Editorial. आम आदमी को तो अदालतों से न्याय की राहत कम ही मिलती है और अगर मिलती है तो दादा के बाद पोतों को मिलती है. अब खास लोगों को भी बड़े वकीलों से न्याय भी मिलना कम होता जा रहा है. न्याय की जरूरत आदमी को आमतौर पर सरकार या सरकारी आदमी से होती है जब वह अपने लाखों कानूनों की धाराओं में से एक अपने मन की चुन कर आम आदमी के धंधे, घर, बच्चों, पैसे, काम पर लगा देता है और फिर आराम से बैठ जाता है.

अपने घर, जमीन, पैसे को बचाने का अब एक ही तरीका आम आदमी के पास बचा है, पुलिस वाले को, सरकारी बाबू को, सत्ता में बैठे नेता को एक बड़ा हिस्सा उस में से दे दो. अगर वह सम?ो कि भीमराव अंबेडकर और जवाहरलाल नेहरू के बनाए संविधान, कानूनों में लिखी या मंचों पर कही गई मीठीमीठी बातों में दम है तो भूल जाओ.

यह देश अब उस जगह पर आ गया है जब प्रधानमंत्री एक दिन पैट्रोल की बचत करते हैं और दूसरे दिन 20-25 गाडि़यों का काफिला और सैकड़ों वाहन रास्तों को रोकने में लग जाते हैं जब उन्हें विदेश जाना होता है, 8,000 करोड़ के विमान में जिस में न अफसर होते हैं, न मंत्री, न प्रैस के लोग. जो विमान 300 लोगों को बैठा सकता है उस में एक तरह से वे अकेले होते हैं.

यह देश अब उस जगह आ गया है जब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एक रोज बैंच से युवा वकील को कौकरोच कहते हैं और कुछ दिन बाद इंगलैंड जा कर कानून मंत्री और कई दूसरों के साथ बैडमिंटन खेलते नजर आते हैं.

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