Power Culture. आजकल ‘दबदबा’ शब्द अपनी परिभाषा ढूंढ़ रहा है. एक जमाना था जब दबदबा मूंछों के ताव, बुलंद आवाज और चौड़ी छाती से पहचाना जाता था. पर आज का दबदबा बड़ा संकोची हो गया है. वह आता तो है, पर दबे पांव. वह दिखता तो है, पर घूंघट की ओट में. आलम यह है कि जिस का दबदबा है, वही डरा हुआ है कि कहीं उस का दबदबा किसी और के दबदबे के नीचे न दब जाए.
शहर के रसूखदार नेताजी को ही देख लीजिए. कुरता इतना सफेद कि हंस को कौम्प्लैक्स हो जाए और स्कौर्पियो के पीछे समर्थकों की ऐसी फौज कि लगे मानो अभी युद्ध छिड़ने वाला है. मंच पर दहाड़ते हैं तो माइक भी थर्राने लगता है. लेकिन जैसे ही किसी ऊंचे पद वाले का फोन आता है, नेताजी का सारा ‘दबदबा’ अचानक योगाभ्यास करने लगता है, बिलकुल सिकुड़ कर छोटा हो जाता है, कंधे ?ाक जाते हैं, आवाज में चाशनी घुल जाती है और चेहरे पर ऐसी दीनता उतर आती है कि मानो शहर के सब से सीधे आदमी वही हों. यह है आज का ‘दबादबा’ दबदबा.
दफ्तरों का हाल तो और भी निराला है. यहां बौस का अपना एक अलग ‘दबदबा’ होता है. वे केबिन में बैठते हैं तो चपरासी से ले कर जूनियर इंजीनियर तक की सांसें ऊपरनीचे होने लगती हैं. फाइलें डर के मारे कांपती हैं. पर असलियत तब खुलती है जब बौस की पत्नी का फोन आता है. उस समय बौस का वह सारा दबदबा लंच बौक्स की खाली कटोरी की तरह बजने लगता है. वे ‘हां जी, न जी’ के बीच ऐसे पिसते हैं कि बेचारा दबदबा खुद अपने होने पर रोने लगता है.
यहां दबदबा केवल पद का है, आदमी का नहीं. पद हटा, तो दबदबा ऐसे गायब होता है जैसे गधे के सिर से सींग.
आजकल सोशल मीडिया ने तो दबदबे का हुलिया ही बिगाड़ दिया है. यहां हर दूसरा आदमी ‘इन्फ्लुएंसर’ बन कर अपना दबदबा कायम करने की फिराक में है. रील में वे शेर की तरह दहाड़ते हैं, दुनिया बदलने की कसमें खाते हैं, पर असल जिंदगी में उन की हालत यह है कि पड़ोसी की कुतिया भी भौंक दे तो घर का दरवाजा अंदर से बंद कर लेते हैं.
उन का दबदबा केवल ‘लाइक्स’ और ‘शेयर’ की बैसाखियों पर टिका है. जिस दिन इंटरनैट बंद, उस दिन सारा दबदबा ठप. यह डिजिटल दबदबा भी बड़ा अजीब है, देखने में तो विशालकाय दिखता है, पर एक ‘ब्लौक’ बटन की मार भी नहीं सह पाता.
महल्लों में भी एक दौर था जब ‘बड़े बुजुर्गों’ का दबदबा हुआ करता था. उन के खांसने भर से गली के लड़के सिगरेट छिपा लेते थे. आज का दबदबा बदला हुआ है. अब महल्ले में उस का दबदबा है, जिस के पास सब से तेज भौंकने वाला विदेशी कुत्ता है. कुत्ता मालिक के दबदबे को लोग अपनी पैंट बचाते हुए चुपचाप स्वीकार कर लेते हैं. यह डर है या दबदबा, कहना मुश्किल है.
शादीब्याह के आयोजनों में तो दबदबे की नूराकुश्ती देखने लायक होती है. फूफाजी का अपना अलग दबदबा होता है जो रायते में नमक ज्यादा होने जैसी मामूली चीज पर ही जाग जाता है. उन का दबदबा इस बात पर डिपैंड करता है कि उन्हें कितनी बार मनाया गया. अगर बिना मनाए मान गए, तो दबदबा कैसा? इसलिए वे जानबू?ा कर मुंह फुलाए कोपभवन में बैठे रहते हैं.
यह ‘रूठा हुआ दबदबा’ भारतीय संस्कृति की एक अनमोल धरोहर है. इसे पालतेपोसते रहने की उज्ज्वल परंपरा हमारी पारिवारिक संस्कृति का अविभाज्य अंग है.
कुलमिला कर, आज के दौर में दबदबा एक भ्रम है. हर दबदबे के पीछे एक कमजोरी छिपी है और हर असरदार आदमी किसी और के असर से दबा हुआ है. यह एक ऐसी कड़ी है, जिस में हम सब एकदूसरे को दबाने की कोशिश में खुद दबे जा रहे हैं.
इसीलिए, अगर आप को कोई बहुत रोब झाड़ता हुआ दिखे, तो परेशान न हों. बस, यह सोच कर मुसकरा दें कि उस का दबदबा भी कहीं न कहीं, किसी न किसी के सामने ‘दबादबा’ ही होगा.
दबदबा अब दहाड़ता नहीं, केवल फुसफुसाता है. और जहां फुसफुसाहट हो, वहां समझ लीजिए कि दबदबे का दम निकल चुका है. अब तो बस नाम की तख्ती रह गई है, अंदर का डर सब को पता है.
लेखक : गोविन्द सेन




