Story in Hindi. लक्ष्मी अपने कालेज के सहपाठी राजेश से प्यार करती थी. पर वह दलित था और लक्ष्मी ऊंची जाति की. लक्ष्मी ने जब राजेश के बारे में अपने घर में बताया, तो मानो भूचाल आ गया. आगे क्या हुआ?
लक्ष्मी 3 दिन से भीतर ही भीतर परेशान लग रही थी. उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. वह अपने मातापिता से कुछ कहना चाहती थी, मगर कह नहीं पा रही थी.
लक्ष्मी कालेज में बीए कर रही थी. उसी की क्लास में सेठ धरमदास का बेटा राजेश भी पढ़ रहा था दोनों में कब प्यार हुआ पता नहीं चला. वह राजेश को बहुत चाहती थी. राजेश भी उसे चाहता था.
राजेश के पिता का बीच बाजार में जूतों का बड़ा शोरूम था. खूब आमदनी होती थी. जब भी वे दोनों पार्क में मिलते थे, तब घंटों बतियाते थे.
लक्ष्मी के पिता का नाम दीनदयाल था. वे ऊंची जाति के थे. वे कभी नहीं चाहते थे एक एससी लड़के को अपना दामाद बनाएं. जाति की दीवार उन के सामने थी.
लक्ष्मी राजेश के घर कई बार गई थी. उस के घर वाले उसे बहू बनाने को तैयार थे. मगर राजेश के पिता धरमदास का कहना था, ‘‘जाति की दीवार तुम दोनों के बीच खड़ी है. क्या तुम्हारे मातापिता इस शादी के लिए तैयार हैं? उन्हें इस शादी के लिए राजी करना तुम्हारा काम है. हम तुम्हारे पिता से हाथ मांगने नहीं जाएंगे.’’
पर लक्ष्मी तो लड़की थी. वह कैसे करती अपनी शादी की बात. वैसे भी दूल्हा नहीं मिल रहा था. जैसे ही दूल्हा मिल जाएगा, उस का कालेज छुड़वा दिया जाएगा.
आज लक्ष्मी ने पूरा मन बना लिया था. कि वह बात कर के रहेगी. मां अकेली बैठ कर गेहूं बीन रही थीं. उस के आसपास न पिता थे, न भाईबहन.
लक्ष्मी ने हिम्मत कर के अपनी मां से कहा, ‘‘मां, मुझे तुम से एक बात कहनी है.’’ ‘‘क्या बात है?’’ मां ने पूछा.
‘‘पहले मुझे वचन दो, आप नाराज तो नहीं होंगी…’’ कह कर लक्ष्मी चुप हो गई. ‘‘कह दे क्या कहना चाहती है,’’ मां ने लक्ष्मी को भरोसा दिलाते हुए कहा.
‘‘मां, तुम इनकार नहीं करोगी.’’ ‘‘अरे, पहले बात तो बता. पहले से कह रही है कि नाराज मत होना,’’ मां बोलीं.
‘‘बस मां, मुझे पूरा यकीन है कि आप सुन कर नाराज नहीं होंगी,’’ तब निश्चिंत हो कर लक्ष्मी बोली, ‘‘मां, मैं कालेज में अपने साथ पढ़ रहे राजेश से शादी करना चाहती हूं.’’
‘‘क्या कहा… तू राजेश से शादी करना चाहती है…कौन है राजेश? स जाति का है वह?’’ मां नाराज हो कर बोलीं.
‘‘मां, तुम भी जानती होंगी. बाजार में सेठ धरमदास के जूतेचप्पल की बहुत बड़ी दुकान है. राजेश उन्हीं का बेटा है,’’ जब लक्ष्मी ने यह बात कही तब गुस्से से मां बोलीं, ‘‘तू उस मोची की बात कह रही है?’’
‘‘हां मां…,’’ लक्ष्मी गरदन हिलाती हुई बोली, ‘‘उन्हीं का बेटा राजेश है.’’ ‘‘मगर लक्ष्मी, मैं उस मोची के बेटे से तेरी शादी नहीं करा सकती.’’
मांबेटी की इस बात को पिता दीनदयाल ने आड़ में रह कर सुन लिया था. इस समय उन का आना उसे ऐसा लगा जैसे कोई बीच में विलेन आ गया हो. फिर भी लक्ष्मी हिम्मत कर के बोली, ‘‘पापा, राजेश में क्या बुराई है?’’
‘‘बुराई… वह मोची का बेटा है. जूतों की बहुत बड़ी दुकान है उन की, तो इस का मतलब यह नहीं है कि तुम दलित के यहां ब्याह कर के अपनी जाति पर धब्बा लगा दो.’’
‘‘पर पापा, दलित भी तो इनसान होते हैं,’’ लक्ष्मी ने जब यह बात कही तब दीनदयाल गुस्से में आ कर बोले, ‘‘मैं ने कब कहा कि दलित इनसान नहीं होते हैं.’’ ‘‘फिर आप को एतराज क्यों हो रहा है पापा?’’
‘‘देख लक्ष्मी, कान खोल कर सुन ले…’’ गुस्से से दीनदयाल बोले, ‘‘तेरी शादी वहीं होगी, जहां मैं चाहूंगा. समझ और कल से तेरा कालेज जाना बंद.’’
दीनदयाल का फैसला सुन कर लक्ष्मी की मां बोलीं, ‘‘देखोजी, इस का कालेज जाना बंद मत कीजिए.’’
‘‘तुम इस का पक्ष मत लो. कालेज क्या भेजा, खानदान पर बट्टा लगा रही है,’’ अपनी पत्नी को डांटते हुए दीनदयाल बोले, ‘‘गैरसमाज के लड़के से शादी करने की बोल रही है. समाज में अपने मांबाप की पगड़ी उछालेगी क्या?’’
दीनदयाल का गुस्सा शांत नहीं हो रहा था. उन का भाषण चालू था, जो बंद होने का नाम नहीं ले रहा था. लक्ष्मी पापा की आदत को जानती थी. जब वे चालू हो जाते थे, फिर नहीं रुकते थे.
मां भी उस समय खामोश थीं. वैसे भी लक्ष्मी मांपापा से डर कर ही रहती थी. अगर इसी बीच पापा के दोस्त मदनलाल न आते, तो न जाने कितनी देर तक उन का भाषण चालू रहता.
मदनलाल ने धीरे से पूछा, ‘‘क्या हुआ दीनदयाल, क्यों परिवार पर इतना चिल्ला रहे हो? अरे, लक्ष्मी कैसे तुम्हारी नाक कटवाने पर तुली है? मैं समझा नहीं.’’
‘‘अरे मदनलाल, इसे कालेज में पढ़ने क्या भेजा, यह उस मोची के बेटेसे शादी करना चाहती है.’’ ‘‘किस मोची का बेटा?’’ मदनलाल ने पूछा.
‘‘अरे वही मोची धरमदास, जिस की बाजार में चप्पलजूतों की बहुत बड़ी दुकान है. उसी का लड़का इस के साथ कालेज में पढ़ रहा है. कह रही है शादी करूंगी तो उसी से ही.’’
‘‘क्यों बेटी लक्ष्मी, तुम्हारे पापा जो कह रहे हैं, वह सही है?’’ जब मदनलाल ने लक्ष्मी से यह पूछा, तब लक्ष्मी गरदन हिलाती हुई बोली, ‘‘हां अंकल, यह सही है.’’
‘‘वह भी तुम से शादी करना चाहता है?’’ ‘‘हां अंकल, उस का पूरा परिवार मुझे बहू बनाना चाहता है,’’ लक्ष्मी ने अपनी बात कह कर गेंद मदनलाल के पाले में डाल दी.
तब मदनलाल बोले, ‘‘दीनदयाल, तुम्हें क्यों एतराज हो रहा है?’’ ‘‘अरे, तुम कैसी बात करते हो मदनलाल…’’ जरा नाराज हो कर दीनदयाल बोले, ‘‘एक मोची के घर में मैं अपनी लड़की कैसे ब्याह दूं. वह निचली जाति का मैं ऊंची जाति का.’’
‘‘यह ऊंचनीच को छोेड़ो दीनदयाल…’’ समझाते हुए मदनलाल बोले, ‘‘ये सब तो पुराने ढकोसले हैं. आजकल यह सब खत्म हो रहा है. वह जमाना भी गया, जब मांबाप जहां कराते थे, वहीं शादी होती है. जब दोनों के मन मिल गए, तब इन की शादी कराना ही अच्छा है.’’
‘‘मेरी कितनी बेइज्जती होगी, यह सोचा है.’’ ‘‘थोड़े दिन महल्ले वाले, रिश्तेदार कह लेंगे. फिर सब चुप हो जाएंगे,’’ समझाते हुए मदनलाल बोले.
इस पर दोनों की काफी बहस हुई. न दीनदयाल कमजोर पड़ रहे थे और न ही मदनलाल. आखिर में जातेजाते मदनलाल कह गए, ‘‘इस बात को गांठ बांध कर सुन ले दीनदयाल, अगर इन की शादी नहीं करेगा तो ये भाग कर शादी कर लेंगे, क्योंकि दोनों बालिग हैं. तब तुम्हारी नाक नहीं कटेगी… इसलिए समझदारी इसी में है कि इन दोनों की आपस में शादी करवा दो, ताकि उम्रभर के लिए दोनों परिवार का रिश्ता बना रहे. इस के बावजूद तुम अपनी जिद पर अड़े हो तो अड़े रहो, नुकसान तुम्हारा होना है,’’ कह कर वे चले गए.
दीनदयाल माथा पकड़ कर बहुत देर तक इस पर सोचते रहे. रहरह कर मदनलाल की आखिरी बात उन के कानों में गूंजती रही. काफी देर बाद वे लक्ष्मी को आवाज देते हुए बोले, ‘‘लक्ष्मी, जरा बाहर आना.’’
‘‘क्या पापा?’’ लक्ष्मी के साथ उस की मां भी आईं. ‘‘राजेश के साथ तुम्हारी शादी मुझे मंजूर है…’’ दीनदयाल बोले, ‘‘मुझे धरमदास के पास ले जाना, ताकि उन से मैं शादी की बात कर सकूं.’’
‘‘सच पापा,’’ कहते हुए खुशी से लक्ष्मी का चेहरा खिल उठा.




