Editorial. यह भाजपाइयों की आदत है कि वे उन मामलों की तलाश में रहते हैं जिन पर हंगामा खड़ा किया जा सके और गरीबों को परेशान किया जा सके. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस अब मराठा को ले कर मुंबई को बांटने में लगे हुए हैं. मुंबई में हजारों आटोरिकशा और टैक्सी ड्राइवर बाहर से आए हुए हैं और वे मराठी नहीं जानते. यह नया मुद्दा है भाजपा का.

भाजपा बजाय मुंबई की सड़कों, पटरियों पर रहने वाले को घर देने, बदबूदार स्लमों की साफसफाई कराने, गाद से भरी छोटी नदियों और नालों के साफ करने के ‘बाहर से आया’ खासतौर पर बिहारी आटोरिकशा वालों को मराठी सीखने पर मजबूर कर रही है.

यह तो सब को पता है कि कोई भी जना अपनी दुकान, व्यापार, आटोरिकशा, टैक्सी, फूड ट्रक, फूड ठेला तब तक चला ही नहीं सकेगा, जब तक वह ग्राहकों की बात नहीं सम झेगा. अगर मुंबई में हजारों आटोरिकशा, टैक्सी वाले बिना मराठी जानने वाले हैं तो इसलिए कि मराठी जानने वाले आसानी से उन से बातचीत कर सकते हैं और गैरमराठी जना उन्हें उन की जगह पहुंचा देता ही है.

भाषा का  झगड़ा खड़ा किया गया है ताकि दादागीरी दिखाई जा सके कि हम मराठे शूद्र हैं, बिहारी या यूपी या अन्य कहीं के नहीं. यह कहने की बात नहीं ज्यादातर सेवाओं में लगे लोग ओबीसी, एससी हैं और हिंदू वर्ग व्यवस्था में शूद्र व अछूत हैं. एक जगह के शूद्रों को दूसरी जगह वे शूद्रों से लड़वा कर काम निकालने की ब्राह्मणवादी सोच सदियों पुरानी है. अब चूंकि दोनों को पासपास कच्ची बस्तियों में रहना पड़ता है तो इन में मेलजोल बढ़ने लगा जो ब्राह्मण नेताओं को रास नहीं आ रहा, उन्होंने कोशिश की है दोनों तरह के ओबीसी डिवाइड हो जाएं.

मुंबई में बरसों रह कर कोई भी बिना मराठी सीखे काम चला सकता है. मुंबई के गुजराती समाज जिस के पास काफी व्यापार है सदियों से बिना मराठी सीखे काम ही नहीं कर रहा, ठाठ से रह रहा है. मुकेश अंबानी को मराठी आती होगी और वे फर्राटेदार मराठी बोल पाते हैं, इस में शक है. यही गौतम अडानी का हाल है. पर देवेंद्र फडनवीस गरीब आटोरिकशा वालों को पकड़ रहे हैं, अमीर व्यापारियों, अफसरों को नहीं.

मुंबई पर 200 साल अंगरेजों ने राज किया था. उन्होंने तो नहीं कहा कि हर टैक्सी ड्राइवर को अंगरेजी आनी चाहिए. उन्होंने मराठी भी नहीं सीखी. पर देवेंद्र फडनवीस ठहरे ब्राह्मण जो फूट डालने के मौके ढूंढ़ते रहते हैं. ठीक उसी तरह जैसे पहले बाल ठाकरे डाला करते थे.

मुंबई के आटोरिकशा वालों की भाषा की जगह देवेंद्र फडनवीस आटोरिकशा जिन सड़कों पर चलते हैं उन्हें ठीक करें, ट्रैफिक ठीक करें, मकानदुकान ठीक कराएं, सरकारी दफ्तर ठीक कराएं. गरीबों को डिवाइड न करें.  Editorial.

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