Emotional Story. दिल्ली से मुंबई जाने वाली लोकमान्य तिलक ट्रेन जैसे ही झांसी स्टेशन पर रुकी, जनरल बोगी के भीड़भाड़ वाले डब्बे में वह शादीशुदा जोड़ा घुस गया. आदमी दुबलापतला लंबा सा था और औरत नई दुलहन सी सजीधजी और लंबा सा घूंघट काढ़े थी. चूंकि डब्बा पूरा भरा हुआ था, इसलिए दोनों जमीन पर ही बैठ गए.

आदमी कुछ गुस्से में लग रहा था, लगातार बड़बड़ा रहा था, ‘‘न अपने रहने का ठिकाना है, न ढंग से खानेपीने का. अब तुझे कहां रखूंगा? वहां छोटी सी खोली है बस रहने के नाम पर. कुछ दिन और रह लेती तो क्या बिगड़ जाता? जैसेतैसे कर के पैसे भेज रहा था न गांव, फिर भी इन को शहर आना है.’’

औरत धीरे से बोली, ‘‘मैं ने थोड़ी न कहा था कुछ.’’

आसपास बैठे लोगों को इस जोड़े और इन की कहानी में दिलचस्पी होने लगी थी. हर ट्रेन के जनरल डब्बे की यही खासीयत होती है कि हर इनसान की अपनी जिंदगी में कितनी भी समस्याएं हों, जैसे ही कोई दूसरा आदमी दिखता है कुछ नई समस्याओं के साथ, तो इनसान की दिलचस्पी उसी में हो जाती है. तो कोई कोई खैनी रगड़ते हुए और कोई बीड़ी पीते हुए, इसी जोड़े को घूरे जा रहा था.

पतिपत्नी की बातचीत से समझ आ रहा था की दोनों के बीच किसी बात को ले कर तनाव था और लोगों को इसे देखने में मजा रहा था. अगले स्टेशन बीना पर ट्रेन रुकी तो आदमी पानी की बोतल ले कर पानी भरने उतर गया.

फिर 5-7 मिनट में ट्रेन चल दी. सभी मुसाफिर जो उतरे थे वापस ट्रेन में चढ़ गए, पर उस औरत के पति का कुछ ठिकाना नहीं था. पहले तो उसे लगा कि भीड़भाड़ है, पति आ ही रहा होगा, फिर उसे घबराहट होने लगी. वह खिडक़ी के बाहर देखने लगी, पर तब तक ट्रेन ने भी रफ्तार पकड़ ली थी.

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