फोन बजता रहा…, देखा तो धक्क रह गया…रचना का था. धड़कनें बढ़ गईं. इतने दिनों बाद उस का फोन…और मेरा इंतजार भी…, क्या करूं. मेरी हिम्मत नहीं हुई कि उसे रिसीव करूं. …अंतत: रिंग बजबज कर खत्म हो गई. मैं बैठा रहा, इंतजार करता रहा कि दोबारा वह फोन करेगी?
किंतु काफी देर हो गई उस ने दोबारा नहीं किया. मन में कई तरह की बातें उठने लगीं. क्यों किया होगा उस ने फोन? वह भी इतने महीने बाद? आज ही? क्या मेरी टैलीपैथी ने काम किया? यदि ऐसा होता तो इस के पहले भी कई बार मैं ने उसे याद किया है, बहुत याद किया है किंतु उस ने फोन नहीं किया. आज ही क्यों? क्या मैं उसे फोन लगाऊं? मैं इसी उधेड़बुन में था कि ज्योति के फोन पर कही अंतिम बात दिमाग में घुसी, ‘यदि तुम्हें मेरी याद आए तो फोन कर देना क्योंकि यहां से फोन जल्दी नहीं लग पाता.’ खैर…ज्योति को तो फोन कर ही दूंगा. पर उस की याद कहां आ रही है. क्यों नहीं आती उस की याद? आती भी है तो सिर्फ इसलिए कि इतने काम कौन करेगा? क्या ज्योति से मेरा विवाह महज इसीलिए हुआ है कि वह घर और मेरा ध्यान रखे? यही उस का धर्म है, दायित्व है? मैं सिर्फ आदेश देता रहूं? नहीं…ऐसा तो कतई नहीं है. यदि ऐसा होता तो ज्योति भी यही सोचती. उसे क्या जरूरत है मेरा ध्यान रखने या मेरे लिए सोचते रहने की? क्या वह नहीं सोच सकती कि मैं उस के लिए कुछ करूं? कभी घुमाफिरा लाऊं या कभी मनोरंजन के लिए कोई फिल्म ही दिखा लाऊं? मैं ने ऐसा तो कभी उस के साथ किया नहीं, बावजूद वह मुझ से इतना लगाव रखती है. क्या मैं दुनिया का इतना बेशकीमती आदमी हूं? नहीं, एक मामूली सा ऐसा इंसान हूं, जो महीने के अंत में ठनठन गोपाल हो जाता है. फिर ज्योति से ही कहता है कि यदि उस ने कुछ बचत कर रखी है तो मेरे जेबखर्च के लिए दे दे. वह देती भी है. पता नहीं कहां से, कैसे बचत कर लेती है? रोमी की जिद भी तो उस की बचत से ही पूरी होती है. पर कभी वह अपने लिए कोई खर्च करते नहीं दिखी. मन विचारों में डूब चुका था. मुझे लगा कि शायद मैं स्वार्थी हूं? या ज्योति को अब तक नहीं समझ पाया. उस ने मुझे अच्छी तरह से समझ रखा है तभी तो मेरे लिए वह हमेशा तत्पर रहती है. सच तो यह है कि विवाह 2 ऐसे विरोधियों के बीच होता है जो सेतु बनाने में पूरी जिंदगी लगा देते हैं. यही उन का धर्म है.
मैं इसे निभा रहा हूं, सच है मगर जो प्रेम करता है उसे अनदेखा भी करता हूं, यह भी सच लगने लगा है. ज्योति ने कभी मुझ से कहा था कि प्रेम के लिए पात्र का होना आवश्यक है. एक ऐसे पात्र का जो प्रेम को अपने में समेट सके. कभीकभी ऐसा भी होता है कि हम जिस से प्रेम करते हैं, वह उसे पचा भी नहीं पाता, अपने प्रेम के अहम् में वह प्रेमी को अंकुश में रखना चाहता है जबकि यह नहीं होना चाहिए. ज्योति की यह बात मुझे रचना की स्मृति की ओर खींच देती है. आज जो हालात हैं रचना किसी प्रकार भी मेरे निश्छल प्रेम को समझ नहीं पाती. उसे नजरअंदाज करती है. घड़ी समय को खींचती हुई आगे बढ़ रही थी, डेढ़ घंटा बीत गया. रचना का फोन नहीं आया. मैं इंतजार कर रहा था.
क्या रचना अब मुझ से प्रेम नहीं करती? उस ने क्यों किया था फोन? और जब किया था तो दोबारा क्यों नहीं किया? अभी यह सोच ही रहा था कि एक बार फिर मोबाइल बज उठा. मैं हड़बड़ा गया, फिर धड़कनें बढ़ गईं. रचना का होगा? मैं भी कैसा आदमी हूं, जो रचना के बारे में उल्टापुल्टा सोच रहा था. पर मेरी रचना ऐसी नहीं है, गुस्सा उतर गया होगा, बस यही सोचते हुए जैसे ही मैं ने फोन उठाया तो रिंग बज कर फिर खत्म हो गई. मैं ने देखा तो दंग रह गया. अपने आप को धिक्कारा, माथा ठोक बैठा… आज ही यह सब होना है? मैं ने मोबाइल पर नंबर मिलाया…यही सोच कर कि अब सिर्फ इसी नंबर पर बात होगी. यही नंबर मेरी जिंदगी का सच है…यही नंबर प्रेम का सार है…यही नंबर है जो यथार्थ है, यही नंबर है जो मुझ से निश्छल प्रेम करता है… ‘‘हैलो… ज्योति… तुम ने अभी फोन किया था न… क्यों?’’ ‘‘बस, ऐसे ही… मुझे लगा आप कुछ परेशान हैं….’’ ‘‘परेशान…, हां, बस यों ही…वैसे ऐसी कोई बात नहीं है….’’ ‘‘मैं कल आ रही हूं.’’ ‘‘सच.’’ ‘‘हां, सचमुच…’’ ‘‘पर इतनी जल्दी?’’ ‘‘हां…मुझे बस मम्मी से मिलना था सो मिल ली….’’ ‘‘सच ज्योति…तुम आ रही हो…ओह ज्योति… आ जाओ…तुम…, मुझे जरूरत है तुम्हारी…सिर्फ तुम्हारी.’’ फोन रख दिया. एकदम से पता नहीं क्या हुआ, पूरा माहौल बदल गया, जिस अतीत के बंधनों से मैं जकड़ा हुआ था, उस से मुक्त हो अचानक मैं खुशी से झूम उठा…यहां तक कि नाचने लगा और जोर से चिल्ला उठा…मुझे मेरा संसार मिल गया.



