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पेड़ : कैसी लड़की थी सुलभा

चीनू की नन्हीनन्ही हथेलियां दूर होती चली गईं और धीरेधीरे एकदम से ओझल हो गईं.

पूरे 30 दिन से उन का घर गुलजार था. बच्चों के होहल्ले से भरा था. साल भर में उन के घर में 2 ही तो खुशी के मौके आते थे. एक गरमी की लंबी छुट्टियों में और दूसरा, दशहरे की छुट्टियों के समय.

उन दिनों नीरेंद्र की उजाड़ जिंदगी में हुलस कर बहार आ जाती थी. उस का जी करता था कि इस आए वक्त को रोक कर अपने घर में कैद कर ले. खूब नाचेगाए और जश्न मनाए, पर ऐसा हो कहां सकता था.

छोटी बहन के साथ 2 बच्चे, छोटे भाई के 2 बच्चे और बड़ी दीदी के दोनों बच्चे, पूरे 6 नटखट ऊधमी सदस्यों के आने से ऐसा लगता जैसे घर छोटा पड़ गया हो. बच्चे उस कमरे से इस कमरे में और इस कमरे से उस कमरे में भागे फिरते, चिल्लाते और चीजें बिखेरते रहते.

बच्चों के मुंह से ‘चाचीजी’, ‘मामीजी’ सुनसुन कर वे अघाते न थे. दिनरात उन की फरमाइशें पूरी करने में लगे रहते. किसी को कंचा चाहिए तो किसी को गुल्लीडंडा. किसी को गुडि़या तो किसी को लट्टू.

4 माह में जितना पैसा वे बैंक से निकाल कर अपने ऊपर खर्च करते थे, उस से भी ज्यादा बच्चों की फरमाइशें पूरी करने में उन दिनों खर्च कर देते. फिर भी लगता कि कुछ खर्च ही नहीं किया है. वे तो नईनई चीजें खरीदने के लिए बच्चों को खुद ही उकसाते रहते.

कभीकभी भाईबहनों को गुस्सा आने लगता तो वे उन्हें झिड़कते, ‘‘क्या करते हो भैया. सुबह से इन मामूली चीजों के पीछे लगभग 100 रुपए फूंक चुके हो. बच्चों की मांग का भी कहीं अंत है?’’

नीरेंद्र हंस देते, ‘‘अरे, रहने दो, यह इन्हीं का तो हिस्सा है. बस, साल में 10 दिन ही तो इन के चाव के होते हैं. देता हूं तो बदले में इन से प्यार भी तो पाता हूं.’’

सिर्फ 30 दिन का ही तो यह मेला होता है. बाद में बच्चों की बातें, उन की गालियां याद आतीं. उन की छोड़ी हुई कुछ चीजें, कुछ खिलौने संभाल कर वे उन निर्जीव वस्तुओं से बातें करते रहते और मन को बहलाते. उन की एक बड़ी अलमारी तो बच्चों के खिलौनों से भरी पड़ी थी.

इस तरह नीरेंद्र अपने अकेलेपन को काटते. हर बार उन का जी करता कि बच्चों को रोक लें, पर रोक नहीं पाते. न बच्चे रुकना चाहते हैं न माताएं उन्हें यहां रहने देना पसंद करती हैं. पहले तो उन के छोटे होने का बहाना था. बड़े हुए तो छात्रावास में डाल दिए गए. इसी से नीरेंद्र उन्हीं बच्चों में से एक को गोद लेना चाहते थे. मगर हर घर में 2 बच्चे देख खुद ही तालू से जबान लग जाती थी.

किसीकिसी साल तो ऐसा भी होता है कि 30 दिनों में भी कटौती हो जाती. कभीकभी बच्चे यहां आने के बजाय कश्मीर, मसूरी घूमने की ठान लेते. फिर तो ऐसा लगने लगता जैसे जीने का बहाना ही खत्म हो जाएगा. पिछले साल यही तो हुआ था. बच्चे रानीखेत घूमने की जिद कर बैठे थे और यहां आना टल गया था. किसी तरह छुट्टियों के 7-8 दिन बचा कर वे यहां आए थे तो उन का मन रो कर रह गया था.

कभीकभी नीरेंद्र को अपनेआप पर ही कोफ्त होने लगती कि क्यों वे अकेले रह गए? आखिर क्या कारण था इस का? पिता की असमय मृत्यु ने उन के घर को अनाथ कर दिया था. घर में वे सब से बड़े थे, इसलिए जिम्मेदारी निभाना उन्हीं का कर्तव्य था. घर में सभी को पढ़ाया- लिखाया. पूरी तरह से हिम्मत बांध कर उन के शादीब्याह किए तब कहीं जा कर अपने लिए विचार किया था.

नीरेंद्र सीधीसादी लड़की चाहते थे. मां ने उन के लिए सुलभा को पसंद किया था. सुलभा में कोई दोष न था. नीरेंद्र खुश थे कि उम्र उन के विवाह में बाधक नहीं बनी. इस से पहले जब वे भाईबहनों का घर बसा रहे थे तब सदा उन्हें एक ही ताना मिला था, ‘‘क्यों नीरेंद्र, ब्याह करोगे भी या नहीं? बूढ़े हो जाओगे, तब कोई लड़की भी न देगा. बाल पक रहे हैं, आंखों पर चश्मा चढ़ गया है और क्या कसर बाकी है?’’

सुन कर नीरेंद्र हंस देते थे, ‘‘चश्मा और पके बाल तो परिपक्वता और बुद्धिमत्ता की निशानी हैं. मेरी जिम्मेदारी को जो लड़की समझेगी वही मेरी पत्नी बनेगी.’’

सुलभा उन्हें ऐसी ही लड़की लगी थी. सगाई के बाद तो वे दिनरात सुलभा के सपने भी देखने लगे थे. उन्हें ऐसा लगता जैसे सुलभा उन की जिंदगी में एक बहार बन कर आएगी.

विवाह की तिथि को अभी काफी दिन थे. एक दिन इसी बीच वे सुलभा के साथ रात को फिल्म देख कर लौट रहे थे. अचानक कुछ बदमाशों ने सुलभा के साथ छेड़छाड़ की थी. नीरेंद्र को बुढ़ऊ कह कर ताना मार दिया था.

सुन कर नीरेंद्र को सहन न हुआ था और वे बदमाशों से उलझ पड़े थे, पर उन से वे कितना निबट सकते थे. अपनेआप से वे पहली बार हारे थे. गुस्सा आया था उन्हें अपनी कमजोरी पर. वे स्वयं को अत्यंत अपमानित महसूस कर रहे थे. हतप्रभ रह गए थे अपने लिए बुढ़ऊ शब्द सुन कर. उस शाम किसी तरह वे और सुलभा बच कर लौट तो आए थे मगर सुलभा ने दूसरे ही दिन सगाई की अंगूठी वापस भेज दी थी. शायद उसे भी यकीन हो गया था कि वे बूढ़े हो गए हैं.

‘अच्छा ही किया सुलभा ने.’ एक बार नीरेंद्र ने सोचा था. परंतु मन में अपनी हीनता और कमजोरी का एक दाग सा रह गया. विवाह से मन उचट गया, कोई इस विषय पर बात चलाए भी तो उस से उलझ बैठते. मां जब तक रहीं नीरेंद्र को शादी के लिए मनाती रहीं, समझाती रहीं.

मां की मृत्यु के बाद वह जिद और मनुहार भी खत्म हो गई. कुछ यह भी जिद थी कि अब इसी तरह जीना है. पहले भाईबहनों पर भरोसा था, पर वे अपनी- अपनी जिंदगी में लग गए तो उन्होंने उन्हें छेड़ना भी उचित न समझा.

हां, भाईबहनों के बच्चों ने अवश्य ही नीरेंद्र के अंदर एक बार गृहस्थी का लालच जगा दिया था. अंदर ही अंदर वे आकांक्षा से भर उठे कि उन्हें भी कोई पिता कहता. वे भी किसी के भविष्य को ले कर चिंता करते. वे भी कोई सपना पालते कि उन का बेटा बड़ा हो कर डाक्टर बनेगा या कोई उन का भी दुखसुख सुनता. सोतेजागते वे यही सोचा करते.

तब कभीकभी मन में मनाते कि कोई उन्हें क्यों नहीं कहता कि ब्याह कर लो. अकेले ही वे रसोईचूल्हे से उलझे हुए हैं कोई पसीजता क्यों नहीं, कोई अजूबा तो नहीं इस उम्र में ब्याह करना. बहुत से लोग कर रहे हैं.

नीरेंद्र अपनी जिंदगी की तुलना भाई की जिंदगी से करते. सोचते कि उन की और धीरेंद्र की सुबह में कितना अंतर है. वे 4 बजे का अलार्म लगा कर सोते. सोचते हुए देर रात गए उन्हें नींद आती. परंतु सुबह तड़के घड़ी की तेज घनघनाहट के साथ ही उन की नींद टूट जाती जबकि वे जागना नहीं चाहते. लेकिन जानते हैं कि सुबह के नाश्ते की तैयारी, कमरों की सफाई, कपड़ों की धुलाई आदि सब उन्हीं को ही करनी है.

मगर धीरेंद्र की सुबह भले ही झल्लाहट से शुरू हो लेकिन उत्सुकता से भरी जरूर होती है. 4 बजे का अलार्म बज जाए तो भी उसे कोई परवाह नहीं. नींद ही नहीं टूटती है. न जाने उसे कैसी गहरी नींद आती है.

घड़ी का कांटा जब 4 से 5 तक पहुंचता है तब उस की पत्नी चिल्लाती है, ‘‘उठो, दफ्तर जाने में देर हो जाएगी.’’

‘‘हूं,’’ धीरेंद्र उसी खर्राटे के साथ कहेगा, ‘‘क्या 5 बज गए?’’

‘‘तैयार होतेहोते 10 बज जाएंगे. फिर मुझे न कहना कि देर हो गई.’’

शायद फिर बच्चों को इशारा किया जाता होगा. पप्पू धीरेंद्र के बिछौने पर टूट पड़ता, ‘‘उठिए पिताजी, वरना पानी डाल दूंगा.’’

फिर वह बच्चों के अगलबगल बैठ कर कहता, ‘‘अरे, नहीं बाबा, मां से कहो कि चाय ले आए.’’

स्नानघर में जा कर भी धीरेंद्र बीवी से उलझता रहता, ‘‘मेरे कुरते में 2 बटन नहीं हैं और जूते के फीते बदले या नहीं? जाने मोजों की धुलाई हुई है या नहीं?’’

पत्नी तमक कर कहती, ‘‘केवल तुम्हें ही तो नौकरी पर नहीं जाना है, मुझे भी दफ्तर के लिए निकलना है.’’

‘‘ओह, तो क्या तुम्हारे ब्लाउज के बटन मुझे टांकने होंगे,’’ धीरेंद्र चुहल करता तो पत्नी उसे धप से उलटा हाथ लगाती.

इसे कोई कुछ भी कहे, पर नीरेंद्र का लोभी मन गृहस्थी के ऐसे छोटेमोटे सुखों की कान लगा कर आहट लेता रहता.

नीरेंद्र बेसन के खुशबूदार हलवे के बहुत शौकीन हैं. जी करता है नाश्ते में कोई सुबहसुबह हलवा परोस दे और वे जी भर कर खाएं. अम्मां थीं तो उन का यह पसंदीदा व्यंजन हफ्ते में 3-4 बार अवश्य मिला करता था. पर उन की मृत्यु के बाद सारे स्वाद समाप्त हो गए.

धीरेंद्र की पत्नी बेसन का हलवा देखते ही मुंह बनाती थी. खुद नीरेंद्र अम्मां की भांति कभी हलवा बना नहीं सके. अब तो बस हलवे की खुशबू मन में ही दबी रहती है.

धीरेंद्र को बेसन के पकौड़ों के एवज में कई बार बीवी के हाथ बिक जाना पड़ता है. बीवी का मन न हो तो कोई न कोई बात पक्की करवा कर ही वह पकौड़े बनाती है. नीरेंद्र भी अपने पसंद के हलवे पर नीलाम हो जाना चाहते हैं, पर वह नीलामी का चाव मन में ही दबा रह गया. अब तो रोज सुबह थोड़ा सा चिवड़ा फांक कर दफ्तर की ओर चल देते हैं.

दफ्तर में नए और पुराने सहयोगियों का रेला नीरेंद्र को देखदेख कर दबी मुसकराहट से अभिवादन करता. कम से कम इतनी तसल्ली तो जरूर रहती कि हर कोई उन से काम निकलवाने के कारण मीठीमीठी बातें तो जरूर करता है. उस के साहब, अपनीअपनी फाइल तैयार करवाने के चक्कर में उसे मसका लगाते रहते. किसी को पार्टी में जाना हो, पत्नी को ले कर बाजार जाना हो, बच्चे को अस्पताल पहुंचाना हो, तुरंत उन्हें पकड़ते. ‘‘नीरेंद्र, थोड़ा सा यह काम कर दो.’’

इतना ही नहीं दफ्तर के क्लर्क, चपरासी, माली, जमादार आदि अपने तरीके से इस अकेले व्यक्ति से नजराना वसूलते रहते. अगर देने में थोड़ी सी आनाकानी की तो वे लोग कह देते, ‘‘किस के लिए बचा रहे हो, बाबू साहब. आप की बीवी होती तो कहते, साड़ी की फरमाइश पूरी करनी है. बेटा होता तो कहते कि उस की पढ़ाई का खर्च है. अगर बेटी होती तो हम कभी धेला भी न मांगते…मगर कुंआरे व्यक्ति को भला कैसी चिंता?’’

पर धीरेंद्र को न तो दफ्तर में रुकने की जरूरत पड़ती और न ही अपने मातहतों के हाथ में चार पैसे धरने की नौबत आती. घर जल्दी लौटने के बहाने भी उसे नहीं बनाने पड़ते. खुद ही लोग समझ जाते हैं कि घर में देरी की तो जनाब की खैर नहीं.

पर नीरेंद्र किस के लिए जल्दी घर लौटें. बालकनी में टहलते ठीक नहीं लगता. अपनीअपनी छतों पर टहलते जोड़ों का आपस में हंसीमजाक सुनना अब उन से सहन नहीं होता. बारबार  लगता है जैसे हर बात उन्हें ही सुनाई जा रही है. खनकती, ठुनकती हंसी वे पचा नहीं पाते. घर के अंदर भाग कर आएं तो मच्छरों की भूखी फौज उन की दुबली देह पर टूट पड़ती है. तब एक ही उपाय नजर आता है कि मच्छरदानी गिरा कर अंदर घुस जाएं और घड़ी के भागते कांटों को देखते हुए समय निकालते रहें.

इसीलिए नीरेंद्र कभीकभी वैवाहिक विज्ञापनों में स्वयं ही अपने लिए उपयुक्त पात्र तलाशने लगते हैं. पर ऐसा कभी न हो सका. कई बार समझौतों के सहारे लगा कि बात बनेगी परंतु विवाह के लिए समझौता करना उन्हें उचित नहीं लगा. अकेलेपन के कारण झिझकते हुए उन्होंने छोटे भाई की लड़की नीलू को अपने पास रख लेने का प्रस्ताव किया तो वह बचने लगा था, ‘‘पता नहीं, बच्ची की मां राजी होगी या नहीं?’’

पर नीरेंद्र बजाय बच्ची की मां से पूछने के छोटी बहन के सामने ही गिड़गिड़ा उठे थे, ‘‘कामिनी, मैं चाहता हूं, क्यों न आशू यहीं मेरे साथ रहे. उस का जिम्मा मैं उठाऊंगा.’’

‘‘आशू?’’ बहन की आंखें झुक गईं, ‘‘बाप रे, इस की दादी तो मुझे काट कर रख देंगी.’’

जवाब सुन कर नीरेंद्र चकित रह गए थे, ‘अरे यह क्या? अपनी लगभग सारी कमाई इन के बच्चों पर उड़ाता हूं. कितने दुलार से यहां उन्हें रखता हूं. हर वर्ष राखी पर मुंहमांगी चीज बहन के हाथ में रखता हूं. इतना ही नहीं, किसी भी बच्चे को कुछ भी चाहिए तो साधिकार माएं चालाकी से उन की फरमाइश लिख भेजती हैं, लेकिन क्या कोई भी अपने एक बच्चे को मेरे पास नहीं छोड़ सकती. कल को वह बच्चा मेरी पूरी संपत्ति का वारिस होगा, लेकिन सब ने मेरी मांग ठुकरा दी.’

‘‘अच्छा, आशू से ही पूछती हूं,’’ बहन ने आशू को आवाज दी थी.

नीरेंद्र उस की बातों से बेजार छत ताकने लगे थे, लेकिन आशू को सिर्फ उन की चीजें ही अच्छी लगती थीं.

कुंआरे रह कर नीरेंद्र लोगों के लिए सिर्फ एक पेड़ बन कर रह गए थे, जिसे जिस का जी चाहे, नोचे, फलफूल, लकड़ी आदि प्रत्येक रूप में उस का उपयोग करे. अपने लिए भी वे एक पेड़ की भांति थे. जैसे बसंत के मौसम में पेड़ों के नए फूलपत्ते आते हैं उसी प्रकार वे भी किसी पेड़ की तरह हरेभरे हो जाते. क्या उन्हें वर्ष भर मुसकराने का हक नहीं है? स्वयं के नोचे जाने के विरोध का भी कोई अधिकार नहीं है?

अकाल्पनिक : ये थी रिश्तों की असली हकीकत

रक्षाबंधन से एक रोज पहले ही मयंक को पहली तन्ख्वाह मिली थी. सो, पापामम्मी के उपहार के साथ ही उस ने मुंहबोली बहन चुन्नी दीदी के लिए सुंदर सी कलाई घड़ी खरीद ली.

‘‘सारे पैसे मेरे लिए इतनी महंगी घड़ी खरीदने में खर्च कर दिए या मम्मीपापा के लिए भी कुछ खरीदा,’’ चुन्नी ने घड़ी पहनने के बाद पूछा.

‘‘सब के लिए खरीदा है, दीदी, लेकिन अभी दिया नहीं है. शौपिंग करने और दोस्तों के साथ खाना खाने के बाद रात में बहुत देर से लौटा था. तब तक सब सो चुके थे. अभी मां ने जगा कर कहा कि आप आ गई हैं और राखी बांधने के लिए मेरा इंतजार कर रही हैं, फिर आप को जीजाजी के साथ उन की बहन के घर जाना है. सो, जल्दी से यहां आ गया, अब जा कर दूंगा.’’

‘‘अब तक तो तेरे पापा निकल गए होंगे राखी बंधवाने,’’ चुन्नी की मां ने कहा.

‘‘पापा तो कभी कहीं नहीं जाते राखी बंधवाने.’’

‘‘तो उन के हाथ में राखी अपनेआप से बंध जाती है? हमेशा दिनभर तो राखी बांधे रहते हैं और उन्हीं की राखी देख कर तो तूने भी राखी बंधवाने की इतनी जिद की कि गीता बहन और अशोक जीजू को चुन्नी को तेरी बहन बनाना पड़ा.’’ चुन्नी की मम्मी श्यामा बोली.

‘‘तो इस में गलत क्या हुआ, श्यामा आंटी, इतनी अच्छी दीदी मिल गईं मुझे. अच्छा दीदी, आप को देर हो रही होगी, आप चलो, अगली बार आओ तो जरूर देखना कि मैं ने क्या कुछ खरीदा है, पहली तन्ख्वाह से,’’ मयंक ने कहा. मयंक के साथ ही मांबेटी भी बाहर आ गईं. सामने के घर के बरामदे में खड़े अशोक की कलाई में राखी देख कर श्यामा बोली, ‘‘देख, बंधवा आए न तेरे पापा राखी.’’

‘‘इतनी जल्दी आप कहां से राखी बंधवा आए पापा?’’ मयंक ने हैरानी से पूछा.

‘‘पीछे वाले मंदिर के पुजारी बाबा से,’’ गीता फटाक से बोली.

मयंक को लगा किअशोक ने कृतज्ञता से गीता की ओर देखा. ‘‘लेकिन पुजारी बाबा से क्यों?’’ मयंक ने पूछा. ‘‘क्योंकि राखी के दिन अपनी बहन की याद में पुजारी बाबा को ही कुछ दे सकते हैं न,’’ गीता बोली. ‘‘तू नाश्ता करेगा कि श्यामा बहन ने खिला दिया?’’

‘‘खिला दिया और आप भी जो चाहो खिला देना मगर अभी तो देखो, मैं क्या लाया हूं आप के लिए,’’ मयंक लपक कर अपने कमरे में चला गया. लौटा तो उस के हाथ में उपहारों के पैकेट थे.

‘‘इस इलैक्ट्रिक शेवर ने तो हर महीने शेविंग का सामान खरीदने की आप की समस्या हल कर दी,’’ अपना हेयरड्रायर सहेजती हुई गीता बोली.

‘‘हां, लेकिन उस से बड़ी समस्या तो पुजारी बाबा का नाम ले कर तुम ने हल कर दी,’’ अशोक की बात सुन कर अपने कमरे में जाता मयंक ठिठक गया. उस ने मुड़ कर देखा, मम्मीपापा बहुत ही भावविह्वल हो कर एकदूसरे को देख रहे थे. उस ने टोकना ठीक नहीं समझा और चुपचाप अपने कमरे में चला गया. बात समझ में तो नहीं आई थी पर शीघ्र ही अपने नए खरीदे स्मार्टफोन में व्यस्त हो कर वह सब भूल गया.

एक रोज कंप्यूटर चेयरटेबल खरीदते हुए शोरूम में बड़े आकर्षक डबलबैड नजर आए. मम्मीपापा के कमरे में थे तो सिरहाने वाले पलंग मगर दोनों के बीच में छोटी मेज पर टेबललैंप और पत्रिकाएं वगैरा रखी रहती थीं. क्यों न मम्मीपापा के लिए आजकल के फैशन का डबलबैड और साइड टेबल खरीद ले. लेकिन डिजाइन पसंद करना मुश्किल हो गया. सो, उस ने मम्मीपापा को दिखाना बेहतर समझा. डबलबैड के ब्रोशर देखते ही गीता बौखला गई, ‘‘हमें हमारे पुराने पलंग ही पसंद हैं, हमें डबलवबल बैड नहीं चाहिए.’’

‘‘मगर मुझे तो घर में स्टाइलिश फर्नीचर चाहिए. आप लोग अपनी पसंद नहीं बताते तो न सही, मैं अपनी पसंद का बैडरूम सैट ले आऊंगा,’’ मयंक ने दृढ़स्वर में कहा.

गीता रोंआसी हो गई और सिटपिटाए से खड़े अशोक से बोली, ‘‘आप चुप क्यों हैं, रोकिए न इसे डबलबैड लाने से. यह अगर डबलबैड ले आया तो हम में से एक को जमीन पर सोना पड़ेगा और आप जानते हैं कि जमीन पर से न आप आसानी से उठ सकते हैं और न मैं.’’

‘‘लेकिन किसी एक को जमीन पर सोने की मुसीबत क्या है?’’ मयंक ने झुंझला कर कहा, ‘‘पलंग इतना चौड़ा है कि आप दोनों के साथ मैं भी आराम से सो सकता हूं.’’

‘‘बात चौड़ाई की नहीं, खर्राटे लेने की मेरी आदत की है, मयंक. दूसरे पलंग पर भी तुम्हारी मां मेरे खर्राटे लेने की वजह से मुंहसिर लपेट कर सोती है. मेरे साथ एक कमरे में सोना तो उस की मजबूरी है, लेकिन एक पलंग पर सोना तो सजा हो जाएगी बेचारी के लिए. इतना जुल्म मत कर अपनी मां पर,’’ अशोक ने कातर स्वर में कहा.

‘‘ठीक है, जैसी आप की मरजी,’’ कह कर मयंक मायूसी से अपने कमरे में चला गया और सोचने लगा कि बचपन में तो अकसर कभी मम्मी और कभी पापा के साथ सोता था और अभी कुछ महीने पहले अपने कमरे का एअरकंडीशनर खराब होने पर जब फर्श पर गद्दा डाल कर मम्मीपापा के कमरे में सोया था तो उसे तो पापा के खर्राटों की आवाज नहीं आई थी.

मम्मीपापा वैसे ही बहुत परेशान लग रहे थे, जिरह कर के उन्हें और व्यथित करना ठीक नहीं होगा. जान छिड़कते हैं उस पर मम्मीपापा. मम्मी के लिए तो उस की खुशी ही सबकुछ है. ऐसे में उसे भी उन की खुशी का खयाल रखना चाहिए. उस के दिमाग में एक खयाल कौंधा, अगर मम्मीपापा को आईपैड दिलवा दे तो वे फेसबुक पर अपने पुराने दोस्तों व रिश्तेदारों को ढूंढ़ कर बहुत खुश होंगे.

हिमाचल में रहने वाले मम्मीपापा घर वालों की मरजी के बगैर भाग कर शादी कर के, दोस्तों की मदद से अहमदाबाद में बस गए थे. न कभी स्वयं घर वालों से मिलने गए और न ही उन लोगों ने संपर्क करने की कोशिश की. वैसे तो मम्मीपापा एकदूसरे के साथ अपने घरसंसार में सर्वथा सुखी लगते थे, मयंक के सौफ्टवेयर इंजीनियर बन जाने के बाद पूरी तरह संतुष्ट भी. फिर भी गाहेबगाहे अपनों की याद तो आती ही होगी.

‘‘क्यों भूले अतीत को याद करवाना चाहता है?’’ गीता ने आईपैड देख कर चिढ़े स्वर में कहा, ‘‘मुझे गड़े मुर्दे उखाड़ने का शौक नहीं है.’’

‘‘शौक तो मुझे भी नहीं है लेकिन जब मयंक इतने चाव से आईपैड लाया है तो मैं भी उतने ही शौक से उस का उपयोग करूंगा,’’ अशोक ने कहा.

‘‘खुशी से करो, मगर मुझे कोई भूलाबिसरा चेहरा मत दिखाना,’’ गीता ने जैसे याचना की.

‘‘लगता है मम्मी को बहु कटु अनुभव हुए हैं?’’ मयंक ने अशोक से पूछा.

‘‘हां बेटा, बहुत संत्रास झेला है बेचारी ने,’’ अशोक ने आह भर कर कहा.

‘‘और आप ने, पापा?’’

‘‘मैं ने जो भी किया, स्वेच्छा से किया, घर वाले जरूर छूटे लेकिन उन से भी अधिक स्नेहशील मित्र और सब से बढ़ कर तुम्हारे जैसा प्यारा बेटा मिल गया. सो, मुझे तो जिंदगी से कोईर् शिकायत नहीं है,’’ अशोक ने मुसकरा कर कहा.

कुछ समय बाद मयंक की, अपनी सहकर्मी सेजल मेहता में दिलचस्पी देख कर गीता और अशोक स्वयं मयंक के लिए सेजल का हाथ मांगने उस के घर गए.‘‘भले ही हम हिमाचल के हैं पर वर्षों से यहां रह रहे हैं, मयंक का तो जन्म ही यहीं हुआ है. सो, हमारा रहनसहन आप लोगों जैसा ही है, सेजल को हमारे घर में कोई तकलीफ नहीं होगी, जयंतीभाई,’’ अशोक ने कहा.

‘‘सेजल की हमें फिक्र नहीं है, वह अपने को किसी भी परिवेश में ढाल सकती है,’’ जयंतीभाई मेहता ने कहा. ‘‘चिंता है तो बस उस के दादादादी की, अपनी परंपराओं को ले कर दोनों बहुत कट्टर हैं. हां, अगर शादी उन के बताए रीतिरिवाज के अनुसार होती है तो वे इस रिश्ते के लिए मना नहीं करेंगे.’’

‘‘वैसे तो हम कोई रीतिरिवाज नहीं करने वाले थे, पर सेजल की दादी की खुशी के लिए जैसा आप कहेंगे, कर लेंगे,’’ गीता ने सहजता से कहा, ‘‘आप बस जल्दी से शादी की तारीख तय कर के हमें बता दीजिए कि हमें क्या करना है.’’

सब सुनने के बाद मयंक ने कहा, ‘‘यह आप ने क्या कह दिया, मम्मी, अब तो उन के रिवाज के अनुसार, सेजल की मां, दादी, नानी सब को मेरी नाक पकड़ कर मेरा दम घोंटने का लाइसैंस मिल गया.’’

गीता हंसने लगी, ‘‘सेजल के परिवार से संबंध जोड़ने के बाद उन के तौरतरीकों और बुजुर्गों का सम्मान करना तुम्हारा ही नहीं, हमारा भी कर्तव्य है.’’ गीता बड़े उत्साह से शादी की तैयारियां करने लगी. अशोक भी उतने ही हर्षोल्लास से उस का साथ दे रहा था.

शादी  से कुछ रोज पहले, मेहता दंपत्ती उन के घर आए. ‘‘शादी से पहले हमारे यहां हवन करने का रिवाज है, जिस में आप का आना अनिवार्य है,’’ जयंतीभाई ने कहा, ‘‘आप को रविवार को जब भी आने में सुविधा हो, बता दें, हम उसी समय हवन का आयोजन कर लेंगे. वैसे हवन में अधिक समय नहीं लगेगा.’’

‘‘जितना लगेगा, लगने दीजिए और जो समय सेजल की दादी को हवन के लिए उपयुक्त लगता है, उसी समय  करिए,’’ गीता, अशोक के बोलने से पहले ही बोल पड़ी.

‘‘बा, मेरा मतलब है मां तो हमेशा हवन ब्रह्यबेला में यानी ब्रैकफास्ट से पहले ही करवाती हैं.’’ जयंतीभाई ने जल्दी से पत्नी की बात काटी, कहा, ‘‘ऐसा जरूरी नहीं है, भावना, गोधूलि बेला में भी हवन करते हैं.’’

‘‘सवाल करने का नहीं, बा के चाहने का है. सो, वे जिस समय चाहेंगी और जैसा करने को कहेंगी, हम सहर्ष वैसा ही करेंगे,’’ गीता ने आश्वासन दिया.

‘‘बस, हम दोनों के साथ बैठ कर आप को भी हवन करना होगा. बच्चों के मंगल भविष्य के लिए दोनों के मातापिता गठजोड़े में बैठ कर यह हवन करते हैं,’’ भावना ने कहा.

गीता के चेहरे का रंग उड़ गया और वह चाय लाने के बहाने रसोई में चली गई. जब वह चाय ले कर आई तो सहज हो चुकी थी. उस ने भावना से पूछा कि और कितनी रस्मों में वर के मातापिता को शामिल होना होगा?

‘‘वरमाला को छोड़ कर, छोटीमोटी सभी रस्मों में आप को और हमें बराबर शामिल होना पड़ेगा?’’ भावना हंसी, ‘‘अच्छा है न, कुछ देर को ही सही, भागदौड़ से तो छुट्टी मिलेगी.’’

‘‘दोनों पतिपत्नी का एकसाथ बैठना जरूरी होगा?’’ गीता ने पूछा.

‘‘रस्मों के लिए तो होता ही है,’’ भावना ने जवाब दिया.

‘‘वैसा तो हिमाचल में भी होता है,’’ अशोक ने जोड़ा, ‘‘अगर वरवधू के मातापिता में से एक न हो तो विवाह की रस्में किसी अन्य जोड़े चाचाचाची वगैरा से करवाई जाती हैं.’’

‘‘बहनबहनोई से भी करवा सकते हैं?’’ गीता ने पूछा.

‘‘हां, किसी से भी, जिसे वर या वधू का परिवार आदरणीय समझता हो,’’ भावना बोली.

मयंक को लगा कि गीता ने जैसे राहत की सांस ली है. मेहता दंपती के जाने के बाद गीता ने अशोक को बैडरूम में बुलाया और दरवाजा बंद कर लिया. मयंक को अटपटा तो लगा पर उस ने दरवाजा खटखटाना ठीक नहीं समझा. कुछ देर के बाद दोनों बाहर आ गए और गीता फोन पर नंबर मिलाने लगी.

‘‘हैलो, चुन्नी…हां, मैं ठीक हूं…अभी तुम और प्रमोदजी घर पर हो, हम मिलना चाह रहे हैं, तुम्हारे भाई की शादी है. भई, बगैर मिले कैसे काम चलेगा… यह तो बड़ी अच्छी बात है…मगर कितनी भी देर हो जाए आना जरूर, बहुत जरूरी बात करनी है.’’ फोन रख कर गीता अशोक की ओर मुड़ी, ‘‘चुन्नी और प्रमोद दोस्तों के साथ बाहर खाना खाने जा रहे हैं, लौटते हुए यहां आएंगे.’’

‘‘ऐसी क्या जरूरी बात करनी है दीदी से जिस के लिए उन्हें आज ही आना पड़ेगा?’’ मयंक ने पूछा.

गीता और अशोक ने एकदूसरे की ओर देखा. ‘‘हम चाहते हैं कि तुम्हारे विवाह की सब रस्में तुम्हारी चुन्नी दीदी और प्रमोद जीजाजी निबाहें ताकि मैं और गीता मेहमानों की यथोचित आवभगत कर सकें,’’ अशोक ने कहा.

‘‘मेहमानों की देखभाल करने को मेरे बहुत दोस्त हैं और दीदीजीजा भी. आप दोनों की जो भूमिका है यानी मातापिता वाली, आप लोग बस वही निबाहेंगे,’’ मयंक ने दृढ़ स्वर में कहा.

‘‘उस में कई बार जमीन पर बैठना पड़ता है जो अपने से नहीं होता,’’ गीता ने कहा.

‘‘जमीन पर बैठना जरूरी नहीं है, चौकियां रखवा देंगे कुशन वाली.’’

‘‘ये करवा देंगे वो करवा देंगे से बेहतर है चुन्नी और प्रमोद से रस्में करवा ले,’’ गीता ने बात काटी. ‘‘तेरी चाहत देख कर हम बगैर तेरे कुछ कहे सेजल से तेरी शादी करवा रहे हैं न, अब तू चुपचाप जैसे हम चाहते हैं वैसे शादी करवा ले.’’

‘‘कमाल करती हैं आप भी, अपने मांबाप के रहते मुंहबोली बहनबहनोई से मातापिता वाली रस्में कैसे करवा लूं्?’’ मयंक ने झल्ला कर पूछा.

‘‘अरे बेटा, ये रस्मेंवस्में सेजल की दादी को खुश करने को हैं, हम कहां मानते हैं यह सब,’’ अशोक ने कहा.

‘‘अच्छा? पुजारी बाबा से राखी किसे खुश करने को बंधवाते हैं?’’ मयंक ने व्यंग्य से पूछा और आगे कहा, ‘‘मैं अब बच्चा नहीं रहा पापा, अच्छी तरह समझ रहा हूं कि आप दोनों मुझ से कुछ छिपा रहे हैं. आप को बताने को मजबूर नहीं करूंगा लेकिन एक बात समझ लीजिए, अपनों का हक मैं मुंहबोली बहन को कभी नहीं दूंगा.’’

‘‘अब बात जब अपनों और मुंहबोले रिश्ते पर आ गई है, गीता, तो हमें मयंक को असलियत भी बता देनी चाहिए,’’ अशोक मयंक की ओर मुड़ा, ‘‘मैं भी तुम्हारा अपना नहीं. मुंहबोला पापा, बल्कि मामा हूं. गीता मेरी मुंहबोली बहन है. मैं किसी पुजारी बाबा से नहीं, गीता से राखी बंधवाता हूं. पूरी कहानी सुनना चाहोगे?’’

स्तब्ध खड़े मयंक ने सहमति से सिर हिलाया. ‘‘मैं और गीता पड़ोसी थे. हमारी कोईर् बहन नहीं थी, इसलिए मैं और मेरा छोटा भाई गीता से राखी बंधवाते थे. अलग घरों में रहते हुए भी एक ही परिवार के सदस्य जैसे थे हम. जब मैं चंडीगढ़ में इंजीनियरिंग कर रहा था तो मेरे कहने पर और मेरे भरोसे गीता के घर वालों ने इसे भी चंडीगढ़ पढ़ने के लिए भेज दिया. वहां यह रहती तो गर्र्ल्स होस्टल में थी लेकिन लोकल गार्जियन होने के नाते मैं इसे छुट्टी वाले दिन बाहर ले जाता था.

‘‘मेरा रूममेट नाहर सिंह राजस्थान के किसी रजवाड़े परिवार से था, बहुत ही शालीन और सौम्य, इसलिए मैं ने गीता से उस का परिचय करवा दिया. कब और कैसे दोनों में प्यार हुआ, कब दोनों ने मंदिर में शादी कर के पतिपत्नी का रिश्ता बना लिया, मुझे नहीं मालूम. जब मैं एमबीए के लिए अहमदाबाद आया तो गीता एक सहेली के घर पर रह कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही थी. नाहर चंडीगढ़ में ही मार्केटिंग का कोर्स कर रहा था.

‘‘मुझे होस्टल में जगह नहीं मिली थी और मैं एक दोस्त के घर पर रहता था. अचानक गीता मुझे ढूंढ़ती हुई वहां आ गई. उस ने जो बताया उस का सारांश यह था कि उस ने और नाहर ने मंदिर में शादी कर ली थी और उस के गर्भवती होते ही नाहर उसे यह आश्वासन दे कर घर गया था कि वह इमोशनल ब्लैकमेल कर के अपनी मां को मना लेगा और फिर सबकुछ अशोक को बता कर अपने घर वालों को सूचित कर देना.

‘‘उसे गए कई सप्ताह हो गए थे और ढीले कपड़े पहनने के बावजूद भी बढ़ता पेट दिखने लगा था. दिल्ली में कुछ हफ्तों की कोचिंग लेने के बहाने उस ने घर से पैसे मंगवाए थे और मेरे पास आ गई थी. मैं और गीता नाहर को ढूंढ़ते हुए बीकानेर पहुंचे. नाहर का घर तो मिल गया मगर नाहर नहीं, वह अपने साले के साथ शिकार पर गया हुआ था. घर पर उस की पत्नी थी. सुंदर और सुसंस्कृत, पूछने पर कि नाहर की शादी कब हुई, उस ने बताया कि चंडीगढ़ जाने से पहले ही हो गईर् थी. नाहर के आने का इंतजार किए बगैर हम वापस अहमदाबाद आ गए.

‘‘समय अधिक हो जाने के कारण न तो गीता का गर्भपात हो सकता था और न ही वह घर जा सकती थी. मैं उस से शादी करने और बच्चे को अपना नाम देने को तैयार था. लेकिन न तो यह रिश्ता गीता और मेरे घर वालों को मंजूर होता न ही गीता अपने राखीभाई यानी मुझ को पति मानने को तैयार थी.

‘‘नाहर से गीता का परिचय मैं ने ही करवाया था, सो दोनों के बीच जो हुआ, उस के लिए कुछ हद तक मैं भी जिम्मेदार था. सो, मैं ने निर्णय लिया कि मैं गीता से शादी तो करूंगा, उस के बच्चे को अपना नाम भी दूंगा लेकिन भाईबहन के रिश्ते की गरिमा निबाहते हुए दुनिया के लिए हम पतिपत्नी होंगे, मगर एकदूसरे के लिए भाईबहन. इतने साल निष्ठापूर्वक भाईबहन का रिश्ता निबाहने के बाद गीता नहीं चाहती कि अब वह गठजोड़ा वगैरा करवा कर इस सात्विक रिश्ते को झुठलाए. मैं समझता हूं कि हमें उस की भावनाओं की कद्र करनी चाहिए.’’

‘‘जैसा आप कहें,’’ मयंक ने भर्राए स्वर में कहा, ‘‘आप ने जो किया है, पापा, वह अकाल्पनिक है, जो कोई सामान्य व्यक्ति नहीं महापुरुष ही कर सकता है.’’

कुछ देर बाद वह लौटा और बोला, ‘‘पापा, मैं सेजल की दादी से बता कर आता हूं. हम दोनों अदालत में शादी करेंगे और फिर शानदार रिसैप्शन आप दे सकते हैं. दादी को सेजल ने कैसे बताया, क्या बताया, मुझे नहीं मालूम. पर आप की बात सुन कर वह तुरंत तैयार हो गई.’’

गीता और अशोक ने एकदूसरे को देखा. उन के बेटे ने उन की इज्जत रख ली.

मारे गए गुलफाम : नौकरानी पर आया मालिक का दिल

मुंबई के इंदिरा नगर में बनी वह चाल बड़ी सड़क से समकोण बनाती एक पतली गली के दोनों ओर आबाद थी. इस के दोनों ओर 15-15 खोलियां बनी हुई थीं. इन खोलियों में ज्यादातर वे लोग रहते थे, जो या तो छोटेमोटे धंधे करते थे या किसी के घर में नौकर या नौकरानी का काम करते थे. इस चाल के आसपास गंदगी थी. गली में जगहजगह कूड़ेकचरे के ढेर नजर आते थे. कहींकहीं खोलियों की नालियों का गंदा पानी बहता दिखलाई पड़ता था.

इन खोलियों में रहने वाले लोगों का स्वभाव भी उन की खोलियों की तरह अक्खड़ और गंदा था. वे बातबात पर गालीगलौज करते थे और देखते ही देखते मरनेमारने पर उतारू हो जाते थे.

इन्हीं खोलियों में से एक खोली सुभद्राबाई की भी थी, जो जबान की कड़वी, पर दिल की नेक थी. वह लोगों के घरों में चौकाबरतन का काम करती थी और इसी से अपना गुजारा करती थी.

मुंबई में तो वैसे ही घर में काम करने वाली बाई मुश्किल से मिलती है, ऊपर से सुभद्राबाई जैसी नेक और ईमानदार बाई का मिलना तो किसी चमत्कार जैसा ही था. यही वजह थी कि सुभद्राबाई जिन घरों में काम करती थी, उन के मालिक उस के साथ बहुत अच्छा बरताव करते थे और उस की छोटीमोटी मांग तुरंत मान लेते थे.

सुभद्राबाई जिन घरों में काम करती थी, उन में एक घर प्रताप का भी था. उन का महानगर में रेडीमेड गारमैंट्स का कारोबार था, जो खूब चलता था.

प्रताप की उम्र तकरीबन 55 साल थी और उन की पत्नी नंदिनी भी तकरीबन उन्हीं की उम्र की थीं. घर में पतिपत्नी ही रहते थे, क्योंकि उन के दोनों बेटे दूसरे शहरों में नौकरी करते थे और अपने परिवार के साथ वहीं सैटल हो गए थे. नंदिनी अकसर अपने बेटों के पास जाया करती थीं, जबकि प्रताप को अपने कारोबार के चलते इस का मौका कम ही मिलता था.

जब भी नंदिनी अपने बेटों के पास जातीं, सुभद्राबाई की जिम्मेदारियां बढ़ जातीं. ऐसे में उसे घर का काम करने के अलावा प्रताप के लिए खाना भी बनाना पड़ता. पर सुभद्राबाई खुशीखुशी यह जिम्मेदारी संभालती. प्रताप और नंदिनी भी इस के बदले उसे छोटेमोटे तोहफे और नकद पैसे देते रहते थे.

उस दिन शाम के तकरीबन 7 बजे थे. महानगर की बत्तियां जल उठी थीं, तभी एक टैक्सी इस गली के मुहाने पर आ कर रुकी. टैक्सी का पिछला दरवाजा खुला और उस में से तकरीबन 25 साला एक खूबसूरत लड़की उतरी. शर्ट और जींस में सजी वह दरमियाने कद की एक सुगठित बदन वाली लड़की थी.

टैक्सी की दूसरी ओर का दरवाजा खोल कर तकरीबन 30 साला एक हैंडसम नौजवान निकला. उस नौजवान ने टैक्सी का किराया चुकाया और जब टैक्सी आगे बढ़ गई, तो वे दोनों गली में दाखिल हो गए.

सुभद्राबाई थोड़ी देर पहले अपने काम से लौटी थी और अब खोली में पड़ी चारपाई पर लेट कर अपनी कमर सीधी कर रही थी. बढ़ती उम्र के साथ ज्यादा देर तक काम करने पर उस की कमर अकड़ जाती थी और ऐसे में उस के लिए खड़ा होना भी मुश्किल हो जाता था. अचानक किसी ने उस की खोली का दरवाजा खटखटाया. पहले तो वह चौंकी, फिर उठ कर दरवाजा खोल दिया. पर दरवाजा खोलते ही उस की आंखों में हैरानी के भाव उभरे. दरवाजे पर 2 अनजान लोग खड़े थे.

‘‘किस से मिलना है आप को?’’ सुभद्राबाई उन्हें गहरी नजरों से देखती हुई बोली.

‘‘क्या आप सुभद्राबाई हैं?’’ लड़की ने पूछा.

‘‘हां,’’ सुभद्राबाई बोली.

‘‘फिर तो हमें आप से ही मिलना है.’’

‘‘पर, मैं ने तो आप लोगों को पहचाना नहीं. कौन हैं आप लोग?’’

‘‘मेरा नाम हिमानी है और ये शमशेर. जहां तक आप का हमें पहचानने का सवाल है, तो उस के पहले हम मिले ही नहीं.’’

‘‘फिर आज?’’

‘‘क्या हमें सारी बातें यहीं दरवाजे पर ही बतलानी पड़ेंगी?’’

‘‘आइए, अंदर आ जाइए,’’ सुभद्राबाई झेंपते हुए बोली.

अंदर सुभद्राबाई ने उन्हें चारपाई पर बिठाया, फिर खोली का दरवाजा बंद कर उन के पास खोली के फर्श पर ही बैठ गई.

‘‘आप भी चारपाई पर बैठिए,’’ उसे फर्श पर बैठता देख लड़की बोली.

‘‘नहीं, मैं यहीं ठीक हूं,’’ सुभद्राबाई बोली, ‘‘आप बोलिए, आप को मुझ से क्या काम है?’’

‘‘काम तो है, वह भी बहुत जरूरी,’’ पहली बार लड़के ने मुंह खोला, ‘‘पर, इस के पहले हम आप को यह बता दें कि हमें आप के बारे में सबकुछ मालूम है. आप किनकिन लोगों के पास काम करती हैं और उन से आप को क्या पगार मिलती है?’’

‘‘यह मेरे सवाल का जवाब नहीं है.’’

‘‘हम आप के सवाल का जवाब देंगे, पर इस के पहले आप हमारे एक सवाल का जवाब दीजिए.’’

‘‘कौन से सवाल का?’’

‘‘सुभद्राबाई, आप का शरीर जब तक ठीक है, आप लोगों के घरों में काम कर के अपना गुजारा कर लेती हैं, पर जिस दिन आप का शरीर थक जाएगा, उस दिन आप क्या करेंगी?’’

‘‘मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझी.’’

‘‘मेरा मतलब यह है कि क्या आप अपने काम से इतना पैसा कमा लेती हैं कि अपना बुढ़ापा सही ढंग से बिता सकें?’’

सुभद्राबाई के चेहरे पर परेशानी के भाव उभरे. पिछले कई दिनों से वह भी यही बात सोच रही थी.

‘‘आप चुप क्यों हैं?’’ सुभद्राबाई को खामोश देख लड़का बोला.

‘‘मुझे अपने काम से जो पैसा मिलता है, वह खानेपहनने और खोली का किराया देने में ही खर्च हो जाता है. मैं लाख कोशिश करती हूं कि हर महीने कुछ पैसे बचा लूं, ताकि बुढ़ापे में काम आएं, पर बचा नहीं पाती.’’

‘‘और कभी बचा भी नहीं पाएंगी, क्योंकि मुंबई में हर चीज इतनी महंगी है कि मेहनतमजदूरी करने वाला इनसान कुछ बचा ही नहीं सकता.’’

‘‘तुम बिलकुल ठीक कहते हो बेटा,’’ सुभद्राबाई एक ठंडी आह भर कर बोली, ‘‘पर, किया भी क्या जा सकता है?’’

‘‘हम औरों के लिए तो नहीं, पर आप के लिए इतना जरूर कह सकते हैं कि बहुतकुछ किया जा सकता है.’’

‘‘कौन करेगा मेरे लिए और क्यों?’’

‘‘यहां कोई दूसरे के लिए कुछ नहीं करता, अपना भविष्य संवारने के लिए इनसान को खुद ही कुछ करना पड़ता है. अगर आप अपना बुढ़ापा संवारना चाहती हैं, तो आप को ही इस की कोशिश करनी होगी.’’

‘‘पर क्या…’’

‘‘पहले आप यह बतलाइए कि क्या आप अपने भविष्य के लिए कुछ पैसे जोड़ना चाहती हैं?’’

‘‘भला कौन नहीं चाहेगा?’’

‘‘मैं आप की बात कर रहा हूं.’’

‘‘हां.’’

‘‘हम आप को पूरे 50 हजार रुपए देंगे.’’

‘‘50 हजार…?’’ सुभद्राबाई हैरान हो कर बोली.

‘‘हां, पूरे 50 हजार.’’

‘‘इस के लिए मुझे करना क्या होगा?’’

‘‘कुछ खास नहीं,’’ लड़के के बदले लड़की बोली, ‘‘आप को सिर्फ एक महीने के लिए मुझे प्रताप के घर बतौर नौकरानी रखवाना होगा. वह भी तब, जब वह घर में अकेला हो.’’

‘‘पर, क्यों?’’

‘‘तुम 50 हजार रुपए कमाना चाहती हो?’’

‘‘हां.’’

‘‘तो फिर वह करो, जो हम चाहते हैं.’’

‘‘लेकिन, तुम बतौर नौकरानी वहां एक महीने रह कर करना क्या चाहती हो?’’

‘‘कुछ न कुछ तो करूंगी ही, पर यह बात हम तुम्हें नहीं बताएंगे.’’

सुभद्राबाई खामोश हो गई. उस के चेहरे पर चिंता की रेखाएं खिंच आई थीं. 50 हजार रुपए की बात सुन कर उस के मन में लालच की भावना जाग उठी थी, पर दूसरी ओर वह उन लोगों की तरफ से दुखी भी थी. न जाने वे प्रताप के साथ क्या करना चाहते थे.

‘‘अब तुम क्या सोचने लगीं?’’ सुभद्राबाई को खामोश देख लड़की बोली.

‘‘पर, तुम कहीं से भी काम वाली बाई नहीं लगती हो,’’ सुभद्राबाई लड़की को सिर से पैर तक देखते हुए बोली.

‘‘यह हमारी सिरदर्दी है. तुम यह बताओ कि तुम यह काम कर सकती हो या नहीं?’’

‘‘तुम्हारा इरादा प्रतापजी को कोई नुकसान पहुंचाना तो नहीं?’’

‘‘बिलकुल नहीं.’’

‘‘फिर ठीक है,’’ सुभद्राबाई बोली, ‘‘पर, पैसे?’’

‘‘उस दिन तुम्हें पैसे मिल जाएंगे, जिस दिन तुम मुझे बतौर नौकरानी प्रताप के घर रखवा दोेगी.’’

‘‘अरे सुभद्रा, तुम…’’ सुभद्राबाई ने हिमानी के साथ जैसे ही ड्राइंगरूम में कदम रखा, प्रताप बोला, ‘‘पूरे 4 दिन कहां रहीं? तुम सोच भी नहीं सकतीं कि इन 4 दिनों में मुझे कितनी परेशानी उठानी पड़ी. तुम्हें तो मालूम ही है कि तुम्हारी मालकिन आजकल बेटे के पास गई हैं.’’

‘‘मालूम है मालिक,’’ सुभद्राबाई अपने चेहरे पर दर्द का भाव लाती हुई बोली, ‘‘पीठ दर्द से मेरा उठनाबैठना मुश्किल है. डाक्टर को दिखाया, तो दवाओं के साथसाथ पूरे एक महीने तक बैडरैस्ट करने की सलाह दी है.’’

‘‘एक महीना?’’

‘‘पर, आप फिक्र न करें, आप को इस दरमियान कोई तकलीफ न होगी,’’ सुभद्राबाई हिमानी को आगे करते हुए बोली, ‘‘यह मेरी भतीजी हिमानी है. जब तक मैं नहीं आती, यही आप के घर का सारा काम करेगी.’’

प्रताप ने हिमानी पर एक गहरी नजर डाली. खूबसूरत और जवान हिमानी को देख उस की आंखों में एक अनोखी चमक जागी.

‘‘इसे सबकुछ समझा दिया है न?’’ प्रताप ने पूछा.

‘‘जी मालिक?’’

हिमानी प्रताप के घर काम करने आने लगी थी. उसे यहां पर काम करते हुए 10 दिन बीत गए थे. इस बीच उस ने बड़ी मेहनत और लगन से प्रताप के घर का काम किया था और उस की सुखसुविधा का बेहतर खयाल रखा था. उस के इस बरताव से प्रताप बड़े खुश हुए थे. वे हिमानी के साथ बड़ा ही कोमल और अपनापन भरा बरताव करते थे.

सच तो यह था कि हिमानी की खूबसूरती और जवानी ने उन के अधेड़ बदन में एक नई उमंग जगा दी थी और उन्हें हिमानी का साथ मिलने से एक अजीब खुशी मिलती थी.

उस दिन शाम के तकरीबन 7 बजे थे. प्रताप अपने बैडरूम में पलंग पर बैठे थे. हिमानी घुटने के बल झुकी उस के कमरे की सफाई कर रही थी. ऐसे में उस के भारी और गोरे उभारों का ज्यादातर भाग उस के ब्लाउज से बाहर झांक रहा था. प्रताप की निगाहें रहरह कर उस के इन कयामती उभारों की ओर उठ जाया करती थीं और जब भी ऐसा होता, उन के तनबदन में एक हलचल सी मच जाती थी.

हिमानी कहने को तो काम कर रही थी, पर उस का पूरा ध्यान प्रताप की हरकतों पर था. उस की नजरों का भाव समझ कर वह मन ही मन खुश हो रही थी. उसे लग रहा था कि वह जल्द ही प्रताप को अपने शीशे में उतार लेगी और ऐसा होते ही अपना उल्लू सीधा कर यहां से रफूचक्कर हो जाएगी.

हिमानी सफाई का काम कर खड़ी हुई और ऐसा होते ही प्रताप की नजरों से वह नजारा गायब हो गया. इस के बावजूद उन के बदन में जो कामनाओं की आग भड़की थी, उस ने उन्हें हिला दिया था.

प्रताप पलंग से उतरे, फिर आगे बढ़ कर हिमानी को अपनी बांहों में भर लिया. उन की इस हरकत से हिमानी चौंकी, फिर बांहों में कसमसाते हुए बोली, ‘‘यह क्या कर रहे हैं साहब?’’

‘‘हिमानी, तुम बहुत ही खूबसूरत हो,’’ प्रताप जोश से कांपती आवाज में बोले, ‘‘तुम्हारी इस खूबसूरती ने मेरे तनबदन में आग लगा दी है. तुम से लिपट कर मैं अपने तन की इसी आग को बुझाने की कोशिश कर रहा हूं.’’

‘‘पर, यह गलत है.’’

‘‘कुछ गलत नहीं,’’ प्रताप उसे बुरी तरह चूमते, सहलाते हुए बोले.

मन ही मन मुसकराती हिमानी कुछ देर तक उन की बांहों से छूटने का नाटक करती रही, फिर अपना शरीर ढीला छोड़ दिया. ऐसा होते ही प्रताप ने उसे उठा कर पलंग पर डाला, फिर उस पर सवार हो गए.

भावनाओं का तूफान जब गुजर गया, तो हिमानी रोते हुए बोली, ‘‘यह आप ने क्या किया? मुझे तो बरबाद कर दिया?’’

पलभर तक तो प्रताप के मुंह से बोल न फूटे, फिर वे शर्मिंदा हो कर बोले, ‘‘हिमानी, मुझ से गलती हो गई. मैं अपने आपे में नहीं था. जो कुछ हुआ, उस का मुझे अफसोस है. प्लीज, यह बात सुभद्राबाई को न बतलाना.’’

‘‘आप ने मेरा सबकुछ लूट लिया और अब कह रहे हैं कि बूआ से यह बात न कहूं.’’

‘‘मैं तुम्हें इस की कीमत देने को तैयार हूं.’’

‘‘कीमत…?’’ हिमानी ने गुस्से वाली निगाहों से प्रताप को देखा.

बदले में प्रताप ने तकिए के नीचे से चाबियों का गुच्छा निकाला, फिर कमरे में रखी अलमारी की ओर बढ़ गए. ऐसा होते ही हिमानी के होंठों पर शातिराना मुसकान रेंग उठी. पर जैसे ही उन्होंने सेफ खोली, उस की निगाहें उस पर जम गईं. अलमारी बड़े नोटों और गहनों से भरी थी.

प्रताप हिमानी के करीब आए और तकरीबन जबरदस्ती नोट की गड्डी उस के हाथ पर रखते हुए बोले, ‘‘प्लीज, सुभद्राबाई को कुछ न बतलाना.’’

हिमानी उन्हें पलभर घूरती रही, फिर अपने कपड़े ठीक करने के बाद नोटों की गड्डी ब्लाउज में रखते हुए कमरे से निकल गई.

उस रात प्रताप पूरी रात ढंग से सो न सके. उन्हें यह बात परेशान करती रही कि कहीं हिमानी उन की करतूत सुभद्राबाई को न बतला दे. अगर ऐसा हो गया, तो वे किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहने वाले थे.

पर दूसरे दिन उन्हें तब हैरानी और खुशी का झटका लगा, जब हिमानी हमेशा की तरह काम पर लौट आई. वह बिलकुल सामान्य थी और उसे देख कर ऐसा हरगिज नहीं लगता था कि उस के साथ कुछ ऐसावैसा घटा है. जब 5 दिन तक सबकुछ ठीक रहा, तो छठे दिन रात को प्रताप ने हिमानी को हिम्मत कर के एक बार फिर अपनी बांहों में समेट लिया.

‘‘यह क्या कर रहे हैं आप?’’ हिमानी चौंकने का नाटक करती हुई बोली, ‘‘आप ने वादा किया था कि आप दोबारा ऐसी गलती नहीं करेंगे.’’

‘‘मैं क्या करूं हिमानी…’’ प्रताप कांपती आवाज में बोले, ‘‘तुम्हारे हुस्न और जवानी ने मुझे ऐसा पागल किया है कि मैं अपनेआप पर काबू नहीं रख पा रहा हूं. प्लीज, मुझे रोको मत… मुझे मेरी प्यास बुझा लेने दो.’’

हिमानी ने अपना शरीर ढीला छोड़ दिया. अगले ही पल दोनों  बदन एकदूसरे से चिपक कर पलंग पर अठखेलियां कर रहे थे. इस बार हिमानी भी पूरे जोश के साथ प्रताप का साथ दे रही थी.

हिमानी ने चालाकी से प्रताप को अपने हुस्नजाल में फांस लिया था. जब उसे यकीन हो गया कि शिकार पूरी तरह उस के जाल में फंस गया है, तो एक रात उस ने उस के खाने में बेहोशी की दवा मिलाई और उस की पूरी अलमारी खाली कर रफूचक्कर हो गई. प्रताप को जब सवेरे होश आया और उस ने अपनी अलमारी देखी, तो सिर पीट लिया. लोकलाज के डर से वे पुलिस में भी इस की शिकायत न कर सके.

जन्म समय: एक डौक्टर ने कैसे दूर की शंका

रिसैप्शन रूम से बड़ी तेज आवाजें आ रही थीं. लगा कि कोई झगड़ा कर रहा है. यह जिला सरकारी जच्चाबच्चा अस्पताल का रिसैप्शन रूम था. यहां आमतौर पर तेज आवाजें आती रहती थीं. अस्पताल में भरती होने वाली औरतों के हिसाब से स्टाफ कम होने से कई बार जच्चा व उस के संबंधियों को संतोषजनक जवाब नहीं मिल पाता था.

अस्पताल बड़ा होने के चलते जच्चा के रिश्तेदारों को ज्यादा भागादौड़ी करनी पड़ती थी. इसी झल्लाहट को वे गुस्से के रूप में स्टाफ व डाक्टर पर निकालते थे.

मुझे एक तरह से इस सब की आदत सी हो गई थी, पर आज गुस्सा कुछ ज्यादा ही था. मैं एक औरत की जचगी कराते हुए काफी समय से सुन रहा था और समय के साथसाथ आवाजें भी बढ़ती ही जा रही थीं. मेरा काम पूरा हो गया था. थोड़ा मुश्किल केस था. केस पेपर पर लिखने के लिए मैं अपने डाक्टर रूम में गया.

मैं ने वार्ड बौय से पूछा, ‘‘क्या बात है, इतनी तेज आवाजें क्यों आ रही हैं?’’

‘‘साहब, एक शख्स 24-25 साल पुरानी जानकारी हासिल करना चाहते हैं. बस, उसी बात पर कहासुनी हो रही है.’’ वार्ड बौय ने ऐसे बताया, जैसे कोई बड़ी बात नहीं हो.

‘‘अच्छा, उन्हें मेरे पास भेजो,’’ मैं ने कुछ सोचते हुए कहा.

‘‘जी साहब,’’ कहता हुआ वह रिसैप्शन रूम की ओर बढ़ गया.

कुछ देर बाद वह वार्ड बौय मेरे चैंबर में आया. उस के साथ तकरीबन 25 साल की उम्र का नौजवान था. वह शख्स थोड़ा पढ़ालिखा लग रहा था. शक्ल भी ठीकठाक थी. पैंटशर्ट में था. वह काफी परेशान व उलझन में दिख रहा था. शायद इसी बात का गुस्सा उस के चेहरे पर था.

‘‘बैठो, क्या बात है?’’ मैं ने केस पेपर पर लिखते हुए उसे सामने की कुरसी पर बैठने का इशारा किया.

‘‘डाक्टर साहब, मैं कितने दिनों से अस्पताल के धक्के खा रहा हूं. जिस टेबल पर जाऊं, वह यही बोलता है कि यह मेरा काम नहीं है. उस जगह पर जाओ. एक जानकारी पाने के लिए मैं 5 दिन से धक्के खा रहा हूं,’’ उस शख्स ने अपनी परेशानी बताई.

‘‘कैसी जानकारी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘जन्म के समय की जानकारी,’’ उस ने ऐसे बोला, जैसे कि कोई बड़ा राज खोला.

‘‘किस के जन्म की?’’ आमतौर पर लोग अपने छोटे बच्चे के जन्म की जानकारी लेने आते हैं, स्कूल में दाखिले के लिए.

‘‘मेरे खुद के जन्म की.’’

‘‘आप के जन्म की? यह जानकारी तो तकरीबन 24-25 साल पुरानी होगी. वह इस अस्पताल में कहां मिलेगी. यह नई बिल्डिंग तकरीबन 15 साल पुरानी है. तुम्हें हमारे पुराने अस्पताल के रिकौर्ड में जाना चाहिए.

‘‘इतना पुराना रिकौर्ड तो पुराने अस्पताल के ही रिकौर्ड रूम में होगा, सरकार के नियम के मुताबिक, जन्म समय का रिकौर्ड जिंदगीभर तक रखना पड़ता है.

‘‘डाक्टर साहब, आप भी एक और धक्का खिला रहे हो,’’ उस ने मुझ से शिकायती लहजे में कहा.

‘‘नहीं भाई, ऐसी बात नहीं है. यह अस्पताल यहां 15 साल से है. पुराना अस्पताल ज्यादा काम के चलते छोटा पड़ रहा था, इसलिए तकरीबन 15 साल पहले सरकार ने बड़ी बिल्डिंग बनाई.

‘‘भाई यह अस्पताल यहां शिफ्ट हुआ था, तब मेरी नौकरी का एक साल ही हुआ था. सरकार ने पुराना छोटा अस्पताल, जो सौ साल पहले अंगरेजों के समय बना था, पुराना रिकौर्ड वहीं रखने का फैसला किया था,’’ मैं ने उसे समझाया.

‘‘साहब, मैं वहां भी गया था, पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला. बोले, ‘प्रमाणपत्र में सिर्फ तारीख ही दे सकते हैं, समय नहीं,’’’ उस शख्स ने कहा.

आमतौर पर जन्म प्रमाणपत्र में तारीख व जन्मस्थान का ही जिक्र होता है, समय नहीं बताते हैं. पर हां, जच्चा के इंडोर केस पेपर में तारीख भी लिखी होती है और जन्म समय भी, जो घंटे व मिनट तक होता है यानी किसी का समय कितने घंटे व मिनट तक होता है, यानी किसी का समय कितने घंटे व मिनट पर हुआ.

तभी मेरे दिमाग में एक सवाल कौंधा कि जन्म प्रमाणपत्र में तो सिर्फ तारीख व साल मांगते हैं, इस को समय की जरूरत क्यों पड़ी?

‘‘भाई, तुम्हें अपने जन्म के समय की जरूरत क्यों पड़ी?’’ मैं ने उस से हैरान हो कर पूछा.

‘‘डाक्टर साहब, मैं 26 साल का हो गया हूं. मैं दुकान में से अच्छाखासा कमा लेता हूं. मैं ने कालेज तक पढ़ाई भी पूरी की है. मुझ में कोई ऐब भी नहीं है. फिर भी मेरी शादी कहीं तय नहीं हो पा रही है. मेरे सारे दोस्तों व हमउम्र रिश्तेदारों की भी शादी हो गई है.

‘‘थकहार कर घर वालों ने ज्योतिषी से शादी न होने की वजह पूछी. तो उस ने कहा, ‘तुम्हारी जन्मकुंडली देखनी पड़ेगी, तभी वजह पता चल सकेगी और कुंडली बनाने के लिए साल, तारीख व जन्म के समय की जरूरत पड़ेगी.’

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‘‘मेरी मां को जन्म की तारीख तो याद है, पर सही समय का पता नहीं. उन्हें सिर्फ इतना पता है कि मेरा जन्म आधी रात को इसी सरकारी अस्पताल में हुआ था.

‘‘बस साहब, उसी जन्म के समय के लिए धक्के खा रहा हूं, ताकि मेरा बाकी जन्म सुधर जाए. शायद जन्म का सही समय अस्पताल के रिकौर्ड से मिल जाए.’’

‘‘मेरे साथ आओ,’’ अचानक मैं ने उठते हुए कहा. वह उम्मीद के साथ उठ खड़ा हुआ.

‘‘यह कागज व पैन अपने साथ रखो,’’ मैं ने क्लिप बोर्ड से एक पन्ना निकाल कर कहा.

‘‘वह किसलिए?’’ अब उस के चौंकने की बारी थी.

‘‘समय लिखने के लिए,’’ मैं ने उसे छोटा सा जवाब दिया.

‘‘मेरी दीवार घड़ी में जितना समय हुआ है, वह लिखो,’’ मैं ने दीवार घड़ी की ओर इशारा करते हुए कहा.

उस ने हैरानी से लिखा. सामने ही डिलीवरी रूम था. उस समय डिलीवरी रूम खाली था. कोई जच्चा नहीं थी. डिलीवरी रूम में कभी भी मर्द को दाखिल होने की इजाजत नहीं होती है. मैं उसे वहां ले गया. वह भी हिचक के साथ अंदर घुसा.

मैं ने उस कमरे की घड़ी की ओर इशारा करते हुए उस का समय नोट करने को कहा, ‘‘अब तुम मेरी कलाई घड़ी और अपनी कलाई घड़ी का समय इस कागज में नोट करो.’’

उस ने मेरे कहे मुताबिक सारे समय नोट किए.

‘‘अच्छा, बताओ सारे समय?’’ मैं ने वापस चैंबर में आ कर कहा.

‘‘आप की घड़ी का समय दोपहर 2.05, मेरी घड़ी का समय दोपहर 2.09, डिलीवरी रूम का समय दोपहर 2.08 और आप के चैंबर का समय दोपहर 2.01 बजे,’’ जैसेजैसे वह बोलता गया, खुद उस के शब्दों में हैरानी बढ़ती जा रही थी.

‘‘सभी घडि़यों में अलगअलग समय है,’’ उस ने इस तरह से कहा कि जैसे दुनिया में उस ने नई खोज की हो.

‘‘देखा तुम ने अपनी आंखों से, सब का समय अलगअलग है. हो सकता है कि तुम्हारे ज्योतिषी की घड़ी का समय भी अलग हो. और जिस ने पंचांग बनाया हो, उस की घड़ी में उस समय क्या बजा होगा, किस को मालूम?

‘‘जब सभी घडि़यों में एक ही समय में इतना फर्क हो, तो जन्म का सही समय क्या होगा, किस को मालूम?

‘‘जिस केस पेपर को तुम ढूंढ़ रहे हो, जिस में डाक्टर या नर्स ने तुम्हारा जन्म समय लिखा होगा, वह समय सही होगा कि गलत, किस को पता?

‘‘मैं ने सुना है कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार एक पल का फर्क भी ग्रह व नक्षत्रों की जगह में हजारों किलोमीटर में हेरफेर कर देता है. तुम्हारे जन्म समय में तो मिनटों का फर्क हो सकता है.

‘‘सुनो भाई, तुम्हारी शादी न होने की वजह यह लाखों किलोमीटर दूर के बेचारे ग्रहनक्षत्र नहीं हैं. हो सकता है कि तुम्हारी शादी न होने की वजह कुछ और ही हो. शादियां सिर्फ कोशिशों से होती हैं, न कि ग्रहनक्षत्रों से,’’ मैं ने उसे समझाते हुए कहा.

‘‘डाक्टर साहब, आप ने घडि़यों के समय का फर्क बता कर मेरी आंखें खोल दीं. इतना पढ़नेलिखने के बावजूद भी मैं सिर्फ निराशा के चलते इन अंधविश्वासों के फेर में फंस गया. मैं फिर से कोशिश करूंगा कि मेरी शादी जल्दी से हो जाए.’’ अब उस शख्स के चेहरे पर निराशा की नहीं, बल्कि आत्मविश्वास की चमक थी.

फैसला: किस बात से मनु की नींद उड़ गई

मनु और मीनू की जिंदगी मस्ती में कट रही थी. मीनू उस का छोटे से छोटा खयाल रखती थी. एक बार मनु को दिल का दौरा पड़ा. उसे अस्पताल में भरती होना पड़ा. वहां एक नौजवान भी मीनू के साथ आता था. ठीक होने के बाद मनु ने उस नौजवान को शराब पिलाई. लड़के ने बहुतकुछ बक दिया. यह सुन कर मनु की नींद उड़ गई. ऐसा क्या कहा था उस नौजवान ने?

मनु को जब भी दफ्तर जाने की देरी होती तो वह कुछ हबड़तबड़ सी करने लगता था. उस की यह बेचैनी पलपल नजर आती तो मीनू चट इस को भांप जाती और जल्दी से काम करने लगती.

मीनू कब उस को थाली परोस कर लगा देती, मनु जैसे भौंचक सा ही रह जाता था.

कितनी दूर मनु का दफ्तर था, यह मीनू अच्छी तरह जानती थी. रोज 2 घंटे गाड़ी चला कर दूर गांव पहुंचना होता था. वापस आने मेें भी इतना ही समय लगता.

मीनू हमेशा ही कुछ रख दिया करती थी. कभी नमकीन, कभी मठरी ताकि दोपहर में कुछ सहारा तो रहे, जिस का मनु को दफ्तर पहुंच कर ही पता चलता.

मनु यह सब दोपहर को कौफी संग चाव से खाता. मीनू और वह इसी तरह एक सुरताल मे बंध कर गृहस्थी को जिए जा रहे थे.

मनु अकसर याद करता रहता कि कैसे थे, वे दिन जब उस को खुद खाना बनाना होता था. कमरा गंदा ही रहता. सबकुछ बिखराबिखरा सा. आज सब कितना संवरा और निखरा सा हो चला है. कोई चिंता ही नहीं रहती कि लंच में क्या पकाना है, डिनर में क्या खाना है. हर पोशाक कितनी व्यवस्थित रहती है. घर बिलकुल चमचमाता हुआ.

मनु सुबह 8 बजे घर से रवाना हो जाता और रात 9 बजे तक ही वापस आ पाता था. उस के इस दैनिक क्रम में घर पर बस सोना और खाना यही मुख्य काम होते थे. मीनू बाकी सब बहुत सहजता से संभाल लिया करती थी.

मनु को राशन, सब्जी, फलफूल, वारत्योहार किसी बात की फिक्र होती ही नहीं थी. मीनू कभी जताती तक नहीं थी कि दिनभर में वह सबकुछ कैसे संतुलित कर लेती है.

जिंदगी बहुत ही सुकून से आगे बढ़ रही थी. पिछले 2 साल से मनु जैसे शाही मौज उठा रहा था. शादी के कितने फायदे हैं, यह उस को पहले अंदाज हो जाता तो और जल्दी शादी कर चुका होता.

वे दोनों फेसबुक दोस्त थे. बस 2 महीने की दोस्ती मे ही कुछ ऐसा जादुई सा घट गया कि दोनों ने शादी करने का  फैसला कर लिया. एक दिलचस्प बात यह हुई कि मीनू और मनु दोनों ही खुद अपनेअपने अभिभावक थे. उन्हें ही अपना फैसला करना था और अपना जीवनसाथी चुनना था.

मनु को मीनू के विचार अच्छे लगे थे कि आगे मीनू बस एक गृहिणी बन कर जीना चाहती थी. उस का यही सपना था, घर पर रहना और घर की देखभाल करना.

मीनू ने मातापिता, परिवार ऐसा कुछ कभी देखा ही नहीं था. जाने कौन से  किसी बच्चों वाले आश्रम से शुरू हुआ उस का बचपन और किशोर जीवन, फिर  जवानी एक नारीशाला जैसे छात्रावास में बीत रहा था. ये युवतियां दोपहर तक सरकारी कालेज में पढ़ती थीं, शाम को मोमबत्ती बनाती थीं और यहीं रहती थीं.

अब मीनू गृहस्थी का मजा लेना चाहती थी. खूब पढ़ीलिखी तो थी, इसीलिए समझदार भी बहुत थी. मनु का जीवन भी तबाही की दास्तान ही था. उस ने सहमति दे दी. दोनों ने शादी कर ली. मनु यही सब याद कर रहा था.

मनु तो अब अपनी पूरी  तनख्वाह ही मीनू के हाथ पर रख देता है. बचत करना तो उस ने कभी सीखा ही नहीं. वैसे भी अभी उम्र ही क्या थी, जो रुपयापैसा जोड़ने की चिंता में गल जाते.

मनु अब बस आराम से पूरे मौज से अपनी नौकरी कर रहा था, पूरा मन लगा कर. वैसे भी उस को अपना काम डूब कर करने की आदत भी थी.

आज भी जैसे ही मनु दफ्तर पहुंचा, तो वह कुछ घबराहट सी महसूस कर रहा था. उसे अंदर जैसे कुछ चुभ रहा था. दर्द लगातार बढ़ रहा था. अब मनु ने एक ड्राइवर का इंतजाम किया और अस्पताल आया. मीनू को पहले ही खबर मिल गई थी. इसलिए उस ने अस्पताल में बात कर के सब तैयारी कर ली थी.

मनु को दिल का दौरा पड़ा था. सब पहले ही सतर्क थे. तुरंत उपकरण लगा दिया गया. धड़कन सामान्य हो गई. मनु की जान बच गई, मगर तबीयत अभी तक इतनी दुरुस्त नहीं थी. डाक्टर की सलाह से अब आराम की जरूरत थी. एक हफ्ते तक उस को अस्पताल में ही रहना था.

मनु देख रहा था कि कितनी मजबूती से मीनू ने यह सब संभाल लिया था. मीनू के  माथे पर एक शिकन तक नहीं देखी थी उस ने. हां, मगर वह किसी नौजवान के  साथ बाइक पर आजा रही थी.

मीनू ने कार चलाना सीखा ही नहीं. मनु ने बहुत जोर दिया, मगर वह हमेशा टालती रही.

मनु ने इस नौजवान को पहले कभी देखा नहीं था. तकरीबन 20-22 साल का  होगा.  मीनू को वही लाता था. मीनू खाना बना कर लाती तो वह साथ ही आता था.

मीनू बहुत प्यार से कहती तो वह फलों का जूस ले आता था. कौफी बनवा लाता. सब काम करता. कितनी बार तो उस ने मनु के पैर तक दबा दिए. सिर पर हलकी मालिश कर दी.

मनु बिलकुल ठीक हो कर घर आ गया. मनु ने कुछ दिन घर से ही काम करना उचित समझा. अब घर पर सुबह से शाम 2 मर्द रहा करते थे. एक तो राज और एक मनु. एक बीमार और एक बिलकुल फिट. मीनू पूरी फुरती से सारा काम संभालती और राज हर समय मनु की सेवा में रहता था.

मनु जब दफ्तर जाने लगा था. एक रविवार को वह अपने साथ राज को घुमाने ले गया. मीनू साथ नहीं गई थी. एक अच्छे से होटल में मनु ने राज को पहले बढि़या शराब पिलाई और इतनी ज्यादा पिला दी कि वह बहक गया.

किसी ने कहा है कि नशे मे आदमी हो या औरत हमेशा सच बोलते हैं. मनु उस से पूछता रहा और वह बताता रहा.

पिछले साल जब मंडी में आम आया ही था, तब राज को मीनू वही आम खरीदती मिली थी. दोनों में पहली मुलाकात में आमलीची की बातें इतनी गहराई से हुईं कि बारबार मिलने लगे.

2 हफ्ते बाद तक तो दोनों तन और मन से एकदूसरे के हो चुके थे.

मीनू उस का खूब खर्च उठाती थी. उस को शारीरिक, मानसिक सब तरह का सहारा देती थी. राज यहां पढ़ाई कर रहा था. किराए का कमरा ले कर वह रहता था. बहुत ही रूखासूखा सा जीवन था उस का, मगर मीनू से मुलाकात के बाद वह एक अनोखा रस भरा जीवन जी रहा था. रुपएपैसे हर समय उस के पास खूब रहते थे.

इसी तरह बोलतेबोलते राज नशे में धुत्त तो था ही, वहीं पर लुढ़क गया. मनु ने उस को सहारा दिया, बिठाया और सामान्य किया. दोनों ने जराजरा सा ही खाया और वापस लौट आए.

2 दिन तक मनु ने अपनेआप को शांत रखा. तीसरे दिन सामान पैक कर के कहीं जाने लगा. मीनू ने पूछा तो कह दिया कि अभी सूचना मिली है, जरूरी ट्रेनिंग पर जाना है.

मीनू ने कोई सवाल नहीं किया. उस को मनु पर पूरा भरोसा था और मनु भी ज्यादा कुछ न कह कर सीधा चला गया. वह गाड़ी चलाता रहा और उसी कसबे में जा कर रुका, जहां मीनू का मायका था. जहां वह छात्रावास में पलीबढ़ी थी और पढ़ाई भी कर रही थी.

बस, सिर्फ एक ही दिन की खोजखबर से मनु को पता लग गया कि मीनू के यहां भी एक दर्जन आशिक हुआ करते थे. यानी मीनू का स्वभाव तो पहले से ही आशिकाना है, मनु ने अंदाजा लगा लिया. फिर भी मन के किसी कोने में उस को जरा सा दुख तो हुआ कि उस ने शादी से पहले ही मीनू की सहीसही खोजखबर क्यों नहीं की? खैर, उस ने बहुत सोचसमझ कर अब दिल की गवाही से एक फैसला किया.

इतना सब जानने के बाद वह राज की बातें भी याद करता रहा. मन कुछ कड़वा सा हो गया था उस का जैसे नीम की पत्तियां चबा ली हों.

मनु वहां से अपने घर यानी मीनू के पास वापस नहीं लौटा. जिस तरह के तनाव से वह गुजर रहा था, उस में दोबारा दिल का दौरा पड़ सकता था. यों भी वह अब उस शहर में वापस जाना ही नहीं चाहता था.

मनु ने उसी समय तय किया कि अब वह पूरी जिंदगी किसी गांव में खेती करेगा, या फिर एकएक सांस समाजसेवा को समर्पित कर देगा. पैसा कमाना अब उस का मकसद नहीं था. पहले भी उस को खानेपहनने और ओढ़ने की कोई चिंता थी ही नहीं. बहुत कम पैसों में बड़ी खुशी से गुजारा करना तो उस की आदत थी.

मनु विचार कर ही रहा था कि एक दोस्त का संदेश आया कि पूना के पास ही एक गांव है, वहां एक सूखे जंगल को हराभरा करना है. यह 4 साल का प्रोजैक्ट है. मगर हरियाली में ही चौबीसों घंटे रहना होगा. बहुत सुविधाएं मिलेंगी. और भी बहुत सारी जानकारी उस ने मनु को भेज दी. आगे एक संदेश और भेजा कि अगर सहमति देते हो तो आगे बात करूं.

अंधा क्या चाहे दो आंखें. मनु ने कहा कि वह 1-2 दिन में ही वहां पहुंच रहा है और तुरंत काम पर लग जाना चाहता है.

मनु को जीवन जीने का एक मकसद  मिल गया था. उस ने मीनू को फोन पर ही अलविदा का एक डिजिटल लैटर लिखा, जिस में बेहद जरूरी और खास बात यही थी कि वह अब फिर से बिलकुल आजाद थी, अपनी मरजी से जो चाहे कर सकती थी.

राज ने पूरा किस्सा बयां कर दिया होगा, इसलिए मनु ने सोचा कि मीनू का कोई जवाब नहीं आएगा. मगर जवाब भी आ गया. मीनू ने लिखा था कि अपना पूरा खयाल रखना. जहां रहो खुश रहो.

शौकीन: आखिर प्रभा अपनी बहन से क्या छिपा रही थी?

मीनू ने लंबी सांस ली और खिड़की से बाहर झांका तो पता लगा कि अब अच्छीखासी सुबह हो गई थी. ड्राइवर को कहीं चाय के लिए रुकने की कह कर वह पवन के ताजा झोंकों का मजा लेने लगी.

अलसुबह 4 बजे मीनू पूना से चली थी. मुंबई आने को ही था. यह जगह कोई गांव जैसी लग रही थी.

खैर, मीनू को तो चाय की तलब लग रही थी. एक छोटा सा बाजार आ गया और वहां लाइन से चाय के ठेले लगे थे.

मीनू की आवाज पर ड्राइवर ने पहियों को रोक दिया. एक महिला चाय का और्डर लेने उस की कार के पास आई.

उस महिला की सूरत देख कर मीनू तो जैसे आसमान से गिरी. उस ने चाय मंगवा ली और ड्राइवर को दूर नजर आ रहे मंदिर में रुपए चढ़ाने भेज दिया. वह फटाफट चला भी गया. दरअसल, उसे भी बीड़ी की तलब लग रही थी.

मीनू को पक्का यकीन था कि ये महिला वो ही है और दो पल की बातचीत में यह साबित भी हो गया.

…तो वे उस की सगी भाभी प्रभा थी, और पिछले 5 सालों से गुमशुदा भी.

“ओह… तो आज यहां मिली,” मीनू ने कुशलमंगल पूछी और प्रभा ने उस को खुल कर बता दिया कि यह सबकुछ कैसे हुआ.

प्रभा आपबीती बताने लगी कि ससुराल में खेतों का मैनेजर ही उस का आशिक था और आशिकी के आखिरी चरण में संपत्ति के लोभ के वशीभूत हो कर उसी ने उस का यह हाल कर दिया था.

मीनू को उस ने विस्तार से बताया कि लड़कपन से ही वह बहुत आजाद किस्म की थी, शायद 3 भाइयों में अकेली होने के कारण.

विवाह हुआ तो ससुराल में सारी आबोहवा और माजरा बहुत जल्द समझ आ गया. बड़ेबड़े खेत थे. बागबगीचे थे. खूब दौलत थी और पति अकेले थे.

“तुम एक बहन थीं, मगर तुम भी मस्तमौला टाइप ही थीं,” प्रभा बोली.

“तो, यहां मेरी एक तरह से लौटरी ही खुल गई. मगर अपनी हवस में अंधी मैं यह नहीं समझ सकी कि यह क्या कर रही हूं.

“यह दौलत कोई मैं ने तो नहीं कमाई है. इस की रखवाली तक तो ठीक है, पर सब की आंखों मे धूल झोंक कर इतनी रंगीनियां, सब को खुलेआम धोखा.

“मैं यह सब कैसे कर सकती हूं. मगर, जवाब भी मैं अपने हिसाब से बना लिया करती. बचपन से कोई अंकुश रहा ही नहीं. सारे सहीगलत तो मैं ने अपने तरीके और अपनी  सहूलियत से जो बना कर रखे थे.

“जैसी मेरी फितरत हो रही थी, मैं ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आगे इतने बुरे दिन देखने थे, मगर यह जाजम तो मैं ने खुद ही अपने लिए बिछा रखी थी.

“हां तो मीनू तुम सब से कमजोर थीं, मैं तुम को फुसलाने  लगी, उल्लू बनाने लगी.

“मैं कभी नहीं कहती थी कि तुम से बात किए बिना मेरा काम नहीं चल पाता. मगर सिर्फ तुम्हारे ही लक्षण, सोचविचार, चालचलन थे ही ऐसे कि मेरा काम आसान हो गया.

“मैं तो आशिकमिजाज थी, लेकिन तुम्हारे ये अंदाज मेरे बाकी के अवगुण को भी बहुत आसानी से छिपाते चले गए.

“तुम्हारे पति को तो अपने हर मिनट को डॉलर में बदलने का जुनून सवार था और तुम्हारे होने ना होने से उस को कभी कोई फर्क नहीं पड़ा.

“वैसे भी वो अच्छी तरह समझ गया था कि तुम्हारे पर्स में नोट भरे हों और वार्डरोब में फैशनेबल कपड़े हों तो तुम को यह भी याद नहीं रहता कि तुम्हारा कोई पति भी है.

“वो इस बात का  फायदा उठा कर तुम को आजादी देने के नाम पर नजरअंदाज करता रहा.

“मीनू, वो खुद एक नंबर का ऐयाश है. 2-3 बार उस ने मुझ से लिपटने की कोशिश की, मगर उस के बदन का पसीना…

“उहूं… मुझे उलटी सी आती थी. पर, तुम तो बेफिक्र सी  अपने रंग मे रहीं.

“तुम आएदिन पीहर आ कर पड़ी रहतीं और तुम्हारे मातापिता यानी मेरे सासससुर तुम्हारी संगत में मिठास से सराबोर रहते. वो बस खातेपीते, आराम करते और तुम से ही बातें करते रहते.

“उन को, तुम्हारे पति को और तुम्हारे भाई तक को अपने जुआताश आदि के नशेपत्ते में, यह कभी पता तक नहीं रहता था कि मैं क्या कर रही हूं. खेत में जाने के बहाने वहां कौनकौन से गुल खिला रही हूं.

“मैं बस दिखावे के लिए तुम से लाड़ करती और सासससुर ही नहीं, मेरे पति भी भावुक हो कर बहुत खुश हो जाते कि कितनी व्यावहारिक हूं मैं. ननद के साथ इतनी सरल, सहज.”

“फिर, उन को कभी बुरा नहीं लगता था कि मैं अपनीअपनी चला रही हूं. उन की मरजी कहीं है ही नहीं. खाना रोज बाहर से आ रहा है. कितनी चीजें बरबाद भी हो रही हैं.

“और मैं… मैं तो अपनी रवानी  में उस के साथ कभी यहां तो कभी वहां, बस आवारागर्दी करती फिरती. तुम और वो सब यही सोचते कि मैं कितनी जिम्मेदार हूं, बागबगीचे, अनाज, मवेशी देख रही हूं. इस घर के लिए तन, मन, धन से जुटी हुई हूं.

“तुम तो भई हद दर्जे की  निकम्मी थीं अपने भाई की तरह, लेकिन मेरा काम तो आसान कर रही थीं. हौलेहौले मैं ने तुम्हें उपन्यास में डूबे रहने  और हर दूसरे दिन टाकीज जा कर फिल्म देखने का ऐसा आदी बना दिया कि तुम उस लत से बाहर आ ही नहीं सकीं. आती भी कैसे, मैं जो तुम्हारी हर बुरी आदत को खादपानी दे रही थी. और मुझे मुश्किल हुई भी नहीं, तुम्हारा जब तक मन होता, पसर कर सोती ही रहती थीं.

“तुम भी अजीब जीव थीं. जब जो मन होता वो करतीं. रात को बाहर बैठ कर नूडल्स खातीं. सुबह से दोपहर तक खर्राटे भर पलंग तोड़तीं.

“समयकुसमय भी नहीं देखती थीं, मैं ने तो बस तुम को हवा दी. मैं तुम को हमेशा राजकुमारी कहती रहती थी, जबकि सच यह था कि तुम इनसान कहलाने लायक भी नहीं थीं.

“तुम्हारे दिलोदिमाग में बस आरामतलबी के कीटाणु भरे पड़े थे. बस, खाना और सोना, बाकी समय ख्यालीपुलावों में मगन रहना. अपने सुकून में मस्तमगन रहना.

“मैं तुम्हारे भाई और तुम को इतना आराम दे रही थी कि तुम इस की आदी बनती चली गई. मातापिता तो खैर पैंसठ-सत्तर को छू रहे थे, उन का सुस्ताना लाजिमी था.

“मेरा हर अवैध काम तुम्हारे आलस के परदे में तसल्ली से परवान चढ़ रहा था कि एक दिन वो धोखेबाज मुझे अपनी चाल मे फंसाने आया. मैं उस के जाल में ऐसी अटकी कि वो मुझे उल्लू बना कर चला गया.

“मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था कि 3 साल छोटा मेरा दीवाना मुझ से ही खेल खेल जाएगा. और मैं बिलकुल अकेली पड़ गई.

“याद है ना, उन दिनों तुम, तुम्हारे मातापिता और भाई के साथ शिमला गई थीं. गरमी बहुत थी और तुम लोग 2-3 हफ्ते तक वहां से वापस नहीं लौटना चाहते थे.

“मुझे कुछ पिलाया गया था. और फिर हलकी सी बेहोशी में मुझे याद है कि मुझे कस कर बांध दिया गया था.

“मैं हिल कर जितनी भी ताकत थी, जूझती रही. मैं बहुत चीखी, जितना दम बचा था उतना.

“पर, वो सब को अपने साथ मिला चुका था, बंगले का  कुक, माली और चौकीदार. मुझ को हाथपैर बांध कर ट्रक में पटक दिया गया और यहां इतनी दूर गांव में फेंक दिया.

“यहां पूरे 2 साल मजदूरों की तरह दिहाडी कर के मैं बच सकी. पत्थर तोड़ कर, झाड़ू लगा कर, नाली साफ कर के रोटी खाई.

“न जाने कैसा चमत्कार हुआ कि मैं निराश नहीं हुई. अब ये चाय का ठेला है, इस से बहुत ही मजे में गुजारा हो जाता है.

“तुम लोग बेहद याद आते थे. पर, अब तक तो मेरी हर  काली करतूत पता लग गई होगी. इस शर्म से यहीं रही. मैं कहीं नहीं गई. कितने दिन तो मुंह छिपाती रहती कि कोई मेरी पहचान न कर ले.”

“मगर, वो एकदम से इतनी घृणा क्यों करने लगा? इतना नाराज हुआ कैसे?” बीच में मीनू ने पूछ लिया.

“बस, जलन हो गई थी उस को. उस ने पकड़ लिया मुझे, रंगेहाथों.

“हां… वो सहन नहीं कर सका. तुम तो जानती हो ना मेरी तलब. मुझ को वो एक नया युवक, जो काम पर लगा था, एक  मवेशी संभालने वाला बहुत ही भा गया था. और मेरा काफी समय उस के साथ गुजरने लगा था. वो मेरे बालों को सहलाता, मेरे पैर दबाता, बहुत सेवा करता था.”

प्रभा ने एकदम चुप्पी साध ली.

उस के आगे और कुछ भी नहीं बता कर वह जरा ठहर कर  आगे बोली, “कैसे हैं सब..?संपत्ति तो वो डकैत लूट ले गया होगा. मैं बहुत शर्मिंदा हूं,” कह कर प्रभा सिसकने  लगी.

“नहीं… ऐसा कुछ हुआ ही नहीं. हम लोग लौटे और तुम्हारी चिट्ठी पढी. तुम अपनी मरजी से चली गई थीं. फिर भी हम लोगों ने तुम्हारे अचानक  गायब होने की  रिपोर्ट लिखवाई.”

“चिट्ठी भी लिख दी मेरे नाम से. मेरे ही लेख को कौपी कर लिया. उफ,” तड़प कर रह गई प्रभा.

“हम ने तुम्हारे भाइयों को खबर की, पर वे आए ही नहीं. यह बहुत अजीब हुआ.

“हां… उस के बाद तकरीबन एक महीने बाद वो मैनेजर भी अफीम के नशे में कुएं में छलांग लगा बैठा.

“आगे उस की पत्नी और बच्चों  को हम लोगों ने सहारा दिया. अब वो ही मेरी नई भाभी हैं. सब संभाल रही हैं. मेरा पूरा खयाल रखती हैं.

“उस के बच्चों को हम ने अपने परिवार में शामिल कर लिया है. वे बहुत मेहनत करती हैं. इन दिनों उन्होंने नई जमीनें भी खरीदवा ली हैं. संपत्ति, रुपया  तो हर रोज बढ़ता जा रहा है.

“वाशिम अब बहुत ही सुंदर हो गया है. मैं तो कल शाम पूना आ गई थी. मेरे पति वहां पर एक आध्यात्मिक आश्रम के संचालक हो गए हैं. वे खुद नियम से स्नान, ध्यान करते हैं. लगता ही नहीं कि चालीस के हो गए हैं. मुझ से भी छोटे लगते हैं,” मीनू ने हंस कर कहा.

प्रभा बड़ी हैरत से सुन रही थी और बहुत मुश्किल से विश्वास कर पा रही थी.

“मुश्किल से 3-4  घंटे लगते हैं  यहां पहुंचन में,” मीनू बोली.

“हूं…” कह कर प्रभा चुप हो गई. अब वह कहीं भी नहीं जाना चाहती थी.

मीनू ने उस को बताया, “उस को 12 बजे तक फिजियोथैरैपी के लिए नानावटी अस्पताल पहुंचना है. जरा कलाई में दिक्कत है.”

“मुझे तुम्हारे लिए बहुत अफसोस है. तुम अपना खयाल रखना,” कह कर मीनू  अपनी कार में बैठ गई.

प्रभा उस को जाते हुए देर तक देखती रही और अपने वर्तमान पर वापस ठहर कर जूठे  गिलास मांजने  लगी.

प्यारा सा रिश्ता: परिवार के लिए क्या था सुदीपा का फैसला

12 साल की स्वरा शाम को खेलकूद कर वापस आई. दरवाजे की घंटी बजाई तो सामने किसी अजनबी युवक को देख कर चकित रह गई.

तब तक अंदर से उस की मां सुदीपा बाहर निकली और मुसकराते हुए बेटी से कहा, ‘‘बेटे यह तुम्हारी मम्मा के फ्रैंड अविनाश अंकल हैं. नमस्ते करो अंकल को.’’

‘‘नमस्ते मम्मा के फ्रैंड अंकल,’’ कह कर हौले से मुसकरा कर वह अपने कमरे में चली आई और बैठ कर कुछ सोचने लगी.

कुछ ही देर में उस का भाई विराज भी घर लौट आया. विराज स्वरा से 2-3 साल बड़ा था.

विराज को देखते ही स्वरा ने सवाल किया, ‘‘भैया आप मम्मा के फ्रैंड से मिले?’’

‘‘हां मिला, काफी यंग और चार्मिंग हैं. वैसे 2 दिन पहले भी आए थे. उस दिन तू कहीं गई

हुई थी?’’

‘‘वे सब छोड़ो भैया. आप तो मुझे यह बताओ कि वह मम्मा के बौयफ्रैंड हुए न?’’

‘‘यह क्या कह रही है पगली, वे तो बस फ्रैंड हैं. यह बात अलग है कि आज तक मम्मा की सहेलियां ही घर आती थीं. पहली बार किसी लड़के से दोस्ती की है मम्मा ने.’’

‘‘वही तो मैं कह रही हूं कि वह बौय भी है और मम्मा का फ्रैंड भी यानी वे बौयफ्रैंड ही तो हुए न,’’ स्वरा ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘ज्यादा दिमाग मत दौड़ा. अपनी पढ़ाई कर ले,’’ विराज ने उसे धौल जमाते हुए कहा.

थोड़ी देर में अविनाश चला गया तो सुदीपा की सास अपने कमरे से बाहर आती हुई थोड़ी नाराजगी भरे स्वर में बोलीं, ‘‘बहू क्या बात है, तेरा यह फ्रैंड अब अकसर घर आने लगा है?’’

‘‘अरे नहीं मम्मीजी वह दूसरी बार ही तो आया था और वह भी औफिस के किसी काम के सिलसिले में.’’

‘‘मगर बहू तू तो कहती थी कि तेरे औफिस में ज्यादातर महिलाएं हैं. अगर पुरुष हैं भी तो वे अधिक उम्र के हैं, जबकि यह लड़का तो तुझ से भी छोटा लग रहा था.’’

‘‘मम्मीजी हम समान उम्र के ही हैं. अविनाश मुझ से केवल 4 महीने छोटा है. ऐक्चुअली हमारे औफिस में अविनाश का ट्रांसफर हाल ही में हुआ है. पहले उस की पोस्टिंग हैड औफिस मुंबई में थी. सो इसे प्रैक्टिकल नौलेज काफी ज्यादा है. कभी भी कुछ मदद की जरूरत होती है तो तुरंत आगे आ जाता है. तभी यह औफिस में बहुत जल्दी सब का दोस्त बन गया है. अच्छा मम्मीजी आप बताइए आज खाने में क्या बनाऊं?’’

‘‘जो दिल करे बना ले बहू, पर देख लड़कों से जरूरत से ज्यादा मेलजोल बढ़ाना सही नहीं होता… तेरे भले के लिए ही कह रही हूं बहू.’’

‘‘अरे मम्मीजी आप निश्चिंत रहिए. अविनाश बहुत अच्छा लड़का है,’’ कह कर हंसती हुई सुदीपा अंदर चली गई, मगर सास का चेहरा बना रहा.

रात में जब सुदीपा का पति अनुराग घर लौटा तो खाने के बाद सास ने अनुराग को कमरे में बुलाया और धीमी आवाज में उसे अविनाश के बारे में सबकुछ बता दिया.

अनुराग ने मां को समझाने की कोशिश की, ‘‘मां आज के समय में महिलाओं और पुरुषों की दोस्ती आम बात है. वैसे भी आप जानती ही हो सुदीपा कितनी समझदार है. आप टैंशन क्यों लेती हो मां?’’

‘‘बेटा मेरी बूढ़ी हड्डियों ने इतनी दुनिया देखी है जितनी तू सोच भी नहीं सकता. स्त्रीपुरुष की दोस्ती यानी घी और आग की दोस्ती. आग पकड़ते समय नहीं लगता बेटे. मेरा फर्ज था तुझे समझाना सो समझा दिया.’’

‘‘डौंट वरी मां ऐसा कुछ नहीं होगा. अच्छा मैं चलता हूं सोने,’’ अविनाश मां के पास से तो उठ कर चला आया, मगर कहीं न कहीं उन की बातें देर तक उस के जेहन में घूमती रहीं. वह सुदीपा से बहुत प्यार करता था और उस पर पूरा यकीन भी था. मगर आज जिस तरह मां शक जाहिर कर रही थीं उस बात को वह पूरी तरह इग्नोर भी नहीं कर पा रहा था.

रात में जब घर के सारे काम निबटा कर सुदीपा कमरे में आई तो अविनाश ने उसे छेड़ने के अंदाज में कहा, ‘‘मां कह रही थीं आजकल आप की किसी लड़के से दोस्ती हो गई है और वह आप के घर भी आता है.’’

पति के भाव समझते हुए सुदीपा ने भी उसी लहजे में जवाब दिया, ‘‘जी हां आप ने सही सुना है. वैसे मां तो यह भी कह रही होंगी कि कहीं मुझे उस से प्यार न हो जाए और मैं आप को चीट न करने लगूं.’’

‘‘हां मां की सोच तो कुछ ऐसी ही है, मगर मेरी नहीं. औफिस में मुझे भी महिला सहकर्मियों से बातें करनी होती हैं पर इस का मतलब यह तो नहीं कि मैं कुछ और सोचने लगूं. मैं तो मजाक कर रहा था.’’

‘‘आई नो ऐंड आई लव यू,’’ प्यार से सुदीपा ने कहा.

‘‘ओहो चलो इसी बहाने ये लफ्ज इतने दिनों बाद सुनने को तो मिल गए,’’ अविनाश ने उसे बांहों में भरते हुए कहा.

सुदीपा खिलखिला कर हंस पड़ी. दोनों देर तक प्यारभरी बातें करते रहे.

वक्त इसी तरह गुजरने लगा. अविनाश अकसर सुदीपा के घर आ जाता. कभीकभी दोनों बाहर भी निकल जाते. अनुराग को कोई एतराज नहीं था, इसलिए सुदीपा भी इस दोस्ती को ऐंजौय कर रही थी. साथ ही औफिस के काम भी आसानी से निबट जाते.

सुदीपा औफिस के साथ घर भी बहुत अच्छी तरह से संभालती थी. अनुराग को इस मामले में भी पत्नी से कोई शिकायत नहीं थी.

मां अकसर बेटे को टोकतीं, ‘‘यह सही नहीं है अनुराग. तुझे फिर कह रही हूं, पत्नी को किसी और के साथ इतना घुलनमलने देना उचित नहीं.’’

‘‘मां ऐक्चुअली सुदीपा औफिस के कामों में ही अविनाश की हैल्प लेती है. दोनों एक ही फील्ड में काम कर रहे हैं और एकदूसरे को अच्छे से समझते हैं. इसलिए स्वाभाविक है कि काम के साथसाथ थोड़ा समय संग बिता लेते हैं. इस में कुछ कहना मुझे ठीक नहीं लगता मां और फिर तुम्हारी बहू इतना कमा भी तो रही है. याद करो मां जब सुदीपा घर पर रहती थी तो कई दफा घर चलाने के लिए हमारे हाथ तंग हो जाते थे. आखिर बच्चों को अच्छी शिक्षा दी जा सके इस के लिए सुदीपा का काम करना भी तो जरूरी है न फिर जब वह घर संभालने के बाद काम करने बाहर जा रही है तो हर बात पर टोकाटाकी भी तो अच्छी नहीं लगती न.’’

‘‘बेटे मैं तेरी बात समझ रही हूं पर तू मेरी बात नहीं समझता. देख थोड़ा नियंत्रण भी जरूरी है बेटे वरना कहीं तुझे बाद में पछताना न पड़े,’’ मां ने मुंह बनाते हुए कहा.

‘‘ठीक है मां मैं बात करूंगा,’’ कह कर अनुराग चुप हो गया.

एक ही बात बारबार कही जाए तो वह कहीं न कहीं दिमाग पर असर डालती है. ऐसा ही कुछ अनुराग के साथ भी होने लगा था. जब काम के बहाने सुदीपा और अविनाश शहर से बाहर जाते तो अनुराग का दिल बेचैन हो उठता. उसे कई दफा लगता कि सुदीपा को अविनाश के साथ बाहर जाने से रोक ले या डांट लगा दे. मगर वह ऐसा कर नहीं पाता. आखिर उस की गृहस्थी की गाड़ी यदि सरपट दौड़ रही है तो उस के पीछे कहीं न कहीं सुदीपा की मेहनत ही तो थी.

इधर बेटे पर अपनी बातों का असर पड़ता न देख अनुराग के मांबाप ने अपने पोते और पोती यानी बच्चों को उकसाना शुरू का दिया. एक दिन दोनों बच्चों को बैठा कर वे समझाने लगे, ‘‘देखो बेटे आप की मम्मा की अविनाश अंकल से दोस्ती ज्यादा ही बढ़ रही है. क्या आप दोनों को नहीं लगता कि मम्मा आप को या पापा को अपना पूरा समय देने के बजाय अविनाश अंकल के साथ घूमने चली जाती है?’’

‘‘दादीजी मम्मा घूमने नहीं बल्कि औफिस के काम से ही अविनाश अंकल के साथ जाती हैं,’’ विराज ने विरोध किया.

‘‘ भैया को छोड़ो दादीजी पर मुझे भी ऐसा लगता है जैसे मम्मा हमें सच में इग्नोर करने लगी हैं. जब देखो ये अंकल हमारे घर आ जाते हैं या मम्मा को ले जाते हैं. यह सही नहीं.’’

‘‘हां बेटे मैं इसीलिए कह रही हूं कि थोड़ा ध्यान दो. मम्मा को कहो कि अपने दोस्त के साथ नहीं बल्कि तुम लोगों के साथ समय बिताया करे.’’

उस दिन संडे था. बच्चों के कहने पर सुदीपा और अनुराग उन्हें ले कर वाटर पार्क जाने वाले थे.

दोपहर की नींद ले कर जैसे ही दोनों बच्चे तैयार होने लगे तो मां को न देख कर दादी के पास पहुंचे, ‘‘दादीजी मम्मा कहां हैं… दिख नहीं रहीं?’’

‘‘तुम्हारी मम्मा गई अपने फ्रैंड के साथ.’’

‘‘मतलब अविनाश अंकल के साथ?’’

‘‘हां.’’

‘‘लेकिन उन्हें तो हमारे साथ जाना था. क्या हम से ज्यादा बौयफ्रैंड इंपौर्टैं हो गया?’’ कह कर स्वरा ने मुंह फुला लिया. विराज भी उदास हो गया.

लोहा गरम देख दादी मां ने हथौड़ा मारने की गरज से कहा, ‘‘यही तो मैं कहती आ रही हूं इतने समय से कि सुदीपा के लिए अपने बच्चों से ज्यादा महत्त्वपूर्ण वह पराया आदमी हो गया है. तुम्हारे बाप को तो कुछ समझ ही नहीं आता.’’

‘‘मां प्लीज ऐसा कुछ नहीं है. कोई जरूरी काम आ गया होगा,’’ अनुराग ने सुदीपा के बचाव में कहा.

‘‘पर पापा हमारा दिल रखने से जरूरी और कौन सा काम हो गया भला?’’ कह कर विराज गुस्से में उठा और अपने कमरे में चला गया. उस ने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया.

स्वरा भी चिढ़ कर बोली, ‘‘लगता है मम्मा को हम से ज्यादा प्यार उस अविनाश अंकल से हो गया है,’’ और फिर वह भी पैर पटकती अपने कमरे में चली गई.

शाम को जब सुदीपा लौटी तो घर में सब का मूड औफ था. सुदीपा ने बच्चों को समझाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे अविनाश अंकल के पैर में गहरी चोट लग गई थी. तभी मैं उन्हें ले कर अस्पताल गई.’’

‘‘मम्मा आज हम कोई बहाना नहीं सुनने वाले. आप ने अपना वादा तोड़ा है और वह भी अविनाश अंकल की खातिर. हमें कोई बात नहीं करनी,’’ कह कर दोनों वहां से उठ कर चले गए.

स्वरा और विराज मां की अविनाश से इन नजदीकियों को पसंद नहीं कर रहे थे. वे अपनी ही मां से कटेकटे से रहने लगे. गरमी की छुट्टियों के बाद बच्चों के स्कूल खुल गए और विराज अपने होस्टल चला गया.

इधर सुदीपा के सासससुर ने इस दोस्ती का जिक्र उस के मांबाप से भी कर दिया. सुदीपा के मांबाप भी इस दोस्ती के खिलाफ थे. मां ने सुदीपा को समझाया तो पिता ने भी अनुराग को सलाह दी कि उसे इस मामले में सुदीपा पर थोड़ी सख्ती करनी चाहिए और अविनाश के साथ बाहर जाने की इजाजत कतई नहीं देनी चाहिए.

इस बीच स्वरा की दोस्ती सोसाइटी के एक लड़के सुजय से हो गई. वह स्वरा से 2-4 साल बड़ा था यानी विराज की उम्र का था. वह जूडोकराटे में चैंपियन और फिटनैस फ्रीक लड़का था. स्वरा उस की बाइक रेसिंग से भी बहुत प्रभावित थी. वे दोनों एक ही स्कूल में थे. दोनों साथ स्कूल आनेजाने लगे. सुजय दूसरे लड़कों की तरह नहीं था. वह स्वरा को अच्छी बातें बताता. उसे सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग देता और स्कूटी चलाना भी सिखाता. सुजय का साथ स्वरा को बहुत पसंद आता.

एक दिन स्वरा सुजय को अपने साथ घर ले आई. सुदीपा ने उस की अच्छे से आवभगत की. सब को सुजय अच्छा लड़का लगा इसलिए किसी ने स्वरा से कोई पूछताछ नहीं की. अब तो सुजय अकसर ही घर आने लगा. वह स्वरा की मैथ्स की प्रौब्लम भी सौल्व कर देता और जूडोकराटे भी सिखाता रहता.

एक दिन स्वरा ने सुदीपा से कहा, ‘‘मम्मा आप को पता है सुजय डांस भी जानता है. वह कह रहा था कि मुझे डांस सिखा देगा.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छा है. तुम दोनों बाहर लौन में या फिर अपने कमरे में डांस की प्रैक्टिस कर सकते हो.’’

‘‘मम्मा आप को या घर में किसी को एतराज तो नहीं होगा?’’ स्वरा ने पूछा.

‘‘अरे नहीं बेटा. सुजय अच्छा लड़का है. वह तुम्हें अच्छी बातें सिखाता है. तुम दोनों क्वालिटी टाइम स्पैंड करते हो. फिर हमें ऐतराज क्यों होगा? बस बेटा यह ध्यान रखना सुजय और तुम फालतू बातों में समय मत लगाना. काम की बातें सीखो, खेलोकूदो, उस में क्या बुराई है?’’

‘‘ओके थैंक यू मम्मा,’’ कह कर स्वरा खुशीखुशी चली गई.

अब सुजय हर संडे स्वरा के घर आ जाता और दोनों डांस प्रैक्टिस करते. समय इसी तरह बीतता रहा. एक दिन सुदीपा और अनुराग किसी काम से बाहर गए हुए थे.

घर में स्वरा दादीदादी के साथ अकेली थी. किसी काम से सुजय घर आया तो स्वरा उस से मैथ्स की प्रौब्लम सौल्व कराने लगी. इसी बीच अचानक स्वरा को दादी के कराहने और बाथरूम में गिरने की आवाज सुनाई दी.

स्वरा और सुजय दौड़ कर बाथरूम पहुंचे तो देखा दादी फर्श पर बेहोश पड़ी हैं. स्वरा के दादा ऊंचा सुनते थे. उन के पैरों में भी तकलीफ रहती थी. वे अपने कमरे में सोए थे. स्वरा घबरा कर रोने लगी तब सुजय ने उसे चुप कराया और जल्दी से ऐंबुलैंस वाले को फोन किया. स्वरा ने अपने मम्मीडैडी को भी हर बात बता दी. इस बीच सुजय जल्दी से दादी को ले कर पास के अस्पताल भागा. उस ने पहले ही अपने घर से रुपए मंगा लिए थे. अस्पताल पहुंच कर उस ने बहुत समझदारी के साथ दादी को एडमिट करा दिया और प्राथमिक इलाज शुरू कराया. उन को हार्ट अटैक आया था. अब तक स्वरा के मांबाप भी हौस्पिटल पहुंच गए थे.

डाक्टर ने सुदीपा और अनुराग से सुजय की तारीफ करते हुए कहा, ‘‘इस लड़के ने जिस फुरती और समझदारी से आप की मां को हौस्पिटल पहुंचाया वह काबिलेतारीफ है. अगर ज्यादा देर हो जाती तो समस्या बढ़ सकती थी यहां तक कि जान को भी खतरा हो सकता था.’’

सुदीपा ने बढ़ कर सुजय को गले से लगा लिया. अनुराग और उस के पिता ने भी नम आंखों से सुजय का धन्यवाद कहा. सब समझ रहे थे कि बाहर का एक लड़का आज उन के परिवार के लिए कितना बड़ा काम कर गया. हालात सुधरने पर स्वरा की दादी को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई

घर लौटने पर दादी ने सुजय का हाथ पकड़ कर गदगद स्वर में कहा, ‘‘आज मुझे पता चला कि दोस्ती का रिश्ता इतना खूबसूरत होता है. तुम ने मेरी जान बचा कर इस बात का एहसास दिला दिया बेटे कि दोस्ती का मतलब क्या है.’’

‘‘यह तो मेरा फर्ज था दादीजी,’’ सुजय ने हंस कर कहा.

तब दादी ने सुदीपा की तरफ देख कर ग्लानि भरे स्वर में कहा, ‘‘मुझे माफ कर दे बहू. दोस्ती तो दोस्ती होती है, बच्चों की हो या बड़ों की. तेरी और अविनाश की दोस्ती पर शक कर के हम ने बहुत बड़ी भूल कर दी. आज मैं समझ सकती हूं कि तुम दोनों की दोस्ती कितनी प्यारी होगी. आज तक मैं समझ ही नहीं पाई थी.’’

सुदीपा बढ़ कर सास के गले लगती हुई बोली, ‘‘मम्मीजी आप बड़ी हैं. आप को मुझ से माफी मांगने की कोई जरूरत नहीं. आप अविनाश को जानती नहीं थीं, इसलिए आप के मन में सवाल उठ रहे थे. यह बहुत स्वाभाविक था. पर मैं उसे पहचानती हूं, इसलिए बिना कुछ छिपाए उस रिश्ते को आप के सामने ले कर आई थी.’’

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई. सुदीपा ने दरवाजा खोला तो सामने हाथों में फल और गुलदस्ता लिए अविनाश खड़ा था. घबराए हुए स्वर में उस ने पूछा, ‘‘मैं ने सुना है कि अम्मांजी की तबीयत खराब हो गई है. अब कैसी हैं वे?’’

‘‘बस तुम्हें ही याद कर रही थीं,’’ हंसते

हुए सुदीपा ने कहा और हाथ पकड़ कर उसे अंदर ले आई.

सलमान ने सोचा न था

सलमान की शादी को 10 साल हो गए थे. वह अपने परिवार के साथ मुंबई में जिंदगी गुजार रहा था. उस के इस परिवार में बीवी रेशमा और 4 बच्चे बड़ी बेटी आयशा 9 साल की, दूसरी बेटी

7 साल की, बेटा अयान 2 साल का और सब से छोटी बेटी, जो महज सालभर की थी. इस परिवार के साथ सलमान की सास भी पिछले 3 साल से रह रही थीं. जिंदगी अच्छी गुजर रही थी. काम भी अच्छा चल रहा था. घर में किसी चीज की कोई कमी न थी.

लौकडाउन के दौरान सलमान की जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया, जिस से उस की जिंदगी पत?ाड़ पेड़ के समान बिखर कर रह गई.

कारोबार खत्म हो चुका था. बीवी रेशमा ने अचानक नईनई मांगें शुरू कर दीं. पहला लौकडाउन खुल चुका था. कारोबार सही नहीं चल पा रहा था. उधर रेशमा जिम जाने लगी. जिम जाने में सलमान को कोई एतराज नहीं था, लेकिन वह जिम से 5-6 घंटे में वापस आती. न टाइम पर खाना, न बच्चों की कोई परवाह.

घर में ?ागड़ा बढ़ने लगा. सलमान ने अपनी सास से भी कहा, ‘‘रेशमा को सम?ाओ. बच्चों को टाइम पर न खाना मिल रहा है और न ही उन की औनलाइन ठीक से पढ़ाई हो पा रही है. मेरा भी काम अभीअभी शुरू हुआ है. मैं भी बच्चों को टाइम नहीं दे पा रहा हूं.’’

इस पर सलमान की सास बोलीं, ‘‘तुम मेरी बेटी के फिट होने से जल रहे हो. उसे अभी अपनी फिटनैस का खयाल रखना है. अभी उस की उम्र ही क्या है.’’

मांबेटी ने सलमान की एक न सुनी. सलमान चुप हो कर रह गया.

जिंदगी यों ही गुजर रही थी. फिर अचानक एक दिन सलमान की जिंदगी में नया भूचाल आ गया. रेशमा ने सलमान के सामने सारी प्रोपर्टी अपने नाम करने की शर्त रख दी. सलमान ने ऐसा करने से मना कर दिया, तो रेशमा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उस ने सलमान से बात करना छोड़ दिया. उसे वह अब अपने पास फटकने भी नहीं देती.

इस के चलते सलमान परेशान रहने लगा. उस ने अपनी सास से कहा, ‘‘रेशमा को सम?ाओ. छोटेछोटे बच्चे हैं. इन की जिंदगी पर क्या असर पड़ेगा.’’

इस पर सलमान की सास बोलीं, ‘‘तुम उस के नाम प्रोपर्टी कर दो. रेशमा के अब्बा ने मेरे नाम कुछ नहीं किया, तो आज मैं तुम्हारे पास पड़ी हूं.’’

सलमान ने कहा, ‘‘वे तुम्हें बुलाते हैं, तुम क्यों नहीं जातीं?’’

उस पर सास बोलीं, ‘‘अब उन के बस की बात ही क्या है. सब तो उन्होंने बेच दिया.’’

इस पर सलमान बोला, ‘‘मैं तो कमा रहा हूं. मैं ने तो अब तक कुछ बेचा नहीं, उलटे खरीदा ही है. मेरे अब्बा भी अभी जिंदा हैं. मैं उन की प्रोपर्टी इस के नाम कैसे कर सकता हूं. जो मेरे नाम है, मैं उस की वसीयत रेशमा के नाम कर देता हूं.’’

सास बोलीं, ‘‘ठीक है.’’

कुछ ही घंटों में उन्होंने एक वकील को घर पर बुला लिया. वकील से बात करने के बाद सलमान की बीवी रेशमा और सास बोलीं कि वसीयत नहीं, गिफ्ट डीड बनाओ.

इस पर सलमान बोला, ‘‘गिफ्ट डीड बनने से तो मेरा कोई हक नहीं रहेगा.

यह गलत है. मैं केवल वसीयत कर सकता हूं.’’

इस पर मांबेटी दोनों भड़क गईं और सलमान को बुराभला कहने लगीं.

सलमान ने उन दोनों को बच्चों का वास्ता दिया. इस पर सलमान की सास बोलीं, ‘‘ये बच्चे घर से लाई थी क्या…? तेरे बच्चे हैं, तू संभाल.’’

सलमान उन की यह बात सुन कर हक्काबक्का रह गया. वक्त इसी तरह गुजर रहा था कि मांबेटी ने घर से पैसे और जेवर उठा लिए और चंपत हो गईं.

दांव पर जिंदगी : आरती को बहू भात खाना क्यों पड़ा भारी

आरती को बहू भात खाने जाना बहुत महंगा पड़ा. उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी.

‘‘लाल, तुम्हारी पत्नी तो बड़ी मस्त है. बहुत मजा आया, पूरा वसूल हो गया,’’ उस आदमी के मुंह से निकलने वाले ये वे शब्द थे, जो बेहोश होने के पहले आरती के कानों में समाए थे.

आवाज सुनीसुनी सी लगी थी. उस के पहले के वे 3 आदमी कौन थे, आरती जान नहीं पाई थी. सब ने अपने चेहरों को ढक रखा था. कोई कुछ बोल भी नहीं रहा था,

जैसे सबकुछ योजना बना कर हो रहा था. एक के बाद एक चढ़े, कूदे और उतर गए. जैसे बेटिकट लफंगे बसों में चढ़तेउतरते हैं.

न आरती चीख पा रही थी और न हिलडुल पा रही थी. पहले ही मुंह में कपड़ा ठूंस दिया गया था. दम घुट रहा था. जो आता जोश से भरा हुआ होता और उस की जान हलक में आ जाती थी.

फिर वहां क्याकुछ हुआ, आरती को कुछ भी पता नहीं. होश आया, तो घर के बिस्तर में पड़ी थी और घर वाले उसे घेरे खड़े थे.

आरती की आंखें लाल को ढूंढ़ रही थीं. वह एक ओर कोने में दुबका सा खड़ा था… चुपचाप. उसे देख कर आरती का मन नफरत से भर उठा. दिल में एक हूक सी उठी, एक सैलाब सा उमड़ा, उस दर्द का, जो वह अभीअभी भोग कर आई थी.

‘‘थाने चलो,’’ अगले दिन सुबह उठते ही आरती ने लाल से कहा.

‘‘होश में आओ, पागल मत बनो, लोग जानेंगेसुनेंगे तो क्या कहेंगे? बाकी की जिंदगी बदनामी ओढ़ कर जीना पड़ेगा. मुंह बंद रखो और रात की घटना को एक डरावना सपना समझ कर भूल जाओ,’’ लाल ने धीरे से कहा.

‘‘यह मेरी जिंदगी का सवाल है. मैं गायबकरी नहीं हूं, तुम थाने चलो,’’ आरती ने जोर दिया और घर से बाहर निकल आई.

आरती ने अपना लिखित बयान थाने में दर्ज करा दिया.

‘‘आप ने लिखा है कि आखिरी वाले आदमी की आवाज सुनीसुनी सी लगी थी?’’ थानेदार रंजन चौधरी ने आरती से पूछा.

‘‘जी हां सर, कुछ दिन पहले एक शाम को ‘लाल’ कह कर घर के बाहर से किसी आदमी ने आवाज दी थी, तब मैं आंगन में थी. यह वही आवाज थी.’’

‘‘घटना के पहले की कुछ बातें बता सकती हैं आप?’’

‘‘सर, घर से हम दोनों 9 बजे चल दिए थे. नर्रा गांव के बाद ही जंगल शुरू हो जाता है. सिंगारी मोड़ पर हमें मुड़ना था. लाल ने हौर्न बजाया, तो मैं ने

पूछा था, ‘रात को हौर्न बजाने का क्या मतलब?’

‘‘लाल ने कहा था, ‘गलती से बज गया था.’’’

आरती का बयान दर्ज कर लिया गया. थानेदार रंजन चौधरी ने लाल पर एक नजर डाली, लेकिन कुछ कहा नहीं. लाल उन की चुभती नजरों का सामना न कर सका. उस का गला सूखने लगा था.

बाद में एक महिला कांस्टेबल की निगरानी में मैडिकल टैस्ट के लिए आरती को सदर अस्पताल भेज दिया गया. शाम को मैडिकल रिपोर्ट मिल गई थी. सामूहिक बलात्कार की तसदीक हो चुकी थी.

अगले दिन पुलिस ने लाल को उस के घर से उठा लिया. घर वालों ने इस का कड़ा विरोध किया. लाल के बड़े भाई ने मंत्री से शिकायत करने की धमकी तक दे डाली, ‘‘गुनाहगारों को पकड़ने की जगह मेरे भाई को ले जा रहे हैं. यह आप अच्छा नहीं कर रहे हैं. आप को मंत्रीजी के सामने इस का जवाब देना पड़ेगा.’’

‘‘आप को जहां शिकायत करनी है, कीजिए, पर इतना जान लीजिए कि इस कांड की गुत्थी आप के भाई से जुड़ी हुई है,’’ थानेदार रंजन चौधरी ने कहा.

आरती बलात्कार कांड में उस वक्त एक नया मोड़ आ गया, जब लाल की गिरफ्तारी के कुछ घंटे बाद उस की निशानदेही पर गुप्त छापामारी कर पुलिस ने उन चारों बलात्कारियों को एकसाथ धर दबोचा.

उस के पहले थाने ले जा कर पुलिस ने लाल का अच्छे ढंग से स्वागत किया था. पहले पानी और फिर चाय पिलाई गई, फिर पूछा गया, ‘‘तुम्हारा कहना है कि उस बलात्कारी को तुम नहीं जानते हो, जो तुम्हारा नाम जानता है?’’

‘‘मैं सच कहता हूं सर, मैं उसे नहीं जानता.’’

‘‘तुम सब जानते हो…’’ बाकी शब्दों को लाल के गाल पर पड़े थानेदार रंजन चौधरी के जोरदार चांटे ने पूरा कर दिया था. फिर तो वह तोते की तरह बोलना चालू हो गया था.

इस के बाद कुछ घंटे चली धर पकड़ के बाद उन चारों के बयान ने पूरे इलाके में एक सनसनी सी फैला दी थी. गलीमहल्लों में जिसे देखो वही लाल और आरती के संबंधों की बाल की खाल उतारने में लगा हुआ था.

आरती के भीतर भी एक तूफान उठा हुआ था, जो उस के दिलोदिमाग को मथ रहा था. एक दागदार जिंदगी की चादर को ओढ़े वह किस तरह जी पाएगी? लोगों की चुभती नजरों का सामना वह कैसे करेगी? यही सब सोचसोच कर उस का दिमाग फटा जा रहा था.

अब तो राजेश भी आरती से दूर जा चुका था. 10 साल पहले उस की बेरंग जिंदगी में एक बदलाव आया था. वह पैंशन डिपार्टमैंट में राजेश की असिस्टैंट थी. काम करतेकरते दोनों कब इतने करीब आ गए कि एकदूसरे को देखे बिना रहना मुश्किल हो गया.

यह सिलसिला 10 साल तक बड़े आराम से चला कि अचानक एक दिन आरती ने राजेश से कहा, ‘‘अब हम  एक ही औफिस में एकसाथ रह कर काम नहीं कर सकते. लाल को हमारे रिश्ते की भनक लग चुकी है.’’

आरती डर गई थी. अपने लिए नहीं, बल्कि राजेश के लिए. वह राजेश से बेइंतिहा प्यार जो करने लगी थी.

लोग भी कहते हैं कि जुआरी और शराबियों से जितना दूर रहो, उतना ही बेहतर है, फिर आरती का पति लाल तो एक अव्वल दर्जे का जुआरी था और शराबी भी.

कुलमिला कर आरती एक बेस्वाद जिंदगी जी रही थी, जिस में न प्यार का गुलकंद था और न उमंग की कोई तरंग. इस उबाऊ जिंदगी से राजेश ने अपनी बांहों में भर कर उसे उबार लिया था.

पति के दबाव में आ कर आरती ने राजेश से एक दिन दूरी बना ली, पर राजेश हर हाल में आरती के साथ जुड़ा रहना चाहता था, ‘‘आरती, मैं तुम्हें आसमान के चांदतारे तो ला कर नहीं दे सकता, पर अपनी पलकों पर जरूर बिठा कर रखूंगा. मैं तुम्हें कभी धोखा नहीं दूंगा, यह मैं वादा करता हूं.

‘‘तुम मु?ो छोड़ने की बात मत करो, मैं तुम्हारे बगैर जी नहीं पाऊंगा,’’ राजेश रोने लगा था.

‘‘राजेश, मैं तुम्हारी जुदाई बरदाश्त कर लूंगी. हर हाल में जी लूंगी, लेकिन तुम्हें कुछ हो जाए, यह मैं सहन नहीं कर सकूंगी. लाल गुस्से में पागल हो चुका है, मैं उस पर भरोसा नहीं कर सकती. हमारा प्यार जिंदा रहे, इस के लिए तुम्हें जिंदा रहना होगा.’’

‘‘तुम्हारी खुशी में ही मेरी खुशी है,’’ आंसू पोंछते हुए राजेश चला गया था.

एक हफ्ते बाद ही राजेश ने अपना तबादला दूसरे एरिया में करवा लिया था. फिर दोनों कभी नहीं मिले.

अखबार से ही राजेश को आरती के साथ हुए बलात्कार की जानकारी हुई. वह गुस्से से सुलग उठा और कभी फोन न करने की अपनी कसम तोड़ डाली, ‘‘आखिर उस जल्लाद ने अपना असली रूप दिखा ही दिया न. मैं कहता रहा, वह तुम्हें धोखा देगा. अब क्या कहूं…’’

‘तुम कैसे हो?’ फोन रिसीव करते ही आरती की आंखों से आंसू झरने लगे थे.

‘‘यह सब जान कर कैसे कहूं कि मैं ठीक हूं.’’

राजेश का फोन आना आरती के घायल तनमन पर चंदन के लेप जैसा था. एक पल के लिए वह अपने जख्मों को भूल गई थी.

आरती बिस्तर पर लेटे हुए कभी ऊपर छत को, तो कभी उस छिपकली को देख रही थी, जिस ने अभीअभी एक कीड़े को निगला था. वह खुद को समझने और समझाने में लग गई थी.

आज ही सभी अखबारों में आरती बलात्कार कांड को ले कर खबरें छपी थीं. पर उन चारों आरोपियों के बयान खटिया के 4 पायों की तरह थे. देह से वे चारों अलग थे, लेकिन बयान उन चारों के अलग नहीं थे. सब ने एकसुर में कहा था, ‘हम ने कोई बलात्कार नहीं किया है. हम ने इस के लिए पैसे दिए थे.’

बयान की शुरुआत पहले आरोपी घनश्याम साहू से हुई थी, ‘‘हमेशा की तरह उस दिन भी हम पांचों जुआ खेल रहे थे. लाल सारा पैसा हार चुका था. वह उठ कर जाने लगा. थोड़ी दूर जा कर रुक गया. फिर पीछे मुड़ा और सामने आ कर बोला, ‘मैं एक दांव और खेलूंगा, एक लाख का. बोलो, खेलते हो?’

‘‘लेकिन, मैं ने साफ मना कर दिया कि उधार का हम नहीं खेलेंगे. यह सुन कर लाल एकदम से बोल उठा,

‘10 लाख हैं मेरे पास.’

‘‘यह सुन कर फूचा बोला, ‘अभी तुम्हारी जेब में 10 टका नहीं था, यह

10 लाख कहां से आ गया?’

‘‘यह सुन कर लाल ने कहा, ‘मेरी पत्नी कितने लाख की है, मालूम है न तुम लोगों को…’

‘‘मैं ने उस का मजाक उड़ाते हुए कहा, ‘हांहां, मालूम है, पर उस से क्या? जुआ खेलने के लिए तो तुम्हें वह 100 का नोट भी नहीं देती.’

‘‘तभी लाल ऊंची आवाज में बोला, ‘एक लाख के रूप में मैं उसी पत्नी को आज दांव पर लगाता हूं.’

‘‘मैं ने हैरान हो कर कहा, ‘होश में तो है? पत्नी को दांव पर लगाएगा? महाभारत याद है न?’

‘‘पर जुए का नशा लाल पर भूत की तरह चढ़ गया था. वह नहीं माना. मैं सोच में पड़ गया था. मैं लाल की पत्नी और उस के स्वभाव को जानता था. जान लेगी तो सब की जान ले लेगी. कोई भी उस के सामने जाने से डरता था, मजाक करना तो दूर की बात.

‘‘हम चारों अभी कुछ सोच ही रहे थे कि तभी सोमा मोदी बोल उठा, ‘अगर लाल इतना बोल रहा है तो मान जाओ. हमारा क्या जाएगा, हारेंगे तो उस का पैसा उसे लौटा देंगे… और अगर जीत गए तो…’ बोलतेबोलते वह रुक गया था.

‘‘फिर उसी जगह हम पांचों बैठ गए थे. ताश की नई बाजी बिछ गई. खेल शुरू हो गया. हम देह की नसों में तनाव महसूस करने लगे थे. लाल का और भी बुरा हाल था.’’

‘‘फिर क्या हुआ था?’’ थानेदार रंजन चौधरी ने पूछा.

‘‘पहले की 2 बाजी में हारजीत का फैसला न हो सका,’’ घनश्याम ने कहना जारी रखा, ‘‘फिर हम तीसरी बाजी खेलने बैठे. लाल ने 3 बार खेल को बीच में रोका. हर बार उस की सोच बदलीबदली सी लगी. हम उस की ओर देखते, तो वह जाहिल की माफिक हंस देता.

‘‘यही आखिरी बाजी होगी, इस के बाद हम नहीं खेलेंगे. जब मैं ने ऐसा कहा, तो लाल ने मुझे घूर कर देखा.

‘‘खेल शुरू हुआ… 5 मिनट…

10 मिनट.. और 15 मिनट… अब की जीत का इक्का मेरे हाथ में था. खेल खत्म हो चुका था. लाल बाजी और दांव पर लगाई पत्नी को हार चुका था.

‘‘लाल ने कुछ नहीं कहा. मैं ने आहिस्ता से नजरें उठा कर लाल को देखा. वह शांत नहीं दिख रहा था.

‘‘तभी मैं ने कहा, ‘लाल, जुए में हम ने तुम्हारी पत्नी जीत तो ली है, पर फायदा क्या? यह बात जो भी उसे कहने जाएगा, उसे चप्पल खानी पड़ेगी और हम नहीं चाहते हैं कि जीत कर किसी की चप्पल खाएं.’

‘‘इस पर लाल ने कहा, ‘तो तुम्हें जीत का फायदा चाहिए?’

‘‘यह सुन कर हम चारों साथियों ने लार टपकाते हुए हामी भरी. लाल ने कहा, ‘ठीक है, तुम चारों मेरे बैंक अकाउंट में अभी एक लाख रुपए भेजो.’

‘‘मैं ने कहा, ‘हम चारों तुम्हें एक लाख रुपए क्यों दें?’

‘‘यह सुन कर लाल ने कहा, ‘तब फिर मेरी पत्नी से जा कर कहो कि हम ने तुम्हें जुए में जीता है.’

‘‘हम चारों एकदूसरे का मुंह देखने लगे. आखिर में हम ने लाल की बात मान ली और उस के खाते में एक लाख रुपए भेज दिए.

‘‘लाल ने कहा,

‘4 दिन बाद इस पैसे

का मजा लेने के लिए तैयार रहना.’’’

‘‘तुम ने अपनी ही पत्नी के साथ ऐसा खेल क्यों खेला..?’’ थानेदार रंजन चौधरी ने लाल से पूछा.

‘‘वह मेरी नाम की ही पत्नी है. उस की जिंदगी के साथ मेरा कोई मेल नहीं है. वह हमारे घर में रहती जरूर है, लेकिन मैं उस के दिल में नहीं रहता.

‘‘मेरी पत्नी हो कर भी वह मेरे साथ एक बंटी हुई जिंदगी जी रही है. उस की आंखों में तो राजेश बसा हुआ है. उस के साथ जोकुछ भी हुआ, उस पर मुझे जरा भी अफसोस नहीं है. वह इसी लायक है.’’

‘बंटी हुई जिंदगी जी रहा हूं, इसीलिए ऐसा किया,’ कुछ अखबारों में लाल के इसी बयान को हैडलाइन बनाया था.

दूसरे दिन चारों बलात्कारियों के साथ लाल को भी टेनुघाट जेल भेज दिया गया. बलात्कारियों के बयान और पुलिस चार्जशीट को अदालत ने गंभीर अपराध माना और इसी को आधार बनाया. हफ्तेभर में कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला भी सामने आ गया.

अपने फैसलों की वजह से चर्चित जज मोहन मलिक के सामने बचाव पक्ष के धाकड़ वकील सतीश मेहता की एक भी दलील काम नहीं आई. जज साहब ने उन की एक नहीं सुनी और चारों आरोपियों को 20-20 साल की और मुख्य आरोपी मानते हुए लाल को आजीवन कारावास की सजा सुना दी.

2 बेटों की मां आरती को अब अपनी जिंदगी का फैसला करना था, जो आसान नहीं था. उसे अपनों के द्वारा छला गया था और शरीर को जलील किया गया था.

घर के बाहर काफी भीड़ जमा हो गई थी. तभी आरती का बड़ा बेटा रूपेश बाहर आ कर बोला, ‘‘लाल हमारा बाप है, पर अब वह हमारे लिए मर चुका है. उस ने हमारी मां और हमें भी समाज में जलील किया है.’’

40वां बसंत पार कर चुकी आरती का बदन आज भी लोगों को लुभा रहा था और यह उसे भी बखूबी पता था, पर उसे यह पता नहीं था कि जिंदगी एक दिन उसे ऐसे मोड़ पर ला खड़ा कर देगी, जहां टैलीविजन चैनल वालों के सामने उसे अपनी बात रखने की नौबत आ पड़ेगी.

आरती ने एक नजर बाहर खड़ी भीड़ को देखा और इतना भर कहा, ‘‘घर और इज्जत जब दांव पर लग जाए, तब उस बंधन को तोड़ कर बाहर निकल जाना ही बेहतर है. औरतें ताश का पत्ता नहीं होती हैं, उन का भी अपना वजूद होता है,’’ बोलतेबोलते आरती की आवाज गंभीर होती चली गई. इसी के साथ वह कमरे की ओर मुड़ गई.

‘‘इस तरह का हिम्मत से भरा फैसला हर औरत नहीं ले सकती,’’ बाहर खड़ी भीड़ में से किसी ने कहा.

Holi 2024 सतरंगी रंग: कैसा था पायल का जीवन- भाग 1

पायल ने उस दिन सुबह से ही घर में हंगामा खड़ा कर रखा था. वह तेजतेज चिल्ला कर बोले जा रही थी, ‘‘भाई को बचपन से इंगलिश के प्राइवेट स्कूल में पढ़ाया है. चलो, मु झे हिंदी मीडियम में पढ़ाया तो कोई बात नहीं, लेकिन अब मैं जो करना चाहती हूं, सब कान खोल कर सुन लो, वह मैं कर के ही रहूंगी.’’

‘‘मगर, तू ठहरी लड़की. तु झे यहीं रह कर जो करना है कर, वह ठहरा लड़का,’’ दादी की यह बात सुन कर पायल उन्हें चुप कराते हुए बोली, ‘‘दादी, आप तो चुप ही रहिए. जमाना कहां से कहां चला गया और आप की घिसीपिटी सोच अभी तक नहीं बदली.’’

पायल एकबारगी दादी को इतना सब बोल तो गई, पर अचानक उसे लगा कि उस ने दादी को कुछ ज्यादा ही बोल दिया है, इसलिए वह मन में पछतावा करते हुए दादी के गले में हाथ डाल कर बोली, ‘‘अरे मेरी प्यारी दादी, सौरी,’’ फिर उस ने अपने दोनों कान पकड़ लिए थे.

दादी के गाल सहलाते हुए पायल बोली, ‘‘जमाना बहुत बदल गया है दादी. अब लड़कियां वे सब काम कर रही हैं, जो पहले सिर्फ लड़के करते थे. दादी, आज हम सब को भी अपनी सोच बदलने की जरूरत है.’’

गांव में कहीं भी कोई भी रूढि़वादी बातें करता, तो पायल उस से उल झ जाती. कई बार तो घर में ही किसी न किसी से किसी न किसी बात पर उस की कहासुनी हो जाती.

इस के बाद पायल अपने होस्टल चली गई. वहां वह अपनी 12वीं जमात की तैयारी में जुटी हुई थी. कुछ महीने बाद ही उस के इम्तिहान शुरू होने वाले थे. उस दिन वह बैठीबैठी सोच रही थी, ‘मैं अपनी जिद पर इतनी दूर पढ़ने आई हूं. मम्मीपापा ने मु झ पर भरोसा कर के ही परदेश में पढ़ने भेजा है. मु झे कुछ तो ऐसा कर के दिखाना चाहिए, जिस से मेरे मम्मीपापा का सिर गर्व से ऊंचा हो सके,’ अभी वह यह सब सोच ही रही थी कि उस के घर से फोन आ गया. उस ने  झट से मोबाइल उठाया और बोल उठी, ‘‘मैं अभी आप सब को याद ही कर रही थी.’’

पर यह क्या, उधर से तो कोई और ही बोल रहा था. किसी अनजान शख्स की आवाज सुन कर पायल घबरा गई.

‘‘अरे, आप कौन बोल रहे हैं?’’ उस के इतना पूछने पर उधर से आवाज आई, ‘हम तुम्हारे पड़ोसी मदन चाचा बोल रहे हैं. तुम्हारी मम्मी की तबीयत ज्यादा खराब हो गई है, तुम तुरंत यहां आ जाओ.’

पायल घबराते हुए मदन चाचा से पूछ बैठी, ‘‘आखिर हुआ क्या है मेरी मां को?’’

जवाब में मदन चाचा ने बस इतना ही कहा, ‘अरे बिटिया, तुम बस जल्दी से घर आ जाओ.’

पायल फिर कुछ परेशान सा होते हुए बोली, ‘‘चाचा, मेरी पापा से बात तो कराओ.’’

इस पर मदन चाचा ने कहा, ‘पापा अभी यहां नहीं हैं. वे डाक्टर साहब को लेने गए हैं.’

मोबाइल फोन अपनी जेब में रखते हुए पायल ने जल्दी से बैग में 3-4 जोड़ी कपड़े डाले और फटाफट चल पड़ी रेलवे स्टेशन की ओर. उस के मन में तरहतरह की बातें आ रही थीं. रास्ते में वह थोड़ीथोड़ी देर में अपने पापा व चाचा के मोबाइल पर काल करती रही, पर कोई भी उस की काल नहीं उठा रहा था. इस से उस के मन की बेचैनी और भी बढ़ती जा रही थी.

घर के दरवाजे पर काफी भीड़ देख कर पायल की बेचैनी और भी बढ़ गई. वह आपे से बाहर हो गई. उस के कदमों की रफ्तार और भी तेज हो गई. वह एक ही सांस में अपने घर तक पहुंच गई.

पायल ने देखा कि उस की मां को जमीन पर लिटा कर रखा गया था. उन के चारों ओर गांव की कई औरतें बैठी हुई थीं.

इतना देखते ही वह दहाड़ें मारमार कर रोने लगी. वह अपनी दादी से चिपक कर फूटफूट कर रो पड़ी. वह उन से पूछती जाती, ‘‘मां को क्या हो गया… मेरी मां कहां चली गईं मु झे छोड़ कर.’’

पायल दादी के सामने सवालों की  झड़ी लगाती चली जा रही थी, पर दादी के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं था.

रूपा चाची ने पायल को चुप कराते हुए कहा, ‘‘चुप हो जा पायल बेटी,’ और फिर वे खुद भी फूटफूट कर रोने लगीं.

रूपा चाची रोतेरोते ही बोलीं, ‘‘अचानक ही सबकुछ हो गया. पता ही नहीं चला कि क्या हुआ था दीदी को. डाक्टर ने आ कर देखा तो बताया कि इन की तो सांस ही बंद हो चुकी है.’’

उस समय पायल को रहरह कर अपनी मां की सभी बातें याद आ रही थीं और रोना भी आ रहा था.

वहां मौजूद सभी औरतें आपस में बातें कर रही थीं कि पायल की मां बहुत ही सौभाग्यशाली थीं, जो वे सुहागिन हो कर अपने पति के कंधे पर सवार हो कर जाएंगी.

ये सब बातें पायल भी सुन रही थी. वह मन ही मन सोचने लगी, ‘इन औरतों को भी कुछ न कुछ बकवास करने को चाहिए. मेरी मां चली गईं और इन सब को उन के सौभाग्य की बातें सू झ रही हैं.’

थोड़ी ही देर में पायल की मां को नहलाधुला कर उन का खूब साजशृंगार किया गया और फिर उन्हें श्मशान घाट ले जाया गया.

मां की मौत के कुछ दिनों बाद से ही पायल के रिश्तेदारों ने उस की दादी से कहना शुरू कर दिया कि अभी सुकेश की उम्र ही क्या है? अभी तो 45 भी पार नहीं किया है उस ने और यह सब हो गया. वह अकेले बेचारा कैसे गुजारेगा अपनी इतनी लंबी जिंदगी? अब उस की दूसरी शादी कर देनी चाहिए.

पायल की दादी को भी लगने लगा था कि सभी ठीक ही तो कह रहे हैं. पायल से भी अपने पापा की उदासी देखी नहीं जा रही थी.

पायल कुछ दिन घर में रह कर होस्टल वापस चली गई. वहां जा कर वह इम्तिहानों की तैयारी में जुट गई.

कुछ महीने बाद ही दादी ने एक बड़ी उम्र की लड़की देख कर पायल के पापा की शादी तय कर दी. शादी की सूचना पायल को भी भेज दी गई.

पायल को जब यह खबर मिली तो वह खुश हुई और सोचने लगी कि मां के जाने के बाद पापा सचमुच अकेले हो गए थे. अब दूसरी शादी हो जाने से उन का अकेलापन दूर हो जाएगा.

पायल इम्तिहान दे कर शादी के समय घर आ गई. उस के पापा की शादी सारे रस्मोरिवाज के साथ बड़ी धूमधाम से हुई. घर में नई दुलहन का स्वागत भी बड़े जोरशोर से हुआ. पायल खुश थी, क्योंकि वह नए खयालों वाली लड़की थी. उसे घिसेपिटे रीतिरिवाज और रूढि़यों से चिढ़ थी.

कुछ समय बाद पायल फिर से अपने होस्टल वापस चली गई और वहां जा कर अपनी पढ़ाई में मसरूफ हो गई.

पर यह क्या, अभी कुछ महीने ही बीते होंगे कि अचानक एक दिन पायल के पास घर से फोन आ गया. पता चला कि उस के चाचाजी सख्त बीमार हैं. उसे जल्द घर आने को कहा गया.

चाचाजी की बीमारी की खबर सुनते ही पायल के दिमाग में तरहतरह के खयाल आने लगे. वह सोचने लगी, ‘अब चाचाजी को क्या हुआ? अभी तो मैं उन्हें अच्छाखासा छोड़ कर आई थी.’

पायल मन में उल झन लिए होस्टल से निकल कर रेलवे स्टेशन पहुंची, फिर बस पकड़ कर अपने गांव पहुंची. आज फिर उस ने दूर से दरवाजे पर भीड़ लगी देखी, तो किसी अनहोनी के डर से?घबरा गई. जब वह घर के नजदीक पहुंची तो उस ने देखा कि उस के मदन चाचा की लाश जमीन पर रखी थी और उस की चाची दहाड़ें मारमार कर रो रही थीं.

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