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घर का चिराग: भाग 3- क्या बेटे और बेटी का फर्क समझ पाई नीता

केशव बाबू गंभीर हो गए. पत्नी के प्रति घृणा करते हुए भी उन्होंने सहानुभूतिपूर्ण स्वयं में कहा, ‘‘तुम चिंता मत करो, लड़के के सिर पर अभी प्रेम का भूत सवार है. ऐसे प्रेम में गंभीरता और स्थायित्व नहीं होता. लिवइन रिलेशनशिप बंधनरहित होते हैं, इन में एक न एक दिन खटास अवश्य आती है, चाहे शादी को ले कर, चाहे बच्चों को ले कर या कमाई को ले कर या फिर उन के बीच में कोई तीसरा आ जाता है. जो रिश्ते शारीरिक आकर्षण पर आधारित होते हैं उन की नियति और परिणति यही होती है. जहां परिवार और समाज नहीं होता, वहां उच्छृंखलता और निरंकुशता होती है. देख लेना, एक दिन विप्लव और उस लड़की का रिश्ता टूट जाएगा.’’

‘‘परंतु वह कुछ करताधरता नहीं है. उस का भविष्य चौपट हो जाएगा.’’

‘‘वह तो होना ही है, जिस तरह की परवरिश और संस्कार तुम ने उस को दिए हैं, उस में उस का बिगड़ना आश्चर्यजनक नहीं है. न बिगड़ता तो आश्चर्य होता. अब हम कुछ नहीं कर सकते. ठोकर खा कर अगर वह सुधर गया, तो समझो सुबह का भूला शाम को घर वापस आ गया. वरना…’’

‘‘परंतु उस का खर्चा कहां से चलेगा?’’

‘‘मुझे लगता है, वह लड़की कहीं न कहीं नौकरी अवश्य करती होगी. जब तक उस के मन में विप्लव के लिए प्रेम रहेगा, वह उस का खर्चा उठाती रहेगी. जिस दिन उसे लगा कि विप्लव उस के लिए बोझ है या कोई अन्य लड़का उस के जीवन में आ गया, वह विप्लव को ठोकर मार देगी.’’ नीता रोने लगी. केशव बाबू ने उसे चुप नहीं कराया. कोई फायदा नहीं था. यह नीता की नासमझी का परिणाम था, परंतु विप्लव के पतन के लिए वह अकेली दोषी नहीं थी. इस में विप्लव का भी बहुत बड़ा हाथ था. कोई भी युवक नासमझ नहीं होता कि उसे अपने कर्मों के परिणामों का पता नहीं होता. प्यार उस ने अपनी बुद्धि और विवेक से किया था और उस ने कुछ सोचसमझ कर अपनी प्रेमिका के साथ रहना स्वीकार किया होगा. पढ़ने में वह कमजोर था, तो इस में उस की नालायकी और कामचोरी थी. हम जो कर्म करते हैं, उन के लिए स्वयं जिम्मेदार होते हैं. हम अपनी गलतियों के लिए किसी और को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते.

केशव बाबू के लिए यह चिंता का विषय था कि बेटा बिगड़ गया था, परंतु वे बहुत अधिक परेशान नहीं थे. पत्नी की हठधर्मी और मनमानी में उन का कोई हाथ नहीं था. उन्होंने तो हर कदम पर उसे रोकने और समझाने की कोशिश की, परंतु वह उलटी खोपड़ी की औरत थी. हर सही बात उसे गलत लगती और हर गलत काम अच्छा. उस का दुष्परिणाम एक न एक दिन सब के सामने आना ही था. कहां तो नीता को चिंता थी कि ज्यादा पढ़ाने से बेटी बिगड़ जाएगी, कहां बेटा बिगड़ गया. जिसे वंश आगे बढ़ाना था, खानदान का नाम रोशन करना था, वही घर के सारे चिराग बुझा कर खुद अंधेरे में गुम हो गया था. अनिका के बीटैक का यह अंतिम वर्ष था. एक दिन उस ने पापा को फोन किया, ‘‘पापा, एक खुशखबरी है.’’

‘‘क्या बेटा, बोलो?’’ केशव बाबू ने उल्लास से पूछा.

‘‘पापा, मेरा सेलैक्शन हो गया है,’’ अनिका खुशी से चहक रही थी. केशव बाबू का हृदय खुशी से झूम उठा. शरीर में एक झुरझुरी सी उठी. उन्हें लगा, जैसे तपती दोपहरी में पसीने से तरबतर शरीर के ऊपर किसी ने वर्षा की ठंडी बूंदें टपका दी हों. वे हर्षित होते हुए बोले, ‘‘मुबारक हो बेटा, कहां हुआ है सेलैक्शन? ले किन अभी तो तुम्हारी फाइनल की परीक्षाएं बाकी हैं.’’

‘‘हां, वो तो है, परंतु ये कैंपस सेलैक्शन है. पिछले अंकों के आधार पर हुआ है. परीक्षा के बाद ही नियुक्तिपत्र मिलेगा. परंतु अभी एक शर्त है कि पहली पोस्ंिटग मुंबई में होगी.’’

‘‘तो इस में परेशानी क्या है? तुम होस्टल में रह चुकी हो. मुंबई में भी तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी.’’

‘‘हां, वह तो सही है. बस, मैं यह सोच रही थी कि आप अकेले हो जाएंगे.’’

‘‘नहीं, बेटा, पहले तुम अपने भविष्य की चिंता करो. वैसे भी शादी के बाद तुम हम सब को छोड़ कर चली जाओगी.’’

‘‘नहीं पापा, मैं आप को छोड़ कर कभी नहीं जाऊंगी.’’ केशव बाबू मन ही मन मुसकराए, परंतु आंतरिक खुशी के बावजूद उन की आंखों में आंसू छा गए. अपने को संभाल कर बोले, ‘‘अच्छा ठीक है. तुम अपना खयाल रखना.’’

‘‘ओके पापा.’’

‘‘मम्मी को बताया?’’

‘‘बता दूं, क्या?’’ अनिका ने पूछा.

‘‘बता दे तो अच्छा रहेगा, तुम्हारी मम्मी हैं, अच्छी हैं या बुरी, सदा तुम्हारी मां रहेंगी. वैसे भी आजकल उन के व्यवहार में आश्चर्यजनक परिवर्तन हुआ है. मेरे साथ मीठा व्यवहार करती हैं. बेटे ने उन की आशाओं और अपेक्षाओं पर जो चोट की है, उस से उन का विश्वास डगमगा गया है. उन को अब कहीं कोई सहारा दिखाई नहीं देता.’’

‘‘ठीक है, मैं अभी फोन करती हूं.’’

शाम को जब केशव बाबू घर पहुंचे, तो नीता ने मुसकराते हुए उन का स्वागत किया. यह एक अच्छा संकेत था. केशव बाबू को अच्छा लगा. नीता ने कहा, ‘‘आप को मालूम है न?’’

‘‘क्या?’’ उन्होंने मन की खुशी को दबाते हुए पूछा.

‘‘अनिका की नौकरी लग गई है.’’

‘‘हैं,’’ वे आश्चर्य प्रकट करते हुए मुड़े, ‘‘मुझे तो नहीं मालूम. तुम्हें कैसे पता चला?’’

‘‘अनिका ने स्वयं फोन कर के बताया है. आप को नहीं बताया?’’

‘‘नहीं, चलो, कोई बात नहीं. तुम को बता दिया तो मुझे बता दिया,’’ वे सामान्य दिखने की चेष्टा करते हुए बोले. बहुत दिनों बाद उन के घर में खुशियों ने अपने पंख फैलाए थे. अनिका की परीक्षाएं समाप्त हो गईं. उसे होस्टल खाली करना था. केशव बाबू उसे कार से स्वयं लेने गए थे. नीता भी जाना चाहती थी, परंतु उन्होंने मना कर दिया. लौटते समय रास्ते में केशव बाबू ने अनिका की पसंद की कुछ चीजें खरीदीं, उसे उपहार जो देना था. जानपहचान वालों के लिए मिठाई के डब्बे खरीदे और जब वे घर पहुंचे तो नीता उन्हें दरवाजे पर ही खड़ी मिली. कार के रुकते ही वह बाहर की तरफ लपकी और अनिका के कार से उतरते ही उसे अपने गले से लगा लिया. अनिका भी मां के गले से इस तरह लिपट गई जैसे सालों से उन के ममत्व, प्रेम और स्नेह को तरस रही थी. ‘‘मेरी बेटी, मेरी बेटी.’’ इस के बाद नीता का गला भर आया. उस की आंखों में आंसू उमड़ आए. उसे लग रहा था, जैसे अपनी खोई हुई बेटी को पा लिया हो.

‘‘मम्मी,’’ अनिका के भर्राये हुए गले से निकला.

कई पलों तक मांबेटी एकदूसरे के गले लगी रहीं. केशव बाबू के टोकने पर वे दोनों अलग हुईं. ‘‘सारा प्यार बाहर ही उड़ेल दोगी, या घर के लिए भी बचा कर रखोगी तुम दोनों.’’ नीता ने खिसियानी हंसी के साथ कहा, ‘‘आप को क्या पता, बेटी को इतने दिनों बाद पा कर कैसा लगता है.’’

‘‘सच कह रही हो, मां के दिल को मैं कैसे समझ सकता हूं.’’ अनिका का हाथ पकड़ कर नीता अंदर ले आई, बोली, ‘‘बेटी, मैं ने सदा तेरे साथ बुरा बरताव किया. तुझे पराया समझती रही, आज मुझे अपनी गलती का एहसास हो रहा है. मेरी समझ में नहीं आता कि कैसे एक मां अपनी जायी बेटी के साथ दुर्व्यवहार कर सकती है, उसे एक बोझ समझ सकती है. लगता है, मेरे ही संस्कारों में कोई कमी रह गई थी.’’

‘‘मां, आप कैसी बातें कर रही हैं? मैं ने तो कभी ऐसा नहीं समझा. मां हमेशा अपने बच्चों का भला चाहती है.’’

भावातिरेक में नीता का गला भर आया. कुछ न कह कर उस ने अनिका को अपने अंक में समेट लिया. जिस दिन अनिका अपने प्रथम असाइनमैंट पर मुंबई जा रही थी, उस दिन फिर नीता की आंखों में आंसू भरे थे. उसे अपने अंक में समेटते हुए बोली, ‘‘बेटी, जातेजाते मैं एक बात स्वीकार करती हूं कि जिसे मैं घर का चिराग समझती थी वह जुगनू भी नहीं निकला और मैं जिसे कंकड़ समझ कर ठुकराती रही, वह हीरा निकला. बेटा, तुम्हीं मेरे घर का चिराग हो. आशा करती हूं कि अपने जीवन में कोई ऐसा कदम नहीं उठाओगी, जो हमें, बेटे की तरह दुख दे जाए.’’ अनिका मां का आशय समझ गई. दृढ़स्वर में बोली, ‘‘मम्मी, आप मेरी तरफ से निश्चिंत रहें. अव्वल तो ऐसा कुछ होगा नहीं, परंतु परिस्थितियों के अनुसार मनुष्य भी बदलता रहता है. अगर ऐसा कुछ हुआ तो आप की और पापा की सहमति व स्नेह से ही ऐसा होगा. मैं आप दोनों को कभी दुख नहीं दे सकती. आप पापा का खयाल रखना.’’ केशव बाबू स्वयं को बहुत दृढ़ समझते थे, परंतु बेटी से जुदा होते हुए उन की आंखों में आंसुओं का समंदर लहरा रहा था.

बहन का सुहाग: भाग 1- चंचल रिया की चालाकी

आनंद रंजन अर्बन बैंक में क्लर्क थे. उन की आमदनी ठीकठाक ही थी. घर में सुघड़ पत्नी के अलावा 2 बेटियां और 1 बेटा बस इतना सा ही परिवार था आनंद रंजन का.

गांव में अम्मांबाबूजी बड़े भाई के साथ रहते थे, इसलिए उन की तरफ की जिम्मेदारियों से आनंद मुक्त थे, हां… पर गांव में हर महीने पैसे जरूर भेज दिया करते थे.

वैसे तो आनंद रंजन का किसी के साथ कोई मनमुटाव नहीं था. सब के साथ उन का मृदु स्वभाव उन्हें लोगों के बीच लोकप्रिय बनाए रखता था, चाहे बैंक का काम हो या सामाजिक काम, सब में आगे बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया करते थे वे. साथ ही साथ अपने परिवार को आनंद रंजन पूरा समय भी देते थे. जहां हमारे देश में एक लड़के को ही वंश चलाने के लिए जरूरी माना जाता है और लड़कियों के बजाय लोग लड़कों को वरीयता देते हैं, वहीं आनंद की दोनों बेटियां, बड़ी बेटी निहारिका और छोटी बेटी रिया उन की आंखों का तारा थीं. बड़ी बेटी सीधीसादी और छोटी बेटी रिया थोड़ी चंचल थी.

आनंद रंजन बेटे और बेटियों दोनों को समान रूप से ही प्यार करते थे और यही वजह है कि जब बड़ी बेटी को इंटरमीडिएट की पढ़ाई के बाद आगे की पढ़ाई के लिए लखनऊ जाने की बात आई, तो आनंद रंजन सहर्ष ही बेटी को लखनऊ भेजने के लिए मान गए थे और लखनऊ विश्वविद्यालय में एडमिशन के लिए खुद वे अपनी बेटी निहारिका के साथ कई बार लखनऊ आएगए.

निहारिका को लखनऊ विश्वविद्यालय में एडमिशन मिल गया था और उस के रहने का इंतजाम भी आनंद रंजन ने एक पेइंग गेस्ट के तौर पर करा दिया था.

एक छोटे से कसबे से आई निहारिका एक बड़े शहर में आ कर पढ़ाई कर रही थी. एक नए माहौल, एक नए शहर ने उस की आंखों में और भी उत्साह भर दिया था.

यूनिवर्सिटी में आटोरिकशा ले कर पढ़ने जाना और वहां से आ कर रूममेट्स के साथ में मिलनाजुलना, निहारिका के मन में एक नया आत्मविश्वास जगा रहा था.

वैसे तो यूनिवर्सिटी में रैगिंग पर पूरी तरह से बैन लगा हुआ था, पर फिर भी सीनियर छात्र नए छात्रछात्राओं से चुहलबाजी करने से बाज नहीं आते थे.

‘‘ऐ… हां… तुम… इधर आओ…‘‘ अपनी क्लास के बाहर निकल कर जाते हुए निहारिका के कानों में एक भारी आवाज पड़ी.

एक बार तो निहारिका ने कुछ ध्यान नहीं दिया, पर दोबारा वही आवाज उसे ही टारगेट कर के आई तो निहारिका पलटी. उस ने देखा कि क्लास के बाहर बरामदे में 5-6 लड़कों का एक ग्रुप खड़ा हुआ था. उस में खड़ा एक दाढ़ी वाला लड़का उंगली से निहारिका को पास आने का इशारा कर रहा था.

यह देख निहारिका ऊपर से नीचे तक कांप उठी थी. उस ने यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने से पहले विद्यार्थियों की रैगिंग के बारे में खूब सुन रखा था.

‘तो क्या ये लोग मेरी रैगिंग लेंगे…? क्या कहेंगे मुझ से ये…? मैं क्या कह पाऊंगी इन से…?‘ मन में इसी तरह की बातें सोचते हुए निहारिका उन लड़कों के पास जा पहुंची.

‘‘क्या नाम है तुम्हारा?”

‘‘ज… ज… जी… निहारिका.‘‘

‘‘हां, तो… इधर निहारो ना… इधर… उधर कहां ताक रही हो… जरा हम भी तो जानें कि इस बार कैसेकैसे चेहरे आए हैं बीए प्रथम वर्ष में,‘‘ दाढ़ी वाला लड़का बोला.

हलक तक सूख गया था निहारिका का. उन लड़कों की चुभती नजरें निहारिका के पूरे बदन पर घूम रही थीं. अपनी किताबों को अपने सीने से और कस कर चिपटा लिया था निहारिका ने.

‘‘अरे, तनिक ऊपर भी देखो न, नीचेनीचे ही नजरें गड़ाए रहोगे, तो गरदन में दर्द हो जाएगा,‘‘ उस ग्रुप में से दूसरा लड़का बोला.

निहारिका पत्थर हो गई थी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि इन लड़कों को क्या जवाब दे. निश्चित रूप से इन लड़कों को पढ़ाई से कोई लेनादेना नहीं था. ये तो शोहदे थे जो नई लड़कियों को छेड़ने का काम करते थे.

‘‘अरे क्या बात है… क्यों छेड़ रहे हो… इस अकेली लड़की को भैया,‘‘ एक आवाज ने उन लड़कों को डिस्टर्ब किया और वे सारे लड़के वास्तव में डिस्टर्ब तो हो ही गए थे, क्योंकि राजवीर सिंह अपने दोस्तों के साथ वहां पहुंचा था और उस अकेली लड़की की रैगिंग होता देख उसे बचाने की नीयत से वहां आया था.

‘‘और तुम… जा सकती हो  यहां से… कोई तुम्हें परेशान नहीं करेगा,’’ राजवीर की कड़क आवाज निहारिका के कानों से टकराई थी.

निहारिका ने सिर घुमा कर देखा तो एक लड़का, जिस की आंखें इस समय उन लड़कों को घूर रही थीं, निहारिका तुरंत ही वहां से लंबे कदमों से चल दी थी. जातेजाते उस के कान में उस लड़के की आवाज पड़ी थी, जो उन शोहदों से कह रहा था, ‘‘खबरदार, किसी फ्रेशर को छेड़ा तो ठीक नहीं होगा… ये कल्चर हमारे लिए सही नहीं है.‘‘

निहारिका मन ही मन उस अचानक से मदद के लिए आए लड़के का धन्यवाद कर रही थी और यह भी सोच रही थी कि कितनी मूर्ख है वह, जो उस लड़के को थैंक्स भी नहीं कह पाई… चलो, कोई बात नहीं, दोबारा मिलने पर जरूर कह देगी.

उस को थैंक्स कहने का मौका अगले ही दिन मिल गया, जब निहारिका क्लास खत्म कर के निकल रही थी. तब वही आवाज उस के कानों से टकराई, ‘‘अरे मैडम, आज किसी ने आप को छेड़ा तो नहीं ना.‘‘

देखा तो कल मदद करने वाला लड़का ही अपने दोनों हाथों को नमस्ते की शक्ल में जोड़ कर खड़ा हुआ था और निहारिका की आंखों में देख कर मुसकराए जा रहा था.

‘‘ज… जी, नहीं… पर कल जो आप ने मेरी मदद की, उस का बहुत शुक्रिया.‘‘

‘‘शुक्रिया की कोई बात नहीं… आगे से अगर आप को कोई भी मदद चाहिए हो तो आप मुझे तुरंत ही याद कर सकती हैं… ये मेरा कार्ड है… इस पर मेरा फोन नंबर भी है,‘‘ एक सुनहरा कार्ड आगे बढाते हुए उस लड़के ने कहा.

कार्ड पर नजर डालते हुए निहारिका ने देखा, ‘राजवीर सिंह, बीए तृतीय वर्ष.’

राजवीर एक राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखता था और उस ने एडमिशन तो विश्वविद्यालय में ले रखा था, पर उस का उद्देश्य प्रदेश की राजनीति तक पहुंचने का था और इसीलिए पढ़ाई के साथ ही उस ने छात्रसंघ के अध्यक्ष पद के लिए तैयारी शुरू कर दी थी.

निहारिका इतना तो समझ गई थी कि पढ़ाई संबंधी कामों में यह लड़का भले काम न आए, पर विश्वविद्यालय में एक पहचान बनाने के लिए इस का साथ अगर मिल जाए तो कोई बुराई  भी नहीं है.

तय समय पर विश्वविद्यालय में चुनाव हुए, जिस में राजवीर सिंह की भारी मतों से जीत हुई और अब वह कैंपस में जम कर नेतागीरी करने लगा.

पर, राजवीर सिंह के अंदर नेता के साथसाथ एक युवा का दिल भी धड़कता था और उस युवा दिल को निहारिका पहली ही नजर में अच्छी लग गई थी. निहारिका जैसी सीधीसादी और प्रतिभाशाली लड़की जैसी ही जीवनसंगिनी की कल्पना की थी राजवीर ने.

और इसीलिए वह मौका देखते ही निहारिका के आगेपीछे डोलता रहता. अब निहारिका को आटोरिकशा की जरूरत नहीं पड़ती. वह खुद ही अपनी फौर्चूनर गाड़ी निहारिका के पास खड़ी कर उसे घर तक छोड़ने का आग्रह करता और निहारिका उस का विनम्र आग्रह टाल नहीं पाती.

किसकी मां, किसका बाप: ससुराल में कैसे हुआ वरुण का स्वागत ?

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किसकी मां, किसका बाप – भाग 3 : ससुराल में कैसे हुआ वरुण का स्वागत ?

निराशा से भरे कटु स्वर में वरुण ने कहा, ‘‘वह तो स्पष्ट है. चलो कोई बात नहीं. कुछ और पसंद कर लो.’’

निशा को वरुण की निराशा का एहसास हुआ था, पर मां के कानून से बंधी थी. सोच कर बोली, ‘‘कोई परफ्यूम ले लेती हूं. कपड़े तो बहुत हैं और फिर रोज कुछ न कुछ बन ही रहा है.’’

‘‘कौन सा लोगी?’’ वरुण ने कहा, ‘‘कल मैं ने टीवी पर एक नए परफ्यूम का विज्ञापन देखा था. नाम जोरदार था और जिन लड़कियों ने लगाया था उन के आसपास खड़े 6 से 60 वर्ष तक के जवान हवा में सूघंते हुए उड़ रहे थे.’’

‘‘सच?’’ निशा ने व्यग्ंयभरी हंसी से कहा, ‘‘बड़ा खतरनाक था तब तो. क्या नाम था?’’

‘‘अरब की लैला,’’ वरुण मुसकराया, ‘‘चलो देखते हैं. शायद मिल जाए.’’

एक बड़ी दुकान पर यह परफ्यूम मिल भी गया. पूरे 500 रुपए की शीशी थी. वरुण ने सोचा, कोई बात नहीं, 1,750 रुपए से तो कम की है. वरुण ने नमूने के तौर पर निशा की गरदन के थोड़ा नीचे एक फुहार डाली. बड़ी मतवाली सुगंध थी.

अंदर गहरी सांस खींचते हुए निशा ने कहा, ‘‘यहां नहीं, मजनुओं का जमघट लग जाएगा.’’

वरुण ने कटाक्ष किया, ‘‘मेरे सासससुर के सामने मत लगाना. तुम्हारे घर की छत जरा नीची है.’’

निशा ने कृत्रिम क्रोध से कहा, ‘‘जरा भी शर्म नहीं आती आप को. मांबाप का सम्मान करना चाहिए.’’

वरुण के दिल पर चोट लगी. अभी से इतना तीखा बोलती है तो आगे क्या होगा? एकाएक गंभीर हो गया और चुप भी. निशा ने महसूस किया पर उस की गलती क्या थी? यह बात भी मन में आई कि इस आदमी से अब तक 3-4 बार झगड़ा सा हो

चुका है. क्या जीवनभर ऐसे ही झगड़ता रहेगा? यों तो घर में भी मांबाप के बीच कुछ न कुछ तूतूमैंमैं होती रहती है, पर अपने जीवन में ऐसी कल्पना नहीं कर पा रही थी.

कुछ देर बाद वरुण ने ही मौन तोड़ा, ‘‘तुम गुफा में गई हो?’’

‘‘गुफा?’’ निशा ने आश्चर्य से उत्तर दिया, ‘‘नहीं, अभी तक तो नहीं गई. अजंता, एलोरा जातेजाते रह गए हम लोग. भारी वर्षा के कारण पुणे से ही लौट आए. अब आप के साथ चलूंगी.’’

वरुण ने गहरी सांस ली, ‘‘तुम्हारे सामान्य ज्ञान पर बड़ा तरस आता है. यह देखो, ऊपर इतना बड़बड़ा क्या लिखा है?’’

निशा ने सिर उठा कर देखा. जिस रेस्तरां के सामने खड़ी थी उस का नाम था ‘गुफा’

झेंपते हुए बोली, ‘‘होटलों में कहां जाते हैं हम लोग. मां को बिलकुल पसंद नहीं है.’’

‘‘मां…’’ वरुण के मुंह से कटु शब्द निकलने ही वाला था, पर तुरंत होंठ सी लिए.

निशा ने घूर कर देखा, पर वरुण दरवाजा खोल कर अंदर जा रहा था. जल्दी से पीछे हो ली. वेटर ने एक खाली मेज की तरफ इशारा किया. बैठते ही वेटर ने पानी के गिलास रखे और मैन्यू कार्ड सामने रख दिया. आदेश की प्रतीक्षा में खड़ा हो गया.

‘‘क्या लोगी?’’ वरुण ने पूछा.

‘‘जो आप चाहें,’’ निशा ने संकोच से मैन्यू कार्ड पर निगाह डालते हुए कहा, ‘‘मेरी समझ में तो कुछ नहीं आता.’’

व्यंग्य से वरुण ने कहा, ‘‘तुम्हारी शिक्षा अधूरी है. काफीकुछ सिखाना पड़ेगा. मां ने यही नहीं सिखाया.’’

कोई कड़वी बात न कह दे, इसलिए निशा ने होंठ दांतों से दबा लिया. इस पुरुष के साथ तो मस्ती का माहौल ही नहीं बनता. इतना पढ़ीलिखी है, पर उस की दृष्टि में बस गंवार ही है. वह भी तो बातबात में मांमां करती है.

मैन्यू कार्ड पर नजरें दौड़ाते हुए वरुण ने आश्चर्य से कहा, ‘‘अरे, यहां तो कढ़ी भी मिलती है.’’

‘‘कढ़ी?’’ निशा ने प्रश्न सा किया.

‘‘क्यों, नाम नहीं सुना कढ़ी का?’’ वरुण ने कहा, ‘‘मुझे बहुत अच्छी लगती है. तुम्हें बनानी आती है?’’

‘‘थोड़ाबहुत,’’ निशा के स्वर में अनिश्ंिचतता थी.

‘‘क्या मतलब?’’ वरुण ने कहा, ‘‘अरे, या तो बनाना आता है या नहीं.’’

निशा ने पूरी गंभीरता से कहा, ‘‘मां नहीं बनातीं. कहती हैं कि कढ़ी खाने से पेट में दर्द होता है. वैसे भी गरमी में तो बेसन की बनी कोई चीज नहीं खानी चाहिए. इसीलिए हमारे यहां कढ़ी नहीं बनती.’’

‘‘ऐसा सोचना है तुम्हारी मां का?’’ वरुण ने कटु व्यंग्य से पूछा, ‘‘और अगर मैं चाहूं कि कढ़ी बने तो क्या मां बनाएंगी?’’

‘‘पता नहीं,’’ निशा ने सरलता से सचाई सामने रख दी और कंधे हिला दिए.

‘‘मेरी पसंदीदा चीजों की सूची भी लंबी हो सकती है, जो मां को पसंद नहीं?’’ वरुण ने मुंह बनाते हुए कहा, ‘‘मैं ने तो सुना है कि ससुराल में दामाद की बड़ी खातिर होती है?’’

वरुण ने जिद में आ कर कढ़ी तो मंगाई ही, साथ ही वह कुछ और भी मंगाया जिसे खाना शायद निशा को अच्छा नहीं लगा. निशा ने साथ तो दिया पर यह भी जाना कि खाने के मामलों में भी वे दोनों उत्तरदक्षिण की तरह थे.

‘‘और कुछ नहीं खाओगी?’’ वरुण ने पूछा, ‘‘तुम ने तो कुछ खाया ही नहीं?’’

‘‘इतना ही खाती हूं,’’ निशा ने हंसने का असफल प्रयत्न किया, ‘‘शादी से पहले शरीर का ध्यान रखना है न.’’

‘‘और शादी के बाद?’’ वरुण ने कटुता से पूछा.

‘‘शादी के बाद बेफिक्री,’’ निशा मुसकराई.

‘‘यह भी तुम्हारी मां ने कहा होगा,’’ वरुण ने पूछा.

निशा की मुसकराहट गायब हो गई, ‘‘हर बात में आप मां को क्यों ले आते हैं?’’

‘‘मैं ले आता हूं?’’ वरुण ने कड़वाहट से कहा, ‘‘या तुम ले आती हो?’’

निशा ने वरुण के चेहरे को देखा और चुप हो गई.

घर के सामने निशा को छोड़ कर वरुण जैसे ही जाने लगा, निशा ने पूछा, ‘‘अंदर नहीं आएंगे? मां को बुरा लगेगा और मेरे ऊपर गुस्सा भी होंगी.’’

‘‘आज नहीं,’’ वरुण ने रूखेपन से कहा, ‘‘मेरी ओर से मां से क्षमा मांग लेना.’’

‘‘फिर कब आएंगे?’’

‘‘पता नहीं, पिताजी से पूछ कर बताऊंगा,’’ वरुण ने कहा और तेज कदम बढ़ाता हुआ आंखों से ओझल

हो गया.

‘पिताजी से पूछ कर बताऊंगा,’ निशा ने समझ लिया कि शादी के सिलसिले में मांबाप जितने महत्त्वपूर्ण होते हैं, उतने ही महत्त्वहीन भी होते हैं. क्या विडंबना है. अगले 10-12 दिनों तक कोई संपर्क न होने से निशा और परिवार वालों को चिंता होने लगी. होने वाले दामाद का शादी से पहले आनाजाना बना रहे तो सब निश्चिंत रहते हैं. बस, बेटी का जाना संदेह के दायरे में घिरा होता है. शादी होने तक मानसम्मान बना रहे, बाद में तो कोई बात नहीं. निशा के दिल में तो विशेषकर एक खटका सा लगा रहा. कहीं वरुण नाराज तो नहीं हो गया?

अंत में चिंतामुक्त होने के लिए वरुण को दावतनामा भेज दिया. वरुण ने कई बहाने बेमन से बनाए, पर फिर राजी हो गया. आखिर उसे भी तो निशा से मिलने की उतनी ही बेकरारी थी.

दोपहर के भोजन के बाद वरुण ने निशा से घूमने चलने को कहा.

‘‘मां से पूछ कर आती हूं,’’ निशा ने मुड़ते हुए कहा.

‘‘और अगर मना कर दिया?’’

‘‘हो भी सकता है.’’

मां ने मुंह तो बनाया पर जल्दी लौट आने की चेतावनी भी दे दी. बोली तो अंदर थी, पर इस तरह कि वरुण के कान में पड़ जाए. वरुण के माथे पर लकीरें पड़ गईं.

काफी देर तक दोनों सड़क पर पैदल चलते रहे. कोई बातचीत नहीं, लगभग एक शीतयुद्ध सा.

निशा ने ही मौन तोड़ा, ‘‘इतने दिनों तक आए क्यों नहीं? सब को चिंता हो रही थी.’’

मानो इसी प्रश्न की प्रतीक्षा में था. वरुण ने शीघ्रता से उत्तर दिया, ‘‘पिताजी से पूछा नहीं था.’’

उत्तर का अभिप्राय समझते हुए भी निशा ने प्रश्न किया, ‘‘क्यों नहीं पूछा? इतना डरते हैं आप?’’

‘‘हां,’’ वरुण ने एकएक शब्द पर जोर देते हुए कहा, ‘‘और तुम्हें भी डरना पड़ेगा.’’

‘‘जिन से लोग डरते हैं,’’ निशा ने कहा, ‘‘उन का सम्मान भी नहीं करते.’’

‘‘ओह,’’ वरुण ने तीखेपन से कहा, ‘‘तो तुम मेरे पिताजी का सम्मान नहीं करोगी?’’

‘‘ऐसा तो मैं ने नहीं कहा.’’

‘‘बात एक ही है.’’

‘‘क्या हर बात का गलत अर्थ निकालना आप की आदत है?’’

‘‘अपनीअपनी समझ है,’’ वरुण ने आते आटोरिकशा को रोकते हुए कहा.

निशा ने पूछा, ‘‘कहां जाना है?’’

‘‘जहां चलो,’’ वरुण ने हंस कर कहा, ‘‘वैसे तो चांद पर जाने की तमन्ना है.’’

‘‘सुना है चांद की सतह में बहुत गहरे खड्डे हैं,’’ निशा ने अर्थभरी मुसकान से कहा.

‘‘हां, हैं तो,’’ वरुण ने उत्तर दिया, ‘‘पर दिल्ली की सड़कों से कम.’’ और तभी एक गढ्डा सामने आने से आटोरिकशा उछल पड़ा और निशा वरुण के ऊपर जा गिरी. जब गति सामान्य हुई तो निशा ने अपने को संभाला, और फिर हंस पड़ी, ‘‘क्या गढ्डा है.’’

‘‘हां,’’ वरुण भी मुसकराया, ‘‘गढ्डे भी कभीकभी एकदूसरे को मिला देते हैं.’’

‘‘विशेषकर,’’ निशा ने अर्थपूर्ण मुसकराहट से कहा, ‘‘तब जबकि ये गढ्डे मांबाप ने न खोदे हों.’’

मीठे व्यंग्य से वरुण ने पूछा, ‘‘इतनी अच्छी शिक्षा तुम्हें किस ने दी?’’

‘‘मां ने,’’ निशा ने तत्परता से कहा और पूछा, ‘‘आप को गढ्डे में गिरने के बारे किस ने बताया?’’

‘‘पिताजी ने,’’ वरुण ने उसी तत्परता से उत्तर दिया, ‘‘कहते हैं कि शादी एक गढ्डा है.’’

फिर एकदूसरे को देख कर दोनों खुल कर हंसने लगे.

सुना है कि इस के बाद दोनों ने कभी भी अपनेअपने मांबाप की चर्चा नहीं की और सारा जीवन हंसी खुशी से बिताया.

मैली लाल डोरी – भाग 3 : दास्तान अपर्णा की

‘‘आज आप के तथाकथित गुरुजी कहां गए. आप की देखभाल करने क्यों नहीं आए वे. जिन के कारण आप ने अपनी बसीबसाई गृहस्थी में आग लगा दी. आज उन्होंने अपनी करामात क्यों नहीं दिखाई? मुझ से क्या चाहते हैं आप. क्यों मुझे फोन किया गया था?’’ अपर्णा आवेश से भरे स्वर में बोली. तभी देवर अरुण आ गया. उस ने जो बताया, उसे सुन कर अपर्णा दंग रह गई.

‘‘आप के जाने के बाद भैया एकदम निरंकुश हो गए. गुरुजी के आश्रम में कईकई दिन पड़े रहते. घर पर ताला रहता और भैया गुरुजी के आश्रम में. गुरुजी के साथ ही दौरों पर जाते. गुरुजी के आश्रम में सेविकाएं

भी आती थीं. गुरुजी सेविकाओं से हर प्रकार की सेवा करवाते थे. कई बार गुरुजी के कहने पर भैया ने भी अपनी सेवा करवाई. बस, उसी समय कोई इन्हें तोहफे में एड्स दे गई. गुरुजी और उन के आश्रम के लोगों को जैसे ही भैया की बीमारी के बारे में पता चला, उन्होंने इन्हें आश्रम से बाहर कर दिया. और आज 3 साल से कोई खैरखबर भी नहीं ली है.’’

अपर्णा मुंह खोले सब सुन रही थी. उस ने नितिन की ओर देखा तो उस ने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए मानो अब तक की सारी काली करतूतों को एक माफी में धो देना चाहता हो.

अपर्णा कुछ देर सोचती रही, फिर नितिन की ओर घूम कर बोली, ‘‘नितिन, मेरातुम्हारा संबंध कागजी तौर पर भले ही न खत्म हुआ हो पर दिल के रिश्ते से बड़ा कोई रिश्ता नहीं होता. जब मेरे दिल में ही तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है, तो कागज क्या करेगा? जहां तक माफी का सवाल है, माफी तो उस से मांगी जाती है जिस ने कोई गुनाह किया हो. तुम ने आज तक जो कुछ भी मेरे साथ किया, उसे भुलाना तो मुश्किल है, पर हां, माफ करने की कोशिश करूंगी. पर अब तुम मुझ से कोई उम्मीद मत रखना.

मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकती. हां, इंसानियत के नाते तुम्हारी बीमारी के इलाज में जो पैसा लगेगा, मैं देने को तैयार हूं. बस, अब और मुझे कुछ नहीं कहना. मैं तुम्हें सारे बंधनों से मुक्त कर के जा रही हूं,’’ यह कह कर मैं ने पर्स में से एक छोटा पैकेट, वह मैली लाल डोरी निकाल कर नितिन के तकिए पर रख दी, ‘‘लो अपनी अमानत, अपने पास रखो.’’

यह कह कर अपर्णा तेजी से कमरे से बाहर निकल गई. नितिन टकटकी लगाए उसे जाते देखता रहा.

 

सुबह का भूला – भाग 3 : आखिर क्यों घर से दूर होना चाहते थे मोहन और रोली

लिहाजा, अब मोहन ने अपने गांव जाना ही छोड़ दिया था, ताकि लोगों को उसे जवाब न देना पड़े. लेकिन अभी भी उसे एक उम्मीद थी कि उस की रोली उस के पास जरूर आएगी, क्योंकि वह उस से प्यार जो बहुत करता था.

मगर एहसानफरामोश रोली ने तो रितेश की दी गई सुखसुविधा में मोहन को ही भुला दिया. वह मजे से रितेश के साथ उस के बढि़या से 2 कमरे के घर में रहने लगी, जहां पलंग, सोफा, बड़ा सा टैलीविजन और क्याक्या नहीं था.

एक बार रितेश उसे हवाईजहाज से मुंबई भी घुमाने ले गया था, जहां हीरोहीरोइन के बड़ेबड़े घर देख कर रोली की आंखें चौंधिया गई थीं. उस के शरीर के बदले रितेश उसे काफीकुछ दे भी रहा था.

मगर जब रितेश रोली की छोटी जाति को ले कर तंज कसता तो रोली का दिमाग गरम हो जाता था. एक बार तो अपने एक दोस्त के सामने ही रितेश ने बोल दिया कि यह तो छोटी जाति की औरत है, फिर दोनों ठहाके लगा कर हंस पड़े थे.

उस दिन रोली का दिमाग ऐसा गरमाया कि मन किया कि उन दोनों के मुंह पर गरम चाय फेंक दे और कहा कि फिर क्यों आते हो मेरे पास अपनी भूख शांत करने? जाओ न कोई ऊंची जाति की औरत के पास? लेकिन वह चुप रही.

एक दिन जब शराब के नशे में रितेश रोली के करीब आया तो वह उसे परे धकेलते हुए बोली, ‘‘आज मेरा मन नहीं है.’’

‘‘मन नहीं है… साड़ी, कपड़ा और पैसे लेते समय तो नहीं कहती कि मन नहीं है…’’ उसे अपनी तरफ खींचते हुए रितेश बोला.

 

‘‘देखो, मुझे छोड़ दो, नहीं तो मैं चिल्लाऊंगी और कहूंगी कि तुम मेरा रेप करने की कोशिश कर रहे हो,’’ अपना आंचल रितेश की पकड़ से छुड़ाते हुए रोली बोली.

‘‘चिल्लाएगी? तो चिल्ला. देखता हूं कि कौन सुनता है तुम्हारी बात…’’ शराब की पूरी बोतल एक बार में ही गटकते हुए रितेश रोली पर झपटा, लेकिन वह पीछे खिसक गई, तो वह नीचे गिर पड़ा.

अब रोली से रितेश के ताने बरदाश्त के बाहर थे और सच बात तो यह थी कि उस ने इस हैवान को पहचानने में ही गलती कर दी थी. जरा से सुख की खातिर वह एक सच्चेसरल इनसान को धोखा दे कर इस राक्षस के पास रहने आ गई.

लेकिन अब नहीं. ताकत बटोर कर रितेश फिर उठा ही था कि रोली ने उस के मुंह में शराब से भरी बोतल घुसेड़ दी और तब तक पिलाती रही, जब तक कि उस की सांस नहीं रुक गई. फिर उसे घसीटते हुए ले जा कर एक नाले में फेंक आई.

पुलिस और लोग तो यही समझेंगे न कि ज्यादा शराब पीने से मर गया डूब कर. वैसे भी लोग शराब पीपी कर मर रहे हैं, अंधे हो रहे हैं, तो एक यह भी सही. चलो, जान तो छूटी रोली की इस से.लेकिन अब वह जाएगी कहां? कौन है यहां अब उस का सिवा मोहन के. लेकिन क्या वह अब उसे अपनाएगा? माफ करेगा उसे? उसे तो अपने रंगरूप का इतना घमंड था कि कभी उस ने मोहन को अपने आगे कुछ समझा ही नहीं. अपने मन में ही सोचतेसोचते रोली वहीं पहुंच गई जहां वह अपने मोहन के साथ रहती थी.

कुछ पल तक रोली वहीं दरवाजे के बाहर ही खड़ी रही. उस के मन में डर और हलचल मची थी कि पता नहीं मोहन उसे देख कर क्या कहेगा? कहीं वह उसे धक्के मार कर बाहर न निकाल दे? फिर कहां जाएगी वह?

‘नहींनहीं, मैं उस के पैरों में गिर पड़ूंगी. रोऊंगी, गिड़गिड़ऊंगी, कहूंगी

कि मारेपीटे जो करे, लेकिन मुझे एक कोना दे दे रहने के लिए अपने घर में. लेकिन अगर फिर भी उस का दिल नहीं पसीजा तो…’

एक मन कहता रोली का कि मोहन कभी भी उसे माफ नहीं करेगा और दूसरा मन कहता, ‘क्यों नहीं माफ करेगा? वह अपनी रोली को अब भी बहुत प्यार करता है. सुबह का भूला अगर शाम को घर वापस लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते. और रोली तो अब भी मोहन की ब्याहता है, तो हक है उस का इस घर पर…’

आखिरकार रोली दरवाजा ठेल कर घर के अंदर चली गई. लेकिन मोहन घर पर नहीं था. आज उस ने अपने मोहन की दी गुलाबी साड़ी पर वही मैचिंग गुलाबी मोतियों की माला पहन रखी थी. सजसंवर कर वह दरवाजे पर खड़ी अपने मोहन का इंतजार कर रही थी.

घर लौटे मोहन ने अपने सामने जब रोली को देखा तो पहले तो उसे अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हुआ, लेकिन फिर यह कह कर उस ने अपना मुंह फेर लिया कि अब क्यों आई है यहां?

लेकिन रोली आंसुओं का सैलाब बहाते हुए उस के कदमों पर गिर पड़ी और कहने लगी, ‘‘मुझे माफ कर दो. मुझ से बड़ी भूल गई. उस इनसान ने मुझे बरगला दिया था. तुम्हारे खिलाफ भड़का दिया था. लेकिन अब मुझे अपनी भूल का एहसास हो चुका है.

‘‘मेरा अपराध माफी के लायक नहीं है, इसलिए अब मेरा मर जाना ही बेहतर है,’’ कह कर वह जाने ही लगी थी कि मोहन ने उसे रोक लिया और उसे अपने सीने से लगा कर बिलख पड़ा.

रोली भी मोहन के सीने से लग कर फफक पड़ी. आज सच में उसे अपनी गलती का एहसास हो रहा था और मोहन ने भी दिल से उसे माफ कर दिया था.

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