Political Story: अमेरिका, डोनाल्ड, ट्रंप और टूटे ख्वाब

Political Story: ‘‘अब मैं क्या कर सकता हूं? मुझे क्या पता था कि अमेरिका में इतना बड़ा उलटफेर हो जाएगा. हम खुद हैरान हैं कि कमला हैरिस कैसे हार गईं? तुम दोनों के ही नहीं, बल्कि और भी कई लोगों के पैसे समझ डूब गए हैं,’’ दलाल ने जब यह बात कही, तो वंदना और अजय के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई.

‘‘ऐसे कैसे हमारे पैसे डूब गए. हम दोनों ने कुल 40 लाख रुपए भरे हैं. हमारे मांबाप ने कर्ज ले कर हमें बाहर भेजने का इंतजाम किया था. वे तो जीतेजी मर जाएंगे,’’ अजय ने कहा.

‘‘भाई, डंकी से अमेरिका और कनाडा जाने वाले को तो पलपल का खतरा रहता है. अच्छा है कि तुम्हारे सिर्फ पैसे ही डूबे हैं, अगर कहीं जान पर बन आती तो हम यहां बैठे क्या कर लेते? हम ने तो पक्का काम किया था, पर इस बार के चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की इतनी भारी जीत ने सब गुड़ गोबर कर दिया.

‘‘अब तो उस ने मंच से भी बोल दिया है कि वहां किसी भी घुसपैठिए को बरदाश्त नहीं किया जाएगा. अब तो जब मामला ठंडा होगा, तो ही दोबारा कोशिश की जा सकती है,’’ दलाल ने अपनी बात कही और अपनी सीट से उठ कर बाहर चला गया.

अजय और वंदना अभी भी दलाल के दफ्तर में बैठे थे. उन्हें लगा जैसे सबकुछ खत्म हो गया है. वंदना तो रोने लगी थी.

अजय और वंदना दोनों वैसे तो उत्तर प्रदेश के मुज्जफरनगर जिले के आसपास के गांवों के रहने वाले थे, पर पिछले 3 साल से नोएडा में लिवइन रिलेशनशिप में रह रहे थे.

23 साल की भरे बदन की वंदना दलित समाज की एक होनहार लड़की थी और पिछले 2 साल से एक प्राइवेट अस्पताल में नर्स की कच्ची नौकरी कर रही थी.

25 साल का अजय एक रैस्टोरैंट में कुक था और बहुत बढि़या खाना बनाता था, पर उस के काम की कद्र नहीं थी.

चूंकि नोएडा महंगा शहर है और खर्चे ज्यादा हैं, तो अजय और वंदना ने सोचा कि क्यों न वे ज्यादा पैसे कमाने के लिए अमेरिका और कनाडा चले जाएं.

अजय कनाडा जाना चाहता था और वंदना अमेरिका. अमेरिका में जुलाई, 2024 तक साढ़े 7 डौलर प्रति घंटे का मिनिमम वेज मिलता रहा है. मतलब, भारतीय रुपए में 660 रुपए प्रति घंटा. रोज 12 घंटे काम करने के तकरीबन 7,000 रुपए. महीने में अगर 25 दिन भी काम कर लिया, तो पौने 2 लाख रुपए की कमाई हो सकती है.

अमेरिका और कनाडा में नर्स और कुक को काम मिल ही जाता है. हो सकता है कि इन्हें कुछ ज्यादा ही कमाई हो जाए.

6 महीने पहले की बात है. अजय और वंदना अपनेअपने गांव गए हुए थे. तब उन दोनों ने अपने मांबाप से विदेश जाने की बात कही थी.

अजय बोला था, ‘‘अरे बाबूजी, पड़ोस के गांव का रतन अमेरिका में ट्रक चलाता है. वह डंकी से वहां गया था और आज देखो, उस ने पूरे परिवार को संभाल लिया है.’’

‘‘यह डंकी क्या होता है?’’ बाबूजी ने सवाल दागा था.

‘‘किसी देश में घुसपैठ कर के घुसना. दलाल पैसे ज्यादा लेते हैं, पर अमेरिका और कनाडा जैसे अमीर देशों में घुसा देते हैं. वहां जाते ही चांदी ही चांदी,’’ अजय ने सम?ाया था.

‘‘पर बेटा, 20 लाख रुपए कम रकम नहीं होती. हमें अपना एक खेत बेचना पड़ेगा,’’ अजय की मां ने अपनी चिंता जताई थी.

‘‘मां, एक बार मैं कनाडा चला जाऊं, फिर 3-4 साल में तुझे नया खेत दिला दूंगा. इस गांव में तुम्हारी तूती बोलेगी,’’ अजय ने मां को मक्खन लगाया था.

उधर वंदना भी अपने मांबाप को मना चुकी थी. हालांकि वह एक साधारण परिवार की लड़की थी, पर चूंकि उस के पिताजी कोटे के चलते सरकारी नौकरी में थे, तो उन्होंने जैसेतैसे पैसे का इंतजाम कर दिया था. दोनों ने एक ही दलाल से मिल कर अमेरिका और कनाडा जाने का बंदोबस्त कर लिया.

इस बीच अमेरिका में चुनाव का ऐलान हो गया था. रिपब्लिकन पार्टी ने डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया था और कमला हैरिस को डैमोक्रैटिक पार्टी ने.

कमला हैरिस का शुरू से पलड़ा भारी लग रहा था, क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप को एक बार राष्ट्रपति के रूप में पहले आजमाया जा चुका था और उन्होंने अपने कार्यकाल में ऐसा कुछ खास कमाल नहीं किया था.

अमेरिका में 5 नवंबर, 2024 को चुनाव हुए थे और डैमोक्रैटिक पार्टी के अलावा तमाम दूसरे नागरिकों को उम्मीद थी कि कमला हैरिस देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनने का गौरव हासिल कर लेंगी, क्योंकि चुनाव से पहले डोनाल्ड ट्रंप ने उन पर खूब निजी हमले किए थे.

डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान पैंसिल्वेनिया में एक रैली में कमला हैरिस की शारीरिक बनावट और बुद्धिमत्ता की निंदा की थी. उन्होंने अपने समर्थकों से कहा था,’’ मैं उन से (कमला हैरिस) कहीं ज्यादा सुंदर हूं.’’

डोनाल्ड ट्रंप ने कमला हैरिस स्पैशल ‘टाइम’ मैगजीन के कवर फोटो का जिक्र करते हुए दावा किया था कि पत्रिका को एक स्कैच कलाकार को काम पर रखना पड़ा, क्योंकि उन की तसवीरें काम नहीं आईं. उन्होंने उन की बुद्धिमत्ता पर भी सवाल उठाया था और उन्हें कट्टरपंथी उदारवादी करार दिया था.

इतना ही नहीं, डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी एक रैली में कहा था, ‘‘कुटिल जो बाइडेन मानसिक रूप से विकलांग हो गए हैं… लेकिन कमला हैरिस, ईमानदारी से कहूं तो मेरा मानना है कि वे ऐसी ही पैदा हुई थीं. कमला में कुछ गड़बड़ है और मुझे नहीं पता कि वह क्या है, लेकिन निश्चित रूप से कुछ कमी है.’’

लोगों को डोनाल्ड ट्रंप का यह बड़बोलापन नहीं सुहा रहा था और ऐसा लग रहा था कि इस बार डोनाल्ड ट्रंप हार जाएंगे, पर जब चुनाव नतीजे आने शुरू हुए तो एकदम से पासा पलटने लगा.

डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार बढ़त बनानी शुरू की, तो वे आगे ही निकलते चले गए. उन्हें कुल 312 सीटें मिलीं और कमला हैरिस महज 226 सीटों पर सिमट कर रह गईं. यह रिपब्लिकन पार्टी की एक बड़ी जीत थी.

चुनाव जीतने के बाद जब डोनाल्ड ट्रंप ने घुसपैठियों पर नकेल कसने की बात कही, तो इस का असर बहुत से देशों पर पड़ने लगा.

एक दिन वंदना और अजय नोएडा के अपने वन रूम फ्लैट में थे. वंदना ने सवाल किया, ‘‘तुम्हें क्या लगता है, डोनाल्ड ट्रंप ने इतनी बड़ी जीत कैसे हासिल की?’’

‘‘खबरों की मानें, तो डोनाल्ड ट्रंप की जीत की एक अहम वजह उन का ग्रामीण क्षेत्रों में अपने समर्थन को बढ़ाने में कामयाब रहना है. उन्होंने इंडियाना, केंटकी, जौर्जिया और उत्तरी कैरोलिना में समर्थन को बढ़ाते हुए अपना दम दिखाया है.

‘‘डैमोक्रैटिक कमला हैरिस को शहरी केंद्रों के साथसाथ आसपास के उपनगरों में भी बड़ी बढ़त हासिल करनी थी. साल 2016 से ही ऐसे उपनगरीय इलाकों में डैमोक्रैट्स को बढ़त मिलती रही है, लेकिन कमला हैरिस को इन इलाकों में मनमुताबिक भारी बढ़त नहीं मिल पाई.

‘‘कमला हैरिस की हार में लैटिन वोटरों के बीच डैमोक्रैटिक पार्टी के लिए समर्थन कम होना बड़ी वजह रहा है. डोनाल्ड ट्रंप को गैरश्वेत वोटरों का भी समर्थन मिला है.’’

‘‘अमेरिका में भी जो बाइडन के खिलाफ एंटीइनकंबैंसी कहीं न कहीं कमला हैरिस की हार की वजह बनी है. रिपब्लिकन पार्टी ने ज्यादा भावनात्मक मुद्दे उठाए. इसी वजह से अमेरिकियों ने भी डैमोक्रैट के मुकाबले रिपब्लिकन पर भरोसा किया.’’ अजय ने अपनी बात रखी.

‘‘मतलब, अब अमेरिका में घुसपैठ करना मुश्किल हो जाएगा?’’ वंदना का अगला सवाल था.

‘‘यह तो डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा ‘चुनावी मुद्दा’ रहा था. उन्होंने वादा किया था कि चुनाव जीतने के बाद वे घुसपैठियों को अमेरिका से बाहर करेंगे. उन्होंने साफ कर दिया था कि अब अमेरिका में सीधे रास्ते से आना होगा.

‘‘डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी कहा था कि वे हर प्रवासी आपराधिक नैटवर्क को निशाना बनाने और उसे खत्म करने के लिए 18वीं सदी के कानून ‘एलियन एनिमीज ऐक्ट’ को लागू करेंगे, लेकिन यह कानून केवल विदेशी दुश्मन देश से आने वाले लोगों पर लागू होता है.’’

‘‘पर, गाज तो हर किसी पर गिरेगी न. हमारा ही हाल देख लो,’’ वंदना बोली.

अजय ने अखबार पढ़ते हुए कहा, ‘‘अरे यार, अब तो एक खरबूजे को देख कर दूसरा खरबूजा भी रंग बदलने लगा है. पिछले कुछ समय से कनाडा में हिंदू और सिख समुदाय के बीच चल रही टैंशन के बाद वहां भी वीजा को ले कर कड़े नियम किए जा रहे हैं.

‘‘जस्टिन ट्रूडो की सरकार ने भारतीय नागरिकों के विजिटर वीजा की अवधि को एक महीने तक सीमित कर दिया है. इस से साढ़े 4 लाख पंजाबियों पर संकट आ गया है. अब उन्हें हर साल टूरिस्ट वीजा लेना होगा. साथ ही, एक महीने में कनाडा छोड़ना होगा. यह कदम कनाडा सरकार ने वीजा प्रणाली में कड़े प्रावधान लागू करने के मकसद से उठाया है.

‘‘इस से भारतीय नागरिकों को लंबी अवधि के वीजा की सुविधा खत्म हो जाएगी. इस का सब से ज्यादा असर पंजाबी समुदाय के लोगों पर होगा, जिन का कनाडा आनाजाना लगा रहता है. पहले 6 महीने का समय मिलता था, पर नए नियम से कनाडा में 10 लाख लोगों पर संकट आ गया है, जो विजिटर या मल्टीपल वीजा पर कनाडा में हैं.’’

वंदना ने कहा, ‘‘भारत के संबंध कनाडा के साथ इतने ज्यादा अच्छे नहीं हैं. आएदिन दोनों देशों के नेता एकदूसरे पर देश में अशांति फैलाने के इलजाम लगाते रहते हैं.’’

‘‘जब वीजा से जाने वालों पर इतने ज्यादा कड़े नियम बनाए जा रहे हैं, तो फिर डंकी वालों पर तो ये दोनों देश नकेल ही कस देंगे. डोनाल्ड ट्रंप कभी नहीं चाहेंगे कि उन का पड़ोसी देश कनाडा घुसपैठियों का अड्डा बन जाए,’’ अजय बोला.

‘‘क्यों न एक बार अपने दलाल से बात कर ली जाए?’’ वंदना ने अजय से धीरे से कहा.

अगले दिन वे दोनों अपने दलाल के पास गए, तो वह बोला, ‘‘अगले कुछ महीनों के लिए तो तुम दोनों अमेरिका या कनाडा जाने के ख्वाब देखने बंद कर दो. वैसे भी तुम्हें अभीअभी 40 लाख रुपए की चपत लगी है.

‘‘हां, एक काम हो सकता है. अगर तुम दोनों चाहो, तो सस्ते में तुम्हें कंबोडिया भिजवा सकता हूं. वहां तुम्हें 30-40 हजार रुपए महीने की नौकरी मिल जाएगी और विदेश जाने का सपना भी पूरा हो जाएगा.’’

‘‘हम कंबोडिया तुम्हारे भरोसे क्यों जाएंगे? तुम ने तो पहले ही हमारे पैसे हड़प लिए हैं,’’ अजय ने वहां से जाते हुए कहा.

‘‘यह भी ठीक है, पर एक बात का ध्यान रखना कि आजकल कंबोडिया जैसे दक्षिणपूर्व एशियाई देश औनलाइन घोटालों के गढ़ बने हुए हैं. मानव तस्कर भारतीय नागरिकों को नौकरी का झांसा दे कर कंबोडिया ले जा रहे हैं और फिर उन्हें औनलाइन घोटाले और साइबर अपराध करने के लिए मजबूर किया जा रहा है.

‘‘भारत के गृह मंत्रालय के साइबर विंग के सूत्रों ने बताया कि घोटालेबाज डिजिटल गिरफ्तारी के जरीए हर दिन तकरीबन 6 करोड़ रुपए उड़ा रहे हैं.

इस साल के पहले 10 महीनों में ही घोटालेबाजों ने 2,140 करोड़ रुपए उड़ा लिए हैं.’’

अजय और वंदना उस दलाल की यह सलाह सुनते हुए वहां से जा रहे थे. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अचानक से उन दोनों की जिंदगी गहरे अंधेरे में जाती हुई लग रही थी. उन के ख्वाब चकनाचूर हो गए थे. Political Story

Hindi Story: कसौटी -कौन परख रहा था कामना को

Hindi Story: प्लेटफार्म पर गाड़ी लगते ही कामना अपने पिता के साथ डब्बे की ओर दौड़ पड़ी. गरमी से उस के होंठ सूख रहे थे. सूती साड़ी पसीने में भीग कर शरीर से चिपक गई थी, पर उसे होश कहां था. यह गाड़ी छूट गई, तो उस का मकसद पूरा नहीं हो पाएगा. किसी भी कीमत पर इस रेल में जगह बनानी ही होगी. बापबेटी दोनों अपनी पूरी ताकत से रेल में चढ़ने की नाकाम कोशिश करने लगे.

उसी डब्बे में एक सज्जन भी चढ़ने की कोशिश कर रहे थे. इसी बीच पैर फिसलने के चलते वे औंधे मुंह प्लेटफार्म पर लुढ़क गए. बापबेटी चढ़ना भूल कर उस गिरे हुए मुसाफिर की मदद को लपके.

दूसरे मुसाफिरों का चढ़नाउतरना लगातार जारी था. किसी ने भी मुड़ कर बेहोश पड़े हुए उन सज्जन को नहीं देखा. न किसी के पास समय था और न इनसानियत. कामना ने आव देखा न ताव और झुक कर उन बुजुर्ग को उठाने लगी.

‘‘पानी… पानी…’’ वे बुजुर्ग बुदबुदाए.

अगर कामना ने उन सज्जन के मुंह पर पानी का छींटा मार कर उन्हें भीड़ से उठा कर सीमेंट की बैंच पर लिटा नहीं दिया होता, तो वे मुसाफिरों के पैरों तले कुचले जाते.

ठंडे पानी के छींटों से वे सज्जन कुनमुनाए और ऊपरी जेब की ओर इशारा किया. कामना ने  झट से जेब में हाथ डाला. दवा की शीशी थी. चंद बूंद होंठों पर पड़ते ही वे बुजुर्ग उठ कर बैठने की कोशिश करने लगे.

इधर गार्ड ने हरी  झंडी दिखाई, सीटी दी और ट्रेन चल पड़ी. बापबेटी हड़बड़ा गए. गाड़ी पकड़ें या अनजान इनसान की मदद करें. मंजिल तक उन का पहुंचना बहुत जरूरी था वे कुछ फैसला लेने ही वाले थे कि उन बुजुर्ग ने कहा, ‘‘बेटी और एक खुराक दवा देना.’’

कामना उन्हें दवा खिलाने लगी. ट्रेन जा चुकी थी. बचे हुए तमाशबीन लोग उन के इर्दगिर्द जमा होने लगे थे.

‘‘क्या हुआ?’’

‘‘कैसे गिर पड़े?’’

‘‘आप लोगों के साथ हैं क्या?’’

तरहतरह के सवाल बापबेटी के कानों से टकराने लगे. कुछ शोहदे नजदीक आने का प्रपंच करने लगे. गाड़ी खुलने के साथ ही बापबेटी के अरमानों का महल ढह गया. वे ठंडी सांस ले कर रह गए. मंजिल हाथ आ कर एक बार फिर फिसल गई थी.

यह अफसोस करने का समय नहीं था. वे दोनों उन सज्जन की तीमारदारी में लग गए. अनजान शहर में किसी तरह पूछताछ करते हुए एक डाक्टर के पास पहुंचे. डाक्टर भले इनसान थे. मुआयना कर के वे बोल उठे, ‘‘दिल का दौरा था. यह तो अच्छा हुआ कि इन्होंने समय पर दवा खा ली, वरना जान भी जा सकती थी.’’

वे बुजुर्ग सज्जन कामना और उस के पिता के प्रति कृतज्ञ हो उठे. डाक्टर ने उन्हें कुछ दवाएं दीं और खतरे से बाहर बताया. कुछ जरूरी हिदायतों के साथ उन्हें घर तक जाने की इजाजत दे दी.

दिल्ली जाने वाली दूसरी ट्रेन रात के 9 बजे थी. कामना और उस के पापा वापस जाने की सोचने लगे.

‘‘क्यों…? आप वापस किसलिए जा रहे हैं?’’ उन सज्जन ने पूछा.

‘‘अब दिल्ली जाने का कोई मतलब नहीं, क्योंकि रात वाली गाड़ी कल शाम को पहुंचेगी और हमारा काम वहां दिन में 10 बजे तक ही था,’’ पिता की आवाज में उदासी थी.

‘‘ऐसा कौन सा काम था, अगर एतराज न हो तो मु झे बताएं,’’ उन सज्जन की उत्सुकता बढ़ गई.

‘‘एतराज कैसा, वहां एक फर्म में बिटिया का इंटरव्यू था. उम्मीद थी कि नौकरी मिल जाएगी, पर लगता है कि अब ऐसा नहीं हो पाएगा. खैर, आप की जान बच गई, यही इस सफर की उपलब्धि रही.’’

कामना उन बुजुर्ग सज्जन की सेवा में लगी थी, अब वापसी के लिए तैयार हो गई. बुजुर्ग सज्जन ने पहली बार बापबेटी को गौर से देखा.

‘‘कौन सी फर्म?’’

कामना से जानकारी पा कर वे सज्जन चिंता में पड़ गए. एक बेरोजगार के हाथ से नौकरी जाने की वजह अपनेआप को सम झ कर उन्हें आत्मग्लानि होने लगी.

‘‘सुनिए, आप दोनों मेरे साथ रात की गाड़ी से दिल्ली चलिए. वहां फर्म में अपनी समस्या बताएंगे तो शायद वे लोग आप को एक मौका दे दें,’’ उन बुजुर्ग ने कहा.

‘‘वहां कौन हमारी बात सुनेगा. इंटरव्यू तो सुबह 10 बजे ही है,’’ कामना ने कहा.

‘‘आप मेरी बात तो मानिए और दिल्ली चलिए. काम नहीं होगा तो लौट आइएगा. क्यों बिटिया, मैं ठीक कह रहा हूं न? नहीं तो मैं अपनेआप को माफ नहीं कर पाऊंगा,’’ अनायास वातावरण गंभीर हो उठा.

‘‘बाबा, चलिए एक बार हो आते हैं,’’ कामना ने अपने पिता से कहा.

‘‘पर, दिल्ली में आप लोग कहां ठहरेंगे?’’ उन बुजुर्ग ने पूछा.

‘‘दिल्ली में हमारा कोई परिचित नहीं है. उस फर्म में मिल कर स्टेशन आ जाएंगे और वापसी के लिए जो भी गाड़ी मिलेगी, पकड़ लेंगे,’’ कामना ने कहा.

‘‘कहीं रुकना पड़ा तो,’’ उन बुजुर्ग ने कहा, तो कामना के पिता का सब्र जवाब दे गया, ‘‘फर्म वाले हमें क्यों रोकेंगे? देर से जाने पर वैसे ही भगा देंगे.’’

बहरहाल, वे तीनों दिल्ली आ पहुंचे.

‘‘कृपया आप लोग मेरी गाड़ी से चलिए. मु झ पर भरोसा कीजिए,’’ उन बुजुर्ग ने हाथ जोड़ कर कहा. इस प्रस्ताव पर बापबेटी चौंक उठे.

‘‘नहींनहीं, हम आटोरिकशा से चले जाएंगे. आप कष्ट न करें,’’ कामना ने कहा.

‘‘इस में कष्ट कैसा? आप ऐसा न सम झें कि मैं आप के एहसान का बदला चुका रहा हूं. मेरी गाड़ी आई है और मैं दिल्ली का रहने वाला हूं, इसलिए आप की मुश्किल हल करने की छोटी सी कोशिश है.’’

उन बुजुर्ग की बातों ने बापबेटी को ज्यादा सोचने का मौका नहीं दिया. वे इनकार नहीं कर सके. नई चमचमाती विदेशी कार, वरदीधारी ड्राइवर को देख कर वे दोनों हैरान थे.

ज्यादा सोचनेसम झने का वक्त नहीं था. एक फाइवस्टार होटल के सामने कार रुकी. ड्राइवर को कोई जरूरी निर्देश दे कर वे बुजुर्ग कामना के पिता से बोले, ‘‘आप के लिए कमरा बुक है. जब तक चाहें रुकें. मेरा ड्राइवर आ कर उस फर्म तक ले जाएगा. गाड़ी आप के पास ही रहेगी. कामना जैसी आप की बेटी, वैसी ही मेरी.’’

कामना भावुक हो कर उन बुजुर्ग के पैरों पर  झुक गई, ‘‘चाचाजी, होटल का खर्चा हम देंगे. आप ने हमारे बारे में सबकुछ जान लिया है, पर अपने बारे में कुछ नहीं बताया.’’

उन बुजुर्ग सज्जन ने कहा, ‘‘बेटी, बातों में समय मत गंवाओ.’’

थोड़ी देर में गाड़ी फर्राटे से लहराती आगे बढ़ गई. फर्म पहुंच कर धड़कते दिल से वे दोनों सीढि़यां चढ़ने लगे.

‘‘कामना सिंह…’’ उस के पहुंचते ही कटे बाल, मिनी स्कर्ट वाली एक लड़की ने पूछा.

‘‘जी हां,’’ कामना ने कहा.

‘‘अंदर आइए, आप का इंतजार हो रहा है,’’ लड़की ने मधुर आवाज में कहा.

‘‘इंतजार और मेरा?’’ कामना बुदबुदाई.

कामना जब इंटरव्यू दे कर निकली तो उस के पैर जमीन पर नहीं थे. हाथ में पकड़ा हुआ नियुक्तिपत्र हवा में फड़फड़ा रहा था.

‘‘पिताजी, मु झे यह नौकरी मिल गई.’’

‘‘सच…’’ पिता को यकीन ही नहीं हुआ.

‘‘हां पिताजी, अच्छी सैलरी, फ्लैट अपने गांव के निकट वाले शहर में पोस्टिंग.’’

कालेसफेद मोतियों की तरह दिनरात बीतने लगे. आज कामना को नौकरी में आए

3 साल बीत गए. उस की शादी के रिश्ते आने लगे.

आज कामना की छुट्टी थी. वह घरेलू काम में जुटी हुई थी. इतने में दरवाजे की घंटी बजी. आया ने किवाड़ खोल कर उसे आवाज दी. वह अपने आंचल से गीले हाथ पोंछ कर पीठ पर लहराते खुले बालों को समेटती हुई बैठक में पहुंची.

‘‘अरे, आप…’’ कामना को अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हो रहा था.

‘‘हां, मैं. कैसी हो बेटी?’’ वे वही बुजुर्ग थे, जिन की कामना ने जान बचाई थी.

भीतर आने के बाद वे बुजुर्ग देर तक उस के पिता से बातें करते रहे.

बात आईगई हो गई. एक जगह कामना के ब्याह की बात पक्की हो गई. ब्याह का न्योता उन बुजुर्ग सज्जन को देने की हार्दिक इच्छा थी, पर उन का अतापता कामना के पास नहीं था.

बरात आ गई. शहनाई की गूंज तेज हो गई. बैंडबाजे की धुन और फिल्मी गीतों पर लड़केलड़कियां डांस करने लगे. दुलहन बनी कामना का दिल तेजी से धड़कने लगा. वरमाला के लिए सहेलियां उसे मंडप की ओर ले चलीं. जयमाल के समय उस की निगाहें बरातियों की ओर उठी गईं. अगली लाइन में वही बुजुर्ग छींटदार साफा बांधे उस की ओर देख कर मंदमंद मुसकरा रहे थे.

कामना चौंक उठी. उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ.

‘‘यही मेरे दादाजी हैं. इन की ही फर्म में नौकरी करती हैं आप. और इन्होंने ही मेरे लिए आप को पसंद किया है,’’ दूल्हा शरारत से फुसफुसाया.

‘‘मु झे पहले क्यों नहीं बताया?’’

‘‘दादाजी से पूछ लेना.’’

कामना ने हड़बड़ा कर अपने पिता की ओर देखा. उन की आंखों में मौन स्वीकृति थी. तो यह बात है. सभी ने मिल कर यह खूबसूरत नाटक खेला है उस के साथ. एक दिलकश साजिश की शिकार हुई है वह.

शादी के बाद कामना एक दिन दादाजी से पूछ ही बैठी, ‘‘आप ने हमें पहले क्यों नहीं बताया कि वह फर्म आप की है?’’

‘‘बेटी, मैं तुम बापबेटी के अच्छे बरताव से काफी प्रभावित हुआ था. अगर तुम दोनों ने भी मु झे दूसरे मुसाफिरों की तरह तड़पने के लिए प्लेटफार्म पर छोड़ दिया होता, तो निश्चित ही मेरी मौत हो गई होती. मैं तुम दोनों को अच्छी तरह परखना चाहता था, इसीलिए मैं ने 3 साल लिए.

‘‘मेरी जायदाद का एकलौता वारिस मेरा पोता भी तुम्हें जांचपरख ले. कोई जल्दबाजी नहीं. अगर संतुष्ट हो जाए तो तुम्हें अपनी जीवनसंगिनी बना ले. तुम मेरी कसौटी पर खरी उतरी और पोते के सपनों को साकार करने वाली भी.’’

कामना पिछले दिनों की कड़ियों का सूत्र एकदूसरे से जोड़ने की फुजूल की कोशिश करती हुई मन ही मन खुश हो उठी. दादाजी की कसौटी पर खरा उतरने का संतोष उस के चेहरे पर साफ झलक रहा था. Hindi Story

Hindi Story: इंतजार-क्या रुक्मी का पति उसके पास लौटा

Hindi Story: रुक्मी ने दीवार पर टंगी लालटेन उतार कर जलाई और सदर दरवाजा बंद कर के आंगन में बिछी खटिया पर आ कर बैठ गई. चारों तरफ निगाह घुमाई, तो हर तरफ एक गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था. पिछले 40 सालों से यह सन्नाटा ही तो उस के अकेलेपन का साथी रहा है.

अब तो रुक्मी को इस की इतनी आदत पड़ गई है कि इस सन्नाटे की भी आहटें उसे सुनाई दे जाती हैं, मानो सन्नाटा उस से बात करने की कोशिश करता हो.

रुक्मी ने लौ धीमी कर के लालटेन को फर्श पर टिकाया और खटिया पर लेट कर सोने की कोशिश करने लगी.

55-56 साल पहले जब 12 बरस की रुक्मी इस घर में ब्याह कर आई थी, तब शहर से दूर कुदरत की गोद में बसे इस छोटे से गांव में उस के ससुर की इस पक्की हवेली के अलावा बाकी सभी घर कच्चे थे, लेकिन लोगों का आपसी प्यार बहुत पक्का था.

पूरा गांव एक संयुक्त परिवार की तरह मिलजुल कर रहता था और रुक्मी के ससुर बैजनाथ चौधरी परिवार के मुखिया की तरह ही यहां रहने वाले हर इनसान के सुखदुख का खयाल रखते थे.

परिवार में सासससुर के अलावा रुक्मी का पति गौरीनाथ और 4 ननदें थीं. धीरेधीरे ननदें अपनीअपनी ससुराल चली गईं और रुक्मी अपने सासससुर और पति के साथ इस हवेली में रह गई.

सासससुर ने हमेशा रुक्मी को खूब स्नेह दिया, लेकिन गौरीनाथ जैसेजैसे नौजवान हुआ, उस की उड़ानें अपने घर और गांव से निकल कर शहर तक होने लगीं. कालेज की पढ़ाई करने के लिए उसे शहर क्या भेजा गया कि वह पूरे तौर से शहर का ही हो कर रह गया.

चौधरी साहब ने कई बार बेटे से कहा कि वह गांव वापस आ कर यहां का कारोबार संभाले, लेकिन उस ने साफ कह दिया कि इतना पढ़नेलिखने के बाद अब वह खेतीबारी का देहाती काम नहीं करेगा.

बेटे के इनकार से निराश और अपनी बढ़ती उम्र से लाचार चौधरी साहब अपनी सारी जमीनजायदाद बेचने के बारे में सोचने लगे, तब एक दिन रुक्मी ने थोड़ा सकुचाते हुए कहा, ‘‘बाबूजी, आप अपने पुरखों की जमीन मत बेचिए. मैं आप को वचन देती हूं कि इस की पूरी देखभाल मैं करूंगी.’’

अपनी बहू की बात सुन कर पहले तो बैजनाथ चौधरी ने उसे जमीनजायदाद से जुड़ी जिम्मेदारियों की मुश्किलें बताते हुए इस  झमेले में न पड़ने को कहा, लेकिन रुक्मी ने खेतखलिहानों की देखभाल करते हुए कुछ ही समय में अपनी काबिलीयत का लोहा चौधरी साहब को मनवा दिया और उन्होंने बहू को सारा काम देखने की आजादी दे दी.

शहर जाने के शुरू के दिनों में तो गौरीनाथ महीने 2 महीने में गांव आता रहता था और यहां से अनाज और रुपए भरभर कर शहर ले जाता था, लेकिन जब रुक्मी की बेटी आशा का जन्म हुआ, तब चौधरीजी ने बेटे से कहा कि वह अनाज तो यहां से चाहे जितना ले जा सकता है, लेकिन पैसे पर अब उस का कोई हक नहीं है, क्योंकि यह पैसा रुक्मी की कड़ी मेहनत का फल है, इसलिए उस पर रुक्मी और उस की बेटी का हक है.

बाबूजी की बात सुन कर गौरीनाथ चिढ़ गया, लेकिन पिता पर कोई बस नहीं चलता था, इसलिए रुक्मी को शहर के खर्चों और अपनी परेशानियों के बारे में बता कर रुपए देने के लिए दबाव डालने लगा, लेकिन रुक्मी ने अपने ससुर की बात की इज्जत रखते हुए पति को पैसे देने से साफ इनकार कर दिया.

पैसा मिलना बंद होने के चलते धीरेधीरे गौरीनाथ ने गांव आना बहुत कम कर दिया. चौधरी साहब बेटे की नीयत को सम झ गए थे, इसलिए उन्होंने अपनी जमीन और पुश्तैनी हवेली रुक्मी के नाम कर दी. साथ ही, आशा की पढ़ाईलिखाई का भी पूरा ध्यान रखते हुए उस का नाम गांव के स्कूल में लिखवा दिया और थोड़ी बड़ी होने पर उस के लिए एक मास्टर रख कर घर में भी उस की पढ़ाई का पूरा इंतजाम करा दिया, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि अपनी मां की तरह अनपढ़ रह कर आशा को भी जिंदगी में तकलीफें उठानी पड़ें.

जब आशा 20 साल की थी, तब रुक्मी के ससुर का देहांत हो गया. सास पहले ही नहीं रही थीं. पिता के देहांत के बाद गौरीनाथ ने रुक्मी से कहा कि वह तो गांव में रह नहीं पाएगा, इसलिए यहां की जमीन और हवेली बेच कर शहर में बंगला खरीदेगा, जिस पर रुक्मी ने कहा कि वह बाबूजी को दिए हुए अपने वचन को निभाएगी और मरते दम तक बाबूजी की इस हवेली को बिकने नहीं देगी.

उस समय तो गौरीनाथ शहर वापस लौट गया, लेकिन 2 साल बाद अचानक वह आशा के जन्मदिन पर बेटी के लिए ढेर सारे कपड़े और उपहार ले कर गांव आया और रुक्मी के लिए भी साड़ी, चूडि़यां और लालीपाउडर ले कर आया. वह 4 दिनों तक घर पर रुका था और रुक्मी से ढेरों बातें भी की थीं.

रुक्मी को लगा था कि उस का पुराना गौरी वापस आ गया है, लेकिन वह गलत थी, क्योंकि उस का गौरी तो उस से नाता तोड़ने के लिए आया था.

शहर वापस जाने से एक दिन पहले जब रुक्मी ने रोते हुए गौरी से गांव लौट आने को कहा, तो उस ने रुक्मी को अपने पास बैठा कर बड़े प्यार से उस का हाथ थाम कर कहा था, ‘‘रुक्मी, मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं, लेकिन अब शहर छोड़ कर नहीं आ सकता और तुम्हें शहर ले नहीं जा सकता, क्योंकि तुम देहातन हो और शहर के तौरतरीके नहीं जानती, इसलिए मैं अब एक पढ़ीलिखी शहरी लड़की से शादी करूंगा, जो शहर में मेरा साथ दे सके.’’

यह कह कर गौरीनाथ ने एक कानूनी कागज आगे करते हुए रुक्मी से उस पर अंगूठा लगवा कर बताया कि वह रुक्मी से तलाक ले रहा है, इसलिए अब वह यहां के खेतों और हवेली की जिम्मेदारियों से छुटकारा पा कर अपने घर वापस जा सकती है.

गौरीनाथ की पूरी बात रुक्मी ने बड़े आराम से सुनी, मगर जब उस ने गांव छोड़ कर जाने की बात कही, तो रुक्मी अपना आपा खो बैठी और बोली, ‘‘ब्याह से पहले अम्मांबाबू कहते थे कि शादी के बाद तेरी ससुराल ही तेरा घर होगा. मैं तो इसे ही अपना घर सम झती रही हूं और बाबूजी भी मु झे अपनी बिटिया जैसा स्नेह करते रहे.

‘‘अब मैं तुम्हें बता देती हूं कि यह हवेली और खेत बाबूजी ने मेरे नाम लिख दिए हैं, सो अब यही मेरा घर है. तुम मु झे यहां से नहीं निकाल सकते.’’

रुक्मी की बात सुन कर गौरीनाथ बगलें  झांकने लगा. उसे यह आज तक नहीं मालूम था कि उस के बाबूजी ने अपनी जायदाद का हकदार बेटे को नहीं, बल्कि अपनी बहू को बना दिया था.

गौरीनाथ ने रुक्मी से वसीयतनामा दिखाने को कहा, मगर शहरी गौरीनाथ की देहातन पत्नी ने उसे जवाब दिया कि वसीयतनामा तो अब वह तलाक के समय कचहरी में ही दिखाएगी.

अपनी पत्नी के तेवर देख कर गौरीनाथ ने आगे कोई बहस नहीं की. उस का अंगूठा लगा हुआ तलाकनामा ले कर शहर वापस चला गया.

गौरीनाथ को तो जवाब दे दिया था कि रुक्मी इस हवेली को छोड़ कर अब कहीं नहीं जाएगी, लेकिन उस का मन तो अपने पति के बहुत दूर चले जाने के एहसास से तड़प रहा था. जब गौरीनाथ ने ही उसे छोड़ने का फैसला कर लिया है, तो इस हवेली और जमीन से क्या लगाव.

रुक्मी की इच्छा हुई कि सबकुछ छोड़ कर इस दुनिया से ही चली जाए, लेकिन आशा का चेहरा देख कर उस ने खुद को संभाला और कलेजे पर पत्थर रख कर इस सचाई को स्वीकार कर लिया कि पति अब उस का नहीं रहा है.

कुछ ही दिनों में गौरीनाथ द्वारा रुक्मी को छोड़ कर शहरी मेम से ब्याह करने की खबर पूरे गांव में फैल गई, लेकिन गांव वालों ने अपने चौधरी साहब की बहू को पूरा संरक्षण देते हुए उसे बेफिफ्री से हवेली में रहने के लिए कहा और हमेशा उस का साथ देने का वचन दिया.

आज तक गांव वाले अपना वचन निभा रहे हैं और जरूरत पड़ने पर रुक्मी की मदद के लिए पूरा गांव उस के साथ खड़ा हो जाता है.

आज से 40 साल पहले एक बार गौरीनाथ अपनी दूसरी पत्नी और बेटे को ले कर गांव आया था और रुक्मी को जमीनजायदाद अपने बेटे के नाम करने का दबाव डालने लगा था. तब गांव की पंचायत ने गौरीनाथ को अपना फैसला सुनाते हुए कहा था कि गांव की जमीन और हवेली पर केवल रुक्मी बहू का और उस के बाद आशा का हक है, इसलिए वह अपने शहरी परिवार को ले कर यहां से जा सकता है.

उस दिन के बाद गौरीनाथ ने अपनी पत्नी और बेटी की कोई खोजखबर नहीं ली. आशा के ब्याह के समय भी वह नहीं आया था. रुक्मी ने अकेले ही बेटी का कन्यादान किया था.

आशा का ब्याह बगल के गांव में हुआ है और उस के ससुराल वाले और पति बहुत सज्जन लोग हैं, इसलिए आशा अपनी मां से मिलने आती रहती है और दामाद भी जरूरत पड़ने पर रुक्मी की मदद के लिए पहुंच जाता है और फिर पूरे गांव का सहयोग तो है ही रुक्मी को. उस ने भी गांव वालों के लिए अपनी हवेली के फाटक खोल दिए हैं.

हवेली के बड़े कमरे में सुबह बच्चों की पाठशाला लगती है और शाम को उसी जगह प्रौढ़ शिक्षा केंद्र बन जाता है. हवेली का पीछे का हिस्सा और जमीन रुक्मी ने स्कूल के लिए दे दी है, जिस से उस के गांव वालों को खेतीबारी में बहुत मदद मिलती है और इसलिए पूरा गांव रुक्मी बहू के गुणगान करते नहीं थकता है.

लेकिन गांव वालों की इतनी इज्जत और स्नेह पाने के बाद भी कई बार रुक्मी को अकेलापन कचोटने लगता है और वह गौरी को याद कर के बिलखने लगती है. यह बेचैनी तब से और भी बढ़ गई है, जब से उसे खांसीबुखार ने घेरा है.

आशा और उस का पति जब पिछले महीने उस से मिलने आए, तो मां को बीमार और कमजोर देख कर वह लोग जिद कर के उस को पास के कसबे के अस्पताल में जांच करवाने ले गए.

डाक्टर ने बताया कि टीबी के चलते दोनों फेफड़े गल चुके हैं और अब रुक्मी की जिंदगी के कुछ ही दिन बचे हैं. आशा ने रोते हुए मां से अपने साथ चलने की जिद की, तो उस ने प्यार से बेटी को मना करते हुए कहा, ‘‘बिटिया, अब अंत समय में मैं अपनी देहरी छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी. मेरी फिक्र न करो, ये गांव वाले मेरा पूरा खयाल रखते हैं. बस, एक इच्छा रही है कि एक बार तेरे बापू को देख लेती.’’

लाख कहने पर भी जब मां साथ जाने के लिए नहीं मानीं, तो आशा ने इस उम्मीद से पिता को फोन किया कि रुक्मी की हालत के बारे में सुन कर शायद उन का मन पसीज जाए और वे मां से मिलने आ जाएं, पर गौरीनाथ ने बेटी को दोटूक जवाब देते हुए कहा, ‘‘मेरा उस से अब कोई रिश्ता नहीं है. तुम्हारी मां है, तुम जानो.’’

रुक्मी की देखभाल करने के लिए आशा को उस के पास छोड़ कर रुक्मी का दामाद अपने गांव चला गया. शाम को रुक्मी ने आशा से कहा, ‘‘बिटिया, मेरे बक्से में एक लाल साड़ी रखी है, वह मु झे पहना दो और सिंदूर की डिबिया ले आओ.’’

अपनी मां की इस मांग से परेशान आशा ने तुरंत अपने पति को फोन कर के जल्दी आने को कहा और फिर अपने आंसू पोंछते हुए मां के बक्से में से लाल साड़ी निकाल कर रुक्मी को पहना कर उन के बाल संवारे और सिंदूरदानी और आईना मां के सामने कर दिया.

उस समय न जाने कहां से रुक्मी के बेजान शरीर में इतनी ताकत आ गई कि  झट से चारपाई पर बैठ कर उस ने कंघे से अपनी मांग में सिंदूर भरा और फिर उठने की कोशिश में लड़खड़ा कर चारपाई पर गिर गई.

आशा ने मां को ठीक से लिटाना चाहा, तो बेटी का हाथ पकड़ कर वह बोली, ‘‘मु झे जमीन पर बिठा दो.’’

आशा ने बहुत सम झाया और आराम करने को कहा, लेकिन रुक्मी ने जिद पकड़ ली, तो आशा ने अपनी मां को सहारा दे कर फर्श पर बिठाया और तभी रुक्मी की आंखें पलटने लगीं और वह वहीं पर गिर पड़ी.

थोड़ी ही देर में रुक्मी के देहांत की खबर गांवभर में फैल गई और उन के अंतिम दर्शनों के लिए पूरा गांव उमड़ पड़ा, लेकिन रुक्मी को जिंदगीभर जिस का इंतजार रहा, वह गौरीनाथ पत्नी के आखिरी समय पर भी नहीं आया. Hindi Story

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