लेखक- डा. प्रणव भारती

टेलीफोन की घंटी बहुत देर से बज रही थी. विनी बाथरूम में थी. वह बिना नहाए ही बाथरूम से निकली, रिसीवर को उठा कर जैसे ही उस ने कान पर ला कर ‘हैलो’ कहा, एक ऐसी आवाज उस के कानों में पड़ी जो बड़ी पहचानी सी थी परंतु फिर भी पहचान के घेरे में नहीं आ पा रही थी.

‘‘हैलो…कौन?’’ उस  ने बेसब्री से कहा.

‘‘विनी दीदी…नहीं पहचाना, नमस्ते…लगता है आप भूल गई हैं,’’ ये आवाज विनी को कई वर्ष पीछे धकेल कर ले गई.

‘‘अरे, राजू? कहां से बोल रहे हो भाई?’’ उस के मुख पर हर्षोल्लास पसर गया.

‘‘मैं अमेरिका से बोल रहा हूं…’’ आवाज खनक रही थी, ‘‘आप का आशीर्वाद है दीदी. इसीलिए यह सबकुछ हो सका. मैं ने यहां घर बना लिया है, दीदी. अपनेआप पर विश्वास नहीं होता. पता नहीं मैं यह सबकुछ कैसे कर पाया.’’

‘‘हम कहां कुछ करते हैं, राजू? हम तो माध्यम हैं न? हमें तो सिर्फ गुमान रहता है कि हम ने किया, हम करते हैं…’’ विनी आदत के अनुसार अपना फलसफा झाड़ना न भूली.

‘‘यही बातें सुनने को मेरा मन बेचैन रहता है, दीदी. यहां सबकुछ है, हर सुखसुविधा है पर वह बात नहीं जो वहां पर थी. और सब से बड़ी बात यहां विनी दीदी नहीं हैं…’’

‘‘अच्छा, अच्छा क्यों अपना बिल बढ़ा रहा है? मुंबई से तो कभी बात भी कर लेता था पर वहां जा कर तो भूल ही गया अपनी विनी दीदी को,’’ उस ने उलाहना दे कर बात बदलने का प्रयास किया.

‘‘नहीं, दीदी, भूलता तो आप को फोन कैसे करता. मेरी इच्छा थी कि पहले कुछ बन जाऊं तब आप को बताऊंगा कि मैं कुछ कर पाया. संस्कार तो आप से ही पाए हैं मैं ने. जड़ें मेरी वहां पर ही हैं, अपनी जड़ों से अलग हो कर कोई पेड़ पनप सकता है क्या? फिर मेरा बोधिवृक्ष तो आप हैं. मैं ने आप को पत्र लिखा है, दीदी.’’

‘‘पता नहीं क्याक्या बोल रहा है. चल, बच्चों को व बहू को मेरा प्यार देना, कभीकभी याद कर लिया करना अपनी विनी दीदी को…बाय…’’

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विनी ने रिसीवर रख दिया. दरअसल, उस की भी आंखें भर आई थीं. वह धम्म से सोफे पर बैठ गई और अपने अतीत में विचरण करने लगी.

विनी जब विवाह कर के गुजरात आई थी तब राजू 8-10 वर्ष का था. धीरेधीरे राजू विनी के पास आने लगा. सामने नीचे वाले फ्लैट में ही वह रहता था. तनु को देखदेख कर बहुत खुश होता वह, कभी कहता कि कितना गोरा है, कितना सुंदर…वह उसे हर समय घुमाने के चक्कर में रहता. साल भर का होतेहोते तनु अपनी मां से अधिक राजू को पहचानने लगा था. विनी को भी बड़ी सुविधा होती.

राजू के परिवार में 4 भाई, 1 तलाकशुदा बहन व उस का बेटा और मातापिता थे. हर चीज उसे सब से कम व बची हुई ही मिलती. राजू के मन में एक ‘कांप्लेक्स’ आ गया था. एक बार राखी के दिन ऊपर आ गया. बोला, ‘दीदी, आप मुझे राखी बांधेंगी?’ विनी को उस का दीदी कहना बड़ा प्यारा लगता.

‘तुम्हारी तो बहन है न, राजू?’ विनी ने पूछा था.

‘हां, है न. पर मुझे राखी बंधवानी है. आप बांधेंगी न?’ वह राखी भी साथ ले कर आया था.

‘लाओ,’ विनी ने राखी उस के हाथ से ले कर उसे बांधी और टीका कर के उस के मुंह में मिठाई रख दी.

विनी उत्तर प्रदेश से गुजरात आई थी. वहां की प्रथा के अनुसार वह हर रक्षाबंधन को जवे, सेंवई बनाती. राजू ने दूध के जवे खाए तो उस का मन बागबाग हो गया. फिर वह हर वर्ष आ कर राखी बंधवाता और बड़ा सा कटोरा भर कर जवे खाता. विनी को न जाने क्यों उसे खाते देख कर एक अजीब तरह का सुख मिलता.

2-3 वर्ष बाद एक राखी के दिन राजू अचानक ही रोंआसा हो उठा था.

‘क्या बात है, राजू?’ विनी ने प्यार से पूछा.

‘कुछ नहीं, दीदी,’ आंसू आ कर उस की पलकों पर ठहर गए, ‘मैं आप को कुछ नहीं दे पाता हूं…’ कहतेकहते वह रो पड़ा.

‘बड़ा पागल है तू. क्या चाहिए मुझे. प्यार नहीं करता अपनी दीदी को?’

‘आप इतनी अच्छी क्यों हैं, दीदी? मुझे घर में चाय नहीं मिलती तो मैं आप के पास चला आता हूं, कुछ खाना

हो तो आप बना देती हैं, गरमगरम.

मेरी मां तो इतना कुछ नहीं करती

मेरे लिए.’

‘देख राजू, मां के पास कितना काम है करने के लिए. वह थक जाती हैं न. फिर तेरा मन जो कुछ खाने का होता है तू मेरे पास आता है, मैं बना देती हूं, क्या फर्क पड़ता है. मां तो बेटा मां ही होती है. तुम्हारी जड़ें उस में होती हैं. मां के लिए गलत कभी नहीं सोचना,’ कह कर विनी ने उस का माथा चूम लिया.

‘दीदी, मैं आप के लिए कुछ लाया हूं,’ एक दिन सहमते हुए उस ने रक्षाबंधन का तोहफा जेब से निकाल कर उस की हथेली पर रख दिया. यह एक छोटी सी सुंदर चांदी की डिबिया थी जिस पर एक सुंदर सी तसवीर बनी हुई थी.

‘ये कहां से लाया, राजू…’ विनी चौंकी, ‘मां की है न…बोल?’

‘हां.’

‘मां को पता है…?’

उस ने नहीं में सिर हिलाया.

‘गलत है न, बेटा. यह तो गलत काम हुआ. तू मुझे प्यार करता है न, वही तेरा गिफ्ट है. चल, मां की अलमारी में रख कर आ. रख देगा या मैं चलूं तेरे घर?’ विनी का माथा ठनकने लगा था.

‘नहीं दीदी, मैं रख दूंगा,’ उस ने धीरे से होंठ हिलाए.

‘पक्का?’

‘हां.’

राजू चला गया. पर उस के बाद जब भी वह आता विनी उसे अच्छीअच्छी बातें सिखाने का प्रयास करती.

उस ने पति से कह कर उन के व्यवसाय में उसे लगा दिया.

राजू ने काम के साथसाथ ही तकनीकी काम सीखना भी शुरू कर दिया था. उस के लिए आर्थिक सहायता भी विनी व उस के पति ने दी थी.

आज वह एक कुशल कारीगर बन अमेरिका पहुंच गया था. विनी को अच्छा लगना स्वाभाविक ही था. छोटे से छुईमुई के पौधे को मजबूत पेड़ के रूप में बढ़ते देख उसे बहुत खुशी हुई.

‘‘पोस्टमैन,’’ डाकिया ने डोरबेल का स्विच दबाते हुए जोर से कहा.

घंटी की आवाज से उस की तंद्रा भंग हुई और वह हड़बड़ाती हुई मेनगेट पर आई. डाकिए ने एक लिफाफा विनी को पकड़ाया और चलता बना.

आज 10-15 दिन बाद उसे राजू का पत्र मिला था. लिखा था :

स्नेहमयी, प्यारी दीदी,

सरस सलिल विशेष

चरण स्पर्श.

जीवन के जिस मोड़ पर आप से सहारा मिला उसे शब्दों में कैसे कहूं? आप लोगों की स्मृति सदा ही बनी रहती है. दीदी, यहां आ गया हूं क्योंकि इस संसार में जीने के लिए पूरे परिवार को धन की आवश्यकता होती है. आप से बहुत छोटा हूं परंतु अब तक जो भी अनुभव हुए उन के अनुसार लगा कि अगर ‘हैंड टू माउथ’ रहा तो कोई मुझे पूछेगा तक नहीं. नहीं जानता आप से किन जन्मों का संबंध है. पर दीदी, प्रार्थना करूंगा, आने वाले जन्मों में आप के पेट से जन्म लूं. आप मुझे अपना नाम दे सकें और दे सकें वे संस्कार जिन से मैं एक सही इनसान बन सकूं. यहां आ कर धन कमाना बहुत बड़ी सफलता नहीं है, दीदी, सफलता तब होगी जब मैं आप के दिए हुए नियम व संस्कारों को सहेज कर रख सकूंगा. आशीर्वाद दीजिए, दीदी. बच्चों को मेरा स्नेह व अंकल को सादर चरण स्पर्श…

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आप का अपना,

राजू.

विनी पत्र हाथ में पकड़े उस गुजराती बच्चे की भावनाओं को तोलती रह गई. उस की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी मानो अपने छोटे भाई पर आशीषों की बरखा कर रही हो. उस का मन संतुष्टि एवं प्रसन्नता से भर उठा था. बहुत गहरी, मजबूत जड़ें थीं रिश्तों की.

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