Journalism Challenges Story. समाचार छप गया था. बहुत तफसील से सारी बातें लिखी थीं. सोहन के चेहरे पर संतोष के भाव उभर आए थे, पर इन भावों के पीछे अनजाना डर भी दिखाई दे रहा था.
यह तो सोहन की आदत में शुमार हो चुका था. वह जो सच है लिख देता, फिर उस की प्रतिक्रिया को देखता रहता. वह जानता था कि दिनभर उसे गालियां मिलने वाली हैं, पर ऐसा भी नहीं था कि केवल गालियां ही मिलती हों. लोग उस के लिखने की तारीफ भी करते थे.
‘अब पत्रकार का जीवन तो ऐसा ही होता है. यदि डर गए तो समझ मर गए…’ सोहन फिल्म ‘शोले’ का डायलौग अपने हिसाब से बना कर मन ही मन ही दोहरा लेता था.
पत्रकारिता के क्षेत्र में आए सोहन को लंबा समय नहीं हुआ था, पर उस के लिखने के अंदाज से वह सीनियर पत्रकारों को पीछे छोड़ता जा रहा था.
‘‘अभी नयानया है, जब एकाध झटका लग जाएगा तो सारी हेकड़ी निकल जाएगी,’’ सीनियर पत्रकार सोहन के बेखौफ लिखने से और अपनेआप को उस से पीछे होते जाने से जलन के मारे ऐसा बोल देते थे.
‘‘अरे, हम भी जब पत्रकारिता के क्षेत्र में आए थे, तो ऐसा ही जोश था. खूब खुल कर लिखते थे, पर…’’ इस के आगे वे बताना नहीं चाहते थे. लोग अंदाजा लगा लेते थे कि इन के साथ क्या हुआ होगा.
सोहन ने इस समाचार के लिए बहुत मेहनत की थी. वैसे तो वह समाचार के लिए हर बार मेहनत करता ही था. वह कभी रेडीमेड समाचार नहीं लगाता था. एक समाचार को अच्छी तरह पढ़ कर फिर अपने हिसाब से लिख कर भेजता था अपने अखबार में. यही कारण था कि उस का समाचार दूसरे अखबारों से अलग भी होता और लोग ढूंढ़ कर अखबार पढ़ते भी.
सोहन जब कालेज में पढ़ रहा था तभी उस ने तय कर लिया था कि वह पत्रकारिता के क्षेत्र में आएगा. परिवार से भी उसे इजाजत मिल गई थी. उस ने एक दैनिक समाचारपत्र के प्रतिनिधि के रूप में अपना कैरियर शुरू कर दिया था.
मोबाइल की घंटी बज रही थी. सोहन जानता था कि फोन किस का हो सकता है. एक किस्म से वह इस फोन का इंतजार ही कर रहा था. समाचार छपा है तो प्रतिक्रिया तो आएगी ही. प्रतिक्रिया उस को ही देनी है, जिस के बारे में समाचार छपा था.
यों तो सोहन का मन नहीं हो रहा था कि वह ऐन सुबह अपना मूड खराब करे, पर मोबाइल पर घंटी लगातार बज रही थी. उस ने धड़कते दिल से मोबाइल हाथ में ले लिया, ‘‘हैलो…’’
‘‘कौन बोल रहा है तू… सुन रे हरामखोर, मैं तेरी सारी पत्रकारिता भुला दूंगा…’’ दूसरी ओर से एक दबंग आवाज आई.
‘‘कौन बोल रहे हें आप?’’ सोहन समझ तो गया था कि फोन किस का है, पर वह चाहता था कि सामने वाला अपना नाम बताए. उस ने फोन का रिकौर्डर पहले ही चालू कर लिया था.
‘‘तेरा बाप बोल रहा हूं,’’ बोलने वाला इतने गुस्से में था कि उस की बाकी की बात गले में ही फंस कर रह गई थी.
‘‘यह तो कोई बात नहीं हुई. आप अपना नाम तो बताएं,’’ सोहन सब्र बनाए हुए था.
‘‘मैं बोल रहा हूं… बसंत ठेकेदार. पहचाना कि कुछ और परिचय भी दूं…’’
‘‘अच्छाअच्छा, ठेकेदारजी.’’
‘‘हां, तुझ से बोला था न कि मेरे बारे में समाचार मत लगाना, फिर भी तू ने लगा दिया…’’
‘‘मैं पत्रकारिता आप से पूछ कर तो करूंगा नहीं. मुझे क्या समाचार लगाना है, यह मैं ही तय करूंगा न.’’
‘‘आज तक किसी की हिम्मत नहीं हुई मेरे बारे में छापने की…’’
‘‘तो क्या हुआ… अब मेरी हिम्मत तो हो गई तो मैं ने छाप दिया…’’
‘‘तू जानता नहीं हैं मुझे, इसलिए ऐसी बात कर रहा है.’’
‘‘मुझे आप के बारे में जानने की क्या जरूरत है…’’
‘‘यदि जान लेता तो इतनी हिम्मत नहीं करता. आज तक किसी ने नहीं की. सारे लोग मेरे टुकड़ों पर पलते हैं,’’ उस की आवाज में घमंड तैरने लगा था.
‘‘अच्छा… कौनकौन… जरा मुझे भी नाम बता दो?’’
‘‘तुझे भी टुकड़ा चाहिए था न… तो बता देता.’’
‘‘देखो बसंतजी, मैं तो आप के टुकड़ों पर पलता नहीं हूं, तो आप मुझे आंख क्यों दिखा रहे हैं…’’
‘‘नहीं पलते हो तो पलने लगो… मैं ने कब मना किया है… बता कितने पैसे चाहिए?’’
‘‘मैं ब्लैकमेलिंग नहीं करता. हराम का मैं नहीं खाता…’’ सोहन को भी गुस्सा आता जा रहा था.
‘‘अरे, मैं सब जानता हूं. तुम जैसे दो कोड़ी के पत्रकारों की औकात…’’
‘‘आप ने कुछ लोगों की औकात देखी होगी, पर सारे पत्रकार बिकाऊ नहीं होते इतना ध्यान रखना.’’
‘‘सब बिकता है. ऊपर से नीचे तक कोई दूध का धुला नहीं है. मैं सभी को पैसा देता हूं. नेताओं को भी और अफसरों को भी. और तुम जैसे पत्रकारों को भी,’’ वह घमंड से बोल रहा था.
‘‘देते होंगे, पर मैं न तो पैसे लेता हूं और न किसी से डरता हूं.’’
‘‘देख भाई, क्यों मुझे गुस्सा दिला रहा है… जानता नहीं है कि मैं क्या कर सकता हूं… तू मान जा अभी भी…’’
‘‘देखिए ठेकेदार साहब, मैं बिकाऊ नहीं हूं… ओके.’’
‘‘क्या ओके… सामचार वापस ले ले, यही अच्छा होगा तेरे लिए.’’
‘‘समाचार तो छप चुका है. अखबार भी बंट चुका है. अब क्या वापस लें…’’
‘‘तू इस का खंडन छाप. कल के अखबार में खंडन छप जाना चाहिए… और अपनी कीमत बोल?’’
‘‘मैं बिकाऊ नहीं हूं.’’ ‘‘हां, ठीक है. कल के अखबार में खंडन छाप देना.’’
‘‘ऐसा नहीं होगा. यदि आप को लगता है कि समाचार गलत है तो मेरे ऊपर मानहानि का मुकदमा दर्ज करा दो.’’
‘‘मतलब तू नहीं मानेगा. समझ ले कि तेरे बुरे दिन आ गए हैं.’’
सोहन बोलना तो बहुतकुछ चाह रहा था, पर चुप रहा. उस ने फोन काट दिया.
सोहन का शरीर डर से कांपने लगा था. वह बसंत ठेकेदार को अच्छी तरह जानता था. वह था ही अपराधी. उस के साथ गुंडों की पूरी फौज रहती थी. मारपीट करना और गोली चला कर दहशत फैलाना उस की दिनचर्या में शामिल था. वह रेत का करोबार करता था. अवैध रेत खनन करना और महंगे दामों पर उसे बेचना यह उस का धंधा था. लाखों की कमाई थी तो वह अवैध काम करने में कोई टांग न अड़ाए, इसलिए अफसरों से ले कर पत्रकारों को भी पैसे देता था. कुछ ही पत्रकार थे जो उस से पैसे नहीं लेते थे और न ही पैसों के नाम पर विज्ञापन.
सोहन तो छपने के लिए समाचार भेजने के बाद से ही तनाव में था. वह जानता था कि समाचार छपने के बाद उसे धमकी जरूर मिलेगी. वैसे धमकी मिलना उस के लिए नई बात नहीं थी. वह गाहेबेगाहे ऐसी धमकी को पाता रहता था.
सो हन तैयार हो कर बैठा ही था कि मनोज घबराया हुआ सा उस के पास आ गया, ‘‘अरे, यह क्या किया तुम ने… बसंत ठेकेदार के खिलाफ समाचार छाप दिया…’’
‘‘मैं ने रेत के अवैध खनन के खिलाफ समाचार छापा है और समाचार में कहीं भी बसंत का नाम नहीं है.’’
‘‘बात घुमाफिरा कर ठेकेदार पर ही तो आती है न…’’
‘‘तो उस में खराब क्या है… गलत काम हो रहा है तो छापूंगा नहीं क्या…’’
‘‘तुम ने गलत काम को छापने का ठेका लिया है क्या?’’
‘‘हां, जब मैं पत्रकार बना तो यह मान लो कि मैं ने गलत काम करने वालों की पोल खोलने का ठेका ही ले लिया है.’’
‘‘और इस से तुम को मिल क्या रहा है?’’
‘‘बहुतकुछ… पर वह तुम नहीं समझेंगे…’’
‘‘अरे, अपने साथ के पत्रकारों को देखो… सब मजा कर रहे हैं… कोई महंगी गाड़ी में घूम रहा है तो किसी ने अपना मकान बनवा लिया है, पर तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं है… वही साइकिल और बस…’’
‘‘मेरी जितनी जरूरतें हैं वे पूरी हो रही हैं… और क्या चाहिए. विज्ञापन का कमीशन आ जाता है उस से काम चल जाता है.’’
सोहन मनोज के इशारे को समझ रहा था. उस के साथी पत्रकारों को पैसे की कोई कमी नहीं होती थी. उन का खर्चा उठाने के लिए अफसरों से ले कर बसंत जैसे ठकेदार जो बैठे थे, पर वह कभी पैसे लेता ही नहीं था और न ही किसी का अहसान. वह केवल अखबार में लगने वाले विज्ञापनों और अखबार की बिक्री से मिलने वाले कमीशन पर ही निर्भर था.
थोड़ी देर शांति छाई रही.
‘‘देख भाई, शहर में एक दर्जन पत्रकार हैं… उन में से तो किसी ने भी रेत के बारे में नहीं छापा…’’
‘‘न छापना उन का नजरिया है. मेरे नजरिए में अवैध रेत का मामला छापना चाहिए था तो मैं ने छाप दिया…’’ सोहन की आवाज में आत्मविश्वास था.
‘‘देख भाई, आज के जमाने में ईमानदारी का कोई मतलब नहीं है… ईमानदारी केवल दुश्मन ही पैदा करती है बस.’’
‘‘दुश्मनों के पीछे अपनी ईमानदारी तो छोड़ने से रहा मैं.’’
‘‘संभल जा भाई. किसी दिन कुछ हो गया तो सारी पत्रकारिता भूल जाएगा…’’
सोहन कुछ नहीं बोला. वह मनोज की चिंता को समझ रहा था.
‘‘मेरे पास बसंत ठेकेदार का फोन आया था. वह कह रहा था अपने दोस्त को समझ ले वरना…’’ मनोज ने जानबूझ कर बात अधूरी छोड़ दी थी.
‘‘हां तो उस से कह दो कि तुम ने समझाया पर वह नहीं समझ रहा है…’’
‘‘अरे, ऐसा नहीं होता भाई. तू मान जा और या तो ऐसा ऊटपटांग लिखना छोड़ दे या फिर…’’
‘‘या फिर क्या?’’ ‘‘पत्रकारिता छोड़ दे,’’ मनोज ने धीमे स्वर में ही बोला ऐसा.
सोहन चौंक गया. पत्रकारिता छोड़ दूं…. इन गुंडों के डर से. पर वह चुप रहा.
मनोज कुछ देर और सोहन को समझाता रहा फिर गुस्से में चला गया.
सोहन एक गरीब परिवार से था. उस के पिताजी का निधन हो चुका था. मां ने मेहनतमजदूरी कर के उसे पढ़ाया था. पैसों की कमी तो हमेशा बनी रहती थी, पर फिर भी घरखर्च सीमित संसाधनों में चल ही जाता था.
सोहन ने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान खुद बनाई है और यह बात उसे अच्छी लगती है. कालेज के दिनों से ही उस की पढ़ने की खास आदत रही है. पढ़ने के कारण ही वह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर लेख भी लिखता रहा है. स्थानीय स्तर के मुद्दों पर भी वह लिखता, पर जब लिखता कोई न कोई उस से नाराज जरूर हो जाता.
सोहन मनोज की बातों में उलझा था. वह जानता था कि बसंत ठेकेदार बहुत जालिम है. वह कुछ भी कर सकता है. तो क्या उसे वाकई पत्रकारिता छोड़ देनी चाहिए?
‘‘बहुत अच्छा लिखा है सोहन,’’ सोहन अपनी सोच में इतना उलझ था कि उसे पड़ोस वाले शर्मा अंकल के आ जाने का अहसास भी नहीं हुआ.
शर्मा अंकल रिटायर्ड पुलिस अफसर हैं. उनकी दबंगता के किस्से दूरदूर तक मशहूर रहे हैं. साथ ही उन की ईमानदारी के किस्से भी. रिटायर्ट हो जाने के बाद वे यहीं आ कर रहने लगे थे. वे सोहन की हौसलाअफजाई करते रहते थे.
‘‘जी, आप ने पढ़ा न?’’ ‘‘हां, तभी बोल रहा हूं. बहुत अच्छा लिखा है. पर तुम कुछ परेशान से लग रहे हो. बसंत ठेकेदार ने धमकाया है क्या?’’
सोहन चौंक गया. इन को कैसे पता? वह बोला कुछ नहीं.
‘‘अरे, इतने दिनों तक पुलिस महकमे में रहा हूं तो सबकुछ समझ लेता हूं. फोन आया था उस का तुम्हारे पास?’’
‘‘जी…’’ सोहन धीरे से ही बोला.
‘‘सोहन, मैं जानता हूं कि बसंत ठेकेदार बहुत जालिम है. इस के बल पर ही उस ने इतना पैसा कमाया है. पर वह करता तो गलत ही है न. उस के सारे कारोबार गैरकानूनी हैं. तो किसी को तो उस के खिलाफ खड़ा होना पड़ेगा.’’
‘‘पर अंकल, उस ने जिस तरह से धमकाया है…’’
‘‘हां, मैं समझ सकता हूं. पर तुम्हारे साथ जन समर्थन है. तुम्हारे लिखे को पढ़ते हें लोग… और फिर तुम उन के लिए ही तो लिख रहे हो. वे लोग तुम्हारा समर्थन करेंगे ही. फिर चिंता क्यों करते हो.’’
सोहन को शर्मा अंकल की बात कुछ जमी. सच तो है कि न जाने कितने लोग उस के लिखे की तारीफ करते हैं और कहते भी हैं कि कभी हमारी जरूरत पड़े तो बताना. हम सभी तुम्हारे साथ हैं. तो क्या वाकई वे उस के साथ हैं?
‘‘क्या सोचने लगे? अरे, और कोई तुम्हारे साथ हो या न हो, पर मैं तो तुम्हारे साथ हूं ही.’’
शर्मा अंकल सोहन को समझ कर चले गए थे. उस का डर कुछ कम हुआ.
सोहन ने जब पत्रकारिता शुरू ही की थी तब उस ने एक सरकारी महकमे के बारे में एक रिपोर्ट छापी थी कि कैसे उस महकमे में उन लोगों को तनख्वाह दी जा रही है जो हैं ही नहीं… और ऐसा सालों से हो रहा था.
सोहन की वह रिपोर्ट छपते ही हड़कंप मच गया था. उस महकमे के बड़े अफसर सूटकेस में भर कर नोट ले कर उस के पास आए थे.
‘‘पत्रकार महोदय, इस सूटकेस में 50,000 रुपए हैं. रिपोर्ट वापस ले लो,’’ एक अफसर ने कहा था.
‘‘नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकता. आप अपना सूटकेस उठाएं यहां से.’’
‘‘देख लो भाई, यह बहुत बड़ी रकम है. इस को कमाने में तुम्हें काफी समय लगेगा.’’
‘‘लगने दो. मैं हराम की कमाई करने पत्रकारिता में नहीं आया हूं.’’
‘‘ठीक है, पर एक बार और सोच लो. तुम्हारी रिपोर्टिंग से मेरा कुछ नहीं होगा, क्योंकि मैं इस से आधी रकम दे कर जांच को दबवा दूंगा.’’
‘‘हां सर, आप सही कह रहे हैं, पर मैं हार नहीं मानने वाला हूं. मैं कोशिश करूंगा कि जांच हो.’’
वे अफसर रकम ले कर चले गए. बाद में वैसा ही हुआ जैसा वे अफसर बोल कर गए थे. जांच हुई, पर जांच में कुछ नहीं निकला.
ए क बार सोहन ने जुआ का समाचार छापा था तो जुआ खेलाने वाला उस के घर आ धमका था और बोला था, ‘‘मैं जुआ खेला रहा हूं तो तुम को क्या तकलीफ है?’’
‘‘जुआ खेलाना अपराध है, गैरकानूनी है.’’
‘‘तो इसे देखना पुलिस का काम है. तुम कौन होते हो…’’
‘‘मैं पत्रकार हूं. समाजसेवा करना मेरा फर्ज है.’’
‘‘देख भाई, बहुत सारे पत्रकार हैं जो मुझ से पैसे लेते हैं. तुम भी लेने लगो और खामोश रहो.’’
‘‘मैं ऐसे पैसे नहीं लेता. जो लेते हैं वे पत्रकार नहीं पत्तलकार कहलाते हैं. जूठन चाटने वाले.’’
वह गुस्से से पैर पटकता हुआ चला गया था. सोहन ने लगातार उस के खिलाफ समाचार छापे. पुलिस ने दबिश दे कर 1-2 जुआरियों को पकड़ लिया, पर जुआ फिर भी रुका नहीं.
इ सी तरह सोहन को सरकारी राशन दुकान से गेहूं वगैरह लेने ही पड़ता था. उस के पास सफेद राशनकार्ड था. नगरपालिका के अफसर ने तो कितनी ही बार उस से कहा था कि वह उस का गरीबी वाला राशनकार्ड बनवा देंगे, पर उस ने नहीं बनवाया.
पिछले महीने सोहन जब राशन लेने आया था तब उसे एक बुजुर्ग अम्मां मिल गई थीं जो दुकान के बाहर बैठ कर दुकान वाले को गरिया रही थीं. दुकान वाले ने उस बुढि़या को बोल दिया था कि उस के हिस्से का राशन इस महीने नहीं आया. वह गुस्से में आ गई. उस के पास अति गरीबी वाला राशनकार्ड था. वह इस राशन के भरोसे ही अपना पेट भरती थी.
सोहन ने उस बुढि़या से बात की और उसे मोबाइल पर रिकौर्ड भी कर लिया फिर उस ने दुकानदार से बात करनी चाही तो दुकानदार मन्नतें करने लगा, ‘‘रहने दो साहब, मैं उन्हें अभी राशन दे देता हूं.’’
‘‘वह तो तुम दोगे ही, देना ही पड़ेगा,’’ सोहन ने कठोर आवाज में उस से कहा. फिर उस ने एक शानदार रिपार्ट तैयार कर अखबार में छपवा दी.
दुकानदार को केवल कारण बताओ नोटिस जारी हुआ तो सोहन और भनभना गया. उस ने फिर न्यूज लगाई और उस में महकमे के बड़े अफसरों को भी घेरा तो प्रशासन हरकत में आया और दुकानदार को निलंबित कर दिया गया.
इसी तरह बसंत ठेकेदार को लगता था कि उस के डर से और उस के रकम बांटने के कारण कोई उस के खिलाफ न तो लिखेगा और न ही बोलेगा, पर अचानक उस के औफिस के सामने सरकारी गाडि़यों का काफिला आ कर रुक गया और एकएक कागज को समेटा जाने लगा.
इस से बसंत ठेकेदार का गुस्सा सोहन पर बढ़ गया था. उस की धाक को धक्का लगा था . जो अफसर उस के औफिस में पैसों का लिफाफा लेने आते थे, वे आज उसे धमका रहे थे.
अफसरों के जाते ही बसंत ठेकेदार ने 4 लठैतों को अपने साथ बिठाया और सोहन को ढूंढ़ने निकल गए. उन्हें सोहन को ढूंढ़ने में कोई मेहनत नहीं करनी पड़ी. सोहन उन्हें साइकिल में ताला लगा कर आगे बढ़ते दिख गया था.
बसंत ठेकेदार की गाड़ी रुक गई और लठैत बाहर निकल कर सोहन के चारों ओर फैल गए. बसंत ठेकेदार गाड़ी से उतारा और उस ने सीधे सोहन के गाल पर एक तमाचा रसीद कर दिया.
सोहन इस के लिए तैयार नहीं था. चांटा लगते ही वह जमीन पर गिर गया. उस के गिरते ही बसंत के लठैतों ने लट्ठ बरसाने शुरू कर दिए.
चारों ओर भीड़ जमा हो गई थी. सोहन भीड़ से खुद को बचाने की गुहार लगा रहा था, पर सभी मूकदर्शक बने हुए थे.
सोहन लहूलुहान हो चुका था. बसंत अपने लठैतों के साथ वहां से जा चुका था, पर सोहन अब भी सड़क पर पड़ा कराह रहा था.
पुलिस की गाड़ी आई तो पर उस ने सोहन की ओर देखा भी नही . सोहन से पुलिस भी बहुत परेशान थी. घटना की जानकारी फैलते ही पत्रकार भी वहां इकट्ठा होने लगे थे, पर वे भी मूक ही बने बैठे थे.
शर्मा अंकल का वहां से निकलना अचानक ही हुआ था. उन्होंने बीच सड़क पर भीड़ लगी देखी तो वे उत्सुकतावश वहां पहुंच गए. उन की नजर जैसे ही सोहन पर पड़ी वे चिल्ला पड़े, ‘‘सोहन…’’ फिर उन्होंने सोहन को अपनी बांहों में उठाया और अस्पताल की ओर पैदल ही चल पड़े.
लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले सोहन आखिरी सांस ले चुका था. इस तरह एक ईमानदार पत्रकार और उस की ईमानदार कलम हमेशा के लिए शांत हो गई थी. Journalism Challenges Story
–कुशलेंद्र श्रीवास्तव




