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गरीब पिछड़े दलितों की कब्र बनते टैंक और गटर

हर किसी को यह एहसास है कि अब होना जाना कुछ नहीं है और जो होना था वह हो चुका है, लेकिन जो हुआ उस पर कोई हल्ला नहीं मचा, जबकि यह दिल दहला देने वाला हादसा है. रक्षाबंधन क्या कोई भी त्योहार गरीबों के लिए खास माने नहीं रखता, उलटे रोज कमानेखाने वालों को तो कोफ्त ही होती है, क्योंकि छुट्टी के दिन दिहाड़ी नहीं मिलती और अगर टैंपरेरी नौकरी वाले हो तो पगार कट जाती है.

चंबल इलाके के मुरैना जिले के गांव धनेला के तिलहन संघ के दफ्तर के नजदीक एक फैक्टरी साक्षी फूड प्रोडक्ट्स है, जिस में चैरी बनाने और सप्लाई करने का काम होता है. इस फैक्टरी के मालिक इलाके के नामी और रसूखदार रईस कौशल गोयल हैं, जिन्होंने अपनी पत्नी के नाम पर यह फैक्टरी खोली है.

कौशल गोयल के रसूख का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन की फैक्टरी एक ऐसे इलाके में चल रही थी, जो इंडस्ट्रियल नहीं है.

रक्षाबंधन की दोपहर साक्षी फूड के इर्दगिर्द काफी गहमागहमी थी. कलक्टर और एसपी समेत छोटेबड़े सरकारी मुलाजिमों के अलावा सैकड़ों गांव वाले जमा थे, जिस की वजह थी टैंक में 5 मजदूरों का मर जाना.

फैक्टरी के टैंक ने एकएक कर के जब 5 लाशें उगलीं तो वहां मौजूद लोगों का कलेजा कांप उठा. कुछ ने अपना गुस्सा भी जताया, जिसे बड़ी चतुराई से अफसरों ने ‘मैनेज’ कर लिया.

पांचों लाशों के निकलने के बाद इस हादसे की पूरी कहानी सामने आई, जिस के मुताबिक मरने वालों के नाम वीर सिंह, राजेश, रामावतार, गिरिराज और रामनरेश थे.

रामावतार, रामनरेश और वीर सिंह टिकटोली गांव के बाशिंदे थे और सगे भाई थे, जबकि राजेश और गिरिराज घुरैया वसई गांव के रहने वाले थे. इन सभी की उम्र 40 साल से कम थी. गिरिराज तो महज 28 साल का था. ये पांचों इस लालच या उम्मीद में टैंक की सफाई करने के लिए राजी हो गए थे कि इस मेहनत से जो पैसा मिलेगा उस से शाम को अपनी बहनों के लिए तोहफा और मिठाई वगैरह घर लेते जाएंगे.

एक के बाद एक इस फैक्टरी में पपीते से चैरी और गुलकंद बनते हैं. फलों का खराब मैटिरियल और पानी एक टैंक में जमा होता जाता है, लेकिन इस टैंक की कई दिनों से साफसफाई नहीं हुई थी, इसलिए इस बाबत हादसे वाले दिन इन पांचों को फैक्टरी वालों ने बुलाया था.

टैंक जो पांचों की कब्र बन गया तकरीबन 9 फुट गहरा है. पहले इन में से कोई 2 आदमी टैंक की सफाई के लिए नीचे उतरे, लेकिन टैंक में पानी गहरा था और कोई जहरीली गैस भी उस में से रिस रही थी, इसलिए वे जान बचाने की गरज से मदद के लिए चिल्लाए तो बाकी 3 भी एकएक कर के टैंक में कूद पड़े.

ऐसे दूसरे सैकड़ोंहजारों हादसों की तरह इन पांचों को भी मास्क और दस्तानों समेत हिफाजत के दूसरे सामान या औजार मुहैया नहीं कराए गये थे, जिस से इन का दम घुट गया. हल्ला मचा तो फैक्टरी में मौजूद लोग और गांव वाले टैंक के पास पहुंच गए.

किसी ने पुलिस को खबर कर दी, जिस ने आ कर इन्हें बाहर निकाला और इलाज के लिए जिला अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उन्हें मरा घोषित कर लाशों का पोस्टमार्टम किया.

अब तक अस्पताल में भी भीड़ जमा हो चुकी थी और कार्यवाही की मांग करने लगी थी, लेकिन भारीभरकम पुलिस ने कोई ‘अनहोनी’ नहीं होने दी.

हादसे की खबर चंबल इलाके में आग की तरह फैली. तरहतरह की बातों के बीच पता चला कि मरने वाले गुर्जर समाज के नौजवान थे, जिस की गिनती उन पिछड़ों में होती है, जिन्हें छूने से सवर्णों को पाप नहीं लगता और उन्हें नहाना नहीं पड़ता. माली हालत की तरह इन की सामाजिक हैसियत भी धार्मिक किताबों के मुताबिक शूद्रों सरीखी ही है.

मौके की नजाकत को भांपते हुए कलक्टर ने मरने वालों के घर वालों को 50,000-50,000 रुपए की इमदाद देने की घोषणा कर डाली, लेकिन अब तक गुर्जर समाज के लोग फैक्टरी मालिक

के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग करने लगे थे, इसलिए प्रशासन की तरफ से खबर आई कि फैक्टरी मालिक एकएक लाख रुपए और मरने वाले के घर के एकएक मैंबर को नौकरी देने को तैयार हो गया है, तो लोगों का गुस्सा कुछ कम हुआ.

मारे गए पांचों की बहनें राखी का थाल सजाए भाइयों का इंतजार करती रहीं, लेकिन खबर उन की मौत की पहुंची तो दोनों गांवों में मातम पसर गया. इन बहनों पर क्या गुजरी होगी, इस का कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता, जिन्होंने राखी के दिन अपने भाइयों को खो दिया.

आएदिन की बात है धन्ना सेठों का लिहाज और खौफ ही इसे कहा जाएगा कि गुर्जर समाज के विरोध के बाद भी पुलिस प्रशासन ने फैक्टरी मालकिन के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज नहीं किया.

6 दिन बाद समाज के लोगों ने कलक्ट्रेट का घेराव कर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन दिया, लेकिन गुर्जर समाज के लोगों को दुख और हैरत इस बात का भी रहा कि कोई मंत्री, विधायक, सांसद या दूसरा कोई बड़ा नेता उन के साथ खड़ा नहीं हुआ, जबकि माहौल पूरी तरह से चुनावी था.

तय है कि इस से उन्हें समझ आ गया होगा कि दौर दबंगों और अमीरों का है. दलित पिछड़े गरीबों की जिंदगी की कीमत महज एक लाख रुपए होती है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी ट्वीट कर हादसे पर दुख जताने की सियासी रस्म निभा दी.

मुरैना के जैसे सैकड़ों हादसे आएदिन होते रहते हैं, जिन पर 2-4 दिन तो हल्ला मचता है, लेकिन बात फिर आईगई हो जाती है. टैंकों, सीवरों, बौयलरों और गटरों में मरने वालों पर कोई गंभीर है, ऐसा कहने की कोई वजह नहीं. ऐसे कुछ हादसों पर नजर डालें, तो समझ आता है कि चूंकि मरने वाले ज्यादातर सफाई मुलाजिम दलित, पिछड़े, गरीब होते हैं, इसलिए किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती :

* इसी साल 15 जून को मुरैना के ही नजदीक ग्वालियर के पुराने रेशम मिल इलाके की एक सीवर लाइन के गटर को साफ करते समय 2 सफाई मुलाजिम अमन और विक्रम करोसिया बेमौत मारे गए थे. इन दोनों की हिफाजत के भी कोई इंतजाम नहीं थे.

हादसे की जिम्मेदारी नगरनिगम ने सफाई ठेकेदार के सिर फोड़ दी, क्योंकि मरने वाले आउट सोर्स मुलाजिम थे यानी ठेके पर काम कर रहे थे.

* भोपाल के गांधीनगर इलाके में पिछले साल दिसंबर महीने में सीवर की सफाई के दौरान एक इंजीनियर और एक मजदूर की मौत हुई थी. इन दोनों को 20 फुट गहरे गड्ढे में सफाई के लिए उतारा गया था, जहां सांस लेने के लिए औक्सीजन न मिलने से दोनों का दम घुट गया था. इन दोनों को भी हिफाजत के औजार नहीं दिए गए थे.

नगरनिगम ने सफाई का ठेका गुजरात की एक कंपनी अंकिता कंस्ट्रक्शन को दिया था, जिस ने यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया था कि हमें नहीं पता कि दोनों क्यों नीचे उतरे और कैसे मरे. इन दोनों की तो लाशों का भी पता न चलता, अगर लोगों की नजर चैंबर के बाहर रखे इन के जूतों पर न पड़ी होती.

* मध्य प्रदेश के ही सिंगरौली में 25 सितंबर, 2021 को इस से भी भयानक हादसा हुआ था, जिस में 3 सफाई मुलाजिम कन्हैया लाल यादव, इंद्रभान सिंह और नागेंद्र रजक को जान से हाथ धोना पड़ा था. ये तीनों भी गटर की जहरीली गैस का शिकार हुए थे.

* इसी साल 24 जनवरी को इंदौर में सीवेज लाइन डालते समय दिलान सिंह नाम के मजदूर की मौत हुई थी. यह मजदूर 25 फुट गहरे गड्ढे में गिरा था और उस का सिर धड़ से अलग हो गया था.

* बीती 25 जून को राजस्थान के कोटा के एक 25 फुट गहरे सीवेज में 3 मजदूरों कमल, किर सिंह और गलिया की भी जहरीली गैस के कारण दम घुटने से मौत हो गई थी. ये सब मध्य प्रदेश के आदिवासी जिले झाबुआ के रहने वाले थे. तीनों को चैंबर के नीचे की पाइप लाइन से रस्सी के जरीए बाहर निकाला गया था. बन रही इमारत सरकारी थी, लेकिन यह काम भी ठेके पर चल रहा था. इस हादसे में भी मुरैना की तरह किर सिंह और गलिया सगे भाई थे. गलिया तो 4 बच्चों का पिता था, जिसे सीवेज ने निगल लिया या सिस्टम ने, बात एकही है.

* अहमदाबाद के ढोलका में भी एक बड़ा हादसा इसी साल 25 अप्रैल को हुआ था, जिस में सीवेज लाइन की सफाई के दौरान 2 मजदूर 24 साला गोपाल पाथर और 32 साला विजय पाथार मारे गए थे. इन दोनों की मौत भी गटर में दम घुटने से हुई थी.

इस हादसे पर हल्ला मचा तो पता चला कि इसी साल तकरीबन 11 सफाई मुलाजिम गटर में मारे गए हैं. गुजरात की एक एनजीओ मानव गरिमा ने दावा किया था कि गुजरात में साल 1993 से ले कर साल 2014 के बीच मरने वाले 16 मजदूरों को मुआवजा नहीं दिया है. राज्य में ऐसे कुल 45 हादसों में 95 लोग मारे गए हैं.

* पटना के जकारियापुर इलाके में इसी साल 11 अप्रैल को 2 सफाई मुलाजिम 24 साला रंजन रविदास और 23 साला मुन्ना रजक की मौत भी सीवेज की सफाई के दौरान हुई थी.

जैसा कि ऐसे ज्यादातर मामलों में होता है, इस में भी देखने में आया कि पहले एक सफाई के लिए गटर में उतरा और काफी देर तक तक वापस नहीं आया तो दूसरा भी उसे देखने उतर गया और वह भी मारा गया. रविदास को देखने मुन्ना गया, तो फिर लाश की शक्ल में ही बाहर आया. ये दोनों नमामि गंगे प्रोजैक्ट के तहत कंपनी के लिए मजदूरी कर रहे थे. इन के पास भी हिफाजत के औजार नहीं थे.

* कानपुर के बिठूर के गांव चक्रतनपुर में पिछले साल 30 अक्तूबर को 3 मजदूरों की मौत भी सीवर टैंक में गिरने से हो गई थी. मरने वालों में से एक साहिल तो नाबालिग ही था, जबकि 2 अन्य मोहित 25 साल का और नंदू 18 साल का था. ये तीनों एक बन रहे मकान की सीवर शटरिंग खोलने गटर में उतरे थे और जहरीली गैस की चपेट में आने से मारे गए.

* 22 सितंबर, 2022 को कानपुर के ही बर्रा इलाके के मालवीय विहार में भी 3 मजदूर 28 साला अंकित पाल,

25 साला शिवा तिवारी और 26 साला अमित कुमार भी एकएक कर के मारे गए थे. ये तीनों भी एक मकान का सैप्टिक टैंक साफ करने उतरे थे.

* बीती 4 अगस्त को बिहार के समस्तीपुर के मगरदही महल्ले में सैप्टिक टैंक में दम घुटने से 2 मजदूरों अमरजीत कुमार और सनी कुमार की मौत हो गई थी.

वजह वही कि दोनों एक मकान का सैप्टिक टैंक साफ करने उतरे थे और जहरीली गैस का शिकार बन गए. इन दोनों को भी मकान मालिक ने हिफाजत के लिए कोई औजार मुहैया नहीं कराए थे.

देशभर में ऐसे हादसों की तादाद बता पाना मुश्किल है, लेकिन सभी में समान बात यह है कि मरने वालों को हिफाजत के लिए औजार नहीं दिए गए थे और तकरीबन सभी गटर की जहरीली गैस के चलते दम घुटने से मरे.

समान बात यह भी है कि किसी भी मामले में सख्त कार्यवाही करने की जरूरत नहीं समझी गई, क्योंकि ये लोग गरीब थे और इन में से 90 फीसदी दलितपिछड़े तबके के थे, जिन्हें कीड़ेमकोड़ों से ज्यादा कुछ नहीं समझा जाता.

सरकार का सफेद झूठ

गटर और टैंकों में इस तरह मरने वालों की तादाद को ले कर सरकार हमेशा सच छिपाने की कोशिश करती रही है, जिस से उस का दामन पाकसाफ दिखे.

इसी साल जून महीने में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री रामदास अठावले ने एक सवाल के जवाब में लोकसभा में बताया था कि साल 2023 में अब तक इस तरह की कुल 9 मौतें हुई हैं, जबकि साल 2022 में 66, साल 2021 में 58, साल 2020 में 22, साल 2019 में 117 और साल 2018 में

67 मौतें दर्ज की गईं. इस तरह सीवर और सैप्टिक टैंकों में सफाई करते समय साल 2018 में और जून महीने तक कुल 339 लोग मारे गए.

इस आंकड़े पर यकीन करने की कोई वजह नहीं है, जिसे कई एनजीओ ने चुनौती भी दी है, लेकिन कोई भी गूगल पर सर्च करे तो हकीकत उसे पता चल जाएगी.

लोकसभा में ही सरकार ने जानकारी दी थी कि देश में मैला ढोने की प्रथा पर पूरी तरह रोक है. इस रिवाज को रोकने के लिए कानून है, लेकिन हर कोई जानता है कि हकीकत में आज भी देश के कुछ हिस्सों में सिर पर मैला ढोने का शर्मनाक सिलसिला बदस्तूर जारी है.

खुद सरकार का सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय इसी साल जून में संसद में मान चुका है कि देश के 766 जिलों में से अब तक 508 ने ही खुद को मैला ढोने से मुक्त घोषित किया है.

इस का सीधा सा मतलब यह निकलता है कि 35 फीसदी जिलों में अभी भी मैला ढोया जा रहा है. जाहिर है कि यह काम कोई तो कर रहा होगा, नहीं तो जादू के जोर से तो मैला साफ होने से रहा.

सफाई कर्मचारी आंदोलन के संस्थापक बेजवाड़ा विल्सन ने मुंबई में 2 लोगों की मौत का हवाला देते हुए कहा था कि संसद में कोई कैसे कह सकता है कि हाथ से मैला ढोने से होने वाली किसी की मौत की खबर नहीं दी जा रही. इसी आंदोलन ने कुछ साल पहले अदालत को बताया था कि इस काम में तकरीबन 12 लाख लोग आज भी लगे हुए हैं.

यहां यह समझना जरूरी है कि हाथ से मैला ढोने और सीवर व सैप्टिक टैंक की सफाई के बीच में फर्क है. मुरैना जैसे हादसे बेहद आम हैं और इस के कुछ उदाहरण ऊपर बताए भी गए हैं, लेकिन सरकारी आंकड़ों में इन की गिनती नहीं होती. यह एक बहुत बड़ा पेंच और कमी है.

साल 1993 में सूखे यानी शुष्क शौचालयों के बनाने और ऐसे शुष्क शौचालयों को साफ करने के लिए मैनुअल मैला ढोने वालों के रोजगार पर रोक लगाई गई थी.

साल 2013 में सीवर, खाई, गड्ढों और सैप्टिक टैंकों की सीधी सफाई के लिए मानव श्रम के इस्तेमाल पर रोक को शामिल करने के लिए कानून को और स्पष्ट किया गया था.

कानून होने के बावजूद भी कई राज्यों, जिन में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात वगैरह खासतौर से शामिल हैं, में मैनुअल स्केवेंजिंग के मामले मिले थे, जिस का कानूनी मतलब है कि मानव मल को मैनुअल रूप से ढोना और मैनुअल स्केवेंजर का मतलब होता है, वह मजदूर या सफाई मुलाजिम, जिस से स्थानीय प्राधिकारी हाथों से मैला ढुलवाने का काम करवाए, मैला साफ कराए, ऐसी खुली नालियां या गड्ढे, जिस में किसी भी तरह से इनसानों का मलमूत्र इकट्ठा होता हो, उसे हाथों से साफ कराए.

फिर साल 2013 में इस शब्द का दायरा बढ़ाते हुए जो कहा गया, उस का मतलब यह है कि किसी भी तरीके से किसी अस्वच्छ शौचालय में या किसी खुली नाली या गड्ढे में मानव मल का निबटान किया जाता है. इस में रेलवे और राज्य सरकारों को यह हक दिया गया था कि वे ऐसी खुली जगहों की पहचान तय कर सकती हैं.

यह टेढ़ीमेढ़ी सांपसीढ़ी सरीखी कानूनी भाषा अच्छेअच्छों को आसानी से समझ नहीं आने वाली, खासतौर से उन 90 फीसदी दलितों को तो कतई नहीं, जो पुश्तों से मैला ढोने के काम में ढकेल दिए गए हैं, क्योंकि धार्मिक किताबों के मुताबिक सेवा का यह काम भी ऊपर वाले ने उन्हें सौंप रखा है.

सफाई कर्मचारी आंदोलन ने साल 2018 में बताया था कि सफाई कर्मचारियों की औसत उम्र तकरीबन 32 साल ही होती है, क्योंकि सफाई के काम के दौरान उन्हें तरहतरह की बीमारियां घेर लेती हैं. इस तरह वे अपनी रिटायरमैंट की उम्र तक भी नहीं जी पाते.

सफाई मुलाजिमों के हितों से ताल्लुक रखते कानून में समयसमय पर बदलाव होते रहे, लेकिन मौतों का सिलसिला उन से थमा नहीं है. हर कहीं होने वाले हादसे इस की गवाही देते हैं. ये कानून बहुत उलझे हुए हैं. प्रोहिबिशन औफ ऐंप्लौयमैंट एंड देयर रिहैबिलिटेशन ऐक्ट 2013 सीवर और नालों की मैनुअल स्केवेंजिंग के लिए सफाई मुलाजिमों को काम करने से रोकता है.

साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में हिदायत दी थी और सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को साल 2013 का कानून पूरी तरह से लागू करने का आदेश दिया था.

अदालत ने यह भी कहा था कि सैप्टिक टैंकों में होने वाली मौतों को रोका जाए. खास बात यह भी है कि सैप्टिक टैंकों और सीवर में सफाई के दौरान मरने वालों के आश्रितों को बतौर मुआवजा 10 लाख रुपए देने का इंतजाम है.

सुप्रीम कोर्ट की यह बात ही हकीकत बताती हुई थी कि दुनिया में कहीं नहीं लोगों को मरने के लिए गैस चैंबरों में भेजा जाता है. आजादी के 76 साल गुजर जाने के बाद भी जातिगत भेदभाव कायम है.

अदालत ने कई तरह के और अफसोस जताते हुए यह भी कहा था कि मैनुअल स्केवेंजिंग में लगे लोगों को औक्सीजन गैस सिलैंडर और मास्क जैसे औजार क्यों नही दिए जा रहे? सुप्रीम कोर्ट के आदेश के चिथड़े देश में हर कहीं उड़ते देखे जा सकते हैं.

जमीनी हकीकत

सीवेज और गटर में सफाई के दौरान मरने वालों में से मुरेना समेत किसी भी शहर के मजदूर के पास हिफाजत के औजार नहीं थे. इस बारे में भोपाल के कुछ सफाई वालों से बात की गई तो पता चला कि न तो नगरनिगम इन्हें मुहैया कराता है और न ही ठेकेदार देते हैं.

एक ठेकेदार से यह सवाल किया गया, तो वह बेहद नफरत भरे लहजे में बोला, ‘‘हम तो देते हैं, लेकिन ये लोग ही  नहीं लेते और ले भी लेते हैं, तो इस्तेमाल नहीं करते. इन का असली औजार तो शराब है, जिसे बिना पिए सफाई के लिए सीवर, नालियों और  गड्ढों में नहीं उतर पाते.’’

सफाई मुलाजिमों ने पूछने पर ईमानदारी से बताया कि हां, यह सच है कि हम वहां बिना नशे के नहीं जा सकते, क्योंकि चैंबरों, सीवेज और टैंकों में भयंकर बदबू आती है और तरहतरह के कीड़ेमकोड़े भी रहते हैं. होश में यह काम नहीं किया जा सकता.

एक सफाई मुलाजिम के मुताबिक, प्राइवेट तौर पर चैंबर या टैंक साफ करने के एवज में 500 रुपए तक मिल जाते हैं, जबकि नगरनिगम का ठेकेदार 8,000 से 10,000 रुपए महीना देता है यानी कुछ पैसों के लिए सफाई मुलाजिम अपनी जान पर खेलने को तैयार हो जाते हैं, तो यह उन की मजबूरी भी है और जरूरत भी.

सफाई के काम में लगे 90 फीसदी से भी ज्यादा लोग दलित होते हैं, जो पीढि़यों से मैला ढोते आ रहे हैं, बस तरीका बदल गया है. साल 2021 में इस बात को केंद्र सरकार भी संसद में मान चुकी है कि मैला ढोने के काम में लगे 97 फीसदी लोग अनुसूचित जातियों के हैं.

इन लोगों से ताल्लुक रखती सुकून देने वाली एकलौती बात यह है कि ये लोग अपने बच्चों को इस घटिया और जानलेवा पेशे में नहीं लाना और लगाना चाहते, इसलिए उन्हें पढ़ा रहे हैं. हालांकि हालात हाहाकारी तरीके से बदलेंगे, ऐसा लगता नहीं.

जब भोपाल के ही दूसरे लोगों से मुरैना जैसे हादसों पर राय मांगी गई, तो उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि अब तो ऊंची जाति वाले भी सफाई मुलाजिम बनने लगे हैं, लेकिन पूछने पर कोई भी तीन से ज्यादा नाम नहीं बता पाया.

सवाल यह भी अहम नहीं है कि ऊंची जाति वाले कुछ लोग इस पेशे में आ गए हैं, अहम सवाल उन की जिंदगी का है, जिस की गारंटी लेने को कोई तैयार नहीं.

हर गली में शराबी फिल्में चसका लगाएं, सरकारें चुप्पी साध जाएं

साल 2013 में एक फिल्म आई थी ‘ये जवानी है दीवानी’. रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण की इस फिल्म में 4 जवान दोस्तों की जिंदगी पर फोकस किया गया था, जिस में महंगी डैस्टिनेशन शादी को बड़े जोरशोर से दिखाया गया था.

साथ ही, उस शादी में शराब पानी से ज्यादा परोसी गई थी.फिल्म के हर दूसरे सीन में कोई न कोई शराब का गिलास हाथ में लिए खड़ा होता है और किसी को इस बात से परहेज नहीं था कि मर्द शराब पी रहा है या औरत. बूआ, चाचा, मामा और भानजेभतीजी सब नशे के आगोश में थे.

ऐसा महसूस हुआ जैसे किसी शराब कंपनी ने फिल्म में पैसा लगाया हो.साल 1984 में आई अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘शराबी’ में तो एक गाना ही था कि जहां ‘चार यार मिल जाएं वहीं रात हो गुलजार…’ इस फिल्म का हीरो शराबी का किरदार निभा रहा था.

जब वही ऐसा गाना गाएगा, तो समझ जाइए कि शराब ही रात गुलजार करने का एकलौता सहारा होगी. उस की कार की डिक्की में ही बार बना हुआ था, जिस में शराब की बोतलें सजी थीं.और तो और, फिल्म ‘दबंग’ में पुलिस चुलबुल पांडे का किरदार निभा रहे सलमान खान ‘हम का पीनी है, पीनी है, पीनी…’ कहते हुए जरा भी नहीं झिझकते हैं.

खाकी वरदीधारी सिर पर बोतल धर कर बेहूदगी से मटक रहे होते हैं.शराब के गाने पर तो हनी सिंह ने हद ही कर दी. ‘चार बोतल वोडका, काम मेरा रोज का…’ गा कर उन्होंने नई पीढ़ी को जता दिया कि शराब किस तरह हमारी जिंदगी में घुस चुकी है.

कव्वाली हो या गजल, रैप हो या दुख भरा गीत या फिर शादी के डीजे पर बजने वाले गाना, शराब का गुणगान इस तरह करते नजर आ रहे हैं, जैसे किसी ने अगर शराब नहीं पी है तो उसे जीने का सलीका ही नहीं आया है.

फिल्मों में काम करने वाले सैलेब्रिटी असल जिंदगी में भी शराब के चसके से दूर नहीं रह पाते हैं. इन की पार्टियों में शराब की खूब खपत होती है. रात को बहुत से फिल्म कलाकार नशे में झूमते कैमरे में कैद होते देखे गए हैं.

अब तो उन के बच्चे भी ऐसी स्टार पार्टियों में शराब के शौकीन होते जा रहे हैं. संजय दत्त, रणबीर कपूर, मनीषा कोइराला, सुष्मिता सेन ने तो कबूल किया हुआ है कि एक समय वे सब शराब की गिरफ्त में रह चुके हैं.

शराब को इस तरह ग्लैमराइज कर के फिल्म वाले तो करोड़ों रुपए कमा लेते हैं, पर ऐसी फिल्में देख कर शराब पीने वाले आम लोगों खासकर नई पीढ़ी का जिस तरह बेड़ा गर्क हो रहा है, वह चिंता की बात है. हमारे देश में शराब की खपत इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि इस तस्करी हद पर है. एक बानगी देखिए :

* अगस्त, 2023. पंजाब से गुजरात शराब ले जाते एक ट्रक को अहमदाबाद हाईवे पर पकड़ा गया. ट्रक से 940 कार्टन शराब जब्त करने के साथसाथ 2 लोगों को भी गिरफ्तार किया गया. उस शराब की कीमत तकरीबन एक करोड़ रुपए आंकी गई. ट्रक में बुरादा भर कर उस के भीतर शराब छिपाई गई थी.

* अगस्त, 2023. बिहार के पूर्वी चंपारण जिले की पुलिस ने भारी मात्रा में विदेशी शराब से लदे एक ट्रक को जब्त किया. इस दौरान ट्रक का मालिक और ड्राइवर भी गिरफ्तार हुआ. जब्त ट्रक समेत शराब की कीमत सवा करोड़ रुपए बताई गई.

* जुलाई, 2023. पुलिस और स्पैशल टास्क फोर्स ने हरियाणा से तस्करी कर बिहार जा रहे एक ट्रक से गैरकानूनी शराब पकड़ी. पुलिस ने तस्करों को भी गिरफ्तार किया. कीटनाशक दवाओं के नीचे शराब की पेटियां भरी हुई थीं. इन चंद खबरों से अंदाजा हो जाता है कि भारत में शराब की इतनी ज्यादा खपत है कि यहां शराब की तस्करी धड़ल्ले से होती है.

आंकड़ों की बात मानें, तो एक स्वैच्छिक संगठन कंज्यूमर वौइस के मुताबिक, भारत में प्रति व्यक्ति शराब (42 फीसदी से ज्यादा अलकोहल) की खपत 13.5 लिटर सालाना है, जो दुनिया में सब से ज्यादा है.एक और रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में तकरीबन 16 करोड़ लोग अलकोहल का सेवन करते हैं. इन में 95 फीसदी मर्द हैं, जिन की उम्र 18 से 49 साल के बीच है.

एक सर्वे कंपनी क्रिसिल द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2020 में 5 राज्यों आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल के लोग देश में बिकी कुल शराब का तकरीबन 45 फीसदी सेवन कर गए थे.सरकार को टैक्स से मतलबदिक्कत यह है कि ‘शराब है खराब’ की बात तो हर कोई जानता है, इस के बावजूद भारत में इस सामाजिक बुराई की खपत में पिछले कुछ साल में (साल 2010 और साल 2017 के बीच) 38 फीसदी बढ़ोतरी देखी गई थी.

एक तरफ शराब से मिलने वाले मुनाफे से सरकार अपना खजाना भरने में बिजी है, वहीं दूसरी तरफ घर नशे की इस आफत से टूट रहे हैं, खत्म हो रहे हैं, पर किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है.सरकार के रेवैन्यू कलैक्शन में 10 से 15 फीसदी तक की हिस्सेदारी शराब की बिक्री से मिलने वाले टैक्स की होती है.

उत्तर प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों के टैक्स रेवैन्यू में तो 20 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी शराब की है.मार्चअप्रैल, 2020 में कोरोना की वजह से जब लौकडाउन लगा तो शराब की दुकानें भी बंद कर दी गई थीं.

इस से सरकारों को बहुत नुकसान हुआ था. लेकिन जब शराब की दुकानें फिर खुलीं तो एक दिन में ही सरकारों ने खूब कमाई की.‘आज तक’ की एक खबर के मुताबिक, अकेले उत्तर प्रदेश में एक दिन में 100 करोड़ रुपए से ज्यादा की शराब बिकी थी.

वहीं, महाराष्ट्र सरकार को भी एक दिन में 11 करोड़ रुपए से ज्यादा का रेवैन्यू मिला, जबकि दिल्ली सरकार ने हफ्तेभर में 235 करोड़ रुपए की शराब बेच दी थी.परिवार होते बरबाद‘शराब की लत’ ये 3 ऐसे भयावह शब्द हैं, जो हर तीसरे घर को लीलते दिख रहे हैं.

चूंकि शराब पीने का चसका कम उम्र में लग जाता है और चढ़ती जवानी में ही यह लोगों को अपनी चपेट में ले लेती है. लिहाजा, यह शराबी के साथसाथ उस के परिवार को भी तबाह कर देती है.‘अमर उजाला’ अखबार में साल 2020 में पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में शराब के कहर पर एक रिपोर्ट छपी थी.

उस में बड़ी गंभीर जानकारी दी गई थी कि एचएनबी केंद्रीय गढ़वाल यूनिवर्सिटी के शिक्षा संकाय ने 2 साल पहले उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली के एक इलाके में शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक दशा पर एक रिसर्च कराई थी.

इस में बेहद चौंकाने वाली बात यह थी कि पुरुषों की औसतन मृत्यु आयु 37.5 साल (सामान्य मृत्यु आयु 50 साल से ऊपर को छोड़ कर) आई थी.इस की वजह शराब से बीमारी लगना थी. यूनिवर्सिटी के गैस्ट टीचर आशु रौलेट ने चमोली के जोशीमठ इलाके में परिवारों के सामाजिक लैवल की स्टडी की थी, जिस में पिछले 25 सालों में 50 फीसदी लोगों की मौत घर में बनाए जाने वाली कच्ची शराब से हुई थी.किसी घर में शराब के सेवन से 35 साल में, तो किसी घर में 40 साल में घर के कमाऊ सदस्य की मौत हो गई थी.

इस वर्ग में सिर्फ 3 फीसदी ही ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट हैं. 21 फीसदी ने प्राइमरी और 18 फीसदी ने मिडिल के बाद पढ़ाई छोड़ दी. शराब पीने से कमाऊ सदस्य की अचानक मौत ने इन की पढ़ाई छुड़ा दी. माली हालत बिगड़ने पर बच्चों को पढ़ाई छोड़ कर मजबूरन कोई रोजगार करना पड़ा.ये हालात सिर्फ तथाकथित ‘देवभूमि उत्तराखंड’ के ही नहीं हैं, कमोबेश भारत के हर राज्य में शराब ने अपनी जानलेवा जड़ें जमाई हुई हैं.

शर्म और दुख की बात तो यह है कि देश की तमाम सरकारें इस दानव की ‘होम डिलीवरी’ कराने पर आमादा दिखती हैं, जबकि शराब की लत एक ऐसी बुराई है, जो न सिर्फ पीने वाले पर ही असर डालती है, बल्कि हत्या, रेप, खुदकुशी या मोटरगाड़ी हादसों की एक बड़ी वजह है. इस ‘बेहया नशे’ की खासीयत यह है कि यह हर तबके को अपने में डुबो कर उस का दम घोंट देने की ताकत रखती है.

साइकोलौजिस्ट तबके ने अपनी स्टडी में पाया है कि शराबी के खून में अलकोहल की मात्रा एक फीसदी हो जाती है, तो उसे मदहोश समझा जाता है. 12 फीसदी मात्रा होने पर शराबी की चालढाल बदल या बिगड़ जाती है, जबकि यही मात्रा 15 फीसदी होने के बाद हद से ज्यादा मदहोश हो जाता है. ऐसे लोग अपनी जिंदगी की बाजी हार चुके होते हैं.

उन की सामाजिक इज्जत की धज्जियां उड़ चुकी होती हैं और उन पर हमेशा डर हावी रहता है.सरकार मंदिरों में उलझी हैपिछले 10 साल से इस देश में एक ही समस्या रह गई है कि किस तरह यह हिंदू राष्ट्र बन जाए. इस के लिए हर गलीमहल्ले में मंदिरों की बाढ़ सी आ गई है, जहां औरतों का जमावड़ा लगा रहता है.

दावा किया जाता है कि मंदिर लोगों की जिंदगी सुधार रहे हैं, पर जो औरतें उन में सिर नवाती फिरती हैं, उन्हीं के घर शराब से बरबाद हो रहे हैं, पर मजाल है कि कहीं कोई सुनवाई हो रही हो. पंडेपुजारी इन्हीं औरतों से व्रतउपवास के नाम पर पैसे तो बटोर लेते हैं, पर शराब से जुड़ी उन की समस्या पर मुंह से दो कड़े बोल नहीं फूटते हैं.

सरकार अगर यह मानती है कि पंडे समाजसुधारक होते हैं, तो वह क्यों नहीं उन्हें शराबबंदी के काम में लगाती है? क्यों नहीं पुजारी घरघर जाएं और शराबियों को शराब से दूर रहने की बात कहें? फिर देखते हैं कि ऊपर वाले के इन नुमाइंदों की शराबी कितनी सुनते हैं.याद रखिए कि शराब ऐसा नशा है, जो लोगों को धीरेधीरे अपनी चपेट में लेता है.

यह पैसे, सेहत, सामाजिक इज्जत के साथसाथ जिंदगी पर भी वार करता है. इस सब के बावजूद इस ‘डायन’ से पीछा छुड़ाया जा सकता है, बस कुछ बातों को गांठ बांध कर रखना होता है, जैसे :* आप अपने शराब छोड़ने के फैसले के बारे में अपने परिवार और दोस्तों को जरूर बताएं और उन से यह कहने में कतई न झिझकें कि वे आप पर नजर रखें.

कभी शराब पीने की ललक उठे तो वे आप को सपोर्ट करें कि इस से बचा जाए.* अपनेआप को बिजी रखें. ऐसे काम करें, जिन में आप को शारीरिक मेहनत करनी पड़े. ऐसा करने से आप तंदुरुस्त रहेंगे. आप को अच्छी नींद भी आएगी.

* अपने शराबी दोस्तों की संगत से बचें. उन के शराब पीने के समय उन के पास कतई न जाएं.* शराब छोड़ने के पहले 2-3 हफ्ते के दौरान आप को शराब के आकर्षण से बचना होगा. आप घर पर रखी बोतलें फेंक दें और उन जगहों पर न जाएं, जहां आप बैठ कर शराब पीते थे.

* आप उन सारी बातों की लिस्ट बनाएं, जो आप को शराब पीने के लिए उकसाती हैं. उन्हें करने से बचें.

* अपनी सेहत सुधारने के साथसाथ परिवार को भी देखें कि आप के इस बुराई से दूर होने पर उन्हें कितनी दिमागी राहत मिलती है.शराब सेहत से ज्यादा गरीब के पैसे को चूसती है. इस तबके में इतना सोचनेसमझने की ताकत नहीं होती है कि जिस फिल्म को वह मनोरंजन के नजरिए से देखता है, वहां कोई हीरो शराब को हीरो बना कर पेश करे, तो वह गरीब भी यह मान लेता है कि ‘अंगूर की बेटी’ इतनी भी नुकसानदेह नहीं है.

धीरेधीरे वह शराब पीता है और फिर बाद में शराब उसे पीती है. उसे तन, मन और धन से कंगाल कर देती है.रहीसही कसर वर्तमान सरकार के नएनए बनते मंदिर पूरी कर रहे हैं. वहां से मोक्ष का रास्ता तो मिलने की गारंटी है, पर किसी शराबी का नशा छुड़ाने का कोई उपाय नहीं बताया जाता है.

शर्मनाक : जनता की कमाई, ओहदेदारों ने उड़ाई

धर्म के ठेकेदार, भ्रष्ट नेता व घूसखोर अफसर भले ही हर दिन अंधी कमाई करते हों, लेकिन मेहनतकश व ईमानदार लोग गुजारे लायक पैसा भी कड़ी मशक्कत कर के कमा पाते हैं. इस के बावजूद बहुत से कौए, गिद्ध, चील, घुन व दीमक जैसे लोग गाढ़े पसीने की उन की कमाई नोचने में लग जाते हैं. मसलन, धर्म की आड़ में दाढ़ीचोटी वाले, रिश्वत के नाम पर सरकारी अफसर और मुलाजिम व सहूलियतों के नाम पर सरकारें जनता की जेबें हलकी करती रहती हैं.

हालांकि टैक्स के रूप में वसूले गए जनता के पैसे का पूरा व सही इस्तेमाल बेशक जनता को सुविधाएं मुहैया कराने के लिए होना चाहिए, लेकिन अफसोस यह है कि ऐसा नहीं होता.

कुरसी पर काबिज नेता व अफसर जनता के पैसे को अपना समझते हैं व मनमाने तरीकों से खूब अनापशनाप खर्च करते हैं. दौरों व बैठकों की आड़ में सैरसपाटे, मौजमस्ती करने का चलन कोई नया नहीं है, लेकिन सरकारी फुजूलखर्ची रोकना जरूरी है.

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माले मुफ्त दिले बेरहम

जनता का पैसा सरकारी दफ्तरों और महंगी गाडि़यों वगैरह पर बड़ी बेरहमी से खर्च किया जाता है. सरकारी इमारतों को आलीशान बनाया जाता है. सरकारी महकमे व उन के दफ्तर जनता को काबू करने, उन्हें सहूलियतें देने, नियमकानून चलाने के लिए हैं. उन्हें कामचलाऊ किफायती व सादा होना चाहिए, लेकिन वे सरकारी मंदिर बन रहे हैं. जनता की पीठ पर बेहिसाब बोझ डाल कर मजे लूटना कहां की अक्लमंदी है

जनता के पैसे से तो जनता को ही सुविधाएं मिलनी चाहिए, लेकिन इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता, इसलिए पैसे की कमी से वक्त पर काम नहीं होता. टूटी सड़कें व पुरानी रेल पटरियां चटकी पड़ी रहती हैं. नदियों व रेलवे स्टेशनों पर पुराने, छोटे व कमजोर पुलों पर अकसर जानलेवा हादसे होते रहते हैं.

पैसे की कमी से एक ओर जनता के फायदे की बहुत सी सरकारी स्कीमें आधीअधूरी रह जाती हैं, वहीं दूसरी ओर जनसेवकों के लिए सरकारी इमारतों में कीमती फर्नीचर, कालीन, परदे वगैरह लगा कर उन्हें सजाया जाता है. इस तरह के खर्चे करना सरकारी खजाने को लुटाना है.

उत्तर प्रदेश की एक मुख्यमंत्री ने अपने विवेकाधीन कोष से 80 करोड़ रुपए बांटे, तो उस से अगले मुख्यमंत्री ने 5 सौ करोड़ रुपए से भी ज्यादा की रकम अपने चहेतों को बांट दी.

अपने राजनीतिक फायदे के लिए जनता के पैसों से धार्मिक यात्राएं कराई जाती हैं. धार्मिक आयोजनों के इश्तिहार दिए जाते हैं. लैपटौप व साइकिलें बांटी जाती हैं. ओहदेदारों की शानोशौकत में कहीं कोई कमी न आए, इस के लिए सरकारी घर व दफ्तर जनता के पैसों से महलों की तरह सजेधजे रहते हैं.

कोई लगाम नहीं

सरकारी कामकाज के नाम पर होने वाले भारीभरकम खर्च को घटाने पर कहीं कोई सख्ती होती नहीं दिखती. उस पर नकेल कसने के उपाय भी सिर्फ दिखावे के लिए होते हैं, इसलिए वे कारगर होते नहीं दिखते. नतीजतन, जनता से वसूल की गई टैक्स की रकम का एक बड़ा हिस्सा गैरजरूरी खर्चों व भ्रष्टाचार की नदी में बह कर ओहदेदारों के पाले में चला जाता है.

सरकारी अंधेरगर्दी का बड़ा अजब हाल है. बहुत से सरकारी दफ्तर व स्कूल वगैरह खंडहरनुमा इमारतों में चलते हुए दिखते हैं. बरसों तक उन की मरम्मत के लिए रकम मंजूर नहीं होती. सालाना बजट में रखी गई तयशुदा रकम को खर्च करने की गरज से कई बार सरकारी संस्थाओं की अच्छीखासी मजबूत इमारतों को तोड़ कर नए सिरे से बना दिया जाता है. नैनीताल के एक सरकारी ट्रेनिंग सैंटर में यही हुआ था.

सरकारी दफ्तरों में रखरखाव व साजसज्जा के नाम पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है, जबकि जनता की मांग वाले बहुत से जरूरी काम पैसे की कमी के चलते रुके रहते हैं. सरकारी महकमों में खरीदबिक्री व काम कराने में कमीशनखोरी आम है. इस में भी हेराफेरी की जाती है. कई काम सिर्फ कागजों पर ही होते हैं.

भ्रष्टाचार के चलते जनता अपने हक से बेदखल है. बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा व सेहत की बुनियादी सहूलियतें बस नाम की हैं.

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बीते दिनों उत्तर प्रदेश में यही हुआ. गोरखपुर के मैडिकल कालेज में भुगतान रुकने से औक्सिजन सप्लाई रुकी और दर्जनों बच्चे मर गए थे, वहीं दूसरी तरफ बीते दिनों ऐलान हुआ था कि अयोध्या में राम की मूर्ति लगेगी. इस के अलावा इलाहाबाद के कुंभ मेले में 5 अरब रुपए खर्च होंगे.

ऐसे खर्चों की फेहरिस्त बहुत लंबी है. करोड़ों रुपए की लागत से महाराष्ट्र में शिवाजी व गुजरात में सरदार पटेल की ऊंची व महंगी मूर्तियां लगेंगी. सवाल इस बात का है कि खर्च की फेहरिस्त में तरजीह किसे दी जाए  तरक्की व खुशहाली के लिए आखिर क्या जरूरी है और क्या गैरजरूरी है

भाग्य, भगवान, धार्मिक अंधविश्वास व रूढि़यों में जकड़े ज्यादातर लोग यही गलती करते हैं. वे तालीम, सफाई व सेहत वगैरह की अनदेखी कर के मुंडन, तेरहवीं, कथा, कीर्तन व तीर्थयात्राओं के लिए कर्ज लेने में भी नहीं हिचकते, इसलिए देश में गरीबी, गंदगी जैसी समस्याएं मौजूद हैं.

यह है उपाय

कम पढ़ेलिखे लोग जागरूकता की कमी से बेवजह के कामों में पैसा खर्च करें, तो बात समझ में आती है, लेकिन अगर सरकारें भी उसी राह पर चलें, तो हैरत व अफसोस होना लाजिम है.

सरकार चाहे तो क्या काम नहीं हो सकता  मसलन, मोदी सरकार ने पुराने व बेअसर हो चुके बहुत से कानून खत्म कर के अच्छा काम किया है. बहुत से सरकारी महकमों में तो कोई खास काम ही नहीं होता. इसलिए अब वक्त आ गया है कि बेवजह चल रहे बहुत से सरकारी महकमे बंद किए जाएं, ताकि सरकारी खर्च व जनता की पीठ पर लदा टैक्स का बोझ घट सके.

नशा करता है जिंदगी का नाश

प्रसिद्व साहित्यकार हरिवंशराय बच्चन के काव्यसंग्रह मधुशाला में मदिरा सेवन का खूबसूरती से महिमामंडन किया गया है. मदिरा के अतिरिक्त चरस, गांजा, स्मैक, अफीम, हीरोइन जैसे अनेक ऐसे नशीले पदार्थ हैं जिन से मनुष्य अपनी नशे की लत को पूर्ण करता है. अपनी मौजमस्ती और यारीदोस्ती निभाने के लिए किए गए किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थ के जहर का सेवन न जाने कितने परिवारों की सुखशांति को छीन लेता है और कितने ही घर बरबाद कर देता है. मदिरा का सेवन तो आजकल स्टेटस सिंबल माना जाता है. कभी कभार किया जाने वाला नशा जब

लत में परिवर्तित हो जाता है तो नशा करने वाले का शरीर अनेक बीमारियों से ग्रस्त हो जाता है. इस से वह स्वयं तो परेशान रहता ही है, उस के घरपरिवार वालों को भी अनेक आर्थिक व मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

इंदौर का राहुल दवे पिछले 5 सालों से स्मैक पी रहा है. उस का शरीर स्मैक का इतना आदी हो गया है कि अगर उसे स्मैक की डोज नहीं मिले तो उस के हाथ पैर कांपने लगते हैं. और उसे लगता है कि जान ही निकल जाएगी. उस के परिवार में

10 साल का बेटा और 4 साल की बेटी के अलावा पत्नी, मातापिता और एक भाई हैं. परिवार वाले पिछले कई सालों में न जाने कितने मंदिर, मसजिद और गुरुद्वारे गए कि किसी प्रकार राहुल की नशे की लत छूट जाए पर इन जगहों पर क्या किसी को कोई लाभ हुआ है? झाड़फूंक करने वालों और गंडेताबीज बनाने वालों की शरण में भी गए पर ये तमाम अंधविश्वासी टोटके नाकाम साबित हुए.

कालू सिंह 20 साल से गांजे का सेवन कर रहे थे. घर वाले परेशान रहते थे परंतु उन की लत के आगे बेबस थे. प्रारंभ में उन की पत्नी उन्हें हर रोज एक महाराज के सत्संग में ले जाती थी क्योंकि महाराज जी ने उन की नशे की लत छुड़ाने की गारंटी ली थी. उन्होंने कहा था कि प्रतिदिन सत्संग में लाने से उन की नशे की लत भगवान भक्ति में लग जाएगी. सुबह पत्नी उन्हें जबरदस्ती सत्संग में ले जाती और शाम को वे नशे में धुत हो कर पत्नी को ही गाली देते और घर से निकल जाते. पड़ोसी उन्हें किसी तरह घर ले कर आते. अंत में पत्नी ने हार मान कर उन्हें उन के हाल पर छोड़ दिया.

रमेश त्यागी बहुत अच्छे घर से हैं. घर में कोई भी नशा नहीं करता. प्रारंभ में दोस्त जबरदस्ती उन्हें पिलाते थे पर धीरेधीरे उन्हें भी मजा आने लगा. फिर तो यह स्थिति हो गई कि जिस दिन उन्हें शराब नहीं मिलती थी, न भूख लगती थी न प्यास. बस, एक शराब ही थी जो उन्हें संतुष्टि देती थी. मातापिता बहुत परेशान रहते थे, घर में कलह होता था, और एक दिन गुस्से में आ कर उन के पिता ने उन्हें घर से ही निकाल दिया. उन की मां ने शराब की लत छुड़ाने के लिए कई उपवास किए. घर में हवन, कथा करवाई. पर नतीजा सिर्फ नशा मुक्ति केंद्र उपरोक्त सभी नशा करने वाले लोग उज्जैन के नशा मुक्ति केंद्र में भरती हैं. जब एक नशा करने वाला इस अवस्था में पहुंच जाता है कि नशे के बिना वह रह नहीं पाता तो ऐसी अवस्था में फंसे लोगों की लत छुड़ाने के लिए सरकार ने नशा मुक्ति केंद्रों की स्थापना की है. इन आवासीय नशा मुक्ति केंद्रो में विभिन्न प्रकार के नशा करने वालों को काउंसलिंग, डाक्टरी सहायता और मनोरंजन द्वारा ठीक करने का प्रयास किया जाता है. यहां मरीज या तो स्वयं आते हैं अथवा मित्र या परिवार वाले ले कर आते हैं. लगभग 15 से 20 दिनों के उपचार के बाद यहां से मरीजों को छुट्टी दे दी जाती है.

मरीज की यातनाएं

नशा मुक्ति केंद्र में मरीज आता तो अपनी या परिवार वालों की मर्जी से है परंतु यहां रह कर उसे कम तकलीफों का सामना नहीं करना पड़ता है.

-यहां पर सब से बड़ी कमी उसे परिवार की खलती है. परिवार के साथ न होने से मनोबल कमजोर हो जाता है और कई बार वह स्वयं को इस संसार में एकाकी महसूस करने लगता है.

-नशे के आदी हो चुके शरीर को जब उस की डोज नहीं मिलती तो मरीज को मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार की परेशानी होनी प्रारंभ हो जाती है. परिवार के साथ न होने से उतनी अच्छी देखभाल भी नहीं हो पाती.

-जब नशे की लत को छुड़ाने की दवा दी जाती है तो शरीर पर उस का प्रतिरोधी असर होता है और उन्हें उलटी, दस्त, बुखार व डिप्रैशन जैसी बीमारियां हो जाती हैं. इस से शरीर बहुत कमजोर हो जाता है.

-अक्सर नशेड़ी बाहरी लोगों से बातचीत करने में कतराते हैं क्योंकि नशा इन का आत्मविश्वास समाप्त कर देता है.

-मनचाहे भोजन, पारिवारिक वातावरण का अभाव, आर्थिक परेशानी और यहां की तयशुदा दिनचर्या से चलना कई बार उन के लिए बहुत बड़ी परेशानी का कारण बन जाता है.

-कोई काम न होने से मन नहीं लगता और वे बड़ी कठिनता से यहां समय व्यतीत कर पाते हैं.

परिवार की यातनाएं

नशा करने वाले का परिवार पूरी तरह निर्दोष होता है परंतु बीमार के साथसाथ परिवारजन भी अनेक प्रकार की परेशानियों का सामना करते हैं. अपने दिल पर पत्थर रख कर वे अपने परिवार के सदस्य को यहां छोड़ कर जाते हैं. क्योंकि यहां सिर्फ मरीज के रहने की ही व्यवस्था होती है. दूर से प्रतिदिन मिलने आना संभव नहीं होता. ऐसे में दिन में कई बार फोन द्वारा वे अपने रिश्तेदार का हालचाल लेते रहते हैं. कईर् घरों के तो मुखिया ही नशे के शिकार होते हैं, ऐसे में घर वालों के सामने रोजीरोटी का ही प्रश्न खड़ा हो जाता है.

-एक व्यक्ति जब नशा कर के आता है तो घर में कलह करता है. कई बार तो पत्नी और बच्चों के साथ मारपीट भी करता है. जिस से छोटे बच्चे सहम जाते हैं और उन के मन में पिता के प्रति सम्मान ही समाप्त हो जाता है.

-मेरी एक सहेली के पति को शराब की लत है. जब उन की बेटी की 12वीं की बोर्ड परीक्षा हो रही थी, उन्होंने घर में आ कर सहेली के साथ मारपीट की. देररात तक दोनों में कहासुनी होती रही. फलस्वरूप, बेटी अगले दिन की परीक्षा की तैयारी नहीं कर पाई. उस विषय में उस के बहुत कम अंक आने से परीक्षा परिणाम खराब हो गया.

-कई बार पिता का अनुसरण कर के बच्चे भी नशा करना प्रारंभ कर देते हैं. जिस से उन का पूरा जीवन बरबाद हो जाता है.

-बच्चों के दोस्त उन के पिता के नशे को ले कर मजाक उड़ाते हैं जिस से उन का बालमन आहत हो जाता है. वे तनाव के शिकार हो जाते हैं.

आर्थिक संकट

नशे की लत जब एक बार शरीर को लग जाती है तो उसे किसी भी कीमत पर नशे की डोज की आवश्यकता होती है.

एक नशा मुक्ति केंद्र के प्रभारी राजेश ठाकुर बताते हैं कि यों तो सभी प्रकार के नशे खर्चीले होते हैं परंतु स्मैक का नशा सर्वाधिक खतरनाक और खर्चीला होता है. 10 ग्राम स्मैक की पुडि़या 200 रुपए में आती है और एक नशेड़ी एक दिन में 2 पुडि़यों का सेवन तो करता ही है. यानी प्रतिदिन 400 रुपए का खर्चा.

-जब नशा करने वाले को पैसे नहीं मिलते तो वह बेचैन हो जाता है और पत्नी, मां के गहने व घर का सामान तक बेच देता है.

-नशा कोई भी हो, उसे करने के लिए पैसों की आवश्यकता होती है और जब नशेडि़यों को सुगमता से पैसे प्राप्त नहीं होते तो वे चोरी, डकैती और लूटमार जैसी घटनाओं को अंजाम देने लगते हैं.

-नशा मुक्ति केंद्र में भेजने के बाद भी मरीज के भोजन, चायनाश्ता, और कई बार दवाओं व फल आदि का इंतजाम भी परिवारीजनों को करना पड़ता है. इस से उन पर अतिरिक्त आर्थिक भार आ जाता है.

प्रतिष्ठा को ठेस

समाज में नशा करने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाता है. नशा करने वालों और उन के परिवार के प्रति लोगों का सम्मान समाप्त हो जाता है. परिवार के सदस्य स्वयं भी आत्मविश्वास की कमी के कारण लोगों से बातचीत करने में कतराते हैं. मेरी एक परिचित कालेज में प्रोफैसर है. उस के पति नशे की लत के इस कदर शिकार हैं कि अकसर सड़क पर पड़े मिल जाते हैं. इस कारण उस को सब के सामने शर्मिंदगी उठानी पड़ती है. परेशान हो कर उस ने लोगों से मिलनाजुलना ही छोड़ दिया है.

नशा चाहे किसी भी प्रकार का हो, नुकसान दायक ही होता है. बेहतर है कि इस का शौक पालने से ही बचा जाए. आमतौर पर इस प्रकार का शौक यारीदोस्ती में उत्पन्न होता है. इसलिए आवश्यक है कि ऐसे लोगों से समय रहते दूरी बना ली जाए. कई बार नशा मुक्ति केंद्र में रहने के बाद नशे की लत से मुक्ति मिल जाती है परंतु घर जा कर यार दोस्तों के प्रभाव में आ कर व्यक्ति फिर से नशा प्रारंभ कर देता है. नशा करने वाला तो अपनी मौजमस्ती करता है परंतु मानसिक, आर्थिक और सामाजिक तकलीफ व परेशानी उस के परिवार को सहनी पड़ती है.

नेता के प्यार में दिल दिया और जान भी दी

जहां पर भी राजनीति व प्यार का मिलन हुआ है, वहां पर ज्यादातर लड़कियों के साथ धोखा ही होता रहा है. बहुत कम ऐसे नेता हैं, जिन्होंने अपने प्यार को निभाया और प्रेमिकाओं की जान बची रही.

उत्तर प्रदेश में एक बड़े नेता हुए, जिन के प्यार में गिरफ्तार हुई कमसिन लड़की को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था. वह लड़की जिस दबंगता से कविता पढ़ती थी, उसी दिलेरी से प्यार के मैदान में नहीं टिकी रह सकी. इस का नतीजा यह हुआ कि जब उस के पेट में नाजायज प्यार की निशानी आई, तो उस के नाम की सुपारी दे दी गई.

इस तरह एक होनहार लड़की तथाकथित प्यार की भेंट चढ़ गई. उसे क्या पता था कि जिस शादीशुदा नेता के प्यार में वह गिरफ्तार है, वही उस की जान का दुश्मन निकलेगा. लड़की की जान गई और नेता जेल पहुंच गए.

इसी तरह एक और बड़े नेता के प्यार की आंच में से एक पत्रकार लड़की पेट से हो गई, तो उसे भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ गया.

एक एयरलाइंस चलाने वाले नेता ने भी अपनी तथाकथित प्रेमिका को मौत के घाट उतार दिया और खुद जेल यात्रा पर निकल गए. वैसे, यह राज हमेशा बना रहेगा कि इन सारे मामलों में कौन कुसूरवार था, नेता या जानबूझ कर प्यार की आग में कूदने वाली वह लड़की, जो शायद नेता के जाल में फंस कर उलझ गई?

हरियाणा के भी एक नेता के प्यार में फिदा हो कर एक वकील औरत ने अपने प्राण गंवा दिए थे.

इस तरह की घटना राजस्थान में भी घटी, जहां एक नेता के प्यार में उलझी औरत की सुपारी मंत्री की पत्नी ने दी और वह बच न सकी.

क्या वजह होती है कि ज्यादातर मामलों में शादीशुदा नेता के जाल में लड़कियां ऐसी फंसती हैं कि उन्हें अपनी जान की भी परवाह नहीं रहती है? वे यह भूल जाती हैं कि इन नेताओं के रुतबे के साथ उन के परिवार का भी वजूद होता है, जो हकीकत में उन से ज्यादा ताकतवर होता है.

इसी तरह एक बड़े नामी मंत्री की पत्नी ने जब बड़े होटल में खुदकुशी की, तब नेता पर शक किया गया. हालांकि यह मौत आज भी राज ही है.

दरअसल, अपने दबदबे के चलते नेता मजे तो लूट लेते हैं, पर लड़की को गले में अटकी हड्डी की तरह न निगल सकते हैं, न उगल सकते हैं. हां, सांपछछूंदर जैसे हालात में फंसे इन नेताओं के प्यार के किस्से देश के राजनीतिक हलकों में सुर्खियां जरूर बटोरते रहे हैं. ज्यादातर मामलों में इस तरह के प्यार का नतीजा लड़की की जान जाने के रूप में होता है.

तंत्र मंत्र के चक्कर में मासूम बेटे की बलि

35 साला उमेश परिहार के पास वह सब कुछ था जिसकी दरकार किसी को भी होती है मसलन अपना बड़ा आलिशान सा घर खूबसूरत स्मार्ट बीबी चार मासूम बच्चे माँ बाप और खुद की कार , और यह सब उस ने अपनी मेहनत से हासिल किया था . पेशे से ड्राइवर उमेश मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य  जिले धार के गाँव घाटबिल्लोदा के चन्दननगर मोहल्ले में रहता था . काम के सिलसिले में अक्सर उसका आना जाना इन्दोर और उज्जैन लगा रहता था . लेकिन जब से धार्मिक शहर उजैन में महाकाल लोक बना है तब से उसके फेरे उज्जैन ज्यादा लग रहे थे .

पिछले कुछ महीनों से वह उज्जैन में ही रहने लगा था अपनी बुलेरो कार उसने किराये पर उठा दी थी ..उज्जैन का माहौल दूसरे धार्मिक शहरों की तरह पूरी तरह धार्मिक है , जहां अल सुबह से बम बम भोले के नारे लगना शुरू होते हैं तो देर रात तक यही सिलसिला चलता रहता है . इस शहर में धर्म गुरुओं , ज्योतिषियों , बाबाओं और तांत्रिकों के इफरात से आश्रम और अड्डे हैं जिनमें ख्वाहिशमंद लोगों की लाइन लगी रहती है .

किसी को घरेलू कलह और लाईलाज बीमारी से छुटकारा चाहिए रहता है तो किसी को नौकरी की दरकार रहती है . बेटी की शादी के लिए भी लोग इन डेरों के चक्कर काटते नजर आते हैं तो किसी को पितृ दोष से मुक्ति के लिए यह शहर मुफीद लगता है . धन दौलत चाहने बालों का तो कहना ही क्या . यहाँ के काल भैरव  मन्दिर में  शराब का भोग लगता है जहाँ शनि उतरवाने दुनिया भर के लोग आते हैं . उजैन के महाकाल मन्दिर में शिव अभिषेक करने तो हस्तियों का तांता लगा रहता है

ऐसे माहौल का अलग अलग किस्म के लोगों पर अलग अलग असर पड़ता है . उमेश पर असर पड़ा तंत्र मन्त्र का और उसमें भी मरघट यानी श्मशान सिद्धि का जिसके लिए उजैन खासतौर से जाना जाता है .क्षिप्रा नदी के किनारे अघोरियों की श्मशान साधना होती है जिसके बारे में तरह तरह के मनगढ़ंत किस्से कहानिया फैलाने बालों ने फैला रखे हैं जिनमे से एक यह भी है कि अगर मरघटों में तत्र मत्र और क्रियाएं करते रहने बाले बाबा किसी को आशीर्वाद दे दें तो उसके वारे न्यारे होने से कोई नही रोक सकता .ये बाबा आमतौर पर नंगे रहते हैं और अपने शरीर पर श्मशान की राख या भभूत लपेटे रहते हैं चौबीसों घंटे गांजे और भंग के नशे में धुत रहने के चलते इनकी आँखे सुर्ख लाल रहती हैं इन्हें देखने भर से आम लोग डरते हैं क्योंकि ये बेहद डरावने एक हद तक खूंखार लगते हैं . इन्हें नागा बाबा भी कहा जाता है .

यानी उज्जैन में मुरादें पूरी करने होने की छोटी मोटी दुकानों सहित बड़े बड़े और शो रूम और माल्स भी हैं जिसकी जैसी हैसियत होती है उसके मुताबिक वह आशीर्वाद खरीद लेता है जिसकी कोई गारंटी नही होती . इस खालिस ठगी के धंधे में कैसे कैसे लोग उल्लू बनते हैं इसकी एक बानगी उमेश परिहार भी है जिसके सर रातों रात रईस बनने का भूत कुछ ऐसे सवार हुआ कि उसने अपने ही हाथों अपने 2 साल के बेटे भीम का इतनी बेरहमी से क़त्ल किया कि देखने बाले तो दूर की बात हैं सुनने बालों की भी रूह काँप उठे .

लालच में गड़े धन के

कोई बिरला ही शख्स होगा जिसने गड़े धन के किस्से कहानी नही सुने होंगे जिनका सार यह रहता है कि जमीन के नीचे इफरात से सोना चांदी हीरे जवाहरात गड़े रहते हैं जिन्हें तंत्र मन्त्र के जरिये निकाला जा सकता है . लेकिन यह काम आसान नही है क्योंकि जमीन में गड़े धन की हिफाजत खतरनाक जहरीले सांप करते हैं इसलिए यह पैसा माहिर गुरुओं जो तांत्रिक ही होते हैं  की सरपरस्ती और देखरेख में ही निकाला जाना चाहिए नही तो लेने के देने पड़ जाते हैं और 90 फीसदी मामलों में गडा धन या खजाना निकालने बाला बेमौत मारा जाता है

उज्जैन आते जाते उमेश ने भी ऐसी चमत्कारी कहानिया सुनी थीं सो जल्द ही अमीर बनने के सपने ने उसकी रात की नींद और दिन का चैन छीन लिया यहाँ तक कि उसने अपनी कार के बोनट पर भी खोपड़ी का निशान बनबा लिया था . बुलेरो किराये पर उठाने के बाद वह ऐसे किसी सिद्ध बाबा की तलाश में जुट गया जो तंत्र मन्त्र सिखा दे जिससे वह गडा धन निकालकर बिना मेहनत किये एशो आराम की जिन्दगी जिए .इसके पहले वह किन्नरों का ड्राइवर हुआ करता था जिन्होंने उसे खूब पैसा दिया था . लेकिन तंत्र मन्त्र के फेर में पडकर वह नशा करने लगा और काम में भी अलाली बरतने लगा तो किन्नरों ने भी उससे किनारा कर लिया .

उसकी यह तलाश बम बम बाबा की शक्ल में पूरी हुई . उज्जैन में बम बम बाबा का बड़ा नाम है जो अघोरी हैं और श्मशान साधना के स्पेशलिस्ट माने जाते हैं . इस बाबा के बारे में भी कई चमत्कारिक किस्से उज्जैन के लोग सुनाते हैं कि वे पहुंचे हुए सिद्ध पुरुष हैं . एक बार जिस पर खुश हो जाएँ उसकी हर मुराद पूरी हो जाए और जिससे गुस्सा हो जाएँ तो खड़े खड़े ही उसे भस्म कर दें . उमेश ने इस बाबा के बारे में सुना तो उसे लगा कि यही बाबा उसे गडा धन दिला सकते हैं . लिहाजा वह बम बम बाबा के चक्कर काटने लगा .

कई दिनों की मिन्नत और मनुहार के बाद बाबा उसे अपना चेला बनाने तैयार हुआ लेकिन इस शर्त के साथ कि पहले किसी की बलि चढ़ाओ तभी अपना चेला बनाऊंगा . लालच में अँधा हो चुका उमेश पूरी तरह बाबा की गिरफ्त में आ चुका था इसलिए यह मूर्खता करने भी तैयार हो गया . लेकिन आजकल के जमाने किसी की बलि लेना यानी उसकी हत्या कर देना आसान काम नही रह गया है सो वह परेशानी और चिंता में पड़ गया कि किस की बलि दे . तंत्र मन्त्र किस तरह अच्छे खासे आदमी की अक्ल हर लेता है यह अब उमेश को देख सहज समझा जा सकता था जिसके जेहन में में बलि के लिए अपने ही जिगर के टुकड़े मासूम भीम के चेहरा कौंध गया .

बेरहमी से कुचल डाला

एक तरफ बेटा था तो दूसरी तरफ करोड़ों की काल्पनिक दौलत जिसके बूते पर वह एशोआराम के ख्याली पुलाव पका रहा था . अन्धविश्वास की दलदल में गहरे तक धंस चुके उमेश को भीम साफ्ट टारगेट लगा था क्योंकि वह विरोध नही कर सकता था और आसानी से उसे मारा जा सकता था . लिहाजा बीती 5 सितम्बर को उज्जैन से वह सीधा अपने घर घाट बिल्लोदा जा पहुंचा . घर पहुँचते ही उमेश ने उटपटांग हरकतें शुरू कर दी . पहले तो उसने पूजा का सारा सामान जमाया और फिर एक कटोरे में आग जला ली .

घर पर मौजूद उसकी पत्नी , माँ और पिता हैरान थे कि वह यह क्या कर रहा है . पूरे घर को आग का धुंआ देता वह मन्त्र भी बुदबुदाता जा रहा था और अपने साथ लाई भभूत भी वह घर में बिखराता जा रहा था . ये हरकतें देख पिता और पत्नी ने उसे टोका तो उसने इन दोनों को पीट डाला ..इसके बाद अचानक ही उसने भीम को उठाया और उसे भी पीटने लगा तो पत्नी और घबरा गई क्योंकि अब उमेश के सर पागलपन सवार हो चुका था . किसी अनहोनी से डरी पत्नी ने भीम को उससे छुड़ाना चाहा तो उमेश और बिफर उठा और खुद को बेटे सहित दूसरे कमरे में लेजाकर शटर बंद कर लिया .

घर के लोग चिल्लाते रह गये लेकिन पगलाया उमेश भीम को मारता रहा तो पत्नी ने पास के थाने की तरफ दौड़ लगा दी . पुलिस तुरंत आ गई लेकिन लाख कहने और धमकाने के बाद भी उसने शटर नही खोला . देखते ही देखते वह बेटे को जमीन पर ऐसे पटकने लगा जैसे धोबी कपडा धोता है . उस मासूम के रोने चिल्लाने और चीखने का इस वहशी दरिब्दे पर कोई असर नही हुआ . वह लगातार उसे पटकता रहा जिससे उसकी मौत हो गई . नजारा इतना वीभत्स था कि पुलिस बाले भी काँप उठे क्योंकि भीम के शरीर की चटनी बन चुकी थी और सारा कमरा खून से लाल हो चुका था .

कोई और चारा न देख पुलिस ने शटर काटने गेस कटर का इंतजाम किया लेकिन तब तक यह हैवान अपने मकसद कामयाब हो चुका था . पुलिस को धमकाते उसने घर को गेस सिलेंडर से ब्लास्ट करने की धमकी भी दी थी . शटर काटकर पुलिस बाले अंदर कमरे में गए तब भी उमेश बमुश्किल काबू आया . उसने आग लगाने की कोशिश की और एक सिपाही को काट भी खाया . खुद को भी उसने सब्बल से नुकसान पहुँचाया .

गिरफ्तारी के बाद उमेश को पीथमपुर के अस्पताल में भर्ती किया गया क्योंकि उसकी दिमागी हालत ठीक नही थी . पुलिस बाले जंजीर से बांधकर उसे ले गये इस वक्त मौजूद सारे लोग उमेश और उसके तंत्र मन्त्र को कोस रहे थे लेकिन सबक कितनीं ने लिया कि इस फरेब में नही पड़ेंगे कहा नही जा सकता .

मेहनत से मिलता है धन

उमेश के लालच और अंधविश्वास ने उससे ही काफी कुछ छीन लिया है जबकि उसके पास सब कुछ था . देश में रोज कहीं न कहीं कोई न कोई ऐसे ही किसी अन्धविश्वास मसलन तंत्र मन्त्र , झाड फूंक , ज्योतिष और टोन टोटकों के फरेब में पडकर बर्बाद हो रहा होता है और खुद का और दूसरों का नुकसान कर रहा होता है लेकिन सब कुछ जानने समझने के बाद भी लोग संभलते नही तो इसके जिम्मेदार वे खुद तो हैं ही लेकिन इफरात से हर कहीं धूनी रमाये बैठे चिलम फूंकते बम बम बाबा जैसे तांत्रिक भी कम गुनाहगार नही ठहराए जा सकते जो लोगों को बहलाते फुसलाते हैं . उमेश को तो सजा होना तय है लेकिन जब तक ऐसे बाबाओं पर काररवाई नही होगी तब तक कोई न कोई भीम तंत्र मन्त्र की बलि चढ़ता रहेगा .

रही बातों रातों रात अम्बानी और अडाणी बन जाने के ख्वाव और ख्वाहिश की तो वह अगर तंत्र मन्त्र से पूरी होना मुमकिन होती तो देश में सभी अमीर होते . कम से कम वे बाबा तो होते ही जो करोडपति बनने का रास्ता हजार पांच सौ रु में दिखाया करते हैं . लेकिन खुद भिखारियों सी जिन्दगी जीते हैं . इसकी वजह शीशे की तरह साफ़ है कि इन चीजों में कोई दम नही होता . पैसा सिर्फ मेहनत और मेहनत से ही आता है और उमेश इसे कमा भी रहा था लेकिन अक्ल मारी गई तो बर्बाद भी हो गया .

ऐप्स से करें ‘पीरियड्स लौक’

आज की भागदौड़भरी जिंदगी को अगर पासवर्ड भरी लाइफ कहा जाए तो गलत नहीं होगा. हम अपने जीमेल, फेसबुक, फोन, एटीएम पिन व कई तरह के अन्य पासवर्ड्स को याद रखने में इतना ज्यादा ध्यान देते हैं कि अपनी हर महीने की सब से महत्त्वपूर्ण डेट को ही भूल जाते हैं. जी हां, हम पीरियड्स डेट के बारे में बात कर रहे हैं. अधिकांश युवतियों को अपनी पीरियड्स डेट्स याद नहीं होतीं, वे अंदाज से तारीख बताती हैं. अगर इस महीने की बता भी दें तो पिछले महीने की तारीख नहीं बता पातीं. तारीख याद नहीं रहने की वजह से कई बार उन्हें छोटी छोटी प्रौब्लम्स से भी गुजरना पड़ता है.

लेकिन अब आप को पीरियड्स की तारीख याद रखने की जरूरत नहीं. आप का एक टच आप की पीरियड्स डेट को लौक कर के आप को टैंशन फ्री रखेगा. आप सोच रही होंगी भला कैसे, तो कुछ ऐसे कि आप अपना मोबाइल तो हमेशा अपने पास रखती होंगी. बस, अपने फोन में पीरियड ट्रैकर ऐप्स डाउनलोड कर तारीख याद रखने के झंझट से छुटकारा पा कर अपने पीरियड्स को हैप्पी पीरियड्स बनाइए.

पीरियड ट्रैकर ऐप्स केवल ऐंड्रौयड फोन में ही नहीं चलते बल्कि आईफोन में भी डाउनलोड किए जा सकते हैं. कुछ में एक साधारण सा कलेंडर होता है जबकि कुछ में सर्विकल म्यूकस और शरीर के तापमान को भी मापा जा सकता है. ये ऐप्स केवल पीरियड्स की तारीख ही नहीं बताते बल्कि इन से आप अपनी प्रैग्नैंसी भी प्लान कर सकती हैं. ये ऐप्स आप को बताते हैं कि आप कब कंसीव कर सकती हैं, कब फर्टिलिटी ज्यादा होती है, कब संबंध बनाने से बचना चाहिए. इस में आप पीरियड्स के दौरान होने वाले शारीरिक बदलाव व फीलिंग्स के नोट्स भी तैयार कर सकती हैं.

ये हैं कुछ पीरियड्स ट्रैकर ऐप्स

पीरियड ट्रैकर लाइट

यह फ्री ऐप है जिसे आप अपने फोन के प्ले स्टोर से डाउनलोड कर सकती हैं. इस ऐप की खास बात यह है कि इस का इस्तेमाल आसानी से किया जा सकता है. इस में बस आप को अपने पीरियड के पहले और आखिरी दिन एक क्लिक करना होगा. इस के बाद ऐप आप को इस डाली गई सूचना के आधार पर यह बताता है कि आप का पीरियड साइकिल कितने दिन का होगा, महीने के किन दिनों में कंसीव करने की संभावना अधिक होगी साथ ही रिमाइंडर आप को बताता रहता है कि किस तारीख को आप का पीरियड आने वाला है.

पिंक पैड

यह ऐप पीरियड ट्रैकर होने के साथसाथ महिलाओं से जुड़े कई विषयों पर जरूरी जानकारी भी देता है. इस पीरियड ट्रैकर में पूरी दुनिया की महिलाओं द्वारा लिखे गए पोस्ट भी मिलेंगे, जो फैशन, ब्यूटी और हैल्थ जैसे विषयों पर होते हैं. इस ऐप की खास बात यह है कि इस में पीरियड का काउंटडाउन आप की होम स्क्रीम पर दिखाई देता है जिस से आप को ऐप ओपन कर के यह देखने की भी जरूरत नहीं कि पीरियड्स में कितने दिन बाकी हैं.

क्लू

यह ऐप काफी आकर्षक तरीके से डिजाइन किया गया है. इस में आप को अपने पीरियड की तारीख और सर्कल के बारे में लिखना होता है. कुछ महिलाओं में यह सर्कल 28 दिन का होता है तो कुछ में 30 दिन का. यह ऐप इस सूचना का इस्तेमाल कर आप को अगले महीने की पीरियड तारीख और अंडोत्सर्ग के बारे में बताता है. इस ऐप में आप अपने मूड व शारीरिक बदलाव व हार्मोनल लक्षण के बारे में एक कस्टम टैग भी बना सकती हैं. इस में आप कब सैक्स किया और गर्भ निरोधक दवाओं को खाने का रिमाइंडर भी लगा सकती हैं.

मंथली साइकल्स

इस का इस्तेमाल कर आप आसानी से अपने पीरियड्स को मौनिटर व मैनेज कर सकती हैं. इस कलेंडर में मैंस्ट्रुअल सर्कल को हाईलाइट करने के लिए कलर डौट्स का इस्तेमाल किया जाता है.

साइकल्स

यह ऐप उन महिलाओं के लिए उपयोगी है जो मूड और अन्य लक्षणों को ट्रैक नहीं करना चाहतीं, सिर्फ यह जानना चाहती हैं कि कब उन का पीरियड आने वाला है.

इस के अलावा माई साइकल्स, पी लौग, फर्टिलिटी फ्रैंड मोबाइल, लव साइकल्स मैंस्ट्रुअल कलेंडर, किंडरा, आई पीरियड, पीरियड फ्री कई ऐप्स हैं जिन्हें डाउनलोड कर के पीरियड्स डेट को लौक किया जा सकता है.

पीरियड ट्रैकर ऐप्स के फायदे

  • इन ऐप्स में आप की प्राइवेसी का पूरा ध्यान रखा जाता है.
  • जो महिलाएं कंसीव करना चाहती हैं उन्हें यह ऐप महीने के सब से फर्टाइल दिनों की जानकारी देता रहता है, साथ ही जो अपनी प्रैग्नैंसी टालना चाहती हैं उन्हें भी पता चलता है कि कब संबंध बनाना सुरक्षित
  • नहीं है.
  • इस के रिमाइंडर से पता चलता है कि पीरियड्स में कितने दिन बचे हैं, जिस से आप को पैड व हैल्थ हाईजीन प्रौडक्ट्स कैरी करने में आसानी होती है.
  • आप को अपने मैंस्ट्रुअल सर्कल के बारे में पता चलता रहता है. अगर कभी पीरियड्स संबंधी कोई समस्या होती है तो आप को अपने पिछले सारे रिकौर्ड्स डाक्टर को बताने में आसानी होती है.

इन ऐप्स की सहायता से आप ट्रैक कर सकती हैं कि आप का पीरियड सर्कल नौर्मल चल रहा है या नहीं.

कोमल हाथों में हथियार आखिर कैसे आए

‘‘मैं तब फर्स्ट ईयर में पढ़ती थी. जयपुर के महेश नगर इलाके से शाम तकरीबन साढ़े 6 बजे मैं पैदल ही घर से ट्यूशन के लिए निकली. आगे जहां लोगों की कम चहल पहल थी वहां पहुंची, तो मैं ने देखा कि सामने एक आदमी मुझे इशारा कर रहा था. वह साइन लैंग्वेज में कुछ कह रहा था. मैं ने पलट कर पीछे देखा तो एक अन्य आदमी भी मुझे फौलो करता नजर आया.

‘‘जब तक मैं समझ पाती कि दोनों एक दूसरे से मेरे बारे में ही बात कर रहे हैं, तब तक उन दोनों ने आ कर मुझे जकड़ लिया और करीब 20 कदम दूर खड़ी एक कार तक घसीटते हुए ले गए. जब वे मुझे कार में धकेल रहे थे तो मैं ने उसी समय एक व्यक्ति को किक मार कर नीचे गिरा दिया और कार से बाहर निकल गई. ऐसे में कार में बैठे 3 और बदमाश मुझे पकड़ कर वहीं मारपीट करने लगे.

‘‘मारपीट व छीना झपटी के दौरान मेरा बैग नीचे गिर गया और उस में रखा चाकू बाहर आ गया. उन लोगों की नजर चाकू पर नहीं पड़ी, लेकिन मैंने बैग के बाहर गिरे चाकू को देख लिया था. ऐसे में उन की मार खाकर मैं ने सड़क पर गिरने का नाटक किया और चाकू उठा कर हिम्मत से उन की तरफ लहरा दिया. मेरे हाथ में चाकू देख कर वे सकपका गए और एकदम पीछे हट गए. मैं मौका देख कर वहां से भाग निकली.

‘‘इस घटनाक्रम को वहां दूर खड़े 8-10 लोग देख रहे थे. मुझे भागता देख उन्हें सारा माजरा समझ आ गया और वे तुरंत कार के पास आ कर बदमाशों से सवाल जवाब करने लगे और मामला गड़बड़ देख उन्होंने बदमाशों की धुनाई करनी शुरू कर दी. उन लोगों की मदद से मैं घर पहुंची. घर पहुंच कर मैंने पेरैंट्स को सारी बातें बताईं और परिजनों के साथ थाने गई, जिस से पुलिस ने आगे की तहकीकात शुरू की.’’

जयपुर के महेश नगर थाना क्षेत्र में रहने वाली माधवी ने अपनी आपबीती सुनाते हुए आगे बताया, ‘‘दिल्ली गैंगरेप की घटना के बाद मैं ने अपने बैग में चाकू रखना शुरू कर दिया था. मैं अपनी ओर से सभी युवतियों को यह कहना चाहती हूं कि स्प्रे, मिर्च पाउडर व चाकू जैसी चीजें हर युवती को खुद की हिफाजत के लिए अपने पास जरूर रखनी चाहिए.’’

सभ्य समाज में हथियारों का कोई काम नहीं है. यह जिम्मेदारी पुलिस और प्रशासन की है कि वह समाज के लोगों में भरोसा और माहौल में शांति बनाए रखे, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा. भरोसा इस कदर उठ चुका है कि युवतियां अपने बचाव के लिए हथियार रखने को मजबूर हैं. युवतियां बदमाशों के खिलाफ अपने कोमल हाथों में हथियार थाम रही हैं.

दिल्ली गैंगरेप की घटना के बाद लाखों लोगों के विरोध और अपराधियों को सख्त सजा देने की मांग के बाद भी समाज के उन लोगों की सोच पर इन सब का कोई असर नहीं हुआ, जो युवतियों को महज शारीरिक हवस को पूरा करने की नजर से देखते हैं. आज भी देशभर में रोज दर्जनों ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां युवतियों का अपहरण कर बलात्कार किया जा रहा है. बढ़ते अपराध पर रोक लगाने में नाकामी से भी अब युवतियां हताश हो चुकी हैं. ऐसे में वे खुद की हिफाजत के लिए खुद आगे आने व हथियार उठाने को मजबूर हैं.

समाज में तेजी से आ रहे इस बदलाव को देखते हुए क्या अब यह समझ लेना चाहिए कि युवतियों को अपनी हिफाजत के लिए खुद ही हथियार उठाने होंगे? अगर ऐसा है तो देश में पुलिस का क्या काम है? क्या युवतियों के पास हथियार उठाने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है? युवतियां हथियार न उठाएं, तो खुद की हिफाजत के लिए क्या करें?

गौरतलब है कि दिल्ली में हुए गैंगरेप हादसे के बाद युवतियों ने हथियार रखने की जरूरत पर जोर दिया है. आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए तो जयपुर में 2011 से कमिश्नरेट लागू होने के बाद से अब तक 2,368 महिलाएं आर्म लाइसैंस के लिए अप्लाई कर चुकी हैं, जिन में से 648 को लाइसैंस मिल भी चुका है. वहीं देश के दूसरे शहरों में भी आर्म लाइसैंस के लिए अप्लाई करने वाली महिलाओं की तादाद में पिछले 2-3 साल में तेजी से बढ़ोतरी हुई है.

सैल्फ डिफैंस ट्रेनर रिचा गौड़ बताती हैं कि पिछले 2 साल में मार्शल आर्ट व कराटे में युवतियों की भागीदारी 70 फीसदी तक बढ़ी है. मैं राजस्थान पुलिस एकेडमी समेत कई शिक्षण संस्थानों में युवतियों को सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग दे रही हूं. हम कुल 4 युवतियों ने मिल कर सैल्फ डिफैंस ट्रेनिंग की शुरुआत की थी, आज हमारे ग्रुप से 65 युवतियां जुड़ी हुई हैं, जो ट्रेनर के रूप में युवतियों को ट्रेनिंग दे रही हैं.

जयपुर की पुलिस अफसर शिल्पा चौधरी का कहना है, ‘‘खुद की रक्षा के लिए हथियार से ज्यादा आत्मविश्वास की जरूरत होती है. युवतियों को सैल्फ प्रोटैक्शन के लिए खुद को तैयार करना है, तो उन्हें सैल्फ डिफैंस ट्रेनिंग लेनी चाहिए. कराटे और मार्शल आर्ट सीखना चाहिए, ताकि मुसीबत के समय वे खुद की रक्षा कर सकें. पर मालूम रहे कि 4 इंच से बड़ा चाकू या कोई हथियार रखना गैरकानूनी है.’’

पिस्टल शूटर राजश्री चूड़ावत का कहना है, ‘‘शूटर होने के कारण मेरा सैल्फ कौन्फिडैंस हमेशा बेहतर रहता है. हालांकि जिस पिस्टल से हम शूट करते हैं, वह पिस्टल बदमाशों पर फायर करने के काम नहीं आती, लेकिन फिर भी कहीं अकेले जाते हैं तो मन में सुरक्षा की भावना रहती है. कम से कम इस पिस्टल से बदमाशों को डराने का काम तो किया ही जा सकता है. हालांकि अभी तक कोई ऐसा हादसा मेरे साथ नहीं हुआ कि पिस्टल दिखाने की जरूरत पड़ी हो, लेकिन कभी ऐसा मौका पड़ेगा तो मैं चूकूंगी नहीं. कहीं भी रेप जैसे मामले सामने आते हैं, तो मेरा खून खौल उठता है. हालिया हालात को देखते हुए युवतियों के लिए सैल्फ प्रोटैक्शन बहुत जरूरी है.’’

इस मामले में रिटायर जिला और सैशन जज अजय कुमार सिन्हा का कहना है, ‘‘सरकार और पुलिस प्रशासन युवतियों को सुरक्षा देने में नाकामयाब हैं. यही वजह है कि युवतियों को आज कोमल हाथों में हथियार थामने पर मजबूर होना पड़ रहा है. युवतियों का पुलिस प्रशासन से भरोसा उठ रहा है. मेरा मानना है कि हथियार रखने के बजाय युवतियों को सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग लेनी चाहिए.’’

राजस्थान यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के प्रोफैसर सोहन शर्मा का कहना है कि युवतियों को समाज में हमेशा से ही सभ्य, शालीन और शांत स्वभाव का माना जाता रहा है, लेकिन अब आने वाले समय में यह सोच बदल जाएगी. इस का जिम्मेदार भी समाज खुद ही होगा. घर के बाहर ही नहीं, घर के भीतर भी युवतियां सुरक्षित नहीं हैं. तमाम तरह के रिश्ते भी आज के दौर में तारतार हो रहे हैं. ऐसे में युवतियां खुद की हिफाजत के लिए हथियार उठाने को विवश हो रही हैं.

अंधविश्वास के नाम पर बलि चढ़ते लोग

राजस्थान तो जैसे अंधविश्वास में ही जीता रहा है. गांवढांबी की बात तो छोड़ो, शहरी पढ़ेलिखे भी अंधविश्वास में जी रहे हैं. कसबों और शहरों में हर शनिवार को दुकान, मकान, गाड़ी में नीबूमिर्च टांगने का अंधविश्वास जोरों पर है.

लोगों की सोच है कि इस से नजर नहीं लगती और धंधा सही होता है. मगर वे लोग यह भूल जाते हैं कि बड़ीबड़ी कंपनियां, होटल व दफ्तरों में नीबूमिर्च नहीं बांधे जाते तो क्या उन का धंधा नहीं चलता?

जो लोग शनिदेव के नाम पर नीबूमिर्च हर शनिवार को बेचते हैं, उन की बल्लेबल्ले है. वे लोग इस के 10 रुपए लेते हैं. साथ ही, सरसों का तेल भी लेते हैं.

एक किलो हरी मिर्च व एक किलो नीबू तकरीबन सौ रुपए में आता है. इन को बांध कर बेचने से ऐसे लोग एक हजार से 15 सौ रुपए कमाते हैं और तेल अलग से मिलता है. वह तेल दुकान पर बेच देते हैं.

कहने का मतलब है कि इस धंधे से जुड़े लोग हर शनिवार को 2 हजार रुपए कमाते हैं. अगर महीने में 4 शनिवार हैं तो 8 हजार रुपए कमा लेते हैं, सिर्फ 4 दिन में.

इन्हीं की तरह बाबा लोग जटा बढ़ा कर, तिलक लगा कर झोलीझंडा लिए राजस्थान के गांवढांणी से ले कर शहरों तक में दानदक्षिणा लेते दिख जाते हैं.

ये लोग भोलेभाले लोगों को ऊपर वाले के नाम पर डरा कर और अच्छे दिन का झांसा दे कर लूटते फिरते हैं.

society

जैसलमेर शहर में सैकड़ों ऐसे बाबा दिख जाएंगे जो दिनभर भीख के नाम पर लोगों की जेबें हलकी करते हैं. इन बाबाओं का ठिकाना गड़सीसर सरोवर के पास है. वहां रात में ये भगवाधारी बाबा दारूमीट की दावत उड़ाते दिख जाते हैं. हर रोज यहां ऊपर वाले के नाम पर लिए गए पैसे से पार्टी होती है.

इन बाबाओं के साथ ही कई दिव्यांग भी होते हैं जो दिनभर सड़कों पर घिसटघिसट कर भीख मांगते हैं. वे भी इन बाबाओं के साथ मुर्गमुसल्लम और दारू में उड़ा देते हैं. सुबह होने पर ये लोग फिर भीख मांगने निकल पड़ते हैं.

राजस्थान में रामदेवरा, जसोल, देशनोक,  केलादेवी, गोगामेड़ी, खाटू श्यामजी, पुष्कर और ख्वाजा गरीब नवाज अजमेर में 12 महीने मेला लगता है. इन जगहों पर जाने वाले लोगों की जेबें कोई जूतों की रखवाली के नाम पर, तो कोई तालाब में मिट्टी निकालने के नाम पर, तो कोई रामरसोड़ा व पानी की प्याऊ के नाम पर और कोई गायों के चारेपानी के नाम पर ढीली करता है.

रामदेवरा में हर साल लाखों लोग आते हैं. राजस्थान में यह इलाका जैसलमेर जिले में पड़ता है. भादवा मेले में हर साल यहां तकरीबन 25-30 लाख लोग आते हैं.

रामदेवरा मंदिर के बाहर जूते खोलते हैं, तब वहां पर पहले से बैठे लोग कहते हैं कि आप आराम से दर्शन कर के आओ. हम जूतों की रखवाली करते हैं.

दर्शन के बाद जब लोग जूते लेने वापस आते हैं तो जूतों की रखवाली के नाम पर पैसे मांगे जाते हैं और खुशीखुशी लोग देते भी हैं.

इस के बाद वहां पर डायरियां ले कर घूम रहे धर्म के ठेकेदार तालाब से मिट्टी निकालने के नाम पर, रामरसोड़ा, प्याऊ और गायों के लिए चारापानी के नाम पर रुपए वसूलते हैं. पैसा न देने पर मारपीट तक की जाती है.

रामदेवरा मंदिर के बाहर जूतों की रखवाली कर रही कमला देवी ने कहा कि वह दिनभर में 4-5 हजार रुपए कमाती है. यह मेला 10 दिन तक चलता है और कमला देवी 10 दिन में तकरीबन 40 हजार रुपए कमाती है. उस का पति, बेटा, बेटी भी इसी काम में लगे होते हैं.

उन का कहना है कि हम जूतों की रखवाली करते हैं और लोग प्यार से 10-12 रुपए देते हैं. हम किसी से छीनते नहीं हैं. मगर वहां का नजारा देखें तब पता चले कि कैसे लूटा जाता है.

गांवोंढांणियों में तो अंधविश्वास इस कदर हावी है कि लोग बीमार पड़ने पर अस्पताल जाने के बजाय भोपों, तांत्रिकों की शरण में जाते हैं. भोपे उन्हें झूठ कहते हैं कि उन से फलां देवता रूठा है या फिर कहते हैं कि उन के स्वर्गवासी पिता, दादा, माता या कोई उन्हें परेशान कर रहा है. उस की आत्मा शांत नहीं है. ऐसे में भोपा उन के मरे हुए दादा, माता या पिता की मूर्ति बनवा कर उन के घर या खेत में लगवा देते हैं.

वहां रात्रि जागरण के अलावा दारूबकरे की दावत उड़ाई जाती है. अगर फिर भी उस परिवार की तकलीफ दूर नहीं होती तो भोपा कहता है कि मूर्ति सही नहीं चढ़ी. दोबारा पूरी कार्यवाही करनी पड़ेगी. फिर भी सही नहीं होता तो कहता है कि अब आप किसी और भोपे के पास जाओ.

भोपे न केवल झाड़फूंक करते हैं बल्कि भूतप्रेत को रोटी तक डलवाते हैं. मगर क्या विज्ञान के समय में यह अति नहीं है? कभी किसी ने भूतप्रेत देखा है? नहीं न…? तो उन से डरना कैसा? मगर लोग तो अंधविश्वास से बाहर निकलना ही नहीं चाहते. अनपढ़ ही नहीं पढ़ेलिखे भी भोपों के चक्कर में पड़े हैं.

जोधपुर जिले के एक गांव में तो कुछ महीने पहले एक भोपे ने एक औरत का दुख दूर करने के नाम पर मंदिर में ले जा कर बलात्कार तक कर दिया था.

उस महिला की रिपोर्ट पर उस बलात्कारी भोपे को पुलिस ने पकड़ लिया था. वह आज भी जेल में है. ऐसे भोपों से सावधान रहें. अगर भोपों के पास कुछ ताकतें होतीं तो वे खुद अपने घर में क्यों दुखी होते?

अजमेर जिले के केकड़ी कसबे में शर्मनाक घटना हुई. 40 साला कन्या देवी के पति की मौत क्या हुई, परिवार के लोग ही जान के दुश्मन बन गए. उसे डायन बताया गया. फिर शुरू कर दिया जोरजुल्म ढाने का दौर. लोहे की चेन से बुरी तरह पीटा गया. कपड़े उतरवा कर महल्ले में घुमाया गया. आंख और हाथ दोनों ही अंगारों से दाग दिए गए. इस से भी मन नहीं भरा तो धधकते अंगारों पर बिठा दिया गया. बुरी तरह से घायल कन्या देवी की अगले दिन मौत हो गई.

इस वारदात पर परदा डालने के लिए उन्हीं लोगों ने अंतिम संस्कार भी कर दिया. इस के बाद जो हुआ, वह और भी चौंकाने वाला था.

पंचपटेलों ने इस मौत के लिए जिम्मेदार लोगों के सारे गुनाह माफ कर दिए. कहा कि पुष्कर सरोवर में डुबकी लगाओ और गायों के लिए एक बोरी अनाज, एक ट्रैक्टर चारा और 5 टैंकर पानी दे कर ‘पाप मुक्त’ हो जाओ.

दूसरी ओर पीडि़त परिवार से कहा गया कि किसी को इस बारे में बताया तो समाज से बाहर कर देंगे.

गनीमत यह रही कि कन्या देवी के भतीजे महादेव ने 12 अगस्त, 2017 को यह मामला केकड़ी थाने तक पहुंचा दिया. शिकायत में डायन बता कर मारने का आरोप लगाया गया है.

केकड़ी के थानाधिकारी हरीराम कुमावत ने शिकायत मिलने के बाद जांच एसआई को सौंप दी है.

अजमेर एसपी राजेंद्र सिंह के संज्ञान में मीडिया इस घटना को लाई तो उन्होंने निष्पक्ष जांच कर आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने का आदेश दिया.

इस मामले में राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष सुमन शर्मा के निर्देश पर आयोग की टीम 14 अगस्त को कांदेड़ा, केकड़ी पहुंची और कन्या देवी के बेटे कालूराम और आसपास के लोगों से जानकारी ली. इस के बाद केकड़ी थाना पहुंच कर डीएसपी राकेशपाल सिंह और सीआई हरिराम कुमावत से बात की.

इस मामले में 2 औरतों समेत 5 और लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है. जांच कर रहे एसआई शंकरलाल ने बताया कि आरोपी चंद्रप्रकाश, सोनिया, पिंकी, गोपीचंद, महावीर को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें 3 दिन की रिमांड पर लिया गया. इस मामले में शामिल मनोहर को तलाशा जा रहा है.

3 अगस्त को कांदेड़ा, केकड़ी में कन्या देवी को उसी की ससुराल के लोगों ने डायन बता कर इतना मारापीटा कि उस की मौत हो गई. उस समय उस का 15 साला बेटा कालूराम घर पर था, जिसे कमरे में बंद कर दिया गया था.

कालूराम की सिक्योरिटी को ले कर महिला आयोग की टीम ने पुलिस से बात की. कालू की जिम्मेदारी चाइल्ड हैल्पलाइन को दी गई है.

राजस्थान सरकार ने सवा 2 साल पहले अप्रैल, 2015 में डायन प्रताड़ना निवारण कानून भी बना दिया, इस के बावजूद राजस्थान में डायन के नाम पर औरतों पर जुल्म ढाने के 37 मामले सामने आ चुके हैं.

पिछले 20 सालों में डायन बता कर औरतों को सताने के 162 मामले सामने आ चुके हैं, वो भी केवल 5 जिलों में.

कानून के माहिरों का मानना है कि यह कानून असरदार तरीके से लागू हो, इस के लिए जरूरी है कि पुलिस ऐसे मामलों में सख्त और तेज ऐक्शन ले. लापरवाही बरतने वाले पुलिस अफसरों पर कड़ी कार्यवाही करे. इस कानून की जानकारी के लिए सरकार समयसमय पर कैंपेन चलाए.

डायन प्रताड़ना निवारण अधिनियम 2015 में किसी भी औरत को डायन करार देने वाले शख्स को 5 साल की सजा और 50 हजार रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है. साथ ही, किसी भी औरत के खिलाफ लोगों को उकसाने और जायदाद पर कब्जा करने पर 3 साल से 7 साल तक की सजा का प्रावधान है. इस दौरान औरत के मरने पर आजीवन कारावास और एक लाख रुपए के जुर्माने का प्रावधान है. कन्या देवी के कातिलों को भी क्या आजीवन कारावास की सजा होगी, यह देखना होगा.

कोटा में छात्रों की खुदकुशी : खुद को साबित करने का जानलेवा दबाव

आप अपने मन में एक चित्र बनाएं कि किसी दूरदराज गांव का गरीबवंचित परिवार का कोई बच्चा ऊंची पढ़ाई के लिए कोटा, राजस्थान में कोचिंग लेने के सपने देख रहा है. उस का मजदूर पिता अपना अधभरा पेट काट कर पैसे जमा करता है और बच्चे की आंखों में सुनहरे भविष्य की चमक देख कर संतुष्ट हो जाता है.

पर अचानक कोटा से खबर आए कि उस मजदूर का बेटा वहां पढ़ाई का दबाव नहीं झेल पाया और एक नायलौन की रस्सी से फांसी लगा कर मर गया है, तो उस मजदूर पिता पर क्या बीतेगी? हमारे लिए यह एक दुखद खबर हो सकती है, पर वह मजदूर तो जीतेजी मर जाएगा.

इस चित्र को सोचने की वजह क्या है? दरअसल, अब कोटा अपनी पढ़ाई से ज्यादा छात्रों की खुदकुशी के लिए सुर्खियां बन रहा है. एक छात्र की लिखी आखिरी चिट्ठी के अंश से आप को बात समझ में आ जाएगी :

‘अभिनव मेरे भाई, तुम कभी कोटा नहीं आना. मैं नहीं चाहता कि तुम भी मेरी तरह दिमागी रूप से परेशान हो जाओ. मैं यहां सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई करता हूं. अकेला हो गया हूं. मोबाइल है नहीं तो कई दिनों से यह लैटर लिख रहा हूं. जब मौका मिल पाया था तब भेजा.

‘अभिनव, तुम पेंटिंग बनाओ. सोशल मीडिया का इस्तेमाल करो. हो सकता है कि तुम को घर बैठे ही कहीं से और्डर आ जाएं. तुम बहुत बड़े आर्टिस्ट बन जाओ.

‘अंत में मांपापा, एक बात आप से बताना भूल गया. भूला नहीं शायद हिम्मत नहीं जुटा पाया. पिछले हफ्ते एक टैस्ट हुआ था पापा. 50 मार्क्स का था. मैं 35 नंबर ला पाया, जो क्लास में सब से कम थे. सब के नंबर अच्छे थे. कोचिंग वाले बोले कि मार्कशीट घर जाएगी. शायद अब तक पोस्ट भी हो गई होगी, लेकिन उस से पहले मैं आप सभी से माफी मांग रहा हूं. मांपापा, आप का सपना अब अभिनव पूरा करेगा. मैं उस लायक नहीं बना.

‘अभिनव, तुम रोना नहीं. बस यह सोच लेना भैया का सपना भी तुम को पूरा करना है.

‘अलविदा.’

कोटा को आईआईटी और नीट के इम्तिहान को क्रैक करने का हब माना जाता है, पर इस साल वहां 24 छात्र पढ़ाई और मानसिक दबाव में अपनी जान दे चुके हैं. हालात इतने बदतर हो रहे हैं कि वहां कोचिंग संस्थानों और होस्टलों में ‘ऐंटी सुसाइड फैन’ लगाने के आदेश जारी होने के बाद भी रविवार, 27 अगस्त, 2023 को 4 घंटे के भीतर 2 छात्रों ने अपनी जान दे दी थी.

इन में एक छात्र बिहार के रोहतास का था और दूसरा महाराष्ट्र के लातूर का रहने वाला था. बिहार के रोहतास जिले का 18 साल का आदर्श राज जहां फांसी पर लटक गया, वहीं 16 साल के अविष्कार संभाजी कासले ने इंस्टीट्यूट की छठी मंजिल से छलांग लगा दी.

खतरे की घंटी

‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस साल जिन छात्रों ने खुदकुशी की है, उन में से ज्यादातर गरीब या लोअर मिडिल क्लास परिवार से थे. ऐसे छात्रों में किसी के पिता नाई, किसी के पिता गाड़ी साफ करने वाले और कुछ के पिता छोटे किसान थे.

कोटा में बच्चों पर क्या गुजर रही है, यह खुदकुशी करने वाले एक छात्र से समझिए, जिस के पिता ने कहा, “अपने बच्चे को कहीं भी भेजिए, बस कोटा मत भेजिए.”

हमारे ऐजूकेशन सिस्टम के लिए यह कितनी शर्मनाक बात है कि 17 साल के एक छात्र ने कोटा पहुंचने के एक महीने के भीतर ही खुदकुशी कर ली थी.

आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2015 में 17 छात्रों ने सुसाइड किया, जबकि साल 2016 में 16, 2017 में 7, 2018 में 20, 2019 में 8, 2020 में 4 और 2022 में 15 छात्रों ने अपनी जान दे दी.

कोटा में हर साल तैयारी के लिए आने वाले छात्रों का आंकड़ा बढ़ता जाता है. साल 2021-22 में यहां 1,15,000 छात्र कोचिंग के लिए पहुंचे थे, तो वहीं 2022-23 में यह तादाद बढ़ कर 1,77,439 हो गई थी. साल 2023-24 में यह आंकड़ा 2,05000 तक पहुंच गया है.

कोटा में कोचिंग इंडस्ट्री की कुल नैटवर्थ तकरीबन 5,000 करोड़ रुपए है. यहां 3,000 से ज्यादा होस्टल, 1,800 मैस और 25,000 पीजी कमरे हैं.

कहने का मतलब है कि कोटा में पढ़ाई के संसाधन इतने ज्यादा मजबूत हैं कि ‘कोटा मौडल’ अपनेआप में एक मिसाल बन गया है, जहां छात्रों के लिए शानदार कोचिंग सैंटर, पढ़ाने के लिए उम्दा टीचर, एक से बढ़ कर एक लाइब्रेरी, पढ़ने की लाजवाब सामग्री… और भी न जाने क्याक्या मुहैया है. तो फिर ऐसी क्या वजह है कि छात्र ‘पढ़ाई के भूत’ से डर के मारे कंपकंपा रहे हैं? क्यों उन्हें मरने में ही अपना भविष्य उज्ज्वल दिखाई देता है?

दरअसल, कोटा का ऐजूकेशन सिस्टम अब हर तरह से फेल होता नजर आ रहा है. यहां का मैनेजमैंट चरमरा गया लगता है और छात्रों को इनसान कम, फीस भरने की एटीएम ज्यादा समझा जाने लगा है.

छात्रों पर पड़ता दबाव

हिंदी फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ में रैंचो अपने साथी छात्र की मौत के बाद प्रिंसिपल से सीधा बोल देता है कि हर छात्र पर पढ़ाई का इतना ज्यादा दबाव रहता है कि उस का दिमाग प्रैशर कुकर सा बनने लगा है.

कुछ ऐसा ही कोटा में देखा जा रहा है. वहां के कोचिंग सिस्टम के अपने ही कायदे बने हुए हैं. वे 9वीं क्लास से ही आईआईटी और नीट के लिए कोर्स शुरू कर देते हैं. बच्चों के मांबाप के मन में यह बैठ जाता है कि अगर उन का नौनिहाल थोड़ा लेट कोचिंग क्लास जौइन करेगा तो पिछड़ जाएगा. लिहाजा, वे भेड़चाल में अपने बच्चे को वहां दाखिल करा देते हैं.

कोटा जैसी जगह पर ऐसा लगता है कि हर बच्चा हर समय पढ़ ही रहा है. वह बंधुआ मजदूर की तरह अपने मांबाप के सपनों को पूरा करने के लिए जुट जाता है कोल्हू के बैल की तरह और जो ‘मेरा समय’ है जैसे घूमनाफिरना, मौजमस्ती करना, दोस्तों और घर वालों से मिलना वगैरह, वह धीरेधीरे ‘दूसरों के सपने पूरे करने का समय’ बन जाता है, जिस में कोचिंग टाइम, स्कूल टाइम, होमवर्क टाइम, टैस्ट टाइम और प्रैक्टिस टाइम ही जरूरी माना जाता है.

यहां सब से जरूरी बात यह है कि खुदकुशी करने वाले ज्यादातर बच्चे ऐसे परिवारों से आते हैं, जहां उन्हीं से जिंदगी को बेहतर करने की उम्मीद लगाई गई होती है. वे अपने घर के हालात से वाकिफ होते हैं, इसलिए उन पर कामयाब होने का दबाव कई गुना बढ़ जाता है. अगर वे पढ़ाई में खुद को कमजोर महसूस करते हैं तो दिमागी तौर पर एकदम से टूट जाते हैं और एक लंबी सी चिट्ठी लिख कर अपनी जिंदगी छोटी कर देते हैं.

अच्छे पैकेज का काटा कीड़ा

आजकल पढ़ाई का मतलब हो गया है कि बच्चा नौकरी में सालाना कितने लाख का पैकेज पा रहा है. हैरत की बात तो यह है कि हम कितने ही लाख या करोड़ का पैकेज सुन लें, हमें कोई हैरानी या खुशी ही नहीं होती है.

इस माहौल में अगर किसी का बच्चा राजनीति विज्ञान वगैरह से कालेज में ग्रेजुएशन कर रहा है तो ‘इस घर का तो पानी भी पीने में शर्म महसूस होगी’ वाली सोच मांबाप पर इतनी ज्यादा हावी है कि वे किसी भी हाल में अपने बच्चे को इंजीनियर या डाक्टर ही बनाना चाहते हैं. उन के सपने बच्चे के सपने से बड़े हो जाते हैं. यहीं पर बच्चे मार खा जाते हैं और डिप्रैशन के अंधेरे में खोने लगते हैं.

इस के अलावा बच्चों पर अपनी पढ़ाई के खर्च का भी बहुत ज्यादा दबाव रहता है. कोटा में एक साल में एक बच्चे के रहने का खर्च तकरीबन ढाई लाख रुपए के आसपास का है. एक से डेढ़ लाख रुपए कोचिंग की फीस है. इस के अलावा बच्चों के दूसरे तमाम खर्चे भी होते हैं. सबकुछ जोड़ कर देखें तो एक साल में एक बच्चे पर तकरीबन 4 लाख रुपए तक भी खर्च हो जाते हैं.

फिर क्या है हल

यह समस्या हर साल बड़ी होती जा रही है, पर इस का हल इतना पेचीदा भी नहीं है. अगर बच्चों को पढ़ाई और मनोरंजन की बैलेंस डोज दी जाए तो उन्हें पढ़ाई बोझ लगनी बंद हो जाएगी. उन्हें यह भी समझना होगा कि इंजीनियरिंग या डाक्टरी ही उज्ज्वल भविष्य की गारंटी नहीं है.

कोरोना काल में दुनिया की रेलगाड़ी मानो पटरी से उतर कर डगमगा गई थी, पर फिर भी बहुत से लोगों ने हिम्मत दिखाई और बहुत से ऐसे काम कामयाबी से किए, जिन के बारे में उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. उन्होंने किसी से सीख ली और हिम्मत दिखाते हुए नई राह खोज ली.

ऐसी ही एक सीख पर गौर कीजिए. कोटा में लगातार बढ़ती छात्रों की खुदकुशी करने की घटनाओं को ले कर महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन आनंद महिंद्रा ने ट्वीट करते हुए लिखा, ‘इस तरह की खबर से मैं भी उतना ही परेशान हूं जितना आप हैं. देश के इतने उज्ज्वल भविष्यों को खत्म होते देखना मेरे लिए दुखद है. ऐसे मामलों में मेरे पास शेयर करने के लिए कोई बड़ी बातें या ज्ञान नहीं है, लेकिन कोटा के हर छात्र को जिंदगी के इस पड़ाव पर आप का टारगेट खुद को साबित करना नहीं, बल्कि खुद को ढूंढ़ना होना चाहिए…

‘किसी ऐग्जाम में कामयाबी नहीं मिलना खुद को खोजने की यात्रा का एक हिस्सा है. इस का मतलब यह भी हो सकता है कि आप की असली प्रतिभा कहीं और है, इसलिए खोजते रहो, ट्रैवल करते रहो… आप आखिरकार खोज लेंगे कि क्या ऐसी चीज है, जो आप के अंदर सर्वश्रेष्ठ है.’

याद रखिए, हर किसी में कोई न कोई गुण होता है. कोई अगर कम पढ़ालिखा है तो जरूरी नहीं कि वह जिंदगी की रेस में पिछड़ जाए. बहुत से गाड़ी मेकैनिक अपने हाथ के हुनर और तजरबे से अच्छीखासी आमदनी कर लेते हैं.

मांबाप और टीचरों को भी चाहिए कि वे बच्चे पर नजर रखें कि कहीं वह पढ़ाई को कुछ ज्यादा ही दिल पर तो नहीं ले रहा है. अगर ऐसा है तो उस के मन को टटोलें और अपने सपनों की हत्या पहले कर दें, ताकि वह खुदकुशी जैसा संगीन अपराध न कर बैठे.

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