Crime and Politics Story. पुलिस इंस्पैक्टर शादाब हुसैन का दिमाग भन्नाया हुआ था. पुलिस की नौकरी उसे अब जैसे एक सजा लगने लगी थी और वरदी अपना कफन. हर जगह उस के हाथ बंधे हुए थे. अपनी मरजी से वह कोई कार्यवाही नहीं कर सकता था.
कितनी मुश्किल से शादाब हुसैन ने उस दरिंदे मुन्ना खान को पकड़ा था. उस के नाम से कम से कम 25 मामले दर्ज थे, जिन में हथियार रखने, कत्ल की कोशिश करने, नकली शराब बनाने व बेचने और हत्या करने तक के इलजाम थे. वह जमानत पर था और 4 दिन पहले उस ने एक मजदूर औरत की इज्जत पर हाथ डालने की कोशिश की थी.
उस औरत की शिकायत पर इंस्पैक्टर शादाब हुसैन ने मुन्ना खान को गिरफ्तार किया था. होना तो यह चाहिए था कि उसे जेल भेज दिया जाता, पर उलटे इंस्पैक्टर को ही ऊपर से हुक्म हुआ, ‘खान साहब को बाइज्जत रिहा कर दिया जाए और उन के खिलाफ कोई मामला दर्ज न किया जाए.’
दरअसल, मुन्ना खान को उस इलाके के विधायक की सरपरस्ती हासिल थी, इसीलिए नाजायज धंधों व मुजरिमों जैसे काम करने के बावजूद वह पहले तो गिरफ्तार नहीं हो पाता था, और अगर हो भी जाता, तो सिफारिश या पैसों के बल पर छूट जाता था. इस बार भी ऐसा ही हुआ था.
उस पत्रकार मनोज ने तो जैसे इंस्पैक्टर के जख्मों पर नमक रगड़ दिया था, ‘‘मुन्ना खान को छोड़ देने के लिए आप को कितने पैसे मिले?’’
उस का सवाल सुन कर इंस्पैक्टर शादाब का जी चाहा कि उस की गरदन मरोड़ दे.
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