Editorial. खाड़ी के देशों में भारी गरमी में बिना एयरकंडीशनिंग के टिन के कमरों में रह कर लगभग 7 करोड़ देश के मजदूर और लगभग 3 लाख पानी के जहाजों पर घरों से दूर काम कर के पैसे इस जलील, जहालत से भरे लुटेरे देश में भेज रहे हैं जहां सरकारें, अमीर, कंपनियां इन के पैसे पर मौज कर रही हैं. यह रकम डौलर में 180 बिलियन है. 1 बिलियन डौलर 10,000 करोड़ रुपए के बराबर होता है.
देश जो सामान बाहर से मंगाता है और जो बाहर बेचता है उस में डौलरों में 333 बिलियन का घाटा है. बाहर से मजदूरों के पैसे और कर्ज के बावजूद डौलरों में 15.2 बिलियन का घाटा है. इस का मतलब है कि देश में जो चीनी, जरमन, यूरोप, अमेरिकी, थाई, इंडोनेशियाई सामान दिख रहा है वह मजदूरों की मेहनत की देन है. इन मजदूरों को कोई मैडल फिर भी नहीं मिलता. हर एयरपोर्ट पर आने वाले भारतीय मजदूर को कस्टम वाले गिद्ध की नजर से देखते हैं और भरपूर लूटते हैं.
अफसोस की बात है कि इस के बावजूद देश का बाहर जाने वाला सामान कम है, आने वाला ज्यादा है, इकोनौमिक टाइम्स की एक खबर के हिसाब से पिछले कुछ साल में 6,000 कंपनियों ने 1,29,000 करोड़ रुपए देश से बाहर बैंकों के मारफत भी डाले. इन कंपनियों के पास इतनी इनकम कहां से आई और कैसे इन्होंने गुप्त खातों में यूएई, हौंगकौंग, सिंगापुर, मौरीशस, चीन वगैरह पैसे भेजे, यह कई साल बाद इनकम टैक्स वालों को पता चला.
देश का मजदूर आज न सिर्फ देश में मेहनतमजदूरी कर के देश को चला रहा है, वह अमीरों के मंदिरों के लिए कांवड़ ढोता है, ईकौमर्स में घरघर सामान पहुंचाता है, हजारों तरह की सेवाओं में अपना खून बहाता है फिर भी स्लमों में रहता है, बिना सीवर के घरों में रहता है और पुलिस के डंडे खाता है.
इन्हीं मजदूरों में से बाहर गए मजदूरों की मेहनत की कमाई से 8,000-8,000 करोड़ के 2 हवाईजहाज प्रधानमंत्री के लिए खरीदे गए. दसियों महंगी गाडि़यां खरीदी गईं. नेताओं के बच्चे विदेशों में पढ़ने गए और अब पता चला है कि लूट के पैसे को ढंग से रखने के लिए विदेशों में ठिकाने ढूंढ़ लिए गए हैं.
वाह क्या देश है. धन्य हो यह भगवान भरोसे चल रहे देश का जो मजदूर के खूनपसीने को पानी से भी बदतर समझता है.Editorial.




