⚲

Humour :ठोको ताली- शिल्पा ने कैसे सिखाया अनूप और सीमा को सबक?

Humour :

“शिल्पा आज अनूप का फोन आया था.”

“ओफ्फो!! फिर से…”

“अरे! परेशान होने की बात नहीं मैंने कह दिया हम दो दिन के लिए बाहर जा रहे हैं.”

“हम इस तरह कब तक मुंह चुराएंगे, कुछ ऐसा करना पड़ेगा कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.”
अनूप शिल्पा के छोटे भाई का दोस्त है. इसीलिए शिल्पा से पहले से परिचित भी है. नई शादी और उसके ही शहर में रहने के कारण शिल्पा जब भी कुछ नया बनाती उन दोनों को बुला लेती. वह नहीं जानती थी कि वह आ बैल मुझे मार वाला काम कर रही है.

वैसे भी शिल्पा को खाना बनाना और खिलाना दोनों में ही मजा आता था. पर अब तो अनूप और उसकी पत्नी सीमा कभी भी किसी समय आ धमकते और खाने की फरमाइश कर देते.

शिल्पा ने तो उन्हें अंगुली पकड़वाई थी पर वह तो पौंचा ही पकड़ बैठे. उस दिन शिल्पा खाने से फुरसत ही हुई थी कि ये दोनों आ गये.

“शिल्पा दी आज तो आपके हाथ की कढ़ी चावल खाने का बहुत मन हो रहा है.”
“दी, कढ़ी बनाती भी तो इतनी अच्छी है.” मस्का लगाते हुए सीमा बोली.
“दी, वो पकौड़े वाली कढ़ी बनाना और थोड़े पकौड़े ज्यादा बना लेना सूखे खाने के लिए.”

शिल्पा के तो तन बदन में आग सी लग गयी थी फिर भी बनावटी मुस्कान ओढ़कर खाना बनाया. शिल्पा ने अब इन्हें सबक सिखाने का मनसूबा बना लिया था.

शर्मा जी के बेटे की बर्थडे पार्टी से लौटने के बाद शिल्पा काफी थकावट महसूस कर रही थी और बर्तन वाली न आने से बर्तन भी पड़े थे. थोड़ी देर आराम करने की सोच कर लेट गई. तभी उसे अनूप की आवाज सुनाई दी “जीजा जी आज हमारा मन आलू के पराठें खाने का हो रहा था और दीदी के हाथ के पराठों का तो जवाब ही नहीं. बाजार में भी इतने अच्छे नहीं मिलते.”

शिल्पा ने एक चुन्नी सिर पर बांधी और बाहर आकर बोली “मेरे सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा है अच्छा हुआ सीमा तुम आ गयीं पहले तो सबके लिए चाय बना लाओ.”

पति को चुप रहने का इशारा करती हुई “और हां कुकर धोकर आलू उबलने रख देना, बाई नहीं आई न. आज मैं तुम्हें आलू के पराठें बनाना सिखाऊंगी. आखिर तुम्हें भी तो अनूप की पसंद सीखना होगी.”

प्यार से “तुम तो अपनी हो, तो तुमसे कहने में क्या संकोच मेरी तो तबीयत ठीक नहीं है तो तुम्हें ही चारों के लिए पराठें बनाना होगें.”

चाय से ज्यादा तो सीमा का मन उबल रहा था.”क्या मैं नौकरानी हूं? जो बर्तन भी साफ करूं और सबके लिए पराठें भी बनाऊं.” अनूप से भी बात नहीं कर पा रही थी.

उसने अनूप को व्हाट्सएप पर सारी परेशानी बताई. और साथ ही उपाय भी.

चाय पीने के बाद कप रखने के बहाने अंदर जाकर सीमा ने अनूप को फोन लगाया .

फोन उठाते ही अनूप बोला. जी सर अभी घर पहुंच रहा हूं

“किसका फोन था?” शिल्पा ने पूछा.

“वो दीदी बौस का फोन है घर पर आ रहे हैं तो हमें निकलना पड़ेगा.”

“कोई बात नहीं फिर कभी, जब भी आओगे हम सीमा के हाथ के पराठें खा लेगें.”

अब तो अनूप और सीमा ऐसे नौ दो ग्यारह हुए कि शिल्पा के घर का रास्ता ही भूल गये.

लेखिका- मधु जैन 

Hindi Crime Story : पिंजरे का पंछी – झूठी ख्वाहिशों का दलदल

Hindi Crime Story. कामिनी दरवाजे के बाहर खड़ी थी. खूब सजधज कर. सामने उसे एक अधेड़ उम्र का आदमी आता दिखाई दिया. उसे लगा कि वह उस की ओर चला आ रहा है. पर यह क्या? वह उस के बगल में खड़ी लड़की के पास चला गया और उस से बातें करने लगा. कामिनी सोचने लगी, ‘अब मेरी जवानी ढलने लगी है, शायद इसीलिए लड़के तो दूर अधेड़ भी मेरे पास आने से कतराने लगे हैं. आज भी मैं कुछ कमा नहीं पाई. अब मैं दीदी को क्या जवाब दूंगी? यही हाल रहा तो एक दिन वे मुझे यहां से निकाल बाहर करेंगी.’

इस के बाद कामिनी पुरानी यादों में खो गई. कामिनी के मातापिता गरीब थे. उस की मां लोगों के बरतन साफ कर के घर का खर्चा चलाती थी.

मातापिता ने कामिनी को अपना पेट काट कर पढ़ाना चाहा और उसे शहर के एक स्कूल में भरती किया. उन का सपना था कि कामिनी भी पढ़लिख कर समाज में नाम कमाए.

एक दिन स्कूल से छुट्टी होने के बाद कामिनी घर आने के लिए आटोरिकशा का इंतजार करने लगी. तभी उस के सामने एक कार आ कर रुकी. उस कार से एक अधेड़ आदमी बाहर आया. वह कामिनी से बोला, ‘बेटी, यहां क्यों खड़ी हो?’

‘मुझे घर जाना है. मैं आटोरिकशा का इंतजार कर रही हूं.’  ‘बेटी, तुम्हारा घर कहां है?’ वह आदमी बोला. ‘देवनगर,’ कामिनी बोली. ‘मुझे भी देवनगर जाना है. हमारे साथ कार में बैठ जाओ.’

उस आदमी की बात सुन कर कामिनी उस की कार में बैठ गई. कार में 2 आदमी और भी बैठे थे.

कार को दूसरी तरफ अनजानी जगह पर जाते देख कामिनी हैरानी से बोली, ‘अंकल, आप कह रहे थे कि आप को देवनगर जाना है, पर आप तो…’

‘बेटी, मुझे जरूरी काम याद आ गया. मैं किसी दोस्त से मिलने जा रहा हूं. तुम्हें ये लोग तुम्हारे घर छोड़ देंगे,’ कामिनी की बात पूरी होने से पहले ही वह आदमी बोला.

कार आगे दौड़ने लगी. कार को दूसरी दिशा में जाते देख कामिनी बोली, ‘अंकल, यह तो देवनगर जाने का रास्ता नहीं है. आप मुझे कहां ले जा रहे हैं?’

‘बेटी, हम तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ देंगे. उस से पहले हम तुम से एक बात करना चाहते हैं. हम कोई गैर नहीं हैं. हम तुम्हें और तुम्हारे मातापिता को अच्छी तरह से जानते हैं.

‘एक दिन हम ने तुम्हें अपनी सहेली से कहते सुना था कि तुम हीरोइन बनना चाहती हो. तुम चाहो तो हम तुम्हें किसी फिल्म में हीरोइन का रोल दिला देंगे. तब दुनियाभर में तुम्हारा नाम होगा. तुम्हारे पास इतनी दौलत हो जाएगी कि तुम अपने मांबाप के सारे सपने पूरे कर सकोगी.

‘हीरोइन बनने के बाद तुम अपने मातापिता से मिलने जाओगी, तो सोचो कि वे कितने खुश होंगे? कुछ दिनों के बाद तुम्हें फिल्म में रोल मिल जाएगा, तब तक तुम्हें अपने मातापिता से दूर रहना होगा.’

कामिनी की आंखों में हीरोइन बनने का सपना तैरने लगा. वह ख्वाब देखने लगी कि उसे बड़े बैनर की फिल्म मिल गई है. पत्रपत्रिकाओं और टैलीविजन के खबरिया चैनलों में उस के नाम की चर्चा हो रही है. समाज में उस के मातापिता की इज्जत बढ़ गई है. उस के पुराने मकान की जगह पर अब आलीशान कोठी है. सब उसी में रह रहे हैं.

‘बेटी, क्या सोच रही हो?’ उस आदमी के सवाल ने कामिनी का ध्यान भंग किया. ‘अंकल, मैं फिल्म में हीरोइन बनने को तैयार हूं,’ कामिनी ने कहा.

2-3 घंटे के सफर के बाद वह कार शहर से दूर एक इलाके में पहुंच गई. कामिनी को इस जगह के बारे में पता नहीं था. कार से उतर कर वे दोनों आदमी कामिनी को ले कर एक मकान में गए.

दरवाजे पर खटखट करने पर एक मोटी औरत बाहर आई. वहां आसपास खड़ी लड़कियां उसे ‘दीदी’ कह कर पुकार रही थीं.

उन आदमियों को देख कर वह औरत बोली, ‘ले आए तुम नई को?’

‘बेटी, तुम्हें कुछ दिन यहीं रहना है. उस के बाद हम तुम्हें फिल्म बनाने वाले के पास ले चलेंगे,’ एक आदमीने कहा और वे दोनों वहां से चले गए.

दीदी ने कामिनी के रहने का इंतजाम एक अलग कमरे में कर दिया. वहां सुखसुविधाएं तो सभी थीं, पर कामिनी को वहां का माहौल घुटन भरा लगा.

3 दिन के बाद दीदी कामिनी से बोली, ‘आज हम तुम्हें एक फिल्म बनाने वाले के पास ले चलेंगे. वे जो भी कहें, सबकुछ करने को तैयार रहना.’

कुछ देर बाद एक कार आई. उस में 2 आदमी बैठे थे. दीदी के कहने पर कामिनी उस कार में बैठ गई. एक घंटे के सफर के बाद वह एक आलीशान कोठी में पहुंच गई. वहां वे आदमी उसे एक कमरे में ले गए.

उस कमरे में एक आदमी बैठा था. उसे वहां के लोग सेठजी कह रहे थे. कामिनी को उस कमरे में छोड़ वे दोनों आदमी बाहर निकले. जाते समय उन में से एक ने कामिनी से कहा, ‘ये सेठजी ही तुम्हारे लिए फिल्म बनाने वाले हैं.’

सेठजी ने कामिनी को कुरसी पर बिठाया. इंटरव्यू लेने का दिखावा करते हुए वे कामिनी से कुछ सवालपूछने लगे. इसी बीच एक आदमी शरबत के 2 गिलास ले कर वहां आया. एक गिलास सेठजी ने पीया और दूसरा गिलास कामिनी को पीने को दिया.

शरबत पीने के बाद कामिनी पर बेहोशी छा गई. उसे जब होश आया, तो उस ने अपने सामने सेठजी को मुसकराते हुए देखा. वह दर्द से कराह रही थी. ‘मेरे साथ धोखा हुआ है. मैं तुम सब को देख लूंगी. मैं तुम्हें जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दूंगी,’ कामिनी चिल्लाई.

‘तुम्हारे साथ कोई धोखा नहीं हुआ है. तुम फिल्म में हीरोइन बनना चाहती थीं. लो, देख लो अपनी फिल्म,’ कह कर सेठजी ने कंप्यूटर में सीडी डाल कर उसे दिखा दी.

सीडी को देख कर कामिनी सन्न रह गई. उस फिल्म में सेठजी उस की इज्जत के साथ खेलते दिखाई दिए. ‘वैसे तो यह फिल्म हम किसी को नहीं दिखाएंगे. अगर तुम ने हमारी शिकायत पुलिस से की, तो हम इसे सारी दुनिया में पहुंचा देंगे,’ कंप्यूटर बंद करते हुए सेठजी बोले.

कमिनी को इस घटना से सदमा पहुंच गया. वह बेहोश हो गई. कुछ देर बाद वे दोनों आदमी कामिनी को कार में बैठा कर दीदी के पास ले गए. कामिनी गुमसुम रहने लगी. वह न कुछ खाती थी, न किसी से बातें करती थी.

एक दिन दीदी कामिनी के कमरे में आ कर बोली, ‘देखो, यहां जो भी लड़की आती है, वह अपनी इच्छा से नहीं आती. वह कुछ दिनों तक तेरी तरह गुमसुम रहती है, बाद में खुद को संभाल लेती है. इस दलदल में जो एक बार पहुंच गई, वह चाह कर भी वापस नहीं जा सकती.

‘अगर तुम यहां से चली भी गई, तो तुम्हारा समाज तुम्हें फिर से नहीं अपनाएगा, इसलिए तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम अब यहीं के समाज में रहने का मन बनाओ. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.’

दूसरे दिन दीदी ने कामिनी को कार में बिठा कर दूसरे आदमी के पास भेजा. अब वह इसी तरह कामिनी को इधरउधर भेजने लगी. एक दिन दीदी ने कामिनी से कहा, ‘तुझे इधरउधर जाते हुए काफी समय हो गया है. अब मैं तुझे एक नया काम सिखाऊंगी.’

‘नया काम… मतलब?’ कामिनी चौंकते हुए बोली. ‘मतलब यह है कि अब तुझे किसी सेठ के पास नहीं जाना है. तुझे यहीं दुकान में रह कर ग्राहकों को अपनी ओर खींचना है.’ ‘किस दुकान में?’ ‘यहीं.’ ‘लेकिन यह तो मकान है, दुकान कहां है?’

‘यही मकान तुम्हारे धंधे की दुकान है. जैसे शोरूम में अलगअलग डिजाइन के कपड़े सजा कर रखे रहते हैं, वैसे ही तुम्हें यहां सजधज कर आधे कपड़ों में रहना है. तुम्हें कुछ नहीं करना है. बस, यहां से गुजरने वाले मर्दों को ललचाई नजरों से देखना है.’

दीदी के समझाने पर कामिनी सोचने लगी, ‘यहां रहने वाली सभी लड़कियां इस शोरूम की चीजें हैं. शोरूम में रखी चीजों को ग्राहक देख कर पसंद करता है. खरीदने के बाद वे चीजें उसी की हो जाती हैं. ग्राहक उस चीज की इज्जत करता है. हम जिस्म के सौदे की वे चीजें हैं, जिन्हें ग्राहक कुछ देर के लिए खरीद कर मजा ले कर चला जाता है

‘वासना के भूखे दरिंदे हमारे पास आ कर अपनी भूख मिटाते हैं. हम भी चाहते हैं कि हमारा दिल किसी के लिए धड़के. वह एक हो. वह हम पर मरमिटने को तैयार हो. हम भी समाज के रिश्तों की डोर से बंधें.’

पिंजरे में बंद पंछी की तरह कामिनी का मन फड़फड़ा रहा था.

एक दिन कामिनी ने सोच लिया कि वह इस दुनिया से बाहर आ कर रहेगी. ज्यादा से ज्यादा इस कोशिश में उस की जान चली जाएगी. जिस्म के शोरूम की चीज बने रहने से अच्छा है कि वह मौत को गले लगा ले. अगर वह बच गई, तो समाज का हिस्सा बन जाएगी.

कामिनी ने दीदी को भरोसे में ले लिया. अपने बरताव और काम से उस ने दीदी पर असर जमा लिया. दीदी को यकीन हो गया था कि कामिनी ने खुद को यहां की दुनिया में ढाल लिया है.

एक दिन मौका देख कर कामिनी वहां से भाग गई और ट्रेन में बैठ कर अपने घर चली गई. इतने सालों के बाद कामिनी को देख कर उस के भाई खुश हो गए. उन्होंने कामिनी को बताया कि मातापिता की मौत हो चुकी है. वह अपने भाई विनोद और सोहन के साथ रहने लगी.

भाइयों को दुख न पहुंचे, यह सोच कर उस ने अपने बीते दिनों के बारे में कुछ नहीं बताया. कामिनी का भाई विनोद एक कंपनी में काम करता था. उस कंपनी का मालिक रवींद्र नौजवान था. एक दिन वह विनोद के जन्मदिन की पार्टी में उस के घर आया. विनोद ने उस से कामिनी का परिचय कराया. उसे कामिनी पसंद आ गई. धीरेधीरे रवींद्र और कामिनी के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं.

एक दिन दोनों ने प्रेमविवाह कर लिया. रवींद्र और कामिनी एकदूसरे को बहुत प्यार करते थे. शादी के बाद कामिनी रवींद्र के साथ शहर में किराए के मकान में रहने लगी. एक दिन रवींद्र की कंपनी में बैठक चल रही थी. रवींद्र को याद आया कि उस की जरूरी फाइल तो घर पर ही रह गई है. रवींद्र ने सुपरवाइजर प्रदीप को वह फाइल लेने अपने घर भेज दिया.

रवींद्र के घर पहुंच कर प्रदीप ने दरवाजे पर खटखट की. थोड़ी देर बाद कामिनी बाहर आ गई. ‘कामिनी, तू यहां? तू ने मुझे पहचाना?’ कामिनी को देख कर प्रदीप बोला. ‘नहीं तो,’ कामिनी बोली. ‘वहां मैं तुम्हारे पास कई बार आया करता था. क्या तुझे यहां साहब किराए पर लाए हैं?’

प्रदीप की बात सुन कर कामिनी चुप रही. प्रदीप कामिनी को बांहों में भरने लगा. वह उसे चूमने की कोशिश करने लगा. ‘परे हट जाओ मेरे सामने से,’ कामिनी चिल्लाई. ‘जानम, मैं ने तुम्हें कई बार प्यार किया है. आज यहां तू और मैं ही तो हैं. मेरी इच्छा पूरी नहीं करोगी?’ ‘नहीं, तुम्हें मुझ से तमीज से बात करनी चाहिए. मैं तुम्हारे साहब की बीवी हूं,’ कामिनी चिल्लाई.

‘तमीज से?’ प्रदीप हंस कर बोला. ‘मैं साहब को तुम्हारे बारे में सबकुछ बता दूंगा,’ प्रदीप बोला. ‘नहीं, तुम ऐसा नहीं करोगे. मेरी जिंदगी बरबाद हो जाएगी.’

‘ठीक है. अगर तुम अपनी जिंदगी बरबाद होने से बचाना चाहती हो, तो मैं जब चाहूं तुम्हें मेरी इच्छा पूरी करनी होगी. तुम्हें यह काम आज और अभी से करना होगा. जिस दिन तुम ने मेरा कहा नहीं माना, मैं तुम्हारी पूरी कहानी साहब को बता दूंगा,’ जातेजाते प्रदीप कामिनी से बोला.

अब प्रदीप रवींद्र की गैरहाजिरी में समयसमय पर कामिनी से मिलने आने लगा.

एक दिन किसी काम से रवींद्र अपने घर समय से पहले आ गया. उस ने प्रदीप और कामिनी को एकसाथ देख लिया. उस ने प्रदीप और कामिनी को बुरी तरह डांटा. उस ने प्रदीप को नौकरी से हटाने की धमकी दी. प्रदीप ने रवींद्र को कामिनी के बारे में सबकुछ बता दिया. रवींद्र ने कामिनी का साथ छोड़ दिया. कामिनी के बारे में जब उस के भाइयों को पता चला, तो उन्होंने भी उसे अपने साथ रखने से मना कर दिया.

कामिनी के पास फिर उसी दुनिया में लौटने के सिवा कोई रास्ता नहीं रह गया था. ‘‘कामिनी, आज भी कुछ कमाया या नहीं?’’ दीदी की बात सुन कर कामिनी यादों से बाहर आ गई. Hindi Crime Story

Marriage Conflict Story: एक दर्द ऐसा भी

Marriage Conflict Story. निजाम बिजनौर जिले के नारायणपुर गांव का रहना वाला था. उस के अब्बा उस गांव के प्रधान थे, जो अपने आखिरी समय में निजाम के लिए काफी जमीन और पैसा छोड़ कर इस दुनिया से चल बसे थे.

निजाम की उम्र उस समय 30 साल थी, जब उस की शादी साजिदा से हुई थी. साजिदा बिजनौर जिले के भागुवाले गांव की रहने वाली एक गरीब परिवार की बेटी थी.

साजिदा की उम्र उस समय महज 16 साल थी, जब उस की शादी निजाम से हुई थी.

साजिदा के अब्बा ने उस की शादी निजाम से इस लालच में करा दी थी, क्योंकि वह अपने बाप का एकलौता बेटा था और जिस के पास काफी जमीन और पैसा था, भले ही उस की उम्र साजिदा से दोगुनी थी.

साजिदा थी बड़ी खूबसूरत और गदराए बदन की मलिका. गोरीचिट्टी, बड़ीबड़ी आंखें, गुलाबी होंठ, सुर्ख गाल जिसे देखते ही निजाम उस का ऐसा दीवाना बन बैठा कि उसे न खाने का होश था, न कमाने का. वह तो बस रातदिन साजिदा की बांहों मे पड़ा रहता और उस के इर्दगिर्द मंडराता रहता.

निजाम साजिदा को जीजान से चाहता था. उस के मुंह से निकली हर बात को पूरा करना उस का मकसद रहता था.

साजिदा समझ चुकी थी कि निजाम उस का दीवाना बन गया है, वह जो कहेगी निजाम वही करेगा.

साजिदा ने अपनी जिंदगी में नया मोड़ लाना शुरू कर दिया. वह निजाम से मुंहमांगे पैसे लेती और मनमाने ढंग से खर्च करती. उस ने अपनेआप को एक देहाती औरत के बजाय मौडर्न बनाना शुरू कर दिया और निजाम से एकएक कर के जमीन बिकवाने लगी और खूब खर्च करने लगी.

साजिदा ने 10 साल में 2 बेटों और 2 बेटियों को जन्म दिया. निजाम और साजिदा दोनों खुश थे. उन के घर में किसी बात की कोई कमी न थी.

निजाम खेतीबारी करता था, पर उस के घर का खर्चा उस की कमाई से ज्यादा था, जिस की मुख्य वजह थी साजिदा का मनमाने ढंग से घूमनेफिरने में खर्च करना.

जब कभी निजाम साजिदा को फुजूलखर्च के लिए रोकता तो साजिदा उस से नाराज हो जाती और उसे अपने पास फटकने न देती. मजबूर हो कर निजाम को साजिदा की बात माननी पड़ती.

समय बीतता गया. बच्चे बड़े होते गए. बड़े लड़के रईस को एक लड़की से प्यार हो गया, तो उस ने उस से शादी कर ली और उसे ले कर देहरादून चला गया और वहीं कोई कामकाज करने लगा.

इधर साजिदा की फुजूलखर्ची और घूमनेफिरने की आदत से घर के कुछ सदस्य नाराज थे, तो एक बेटी अमीना उस के कहने में थी. वह भी उसी के रास्ते पर चल कर अपनी जिंदगी जी रही थी.

साजिदा 50 की उम्र में भी 30 की लगती थी. उस ने अपने हुस्न और जिस्म को इस तरह मेंटेन कर के रखा था कि कोई उसे जब निजाम के साथ देखता तो उन दोनों को बापबेटी समझता था. गांव के कई लड़के आज भी उस पर मरमिटते थे और मौका देख कर अपने प्यार का इजहार भी कर देते थे. साजिदा की एक कातिल मुसकान उन का दिल धड़का देती थी.

निजाम बूढ़ा होता जा रहा था. साजिदा की जिस्मानी जरूरत पूरी करने में अब वह कमजोर हो चुका था, जिस से साजिदा अब उस से कतराने लगी थी. यही वजह थी कि वह गांव के कई लड़कों से अपनी जिस्मानी जरूरत पूरी करने लगी थी.

जब साजिदा के बच्चों को उस की इस हरकत का पता चला तो उन्होंने उस के बाहर आनेजाने पर रोक लगा दी. सब बच्चे साजिदा के खिलाफ हो गए, सिर्फ अमीना उस के साथ थी, जिस का फायदा साजिदा को यह मिला कि जब भी वह अपने किसी आशिक से मिलने जाती तो अमीना को भी साथ ले जाती.

अमीना की उम्र उस समय 16 साल थी. सब यही समझते थे कि अमीना के साथ होते हुए साजिदा कोई गलत हरकत नहीं कर सकेगी, पर उन का यह समझना भूल था.

साजिदा की हरकतों से अमीना अच्छीखासी वाकिफ थी और उसे भी अपनी अम्मी के रास्ते पर चलना अच्छा लगता था.

अमीना भी खूबसूरती की एक जीतीजागती मिसाल थी. कम उम्र में ही उस के आशिकों की एक अच्छीखासी तादाद हो गई थी.

साजिदा जब अमीना के सामने ही अपने आशिकों की बांहों में सिमट कर खूब मजे लेती, तो अमीना की भी हवस जाग जाती और वह भी अपने जिस्म की आग बुझाने के लिए बेताब हो उठती.

साजिदा भी अमीना को किसी लड़के के साथ तनहा छोड़ देती, ताकि वह भी अपने जिस्म के मजे ले सके, ताकि साजिदा के नाजायज रिश्ते को अमीना छिपा ले.

एक दिन साजिदा अमीना के साथ खेत में टहलने गई थी, जहां साजिदा का आशिक उसे अपनी बांहों में भर कर मजे ले रहा था. दूसरी तरफ साजिदा के आशिक का बेटा अमीना को अकेली देख कर उस पर आशिक हो गया और अमीना को अपनी बांहों में भर कर उस के शरीर से खेलने लगा.

अमीना ने उस का कोई विरोध नहीं किया, क्योंकि उस पर तो सैक्स का भूत सवार रहता ही था. जब वे दोनों खेत में जिस्म की आग को ठंडा कर रहे थे, तभी गांव के किसी बुज़ुर्ग ने उन्हें देख लिया और उस ने सारी घटना आ कर साजिदा के छोटे बेटे और उस के शौहर निजाम को बता दी.

यह सुन कर निजाम को इतना गुस्सा नहीं आया जितना उस के बेटे रिहान को आया.

कुछ देर बाद साजिदा जैसे ही घर में घुसी तो निजाम उसे डांटने लगा. साजिदा भी बिना डरे उस से जबान चलाने लगी.

यह देख कर रिहान को गुस्सा आ गया और उस ने पास रखे डंडे से अपनी मां की पिटाई कर दी और जान से मारने की धमकी भी दी.

रिहान की धमकी से साजिदा घबरा गई और अब उस की हिम्मत जवाब दे गई. उस ने घर से बाहर निकलना बंद कर दिया.

कुछ दिनों में निजाम ने अपनी दोनों बेटियों की शादी कर दी, क्योंकि उसे अब डर था कि कहीं वे भी अपनी मां के रास्ते पर चल कर गलत न हो जाएं. उसे अपनी बड़ी बेटी सायरा पर तो भरोसा था, पर छोटी बेटी अमीना पर नहीं था, क्योंकि वह अकसर अपनी अम्मी का पक्ष लेती थी और उसी के साथ घूमतीफिरती थी.

सायरा की शादी दिल्ली में हो गई और अमीना की शादी मुंबई में. समय बीतता गया. अमीना की डिलीवरी के समय साजिदा उस के पास मुंबई चली गई.

अमीना ने कुछ ही दिनों में एक बेटी को जन्म दिया, जिसे पा कर साजिदा का दामाद इरफान और बेटी अमीना बहुत खुश हुए.

इरफान एक अच्छा कारोबारी था. उस के घर में खानेपीने की कोई कमी न थी. साजिदा को इरफान के घर रहना अच्छा लग रहा था, इसलिए वह अपने गांव वापस जाने का नाम ही नहीं ले रही थी.

निजाम ने कई बार साजिदा को आने के लिए कहा, पर वह कोई न कोई बहाना बना कर टाल गई.

निजाम ने इरफान को फोन कर के कहा कि वह अपनी सास पर लौटने का दबाव डाले, पर अपनी अम्मी के गांव जाने की बात सुन कर अमीना गुस्सा हो गई और बोली, ‘‘मेरी अम्मी कही नहीं जाएंगी. वे मेरे साथ ही रहेंगी.’’

‘‘घर पर अब्बा परेशान हैं. वे अम्मी को बुला रहे हैं. तुम क्यों इन्हें रोक रही हो?’’

यह सुन कर साजिदा बोली, ‘‘मेरी बेटी मुझ से प्यार करती है और मैं भी उस से बहुत प्यार करती हूं.’’

इरफान बोला, ‘‘घर पर अब्बा भी तो परेशान हैं. आजकल उन की तबीयत भी सही नहीं रहती और उन्होंने मुझे  सख्ती से कहा है कि अपनी सास को घर भेज दो.’’

अमीना चिल्लाई, ‘‘अम्मी कहीं नहीं जाएंगी, बस यह मेरा आखिरी फैसला है.’’

यह सुन कर इरफान को गुस्सा आ गया और बोला, ‘‘आखिर कब तक रहेंगी ये यहां?’’

‘‘जिंदगीभर, क्योंकि ये मेरी अम्मी हैं,’’ कहते हुए अमीना अपने कमरे मे चली गई और गुस्से ने दरवाजा बंद कर लिया.

अमीना की इस हरकत से इरफान को काफी गुस्सा आया और उस ने अमीना और साजिदा से बात करना बंद कर दिया. उस ने सोचा कि अगर वह कुछ दिन अमीना से बात नहीं करेगा तो उसे अपनी गलती का अहसास होगा, पर ऐसा नहीं हुआ.

इस बीच साजिदा ने अपने एक मिलने वाले बिल्डर से अमीना को मिलवा दिया, जो देखने मे इरफान से ज्यादा हैंडसम और अमीर था. देखते ही देखती उन दोनों मे दोस्ती हो गई और साजिदा ने इस दोस्ती को इतना बढ़ावा दिया कि वे दोनों इरफान की गैरमौजूदगी में घर में ही मिलने लगे और साजिदा उन दोनों को अकेला घर में छोड़ कर बाहर निगरानी करने लगी.

जल्द ही उन दोनों के बीच जिस्मानी ताल्लुकात बन गए और अमीना अब उस बिल्डर की दीवानी हो गई.

इरफान ने देखा कि अमीना को अपनी गलती का अहसास नहीं है, तो वह खुद ही अमीना को मनाने उस के करीब गया तो अमीना ने उसे झिड़क कर दूर कर दिया. अमीना की इस हरकत से इरफान दंग रह गया.

कुछ ही दिनों में अमीना और इरफान के बीच झगड़ा शुरू होने लगा और अमीना अब इरफान की सूरत भी देखना गवारा नहीं कर रही थी और अपने आशिक के साथ गुलछर्रे उड़ा रही थी.

कुछ ही दिनों मे साजिदा और अमीना के हाथ इरफान के रखे हुए पैसे और जेवर लग गए, जिन्हें उन्होंने गायब कर दिया. जब इस बात पर बहस हुई तो अमीना और साजिदा इरफान का घर छोड़ कर कहीं चली गईं.

इरफान अमीना की हरकतों से पहले ही तंग आ चुका था, इसलिए उस ने अमीना को उस के हाल पर छोड़ दिया.

कुछ दिनों बाद इरफान ने दूसरी शादी कर ली और अपनी बेटी और नई बीवी के साथ बिजी हो गया.

अमीना और साजिदा कहां गायब हुईं, इस का कुछ पता न चला. कई महीने साजिदा का इंतजार करने के बाद आखिरकार निजाम ने बिजनौर के महिला परामर्श केंद्र की शरण ली.

वहां की इंस्पैक्टर संध्या ने साजिदा का मोबाइल नंबर लिया. अनजान नंबर से आई काल को साजिदा ने उठा लिया और उसे बिजनौर के परामर्श केंद्र मे आने को कहा गया.

यह सुन कर साजिदा घबरा गई और एक हफ्ते बाद आने का वादा कर लिया तो इंस्पैक्टर संध्या ने निजाम को भी बिजनौर आने के लिए फोन कर दिया.

एक हफ्ते बाद वे दोनों महिला परामर्श केंद्र पहुंचे. उन दोनों की बात इंस्पैक्टर संध्या ने सुनी तो वे साजिदा से बोलीं, ‘‘तुम अपने शौहर से दूर कहां रह रही हो? तुम इन के साथ क्यों नहीं रहती हो?’’

साजिदा बोली, ‘‘ये मुझे खर्चा भी नहीं देते और कुछ कामकाज भी नहीं करते. मैं इन के साथ नहीं रह  कती.’’

इंस्पैक्टर संध्या ने कहा, ‘‘ये तुम्हें खर्च देंगे. जैसा खुद खाएंगे, वैसा तुम्हें भी खिलाएंगे.’’

साजिदा बोली, ‘‘मुझे  इन के साथ नहीं रहना. इन का बेटा मुझे मारता है. एक बार उस ने मेरे पैरों पर इतनी तेज लाठी मारी थी कि मैं कई दिन तक उठ भी नहीं पाई थी. वह मुझे जान से मारने की धमकी देता है.’’

इस पर इंस्पैक्टर संध्या ने निजाम पर गुस्सा होते हुए कहा, ‘‘अपने बेटे को भी यहां बुलाओ. उस ने अपनी मां को क्यों मारा और क्यों जान से मारने की धमकी देता है?’’

निजाम बोला, ‘‘इस का आएदिन बिना बताए घर से गायब हो जाना और गांव वालों से इस के बारे में उलटीसीधी बातें सुन कर उसे गुस्सा आ गया था, इसलिए उस ने ऐसी हरकत की.’’

इंस्पैक्टर संध्या बोलीं, ‘‘क्यों साजिदा, यह सब क्या सुन रही हूं मैं…’’

साजिदा रोते हुए बोली, ‘‘ये सब मेरे ऊपर झुठा इलजाम लगा रहे हैं. मैं इन के साथ नहीं रहूंगी.’’

इस पर निजाम बोला, ‘‘इस ने तो अपनी बेटी का घर भी उजाड़ दिया है. वह भी अपने शौहर को छोड़ कर कहीं चली गई तो उस ने दूसरी शादी कर ली.’’

इंस्पैक्टर संध्या ने साजिदा से उस की बेटी के बारे मे पूछा तो वह बोली, ‘‘उस का शौहर भी उसे मारतापीटता था, इसलिए वह उस का घर छोड़ कर अलग रह रही है. हम दोनों साथ ही रहते हैं.’’

काफी देर के बाद भी साजिदा यही कहती रही कि उसे इन के साथ नहीं रहना, तो इंस्पैक्टर संध्या ने साजिदा को छोड़ दिया और निजाम से बोली, ‘‘हम जबरदस्ती साजिदा को तुम्हारे साथ नहीं भेज सकते और अगर भेज भी देंगे तो यह तुम्हारे साथ नहीं रहेगी, क्योंकि यह अब तुम्हारे साथ नहीं रहना चाहती.’’

निजाम हताश हो कर घर वापस आ गया. कई साल गुजर गए पर आज तक दोनों मांबेटी का कुछ पता न चला.

साजिदा एक ऐसी बेवफा औरत निकली, जिस ने अपना तो बसाबसाया घर उजाड़ा ही, साथ में अपनी बेटी अमीना का घर भी बरबाद कर दिया. Marriage Conflict Story

-अंसारी जीशान अहमद

Humorous Family Story : सिगरेट की लत

Humorous Family Story. उन की इस आदत से मैं वाकिफ हूं फिर भी पतिदेव की हुक्मउदूली नहीं कर सकती. खाना मेज पर रखेरखे ठंडा हो गया. अपनी आदत के अनुसार वह घंटे भर बाद वापस आए. चाहे कितना कुछ कहूं पर चिकने घड़े की तरह उन पर कुछ असर ही नहीं होता है. मेरा दिल तो शादी के बाद से ही पतिदेव को सिगरेट पीता देख कर सुलगना शुरू हो गया था. मैं जब भी उन के होंठों पर सौतन की तरह सिगरेट को चिपके देखती कसमसा कर रह जाती.

अब तो सिगरेट पीने की लत, शौक से जनून की हद तक बढ़ गई है और घर की तमाम कीमती चीजें फुंकनी शुरू हो गई हैं. कभी सोफे के कवर पर सिगरेट का जला निशान दिखाई देता है तो कभी कारपेट पर. सिगरेट पीने की कोई एक जगह तो बन नहीं सकती, इसलिए तकिए के कवर भी सिगरेट के वार से बच नहीं पाते. अखबार या पत्रिका पढ़तेपढ़ते हाथ में सिगरेट दबाए कब पतिदेव नींद में खर्राटे लेने लगते हैं, उन्हें खुद पता नहीं चलता है.

वह तो जब मैं काम खत्म कर सोने के लिए कमरे में आती हूं तो रजाई व गद्दे से उठते धुएं का रहस्य समझ में आता है. दुखी हो कर एक बार तो मैं ने पतिदेव को धमकी भी दे डाली थी, ‘‘या तो तुम सिगरेट पीना बंद कर दो, वरना मैं तुम से दोगुनी सिगरेट पीना शुरू कर दूंगी.’’ पतिदेव ने ठहाका लगाते हुए कहा, ‘‘यह शुभ काम तुम जितनी जल्दी चाहो शुरू कर लो.’’

पति को खुश देख कर सोचा कोई और चाल चलनी होगी, सो मैं ने ऐलान कर दिया, ‘‘आज से आप घर के अंदर सिगरेट नहीं पिएंगे.’’ ‘अंधा क्या चाहे दो आंखें.’ यह कहावत यहां बिलकुल सटीक बैठी. अब तो पान की दुकान पर देर रात तक मित्रमंडली में जमे रहने का उन्हें एक बहाना मिल गया. अब मैं पति के इंतजार में कुढ़ती रहती हूं. कुछ कह भी नहीं पाती.

मसूरी में हिमपात हुआ तो पति ने मुझे खुश करने के लिए स्नोफाल देखने का प्रोग्राम बना डाला. वहां पहुंचे तो स्नोफाल नहीं देख सके, क्योंकि दिल्ली की बरसात की तरह स्नोफाल रूपी बादल बरस चुके थे. हां, वहां पहुंच कर बर्फ पर पैर फिसलने का खतरा मुझे जरूर लग रहा था. नीचे से आते हुए लोगों पर वहां पहले पहुंचे लोग बर्फ का गोला बना कर फेंक रहे थे.

मेरी कनपटी पर ऐसे ही एक बर्फ का गोला लगने से मैं स्वयं को संभाल नहीं पाई और फिसल गई. आखिर वही हुआ जिस के लिए मैं डर रही थी. हिम्मत कर के उठी तब तक दूसरा गोला सिर पर पड़ा और दोबारा गिर पड़ी. अब दर्द से कराहती हुई मैं वापस उतरने लगी. दूर से अपनी गाड़ी के पास भीड़ लगी देख कर मन में एकसाथ शंका के कई बुलबुले बनने व फूटने लगे.

आखिर में मेरी सोच सिगरेट पर जा कर अटक गई. मुझे लगा कि शायद गाड़ी चलाते समय पति के हाथ में सिगरेट जलती ही होगी और नींद का झोंका आया होगा और हाथ की जलती सिगरेट छूट कर नीचे गिर गई होगी. जब फर्श का कारपेट जल कर गाड़ी में धुआं भर गया होगा तो उसे देख कर लोगों ने शीशा तोड़ कर आग बुझाई होगी. पता नहीं क्या सोच कर मैं दुखी नहीं थी.

शायद मैं सोच रही थी कि आज के बाद पति हमेशा के लिए ही सिगरेट छोड़ देंगे, क्योंकि बहुत बड़ा नुकसान होतेहोते बच गया. रात को खाना खाने से पहले मैं ने पति को बाहर जाते देख कर पूछा, ‘‘कहां जा रहे हैं?’’ ‘‘सिगरेट खत्म हो गई है. बाहर पीने जा रहा हूं.’’ ‘‘क्या…आप ने अब भी सिगरेट छोड़ने का फैसला नहीं किया?’’ ‘‘तुम क्या समझती हो कि मेरी सिगरेट से गाड़ी जलने लगी थी?’’ ‘‘और क्या.

इस में कोई शक है क्या?’’ ‘‘मैडम, तुम्हारी पूजापाठ की वजह से आज गाड़ी में आग लग जाती. घर से कहीं जाओगी तो गाड़ी में अगरबत्ती जलाना नहीं भूलती हो. आगे से यह सब नहीं चलेगा, समझीं.’’ मैं आंखें फाड़े आश्चर्य से पति को देख रही थी. Humorous Family Story

लेखक- मंजरी सक्सेना

 

Romantic story in Hindi : नहले पर दहला

Romantic story in Hindi. बड़े शहरों में ऐसा बहुत कम होता है कि कोई आसपास रह रहे लोगों पर अपनी निगाहें जमाए रखे और कोई क्या कर रहा है, कहां जा रहा है, किस से मिल रहा है, यह सब एक खुफिया जासूस की तरह अपनी पैनी नजरों से देखता रहे.

21वीं सदी की ऐसी दौड़धूप से भरी जिंदगी में भला किसे ऐसा वक्त मिलता होगा? फिर ऐसी हरकत करने से कोई फायदा भी तो नहीं है. ख्वाहमख्वाह समय की बरबादी और दिमाग को परेशान करना. बड़े शहरों के बुद्धिमान लोग ऐसा कभी नहीं करेंगे, लेकिन वहां सभी बुद्धिमान ही रहते हों, ऐसा तो कभी नहीं होगा. वहां कुछ अक्ल के कच्चे और सनकी लोग आज भी मौजूद हैं.

इस कहानी का हीरो भी कुछ ऐसी ही सनक से भरा हुआ था. उस का बिहारी दास नाम था. फिर उसे काम भी अपनी पसंद का ही मिला था. उसे एक कुरियर कंपनी में डिलीवरी बौय की नौकरी मिल गई थी, जिस वजह से उसे इधरउधर भटकने का मौका मिलता था. यह काम वह बड़े जोश से करता था. फिर रोजाना 100-150 लिफाफे 2-3 घंटे में ही उन के पते पर पहुंचा कर वह अपना काम पूरा कर डालता था. इस के बाद सारा दिन उसे कुछ नहीं करना होता था.

तब वह भला क्या करता? बारीबारी से एक पान की दुकान और ट्रैवल एजेंसी की दुकान पर बैठ कर अपना टाइमपास करता रहता था. उस का घर दसमंजिला बिल्डिंग के एक फ्लैट में तीसरी मंजिल पर था. उस बिल्डिंग में रह रहे सभी लोगों को वह करीबकरीब जानता था. हां, यह बात अलग थी कि सभी से वह गहरी पहचान नहीं बना पाया था.

उसी बिल्डिंग में एक अधेड़ उम्र के शख्स तिवारीजी रहते थे, जो किसी बैंक में काम करते थे और अकेले रहते थे. बिहारी दास ने अपनी कुछ घंटों की मुलाकात में यह जान लिया था कि उन की पत्नी की उन से बनती नहीं थी और दोनों अलग रह रहे थे.

वैसे तो वे अकेले ही रहते थे, मगर उन के घर पर एक खूबसूरत लड़की को बिहारी दास ने कई बार आतेजाते देखा था. फिर जब उन से पूछा गया कि वह कौन है, तब उन्होंने कुछ अनमने भाव से कह दिया था कि वह उन की भतीजी है.

मगर, बिहारी दास की पैनी नजर ने उन के झूठ को पहचान लिया था. बाद में तिवारीजी ने बिहारी दास से बात करना छोड़ दिया था, लेकिन बिहारी दास ने ठान लिया था कि वह तिवारीजी का भांड़ा जरूर फोड़ कर रहेगा.

जैसा कि बड़े शहरों में होना लाजिमी है, बिहारी दास की बिल्डिंग में हलकेफुलके गैरकानूनी काम भी होते थे, जिन के बारे में उसे सब पता था. 10वीं मंजिल पर एक मसाज पार्लर चल रहा था, जहां लड़केलड़कियों की भीड़ लगी रहती थी. वहां मसाज के बहाने कुछ और ही चल रहा था.

हालांकि कुछ महीने पहले बिहारी दास ने फोन कर के वहां पुलिस भी बुला ली थी, जिस ने अचानक छापा मार कर मसाज पार्लर के मालिक सज्जन सिंह के साथ पैसों का गुपचुप लेनदेन किया और वहां से चल दी थी.

सज्जन सिंह को कतई पता नहीं चला कि आखिर पुलिस को सूचना किस ने दी थी. बिहारी दास मन ही मन खुश हो रहा था.

जैसा कि बिहारी दास का स्वभाव था, वह हमेशा ध्यान रखता कि बिल्डिंग के फ्लैट में कौन आजा रहा है, कौन सा फ्लैट खाली हुआ और किस ने खरीदा या कौन नया किराएदार आया है या आई है और किराएदार क्या करते हैं. यह सब वह अपनेआप चालाकी से जान लेता था.

अपनी इस हरकत के चलते बिहारी दास अकसर घर से बाहर रहता था और किसी अमीर कारोबारी की तरह देरी से घर लौटता था.

बिहारी दास की पत्नी राधिका ने उस से एतराज भी जताया था, ‘‘आखिर क्या करते रहते हो सारा दिन? रात को जल्दी क्यों नहीं लौटते?’’

‘‘शहर में अगर टिकना हो तो हमेशा चौकन्ना रहना पड़ता है,’’ बिहारी दास फख्र से बताता था.

बिहारी दास की पत्नी राधिका खूबसूरत थी, मगर उसे शायद इस का एहसास न था. उस की नजर हमेशा बाहर आजा रही लड़कियों पर टिकी रहती. कई बार तो सड़क के किनारे चलतेचलते अपने मोबाइल फोन पर बात कर रही किसी लड़की की बातों को वह पास से गुजरते हुए सुनने की कोशिश करता. वह प्यार से बात कर रही है या नाराज हो कर, यह पकड़ने की कोशिश करता.

कई बार तो बिहारी दास लड़की से कुछ ही दूरी पर खड़ा रह जाता और जब तक वह बातें पूरी न कर लेती, वह वहीं खड़ा रहता. फिर अगर लड़की गुस्से में अपना मोबाइल फोन बंद कर लेती तो वह मन ही मन हंस पड़ता, ‘बेचारी… अपने यार से खफा है.’

तिवारीजी पर अब बिहारी दास अपनी पैनी आंखें गड़ाए हुए था. बिल्डिंग में जैसे ही वह उस लड़की को देखता, उस के पीछे चल देता और देखता कि वह तिवारीजी के घर ही गई है या नहीं. फिर वह बिल्डिंग के सामने पान की दुकान पर बैठ कर उस लड़की के बाहर निकलने का इंतजार करता रहता. जब वह चली जाती, तब वह तिवारीजी के घर किसी बहाने पहुंच जाता.

‘‘आप के पास क्या 2,000 रुपए के खुले हैं?’’

जब तिवारीजी उसे खुले पैसे दे देते, तो वह बातचीत शुरू कर देता था.

‘‘वह मिस जो आप के यहां आई थी, उस की स्कूटी स्टार्ट नहीं हो रही थी. तुरंत सुखबीर गैराज वाले को बुला लिया और उस ने ठीक करा दी. क्या वह बहुत दूर रहती है?’’

‘‘हां, रहती तो दूर है, मगर शहर में दूर क्या और नजदीक क्या? स्कूटी तो हर किसी के लिए जरूरी है,’’ तिवारीजी ने कुछ नाराजगी से बोला. इस पर बिहारी दास खिसिया कर रह गया.

एक दिन शाम को दीपक की पान की दुकान पर बैठे बिहारी दास ने उसी लड़की को किसी लड़के के साथ बिल्डिंग से निकलते हुए देखा.

‘‘अरे, इस के साथ यह लड़का कौन हैं…’’ बिहारी दास के मुंह से अचानक ही यह सवाल निकल पड़ा.

‘‘ये तो रोज ही साथसाथ निकलते हैं…’’ पान वाले दीपक ने उन की ओर देखते हुए कहा, ‘‘मैं इन्हें हरदम इसी वक्त देखता हूं.’’

‘‘यह तो तिवारीजी की भतीजी है,’’ बिहारी दास ने उन्हीं दोनों पर नजर जमाए हुए शक जाहिर किया, ‘‘कहीं तिवारीजी कोई खेल तो नहीं खेल रहे?’’

बिहारी दास ने मन में ठान लिया कि वह तिवारीजी की भतीजी की सचाई का पता लगा कर ही रहेगा.

‘‘देख दीपक…’’ बिहारी दास ने गंभीरता से कहा, ‘‘आइंदा तू जब भी इन दोनों को यहां आते या निकलते देखे, तो फौरन मुझे बता देना. मेरा फोन नंबर है न तेरे पास?’’

दीपक ने सहयोग देने के लिए हामी भरी.

अगले ही दिन रात को अपने दोस्तों के साथ जब बिहारी दास एक रैस्टोरैंट में खाना खा रहा था कि तभी दीपक का फोन आ गया.

‘दासजी, जल्दी आइए. वह लड़की किसी के साथ अभीअभी बिल्डिंग के अंदर गई है.’

चूंकि बिहारी दास खाना अधूरा छोड़ कर नहीं निकल सकता था, इसलिए उसे अपने घर वापस आतेआते एकाध घंटा बीत गया. वह जल्दी ही लिफ्ट से सीधा 5वीं मंजिल पहुंच गया, जहां तिवारीजी का फ्लैट था. वह किसी बहाने तिवारीजी के फ्लैट में घुस कर उस की भतीजी और उस लड़के को रंगे हाथ पकड़ना चाहता था.

बिहारी दास जल्दीजल्दी फर्लांग भरते हुए फ्लैट के दरवाजे पर पहुंचा और उस ने सीधे ही डोरबैल बजाई.

कुछ देर बाद दरवाजा खुला और वह लड़की, जिसे तिवारीजी अपनी भतीजी कह रहे थे, बिहारी दास के सामने खड़ी थी.

‘‘जी, आप को किस से मिलना है?’’

बिहारी दास को देख कर वह लड़की हैरान थी.

‘‘जी, मैं… तिवारीजी का पड़ोसी हूं. उन से मिलना था,’’ बिहारी दास कुछ सहम कर बोला, फिर उस ने अंदर झांक कर देख लिया. वह लड़का सोफे पर लेटे हुए टीवी देख रहा था.

‘‘आप… आप दास बाबू तो नहीं?’’ वह लड़की घूर कर बिहारी दास के चेहरे को देख रही थी, ‘‘तिवारी अंकल आप का जिक्र करते रहते हैं. आप तीसरी मंजिल पर रहते हैं न?’’

‘‘जी, बिलकुल,’’ बिहारी दास को एक झटका सा लगा, ‘क्या तिवारी ने इसे सबकुछ बता दिया है?’ वह सोचने लगा.

‘‘आप की बीवी का नाम राधिका है न?’’ कह कर वह लड़की मुसकरा दी, ‘‘अंकल आप के यहां ही गए हैं. कहते हैं, राधिका चाय अच्छी बनाती हैं. मैं पी कर आता हूं.

‘‘मैं रोजाना शाम को उन के लिए खाना बनाने अपने मंगेतर के साथ आती हूं. वे अभी आप ही के यहां गए होंगे. आप अंदर आइए न,’’ वह लड़की बड़ी मीठी आवाज में बोल कर उसे अंदर आने की गुजारिश करने लगी.

लेकिन, बिहारी दास को बिजली सा झटका लगा, ‘तिवारीजी और मेरे घर… वह भी मेरी गैरहाजिरी में…’

एक ही पल में बिहारी दास पर मानो पहाड़ सा टूट पड़ा. वह उलटे पैर वहां से निकल कर सीधा लिफ्ट से उतर कर अपने फ्लैट की तरफ दौड़ा. उस के दिमाग को अनेकानेक शक ने घेर लिया. उसे लगा कि अपना खेल खत्म होने जा रहा है. उस का पड़ोसी तिवारी उस से कहीं गुना ज्यादा चालाक निकला.

वह हरगिज भरोसे के लायक शख्स नहीं था, फिर बिहारी दास की बीवी राधिका तो बेचारी भोली थी. कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गई.

बिहारी दास के पैर रास्ते में ही भारीपन महसूस करने लगे. अब वह धीरेधीरे सहम कर अपने फ्लैट के दरवाजे तक पहुंचा ही था कि तुरंत दरवाजा खुला और तिवारीजी हंसते हुए बाहर निकले.

‘‘अरे, दासजी आप… आप तो हमेशा रात को देरी से लौटते हैं. आज जल्दी लौट आए,’’ फिर तीर सा पैना व्यंग्य कसते हुए तिवारीजी बोले, ‘‘राधिका भाभीजी चाय बढि़या बनाती हैं. अब तो हमें उस की आदत सी हो गई है.’’

तिवारीजी चल पड़े, मगर बिहारी दास को लगा मानो उस के पैर तले जमीन सरकने लगी थी. अपने घर में घुसते ही वह बैठक में रखे सोफे पर ढेर हो गया.

लेखक- रामचरन हर्षाना

Short Story : बीवी या बौस

Short Story. मैंने अपनी जिद पर लव मैरिज की थी, इसीलिए विदाई के वक्त ससुरजी ने कहा था, ‘‘जमाई बाबू, अभी तो मैं अपनी बेटी की शादी नहीं करना चाहता था, लेकिन आप के प्यार के आगे मुझे झुकना पड़ा. खैर, बेटी को मैं ने अच्छे संस्कार दिए हैं, इसलिए आप की जिंदगी की बगिया हमेशा गुलजार रहेगी.’’

मैं ने ससुरजी के चरण छू कर कहा था, ‘‘जब तक मेरी इन बाजुओं में दम है, आप की बेटी राज करेगी.’’

और इस तरह बिना एक फूटी कौड़ी दिए ससुर साहब ने अपनी सुपुत्री मुझे सौंप दी और मैं अपनी बीवी को ले कर दिल्ली की एक बस्ती में आ गया.

जब मेरी मासूम सी बीवी ने मेरे घर में पहला कदम रखा था, तो मैं बहुत खुश हुआ था. सोचा था कि अब मुझे कष्ट नहीं होगा. समय पर नाश्ताखाना मिलेगा. जब दफ्तर से लौट कर आऊंगा तो बीवी मुझे प्यार करेगी. लेकिन मेरे सपने धरे के धरे रह गए.

एक दिन मैं ने दफ्तर से लौटते समय अपनी बीवी को फोन किया, ‘‘क्या कर रही हो?’’

‘कुछ नहीं, लेकिन आप कब आ रहे हैं?’ उधर से आवाज आई.

मुझे बहुत भूख लगी थी. मैं ने सोचा कि वह खाना बना कर रखेगी, इसीलिए मेरे आने के बारे में पूछ रही है. मैं ने कहा, ‘‘प्रिये, कुछ लजीज खाना बनाओ. मैं दफ्तर से निकल रहा हूं. एक घंटे में पहुंच जाऊंगा.’’

‘ठीक है,’ वह बोली.

मैं रास्तेभर गाना गुनगुनाते हुए घर पहुंचा. मैं खुश था कि घर पहुंचते ही गरमागरम लजीज खाना मिलेगा. मैं ने घंटी बजा दी लेकिन दरवाजा नहीं खुला. फिर 1-2 बार बजा कर इंतजार किया. फिर भी दरवाजा नहीं खुला तो कई बार घंटी बजाई. तब जा कर दरवाजा खुला.

‘‘क्यों, क्या हो गया? देर क्यों हुई दरवाजा खोलने में,’’ मैं ने पूछा.

वह अपने चेहरे पर लटक रहे बालों को समटते हुए बोली, ‘‘कुछ नहीं, जरा आंख लग गई थी.’’

घर का सामान सुबह जिस हालत में था वैसे ही अभी भी पड़ा था. सुबह जिस प्लेट में मैं ने नाश्ता किया था वह वैसे ही जूठी डाइनिंग टेबल पर पड़ी थी. धोने के लिए गंदे कपड़ों का ढेर एक कोने में मुंह चिढ़ा रहा था. फर्श पर धूल की परत थी. रसोईघर में जूठे बरतनों का ढेर लगा था.

लजीज खाना खाने का मेरा सपना चकनाचूर हो गया था. वह मासूमियत से हुस्न के हथियार के साथ अनमने ढंग से मुझे देख रही थी. मैं खून का घूंट पी कर रह गया.

कुछ दिनों के बाद एक सुबह मैं दफ्तर के लिए निकल रहा था, तो वह बोली, ‘‘सुनिएजी, मेरे मोबाइल फोन में बैलेंस खत्म हो गया है. बैलेंस डलवा दीजिएगा.’’

मैं ने चौंक कर कहा, ‘‘बैलेंस कैसे खत्म हो गया… कल ही तो 2 सौ रुपए का रीचार्ज कराया था?’’

‘‘कल मैं ने मम्मीपापा से बात की थी और बूआ से भी बात की थी…

2-3 सहेलियों से भी बात की थी…’’ वह थोड़ा अटकते हुए बोली.

‘‘तो इतनी ज्यादा बात करने की क्या जरूरत थी? सिर्फ हालचाल पूछ लेती और बात खत्म कर देती,’’ मैं ने कहा.

‘‘हालचाल ही तो पूछा था,’’ वह बोली.

मुझे दफ्तर के लिए देर हो रही थी. मैं ने कहा, ‘‘अच्छा, ठीक है, बैलेंस डलवा दूंगा,’’ कह कर मैं घर से निकल गया. मेरे सपनों का महल टूटता जा रहा था.

इसी बीच उसे एक नया शौक सूझा. अब वह टैलीविजन का रिमोट हाथ में लिए सीरियल देखती रहती थी. कुछ कहता तो भी सीरियल में ही खोई रहती. जोर से बोलने पर वह मेरी तरफ देख कर पूछती, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘दफ्तर से थकाहारा आया हूं. पानी और नाश्ते के लिए भी नहीं पूछती और कहती हो कि क्या हुआ…’’

‘‘अच्छा, अभी 5 मिनट में लाती हूं. सीरियल अब खत्म होने ही वाला है,’’ टैलीविजन पर से आंखें हटाए बिना वह जवाब देती.

उस के वे 5 मिनट कभी खत्म नहीं होते. मजबूरन मैं खुद ही रसोईघर में जा कर कुछ खाने को ले आता. खुद भी खाता और अपनी बीवी को भी खिलाता.

महीनों सीरियल प्रेम दिखाने के बाद मेरी बीवी का पासपड़ोस की औरतों के घरों में आनेजाने और गपबाजी का दौर शुरू हुआ.

मैं दफ्तर से आ कर दरवाजे की घंटी बजाता रहता लेकिन दरवाजा नहीं खुलता. जब फोन करता तो पता चलता कि वह किसी पड़ोसन के घर बैठी है.

जल्द ही मेरी बीवी का पड़ोसन के घरों में जाने का साइड इफैक्ट भी शुरू हो गया. दूसरों के घरों में कुछ नई और अच्छी चीजें देख कर आती और मुझे भी वे चीजें लाने को कहती. कुछ तो अपनी जरूरत और पैसे की सीमा को देखते हुए मैं ले भी आया लेकिन अकसर ऐसी डिमांड होने लगी.

कुछ मेरी चादर से बाहर होता तो मैं मना कर देता. वह मुंह फुला कर बैठ जाती. खाना जैसेतैसे बना कर लाती, जो खाया न जाता.

एक दिन मैं ने उसे समझाया, ‘‘प्रिये, सब की जरूरत और औकात अलग होती है और उसी के मुताबिक सब काम करते हैं. दूसरों को देख कर हमें परेशान नहीं होना चाहिए.’’

‘‘हां, मेरी किस्मत ही खराब है, तभी तो सारी अच्छी चीजें दूसरों के घर देखती हूं. अपने घर में नसीब कहां?’’ वह बुझी आवाज में बोली.

‘‘निराश क्यों होती हो? समय आने पर हमारे यहां भी सबकुछ हो जाएगा. सब एक दिन में तो अमीर नहीं हो जाते. इस में समय लगता है,’’ मैं ने कहा.

‘‘मैं बोझ हो गई थी, इसीलिए मेरे मम्मीपापा ने जल्दी मेरी शादी करा दी,’’ यह कहते ही उस की आंखों से आंसू टपकने लगे.

‘‘लेकिन यह शादी तो हम दोनों के बीच प्यार होने के चलते हुई थी.’’

‘‘तो क्या हुआ? मैं नादान थी, लेकिन मेरे मम्मीपापा को तो अक्ल थी. मुझे बोझ समझ कर उन्होंने मेरा निबटारा कर दिया.’’

‘‘खैर, देर से शादी होती तो क्या कोई टाटा, बिरला या मुकेश अंबानी का बेटा आ जाता रिश्ता ले कर?’’ गुस्से में मेरे मुंह से निकला.

‘‘कोई भी आता लेकिन आप से अच्छा आता,’’ उस ने जवाब दिया.

मैं ने चुप रह जाना ही ठीक समझा.

रविवार का दिन था. मैं ने सोचा कि आज आराम करूंगा. रोज अपने दफ्तर में बौस की और्डरबाजी से परेशान रहता हूं. कम से कम आज तो आराम कर लूं.

मैं ने बीवी से कहा, ‘‘जानेमन, आज कुछ अच्छा खाना बनाओ ताकि खा कर मजा आ जाए. मैं आज टैलीविजन पर फिल्म देखूंगा और आराम करूंगा.’’

लेकिन मेरी बीवी का खयाल कुछ और ही था. वह बोली, ‘‘चलिए न आज कहीं बाहर घूमने चलते हैं और होटल में खाना खाते हैं.’’

मैं ने घबरा कर कहा, ‘‘कहां घूमने चलेंगे? कोई अच्छी जगह नहीं है. भीड़भाड़ और गाडि़यों के जाम में ही फंसे रहे जाते हैं और होटल का खाना तो ऐसा होता है कि खाने के बाद पछतावा होने लगता है कि क्यों खाया.

‘‘खाने का कोई स्वाद नहीं होता. सिर्फ ज्यादा पैसे और टिप दो. शाम को हैरानपरेशान हो कर घर लौटो.’’

‘‘आप तो हमेशा ऐसे ही बोलते हैं. शादी के बाद हनीमून पर भी बाहर नहीं ले गए,’’ वह बिस्तर पर लेट कर आंसू बहाने लगी.

छुट्टी का मजा खराब हो चुका था. मैं खुद रसोईघर में जा कर कुछ स्वादिष्ठ खाना बनाने की कोशिश करने लगा.

एक बार पड़ोस में शादी थी. मुझे भी सपरिवार न्योता मिला था. दफ्तर से आ कर मैं ने अपनी बीवी से कहा, ‘‘जल्दी तैयार हो जाओ. सब इंतजार कर रहे होंगे.’’

लेकिन बहुत देर बाद भी वह अपने कमरे से बाहर न निकली. मैं कमरे में गया तो देखा कि वह तकिए में मुंह छिपा कर रो रही थी.

‘‘अरे, क्या बात हो गई… रो क्यों रही हो?’’ मैं ने घबरा कर पूछा.

वह कुछ न बोली. मैं ने जबरदस्ती उसे खींच कर बैठाया और फिर वजह पूछी.

‘‘न्योते में जाने लायक मेरे पास कपड़े नहीं हैं. मैं क्या पहन कर जाऊंगी?’’ वह सुबकते हुए बोली.

मैं हैरान रह गया. मैं रोज दफ्तर आताजाता हूं. लेकिन मेरे पास सिर्फ 2 जोड़ी ढंग के कपड़े थे, जबकि मेरी बीवी के पास कई जोड़ी कपड़े थे. 2 महीने पहले भी उस ने एक सूट खरीदा था, फिर भी वह रो रही थी.

मैं ने अलमारी में से उस के कई कपड़े निकाले और उस के आगे फैलाते हुए कहा, ‘‘ये सारे तो नए सूट हैं, फिर क्यों रो रही हो?’’

‘‘ये सब तो मैं पहले पहन चुकी हूं,’’ वह मुंह फेर कर बोली.

‘‘तुम कहना क्या चाहती हो? जो कपड़ा एक बार पहन लिया, वह पुराना हो गया क्या?’’ मैं ने पूछा.

‘‘ये कपड़े पहने हुए मुझे सब औरतें देख चुकी हैं.’’

‘‘मतलब, हर मौके लिए तुम्हें नए कपड़े चाहिए?’’ मैं ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘कोई कपड़े से बड़ा या छोटा नहीं होता. देखो तो, यह सूट कितना अच्छा है. तुम पहन कर तो देखो. जो इस सूट में तुम्हें देखेगा, तारीफ करेगा,’’ मैं ने पुचकारते हुए कहा.

उस दिन मैं बड़ी मुश्किल से अपनी बीवी को मना पाया था.

लेकिन अब मेरी सीधीशांत दिखने वाली बीवी बातबात पर गुस्सा करने लगी थी. सीरियल देखने से मना करता तो रिमोट पटक देती. पासपड़ोस में ज्यादा जाने से मना करता तो गुस्से में अपने को कमरे बंद कर लेती.

फोन पर ज्यादा बात करने से मना करता तो कई दिन तक मोबाइल फोन नहीं छूती. इतना ही नहीं, अगर मैं उस के बने खाने की शिकायत करता तो मुझे पर ही चीखने लगती और खाना बनाना छोड़ देती.

मैं तंग आ गया था. सोचता कि शादी से पहले कितनी सीधी और प्यारी थी मेरी बीवी, पर अब तो ज्वालामुखी बन गई है और गुस्सा तो जैसे इस की नाक पर बैठा रहता है.

दफ्तर में मेरा बौस काम में कमी निकाल कर मुझ पर बातबात पर गुस्सा करता था. लेकिन नौकरी तो करनी ही थी, उसी से घर का गुजारा चलता था, इसीलिए बौस का गुस्सा सहना पड़ता था.

घर आता तो बीवी भी मुझ पर ही बातबात पर गुस्सा करती. समझ में नहीं आता कि वह मेरी बीवी है या बौस.

मेरी बीवी और मेरे बौस ने मेरी जिंदगी दूभर कर दी थी. पता नहीं, इन दोनों के चक्रव्यूह से मैं कभी निकल पाऊंगा भी या नहीं.

story in hindi: बगावत एक अफसर की

story in hindi. जनाब, आजकल हमारा मूड बड़ा उखड़ाउखड़ा रहता है. अब माना कि हमारी जरा सी तोंद निकल आई है या जरा पान के शौक में दीवार पर भूल से थूक ही दिया हो, तब भी किसी को क्या हक कि हमें पिछड़ा, 19वीं सदी का सरकारी बाबू कह कर हमारी तौहीन कर दे. खामखां हमारी इमेज तोंदवाले, मुच्छड़, पान से रंगे दांतों वाले, घड़ीघड़ी दांत खुरचते, खींसें निपोर कर हर काम में दांत से जीभ काटते किसी ढपोरशंखी सी बना दी गई है. भई, यह तो सरासर गलतबयानी है.

अब हम अपने कामों या नाकामियों में काफी मौडर्न हो गए हैं, अपनी फितरत हम ने बड़ी स्मार्ट बना ली है और ढर्रों में भी हम ने मौडर्न जान फूंक दी है. अब अमेरिका वाले डोनाल्ड ट्रंप को ही ले लीजिए, कुएं के अंदर का ट्रंप सूटबूट में कितना रोबीला गबरू जवान लगता है. देख कर कौन कहे कि साहब, जाति, प्रजाति व धर्म को ले कर जनाब इतने कूपमंडूक होंगे. उन्हें सिर्फ गोरे नजर आते हैं. भूरे, पीले, काले, दाढ़ी वाले, टोपी वाले दुश्मन हैं उन के लिए. फिर भी क्या अदा है, क्या रुतबा है, क्या स्टाइल है. स्टाइल और अदा के जलवे ने उन की ढपोरशंखी चुल्लूवाली मानसिकता को कैसा नायाब हीरो वाला ट्रंप सूट पहना कर खड़ा कर दिया है कि दुनिया को अच्छाखासा कंफ्यूजन हो रहा है कि महारथी की फितरत का विरोध करें या इंतजार ही कर लें कि और किनकिन बेहतरीन तरीकों से वे पिछड़ेपन को पेश कर सकते हैं.

भई, वे ठहरे अमेरिका वाले ट्रंप, तो हम ठहरे भारत सरकार के सरकारी अफसर मुलाजिम, क्या हम कम हैं. सरकार यों ही इतना हमें नहीं देती. गाड़ी देती है, बंगला देती है, अर्दलीचपरासी देती है. और तो और, काम लेने को तरहतरह के नियमों के चाबुक भी देती है.

अब यह तो कोई बात नहीं हुई कि इतना ठाटबाट पा कर भी हम जरा अपने कौलर में ठसक न रखें. फिर अब यह न पूछ बैठना कि कोई कितनी पढ़ाई कर के सरकारी अफसर बने या कौन कितना खिलापिला कर रिश्तोंनातों की सुरंग से अंदर घुस आए-बराबरी की बात है. कोई कैसे भी घुसा, जब सिंहासन मिल गया तो योग्यता क्या माने रखेगी? सब बराबर. समान अधिकार. हां, गलती से भी अब कर्तव्य की बात न छेड़ना, मिस्टर. हम कोई कम नहीं हैं काम करने में या कहिए कि करवाने में. काम लेने का हुनर न होता तो इतना बड़ा सिस्टम चलता कैसे. खुद ही देख लो, किस जमाने से इतना बड़ा सिस्टम इतना सिस्टमैटिक चल रहा है. सरकारें बदल जाती हैं मगर सिस्टम के अंदर की दीमक ठीक अपने सिस्टम से उसी तरह काम पे लगी हैं.

लोग कहते हैं काम नहीं होता? कैसे काम नहीं होता. अगर हम अफसर हैं तो पूछो जरा ड्राइवर से- नहीं जाता वह बीवी की शौपिंग से ले कर बच्चे के स्कूल तक. पूछो अर्दली से-हुक्म की तामील न हो तो उस की क्या लानतमलामत होती है. चाय दे, पानी दे, ये ला, वो ला, दुकान जा, बैंक जा, दौड़दौड़दौड़, क्या दौड़ लगवाता हूं. पूछो जरा चपरासी से, घर पर क्याक्या नहीं करता. घास छीलने से ले कर जूते पौलिश तक सबकुछ. हम तो क्या, हमारी बीवी और उस के रिश्तेदारों तक के हुक्म बजाने में वह उस्ताद हो गया है और वह भी हमारे दिए स्मार्टफोन के स्मार्ट तरीकों के सहारे. क्यों, कह लो हमें पिछड़ा, नकारा. हो गई न गुम सिट्टीपिट्टी.

अफसर ही क्यों, अगर हुए हमारे फाइलों वाले बाबू, तो जनाब अब भूल जाओ. पुरानी फाइलों वाले बाबू अब कहां. अब हम कागज की फाइल नहीं टरकाते साहब, अब तो कंप्यूटर पर फोल्डर और फाइल खिसकाते हैं. खींसें निपोर कर हाथ नहीं बढ़ाते. काम करवाना है तो दे दो चवन्नी.

अब हम इतने स्मार्ट तो हो ही गए हैं कि आप की स्मार्टनैस का हम बखूबी अंदाजा लगा सकें. काम करवाने के बहाने पैसे दिए नहीं, कि सेटिंग ले कर हाजिर. ये नैट बैंकिंग और स्मार्टफोन किस दिन काम आएंगे. गहरे पानी में उतरने की कला के हम फनकार हुए हैं वर्षों की साधना के बाद. यों ही न समझना हमें. मोबाइल में उंगली चलाई कि सुदामा समझ गया कि मौडर्न किशन है. आंखों का पानी उतार कर पैर नहीं, इज्जत धो देगा, हे…हे! अपना यह तरीका भी अब रहा नहीं कि ‘मोहन बाबू, इन की फाइल देख लीजिएगा’ कह कर आसामी को अगले टेबल तक सरकाएं और मोहन बाबू के हाथों की खुजली उन्हें जब तक अगली तारीख तक सरकाए, आसामी अपने गले चढ़ बैठे. अब तो उन की अर्जी को सीधे कंप्यूटर के फोल्डरों के तहखाने में डाल मंदमंद मुसकराते कह लो, ‘जी, जी, आप का केस प्रोसैस में डाल दिया है,’ हाथ मिलाया, भेदभरी निगाहें मिलाईं. अब घूमते रहो जब तक नैट ट्रांजैक्शन का फायदा हमें भी न मिल जाता. सारा लेनदेन तो कैशलैस करना जानते हैं. बीवी के भाई के अकाउंट में भी पैसा आता है और उस के भाई के भी. 5 प्रतिशत उस का 95 प्रतिशत हमारा.

और तो और, किसी डिपार्टमैंट में काम निकलवाना है, अपनी सैटिंग वहां भी मौडर्न तरीके से फिक्स रहती है. संबंधित विभाग में बैठे व्यक्ति की पूरी कुंडली निकलवाता हूं ठीक मंदिरों के तकनीकी जानकार पंडों की तरह. किस का कौन सा भाई किस के दामाद का कौन सा भतीजा है ताकि कब किस के खाला के भतीजे के चाचा का काम मैं ने या मेरे विभाग ने किया था, वह पता लगे. फिर इस बदौलत मैं उस से काम निकलवाने का हक बीपीएल कार्डधारक के हक की तरह अनायास ही पा सकूं. अब यह न सोचिएगा कि ये सब फलांफलां जगह पर चप्पल घिसते हुए फलांफलां आदमी से पूछपूछ कर मैं ने जानकारी जुटाई. नहीं जी, अब हम इतने पिछड़े नहीं रहे, अब तो हम मौडर्न तरीके से पिछड़ रहे हैं. सौ तरीके के ऐप्स डाउनलोड कर रखें हैं, हजार तरह के कौन्टैक्ट बना रखे हैं. काम से बचना हो, जवाब न देना हो, काम का झांसा दे कर फर्जीवाड़ा करना हो, सरकारी पैसे की हेराफेरी करनी हो.

भई, अब हमें पान की दुकान पर मुवक्किल को आते देख मुंह घुमा कर पीक थूकने के बहाने पहचान छिपा कर भागने की जरूरत नहीं पड़ती. सीधी उंगलियों से टेढ़ा काम हम आसानी से निबटा जाते हैं. मौडर्न तरीका, मौडर्न डिवाइस. नंबर ब्लौक, नौट सीन – हो गया काम तमाम. ढूंढ़ते रह जाओगे, समझे क्या….

hindi kahani: यों आम खाएगा आम आदमी

hindi kahani. ‘अब की बार आम आम आदमी की पहुंच के अंदर,’ किराने की दुकान से नूनतेल लेते हुए अचानक नजर अखबार की इस सुर्खी पर पड़ी, तो एकाएक भरोसा नहीं हुआ. लेकिन अखबार वाले झूठी खबर भला क्यों छापेंगे, यह सोचते हुए उस ने हिम्मत जुटाई और आम के भाव पूछे.

कीमत बहुत ज्यादा नहीं थी, तो कम भी नहीं थी. हफ्ताभर चायबीड़ी वगैरह की तलब छोड़ कर आखिरकार उस ने आधा दर्जन आम खरीद ही लिए. मियांबीवी और 3 बच्चे. कुल 5 जनों के लिए एकएक आम. 6ठा आम वह कहीं अकेले में बैठ कर गुपचुप खाना चाहता था.

सड़क पर किसी जानपहचान वाले से टकराने का खतरा था, इसलिए वह पास के एक पार्क में घुस गया, जहां ज्यादातर बड़े आदमी ही टहला करते थे. वह झाड़ी की ओट ले कर बचपन के दिनों को याद करते हुए तबीयत से आम चूसने का इरादा कर के बैठ गया.

‘‘कौन है तू? थैली में क्या है?’’ वह आम निकालता, इस से पहले ही किसी ने कड़क कर उस से पूछा. सकपकाते हुए उस ने सिर उठाया. सामने डंडा लिए हवलदार खड़ा था.

‘‘जी, आम हैं,’’ कहते हुए उस ने बेहिचक थैली का मुंह खोल दिया. उस के हिचकने का कोई कारण भी तो नहीं था. ‘आम आदमी आम खाते हुए पकड़ा गया’ ऐसी कोई खबर बनने की उम्मीद थोड़े ही थी.

‘‘अरे, इतने सारे आम. कहां से लाया है और यहां क्या कर रहा है?’’ हवलदार जोर से बोला.

‘‘जी, ये आम मैं ने सड़क पर ठेले वाले से लिए हैं… बच्चों के लिए. शांति के साथ बैठ कर एक आम खाने के लिए यहां आ गया.’’

यह सुन कर हवलदार की आंखें चमकीं, ‘‘तू जब पार्क में घुस रहा था, तभी तेरी चाल देख कर मैं समझ गया था कि जरूर कुछ गड़बड़ है. हम पुलिस वाले मामला फौरन ताड़ लेते हैं. अच्छा बता, किधर है शांति?’’

‘‘जी, शांति से मेरा मतलब यहां आराम से बैठ कर आम खाने से है,’’ वह थोड़ा हड़बड़ाया.

हलवदार खिसियाते हुए बोला, ‘‘पुलिस को गुमराह करने की कोशिश करता है. चल बता, यहां कितने दिनों से यों छिप कर आम खा रहा था?’’

‘‘जी, मैं तो यहां पहली बार आया हूं. और आम तो मैं ने पिछले 2 साल से नहीं खाया. इस महंगाई में आम आदमी भला रोजरोज कैसे आम खा सकता है?’’ हवलदार सोच में पड़ गया.

‘‘आम आदमी को आम खाना भी नहीं चाहिए. क्या तुझे मालूम नहीं है कि आम फलों का राजा है और आम आदमी जनतंत्र का राजा है. एक राजा दूसरे राजा को खाए, यह थोड़े ही शोभा देता है. फिर हम सेवक किसलिए हैं. खानेपीने का तगड़ा अभ्यास है हमें,’’ कहते हुए हवलदार ने आमों पर नजर डाली.

उस ने थैली का मुंह बंद कर लिया और हिम्मत की, ‘‘सेवक नहीं, आप तो सरकार हैं. अब जाने की इजाजत दीजिए.’’

हवलदार डपटते हुए बोला, ‘‘ऐसे कैसे जाने देंगे. हम कानून के रखवाले हैं. पैनी नजर रखते हैं. दूर की सोचनी पड़ती है हमें, नहीं तो देश कैसे चलेगा.’’

‘‘लेकिन इस में देश और कानून का क्या सवाल?’’ न चाहते हुए भी उस का मुंह बिगड़ गया.

‘‘अरे वाह, सवाल क्यों नहीं है? तुम और तुम्हारे बच्चे आम खाएंगे. छिलके गली में फेंकेंगे. इस से गंदगी होगी. हैजा भी फैल सकता है,’’ हवलदार तुनका.

‘‘लेकिन साहब, हम लोग छिलके फेंकते ही नहीं, खा लेते हैं,’’ उस ने सफाई दी.

‘‘क्या कहा? छिलके तक खा लेते हो. लेकिन यह तो सेहत के लिए हानिकारक है. जो हानिकारक है, वह जुर्म है,’’ हवलदार ने दूर की हांकी.

‘‘छिलके समेत आम खाना जुर्म कैसे हो सकता है साहब? छिलके में तो तमाम तरह के विटामिन होते हैं. मेरे बेटे की किताब में लिखा है,’’ आम आदमी जानकार निकला.

पर हवलदार कहां हार मानने वाला था, ‘‘अच्छा किताब में लिखा है, तो चलो मान लेते हैं. लेकिन गुठली तो जरूर तुम सड़क पर फेंकोगे. इस से हादसा तक हो सकता है. तब तो जुर्म होगा कि नहीं?’’

इस बाबत आम आदमी गांधीवादी था, ‘‘नहीं जनाब, हम तो गुठली भी नहीं फेंकते. उसे सुखाते हैं, फिर भून कर या उबाल कर खा लेते हैं. गुठली के कड़े खोल को चूल्हा जलाने के काम में लाते हैं,’’ अपनी तरफ से उस ने एकदम सधा हुआ जवाब दिया था. उस के हिसाब से अब के पकड़ में आने की कोई गुंजाइश नहीं थी.

‘‘ओ… हो… तो यह बात है,’’ कहते हुए हवलदार गंभीर हो गया. अब हवलदार को भी अपने बच्चे की किताब टटोलने का फायदा मिल रहा था.

‘‘यह तो तुम बड़ा खतरनाक जुर्म कर रहे हो. सरकार बेचारी अपील करकर के हार गई है कि पेड़ लगाओ, धरती को खूबसूरत बनाओ, लेकिन इस अपील का कोई असर ही नहीं हो रहा है. अब जा कर पता चला कि आखिर पेड़ बेचारे उगें तो कैसे उगें. सारी गुठलियां तो तुम लोग खा जाते हो. इस गुनाह का तो तुम्हें भारी दंड मिलना चाहिए.’’

यह सुन कर उस की घिग्घी बंध गई. वाकई वह कितना भारी अपराध करता आ रहा है. यहां तक कि उस के बच्चे तो आसपड़ोस वालों की गुठलियां भी चट कर जाते हैं. हर गुठली से आम का एक पेड़ तैयार हो सकता था यानी अब तक उस ने देश के कितने पेड़ों का नुकसान कर दिया है. कहीं हवलदार ने हिसाब लगा लिया, तो गजब हो जाएगा. तब कितना जुर्माना भरना पड़ेगा. वह ढीला पड़ गया, ‘‘माफ करें साहब. आगे से गुठली नहीं खाऊंगा.’’

‘‘माना कि नहीं खाएगा, लेकिन गुठलियां खाखा कर अब तक जो देश का कबाड़ा किया है, उस का हर्जाना कौन भरेगा?

‘‘ऐसा करते हैं कि 6 में से बस 3 आम हम ले लेते हैं,’’ कहते हुए हवलदार ने थैली की तरफ हाथ बढ़ाया, तो वह एकदम बिदका.

‘‘अरे साहब, मुझ गरीब को क्यों घेरते हो? आम तो आप उस ठेले वाले से ले लेना. वह आप को मना थोड़े ही करेगा.’’

‘‘चुप बे, हमें ही सिखाता है. भला ठेले से हम आम कैसे ले सकते हैं. उस से तो हम हफ्ता लेते हैं. नियम की बात है यह,’’ हवलदार ने घुड़का, तो उस ने चुपचाप 3 आम हवलदार के हवाले कर दिए.

हवलदार का मूड ठीक हुआ, तो उस ने हौसला किया, ‘‘हुजूर, हम छोटे लोगों को तो आप जब चाहो कानून के डंडे से दबा देते हो, लेकिन सुना है कि ये बड़े लोग तो आप की बिलकुल परवाह नहीं करते हैं. फिर भी आप हम से तूतड़ाक और उन से बड़ी तमीज से पेश आते हो.’’

ह आरोप सुन कर हवलदार तिलमिलाया, ‘‘नहीं, एकदम गलत बात है यह. कानून की नजर में सब बराबर हैं. भेदभाव हम बिलकुल नहीं रखते. कानून का जो भी हक बनता है, सब से वसूलते हैं. किसी को नहीं छोड़ते. बस, आदमी देख कर जरा तरीका बदल देते हैं. ट्रेनिंग में हम ने यही सीखा है.

‘‘देखो, वह जो अभीअभी सामने सड़क पर सेठ ने गलत जगह पर कार खड़ी की है, मैं उस से भी हर्जाना लूंगा. जाते ही एक सलाम ठोकूंगा. देखना, तपाक से 50 का नोट देगा मुझे. छुट्टा नहीं हुआ, तो सौ भी दे सकता है.

‘‘चल, तू कहता है, तो तमीज की खातिर मैं तुझे भी एक सलाम झाड़ देता हूं. तू 50 का नहीं, सिर्फ 10 का ही नोट देना. पर इस से कम में सलाम वाली तमीज खर्च करना मेरे कानून के खिलाफ है.’’

यह सुनते ही वह पुलिस वाले की सलामी की मार से बचने के लिए भाग खड़ा हुआ. सड़क पर आतेआते उस ने बड़ी सरलता से यह जटिल हिसाब लगाया कि 3 बच्चों में 2 आम बांट देगा और एक आम वह बीवी के साथ मिल कर खाएगा. अकेले एक पूरा आम खाने के अपराध  से बचने का संतोष सुख भी अब उस के खाते में था.

Hindi Story : मेरा नंबर कब आएगा?

Hindi Story:

पहला सीन

दक्षिण भारत के एक मशहूर मंदिर के सामने लोगों की लंबी लाइन लगी थी. सभी अपने पाप धोने या पाप करने से पहले ही लाइसैंस मांगने के लिए खड़े थे. मैं भी पिछले 3 घंटे से धूप में डटा हुआ था. लेकिन अगले 4 घंटे तक कामयाबी मिलने की कोई उम्मीद नहीं लग रही थी. मुझे लग रहा था कि जितनी मेहनत यहां खड़े हो कर मूर्ति देखने के लिए कर रहा हूं, उतनी अगर हिमालय पर जा कर करता, तो अब तक शायद सीधे किसी देवता से मुलाकात हो गई होती.

अचानक ही मेरे एक दोस्त नजर आ गए. उन्होंने मुझे इस बात का अहसास दिलाया कि मैं पहले दर्जे का बेवकूफ हूं.

दोस्त ने मुझे बताया कि आजकल देवता भी उसी को जल्दी दर्शन देते हैं, जो ज्यादा भोग लगाता है. मैं ने पलट कर देखा, तो सचमुच ही थोड़ी दूरी पर 5 सौ रुपए वालों की बुकिंग चल रही थी और कहां हम फटीचर जैसे लोग मुफ्त में ही देवता को देख लेना चाहते थे.

मंदिर में तैनात पंडे बेहद लगन से पैसे वालों को देवता का दीदार करा रहे थे. शायद देवता को भी उन से ही मिलने की जल्दी रहती हो. मैं ने भी एक बार जाने की हिम्मत की, लेकिन रुपयों का मोह देवता की भक्ति से ज्यादा बड़ा निकला.

तभी पता चला कि मंदिर के दरवाजे बंद हो गए हैं. अब 4 बजे खुलेंगे. मैं ने गहरी सांस ली. ऊपर देखा और आसमान वाले से पूछा, ‘मेरा नंबर कब आएगा?’

दूसरा सीन

सुबहसुबह बीवी द्वारा काफी धमकाए जाने के बाद आखिरकार मैं अपना झोला उठा कर राशन की दुकान की तरफ बढ़ा. वहां काफी लंबी लाइन देख कर मेरी हिम्मत जवाब देने लगी.

कदम लौटाने की कोशिश करते ही बीवी का खतरनाक चेहरा आंखों के सामने कौंध उठा. मैं मन मार कर लाइन में लग गया. अचानक कुछ दादा जैसे लोग मूंछों पर ताव देते हुए लाइन के बगल से आगे चले गए. मैं ने पहले तो आवाज दे कर उन्हें रोकना चाहा, पर शायद सुबह नाश्ता नहीं मिल पाने की वजह से आवाज ही नहीं निकली. मैं ने ज्यादा कोशिश भी नहीं की, क्योंकि इस बार मैं ने इंश्योरैंस पौलिसी को रीन्यू नहीं कराया था.

वे लोग सीना ताने हुए बोरियां उठा कर वापस चले गए. कुछ ही मिनटों में यह खबर फैली कि राशन खत्म हो गया. थोड़ी देर तक भीड़ बकतीझकती रही, फिर छंट गई. मैं भारी कदमों से दुकानदार के पास पहुंचा. वह तसल्ली से करारे नोट गिन रहा था. मैं ने धीरे से उस का कंधा छुआ.

उस ने तीखी निगाहों से मुझे घूर कर देखा.

मैं ने उस से पूछा, ‘‘मेरा नंबर कब आएगा?’’

तीसरा सीन

 मैं प्रदेश सचिवालय के वेटिंग रूम में बैठा था. मुझे बताया गया था कि मेरी फाइल जिस बाबू के पास है,वह अभी तक दफ्तर में नहीं आया है. तब मुझे सरकारी मुलाजिम के लिए प्रचलित एक कहावत याद आ गई, ‘12 बजे लेट नहीं और 3 बजे भेंट नहीं’.

इतना ज्यादा इंतजार तो मैं कालेज में अपनी प्रेमिका का भी नहीं किया करता था. खैर, सवा 12 बजे बाबू साहब तशरीफ लाए. बेहद बिजी होने का नाटक करते हुए उन्होंने टेबल के साथ वाली कुरसी पर आसन जमा लिया.

कुछ फाइलों को इधरउधर किया, फिर मुझे दिखा कर बड़बड़ाते हुए जोर से पटका. उड़ती हुई धूल वहां हो रहे काम की गवाह थी. उन्होंने चिल्ला कर चपरासी को बुलाया. उसे डांट कर अपने खराब मूड की पहचान कराई. फिर मुझ से कहा, ‘‘कहिए, आप का क्या मामला है?’’

मैं ने बेहद तमीज से अपना सारा मामला सुनाया और उन से फाइल आगे बढ़ाने की गुजारिश की.

उन्होंने मुझे समझाया, ‘‘देखिए साहब, यह जो सरकारी शब्द है न, असल में ‘सरक’ शब्द का बिगड़ा हुआ रूप है. अब जो नाम से ही सरकता है, उसे आप दौड़ा कैसे सकते हैं?’’ तभी धमकते कदमों के साथ एक महाशय वहां आए. कुरसी खींच कर बैठे और बाबू पर सीधा हमला किया, ‘‘क्यों बे चपड़गंजू, तेरी इतनी हिम्मत कि नेताजी के साले की फाइल 2 दिन तक दबा कर बैठ गया. तेरी तो… अपना ट्रांसफर अंडमाननिकोबार करवाना चाहता है क्या?’’

बाबू साहब की घिग्घी बंध गई. वे गिड़गिड़ाते हुए बोले, ‘‘साहब, घोड़ा घास से यारी करेगा, तो खाएगा क्या? और फिर ऊपर भी तो पहुंचाना पड़ता है.’’

फिर सौ रुपए के नोटों की एक गड्डी का लेनदेन हुआ और शायद जश्न मनाने के लिए वे दोनों कैंटीन की तरफ चल दिए. मैं ने चपरासी को रोक कर पूछा, ‘‘मेरा नंबर कब आएगा?’’

चौथा सीन

मैं अपने परिवार वालों के साथ जैसे ही सिनेमाहाल पहुंचा, तो लोगों की भीड़ देख कर चकरा गया. टिकट की लाइन चक्कर खा कर घूमती हुई जाने कहां तक चली गई थी. वहीं पर मुझे पहली बार अहसास हुआ कि हिंदुस्तान की आबादी वाकई सवा अरब पार कर चुकी है.

खैर, मैं किसी तरह लाइन का आखिरी सिरा ढूंढ़ने में कामयाब हो गया. समय गुजारने के लिए मैं ने आगे वाले से बात करनी चाही, तो पता चला कि वह अगले शो का टिकट लेने के लिए खड़ा था. उस हिसाब से तो टिकट खिड़की तक पहुंचतेपहुंचते मुझे अगला शो शुरू हो जाने की पूरी उम्मीद थी.

तभी एक मददगार की टक्कर से मैं निहाल हो गया. दरअसल, वह टिकट ब्लैक करने वाला था.

उस ने पूछा, ‘‘3 सौ का 5 सौ में मांगता है क्या?’’

मैं ने उसे दिल से शुक्रिया कहा, क्योंकि उस ने कम से कम मुझे ब्लैक में टिकट खरीदने लायक तो समझा. मैं ने उस से पूछा, ‘‘जनाब, इतनी कड़ी मेहनत कर के आप एक दिन में औसतन कितना कमाते हैं?’’

उस ने आंखें तरेरीं, ‘‘सीबीआई वाला है क्या?’’

मैं ने सहमते हुए कहा, ‘‘नहीं जी, बस यों ही अपनी जानकारी बढ़ाने के लिए पूछा था.’’

वह हंसा और बोला, ‘‘बस 5-6 हजार रुपए रोज कमा लेते हैं.’’ मैं ने कहा, ‘‘इतना… अरे साहब, हम शहर के नामी वकील हैं, फिर भी रोज इतना नहीं कमा पाते हैं.’’

‘‘वही तो, जब मैं वकील था, तो मैं भी इतना नहीं कमा पाता था, पर अब तो बात और है,’’ कह कर ब्लैक में टिकट बेचने वाला चलता बना.

मैं ने पलट कर देखा, तो टिकट खिड़की बंद हो चुकी थी.

मैं ने पूरी ताकत लगाई और चिल्ला कर कहा, ‘‘मेरा नंबर कब आएगा?’

hindi story: रिश्वत पर ऐसा निबंध आपने कभी नहीं पढ़ा होगा

hindi story. कल शाम थकाहारा, रिश्वत का मारा सहीसलामत घर लौटने की खुशी में मैं इतरा ही रहा था कि दरवाजे पर दस्तक हुई. मैं परेशान हो कर कुछ सोचने लगा. दिमाग पर दबाव डाला, तो काफी राहत मिली कि जिसजिस ने कुछ दिया था, उन सब का काम तो कर ही आया हूं. अब कौन हो सकता है? शायद कोई घर आ कर सेवा करना चाहता हो? तो आ जाओ भैया.

हम सरकारी मुलाजिम तो नौकरी में आते ही हैं चौबीसों घंटे रिश्वत लेने के लिए, वरना मुफ्त में क्या पागल कुत्ते ने काट रखा है, जो फाइलों में उलझेउलझे सिर गंजा करा लें.

मैं ने थकने के बाद भी हिम्मत न हारी. दरवाजा खोला, तो पड़ोसन का बेटा सामने नजर आया. सोचा था कि थोड़ा और माल बना लूंगा, लेकिन उसे देखते ही सारा का सारा जोश धरा रह गया.

‘‘कहो बेटे, क्या बात है?’’ मैं ने बेमन से पूछा.

‘‘अंकल, आप के पास टाइम है क्या?’’

कोई बड़ा आदमी होता, तो साफ कह देता कि हम सरकारी लोगों के पास टाइम के सिवा सबकुछ होता है, पर बच्चा था इसलिए कहा, ‘‘हांहां. बेटे कहो, क्या करना है?’’

‘‘मम्मी ने मुझे आप के पास निबंध लिखवाने के लिए भेजा?है,’’ बच्चे की कमर से निकर बारबार यों छूट रही थी, जैसे पाकिस्तान के हाथ से कश्मीर छूट रहा है.

‘‘मुझ से…’’ मैं ने ताज्जुब से कहा.

नकल मार कर तो मैं ने 10वीं पास की थी और पापा के दोस्त की पैरवी से यहां लग गया था, वरना कोई होटल पर बरतन मांजने को भी न रखता… अब यह निबंध, वह तो चाहे अंगरेजी का होता या हिंदी का, उसे क्या पढ़ना और क्या याद करना.

5-7 निबंध फाड़ कर परीक्षा भवन में ले जाते थे और जो आ गया, चिपका दिया. पर शायद समय आने पर आदमी बुद्धिमान भी हो जाता है और पड़ोसी उसे पहचान भी लेते हैं. जैसे आज मेरी पहचान हुई थी. मैं ने अपनी बुद्धिमानी को शाबाशी दी और पड़ोसन के बेटे से कहा, ‘‘आओ बेटे, अंदर आओ. मैं तुम्हें निबंध जरूर लिखवाऊंगा. पर निबंध लिखने की कौन सी जरूरत आ पड़ी, अभी तो परीक्षा भी नजदीक नहीं है?’’

‘‘स्कूल में निबंध प्रतियोगिता है न,’’ बच्चे ने बताया.

‘‘तो किसी अच्छी सी गाइड में से लिख लेते.’’

‘‘मौलिक चाहिए था अंकल. अगर आप लिखवा देंगे, तो मैं पहला इनाम जीत जाऊंगा.’’

‘‘सच,’’ मुझे लगा कि बच्चा मुझे पहचानने में गलती कर रहा है. पर बच्चे मन के सच्चे होते हैं, इसलिए यह गलती नहीं हो सकती थी. मैं खुशी के मारे फूलने लगा, तो मुझे ब्रह्मांड भी फूलने के लिए कम लगा.

पता नहीं क्यों मैं आज तक अपनेआप को ‘अंडरऐस्टीमेट’ करता रहा. मैं ने बच्चे को कुरसी पर बिठाया, ‘‘अच्छा बेटे, तो तुम्हें कौन से विषय पर निबंध लिखना है?’’

‘‘रिश्वत पर,’’ बच्चे ने कहा, तो अब पैंट सरकने की बारी मेरी थी. बच्चे को मेरी पैंट सरकने का पता न चले, इसलिए मैं ने बैठते हुए कहा, ‘‘बेटे, पड़ोस वाले पटवारी अंकल के पास जा कर लिख लेते, तो बहुत अच्छा रहता.’’

‘‘अंकल, वे हरिद्वार गए हैं.’’

‘‘तो सामने वाले ऐक्साइज अंकल के पास लिख लेते?’’

‘‘अंकल, उन की बेटी की शादी है. वे ओवर टाइम कर रहे हैं और कई दिनों से घर नहीं आ रहे हैं.’’

‘‘तो बगल वाले पुलिस अंकल भी तो हैं?’’

‘‘अंकल, उन की ड्यूटी चैक पोस्ट पर है. वे रात को भी घर नहीं आते.’’

‘‘कोई बात नहीं, बेटे. तुम्हें मैं ही निबंध लिखवाऊंगा. ऐसा निबंध कि तुम अव्वल आओगे. पर… तुम्हारे पापा तो गुरुजी हैं न… उन्होंने… चलो… उन्हें ट्यूशन से फुरसत नहीं होगी…’’

‘‘समय तो है, पर वे भी किताबी निबंध ही लिखवा सकते हैं, व्यावहारिक नहीं. मौलिक तो आप ही लिखवा सकते हैं.’’

‘पता नहीं, वे लोग बच्चे पैदा क्यों करते हैं, जिन के पास अपने बच्चों को निबंध लिखवाने के लिए व्यावहारिक ज्ञान नहीं होता? बेकार में मास्टर बने फिरते हैं. जब निबंध लिखवाने की बारी आती है, तो बोलती बंद हो जाती है,’ मैं ने सोचा, फिर उस से कहा, ‘‘तो बेटे, तैयार हो जाओ.’’

‘‘मैं तैयार हूं अंकल,’’ बच्चे ने खुश हो कर कहा.

बच्चे के हां कहने पर स्कूल के दिनों का नालायक एकाएक जानकार हो गया. मैं उसे लिखाने लगा, ‘‘हमारा देश पहले कृषि प्रधान देश था, अब रिश्वत प्रधान देश है. रिश्वत की खेती में हमारा देश दुनियाभर में आगे है. यहां दफ्तर के गेट से ले कर चिमनी तक में रिश्वत ली जाती है. इस देश में पैदा होने से ले कर मरने तक में रिश्वत ली जाती है.

‘‘रिश्वत हमारी संस्कृति की सौगात है. रिश्वत के बिना हमारा जीवन भी अधूरा है और संस्कृति भी.

‘‘रिश्वत हमारी पहचान है. रिश्वत हमारा राष्ट्रीय धर्म है. हम देश के लिए नहीं, रिश्वत के लिए मरते हैं. धन्य हैं वे रिश्वतखोर, जिन्होंने डट कर रिश्वत ली, मगर कभी पकड़े नहीं गए. ऐसे रिश्वतखोर ही दुनिया में हमारे देश का नाम रोशन करते हैं. ‘‘रिश्वत देना और लेना भी एक कला है. जो इस कला में माहिर होते हैं, वे आराम से जिंदगी बिताते हैं. रिश्वत देने और लेने के तमाम तरीके हैं.

‘‘इस दुनिया में हर चीज के फायदे और नुकसान दोनों हैं. मगर रिश्वत देने और लेने के फायदे ही फायदे हैं. रिश्वत लेने वाले के लिए भी मुनाफे का सौदा है और देने वाले के लिए भी.

‘‘रिश्वत ले कर फाइलों में पंख लग जाते हैं और रिश्वत दे कर समय की बहुत बचत होती है. मैं तो कहता हूं कि 5-7 सौ रुपए कीमती समय से ज्यादा कीमती तो नहीं हैं. ‘‘रिश्वत लेना और देना एक नेक काम है. रिश्वत ही पूजा है. रिश्वत हमें नियमकानूनों से नजात दिलाती है. आज जो यह नेक काम नहीं करता, वह निकम्मा है. वह अमीर होने के बाद भी दीनहीन है.

‘‘यह सरकारी कामों में तेजी के लिए एक आजमाया टौनिक है. रिश्वत पाने के बाद सरकारी मुलाजिमों की सुस्ती कोसों दूर भाग जाती है. ‘‘रिश्वत न होती, तो गैरकानूनी काम न होते. रिश्वत न होती, तो चपरासियों के महलमकान न होते. रिश्वत न होती, तो बिकने वाले इनसान न होते.

‘‘रिश्वत पर जितना लिखा जाए, कम है. रिश्वत हमारा तन, मन और धन है. हमारे सारे काम रिश्वत पर ही टिके हैं.

‘‘इस देश में मूल्यों, आदर्शों, नैतिकताओं ने तमाम हमले किए, मगर वे अपना एकछत्र राज्य स्थापित न कर सके. अगर इस देश में किसी का एकछत्र राज्य स्थापित हुआ है, तो वह है रिश्वत का. ‘‘रिश्वत बड़ेबड़ों को उसूलों से गिरा देती है. रिश्वत न्याय को नचा देती है. रिश्वत घरबार बनवा देती है.

‘‘अगर हम देश की चहुंमुखी तरक्की चाहते हैं, तो बस एक ही रास्ता है कि रिश्वत का लेनदेन आसान बनाया जाए…’’

‘‘अंकल, मुझे नींद आ रही है,’’ बच्चे ने बोर होते हुए टोका.

‘‘अच्छा तो आखिर में लिखो… मैं यही प्रार्थना करता हूं कि रिश्वत देने वाले भी सलामत रहें और लेने वाले भी. जय देश, जय रिश्वत.’’

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें