सचिन और रितुल ने जब डिनर खत्म किया तो रात के 10 बज रहे थे. जब रितुल घर पहुंची तो मम्मीपापा के चेहरे पर तनाव तो था पर उन्होंने कुछ नहीं कहा.
रितुल के जीवन में बहुत से मित्र थे. उस ने उन्हें महिला और पुरुष की परिधि में कभी नहीं रखा था. जब तक उस के पास बीवी का तमगा था किसी ने उस से कोई प्रश्न नहीं किया था. पर जैसे ही वह अकेली हुई उस का अपना परिवार भी उसे सवालिया निगाहों से देखने लगा था. रितुल को समझ नहीं आ रहा था कि पति के न होने से वह कैसे अपनेआप को एकदम से बदल दे?
यह ठीक है कि उस का परिवार उस की दूसरी शादी करने के लिए तैयार था. पर 50-55 साल के टूटे हुए
पुरुषों के साथ रितुल समझौता करने के लिए तैयार नहीं थी. 55 साल का पुरुष उस की मानसिक, भावनात्मक या दैहिक जरूरतें कैसे पूरी कर सकता है?अगर समझौता करना ही है तो क्यों न वह अपनी शर्तों पर करे.
जब शाम को रितुल घर पहुंची तो रितुल के पापा विपुल बोले,”रितुल बेटा, हम सब समझते हैं, इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम जल्द से जल्द दूसरी शादी कर लो.”
रितुल बोली,”पापा, आप ठीक कह रहे हैं पर मैं जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं करना चाहती हूं. हमारे समाज में अधिकतर विवाह आर्थिक कारणों से होते हैं और मैं आर्थिक रूप से स्वाबलंबी हूं और मुझे किसी सहारे की जरूरत नहीं है. अगर कोई अच्छा साथी टकराया जो मुझे पूरी तरह अपना सके तो मैं आप को बताने में बिलकुल भी गुरेज नहीं करूंगी.”
तभी रितुल की मम्मी नीरजा बोली,”रितुल, दूसरी शादी एक समझौता ही तो है.”
रितुल बोली,”मम्मी, जब समझौता ही करनी है तो यह जिंदगी ही क्या बुरी है?”
नीरजा तिलमिला कर बोली,”अब बहुत अच्छी जिंदगी नहीं जी रही हो. होटलों के कमरों में बंद, कभी नलिन तो कभी सचिन…”
रितुल मुसकराते हुए बोली,”मम्मी, आप की बेटी हूं. कभी ऐसा कोई काम नही करूंगी जिस से मुझे अपनी नजरों में ही शर्मिंदा होना पड़े. मैं न किसी के गले पड़ी हूं और न ही किसी पुरुष से किसी भी तरह का कोई फायदा उठा रही हूं. अगर ये लोग मेरे साथ और मैं इन के साथ खुशी के कुछ पल गुजार लेती हूं तो फिर इस में क्या बुरा है?”
देर रात तक रितुल प्रजैंटेशन पर काम करती रही थी. कल औफिस में नए बौस के सामने प्रजैंटेशन है. सुना था, नए बौस बेहद खङूस हैं. कभी उन्हें किसी ने हंसते हुए नहीं देखा है. नाम है यश. अगले दिन जब रितुल औफिस पहुंची तो देखा अनंत का मूड औफ था. अनंत रितुल के साथ ही उस प्रोजैक्ट पर काम कर रहा था.
रितुल को देख कर बोला,”अच्छा है, आप देर से आई हो. मुझे तो इस खङूस ने इतना सुनाया कि मेरे वारेन्यारे कर दिए.”
रितुल डरतेडरते यश के कैबिन में पहुंची तो यश बोला,”रितुल, आप आज फिर लेट हैं. औरतों के लिए नौकरी बस टाइमपास होती है, बस नारी मुक्ति के नाम पर पतियों को तंग करने का तरीका.”
रितुल बोली,”सर, मेरे पति की 3 साल पहले मौत हो चुकी है.”यश एकाएक उसे अचरज से देखने लगा. विधवा कहां से लगती है रितुल, कितनी बनीठनी तो रहती है. हमेशा पुरुषों में घिरी रहती है. यश मन ही मन सोचने लगा कि आज प्रजैंटेशन में पता चल जाएगा कि कितनी स्किल्ड है रितुल.
बोर्ड औफ डाइरैक्टर्स के सामने रितुल ने काफी अच्छे से सारे पौइंट्स ऐक्सप्लेन किए. यश चाह कर भी कुछ नुक्स निकाल नहीं पाया था.
जब यश रात को अपने परिवार के साथ डिनर करने गया तो देखा रितुल भी उसी होटल में थी. साथ में कोई
पुरुष भी था. यश का मन खराब हो गया. ये खूबसूरत औरतें ऐसी ही होती हैं.
तभी उस ने देखा कि रितुल और वह पुरुष उस की टेबल की तरफ ही आ रहे थे. रितुल ने यश का परिचय अपने मित्र सचिन से कराया. यश सोच रहा था कि रितुल कैसे इतना खुश रहती है. क्या इसे अपने पति से कोई प्यार नहीं था जो इतनी जल्दी उसे भूल गई? उस के रहनसहन से भी ऐसा ही लगता है.
फिर सचिन और रितुल, सचिन के फ्लैट पर गए और दोनों एकाकार हो गए. घर पहुंचतेपहुंचते रात के 12 बज गए थे. धीरे से उस ने कार पार्क करी और चुपके से मीरा को बांहों में भर कर सो गई. रितुल को पता था कि अगर सबकुछ ठीक रहा तो उस का प्रोमोशन हो जाएगा और वेतन भी बढ़ जाएगा. तब वह घर के लिए एक परमानैंट मैड रख लेगी. आखिर कब तक मम्मी यों ही खुद को घिसती रहेंगी.
रितुल जैसे ही कमरे से बाहर निकली तो ऐसा लगा जैसे उस के मम्मीपापा के साथसाथ उस की 12 साला बेटी भी उसे सवालिया नजरों से देख रहे हैं. एक बार तो मन किया कि वापस कमरे में चली जाए पर कुछ सोच कर वह ठहर गई.
वह जैसे ही रसोई में घुसी तो मम्मी ने नफरत भरी नजरों से उस की तरफ देखा और कहा,”तुम्हें तो अभी तैयार होने में समय लगेगा, मैं खुद कर लूंगी.”
नहाते हुए रितुल सोच रही थी कि क्या करे वह अपनी शरीर की इस क्षुधा का? अगर वह पुरुष होती तो क्या उस से इतने सवालजवाब होते?विधवा है मगर है तो औरत ही न.अगर उसे पुरुषों का साथ भाता है तो वह क्या करे? किसी का घर तो नहीं तोड़ रही है वह… उस के बहुत से पुरुष मित्र हैं पर उस ने कभी भी कुछ चोरीछिपे नहीं किया है और न ही कभी किसी का दिल दुखाया है.
जब वह नहा कर बाहर निकली तो रितुल का मन फूल की तरह हलका हो गया था. हरी तांत वाली कौटन की साड़ी बांधती रितुल के होंठों पर मुसकराहट थिरक उठी. नलिन उसे हमेशा साड़ी में ही देखना पसंद करता था. नलिन के साथ ही तो कल उसे सुरेंद्र चाचा ने होटल से बाहर निकलते हुए देख लिया था. तुरंत छोटे भाई का फर्ज निभाते हुए मम्मीपापा को सूचित कर दिया गया था.
खींसें निपोरते हुए सुरेंद्र ने रितुल के पापा विपुल से कहा,”भैया, अपनी बेटी ऐसा करे, अच्छा नहीं लगता.कभी नलिन तो कभी सचिन, आज मैं ने देखा है कल को कोई और देखेगा तो न जाने क्याक्या बात बनाएं. मेरी बात मानें, समय रहते रितुल की दूसरी शादी कर दीजिए.”
पूरी रात रितुल को उस की मम्मी नीरजा परिवार की इज्जत की दुहाई और जवान होती बेटी की जिम्मेदारी के फर्ज के बारे में समझती रही थी. आखिरकर जब रितुल तंग आ गई तो उस ने झुंझलाते हुए कहा,”मम्मी, जब आप को 60 साल की उम्र में भी एक पुरुष संग की चाह होती है, तो बताओ मैं क्या करूं? आप एक औरत हो कर भलीभांति समझती होंगी, मैं क्या कहना चाहती हूं…”
कल रात का वाकेआ याद करते हुए नीरज सोच रही थी कि रितुल के कारण वह और विपुल अपना घर छोड़ कर यहां रह रहे हैं ताकि रितुल और उस की बेटी मीरा को अकेलापन न लगे और यह नाक कटवाने पर तुली हुई है.
रितुल ने जल्दीजल्दी अपने घुंघराले बालों पर ब्रश फेरा, उस की तरह ही उस के बाल भी एकदम कड़क और जंगली थे. किसी के काबू में नहीं आते थे.
बिना किसी से बात किए रितुल ने नाश्ता किया और मीरा से बोली,”मीरा, चलो स्कूल के लिए देर हो जाएगी.”
पूरे रास्ते मीरा अनमनी सी रही. जब रितुल ने पूछा,”बेटा, क्या हुआ है?अगर कोई बात है तो मुझ से बोल सकती हो…”
मीरा बोली,”मम्मी, आप शादी कर लीजिए.”
रितुल हंसते हुए बोली,”वह क्यों भला?”
मीरा बोली,”आप के बारे में कोई कुछ बोले तो मुझे अच्छा नहीं लगता है. मैं आराम से होस्टल में रह लूंगी.”
रितुल बोली,”तुम्हें यह सब सोचने की जरूरत नहीं है, तुम बस पढ़ाई पर ध्यान लगाओ,” रितुल ने मीरा को उतार कर कार अपने कालेज की दिशा में मोड़ दी.
रितुल एक 35 वर्षीय खूबसूरत विधवा है. महिला इसलिए नहीं है क्योंकि हमारे समाज में अगर कोई महिला विधवा या तलाकशुदा हो जाती है तो फिर वह महिला नहीं, विधवा या तलाकशुदा ही कहलाती है. रितुल का जीवनसाथी 3 साल पहले उसे बीच राह में छोड़ कर चला गया था. जाने वाला चला गया पर रितुल तो एक हाड़मांस की इंसान थी. अपनी दैहिक और मानसिक जरूरतों का वह क्या करे?
शाम को उस का डिनर सचिन के साथ था. सचिन से उस की मुलाकात एक फ्रैंड के घर पर हुई थी. सचिन पिछले 3 सालों से अपनी बीवी से अलग रह रहा था. उसे भी रितुल की बातें और उस का साथ भाता था. रितुल और औरतों से बिलकुल अलग थी. वह न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि अपने विचारों से भी स्वतंत्र थी. उन की दोस्ती को लगभग 1-2 साल हो गए थे, पर आज तक कभी भी रितुल ने उस से शादी या किसी रिश्ते के लिए दबाव नहीं बनाया था.
धीरेधीरे 6 माह गुजर गए. इस खूबसूरत जोड़े की असलियत जगजाहिर हो चुकी थी, इसलिए सब से कर्ज मिलना बंद हो गया था. अब मकानमालिक भी इन्हें रोज आ कर धमकाने लगा था. 6 माह से उस का किराया जो बाकी था. एक दिन क्रोधित हो कर मकानमालिक ने माला के घर का सामान सड़क पर फेंक दिया और कोर्ट में घसीटने की धमकी देने लगा. पड़ोसियों के बीचबचाव से वह बड़ी मुश्किल से शांत हुआ.
रोज की अशांति और फसाद से शलभ त्रस्त हो गया. उस का मेरठ से और नौकरी से मन उचाट हो गया. न तो वह मेरठ में रहना चाहता था, न ही दिल्ली वापस जाना चाहता था. इन 2 शहरों को छोड़ कर उस की कंपनी की किस अन्य शहर में कोई शाखा नहीं थी. आखिर नौकरी बदलने की इच्छा से शलभ ने मुंबई की एक फर्म में आवेदनपत्र भेज दिया.
एक शाम शलभ दफ्तर से अपने घर लौटा तो अपने गेट के बाहर पुलिया पर अकेली माला को उदास बैठा पाया. रमा अपनी परिचित के यहां लेडीज संगीत में गई हुई थी. देर रात तक चलने वाले कार्यक्रम के कारण वह शीघ्र लौटने वाली नहीं थी. पूछने पर माला ने बताया कि 6 माह से किराया नहीं देने के कारण मकानमालिक ने उस की व महेश की अनुपस्थिति में मकान पर अपना ताला लगा दिया है. महेश उसे यहां बैठा कर मकानमालिक को मनाने गया था.
शुलभ कुछ देर तो दुविधा की स्थिति में खड़ा रहा फिर उस ने माला को अपने घर के अंदर बैठने के लिए कहा. घर के अंदर आते ही माला शलभ के गले लग कर बिलखने लगी. हालांकि शलभ बुरी तरह चिढ़ा हुआ था मालामहेश की हरकतों से पर खूबसूरत माला को रोती देख उस का हृदय पसीज उठा.
माला का गदराया यौवन और आंसू से भीगा अद्वितीय रूप शलभ को पिघलाने लगा. माला के बदन के मादक स्पर्श से शलभ के तनबदन में अद्भुत उत्तेजना की लहर दौड़ गई. माला के बदन की महक व उस के नर्म खूबसूरत केशों की खुशबू उसे रोमांचित करने लगी.
शलभ के कान लाल हो गए, आंखों में गुलाबी चाहत उतर आई और हृदय धौंकनी के समान धड़कने लगा. तीव्र उत्तेजना की झुरझुरी ने उस के बदन को कंपकंपा दिया. पल भर में वह माला के रूप लावण्य के वशीभूत हो चुका था.
अपने को संयमित कर के शलभ ने माला को अपने सीने से अलग किया और धीरे से सोफे पर अपने सामने बैठा कर सांत्वना दी, ‘‘शांत हो जाओ. सब ठीक हो जाएगा…’’
माला ने अश्रुपूरित आंखों से शलभ की आंखों में झांकते हुए पूछा, ‘‘पैसा नहीं है हमारे पास… कैसे ठीक होगा ’’
‘‘मैं कुछ करता हूं…’’ अस्फुट भर्राया सा स्वर निकला शलभ के गले से.
‘‘आता हूं मैं बस अभी, तब तक तुम यहीं बैठो…’’ कह कर शलभ ने एटीएम कार्ड उठाया और गाड़ी से निकल पड़ा.
लौट कर शलभ ने माला के हाथ में 6 माह के किराए के 9 हजार जैसे ही थमाए उस ने खुशी से किलकारी मारी. शलभ सोफे पर बैठ कर जूते उतारने लगा तो वह अपने स्थान से उठी, खूबसूरत अदा से अपना पल्लू नीचे ढलका दिया और शलभ के एकदम करीब जा कर उस के कान में मादक स्वर में फुसफुसाई, ‘‘थैंक्यू जीजू, थैंक्यू.’’
माला के उघड़े वक्षस्थल की संगमरमरी गोलाइयों पर नजर पड़ते ही शलभ का चेहरा तमतमा गया और उस के मुख से कोई आवाज नहीं निकली. वह मुग्ध हो उसे देखने लगा. घर में माला महेश के विरुद्ध शलभ के स्वर एकाएक बंद हो गए. पति के रुख में अचानक बदलाव पा कर रमा को आश्चर्य तो हुआ पर वास्तविकता से अनभिज्ञ उस ने राहत की सांस ली. रोजरोज की तकरार से उसे मुक्ति जो मिल गई थी. नहीं चाहते हुए भी शलभ ने पत्नी से माला को 9 हजार रुपए देने की बात गुप्त रखी.
माला को भी इस बात का एहसास हो गया था कि उसे देख कर सदैव भृकुटि तानने वाला शलभ उस के रूप के चुंबकीय आकर्षण में बंध कर मेमना बन गया था. वह उसे अपने मोहपाश में बांधे रखने के लिए उस पर और अधिक डोरे डालने लगी. जब भी रमा किसी काम से बाहर जाती, सहजसरल भाव से वह माला के ऊपर घर की देखरेख का जिम्मा सौंप देती. इस का भरपूर फायदा उठाती माला.
उस के दोनों हाथों में लड्डू थे. रमा के सामने आंसू बहा कर माला पैसे मांग लेती और शलभ उस पर आसक्त हो कर अब स्वयं ही धन लुटा रहा था. अपने सहज, सरल स्वभाव वाले निष्कपट अनुरागी पति को अपने प्रति दिनप्रतिदिन उदासीन व ऊष्मारहित होते देख कर रमा का माथा ठनका पर बहुत सोचनेविचारने के बाद भी वह सत्य का पता नहीं लगा पाई.
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शुचि शाम को मेरा हालचाल जानने मेरे घर आई. मैं ने उसे अपने पास बिठाया और एक चेक उसे दिखाते हुए बोला, ‘‘यह 5 लाख रुपए का चेक मैं ने तुम्हारे नाम से आज ही भर दिया है. अब मुझ से पूछो कि इस रकम की हकदार बनने के लिए तुम्हें क्या करना पड़ेगा.
’’‘‘क…क्या करना पड़ेगा, सर?’’ वह एकदम से टेंशन का शिकार तो बन गई पर डरी हुई बिलकुल नजर नहीं आ रही थी.
‘‘क्या तुम मेरी सारी बातें खुशी- खुशी मानोगी?’’
‘‘सर, आप के इस एहसान का बदला मैं कैसे भी चुकाने को तैयार हूं.’’
सीमा की अपनी बेटी के प्रति चिंता जायज थी. मैं चाहता तो भावुकता की शिकार बनी शुचि को गलत राह पर कदम रखने को आसानी से राजी कर सकता था.
‘‘मैं ने कुछ दिन पहले कहा था न कि दोस्तों के बीच एहसान शब्द का प्रयोग ठीक नहीं है. अब तो मैं तुम्हारे परिवार से भी जुड़ गया हूं. इसलिए यह शब्द मैं फिर कभी नहीं सुनना चाहूंगा.’’
‘‘ठीक है, सर.’’
‘‘अब इस ‘सर’ को भी विदा कह कर मुझे ‘नरेश अंकल’ बुलाओ. इस संबोधन में ज्यादा अपनापन है.’’
‘‘ओ के, नरेश अंकल…’’ वह मेरे चेहरे को बड़े ध्यान से पढ़ने की कोशिश कर रही थी.
‘‘यह मेरी दिली इच्छा है कि एम.बी.ए. के लिए तुम्हें अच्छे कालिज में प्रवेश मिले. इस लक्ष्य को पाने के लिए तुम्हें बहुत मेहनत करने का वचन मुझे देना होगा, शुचि.’’
‘‘मैं बहुत मेहनत करूंगी,’’ उस की आंखों में दृढ़ निश्चय के भाव उभरे.
‘‘आज से ही?’’
‘‘हां, मैं आज से ही दिल लगा कर मेहनत करूंगी, नरेश अंकल,’’ वह जोश भरी आवाज में चिल्लाई और फिर हम दोनों ही खुल कर हंस पड़े थे.
‘‘गुड,’’ मैं ने उस के सिर पर हाथ रख कर दिल की गहराइयों से उसे आशीर्वाद दिया तो वह एक आदर्श बेटी की तरह मेरे पैर छू कर सीने से लग गई.
उस के मार्गदर्शन की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले कर मैं जिस जोश और उत्साह को अपने भीतर महसूस कर रहा था, उस ने मेरे अकेलेपन के एहसास की जड़ें पूरी तरह नष्ट कर दी थीं.
Writer- पूनम पाठक
‘‘आरती, प्लीज मेरी बात सुनो. मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. प्लीज, मुझे माफ कर दो,’’ रंजन बहुत देर तक दरवाजा पीटता रहा, मगर आरती ने कोई जवाब नहीं दिया और न ही दरवाजा खोला. थकहार कर रंजन हाल में आ कर दीवान पर अपना सिर पकड़ कर बैठ गया.
कानपुर, उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कसबे झींझक से नौकरी की तलाश में आए रंजन को बरलाई शुगर मिल में सिक्योरिटी इंचार्ज की पोस्ट उस की अच्छी बौडी की वजह से मिल गई थी. वहीं फैक्टरी के एरिया में उसे 2 कमरों का क्वार्टर भी मिला था.
अच्छे से सर्विस में जमने के बाद रंजन अपनी पत्नी आरती को भी यहीं ले आया था. शादी हुए तकरीबन 2 साल हो चुके थे, पर अभी तक उन के कोई औलाद नहीं थी.
शुगर फैक्टरी में अक्तूबर से फरवरीमार्च महीने तक का समय सीजन कहलाता है यानी इस समय फैक्टरी में चीनी बनने का प्रोसैस चालू रहता है. यह समय सभी मुलाजिमों के लिए बहुत अहम रहता है. यहां तक कि सभी अफसरों के लिए भी.
उस दिन रंजन की छुट्टी थी. पास ही देवास से उस के कुछ दोस्त फैक्टरी देखने आए हुए थे. चलती फैक्टरी में चीनी बनाने का प्रोसैस देखना बहुत दिलचस्प होता है. सभी बड़े ध्यान से गन्ने को क्रेन द्वारा उठा कर क्रेन कैरियर में डाला जाना देख रहे थे.
जिस ट्रक से गन्ना उठाया जा रहा था, खाली होने के बाद वह वापस मुड़ने लगा कि अचानक ही रंजन की नजर एक नन्हीं सी बच्ची पर पड़ी, जो अपनी ही धुन में हाथ में एक छोटा सा गन्ना लिए उस ट्रक के ठीक पीछे खेल रही थी.
रंजन बिना एक भी पल गंवाए चिल्लाता हुआ उस ओर फुरती से दौड़ पड़ा. ट्रक उस बच्ची से हाथ भर की दूरी पर ही था कि रंजन ने बच्ची को खींच कर अपनी गोद में उठा लिया.
लोगों के शोरगुल से सारा माजरा समझ कर ट्रक वाले ने तुरंत ब्रेक लगाया. आननफानन वहां भीड़ जमा हो गई. ट्रक वाले ने उतर कर हाथ जोड़ते हुए सभी से माफी मांगी और रंजन का शुक्रिया अदा किया.
इस घटना से घबराई बच्ची रंजन से कस कर लिपट गई, तभी पीछे से किसी ने रंजन की बांह पकड़ कर उसे खींचा और एक झन्नाटेदार थप्पड़ उस के गाल पर जड़ दिया, ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी बेटी को हाथ लगाने की?’’
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बच्ची अब रंजन को छोड़ कर ‘मांमां’ कहते हुए उस औरत के गले
जा लगी.
‘‘अरे मैडम, आप बिना सोचेसमझे जिस इनसान को मार रही हैं, उसी ने आप की बेटी को ट्रक की चपेट में आने से बचाया है. कैसी मां हैं आप? खुद बच्ची का खयाल नहीं रखतीं और दूसरों पर तोहमत लगाती हैं?’’ रंजन के दोस्त ने थोड़ा तैश में आ कर कहा.
पूरी बात समझने के बाद वह औरत नेहा बहुत ही शर्मिंदा हुई. उस ने तत्काल रंजन से माफी मांगी और उसे ‘थैंक्यू’ कहा.
रात को बिस्तर पर लेटे हुए रंजन को उस बच्ची की याद हो आई. फिर उसे उस की मां का वह थप्पड़ भी याद आया. कितनी घबराई हुई थी उस बच्ची की मां.
2-3 दिन बाद रंजन केबिन में बैठा था कि सामने से उसे वही औरत आती दिखी. वह उसी की तरफ बढ़ी चली आ रही थी.
‘‘मैं सच में उस दिन के लिए बहुत शर्मिंदा हूं. कई बार सोचा कि तुम से मिल कर माफी मांग लूं, पर हिम्मत नहीं हो रही थी. अगर उस दिन तुम मेरी परी को न बचाते, तो मेरी पूरी दुनिया ही उजड़ जाती. समझ नहीं आ रहा कि कैसे तुम्हारा शुक्रिया अदा करूं रंजन,’’ कह कर नेहा ने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए.
‘‘प्लीज, ऐसी बातें न करें. मैं ने उस दिन जो किया, वह मेरा फर्ज था. क्या आप यहीं फैक्टरी में रहती हैं?’’ बात बदलने के मकसद से रंजन ने पूछा.
‘‘हां, शाम को पार्क में मिलो न, वहीं बात करते हैं. परी भी तुम्हें देख कर खुश हो जाएगी. अभी मेरे औफिस का समय हो रहा है,’’ कहते हुए नेहा तेजी से जनरल औफिस की तरफ चल दी.
शाम को रंजन पार्क में पहुंचा, तभी परी चिल्लाई, ‘‘मम्मी, मुझे बचाने वाले अंकल…’’
नेहा ने मुड़ कर पीछे देखा, तो रंजन को अपनी ओर अपलक ताकते देख वह हौले से मुसकरा उठी. रंजन थोड़ा अचकचा गया, जैसे उस की चोरी पकड़ी गई हो.
‘‘अरे तुम… आओ न, वहां क्यों खड़े हो?’’ नेहा हंसते हुए बोली.
‘‘जी,’’ कहते हुए रंजन ने परी को गोद में उठा लिया.
रंजन और नेहा देर तक बतियाते रहे. नेहा ने अपने बारे में रंजन को बताया कि तकरीबन सालभर पहले उस के पति एक सड़क हादसे में चल बसे है. बहुत टूट गई थी वह, लेकिन परी का मुंह देख कर उस ने जिंदगी जीने की ठान ली. मिल की नीतियों के तहत पति की नौकरी उसे मिल गई थी. तब से वह यहीं है.
नेहा के खुले बरताव ने रंजन पर बहुत असर डाला. आरती घर पर थी नहीं, रंजन के कोई ज्यादा यारदोस्त भी नहीं थे. उस के पास अभी समय ही समय था. इधर जिंदगी के अकेलेपन से ऊबी हुई नेहा भी रंजन में काफी दिलचस्पी दिखा रही थी. नतीजतन, वे काफी समय साथ बिताने लगे. परी भी रंजन से काफी घुलमिल चुकी थी.
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‘‘कल परी का बर्थडे है और तुम्हें घर आना है,’’ एक शाम नेहा ने रंजन
से कहा.
‘‘अरे वाह, बिलकुल आऊंगा, वैसे और कौनकौन आ रहा है?’’ रंजन ने हंस कर पूछा.
‘‘तुम, मैं और हमारी परी बस,’’ परी के गालों पर एक प्यारी सी चुम्मी लेते हुए नेहा ने कहा.
रंजन को कुछ अजीब सा लग रहा था. दरअसल, उसे इस तरह अकेले नेहा के घर जाने में सकुचाहट महसूस हो रही थी, लेकिन नेहा और परी से हो चुके जुड़ाव के चलते आखिरकार उस ने उन के घर जाने का फैसला कर लिया.
दूसरे दिन शाम साढ़े 6 बजे रंजन नेहा के घर जा पहुंचा. परी ने दरवाजा खोला, तो उस ने उसे बर्थडे विश करते हुए एक खूबसूरत गिफ्ट उस के हाथों में रख दिया.
‘‘अंकल, आप क्या लाए हो मेरे लिए?’’ पूछते हुए परी गिफ्ट को खोलने में लग गई.
‘‘खुद ही खोल कर देख लो,’’ हंस कर कहते हुए रंजन ने बैठक में चारों तरफ नजर दौड़ाई. कमरे में सामने की दीवार पर एक फोटो में नेहा के साथ उस के पति व परी को देख कर रंजन हैरानी से भर गया.
‘‘क्या देख रहे हो रंजन, ये परी के पापा हैं,’’ नेहा की आवाज सुन रंजन पीछे मुड़ा. उस की नजरें एकटक नेहा पर जा टिकीं. शानदार इवनिंग गाउन में नेहा बला की खूबसूरत नजर आ रही थी.
तीनों ने मिल कर केक काटा. फिर खाना खा कर ढेर सारी मस्ती और डांस किया. 8 बजने को थे. परी थक कर सो चुकी थी. नेहा के कहने पर रंजन ने उसे बैडरूम में ले जा कर सुला दिया.
‘‘काफी देर हो चुकी है. अब मुझे चलना चाहिए,’’ रंजन ने नेहा से चलने की इजाजत लेनी चाही.
‘‘मुझे छोड़ कर जा सकोगे तुम?’’ नेहा की मदभरी आवाज ने उस के बढ़ते कदमों को जैसे रोक दिया. उस ने आगे बढ़ कर रंजन का हाथ थाम उसे खींच कर सोफे पर बिठा दिया.
‘‘नेहाजी, यह सही नहीं है,’’ रंजन के हिलते होंठों की आवाज गले में ही घुट कर रह गई. नेहा ने उस के मुंह पर उंगली रखी और उस पर झुकती चली गई.
नेहा का संगमरमरी बदन और उस से आती खुशबू ने रंजन को दीवाना कर दिया. नेहा की सांसें और ऊपरनीचे होते उभार रंजन को मदहोश करने के लिए काफी थे. वह पहले झिझकता, पर बाद में नेहा की इस रसीली दावत को नकार न सका और उस के बदन से खेलने लगा.
पर, घर आ कर रंजन को बहुत पछतावा होने लगा. वह एक शादीशुदा खुशहाल इनसान था, लेकिन वक्ती नजाकत में उसे भी होश नहीं रह गया था. नेहा की खूबसूरती ने उस से वह करवा लिया था, जिसे सोच कर भी उसे शर्म आ रही थी. वह नेहा से दूर रहने लगा.
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ऐसे ही एक दिन शाम को औफिस से आने के बाद रंजन चाय पीते हुए टैलीविजन देख रहा था कि डोरबैल बजी. दरवाजा खोलते ही रंजन चौंक पड़ा. दरवाजे पर नेहा परी को लिए खड़ी थी.
‘‘अंकल देखो, मम्मी ने मुझे कितनी अच्छी घड़ी दिलाई है. यह अंधेरे में भी टाइम बताती है.’’
‘‘अरे वाह, यह तो सच्ची में बहुत सुंदर है,’’ रंजन ने उसे प्यार से दुलारते हुए कहा.
‘‘आप थोड़ी देर टीवी देखो, मम्मी को अंकल से कुछ जरूरी बात करनी है,’’ नेहा ने परी से कहा.
‘‘ओके मम्मी,’’ परी रिमोट ले कर चैनल बदलने लगी.
‘‘इधर आओ,’’ नेहा ने रंजन का हाथ पकड़ कर उसे उसी के बैडरूम में खींच लिया.
‘‘यह क्या कर रही हैं आप?’’ रंजन ने अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा.
‘‘मेरा फोन क्यों नहीं उठा रहे थे तुम?’’ नेहा ने गुस्से से पूछा.
‘‘देखिए, उस दिन जो भी हुआ, सही नहीं था.’’
‘‘तुम कहना चाहते हो, जो भी हुआ उस में तुम्हारी मरजी नहीं थी?’’
‘‘अगर आप मुझे न उकसाती, तो यह न होता.’’
‘‘अच्छा तो मेरी आंखों में देख कर कहो कि तुम मुझे नहीं चाहते?’’
‘‘देखिए, मैं आप को पसंद करता हूं, परी को भी बहुत प्यार करता हूं, पर…’’
मैं सुबह की सैर पर था. अचानक मोबाइल की घंटी बजी. इस समय कौन हो सकता है, मैं ने खुद से ही प्रश्न किया. देखा, यह तो अमृतसर से कौल आई है.
‘‘हैलो.’’
‘‘हैलो फूफाजी, प्रणाम, मैं सुरेश बोल रहा हूं?’’
‘‘जीते रहो बेटा. आज कैसे याद किया?’’
‘‘पिछली बार आप आए थे न. आप ने सेना में जाने की प्रेरणा दी थी. कहा था, जिंदगी बन जाएगी. सेना को अपना कैरियर बना लो. तो फूफाजी, मैं ने अपना मन बना लिया है.’’
‘‘वैरी गुड’’
‘‘यूपीएससी ने सेना के लिए इन्वैंट्री कंट्रोल अफसरों की वेकैंसी निकाली है. कौमर्स ग्रैजुएट मांगे हैं, 50 प्रतिशत अंकों वाले भी आवेदन कर सकते हैं.’’
‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है.’’
‘‘फूफाजी, पापा तो मान गए हैं पर मम्मी नहीं मानतीं.’’
‘‘क्यों?’’
‘‘कहती हैं, फौज से डर लगता है. मैं ने उन को समझाया भी कि सिविल में पहले तो कम नंबर वाले अप्लाई ही नहीं कर सकते. अगर किसी के ज्यादा नंबर हैं भी और वह अप्लाई करता भी है तो बड़ीबड़ी डिगरी वाले भी सिलैक्ट नहीं हो पाते. आरक्षण वाले आड़े आते हैं. कम पढ़ेलिखे और अयोग्य होने पर भी सारी सरकारी नौकरियां आरक्षण वाले पा जाते हैं. जो देश की असली क्रीम है, वे विदेशी कंपनियां मोटे पैसों का लालच दे कर कैंपस से ही उठा लेती हैं. बाकियों को आरक्षण मार जाता है.’’
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‘‘तुम अपनी मम्मी से मेरी बात करवाओ.’’
थोड़ी देर बाद शकुन लाइन पर आई, ‘‘पैरी पैनाजी.’’
‘‘जीती रहो,’’ वह हमेशा फोन पर मुझे पैरी पैना ही कहती है.
‘‘क्या है शकुन, जाने दो न इसे फौज में.’’
‘‘मुझे डर लगता है.’’
‘‘किस बात से?’’
‘‘लड़ाई में मारे जाने का.’’
‘‘क्या सिविल में लोग नहीं मरते? कीड़ेमकोड़ों की तरह मर जाते हैं. लड़ाई में तो शहीद होते हैं, तिरंगे में लिपट कर आते हैं. उन को मर जाना कह कर अपमानित मत करो, शकुन. फौज में तो मैं भी था. मैं तो अभी तक जिंदा हूं. 35 वर्ष सेना में नौकरी कर के आया हूं. जिस को मरना होता है, वह मरता है. अभी परसों की बात है, हिमाचल में एक स्कूल बस खाई में गिर गई. 35 बच्चों की मौत हो गई. क्या वे फौज में थे? वे तो स्कूल से घर जा रहे थे. मौत कहीं भी किसी को भी आ सकती है. दूसरे, तुम पढ़ीलिखी हो. तुम्हें पता है, पिछली लड़ाई कब हुई थी?’’
‘‘जी, कारगिल की लड़ाई.’’
‘‘वह 1999 में हुई थी. आज 2018 है. तब से अभी तक कोई लड़ाई नहीं हुई है.’’
‘‘जी, पर जम्मूकश्मीर में हर रोज जो जवान शहीद हो रहे हैं, उन का क्या?’’
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‘‘बौर्डर पर तो छिटपुट घटनाएं होती ही रहती हैं. इस डर से कोईर् फौज में ही नहीं जाएगा. यह सोच गलत है. अगर सेना और सुरक्षाबल न हों तो रातोंरात चीन और पाकिस्तान हमारे देश को खा जाएंगे. हम सब जो आराम से चैन की नींद सोते हैं या सो रहे हैं वह सेना और सुरक्षाबलों की वजह से है, वे दिनरात अपनी ड्यूटी पर डटे रहते हैं.’’
मैं थोड़ी देर के लिए रुका. ‘‘दूसरे, सुरेश इन्वैंट्री कंट्रोल अफसर के रूप में जाएगा. इन्वैंट्री का मतलब है, स्टोर यानी ऐसे अधिकारी जो स्टोर को कंट्रोल करेंगे. वह सेना की किसी सप्लाई कोर में जाएगा. ये विभाग सेना के मजबूत अंग होते हैं, जो लड़ने वाले जवानों के लिए हर तरह का सामान उपलब्ध करवाते हैं. लड़ाई में भी ये पीछे रह कर काम करते हैं. और फिर तुम जानती हो, जन्म के साथ ही हमारी मृत्यु तक का रास्ता तय हो जाता है. जीवन उसी के अनुसार चलता है.
‘‘तो कोई डर नहीं है?
‘‘मौत से सब को डर लगता है, लेकिन इस डर से कोईर् फौज में न जाए यह एकदम गलत है. दूसरे, सुरेश के इतने नंबर नहीं हैं कि वह हर जगह अप्लाई कर सके. कंपीटिशन इतना है कि अगर किसी को एमबीए मिल रहे हैं तो एमए पास को कोई नहीं पूछेगा. एकएक नंबर के चलते नौकरियां नहीं मिलती हैं. बीकौम 54 प्रतिशत नंबर वाले को तो बिलकुल नहीं. सुरेश अच्छी जगहों के लिए अप्लाई कर ही नहीं सकता. तुम्हें अब तक इस का अनुभव हो गया होगा शकुन, इसलिए उसे जाने दो.’’
रामबन, कश्मीर घाटी का एक संवेदनशील जिला. ऊंचे पहाड़, दुर्गम रास्ते और गहरी खाइयों के बीच स्थित है यह छोटा सा इलाका. भोलेभाले ग्रामीण जो मौसम की मार सहने के तो आदी थे मगर हाल ही में हुईं आतंकी वारदातों की मार के उतने आदी नहीं थे. मन मार कर इस को भी झेलने के अलावा उन के पास कोई चारा न था. सभी अच्छे दिनों की कल्पना को मन ही मन संजो रहे थे इस यकीन के साथ कि दुखों की रात की कभी तो खुशियोंभरी सुबह होगी.
पूरे इलाके में रामबन में ही एक सरकारी स्कूल, छोटा सा डाकखाना और एक अस्पताल था. राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़े होने के चलते कभीकभी इन सेवाओं की अहमियत बढ़ जाती थी. हालांकि स्कूल था मगर शिक्षक नदारद थे, अस्पताल था मगर सुविधाएं ना के बराबर थीं, डाकखाना था जो डाकबाबू के रहमोकरम पर चल रहा था. मगर फिर भी उन की इमारतें उन के होने का सुबूत दे रही थीं.
उस दिन रामबन और आसपास के जिलों में मंत्रीजी का दौरा था. पूरा प्रशासन उन के स्वागत में एकपैर पर खड़ा था. सुरक्षाकर्मियों की नींद उड़ी हुई थी. आएदिन आतंकी घटनाओं ने वैसे भी सुरक्षा एजेंसियों की नाक में दम किया हुआ था, उस पर मंत्रीजी को अपने लावलशकर के साथ इलाके का दौरा करना उन के लिए किसी आपदा से कम न था. अस्पताल वालों को भी मुस्तैद रहने की हिदायत थी और सुरक्षाकर्मियों का वहां भी जमावड़ा था.
मैडिकल डाइरैक्टर अस्पताल के अफसर डाक्टर सारांश को समझा रहे थे कि मंत्रीजी का किस तरह से स्वागत करना है. डाइरैक्टर साहब कहे जा रहे थे और डा. सारांश हैरानी से उन्हें ताकते जा रहे थे.
‘‘सर, यह काम हमारा नहीं है, हमारा काम है मरीजों की तीमारदारी करना, उन का इलाज करना न कि आनेजाने वाले मंत्रियों की सेवा करना,’’ डा. सारांश ने अपनी बात कही तो मैडिकल डाइरैक्टर ने उन्हें समझाइश दी, ‘‘मैं जानता हूं डा. सारांश, मगर करना पड़ता है. यह हमारे सिस्टम का ही हिस्सा है.’’
‘‘तो बदल क्यों नहीं देते यह सिस्टम, सालों से चल रहे ऐसे सिस्टम को तिलांजलि क्यों नहीं दे देते हम,’’ डा. सारांश यह कहते हुए अपने कक्ष की तरफ बढ़ गए.
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इधर जहां सारा प्र्रशासन मंत्रीजी की फिक्र में घबराया हुआ सा था, वहीं महज कुछ ही मील दूर सेना की एक टुकड़ी औपरेशन विनाश की तैयारी में थी. फोनलाइन पर सीमापार से हो रही आतंकियों की बातचीत को सुना गया था. सूचना थी कि पाकिस्तान ने आतंकवादियों की एक टोली भारत की सीमा में ढकेल दी थी और आतंकियों ने रामबन के जंगलों में अपना आशियाना बनाया हुआ था. आतंकी पूरे असलहों और साजोसामान से लैस थे. वे एक बड़ी घटना को अंजाम देने की फिराक में थे.
खबर पक्की थी. सो, कमांडिंग अफसर ने कोई जोखिम नहीं लिया और अलगअलग टोलियां बना कर बीहड़ की अलगअलग दिशाओं में भेज दीं. उन्हीं में से एक टोली का नेतृत्व कर रहे थे मेजर बलदेव राज. मेजर बलदेव एक अच्छे खानदान से थे. उन के सारे भाईबहन विदेशों में अच्छी नौकरियों और बिजनैस से जुड़े थे. वतनपरस्ती के जज्बे ने उन्हें विदेशी शानोशौकत के बजाय फौज में पहुंचा दिया था जहां उन की गिनती जांबाज अफसरों में होती थी. लिहाजा, पाकिस्तान से आए 4 आतंकवादियों को पकड़ने के लिए उन्हें खास जिम्मेदारी दी गई थी.
पीठ पर वजनी साजोसामान, हाथ में बंदूक और सिर पर भारीभरकम हैलमेट पहने मेजर बलदेव के नेतृत्व में उन की टोली जंगल के चप्पेचप्पे की छानबीन कर रही थी. खबर पक्की थी कि आतंकवादी उन्हीं जंगलों में छिपे थे, इसलिए मेजर बलदेव गुप्त भाषा में अपने सिपाहियों को बारबार आगाह कर रहे थे. शाम का साया धीरेधीरे बादलों पर छा रहा था. तभी पत्तों की सरसराहट हुई और जवानों को आभास हो गया कि आतंकवादी आसपास ही थे.
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धीरेधीरे जवान उस ओर बढ़ने लगे जहां से सरसराहट हो रही थी. तभी अचानक दूसरी दिशा से अंधाधुंध फायरिंग शुरू हो गई. मेजर बलदेव को ऐसे ही किसी हमले की आशंका थी, लिहाजा, उन की टोली के कुछ सिपाहियों का रुख दूसरी ओर था.
अगले चंद मिनट आग के गोले, धुएं और शोर के बीच बीत गए. दूसरी ओर से फायरिंग बंद हो गई तो मेजर बलदेव समझ गए कि दुश्मन का खात्मा हो गया है. अगले ही पल धुआं छटा और अपने साथियों को करीब पा कर उन्होंने राहत की सांस ली. ‘‘सर, चारों आतंकवादी मारे गए हैं, आइए उन की लाशें देखिए और हैडक्वार्टर को इत्तला कर दीजिए.’’
मेजर बलदेव ने उठने की कोशिश की मगर उठ नहीं पाए. उन की दायीं टांग लहूलुहान थी, होंठों पर दर्द था मगर आंखों में विजय की मुसकान थी. उन्होंने बड़ी मुश्किल से हैडक्वार्टर को मैसेज भिजवाया और एक बार फिर ब्रिगेडियर साहब से भूरिभूरि प्रशंसा पाई.
सवाल इतने आकस्मिक रूप में आया था कि युवती को सोचने का तनिक भी मौका नहीं मिला और वह हड़बड़ा कर बोली, ‘‘जी हां, बीसी कालेज में फर्स्ट ईयर साइंस की स्टुडैंट.’’
‘‘ओह, वंडरफुल,’’ यादव ने उड़ती नजरों से बैठे हुए लोगों का मुआयना किया, ‘‘ई बुढ़वन सब देश का कबाड़ा कर के छोड़ेंगे. हर जगह पर, चाहे सत्ता हो या साहित्य, ई लोग कुंडली मार कर बैठ गए हैं और हिलने का नाम ही नहीं ले रहे, हंह.’’
‘‘भाईसाहब, आप का परिचय?’’ अतुल प्रोफैसर से संबोधित था.
प्रोफैसर भड़क उठे, ‘‘आप छात्र हैं न? मुझे नहीं पहचान रहे? मैं प्रोफैसर शुभंकर सान्याल. नारी सशक्तीकरण पर उसी परचे का प्रख्यात लेखक जिस की चर्चा आज हर बुद्धिजीवी और हर छात्र की जबान पर है.’’
‘‘प्रोफैसर हैं? चलिए, एगो पहेली बुझिए तो…’’ पिंटू बोली बदलबदल कर बोलने में माहिर था, खालिस बिहारी अंदाज में प्रोफैसर की ओर मुंह कर के हुंकार भर उठा, ‘‘एगो है जो रोटी बेलता है, दूसरा एगो है जो रोटी खाता है. एगो तीसरा अऊर है ससुर जो न बेलता है, न खाता है, बल्कि रोटी से कबड्डी खेलता है. ई तीसरका को कोई भी नय जानत. हमारी संसद भी नहीं. आप जानत हैं?’’
प्रोफैसर चुप. अन्य यात्रीगण भी चुप. युवती मन ही मन खुश हुई. प्रश्न क्लासरूम में किया गया होता तो वह हाथ अवश्य उठा देती. यादव दोनों ओर की बर्थ के भीतर तक चला आया और खिड़की की ओर इशारा कर के प्रोफैसर से बोला, ‘‘यहां बैठने दीजिए तो.’’
प्रोफैसर इन लोगों के व्यंग्य से खिन्न तो थे ही, चीखते हुए फट पड़े, ‘‘कपार पर बैठोगे? जगह दिख रही है कहीं? और ये बोली कैसी है?’’
यादव ने लैक्चर खत्म होने का इंतजार नहीं किया. वह प्रोफैसर को ठेलठाल कर ऐन युवती के सामने बैठ ही गया.
पिंटू बोली में ‘खंडाला’ स्टाइल का बघार डालते हुए नेताजी की ओर मुड़ा, ‘‘ऐ, क्या बोलता तू? बड़े भाई को यहां बैठने को मांगता, क्या? बोले तो थोड़ा सरकने को,’’ पिंटू की आवाज में कड़क ही ऐसी थी कि नेताजी अंदर ही अंदर सकपका गए. लेकिन फिर सोचा, इस तरह भय खाने से काम नहीं चलेगा. यही तो मौका है युवती पर रौब गांठने का.
‘‘तुम सब स्टुडैंट हो या मवाली? जानते हो हम कौन हैं? धनबाद विधानसभा क्षेत्र के भावी विधायक. विधायक से इसी तरह बतियाया जाता है?’’
‘‘विधायक हो या एमपी, स्टुडैंट फर्स्ट,’’ अतुल के बदन पर कपड़े नए स्टाइल के थे. कीमती भी. संपन्नता के रौब से चमचमा रहा था चेहरा. पिंटू ने उसे ‘बडे़ भाई’ का संबोधन यों ही नहीं दिया था. वह इन दोनों का नायक था. अतुल ने आगे बढ़ कर नेताजी की बगलों में हाथ डाला और उन्हें खींच कर खड़ा करते हुए खाली जगह पर धम्म से बैठ गया. नेताजी ‘अरे अरे’ करते ही रह गए. अंदर ही अंदर सभी लोग आतंकित हो उठे थे. ये लड़के ढीठ ही नहीं बदतमीज व उच्छृंखल भी हैं. इन से पंगा लेना बेकार है. शकीला स्वयं ही अपनी सीट से खड़ी हो गई और पिंटू से बोली, ‘‘अरे भाई, प्यार से बोलने का था न कि हम कालेज वाले एकसाथ बैठेंगे. आप यहां बैठो, मैं उधर बैठ जाती.’’
फिर जैसे सबकुछ सामान्य हो गया. तीनों युवती के इर्दगिर्द बैठने में सफल हो गए. गाड़ी अपनी रफ्तार से दौड़ती रही.
‘‘आप का नाम जान सकते हैं? कहां रहती हैं आप?’’ थोड़ी देर बाद अतुल ने युवती को भरपूर नजरों से निहारते हुए सवाल किया. उस का लहजा विनम्रता की चाशनी से सराबोर था.
‘‘जी शीला मुर्मू. काशीपुर डंगाल में रहती हूं. धनबाद से 60 किलोमीटर दूर.’’
‘‘वाह,’’ तीनों लड़के चौंक पड़े.
‘‘कोई उपाय भी तो नहीं. हमारे कसबे में इंटर तक की ही पढ़ाई है.’’
‘‘बहुत खूब. मोगैम्बो खुश हुआ,’’ पिंटू ने नई बोली का नमूना पेश किया.
एक क्षण का मौन.
‘‘जाहिर है, कोई पसंदीदा सपना भी जरूर होगा ही?’’ अतुल उस की आंखों में भीतर तक झांक रहा था, ‘‘ऐसा सपना जो अकसर रात की नींदों में आ कर परेशान करता रहता हो.’’
‘‘बेशक है न,’’ मजाक में पूछे प्रश्न का शीला ने सीधा और सच्चा जवाब दे दिया, ‘‘परिस्थितियों ने साथ दिया तो… तो डाक्टर बनूं.’’
‘‘ऐक्सीलैंट,’’ शीला के उत्तर पर तीनों ने एकदूसरे की ओर देखा. इस देखने में व्यंग्य का पुट घुला था, यह मुंह और मसूर की दाल. फिर तीनों के ठहाके फूट उठे.
फिर कुछ क्षणों का मौन.
तीनों ने देखा, शीला स्मृतियों की धुंध में खोई बाहर के दृश्यों को देख रही है. तीनों की नजरें परस्पर गुंथ गईं. आंखों ही आंखों में मौन संकेत हुए. फिर आननफानन एक मादक गुदगुदा देने वाली योजना की रूपरेखा तीनों के जेहन में आकृति लेने लगी.
‘‘कहां खो गईं आप?’’
‘‘जी?’’ शीला हौले से मुसकरा दी.
‘‘आज पहला दिन था. रैगिंग तो हुई होगी?’’ अतुल ने प्रश्न किया तो शीला एक पल के लिए सकपका गई. दिमाग में आज हुई रैगिंग का एकएक कोलाज मेढक की तरह फुदकने लगा. 3 सीनियरों का उसे घेर कर द्वितीय तल के एक क्लासरूम में ले जाना फिर ऊलजलूल द्विअर्थी यक्ष प्रश्नों का सिलसिला. शीला मन ही मन घबरा रही थी. पर रैगिंग का स्तर खूब नीचे नहीं उतरा था और तीनों छात्र मर्यादा के भीतर ही रहे थे.
‘‘आप न भी बताएंगी तो भी अनुमान लगाना कठिन नहीं कि रैगिंग के नाम पर बेहद घटिया हरकत की गई होगी आप के साथ,’’ अतुल फुफकारा, ‘‘बीसी कालेज के छात्रों को हम अच्छी तरह जानते हैं. इस शहर के सब से ज्यादा बदतमीज और लफंगे छात्र, हंह.’’
शीला मौन रही. क्या कहती भला?
‘‘एकदम ठीक बोल रहा दादा,’’ पिंटू इस बार अपने लहजे में बंगाली टोन का छौंक डालते हुए हिनहिनाया, ‘‘माइरी, अइसा अभद्रो व्यवहार से ही तो हमारा छात्र समुदाय बदनाम हो रहा. इस बदनामी को साफ करने का एक उपाय है, दोस्तो,’’ इसी बीच मादक योजना की रूपरेखा मुकम्मल आकार ले चुकी थी, ‘‘क्यों न हम इस नए दोस्त को नए प्रवेश की मुबारकबाद देने के लिए छोटी सी पार्टी दे दें?’’
‘‘गजब, क्या लाजवाब आइडिया है, अतुल,’’ यादव समर्थन में चहक उठा, ‘‘मुबारकबाद का मुबारकबाद और बदनामी का परिमार्जन भी.’’
‘‘पर बड़े भाई, पार्टी होगी कहां और कब?’’
‘‘पार्टी आज ही होगी यार और अभी कुछ देर बाद,’’ अतुल हंसा. दरअसल, योजना बनी ही इतनी मादक थी कि भीतर का रोमांच लहजे के संग बह कर बाहर टपकना चाह रहा था, ‘‘अगले स्टेशन पर हम उतर जाएंगे. स्टेशन के पास ही बढि़या होटल है, ‘होटल शहनाई.’ वहीं पार्टी दे देंगे. ओके.’’
शीला अतुल के अजूबे और अप्रासंगिक प्रस्ताव पर चकित रह गई. किसी अन्य कालेज के अपरिचित छात्र. अचानक इतनी उदारता.
‘‘नो, नो, थैंक्स मित्रो, मेरे सीनियर्स ने वैसा कुछ भी नहीं किया है अभद्र, जैसा आप सब समझ रहे हैं.’’
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‘‘चलिए ठीक है. माना कि आप के सीनियर्स शरीफ हैं पर पार्टी तो हमारी ओर से तोहफा होगी आप को. परिचय और अंतरंगता इसी तरह तो बनती है. हम छात्र किसी भी कालेज के हों, हैं तो एक ही बिरादरी के.’’
‘‘आप ठीक कह रहे हैं. अब तो मिलना होता ही रहेगा न. पार्टी फिर कभी,’’ शीला ने दृढ़ता से इनकार कर दिया.
‘‘उफ, 12 बजे हैं अभी. 3:25 बजे की लोकल पकड़वा देंगे. देर नहीं होगी.’’
‘‘सौरी…मैं ने कहा न, मैं पार्टी स्वीकार नहीं कर सकती,’’ शीला ने चेहरा खिड़की की ओर फेर लिया.
कुछ क्षणों का बेचैनी भरा मौन.
‘‘इधर देखिए दोस्त,’’ अतुल की तर्जनी शीला की ठोढ़ी तक जा पहुंची, ‘‘जब मैं ने कह दिया कि पार्टी होगी, तो फिर पार्टी होगी ही. हम अगले स्टेशन पर उतर रहे हैं.’’
अतुल के लहजे में छिपी धमकी की तासीर से शीला भीतर तक कांप उठी.
‘‘आखिर हम भी तो आप के सीनियर्स ही हुए न,’’ तीनों बोले.
शीला ने डब्बे में बैठे यात्रियों का सिंहावलोकन किया. लगभग सभी यात्री अवाक् और हतप्रभ थे. किसी ने सोचा भी न था कि ऊंट इस तरह करवट ले बैठेगा.
‘‘अरे भैया, लड़की का पार्टी के लिए मन नहीं है तो काहे जबरदस्ती कर रहे ससुर?’’ नेताजी ने बीचबचाव की पहल की तो पिंटू तुनक कर खड़ा हो गया, ‘‘ओ बादशाहो, तुसी वड्डे मजाकिया हो जी. त्वाडे दिल विच्च इस कुड़ी के लिए एन्नी हमदर्दी क्यों फड़फड़ा रेहंदी है, अयं?’’
नेताजी की ओर कड़ी दृष्टि से देखते हुए अतुल शीला से मुखातिब हो कर बोला, ‘‘आइए, गेट के पास चलते हैं.’’
‘‘नहींनहीं, मैं नहीं जाऊंगी,’’ शीला की आंखों में भय उतर आया, ‘‘प्लीज…’’
‘‘अब नखरे मत दिखा,’’ यादव और अतुल भी खडे़ हो गए. यादव ने शीला की कलाई थाम ली तो शीला ने झटके से छुड़ाते हुए विनम्र भाव से कहा, ‘‘प्लीज, छोड़ दें मुझे. पार्टी फिर कभी,’’ फिर सहायता के लिए प्रोफैसर से गुहार लगाते हुए चीख पड़ी, ‘‘देखिए न, सर…’’
‘‘आप लोग छात्र हैं या आतंकवादी, अयं? इस तरह जबरदस्ती नहीं कर सकते,’’ प्रतिरोध करने की उत्तेजना में प्रोफैसर सीट से खड़े हो गए.
‘‘शटअप,’’ यादव ने चीखते हुए प्रोफैसर को इतनी जोर से धक्का दिया कि वे लड़खड़ाते हुए धप्प से सीट पर लुढ़क गए.
तभी जीआरपी के 2 जवान गश्त लगाते हुए उधर से गुजरे. शीला को जैसे नई जान मिल गई हो, वह चीख पड़ी, ‘जीआरपी अंकल.’
शिवानंद के आगे बढ़ते कदम ठिठक गए. पीछे मुड़ कर बर्थ के भीतर तक झांका तो दृष्टि सब से पहले अतुल से टकराई. वे खिल उठे, ‘‘अरे, अतुल बाबू, आप? नत्थूराम, ई अतुल बाबू हैं, आईजी रेल, तिवाड़ी साहब के सुपुत्र.’’
‘‘अंकल, आप इस टे्रन में?’’ अतुल शिवानंद से हाथ मिलाते हुए मुसकराया.
‘‘जनता को भी न सरकार और पुलिस विभाग को बदनाम करने में बड़ा मजा मिलता है एकरा माय के. शिकायत किहिस है जे टे्रन में लूटडकैती, छेड़छाड़, किडनैपिंग बढ़ रहा है. बस… आ गया ऊपर से और्डर लोकलवा सब में गश्त लगाने का, हंह. लेकिन अभी तक एक्को केस ऐसा नय मिल सका है.’’
‘‘जनता की बात छोडि़ए,’’ अतुल ने लापरवाही से कंधे झटके. शिवानंद ने युवती की ओर देख कर संकेत से पूछा, ‘‘ई आप के साथ हैं?’’
‘‘जी हां, क्लासफ्रैंड हैं हमारी,’’ अतुल मुसकराया तो शीला का मन हुआ, सारी बात बता दे पर जबान से बोल नहीं फूटे.
‘‘मैडम, अतुल बाबू बड़े सज्जन और सुशील नौजवान हैं. इन की दोस्ती से आप फायदे में ही रहेंगी. अच्छा, अतुल बाबू, सर को हमारा परनाम कहिएगा.’’
शीला की आंखों के आगे सारी स्थिति आईने की तरह साफ हो गई. अतुल आईजी रेल का लड़का है. पावर और पैसा, जब दोनों ही चीजें हों जेब में तो यादव और पिंटू जैसे वफादार चमचे वैसे ही दौड़े आएंगे जैसे गुड़ को देख कर चींटियां. सिपाहियों के जाते ही तीनों एक बार फिर जोरों से हंस पड़े. पिंटू ने आगे बढ़ कर शीला की कलाई थाम ली और खींच कर उसे उठाने का प्रयास करने लगा. शीला की इच्छा हुई, एक झन्नाटेदार तमाचा उस के गाल पर जड़ दे. बड़ी मुश्किल से ही उस ने क्रोध को जज्ब किया. इस तरह रिऐक्ट करने से बात ज्यादा बिगड़ सकती है.
तभी न जाने किस जेब से निकल कर अतुल की हथेली में छोटा सा रिवौल्वर चमक उठा.
‘‘किसी ने भी चूंचपड़ की तो…’’ रिवौल्वर यात्रियों की ओर तानते हुए वह गुर्रा उठा, ‘‘मनीष मिश्रा केस के बारे में तो सुना होगा न?’’
मनीष मिश्रा, वही जिस के तार स्वयं पीएम साहब से जुड़े हुए थे. बदमाशों ने चलती टे्रन से बाहर फेंक दिया था उसे. अपराध? सफर कर रही एक लड़की से छेड़खानी का मुखर विरोध. यात्रियों के बदन भय से कंपकंपाने लगे और रोंगटे खड़े हो गए.
सब से पहले नेताजी उठे, ‘‘थानापुलिस में तो एतना पहचान है कि का कहें ससुर. पर ई छात्र लोग का आपसी मामला न है. पुलिस हस्तक्षेप नहीं कर सकती.’’
फिर प्रोफैसर साहब भी अटैची संभालते हुए उठ खड़े हुए, ‘‘जब इतने प्यार से पार्टी दे रहे हैं ये लोग तो क्या हर्ज है स्वीकारने में? पर घर लौट कर मेरा आलेख पढि़एगा जरूर.’’
धीरेधीरे शकीला के अलावा सभी यात्री डब्बे के दूसरे हिस्सों में चले गए. शकीला वहीं बैठी रही. हिजड़ा होते हुए भी इतना तो समझ चुकी थी कि अकेली लड़की मुसीबत में पड़ गई है. ये लोग इसे जबरदस्ती अगवा करने पर उतारू हैं. पर इस हाल में वह करे भी तो क्या?
‘‘तेरे यार सब तो भाग गए.’’ पिंटू चुटकी बजाते हुए व्यंग्य से बोला, ‘‘तू कौन सा तीर मार लेगी, अयं?’’
‘‘किन्नरों को मामूली न समझियो,’’ शकीला ताली पीटती हुई अदा से खिलखिलाई, ‘‘हमारे 2 किन्नरों ने तो महाभारत का किस्सा ही बदल डाला
था. एक थे शिखंडी महाराज, दूसरे बिरहनला (बृहन्नला).’’
ये नोंकझोंक चल ही रही थी कि तभी उस हिस्से में बूटपौलिश वाला एक लड़का हवा के झौंके की तरह आ पहुंचा. दसेक साल की उम्र. काला स्याह बदन. बाईं कलाई में पौलिश वाला बक्सा झुलाए, दाएं हाथ से ठोस ब्रश को बक्से पर ठकठकाता, ‘‘पौलिश साब.’’
‘‘तू कहां से आ टपका रे? चल फूट यहां से,’’ अतुल ने रिवौल्वर उस की ओर तान दिया. लड़का तनिक भी न घबराया. पूरा माजरा भांपते एक पल भी नहीं लगा उसे. खीखी करता खीसें निपोर बैठा, ‘‘समझा साब, कोई शूटिंग चल रहेला इधर. अपुन डिस्टप नहीं करेगा साब. थोड़ा शूटिंग देखने को मांगता. बिंदास…’’
‘‘इस को रहने दो बड़े भाई,’’ पिंटू ने मसका लगाया, ‘‘तुम लगते ही हीरो जैसे हो.’’
शकीला के रसीले बतरस और पौलिश वाले लड़के के आगमन से तीनों का ध्यान शीला की ओर से कुछ देर के लिए हट गया. शीला के भीतर एक बवंडर जन्म लेने लगा. कैसा हादसा होने जा रहा है यह? इन की नीयत गंदी है, यह तो स्पष्ट हो चुका है, पार्टी के नाम पर अगवा करने की कुत्सित योजना. उफ.
इस तरह की विषम परिस्थितियों में अकेली लड़की के लिए बचाव के क्या विकल्प हो सकते हैं भला? सहायता के लिए ‘बचाओ, बचाओ’ की गुहार लगाने पर सचमुच कोई दौड़ा चला आएगा? डब्बे में बैठे यात्रियों का पलायन तो देख ही रही है वह. फिर? इन निर्मम, नृशंस और संवेदनहीन युवकों के आगे हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने से भी कोई लाभ होने वाला नहीं. इन के लिए तो हर स्त्री सिर्फ मादा भर ही है. हर रिश्तेनाते से परे. सिर्फ मादा.
शीला सतर्क नजरों से पूरी स्थिति का जायजा लेती है. डब्बे में शकीला और पौलिश वाला लड़का ही रह गए थे. भावावेश में शकीला की ओर देखती है वह. तभी आंखों के आगे धुंध छाने लगती है, ‘अरे, बृहन्नला के भीतर से यह किस की आकृति फूट रही है? अर्जुन, हां, अर्जुन ही हैं जो कह रहे हैं, नारी सशक्तीकरण की सारी बातें पाखंड हैं री. पुरुषवादी समाज नारियों को कभी भी सशक्त नहीं होने देगा. सशक्त होना है तो नारियों को बिना किसी की उंगली थामे स्वयं ही पहल करनी होगी.’
शीला अजीब से रोमांच से सिहर उठती है. नजरें वहां से हट कर पौलिश वाले लड़के पर टिक जाती हैं. पौलिश वाले लड़के का चेहरा भी एक नई आकृति में ढलने लगता है, ‘बचपन में लौटा शम्बूक. होंठों पर आत्मविश्वास भरी निश्छल हंसी, ‘ब्राह्मणवादी, पुरुषवर्चस्ववादी व्यवस्था’ ने नारियों व दलितों को कभी भी सम्मान नहीं दिया. अपने सम्मान की रक्षा के लिए तुम्हारे पास एक ही विकल्प है, पहल. एक बार मजबूत पहल कर लो, पूरा रुख बदल जाएगा.’
शीला असाधारण रूप से शांत हो गई. भीतर का झंझावात थम गया. आसानी से तो हार नहीं मानने वाली वह. मन ही मन एक निर्णय लिया. तीनों युवक शकीला के किसी मादक चुटकुले पर होहो कर के हंस रहे थे कि अचानक जैसे वह पल ठहर गया हो. एकदम स्थिर. शीला ने दाहिनी हथेली को मजबूत मुट्ठी की शक्ल में बांधा और भीतर की सारी ताकत लगा कर मुट्ठी को पास खड़े यादव की दोनों जांघों के संधिस्थल पर दे मारा.
उसी ठहरे हुए स्थिर पल में शकीला के भीतर छिपे अर्जुन ने ढोलक को लंबे रूप में थामा और पूरी शक्ति लगा कर चमड़े के हिस्से वाले भाग से पिंटू के माथे पर इतनी जोर से प्रहार किया कि ढोलक चमड़े को फाड़ती उस की गरदन में फंस गई. और उसी ठहरे हुए स्थिर पल में पौलिश वाले लड़के के भीतर छिपे शंबूक ने दांतों पर दांत जमा कर हाथ के सख्त ब्रश को अतुल की कलाई पर फेंक मारा. इतना सटीक निशाना कि रिवौल्वर छिटक कर न जाने कहां बिला गया और ओहआह करता वह फर्श पर लुढ़क कर तड़पने लगा.
पलक झपकते आसपास के डब्बों से आए यात्रियों की खासी भीड़ जुट गई वहां और लोग तीनों पर लातघूंसे बरसाते हुए फनफना रहे थे, ‘‘हम लोगों के रहते एक मासूम कोमल लड़की से छेड़खानी करने का साहस कैसे हुआ रे?’’