नोटबंदी का फरमान जारी हुए 100 से ज्यादा दिन गुजर चुके हैं, पर न तो देश में सोना बरसा है और न ही चौराहे के पुलिस वाले ने अपना हफ्ता लेना बंद किया है. देशभर में काले धन की कमाई, बेईमानी, आतंकवाद, नकली नोटों का कारोबार कोई कम नहीं हुआ दिख रहा. जो दिख रहा है, वह यह है कि गरीब आदमी अमीरों को मारने की कोशिश में मारा गया है. भारतीय जनता पार्टी के पंडों की अगुआई में फौज ने जम कर नारे लगाए हैं कि लाइनों में लग कर गरीबों ने अमीरों की अक्ल दुरुस्त की है, पर जरा सी आंख खोल कर देखें, तो न सड़कों पर गाडि़यों की कमी हुई है, न बडे़ बाजारों में भीड़ कम हुई?है और न ही शादियों का रंग फीका पड़ा है. सोने और हीरे के जवाहरात भी ठाट से उसी तरह बिक रहे हैं. अगर कुछ नहीं बिक रहा है तो वह है खेतों से अनाज, सब्जियां और मंडियों से कच्चा सामान.

नोटबंदी की गाज गिरनी थी अमीरों पर, लेकिन गिरी है छोटे आम आदमी पर, जिसे 45 सौ रुपए लेने के लिए अकाउंट खोलने पड़ रहे हैं, लाइनों में खड़ा होना पड़ रहा है. शुरू में तो इन लोगों को कमीशन का कुछ पैसा मिला, पर अब वह भी मिलना बंद हो गया, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार ही सारा धन, काला हो या सफेद, बैंकों में जमा हो कर रिजर्व बैंक के पास पहुंच गया है. नोटबंदी की वजह से सिवा छोटे हलके नोट आए और पूरे 50 दिन देशभर में भूचाल सा आया रहा, इस के अलावा कुछ लाभ नहीं हुआ.

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