Family Story in Hindi: 7 बजे की ट्रेन – रेणु क्यों उदास रहती थी?

Family Story in Hindi: एक उदास शाम थी. स्टेशन के बाहर गुलमोहर के पीले सूखे पत्ते पसरे हुए थे जो हवा के धीमे थपेड़ों से उड़ कर इधरउधर हो रहे थे. स्टेशन पहुंचने के बाद उन्हीं पत्तों के बीच से हो कर रेणू प्लेटफौर्म के अंदर आ चुकी थी. वह धीमेधीमे कदमों से प्लेटफौर्म के एक किनारे पर स्थित महिला वेटिंगरूम की ओर जा रही थी. 7 बजे की ट्रेन थी और अभी 6 ही बजे थे. ट्रेन के आने में देर थी. शहर में उस की मां का घर स्टेशन से दूर है और ट्रांसपोर्टेशन की भी बहुत अच्छी सुविधा नहीं है. इसलिए वहां से थोड़ा समय हाथ में रख कर ही चलना पड़ता है, लेकिन आज संयोग से तुरंत ही एक खाली आटो मिल गया जिस के कारण रेणू स्टेशन जल्दी पहुंच गई थी. पिताजी की मृत्यु के बाद मां घर में अकेली ही रह गई थी. घर के सामने सड़क के दूसरी ओर एक पीपल का पेड़ था और उस के बाद थोड़ी दूरी पर एक बड़ा सा तालाब. दोपहर के समय सड़क एकदम सुनसान हो जाती थी.

कम आबादी होने के कारण इधर कम ही लोग आतेजाते थे. सुबह तो थोड़ी चहलपहल रहती भी थी पर दोपहर होतेहोते, जिन्हें काम पर जाना होता वे काम पर चले जाते बाकी अपने घरों में दुबक जाते. दूर तक सन्नाटा पसरा रहता. यह सूनापन मां के घर के आंगन में भी उतर आता था. घर के आंगन में स्थित हरसिंगार की छाया तब छोटी हो जाती.

मां कितनी अकेली हो गई थी. आज जब वह घर से निकल रही थी तो मां उस का हाथ पकड़ कर रोने लगी. इतना लाचार और उदास उस ने मां को कभी नहीं देखा था. उस की आंखों में अजीब सी बेचैनी और बेचारगी झलक रही थी.

जब वह छोटी थी तो घर की सारी जिम्मेदारियां मां ही उठाती थी. वह मानसिक रूप से कितनी मजबूत थी. पिताजी तो अपने काम से अकसर बाहर ही रहते थे. बस, वे महीने के आखिर में अपनी सारी कमाई मां के हाथ में रख देते थे. घरबाहर का सारा काम मां ही किया करती थी. उसे स्कूल, ट्यूशन छोड़ना और लाना सब वही करती थी. उस समय तो वह इलाका जहां आज उन का घर है, और भी उजाड़ था. स्कूल बस के आने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता था.

उसे याद है जब एक बार वह बीमार हो गई थी और कोई रिकशा नहीं मिल रहा था तो मां उसे अपनी गोद में ले कर उस सड़क तक ले गई थी जहां आटोरिकशा मिलता था. उस के बाद वहां से शहर के नामी अस्पताल में ले गई थी और उस का इलाज कराया था. तब उसे डाक्टरों ने 3 दिन तक अस्पताल में भरती रखा था. मां कितनी मुस्तैदी से अकेले ही अस्पताल में रह कर उस की देखभाल करती रही थी. पिताजी तो उस के एक सप्ताह बाद ही आ पाए थे. इस बार मां बता रही थी कि जब वह बीमार हुई तो 3 दिन तक बुखार से घर में अकेले तड़पती रही. कोई उसे डाक्टर के पास ले जाने वाला भी कोई नहीं था. वह तो भला हो दूध वाले का, जिस ने दया कर के एक दिन उसे डाक्टर के यहां पहुंचा दिया था.

यह सब बताते हुए मां कितनी बेबस और कमजोर दिख रही थी. उम्र के इस पड़ाव में अकेले रह जाना एक अभिशाप ही तो है. रेणू यह सब सोच ही रही थी.

रेणू अपने मांबाप की इकलौती संतान थी. उस के मातापिता ने कभी दूसरे संतान की चाहत नहीं की. वे कहते कि एक ही बच्चे को अगर अच्छे से पढ़ायालिखाया जाए तो वह 10 के बराबर होता है. रेणू को याद है कि उस की बड़ी ताई ने जब उस की मां से कहा था कि अनुराधा, तुम्हारे एक बेटा होता तो अच्छा रहता, तो कैसे उस की मां उन पर झुंझला गई थी. वह कहने लगी थी कि आज के जमाने में बेटी और बेटा में भी भला कोई अंतर रह गया है. बेटियां आजकल बेटों से बढ़ कर काम कर रही हैं. हम तो अपनी बेटी को बेटे से बढ़ कर परवरिश देंगे. प्लेटफौर्म पर कोई ट्रेन आ कर रुकी थी, जिस के यात्री गाड़ी से उतर रहे थे. अचानक प्लेटफौर्म पर भीड़ हो गई थी. लाउडस्पीकर पर ट्रेन के आने और उस के गंतव्य के संबंध में घोषणा हो रही थी. रेणू ने तय किया कि वेटिंगरूम में जाने से पूर्व एक कप चाय पी ली जाए और तब फिर आराम से वेटिंगरूम में कोई पत्रिका पढ़ते हुए समय आसानी से गुजर जाएगा. यही सोच कर वह एक टी स्टौल पर

रुक गई. उस के मांपिताजी ने उसे पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. इंजीनियरिंग करने के बाद रेणू आज बेंगलुरु में एक अच्छी कंपनी में कार्य कर रही थी. उस के पति भी वहीं एक अंतर्राष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत थे. दोनों की मासिक आय अच्छीखासी थी. किसी चीज की कोई कमी नहीं थी.

अब तक प्लेटफौर्म पर भीड़ छंट चुकी थी. प्लेटफौर्म पर आई गाड़ी निकल चुकी थी. रेणू ने वेटिंगरूम की ओर जाने का निश्चय किया. बगल के बुक स्टौल से उस ने एक पत्रिका भी खरीद ली थी. रेणू धीरेधीरे वेटिंगरूम की ओर बढ़ रही थी पर उस का मन फिर उड़ कर मां के उदास आंगन की ओर चला गया था. क्या मां ने चाय पी होगी? वह सोचने लगी. मां बता रही थी कि अब वह एक वक्त ही खाना बनाती है. एक बार सुबह कुछ बना लिया, फिर उसे ही रात में भी गरम कर के खा लेती थी. जितनी बार खाना बनाओ, उतनी बार बरतन धोने का झंझट.

इस बार रेणू ने अपनी मां को कुछ ज्यादा ही उदास पाया था. इस बार वह आई भी तो पूरे 1 साल के बाद थी. प्राइवेट कंपनी में वेतन भले ही ज्यादा मिलता हो पर जीने की आजादी खत्म हो जाती है और अभी तो उस का तरक्की करने का समय है. अभी तो जितनी मेहनत करेगी उतनी ही तरक्की पाएगी. इतनी दूर बेंगलुरु से बारबार आना संभव भी तो नहीं था. जब तक पिताजी थे, मां अकसर फोन कर के भी उस का हालचाल लेती रहती थी पर अब वह इस बात से भी उदासीन हो गई थी. पहले बगल में मेहरा आंटी रहती थीं तो मां को कुछ सहारा था. उन से बोलबतिया लेती थी और एकदूसरे को मदद भी करती रहती थीं. इस बार जब रेणू आई और उस ने मेहरा आंटी के बारे में पूछा तो मां ने बताया कि उस का बेटा विनीत उसे मुंबई ले कर चला गया है अपने पास. हालांकि रेणू ने यह महसूस किया था कि जैसे मां कह रही हो कि उस का तो बेटा था, उसे अपने साथ ले गया.

अपनी इन्हीं विचारों में डूबी रेणू अचानक से किसी चीज से टकराई, नीचे देखा तो वह एक आदमी था, जिस के दोनों पैर कटे थे. वह हाथ फैला कर उस से भीख मांग रहा था. वह आदमी बारबार अपने दोनों पैर दिखा कर उस से कुछ पैसे देने का अनुरोध कर रहा था. उस के चेहरे पर जो भाव थे, उसे देख कर रेणू चौंक गई. उसे लगा वह मानो गहरे पानी में डूबती जा रही है और सांस नहीं ले पा रही है. ऐसे ही भाव तो उस की मां के चेहरे पर भी थे जब वह अपनी मां से विदा ले रही थी. उसे लगा वह चक्कर खा कर गिर जाएगी. वह बगल में ही पड़ी एक बैंच पर धम्म से बैठ गई. वह आदमी अब भी उस के पैरों के पास उसे आशाभरी नजरों से देख रहा था. उसे उस आदमी की आंखों में अपनी मां की आंखें दिखाई दे रही थीं. ऐसी ही आंखें… बिलकुल ऐसी ही आंखें तो थीं उस की मां की जब वह घर से स्टेशन के लिए निकल रही थी.

रेणू ने अपनी आंखें बंद कर लीं और वहीं बैठी रही. 7 बज गए थे. बेंगलुरु जाने वाली ट्रेन का जोरजोर से अनाउंसमैंट हो रहा था. ट्रेन निकल जाने के बाद प्लेटफौर्म पर शांति छा गई और रेणू के मन में भी. रेणू थोड़ी देर वहीं बैठी रही.

अब उस का मन बहुत हलका हो गया था. आटो में बैठे हुए उस के मोबाइल पर मैसेज प्राप्त होने का रिंगटोन बजा. उस ने देखा कि बेंगलुरु जाने वाली अगले दिन की ट्रेन में 2 लोगों के टिकट कन्फर्म हो गए हैं. उस ने अपने पति को एक थैंक्स का मैसेज भेज दिया. ‘‘मां, आज क्या खाना बना रही हो? बहुत जोरों की भूख लगी है,’’ मां ने जैसे ही दरवाजा खोला, रेणू ने मां से कहा.

‘‘अरे, गई नहीं तुम? क्या हुआ, तबीयत तो ठीक है? ट्रेन तो नहीं छूट गई?’’ मां के स्वर में बेटी की खैरियत के लिए स्वाभाविक उद्विग्नता थी. ‘‘हां, मां सब ठीक है,’’ कहती हुई रेणू सोफे पर बैठ गई और मां को खींच कर वहीं बिठा लिया और उस की गोद में अपना सिर रख दिया. ऐसी शांति और ऐसा सुख, मां की गोद के अलावा कहां मिल सकता है. रेणू सोच रही थी. उस के गाल पर पानी की 2 गरम बूंदें गिर पड़ीं. ये शायद मां की खुशी के आंसू थे. अगले दिन बेंगलुरु जाने वाली ट्रेन में 2 औरतें सवार हुई थीं. Family Story in Hindi

Hindi Family Story: चौथा कंधा – सोनू की कालगर्ल भाभी

Hindi Family Story: अन्य पिछड़ा वर्ग का दीना कोलकाता के एक उपनगर संतरागाछी में रहता था. वहीं एक गली में उस की झोंपड़ी थी. उसी झोंपड़ी के आगे उस की छोटी सी दुकान थी, जहां उस ने एक सिलाई मशीन लगा रखी थी. दुकान में वह रैक्सीन के साथसाथ कपड़ों के बैग भी तैयार करता था. साथ में कुछ चप्पलें भी बनाता था.

दीना की पत्नी मीरा महल्ले में मजदूरी का काम करती थी या फिर गल्ले की दुकानों में चावल, गेहूं, मसाले की सफाई करती थी. बदले में नकद मजदूरी या अनाज मिल जाता था.

दीना के 4 बेटे थे, सब से बड़ा बेटा गोलू, उस के बाद पिंकू, टिंकू और सब से छोटा सोनू. चारों बेटे स्कूल जाते थे. बीचबीच में दोनों बड़े बेटे शहर जा कर सामान बेचा करते थे. परिवार की गुजरबसर हो जाती थी.

एक दिन दीना ने अपनी पत्नी मीरा से कहा, ‘‘हम दोनों कितने भाग्यवान हैं. हमारी मौत पर कंधा देने वाले चारों बेटे हैं. बाहरी कंधे की जरूरत नहीं पड़ेगी.’’

देखतेदेखते गोलू और पिंकू दोनों बीए पास कर गए. इत्तिफाक से राज्य के नए मुख्यमंत्री भी अन्य पिछड़ा वर्ग से थे. उन्होंने फरमान जारी किया कि अन्य पिछड़ा वर्ग के कोटे के खाली पदों पर फौरन बहाली कर ऐक्शन टेकन रिपोर्ट सरकार को सौंपी जाए.

दीना के दोनों बेटों को राज्य सरकार में आरक्षण के बल पर क्लर्क की नौकरी मिल गई थी. एक की पोस्टिंग बर्दवान थी और दूसरे की आसनसोल में हो गई.

कुछ साल तक वे दोनों परिवार की माली मदद करते रहे और बीचबीच में अपने घर भी आया करते थे.

टिंकू और सोनू भी अपनी पढ़ाई में लग गए थे. मीरा ने अब बाहर का काम करना बंद कर दिया था.

इधर दोनों बड़े बेटों ने अपनी मरजी से शादी कर ली. वे अपनीअपनी गृहस्थी में बिजी रहने लगे. घर में पैसे भेजना बंद कर दिया था.

टिंकू बीए फाइनल में था और सोनू मैट्रिक पास था. दीना को खांसी और दमे की पुरानी बीमारी थी. अब उस से काम नहीं होता था.

एक दिन सोनू ने पिता से कहा, ‘‘टिंकू भैया तो कुछ दिनों में बीए पास कर लेगा. उसे कुछ न कुछ काम जरूर मिल जाएगा. तब तक भैया को पढ़ने दें, आप का काम मैं संभाल लूंगा. भैया को नौकरी मिलते ही मैं अपनी पढ़ाई फिर से शुरू कर दूंगा.’’

दुकान का काम अब मीरा देखती थी. सोनू रोज कुछ बैग और चप्पलें ले कर बेचने निकल जाता था.

रोज की तरह सोनू उस दिन भी दोनों कंधों पर एकएक थैला लिए था. एक थैले में कुछ जोड़ी चप्पलें थीं, कुछ जैट्स और कुछ लेडीज. दूसरे कंधे पर भी थैला होता था, जिस में रैक्सीन और कपड़े के बैग थे.

अकसर प्लैनेटोरियम इलाके से थोड़ा आगे सड़क के किनारे एक सुंदर लड़की उसे दिखती थी. जब भी उसे देखता, वह पूछता ‘‘दीदी, कुछ लोगी?’’

वह मना करते हुए बोलती, ‘‘मुझे कुछ नहीं चाहिए, तुम अपना समय बरबाद न करो.’’

एक छुट्टी के दिन सोनू फिर उस लड़की के सामने रुक कर बोला, ‘‘दीदी, कुछ चाहिए आज? आप की चप्पलें काफी घिसी हुई लगती हैं.’’

लड़की ने अपनी साड़ी खींच कर नीचे कर चप्पलों को ढक लिया, फिर वह बोली, ‘‘कुछ नहीं चाहिए, पर तुम रोजरोज मुझ से ही क्यों पूछते हो? यहां तो थोड़ीथोड़ी दूरी पर हर खंभे पर लड़कियां खड़ी हैं, तुम उन से क्यों नहीं पूछते?’’

‘‘दीदी, आप मुझे अच्छी लगती हो. बस रुक कर दो पल आप से बात कर लेता हूं, बिक्री हो न हो.’’

‘‘अच्छा, अपना नाम बताओ?’’

‘‘मैं सोनू… और आप?’’

‘‘मैं पारो.’’

‘‘और, आप का देवदास कौन है?’’

‘‘सारा शहर मेरा देवदास है. चल भाग यहां से… बित्ते भर का छोकरा और गजभर की जबान,’’ पारो बोली.

सोनू हंसते हुए आगे बढ़ गया और पारो भी हंसने लगी थी.

अगले दिन फिर सोनू की मुलाकात पारो से हुई. उस ने पूछा, ‘‘दीदी, आप रोज यहां खड़ीखड़ी क्या करती हो?’’

‘‘मैं भी कुछ बेचती हूं.’’

‘‘क्या?’’

‘‘तुम नहीं समझोगे,’’ बोल कर पारो ने आगे वाले खंभे के पास खड़ी लड़की की तरफ दिखा कर कहा, ‘‘देख, जो वह करती है, मैं भी वही करती हूं.’’

सोनू ने देखा कि उस लड़की के पास एक लड़का आया और उस के साथ

2 मिनट बात की, फिर वे दोनों एक टैक्सी में बैठ कर निकल गए.

अगले दिन सोनू फिर उसी जगह पारो से मिला. दोनों ने आपस में एकदूसरे के परिवार की बातें कीं.

सोनू ने कहा, ‘‘मैं काम कर के घर का खर्च और बड़े भाई की पढ़ाई का खर्च जुटाने की कोशिश करता हूं.’’

पारो बोली, ‘‘तू तो बड़ा अच्छा काम कर रहा है. मैं भी अपने छोटे भाई

को पढ़ा रही थी. वह बीए पास कर

चुका है. कुछ जगह नौकरी की अर्जी

दी है. उसे काम मिलने के बाद मैं यहां नहीं मिलूंगी.’’

कुछ दिनों तक ऐसे ही चलता रहा था. सोनू की अकसर पारो से मुलाकात होती रहती थी. टिंकू बीए पास कर चुका था. नौकरी के लिए उस ने भी अर्जी दे रखी थी. पर साहब को रिश्वत चाहिए थी, इसलिए औफर लैटर रुका हुआ था.

पिछले 2-3 दिनों से सोनू सामान बेचने नहीं निकल सका था. उस के पिता की तबीयत ज्यादा खराब थी. उन्हें सरकारी अस्पताल में भरती किया गया था. उन की हालत में कोई सुधार नहीं था. टिंकू पिता के पास अस्पताल में था.

आज सोनू बाजार निकला था. पारो ने सोनू को आवाज दे कर कहा, ‘‘तू कहां था? मैं तुझे खुशखबरी देने के लिए ढूंढ़ रही थी. मेरे भाई को नौकरी मिल गई है आसनसोल के कारखाने में. सोमवार को उसे जौइन करना है. बस, अब 2-4 दिन बाद मैं यहां नहीं मिलूंगी.’’

‘‘मुबारक हो दीदी, तो मिठाई नहीं खिलाओगी? मेरे पिता अस्पताल

में भरती हैं, इसलिए मैं नहीं आ सका था.’’

‘‘घबराओ नहीं, सब ठीक हो जाएगा,’’ बोल कर पारो ने मिठाई उस के मुंह में डाल दी.

‘‘क्या ठीक होगा, टिंकू भैया की नौकरी रुकी है. वैसे, आरक्षण कोटे में औफर तो मिलना है, पर साहब ने घूस के लिए अभी तक लैटर इशू नहीं किया है.’’

‘‘तुम उस साहब का पता बताओ, मैं उन से रिक्वैस्ट करूंगी.’’

‘‘कोई फायदा नहीं, हम लोगों ने बहुत नाक रगड़ी उन के सामने, वह बिना रिश्वत लिए मानने वाला नहीं है.’’

‘‘अरे, तुम बताओ तो सही. हो सकता है कि कोई पहचान वाला हो और काम बन जाए.’’

‘‘ठीक है. बताता हूं, पर घूस की बात वह घर पर करता है.’’

‘‘ठीक है, घर पर ही मिल लूंगी.’’

उस दिन शाम को पारो उस साहब के घर पर मिली. एक काली मोटी सी औरत ने कहा, ‘‘मैं साहब की पत्नी हूं. कहो, क्या काम है?’’

पारो बोली, ‘‘मुझे भाई की नौकरी के सिलसिले में उन से बात करनी है.’’

‘‘ठीक है, तुम यहीं रुको. मैं उन्हें भेजती हूं,’’ बोल कर वह अंदर चली गई.

साहब आए, तो पारो को ऊपर से नीचे तक गौर से देखते रह गए.

पारो ने अपने आने की वजह बताई, तो वे बोले, ‘‘तुम लोगों को पता होना चाहिए कि दफ्तर का काम मैं घर पर नहीं करता हूं.’’

पारो ने सीधे मुद्दे पर आते हुए धीमी आवाज में कहा, ‘‘सर, मैं ज्यादा रुपए तो नहीं दे सकती हूं, हजार डेढ़ हजार रुपए से काम हो जाता, तो बड़ी मेहरबानी होगी.’’

साहब ने धीरे से कहा, ‘‘मैं तुम से ज्यादा लूंगा भी नहीं. बस जो तुम्हारे पास है, उतने से मैं काम कर दूंगा. तुम कल शाम को इस होटल में मिलना. याद रहे, अकेले में प्राइवेट मीटिंग होगी,’’ और उन्होंने होटल और कमरा नंबर पारो को बता दिया.

अगले दिन साहब ने दफ्तर जाते समय पत्नी से कहा, ‘‘लंच के बाद मुझे बर्दवान जाना है. एक जरूरी मीटिंग है. आतेआते रात के 12 बज जाएंगे.’’

दूसरे दिन पारो सोनू को रोज वाली जगह पर नहीं मिली. वह तो साहब के साथ होटल के कमरे में मीटिंग में थी. रात के 12 बजे तक साहब ने पारो के साथ इस उम्र में खूब मौजमस्ती की.

पारो ने पूछा, ‘‘मेरा काम तो हो जाएगा न सर?’’

साहब बोले, ‘‘मैं इतना बेईमान नहीं हूं. तुम ने मेरा काम कर दिया, तो समझो तुम्हारा काम हो चुका है. और्डर मैं ने आज साइन कर दिया है. मेरे ही दराज में है. कल सुबह भाई को अपना आईडी प्रूफ ले कर दफ्तर भेज देना. डाक से पहुंचने में कुछ दिन लग जाएंगे. सरकारी तौरतरीके तो जानती ही हो.’’

‘‘जी सर, मैं भाई को भेज दूंगी,’’ साड़ी लपेटते हुए पारो बोली.

अगले दिन सुबहसुबह पारो सोनू के घर पहुंची. सोनू और टिंकू घर पर ही थे. उन की मां अस्पताल में थीं.

पारो ने टिंकू से दफ्तर जा कर बहाली का और्डर लेने को कहा.

सोनू बोला, ‘‘कितनी घूस देनी पड़ी?’’

पारो बोली, ‘‘मेरे पास ज्यादा कुछ था भी नहीं. थोड़े में ही मान गए वे.’’

‘‘ओह दीदी, तुम कितनी अच्छा हो,’’ बोल कर सोनू उस के पैर छूने को ?ाका, तो पारो ने उसे रोक कर गले लगाया.

टिंकू ने दफ्तर से और्डर ले कर उसी दिन जौइन भी कर लिया. दीना को यह खुशखबरी सोनू ने दे दी थी.

दीना बोला, ‘‘अब मैं चैन से मर सकूंगा. टिंकू अपनी मां और छोटे भाई की देखभाल करेगा.’’

उसी शाम को दीना चल बसा, इत्तिफाक से पारो और उस का भाई

तपन उस दिन अस्पताल में दीना से मिलने गए थे. सोनू ने दोनों बड़े भाइयों को पिता की मौत की खबर उसी समय दे दी और कहा कि दाहसंस्कार कल सुबह होना है.

बड़ा बेटा गोलू तो 2 घंटे की दूरी पर बर्दवान में था. वह बोला, ‘‘मैं तो नहीं आ सकूंगा, बहुत जरूरी काम है, तेरहवीं के दिन आने की कोशिश करूंगा.’’

दूसरा बेटा पिंकू आसनसोल से उसी रात आ गया, पर उस की पत्नी नहीं आई. सुबह अर्थी उठने वाली थी. पारो भी अपने भाई के साथ आई थी.

टिंकू ने सोनू से कहा, ‘‘हम तीन भाई तो हैं ही. जा कर पड़ोस से किसी को बुला ला, कंधा देने के लिए.’’

पारो आगे बढ़ कर बोली, ‘‘चौथा कंधा मेरा भाई तपन देगा.’’

मीरा अपने पति की अंतिम विदाई के समय फूटफूट कर रो रही थी. उसे पति की कही बात याद आ गई. कितने फख्र से कहते थे कि मरने पर मेरे चारों बेटे हैं ही कंधा देने के लिए.

कुछ दिनों बाद सोनू का घर सामान्य हो चला था. पारो अकसर आती रहती थी. सोनू अपनी पढ़ाई में लग गया.

एक दिन मीरा ने पारो से कहा, ‘‘बेटी, तुम ने बड़े एहसान किए हैं हम लोगों पर. एक और एहसान कर सकोगी?’’

‘‘मां, मैं ने कोई एहसान नहीं किया है. आप बोलिए, मैं क्या कर सकती हूं?’’

‘‘सोनू को अपना देवर बना लो, वह तुम्हारी बड़ी तारीफ करता है. हां, अगर टिंकू तुम्हें ठीक लगे तो…’’

टिंकू भी उस समय घर में था, उस ने खामोश रह कर स्वीकृति दे दी थी और पारो की ओर देख कर उस के जवाब का इंतजार कर रहा था.

पारो बोली, ‘‘आप लोगों को मैं अंधेरे में नहीं रखना चाहती हूं. मैं कुछ दिन पहले तक कालगर्ल थी. पता नहीं, टिंकू मुझे पसंद करेंगे या नहीं.’’

‘‘कौन सी गर्ल, वह क्या होता है?’’ मां ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं मां. सेल्स गर्ल समझो. सोनू इस के बारे में मुझे सब बताया करता था. पारो बहुत अच्छी लड़की है. अब फैसला इसे करने दो.’’

सोनू पारो के पास आ कर बोला, ‘‘मान जाओ न दीदी… नहीं भाभी.’’

पारो ने नजरें झका लीं. उस ने सिर पर पल्लू रख कर मां के पैर छुए. Hindi Family Story

Hindi Family Story: दूसरी भूल – अनीता की कशमकश

Hindi Family Story: अनीता बाजार से कुछ घरेलू चीजें खरीद कर टैंपू में बैठी हुई घर की ओर आ रही थी. एक जगह पर टैंपू रुका. उस टैंपू में से 4 सवारियां उतरीं और एक सवारी सामने वाली सीट पर आ कर बैठ गई.जैसे ही अनीता की नजर उस सवारी पर पड़ी, तो वह एकदम चौंक गई और उस के दिल की धड़कनें बढ़ गईं.

इस से पहले कि अनीता कुछ कहती, सामने बैठा हुआ नौजवान, जिस का नाम मनोज था, ने उस की ओर देखते हुए कहा, ‘‘अरे अनीता, तुम?’’

‘‘हां मैं,’’ अनीता ने बड़े ही बेमन से जवाब दिया.

‘‘तुम कैसी हो? आज हम काफी दिन बाद मिल रहे?हैं,’’ मनोज के चेहरे पर खुशी तैर रही थी.

‘‘मैं ठीक हूं.’’

‘‘मुझे पता चला था कि यहां इस शहर में तुम्हारी शादी हुई है. जान सकता हूं कि परिवार में कौनकौन हैं?’’

‘‘मेरे पति, 2 बेटियां और एक बेटा,’’ अनीता बोली.

‘‘तुम्हारे पति क्या करते हैं?’’

‘‘कार मेकैनिक हैं.’’

‘‘क्या नाम है?’’

‘‘नरेंद्र कुमार.’’

‘‘मैं यहां अपनी कंपनी के काम से आया था. अब काम हो चुका है. रात की ट्रेन से वापस चला जाऊंगा,’’ मनोज ने अनीता की ओर देखते हुए कहा, ‘‘घर का पता नहीं बताओगी?’’

‘‘क्या करोगे पता ले कर?’’ अनीता कुछ सोचते हुए बोली.

‘‘कभी तुम से मिलने आ जाऊंगा.’’

‘‘क्या करोगे मिल कर? देखो मनोज, अब मेरी शादी हो चुकी?है और मुझे उम्मीद है कि तुम ने भी शादी कर ली होगी. तुम्हारे घर में भी पत्नी व बच्चे होंगे.’’

‘‘हां, पत्नी और 2 बेटे हैं. तुम मुझे पता बता दो. वैसे, तुम्हारे घर आने का मेरा कोई हक तो नहीं है, पर एक पुराने प्रेमी नहीं, बल्कि एक दोस्त के रूप में आ जाऊंगा किसी दिन.’’

‘‘शिव मंदिर के सामने, जवाहर नगर,’’ अनीता ने कहा.

कुछ देर बाद टैंपू रुका. अनीता टैंपू से उतरने लगी.

‘‘अनीता, अब तो रात को मैं वापस आगरा जा रहा हूं, फिर किसी दिन आऊंगा.’’

अनीता ने कोई जवाब नहीं दिया. घर पहुंच कर उस ने देखा कि उस की बड़ी बेटी कल्पना, छोटी बेटी अल्पना और बेटा कमल कमरे में बैठे हुए स्कूल का काम कर रहे थे.

अनीता ने कल्पना से कहा, ‘‘बेटी, मैं जरा आराम कर रही हूं. सिर में तेज दर्द है.’’

‘‘मम्मी, आप को डिस्प्रिन की दवा या चाय दूं?’’ कल्पना ने पूछा.

‘‘नहीं बेटी, कुछ नहीं,’’ अनीता ने कहा और दूसरे कमरे में जा कर लेट गई.

अनीता को तकरीबन 11 साल पहले की बातें याद आने लगीं. जब वह 12वीं जमात में पढ़ रही थी. कालेज से छुट्टी होने पर वह एक नौजवान को अपने इंतजार में पाती थी. वह मनोज ही था. उन दोनों का प्यार बढ़ने लगा. अनीता जान चुकी थी कि मनोज किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर रहा है.

मनोज के पिताजी का अपना कारोबार था और अनीता के पिताजी का भी. वे दोनों शादी करना चाहते थे, पर अनीता के पापा को यह रिश्ता बिलकुल मंजूर नहीं था.

लिहाजा, अनीता और मनोज ने घर से भागने की ठान ली. घर से 50 हजार रुपए नकद व कुछ जेवर ले कर अनीता मनोज के साथ जयपुर जाने वाली ट्रेन में बैठ गई थी.

जयपुर पहुंच कर वे 8-10 दिन होटल में रहे. पता नहीं, पुलिस को कैसे पता चल गया और उन दोनों को पकड़ लिया गया. अनीता के पापा को आगरा से बुलाया गया. मनोज को पुलिस ने नहीं छोड़ा. नाबालिग लड़की को भगाने के अपराध में जेल भेज दिया गया.

पापा को अनीता से बहुत नफरत हो गई थी, क्योंकि उस ने कहना नहीं माना था.

अनीता ने आगे पढ़ाई करने को कहा था, पर पापा ने मना कर दिया था और उस की शादी करने की ठान ली थी. उस के लिए रिश्ते ढूंढ़े जाने लगे.

सालभर इधरउधर धक्के खाने के बाद पापा को एक रिश्ता मिल ही गया था. विधुर नरेंद्र की उम्र 35 साल थी. उस की पत्नी की एक हादसे में मौत हो चुकी थी. उस की 2 बेटियां थीं. एक 5 साल की और दूसरी 3 साल की.

नरेंद्र एक कार मेकैनिक था. उस की अपनी वर्कशौप थी. पापा ने नरेंद्र से जब शादी की बात की, तो उसे सब सच बता दिया था. नरेंद्र ने सब जान कर भी मना नहीं किया था.

अनीता शादी कर के नरेंद्र के घर आ गई थी. अब वह 2 बेटियों की मां बन गई थी.

एक दिन नरेंद्र ने कहा था, ‘देखो अनीता, मुझे तुम्हारी पिछली जिंदगी से कोई मतलब नहीं. तुम भी वह सब भुला दो. इस घर में आने का मतलब है कि अब तुम्हें एक नई जिंदगी शुरू करनी है. अब तुम अल्पना और कल्पना की मम्मी हो… तुम्हें इन दोनों को पालना है.’

‘जी हां, मैं ऐसा ही करूंगी. अब कल्पना और अल्पना आप की ही नहीं, मेरी भी बेटियां हैं,’ अनीता ने कहा था.

एक साल बाद अनीता ने एक बेटे को जन्म दिया था. बेटा पा कर नरेंद्र बहुत खुश हुआ था. बेटे का नाम कमल रखा गया था.

अनीता नरेंद्र को पति के रूप में पा कर खुश थी और उस ने भी कभी शिकायत का मौका नहीं दिया था. पापामम्मी भी अपना गुस्सा भूल कर अब उस से मिलने आने लगे थे.

आज दोपहर अनीता की अचानक मनोज से मुलाकात हो गई. उसे मनोज को घर का पता नहीं देना चाहिए था.

उस के दिल में एक अनजाना सा डर बैठने लगा. वह आंखें बंद किए चुपचाप लेटी रही.

अगले दिन सुबह के तकरीबन 11 बजे अनीता रसोई में खाना तैयार कर रही थी. कालबेल बज उठी. उस ने दरवाजा खोला, तो सामने मनोज खड़ा था.

‘‘तुम…’’ अनीता के मुंह से अचानक ही निकला,’’ तुम तो कह रहे थे कि मैं रात की गाड़ी से आगरा जा रहा हूं.’’

‘‘अनीता, मुझे रात की गाड़ी से ही आगरा जाना था, पर टैंपू में तुम से मिलने के बाद मेरा दिल दोबारा मिलने को बेचैन हो उठा. होटल में रातभर नींद नहीं आई. तुम्हारे बारे में ही सोचता रहा. तुम नहीं जानती अनीता कि मैं आज भी तुम को कितना चाहता हूं,’’ मनोज ने कहा.

अनीता चुपचाप खड़ी रही. उस ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘अनीता, अंदर आने के लिए नहीं कहोगी क्या? मैं तुम से केवल 10 मिनट बातें करना चाहता हूं.’’

‘‘आओ,’’ न चाहते हुए भी अनीता के मुंह से निकल गया.

कमरे में सोफे पर बैठते हुए मनोज ने इधरउधर देखते हुए पूछा, ‘‘कोई दिखाई नहीं दे रहा है… सभी कहीं गए हैं क्या?’’

‘‘बच्चे स्कूल गए हैं और नरेंद्र वर्कशौप गए हैं,’’ अनीता बोली.

तभी रसोई से गैस पर रखे कुकर से सीटी की आवाज सुनाई दी.

‘‘जो कहना है, जल्दी कहो. मुझे खाना बनाना है.’’

‘‘अनीता, तुम अब पहले से भी ज्यादा खूबसूरत हो गई हो. दिल करता है कि तुम्हें देखता ही रहूं. क्या तुम्हें जयपुर के होटल के उस कमरे की याद आती है, जहां हम ने रातें गुजारी थीं?’’

‘‘क्या यही कहने के लिए तुम यहां आए हो?’’

‘‘अनीता, मैं तुम्हारे पति को सब बताना चाहता हूं.’’

‘‘तुम उन्हें क्या बताओगे?’’ अनीता ने घबरा कर पूछा.

‘‘मैं नरेंद्र से कहूंगा कि जयपुर में मैं अकेला ही नहीं था. मेरे 2 दोस्त और भी थे, जिन के साथ अनीता ने खूब मस्ती की थी.’’

‘‘झठ, बिलकुल झूठ,’’ अनीता गुस्से से चीखी.

‘‘यह झूठ है, पर इसे मैं और तुम ही तो जानते हैं. तुम्हारा पति तो सुनते ही एकदम यकीन कर लेगा,’’ मनोज ने अनीता की ओर देखते हुए कहा.

अनीता ने हाथ जोड़ कर पूछा, ‘‘तुम आखिर चाहते क्या हो?’’

‘‘मैं चाहता हूं कि आज दोपहर बाद तुम मेरे होटल के कमरे में आ जाओ.’’

‘‘नहीं मनोज, मैं नहीं आऊंगी. अब मैं अपनी जिंदगी में जहर नहीं घोलूंगी. नरेंद्र मुझ पर बहुत विश्वास करते हैं. मैं उन से विश्वासघात नहीं करूंगी,’’ अनीता ने मनोज से घूरते हुए कहा.

‘‘तो ठीक है अनीता, मैं नरेंद्र से मिलने जा रहा हूं वर्कशौप पर,’’ मनोज ने कहा.

‘‘वर्कशौप जाने की जरूरत नहीं है. मैं यहीं आ गया हूं,’’ नरेंद्र की आवाज सुनाई पड़ी.

यह देख अनीता और मनोज बुरी तरह चौंक उठे. अनीता के चेहरे का रंग एकदम पीला पड़ गया.

‘‘यहां क्यों आया है?’’ नरेंद्र ने मनोज को घूरते हुए पूछा, ‘‘तुझे इस घर का पता किस ने दिया?’’

‘‘अनीता ने. कल यह मुझे बाजार में मिली थी,’’ मनोज बोला.

अनीता ने घबराते हुए नरेंद्र को पूरी बात बता दी.

‘‘अबे, तुझे अनीता ने पता क्या इसलिए दिया था कि तू घर आए और उसे ब्लैकमेल करे. मैं ने तुम दोनों की बातें सुन ली हैं. अब तू यहां से दफा हो जा. फिर कभी इस घर में आने की कोशिश की, तो पुलिस के हवाले कर दूंगा,’’ नरेंद्र ने मनोज की ओर नफरत से देखते हुए गुस्साई आवाज में कहा.

मनोज चुपचाप घर से निकल गया.अनीता को रुलाई आ गई. वह सुबकते हुए बोली, ‘‘मुझे माफ कर दो. मुझ से बहुत बड़ी भूल हो गई, जो मैं ने मनोज को घर का पता दे दिया था.’’

‘‘हां अनीता, यह तुम्हारी जिंदगी की दूसरी भूल है, जो तुम ने अपने दुश्मन को घर में आने दिया. मनोज तुम्हारा प्रेमी नहीं, बल्कि दुश्मन था. सच्चे प्रेमी कभी भी अपनी प्रेमिका को घर से रुपएगहने वगैरह ले कर भागने को नहीं कहते.’’

अनीता की आंखों से आंसू बहते रहे. नरेंद्र ने उस के चेहरे से आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘अनीता, मुझे तुम पर बहुत विश्वास था, पर आज की बातें सुन कर यह विश्वास और बढ़ गया है. वैसे तो मनोज अब यहां नहीं आएगा और अगर आ भी गया, तो मुझे फोन कर देना. मैं उसे पुलिस के हवाले कर दूंगा.’’

नरेंद्र की यह बात सुन कर अनीता के मुंह से केवल इतना ही निकला, ‘‘आप कितने अच्छे हैं…’ Hindi Family Story

Hindi Romantic Story: कैसी हो गुंजन – उस रात किशन ने ऐसा क्या किया

Hindi Romantic Story: ‘गुंजन, एक गुजारिश है तुम से. जिस तरह तुम ने अपना पुराना सिम बदल लिया है, उसी तरह यह अपना दूसरा सिम भी बदल लो, क्योंकि मैं तुम्हें फोन किए बिना नहीं रह पाता. जब मुझे तुम्हारा नंबर ही पता न होगा, तो मैं कम से कम तुम्हें भूलने की कोशिश तो कर पाऊंगा.

‘मैं तुम्हें फोन कर के परेशान नहीं करूंगा. यह सोच कर मैं हर दिन कसम खाता हूं, लेकिन फिर मजबूर हो कर अपनी ही कसम तोड़ कर तुम्हें फोन करने लगता हूं.

‘गुंजन प्लीज, अपना सिम बदल डालो, वरना मैं तुम्हें कभी भी भूल नहीं पाऊंगा.’

मैं उस दिन बस इतना ही लिख पाया था. इस के आगे कुछ लिखने की जैसे मेरी हिम्मत ही टूट गई थी. शायद गुंजन मेरी सोच में इस तरह शामिल थी कि मैं उसे भूल नहीं पा रहा था.

दूसरी तरफ गुंजन थी, जो आज पूरे 2 महीने हो गए थे, न तो उस ने मुझे फोन किया था और न ही उस ने मेरा फोन उठाया था. वह जनवरी, 2015 की एक शाम थी, जब मुझे रास्ते में पड़ा हुआ एक मोबाइल फोन मिला था. मैं ने जब फोन उठा कर देखा तो वह पूरी तरह से चालू था. बस, उस में पैसे नहीं थे.

फोन किस का है? यह सवाल जरूर मेरे जेहन में आया था, लेकिन इस का जवाब भी मुझे अपने अंदर से ही मिल गया था. मेरा मन कहता था कि जिस का भी फोन होगा, वह खुद ही फोन कर के बताएगा और फिर मैं उसे पहुंचा दूंगा.

अभी सिर्फ 2 दिन ही हुए थे कि तीसरे दिन उस मोबाइल पर मैसेज आया, तो मुझे इस बात का अंदाजा लग गया था कि शायद वह फोन कालेज में पढ़ने वाले किसी लड़के का था, जिसे मैसेज करने वाली लड़की उस की रिश्ते में बहन थी.

मैसेज पढ़ कर पहले तो मेरा मन हुआ कि मैं भी एक मैसेज करूं, लेकिन चूंकि उस में पैसे नहीं थे, इसलिए मैं इस बात को टाल गया. 1-2 दिन बाद एक दिन जब मैं ने उस फोन को रीचार्ज कराया, तो मैं ने उस लड़की को मैसेज के जरीए बता दिया कि वह फोन मुझे पड़ा मिला है और अभी तक किसी ने फोन कर के इस फोन के बारे में पूछा भी नहीं है.

मेरे मैसेज करने के चंद मिनटों बाद ही उधर से फोन आ गया. उधर से आवाज आई, ‘आप कौन बोल रहे हैं? क्या आप बताएंगे कि यह मोबाइल फोन आप को कब, कहां और कैसे मिला?’

मैं ने बिना किसी लागलपेट के साफसाफ सबकुछ बता दिया, ‘‘मैडम, यह फोन एक शाम को मुझे रास्ते में पड़ा मिला था. मैं फतेहपुर से बोल रहा हूं. वहीं बसअड्डे के पास मुझे यह शाम के 6 बजे के आसपास मिला था.’’

‘तो जब आप को यह फोन पड़ा मिला, तो क्या आप ने इस के मालिक को खोजने की तकलीफ उठाई?’

उस के सीधे से सवाल का मैं ने भी सीधा सा जवाब दिया था, ‘‘नहीं मैडम, मैं ने सोचा कि जिस का फोन होगा, वह खुद ही फोन कर के पता करेगा.’’

इस बार मेरे जवाब के बाद उस ने बस यही कहा था, ‘अच्छा, कोई बात नहीं,’ और तुरंत फोन रख दिया था.

उस के फोन रखने के बाद मैं भी इस बात को यहीं भूल गया था और अपनी पढ़ाई में मशगूल हो गया था. मैं यहीं फतेहपुर शहर में रह कर पढ़ाई करता था और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाएं देता था. इस वजह से मैं अपनेआप में ही मस्त रहने वाला जीव था. लेकिन यह मेरी भूल थी, क्योंकि उस फोन वाली लड़की ने मेरा सबकुछ बदल डाला था. मोबाइल फोन की खोजबीन से चालू हुआ यह सिलसिला आगे बढ़ गया था.

उस लड़की का नाम गुंजन था, जो हमारे पड़ोसी जिले बांदा की रहने वाली थी. डबल एमए करने के बाद उस का 3 साल पहले विशिष्ट बीटीसी में चयन हो चुका था. वह इस समय अपने गांव के ही पास प्राइमरी स्कूल में पढ़ाती थी.

वह स्वरोजगार थी और मैं बेरोजगार. सो, मैं हीनभावना से घिरा हुआ था, लेकिन उस के प्यार ने मुझ में आत्मविश्वास पैदा कर दिया था. वह मुझे हमेशा पढ़ाई करते रहने की सलाह देती थी. अकसर बातों ही बातों में हम एकदूसरे को प्यारभरी बातों में सराबोर करने लगे थे. लेकिन फिर भी हम ने अभी तक एकदूसरे को देखा न था, इसलिए एक दिन जब मैं ने कहा कि गुंजन, मैं तुम्हें जीभर कर देखना चाहता हूं, तो उस ने भी कहा था कि किशन, मैं भी तुम्हें न केवल देखना चाहती हूं, बल्कि इस प्यार को रिश्ते में बदलना चाहती हूं.

‘‘मतलब?’’ मैं ने चौंक कर पूछा, तो उस ने बताया, ‘किशन, मैं तुम्हें बेहद प्यार करती हूं. मैं ने तुम्हें देखा जरूर नहीं है, लेकिन मेरे लिए इस की ज्यादा अहमियत नहीं है. फिर भी मैं केवल इसलिए तुम्हारे पास आना चाहती हूं कि मैं तुम्हारी गोद में सोना चाहती हूं. जिस प्यार को मैं ने आज तक सिर्फ फोन से महसूस किया है, उसे अब मैं जी भर कर जीना चाहती हूं.

‘साफसाफ शब्दों में कहूं, तो मैं अब तुम्हारी होना चाहती हूं जानू.’ तब मैं संभल कर बोला था, ‘‘हांहां रानी, मैं भी तो ऐसा ही चाहता हूं.’’

मैं ने इस जवाब के अलावा और कुछ भी नहीं कहा था. आप को बताना चाहता हूं कि जब गुंजन बेहद रोमांटिक मूड में होती थी, तो वह मुझे ‘जानू’ बोलती थी और उस वक्त मैं उसे ‘रानी’ कहता था.

हम दोनों ने महसूस किया कि हमारा शरीर फोन में बात करतेकरते इतना प्यार में पिघल जाता था कि फिर हमें कईकई घंटे उस प्यार की गरमाहट महसूस होती रहती थी. उस वक्त हम दोनों बस यही सोचा करते थे कि काश, वह पल आ जाए, जब हम आमनेसामने हों और हमारे अलावा कोई भी न हो.

मैं अकसर उसे छुट्टियों में अपने पास बुलाने की जिद करता था, तो वह कहती थी कि वह छुट्टियों में कतई मेरे पास नहीं आएगी, क्योंकि जब स्कूल खुला हो, तभी वह घर से बाहर निकल सकती है, क्योंकि तब घर वाले किसी तरह का सवाल नहीं करते.

हम दोनों रात में जी भर कर बात जरूर करते थे, लेकिन फिर भी कभी मन नहीं भरता था. वैसे, हमारे बीच एक और भी खेल होता था. वह यह कि प्यार के पलों में जो शब्द मुंह से अकसर निकल जाते हैं, अब हम फोन पर जी भर कर एकदूसरे से कहते और सुनते थे.

यह भी सच है कि मैं अकसर गुंजन से मिलने की जिद करता था, लेकिन वह तब यही कहती थी, ‘जानू, धीरज रखो. जिस दिन आऊंगी. सारी रात के लिए आऊंगी और अपनी 26 साल की प्यास बुझाऊंगी, फिर जितना चाहे प्यार कर लेना, बिलकुल मना नहीं करूंगी.’

और फिर एक दिन सचमुच उस ने ऐसा ही किया. उस ने मुझे फोन कर के बताया कि वह शाम तक मेरे पास आ जाएगी, तो मैं सातवें आसमान में उड़ने लगा था. गुंजन को लेने मैं बसअड्डे पर एक घंटा पहले ही पहुंच गया था और पहली बार उसे देखने के लालच में बेहद खुश था. लेकिन यह क्या. जब वह बस से उतरी, तो मैं डर गया और एक पल को उस से न मिलने का मन हुआ, लेकिन तभी उस का फोन आ गया.

आप सोचते होंगे कि मैं डर क्यों गया था? तो बात यह थी कि वह इतनी खूबसूरत थी कि मुझे लगा कि वह मेरी कैसे बन सकती है, क्योंकि मेरी शक्ल तो बेहद सामान्य सी थी.

लेकिन यह मेरा केवल भरम था. जब मैं ने उस का फोन उठाया, तो वह हड़बड़ाई सी बोली, ‘किशन, तुम कहां हो? जल्दी आ जाओ. मैं तुम्हारे पास आना चाहती हूं.’ और फिर मैं उस के सामने जा पहुंचा. मैं ने उसे तुरंत ही अपनी मोटरसाइकिल पर बिठा लिया और बिना बोले चल दिया.

कमरा खोल कर मैं ने उस से बैठने को कहा था, लेकिन मैं बेहद बेचैन था. पहली बात तो वह एक लड़की थी, जो मेरे कमरे में आज पहली बार आई थी. दूसरी बात यह कि अगर किसी को कुछ पता चल जाए, तो बदनामी होने का भी बेहद डर था.

लेकिन वह सिर्फ पानी के गिलास में अपने होंठ डुबा कर बूंदबूंद पानी पी रही थी, बिना किसी खास हरकत के. काफी देर बाद मैं ने उस से कहा, ‘‘चाय पीओगी?’’

‘‘इतनी शाम को?’’

‘‘क्यों, अभी तो 8 ही बजे हैं?’’ मैं ने जब सवाल किया, तो उस ने भी बताया, ‘‘8 तो बजे हैं, लेकिन सर्दियों के 8 चाय पीने को नहीं खाना खाने को कहते हैं, लेकिन मुझे खाना नहीं खाना. बस, तुम से एक बात कहनी है.’’

‘‘क्या?’’ मैं ने लापरवाही से पूछा, तो उस ने कहा, ‘‘क्या तुम 20 मिनट के लिए मुझे अकेला छोड़ सकते हो?’’

‘‘ठीक है, मैं जा रहा हूं,’’ उस के सवाल के जवाब में मैं ने बस इतना ही कहा था.

20 मिनट बाद दरवाजा खोल कर उस ने खुद ही मुझे अंदर आने के लिए कहा, तो मैं धीरेधीरे अंदर आ गया. अंदर पहुंच कर मैं ने जो देखा, बस देखता ही रह गया. साड़ी पहन कर गुंजन दुलहन का पूरा शृंगार किए घूंघट में खड़ी थी. मुझ से जब रहा न गया, तो मैं ने घूंघट उठा कर देखा. वह बिलकुल सुहागरात में सजी दुलहन लग रही थी.

मुझे देख कर वह नजरें नीची कर के बोली, ‘‘किशन, मैं तुम्हारी दुलहन बनना चाहती हूं. क्या तुम मेरी मांग में यह सिंदूर सजाओगे?’’ इतना कह कर उस ने सिंदूर की डब्बी मेरी तरफ बढ़ाई.

मैं ने तुरंत उस के हाथ से वह डब्बी ले ली और सिंदूर निकाल कर कहा, ‘‘मैं तुम्हें अपनी दुलहन स्वीकार करता हूं,’’ और फिर इतना कह कर मैं ने उस की मांग सजा दी.

फिर हम ने पूरी रात सुहागरात मनाई थी. उस के गदराए बदन को मैं ने जी भर कर भोगा था. उस के सीने की गोलाइयां, उस के होंठ, उस का सारा बदन मैं ने चुंबनों से गीला कर दिया था. वह मुझ से इस तरह लिपट जाती थी, जैसे कोई तड़पती हुई मछली पानी की धार से लिपटती है. हम ने उस रात शायद अपनी पूरी जिंदगी जी ली थी. लेकिन चूंकि हमें सुबह 5 बजे निकलना भी था, इसलिए मन को मार कर पहले तैयार हुए, फिर कमरे से निकल गए. मैं उसे उस के गांव तक छोड़ने जाना चाहता था, लेकिन उस की जिद के आगे मैं हार गया और उसे उस के गांव से कुछ किलोमीटर पहले ही छोड़ कर वापस आ गया.

तब से ले कर आज तक मैं उस से बात करने को तरसता हूं. मैं जब भी फोन लगाता हूं, मुझे कोई जवाब नहीं मिलता. मैं ने तमाम मैसेज कर डाले, लेकिन वह नहीं पसीजी.

मैं आज भी गुंजन की याद में तड़पता रहता हूं. उसे अपनी तड़प, अपनी बेताबी मैं किसी भी कीमत पर बताना चाहता हूं. यही वजह है कि आज मैं ने ये सारी बातें आप को भी बताई हैं, ताकि अगर गुंजन इसे पढ़ लेगी तो शायद मुझ पर तरस खा कर मेरे ख्वाबों की दुनिया में फिर से मेरी दुलहन बन कर आ जाएगी.

मेरी उस चिट्ठी का अगला हिस्सा कुछ यों था:

‘गुंजन, तुम कैसी हो. बस, मैं यही पूछना चाहता हूं. अपनी तड़प, अपनी तकलीफ तुम से नहीं कहूंगा. बस, मुझे तुम कैसी हो, कहां हो, यही जानना है. और अगर कुछ और जानना है, तो वह बस यह कि गुंजन क्या सच में अब तुम मुझे प्यार नहीं करती? लेकिन याद रखना. अगर उस का जवाब ‘न’ हो, तो भी मुझे न बताना, क्योंकि मैं तब जिंदा नहीं रह पाऊंगा. मैं तो बस यों ही तुम्हारी यादों में जीना चाहता हूं.

‘आई लव यू गुंजन, अपना खयाल रखना.

‘तुम्हारा, किशन.’ Hindi Romantic Story

Family Story In Hindi: सच होते सपने – गोपुली की समझदारी

Family Story In Hindi: गोपुली को लगने लगा कि उस के मां बाप ने उस की जिंदगी तबाह कर दी है. उन्होंने न जाने क्या सोच कर इस कंगले परिवार में उसे ब्याहा था?

वह तो बचपन से ही हसीन जिंदगी के ख्वाब देखती आई थी.

‘‘ऐ बहू…’’ सास फिर से बड़बड़ाने लगी, ‘‘कमाने का कुछ हुनर सीख. इस खानदान में ऐसा ही चला आ रहा है.’’

‘‘वाह रे खानदान…’’ गोपुली फट पड़ी, ‘‘औरत कमाए और मर्द उस की कमाई पर गुलछर्रे उड़ाए. लानत है, ऐसे खानदान पर.’’

उस गांव में दक्षिण दिशा में कुछ कारीगर परिवार सालों से रह रहे थे. न जाने कितनी ही पीढि़यों से वे लोग ठाकुरों की चाकरी करते आ रहे थे. तरक्की के नाम पर उन्हें कुछ भी तो नहीं मिला था. आज भी वे दूसरों पर निर्भर थे.

पनराम का परिवार नाचमुजरे से अपना गुजरा करता आ रहा था. उस की दादी, मां, बीवी सभी तो नाचमुजरे से ही परिवार पालते रहे थे. शादीब्याह के मौकों पर उन्हें दूरदूर से बुलावा आया करता था. औरतें महफिलों में नाचमुजरे करतीं और मर्द नशे में डूबे रहते.

कभी गोपुली की सहेली ने कहा था, ‘गोपा, वहां तो जाते ही तुझे ठुमके लगाने होंगे. पैरों में घुंघरू बांधने होंगे.’

गोपुली ने मुंह बना कर जवाब दिया था, ‘‘नाचे मेरी जूती, मैं ऐसे खोटे काम कभी नहीं करूंगी.’’

लेकिन उस दिन गोपुली की उम्मीदों पर पानी फिर गया, जब उस के पति हयात ने कहा, ‘‘2 दिन बाद हमें अमधार की बरात में जाना है. वहां के ठाकुर खुद ही न्योता देने आए थे.’’

‘‘नहीं…’’ गोपुली ने साफसाफ लहजे में मना कर दिया, ‘‘मैं नाचमुजरा नहीं करूंगी.’’

‘‘क्या…’’ हयात के हाथों से मानो तोते उड़ गए.

‘‘कान खोल कर सुन लो…’’ जैसे गोपुली शेरनी ही बन बैठी थी, ‘‘अपने मांबाप से कह दो कि गोपुली महफिल में नहीं नाचेगी.’’

‘‘फिर हमारे पेट कैसे भरेंगे बहू?’’ सामने ही हुक्का गुड़गुड़ा रहे ससुर पनराम ने उस की ओर देखते हुए सवाल दाग दिया.

‘‘यह तुम सोचो…’’ उस का वही मुंहफट जवाब था, ‘‘यह सोचना मर्दों का काम हुआ करता है.’’

गोपुली के रवैए से परिवार को गहरा धक्का लगा. आंगन के कोने में बैठा हुआ पनराम हुक्का गुड़गुड़ा रहा था. गोपुली की सास बीमार थी. आंगन की दीवार पर बैठा हुआ हयात भांग की पत्तियों को हथेली पर रगड़ रहा था.

‘‘फिर क्या कहती हो?’’ हयात ने वहीं से पूछा.

‘‘देखो…’’ गोपुली अपनी बात दोहराने लगी, ‘‘मैं मेहनतमजदूरी कर के तुम लोगों का पेट पाल लूंगी, पर पैरों में घुंघरू नहीं बांधूंगी.’’

कानों में घुंघरू शब्द पड़ते ही सास हरकत में आ गई. उसे लगा कि बहू का दिमाग ठिकाने लग गया है. वह खाट से उठ कर पुराना संदूक खोलने लगी. उस में नाचमुजरे का सामान रखा हुआ था.

सास ने संदूक से वे घुंघरू निकाल लिए, जिन के साथ उस के खानदान का इतिहास जुड़ा हुआ था. उन पर हाथ फेरते हुए वह आंगन में चली आई. उस ने पूछा, ‘‘हां बहू, तू पैरों में पायल बांधेगी या घुंघरू?’’

‘‘कुछ भी नहीं,’’ गोपुली चिल्ला कर बोली.

हयात सुल्फे की तैयारी कर चुका था. उस ने जोर का सुट्टा लगाया. चिलम का सारा तंबाकू एकसाथ ही भभक उठा. 2-3 कश खींच कर उस ने चिलम पनराम को थमा दी, ‘‘लो बापू, तुम भी अपनी परेशानी दूर करो.’’

पनराम ने भी जोर से सुट्टा लगाया. बापबेटे दोनों ही नशे में धुत्त हो गए. सास बोली, ‘‘ये दोनों तो ऐसे ही रहेंगे.’’

‘‘हां…’’ गोपुली ने भी कहा, ‘‘ये काम करने वाले आदमी नहीं हैं.’’

सामने से अमधार के ठाकुर कर्ण सिंह आते हुए दिखाई दिए. सास ने परेशान हो कर कहा, ‘‘ठाकुर साहब आ रहे हैं. उन से क्या कहें?’’

‘‘जैसे आ रहे हैं, वैसे ही वापस चले जाएंगे,’’ गोपुली ने जवाब दिया.

‘‘लेकिन… उन के बयाने का क्या होगा?’’

‘‘जिस को दिया है, वह लौटा देगा,’’ गोपुली बोली.

ठाकुर कर्ण सिंह आए, तो उन्होंने छूटते ही कहा, ‘‘देखो पनराम, तुम लोग समय पर पहुंच जाना बरात में.’’

‘‘नहीं…’’ गोपुली ने बीच में ही कहा, ‘‘हम लोग नहीं आएंगे.’’

गोपुली की बात सुन कर ठाकुर साहब को अपने कानों पर यकीन ही नहीं हो रहा था. उन्होंने पनराम से पूछा. ‘‘क्यों रे पनिया, मैं क्या सुन रहा हूं?’’

‘‘मालिक, न जाने कहां से यह मनहूस औरत हमारे परिवार में आ गई है,’’ पनराम ठाकुर के लिए दरी बिछाते हुए बोला.

ठाकुर दरी पर बैठ गए. वे गोपुली की नापजोख करने लगे. गोपुली को उन का इस तरह देखना अच्छा नहीं लगा. वह क्यारियों में जा कर गुड़ाईनिराई करने लगी और सोचने लगी कि अगर उस के पास भी कुछ खेत होते, तो कितना अच्छा होता.

अमधार के ठाकुर बैरंग ही लौट गए. गोपुली सारे गांव में मशहूर होने लगी. जितने मुंह उतनी ही बातें. सास ने पूछा, ‘‘क्यों री, नाचेगी नहीं, तो खाएगी क्या?’’

‘‘मेरे पास 2 हाथ हैं…’’ गोपुली अपने हाथों को देख कर बोली, ‘‘इन्हीं से कमाऊंगीखाऊंगी और तुम सब का पेट भी भरूंगी.’’

तीसरे दिन उस गांव में पटवारी आया. वह गोपुली के मायके का था, इसलिए वह गोपुली से भी मिलने चला आया. गोपुली ने उस से पूछा, ‘‘क्यों बिशन दा, हमें सरकार की ओर से जमीन नहीं मिल सकती क्या?’’

‘‘उस पर तो हाड़तोड़ मेहनत करनी होती है,’’ पटवारी के कुछ कहने से पहले ही हयात ने कहा.

‘‘तो हराम की कब तक खाते रहोगे?’’ गोपुली पति हयात की ओर आंखें तरेर कर बोली, ‘‘निखट्टू रहने की आदत जो पड़ चुकी है.’’

‘‘जमीन क्यों नहीं मिल सकती…’’ पटवारी ने कहा, ‘‘तुम लोग मुझे अर्जी लिख कर तो दो.’’

‘‘फिलहाल तो मुझे यहींकहीं मजदूरी दिलवा दो,’’ गोपुली ने कहा.

‘‘सड़क पर काम कर लेगी?’’ पटवारी ने पूछा.

‘‘हांहां, कर लूंगी,’’ गोपुली को एक नई राह दिखाई देने लगी.

‘‘ठीक है…’’ पटवारी बिशन उठ खड़ा हुआ, ‘‘कल सुबह तुम सड़क पर चली जाना. वहां गोपाल से बात कर लेना. वह तुम्हें रख लेगा. मैं उस से बात कर लूंगा.’’

सुबह बिस्तर से उठते ही गोपुली ने 2 बासी टिक्कड़ खाए और काम के लिए सड़क की ओर चल दी. वह उसी दिन से मजदूरी करने लगी. छुट्टी के बाद गोपाल ने उसे 40 रुपए थमा दिए.

गोपुली ने दुकान से आटा, नमक, चीनी, चायपत्ती खरीदी और अपने घर पहुंच गई. चूल्हा जला कर वह रात के लिए रोटियां बनाने लगी.

सास ने कहा, ‘‘ऐ बहू, तू तो बहुत ही समझदार निकली री.’’

‘‘क्या करें…’’ गोपुली बोली, ‘‘परिवार में किसी न किसी को तो समझदार होना ही पड़ता है.’’

गोपुली सासससुर के लिए रोटियां परोसने लगी. उन्हें खिलाने के बाद वह खुद भी पति के साथ रोटियां खाने लगी. हयात ने पानी का घूंट पी कर पूछा, ‘‘तुझे यह सब कैसे सूझा?’’

गोपुली ने उसे उलाहना दे दिया, ‘‘तुम लोग तो घर में चूडि़यां पहने हुए होते हो न. तुम ने तो कभी तिनका तक नहीं तोड़ा.’’ इस पर हयात ने गरदन झुका ली.

गोपुली को लगने लगा कि उस निठल्ले परिवार की बागडोर उसे ही संभालनी पड़ेगी. वह मन लगा कर सड़क पर मजदूरी करने लगी.

एक दिन उस ने गोपाल से पूछा, ‘‘मैं उन्हें भी काम दिलवाना चाहती हूं.’’

‘‘हांहां…’’ गोपाल ने कहा, ‘‘काम मिल जाएगा.’’

गोपुली जब घर पहुंची, तो हयात कोने में बैठा हुआ चिलम की तैयारी कर रहा था. गोपुली ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘ये गंदी आदतें छोड़ दो. कल से मेरे साथ तुम भी सड़क पर काम किया करो. मैं ने गोपाल से बात कर ली है.’’

‘‘मैं मजदूरी करूंगा?’’ हयात ने घबरा कर पूछा.

‘‘तो औरत की कमाई ही खाते रहोगे,’’ गोपुली ने ताना मारा.

‘‘नहीं, ऐसी बात तो नहीं है,’’ हयात सिर खुजलाते हुए बोला, ‘‘तुम कहती हो, तो तुम्हारे साथ मैं भी कर लूंगा.’’ दूसरे दिन से हयात भी सड़क पर मजदूरी करने लगा. अब उन्हें दोगुनी मजदूरी मिलने लगी. गोपुली को सासससुर का खाली रहना भी अखरने लगा.

एक दिन गोपुली ने ससुर से पूछा, ‘‘क्या आप रस्सियां बंट लेंगे?’’

‘‘आज तक तो नहीं बंटीं,’’ पनराम ने कहा, ‘‘पर, तुम कहती हो तो…’’

‘‘खाली बैठने से तो यही ठीक रहेगा…’’ गोपुली बोली, ‘‘दुकानों में उन की अच्छी कीमत मिल जाया करती है.’’ ‘‘बहू, मुझे भी कुछ करने को कह न,’’ सास ने कहा.

‘‘आप लंबी घास से झाड़ू बना लिया करें,’’ गोपुली बोली.

अब उस परिवार में सभी कमाऊ हो गए थे. एक दिन गोपुली सभापति के घर जा पहुंची और उन से कहने लगी, ‘‘ताऊजी, हमें भी जमीन दिलवाइए न.’’

तभी उधर ग्राम सेवक चले आए. सभापति ने कहा, ‘‘अरे हां, मैं तो तेरे ससुर से कब से कहता आ रहा हूं कि खेती के लिए जमीन ले ले, पर वह तो बिलकुल निखट्टू है.’’

‘‘आप हमारी मदद कीजिए न,’’ गोपुली ने ग्राम सेवक से कहा.

ग्राम सेवक ने एक फार्म निकाल कर गोपुली को दे दिया और बोले, ‘‘इस पर अपने दस्तखत कर दो.’’

‘‘नहीं,’’ गोपुली बोली, ‘‘इस पर मेरे ससुर के दस्तखत होंगे. अभी तो हमारे सिर पर उन्हीं की छाया है.’’

‘‘ठीक है…’’ सभापति ने कहा, ‘‘उन्हीं से करा लो.’’

गोपुली खुशीखुशी उस फार्म को ले कर घर पहुंची और अपने ससुर से बोली, ‘‘आप इस पर दस्तखत कर दें.’’

‘‘यह क्या है?’’ ससुर ने पूछा.

गोपुली ने उन्हें सबकुछ बतला दिया.

पनराम ने गहरी सांस खींच कर कहा, ‘‘अब तू ही हम लोगों की जिंदगी सुधारेगी.’’ उस दिन आंगन में सास लकड़ी के उसी संदूक को खोले बैठी थी, जिस में नाचमुजरे का सामान रखा हुआ था. गोपुली को देख उस ने पूछा, ‘‘हां तो बहू, इन घुंघरुओं को फेंक दूं?’’

‘‘नहीं…’’ गोपुली ने मना करते हुए कहा, ‘‘ये पड़े रहेंगे, तो गुलामी के दिनों की याद दिलाते रहेंगे.’’

गोपुली ने उस परिवार की काया ही बदल दी. उस के साहस पर गांव वाले दांतों तले उंगली दबाने लगे. घर के आगे जो भांग की क्यारियां थीं, वहां उस ने प्याजलहसुन लगा दिया था.

सासससुर भी अपने काम में लगे रहते. पति के साथ गोपुली सड़क पर मजदूरी करती रहती. गोपुली की शादी को 3 साल हो चुके थे, लेकिन अभी तक उस के पैर भारी नहीं हुए थे. सास जबतब उस की जांचपरख करती रहती. एक दिन उस ने पूछा, ‘‘बहू, है कुछ?’’

‘‘नहीं…’’ गोपुली मुसकरा दी, ‘‘अभी तो हमारे खानेखेलने के दिन हैं. अभी क्या जल्दी है?’’ सास चुप हो गई. हयात और पनराम ने भांग छोड़ दी. अब वे दोनों बीडि़यां ही पी लेते थे.

एक दिन गोपुली ने पति से कहा, ‘‘अब बीड़ी पीना छोड़ दो. यह आदमी को सुखा कर रख देती है.’’

‘‘ठीक?है,’’ हयात ने कहा, ‘‘मैं कोशिश करूंगा.’’

आदमी अगर कोशिश करे, तो क्या नहीं कर सकता. गोपुली की कोशिशें रंग लाने लगीं. अब उसे उस दिन का इंतजार था, जब उसे खेती के लिए जमीन मिलेगी.

उस दिन सभापति ने हयात को अपने पास बुलवा लिया. उन्होंने उसे एक कागज थमा कर कहा, ‘‘ले रे, सरकार ने तुम को खेती के लिए जमीन दी है.’’

‘‘किधर दी है ताऊजी?’’ हयात ने पूछा.

‘‘मोहन के आगे सुंगरखाल में,’’ सभापति ने बताया. हयात ने घर जा कर जमीन का कागज गोपुली को दे दिया, ‘‘गोपुली, सरकार ने हमें खेती के लिए जमीन दे दी है.’’

गोपुली ने वह कागज ससुर को थमा दिया, ‘‘मालिक तो आप ही हैं न.’’

पनराम ने उस सरकारी कागज को सिरमाथे लगाया और कहा, ‘‘तुम जैसी बहू सभी को मिले.’ Family Story In Hindi

Hindi Family Story: उपहार – साली के चक्कर में बीवी से किया बिगाड़

Hindi Family Story: बैजू की साली राधा की शादी बैजू के ताऊ के बेटे सोरन के साथ तय हो गई. बैजू और उस की पत्नी अनोखी नहीं चाहते थे कि यह शादी हो, पर सोरन के बड़े भाई सौदान ने राधा के भाई बिल्लू को बिना ब्याज के कर्ज दे कर यह सब जुगाड़ बना लिया था. अब ऊपरी खुशी से बैजू और अनोखी इस शादी को कराने में जुट गए. शादी से पहले ही राधा ने जीजा से अपने लिए एक रंगीन टीवी उपहार में मांग लिया. बैजू ने दरियादिली से मान लिया, पर जब अनोखी ने सुना, तो वह जलभुन गई. घर आते ही वह आंखें तरेर कर बोली, ‘‘अपने घर में कालासफेद टैलीविजन नहीं और तुम साली को रंगीन टीवी देने चले हो.

‘‘चलो, सिर्फ साली को देते तो ठीक था, लेकिन उस की शादी में टीवी देने का मतलब है कि सोरन के घर टीवी आएगा. हम टीवी दे कर भी बिना टीवी वाले रहेंगे और सोरन बिना पैसा दिए ही टीवी देखने का मजा उठाएगा.

‘‘तुम आज ही जा कर राधा से टीवी के लिए मना कर दो, नहीं तो मेरीतुम्हारी नहीं बनेगी.’’

बैजू अनोखी की बात सुन कर सकपका गया. उसे तो खुद टीवी देने वाली बात मंजूर नहीं थी, लेकिन राधा ने रंगीन टीवी उपहार में मांगा, तो वह मना न कर सका.

समाज के लोग कहेंगे कि मर्द हो कर अपनी जबान का पक्का नहीं है. यह भी कहेंगे कि वह औरत की बातों में आ गया. सब उसे जोरू का गुलाम कहेंगे.

बैजू इतना सोच कर अपनी बीवी के सामने गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘अनोखी, मैं तेरे हाथ जोड़ता हूं. इतने पर भी तू न माने, तो मैं तेरे पैरों में गिर जाऊंगा. इस बार की गलती के लिए मुझे माफ कर दे. आगे से मैं तुझ से पूछे बिना कोई काम न करूंगा.

‘‘मैं ने राधा को टीवी देने की बात कह दी है, अब मैं अपनी बात से पीछे नहीं हट सकता. तू खुद ही सोच कि क्या मेरी बदनामी में तेरी बदनामी नहीं होगी? लोग मुझे झूठा कहेंगे, तो तुझे भी तो झूठे की बीवी कहेंगे. महल्ले की औरतें ताने मारमार कर तेरा जीना मुहाल कर देंगी. मुझे मजबूर मत कर.’’

अनोखी थोड़ी चालाक भी थी. उसे पता था कि कहने के बाद टीवी न देने से महल्ले में कितनी बदनामी होगी. वह अपने पति से बोली, ‘‘ठीक है, इस बार मैं तुम्हें माफ कर देती हूं, लेकिन आगे से किसी की भी शादी में ऐसी कोई चीज न देना, जो हमारे घर में न हो…

‘‘और तुम यह मत समझना कि मैं बदनामी से डरती हूं. मैं तो केवल तुम्हारे मनुहार की वजह से यह बात मान गई हूं.’’

राधा और सोरन की शादी हुई. बैजू ने अपने दिल पर पत्थर रख कर रंगीन टीवी का तोहफा शादी में दे दिया.

अनोखी भी टीवी की तरफ देखदेख कर अपना दिल थाम लेती थी. मन होता था कि उस टीवी को उठा कर अपने घर में रख ले, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकती थी.

अनोखी का सपना था कि उस के घर में भी रंगीन टीवी हो. उस टीवी पर आने वाले सासबहू की लड़ाई से लबरेज धारावाहिक धूमधाम से चलें. लेकिन ये सब अरमान सीने में ही दबे रह गए.

राधा सोरन के घर में आ कर रहने लगी. थोड़े ही दिनों में राधा ने सोरन से कह कर जीजा का दिया रंगीन टीवी चलाना शुरू कर दिया. टीवी इतनी तेज आवाज में चलता कि बगल में बने बैजू के घर में बैठी अनोखी के कानों तक सासबहू के भड़कते संवाद गूंजते.

अनोखी का दिल होता कि जा कर टीवी देख ले, लेकिन उस ने कसम खाई थी कि जब तक वह अपने घर में भी रंगीन टीवी न मंगवा लेगी, तब तक राधा के घर टीवी पर कोई प्रोग्राम न देखने जाएगी.

राधा ने एक दिन अपनी सगी बहन अनोखी से कहा भी, ‘‘जीजी, तू मेरे घर पर टीवी देखने क्यों नहीं आती? कहीं तुझे भी महल्ले के लोगों की तरह मुझ से जलन तो नहीं होती?’’

अनोखी इस बात को सुन कर खून का घूंट समझ कर पी गई. उस ने राधा को कोई जवाब न दिया, लेकिन दोचार दिनों में ही आसपड़ोस की औरतों से उसे सुनने को मिला कि राधा सब से कहती है, ‘‘मेरी बड़ी बहन मुझ से दुश्मन की तरह जलती है. क्योंकि मेरे घर में रंगीन टीवी है और उस के घर कालासफेद टीवी भी नहीं है.’’

अनोखी इस बात को भी खून का घूंट समझ कर पी गई. लेकिन एक दिन अनोखी का लड़का रोता हुआ घर आया. जब अनोखी ने उस से रोने की वजह पूछी, तो उस ने बताया, ‘‘मां, मौसी ने मुझे टीवी नहीं देखने दिया.’’

अपने लड़के से यह बात सुन कर अनोखी का अंगअंग जल कर कोयला हो गया. आखिर उस के पति का दिया टीवी उसी का लड़का क्यों नहीं देख सकता? शाम तक अनोखी इसी आग में जलती रही.

जब बैजू घर आया, तो उस ने तुगलकी फरमान सुना दिया, ‘‘तुम अभी जा कर उस टीवी को उठा लाओ. आखिर तुम ने ही तो उस को दिया है. जब हमारा दिया हुआ टीवी हमारा ही लड़का न देख सके, तो क्या फायदा… और वह राधा की बच्ची सारे महल्ले की औरतों से मेरी बदनामी करती फिरती है. तुम अभी जाओ और टीवी ले कर ही घर में कदम रखना.’’

अनोखी की लाल आंखें देख बैजू सकपका गया. अनोखी को जवाब भी देने की उस में हिम्मत न हुई. वैसे, गुस्सा तो बैजू को भी आ रहा था. वह सीधा सोरन के घर पहुंच गया.

राधा टीवी देख रही थी. बैजू को देखते ही वह मुसकरा कर बोली, ‘‘आओ जीजा, तुम भी टीवी देख लो.’’

बैजू थोड़ा नरम हुआ, लेकिन अनोखी की याद आते ही फिर से गरम हो गया. वह थोड़ी देर राधा को देखता रहा, फिर बोला, ‘‘राधा, यह टीवी तुम्हें वापस करना होगा. मैं ने ही तुम्हें दिया था और मैं ही वापस ले जाऊंगा.’’

बैजू के मुंह से टीवी की वापसी वाली बात सुन कर राधा के रोंगटे खड़े हो गए. वह बोली, ‘‘जीजा, तुम्हें क्या हो गया है? आज तुम ऐसी बातें क्यों करते हो? यह टीवी तो तुम ने मुझे उपहार में दिया था.’’

बैजू कुछ कहता, उस से पहले ही महल्ले की कई औरतें और लड़कियां राधा के घर में आ पहुंचीं. उन्हें रंगीन टीवी पर आने वाला सासबहू का सीरियल देखना था.

शायद बैजू गलत समय पर राधा से टीवी वापस लेने आ पहुंचा था. इतने लोगों को देख बैजू के होश उड़ गए. भला, इतने लोगों के सामने उपहार में दिया हुआ टीवी कैसे वापस ले जाएगा. महल्ले की औरतों को देख कर राधा की हिम्मत बढ़ गई.

एक औरत ने राधा से पूछ ही लिया, ‘‘क्या बात है राधा बहन, इस तरह उदास क्यों खड़ी हो?’’

राधा शिकायती लहजे में उन सब औरतों को सुनाते हुए बोली, ‘‘देखो न बहन, जीजा ने पहले मुझे शादी के समय उपहार में यह टीवी दे दिया, लेकिन अब वापस मांग रहे हैं. भला, यह भी कोई बात हुई.’’

राधा की यह बात सुन कर बैजू सकपका गया. अब वह क्या करे. टीवी वापस लेने में तो काफी बदनामी होने वाली थी. उस ने थोड़ी चालाकी से काम लिया. वह गिरगिट की तरह एकदम रंग बदल गया और जोर से हंसता हुआ बोला, ‘‘अरे राधा, तुम तो बड़ी बुद्धू हो. मैं तो मजाक कर रहा था.

‘‘तुम मेरी सगी और एकलौती साली हो, भला तुम से भी मैं मजाक नहीं कर सकता. तुम बड़ी भोली हो, सोचती भी नहीं कि क्या मैं यह टीवी वापस ले जा सकता हूं… पगली कहीं की.’’

बैजू की इस बात पर राधा दिल पर हाथ रख कर हंसने लगी और बोली, ‘‘जीजा, तुम ने तो मेरी जान ही निकाल दी थी. फिर तुम बिना साली के भटकते फिरते. जिंदगीभर तुम किसी लड़की से जीजा सुनने को तरसते.’’

इस बात पर सभी औरतों की हंसी छूट पड़ी. सारा माहौल फिर से खुशनुमा हो गया. बैजू को एक पल भी वहां रहना अच्छा नहीं लग रहा था. वह राधा से बोला, ‘‘अच्छा राधा, अब मैं चलता हूं. मैं तो यह देखने आया था कि टीवी सही चल रहा है कि नहीं.’’

राधा अपने जीजा के मुंह से इतनी फिक्र भरी बात सुन खुश हो गई और बोली, ‘‘जीजा, तुम आए हो तो शरबत पीए बिना न जाने दूंगी. एक मिनट बैठ जाओ, अभी बना कर लाती हूं.’’

राधा ने खुशीखुशी शरबत बना कर बैजू को पिला दिया. शरबत पीने के बाद बैजू उठ कर अपने घर को चल दिया. उसे पता था कि अनोखी उस का क्या हाल करेगी. कहेगी कि साली की मुसकान से घायल हो गए. उस की मीठीमीठी बातों में फंस गए. उस ने शरबत पिला कर तुम को पटा लिया. उस के घर में ही जा कर रहो, अब तुम मेरे पति हो ही नहीं.

लेकिन बैजू भी क्या करता. भला उपहार को किस मुंह से वापस ले ले, वह भी इतनी औरतों के सामने. ऊपर से जिस से उपहार वापस लेना था, वह उस की सगी और एकलौती साली थी.

बैजू ने सोच लिया कि वह बीवी का हर जुल्म सह लेगा, लेकिन दिया हुआ उपहार वापस नहीं लेगा. Hindi Family Story

Funny Story In Hindi: रिश्वत का ऐक्सक्लूसिव कोड

Funny Story In Hindi: हे मेरे शहर की सेम पदों पर सेम काम की फाइल खुलवाने, निकलवाने की मनमरजी की रिश्वत लेने वालों से परेशान रिश्वत खिलाने को मजबूर आत्माओ, तुम्हें यह जान कर खुशी नहीं, हद से ज्यादा खुशी होगी कि जनाब ने शहर के ढाबों में चाय, परांठों, लंच, कच्चे, उबले अंडों के रेटों को ले कर ऐक्सक्लूसिव कोड जारी करने के बाद अब शहर के तमाम औफिसों में रिश्वत प्रोटोकाल में चल रही गड़बड़ी को ले कर बड़ी सर्जरी की है.

छोटीमोटी सर्जरी तो वे अकसर करते रहते हैं, पर यह सर्जरी असल में रिश्वत लेने वालों की नहीं होती, रिश्वत देने वालों की ही होती रही है. रिश्वत कोड लागू होने के बाद भी शहर के तमाम महकमों में एक से काम की अलगअलग दर के हिसाब से रिश्वत लेने पर जनाब को आ रही जनता की शिकायतों की अलगअलग प्रैक्टिस से तंग आ कर जनाब ने आखिर भ्रम के हालात अपने कठोर फैसले के बाद साफ कर दिए हैं.

जनाब मानते हैं कि उन के औफिसों में काम करवाने के बदले रिश्वत देने का कोड नहीं, ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड जारी किया है, ताकि जनता औफिसों के स्वच्छ प्रशासन के नारे के धोखे में रह कर धक्के खातेखाते परेशान न हो.

जनाब द्वारा अब पूरे शहर के औफिसों में सेम तरह के काम करवाने के सब महकमों में दाम तय कर दिए गए हैं. अब हर महकमे में किस तरह की फाइल के कितने रुपए रिश्वत में लिए दिए जाएंगे, जनाब द्वारा यह फिक्स कर दिया गया है.

जनाब की ओर से जारी हुए ताजा आदेशों में जनाब ने साफ कर दिया है कि अब छोटा बाबू, बड़ा बाबू या कोई और काबिल अफसर किसी काम के अपनी मरजी से किसी से रिश्वत नहीं वसूल कर पाएगा.

ऐक्सक्लूसिव रिश्वत प्रोटोकाल के तहत अब हर महकमे में एकसमान रिश्वत कोड होगा और वही हर मुलाजिम के लिए लास्ट कोड माना जाएगा. जनाब ने यह फैसला जनहित में जनता द्वारा रिश्वत देने की हड़बड़ी से निकालने के लिए लिया है.

गौर हो, पहले के रिश्वत प्रोटोकाल में रिश्वत लेने की असमानता, गलतफहमियों और जनता की नाराजगियों के मामले लगातार जनाब के सामने आ रहे थे, जिस के चलते जनाब को हालात हाथ में लेते हुए यह कठोर कदम उठा कर उस में दखल देने को न चाहते हुए भी मजबूर होना पड़ा.

पिछले कुछ समय से शहर के दफ्तरों में आम देखा जा रहा था कि किसी महकमे में एक ही टाइप की फाइल को निकलवाने के इतने तो दूसरे महकमे में उसी तरह की फाइल को निकलवाने के जनता से दोगुने पैसे वसूले जा रहे थे. ऐसे में रिश्वत लेने और रिश्वत देने वाले दोनों ही अपने अपने को असहज महसूस कर रहे थे.

इस सिलसिले में रिश्वत देने वालों का कहना था कि औफिसों में काम के बदले रिश्वत देना तो ठीक है, पर सभी औफिसों में एक से काम होने के बाद भी रिश्वत कोड में समानता क्यों नहीं, जबकि संविधान में सब को समानता का अधिकार है? ऐसे में हर जगह सेम काम का रिश्वत प्रोटोकाल अलगअलग क्यों?

इसी के बाद जनाब ने महसूस किया कि असल में रिश्वत के पुराने जनाब ने जो नियम तय किए थे, वे क्लियर होते हुए भी क्लियर नहीं थे. उन में संशोधन इतने हुए थे कि न रिश्वत देने वाला उन नियमों को समझ पा रहा था, न रिश्वत लेने वाला समझ पा रहा था कि रिश्वत लेनेदेने का नियम है तो सही, पर लास्ट नियम क्या है?

और उस से भी ज्यादा यह कि रिश्वत के प्राटोकाल जैसे सैंसेटिव मामले में समानता के न होने के चलते जनाब के औफिसों की कोई इमेज न होने के बाद उस की इमेज को नुकसान हो रहा था, इसलिए जनाब ने पुराने रिश्वत लेने के सारे नियमों को रद्द करते हुए ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड बनाने की सोची, ताकि अब उन के औफिसों की इमेज और खराब न हो, उन के वर्करों की इमेज तो उसी दिन खराब हो जाती है, जिस दिन जनता उन के पास अपने काम करवाने जेब पकड़े आती है.

जनाब मानते हैं कि कुछ वीवीआईपी मामलों में रिश्वत लेनेदेने के अलग नियम हो सकते हैं, पर इस का मतलब यह नहीं हो जाता कि ये नियम सब जगह लागू हों और इन का मनमाना गलत इस्तेमाल किया जाए.

बाकी नियमों की तरह समाज में रिश्वत के नियमों में भी नियम बने रहने से समाज में अफरातफरी के माहौल से बचा जा सकता है, इसलिए जनाब ऐक्सक्लूसिव कोड औफ रिश्वत के जरीए नए सिरे से सब के लिए कुरसी के हिसाब से रिश्वत लेना तय कर रहे हैं, ताकि पद के हिसाब से रिश्वत लेने में समानता बने.

जनाब का यह भी मानना है कि और जगह कंफ्यूजन होता हो तो होता रहे, पर इस ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड के लागू हो जाने के बाद से रिश्वत लेनेदेने में किसी तरह का कोई कंफ्यूजन नहीं रहेगा.

बड़े अफसरों से ले कर चपरासी तक को ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड के हिसाब से ही रिश्वत लेनी होगी. उस से आगे दाता जो मुलाजिम को अपनी खुशी के हिसाब से दे, उस की इच्छा.

ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड लागू हो जाने के बाद भी जो किसी मुलाजिम ने ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड का पालन नहीं किया और जनता ने किसी की शिकायत उन से की तो वे रिश्वतनिष्ठ मुलाजिम को ले कर इतने सख्त होंगे कि… ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड का पालन न करने पर उस का पक्ष सुने बिना मजे से उसे बरखास्त तक किया जा सकेगा.

जनाब मानते हैं कि कायदे से वैसे तो रिश्वत लेने के बाद जनता का काम पहली बार में ही हो जाना चाहिए, पर जो किसी वजह से वह काम करवाने को रिश्वत देने के बाद भी जो किसी कानूनी रुकावट के चलते दोबारा जनता को औफिस में विजिट करना जरूरी हो, तो अब से काम करवाने वाले से हर बार ऐक्स्ट्रा रिश्वत नहीं ली जाएगी.

जनाब जनहित में ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड इसलिए भी ला रहे हैं, ताकि जनता की जेब पर रिश्वत देने का ऐक्स्ट्रा भार न पड़े, क्योंकि जनता पहले ही बहुत से ऐक्स्ट्रा भारों से दबी हुई है. और जगह ट्रांसपेरेंसी, इज्जत बची हो या नहीं, पर रिश्वत लेने ओर देने में इज्जत और ट्रांसपेरेंसी बची रहे. Funny Story In Hindi

Best Hindi Story: गांव से बौलीवुड का सफर

Best Hindi Story, लेखिका – नीलम झा

रानी एक छोटे से गांव की साधारण लड़की थी, जिस के भीतर असाधारण सपने पलते थे. उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में बसे रामपुर गांव में उस का जन्म हुआ था. पिता किसान थे, जो खेतों में दिनरात मेहनत कर के अपनी जमीन और बच्चों को सींचते थे.

पिता की हथेली पर उकेरी मेहनत की रेखाएं रानी के लिए संघर्ष की पहली पाठशाला थीं. मां घर संभालती थीं, बच्चों को पढ़ाती थीं और गांव की औरतों के साथ हलकीफुलकी गपशप कर के जिंदगी को आसान बनाती थीं.

रानी को पढ़ाई का जुनून था, लेकिन गांव की सामाजिक और भौगोलिक सीमाएं उसे बांधे रखती थीं. स्कूल खत्म होते ही वह घर के कामों में हाथ बंटाती, गायों को चारा डालती और भाईबहनों की देखभाल करती.

उस की रातें सपनों में बीतती थीं. ऐसे सपने जो बौलीवुड की नकली चमक से भरे थे, जहां हीरोइनें स्क्रीन पर राज करती थीं और रानी उस चमक को असली मानती थी.

एक शाम, जब रानी किताबों में खोई थी, मां ने उस के माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘रानी, ये सपने देखना छोड़ दे. गांव में ही बस जा, शादी कर ले. यही तेरी किस्मत है मेरी बच्ची.’’

रानी ने मुसकराते हुए मां की ओर देखा. उस की आंखों में गांव की मिट्टी से निकली एक अजीब सी जिद थी, जो आसमान छूने को बेताब थी.

‘‘मां, मैं शहर जाऊंगी. कुछ बनूंगी, नाम कमाऊंगी और आप को गर्व महसूस कराऊंगी,’’ रानी ने कहा.
स्कूल खत्म होते ही रानी ने अपना अटूट फैसला लिया. मुंबई, वहां का नाम सुनते ही उस का दिल उत्साह से धड़क उठता. उस ने ट्यूशन पढ़ा कर, घर के काम कर के पाईपाई जोड़ी. जब उस ने ट्रेन का टिकट लिया, तो गांव वालों ने ताने मारे, उन की आवाजें उस के कानों में जहर घोल रही थीं, ‘पागल है यह लड़की.

शहर खा जाएगा इसे. लड़की अकेली क्या करेगी वहां? कोई इज्जत नहीं बचेगी…’

लेकिन रानी नहीं रुकी. बैग में कपड़े, कुछ पैसे और असीम सपने ले कर वह मुंबई पहुंची. उस की आंखें फटी की फटी रह गईं… ऊंची इमारतें, हुजूम, स्टूडियो की चमकदमक. उस का संघर्ष तुरंत शुरू हो गया.

ऐक्स्ट्रा रोल्स करना, चाय सर्व करना, आडिशन के पीछे भूखे पेट भागना और रातें एक छोटे से रूम में संघर्षरत साथी लड़कियों के साथ गुजारना. यह उस की कठोर दिनचर्या बन गई, जिस ने उस की इच्छाशक्ति को और मजबूत किया है.

एक सीनियर ऐक्ट्रैस ने एक रात उसे हिम्मत देते हुए कहा, ‘‘तुम्हें कभी हार नहीं माननी है रानी. यहां टूटना आसान है, क्योंकि अकेलापन बहुत है.’’

रानी ने मजबूती से सिर हिलाया, ‘‘जी, मैं हार नहीं मानूंगी. मैं गांव की लड़की हूं, मैं ने सिर्फ संघर्ष देखा है, हारना नहीं आता मुझे.’’

दिन बीतते गए, महीने गुजरते गए. एक दिन रानी को एक फिल्म ‘देस विदआउट बौर्डर्स’ के आडिशन में छोटा सा चांस मिला. डायरैक्टर ने उस की मासूमियत और ऐक्टिंग की भूख को पहचाना. रोल मिल गया.

फिल्म रिलीज हुई और बौक्स औफिस पर हिट हो गई. रानी रातोंरात स्टार बन गई. गांव में जश्न मनाया गया.

मां ने फोन पर रोते हुए कहा, ‘‘बेटी, तू ने कर दिखाया. तू ने मेरी आंखों में खुशी के आंसू ला दिए.’’

अब रानी का नाम था, शोहरत थी. उस ने एक के बाद एक कामयाब फिल्में दीं… ‘हार्टबीट’, ‘फ्लेम्स औफ लव’, ‘पल्स’. उस ने हर रोल में जान डाल दी. फैंस पागल थे, मीडिया उस के पीछे लगा था. लेकिन उस का दिल कहीं और था, सपनों के बीच प्यार की तलाश में.

2003 का साल था. मुंबई की एक भव्य पार्टी में रानी पहुंची. वहीं उस की मुलाकात विक्रम सिंह से हुई, जो लौन टैनिस का नैशनल चैंपियन और एक चमकता सितारा था. लंबा कद और एक दिलकश मुसकान जो किसी का भी दिल चुरा ले.

विक्रम ने सीधे रानी को देखा और कहा, ‘‘हाय, आप रानी हैं न? ‘देस विदआउट बौर्डर्स’ देखी. कमाल की अदाकारा.’’

रानी शरमाई, अपनी गांव की जड़ों को याद करते हुए, फिर बोली, ‘‘थैंक यू. आप विक्रम सिंह? मैं ने आप के बारे में बहुत सुना है.’’

‘‘हां. टैनिस खेलता हूं. लेकिन आप की फिल्में भी देखता हूं, मैं आप का फैन हूं.’’

बात बढ़ी. डिनर डेट्स हुईं, मीडिया ने फोटोज खींचे. ‘बौलीवुड स्टार और टेनिस हीरो का रोमांस’, यह हैडलाइन हर पत्रिका पर छाई थी. रानी खुश थी. विक्रम का साथ उसे अच्छा लगता था. उस की स्पोर्ट्स वर्ल्ड और रानी की फिल्मी दुनिया, यह एक शानदार जोड़ी लगती थी.

विक्रम ने एक शाम समंदर किनारे कहा, ‘‘रानी, तुम्हारे साथ समय बिताना बहुत मजा आता है. तुम लाइमलाइट में हो कर भी बहुत सच्ची हो.’’

रानी ने विक्रम का हाथ थामा. ‘‘मुझे भी लेकिन हमारा फ्यूचर क्या है विक्रम? तुम शादी के लिए तैयार हो?’’

विक्रम चुप रहा. यह चुप्पी कई महीनों तक चली. रोमांस चलता रहा, लेकिन शादी की बात नहीं हुई. विक्रम का कैरियर, ट्रेनिंग, टूर्नामैंट्स सब प्राथमिकता में थे.

रानी इंतजार करती रही, उस के दिल में असुरक्षा घर करने लगी. साल 2006 तक यह रिश्ता चला, फिर अचानक ब्रेकअप हुआ. मीडिया में खबरें फैलीं ‘रानी और विक्रम अलग हो गए?’

रानी ने कुछ नहीं कहा. उस का दिल टूटा, लेकिन वह मजबूत बनी रही, प्रोफैशनल मुखौटा लगाए रखा.
फिर रानी की मुलाकात हुई अर्जुन मेहरा से, एक शांत, कामयाब आर्किटैक्ट. वह कोलकाता का लड़का था, जिस ने अपने दम पर ‘मेहरा डिजाइंस’ फर्म खड़ी की थी. अर्जुन शांत था और लाइमलाइट से दूर रहता था.

एक कौमन फ्रैंड की पार्टी में उन की मुलाकात हुई, ‘‘हाय, मैं अर्जुन. आप की फिल्में पसंद हैं.’’

रानी मुसकराई. ‘‘थैंक यू. आप क्या करते हैं?’’

‘‘आर्किटैक्ट. बिल्डिंग्स डिजाइन करता हूं. मैं शोरगुल से दूर रहना पसंद करता हूं.’’

बातें हुईं. अर्जुन की सादगी रानी को भा गई. विक्रम के तूफान के बाद यह शांति उसे ठहराव का वादा लगी. डेट्स शुरू हुईं, ट्रिप्स लगे. अर्जुन ने 3 महीने बाद प्रपोज किया, ‘‘रानी, मुझ से शादी करोगी? मैं तुम्हें खुश रखूंगा.’’

रानी ने सोचा. उस का दिल अब अस्थायी चमक नहीं, बल्कि हमेशा का सुकून चाहता था. उस ने हां कहा.
19 मार्च 2006, रानी 33 की उम्र में अर्जुन से शादी के बंधन में बंधी. गांवभर में खुशी थी.

मां ने कहा, ‘‘बेटी, अब बस. तेरा घर बस गया और यही जरूरी है.’’

शादी के बाद रानी की जिंदगी बदल गई. उस ने फिल्में कम कीं. फैमिली फर्स्ट. अर्जुन का साथ, घर की शांति. 2007 में खुशी दोगुनी हुई, बेटी हुई आर्या मेहरा. रानी आर्या को गोद में ले कर रो दी, ‘‘मेरी जान. तू मेरा ग्लो है, मेरी सब से बड़ी कामयाबी.’’

अर्जुन ने रानी को गले लगाया, ‘‘हमारा परिवार पूरा हो गया रानी.’’

रानी ने कहा, ‘‘हां, अब सब ठीक है. मुझे और कुछ नहीं चाहिए.’’

पहले साल सुहाने थे. घर में शांति, आर्या की नन्ही हंसी. रानी मां बनी, फिल्मों से ब्रेक. लेकिन धीरेधीरे दरारें आईं. अर्जुन कारोबार में इतना बिजी रहने लगा कि उस का प्रैक्टिकल दिमाग रानी की भावनात्मक जरूरतों को समझ नहीं पाया.

रानी अकेली पड़ गई, आर्या को संभालना. फिर मुश्किलें आईं. रानी दोबारा प्रेग्नेंट हुई. खुशी थी, लेकिन डाक्टर ने कहा, ‘‘प्रौब्लम है. अबौर्शन करना पड़ेगा, नहीं तो तुम्हारी जान को खतरा है.’’

रानी रोई. अर्जुन ने हिम्मत दी, ‘‘अगली बार रानी. हम फिर कोशिश करेंगे, हिम्मत रखो.’’

फिर दूसरी बार, वही दर्द.

2 अबौर्शन, जिस ने रानी को अंदर से तोड़ दिया. रानी उदासी में डूब गई, उसे लगा कुदरत उस से उस का दोबारा मां बनने का सपना छीन रही है.

अर्जुन ने कहा, ‘‘सब ठीक हो जाएगा रानी. हम एकदूसरे के लिए काफी हैं. बच्चों के लिए खुद को खतरे में मत डालो.’’

लेकिन तनाव बढ़ा. झगड़े छोटी बातों पर होने लगे. अर्जुन प्रैक्टिकल, रानी भावुक. अर्जुन का बिजनैस माइंड, रानी का फिल्मी बैकग्राउंड. यह फर्क एक गहरी खाई बन गया.

अर्जुन ने एक यूरोप ट्रिप कैंसल की, ‘‘बिजनैस में बड़ा प्रैशर है रानी. क्लाइंट्स जरूरी हैं.’’

रानी गुस्से से बोली, ‘‘आर्या के लिए प्लान था. तुम हमेशा काम को चुनते हो, मैं नहीं, आर्या भी नहीं.’’

स्वभाव का फर्क बढ़ने लगा. झगड़े रोज होने लगे.

आर्या डरती थी, ‘‘मम्मी, पापा से लड़ाई मत करो. मुझे डर लगता है.’’

रानी रोई, बेटी को गले लगाया, ‘‘नहीं बेटी. सब ठीक हो जाएगा, अब नहीं लड़ेंगे, मैं वादा करती हूं.’’

2013 तक चला यह संघर्ष, 6 साल. आखिरकार तलाक.

अर्जुन ने यह कहते हुए फाइल किया, ‘‘हम दोनों को शांति चाहिए रानी.’’

रानी सदमे में थी, ‘‘क्यों अर्जुन? हम कोशिश करें. सब ठीक हो सकता है.’’

अर्जुन ने शांत मगर दृढ़ स्वर में कहा, ‘‘नहीं चलेगा रानी. अब बहुत देर हो गई है. हम दोनों एकदूसरे को बस दुख दे रहे हैं.’’

कोर्ट, कस्टडी की लड़ाई. आर्या किस के साथ? रानी पूरी ताकत से लड़ी, ‘‘वह मेरी जान है अर्जुन. मैं उसे नहीं छोड़ सकती. मैं उस की मां हूं.’’

जज ने फैसला रानी के पक्ष में दिया… कस्टडी रानी को, लेकिन विजिटेशन राइट्स अर्जुन को. तलाक के बाद रानी अकेली रह गई. सिंगल मदर.

रानी ने टूटे दिल के साथ आर्या को संभाला. अब उसे वापसी करनी थी, आर्या के भविष्य के लिए, अपनी
अधूरी पहचान के लिए. वह शूटिंग पर जाती, आर्या को नानी के पास छोड़ती, ‘‘बेटी, मां काम पर जा रही है. यह सब तुम्हारे लिए है. शाम को आऊंगी.’’

आर्या ने समझदारी से कहा, ‘‘ओके मम्मी. लव यू… और आप अपना ध्यान रखना.’’

रानी मुसकराती, दर्द छिपाया. अबौर्शन का सदमा, तलाक का दर्द, कस्टडी फाइट… सब सहा.

2025 में रानी की फिल्म ‘क्राइसिस’ आई. एक पत्रकार ने रानी से पूछा, ‘‘तलाक दर्दनाक था, लेकिन आप ने सीखा क्या रानीजी?’’

रानी ने ईमानदारी से जवाब दिया, ‘‘तलाक दर्दनाक था. लेकिन मैं ने सीखा कि प्यार काफी नहीं होता.

एकदूसरे को समझना और इज्जत करना जरूरी है. अब मैं जानती हूं कि मेरी कीमत क्या है.’’

आर्या बड़ी हो रही थी, 18 की, स्कूल टौपर. रानी को गर्व था.

‘‘तू डाक्टर बनेगी,’’ रानी ने कहा.

आर्या जोर से हंसी और बोली, ‘‘हां मम्मी. आप जैसी स्ट्रौन्ग बनूंगी. मैं टूटना नहीं सीखूंगी.’’

रानी की जिंदगी गांव से बौलीवुड, प्यार से तलाक, दर्द से सीख. वह मजबूत बनी. अब वह अकेली रानी नहीं थी, वह एक योद्धा थी, जिस की चमक कभी फीकी नहीं पड़ने वाली थी.

रानी का सफर अनोखा था, प्रेरणा से भरा. तलाक ने उसे तोड़ा नहीं, बल्कि एक नया रास्ता दिखाया… आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता का.

रानी की चमक अब नकली नहीं, बल्कि अनुभव की असली चमक थी. वह जानती थी कि उस के गांव की लड़कियां अब उस के नाम से सपने देखेंगी और यह उस की सब से बड़ी जीत थी. Best Hindi Story

Hindi News Story: गोवा नाइट क्लब अग्निकांड

Hindi News Story: 6 दिसंबर, 2025. विजय और अनामिका मस्ती करने गोवा गए हुए थे. चूंकि उन दोनों ने पहले से प्रोग्राम बना रखा था, तो वे अरपोरा विलेज के एक नाइट क्लब में बैठे हुए थे. माहौल बड़ा रंगीन था और शराब और शबाब की पूरी मस्ती थी.

विजय और अनामिका की सीट से सटी सीटों पर 4 जने बैठे हुए थे. एक लड़की और 3 लड़के. चारों जम कर शराब पी रहे थे.

अभी रात के 11 बजे थे. बर्च बाय रोमियो लेन नाम के इस नाइट क्लब का माहौल बड़ा गजब का था. क्लब की सजावट के लिए अंदर और आसपास बहुत सारे पाम ट्री लगे हुए थे.

हो भी क्यों न, बर्च बाय रोमियो लेन नाइट क्लब ‘नोमाडिक जंगल’ थीम पर बनाया गया था. इस में अंदर हर तरफ छोटेछोटे पुल और पैदल रास्ते बने थे, बीचबीच में स्विमिंग पूल और तालाब जैसे पानी वाले एरिया भी थे. स्ट्रा और बांस की सजावट में हर रात यहां आतिशबाजी भी होती थी.

‘‘विजय, मुझे लगता है यह लड़की पूरी तरह से शराब के नशे में मस्त हो गई है,’’ अनामिका ने विजय के कान में फुसफुसा कर कहा.

‘‘यार, यहां का माहौल ही ऐसा है. ऊपर से यह म्यूजिक माहौल को मादक बना रहा है,’’ विजय बोला.
इतने में वह लड़की उठी, पर थोड़ा लड़खड़ा गई. फिर संभलते हुए अकेले ही वाशरूम की तरफ बढ़ गई. उन 3 लड़कों को कोई फर्क नहीं पड़ा. वे तो बैली डांस का मजा ले रहे थे. शायद उन्होंने ड्रग भी ले रखी थी. कजाकिस्तान की एक खूबसूरत बैली डांसर क्रिस्टीना डांस कर रही थी.

‘‘मुझे लगता है कि वह लड़की संभल नहीं पाएगी. मुझे वाशरूम जा कर देखना चाहिए,’’ अनामिका ने कहा और वाशरूम की तरफ बढ़ गई.

पर वह लड़की वाशरूम में नहीं थी. अनामिका अपना मेकअप ठीक करने लगी. इधर बाहर विजय भी डांस का मजा ले रहा था.

अंगदिखाऊ नीले रंग की ड्रैस में वह बैली डांसर अपने बाल हिलाती हुई मादक डांस कर रही थी. उस के बदन में कमाल की लचक थी. डांस इतना भड़काऊ था कि विजय भी बेकाबू हो रहा था. डांसर के पीछे ड्रम वगैरह पर सफेद ड्रैस में साथी कलाकार पूरा साथ दे रहे थे.

इतने में क्लब की छत पर अचानक से आग की लपटें उठीं. किसी ने ज्यादा गौर नहीं किया, पर जब चिनगारियां नीचे गिरने लगीं, तो लोगों को होश आया कि आग लग गई है. वे तीनों लड़के अभी भी अपने मोबाइल से रील बना रहे थे.

इसी बीच किसी मनचले ने बैली डांसर की तारीफ में कहा, ‘‘आग लगा दी.’’

पर यह आग सच में लगी थी और इतनी ज्यादा भयंकर थी कि लोगों का बाहर निकलना मुश्किल हो गया. वे तीनों लड़के पहली फुरसत में वहां से बाहर निकलने की जुगत भिड़ाने लगे.

विजय को अनामिका की याद आई. वह वाशरूम की तरफ भागा और अनामिका को देख कर चिल्लाया, ‘‘जल्दी बाहर चलो, आग लग गई है.’’

अनामिका को कुछ समझ नहीं आया. उस पर नशे का सुरूर था. वह बोली, ‘‘पर वह लड़की वाशरूम में नहीं है. कहां गई होगी?’’

‘‘तुम चिंता मत करो, मैं देखता हूं,’’ विजय बोला और उन दोनों ने अपने मुंह पर पानी के छींटे मारे. आग लगने से उन का आधा नशा तो पहले ही काफूर हो चुका था.

वहां से एक रास्ता बेसमेंट में जाता था. वहां भी काफी लोग थे. वह लड़की गलती से बेसमेंट में चली गई थी और सीढि़यों पर बेसुध बैठी थी. वहां आग अपना असर दिखा चुकी थी. शायद वह लड़की जल चुकी थी, पर वहां धुआं इतना ज्यादा था कि कुछ दिखाई नहीं दे रहा था.

अनामिका और विजय ने बड़ी फुरती से काम किया. विजय ने वहां चिल्ला कर कहा, ‘‘सब यहां से ऊपर की तरफ भागो.’’

पर शायद ज्यादातर लोग सुन नहीं पाए थे. 1-2 लोग किसी तरह हिम्मत दिखा कर भागे. विजय ने उस लड़की को उठा कर पीठ पर लाद लिया. अनामिका ने अपनी जैकेट उस लड़की को ओढ़ा दी.

वे तीनों जैसेतैसे बाहर निकले, पर तब तक आग का तांडव शुरू हो चुका था. क्लब की सजावट ही उस की सब से बड़ी दुश्मन साबित हुई. क्लब के इंटीरियर में सूखी घास, ताड़ के पत्ते, रैटन (बेंत) और बांस का भारी इस्तेमाल किया गया था. यहां तक कि छत भी इन्हीं ज्वलनशील चीजों से बनी थी. यह क्लब असल में एक ‘टिंडरबौक्स’ (बारूद के ढेर) जैसा था, जिसे बस एक चिनगारी की जरूरत थी.

क्लब में आनेजाने के लिए केवल एक ही रास्ता था, जो बेहद संकरा था. इस रास्ते पर भी ज्वलनशील पदार्थों से मेहराब बनाए गए थे, जिस ने आग भड़कने पर निकलने का रास्ता और मुश्किल कर दिया.

‘‘इस के साथी तो यहां नहीं दिख रहे. लगता है भाग गए हैं. हमें इसे जल्दी से डाक्टर के पास ले जाना होगा,’’ अनामिका बोली.

आधा घंटे में ही वे दोनों एक अस्पताल में थे. डाक्टर ने बड़ी तेजी दिखाई और उस लड़की का उचित इलाज किया. तब तक वह लड़की होश में आ चुकी थी. खुद को अस्पताल में देख कर वह रोने लगी.

‘‘आप घबराइए मत, ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है. आप के जले के घाव जल्दी भर जाएंगे. निशान भी नहीं रहेंगे. आप किसी अपने को खबर कर दीजिए,’’ डाक्टर ने कहा.

‘‘जो लड़के मेरे साथ थे, वे सब कहां हैं?’’ उस लड़की ने सवाल किया.

‘‘वे तो आग लगते ही वहां से भाग गए. आप चिंता मत कीजिए, हम दोनों आप के साथ हैं…’’ अनामिका बोली, ‘‘वैसे मेरा नाम अनामिका है और ये हैं विजय.’’

‘‘मेरा नाम दीप्ति है और मैं नोएडा में रहती हूं. घर से यह बोल कर आई थी कि चेन्नई में कोई ऐग्जाम है. पर सब झूठ था. मैं अपने इन 3 दोस्तों के साथ यहां गोवा आ गई थी. सोचा था कि कुछ दिन मस्ती कर के चली जाऊंगी, पर अब बुरी तरह से फंस गई हूं.’’

‘‘वे तीनों कौन थे?’’ विजय ने पूछा.

‘‘कहने को तो मेरे दोस्त थे, पर मुझ पर मुसीबत आते ही भाग खड़े हुए,’’ दीप्ति ने बताया.

‘‘तुम अभी आराम करो. हम दोनों बाहर बैठे हैं. सुबह होने वाली है,’’ अनामिका ने कहा.

इस के बाद वे दोनों बाहर जा कर एक बैंच पर बैठ गए. विजय ने मोबाइल में खंगाला तो खबरों से पता चला कि वह क्लब पूरी तरह जल गया था. अस्पताल में भी कुछ लोग बात कर रहे थे कि तकरीबन 25 लोग मर गए हैं.

अगले दिन अखबार में खबर छपी कि बर्च बाय रोमियो लेन नाइट क्लब में वीकैंड पार्टी चल रही थी. डांस फ्लोर पर 100-150 लोग ?ाम रहे थे. बैली डांसर भी थिरक रही थी.

रात के तकरीबन 12 बजे क्लब की बेसमेंट में बनी किचन में अचानक एक सिलैंडर ब्लास्ट हुआ. कुछ ही मिनट में आग किचन से पहले फ्लोर तक पहुंच गई, जहां पार्टी हो रही थी.

आग देख कर डांस फ्लोर पर अफरातफरी मच गई. लोग इधरउधर भागने लगे. इस दौरान कई लोग आग की लपटों के शिकार हो गए. इन में से कई लोग बचने के लिए बेसमेंट की किचन में चले गए, जहां पहले से क्लब का स्टाफ फंसा हुआ था.

जब तक फायर ब्रिगेड आग पर काबू पाती, तब तक 25 लोगों की मौत हो चुकी थी. इस में 14 स्टाफ और 4 टूरिस्ट थे. 7 लोगों की पहचान अभी नहीं हो पाई. बताया जा रहा है कि ज्यादातर मौतें जलने की बजाय दम घुटने के चलते हुईं.

सुबह तक दीप्ति भी थोड़ा ठीक महसूस कर रही थी. पर वह इस बात से डरी हुई थी कि घर पर क्या कहेगी?

‘‘आप को सब सच बताना होगा,’’ विजय दीप्ति से बोला.

‘‘विजय, आप समझ नहीं रहे हैं. मैं कैसे अपने परिवार वालों को कह दूं कि यहां गोवा में 3 लड़कों के साथ मस्ती कर रही थी. चेन्नई और गोवा के बीच बहुत ज्यादा दूरी है. मेरे घर वाले बिना शादी किए ही मेरी औनर किलिंग कर देंगे. और वैसे भी जब से यह इंडिगो वाला मामला हुआ है, कोई कैसे यहां आ सकता है.

‘‘मेरा तो दिमाग खराब हो गया है. मैं अपने मम्मीपापा को कह दूंगी कि यहां चेन्नई में फंस गई हूं और बाद में आऊंगी,’’ दीप्ति ने कहा.

‘‘पर कब तक सच को छिपाया जाएगा. यह ठीक है कि कुछ दिनों बाद तुम्हारे घाव भर जाएंगे, पर इन के दाग जाने में समय लगेगा. फिर क्या जवाब दोगी? तुम्हें सब सच बता देना चाहिए. वे तुम्हारे अपने हैं, सब समझ जाएंगे,’’ अनामिका बोली.

‘‘एक तो यह हादसा हो गया है, ऊपर से इंडिगो ने नरक मचा रखा है. यह सब लापरवाही बरतने का नतीजा है कि मुसाफिरों को इतनी ज्यादा परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं.

‘‘दरअसल, पिछले कुछ दिनों से इंडिगो छोटी तकनीकी खराबियों का सामना कर रही थी. साथ ही फ्लाइट भी लेट हो रही थीं. तब यह एयरलाइन कंपनी इस के लिए खराब मौसम को जिम्मेदार ठहरा रही थी.

हालांकि, इस संकट की शुरुआत तब हुई, जब सरकार ने फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन के नए नियम लागू करने का फैसला लिया, जिस के तहत पायलटों को बहुत ज्यादा थकान से बचाना था. लेकिन एयरलाइन कंपनी पहले से ही स्टाफ की कमी झेल रही थी. नए नियमों से उन पर दबाव बढ़ गया, जिस से कई फ्लाइट रद्द की गईं.

‘‘सरकार के फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन लागू करने से इंडिगो को अपने पायलटों को आराम देना पड़ा. कंपनी में पहले ही स्टाफ की कमी थी, जिस से पूरा सिस्टम की चरमरा गया. कंपनी ने कई उड़ानें रद्द कर दीं, जिस से यह समस्या और बड़ी हो गई.

‘‘सच कहूं तो देश की सब से बड़ी एयरलाइन होना इस बार इंडिगो के लिए ही भारी पड़ गया. इतने बड़े नैटवर्क में जब एक चीज कमजोर हुई, तो उस का असर पूरे आपरेशन पर दिखने लगा. हजारों क्रू मैंबर, कई एयरपोर्ट और रोज चलने वाली 2,000 से ज्यादा फ्लाइट्स सब पर एकसाथ दबाव आ गया, जिस के कारण और ज्यादा हालात खराब हो गए,’’ विजय ने इंडिगो में मचे बवाल पर अपनी राय दी.

यह सुन कर अनामिका बोली, ‘‘अरे यार, मैं ने बीबीसी का एक लेख पढ़ा था, जिस में एविएशन ऐक्सपर्ट हर्षवर्धन ने बीबीसी न्यूज हिंदी से कहा, ‘कुछ हद तक यह बात सही है कि एविएशन इंडस्ट्री में इंडिगो की मोनोपौली है, तकरीबन 65 फीसदी. लेकिन यह मोनोपौली राजग सरकार के ही समय में नहीं बनी है.’

‘‘उन्होंने आगे कहा, ‘आज जोकुछ हो रहा है, उस में इस मोनोपौली का बहुत बड़ा हाथ है. इस की वजह से पूरा देश तकरीबन बंधक बन गया है. हमारे देश में एविएशन मार्केट काफी बढ़ गया है और ऐसे में जिस के पास 65 फीसदी हिस्सेदारी है, अगर उस कंपनी में दिक्कत आएगी तो यह संकट पूरे मार्केट को बैठा ही देगा.’

‘‘उन्होंने यह भी कहा, ‘किसी भी तरह का यातायात, खासकर हवाई यातायात किसी भी अर्थव्यवस्था के विकास में अहम भूमिका निभाता है. यह अर्थव्यवस्था की नसों में बहते खून की तरह है… सिर्फ राजग को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. संप्रग की सरकार भी उतनी ही जिम्मेदार रही है.’

‘‘यह तो राजनीतिक बात हुई, पर इस सब में जनता ही पिसी. वे लोग अपनी मंजिल तक तो जा ही नहीं पाए, मानसिक पीड़ा हुई सो अलग.

‘‘दीप्ति, मेरा तो यह मानना है कि तुम इस हादसे को भूलने की कोशिश करो और अपने मांबाप को एकदम सही जानकारी दो. तुम्हारी जान बच गई है. यह ठीक है कि तुम झूठ बोल कर यहां आई, पर जिन 3 दोस्तों पर तुम ने भरोसा किया, वे तो हादसे वाले दिन ही दुम दबा कर भाग गए थे. उन्होंने अब तक तुम्हारी कोई खैरखबर नहीं ली.’’

‘‘तुम सही कह रही हो अनामिका. तुम दोनों ने न सिर्फ मेरी जान बचाई है, पर मेरा हौसला भी बढ़ाया है. मैं ने आज 2 सच्चे दोस्त पाए हैं. तुम मुझे फोन दो, मैं अभी पापा से बात करती हूं,’’ दीप्ति ने कहा.

अनामिका और विजय के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई. Hindi News Story

Best Hindi Kahani: किनारे पर आ कर डूब गए

Best Hindi Kahani: मांगीलाल एससी समाज से था. वह अक्ल से जरा पैदल था. वह पिछले तकरीबन 20 साल से रामनारायण की पार्टी का सदस्य था और रामनारायण का विश्वासपात्र भी. वह गरीब जरूर था, मगर पार्टी के लिए समर्पित कार्यकर्ता था. वह पार्टी की मीटिंग में दरिया बिछानाउठाना करता था. भले ही कार्यकर्ता उसे गालियां दें, मगर वह उन की बात का बुरा नहीं मानता था, बल्कि पार्टी का काम ईमानदारी से करता था. वह तो हमेशा कहा करता था कि उस का जनम तो पार्टी के लिए ही हुआ है.

मांगीलाल खोपरा गांव का रहने वाला था. उस की बीवी और 3 बच्चे थे. वह 5वीं जमात तक पढ़ा था, पर उस की बीवी कंचन हायर सैकंडरी तक पढ़ी थी. उस के 2 भाई थे, थोड़ी खेतीबारी थी. जब पिता जिंदा थे, तब वे खेत और घर का बंटवारा कर गए थे. कुछ खेतीबारी मांगीलाल के हिस्से में आई थी, इसलिए वह खेती करता था. मगर खेती से इतनी आमदनी नहीं होती थी कि दो वक्त का पेट भर सके.

जब मांगीलाल की 20 साल पहले कंचन से शादी हुई थी, तब कंचन ने प्राइमरी स्कूल में मास्टर की नौकरी का फार्म भर दिया था. कंचन अपने मायके से ही बीटीआई कर के आई थी. इस का फायदा उसे मिला और वह गांव के प्राइमरी स्कूल में ही नौकरी पा गई. आज वह 30,000 रुपए महीना से ज्यादा पगार ले रही थी.

कंचन की जैसे ही मास्टरनी की नौकरी लगी, मांगीलाल निश्चिंत हो गया और ज्यादा समय पार्टी को देने लगा. रामनारायण उसे शहर ले जाते थे. ऐसे में कंचन बहुत नाराज रहती थी. आएदिन उसे सुनाती रहती थी, मगर वह एक कान से सुनता, दूसरे कान से निकाल देता. अब बच्चे भी जवानी की दहलीज पर आ चुके थे. मांगीलाल और ज्यादा लापरवाह हो गया था.

इधर, जैसे पंचायत चुनाव का ऐलान हुआ, उस के पहले सरपंच की सीट का रिजर्वेशन तय हो चुका था. यह देख कर रामनारायण ने मांगीलाल को सरंपच पद पर खड़ा होने का ऐलान कर दिया. पार्टी में विरोध हुआ कि मांगीलाल जैसे मंदबुद्धि को क्यों टिकट दे दिया, मगर रामनारायण ने तरकीब लगा कर सारा विद्रोह दबा दिया.

जैसे ही कंचन को मालूम पड़ा कि मांगीलाल को सरपंच का चुनाव लड़वाया जा रहा है, तब वह आगबबूला हो उठी. वह मांगीलाल से बोली, ‘‘यह मैं क्या सुन रही हूं…’’

‘‘क्या सुन रही हो?’’ मांगीलाल ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘क्या सरपंच के चुनाव में तुम्हें खड़ा कर रहे हैं?’’ कंचन ने पूछा.

‘‘हां,चुनाव में खड़ा तो कर रहे हैं,’’ मांगीलाल ने बताया.

‘‘अरे, पैसा कहां है तुम्हारे पास खर्च करने के लिए?’’ कंचन ने पूछा.

‘‘सब रामनारायणजी देंगे. मेरी बात हो गई,’’ मांगीलाल बोला.

‘‘तुम मना कर दो,’’ कंचन बोली

‘‘क्यों मना कर दूं. मेरी सेवा से खुश हो कर मुझे टिकट दिया,’’ मांगीलाल ने कहा.

‘‘सेवा के चलते नहीं, बल्कि मजबूरी के चलते ताकि तुम सरपंच बन जाओ, तो वे तुम्हें कठपुतली की तरह नचा सकें…’’ समझाती हुई कंचन बोली, ‘‘कोई यों ही मुफ्त में पैसा थोड़े ही लगाता है, इसलिए मना कर दो.’’

‘‘अरे, पैसा वे लगा रहे है, फिर क्यों न लड़ूं?’’ मांगीलाल ने सवाल किया.

‘‘रामनारायण तुम्हारा इस्तेमाल कर रहे हैं. अगर तुम जीत गए न तुब तुम्हारे कंधे पर बंदूक रख कर घपला कर के कमीशन खाएंगे और अगर तुम हार गए, तो अंजाम क्या होगा जानते हो?’’ कंचन बोली.

‘‘हारना तो मुझे है नहीं,’’ मांगीलाल जोश के साथ बोला.

‘‘तुम भ्रम में जी रहे हो. अगर हार गए न, तब रामनारायणजी ने चुनाव में जितना पैसा खर्च किया है, उस से दोगुना वसूल कर लेंगे. इस बात को जानते हो?’’ समझाती हुई कंचन बोली, ‘‘इसलिए कहती हूं कि मना कर दो.’’

‘‘कंचन, तुम मुझ से जलने लगी हो, इसलिए ऐसी बात करती हो,’’ मांगीलाल को बुरा लगा.

‘‘ठीक है, अगर तुम्हारी समझ में नहीं आए, तब मरो,’’ गुस्से से लालपीली हो कर कंचन बोली.

पर फिर कंचन ने भी सोचा कि मांगीलाल को समझाना बेकार है, क्योंकि उस के पास समझने की ताकत नहीं है. भैंस के आगे बीन बजाना कहावत मांगीलाल के लिए ही बनाई गई है.

फिर क्या था, रामनारायण ने मांगीलाल से फार्म शहर जा कर भरवा दिया और चुनाव की सारी बागडोर उन्होंने ही संभाल ली. मांगीलाल को जिताने के लिए अपनी सारी ताकत झोंक दी. पैसा भी खर्च किया.

मांगीलाल के पोस्टरों से सारा गांव पट गया. जो मांगीलाल के खिलाफ खड़ा हुआ था, वह भी कम नहीं पड़ रहा था. वह भी जबरदस्त प्रचार कर रहा था.

इस तरह पूरे गांव में चुनाव का घमासान मचा हुआ था. गांव वाले मजा ले रहे थे और साथ में मांगीलाल की खिल्ली भी उड़ा रहे थे. रामनारायण ने मांगीलाल को खड़ा कर के बहुत बड़ा दांव खेला है. अगर वह हार गया तब वे डूब जाएंगे.

जैसेजैसे वोट डालने की तारीख पास आती जा रही थी, चुनाव का जोश दोनों उम्मीदवारों में बढ़ता जा रहा था. सभी पर पागलपन सवार था. जैसे चुनाव ही अब सबकुछ हो गया था. कई बार झगड़े होतेहोते भी बचे, क्योंकि दोनों दल वाले अपनीअपनी जीत के प्रति आश्वस्त थे. पर रामनारायण की इज्जत इस समय दांव पर लगी हुई थी. अगर मांगीलाल हार गया, तब गांव में वे मुंह दिखाने के काबिल न रहेंगे. लिहाजा, उन्होंने चुनाव जीतने के सारे हथकंडे अपना रखे थे.

चुनाव का दिन भी आ गया. बिना किसी विवाद के चुनाव पूरा हो गया. जब गिनती हुई तब मांगीलाल 25 वोटों से हार गया. मगर मांगीलाल को तो अपनी हार से कोई फर्क नहीं पड़ा. पर रामनारायण की नाक कट गई. मांगीलाल को ले कर जो दांव खेला था, जिस पर पैसा खर्च किया था, वह सब बेकार हो गया. किनारे पर आ कर नाव डूब गई.

वे अपनी हवेली में मांगीलाल के साथ बैठ कर गम मना रहे थे. अफसोस के साथ भीतर का गुस्सा फूट पड़ा था, ‘‘मांगीलाल, तुम ने मुझे डुबो दिया.’’

‘‘मैं ने आप को कहां डुबोया साहब?’’ मांगीलाल बोला.

‘‘तू हारा तो मेरी नाक कट गई…’’ गुस्से से रामनारायण बोले, ‘‘जानता है, तेरे पीछे मैं ने कितने पैसे खर्च किए.’’

‘‘कितने किए साहब?’’

‘‘2 लाख से ऊपर हो गए. अब इस की भरपाई किस से करूंगा?’’

‘‘हां, आप ने मेरे लिए पैसा तो खर्च किया,’’ सहमति देते हुए मांगीलाल बोला.

‘‘ये 2 लाख रुपए अब तुझे मुझ को देने होंगे.’’

‘‘मैं कहां से दूंगा?’’ मांगीलाल हाथ खड़े करते हुए बोला.

‘‘कहीं से भी ला कर दे, मगर…’’

‘‘मैं ने तो पहले ही कहा था, मैं ठनठन गोपाल हूं,’’ बीच में ही बात काटते हुए मांगीलाल बोला.

‘‘तब चुनाव में क्यों खड़ा हुआ?’’

‘‘मैं कहां खड़ा हुआ, आप ने ही जबरदस्ती खड़ा किया,’’ सच बात उगलते हुए मांगीलाल बोला.

‘‘मैं ने तो तुझ से यह कहा था कि पैसे की मदद मैं करूंगा. जीतने के बाद सब उतार देना. अब तू हार गया तो 2 लाख रुपए वापस कर.’’

‘‘मगर आप ने ऐसा नहीं कहा था.’’

‘‘अब हार गया तो बदल गया. मुझे पूरे 2 लाख रुपए चाहिए,’’ रामनारायण गुस्से से बोले.

‘‘मगर मेरे पास एक भी पैसा नहीं है, मैं कहां से दूंगा?’’ एक बार फिर मांगीलाल इनकार करते हुए बोला.

‘‘मकान बेच या खेत बेच, मगर मुझे 2 लाख रुपए चाहिए. 2 दिन की मोहलत देता हूं. अगर नही दिए तो…’’ कह कर रामनारायण चुप हो गए. फिर पलभर रुक कर वे बोले, ‘‘अगर नहीं दिए तो तेरी बीवी का ट्रांसफर काले पानी में करवा दूंगा. जा बंदोबस्त कर के आ. अब मुझे अकेला छोड़ दे.’’

मांगीलाल उठ कर चल दिया. अब वह कहां जाए. कहां से दे 2 लाख रुपए, जबकि ऐसा कोई करार नही हुआ. उसे रहरह कर कंचन की कही बातें याद आ रही थीं. वह रामनारायण का सारा गणित समझ गया.

अब वह कंचन के सामने जाने से डरने लगा. अब उस के सामने एक तरफ कुआं दूसरी तरफ खाई थी. क्या करे? कंचन के पास जा भी नहीं सकता. उस ने पहले ही सचेत कर दिया था कि तुम अगर हार गए, रामनारायण दोगुना रकम वसूलेंगे. कंचन की बात सच निकली.

कहां जाए? क्या कुएं में कूद कर खुदकुशी कर ले? मगर उस के भीतर के मन ने कहा कि खुदकुशी करना गलत है, बुजदिलों का काम है. तब खुदकुशी करने का विचार उस ने त्याग दिया. वह कंचन के पास जा कर सब बातें कह देगा कि वह गुनाहगार है, जो सजा देनी है, वह झेलने को तैयार है. तब अपना मन कड़ा कर के वह घर की तरफ चल दिया. Best Hindi Kahani

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