लकड़हारों के हाथ 11 हजार रुपए में उस पेड़ को बेच कर बेचारी राधा अभी चैन की सांस भी नहीं ले पाई थी कि एक नौजवान ने आ कर पूछा, ‘‘काकी, आप ने सड़क किनारे वाला पेड़ बेच दिया?’’

‘‘हां बेटा,’’ राधा ने धड़कते दिल से कहा, ‘‘हड़बड़ी में सिर्फ 11 हजार रुपए में दे दिया. क्या करती... अब भी कलेजा धकधक कर रहा है कि कहीं सरपंच को न पता चल जाए. उसे खबर लग गई, तो न जाने कौन सा बखेड़ा खड़ा कर देगा... ये लोग जल्दी से पेड़ उठा लें, तभी चैन आएगा.’’

यह सुन कर वह नौजवान मुसकराते हुए बोला, ‘‘तभी तो 8-9 मजदूर पेड़ काटने में लगा दिए हैं. खैर, कोई बात नहीं, आप का भला हो.’’

मगर राधा का भला नहीं हुआ. वह नौजवान बड़ा बदमाश था. दूसरों को लड़ता देखने में उसे बड़ा मजा आता था. उस ने फौरन यह खबर सरपंच तक पहुंचा दी.

पेड़ बिक जाने की बात सुनते ही सरपंच का खून खौल उठा. गुस्से में वह पहले तो पागलों की तरह बड़बड़ाया, फिर मोटरसाइकिल उठाई और ब्लौक दफ्तर की ओर चला गया.

उधर लकड़हारों ने देखते ही देखते उस पेड़ को काट कर गिरा दिया और कुल्हाडि़यों से उस की डालों के टुकड़े करने लगे, तभी सरकारी अफसर के साथ सरपंच दनदनाते हुए वहां आ पहुंचा. उस ने लकड़हारों से डपट कर पूछा, ‘‘मेरे पेड़ को किस ने काटा?’’

‘‘मैं ने...’’ एक मोटातगड़ा नौजवान कंधे पर कुल्हाड़ी रखे आगे आया, ‘‘यह पेड़ आप का कैसे हो गया? मैं ने राधा काकी से खरीदा है.’’

‘‘पेड़ उस का नहीं, मेरा है. अब तुम सब फंस गए हो... पहले अच्छी तरह पता तो कर लिया होता,’’ सरपंच सख्ती से बोला.

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