Love Story. अंजलि उम्र में आशीष से 5 साल बड़ी थी, पर फिर भी वह उसे बहुत पसंद करता था. एक दिन आटोरिकशा में 2 गुंडों ने अंजलि को परेशान किया, तो आशीष वहां जा कर उन से भिड़ गया. आगे क्या हुआ?
शहर की सुबह धीरेधीरे जाग रही थी. सड़कों पर भागती गाडि़यां, चाय की दुकानों से उठती भाप, स्कूल और कालेज जाते विद्यार्थियों की चहलपहल… हर तरफ रोजमर्रा की जिंदगी अपनी रफ्तार पकड़ रही थी.
अंजलि आईने के सामने खड़ी अपने बाल संवार रही थी. लगभग 27 साल की अंजलि शहर के एक नामी कालेज में लैक्कचरर थी. उस के चेहरे पर सादगी और आत्मविश्वास दोनों साथसाथ दिखाई देते थे. उस की मां ने रसोई से आवाज लगाई, ‘‘अंजलि बेटा, नाश्ता कर के जाना.’’
‘‘मम्मी, देर हो रही है. कालेज पहुंच कर कैंटीन में कुछ खा लूंगी.’’ ‘‘तुम रोज यही कहती हो.’’
अंजलि मुसकरा दी. बैग उठाया और जल्दीजल्दी घर से निकल गई.
उसी महल्ले की दूसरी गली में आशीष भी अपने कमरे में तैयार हो रहा था. उस की उम्र मुश्किल से 22 साल थी. बैंक में नईनई नौकरी लगी थी.
आशीष की मां ने उस के माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘क्या तू ठीक है? कल फिर देर रात तक काम करता रहा था.’’
‘‘अरे मम्मी, मैं बिल्कुल ठीक हूं,’’ आशीष मुसकराया, लेकिन उस की मुसकान के पीछे हमेशा की तरह एक चेहरा छिपा हुआ था, अंजलि का चेहरा. जिस लड़की ने उसे 9वीं से 12वीं तक मैथ्स पढ़ाया था, वही अब उस की दुनिया बन चुकी थी.
आशीष को आज भी याद था कि जब पहली बार अंजलि ने उस के टैस्ट में 100 में 100 नंबर आने पर उस के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था, ‘‘शाबाश, मुझे पता था, तुम कर लोगे.’’
बस शायद उसी दिन से अंजलि आशीष के दिल में उतर गई थी, लेकिन अंजलि उसे हमेशा छोटे भाई की तरह ही देखती थी.
करीब साढ़े 10 बजे अंजलि सड़क किनारे खड़े एक आटोरिकशा में जा कर बैठ गई.
‘‘भैया, जल्दी सिविल लाइन कालेज चलिए.’’
आटोरिकशा आगे बढ़ गया. कुछ दूर पहुंचते ही अचानक 2 लड़के तेजी से आए और आटोरिकशा में घुस कर अंजलि के बगल में बैठ गए. उन के चेहरे पर अपराध की कठोरता साफ दिखाई दे रही थी. एक ने जेब से चाकू निकाला. धूप की किरण चाकू पर पड़ी तो उस की चमक देख कर अंजलि का दिल कांप उठा.
‘‘चुपचाप बैठी रह,’’ एक गुंडे ने धीमी लेकिन खतरनाक आवाज में कहा.
आटोरिकशा चलाने वाला डर गया. ‘‘भाई साहब मुझे जाने दो.’’ वह कांपते हुए बोला.
दूसरे गुंडे ने उस की गरदन पकड़ ली, ‘‘सीधे गाड़ी चला.’’
अंजलि का गला सूख गया. उस की सांसें तेज हो गईं. अगले ही पल उस ने पूरी ताकत से चीख मारी, ‘‘बचाओ बचाओ.’’
अंजलि की आवाज सड़क पर गूंज उठी. उसी समय सामने से बाइक पर आशीष जा रहा था. जैसे ही उस के कानों में यह आवाज़ पड़ी, उस ने पलट कर देखा. आटोरिकशा के अंदर सहमी हुई अंजलि दिखाई दी.
आशीष की आंखों में खून उतर आया. उस ने बिना सोचेसमझे बाइक आटोरिकशा के सामने तिरछी खड़ी कर दी. आटोरिकशा रुक गया.
आशीष गुस्से से चिल्लाया, ‘‘कौन हो तुम लोग?’’ एक गुंडा हंसा, ‘‘तू कौन होता है बीच में आने वाला?’’
‘‘जिस लड़की के साथ तुम बदतमीजी कर रहे हो, वह मेरी…’’ कहते हुए आशीष रुक गया. उस ने गुस्से से दांत भींच लिए. ‘‘उतर नीचे,’’ आशीष चिल्लाया.
दोनों गुंडे आटोरिकशा से उतर आए. एक ने चाकू घुमाते हुए कहा, ‘‘ज्यादा हीरो बन रहा है…’’
अगले ही पल आशीष ने उस के मुंह पर जोरदार मुक्का मार दिया. सड़क पर हड़कंप मच गया. दोनों गुंडे उस पर टूट पड़े. अंजलि डर के मारे आटोरिकशा से उतर कर एक तरफ खड़ी कांप रही थी.
‘‘कोई बचाइए,’’ कहते हुए अंजलि रो पड़ी.
लेकिन लोग सिर्फ तमाशा देख रहे थे. आशीष अकेला दोनों से भिड़ा हुआ था. एक गुंडे ने पीछे से उसे पकड़ लिया. दूसरे ने चाकू उठाया. ‘‘आशीष, संभलो,’’ अंजलि चीखी.
लेकिन देर हो चुकी थी. चाकू सीधे आशीष के कंधे में धंस गया.
‘‘आह,’’ आशीष की दर्दभरी चीख निकल गई. खून उस की सफेद शर्ट को लाल करने लगा, लेकिन वह रुका नहीं. उस ने घायल कंधे के बावजूद दोनों को इतनी बुरी तरह पीटा कि वे डर कर भाग निकले.
आशीष लड़खड़ा कर सड़क पर बैठ गया.
‘‘आप ठीक हैं न?’’ इतना कह कर आशीष लगभग बेहोश हो गया.
तभी आशीष का दोस्त कुलदीप वहां पहुंच गया. उस ने तुरंत लोगों की मदद से आशीष को उठाया और पास के नर्सिंग होम ले गया.
डाक्टर ने जांच करते हुए कहा, ‘‘घाव काफी गहरा है. तुरंत टांके लगाने पड़ेंगे.’’
आशीष दर्द से कराह रहा था, लेकिन उस की आंखों में सिर्फ चिंता थी.
‘‘वे ठीक हैं न?’’ कुलदीप ने उस का हाथ दबाया, ‘‘हां, वे ठीक हैं.’’
इधर अंजलि घर लौट आई थी. उस के हाथ अब भी कांप रहे थे. उस ने कालेज में फोन कर के छुट्टी ले ली, लेकिन धीरेधीरे उस के मन में एक दूसरा विचार जन्म लेने लगा. उसे याद आया, कुछ महीने पहले आशीष ने उस से कहा था, ‘‘मैं आप से प्यार करता हूं.’’
वह हंस पड़ी थी, ‘‘पागल हो गए हो क्या… मैं तुम से 5 साल बड़ी हूं.’’ ‘‘उम्र से क्या फर्क पड़ता है?’’
‘‘बहुत फर्क पड़ता है… और तुम मेरे छात्र रहे हो.’’
उस दिन के बाद आशीष चुप रहने लगा था. अब अंजलि के मन में शक उठ खड़ा हुआ, ‘कहीं ये सब उसी का प्लान तो नहीं था?’
डर और शक मिल कर इनसान से सहीगलत का फर्क छीन लेते हैं और यही अंजलि के साथ हुआ. शाम तक आशीष को अस्पताल से छुट्टी मिल गई. कंधे पर मोटी पट्टी बंधी थी. चेहरा दर्द से पीला पड़ा हुआ था. लेकिन वह सीधे अंजलि के घर पहुंचा. दरवाजा खुला. अंजलि सामने थी.
आशीष ने हलकी मुसकान के साथ कहा, ‘‘अब आप ठीक हैं न?’’
अचानक ‘चटाक’… जोरदार थप्पड़ उस के चेहरे पर पड़ा. आशीष लड़खड़ा गया. उस की आंखें फटी रह गईं.
‘‘मुझे तुम से यह उम्मीद नहीं थी,’’ अंजलि गुस्से से कांप रही थी, ‘‘मुझे पाने के लिए तुम ने गुंडों का सहारा लिया? इतना गिर जाओगे तुम?’’
आशीष जैसे पत्थर का हो गया, ‘‘आप क्या कह रही हैं?’’ ‘‘ड्रामा मत करो.’’
‘‘मैं सच…’’ आशीष बोला. ‘‘बस, निकल जाओ यहां से.’’
आशीष की आंखों से आंसू बह निकले, ‘‘मैं ने आप की जान बचाई.’’ ‘‘और एहसान जताने आ गए?’’
आशीष का गला भर आया. कुछ पल वह चुप खड़ा रहा, फिर धीरे से बोला, ‘‘काश आप एक बार मेरी आंखों में देख कर सच पहचान पातीं.’’
और आशीष चला गया. घर पहुंचते ही उस ने खुद को कमरे में बंद कर लिया. उस की मां रोते हुए दरवाजा पीटती रहीं, ‘‘बेटा, दरवाजा खोल.’’
लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया. रात को कुलदीप आया और उस ने पूरी घटना सब को बताई.
‘‘चाचाजी, अगर आशीष समय पर नहीं पहुंचता तो पता नहीं क्या हो जाता.’’
आशीष के पिता की आंखें भर आईं. उन्होंने तुरंत अंजलि को फोन लगाया और बोले, ‘‘बेटा, तुम अभी बहुत बड़ी गलतफहमी में हो.’’
लेकिन अंजलि अभी भी गुस्से में थी, ‘‘अंकल, आशीष ने फिल्मी ड्रामा किया है.’’
आशीष के पिता की आवाज भारी हो गई, ‘‘तुम ने उस के कंधे का घाव देखा है? 5 टांके लगे हैं उसे वह लड़का तुम्हारे लिए अपनी जान दे सकता है, लेकिन ऐसी हरकत नहीं कर सकता.’’ फोन कट गया.
रात के 2 बजे जब घर वालों ने दरवाजा तोड़ा, तो अंदर का सीन देख कर सब रो पड़े. आशीष फर्श पर बैठा था. उस की आंखें सूज चुकी थीं. वह बच्चे की तरह फूटफूट कर रो रहा था.
‘‘मैं ने क्या गलत किया था.’’ आशीष की मम्मी ने उसे गले लगा लिया.
उधर अंजलि भी पूरी रात नहीं सो पाई. हर बार आंख बंद करते ही वही सीन सामने आ जाता. खून से लथपथ आशीष उस की कांपती आवाज और फिर उस का मासूम चेहरा. धीरेधीरे उस का भरम टूटने लगा.
‘‘अगर वह सच में बेकुसूर हुआ तो,’’ उस की आंखों से आंसू बह निकले. ‘‘मैं ने क्या कर दिया.’’ सुबह होते ही वह भागती हुई आशीष के घर पहुंची. कमरे का दरवाजा आधा खुला था. आशीष खिड़की के पास चुपचाप बैठा था. अंजलि अंदर गई. उस की आंखों से आंसू बह रहे थे. अचानक वह आशीष के सामने घुटनों पर बैठ गई.
‘‘आशीष,’’ उस की आवाज कांप रही थी, ‘‘मुझे माफ कर दो मैं ने तुम्हें समझे बिना बहुत बड़ा इलजाम लगा दिया.’’
आशीष चुप रहा. उस की आंखों से आंसू बहते रहे. अंजलि रो पड़ी, ‘‘तुम ने मेरी जान बचाई और मैं ने तुम्हारा दिल तोड़ दिया.’’
कुछ क्षण कमरे में सिर्फ सिसकियां गूंजती रहीं, फिर पहली बार आशीष ने उस की ओर देखा. उस की आवाज टूटी हुई थी, ‘‘चोट कंधे पर लगी थी, लेकिन दर्द यहां हुआ.’’ उस ने अपने सीने पर हाथ रख लिया.
अंजलि फूट पड़ी. आशीष के पापा ने अंजलि और आशीष के सिर पर अपने हाथ रख कर दोनों को गले लगा लिया, फिर अंजलि को कहा, ‘‘बेटी, कब आ रही हो इस घर में बहू बन कर?’’
अंजलि शरमा कर आशीष की मम्मी के गले लग गई. उसी समय अंजलि के मम्मीपापा भी आशीष के घर आ गए. अंजलि और आशीष ने झुक कर दोनों के चरण छुए.
उस दिन सिर्फ 2 दिलों का मिलन नहीं हुआ था, बल्कि 2 परिवार हमेशा के लिए एक खूबसूरत रिश्ते में बंध गए थे. आंगन में जलता छोटा सा दीपक मानो इस नए रिश्ते की उजली शुरुआत का साक्षी बन कर मुसकरा रहा था.
— दीपक गिरकर




