⚲

सावधान! मूर्खता है धर्मगुरु बनाना और सत्संग में जाना

लंबेचौड़े और ऊंचे मंच पर हजारों की भीड़ के सामने रेशमी गेरुआ वस्त्र धारण किए, रुद्राक्ष, मोती व चंदन की माला पहने, गुलाब के फूलों से महकते सिंहासन पर बैठ, सुंदर रूपसी बालाओं से घिरे हुए धर्मगुरु का देश की गरीबी पर कंरदन करते हुए यह कहना कि संसार मिथ्या है, घरपरिवार माया है, धन की इच्छा लोभ है, मोहमाया के बंधन से मुक्त हो जाओ…और फिर प्रवचन समाप्त कर के उन का अपने भक्तों की भीड़ के बीच से हो कर गुजरना, भक्तों का उन्हें देख कर जयकारा लगाना…इस धर्मगुरु के पैर छूने में एकदूसरे को कुचल डालने की होड़ और अंत में अपनी चमचमाती लग्जरी गाडि़यों के बेड़े से स्टैंडर्ड बढ़ाते चेलों की लंबी लाइन के साथ अपने आलीशान पांचसितारा सुविधाओं वाले आश्रम की तरफ प्रस्थान कर जाने का यह दृश्य किसी फिल्म का नहीं बल्कि किसी भी धर्मगुरु के सत्संग में होने वाली फुजूलखर्ची का नजारा है.

धर्मगुरु बनाने का यह चलन कोई नया नहीं, बल्कि बहुत पुराना है. समाज में इस तरह का प्रचार कर दिया गया है कि भगवान से बड़ा ‘गुरु’ है और लोग भी भगवान को भूल कर गुरु की शरण में आ रहे हैं. शिष्य आजकल गुरुओं की पूजा करने लगे हैं.

इस तरह के प्रचार के चलते ही धर्मभीरु जनता भयभीत हो गुरु को ढूंढ़ती है और गुरु मिल जाने पर उस के द्वारा गुरुमंत्र दिया जाता है, जिस के बदले दीक्षा लेने वाले को मोटी दक्षिणा गुप्त दान के रूप में देनी होती है. इन तथाकथित गुरुओं द्वारा बताया जाता है कि जो जितनी अधिक दक्षिणा देगा उसे उतना ही अधिक लाभ होगा. दक्षिणा के साथ फल का संबंध एक प्रकार का व्यावसायिक संबंध ही है और इस के बाद तो यह सिलसिला जीवन भर चलता रहता है.

हिंदू धर्मग्रंथों में गुरु की महिमा का बढ़चढ़ कर बखान किया गया है. भक्तिकाल के कवियों ने तो जम कर गुरु को महिमामंडित किया है. गुरु के बारे में कई उक्तियां प्रसिद्ध हैं, जैसे :

गुरुर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुगुरूर्देवो महेश्वर:।

गुरु: साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरुवे नम:॥

-स्कंदपुराण, गुरुगीता

(अर्थात गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु महेश्वर है, गुरु ही परब्रह्म है, उस गुरु के लिए नमस्कार.)

गुरु बिन पंथ न पावै कोई।

केतिकौ ज्ञानी ध्यानी होई॥

-नूरमुहम्मद अनुराग बांसुरी, पृ. 33

पहले धार्मिक गुरु ब्राह्मण होते थे और इन्हीं ब्राह्मणों ने धर्म के मुख्य उद्देश्य नैतिकता को ताक पर रख कर दूसरे उद्देश्यों पर पूरा जोर दिया. ब्राह्मणों ने अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए आत्मापरमात्मा, स्वर्गनरक, जन्ममरण की भूलभुलैया भरे सिद्धांतों के जाल में समाज को फंसा कर उस का खूब शोषण किया.

शोषण का साधन यज्ञ को बनाया. यज्ञ को ले कर धर्मग्रंथों में इस का गुणगान भरा पड़ा है. अथर्ववेद की घोषणा है :

‘अयं यज्ञो भुवनस्य नाभि’

(अर्थात विश्व की उत्पत्ति का स्थान यह यज्ञ है.)

गीता का उद्घोष है :

‘यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्रे लोकोऽयं कर्म बन्धन:’

(अर्थात यज्ञ के लिए जो कर्म किए जाते हैं, उन के अतिरिक्त अन्य कर्मों से यह लोक बंधा है.)

इसी में आगे कहा गया है :

‘नायं लोकोऽस्त्य यज्ञस्य कुतोऽन्य: कुरूसतम’

(अर्थात यज्ञ करने वाले को जब इस लोक में ही कोई सफलता नहीं मिलती तब उसे परलोक कहां मिलेगा.)

राजामहाराजा राजसूर्य या कहें अश्वमेध यज्ञ करते थे, जिन में हजारों ब्राह्मणों को धनदौलत, वस्त्र, दासदासी, घोड़े, रथ आदि दानस्वरूप दिए जाते थे क्योंकि यह यज्ञ पूरे ही तब होते थे जब उन्हें भरपूर दानदक्षिणा मिल जाती थी. यह यज्ञ पूरे साल चलते रहते थे. हां, इन के नाम व उद्देश्य जरूर बदले होते थे पर राजाओं को प्रतिदिन दान करना होता था और तलवार के बल पर जमा की गई धनदौलत से भरे खजाने खाली हो कर ब्राह्मणों के घर चले जाते थे. राजाओं को अश्वमेध यज्ञ के फलस्वरूप इस जन्म में कीर्ति तथा अगले जन्म में पुन: राजा बनने का झूठा आश्वासन मिलता था और ब्राह्मणों के घर ठगी के धन से भर जाते थे. इस दान के प्रमाण ऋग्वेद में मिलते हैं.

‘‘हे अग्ने, देवभक्त के पौत्र पिजवन के पुत्र सुदास ने 200 गाएं, बधुओं सहित 2 रथ दान किए. इस दान की प्रशंसा करते हुए मैं योग्य होता यज्ञ गृह में जाता हूं.’’

-ऋग्वेद 7-18-22.

धर्म के धंधे में पैसा है इसलिए देश में ऐसे निकम्मे लोगों की एक बड़ी फौज खड़ी हो गई है. साधुसंत नामधारी ये जीव गृहत्याग का बहाना बना कर घुमक्कड़ जीवन अपना, एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते हैं. इन सभी का उद्देश्य एक ही होता है कि जीविका के लिए कर्म न करना पड़े और चढ़ावे व भिक्षा के द्वारा ही जीवन निर्वाह होता रहे, यानी धर्म की आड़ में बिना हाथपांव हिलाए पेट भरना, जबकि हकीकत में धर्मकर्म से वे कोसों दूर रहते हैं और इन में बहुत से दुर्व्यसनों व दुराचारों में लीन रहते हैं.

धर्मगुरुओं में आज आपस में ही होड़ मची हुई है कि किस के चेले ज्यादा हैं, कौन छोटा कौन बड़ा है. कौन ज्यादा भीड़ जुटा पाता है और किस के कितने अमीर शिष्य हैं. ये तथाकथित गुरु दुनिया के बैरभाव कहां दूर करेंगे, खुद इन के अपने मठ में ही गद्दी हथियाने की लड़ाइयां चलती रहती हैं, मारकाट मची रहती है.

मठों, आश्रमों में अपार धन आता है. गुरुशिष्य के बीच इस को ले कर लड़ाईझगड़े शुरू हो जाते हैं. इस में सब से ज्यादा चालाक और ताकतवर शिष्य गुरु की गद्दी पर विराजमान होता है. इस का एक ताजा उदाहरण बाबा रामदेव है जो पतंजलि योग पीठ के संस्थापक शंकरदेव को पीछे धकेल कर खुद गद्दी पर बैठ गया.

प्रवचनों का हाईटेक रूप

जिस भी धार्मिक गुरु का प्रवचन जिस शहर में होना होता है वहां उन के शिष्य कई दिन पहले पहुंच कर अपने गुरु की महिमा का बखान शुरू कर उन के नाम के परचे बांटते हैं, बड़ेबड़े होर्डिंग शहर भर के चौराहों पर लगते हैं. अपने गुरु का प्रचार कर बड़ी संख्या में भीड़ जुटाने का काम ये चेले ही करते हैं.

बड़े घरों की महिलाएं सजसंवर कर प्रवचन का लाभ लेने सब से आगे बैठने की होड़ में लगी रहती हैं. अब यह बात अलग है कि उन का मकसद प्रवचन नहीं, वीडियो रिकार्डिंग होती है क्योंकि प्रवचन के वीडियो कैसेट साल भर दिखाए जाते हैं.

चूंकि समय के साथसाथ धर्म का व्यापार भी आधुनिक करवट ले रहा है इसलिए धर्म के क्षेत्र में भी इलेक्ट्रोनिक समावेश अपनी पहचान बना चुका है हिंदुओं की धर्मांधता को भुनाने के लिए कई धार्मिक चैनल आ गए हैं. जैसे, श्रद्धा, संस्कार, आस्था आदि. बाकी के लोकप्रिय चैनल भी दिन में कुछ घंटे प्रवचन जरूर दिखाते हैं.

आम जनता के बीच बड़े पंडाल में जब ये धार्मिक गुरु प्रवचन करते हैं तो उसे प्रवचन कहते हैं और जब वातानुकूलित सभागार में बैठ कर बोलते हैं तो वह आध्यात्मिक उपदेश में तबदील हो जाता है. इन का लक्ष्य विदेशों में रह रहे प्रवासी भारतीय भी हैं. ये प्रवासी भारतीय जम कर दानदक्षिणा देते हैं. धर्म के नाम पर ये गुरु और चैनल वाले दोनों ही जनता की जेब काट रहे हैं.

प्रवचन बिजनेस के ब्रांड नाम का काम

आसाराम बापू, मोरारी बापू, सुधांशु महाराज तो अब प्रवचन बिजनेस के ब्रांड नाम बन चुके हैं. इन के नाम पर लोग अपना सारा कामधंधा छोड़ कर इन का प्रवचन सुनने पहुंचते हैं. इन के प्रवचन का नशा किसी अफीम से कम नहीं है इसीलिए धर्म के नाम पर इन संतों के शिविर हर शहर में लगाए जाते हैं.

इन भव्य पंडालों को लगाने में लाखों रुपए खर्च होते हैं. भक्तों द्वारा आवास समिति, स्वागत समिति, भोजन समिति, पंडाल समिति, स्वामीजी रक्षक समिति, प्रचार समिति व धन संग्रह समिति प्रमुखता से गठित कर दी जाती हैं. यहां पर बड़े दानदाता स्वागत समिति में, व्यापारी भोजन समिति में, पत्रकार, समाजसेवी व खासखास सरकारी विभागों के अधिकारी धनसंग्रह समिति में लिए जाते हैं. शहर के दबंगों को रक्षक समिति में लिया जाता है व बाकी समर्पित कार्यकर्ताओं को पंडाल, सेवा, साफसफाई व प्रचार समिति में रखा जाता है.

ये सभी अपना कामधंधा छोड़ कर जितने दिन प्रवचन होते हैं धार्मिक गुरु की चाकरी में लगे रहते हैं. इस के बदले में इन्हें मिलता है स्वामीजी का आशीर्वाद, जिसे पा कर ये अपने को धन्य समझ लेते हैं और मान लेते हैं कि स्वामीजी का हाथ इन के सिर पर है.

बिजली, माइक, क्लोज सर्किट टीवी और सजावट के दूसरे सामानों पर भी खर्च आता है. हर एक शिविर पर लाखों रुपए का खर्च आता है, जो प्रवचन के ये ब्रांड नाम अपनी जेब से नहीं देते बल्कि इन के प्रवचन के आयोजन- कर्ता खर्च करते हैं और इन के भक्त अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई लुटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते.

आगरा में रहने वाले जगमोहन गुप्ता का कहना है कि अभी कुछ साल पहले वृंदावन में मोरारी बापू के प्रवचन का भव्य आयोजन किया गया. यहां पर पंडाल में विशेष भक्तों, पत्रकारों, महिलाओं व विशेष दानदाताओं के लिए अलगअलग स्थान तय थे. भक्तों से मंच पर बैठ कर कथा सुनने की फीस बनाम दक्षिणा 3,100 से 5,100 रुपए तक वसूल की गई. गद्दा और सफेद धुली चादर पर आगे की पंक्ति में बैठ कर कथा सुनने की फीस 2,100 से 3,100 रुपए तक वसूली गई. बढ़ती महंगाई को देख कर कहा जा सकता है कि कथा सुनने की यह फीस अब और भी बढ़ गई होगी.

इस तरह की कथा का आयोजन जहां भी होता है कथा के दौरान लगभग 30-40 अस्थायी दुकानें भी लग जाती हैं. इन दुकानों में गुरुओं की कथा के कैसेट, संतों के प्रवचन के कैसेट और पुस्तकें 30 से ले कर 50 रुपए तक में बिकती हैं. इन के हजारों अनुयायी गुरुओं द्वारा प्रकाशित पत्रिका के स्थायी ग्राहक बनते हैं. प्रत्येक दुकान 11 दिन के लिए 1 हजार से ले कर 2 हजार रुपए तक ठेके पर उठाई जाती है. यहां संतों की तसवीरें भी 100 से 300 रुपए तक में खूब बिकती हैं.

यह आमदनी लाखों में होती है. जहां प्रवचन होते हैं वहां थोड़ीथोड़ी दूरी पर दानदाता की सुविधा के लिए दानपात्र रखे होते हैं, जिन पर लिखा होता है, ‘रुपएपैसे दानपात्र में ही डालें और आभूषण व कपड़े पंडित के पास जमा कराएं.’ सोचने की बात यह है कि ये धर्मगुरु तो संत हैं और संत तो कुछ लेते नहीं हैं या यों कहें कि इन्हें तो कुछ लेना नहीं चाहिए. फिर चढ़ावे की रकम कहांकहां आपस में बंटती है और किस को कितना मिलता है यह खोज का विषय है. यह सबकुछ हर धर्मगुरु के सत्संग में देखने को मिलता है.

मलीमसानपि जनान संत:

कुर्वन्ति निर्मलान।

(अर्थात संत मलिन चित्त वाले मनुष्यों को भी निर्मल कर देते हैं.)

-अचिंत्यानंद वर्णी, विवेकशतक, 55

लेकिन आजकल के ये संत कितने सुचरित्र वाले हैं इस का पता तो इन कुछ उदाहरणों से ही चल जाएगा. अपने प्रवचन में लाखों की भीड़ जुटाने वाला संत ज्ञानेश्वर खुद को भक्तों के बीच भगवान बतलाता था. इस स्वघोषित भगवान की जिस समय गोली मार कर हत्या की गई उस समय उस पर हत्या करने, बिजली की चोरी, सरकारी जमीन पर कब्जा, विस्फोटक पदार्थ एक्ट, अवैध हथियार रखने, जैसे अनेक मुकदमे चल रहे थे. उस के वाराणसी व बाराबंकी आश्रम में बड़ी संख्या में स्त्रियों का शारीरिक शोषण होता था.

करौंथा स्थित सतलोक आश्रम का स्वामी संत रामपाल अब जेल में है. उस की काली करतूतों से परदा उठ चुका है. रामपाल और उस के चेलों पर हत्या और जमीन पर जबरन कब्जा, डरानेधमकाने के अन्य मामले भी दर्ज किए गए हैं. लोगों को मोहमाया से दूर रहने का उपदेश देने वाला रामपाल खुद किस कदर मोहमाया से जकड़ा था यह उस का आलीशान आश्रम देखने से ही पता चल जाता है.

48 साल के पाखंडी साधु विकासानंद को पुलिस ने छापा मार कर जबलपुर के एक होटल से उस वक्त गिरफ्तार किया जब वह कुछ लड़कियों के साथ आपत्तिजनक स्थिति में था.

उस का फाइव स्टार आश्रम जबलपुर में ऐय्याशी, ब्लैकमेलिंग, स्मगलिंग व ब्लू फिल्म बनाने का अड्डा बना हुआ था.

खुद को कृष्ण व शिव का अवतार बता कर एक तांत्रिक नारायण दत्त श्रीमाली व उस के पुत्रों ने हरियाणा के सैकड़ों लोगों से 4 करोड़ के लगभग ठग लिए थे. 2001 में नारायण दत्त के खिलाफ कई आपराधिक मामले भी दर्ज किए गए.

धीरेंद्र ब्रह्मचारी ने अपनी राजनीतिक पहुंच के कारण अरबों की संपत्ति जमा कर ली. उस का अपना हवाई जहाज और हवाई अड्डा था. ऐसे स्वामी से सदाचार की क्या उम्मीद की जा सकती है?

रामदेव पर भी आयुर्वेद की आड़ में आम लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने का आरोप लगा. लेकिन लोगों में उस की पहुंच को देख कर सरकार खामोश हो गई.

शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती की गिरफ्तारी के बाद विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समेत तमाम हिंदूवादी संगठनों और नेताओं ने उन की गिरफ्तारी के तरीकों पर ऐतराज जताते हुए पृथक कानून व्यवस्था बनाने की मांग उठाई.

धर्म के इन ठेकेदारों की मानें तो शंकराचार्य या अन्य किसी धार्मिक व्यक्ति को गिरफ्तार न करना ही धर्म का सम्मान है. ये चाहते हैं कि धर्माचार्यों को अपराध करने की छूट दे दी जाए यानी धर्म को कानून के नीचे रखा जाए. अब सवाल यह उठता है कि हिंदू धर्म की सब से ऊंची गद्दी पर बैठे ये लोग अगर अपराध करते हैं तो इन्हें सजा क्यों न दी जाए?

अब यह साबित हो चुका है कि ये धर्मगुरु खुद ही परले दर्जे के ऐय्याश, धोखेबाज, कुचरित्र, हत्या जैसे जघन्य अपराधों में लिप्त पाए जाते हैं, तो जनता को अपने सत्संग में कौन सा मुक्ति का पाठ पढ़ाएंगे? धार्मिक गुरुओं द्वारा जनता को बेवकूफ बना कर माल बटोरने का यह धंधा सदियों से चला आ रहा है इसलिए अब समय आ गया है कि जनता जागरूक हो जाए और धर्म के ठेकेदार बने इन संतों, गुरुओं की दुकानदारी पर रोक लगाए.

डाक्टर की मानें झाड़फूंक की नहीं

रीमा कैंसर की पहले स्टेज से जूझ रही थीं. डाक्टरों का कहना था कि अगर वे समय से पूरा इलाज करा लेंगी तो ठीक हो सकती हैं. लेकिन रीमा के परिवार वालों का डाक्टर के इलाज से ज्यादा झाड़फूंक पर यकीन था. वे उन्हें एक बाबा के पास ले कर पहुंचे.

उस बाबा ने अपने तंत्रमंत्र से रीमा को ठीक करने का दावा किया जिस पर परिवार वालों ने आंख मूंद कर यकीन कर लिया.

उस बाबा ने इस के एवज में न केवल ढेर सारे रुपयों की मांग की, बल्कि रीमा को डाक्टर के पास ले जाने से मना भी कर दिया.

परिवार के लोग रीमा को अकसर उस बाबा के पास झाड़फूंक के लिए ले जाने लगे. रीमा की बीमारी बढ़ती जा रही थी लेकिन उन के घर वालों को उस बाबा पर इस कदर यकीन था कि रीमा की पीड़ा को भी वे महसूस नहीं कर पा रहे थे.

एक दिन रीमा की हालत ज्यादा खराब होने लगी. उन के परिवार वालों को लगा कि उन्हें एक बार फिर से डाक्टर को दिखाना चाहिए.

डाक्टर ने बताया कि झाड़फूंक के चलते रीमा की बीमारी बहुत ज्यादा बढ़ चुकी है और उन का बचना मुश्किल है. आखिरकार एक दिन रीमा की मौत हो गई.

इस देश में आज भी लोग बीमारियों का इलाज माहिर डाक्टरों से न करा कर बाबाओं, पीरफकीरों की शरण में खोजते हैं. ऐसे में हर रोज हजारों लोगों को पाखंड और पोंगापंथ के चक्कर में अपनी जान गंवानी पड़ती है.

डाक्टर वीके वर्मा का कहना है कि उन के पास हर रोज ऐसे मरीज आते हैं जो झाड़फूंक के चक्कर में पड़ कर अपनी बीमारी को गंभीर बना लेते हैं या मौत के मुंह में चले जाते हैं. कई बार मरीजों को झाड़फूंक न कराने की सलाह देने पर उन्हें भी लोगों के विरोध का सामना करना पड़ता है.

पढ़ेलिखे भी शिकार

एक मनोविज्ञानी राधेश्याम चौधरी का कहना है कि पढ़ेलिखे लोगों की इलाज के लिए बाबाओं के आगे लाइन लगाने की खास वजह यह होती है कि उन के मन में बचपन से ही भूतप्रेतों और बाबाओं को ले कर डर बैठा दिया जाता है जिसे वे बड़ा होने पर भी अपने मन से निकाल नहीं पाते हैं.

अगर ऐसे लोग कभी बीमार पड़ते भी हैं या परेशानियों का शिकार होते हैं तो उन्हें इस का इलाज बाबाओं के पास ज्यादा दिखाई देता है. उन को इस बात की समझ तब आती है जब वे बाबाओं के झांसे में पड़ कर अपना नुकसान कर बैठते हैं. हमें बच्चों में वैज्ञानिक सोच पैदा करनी चाहिए जिस से उन के मन में भूतप्रेतों का डर न रहने पाए.

ऐसे मरीज हैं ज्यादा

पीरफकीरों के यहां झाड़फूंक कराने आए ज्यादातर लोग दिमागी बीमारियों से जूझ रहे होते हैं. ऐसे मरीजों के परिवार वाले मरीज की ऊलजुलूल हरकतों को भूतप्रेत का साया मान लेते हैं जिस के चलते वे बाबाओं की शरण में पहुंच जाते हैं.

झाड़फूंक की दुकान चलाने वाला बाबा सब से पहले उन्हें डाक्टरों के पास ले जाने से मना करता है, क्योंकि उसे पता होता है कि अगर मरीज डाक्टर के पास चला गया तो न केवल आसानी से ठीक हो जाएगा बल्कि उसे अपनी झाड़फूंक की दुकान भी बंद करनी पड़ जाएगी. इस से लंबे समय तक जेब ढीली करने वालों की तादाद में कमी आ जाएगी और उस की पोल खुलने का भी डर बना रहेगा.

मानसिक रोग विशेषज्ञ डाक्टर मलिक मोहम्मद अकमलुद्दीन का कहना है कि दिमागी बीमारी के ज्यादातर मरीज तो उन के पास तब आते हैं जब उन की हालत बहुत ज्यादा बिगड़ चुकी होती है.

परिवार से पूछने पर पता चलता है कि मरीज की अजीबोगरीब हरकतों को भूतप्रेतों का साया मान कर वे उस की झाड़फूंक करा रहे थे.

अजीब हरकतें करना दिमागी बीमारी की निशानी है. इस में कई तरह के लक्षण एकसाथ दिखाई पड़ सकते हैं. इन में स्किजोफ्रेनिया, बाइपोलर डिसऔर्डर या कैटाटोनिक अवसाद जैसी कई बीमारियां शामिल हैं.

इन बीमारियों में मरीज के विचारों और बरताव में बदलाव आ जाता है. इस के चलते वह कुछ समय के लिए अपनी देखभाल करने में नाकाम हो जाता है.

इसी तरह के लक्षण दूसरी दिमागी बीमारियों में भी पाए जाते हैं. कुछ बीमारियों में मरीज अपनेआप को किसी दूसरे के किरदार के साथ जीने लगता है. लोग समझते हैं कि उस पर कोई ऊपरी साया है, जबकि भूतप्रेत या ऊपरी साया सब बकवास है जो पोंगापंथियों के दिमाग की उपज होती है.

ऐसी बीमारियों में डाक्टरी इलाज का सहारा लेना चाहिए, न कि बेसिरपैर की बातों में फंस कर अपनी जेब ढीली कर दी जाए.

डाक्टर वीके वर्मा का कहना है कि सामान्य या गंभीर बीमारियों की दशा में हमें डाक्टर से इलाज कराना चाहिए जिस से समय रहते बीमारी से न केवल नजात मिलेगी, बल्कि बच्चा न पैदा होने जैसी समस्याओं से जूझ रही औरतों का बाबाओं द्वारा यौन शोषण भी नहीं हो पाएगा.

अगर कोई भी इलाज के लिए पीरफकीरों और बाबाओं की शरण में जाने को कहता है तो उसे अंधविश्वास फैलाने के जुर्म में जेल भिजवाने का डर दिखाएं.

याद रखिए, कोई भी आप को झाड़फूंक कराने के लिए मजबूर नहीं कर सकता. अगर कोई ऐसा करता पाया जाता है तो उस के ऊपर सख्त कानूनी कार्यवाही की जा सकती है.

शौचालय सस्ते में बनाएं

भारत में खुले में शौच की समस्या आज भी चुनौती बनी हुई है, जबकि सरकार जोरजोर से खुले में शौच मुक्त होने के ढोल पीट रही है. सरकार शौचालय बनवाने के लिए रुपए भी देती है, लेकिन यह पैसे भ्रष्टाचार के चलते जरूरतमंदों तक पहुंच ही नहीं पाते हैं.

खुले में शौच की समस्या का सीधा सामना औरतों और लड़कियों को ज्यादा करना पड़ता है. इस दौरान किसी जंगली जानवर के हमले या जहरीले जीव के काटने से भी मौत होना आम बात है. कई बार उन्हें बलात्कार का शिकार तक होना पड़ता है.

बूढ़े और लाचार बीमार लोगों का बाहर शौच के लिए जाना और भी मुश्किल काम है. बारिश के दौरान या आपदा के समय में यह और भी भयावह हो जाता है.

खुले में किए गए शौच से संक्रमण फैलने और बीमारियां होने का खतरा बना रहता है क्योंकि यहीं से मक्खियां मल से फैलने वाले कीटाणुओं को घरों और खाने की चीजों तक पहुंचा देती हैं.

लिहाजा, यह जरूरी हो जाता है कि गांवों या शहरों में खुले में शौच में कमी लाने के लिए शौचालय बनाने की सस्ती तकनीक का सहारा लिया जाए जिस के तहत बने शौचालय सस्ते होने के साथसाथ टिकाऊ भी हों.

सोख्ता शौचालय

सोख्ता गड्ढों वाले शौचालयों को महज 10 से 12 हजार रुपए में तैयार किया जा सकता है. इस में 2 गड्ढे बनाए जाते हैं. इन की गहराई सवा मीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए क्योंकि मल को खाने वाले कीड़े जमीन के अंदर सवा मीटर की गहराई में ही पैदा होते हैं. ज्यादा गहराई होने पर कीड़े पैदा नहीं हो पाते हैं और जमीन के अंदर तक पीने का पानी खराब होने का खतरा भी बढ़ जाता है.

प्रधानमंत्री के हाथों ‘गौरवग्राम पुरस्कार’ हासिल कर चुके स्मार्ट विलेज हसुड़ी औसानपुर के ग्राम प्रधान दिलीप कुमार त्रिपाठी बताते हैं कि अगर सोख्ता गड्ढों वाले शौचालय का इस्तेमाल ज्यादा समय तक करना चाहते हैं तो शौचालय की सीट के पास 2 गड्ढे बनाने चाहिए. इन्हें समयसमय पर साफ कर के 10 से 12 सदस्यों वाले परिवार के लिए सालों तक इस्तेमाल में लाया जा सकता है.

इस तरह के शौचालयों को बनाते समय यह ध्यान देना चाहिए कि शौचालय के गड्ढे पीने के पानी के चांपाकल वगैरह से कम से कम 10 मीटर की दूरी पर हों.

society

2 गड्ढों वाले शौचालय व एक चबूतरे को बनाने के लिए 1,000 ईंटें, डेढ़ से 3 बोरी सीमेंट, 10 से 12 बोरी बालू, 4 फुट पाइप, एक लैट्रिन सीट व गड्ढा ढकने के लिए ढक्कन की जरूरत पड़ती है. इस तरह के शौचालय को बनाने के लिए सरकार से 12,000 रुपए की मदद भी मुहैया कराई जाती है.

बांस से बने सस्ते शौचालय

अगर सस्ते में शौचालय बनवाने की बात की जाए तो बांस से बने शौचालयों का सहारा ले सकते हैं. इन में बहुत कम खर्च आता है.

गोरखपुर जिले के जंगल कौडि़या ब्लौक के कई गांवों में इस तरह की तकनीक से लोगों ने अपने घरों में शौचालयों को बनवाया है जिन में शौचालय की दीवारों और छत को बांस से बना कर उस पर मिट्टी का लेप लगा दिया जाता है और नीचे सीमेंट, ईंट के साथ चबूतरा बना कर लैट्रिन सीट बिठाई जाती है. इसी के बगल में गड्ढा बनाया जाता है. यह गड्ढा सोख्ता गड्ढों की तरह ही बनता है.

इस तरह की शौचालय तकनीक को ईजाद करने वाली संस्था गोरखपुर ऐनवायरनमैंटल ऐक्शन ग्रुप से विजय पांडेय बताते हैं कि गरीब परिवारों के लिए यह तकनीक बहुत ही कारगर है और इस में मुश्किल से 4,930 रुपए की लागत आती है जिसे कोई भी परिवार आसानी से अपने घरों में बनवा सकता है. यह जगह भी कम घेरता है.

सैप्टिक टैंक शौचालय

ऐसे शौचालयों को भी कम लागत में बनाया जा सकता है लेकिन यह उस जगह के लिए ज्यादा मुफीद माना जाता है जहां सीवर लाइन हो या ढकी हुई नालियां हों.

शौचालय बनाने के कारोबार से जुड़े राकेश बताते हैं कि सैप्टिक टैंक शौचालय को महज एक दिन में बना कर इस्तेमाल में लाया जा सकता?है. इस के लिए पहले से बने सीसी पाइप को जमीन के अंदर फिट किया जाता है और फिर उस के बगल में चबूतरा बना कर शौच जाने के लिए चालू कर दिया जाता है.

ऐसे शौचालयों से निकलने वाले पानी को खुले में नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि इस से मच्छर, कीड़ेमकोड़ों के पनपने का डर बढ़ जाता है और खुले में पानी छोड़ने से आबोहवा पर बुरा असर पड़ सकता है.

ऐसे शौचालय बनाने के लिए 15 से 17 हजार रुपए की लागत आती है. 5 से 10 सदस्यों वाले परिवारों के लिए इसे 50 साल तक शौच जाने के लिए इस्तेमाल में लाया जा सकता है.

बच्चा उदास रहे तो हो जाएं सावधान

15 साल की रिया जब भी स्कूल जाती, क्लास में सब से पीछे बैठ कर हमेशा सोती रहती. उस का मन पढ़ाई में नहीं लगता था. वह किसी से न तो ज्यादा बात करती और न ही किसी को अपना दोस्त बनाती. अगर वह कभी सोती नहीं थी, तो किताबों के पन्ने उलट कर एकटक देखती रहती. क्या पढ़ाया जा रहा है, इस से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता. हर बार उस की शिकायत उस के मातापिता से की जाती, पर इस का उस पर कोई असर नहीं पड़ता था.

वह हमेशा उदास रहा करती थी. इसे देख कर कुछ बच्चे तो उसे चिढ़ाने भी लगते थे, पर वह उस पर भी अधिक ध्यान नहीं देती थी. परेशान हो कर उस की मां ने मनोवैज्ञानिक से सलाह ली. कई प्रकार की दवाएं और थेरैपी लेने के बाद वह ठीक हो पाई.

दरअसल, बच्चों में डिप्रैशन एक सामान्य बात है, पर इस का पता लगाना मुश्किल होता है. अधिकतर मातापिता इसे बच्चे का आलसीपन समझते हैं और उन्हें डांटतेपीटते रहते हैं. इस से वे और अधिक क्रोधित हो कर कभी घर छोड़ कर चले जाते हैं या फिर कभी आत्महत्या कर लेते हैं.

बच्चों की समस्या न समझ पाने की 2 खास वजहें हैं. पहली तो हमारे समाज में मानसिक समस्याओं को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता और दूसरे, अभी बच्चा छोटा है, बड़ा होने पर समझदार हो जाएगा, ऐसा कह कर अभिभावक इस समस्या को गहराई से नहीं लेते. मातापिता को लगता है कि यह समस्या सिर्फ वयस्कों को ही हो सकती है, बच्चों को नहीं.

शुरुआती संकेत : जी लर्न की मनोवैज्ञानिक दीपा नारायण चक्रवर्ती कहती हैं कि आजकल के मातापिता बच्चों की मानसिक क्षमता को बिना समझे ही बहुत अधिक अपेक्षा रखने लगते हैं. इस से उन्हें यह भार लगने लगता है और वे पढ़ाई से दूर भागने लगते हैं. अपनी समस्या वे मातापिता से बताने से डरते हैं और उन का बचपन ऐसे ही डरडर कर बीतने लगता है, जो धीरेधीरे तनाव का रूप ले लेता है. मातापिता को बच्चे में आए अचानक बदलाव को नोटिस करने की जरूरत है. कुछ शुरुआती लक्षण निम्न हैं :

–       अगर बच्चा आम दिनों से अधिक चिड़चिड़ा हो रहा हो या बारबार उस का मूड बदल रहा हो.

–       बातबात पर  गुस्सा होना या रोना.

–       अपनी किसी हौबी या शौक को फौलो न करना.

–       खानेपीने में कम दिलचस्पी रखना.

–       सामान्य से अधिक समय तक सोना.

–       अलगथलग रहने की कोशिश करना.

–       स्कूल जाने की इच्छा का न होना

–       स्कूल के किसी काम को न करना आदि.

इस बारे में दीपा आगे बताती हैं कि किसी भी मातापिता को बच्चे को डिप्रैशन में देखना आसान नहीं होता और वे इसे मानने को भी तैयार नहीं होते कि उन का बच्चा डिप्रैशन में है.

तनाव से निकालना : निम्न कुछ बातों से बच्चे को तनाव से निकाला जा सकता है–

–       हमेशा धैर्य रखें, गुस्सा करने पर बच्चा भी रिवोल्ट करेगा और आप उसे कुछ समझा नहीं सकते.

–       बच्चे को कभी यह एहसास न होने दें कि वह बीमार है. यह कोई बीमारी नहीं है, इस का इलाज हो सकता है.

–       हिम्मत से काम लें, बच्चे को डिप्रैशन से निकालने में मातापिता से अच्छा कोई नहीं हो सकता.

–       बच्चे से खुल कर बातचीत करें, तनावग्रस्त बच्चा अधिकतर कम बात करना चाहता है. ऐसे में बात करने से उस के मनोभावों को समझना आसान होता है. उस के मन में कौन सी बात चल रही है, उस का समाधान भी आप कर सकते हैं.

–       हमेशा बच्चे को लोगों से मिलनेजुलने के लिए प्रेरित करें.

–       बातचीत से अगर समस्या नहीं सुलझती है, तो इलाज करवाना जरूरी है. इस के लिए आप खुद उसे मनाएं और ध्यान रखें कि डाक्टर जो भी दवा दे, उसे वह समय पर ले, इस से वह जल्दी डिप्रैशन से निकलने में समर्थ हो जाएगा.

अपना दायित्व समझें : मातापिता बच्चे के रिजल्ट को ले कर बहुत अधिक परेशान रहते हैं. इस बारे में साइकोलौजिस्ट राशिदा कपाडि़या कहती हैं कि बच्चों में तनाव और अधिक बढ़ जाता है जब उन की

बोर्ड की परीक्षा हो. ऐसे में हर मातापिता अपने बच्चे से 90 प्रतिशत अंक की अपेक्षा लिए बैठे रहते हैं और कम नंबर आने पर वे मायूस होते हैं. ऐसे में बच्चा और भी घबरा जाता है. उसे एहसास होता है कि नंबर कम आने पर उसे कहीं ऐडमिशन नहीं मिलेगा, जबकि ऐसा नहीं है, हर बच्चे को अपनी क्षमता के अनुसार दाखिला मिल ही जाता है.

कई ऐसे उदाहरण हैं जहां रिजल्ट देखे बिना ही बच्चे परीक्षा में अपनी खराब परफौर्मेंस के बारे में सोच कर आत्महत्या तक कर लेते हैं. इस से बचने के लिए मातापिता को खास ध्यान रखने की जरूरत है :

–       अपने बच्चे की तुलना किसी अन्य बच्चे से न करें.

–       वह जो भी नंबर लाया है उस की तारीफ करें और उस की चौइस को आगे बढ़ाएं.

–       अपनी इच्छा बच्चे पर न थोपें.

–       उस की खूबियों और खामियों को समझने की कोशिश करें. अगर किसी क्षेत्र में प्रतिभा नहीं है, तो उसे छोड़ उस के हुनर को उभारने की कोशिश करें.

–       एप्टिट्यूड टैस्ट करवा लें, इस से बच्चे की प्रतिभा का अंदाजा लगाया जा सकता है.

–       उस के सैल्फ स्टीम को कभी कम न करें.

–       उस की मेहनत को बढ़ावा दें.

–       समस्या के समाधान के लिए बच्चे से खुल कर बातचीत करें और उस के मनोभावों को समझें तथा उस के साथ चर्चा करें.

–       अपनी कम कहें, बच्चे की ज्यादा सुनें, इस से बच्चा आप से कुछ भी कहने से हिचकिचाएगा नहीं.

–       बच्चे को हैप्पी चाइल्ड बनाएं, डिप्रैशनयुक्त नहीं.

लड़कियां हों या महिलाएं, 5 समस्याएं गायनोकोलौजिस्ट से न छिपाएं

हमेशा हंसती रहने वाली मेघा पिछले 2 महीने से काफी उदास रहने लगी थी. उसे किसी से बात करना तक अच्छा नहीं लगता था. उस ने कालेज जाना भी कम कर दिया था. एक दिन उस की मां ने उस से पूछा, ‘‘क्या बात है मेघा, आजकल मैं देख रही हूं कि तू बहुत उदास रहने लगी है. न हंसती है न किसी से बात करती है?’’

इस पर मेघा ने कहा, ‘‘नहीं मम्मी, ऐसी कोई बात नहीं है, बस यों ही.’’

मेघा की रमेश के साथ पिछले एक साल से दोस्ती थी. दोनों कालेज के बाद अकसर गार्डन या मौल में घूमने जाते थे. उन के शारीरिक संबंध भी बन गए थे. रमेश जब चाहता उसे एकांत जगह पर ले जाता और फिर दोनों सैक्स करते.

2 महीने से मेघा को पीरियड्स नहीं हुए थे. उसे लग रहा था कि वह प्रैग्नैंट हो गई है. इसीलिए वह उदास रहने लगी थी. उसे डर था कि अगर वह मां को यह बताएगी कि रमेश के साथ उस के शारीरिक संबंध हैं और पीरियड्स नहीं हो रहे हैं तो मां उसे डांटेगी और गायनोकोलौजिस्ट के पास ले जाएगी जहां उस की पोलपट्टी खुल जाएगी.

लेकिन ऐसा कब तक चलता. एक दिन उस ने मां को बताया कि उसे पिछले 2 महीने से पीरियड्स नहीं हुए हैं. यह सुन कर पहले तो मां का माथा ठनका कि कहीं मेघा प्रैग्नैंट तो नहीं हो गई है. खैर, मां ने उसे कुछ नहीं कहा. एक दिन वह उसे ले कर एक गायनोकोलौजिस्ट के पास गई. मेघा थरथर कांपने लगी जब गायनोकोलौजिस्ट ने मेघा से उस की समस्या पूछी. पहले तो मेघा सकुचाई पर फिर उस ने डाक्टर को बताया कि उसे पिछले 2 महीने से पीरियड्स नहीं हुए हैं.

डाक्टर ने पूछा कि इस से पहले भी कभी ऐसा हुआ है? तो उस ने जवाब दिया कि पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ.

लेडी डाक्टर बुजुर्ग थी. उस के पास ऐसे कई केस आते थे. डाक्टर ने इस बारे में उस से ज्यादा पूछना उचित नहीं समझा. उस ने मेघा का प्रैग्नैंसी टैस्ट किया, लेकिन रिपोर्ट नैगेटिव निकली, इस का मतलब था कि मेघा प्रैग्नैंट नहीं थी. किसी और वजह से उसे पीरियड्स नहीं हो रहे थे.

इस बार तो मेघा बालबाल बच गई लेकिन अब उस ने फैसला कर लिया कि वह अब अपने बौयफ्रैंड के साथ कभी शारीरिक संबंध नहीं बनाएगी.

लेडी डाक्टर ने मेघा का इलाज शुरू किया और जल्दी ही उस के पीरियड्स नियमित हो गए.

युवतियों की शारीरिक संरचना काफी जटिल होती है. हमेशा कुछ न कुछ समस्या लगी रहती है. अधिकतर युवतियों को इस बारे में सही जानकारी नहीं होती, इसलिए वे डर जाती हैं. उन्हें लगने लगता है कि वे प्रैग्नैंट हो गई हैं, क्योंकि आजकल युवकयुवतियां सैक्स को ले कर काफी बोल्ड हो गए हैं. वे इस में कोई बुराई नहीं समझते. वे खुल कर सैक्स एंजौय करते हैं.

society

युवतियों की शारीरिक समस्याएं

अनियमित माहवारी : युवतियों की यह समस्या आम है, पर इसे ले कर वे काफी भयभीत रहती हैं. अनियमित माहवारी के कई कारण हैं. गायनोकोलौजिस्ट डा. रेनू शर्मा के अनुसार, ‘‘जो युवतियां सोचती हैं कि माहवारी प्रैग्नैंसी की वजह से रुकती है, तो यह गलत है. ऐसे अनेक कारण हैं जिन की वजह से अकसर युवतियां इस शारीरिक समस्या का शिकार होती हैं.’’

वास्तव में यह कोई बीमारी नहीं है. यदि समय पर इलाज किया जाए और खानपान पर ध्यान दिया जाए तो यह समस्या जल्दी ही खत्म हो जाती है. कभी कुछ युवतियों को महीने में 2 बार भी माहवारी हो जाती है, जिस से शरीर का काफी खून निकल जाता है और उन में कमजोरी आ जाती है. यह समस्या हार्मोन की गड़बड़ी की वजह से होती है. टैस्टों के जरिए समस्या की जड़ तक पहुंचा जा सकता है और फिर उस के अनुसार ही इलाज किया जाता है.

स्तन में गांठें बनना : युवतियों में यह समस्या कौमन है. अकसर उन के स्तन में गांठें पड़ जाती हैं, जिस की वजह से स्तन को स्पर्श करते ही उन्हें काफी दर्द महसूस होता है. यदि आप को भी यह समस्या है तो आप बिना संकोच के तुरंत अपनी लेडी डाक्टर से मिलें और पूरी समस्या उन्हें सहीसही बता दें. स्तन में गांठें पड़ने के कई कारण हो सकते हैं.

खून की जांच व अल्ट्रासाउंड से समस्या की वजह पता चल जाती है और फिर इलाज से इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है. बड़ी उम्र की महिलाओं के स्तनों में गांठों की समस्या हो जाती है जो कभीकभी ब्रैस्ट कैंसर के रूप में सामने आती है. ऐसे में कीमोथेरैपी की जाती है और कभीकभी तो जिस ब्रैस्ट में यह समस्या है, उसे काटना भी पड़ सकता है. युवतियों में ब्रैस्ट कैंसर का प्रतिशत बहुत कम होता है, इसलिए उन्हें घबराने की जरूरत नहीं है.

ल्यूकोरिया : ल्यूकोरिया यानी वेजाइना से निकलने वाला सफेद या चिपचिपा गाढ़ा पदार्थ. ल्यूकोरिया की शिकायत उन युवतियों में अधिक होती है जो अपने जननांगों की साफसफाई नहीं रखतीं या फिर किसी दूसरी युवती के अंदरूनी कपड़े पहनती हैं. यह एक छूत की बीमारी है. यदि समय पर इस का इलाज नहीं कराया जाए तो यह बीमारी काफी बढ़ जाती है. इस से पीडि़त युवती कमजोर हो जाती है. इसलिए अगर आप के साथ ऐसी समस्या है तो तुरंत किसी डाक्टर से संपर्क करें और उन्हें अपनी समस्या बताएं. इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि समस्या छिपाने से और बढ़ती है.

ओवरी में गांठ (पीसीओडी) : युवतियों में पीसीओडी की समस्या भी आम है. इस समस्या में ओवरी में गांठ (सिस्ट) बन जाती है, जिस से माहवारी तो रुक ही जाती है, साथ ही पेट में भी दर्द रहता है. कभीकभी अंडाशय में बना अंडा, जो हर महीने फूट कर खून (माहवारी) के रूप में बाहर निकल जाता है, वह फूट नहीं पाता और अंडाशय के चारों ओर जमा हो कर दीवार सी बना देता है, जिस से पेट में सूजन आ जाती है. अगर माहवारी बंद हो जाए तो अल्ट्रासाउंड कराना जरूरी होता है. इस से मालूम हो जाता है कि युवती को पीसीओडी की समस्या है या नहीं. वैसे, इस में कोई घबराने वाली बात नहीं है. यदि समय पर डाक्टर को दिखाया जाए तो इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है.

जो युवतियां संकोचवश समय रहते गायनोकोलौजिस्ट को नहीं दिखातीं उन की यह समस्या बढ़ जाती है. समस्या के बढ़ने पर उन में बांझपन का खतरा भी बढ़ जाता है. इसलिए ऐसी स्थिति में युवतियों को तुरंत डाक्टर से संपर्क करना चाहिए और उन्हें खुल कर अपनी समस्या बतानी चाहिए.

बिना शादी के प्रैग्नैंसी : युवतियां अपनी गलतियों की वजह से प्रैग्नैंसी का शिकार हो जाती हैं. यदि आप कुंआरी हैं और प्रैग्नैंट हो गई हैं तो पहले अपनी मां या बड़ी बहन को कौन्फिडैंस में लें और उन्हें सबकुछ सचसच बता दें.

बहुत सी लड़कियां प्रैग्नैंट होने पर बदनामी के डर से डाक्टर के पास नहीं जातीं और अपनेआप गर्भ गिराने वाली दवाएं खाती रहती हैं, लेकिन कभीकभी ये दवाएं जिंदगी के लिए खतरा भी बन जाती हैं.

पुण्य और फल : पैसा बटोरने का धंधा

भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, जहां धर्म के नाम पर जो भी किया जाए, सब जायज माना जाता है. अपनी तथाकथित आस्था और बेसिरपैर के विश्वास के लिए यहां के रूढ़िवादी लोग किसी भी हद तक जा सकते हैं. वे तथाकथित देवताओं को भी खुश करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहते.

‘पुण्य’ कमाने और ‘फल’ पाने के लोगों ने कई साधन अपना रखे हैं, इन्हीं में से एक है, भगवती जागरण. इस से रातभर जाग कर अन्य किसी को कुछ हासिल होता हो या न होता हो, मगर जागरण करने वाली पार्टियों और धंधेबाजों के लिए यह बड़े फायदे का आयोजन बन कर रह गया है.

अब तो भगवती जागरण करने वाली पार्टियां भी पूर्ण रूप से व्यावसायिक हो गई हैं. पहले जहां 500 रुपए में भी ऐसा आयोजन हो जाता था वहीं अब छोटेमोटे गायक ही 2 से 10 हजार रुपए आराम से ले लेते हैं. इस के अलावा अन्य खर्चों की तो बात ही अलग है.

कहींकहीं गुफा बना कर बर्फ की सिल्लियां भी रख दी जाती हैं, जिन पर से बहुत से लोग फिसल कर गिर पड़ते हैं, कई बार तो गंभीर दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं. मगर इन सब से बेपरवाह आयोजक पुण्य कमाने के लिए आंखें बंद किए रहते हैं. दरबार किसी पुरोहित के बिना शोभा नहीं देता इसलिए वहां पर अपना एक आदमी बैठा दिया जाता है, ताकि चढ़ावे का ध्यान रखा जाए.

बड़े आयोजनों के लिए महीनों पहले चंदा इकट्ठा किया जाता है. शहरों में मुनादी करवाई जाती है, अखबारों में विज्ञापन दे कर लोगों को सूचित किया जाता है कि वे इस अवसर पर एकत्र हो कर पुण्य कमाने में पीछे न रहें. कई बार आयोजकों को पैसे के कारण आपस में लड़तेझगड़ते भी देखा गया है.

यहां गायक व गायिकाएं फिल्मी तर्जों पर ‘भेंटें’ गाते दिखाई देते हैं. यह सिलसिला सारी रात चलता रहता है और कानफोड़ू आरकेस्ट्रा से बेहद शोर उत्पन्न कर आसपास के लोगों को परेशान किया जाता है. फिर इस से ध्वनि प्रदूषण की जो समस्या उत्पन्न होती है, वह तो अलग ही है. समाज सुधारक भी यहां आ कर खूब तालियां पीटते देखे जाते हैं.

ध्यान देने योग्य बात यह है कि जिस शोर को सुन कर आम आदमी भी खुश नहीं होता, वहां देवी का प्रसन्न होना तो दूर की बात है. भगवती जागरण के अधिकांश कार्यक्रमों में ऐसे भक्त मिल जाएंगे, जो बिना किसी नशे के गा ही नहीं पाते. जब खुद में ही कोई श्रद्धा और भक्ति की भावना नहीं जगा पाए तो उन का गायन दूसरों को कैसे प्रभावित कर सकता है.

इसलिए अब ऐसे आयोजनों का मंतव्य सिर्फ नाम, शोहरत और पैसा कमाना ही रह गया है. यही इन की मुख्य आस्था और यकीन है और इसी यकीन के बल पर कई गायकों ने अपने आडियो कैसेट निकाले हैं. कुछ व्यावसायिक भक्तों ने तो वीडियो कैसेट भी जारी किए हैं. इसी ‘भक्तिभाव’ से प्रेरित हो कर दिन प्रतिदिन ऐसे लोगों की जमात बढ़ती जा रही है.

चिंतपूर्णी मंदिर के पास एक धर्मशाला में एक बार ऐसे आयोजन करने गई 2 देवियों में चढ़ावे की रकम को ले कर विवाद पैदा हो गया. एक देवी ने अपने पास रखे त्रिशूल से दूसरी ‘माता’ पर वार कर दिया और उसे लहूलुहान कर दिया. बाद में थाने में इन में समझौता करवाया गया. जागरण के पीछे लगभग हर जगह यही मानसिकता दिखाई देती है.

जितना धन ऐसे आयोजनों पर खर्च किया जाता है, उस से कई कल्याणकारी योजनाएं चलाई जा सकती हैं. परंतु धर्म के ठेकेदारों को यह सब मंजूर नहीं, क्योंकि पैसा बटोरने का इस से सरल रास्ता और कोई उन्हें दिखाई नहीं देता. इस ‘जागरण संस्कृति’ ने अब व्यवसाय का रूप धारण कर लिया है. फिर ऐसे फलतेफूलते कारोबार को कौन बेवकूफ बंद करना चाहेगा.

जाति से बाहर शादी पर होता बवाल

हमारे देश में इंटरकास्ट लवमैरिज यानी जाति से बाहर शादी करने वालों की तादाद आज भी महज 5 फीसदी ही है. 95 फीसदी लोग अपनी जाति में ही शादी करते हैं. नैशनल काउंसिल औफ एप्लाइड इकोनौमिक रिसर्च और यूनिवर्सिटी औफ मैरीलैंड की एक हालिया स्टडी से पता चलता है कि भारत में 95 फीसदी शादियां अपनी जाति के अंदर होती हैं. यह स्टडी 2011-12 में इंडियन ह्यूमन डवलपमैंट द्वारा कराए गए सर्वे पर आधारित है. इस सर्वे में 33 राज्यों व केंद्रशासित शहरी व गंवई इलाकों में बने 41,554 घरों को शामिल किया गया था.

जब इन घरों की औरतों से पूछा गया कि क्या आप की इंटरकास्ट मैरिज हुई थी, तो महज 5 फीसदी औरतों ने ही हां में जवाब दिया. गंवई इलाकों की तुलना में कसबों के हालात थोड़ा बेहतर हैं.

अपनी ही जाति में शादी करने वालों में मध्य प्रदेश के लोगों की तादाद सब से ज्यादा यानी 99 फीसदी रही, जबकि हिमाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ में यह तादाद 98 फीसदी थी.

भारत में कानूनी तौर पर जाति से बाहर शादी करने को मान्यता मिली हुई है. इंटरकास्ट मैरिज को ले कर 50 साल पहले ही कानून पास किया जा चुका है, फिर भी लोग ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं. इस की अहम वजह यह है कि ऐसा करने पर अपने ही समुदाय के लोग इन लोगों का जीना मुश्किल कर देते हैं.

झारखंड की रहने वाली काजल के घर वालों के साथ महज इस वजह से मारपीट की गई, क्योंकि काजल ने दूसरी जाति के सुबोध कुमार नामक लड़के से लवमैरिज की थी.

इस बात को 2 साल हो चुके हैं. शादी के वक्त दोनों बालिग थे और इस रिश्ते को उन के परिवार वालों की हामी भी मिली हुई थी, फिर भी यह बात उन के समुदाय के दूसरे लोगों को हजम नहीं हो रही थी. गांव के कुछ दबंगों द्वारा उन्हें धमकियां दी जाती थीं. जुर्माने के तौर पर उन्होंने रुपयों की भी मांग रखी थी.

16 मई, 2016 को समाज का गुस्सा इतना उबला कि 4-5 लोग लाठियां ले कर काजल के पिता एस. प्रजापति के घर पहुंच गए. काजल के मांबाप और दोनों भाइयों को पहले बंधक बनाया गया और फिर उन की जम कर पिटाई की गई. घायल परिवार रोताबिलखता थाने पहुंचा.

दिल की आवाज सुनने का यह हश्र सिर्फ काजल का ही नहीं हुआ है, बल्कि ऐसे हजारों नौजवान जोड़े हैं, जिन्हें अपनी जाति से बाहर शादी करने की सजा भुगतनी पड़ी है. उन्हें जिस्मानी व दिमागी रूप से इतना सताया जाता है कि कई दफा थकहार कर वे खुदकुशी तक कर लेते हैं और यह सब करने वाले आमतौर पर उन के घर वाले नहीं, बल्कि उन की जाति और गांव के लोग होते हैं.

जरा सोचिए, भारत में तकरीबन 3 हजार जातियां और 25 हजार उपजातियां हैं. शादी के वक्त न सिर्फ जाति, बल्कि उपजाति का भी खयाल रखना पड़ता है. इस के बाद जाहिर है कि हर इनसान की अपनी खास पसंद होती है. उसे खास भाषा, माली हालत, प्रोफैशन, उम्र, सामाजिक बैकग्राउंड वगैरह भी देखना होता है. जाहिर है, इन सब के बीच अपने जीवनसाथी का चुनाव करना बहुत ही मुश्किल हो जाता है.

इस का नतीजा यह निकलता है कि डिमांड और सप्लाई का सिद्धांत काम करने लगता है और शादी के बाजार में लड़कों की कीमत आसमान छूने लगती है. यहीं से दूसरी सामाजिक बुराइयां भी पनपने लगती हैं.

कहां हैं गूगल फेसबुक के देसी विकल्प

एक दौर था जब आईटी सैक्टर में भारत की तूती बोलती थी. दावा किया जाता था कि आईटी यानी सूचना तकनीक की मशीनी दुनिया में भारतीय युवा प्रतिभाओं ने जो कमाल किया है, उस के दम पर भारत पूरे विश्व का ग्रोथ इंजन बना हुआ है. इस की 2 वजहें थीं, पहली-कंप्यूटर, इंटरनैट विषयों को समझने की सही वक्त पर शुरुआत और दूसरी, युवाओं का अंगरेजी ज्ञान.

इन 2 वजहों से भारतीय युवा देखतेदेखते पूरी दुनिया पर छा गया, लेकिन यह कमाल सिर्फ सर्विस सैक्टर में हुआ यानी हम ने जो ज्ञान हासिल किया वह अमेरिका, ब्रिटेन आदि मुल्कों में नौकरी पाने में लगाया. कुछ मानो में यह कमाल आज तक जारी है. गूगल के सीईओ के रूप में सुंदर पिचाई की मौजूदगी यह बात साबित करती है.

लेकिन ऐसा चमत्कार भारत और भारतीय प्रतिभाएं वहां नहीं कर सकतीं, जहां चीन ने बाजी मार ली. यह मामला गूगल, फेसबुक, ट्विटर, अलीबाबा और माइक्रोसौफ्ट जैसी इंटरनैट सेवाएं विकसित करने का है. इन ज्यादातर चीजों में किसी न किसी स्तर पर भारतीय आईटी पेशेवरों ने अपना योगदान दिया है, लेकिन ऐसा ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर का कोई कारनामा भारतीय जमीन पर नहीं हो सका. इस के लिए जहां एक ओर हमारे देश के नीतिनिर्धारक नेता जिम्मेदार हैं जो देश और समाज को ऐसे मामलों में कोई नई दृष्टि व योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए वैसा मंच नहीं दे पाते हैं, तो दूसरी ओर बड़ी समस्या जनता के स्तर पर है.

भारत की जनता एक ओर तो भेड़चाल में विश्वास करती है, विदेशी चीजों के विकल्प के रूप में किसी नए प्रयोग को आजमाने में नाकभौं सिकोड़ती है तो दूसरी तरफ, देश की भलाई के लिए कोई पाबंदी लगाई जाएगी, तो लोकतंत्र की दुहाई दे कर वह सरकार को कोसने में जुट जाती है.

दिक्कतें देसी, हल भी हों देसी

देश में गूगल, फेसबुक आदि के देसी विकल्प बनाने का इस संबंध में एक उदाहरण हो सकता है. इस की बात देश में गाहेबगाहे उठती रही है. दिसंबर 2017 में केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री जयंत सिन्हा ने ऐसी ही एक बात पुणे में आयोजित कार्यक्रम ‘इंडिया आइडियाज कौन्क्लेव’ में कही थी. भारतीय उद्यमियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि अगर समस्याएं देसी हैं, तो उन के समाधान भी देसी होने चाहिए. इस के लिए भारत को गूगल, फेसबुक, अलीबाबा जैसी अंतर्राष्ट्रीय महारथी कंपनियों जैसी कामयाबी के समकक्ष अपना मौडल खड़ा करना चाहिए. ताकि जब देसी समस्याओं के समाधान की बात उठे, तो उन्हें हल करने के तरीके हमारे अपने हों.

उल्लेखनीय है कि हमारी सरकारें इस मसले को ले कर लगातार चिंता व्यक्त करती रही हैं. प्रकाश जावड़ेकर भी वर्ष 2017 में लोकसभा में फेसबुक, ट्विटर, गूगल और माइक्रोसौफ्ट आदि के देसी विकल्प बनाने की बात कह चुके हैं.

लोकसभा में आईआईआईटी बिल (प्राइवेटपब्लिक मोड) 2017 पेश करते वक्त केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावेड़कर ने यह अफसोस जताया था कि भारतीय आईटी प्रतिभाओं को भले ही दुनिया सलाम ठोकती हो, लेकिन इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस में कई कमियां और विसंगतियां हैं, जिन का खमियाजा आईटी सैक्टर भुगत रहा है. सब से बड़ी खामी यह है कि भारत आज तक न तो अपना माइक्रोसौफ्ट बना पाया, न फेसबुक, न ट्विटर, न गूगल. ऊपर से विडंबना यह है कि इन सारी कंपनियों में भारतीय पेशेवर ही नौकरी कर रहे हैं और शीर्ष पदों पर काबिज हैं. ये प्रतिभाएं भी उन अमेरिकी, यूरोपीय चुनौतियों का विकल्प नहीं पेश कर पाईं जिन का आज दुनिया में सिक्का चल रहा है.

पिछली यूपीए सरकार के समय तत्कालीन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने भी इंटरनैट के लिए गूगल की तरह स्वदेशी सर्च इंजन की जरूरत बताई थी.

मालिक नहीं महज ग्राहक हैं हम

यह सच है कि आईटी सैक्टर के अगुआ देश (भारत) के लोग अभी भी इंटरनैट के उपभोक्ता बने हुए हैं, आविष्कारक नहीं. इस से रोजगार, कमाई, बौद्धिक संपदा अधिकार आदि कई मुद्दों पर देश को पिछड़ना पड़ रहा है. हम सिर्फ बाजार, ग्राहक हैं. यह बात इस से साबित होती है कि देश में सामान और सेवाएं बेचने वाले ई-कौमर्स सरीखे काफी इंतजाम हुए हैं, जैसे फ्लिपकार्ट, मिंत्रा, जबौंग, बिग बास्केट और शादीडौटकौम जैसी वैबसाइटों की भरमार है. लेकिन ये सभी सामान और सेवाएं खरीदनेबेचने के प्रबंधों से ज्यादा कुछ नहीं हैं.

ये अमेजोन और इसी तरह की अन्य विदेशी ई-कौमर्स कंपनियों की नकल पर खड़ी की गई हैं. इन में आविष्कार वाली कोई बात नहीं है. इन से कुछ रोजगार तो अवश्य मिले पर देश की आविष्कार वाली वह छवि नहीं बनी, जो हमारी कथित पूरब का ज्ञान वाली इमेज के हिसाब से बौद्धिक अधिकारों (पेटैंट) की फीस से मिलने वाली बेशुमार पूंजी पैदा करती. यह काम तभी हो सकता था जब भारत में ही गूगल, फेसबुक जैसी चीजों के देसी मौडल खड़े किए जाते और उन्हें अपनाया जाता.

देश को इंटरनैट के ऐसे देसी विकल्प सिर्फ इसलिए नहीं चाहिए कि इसी मामले में हम अपने पैरों पर खड़े हो सकेंगे, बल्कि इस की जरूरत कई अन्य वजहों से है, जिस का एक खुलासा वर्ष 2017 में पीडब्ल्यूसी ग्लोबल 100 सौफ्टवेयर लीडर्स के चयन वाली रिपोर्ट से हो चुका है. इस रिपोर्ट में दुनिया की शीर्ष 100 आईटी कंपनियों का वैश्विक चयन किया गया था, जिस में भारत की 16 कंपनियां स्थान बना सकती थीं.

रिपोर्ट के मुताबिक, आईटी सैक्टर में कमाई के मामले में साल 2011 में उभरते बाजार में भारत की 5वीं रैंकिंग थी, जबकि सौफ्टवेयर रैवेन्यू के मामले में 2,738 मिलियन डौलर की कमाई के साथ चीन इस लिस्ट में सब से ऊपर था. चीन के बाद इसराईल, रूस, ब्राजील का नंबर था और उस के बाद भारत का. 100 देशों की लिस्ट में 5वीं रैंकिंग बहुत बुरी नहीं मानी जा सकती, लेकिन यह उपलब्धि हमारे लिए गौरव का विषय नहीं है. कुछ समय पहले तक युवा प्रतिभाओं के बल पर भारत ने अमेरिका की सिलिकौन वैली से ले कर दुनिया के कई विकसित देशों में जिस तरह आईटी सैक्टर में अपनी योग्यता का परचम लहराया था, उस से लगता था कि दशकों तक भारत को कम से कम इस मामले में कोई चुनौती नहीं मिल सकेगी.

भारत में पिछले 2 दशकों में जो बीपीओ इंडस्ट्री खड़ी हुई, कहा जाता था कि उस में उसे कोई चुनौती नहीं है. लेकिन न सिर्फ इस सैक्टर में भारत धीरेधीरे अपनी चमक खो रहा है, बल्कि इनोवेशन (नवाचार) के मामले में भी भारत पिछड़ गया है.

हालात यह है कि आज हम माइक्रोसौफ्ट विंडोज, गूगल, फेसबुक, व्हाट्सऐप जैसी तमाम चीजों के ग्राहक या उपभोक्ता मात्र बन कर रह गए हैं. इस मामले में हमारे आविष्कार जरा भी नहीं हैं. हालांकि, यहां एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि भारतीय आईटी उद्योग में ऐसी क्या समस्याएं पैदा हुईं जिन्होंने उसे ऐसे सैक्टर में आगे बढ़ने से रोक दिया, जिस में कभी उस की तूती बोलती थी.

गूगल की नहीं चलने दी चीन ने

आईटी तकनीक के साथसाथ अंगरेजी सीख कर इस क्षेत्र में भी अब चीन, फिलीपींस जैसे देश भी प्रतिस्पर्धा देने की हैसियत में आ गए हैं. ये देश कभी अंगरेजी बोलचाल की शैली और लहजे में कमियों के कारण काफी पिछड़े हुए थे. आईटी संबंधी ग्लोबल कामकाज में उन का दखल अब आईटी ज्ञान की बदौलत बढ़ा है. चीन जैसे मुल्क सौफ्टवेयर में ही नहीं, बल्कि हार्डवेयर के कामकाज में कड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं. ये मुल्क ऐसा इसलिए कर पाए क्योंकि इन्होंने न केवल भारत जैसे देशों को उन क्षेत्रों मेें कड़ी टक्कर दी जिन का इन्हें विशेषज्ञ माना जाता था बल्कि उन्होंने आईटी के सभी क्षेत्रों में नए अवसरों को तलाशा और उन का दोहन किया.

उल्लेखनीय यह भी है कि चीन ने दुनिया के अग्रणी ब्रैंडों को अपने यहां हावी नहीं होने दिया और उन के बेहतरीन देसी विकल्पों को पेश कर के दिखा दिया कि न तो वह अपने बाजार का किसी अन्य देश या विदेशी कंपनी को दोहन करने देगा और न ही खुद होड़ में बने रहने का कोई मौका गंवाएगा. चीन ने अपने यहां न तो गूगल की एक चलने दी और न ही ट्विटरफेसबुक की. इन के विकल्प उस ने पेश कर दिए हैं और वे बेहद प्रचलित हैं.

एक इलाज है पाबंदी

आतंकी गतिविधियों पर रोक, साइबर सुरक्षा, खोज की नई तकनीक विकसित करने और कमाई जैसे कुछ कारण हैं जिन के आधार पर देसी फेसबुक, ट्विटर और सर्च इंजन गूगल की इस जरूरत को वाजिब ठहराया जा सकता है. हमारे देश में इस आवश्यकता को परखने का एक प्रमुख नजरिया यह भी हो सकता है कि चीन की तरह भारत में इंटरनैट एक दायरे में रह कर काम करे. इसलिए बहुत से लोग इस हदबंदी के पैरोकार होंगे.

आतंकी गतिविधियों से ले कर अश्लील सामग्रियों के प्रसार तक कई ऐसी आपत्तिजनक बातें और चीजें भारत जैसे लोकतांत्रिक  देश में भी इंटरनैट के लिए कुछ बंदिशों और कायदेकानूनों की मांग करते हैं. पर इंटरनैट पर जैसी लगाम पड़ोसी मुल्क चीन में लगाई गई है, क्या वैसा सबकुछ भारत में मुमकिन है? फिलहाल नहीं.

चीन इंटरनैट पर ऐसी पाबंदी इसलिए लगा पा रहा है क्योंकि वहां इन चीजों के विकल्प बनाए गए हैं. वहां अगर गूगल को काम नहीं करने दिया जाए, तो उस का बेहतर विकल्प बायदु डौटकौम हाजिर है. इसी तरह  यदि ट्विटर बंद कर दिया जाता है तो चीन उस के बदले वेईबो पर वही सेवा देने लगता है. यही नहीं, चीन की सरकार इंटरनैट के हर डाटा कोे संचालित करने वाले विशालकाय सर्वर भी बीजिंग में स्थापित करना चाहती है ताकि सारे डाटा को जब चाहे रोका और खंगाला जा सके.

साफ है कि यदि भारत को चीन जैसा नियंत्रित इंटरनैट चाहिए तो उसे गूगल, ट्विटर और फेसबुक जैसी चीजों का विकल्प देना होगा क्योंकि अब इन के बिना दुनिया चल नहीं सकती. पर देसी इंटरनैट विकल्पों की मांग का अकेला यही औचित्य नहीं है. कहने को तो इस के लिए सीधे गूगल, ट्विटर, फेसबुक से बात की जा सकती है कि वे हमारे देश के लिए अलग से गूगल आदि ला दें. चीन में ऐसा प्रयोग किया जा चुका है.

चीनी सरकार की बंदिशों के आगे झुकते हुए गूगल ने 2006 में चीन में अपना सैल्फ सैंसर्ड सर्च इंजन लौंच किया था. तब उस ने चीन सरकार के कुछ दिशानिर्देशों का पालन करने की हामी भरी थी, लेकिन इस से काम नहीं चला. लिहाजा, विशुद्ध चीनी सर्च इंजन बायदु डौटकौम लाया गया, जो उसी तरह काम करता है जैसा चीनी सरकार चाहती है.

हैकिंग का मसला भी सुलझेगा

देसी विकल्पों की खोज का दूसरा मकसद साइबर सुरक्षा को मजबूत बनाना है. अभी साइबर सिक्योरिटी का आलम यह है कि सरकारी संस्थानों की वैबसाइटों को तो जब चाहे, जो चाहे हैक कर लेता है. वहां से डाटा चुराना कोई मुश्किल नहीं है, लेकिन सरकार भी जानती है कि इन चुनौतियों के मद्देनजर माइक्रोसौफ्ट जैसे एक स्वदेशी औपरेटिंग सिस्टम  (ओएस) को विकसित करने की जरूरत है. हालांकि दावा किया जाता रहा है कि इस मोरचे पर अपने देश में काम शुरू हो चुका है.

डीआरडीओ यानी रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के करीब 150 कंप्यूटर इंजीनियर विंडोज और लाइनैक्स जैसे विदेशी व आयातित ओएस जितना ही सक्षम व ताकतवर औपरेटिंग सिस्टम विकसित कर रहे हैें.

इंटरनैट की किसी उपयोगिता के देसी अवतार के बारे में विचार करने के साथसाथ जरूरी यह भी है कि उस की व्यावहारिकता के पहलू पर भी गौर किया जाए. कहीं ऐसा न हो कि सरकारी मदद से विकसित होने और चलने वाली अन्य परियोजनाओं की तरह देसी इंटरनैट, आईटी के विकास का काम सरकारी गति से ही आगे बढे़ और सिर्फ जनता से वसूले गए टैक्स की बरबादी का सबब बन जाए.

सरकार को ऐसी किसी भी परियोजना में हाथ डालने से पहले यह गौर करना चाहिए कि वे योजनाएं आम जनता को आकर्षित करने वाली और देश के आईटी उद्योग को मजबूत करने वाली साबित हों. जनता को भी इस में सहयोग करना होगा. कहीं ऐसा न हो कि किसी दिन सरकार अपनी ओर से गूगलफेसबुक पर प्रतिबंध लगाते हुए उन के बेहतर औप्शन पेश करे, तो जनता उन्हें आजमाए बिना ही सरकार की लानतमलामत में जुट जाए.

आजकल तो यह ट्रैंड भी खूब चल निकला है कि देश के फायदे की किसी भी सरकारी बात पर जनता बिना जांचेपरखे टीकाटिप्पणी करने लगती है और टीवी चैनल वाले 8-10 लोगों को स्टूडियो में बिठा कर दिनरात आलोचना का कीर्त चालू कर देते हैं. ऐसे में सरकार को जनमत के दबाव में अपना फैसला बदलना पड़ता है क्योंकि सत्ता में बैठी पार्टी को लगता है कि  उसे आगे भी सरकार बनानी है, तो जनता जैसा चाहती है, वैसा ही करना होगा.

इस में नेताओं का दोष यह है कि वे जनता को समझा नहीं पाते हैं कि सरकार जो फैसला कर रही है, वह आखिरकार पूरे देश के लिए अच्छा होगा.

चीन ने कब क्या बैन किया

चीनी सरकार की यह नीति रही है कि विदेश से आने वाली कोई भी सूचना उस के नागरिकों तक सीधे नहीं पहुंच सकती. यह पहले विदेशी कंपनियों के स्वामित्व वाली सभी चीजों को फिल्टर करती है ताकि पता लगाया जा सके कि कहीं कोई चीन की आलोचना तो नहीं कर रहा है. इस के लिए चीन की सरकार ने पूरी दुनिया में मशहूर कई ऐप्स (अप्लीकेशंस) अपने यहां प्रतिबंधित कर रखे हैं.

चीन ने अपने बेहद कड़े साइबर सुरक्षा कानूनों का हवाला देते हुए मुफ्त में औनलाइन बातचीत और मैसेजिंग की सुविधा देने वाले स्काइप पर अक्तूबर 2017 में रोक लगा दी थी. दावा किया गया कि इस के स्वामित्व वाली कंपनी माइक्रोसौफ्ट ऐप्पल के चीन स्थित ऐप स्टोरों से स्काइप को पूरी तरह हटा दिया गया था.

स्काइप जैसे ऐप पर पाबंदी वर्ष 2017 की शुरुआत में ही वहां लग चुकी है. चीन में व्हाट्सऐप की जगह उस के चीनी विकल्प वीचैट को पेश किया गया, जिस के वहां करीब 9 करोड़ उपभोक्ता हैं.

वर्ष 2014 में जब युवाओं के कुछ संगठनों ने हौंगकौंग में बेहद चर्चित आंदोलन ‘अंबे्रला रिवोल्यूशन’ चलाया तो इस के लिए फोटो शेयरिंग ऐप इंस्टाग्राम को अपने आंदोलन का जरिया बनाया. यह देखते हुए चीन ने अपने यहां इस ऐप को बैन कर दिया.

कुछ ऐसा ही नजारा तब दिखा जब जुलाई 2009 में चीन के शिंजिंयाग प्रांत में हुए उरुमक्वी दंगों में फेसबुक के बढ़चढ़ कर इस्तेमाल की बात पता चली. इस के बाद चीन ने तुरंत फेसबुक पर रोक लगा दी, हालांकि हौंगकौंग और मकाऊ के कुछ इलाकों में कुछ शर्तों के साथ इस के प्रयोग की छूट दी गई.

चीन ने जून 2009 में ट्विटर के साथसाथ ब्लौगिंग के प्लेटफौर्म ब्लौगर और वर्डप्रैस पर भी रोक लगा दी थी. हालांकि, कुछ चीनियों ने इस पाबंदी को धता बताते हुए जुगाड़ के जरिए इन का इस्तेमाल जारी रखा.

यूट्यूब पर भी चीन में सब से पहले 2007-08 के कुछ महीनों के लिए रोक लगाई गई थी, पर इस पर बाद में पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई. अब यूट्यूब सिर्फ हौंगकौंग, मकाऊ, शंघाई फ्री टे्रड जोन में ही देखा जा सकता है.

चीन में सब से ज्यादा चर्चा वर्ष 2014 में गूगल व जीमेल पर रोक लगाने की हुई. असल में गूगल और चीन के रिश्तों में हर समय उतारचढ़ाव आता रहा है. फिलहाल वहां इस पर पाबंदी है. लेकिन वर्ष 2010 से गूगल ने अपना कामकाज हौंगकौंग की ओर शिफ्ट कर दिया जहां इस पर सैंसर की कोई पाबंदी नहीं है.

कैरियर इन क्रिएटिव फील्ड

यदि आप क्रिएटिविटी और फैशन को ले कर पैशनिस्ट हैं तो ग्लैमर वर्ल्ड में अपना कैरियर तलाश सकते हैं. इस में थोड़ा रिस्क तो है, लेकिन अगर कामयाब हो गए तो पौपुलैरिटी के साथसाथ पैसा भी खूब है. आज फैशन की दुनिया का दायरा काफी बढ़ गया है. रैंप शो, फैशन शो, ब्रैंड प्रमोशन इवैंट सभी बड़े और मेगा बजट के होने लगे हैं. इन के बढ़ने से आज की जैनरेशन ग्लैमर को बतौर कैरियर अपनाने के लिए उत्सुक है.

युवाओं के लिए यह फील्ड काफी आकर्षक है, क्योंकि इस में क्रिएटिविटी और इमैजिनेशन में ग्लैमर का तड़का लगाने की जरूरत होती है. यंग जैनरेशन हर बार कुछ नया करना चाहती है, इस फील्ड में इस की सब से ज्यादा जरूरत भी है. आइए जानते हैं कुछ ऐसे ही ग्लैमरस कैरियर औप्शंस के बारे में :

फैशन कोरियोग्राफी

आमतौर पर यों तो फैशन कोरियोग्राफी को ही फैशन डिजाइनिंग समझा जाता है, जबकि ऐसा नहीं है. कोरियोग्राफर पर ही पूरे शो की जिम्मेदारी होती है. किस मौडल को क्या पहनना है, रैंप पर कब किस मौडल को कैसे कैटवाक करनी है, साथ ही शो स्टौपर के साथ मौडल्स की पोजिशंस को भी कोरियोग्राफर ही मैनेज करता है.

डिमांड : आएदिन फैशन शोज और प्रमोशन इवैंट होते रहते हैं. ऐसे में यह इवैंट फैशन इंडस्ट्री में हो रहे अपडेट्स को जानने का भी एक बेहतरीन सोर्स है. साथ ही फैशन कोरियोग्राफर्स की डिमांड भी लगातार बढ़ रही हैं. इतना ही नहीं, कालेज इवैंट्स के अलावा कौर्पाेरेट इवैंट्स में भी फैशन शोज काफी पौपुलर हो रहे हैं.

स्टडी से ज्यादा लाइव ऐक्सपीरियंस: इस फील्ड की खास बात यह है कि इस में थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल पर जोर दिया जाता है. अगर आप में क्रिएटिविटी है तो किसी फैशन कोरियोग्राफर के साथ काम सीख सकते हैं. शुरुआत में कम सैलरी मिलती है. लेकिन जैसेजैसे आप के शोज हिट होते जाते हैं, वैसेवैसे आप की इनकम बढ़ती जाती है. आप चाहें तो आगे चल कर एक ब्रैंड के रूप में भी काम कर सकते हैं. यह आप को अपनी एक अलग पहचान देगा.

नौलेज जरूरी : फैशन कोरियोग्राफर में म्यूजिक के सेलैक्शन और कलैक्शन की समझ के साथसाथ शो के लिए लुक और थीम तैयार करने की भी समझ होनी चाहिए. कोरियोग्राफर को एक ही समय पर कई सारे काम करने पड़ते हैं, जैसे मौडल और डिजाइनर से ड्रैस की फिटिंग चैक कराना, शो को डायरैक्ट करना, डीजे म्यूजिक और लाइट इंजीनियर के साथ कोओर्डिनेट करना.

society

मौडलिंग

अट्रैक्टिव लुक और बेहतर कम्युनिकेशन स्किल्स इस क्षेत्र में सफलता का मूलमंत्र है. बीटाउन में ऐंट्री करने वाले कई ऐक्टरऐक्ट्रैस मौडलिंग से ही ऐक्टिंग में आए हैं. ऐश्वर्या राय से ले कर जौन अब्राहम तक सभी पहले मौडलिंग करते थे. यदि आप का चेहरा फोटोजैनिक है और फैशन, ग्लैमर आप को शुरू से ही अट्रैक्ट करता रहा हो तो मौडलिंग आप के लिए बढि़या कैरियर औप्शन होगा.

 टैलीविजन मौडलिंग : इस में आप को मूवी कैमरों के सामने मौडलिंग करनी पड़ती है, जिस का इस्तेमाल टीवी विज्ञापनों, सिनेमा, वीडियो और इंटरनैट में किया जाता है. आजकल डिजिटल मीडियम में भी इस के अवसर बढ़े हैं.

प्रिंट मौडलिंग : इस में स्टिल फोटोग्राफर्स मौडल्स की तसवीरें लेते हैं, जिन का इस्तेमाल अखबार, ब्रोशर्स, पत्रिकाओं, कैटलौग, कैलेंडरों आदि में किया जाता है.

शोरूम मौडलिंग : शोरूम मौडल्स आमतौर पर निर्यातकों, गारमैंट निर्माताओं और बडे़ रिटेलरों के लिए काम करते हुए फैशन को प्रदर्शित करते हैं.

रैंप मौडलिंग : इस में मौडल्स को रैंप पर वाक करते हुए किसी नामी फैशन डिजाइनर के कपड़ों की झलक दिखानी होती है. रैंप मौडल की खड़े होने की अदा, चलने की शैली और बौडी लैंग्वेज का बेहतर होना जरूरी है.

क्या है जरूरी : मौडलिंग के क्षेत्र में आने के लिए यों तो किसी खास तरह की योग्यता का होना जरूरी नहीं है, हां, लड़कियों के लिए इस फील्ड में लंबाई 5 फुट 7 इंच और लड़कों के लिए 5 फुट 10 इंच होनी जरूरी है. इसी के साथ ही अगर आप ने किसी मौडलिंग इंस्टिट्यूट से ट्रेनिंग ले रखी है तो सोने पर सुहागा. 12वीं के बाद आप सीधे इस क्षेत्र में दाखिला ले सकते हैं.

कहां से करें : जे डी इंस्टिट्यूट औफ फैशन डिजाइन मुंबई, नैशनल इंस्टिट्यूट औफ फैशन डिजाइन चंडीगढ़, आर के फिल्म्स ऐंड मीडिया एकेडमी, नई दिल्ली.

फैशन डिजाइनिंग

आज डिजाइनर कपड़ों की बढ़ती मांग के चलते फैशन इंडस्ट्री में तेजी से उछाल आया है. इंडियन फैशन इंडस्ट्री ग्लोबल रूप ले चुकी है. हर महीने करोड़ों का कारोबार होता है. यहां तक कि भारत में तैयार होने वाले कपड़ों की मांग विदेशों में भी खूब है.

ऐसे में फैशन डिजाइनिंग में कैरियर की काफी अच्छी संभावनाएं हैं. ऐक्सपोर्ट हाउस, फैशन डिजाइनर, गारमैंट चेन स्टोर, टैक्सटाइल मिल, लाइफस्टाइल मैग्जीन के साथ आप फैशन मर्चेंडाइजर के रूप में फैशन डिजाइनर के साथ काम कर सकते हैं या ऐक्सपोर्ट हाउस के साथ जुड़ सकते हैं. अगर आप कुछ हट कर करना चाहते हैं तो शू डिजाइनिंग या फिर ज्वैलरी डिजाइनिंग से ले कर ऐक्सैसरी डिजाइनिंग जैसे कैरियर भी चुन सकते हैं. फैशन और ग्लैमर का तालमेल तो हमेशा ही रहा है, यही कारण है कि यह क्षेत्र यूथ को बेहद आकर्षित करता है.

कोर्स : यह प्रोफैशनल कोर्स 12वीं के बाद किया जा सकता है. इस के तहत अपेरल डिजाइनिंग, फैशन डिजाइनिंग, प्रोडक्शन मैनेजमैंट, क्लौथिंग टैक्नोलौजी, टैक्सटाइल साइंस, अपेरल कंस्ट्रक्शन मैथड, फैब्रिक ड्राइंग और प्रिंटिंग, कलर मिक्सिंग तथा कंप्यूटर एडेड डिजाइन आदि क्षेत्रों में से किसी एक का चुनाव कर सकते हैं. इस में सर्टिफिकेट, डिप्लोमा, एडवांस डिप्लोमा, फाउंडेशन डिगरी, डिगरी और पीजी डिगरी तक कोर्स उपलब्ध हैं. निफ्ट जैसे संस्थान में प्रवेश के लिए लिखित परीक्षा, ग्रुप डिस्कशन और इंटरव्यू के दौर से गुजरना पड़ता है.

कहां से करें : नैशनल इंस्टिट्यूट औफ फैशन टैक्नोलौजी दिल्ली, एमिटी स्कूल औफ फैशन टैक्नोलौजी नोएडा, नैशनल इंस्टिट्यूट औफ फैशन टैक्नोलौजी मुंबई, सिंबायोसिस इंस्टिट्यूट औफ डिजाइन पुणे.

क्या कहना है मौडलिंग से ऐक्टिंग में आए सितारों का

वानी सूद : श्रीदेवी के साथ फिल्म ‘मौम’ और कई टीवी शोज में आने वाली दिल्ली गर्ल वानी सूद कहती हैं, ‘‘ मैं अपने कालेज के फैशन वीक में हिस्सा लेती थी. जब लोगों ने एप्रिशिएट किया तब कई ब्रैंड्स और फैशन शोज में मौडलिंग की. मैं मुंबई मौडलिंग के लिए ही आई थी लेकिन साथ में ऐक्टिंग प्रोजैक्ट्स के लिए औडिशन देती रही, चांस मिला तो ऐक्टिंग में आ गई.’’

अर्जित तनेजा : अर्जित ने भी अपनी शुरुआत मौडलिंग से की थी. वे कहते हैं, ‘‘मैं ने कभी ऐक्टिंग में कैरियर बनाने की नहीं सोची थी. शौकिया मौडलिंग करता था. एक बार किसी फैशन शो के लिए मुंबई जाना पड़ा तो मेरा पोर्टफोलियो वहां शेयर हुआ और मुझे एक टीवी शो के औडिशन के लिए बुला लिया गया.’’

क्रिएटिव सोच वाले ही सक्सैसफुल हैं

दिल्ली एनसीआर में कई बड़े फैशन शोज की कोरियोग्राफी कर चुके पुष्कर कहते हैं, ‘‘फैशन कोरियोग्राफी का क्षेत्र बहुत बड़ा है, इस में हार्डवर्क और कई चैनलों में एकसाथ काम और कोऔर्डिनेशन करना पड़ता है. मेरी टीम कई बार 12 घंटे से भी ज्यादा काम करती है. यह फैशन क्रिएटिव सोच रखने वाले के लिए बिलकुल सही जगह है.’’

भीख घोटाला : इन की इजाजत के बिना एक चवन्नी नहीं मांग सकता भिखारी

भारत में ट्रैफिक सिगनल की लाल बत्ती पर किसी फटेहाल औरत का अपनी गोद में बच्चा लिए किसी कार की तरफ दौड़ना या किसी छोटे बच्चे के साथ विकलांग बूढ़े का भीख मांगना दिखाई देना आम बात है. आप को रेलवे स्टेशनों, मैट्रो स्टेशनों, पर्यटन स्थलों, मंदिरों में भीख मांगते हुए कई लोग मिलेंगे और कई ऐसी जगहों पर तो रोजाना मिलेंगे जहां भीड़ ज्यादा होती है.

ऐसी ही कुछ वजहों के चलते भारत में भीख मांगना सब से गंभीर सामाजिक बुराइयों में से एक है. देश में कुछ भिखारी असली हैं, जो काम करने में नाकाम हैं क्योंकि वे बूढ़े या शरीर से लाचार हैं. उन्हें बुनियादी जरूरतों के लिए पैसे की जरूरत है, इसीलिए वे भीख मांगते हैं. ऐसे कई लोग हैं जो गरीबी रेखा से नीचे हैं और अपना पेट भरने के लिए भीख मांगते हैं.

कुछ मामले ऐसे हैं जिन में पूरे परिवार के सदस्य भीख मांगने में शामिल हैं. इस तरह के परिवारों के बच्चे स्कूल नहीं जाते, बल्कि भीख मांगते हैं. वे भीख इसलिए भी मांगते हैं क्योंकि उन के परिवार की एक दिन की आमदनी में पूरे परिवार को खिलाने के लिए जरूरत के मुताबिक पैसा नहीं है.

भीख मांगना एक घोटाला

भारत में भीख मांगने वालों का एक बड़ा रैकेट बन गया है. कई लोगों के लिए भीख मांगना किसी दूसरे पेशे की तरह है. वे पैसे कमाने के लिए बाहर जाते हैं. वे काम कर के नहीं बल्कि भीख मांग कर कमाना चाहते हैं.

ऐसे लोग गिरोह के साथ दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम, मुंबई, कोलकाता जैसे शहरों में भीख मांग रहे हैं. इन गिरोहों के अपने नेता होते हैं. हर नेता भिखारियों के एक समूह को खास इलाका बांटता है और रोजाना की कमाई उन के बीच साझा करता है.

भिखारियों का नेता अपने पास बड़ा हिस्सा रखता है और बाकी हिस्सा भिखारियों में बांट देता है. ये भिखारी भीख मांगने में इतने लीन हो जाते हैं कि इस के अलावा और कोई काम नहीं करना चाहते हैं.

यह पता लगाना मुश्किल है कि कौन असली भिखारी है और कौन बनावटी भिखारी है क्योंकि दोनों देखने में एकजैसे ही लगते हैं. यहां तक कि उन के बच्चों को भीख मांगने और असली दिखने के लिए ठीक से ट्रेंड किया जाता है. जब हम एक जवान को उस के छोटे बच्चे को पकड़े हुए सड़कों पर भीख मांगते हुए देखते हैं तो कभीकभी उन के चेहरे को देख कर हमारे दिल पसीज जाते हैं.

ज्यादातर मामलों में बच्चे को सोते (नशे की हालत में) हुए पाया जाता है, यकीनी तौर पर यह एक घोटाला है. कई स्टिंग औपरेशनों से पता चला है कि भीख मंगवाने में बच्चों को किराए पर लिया जाता है. कभीकभी बच्चों को पूरे दिन के लिए नशा दे दिया जाता है ताकि वे बीमार लगें.

भिखारी को बहुत अच्छे ढंग से ट्रेनिंग दी जाती है ताकि जब वह भीख मांग रहा हो तो आप उन्हें पैसे देने के लिए राजी हो जाएं, खासतौर पर विदेशियों के लिए.

भिखारी देश में असामाजिक तत्त्व बन जाते हैं. वे सभी ड्रग्स का सेवन करने लगते हैं. ड्रग्स खरीदने के लिए पहले वे भीख मांगना शुरू करते हैं, फिर जब जेबखर्च धीरेधीरे बढ़ता है तो वे लूट और हत्या जैसे बड़े अपराधों में शामिल हो जाते हैं.

देश में 4 लाख से भी ज्यादा भिखारी हैं. सब से ज्यादा भिखारी पश्चिम बंगाल में हैं और सब से कम भिखारी के मामले में लक्षद्वीप हैं. वहां महज 2 भिखारी हैं.

लोकसभा में एक लिखित सवाल का जवाब देते हुए सामाजिक न्याय मंत्री थावर चंद गहलोत ने यह जानकारी दी. उन्होंने बताया कि जनसंख्या सर्वे 2011 में जमा किए गए आंकड़ों के आधार पर यह जानकारी मुहैया कराई गई है.

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, भारत में कुल 4 लाख, 13 हजार, 670 भिखारी हैं, जिस में से 2 लाख, 21 हजार, 673 मर्द और एक लाख, 91 हजार, 997 औरतें हैं.

देशभर में पश्चिम बंगाल में भिखारियों की तादाद सब से ज्यादा 81 हजार, 224 है. इस के बाद नंबर आता है उत्तर प्रदेश का जहां 65 हजार, 835 भिखारी हैं. तीसरे नंबर पर बिहार है जहां 29 हजार, 723 भिखारी हैं. मध्य प्रदेश में 28 हजार, 695 भिखारी हैं.

पूर्वोत्तर के राज्यों में भिखारियों की तादाद असम में सब से ज्यादा है और मिजोरम में सब से कम. दक्षिण के राज्यों में सब से कम भिखारी केरल में हैं तो सब से ज्यादा भिखारी आंध्र प्रदेश में हैं.

इस आंकड़े के मुताबिक, पश्चिम बंगाल सहित असम, मणिपुर जैसे राज्यों में मर्द भिखारियों के मुकाबले औरत भिखारियों की तादाद ज्यादा है.

केंद्रशासित प्रदेशों में सब से ज्यादा भिखारी दिल्ली में हैं. दिल्ली में कुल 12,187 भिखारी हैं, जबकि चंडीगढ़ में कुल 723.

क्या करना चाहिए

भारत में तेजी से भिखारियों की तादाद में बढ़ोतरी हो रही है. सरकार, विभिन्न संगठन, कार्यकर्ता दावा करते हैं कि भिखारियों को खत्म करने के लिए कई उपाय किए गए हैं और कुछ हद तक कामयाब भी हुए हैं. लेकिन भीख मांगने की आदत अभी भी जारी है.

हमें भी इस के लिए कुसूरवार ठहराया जाना चाहिए क्योंकि हम भारतीयों के रूप में बहुत रूढ़िवादी और ऊपर वाले से डरने वाले हैं. हम ने अपने मन को धार्मिक सीमा में बांध कर रखा है. यह हमें दान करने के लिए मजबूर करता है और दान करने का सब से आसान तरीका है कि पास के मंदिर में जाएं और वहां पर भिखारियों को भीख दें. यह उन्हें निकम्मा बनाता है और आम आदमी को रिश्वत देने की आदत डालता है.

यह सेवा का काम नहीं है. भीख देना बंद करना चाहिए. भले ही चाहे ऐसा लगे कि हम बेरहम हैं, पर जब कोई छोटा बच्चा सड़क पर भीख मांगने के लिए आए तो उसे पैसा न दिया जाए. यह एक ऐसा कदम है जिस से भिखारियों को कम करने में कुछ हद तक मदद मिल सकती है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें