महाराष्ट्र के संभाजीनगर से जुड़ी जिद की एक घटना ने गैरवाजिब जिद को ले कर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. तिसगांव की ‘खावल्या’ पहाड़ी पर 21 अगस्त को जो हुआ, वह बेहद दुखद है. जिद को ले कर हुई घटना में 19 साल के कुणाल छांगुड़े, उस के पिता मुरलीधर और मां संगीता की मौत हो गई.
आत्महत्या की धमकी
जिद के चलते पहाड़ी से गिर कर मांबाप के साथ जाने गंवाने वाला कुणाल पढ़ाई में बहुत अच्छा था. उस ने 10वीं क्लास के इम्तिहान में 92 फीसदी अंक हासिल किए थे और आगे नीट की तैयारी कर रहा था. लेकिन एक महंगे आईफोन की चाह धीरेधीरे परिवार के लिए बड़ी परेशानी बन गई.
बीते साल कुणाल ने आईफोन की मांग को ले कर परिवार पर आत्महत्या का डर दिखा कर दबाव बनाया था. आखिरकार मातापिता ने उस की इच्छा पूरी करने के लिए किस्त पर फोन दिला दिया. उस समय शायद उन्हें लगा होगा कि बेटा खुश हो जाएगा और बात खत्म हो जाएगी. लेकिन बाद में उसी फोन की किस्त परिवार के लिए बो झ बन गई.
कुणाल के पिता मुरलीधर ट्रक ड्राइवर थे. उन की कमाई सीमित थी. घर चलाने की जिम्मेदारियां थीं. ऐसे में महंगे फोन की किस्त चुकाना आसान नहीं था. जब किस्त का भुगतान नहीं हो पाया तो घर में पितापुत्र के बीच विवाद हुआ. गुस्से में कुणाल पहाड़ी पर चला गया. उस ने वहां ऐसा कदम उठाने की बात कही, जिस से परिवार और गांव के लोग परेशान हो गए.
मातापिता और गांव वाले कुणाल को समझाने के लिए वहां पहुंचे. पुलिस को भी सूचना दी गई. काफी देर तक उसे सम झाने की कोशिश होती रही.
इसी दौरान पिता बेटे को सुरक्षित करने के लिए उस के पास पहुंचे. कोशिश के दौरान दोनों का संतुलन बिगड़ गया और दोनों नीचे गिर गए जिस से पिता और बेटे की मौत हो गई. यह देख कर सदमे में मां अपने आवेश को नहीं रोक सकी और वह भी खाई में कूद गई. एक गैरजरूरी जिद के चलते एक पूरा परिवार खत्म हो गया.
जिस चीज को पाने के लिए इतना बड़ा विवाद शुरू हुआ था, वह एक मोबाइल फोन था. एक ऐसा फोन जिसे बाजार में आज हजारों तरह के औप्शनों के बीच खरीदा जा सकता है. लेकिन उस फोन के पीछे भागतेभागते 3 जिंदगियां चली गईं.
इसी तरह की जिद और जुनून से जुड़ा एक और अपराध का मामला केरल के अलप्पु झा जिले के करुवट्टा इलाके में भी सामने आया था. यहां 13 साल की एक किशोरी पर अपने ही 65 साल के दादा की हत्या किए जाने का आरोप लगा. पुलिस के मुताबिक, किशोरी ने 3 नाबालिग लड़कों की मदद से इस वारदात को अंजाम दिया.
पुलिस ने बताया कि लड़की के दादा उस के मोबाइल फोन के इस्तेमाल करने पर गुस्सा करते थे. वह लड़कों के साथ दोस्ती करती थी. इस उम्र में उस ने बौयफ्रैंड भी बना लिया था. यह बात लड़की के दादा को पता चली तो उन्होंने उसे डांटा था. उस का मोबाइल भी छीन लिया गया था, लेकिन बाद में जिद पर उसे मोबाइल वापस कर दिया गया. लड़की ने घर से चुराए गए सोने और नकदी से अपने लिए आईफोन और अपने बौयफ्रैंड के लिए मोटरसाइकिल खरीदने का प्लान बनाया था.
इसी तरह की जिद से जुड़ी एक घटना उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के थाना ट्रौनिका सिटी के गांव पावी सादिकपुर में सामने आई थी. यहां 24 साल के सादीन नाम के एक नौजवान ने परिवार वालों द्वारा आईफोन की मांग पूरी न किए जाने के बाद खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली.
पुलिस जांच में सामने आया था कि सादीन काफी समय से आईफोन 17 प्रो की मांग अपने परिवार से कर रहा था. परिवार लगातार कोई न कोई बहाना बना रहा था. इसी से गुस्से में आ कर सादीन ने तमंचे से खुद को गोली मार ली.
स्टेटस सिंबल बना आईफोन
गंवई से ले कर शहरी इलाकों के किशोरों और नौजवानों में आजकल महंगे गैजेट्स और आईफोन स्टेटस सिंबल बन कर उभरे हैं. इस की महंगी कीमत, ब्रांड इमेज और सोशल मीडिया पर इस की मौजूदगी ने इसे लाइफस्टाइल और स्टेटस दिखाने वाला प्रोडक्ट बना दिया है.
कुछ नौजवानों के लिए लेटैस्ट मौडल का मालिक होना अपनी हैसियत दिखाने और किसी खास सोशल ग्रुप में शामिल होने का जरीया बन जाता है. सोशल मीडिया ने इस ट्रैंड को और भी ज्यादा बढ़ा दिया है.
आज बच्चों की इच्छाएं पहले से बहुत अलग हैं. कुछ दशक पहले बच्चे खिलौने, साइकिल या क्रिकेट का बल्ला पाने के लिए जिद करते थे. आज उन की पसंद बदल गई है. महंगा मोबाइल, गेमिंग डिवाइस, बाइक, ब्रांडेड कपड़े और दूसरे महंगे सामान उनकी इच्छाओं की सूची में शामिल हैं. इस में सब से बड़ी भूमिका बाजार और सोशल मीडिया की है.
मोबाइल की स्क्रीन पर बच्चा हर दिन ऐसी जिंदगी देखता है, जिस में सब कुछ चमकदार है. नया फोन, महंगे कपड़े, बड़ी गाड़ी, घूमने की तसवीरें और शानदार जीवनशैली. धीरेधीरे उसे लगने लगता है कि खुश रहने और दूसरों के बीच अपनी जगह बनाने के लिए उस के पास भी वही चीजें होनी चाहिए. दोस्तों के बीच तुलना इस दबाव को और बढ़ा देती है. किसी दोस्त के पास नया आईफोन है तो दूसरे बच्चे को अपना फोन पुराना लगने लगता है. किसी के पास महंगी बाइक है तो उसे अपनी साइकिल छोटी लगने लगती है. यहीं से जरूरत और दिखावे का फर्क मिटने लगता है. बच्चे के मन में सवाल यह नहीं रहता कि मु झे फोन की जरूरत है या नहीं. सवाल यह बन जाता है कि मेरे दोस्त के पास है तो मेरे पास क्यों नहीं है?
हर जिद गलत नहीं होती
मनोविज्ञानी डाक्टर प्रीति त्रिपाठी का कहना है कि बच्चे का जिद करना हमेशा बुरी बात नहीं है. छोटे बच्चे अपनी बात सम झाने के लिए रोते हैं, नाराज होते हैं और कभीकभी जिद करते हैं. यह उन के बढ़ने का एक सामान्य हिस्सा है. परेशानी तब होती है जब जिद आदत बन जाए और बच्चा हर बात अपनी मरजी से मनवाना चाहे.
डाक्टर प्रीति त्रिपाठी आगे बताती हैं कि बच्चों की हर जिद पूरी करना प्यार नहीं है. कई मातापिता सोचते हैं कि हम ने बचपन में बहुत कमी देखी है, हमारे बच्चे को किसी चीज की कमी नहीं होनी चाहिए. यह भावना अच्छी है, लेकिन कई बार यही सोच बच्चे को जरूरत से ज्यादा जिद्दी बना देती है.
बच्चे को अगर हर बार रोने पर खिलौना मिल जाए, हर मांग पर मोबाइल मिल जाए और हर जिद के आगे मातापिता झुक जाएं, तो उस के मन में एक बात बैठ जाती है कि जोर दे कर मांगूंगा तो चीज मिल ही जाएगी.
यही आदत आगे चल कर बड़ी मांगों में बदल सकती है. इसलिए बच्चे को समयसमय पर ‘न’ सुनना भी सीखना चाहिए. उसे यह सम झना जरूरी है कि घर में पैसे पेड़ पर नहीं उगते. हर चीज खरीदना संभव नहीं होता और हर इच्छा तुरंत पूरी करना भी जरूरी नहीं है.
हम अपने बच्चों को पढ़ना, लिखना और आगे बढ़ना सिखाते हैं, लेकिन एक जरूरी चीज कई बार नहीं सिखाते… निराशा को संभालना. हर इच्छा पूरी नहीं होगी. हर इम्तिहान में अच्छे अंक नहीं आएंगे. हर दोस्त हमेशा साथ नहीं रहेगा. हर चीज खरीद पाना संभव नहीं होगा. इन छोटीछोटी निराशाओं से निबटना बच्चा जितनी जल्दी सीखता है, उतना ही मजबूत बनता है.
अगर बच्चा किसी महंगी चीज के लिए जिद करे तो तुरंत डांटने के बजाय उस से बात करें. पूछें कि उसे वह चीज क्यों चाहिए? क्या उसे सच में जरूरत है या दोस्तों को देख कर इच्छा हुई है? घर का बजट सम झाएं. अगर चीज जरूरी नहीं है तो साफ कहें कि अभी नहीं खरीद सकते.
सब से जरूरी बात यह है कि एक बार ‘न’ कहने के बाद केवल बच्चे के रोने या गुस्सा करने से फैसला न बदलें वरना बच्चा सम झ जाएगा कि ज्यादा जिद करने से बात मनवाई जा सकती है.
गुस्से के समय संभालना जरूरी
समाजविज्ञानी श्रीधर पांडेय का कहना है कि जब बच्चा बहुत गुस्से में हो तो उस समय लंबा भाषण देने का कोई फायदा नहीं. पहले उसे शांत होने का समय दें. खुद भी शांत रहें. बच्चे को यह भरोसा दें कि आप उस की बात सुनेंगे, लेकिन गलत मांग सिर्फ इसलिए पूरी नहीं होगी क्योंकि वह गुस्सा कर रहा है.
बच्चे को 2 ऐसे औप्शन दिए जा सकते हैं जो परिवार की सीमा में हों. मसलन, महंगी चीज अभी नहीं खरीदी जा सकती तो किसी कम खर्च वाले औप्शन पर बात हो सकती है. इस से बच्चे को लगता है कि उस की बात पूरी तरह अनसुनी नहीं की जा रही. बच्चे के शांत होने के बाद ही उस से आराम से बात करें.
घर के माहौल के भी हैं माने
बच्चे केवल हमारी बातें नहीं सुनते, वे हमारा बरताव भी देखते हैं. अगर घर में बड़े लोग छोटीछोटी बात पर चिल्लाते हैं, गुस्सा करते हैं या अपनी बात मनवाने के लिए दबाव बनाते हैं तो बच्चा भी वही सीखता है, इसलिए बच्चों को सब्र करना सिखाने से पहले मातापिता को खुद सब्र रखना होगा.
बच्चे के साथ रोज कुछ समय बैठ कर बात करना बहुत जरूरी है. केवल यह पूछना कि स्कूल में क्या पढ़ाया, काफी नहीं है. यह भी पूछें कि आज उसे किस बात की खुशी हुई, किस बात का बुरा लगा, दोस्तों के साथ सब ठीक है या नहीं. कई बार बच्चे अपनी परेशानी सीधे नहीं बताते. मातापिता का भरोसे वाला रिश्ता उन्हें खुल कर बोलने का मौका देता है.
पैसों की कीमत सम झाना जरूरी
श्रीधर पांडेय बताते हैं कि बच्चों को कम उम्र से ही पैसों की कीमत सम झानी चाहिए. उन्हें यह बताना चाहिए कि परिवार की आमदनी सीमित होती है और हर खर्च सोचसम झ कर करना पड़ता है. किस्त या ईएमआई की सुविधा ने महंगी चीजें खरीदना आसान जरूर किया है, लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि हर चीज खरीद लेना सम झदारी है. किस्त भी आखिरकार चुकानी पड़ती है. बच्चों को यह सम झना चाहिए कि किसी चीज को पाने के लिए परिवार पर ऐसा बो झ नहीं डालना चाहिए जिसे उठाना मुश्किल हो.
सामाजिक कार्यकर्ता माधुरी पांडेय का कहना है कि आप का बच्चा अगर किसी चीज को ले कर बहुत परेशान है तो उसे केवल ‘जिद्दी’ कह कर बात खत्म न करें. यह जानने की कोशिश करें कि उस के मन में क्या चल रहा है. अगर बच्चा लगातार बहुत परेशान रहता है, उस का बरताव अचानक बदल गया है या वह खुद को नुकसान पहुंचाने जैसी बातें करता है, तो इसे सिर्फ जिद सम झ कर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
ऐसी हालत में किसी भरोसेमंद बड़े और काबिल मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेना सम झदारी है. मातापिता के लिए भी यह सम झना जरूरी है कि बच्चे को बचाने का मतलब उस की हर मांग पूरी करना नहीं है. कई बार बच्चे को रोकना ही उस के भविष्य की रक्षा करना होता है.
महाराष्ट्र की घटना हमें बहुत कड़वा सबक देती है. एक महंगा फोन, एक बाइक, एक कपड़ा या कोई दूसरी चीज जिंदगी से बड़ी नहीं हो सकती. चीजें फिर खरीदी जा सकती हैं, पैसा फिर कमाया जा सकता है, लेकिन परिवार के किसी सदस्य को खो देने का दुख कभी पूरा नहीं होता.
आज जरूरत बच्चों को महंगी चीजें देने से ज्यादा उन्हें सही सोच देने की है. उन्हें यह सिखाने की जरूरत है कि जिंदगी में हर इच्छा पूरी नहीं होती, लेकिन हर मुश्किल से बात कर के, सब्र रख कर और मिलजुल कर रास्ता जरूर निकाला जा सकता है.
बच्चों को महंगी चीजों से ज्यादा मजबूत संस्कार, सब्र और परिवार का भरोसा चाहिए. यही वह पूंजी है, जो उन्हें जिंदगी की बड़ी से बड़ी चुनौती के सामने टूटने के बजाय संभल कर आगे बढ़ना सिखाती है. Society




