चुग गई खेत : बाप जातेजाते बेटे को बना गया भिखारी

राम कुमार काफी देर से बहू मालती को बारबार कह रहा था कि उसे बड़े जोरों की भूख लगी है. खाली पेट उस की जान निकली जा रही है.

मालती पहले तो कपड़े धोने का बहाना बनाती रही, फिर पड़ोस की धन्नो मौसी अपना समय गुजारने के लिए उस के पास आ बैठी.

धन्नो मौसी गांव में दाई का काम करती थी. वह जवान औरतों और मनचली लड़कियों के नाजायज संबंधों की भी पूरी जानकारी रखती थी.

इस समय भी धन्नो मौसी किसी औरत के अपने जेठ से नाजायज संबंधों की रसीली दास्तान मिर्चमसाला लगा कर मालती को सुना रही थी.

मालती भी अपने भूखे ससुर की जरूरत को अंगूठा दिखाते हुए धन्नो मौसी की बेहूदा बातें चटखारे ले कर सुन रही थी.

जिस्मानी संबंधों की दास्तान सुन कर मालती अपनी सैक्स भावनाओं को भड़का रही थी.

मालती का पति नरपाल सुबह से किसी काम से शहर गया था. उस के पास जो जमीन थी, उसे किसी को बंटाई पर दे रखा था. फसल तैयार होने पर वह आधी फसल लेता था.

मालती की शादी को 5 साल हो चुके थे, पर अभी तक बच्चा नहीं हुआ था. इस के बावजूद नरपाल दिनरात मालती की जवानी में ही खोया रहता था. मेहनत कर के रुपयापैसा कमाना उस की आदत में नहीं था. बाप की जमीन से जो कमाई होती थी, उसी को खा रहा था.

राम कुमार बारबार समझाता था कि खेतों को बंटाई पर देने के बजाय खुद मेहनत करे, मगर नरपाल ने बाप की सीख पर ध्यान नहीं दिया. उसे तो हर तरफ मालती की मचलती जवानी नजर आती थी.

राम कुमार की उम्र 55 साल की हो चुकी थी. उस की पत्नी को मरे 10 साल हो चुके थे.

पत्नी का अचानक साथ छोड़ जाना, बेटे की लापरवाही व निकम्मेपन ने उसे परेशान कर दिया था. इसी परेशानी, तनाव व घर में आएदिन क्लेश के चलते वह लकवे का शिकार हो गया था.

राम कुमार अपने छोटेछोटे कामों के लिए दूसरों का मुहताज हो गया था. नरपाल तो अपने बाप की तरफ जरा भी ध्यान नहीं देता था.

राम कुमार ने नरपाल की शादी यह सोच कर की थी कि बेटा नहीं तो बहू ही उस की देखभाल करेगी. मगर उस की उम्मीदों पर पानी फिर गया.

लाचार और बेबस राम कुमार काफी देर तक गिड़गिड़ाता रहा कि दोपहर को खाना बना दे, उसे भूख लगी है. मगर मालती जानबूझ कर उस की फरियाद को अनसुना करती रही.

‘‘अरे बहू, अगर खाना नहीं बनाती, तो एक गिलास पानी ही दे दे. क्यों मुझे भूखाप्यासा मारने पर तुली है?’’ राम कुमार की आवाज भर्रा उठी थी.

‘‘अरे मालती, तुम्हारा ससुर तो तुम्हें दो घड़ी आराम से बैठने नहीं देगा. बेचारे की प्यास बुझ, मैं चली अपने घर. यहां बैठना तो मुश्किल हो रहा है,’’ हाथ नचाते हुए धन्नो मौसी चली गई.

‘‘इस बूढ़े ने तो नाक में दम कर दिया है,’’ मालती पैर पटकते हुए रसोईघर में गई और पानी का लोटा राम कुमार के सामने मेज पर रख दिया. पानी रख कर वह बड़बड़ाते हुए दूसरे कमरे में जा कर लेट गई.

पानी देखा, तो राम कुमार के मुरझाए चेहरे पर चमक आ गई. उस ने थोड़ा झाक कर हाथ बढ़ाया, तो पानी के लोटे तक हाथ पहुंच तो गया, मगर आधे जिस्म से अपना संतुलन नहीं बना पाया.

पानी का लोटा हाथ में न आने की वजह से मेज पर ही लुढ़क गया और सारा पानी मेज पर बिखर गया.

अपनी बेबसी और बहू की लापरवाही पर राम कुमार रो पड़ा. लाचार बूढ़े की सिसकियां घर में मातम और अनहोनी का माहौल पैदा कर रही थीं. कमरे में पानी बिखरने पर बिगड़ी मालती छाती पर हाथ मारते हुए ससुर को कोसने लगी.

घर में शोर सुन कर पड़ोस में रहने वाली एक 40 साला विधवा विमला आ गई. पड़ोस की औरतें और बच्चे भी वहां जमा हो गए.

फर्श पर बिखरा पानी देख कर विमला समझ गई कि माजरा क्या है. उस ने फौरन अपने घर से पानी ला कर राम कुमार को पिलाया, तो मालती उस के पीछे पड़ गई और आरोप लगा दिया कि बूढ़े के विमला के साथ नाजायज संबंध हैं.

यह सुन कर बेचारी विधवा विमला अपने घर चली गई. वह अपनी बदनामी से परेशान हो गई थी. शाम को नरपाल जैसे ही घर आया, कुछ औरतों ने मालती की शिकायत की कि वह उस के अपाहिज बाप पर जुल्म कर रही है. आज तो उस ने ससुर को सारा दिन खाना भी नहीं दिया.

महल्ले की औरतों की बातें सुन कर नरपाल का जमीर जागा. वह घर में घुसते ही मालती पर बरस पड़ा.

पति के बदले तेवर देख कर मोटेमोटे आंसू बहाती हुई मालती ससुर पर गलत आरोप लगाने लगी कि इस घर में रह कर अपनी बेइज्जती नहीं कराएगी. घर में अपने बाप को रखे या उसे. जब तक वह अपने बाप को घर से नहीं निकालेगा, तब तक वह लौट कर नहीं आएगी.

ऐसा सुन कर नरपाल नरम पड़ गया, मगर मालती अपनी जिद पर अड़ गई थी. उस ने पति की बात नहीं मानी और कंधे पर बैग उठाए आटोरिकशे में बैठ कर बसअड्डे पहुंच गई.

नरपाल ने तो यह सोच कर मालती को धमकाया था कि उसे अपनी गलती का एहसास होगा, मगर यहां तो पासा ही पलट गया था.

नरपाल भी बस में बैठा और मालती को मनाने ससुराल चला गया. वहां पहुंच कर मालती से माफी मांगते हुए घर चलने को कहा, तो नरपाल की सास ने बेटी का पक्ष लेते हुए कहा, ‘‘देखो दामादजी, मेरी बेटी को आप का बाप तंग करता है. जब तक वह जिंदा है, तब तक मालती वहां नहीं जाएगी.’’

‘‘मगर मांजी, मैं तो मालती के बगैर एक रात भी अकेला नहीं रह सकता. मालती में तो मेरी जान अटकी है,’’ नरपाल ने मालती का हाथ थाम कर अपनी दीवानगी जाहिर की.

सास मन ही मन खुश हुई. उसे लगा कि बेटी ने नरपाल को अपने रंगरूप का दीवाना बना रखा है. अब तो बूढ़ा जल्दी ही मरेगा. तब उस की बेटी अपने घर में मजे से रहेगी.

उस ने नरपाल से कहा, ‘‘अगर ऐसा है, तो तुम भी यहां रहने आ जाओ. तब तो दोनों की समस्या ही खत्म हो जाएगी.’’

नरपाल भी तो यही चाहता था. इधर मालती का छोटा भाई कालेज जाने लगा था. बापू के साथ खेतों में काम करने वाले आदमी की जरूरत थी. नरपाल ने वह कमी पूरी कर दी थी.

रात के 10 बजने को थे. अपाहिज राम कुमार आंसू बहा रहा था. उसे लगा कि बुरे समय में बहू ने तो साथ छोड़ा, अपना पैदा किया बेटा भी उसे भूल गया.

अचानक राम कुमार के जेहन में खयाल आया. उस ने मेज पर टेबल फैन चलता देखा. उस ने माचिस की तीली जला कर तार को जला दिया. तार जलने से चिनगारियां निकलीं, तो उस ने तार को पकड़ कर अपनेआप को फर्श पर गिरा लिया.

तभी एक दर्दनाक चीख कमरे में गूंजी. बिजली के तार ने राम कुमार को दूर झटक दिया. वह गेंद की तरह लुढ़कता हुआ कमरे की दीवार से जा टकराया और बेहोश हो गया.

किसी के चीखने की आवाज सुन कर पड़ोस में रहने वाली विधवा विमला भागी आई. वह राम कुमार को बेहोश देख कर सहम गई. उसे लगा कि कहीं बूढ़ा मर गया, तो उस के सिर पर हत्या का आरोप न लग जाए.

विमला ने गौर से देखा. राम कुमार की सांसें चल रही थीं. उस ने सीने पर हाथ रख के देखा, तो दिल धड़क रहा था. वह फौरन दूसरी गली में रहने वाले डाक्टर को बुला लाई.

डाक्टर ने बेहोशी हटाने का टीका लगाया, तो राम कुमार को होश आ गया. होश में आते ही उस ने उठने की कोशिश की, तो वह अपनेआप उठ खड़ा हुआ और खुशी के मारे चीख उठा, ‘‘डाक्टर साहब, मैं खड़ा हो सकता हूं… मेरे हाथ और पैर में जान आ गई है.’’

डाक्टर के पूछने पर राम कुमार ने बिजली के करंट लगने की बात बताई.

डाक्टर ने चैकअप कर के बताया, ‘‘बिजली का करंट लगने से तुम्हारे जिस्म का जो आधा हिस्सा बेकार हो गया था, अब उस में जान आ गई है. अगर सही समय पर दवा दी जाए, तो तुम 5-10 दिनों में ठीक हो सकते हो.’’

यह सुन कर राम कुमार के चेहरे पर खुशी उभर आई.

‘‘आप दवा दीजिए डाक्टर साहब, इन के बेटाबहू तो यहां पर हैं नहीं, फिर भी इनसानियत के नाते मैं इन की देखभाल करूंगी,’’ विमला ने मदद करने का भरोसा दिया.

डाक्टर दवाएं दे कर चला गया. विमला ने राम कुमार को हलका खाना बना कर खिलाया और दवा दे कर अपने घर चली गई.

4-5 दिन गुजर गए थे. विमला राम कुमार को सुबहशाम दवा देती, खाना बना कर खिलाती. वह धीरेधीरे अच्छा होने लगा.

राम कुमार मन ही मन विमला का एहसानमंद था. मगर गांव के कुछ लोगों ने नीची जाति की विमला के ऊंची जाति के जमींदार के घर के रसोईघर में खाना बना कर खिलाने पर नाराजगी जताई.

गांव में पंचायत हुई कि विमला को सजा के रूप में गांव से निकाल दिया जाए.

यह खबर राम कुमार को लगी, तो उस ने फौरन विमला को बुला कर पूछा, ‘‘गांव वाले तुझे भलाई करने की सजा देना चाहते हैं. मगर मेरी मजबूरी किसी ने नहीं देखी. क्या तुम गांव छोड़ कर चली जाओगी?’’

‘‘अगर मेरी मदद करने कोई नहीं आया, तो मैं गांव छोड़ दूंगी,’’ विमला ने मायूस होते हुए कहा.

‘‘ठीक है, तुम ने मुझे नई जिंदगी दी है. मेरे बेटाबहू तो मुझे मरने के लिए छोड़ गए थे. तुम भाग कर कहीं मत जाओ, दुनिया का मुंह बंद करने के लिए मेरे पास एक हथियार है,’’ राम कुमार ने कहा, तो विमला के मायूस चेहरे पर उम्मीद की रेखा उभरी.

‘‘ऐसा कौन सा रास्ता है आप के सामने, जिस से गांव वाले चुप हो जाएंगे?’’

‘‘हम अभी चल कर शादी कर लेते हैं. औरत की कोई जाति नहीं होती. मेरी पत्नी बन कर तुम भी मेरे समान हो जाओगी. फिर देखूंगा एक अच्छे इनसान को दुनिया परेशान कैसे करती है?’’ कहते हुए राम कुमार ने विमला का हाथ थाम लिया.

‘‘लेकिन, बेटाबहू भी तो आप के खिलाफ हो जाएंगे,’’ विमला ने अपना डर जताया.

‘‘मुझे ऐसे बेटाबहू की परवाह नहीं है,’’ राम कुमार ने कहा और कुछ दिनों बाद शादी कर के विमला को बीवी का दर्जा दे दिया.

गांव वाले फिर भी नहीं माने. अब तो वे किसी भी हालत में राम कुमार को भी गांव से निकालने पर आमादा हो गए.

राम कुमार ने भी गांव छोड़ना ही मुनासिब समझ. वह अपनी जमीन और घरबार बेच कर सारा रुपयापैसा समेट कर किसी अजनबी शहर में जा बसा, जहां कोई भी उसे नहीं जानता था.

नरपाल और मालती को खबर लगी, तो वे भागे आए. गांव में तो सबकुछ लुट चुका था. न जमीन, न घरबार. बाप जातेजाते अपने बेटे को भिखारी बना गया था.

जाएं तो जाएं कहां : चार कैदियों का दर्द -भाग 4

अनुपम को हैरानी हुई कि उस के नाम किसी ने चिट्ठी लिखी है. जेल में आने वाली चिट्ठियों को जेलर के पास से हो कर गुजरना पड़ता था. उसे पहले खोल कर पढ़ा जाता, फिर चिट्ठी दी जाती. चिट्ठी खुली थी. जेल के गार्ड ने चिट्ठी ला कर अनुपम को दी.

अनुपम ने चिट्ठी खोल कर पढ़ी:

‘प्रिय पतिदेव,

‘चरण स्पर्श,

‘पता चला है कि आप आतंकवाद के आरोप में दिल्ली जेल में हैं. सो, चिट्ठी लिखने का सौभाग्य मिला. मैं ठीक हूं. दोनों बेटियां साथ में?हैं. हम इस समय जम्मू शरणार्थी शिविर में हैं. कुछ समय बाद ही कश्मीर में आतंकवादियों ने फिर से पैर पसार लिए थे. उन का खुला आदेश?था कि हिंदू घाटी छोड़ दें, वरना मारे जाएंगे.

‘जब हिंदुओं की दिनदहाड़े हत्याएं होने लगीं, तो सभी हिंदू मौका मिलते ही अपना घर छोड़ कर भाग गए. आसपड़ोस के मुसलिम परिवारों ने कहा भी कि आप लोग मत जाइए. लेकिन बंदूक के सामने किस का जोर चलता?है. बाद में उन्होंने ही कहा कि अभी आप लोग चले जाइए. माहौल ठीक होते ही आ जाना.

‘काफी समय बीत गया, लेकिन कोई भी जाने को तैयार नहीं है. राहत केंद्रों से ही लोग दिल्ली जैसे शहरों की तरफ बढ़ने लगे हैं, रोजगार की तलाश में. नए मकान की तलाश में.

‘मैं जम्मू में ही रह कर दूसरों के घरों में बरतनझाड़ू का काम कर के जैसेतैसे दोनों बेटियों की खातिर जी रही हूं. आप से मिलने दिल्ली आना नहीं हो पा रहा है.

‘मैं ने एक वकील से बात की है. वह आप का केस लड़ने को तैयार है. वह भी कश्मीरी पंडित?है. हमारे दर्द को समझता है. बिना पैसे के इनसानियत के नाम पर वह केस लड़ने को राजी है. हम जल्दी मिलेंगे.

‘आप के इंतजार में.

‘आप की मनोरमा.’

चिट्ठी पढ़ कर अनुपम की आंखों में आंसू आ गए. खुशी के आंसू. आंसू अपनों के मिलने के. चारों कैदी रसोई वाले बैरक में बैठे थे. अनुपम ने बाकी तीनों को बताया. वे खुश हो गए.

‘‘किसी ने ठीक ही कहा है कि एक दरवाजा बंद होता है, तो दूसरा खुल जाता है,’’ अनुपम ने कहा.

‘‘हां, और किसी के लिए सारे दरवाजे बंद कर देता है. किसीकिसी की जिंदगी में उजाला होता ही नहीं है,’’ बिशनलाल ने कहा. जमानत खारिज होने से वह उदास था.

‘‘हम तो भटके हुए राही हैं. राजनीति के शिकार. हम जाएं तो जाएं कहां? हम जैसों का न कोई देश है, न घर,’’ चांद मोहम्मद ने कहा.

‘‘आप लोग अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारते हैं,’’ राकेश ने कहा.

‘‘हां, तुम ठीक कहते हो. बलि के बकरे हैं हम. कटने के ही काम आते हैं…’’ चांद मोहम्मद ने उदास लहजे में कहा, ‘‘हमारे अपने ही लोग हमारे दुश्मन हैं, तो…’’

माहौल फिर बोझिल हो गया. चारों लेट कर नींद के आने का इंतजार करने लगे.

‘‘यहां पर कितनी गंदगी है. जेल प्रशासन भी साफसफाई का बिलकुल खयाल नहीं रखता,’’ अनुपम ने कहा.

‘‘यही आदमी बाहर की दुनिया में भी कहता है. गंदगी खुद करता है और कुसूर सरकार को देता है. बाहर भी आबादी जरूरत से ज्यादा है और अंदर भी. हमें इस का ध्यान खुद रखना होगा,’’ चांद मोहम्मद ने कहा.

‘‘सब को ध्यान रखना चाहिए. हम अकेले क्या कर सकते हैं’’ राकेश ने कहा.

‘‘हम यह चाहते हैं कि पानगुटका खा कर थूकें हम और सफाई सरकार करे. शौचालय की गंदगी के लिए भी हम सरकार को दोष देंगे. अंदरबाहर सब जगह एक सा हाल है,’’ बिशनलाल ने कहा.

‘‘अफसरमुलाजिम सिर्फ घूस खाएं, मुनाफा कमाएं, हमें इस्तेमाल करें और हमारे हिस्से में आए सिर्फ मेहतरी,’’ अनुपम ने मुंह बनाते हुए कहा.

‘‘खैर छोड़ो… हां भाई राकेश, तुम सुनाओ. इतना बड़ा केस तो है नहीं तुम्हारा, फिर तुम्हारी जमानत क्यों नहीं हो पा रही है?’’ चांद मोहम्मद ने पूछा.

‘‘जमानत के लिए वकील चाहिए. जमानत मंजूर होने के बाद जमानतदार चाहिए. उस सब के लिए पैसा चाहिए. पैसा है नहीं मेरे पास.

‘‘फिर बाहर जा कर हमें करना क्या है? बेरोजगारी से कौन लड़ेगा? पैसे कहां से आएंगे? फिर समाज की हंसी भी बरदाश्त करनी पड़ेगी. घर वालों को लाख दफा मना किया था, लेकिन माने नहीं. खुद भी भुगत रहे हैं और हमें भी भुगतवा रहे हैं,’’ राकेश ने कहा.

‘‘हुआ क्या था?’’ अनुपम ने पूछा.

‘‘नौकरी मिली नहीं. न रिश्वत देने के लिए पैसे थे और न ही कोई सरकारी कोटा. घर के लोगों की सारी उम्मीदें मुझ से थीं. मैं यूपीएससी की तैयारी के लिए दिल्ली गया, लेकिन कुछ हो न सका.

‘‘एक मुसलिम लड़की के प्यार में दीवाना हुआ, तो उस के घर वालों ने फतवा जारी कर दिया. पढ़ाईलिखाई एक तरफ रह गई. मेरी जान के लाले पड़ गए. शादी के लिए मंदिर तक पहुंच गए. ऐन वक्त पर लड़की के परिवार वाले वहां आ गए.

‘‘लड़की अपने परिवार का विरोध न कर सकी. मुझे मारापीटा गया. पुलिस को घूस खिला कर 4 दिन तक थाने में बंद रख कर थर्ड डिगरी दी गई.

‘‘जब मैं बाहर आया, तो दोस्तों से पता चला कि प्रेमिका की शादी दुबई में जा कर करवा दी गई. मैं घर पहुंचा तो पिता के सपने चकनाचूर करने का मुझे कुसूरवार करार दिया गया.

‘‘रोजरोज के तानों से तंग आ कर मैं काम की तलाश में मुंबई चला आया. कुछ दिन भटकने के बाद मैं आटोरिकशा चलाने लगा.

‘‘कुछ दिन बीते थे कि हिंदीमराठी झगड़ा शुरू हो गया. उत्तरभारतीयों खासकर बिहारियों के आटोरिकशे जला दिए गए. तोड़फोड़ की गई. मराठी नेता ने मुंबई छोड़ो अभियान छेड़ दिया. उन के अभियान में मैं भी फंस गया. मारपीट कर मुझे पटना जाने वाली ट्रेन में ठूंस दिया गया.

‘‘घर आया तो मातापिता को लगा कि लड़के की शादी कर दी जाए. मैं ने लाख समझाया कि अभी मुझे कुछ कर लेने दो, कुछ बन जाने दो.

‘‘पिताजी ने गुस्से से कहा, ‘तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता. तुम कुछ नहीं बन सकते. शादी करो और हमें जिम्मेदारी से मुक्त करो.’

‘‘पिताजी चाहते थे कि हमारी जाति में शादी हो जाए. दहेज में जो रकम मिलेगी, उस से मेरे लिए छोटीमोटी दुकान खोल देंगे.

‘‘शादी की रात पत्नी ने कहा, ‘मैं किसी और से प्यार करती हूं. मुझे हाथ मत लगाना.’

‘‘मेरे सारे अरमान ठंडे पड़ गए. मैं ने पूछा भी कि फिर मुझ से शादी क्यों की? मेरी जिंदगी क्यों बरबाद की? पता नहीं, क्या हुआ, शादी की पहली ही रात दुलहन ने जहर खा लिया.

‘‘अस्पताल में दुलहन तो बच गई, लेकिन उस के कहने पर दहेज के लिए सताने और उसे खुदकुशी के लिए उकसाने का केस बना. पूरा परिवार अंदर. बूढ़े मातापिता, जवान बहन.

‘‘बड़ी मुश्किल से एकएक कर के मातापिता और बहन की जमानत हुई. चाचा और मामा ने दलालों को पैसा दे कर जमानतदार दिलवाए.

‘‘मैं हर तरफ से टूट चुका था. उस पर पिताजी का गुस्सा. एक बार मिलने आए तो उन्होंने कहा कि हम कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहे. हम यह शहर छोड़ कर जा रहे?हैं. जब हमारे पास पैसे होंगे तो जमानत करवा लेंगे, अब सिर्फ पेशी में आएंगे.

‘‘पिताजी परिवार को ले कर बनारस चले गए. चाचा बनारस में नौकरी करते थे. उन्होंने पिताजी को एक प्राइवेट कंपनी में चौकीदार की नौकरी दिलवा दी. 4-5 हजार रुपए महीने की तनख्वाह में घर चलाएं या केस लड़ने के लिए पैसा दें, मेरी जमानत कराएं. बहन की शादी करना भी जरूरी है. पेशी में मां और बहन से कोर्ट में मुलाकात हुई.

‘‘मां ने रोते हुए कहा, ‘हम तुम्हारी जमानत कराने की कोशिश में लगे हैं. यहां से तो जमानत अर्जी खारिज हो गई. हाईकोर्ट से तुम्हारी जमानत हो जाएगी. लेकिन अभी पैसों की तंगी है.’

‘‘मैं ने मां से कहा, ‘क्या करूंगा बाहर आ कर मैं? अंदर ही?ठीक हूं. मेरी जमानत की कोशिश मत करना.’’’

माहौल में फिर उमस सी भर आई.

बिशनलाल ने कहा, ‘‘न तो जमीन अपनी, न ही जंगल अपना. पुलिस कारोबारी, माओवादी सब दुश्मन अपने. जाएं तो जाएं कहां?’’

चांद मोहम्मद ने अपने इर्दगिर्द भिनभिना रहे मच्छर को मारते हुए कहा, ‘‘वतन हो कर बेवतन. मजहब के बकरे हैं हम. जाएं तो जाएं कहां?’’

मच्छरों से बचने के लिए अनुपम ने जगहजगह से फटी हुई चादर पैर से सिर तक ओढ़ते हुए कहा, ‘‘अपने ही देश में शरणार्थी, अपने ही घर में आतंकवादियों का शिकार और अपनी ही पुलिस से आतंकवाद का ठप्पा. मर क्यों नहीं जाते हम?’’

राकेश ने कहा, ‘‘कल होली है. मिठाई बांटने आएंगी कई समाजसेवी संस्थाएं.’’

बिशनलाल ने खड़े हो कर कहा, ‘‘भाईचारा जिंदाबाद…’’ और फौरन लेट गया.

राकेश ने हाथ को माइक बनाते हुए कहा, ‘‘सुनिए, सन्नाटे को चीरती हुई सनसनी. एक बिहारी की दर्दभरी दास्तां. प्रेमिका का निकाह दुबई में. पत्नी भाग गई प्रेमिका के संग. दहेज का लोभी, बीवी को मारने की कोशिश करने वाला यह खतरनाक शख्स राकेश कुमार जेल में…’’

इस के बाद राकेश हंसने लगा. साथ ही, यह सुन कर बाकी तीनों भी हंसने लगे. हंसतहंसते चारों की आंखों में आंसू आ गए और फिर चारों एकसाथ अपनेअपने आंसुओं को छिपाने के लिए मुंह को अपने हाथों से बंद कर लेते, लेकिन कमबख्त आंसू छलकछलक कर उन के दर्द का ब्योरा दे ही देते.

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‘‘हो सके तो कुछ दिनों के लिए मेरे साथ वक्त बिताने के लिए तुम भी बीजिंग आ जाना. आओगी तो अच्छा लगेगा मुझे, तुम्हारी मेहरबानी होगी मुझ पर,’’ शरद ने दुबई एयरपोर्ट पर मुझ से विदाई लेते हुए कहा. उन का काम के सिलसिले में देशविदेश जानाआना लगा रहता था. वे जहां भी जाते थे, उम्मीद करते कि कुछ ही दिनों के लिए ही सही, मैं भी उन्हें जौइन करूं.

‘सूरत देखी है अपनी शीशे में, मैं घर में तो तुम्हारे साथ 5 मिनट बैठना पसंद नहीं करती, फिर बीजिंग में क्या खाक करने आऊंगी. मैं तो तुम्हारे साथ उम्र काट रही हूं उम्रकैद की तरह,’ मैं ने दिल ही दिल में सुलगते हुए सोचा और शरद की बात को तवज्जुह दिए बिना कार से उन का लगेज निकालने में उन की मदद करने लगी. फिर बिना उन की तरफ देखे ही गुडबाय कर, टाइम से अपने औफिस पहुंचने के लिए कार स्टार्ट कर दी.

शेख जायद रोड ट्रैफिक से पटी हुई थी. ‘लगता है फिर औफिस के लिए देर हो जाएगी और नगमा की स्कैन करती हुई आंखें फिर से बरदाश्त करनी होंगी. क्या दोटके की जिंदगी है मेरी,’ मैं मन ही मन भन्नाई. तभी एक हौर्न की आवाज ने मेरी सोच में बाधा डाली. सामने ग्रीन लाइट हो चुकी थी. मैं ने यंत्रवत ब्रैक से पैर हटा कर कलच पर दबाव डाला. मेरी कार आगे बढ़ने लगी और मेरी सोच भी.

इंडिया में मेरे भैया सोचते हैं कि मेरी झोली चांदसितारों से भरी हुई है. उन्हें क्या पता कि हालात मुझे न्यूट्रौन में बदल चुके हैं, न कोई खुशी न गम. जी रही हूं एक उदासीन सी जिंदगी क्योंकि हाथ में उम्र की लंबी सी लकीर ले कर पैदा हुई हूं. ढो रही हूं नीम पर चढ़े हुए करेले सी कड़वी बेनूर, अनचाही शादी को.

‘‘कुछ खोईखोई सी हैं आप आज,’’ औफिस पहुंचते ही नगमा ने आदतानुसार कटाक्ष किया.

‘‘तुम्हें तो पता है कि मैं शौकिया तौर पर शायरी लिखती हूं, इसलिए सोचते रहना मेरा काम है. सोचूंगी नहीं तो लिखूंगी कैसे,’’ मैं ने स्थिति संभालते हुए सफाई पेश की.

‘‘आज तो तुम्हारा चेहरा कोई औटोबायोग्राफिकल शेर सुनाता सा लग रहा है. ऐसा लग रहा है कि किसी ने तुम्हारे दिल की तनहाइयों में पत्थर फेंक कर वहां उथलपुथल मचा दी हो.’’

‘‘आप भी कौन सी कम हैं, दूसरों की जिंदगी में हस्तक्षेप करकर के उन की जिंदगी की खामियों के नगमें दुनिया में गागा कर अपना नाम सार्थक करती रहती हैं,’’ मैं ने नहले पर दहला मारा क्योंकि मैं जानती थी कि सीधी भाषा नगमा को समझ में नहीं आती है.

‘‘तुम जानो, तुम्हारा काम जाने. मेरे पास भी फालतू वक्त नहीं है तुम्हारे जैसों पर जाया करने के लिए,’’ नगमा खिसियाई बिल्ली सी मुझे अकेला छोड़ कर चली गई. दिन काम की व्यस्तताओं में गुजर गया. शाम का इंतजार करने की जरूरत नहीं हुई. सीधे घर जाने की इच्छा नहीं हो रही थी, घर जा कर कौन से गीत गाऊंगी. वही रोज का बेनूर रूटीन- खाना बनाओ, डिशवाशर लोड करो, डिनर कर के किचन साफ करो और फिर नहाधो कर बैडरूम में एक बोरियतभरी रात काटो.

मन ज्यादा दुखी होता तो यूट्यूब पर सफल प्रेमकहानियां देख कर खुश होने की नाकाम कोशिश कर लेती. इन प्रेमकहानियों में अपने होने की कल्पना करती. और काल्पनिक ही सही, पर कुछ पल प्यार से जीने की कोशिश करती. फिर याद आया कि शरद तो हैं ही नहीं, इसलिए आज रास्ते में ही कुछ खा कर चलती हूं. अकेले अपने लिए क्या पूरी कुकिंग करने की तकलीफ उठानी.

वर्ल्ड ट्रेड सैंटर स्थित जेपेनगो कैफे में मैंगू स्मूदी के घूंट भरते हुए अनमने मन से सामने पड़े हुए अखबार के पन्ने आखिरी पेज की तरफ से पलटने लगी. जब से नौकरी ढूंढ़नी शुरू की थी, अखबार को आखिरी पेज की तरफ से पलटने की आदत पड़ गई थी. नौकरी तो करीब सालभर पहले मिल गई थी मगर आदत आज भी वैसी की वैसी बनी हुई है.

डिनर करने के बाद भी सीधे घर जाने की इच्छा नहीं हो रही थी. औफिस के बाद आसपास की फ्लोरिस्ट शौप में यों ही चक्कर लगाना मुझे अच्छा लगता था. आज मैं फिर से वहां फूलों को निहारने के लिए पहुंच गई.

फूलों को देखतेदेखते अचानक मुझे महसूस हुआ कि आंखों की कोरों से मैं ने किसी जानेपहचाने चेहरे को आसपास देखा है. कोई ऐसा चेहरा जो पहले कभी मेरे बहुत करीब रहा है. मैं तुरंत ही फ्लोरिस्ट शौप से बाहर निकल आई. मैं ने चारों ओर नजर घुमा कर देखा. मगर दूरदूर तक कोई भी परिचित चेहरा नजर न आया. शायद मुझे कोई गलतफहमी हुई है. यह सोचती हुई मैं कार पार्किंग की ओर बढ़ने लगी, तो देखा कि टैक्सीस्टैंड पर जोसफीन खड़ी थी.

जोसफीन यहां और वह भी ब्राइन के बिना, यह कैसे संभव है. हैरान सी मैं लपक कर उस की तरफ भागी. मुझे देख कर जोसफीन उत्साह से भर कर मेरे गले लग गई. परिचित मुसकराहट से सराबोर उस का चेहरा कई वर्षों के बाद देखने को मिल रहा था.

‘‘इन से मिलो, ये हैं मेरे नए पार्टनर जैकब,’’ जोसफीन ने अपने साथ खड़े आदमी की तरफ इशारा करते हुए कहा.

‘‘पार्टनर, क्या मतलब? तुम्हारी और ब्राइन की कंपनी में कोई पार्टनर भी हुआ करता था, ये तो तुम ने पहले कभी बताया ही नहीं,’’ मैं ने कुतूहल से पूछा.

‘‘नहींनहीं, मेरा वह मतलब नहीं है. मेरे कहने का मतलब है जैकब मेरे डी- फैक्टो पार्टनर हैं और हम लिविंग टूगेदर रिलेशन में हैं.’’

मैं ने एक गहरी नजर जैकब महाशय पर डाली. मेरे होंठ कुछ बोलने को हिले. मगर शब्द बाहर न आ सके.

आखिर जोसफीन ने ही बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘काफी समय से तुम से बातचीत नहीं हो पाई है. तुम तो बिना कुछ बताए ही सिडनी से गायब हो ली थीं. लाइफ काफी बदल चुकी है तब से. अभी हम यहां एक हफ्ते और रुकेंगे. अगर मौका मिला तो तुम्हारे साथ कौफी पीने आऊंगी. मुझे अपना फोन नंबर दे दो.’’

मैं ने ज्यादा कुछ सोचे बिना हैंडबैग से अपना कार्ड निकाल कर उस की ओर बढ़ा दिया. तभी एक टैक्सी आ गई. जोसफीन ने एक बार फिर से मुझे अपने गले लगाया और जैकब के साथ टैक्सी में बैठ कर चली गई. मैं हैरानपरेशान सी टैक्सी को अपनी आंखों से ओझल होने तक देखती रही.

ब्राइन सिडनी का जानामाना व्यक्ति था. उस की खनिज तेल और खनन कंपनी थी जो कि आस्ट्रेलिया, टर्की, अफ्रीका और अमेरिका तक फैली हुई थी. उस की रईसी उस के सिडनी के पौइंट पाइपर उपनगर स्थित निवास में ही सिमटी हुई नहीं थी, बल्कि पूरे सैलाब के साथ हर तरफ छलकीछलकी पड़ती थी. धन की अधिकता के साथसाथ उस की हर बात बड़ी थी. वह अपने धन को अपने बैंक खाते तक ही सीमित नहीं रखता था, मानवीय कामों पर भी जम कर लुटाता था. उस के नाम और काम की चर्चा शहर के कोनेकोने में इज्जत के साथ होती थी.

ब्राइन के किसी से मिलने के पहले ही उस की प्रसिद्धि उस तक पहुंच जाती. विश्वविद्यालय को रिसर्च और जरूरतमंद छात्रों की उच्चशिक्षा के लिए अनुदान देना उस के पसंदीदा लोकोपकारी काम थे.

इन तमाम मानवतावादी कामों के साथसाथ उसे अपने लिए जीना भी बखूबी आता था. वह गोताखोरी, नौकायन, पैराग्लाइडिंग का बेहद शौकीन था.

जोसफीन और ब्राइन की मुलाकातों का सिलसिला नीले आकाश के आंचल में हुआ था. जोसफीन क्वान्टाज एयरलाइंस में एयरहोस्टेस थी. और ब्राइन अपने देशविदेश में फैले हुए व्यापार के सिलसिले में ज्यादातर हवाईयात्रा करने वाला यात्री.

अपनी मुसकराहट की जादूगरी से यात्रियों की लंबीलंबी यात्राओं को सुखद बनाने वाली नीलगगन की परी सी थी जोसफीन. उस की फ्लाइट में उस की सेवा में उड़ने वाले यात्री उसे कभी न भुला पाते और अपनी हर यात्रा में उसी की सेवा में उड़ने की चाहत रखते. एक तरफ आकर्षक रूपसागर था तो दूसरी तरफ भव्य जिंदगी जीने वाला प्रभावशाली व्यापारी. दोनों ही एकदूसरे के आकर्षण से ज्यादा समय तक न बच पाए और कुछ महीनों की मुलाकातों के बाद वे एकदूसरे के हो गए.

जब मैं पहली बार जोसफीन और ब्राइन से मिली थी तब तक उन की शादी को 10 साल पूरे हो चुके थे जबकि मेरी और शरद की शादी को केवल 3 साल ही हुए थे. उन के 10 साल की शादी में भी प्यार का महासागर उमड़ पड़ता था. उन के बीच की कैमिस्ट्री को देख कर मेरे जैसों को ईर्ष्या से अछूता रहना नामुमकिन था क्योंकि मेरी 3 साल की शादी में प्यार का अकाल सदाबहार था.

शरद और मेरी हर बात, हर शौक में नौर्थ और साउथ पोल का फर्क था. जोसफीन और ब्राइन के हर शौक, हर तरीके एकजैसे थे. वे दोनों खूब शौक से साथसाथ गोताखोरी पर जाया करते थे. 3-4 साल पहले गोताखोरी के दौरान रीढ़ की हड्डी में चोट लगने से ब्राइन के शरीर का निचला हिस्सा बेकार हो गया. जिस से वह ज्यादा लंबा चलने की शक्ति गवां बैठा. मगर प्यार तो प्यार होता है. सो, यह हादसा भी उन दोनों के प्यार के महासागर से एक बूंद भी कम न कर पाया. कम करता भी कैसे, आखिर उन्होंने नीले आकाश को साक्षी मान कर उम्रभर साथ निभाने के वादे जो किए थे.

वे दोनों एकदूसरे के बने थे अपनी खुशी से, उन्हें एकदूसरे पर थोपा नहीं गया था. उन के प्यार में समर्पण था, ढोए जाने वाला सामाजिक बंधन नहीं. उन की शादी उन के प्यार की परिणति थी, महज निभाए जाने वाली रस्म नहीं. मेरी और शरद की शादी तो वह जैकपौट थी जिस में लौटरी शरद की लगी थी. मेरी स्थिति तो जुए में अपना सबकुछ हारे हुए जुआरी जैसी थी.

जब भी मैं जोसफीन और ब्राइन को साथसाथ देखती तो मेरे दिल का दर्द पूरी शिद्दत पर पहुंच जाता. मैं सोचती, काश, मेरी भी शादीशुदा जिंदगी उन की शादीशुदा जिंदगी की तरह एक परीकथा होती. मैं उन के सामने बैठ कर स्वयं को बहुत आधाअधूरा महसूस करती. जब यह बरदाश्त से बाहर हो गया तो हीनभावना से बचने के लिए मैं ने उन से किनारा करना शुरू कर दिया. उन के सामने सुखी विवाहित जीवन का झूठा आवरण ओढ़ेओढ़े मैं अब थकने लगी थी.

इस झूठे नाटक में मेरे चेहरे के भावों ने मेरा साथ देना बंद कर दिया था. मेरे दिल के दर्द की लहरें मेरे सब्र के बांध को तोड़ कर पूरे बहाव के साथ उमड़ने लगी थीं. इस सैलाब को दिल में जज्ब करना नामुमकिन होता जा रहा था. इसलिए जब शरद को दुबई में एक बेहतर जौब मिला तो मेरे दिल को एक अजब सा सुकून मिला. मेरी खुशी शरद को बेहतर जौब मिलने की वजह से कम और सिडनी को हमेशा के लिए छोड़ कर जाने की वजह से ज्यादा थी.

‘चलो, न तो यह ‘मेड फौर इच अदर’ जोड़े से सामना होगा, न ही मेरे दिल के जख्मों में टीस उठेगी.’ यह सोच कर चैन की सांस ली थी उस वक्त मैं ने, और जोसफीन को बिना बताए ही सिडनी से दुबई चली आई थी.

दुबई आ कर मैं अगले जन्म में मनचाहे हमसफर की कामना करती हुई अपनी जिंदगी की रेलगाड़ी को आगे खींचने लगी. मन लगाने के लिए मैं ने एक कंपनी में रिसैप्शनिस्ट की नौकरी कर ली थी. सोचा, न मेरे पास खाली वक्त होगा न जिंदगी की कमियों को ले कर मन को भटकने का मौका मिलेगा. अपनी व्यस्तताओं में मैं जोसफीन-ब्राइन और उन की परीकथा को भूल सी चुकी थी.

मगर आज शाम वर्ल्ड ट्रेड सैंटर में जोसफीन फिर से सामने आ गई थी. इस बार वह मुझे अपनी सहेली न लग कर, कोई पहेली सी लगी थी. जोसफीन से अचानक रूबरू होने के बाद घर वापस आने पर भी मन जोसफीन, ब्राइन, जैकब त्रिकोण में उलझा रहा. क्या ब्राइन मर चुका है? अगर नहीं तो फिर जोसफीन नए डीफैक्टो पार्टनर के साथ क्यों है? ये एकदूसरे के प्यार में सिर से पांव तक डूबे रहने वाला जोड़ा ऐसे कैसे अलग हो सकता है? कितनी कशिश थी दोनों में, क्या हुआ उस कशिश का? सोचतेसोचते मेरा सिर चकराने लगा. इस ट्रायंगल के तीनों कोणों का आकलन करतेकरते आखिर मैं निढाल हो कर सो गई.

सुबह उठी तो सिर कुछ भारी सा लग रहा था. कुछ देर यों ही बिस्तर में लेटी रही, समझ में नहीं आ रहा था कि औफिस जाऊं या नहीं. अंत में हमेशा की तरह मेरे आलस की जीत हुई. मैं ने औफिस न जाने का निश्चय कर लिया और मुंह पर चादर ढक कर थोड़ी देर ऊंघने के लिए लेट गई.

आधे घंटे में जब टैक्सट मैसेज की आवाज से आंख खुली तो मैं ने अनमने भाव से मोबाइल उठाने के लिए हाथ बढ़ाया. बेमन से मैं ने अपनी अधखुली आंखें मोबाइल पर गड़ाईं तो देखा कि जोसफीन का मैसेज आया था. वह लंच के समय मुझ से कहीं पर मिलना चाहती थी.

मैसेज देखते ही मेरी आंखें पूरी तरह से खुल गईं और मैं ने बिना एक पल गंवाए, आए हुए मैसेज के नंबर को दबा दिया. मैं जोसफीन के बारे में सबकुछ जानने को बेताब थी. मैं ने उसे बताया कि आज मैं पूरे दिन घर में ही हूं, इसलिए वह किसी भी समय मुझ से मिलने आ सकती है. पूरे उत्साह के साथ मैं नहाधो कर घर को ठीक करने में लग गई और जोसफीन निश्चित समय पर आ पहुंची.

‘‘तुम्हारे वो, मेरा मतलब है जैकब महाशय कहां रह गए?’’ मैं ने इधरउधर नजर घुमाते हुए पूछा.

‘‘जैकब को तो एक कौन्फ्रैंस में जाना था. वैसे भी हम उस के होते हुए तो खुल कर बातचीत भी नहीं कर पाते. मैं अकेले ही तुम से मिलने आना चाहती थी,’’ जोसफीन ने अपनी चिरपरिचित मुसकराहट के साथ जवाब दिया.

मैं भी कौन सा जैकब से मिलने को इच्छुक थी. मेरे मन में तो ब्राइन की खैरियत को ले कर उथलपुथल मची हुई थी कि अगर वह जोसफीन के साथ नहीं तो फिर कहां और कैसा है? एक लंबा अरसा बीत चुका था हमें मिले हुए. बहुतकुछ कहने और सुनने को था, मगर मैं अपनी तरफ से बात को कुरेदना नहीं चाहती थी. मैं ने इंतजार करना ही ठीक समझा. काफी देर इधरउधर की बातें करने के बाद आखिर ब्राउन का जिक्र आ ही गया.

‘‘मेरे और ब्राइन के तलाक को 4 साल हो चुके हैं,’’ जोसफीन ने बिना किसी संवेदना के परदाफाश किया.

‘‘4 साल मतलब, जैसे ही मैं ने सिडनी छोड़ा उस के कुछ ही समय बाद तुम दोनों अलग हो गए. मगर ऐसा कैसे हो गया? तुम्हें तो हमेशा ही इस बात का गुमान था कि ब्राइन अमेरिका में अपने सारे रिश्तेनाते छोड़ कर मीलों दूर आस्ट्रेलिया में तुम्हारे और सिर्फ तुम्हारे लिए आ कर बस गया था,’’ मैं ने एक सांस में कई सवाल दाग दिए.

‘‘तो क्या हुआ, मैं ने भी तो उस की विकलांगता को वर्षों तक झेला और अपनी जिंदगी का गोल्डन टाइम उस पर बरबाद कर दिया,’’ जोसफीन ने कहा.

‘‘बरबाद कर दिया, क्या मतलब, वह हादसा तो शादी के बाद में हुआ था और उस के बाद भी तो तुम ने उस के साथ कई साल खुशहाली के साथ बिताए… और फिर तुम ही तो कहती थीं कि हादसे तो हादसे होते हैं, उन पर किसी का वश कहां. ये कहीं भी और किसी के भी साथ हो सकते हैं और फिर यह सही बात है कि हादसे तो हादसे होते हैं,’’ मैं ने एकएक शब्द पर जोर दे कर कहा.

‘‘हां, तो, जब मैं ने ये सब कहा था तब कम से कम ब्राइन के पास एक लाइफस्टाइल, एक स्टेटस तो था,’’ वह लापरवाही के साथ बोली.

‘‘एक स्टेटस था? क्या मतलब है तुम्हारा इस ‘था’ से?’’ मेरे स्वर में अब घबराहट घुल चुकी थी.

जोसफीन ने सबकुछ शुरू से आखिर तक कुछ ऐसे बताया :

‘‘अब से करीब 8 साल पहले ब्राइन ने अपनी कंपनी को आगे बढ़ाने के लिए धातुओं के अन्वेषण, खानों की खोज आदि के लिए बैंकों और वित्तीय संस्थाओं से भारी कर्ज ले लिया था. ऐसा करने के कुछ समय के बाद दुनियाभर में खनिज तेल और लौह अयस्क की कीमतें गिरने लगीं और वित्तीय संस्थाओं ने कर्ज की वापसी के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया. दूसरी तरफ पहले से चल रहे अन्वेषण को आगे जारी रखने के लिए भी फंड की जरूरत पड़ने लगी. जिस के लिए भी वित्तीय संस्थाओं ने हाथ खड़े कर दिए. ब्राइन की कंपनी ने नई इक्विटी निकाल कर शेयर बाजार से फंड बनाने की कोशिश भी की लेकिन वह प्रयास भी असफल रहा.

‘‘अब वित्तीय संस्थान पुराने मूलधन और ब्याज की वापसी के लिए जोर डालने लगे थे. दूसरी तरफ पहले से चल रहीं अन्वेषण और खनन परियोजनाएं धन के अभाव में बंद होने लगीं.

‘‘ब्राइन ने अन्य कंपनियों और अपने व्यवसायी मित्रों से भी मदद लेने की कोशिश की, मगर हर जगह नाकामी ही हासिल हुई. हार कर उस ने अपने एकमात्र मुनाफे में चल रहे कंस्ट्रक्शन व्यवसाय को बेचने का फैसला किया परंतु इस में भी ट्रेड यूनियन और फौरेन इनवैस्टमैंट एप्रूवल बोर्ड ने चाइनीज खरीदार को बेचने के लिए स्वीकृति देने पर अड़ंगा लगा दिया.

‘‘आखिरकार सब तरफ से मायूस हो कर बोर्ड औफ डायरैक्टर ने कंपनी को लिक्विडेशन में ले जाने का फैसला कर लिया. इस के साथ ही ब्राइन और मेरी जिंदगी के सुनहरे दिनों का भी लिक्विडेशन हो गया,’’ जोसफीन ने एक गहरी सांस छोड़ते हुए कहा.

‘‘ब्राइन के दिवालिया होने और तुम्हारे उस से तलाक लेने का क्या संबंध है?’’ मैं ने चिड़चिड़ा कर पूछा.

‘‘सीधा संबंध था, मैं ने सालों उस की विकलांगता को झेला. अब उस के पास बचा भी क्या था मुझे बांधे रखने के लिए. मैं कोई बेवकूफ थोड़े ही हूं जो कि किसी दिवालिया पर अपनी जिंदगी बरबाद कर दूं,’’ जोसफीन बोली.

‘‘और यह जैकब? यह क्या मार्केट में तुम्हारे लिए तैयार बैठा था जो ब्राइन के व्यापार के फेल होते ही तुम इस के साथ रहने लगीं?’’ मैं ने सवाल किया.

‘‘हां, ऐसा ही कुछ समझो. कुछ साल से हम दोस्त थे. ब्राइन के शहर से बाहर होने के दौरान हम ने कई बार कैजुअल समय बिताया था. ब्राइन जैसे व्हीलचेयरमैन के पास था ही क्या मुझे देने के लिए. जब मुझे जैकब जैसा रियल मैन मिल सकता है तो फिर मुझे किसी व्हीलचेयरमैन के साथ समय गुजारने की क्या जरूरत थी. आखिर कुदरत ने हमें जिंदगी जीने के लिए ही दी है, किसी की मजबूरियों पर बरबाद करने के लिए थोड़े ही दी है,’’ इतना कह कर जोसफीन जोर का कहकहा लगा कर हंस दी.

जिंदगी में पहली बार मुझे उस की हंसी को देख कर घृणा महसूस हुई. मैं हतप्रभ सी उसे देखती रह गई. मैं ने अपने काले, घुंघराले बालों को मुट्ठी में भर कर हलके से खींच कर देखा कि मैं होश में तो हूं. हां, होश था मुझ को क्योंकि बालों के खिंचने पर मैं ने दर्द महसूस किया. फिर भी जब पक्का भरोसा न हुआ तो इस बार मैं ने बाएं हाथ की हथेली में दाएं हाथ के अंगूठे का नाखून गड़ा कर देखा, दर्द का आभास मुझे अब भी हुआ.

यह साबित हो चुका था कि मैं पूरी तरह होश में थी. इस का सीधासीधा मतलब था कि जो मुझे सुनाई दे रहा था वह सच था, मेरे मन का वहम नहीं. मगर यह तो रंगबिरंगी दुनिया है. यहां कुछ भी संभव है. यहां रोज किसी न किसी के साथ अनहोनी होती है, अप्रत्याशित घटता है.

स्टील, लोहे और तेल की बढ़ती कीमतों को देखते हुए ब्राइन बहुत ही महत्त्वाकांक्षी हो उठा था. उस के मन में एक लालसा जाग उठी थी जल्दी से जल्दी फौरचून फाइव हंड्रैड की लिस्ट में अपनी कंपनी का नाम देखने की. इस लालसा से वशीभूत हो कर और स्टील, लोहे व खनिज तेल की कीमतों को बढ़ते देख कर उस ने कई देशों में नई खानों और तेल की खोज के अधिकार प्राप्त कर लिए थे. मगर औयल, गैस और खनिज की गिरती कीमतों ने उस के व्यापार को पूरी तरह से डुबो कर रख दिया.

वह शरीफ आदमी यह नहीं जानता था कि फौरचून फाइव हंड्रैड की लिस्ट की जगह, समय उसे हर तरह से बरबाद करने के लिए उस के कदम के इंतजार में था. जिस जोसफीन को उस ने खुद से ज्यादा प्यार किया था, उस ने बुरे वक्त में उस का संबल बनने की जगह उसे हर तरह से तोड़ कर रख दिया.

आसमानी परी की मुसकान के पीछे कितना शातिर दिमाग काम कर रहा था, मैं कभी समझ ही नहीं पाई. मैं ने जाना कि गिरगिट ही नहीं, इंसान भी रंग बदलते हैं. मैं ने जाना कि शादी परिवार द्वारा तय की गई हो या स्वयं की इच्छा से की गई हो, उसे सफलअसफल लोग स्वयं बनाते हैं. मैं मैदान के एक किनारे पर खड़ी हो कर सोचती रही कि दूसरे किनारे की तरफ सिर्फ हरियाली ही हरियाली है.

मृगतृष्णा में फंसी मैं कभी देख ही न सकी कि असली हरियाली मेरे पैरों तले थी, जरूरत थी तो सिर्फ सही दृष्टिकोण की. हां, जिंदगी जीने के लिए ही होती है पर किसी दूसरे के जज्बातों को रौंद कर अपने ख्वाब सजाने के लिए भी नहीं. प्यार और त्याग एकदूसरे के पर्याय हैं. त्याग किए बिना प्यार हासिल नहीं किया जा सकता. प्यार, प्यार है, भौतिक जरूरतों का गुणाभाग नहीं. भौतिकता के लाभहानि के गणित से अर्जित किया गया प्यार, त्याग का नहीं बल्कि वासना का पर्याय होता है.

मुझे जिंदगी का घिनौना चेहरा देखने को मिला. मुझे समझ में आया कि कभीकभी आंखों को जो दिखता है और कानों को सुनाई देता है, वह भी गलत हो सकता है. पता लगा कि हर शख्स आवरण ही ओढ़े हुए जी रहा है अपनेअपने झूठ का. खैर, मुझे यह आवरण और नहीं ओढ़ना है. जिंदगी को जिंदगी के जैसे ही जीना है, मृगतृष्णा की तरह नहीं. जिंदगी को जिंदगी बनाना मेरे अपने हाथ में था. मृगतृष्णा तो सिर्फ छल है, धोखा है अपनेआप से.

जोसफीन के विदा होते ही मैं ने शरद को फोन किया बताने के लिए कि मैं बीजिंग आ रही हूं उन के पास मृगतृष्णा को छोड़ कर, अपनी और उन की जिंदगी को मुकम्मल बनाने के लिए.

इसी को कहते हैं जीना : कैसा था नेहा का तरीका -भाग 3

‘‘ललिता का तो स्वभाव ही है. कोई एक कदम इस की तरफ बढ़ाए तो यह 10 कदम आगे बढ़ कर उस का साथ देती है. हम नएनए इस शहर में आए थे. यह लड़की एक शाम फोन करने आई थी. उस का फोन काम नहीं कर रहा था… गलती तो ललिता की ही थी… किसी की भी तरफ बहुत जल्दी झुक जाती है.’’

स्तब्ध था मैं. अगर मुझ से भी नहीं मिलती तो किस से मिलती है आजकल?

4 दिन और बीत गए. मैं आफिस के बाद हर शाम अस्पताल चला जाता. मुझे देखते ही ललिताजी का चेहरा खिल जाता. एक बार तो ठिठोली भी की उन्होंने.

‘‘बेचारा बच्चा फंस गया हम बूढ़ों के चक्कर में.’’

‘‘आप मेरी मां जैसी हैं. घर पर होता और मां बीमार होतीं तो क्या उन के पास नहीं जाता मैं?’’

‘‘नेहा से कब मिलते हो तुम? हर शाम तो यहां चले आते हो?’’

‘‘वह मिलती ही नहीं.’’

‘‘कोई काम नहीं होगा न. काम पड़ेगा तो दौड़ी चली आएगी,’’ ललिताजी ने ही उत्तर दिया.

शर्माजी कुछ समय के लिए घर गए तब ललिताजी ने इशारे से पास बुलाया और कहने लगीं, ‘‘मुझे माफ कर देना बेटा, मेरी वजह से ही तुम नेहा के करीब आए. वह अच्छी लड़की है लेकिन बेहद स्वार्थी है. मोहममता जरा भी नहीं है उस में. हम इनसान हैं बेटा, सामाजिक जीव हैं हम… अकेले नहीं जी सकते. एकदूसरे की मदद करनी पड़ती है हमें. शायद यही वजह है, नेहा अकेली है. किसी की पीड़ा से उसे कोई मतलब नहीं है.’’

‘‘वह आप से मिलने एक बार भी नहीं आई?’’

‘‘उसे पता ही नहीं होगा. पता होता तो शायद आती…और पता वह कभी लेती ही नहीं. जरूरत ही नहीं समझती वह. तुम मिलना चाहो तो जाओ उस के घर, इच्छा होगी तो बात करेगी वरना नहीं करेगी… दोस्ती तक ही रखना तुम अपना रिश्ता, उस से आगे मत जाना. इस तरह के लोग रिश्तों में बंधने लायक नहीं होते, क्योंकि रिश्ते तो बहुत कुछ मांगते हैं न. प्यार भी, स्नेह भी, अपनापन भी और ये सब उस के पास हैं ही नहीं.’’

शर्माजी आए तो ललिताजी चुप हो गईं. शायद उन के सामने वह अपने स्नेह, अपने ममत्व को ठगा जाना स्वीकार नहीं करना चाहती थीं या अपनी पीड़ा दर्शाना नहीं चाहती थीं.

3-4 दिन और बीत गए. ललिताजी घर आ चुकी थीं. नेहा एक बार भी उन से मिलने नहीं आई. लगभग 3 दिन बाद वह लंच में मुझ से मिलने मेरे आफिस चली आई. बड़े प्यार से मिली.

‘‘कहां रहीं तुम इतने दिन? मेरी याद नहीं आई तुम्हें?’’ जरा सा गिला किया था मैं ने.

‘‘जरा व्यस्त थी मैं. घर की सफाई करवा रही थी.’’

‘‘10 दिन से तुम्हारे घर की सफाई ही चल रही है. ऐसी कौन सी सफाई है भई.’’

मन में सोच रहा था कि देखते हैं आज कौन सा काम पड़ गया है इसे, जो जबान में मिठास घुल रही है.

‘‘क्या लोगी खाने में, क्या मंगवाऊं?’’

खाने का आर्डर दिया मैं ने. इस से पहले भी जब हम मिलते थे खाना मैं ही मंगवाता था. अपनी पसंद का खाना मंगवा लिया नेहा ने. खाने के दौरान कभी मेरी कमीज की तारीफ करती तो कभी मेरी.

‘‘शर्माजी और ललिताजी कैसी हैं? शर्माजी छुट्टी पर हैं न, कहीं बाहर गए हैं क्या?’’

‘‘पता नहीं, मैं ने बहुत दिन से उन्हें देखा नहीं.’’

‘‘अरे भई, तुम इस देश की प्रधानमंत्री हो क्या जो इतना काम रहता है तुम्हें. 2 घर छोड़ कर तो रहते हैं वह…और तुम्हारा इतना खयाल भी रखते हैं. 10 दिन से वह तुम से मिले नहीं.’’

‘‘मेरे पास इतना समय नहीं होता. 2 बजे तो स्कूल से आती हूं. 4 बजे बच्चे ट्यूशन पढ़ने आ जाते हैं. 7 बजे तक उस में व्यस्त रहती हूं. इस बीच काम वाली बाई भी आ जाती है…’’

‘‘किसी का हालचाल पूछने के लिए आखिर कितना समय चाहिए नेहा. एक फोन काल या 4-5 मिनट में जा कर भी इनसान वापस आ जाता है. उन के और तुम्हारे घर में आखिर दूरी ही कितनी है.’’

‘‘मुझे बेकार इधरउधर जाना अच्छा नहीं लगता और फिर ललिताजी तो हर पल खाली रहती हैं. उन के साथ बैठ कर गपशप लगाने का समय नहीं होता मेरे पास.’’

नेहा बड़ी तल्खी में जवाब दे रही थी. खाना समाप्त हुआ और वह अपने मुद्दे पर आ गई. अपने पर्स से राशन कार्ड और पैन कार्ड निकाल उस ने मेरे सामने रख दिए.

‘‘यह देखो, इन दोनों में मेरी जन्मतिथि सही नहीं लिखी है. 7 की जगह पर 1 लिखी गई है. जरा इसे ठीक करवा दो.’’

हंस पड़ा मैं. इतनी हंसी आई मुझे कि स्वयं पर काबू पाना ही मुश्किल सा हो गया. किसी तरह संभला मैं.

‘‘तुम ने क्या सोचा था कि तुम्हारा काम हो गया और अब कभी किसी की जरूरत नहीं पड़ेगी. मत भूलो नेहा कि जब तक इनसान जिंदा है उसे किसी न किसी की जरूरत पड़ती है. जिंदा ही क्यों उसे तो मरने के बाद भी 4 आदमी चाहिए, जो उठा कर श्मशान तक ले जाएं. राशन कार्ड और पैन कार्ड जब तक नहीं बना था तुम्हारा मुझ से मिलना चलता रहा. 10 दिन से तुम मिलीं नहीं, क्योंकि तुम्हें मेरी जरूरत नहीं थी. आज तुम्हें पता चला इन में तुम्हारी जन्मतिथि सही नहीं तो मेरी याद आ गई …फार्म तुम ने भरा था न, जन्मतिथि तुम ने भरी थी…उस में मैं क्या कर सकता हूं.’’

‘‘यह क्या कह रहे हो तुम?’’ अवाक्  तो रहना ही था नेहा को.

‘‘अंधे को अंधा कैसे कहूं…उसे बुरा लग सकता है न.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब साफ है…’’

उसी शाम ललिताजी से मिलने गया. उन्हें हलका बुखार था. शर्माजी भी थकेथके से लग रहे थे. वह बाजार जाने वाले थे, दवाइयां और फल लाने. जिद कर के मैं ही चला गया बाजार. वापस आया और आतेआते खाना भी लेता आया. ललिताजी के लिए तो रोज उबला खाना बनता था जिसे शर्माजी बनाते भी थे और खाते भी थे. उस दिन मेरे साथ उन्होंने तीखा खाना खाया तो लगा बरसों के भूखे हों.

‘‘मैं कहती थी न अपने लिए अलग बनाया करें. उबला खाना खाया तो जाता नहीं, उस पर भूखे रह कर कमजोर भी हो गए हैं.’’

ललिताजी ने पहली बार भेद खोला. दूसरे दिन से मैं रोज ही अपना और शर्माजी का खाना पैक करा कर ले जाने लगा. नेहा की हिम्मत अब भी नहीं हुई कि वह एक बार हम से आ कर मिल जाती. हिम्मत कर के मैं ने सारी आपबीती उन्हें सुना दी. दोनों मेरी कथा सुनने के बाद चुप थे. कुछ देर बाद शर्माजी कहने लगे, ‘‘सोचा था, प्यारी सी बच्ची का साथ रहेगा तो अच्छा लगेगा. उसे हमारा सहारा रहेगा हमें उस का.’’

‘‘सहारा दिया है न हमें प्रकृति ने. बच्ची का सहारा तो सिर्फ हम ही थे… बदले में सहारा देने वाला मिला है हमें… यह बच्चा मिला है न.’’

ललिताजी की आंखें नम थीं, मेरी बांह थपथपा रही थीं वह. मेरा मन भी परिवार के साथ रहने को होता था पर घर दूर था. मुझे भी तो परिवार मिल गया था परदेस में. कौन किस का सहारा था, मैं समझ नहीं पा रहा था. दोनों मुझे मेरे मातापिता जैसे ही लग रहे थे. वे मुझे सहारा मान रहे थे और मैं उन्हें अपना सहारा मान रहा था, क्योंकि शाम होते ही मन होता भाग कर दोनों के पास चला जाऊं.

क्या कहूं मैं? अपनाअपना तरीका है जीने का. कुदरत ने लाखों, करोड़ों जीव बनाए हैं, जो आपस में कभी मिलते हैं और कभी नहीं भी मिलते. नेहा का जीने का अपना तरीका है जिस में वह भी किसी तरह जी ही लेगी. बस, इतना मान सकते हैं हम तीनों कि हम जैसे लोग नेहा जैसों के लिए नहीं बने, सो कैसा अफसोस? सोच सकते हैं कि हमारा चुनाव ही गलत था. कल फिर समय आएगा…कल फिर से कुछ नया तलाश करेंगे, यही तो जीवन है, इसी को तो कहते हैं जीना.

हिकमत- क्या गरीब परिवार की माया ने दिया शादी के लिए दहेज?- भाग 3

कहता है कि लड़की की तनख्वाह को ही दहेज समझ लो. भला, ऐसे कैसे समझ लें? हम ही क्या, और भी कोई समझने को तैयार नहीं है, तभी तो अभी तक माया कुंआरी बैठी है.’’

‘‘और विद्याधर भी, आप को बहू की सख्त जरूरत है मांजी, तो एकमुश्त रकम का लालच छोड़ कर क्यों नहीं दोनों का ब्याह कर देतीं?’’ मनोरमाजी ने तल्ख हुए स्वर को भरसक संयत रखते हुए कहा, ‘‘माया की तनख्वाह तो हर महीने घर ही में आएगी.’’

‘‘हमें एकमुश्त रकम का लालच अपने लिए नहीं, बिरादरी में अपना मानसम्मान बनाए रखने के लिए है,’’ विद्याधर के पिता पहली बार बोले, ‘‘हमारा श्रीपंथ संप्रदाय एक कुटुंब  की तरह है. इस संप्रदाय के कुछ नियम हैं जिन का पालन हम सब को करना पड़ता है. जब हमारे समाज में लड़की के दहेज की राशि निर्धारित हो चुकी है तो शंकरलाल कैसे उसे कम कर सकता है और मैं कैसे कम ले सकता हूं?’’

‘‘यह तो सही कह रहे हैं आप,’’ मनोज बोला, ‘‘लेकिन संप्रदाय तो भाईचारे यानी जातिबिरादरी के लोगों की सहायतार्थ बनाए जाते हैं लेकिन मांजी की गठिया की बीमारी को देखते हुए भी कोई उन्हें बहू नहीं दिलवा रहा?’’

‘‘कैसे दिलवा सकते हैं मनोज बाबू, कोई किसी से जोरजबरदस्ती तो कर नहीं सकता कि अपनी बेटी की शादी मेरे बेटे से करो?’’

‘‘और जो आप के बेटे से करना चाहते हैं जैसे शंकरलालजी तो उन की बेटी से आप करना नहीं चाहते,’’ मनोज ने चुटकी ली.

‘‘क्योंकि मुझे समाज यानी अपने संप्रदाय में रहना है सो मैं उस के नियमों के विरुद्ध नहीं जा सकता. आज मजबूरी से मैं शंकरलाल की कन्या को बहू बना लाता हूं तो कल को तो न जाने कितने और शंकरलाल-शंभूदयाल अड़ जाएंगे मुफ्त में लड़की ब्याहने को और दहेज का चलन ही खत्म हो जाएगा.’’

‘‘और एक कुप्रथा को खत्म करने का सेहरा आप के सिर बंध जाएगा,’’ मनोरमाजी चहकीं.

‘‘तुम भी न मनोरमा, यहां बात विद्याधर की शादी की हो रही है और सेहरा तुम चाचाजी के सिर पर बांध रही हो,’’ मनोज ने कहा, ‘‘वैसे चाचाजी, देखा जाए तो सौदा बुरा नहीं है. माया को बहू बना कर आप को किस्तों में निर्धारित रकम से कहीं ज्यादा पैसा मिल जाएगा और मांजी को आराम भी और आप को समाजसुधारक बनने का अवसर.’’

‘‘हमें नेता या समाजसुधारक बनने का कोई शौक नहीं है. हमारा श्रीपंथ संप्रदाय जैसा भी है, हमारा है और हमें इस के सदस्य होने का गर्व है,’’ मांजी बोलीं, ‘‘आप अगर हमारी सहायता करना ही चाह रहे हो तो विद्याधर को तरक्की दिलवा दो, तुरंत निर्धारित दहेज के साथ शादी हो जाएगी और इस भरोसे से कि इस की शादी में तो पैसा मिलेगा ही, इस के पिताजी ने इस की बहन की शादी के लिए जो कर्जा लिया हुआ है वह भी उतर जाएगा.’’

विद्याधर और उस के पिता हतप्रभ रह गए. मनोरमा और मनोज भी चौंक पड़े.

‘‘कमाल है पिताजी, वह कर्जा आप ने अभी तक उतारा नहीं? मैं ने चिटफंड से ले कर रकम दी थी आप को,’’ विद्याधर ने पूछा.

‘‘वह तेरी मेहनत की कमाई है. उस से बेटी का दहेज क्यों चुकाऊं? उसे मैं ने बैंक में डाल दिया है, तेरे दहेज में जो रकम मिलेगी उस से वह कर्जा उतारूंगा.’’

विद्याधर ने सिर पीट लिया.

‘‘आप ने यह नहीं सोचा, बेकार में सूद कितना देना पड़ रहा है? कल ही उस पैसे को बैंक से निकलवा कर कर्जा चुकता करूंगा,’’ विद्याधर ने दृढ़ स्वर में कहा.

‘‘विद्याधर को तरक्की मिल सकती है,’’ मनोज ने मौका देख कर कहा, ‘‘अगर यह आएदिन सुबह का नाश्ता बनाने के चक्कर में देर से औफिस न आया करे और फिर शाम को जल्दी घर न भागा करे. आप लोग एक अच्छी सी नौकरानी क्यों नहीं रखते?’’

‘‘कई रखीं लेकिन सभी एक सी हैं, चार रोज ठीक काम करती हैं फिर देर से आना या नागा करने लगती हैं,’’ मांजी असहाय भाव से बोलीं.

‘‘बात घूमफिर कर फिर बहू लाने पर आ गई न?’’ मनोरमाजी ने भी मौका लपका, ‘‘और उस के लिए आप दहेज का लालच नहीं छोड़ोगे.’’

‘‘हमें दहेज का लालच नहीं है, बस समाज में अपनी इज्जत की फिक्र है,’’ मांजी ने कहा, ‘‘दहेज न लिया तो लोग हंसेंगे नहीं हम पर?’’

‘‘लोगों से कह दीजिएगा, नकद ले कर बैंक में डाल दिया, बात खत्म.’’

‘‘बात कैसे खत्म,’’ मां झल्ला कर बोलीं, ‘‘श्री का मतलब जानती हो, लक्ष्मी होता है यानी श्रीपंथ, लक्ष्मी का पंथ, इसलिए हमारे में शादी की पहली रस्म, ससुराल से आई लक्ष्मी की पूजा से ही होती है, उसे हम खत्म नहीं कर सकते.’’

‘‘अगर आप को रकम का लालच नहीं है तो महज रस्म के लिए हम उस रकम का इंतजाम कर देंगे,’’ मनोरमाजी ने कहा, ‘‘रस्म पूरी करने के बाद यानी बिरादरी को दिखाने के बाद आप रकम हमें वापस कर दीजिएगा.’’

‘‘आप का बहुतबहुत धन्यवाद, भाभी, लेकिन मैं और माया झूठ की बुनियाद पर की गई शादी कदापि नहीं करेंगे,’’ विद्याधर ने दृढ़ स्वर में कहा.

‘‘तो फिर क्या करोगे?’’

‘‘ऐसे ही घुटघुट कर जीते रहेंगे.’’

विद्याधर के पिता ने उसे चौंक कर देखा, ‘‘तू घुटघुट कर जी रहा है?’’

‘‘घुटघुट कर ही नहीं तड़पतड़प कर भी,’’ मनोज बोला, ‘‘जवान आदमी है, जब से माया से प्यार हुआ है, तड़पने लगा है. मगर आप को क्या फर्क पड़ता है. आप को तो अपने बच्चे की खुशी से ज्यादा संप्रदाय की मर्यादा की फिक्र है. चलो मनोरमा, चलते हैं.’’

‘‘रुकिए मनोज बाबू, मुझे शंकरलालजी के घर ले चलिए, शादी की तारीख तय कर के ही आऊंगा, जिसे जो कहना है कहता रहे.’’

‘‘मुझे भी अपने बेटे की खुशी प्यारी है, मैं भी किसी के कहने की परवा नहीं करूंगी.’’

मनोरमा, मनोज और विद्याधर खुशी से गले मिलने लगे. हिकमत कामयाब हो गई थी.

जाएं तो जाएं कहां : चार कैदियों का दर्द- भाग 3

‘‘बेकुसूरों की भी पिटाई कर दी,’’ राकेश ने कहा.

‘‘यहां भी जंगलराज ही तो है,’’ बिशनलाल बोला.

‘‘मुझे तो लगा कि हमारी भी…’’ चांद मोहम्मद ने बात अधूरी छोड़ दी.

‘‘हमारी क्यों? हम ने तो कभी अपना सिर नहीं उठाया. उन के हर अच्छेबुरे समय में साथ दिया है,’’ अनुपम ने कहा.

‘‘गेहूं के साथ घुन भी पिसता है,’’ बिशनलाल बोला.

‘‘हां, हो भी सकता था. हम क्या कर सकते हैं? उन की कैद में?हैं. गुलाम हैं उन के,’’ चांद मोहम्मद ने कहा.

‘‘चांद मोहम्मद, कैद में तो सभी हैं. तुम अपनी कहो,’’ राकेश बोला.

‘‘क्या कहूं…’’ चांद मोहम्मद ने कहा, ‘‘जब मैं बाहर था तो सोचता था कि मेरे साथ जो हुआ, वह इसलिए हुआ क्योंकि मैं मुसलिम हूं. लेकिन, तुम लोगों को सुन कर लगा कि सभी का एक सा हाल है. ज्यादा सोचना भी ठीक नहीं, वरना फायदा उठाते हैं धर्म के ठेकेदार.’’

‘‘तो तुम यह कहना चाहते हो कि तुम भी बेकुसूर हो?’’ राकेश ने कहा.

‘‘नहीं, मैं बेकुसूर नहीं हूं, तो कुसूरवार भी नहीं हूं,’’ कह कर चांद मोहम्मद चुप हो गया.

‘‘साफसाफ कहो, तुम क्या कहना चाहते हो?’’ अनुपम ने पूछा.

चांद मोहम्मद को वह जमाना याद आ गया, जब वह शेरोशायरी किया करता था. प्यारमुहब्बत भरी गजलें लिखा करता था. फिर उस की शादी उसी लड़की से हो गई, जिसे वह बेहद प्यार करता था. पत्नी पेट से थी. चांद मोहम्मद एक जलसे में गया हुआ था. लौट कर वह वापस आया, तो पूरी बस्ती जल कर राख हो चुकी थी. हर तरफ घायलों की कराहें, जले हुए घर, लाशों के ढेर लगे हुए थे. उस की पत्नी मर चुकी थी. उस के पेट में त्रिशूल घुसा हुआ था.

चारों ओर पुलिस की गाडि़यों के सायरन, अस्पताल, राहत कैंप, मीडिया की रिपोर्टिंग का नजारा था.

धर्म के ठेकेदारों के तीखे बयान. राजनीतिबाजों ने अपनी सियासत तेज कर दी थी. मसजिद में धर्मगुरु खून का बदला खून से लेने की बात कर रहे थे कि सच्चे मुसलिम हो तो उठो और जिहाद करो.

चांद मोहम्मद सोच रहा था, ‘क्या यह हमारा वतन नहीं है? क्यों हम लोगों को पाकिस्तान भेजने की बात कही जाती है? क्यों हमें गद्दार कहा जाता है? कुछ लोगों की गलती की सजा पूरी कौम को क्यों दी जाती है? क्यों बेकुसूरों को ही सूली पर चढ़ना पड़ता है हर बार?’

चांद मोहम्मद ने उन सब को बताया, ‘‘मौलवी ने हमें भड़काते हुए कहा, ‘कौम की खिदमत करो. जन्नत नसीब होगी. सच्चे मुसलिम बनो.’

‘‘और मैं सरहद पार चला गया. ट्रेनिंग से जब मैं वापस आया, तो मुझ से कहा गया कि तुम्हारा टारगेट है हिंदू नेता की हत्या कर के गोधरा का बदला लेना.

‘‘मैं इस के लिए तैयार भी हो गया. जो त्रिशूल मेरी पत्नी के पेट में घोंपा गया?था, वह मुझ में भी तब तक चुभा रहेगा, जब तक कि मैं उस त्रिशूल वाले नेता की हत्या नहीं कर देता. मेरे साथ 2 और जिहादी थे. मैं, नुसरत बेगम, जो सौफ्टवेयर इंजीनियर थी.

‘‘नुसरत बेगम 30 साल की एक खूबसूरत औरत थी. किसी हिंदू लड़के से इश्क कर बैठी थी. लड़के ने धोखा दे दिया था, इसलिए वह पक्की जिहादी बन चुकी थी. हर हिंदू लड़के में उसे अपना बेवफा प्रेमी दिखता था.

‘‘दूसरा, असलम. उस का पूरा परिवार फसाद में मारा गया था. वह खून के बदले खून चाहता था. हम तीनों कौम के रहनुमा अकबर खान से मिलने वाले थे. अकबर खान की विशाल हवेली के एक गुप्त कमरे में हमें ठहराया गया था.

‘‘रात के 2 बजे अचानक मेरी नींद खुली. किसी के हंसीठहाके की आवाज सुनाई दी. रात के 2 बजे कौन हो सकता है अकबर अली की हवेली में?

‘‘मैं आवाज का पीछा करते हुए गुप्त कमरे से बाहर निकला. वहां बड़े से हाल में अकबर अली के साथ एक और शख्स बैठा हुआ था. शराबकबाब का दौर चल रहा था.

‘‘हंसीठहाकों के बीच अकबर खान की आवाज सुनाई दी, ‘इस बार तुम ने हमारे कुछ ज्यादा ही लोग मार दिए.’

‘‘दूसरी आवाज आई, ‘अगली बार तुम हिसाब बराबर कर लेना.’

‘‘दूसरी आवाज वाला आदमी अब मुझे साफ दिखाई दिया. मैं चौंक गया. यह तो वही त्रिशूलधारी नेता था.

‘‘अकबर खान ने कहा, ‘हां, बलि के 3 बकरे मिले हैं. कल तुम्हारी सभा है. तुम बुलेटप्रूफ जैकेट पहने रखना. मारे जाएंगे सभा में आए लोग.’

‘‘वह त्रिशूलधारी नेता बोला, ‘और तुम्हारे आतंकी?’

‘‘‘उन्हें पुलिस मार गिराएगी.’

‘‘‘चलो, तब तो हमें राजनीति को चमकाने का खूब मौका मिलेगा. चुनाव आ रहे हैं.

‘‘‘तुम ने हमें गोधरा दिया था, तभी तो हमारे लोगों ने वोट दिया था हमें.’

‘‘‘तुम ने किया तो हम ने किया.’

‘‘‘राजनीति इसी तरह चलती है.’

‘‘यह सुन कर मैं सकते में था. मैं तेजी से अपने 2 साथियों के पास पहुंचा. उन्हें जगा कर सारी बात बताई. उन के चेहरे पर भी तनाव छा गया.

‘‘असलम ने गुस्से में कहा, ‘मतलब, हमें इस्तेमाल किया जा रहा है. बलि के बकरे हैं हम?’

‘‘मैं ने कहा, ‘हम जैसे लोग हमेशा मजहब के नाम पर गुमराह होते रहे हैं. सब आपस में मिले हुए हैं.’

‘‘नुसरत ने गुस्से में कहा, ‘गोली तो इन के सीने में उतारनी चाहिए.’

‘‘असलम बोला, ‘अच्छा है कि हम यहां से भाग निकलें.’

‘‘और हम तीनों वहां से भागने की तैयारी में लग गए. हमें?क्या पता था कि जिस गुप्त कमरे में हमें ठहराया गया है, वहां पर गुप्त कैमरे भी लगे हुए हैं. हमारी बातें उन तक पहुंच रही थीं.

‘‘हम शहर से 40 किलोमीटर दूर सुनसान रास्ते में थे कि हमारी गाड़ी को चारों तरफ से पुलिस ने घेर लिया. असलम और नुसरत के पास पिस्तौल थी. उन दोनों ने गाड़ी से निकल कर भागते हुए पुलिस पर फायरिंग की. जवाबी कार्यवाही में पुलिस ने भी गोली चलाई. वे दोनों मारे गए. मैं ने हाथ ऊपर कर दिए. मुझे आतंकवादी होने के आरोप में अंदर कर दिया.’’

बैरक में फिर सन्नाटा पसर गया और वे चारों थकेहारे से जमीन पर बिछे अपने कंबलों में निढाल हो कर लेट गए.

आज बिशनलाल और अनुपम की पेशी थी. वे दोनों जल्दीजल्दी खाना खा कर मुख्य द्वार के पास बने कमरे की ओर चल दिए. पेशी की तारीख पिछली पेशी में ही कोर्ट के बाबू द्वारा पता चल जाती थी. जिन के वकील होते थे, वे बता देते थे.

जेल में पेशी पर जाने वालों की रोज लिस्ट बना कर उन्हें आवाज दी जाती थी. जेल के बाहर पुलिस की गाड़ी खड़ी रहती थी.

पेशी पर जाने वाले सारे विचाराधीन कैदियों को एक कमरे में जमा करने के बाद जेल के मुख्य द्वार से एकएक कर के बाहर निकाला जाता और गेट से सटी पुलिस गाड़ी में पुलिस के पहरे में अंदर बिठा दिया जाता.

सारे कैदियों के बैठने के बाद पुलिस की गाड़ी का दरवाजा बंद कर ताला लगा दिया जाता. फिर पिछले केबिन में 4 हथियारबंद पुलिस वाले बैठते और अदालत की ओर गाड़ी चल पड़ती.

अदालत के पास बने एक छोटे, पर मजबूत कमरे में सारे विचाराधीन कैदी जानवरों की तरह ठूंस दिए जाते. जिस की पेशी की पुकार लगती, उसे 2 पुलिस वाले दोनों हाथों में हथकड़ी लगा कर अदालत में पेश करते.

बिशनलाल और अनुपम जैसे अपराधियों को 4 पुलिस वाले बंदूक के साए में ले जाते. अदालत भी सरकार की होती है. काम सरकारी तरीके से चलता है. मुलजिम को कठघरे में खड़ा किया जाता. पुलिस वाले भी मुलजिम के कठघरे के पास ही खड़े रहते. जिन का वकील होता, वह मुलजिम की तरफ से बोलता. जिस का नहीं होता, उसे सरकार की तरफ से वकील दिया जाता. जो न होने के बराबर ही होता था.

अनुपम और बिशनलाल को जमानत नहीं दी गई. सरकारी वकील ने भरपूर विरोध जताया. उन्हें नक्सलवादी, आतंकवादी बता कर यह कहा कि इन से समाज को खतरा है. जमानत मिलने पर इन के भाग जाने का डर है.

ऐसे भी बहुत से विचाराधीन कैदी थे, जिन्हें जमानत मिली तो उन के पास जमानतदार नहीं थे. कुछ ऐसे भी विचाराधीन कैदी थे, जिन की पेशी हुई ही नहीं, क्योंकि उन के गवाह नहीं आए थे. गवाह आते तो सरकारी वकील छुट्टी पर होता. कभी मजिस्ट्रेट लंबी छुट्टी पर होता. फिर सरकारी छुट्टी, जांच अधिकारी, डाक्टर का हाजिर न होना. इस तरह छोटेछोटे केसों में लोग सालों पडे़ रहते जेल के अंदर.

शाम होते ही अगली तारीख ले कर मुलजिमों को पुलिस की गाड़ी में बिठा कर वापस जेल भेज दिया जाता. जितने गए थे, उन की गिनती के साथ उन्हें अंदर लिया जाता. फिर वही रूटीन. भोजन लो. अपने बैरक में जाओ और ‘टनटनटन’ की आवाजों के साथ बैरक में सभी की गिनती होती और शाम 7 बजे से सुबह 7 बजे तक सब अपने बैरकों में कैद.

जिंदगी की तलाश में : कैसे बदला कृष्ण का जीवन

शाम गहराने लगी थी, मगर बाहर के अंधेरे से घोर अंधेरा कृष्ण के भीतर छाने लगा था. अपने चेहरे को हथेलियों से ढके, आंखें मूंदे उस ने मोबाइल के ईयरफोन कान में ठूंस कर सुनीता की आवाज दबाने की नाकाम कोशिश में अपना सारा ध्यान गाने पर लगा दिया था, ‘जिंदगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए…’

गाना खत्म होतेहोते कृष्ण की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली. उस के जी में आया कि वह अपने हालात पर खूब फूटफूट कर रोए… मगर उस से ऐसा नहीं हो सका और अंदर की हूक आंखों से आंसू बन कर बहती रही.

कृष्ण ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की जिंदगी इस मोड़ पर आ कर खड़ी हो जाएगी, जहां वह कहीं का नहीं रहेगा… काश, वह उस नर्स के इश्क में न फंसा होता… काश… उस ने घर वालों की बात मानी होती… काश… उस ने अपने और अपने परिवार के बारे में सोचा होता… काश… काश… काश… मगर अब क्या हो सकता था… जिंदगी इसी काश में उलझ कर रह गई थी.

कृष्ण को अच्छी तरह याद है कि पिता की अचानक हुई मौत के बाद उन की जगह पर उस की नौकरी लगते ही उस के जैसे पंख उग आए थे. जवानी का जोश और मुफ्त में मिली पिताजी की जगह रेलवे की नौकरी के बाद दोस्तीयारी में पैसे उड़ाना, मोटरसाइकिल पर सजसंवर कर इधर से उधर चक्कर काटना, मौका मिलते ही दोस्तों के साथ मौजमस्ती मारना… बस, यही उस का रोज का काम बन गया था. तब न उसे दोनों बहनों के ब्याह की चिंता थी और न विधवा मां की सेहत की फिक्र.

एक दिन दोस्तों के साथ पिकनिक पर भीग जाने पर कृष्ण को बुखार चढ़ गया था. अस्पताल में नर्स से सूई लगवाते हुए उस की नजरों से घायल हो कर कृष्ण उस का दीवाना हो उठा था, जब नर्स ने अपने मदभरे नैनों में ढेर सारा प्यार समेटे हुए पूछा था, ‘‘सूई से डरते तो नहीं हो? आप को सूई लगानी है.’’

कृष्ण उस नर्स की हिरनी सी बड़ीबड़ी आंखों को बस देखता रह गया था. सफेद पोशाक में गोलमटोल चेहरे वाली नर्स की उन आंखों ने जैसे उसे अपने अंदर समा लिया था. उसे लगा था, जैसे खुशबू से सराबोर हवा ने उसे मदहोश कर दिया हो, जैसे पहाड़ों पर घटाएं बरसने को उमड़ पड़ी हों…

नर्स ने बांह ऊंची करने के लिए कृष्ण का हाथ अपने कोमल हाथों में लिया, तो वह कंपकंपा कर बोला था, ‘‘डर तो लगता है, पर आप लगाएंगी तो लगवा लूंगा.’’

इतना कहते हुए नर्स ने शर्ट की बांह ऊपर चढ़ा दी थी. नर्स ने हौले से सूई लगा कर कृष्ण की आंखों में झांकते हुए पूछा था, ‘‘दर्द तो नहीं हुआ?’’

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं.’’

‘‘आप का नाम क्या है?’’

‘‘कृष्ण.’’

‘‘मतलब कृष्ण कन्हैया हैं आप… गोपियों के कन्हैया…’’ नर्स ने इंजैक्शन की जगह को रुई से रगड़ते हुए मुसकरा कर कहा था.

कृष्ण अपने घर चला आया था. शरीर का बुखार तो अब उतर चुका था, मगर नर्स के इश्क का बुखार उस पर इस कदर हावी हो गया था कि आंखें बंद करते ही नर्स की बड़ीबड़ी हिरनी सी आंखें नजर आती थीं.

बुखार उतरने के बाद भी कृष्ण कई बार अस्पताल के चक्कर लगा आता. नर्स से किसी न किसी बहाने दुआसलाम कर आता. नर्स भी उस से मुसकरा कर बात करती.

उसी दौरान क्रिसमस पर हिम्मत कर कृष्ण ने नर्स को रास्ते में रोक कर ‘मैरी क्रिसमस’ कह कर लाल गुलाबों का गुलदस्ता थमा दिया था. नर्स

ने भी मुसकरा कर उस का तोहफा कबूल कर लिया था.

बस, फिर वे दोनों मिलने लगे थे. प्यार हो चुका था, इजहार हो चुका था. घर में क्या हो रहा है, कृष्ण को कुछ परवाह न थी. वह उस नर्स को मोटरसाइकिल पर पीछे बैठा कर घूमता… उस के प्यार में झूमता, मस्ताता बस.

उधर ब्याह लायक बहनें कृष्ण के इस आवारापन की हरकतों को देख कर मजबूरन मां को संभालने की खातिर अपना घर बसाने की सोच भी न पाती थीं. अगर उन्होंने ब्याह रचा लिया, तो दिल की मरीज विधवा मां को कौन संभालेगा? बस, इसी एक बड़े सवाल ने उन्हें कुंआरी रहने पर मजबूर कर दिया था. वे दोनों घर में ही ब्यूटीपार्लर खोल कर रोजीरोटी कमाने लगी थीं.

फिर अचानक ही नर्स का तबादला और उसी के चलते ही कृष्ण का घर से और दूर हो जाना… वह कईकई दिन घर से 200 किलोमीटर दूर अपने प्यार के नशे में चूर पड़ा रहता.

और एक दिन जैसे बिजली गिरी थी कृष्ण पर. नर्स के घर का दरवाजा बिना खटखटाए घनघोर घटाओं में भीगता वह अचानक अंदर दाखिल हुआ था, तो सामने का नजारा देख कर उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई थी. वह नर्स किसी और मर्द के साथ बिस्तर पर थी.

कृष्ण को यह सब देख कर ऐसा लगा था, जैसे किसी ने उस के दिल में छुरा भोंक दिया हो, जैसे सारा आसमान घूमने लगा हो… उसे लगा था कि वह खून से लथपथ हो कर वीरान रेगिस्तान में अकेला घायल खड़ा हो और तमाम चीलकौए उसे नोंच खाने को उस पर मंडरा रहे हों… कितने वादे… कितनी कसमें खाई थीं… कैसे कहती थी वह नर्स, ‘मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती कृष्ण… मैं मर जाऊंगी, जो तुम मेरे न हुए…’

कृष्ण को लगा था कि जमीन फट जाए और वह उस में समा जाए… जैसे नर्स के क्वार्टर की दीवारें आग से भभक उठी हों, वैसे ही नफरत की आग में भभक उठा था कृष्ण.

कृष्ण नर्स को कुछ कह पाता, उस से पहले ही नर्स ने उस से रूखी आवाज में कहा था, ‘‘बेवकूफ इनसान, तुम को इतना भी नहीं पता कि किसी लड़की के घर का दरवाजा खटखटा कर अंदर आना चाहिए…’’ फिर गुर्राते हुए नफरत भरे अंदाज में उस ने घूरते हुए कृष्ण से कहा था, ‘‘ऐसे घूर कर क्या देख रहे हो मुझे? ये नए डाक्टर साहब हैं. मेरे नए फ्रैंड… अभी एक हफ्ता पहले ही डिस्पैंसरी में पोस्टिंग हुआ है…’’

कृष्ण मुट्ठी भींचे सब सुनता रहा था. जी में आया कि नर्स का गला ही घोंट दे, मगर वह कुछ और कहती, उस से पहले ही वह मुड़ कर मोटरसाइकिल स्टार्ट कर निकल पड़ा था तेज रफ्तार से घर की ओर… जैसे वह जल्दी से जल्दी दूर… बहुत दूर भाग जाना चाहता हो… जैसे नर्स की आवाज उस का पीछा कर रही हो और वह

उसे सुनना नहीं चाहता हो… वह टूट गया था अंदर ही अंदर.

इसी तरह उदासी और तनहाई में दिन रगड़रगड़ कर बीत रहे थे कि एक दिन अचानक ही कृष्ण के कानों में किसी की दिल भेद देने वाली रुलाई सुनाई पड़ी.

‘अरे, यह तो सुनीता के रोने की आवाज है,’ कृष्ण पहचान गया था. सुनीता, उस की पड़ोसन… मजबूर, बेसहारा सी, मगर निहायत ही खूबसूरत, जिसे उस का पति रोज शराब पी कर बिना बात मारता है और वह उस की मार खाती जाती है. आखिर जाए भी तो कहां… उस का इस दुनिया में कोई नहीं… मामा ने मामी की रोजरोज की चिकचिक से तंग आ कर उसे एक बेरोजगार शराबी से ब्याह कर मानो अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली थी.

कृष्ण, जो अपने प्यार में नाकाम हो कर टूट चुका था, न जाने क्यों अचानक ही उठ कर सुनीता के घर की ओर लपका. वह  रोजरोज सुनीता को यों पिटते नहीं देख सकता.

कृष्ण ने दरवाजा खोल कर पिटती सुनीता को हाथ से पकड़ा ही था कि वह उस के सीने से इस कदर लिपट पड़ी, जैसे कोई बच्चा मार के डर से लिपट जाता है.

‘‘बचा लो इस राक्षस से, वरना मुझे यह मार ही डालेगा…’’ सुनीता कृष्ण से लिपट कर फूट पड़ी थी. पता नहीं, कृष्ण के टूटे दिल को सुनीता के यों सीने से लग जाने से कितना सुकून मिला था. उस ने उसे अपनी बांहों में भर लिया था.

‘‘मैं तुम्हें इस तरह पिटता नहीं देख सकता सुनीता…’’

‘‘अबे हट, बड़ा आया सुनीता का आशिक. तू होता कौन है इसे बचाने वाला…?’’ कहते हुए सुनीता के पति ने कृष्ण को जोर का धक्का दे दिया और खुद कमरे में रखी हौकी उठा कर कृष्ण के ऊपर लपका. अगर पड़ोसी न बचाते, तो वह नशे में कृष्ण के सिर पर हौकी दे मारता.

मगर अब सुनीता कृष्ण के सामने आ खड़ी थी उसे बचाने के लिए. सारा महल्ला तमाशा देख रहा था.

सुनीता के पति ने तमाम महल्ले वालों के सामने चीखचीख कर कहा, ‘‘आशिक बनता है इस का… कब से चल रहा है तुम्हारा चक्कर… रख सकता है हमेशा के लिए इसे… चार दिन ऐश करेगा और छोड़ देगा… इतना ही मर्द है तो ले जा हमेशा के लिए और रख ले अपनी बीवी बना कर… मुझे इस की जरूरत भी नहीं…’’

सुनीता और सारा महल्ला खामोश हो कर कृष्ण के जवाब का इंतजार करने लगे. सुनीता उस से लिपटी कांप रही थी. कृष्ण के जवाब के इंतजार में उस का दिल जोरजोर से धड़कने लगा था.

‘‘हां, बना लूंगा अपनी बीवी… एक औरत पर हाथ उठाते, भूखीप्यासी रखते, जुल्म करते शर्म नहीं आती… बड़ा मर्द बनता है… देख, कैसा मारा है इसे…’’ कृष्ण ने जेब से रूमाल निकाल कर सुनीता के होंठों से बहता खून पोंछ दिया.

सुनीता कृष्ण के सीने से लगी आंखों में आंसू लिए बस उसे ही देखती रह गई, जैसे कहना चाह रही हो, ‘मेरे लिए इतना रहम… आखिर क्यों? मैं तो शादीशुदा और एक बच्ची की मां… फिर भी…’

किसी ने पुलिस को भी फोन कर दिया. फिर क्या, पुलिस के सामने ही सुनीता ने कृष्ण को और कृष्ण ने सुनीता को स्वीकार कर लिया. महिला थाने में रिपोर्ट, फिर फैमिली कोर्ट से आसानी से तलाक हो गया.

पता नहीं, कृष्ण ने अपने पहले प्यार को भुलाने के लिए या सुनीता पर इनसानियत के नाते तरस खा कर उसे घर वालों, महल्ले वालों और रिश्तेदारों की परवाह किए बगैर अपना लिया था… फिर किराए का अलग मकान… सुनीता की बेटी का नए स्कूल में दाखिला और लोन पर ली गई नई कार…

शायद अपने पहले प्यार को भुलाने की कोशिश में कृष्ण ने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया था और सुनीता उसे और उस के द्वारा मुहैया कराए गए ऐशोआराम पा कर निहाल हो गई थी.

उधर, कृष्ण सुनीता की बांहों में पड़ा उस की रेशमी जुल्फों से खेलता और नर्स के साथ बिताए पलों को सुनीता के साथ दोहराने की कोशिश करता. पड़ोस में रहने के चलते शायद सुनीता उस के पहले प्यार के बारे में सबकुछ जानती थी.

कृष्ण को न बूढ़ी मां की चिंता थी, न दोनों बहनों के प्रति फर्ज का भान. हां, कभी सुनीता को उस ने मांबहनों के साथ रहने के लिए दबाव दिया था, तो सुनीता ने दोटूक शब्दों में कह दिया था, ‘‘मैं उस महल्ले में तुम्हारी मांबहनों के साथ कभी नहीं रह सकती. लोग तुम्हारे और नर्स के किस्से छेड़ेंगे, जो मुझ से कभी बरदाश्त नहीं होगा…’’

समय के साथसाथ कृष्ण का अपने पहले प्यार को भुलाने और जोश में आ कर सुनीता को अपनाने की गलतियों का अहसास होने लगा.

सुनीता ऐशोआराम की आदी हो गई. वह कृष्ण के उस पर किए गए उपकार को भी भूल गई और एक लड़के को जन्म देने के बाद तो उस के बरताव में न जाने कैसा बदलाव आया कि कृष्ण अपने किए पर पछताने लगा.

कभीकभार मां के पास रुक जाने, दोस्तयारों के पास देर हो जाने पर सुनीता उसे इतना भलाबुरा कहने लगी कि उस का जी करता उसे जहर ही दे दे. वह अकसर नर्स को ले कर ताना मारने लगी. न समय पर नाश्ता, न समय पर खाना… कृष्ण के लेट घर आने पर खुद खा कर बेटी को ले कर सो जाना उस का स्वभाव बन गया.

सुनीता तो अब नर्स और कृष्ण के पहले प्यार को ले कर ताना मारती रहती थी. ज्यादा कुछ बोलने पर वह दोटूक कह देती थी, ‘‘नर्स ने धोखा दिया तुम्हें इस चक्कर में मुझे अपना लिया, वरना इतने बदनाम आदमी से कौन रचाता ब्याह? मुझे अपना कर कोई अहसान नहीं कर दिया तुम ने… अभी भी मुझे क्या पता कहांकहां जाते हो… किसकिस के साथ गुलछर्रे उड़ाते हो…’’

तब काटो तो खून नहीं वाली हालत हो जाती थी कृष्ण की. वह चीख पड़ता, ‘‘हां… उड़ाता हूं… खूब उड़ाता हूं गुलछर्रे… तेरी इच्छा है तो तू भी उड़ा ले…’’ और निकल जाता कार ले कर दूर जंगलों में.

एक दिन कृष्ण तेज बुखार से तपता जब नजदीकी डिस्पैंसरी में इलाज कराने पहुंचा, तो सन्न रह गया. हाथ

में इंजैक्शन लिए उस की वही नर्स खड़ी थी.

कृष्ण ने उस के हाथ से परची छीन ली. नर्स ने आसपास देखा. दोपहर के डेढ़ बजे का समय था. मरीज जा चुके थे. उस के और कृष्ण के अलावा वहां कोई नहीं था.

नर्स ने कृष्ण के हाथ से दोबारा परची ली और कहा, ‘‘मुझे माफ कर दो. मैं आप के पैर पड़ती हूं. मुझ से बहुत बड़ी भूल हुई, जो मैं ने आप को…’’

बाकी शब्द नर्स के गले में अटक कर रह गए. कान पकड़ कर आंखों में आंसू भरे वह कृष्ण के कदमों में झुक गई.

कृष्ण का गुस्सा नर्स को यों गिड़गिड़ाते देख बुखार की गरमी से जैसे पिघल गया. उस ने बुखार से तपते अपने हाथों से उठाते हुए पहली बार नर्स को उस के नाम से पुकारा, ‘‘बस भी करो मारिया. मैं अब…’’

कहतेकहते रुक गया कृष्ण और अपनी बांहें खोल कर मारिया के सामने कर दीं.

‘‘पास ही स्टाफ क्वार्टर है, मैं उसी में रहती हूं. अभी एक हफ्ता पहले ही ट्रांसफर हुआ है यहां. आप को देखने की कितनी तमन्ना थी… आज पूरी हो गई. प्लीज आना… ए 41 नंबर है र्क्वाटर का,’’ कहते हुए मारिया ने आंसुओं से भरी आंखों से कृष्ण को इंजैक्शन लगा दिया.

घर आ कर कृष्ण निढाल सा पलंग पर पड़ गया. आंखों में मारिया की आंसुओं भरी आंखें और फूल

सा कुम्हलाया चेहरा था. आसमान में बादलों की गड़गड़ाहट के साथ तेज चमकती बिजली थी. कृष्ण पलंग पर आंखें मूंदे यों ही पड़ा रहा और आज के दिन के बारे में सोचता रहा…

सुनीता ने एक बार भी कृष्ण से तबीयत खराब होने के बावजूद खानेपीने, दवा वगैरह के बारे में नहीं पूछा. बस, नए दिलाए हुए मोबाइल फोन से वह चिपकी रही.

आज तीसरा दिन था. बुखार अभी भी महसूस हो रहा था, मगर रविवार के दिन डाक्टर कम ही मिलता है, फिर भी कृष्ण किसी तरह उठा और डिस्पैंसरी की ओर चल दिया. उस की सोच के मुताबिक डाक्टर नहीं आया था. मारिया ही डिस्पैंसरी संभाल रही थी.

कृष्ण को देखते ही मारिया गुलाब के फूल सी खिल उठी, ‘‘ओह कृष्ण… अब कैसा है आप का तबीयत?’’

केरल की होने के चलते मारिया के हिंदी के उच्चारण कुछ बिगड़े हुए होते थे. उस ने कृष्ण की कलाई को अपने नरम हाथों से पकड़ कर नब्ज टटोलने की कोशिश की ही थी कि तभी कृष्ण ने हाथ खींच लिया.

‘‘मैं ठीक हूं.’’

‘‘अभी तक नाराज हो…’’ कहते हुए मारिया ने कृष्ण को अपनी बांहों में भर लिया. कृष्ण को लगा जैसे वह कोयले की तरह धूधू कर जल उठा हो. जैसे उसे 104 डिगरी बुखार हो गया हो. तभी मारिया ने मौका पा कर अपने पंजों पर खड़े हो उस के होंठों पर अपने धधकते होंठ रख दिए.

मारिया की आंखों में नशा उतरने लगा था. डिस्पैंसरी खाली थी. खाली डिस्पैंसरी के एक खाली कमरे की हवा मारिया की गरम सांसों से गरम हो चली थी.

‘‘कृष्ण, मुझे माफ कर दो. देखो न, आप की मारिया आप से अपने प्यार की भीख मांग रही है. अभी भी वही आग, वही कसक और वही प्यार बाकी है मारिया में… एक बार, सिर्फ एक बार…’’

कृष्ण, जो मारिया का साथ पा कर कुछ पल को अपने होश खो बैठा था, ने मारिया को दूर धकेल दिया और बोला, ‘‘मुझे तुम से घिन आ रही है. तुम प्यार के नाम पर कलंक हो. मैं तुम से प्यार नहीं, बल्कि नफरत करता हूं. मुझे कभी अपनी सूरत भी मत दिखाना…’’

इतना कहता हुआ कृष्ण डिस्पैंसरी से बाहर चला गया था. मारिया ‘धम्म’ से कुरसी पर बैठ गई.

कृष्ण नफरत से भरा भनभनाता सीधे अपने घर की तरफ निकल पड़ा था. उसे लग रहा था जैसे उस के चारों ओर आग जल रही हो, जिस में वह जला जा रहा हो… मारिया ने जैसे उस के अंदर आग भर दी थी… प्यार की नहीं, नफरत की आग. बस, उसी आग में जलता जब घर पहुंचा तो वहां का नजारा देख हैरान रह गया.

घर के दरवाजे पर सुनीता का पहला पति सुनीता का हाथ अपने हाथों में लिए उस से कह रहा था, ‘‘चिंता मत करो, मैं जल्दी आऊंगा…’’ फिर कृष्ण को देख कर वह नजरें झुकाए हुए चुपचाप वहां से खिसक लिया.

कृष्ण ने सुनीता के गाल पर एक करारा तमाचा जड़ दिया और बोला, ‘‘मक्कार… धोखेबाज… बता, कब से चल रहा है यह सब?’’

सुनीता गाल को सहलाते हुए कृष्ण पर चिल्लाई, ‘‘जब से तुम्हारा नर्स के साथ चक्कर चल रहा है. कहां से आ रहे हो? मारिया से मिल कर न? अपने गरीबान में झांक लो, तब मुझे कुछ कहना. वे आएंगे… तुम उन्हें रोक भी नहीं सकते… उन की बेटी मेरे पास है… क्या कर लोगे तुम?’’

कृष्ण को लगा कि वह चक्कर खा कर वहीं गिर पड़ेगा. उस ने सपने में भी ऐसा नहीं सोचा था. इतना बड़ा धोखा.

कृष्ण चल पड़ा था अपने घर की ओर. मांबहनों के पास. टूटे कदम और बोझिल मन लिए. जा कर ‘धम्म’ के पलंग पर पड़ गया था. उसे लगा जैसे वह न घर का रहा न घाट का… न मांबहनों का हो पाया और न मारिया या सुनीता का… आखिर उसे उस के भटकने की सजा जो मिल गई थी.

कृष्ण की आंखों में आंसू थे. सुनीता की गूंजती आवाज दबाने के लिए उस ने मोबाइल फोन के ईयरफोन कानों में ठूंस लिए थे, ‘जिंदगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए… जब ये सोचा तो घबरा गए… आ गए, हम कहां आ गए…’

 

अब कोई नाता नहीं : अतुल-सुमित में से कौन बना अपना – भाग 2

छोटीमोटी बीमारी होने पर उन्हें पड़ोसियों का सहारा लेना पड़ता था. मगर हर बार यह मुमकिन नहीं था कि जब उन्हें जरूरत पड़े तब पड़ोसी उन की सेवा में हाजिर हो जाएं. इसी बीच देश में कोरोना महामारी की दूसरी लहर ने कहर ढाना शुरू कर दिया. लौकडाउन के कारण कामवाली बाई यशोदा ने आना बंद कर दिया और घरेलू नौकर किशन अपने गांव चला गया. लोग अपनेअपने घरों में बंद हो गए. रमा को दमे की शिकायत थी तो कांता प्रसाद डायबिटिक थे. चिंता और तनाव ने दोनों को और अधिक बीमार बना दिया था.

सुमित इस संकट की घड़ी में व्हाट्सऐप पर ‘टेक केयर, बाहर बिलकुल मत जाना और जाना पड़ जाए तो मास्क पहन कर जाना, सैनिटाइजर का उपयोग करते रहना, बारबार साबुन से हाथ धोते रहना, सोशल दूरी बनाए रखना’ जैसे महज औपचारिक संदेश नियमित रूप से भेज कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेता था. एक दिन रात में कांता प्रसाद को तेज बुखार आया. उन्हें लगा, मौसम बदलने से आया होगा. घर में ही दवा खा ली. मगर बुखार न उतरा. 2 दिनों बाद उन्हें सांस लेने में तकलीफ होने लगी और मुंह का स्वाद चला गया तब रमा को पता चला कि ये तो कोरोना के लक्षण हैं.

रात में करीब एक बजे उन्होंने अतुल को फोन किया और सारी बात बताई. अतुल और उस के पिता ने तुरंत भागदौड़ शुरू कर दी. अतुल ने एक सामाजिक संस्था के यहां से ऐंबुलैंस मंगवाई और अपने पिता के साथ कांता प्रसाद के घर के लिए रवाना हो गया.

बीच रास्ते में अतुल अस्पतालों में बैड की उपलब्धता के लिए लगातार फोन कर रहा था. दोतीन अस्पतालों से नकारात्मक उत्तर मिला, मगर एक अस्पताल में एक बैड मिल गया. अतुल ने कांता प्रसाद को फोन कर के अस्पताल जाने के लिए तैयार रहने के लिए कहा. रात करीब 2 बजे कांता प्रसाद को एक अस्पताल के कोरोना वार्ड में एडमिट कर दिया और ट्रीटमैंट चालू हो गया.

रमा की आंखों में छिपा हुआ नीर आंसुओं का रूप धारण कर उस के गालों को भिगोने लगा जिसे देख अतुल ने कहा, ‘ताईजी, प्लीज आंसू न बहाओ. अब चिंता की बात नहीं है. यह शहर का बहुत अच्छा अस्पताल है. ताऊजी जल्दी ही स्वस्थ हो जाएंगे. ताईजी, अब आप हमारे घर चलो. ताऊजी के ठीक होने तक आप हमारे ही घर पर रहना. अस्पताल में कोरोना मरीज के रिश्तेदारों को ठहरने की अनुमति नहीं है.’

रमा का कंठ रुंध गया था. वह बोल नहीं पा रही थी. खामोशी से अतुल के साथ रवाना हो गई. कांता प्रसाद का औक्सीजन लैवल कम हो जाने से कुछ दिनों तक उन्हें वैंटिलेटर पर रखा गया. फिर उन्हें जनरल वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया. डाक्टरों ने बताया कि समय पर बैड मिल जाने से उन की जान बच गई है. कुछ ही दिनों के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल गई. कांता प्रसाद मन ही मन सोच रहे थे कि आज अतुल उन की सहायता के लिए दौड़ कर न आता तो न जाने उन का क्या हाल होता.

इस कोरोना महामारी ने आज इंसान को इंसान से दूर कर दिया है. कोरोना का नाम सुनते ही अपने लोग ही दूरियां बना लेते हैं. ऐसे में अतुल और राम प्रसाद ने अपनी जान की परवा किए बगैर उन की हर संभव सहायता की थी. बुरे वक्त में अतुल ही उन के काम आया था, उन के अपने बेटे सुमित ने तो उन से अब महज औपचारिक रिश्ता बना कर रखा था. वे मन ही मन सोचने लगे कि अब उस से तो नाता रखना बेकार है.

अतुल के साथसाथ कांता प्रसाद भी अतीत की यादों से वर्तमान में लौटे. वे अभी भी अतुल को अपने गले से लगाए हुए थे. अतुल ने अपनेआप को उन से अलग करते हुए कहा, ‘‘ताऊजी, पुरानी बातों को छोड़ दीजिए, मैं तो आप के बेटे के समान हूं. क्या पिता अपने बेटे को डांटताफटकारता नहीं है. फिर आप तो मेरे बड़े पापा हैं. मुझे आप की बातों का कभी बुरा नहीं लगा. अब आप अतीत की कटु यादों को बिसरा दो और अपनी तबीयत का ध्यान रखो. अपनी मैडिकल की दुकान होने से कई बार अस्पतालों में जाना पड़ता है, इसी कारण कुछेक डाक्टरों से मेरी पहचान हो गई है. इसलिए आप को बैड मिलने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई और आप का समय पर इलाज हो गया. अब आप को डाक्टरों ने सख्त आराम की हिदायत दी है.’’

बाद में वह ताईजी की ओर मुखातिब होते हुए बोला, ‘‘ताईजी, अब आप ताऊजी के पास ही बैठी रहोगी और इन का पूरा ध्यान रखोगी, साथ ही, अपना भी ध्यान रखोगी. अब आप की उम्र हो गई है, सो आप दोनों को आराम करना चाहिए. अब आप दोनों को किसी तरह की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है. अभी कुछ ही देर में दिशा और निशा यहां पर आ रही हैं. वे किचन संभाल लेंगी और घर का सारा काम भी वे दोनों कर लेंगी.’’

अभी अतुल ने अपनी बात समाप्त भी नहीं की कि राम प्रसाद ने अपनी पत्नी सरला और दोनों बेटियों के साथ घर में प्रवेश किया. राम प्रसाद भीतर आते ही कांता प्रसाद के पैर छूने के लिए आगे बढ़े तो कांता प्रसाद ने उन्हें अपने गले से लगा लिया. दोनों की आंखों से गंगाजमुना बहने लगी. एक लंबे अरसे से दोनों के मन में जमा सारा मैल पलभर में आंसुओं में बह गया. दोनों भाइयों को वर्षों बाद गले मिलते देख परिवार के अन्य सदस्यों की आंखें भी पनीली हो गईं.

निशा और दिशा सभी के लिए चायनाश्ता बनाने के लिए रसोई घर की ओर मुड़ गईं. बैठक में कुछ देर तक निस्तब्धता छाई रही जिसे अतुल ने भंग करते हुए कहा, ‘‘ताऊजी, एक बात कहूं, कोरोना महामारी ने लोगों के बीच दूरियां जरूर बढ़ाई हैं पर हमारे लिए कोरोना लकी साबित हुआ है क्योंकि इस ने 2 परिवारों की दूरियां मिटाई हैं.’’ यह कहते हुए वह जोर से हंसने लगा, अतुल की हंसी ने गमगीन माहौल को खुशनुमा बना दिया.

हिकमत- क्या गरीब परिवार की माया ने दिया शादी के लिए दहेज?- भाग 2

‘‘तुम्हें घर पहुंचाने की जिम्मेदारी मेरी है.’’

‘‘फिर तो आप जब तक कहेंगी मैं रुक जाऊंगी.’’

शाम को मनोरमाजी ने कहा, ‘‘रात को हम दोनों का अकेले आटो पर जाना ठीक नहीं रहेगा. मैं विद्याधर को फोन कर देती हूं, वह अपने स्कूटर पर हमारे साथ हो लेगा.’’

‘‘जैसा आप ठीक समझें.’’

कुछ देर फोन पर बात करने के बाद मनोरमाजी ने पूछा, ‘‘माया, घर देर से जाने पर तुम्हें खाने के लिए कुछ परेशानी तो नहीं होगी?’’

माया ने इनकार में सिर हिलाया, ‘‘ढका रखा होगा, खा लूंगी.’’

‘‘तो क्यों न तुम भी हमारे साथ बाहर ही खा लो? विद्याधर को देर से जाने पर मां की बातें सुननी पड़ेंगी और मुझे अपने लिए कुछ पकाना पड़ेगा, सो हम लोग बाहर खा रहे हैं, फिक्र मत करो, औफिस के काम में देर हुई न, सो बिल औफिस को दे दूंगी. तुम अपने घर पर फोन कर दो कि तुम खाना खा कर आओगी या मुझे नंबर मिला कर दो, मैं तुम्हारी मां को समझा देती हूं.’’

‘‘आज के लिए इतना ही काफी है, माया. जाओ, फ्रैश हो जाओ,’’ मनोरमाजी ने 7 बजे के बाद कहा.

जब वह वापस आई तो विद्याधर आ चुका था.

‘‘तुम दोनों बातें करो, मैं अभी फ्रैश हो कर आती हूं,’’ कह कर मनोरमाजी चली गईं.

दोनों में परिचय तो था ही सो कुछ देर तक आसानी से बात करते रहे, फिर माया ने कहा, ‘‘बड़ी देर लगा दी मनोरमाजी ने.’’

‘‘बौस हैं और बौस की बीवी भी, कुछ तो ठसका रहेगा ही,’’ विद्याधर ने ठहाका लगा कर कहा. माया भी हंस पड़ी और रहीसही असहजता भी खत्म हो गई.

‘‘कल ‘निमंत्रण’ में चलेंगे, वहां का खाना इस से भी अच्छा है,’’ मनोरमाजी से खाने की तारीफ सुन कर विद्याधर ने कहा.

‘‘तुम्हारा खयाल है कि हम कल भी देर तक काम करेंगे?’’ मनोरमाजी ने पूछा.

‘‘बौस आप हैं. सो यह तो आप को ही मालूम होगा कि काम खत्म हुआ है या नहीं,’’ विद्याधर ने कहा.

‘‘काम तो कई दिन तक खत्म नहीं होगा लेकिन तुम लोग रोज देर तक रुकोगे?’’

‘‘हां, मुझे तो कुछ फर्क नहीं पड़ता,’’ विद्याधर बोला.

‘‘मुझे भी, अब जब काम शुरू किया है तो पूरा कर ही लेते हैं,’’ माया ने कहा.

‘‘ठीक है, मुझे भी आजकल घर पहुंचने की जल्दी नहीं है.’’

माया के घर के बाहर आटो रुकने पर विद्याधर ने भी स्कूटर रोक कर कहा, ‘‘कल मिलते हैं, शुभरात्रि.’’

‘जल्दी ही तुम इस में ‘स्वीट ड्रीम’ भी जोड़ोगे,’ मनोरमाजी ने पुलक कर सोचा, उन की योजना फलीभूत होती लग रही थी. औफिस में यह पता चलते ही कि मनोरमाजी और माया बकाया काम निबटा रही थीं, अन्य लोगों ने भी रुकना चाहा. मनोरमाजी सहर्ष मान गईं क्योंकि अब वे सब के खाना लाने के बहाने माया को विद्याधर के साथ भेज दिया करेंगी, घर छोड़ने का सिलसिला तो वही रहेगा. और काम का क्या उसे तो रबर की तरह खींच कर जितना चाहे लंबा कर लो.

मनोज के लौटने से पहले ही माया और विद्याधर में प्यार हो चुका था. उन्हें अब फोन करने या मिलने के लिए बहाने की जरूरत नहीं थी लेकिन मुलाकात लंचब्रेक में ही होती थी. छुट्टी के रोज या शाम को मिलने का रिस्क दोनों ही लेना नहीं चाहते थे.

मनोज ने उन के जीवन में और भी उथलपुथल मचाने के लिए मनोरमा को बुरी तरह लताड़ा.

‘‘जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा. माया के घर वाले तो बिना दहेज या कम दहेज के सजातीय वर से तुरंत शादी कर देंगे और विद्याधर के घर वाले भी हमारी थोड़ी सी कोशिश से मान जाएंगे,’’ मनोरमाजी ने कहा.

‘‘कुछ ठीक नहीं होगा मनोरमा, माना कि विद्याधर की मां को बहू की सख्त जरूरत है लेकिन बिरादरी में नाक कटवा कर नहीं, यानी उसे तो शादी में निर्धारित रकम मिलनी ही चाहिए जो माया का परिवार नहीं दे सकता और मां या बिरादरी के खिलाफ जाने की हिम्मत प्यार होने के बावजूद विद्याधर में नहीं है.’’

‘‘कई बार हिम्मत नहीं हिकमत काम आती है. मानती हूं विद्याधर तिकड़मी भी नहीं है लेकिन मैं तो हूं. आप साथ दें तो मैं दोनों की शादी करवा सकती हूं,’’ मनोरमाजी ने बड़े आत्मविश्वास से कहा, ‘‘आप को कुछ ज्यादा नहीं करना है, बस मेरे साथ विद्याधर के घर चलना है और बातोंबातों में उस के घर वालों को बताना है कि आप की नजर में विद्याधर के लिए एक उपयुक्त कन्या है, उस के बाद मैं सब संभाल लूंगी.’’

‘‘बस, इतना ही? तो चलो, अभी चलते हैं.’’

शनिवार की सुबह थी सो विद्याधर घर पर ही मिल गया. उस ने और घर वालों ने उन का स्वागत तो किया लेकिन चेहरे पर एक प्रश्नचिह्न लिए हुए, ‘कैसे आए?’

‘‘हम ने तो सोचा तुम तो कभी बुलाओगे नहीं, हम स्वयं ही चलते हैं,’’ मनोज ने कहा.

‘‘कैसे बुलाए बेचारा? घर में मेहमानों को चायपानी पूछने वाला कोई है नहीं,’’ विद्याधर की मां ने असहाय भाव से कहा, ‘‘मेरे से तो अब कुछ होता नहीं…’’

‘‘आप की उम्र अब काम नहीं, आराम करने यानी बहू से सेवा करवाने की है, मांजी,’’ मनोरमाजी ने कहा.

‘‘बहू का सुख तो लगता है मेरे नसीब में है ही नहीं,’’ मांजी उसांस ले कर बोलीं.

‘‘ऐसी मायूसी की बातें मत करिए, मांजी. मैं विद्याधर के लिए ऐसी सर्वगुण संपन्न, सजातीय लड़की बताता हूं कि यह मना नहीं करेगा,’’ मनोज ने कहा, ‘‘माया मनोरमा की कनिष्ठ अधिकारी है, बहुत ही नेक स्वभाव की संस्कारशील लड़की है, नेहरू नगर में घर है उस का…’’

‘‘शंकरलाल की बेटी की बात तो नहीं कर रहे?’’ विद्याधर की मां ने बात काटी, ‘‘मिल चुके हैं हम उन से, लड़की के सर्वगुण संपन्न होने में तो कोई शक नहीं है लेकिन बाप के पास दहेज में देने को कुछ नहीं है.

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