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दुबलेपन को कहें बाय-बाय, वज़न बढ़ाएं ऐसे 

मौजूदा भागदौड़भरी लाइफस्टाइल में खुद को फिट बनाए रखना हर लिहाज से जरूरी है. दुबलेपन को दूर करने और कमजोर शरीर को तंदुरुस्त बनाने के लिए लोग दवाओं से ले कर तरहतरह के हैल्थ सप्लीमैंट्स लेते हैं. लेकिन फिर भी अधिकतर लोगों का शरीर कमजोर और दुबलापतला ही रहता है.

दुबलेपतले शरीर के कारण किशोरों, युवाओं और अधेड़ पुरुषों को क्रमशः स्कूल, कालेज और औफिस या बिज़नैस प्रतिष्ठानों तक में शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है. वजन बढ़ाने के लिए पुरुषजाति न जाने क्याक्या करती है, खाती है, लेकिन वजन नहीं बढ़ता और शरीर जस का तस ही बना रहता है.

1. क्यों नहीं बनती सेहत :

वजन न बढ़ने और तंदुरुस्त न होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं.  इन कारणों में कुछ ऐसी गलत आदतें भी शामिल होती हैं, लोग जिन के शिकार हो जाते हैं. ऐसी आदतें न केवल शरीर को बाहरी तौर पर नुकसान पहुंचाती हैं बल्कि शरीर को भीतर से भी नुकसान पहुंचाती हैं.

आप उन में से हैं जो खाते तो बहुत हैं लेकिन उन के शरीर में लगता नहीं है, तो वो गलतियां न करें जिन का ज़िक्र यहां किया जा रहा है. आप अगर चाहते हैं कि आप तंदुरुस्त रहें और आप की पर्सनैलिटी दूसरों की तरह चमके तो इन गलत आदतों को बायबाय कर दें.

2. भूख लगने पर खाना न खाने की आदत :

व्यस्त जीवनशैली में अधिकतर लोग अपने शैड्यूल के चक्कर में  सही समय पर खाना नहीं खाते  हैं. कोई ऐसा अगर नियमितरूप से करता  है तो उस की सेहत पर बुरा असर पड़ना शुरू हो जाता है. दरअसल, ऐसा करने से भूख मर सी जाती है, भूख लगना बंद हो जाती है. सही समय पर खाना नहीं खाने से शरीर पर विपरीत असर पड़ता है. किसी भी इंसान की यह गलत आदत उस के शरीर को तंदुरुस्त नहीं होने देती.

3. रोज एक सी ऐक्सरसाइज करने की आदत :

फिट रहने और शरीर के वजन को बढ़ाने के लिए रोजाना ऐक्सरसाइज करना अनिवार्य है. सुबह की सैर पर जाना, किसी मैदान या पार्क में थोड़ीबहुत कसरत या उछलकूद करने से सेहत बेहतर होती है. इस के लिए अधिकतर पुरुषों ने जिम को एक आसान विकल्प समझा हुआ है.

लोग जिस्म बनाने के चक्कर में दवाएं और हैल्थ सप्लीमैंट्स ले लेते हैं, जो उन्हें भले ही  मसल्स बनाने में जरूर मदद करते हैं लेकिन इस के साइड इफैक्ट बाद में सामने आते हैं. दूसरों को बौडी बनाता देख नए लड़के भी वही करने लग जाते हैं और रोजाना एक ही ऐक्सरसाइज करने लगते हैं. तंदुरुस्त न होने के पीछे एक वजह यह भी है. बहुत से लोग जिम जा कर रोजाना एक ही तरह की ऐक्सरसाइज करते हैं. रोजाना एक ही तरह की ऐक्सरसाइज करने से शरीर के अंग कमजोर होने लग जाते हैं और फिर बौडी नहीं बन पाती.

दरअसल, अगर इंग्लिश ऐक्सरसाइज कर रहे हैं तो उसे ट्रेनर के निरीक्षण में करें क्योंकि उस का एक साइंस होता है. जिम ट्रेनर इंसान के जिस्म के मुताबिक ऐक्सरसाइज करने का चार्ट बना देते हैं, जिस में हफ्ते के 6 दिनों का ब्योरा होता है कि किस दिन कौनकौन सी ऐक्सरसाइज करनी हैं. जिम ट्रेनर के निरीक्षण में ऐक्सरसाइज करने से जिस्म फिट रहने के साथ वजन बढ़ कर आदर्श लैवल पर बना रहता है.

4. पानी कम पीने की आदत :

24 घंटे के रातदिन के दौरान इंसान को भरपूर पानी पीना चाहिए. पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से शरीर को भीतर व बाहर दोनों तरफ से फायदा मिलता है. यह शरीर के वजन को बढ़ाने व जिस्म की स्किन और बालों को पोषण प्रदान करने में अहम भूमिका निभाता है.

देशविदेश के वैज्ञानिकों का कहना है कि इंसान को अपनेआप को हाइड्रेट रखने और शरीर से टौक्सिन्स को बाहर निकालने के लिए दिनभर में 8 से 10 गिलास पानी या कोई तरल पदार्थ पीना चाहिए. इंसान चाहे तो नारियल पानी और ताजे फलों का जूस भी पी सकता है. सो, अगर कोई कम पानी पीता है तो उसे यह आदत छोड़नी होगी.

5. सोने में कंजूसी की आदत :

ऊर्जावान और स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है कि इंसान नियमित रूप से पूरी नींद लें. नींद न पूरी होने से सिर भारी रहने के साथ शरीर का ब्लडप्रैशर यानी बीपी बढ़ सकता है. नींद न पूरी होने की वजह से थकान के साथसाथ चिड़चिड़ाहट भी महसूस होती है और बातबात पर गुस्सा आता है. मैडिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, कम से कम 7 घंटे की नींद लेनी जरूरी है. पूरी नींद लेने से इंसान स्वस्थ महसूस करने के साथ ऊर्जावान बना रहता है. यह इंसान की फिटनैस और आदर्श वजन के लिए भी बेहद ज़रूरी है. ऐसे में जो लोग रात में सोने में कंजूसी करते हैं वे अपनी इस आदत को छोड़ दें.

यानी, सेहतमंद जीवन के लिए जरूरी होती हैं अच्छी आदतें. ये इंसान को खुश रखने के साथ ऊर्जा से भरपूर भी रखती हैं. यही नहीं, ये इंसान को बीमारियों से काफी हद तक दूर भी रखती हैं. तो, गलत आदतों को त्याग कर कोई भी तंदुरुस्त होने के साथ आइडियल वज़न हासिल कर सकता है.

अगर आप भी करते हैं रक्तदान तो जरूर ध्यान रखें इन बातों का

आज के समय में ब्लड डोनेट (रक्तदान) करके आप दूसरों की मदद तो करते ही हैं साथ ही आपको भी इसके बहुत फायदे होते हैं. कई लोगों को लगता है कि रक्तदान करने के बाद शरीर में कमजोरी आ जाती है, लेकिन ऐसा नहीं है. रक्तदान करने के 21 दिन बाद यह दोबारा बन जाता है. इसलिए रक्तदान करने से पहले घबराए नहीं बल्कि रक्तदान करते समय इन बातों का खास खयाल रखें.

– कोई भी हेल्दी व्यक्ति रक्तदान कर सकता है. बात करें पुरुष की तो वह 3 माह में एक बार रक्तदान कर सकते हैं वहीं महिलाएं 4 माह में एक बार ब्लड डोनेट कर सकती हैं.

– एक बार में किसी के शरीर से भी 471ml से ज्यादा रक्त नहीं लिया जा सकता.

– अगर आप रक्तदान करने के योग्य हैं और रक्तदान करने की सोच रही हैं तो एक दिन पहले से स्मोक करना बंद कर दें. इसके अलावा रक्तदान करने के तीन घंटे बाद ही धुम्रपान करें.

– रक्तदान करने के बाद हर तीन घंटे में हैवी डाइट लें. इसमें आप ज्यादा से ज्यादा हैल्दी खाना ही लें. आप चाहे तो फल खा सकती हैं.

– ज्यादातर रक्तदान करने के बाद रक्तदाता को खाने के लिए जूस, चिप्स, फल आदि दिए जाते हैं, इन्हें लेने से परहेज नहीं करना चाहिए.

– रक्तदान करने के 12 घंटे बाद तक आप हैवी एक्सरसाइज न करें. खून देने के तुरंत बाद गर्मजोशी अच्छी नहीं होती. पहले अपने शरीर में खून के संचार को नौर्मल होने दें.

– रक्तदान करने से 48 घंटे पहले से शराब का सेवन बंद कर दें. अगर आपने 48 घंटों के बीच शराब का सेवन किया है तो आप ब्लड डोनेट नहीं कर सकते हैं

– रक्तदान करने के बाद अगर आप हेल्दी डाइट न लेकर तरल पदार्थ लेती रहेंगी, तो इससे आपको कमजोरी महसूस होगी.

– लोगों को गलतफहमी होती है कि रक्तदान करने से हीमोग्लोबिन में कमी आती है, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है.

 

अगर आप भी हैं पैनिक डिसऔर्डर के शिकार तो जरूर पढ़ें ये खबर

पैनिक डिसऔर्डर एक ऐसा मनोरोग है जिस में किसी बाहरी खतरे के बावजूद विभिन्न शारीरिक लक्षणों, मसलन, दिल की धड़कन का असामान्य हो जाना तथा चक्कर आना आदि के साथ लगातार और आकस्मिक रूप से रोगी आतंकित हो जाता है. ये आतंकित कर देने वाले दौरे, जो कि पैनिक डिसऔर्डर की पहचान हैं, तब आते हैं जब किसी खतरे पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने की सामान्य मानसिक प्रक्रिया तथा कथित संघर्ष अनुपयुक्त रूप से जाग जाता है.

पैनिक डिसऔर्डर से ग्रस्त अधिकतर लोग अगले अटैक की संभावना को ले कर चिंतित रहते हैं और उन स्थितियों से बचने की कोशिश करते हैं जिन में उन के अनुसार यह भय का दौरा पड़ सकता है.

शुरुआती पैनिक अटैक

आमतौर पर पहला पैनिक अटैक कभी भी हो सकता है, जैसे कार चलाते हुए या काम के लिए जाते हुए. सामान्य गतिविधियों के दौरान एकाएक व्यक्ति डराने वाले तथा तकलीफदेह लक्षणों से ग्रस्त हो जाता है. ये लक्षण कुछ सैकंड तक जारी रहते हैं लेकिन कई मिनट तक भी यह स्थिति बनी रह सकती है. ये लक्षण लगभग एक घंटे के भीतर सामान्य हो जाते हैं. जिन लोगों पर यह दौरा पड़ चुका है वे बता सकते हैं कि उन्होंने किस तरह की बेचैनी के साथ यह डर महसूस किया था कि उन्हें कोई बहुत खतरनाक जानलेवा बीमारी हो गई है या फिर वे पागल हो रहे हैं.

ऐसे कुछ लोग जिन्हें एक पैनिक अटैक या फिर कभीकभार जिन का सामना इस दौरे से हुआ हो, उन में ऐसी किसी समस्या का विकास नहीं होता जो उन के जीवन को प्रभावित करे लेकिन दूसरों के लिए इस स्थिति का जारी रहना असहनीय हो जाता है. पैनिक डिसऔर्डर में आतंकित कर देने वाले दौरे जारी रहते हैं और व्यक्ति के मन में यह डर समा जाता है कि उसे अगले दौरे का सामना कभी भी करना पड़ सकता है.

यह भय जिसे अग्रिम बेचैनी या डर का खौफ कहते हैं, अधिकतर समय मौजूद रहता है और व्यक्ति के जीवन को गंभीर रूप से तब भी प्रभावित कर सकता है जब उस पर दौरा नहीं पड़ा हो. इस के साथसाथ उस के मन में उन स्थितियों को ले कर भयंकर फोबिया का जन्म हो जाता है जिन में उस पर दौरा पड़ा था.

उदाहरण के लिए अगर किसी को गाड़ी चलाते वक्त पैनिक अटैक हुआ हो तो वह आसपास जाने के लिए भी गाड़ी चलाने में डरता है. जिन लोगों में आतंक से जुड़े इस फोबिया का विकास हो गया हो वे उन स्थितियों से बचने की कोशिश करने लगते हैं जिन के बारे में उन्हें आशंका रहती है कि उन को दौरा पड़ सकता है. परिणामस्वरूप वे अपनेआप को लगातार सीमित करते चले जाते हैं. उन का काम प्रभावित होता है क्योंकि वे बाहर निकलना नहीं चाहते और न ही समय पर अपने काम पर पहुंचते हैं.

इन दौरों की वजह से व्यक्ति के संबंध भी प्रभावित होते हैं. नींद पर असर पड़ता है और रात में दौरा पड़ने की स्थिति में व्यक्ति आतंकित हो कर जाग जाता है. यह अनुभव इतना हिला देने वाला होता है कि कई लोग सोने से भी डरने लगते हैं और थकेथके से रहते हैं. दौरा न पड़े, तब भी डर की वजह से नींद प्रभावित होती है.

इस सिलसिले में डाक्टर से मिलने के बाद जब यह पता चल जाता है कि जीवन पर खतरे की कोई स्थिति नहीं है तब भी इस दौरे से प्रभावित बहुत से लोग आतंक में डूबे रहते हैं. वे बहुत से चिकित्सकों के पास दिल की बीमारी या सांस की समस्या के इलाज के लिए भी जाया करते हैं. इस बीमारी के लक्षणों की वजह से बहुत से मरीज यह समझते हैं कि उन्हें कोई न्यूरोलौजिकल बीमारी या फिर कोई गंभीर गैस्ट्रौइनटैस्टाइनल समस्या हो गई है. कुछ मरीज कई चिकित्सकों से मिल कर महंगी और अनावश्यक जांच करवाते हैं ताकि यह मालूम किया जा सके कि इन लक्षणों की वजह क्या है.

चिकित्सकीय सहायता की यह खोज लंबे समय तक भी जारी रह सकती है क्योंकि इन मरीजों की जांच करने वाले बहुत से चिकित्सक पैनिक डिसऔर्डर की पहचान करने में असफल रहते हैं. जब चिकित्सक बीमारी की थाह पा भी लेते हैं तब भी कभीकभी वे इस की व्याख्या करते हुए यह सलाह दे देते हैं कि खतरे की कोई बात नहीं है और इलाज की कोई जरूरत नहीं है.

उदाहरण के लिए, चिकित्सक यह कह सकते हैं कि चिंता की कोई बात नहीं है. आप को सिर्फ पैनिक डिसऔर्डर अटैक हुआ था. हालांकि इस का उद्देश्य सिर्फ हौसलाअफजाई होता है, फिर भी ये शब्द उस चिंतित मरीज के लिए बेहद निराशाजनक होते हैं जोकि बारबार इस तरह के आतंकित करने वाले दौरों की चपेट में रहता है. मरीज को यह बताया जाना जरूरी है कि चिकित्सक अशक्त बना देने वाले पैनिक डिसऔर्डर से होने वाली परेशानी को समझते हैं और उन का मानना है कि इस का इलाज प्रभावी ढंग से किया जा सकता है.

क्या है इलाज

चिकित्सीय इलाज पैनिक डिसऔर्डर से पीडि़त मरीजों में 70 से 80 प्रतिशत को राहत पहुंचा सकता है और शुरुआती इलाज इस रोग को एगोराफोबिया की स्थिति तक नहीं पहुंचने देता. किसी भी इलाज की शुरुआत से पूर्व मरीज की पूरी चिकित्सकीय जांच की जानी चाहिए ताकि यह पता चल सके कि हताशा के इन लक्षणों की और कोई वजह तो नहीं है.

ऐसा इसलिए आवश्यक है क्योंकि थायराइड हार्मोन से खास तरह की ऐपिलैप्सी और हृदय संबंधी समस्या बढ़ जाती है और पैनिक डिसऔर्डर से मिलतेजुलते लक्षण पैदा हो सकते हैं.

कौगनिटिव बिहेवियरल थैरेपी कही जाने वाली साइकोथैरेपी के प्रयोग और दवाओं के सेवन द्वारा पैनिक डिसऔर्डर का इलाज किया जा सकता है. इलाज का चयन व्यक्तिगत जरूरतों तथा प्राथमिकताओं के मुताबिक किया जाता है.

पैनिक अटैक समस्या नहीं

35 वर्षीय रोहण बैंक एग्जीक्यूटिव है. वह काम के लिए रोज दादर स्टेशन से मुंबई सीएसटी जाता था. एक दिन जब वह काम पर जा रहा था तो सीएसटी से पहले के ही स्टेशन पर उतर गया. जब वह वापस उस ट्रेन में नहीं चढ़ पाया तो दूसरी ट्रेन का सहारा ले कर औफिस लेट पहुंचा. बौस ने उसे डांटा तो वह वहीं बेहोश हो कर गिर पड़ा. थोड़ी देर बाद सबकुछ सामान्य हो गया. पर इस के बाद से जब भी बारिश होती या ट्रेन लेट आती, भले औफिस में कोई कुछ नहीं कहता, पर वह पैनिक हो जाता. उसे बेहोशी छाने लगती. दिनप्रतिदिन उस का परफौर्मेंस बिगड़ने लगा. धीरेधीरे नौबत ऐसी आ गई कि वह ट्रेन में भीड़ देख कर घबराने लगता. बैठने की जगह न हो तो परेशान हो जाता. ठंड में भी पसीने छूटने लगते. उस का खानापीना कम होने लगा. वह बीमार दिखने लगा. उस की पत्नी सीमा ने कई डाक्टरों से सलाह ली. सभी ने जांच की पर कोई समस्या नहीं दिखी. किसी दोस्त ने मनोचिकित्सक के पास ले जाने की सलाह दी. सीमा, रोहण को डा. पारुल टौक के पास ले गई. डाक्टर ने करीब 1 महीने की काउंसलिंग और दवा के जरिए रोहण को ठीक किया.

ऐसी ही एक और घटना है. 45 वर्षीय अनुराधा को हमेशा छाती में दर्द की शिकायत रहती थी. घबराहट में उसे चक्कर आने लगते थे और वह कई बार बेहोश हो कर गिर पड़ती थी. उस के पति धीरेन को अपनी पत्नी को ले कर काफी चिंता सताने लगी. उन्होंने सब से पहले कार्डियोलौजिस्ट से संपर्क किया. जांच के बाद डाक्टर को कोई भी समस्या नहीं दिखी. धीरेन पेट के डाक्टर के पास भी गए क्योंकि उन की पत्नी को पेटदर्द, बारबार दस्त का लगना आदि समस्या थी. वहां भी जांच में कुछ नहीं निकला. फिर फैमिली फिजीशियन की सलाह पर वे मनोचिकित्सक के पास गए. वहां पता चला कि अनुराधा पैनिक अटैक की शिकार है.

पैनिक अटैक के बारे में मुंबई के फोर्टिस अस्पताल और निमय हैल्थकेयर की मनोचिकित्सक डा. पारुल टौक कहती हैं, ‘‘इस तरह की समस्या किसी भी उम्र की महिला, पुरुष या युवा को हो सकती है. यही अटैक आगे चल कर फोबिया या डिप्रैशन का कारण बनता है. यह कोई बड़ी बीमारी नहीं है. इसे आसानी से और बिना अधिक खर्च किए मरीज को ठीक किया जा सकता है. लक्षणों का पता चलते ही तुरंत किसी मनोचिकित्सक से मिल कर इलाज करवाएं.’’

पैनिक अटैक आने पर क्या करें

अगर आप के परिवार में या आप के आसपास किसी व्यक्ति को पैनिक अटैक आए तो घबराएं नहीं, बल्कि उस कठिन परिस्थिति में आप उस व्यक्ति की सहायता कर सकते हैं

–       शांत रहें और पीडि़त व्यक्ति की शांत रहने में सहायता करें.

–       अगर वह व्यक्ति एंग्जाइटी की दवा लेता है तो उसे यह दवा तुरंत दें.

–       उस की समस्या को तुरंत और संक्षेप में समझने का प्रयास करें.

–       उस व्यक्ति को दोनों हाथ सिर के ऊपर सीधे उठाने में सहायता करें.

–       पैनिक होने की स्थिति में व्यक्ति को टहलाने ले जाएं, स्ट्रैचिंग या कूदने को कहें.

–       पीडि़त को धीरेधीरे सांस लेने को कहें और इस में उस की सहायता करें. नाक से लंबी सांस लें और मुंह से छोड़ें.

–       तुरंत किसी पास के अस्पताल में ले जाएं.

–       व्यक्ति को पैनिक अटैक से बचाए रखने के लिए उस को प्रोत्साहित करते रहें.

–       यदि स्थिति बिगड़ जाए तो उसे विश्वास दिलाएं कि यह कोई बड़ी बात नहीं है.

–       मातापिता हमेशा बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ाते रहें. जैसे कुछ भी अच्छा काम करने पर तारीफ करें या कहें, हमें तुम पर नाज है.

–       नियमित तौर पर हैड मसाज देते रहें.

–       व्यक्ति से हमेशा अपने दिल की बात खुल कर बताने को कहें.

बौडी टोंड तो स्ट्रौंग होगा बौंड

लड़का हो या लड़की या फिर औरत हो या मर्द, सभी के लिए ऐक्सरसाइज करना फायदेमंद रहता है. ऐक्सरसाइज पुराने रोगों की रोकथाम से ले कर मौडर्न लाइफस्टाइल को ठीक करने तक में लाभदायक होती है. यह तनाव और घबराहट से मुक्ति दिलाती है. ऐक्सरसाइज आप के वजन पर भी नियंत्रण रखती है.

अगर आप रोज 30 मिनट तक  ऐक्सरसाइज करें तो उस के आप को ये लाभ होंगे :

  • दिल का दौरा पड़ने का खतरा कम होगा.
  •  वजन नियंत्रण में रहेगा.
  • ऐक्सरसाइज कोलैस्ट्रौल को नियंत्रित रखेगी.
  • टाइप टू डायबिटीज और कई तरह के कैंसर के खतरे को कम करेगी.
  • ब्लडप्रैशर कम होगा.
  • हड्डियां मजबूत होंगी और मांसपेशियों के कमजोर होने का खतरा कम होगा.
  • अधिक ऊर्जा महसूस करेंगे, खुश रहेंगे और नींद अच्छी आएगी.

तनाव से मुक्ति

इस के अलावा वर्कआउट नकारात्मक विचारों और टैंशन को भी कम करता है. अगर आप फिट हैं तो मन भी खुश रहेगा.

ऐक्सरसाइज सैरोटोनिन, ऐंडोर्फिन और स्ट्रैस के प्रभाव को कम कर मस्तिष्क के रसायन स्तर को संतुलित करती है.

जब आप ऐक्सरसाइज करते हैं तो आप का शरीर फिट रहने के साथसाथ सही आकार में भी रहता है, जिस से आप के पार्टनर का ध्यान आप की ओर सहजता से खिंचता है.

आत्मविश्वास में बढ़ोत्तरी

पूरे दिन की थकान के बाद जब आप ऐक्सरसाइज करते हैं, तो आप रिलैक्स हो जाते हैं. इस से सकारात्मक सोच और आत्मविश्वास बढ़ता है.

जिस तरह दांतों को ठीक रखने के लिए ब्रश करना जरूरी होता है उसी तरह फिट बौडी और सकारात्मक सोच के लिए कम से कम सप्ताह में 5 दिन 30 मिनट तक ऐक्सरसाइज करना आवश्यक है.

शारीरिक रूप से फिट व्यक्ति की सैक्सुअल लाइफ भी अच्छी रहती है, क्योंकि ऐक्सरसाइज से आप की मांसपेशियां टोंड रहती हैं.

एक शोध में पता चला है कि रोज ऐक्सरसाइज करने वाले दंपती का आपसी रिश्ता अधिक मजबूत होता है. अधिक उम्र तक वे एकदूसरे को आकर्षक मानते हैं.

इस तरह के ऐक्सरसाइज में ऐरोबिक, कुछ दूर पैदल चलना सब से अधिक प्रभावशाली होती है. ऐक्सरसाइज से ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है और व्यक्ति काफी समय तक अपनेआप को युवा महसूस करता है. पूरे दिन में आप आसानी से 30 मिनट ऐक्सरसाइज के लिए निकाल सकते हैं.

लड़कियों के लिए तो ऐक्सरसाइज खासतौर पर फायदेमंद रहती है. इस से तनाव, ब्लडप्रैशर, कोलैस्ट्रौल जैसी कई समस्याओं से राहत मिलती है.

आखिर कैसे होता है स्किन कैंसर, पहचानें लक्षण

धूप में ज्यादा रहने से या ज्यादा वक्त तक रेडियोएक्टिव तरंगों के संपर्क में रहने से स्किन कैंसर का खरता रहता है. दुनियाभर में स्किन कैंसर की शिकायतें बढ़ रही हैं और आने वाले समय में ये लोगों के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकती है. बढ़ते समय के साथ इसके नए नए प्रकार भी सामने आ रहे हैं.

क्या हैं संकेत

कैंसर का कोई भी प्राकर हो उसके संकेत आपको काफी पहले से दिखने लगेंगे. इसका सबसे पहले आपको अपने चेहरे, कान, गर्दन, होंठ व हाथों की त्वचा पर असर नजर आएंगे. इस खबर में हम आपको स्किन कैंसर के संकेतों के बारे में आपको बताएंगें जो कैंसर होने से ठीक पहले आपके शरीर पर होते हैं.

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  • शरीर पर लाल निशान

स्किन कैंसर का सबसे पहला संकेत है शरीर पर लाल निशानों का होना. ऐसा होने पर आप तुरंत किसी डाक्टर से संपर्क करें. ये निशान आपके सिर, गर्दन और हाथ पर होते हैं.

  • एग्जिमा

एग्जिमा एक तरह की त्वचा संबंधी बीमारी है. आम भाषा में इसे खाज भी कहते हैं. समान्य तौर पर ये समस्या कोहनी, हथेली या पैरों पर होती है. एग्जिमा होते ही आप स्किन स्पेशेलिस्ट से जांच कराएं.

  • ज्यादा मस्सों का होना

अगर आपके शरीर पर मस्सों की संख्या बढ़ने लगे तोसचेत हो जाइए. स्किन कैंसर वाले मस्सों में त्वचा से खून निकलने की शिकायतें भी होती हैं. अगर आपकी त्वचा पर मौजूद मस्से का आकार पांच या छह मिलीमीटर से अधिक है तो ये स्किन कैंसर का संकेत है.

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  • होठों पर बनने लगें निशान

होठों के सूखे पड़ने पर उसमें दरार का दिखना, इसके साथ ही उसपर पापड़ी वाले चकत्ते दिखने लगें तो ये कैंसर के संकेत हैं. आप तुरंत डाक्टर से संपर्क करें.

  • मस्सों का रंग

अगर आपको काल, नीला, सफेद या लाल रंग का मस्सा हो रहा हो तो ये आपके लिए खतरे की घंटी है. आपको तुरंत डाक्टर से संपर्क करना चाहिए. वहीं भूरे या गुलाबी मस्से का होना एक समान्य बात है.

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गंजापन पुरुषों में ही क्यों : सिर के बाल लगाएं चारचांद

इंसान के जिस्म का कोई भी बाहरी हिस्सा कम या खत्म होने लगे या हो जाए तो उस में हीनभावना का पैदा हो जाना स्वाभाविक है. सिर के बाल भी इंसानी जिस्म का हिस्सा होते हैं. गंजापन, केशाभाव या बालों का झड़ना हलके से ले कर सिर के पूरी तरह गंजा होने तक का हो सकता है. आमतौर पर 50 से 100 बाल हर दिन टूटतेझड़ते हैं. यह कुदरती प्रक्रिया है. यदि इस से ज्यादा बाल झड़ते हैं, तो यह गंजेपन यानी बाल्डनैस का विषय हो सकता है.

देशदुनिया के लोगों में गंजापन तेजी से बढ़ रहा है. इस का कारण है लोगों का गलत खानपान और जीवनशैली. गंजेपन को ले कर पुरुषों में अकसर ही काफी हीनभावना रहती है. एक उम्र के बाद जब उन के सिर पर से बाल उड़ने लगते हैं, तो उन का सैल्फ कौन्फिडैंस चोट खा जाता है. अपनी इमेज को ले कर वे शर्म महसूस करने लगते हैं. आजकल तो छोटी उम्र के बच्चों में भी बाल झड़ने की समस्या होने लगी है.

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वहीं, गंजेपन का शिकार आमतौर पर सिर्फ पुरुष ही होते हैं, ऐसा क्यों? महिलाओं में गंजापन बहुत ही कम दिखाई देता है या किसी बीमारी के कारण होने वाला गंजापन ही उन में होता है. जबकि, पुरुषों की उम्र 40 पार होतेहोते आधे से ज्यादा में गंजापन ज़ाहिर होने लगता है.

बाल्डनैस क्यों :

मैडिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार, पुरुषों में बालों के झड़ने का सब से आम कारण एंड्रोजेनेटिक एलोपीशिया माना जाता है. इस को ‘पुरुष पैटर्न गंजापन’ के रूप में भी जाना जाता है. इस में पुरुषों के सिर के बाल झड़ने लग जाते हैं. माथे की तरफ से या सिर के ऊपर से पहले धीरेधीरे बाल झड़ने शुरू होते हैं. फिर पतले होतेहोते ख़त्म हो जाते हैं. जैसे हमारे शरीर में चमड़ी के ऊपर रोमछिद्र होते हैं वैसे ही सिर की चमड़ी के ऊपर हेयर फौलिकल्स होते हैं. इन्हीं में से बाल निकलते हैं. जब ये हेयर फौलिकल्स सिकुड़ने लगते हैं, तो बाल पतले होने शुरू हो जाते हैं. समय के साथ धीरेधीरे ये गायब भी हो जाते हैं.

गंजेपन का एक कारण यह भी. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, इंसान के जिस्म में टैस्टोस्टेरौन एक ऐसा हार्मोन होता है, जो पुरुषों और महिलाओं दोनों में पाया जाता है मगर पुरुषों में इस की मात्रा बहुत ज्यादा होती है. पुरुषों के पुरुषत्व वाले शारीरिक बदलावों के लिए यही हार्मोन जिम्मेदार होता है. टैस्टोस्टेरौन पुरुषों में स्रावित होने वाले एंड्रोजन समूह का स्टेरौयड हार्मोन है, जिस के कारण पुरुषों में बाल झड़ने की समस्या पैदा होती है. दरअसल, इंसान के शरीर में कुछ एंजाइम ऐसे होते हैं जो टैस्टोस्टेरौन को डिहाइड्रो-टैस्टोस्टेरौन में बदल देते हैं. इसी डिहाइड्रो-टैस्टोस्टेरौन के कारण बाल पतले व कमजोर हो जाते हैं और फिर झड़ने लगते हैं. सामान्यतौर पर हार्मोंस में यह बदलाव करने वाले एंजाइम एक इंसान में उसे उस के जींस से प्राप्त हुए होते हैं. इसी कारण गंजेपन को आनुवंशिक यानी खानदानी भी माना जाता है.

स्किन स्पैशलिस्ट डाक्टर भावुक मित्तल का कहना है कि जेनेटिक्स (खानदानी कारण यानी पहले से घर के पुरुषों में यह दिक्कत चली आ रही हो), उम्र का बढ़ना, और हार्मोंस का ऊपरनीचे होना बाल्डनैस के सब से बड़े कारण हैं. दूसरे कारणों में विटामिन्स और मिनरल्स की कमी, न्यूट्रीशन वाला खाना न खाना, स्ट्रेस, लंबी बीमारी को गिना जाता है.

 बालों को झड़ने से रोकें :

अगर जेनेटिक कारणों से हेयर लौस हो रहा है, तो उसे धीमा किया जा सकता है. पूरी तरह से उस से छुटकारा नहीं पाया जा सकता. लेकिन अगर बीमारी या पोषण की कमी की वजह से बाल झड़ रहे हैं, तो उन के लिए उपाय किए जा सकते हैं. शरीर में आयरन की कमी की वजह से भी बाल झड़ते हैं. अगर इन में से कोई भी वजह नहीं है, तो आप को फुल बौडी टैस्ट करा कर अपने हार्मोंस की जांच भी करवा लेनी चाहिए. इस बाबत डाक्टर आप को बेहतर सलाह दे पाएंगे.

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महिलाओं में गंजापन नहीं :

महिलाओं में भी टैस्टोस्टेरौन पाया जाता है मगर उन में इस की मात्रा बहुत कम होती है. जब यह महिलाओं में अधिक स्रावित होता है तो महिलाओं में अनचाहे बालों की अधिक मात्रा में आने की समस्या पैदा होती है. महिलाओं के शरीर में मुख्यरूप से एस्ट्रोजन हार्मोन का स्राव होता है, जो महिलाओं के शरीर में टैस्टोस्टेरौन के डिहाइड्रो-टैस्टोस्टेरौन में बदलने की प्रक्रिया को धीमा कर देता है. इसीलिए, महिलाओं में बाल झड़ने की समस्या तो होती है मगर गंजापन नहीं होता है.

गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव होते हैं. कई बार जब महिलाओं के शरीर में इस दौरान टैस्टोस्टेरौन हार्मोन का स्राव बढ़ जाता है, तो बाल झड़ने की समस्या उत्पन्न होती है. इसलिए अकसर महिलाओं को गर्भावस्था और मेनोपौज में बाल झड़ने की समस्या होती है.

इस प्रकार साफ़ है कि मानव शरीर की संरचना में भिन्नता के चलते पुरुष के सिर के बाल झड़तेझड़ते उस पर गंजापन उभर आता है जबकि महिला के सिर के बाल झड़ते तो हैं लेकिन वे गंजापन की हद तक नहीं झड़ते. हां, उन में अनचाहे बालों के अधिक मात्रा में आने की समस्या पैदा हो सकती है. इस में शक नहीं है कि सिर के बाल इंसान की खूबसूरती में चारचांद लगाते हैं.

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मर्द को भी दर्द होता है : ऐसे करें लाइफ एंजौय

कहावत नहीं है, हां, लोग कहते हैं, मर्द को दर्द नहीं होता. लेकिन, ऐसा नहीं है. पुरुष बाहर से जितने कठोर, भीतर से उतने ही नर्मदिल होते हैं. आजकल की भागदौड़ में पुरुष न तो अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दे पाते हैं न ही अपनी डाइट पर. इस वजह से उन्हें कई बार बीमार भी पड़ना पड़ता है. आज की अतिआधुनिक जीवनशैली में वे कुछ दर्दों से बच सकते हैं. पुरुषों से जुड़ी कई ऐसी चीजें भी हैं जिन्हें वे खुद भी नहीं जानते.  सो, तनावभरे व दर्दभरे मौजूदा दौर में जीवन को आनंदमय बनाने के लिए चौकन्ना व सेहतमंद रहना होगा.

डाक्टर के संपर्क में रहें :

किसी तरह का दर्द महसूस न करें और जीवन का भरपूर आनंद उठाएं, इस बाबत समयसमय पर डाक्टरी सलाह लेते रहें. लेकिन ऐसा देखा जाता है कि ज़्यादातर पुरुष अपनी तकलीफों को इग्नोर करते रहते हैं. हालांकि, अपनी गलती की वजह से उन्हें बाद में बीमारी या फिर किसी वायरस का शिकार होना पड़ता है. वहीं, बीमार होने के बाद डाक्टर के पास जाते भी हैं तो वे कई बार डाक्टर से कई बातें छिपा लेते हैं. इस वजह से उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है. सो, दिक्कत न आने पाए, इस के लिए डाक्टर से रूटीन चेकअप जरूर करवाते रहना चाहिए.

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खर्राटों को हलके में न लें :

रात में सोने के बाद ज्यादातर लोगों की खर्राटे लेने की आदत सी बन जाती है. आप इसे टालने के बजाय इस पर ध्यान दें. खर्राटों का दिल से कनैक्शन होता है. खर्राटे लेते समय कुछ सैकंड के लिए आप की सांसें रुक भी सकती हैं. सो, इसे आदत समझ कर हलके में न लें, बल्कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ से संपर्क करें.

ज्यादा बार बाथरूम जाना : 

अगर आप दिन में करीब 8 बार और रात में करीब  2 बार टौयलेट जा रहे हैं तो आप के शरीर में किसी तरह की दिक्कत हो सकती है. लोग अकसर ज्यादा बार बाथरूम जाने की बात को नजरअंदाज करने की कोशिश करते हैं, लेकिन आप को इस के लिए चिकित्सक से संपर्क करने की जरूरत है. अगर आप इसे नजरअंदाज करेंगे तो हो सकता है आप किसी बीमारी का शिकार हो जाएं.

सब्जियों का सेवन ताकि दिक्कत न हो :

बहुत ही कम लोग होते हैं जो फल और हरी सब्जियों का सेवन ज्यादा करते हैं. डाक्टर कहते हैं कि फल औऱ हरी सब्जियों के खाने से दिल स्वस्थ रहता है. इस से आप का शुगर लैवल भी ठीक रहता है. अगर आप फल और हरी सब्जियों से दूर भागेंगे तो आप किसी बड़ी बीमारी का शिकार हो सकते हैं.

शराब है खराब :

कई लोगों को शौक होता है कि वे शराब पिएं और सिगरेट का सेवन करें. यह शौक आप के लिए काफी नुकसानदायक साबित हो सकता है. इस लत से कोई भी जल्दी अस्वस्थ हो सकता है.

जीवनशैली से जुड़ी कुछ अहम बातें :

*  पुरुषों की औसत आयु महिलाओं से कम होती है. पुरुषों की औसतन आयु 64.52 वर्ष होती है जबकि स्त्रियों की 68.76 वर्ष होती है.

*  पुरुष के दिमाग का आकार महिलाओं से बड़ा होता है. पुरुषों के दिमाग़ का आकार स्त्रियों से 10 फीसदी ज़्यादा होता है. लेकिन यह निर्भर करता है कि वे दिमाग का कितना इस्‍तेमाल करते हैं.

*  एक शोध से यह पता चला है कि किसी भी काम को करने में पुरुष अपने दिमाग़ का सिर्फ़ आधा हिस्सा ही प्रयोग करते हैं, जबकि स्त्रियां पूरा दिमाग़ एक ही वक़्त में इस्तेमाल कर सकती हैं.

*  आमतौर पर पुरुषों को घर पर बैठ कर ड्रिंक करने से ज़्यादा लंबे रोमांटिक वौक पर जाना ज्यादा पसंद होता है.

*  पुरुष अपनी कुल उम्र के 6 महीने सिर्फ शेविंग करने में बिताते हैं.

*  इस बात से तो हर कोई वाकिफ़ होगा कि लड़कियां, लड़कों से ज्‍यादा बोलती हैं. अध्‍ययन के मुताबिक, एक महिला दिनभर में लगभग 7 हजार शब्द बोलती हैं, तो वहीं पुरुष सिर्फ 2 हजार शब्‍द ही बोलते हैं.

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*  पराई स्त्रियों को घूरने में पुरुष अपने जीवन का पूरा एक साल बरबाद कर देते हैं.

*  पुरुष स्त्रियों से ज़्यादा झूठ बोलते हैं. एक स्त्री दिन में औसतन 3 झूठ ही बोलती है, जबकि पुरुष दिनभर में कम से कम 6 झूठ बोलते हैं.

*  ब्रेकअप के बाद पुरुष ज्‍यादा दिन तक अवसाद व तनाव में रहते हैं जबकि महिलाएं रिश्‍तों में दरार आने के बाद जल्‍दी मूवऔन कर लेती हैं.

*  अकसर पुरुष डाक्टर के पास जाने से कतराते हैं, उन्‍हें लगता है कि डाक्‍टर के पास जाने से कहीं कोई बड़ी बीमारी न हो जाए.

एक रिसर्च का नतीजा है कि ब्रेकअप के बाद पुरुष ज्‍यादा दिन तक अवसाद व तनाव में रहते हैं जबकि महिलाएं रिश्‍तों में दरार आने के बाद जल्‍दी मूवऔन कर लेती हैं. इस का ज़िक्र ऊपर हो चुका है, यह, दरअसल, यह दर्शाता है कि मर्द को शारीरिक दर्द ही नहीं होता, बल्कि, संवेदनात्मक दर्द भी होता है वह भी महिलाओं से ज्यादा.

छुट्टी लेने के लिए खुद को बताया कोरोना से पीड़ित

पूरा विश्व जहां कोरोना वायरस को ले कर डर के माहौल में है, वहीं कुछ लोग इस बीमारी को मजाक भी बना डालते हैं.

यह सही है कि किसी को औफिस जाने का मन नहीं होता तो वह बौस से तरह-तरह के बहाने बना कर छुट्टियां  लेता है. मगर एक ऐसे समय जब कोरोना वायरस को ले कर सब डरे हुए हों, एक व्यक्ति ने औफिस न जाने का बहाना बनाते हुए खुद को कोरोना से पीड़ित मरीज घोषित कर दिया.

अजीबोगरीब मामला

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह अजीबोगरीब मामला है चीन का, जहां एक व्यक्ति ने लंबी छुट्टियां लेने और मौजमस्ती करने के लिए अपनी कंपनी को मेल कर दिया कि वह कोरोना वायरस से पीङित है और उसे छुट्टियां चाहिए ताकि वह अपना उपचार करा पाए.

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कंपनी ने तुरंत उस की छुट्टियां मंजूर कर दीं और उस के आसपास बैठे लोगों का मैडिकल चैकअप भी कराया.

इतना ही नहीं औफिस को कुछ दिनों तक के लिए बंद भी कर दिया गया ताकि वहां अच्छी तरह साफसफाई हो सके.

हैरत की बात तो तब हुई जब कंपनी के एक भी कर्मचारी कोरोना वायरस से पीङित नहीं पाए गए तब कंपनी ने उस व्यक्ति से अपना मैडिकल रिपोर्ट भेजने को कहा.

सिर मुंडाते ओले पड़े

झूठ बोलने वाला वह व्यक्ति कोई रिपोर्ट पेश नहीं कर पाया तो कंपनी ने पुलिस में शिकायत करी. पुलिस की सख्ती से उस ने सच उगल दिए और कहा कि उस ने छुट्टियां लेने के बहाने झूठ कहा था.

कंपनी ने काररवाई करते हुए उक्त व्यक्ति को नौकरी से बर्खास्त कर दिया, वहीं पुलिस ने भी उस पर काररवाई की और 3 महीने के लिए जेल भेज दिया.

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मालूम हो कि किसी भी तरह का अफवाह फैलाना कानूनन जुर्म माना जाता है और इस के लिए सजा का प्रावधान है.

दाई से डिलीवरी न कराएं

फिल्म ‘दंगल’ तो आप सब को याद होगी ही. हरियाणा का एक ठेठ देहाती पहलवान जब साधनों की कमी में खुद कुश्ती में कोई बड़ा कारनामा नहीं कर पाता है, तो उसे अपनी आने वाली औलाद से उम्मीद बंध जाती है. औलाद भी लड़का ही चाहिए, क्योंकि तब समाज में लड़कियों को लड़कों की तरह लंगोट बांध कर अखाड़े में उतरने की तो सोचिए भी मत, ढंग से स्कूल में भेज दो तो गनीमत समझी जाती थी.

बेटे के चक्कर में पहलवान महावीर फोगाट बने आमिर खान के एक के बाद एक 4 बेटियां पैदा हो जाती हैं. बाद में इस फिल्म की कहानी क्या मोड़ लेती है, उस पर ज्यादा बात नहीं करेंगे, पर हां एक गंभीर मुद्दे पर जरूर सोचेंगे कि फिल्म में आमिर खान की पत्नी बनी साक्षी तंवर की जचगी कहां और कैसे होती है.

महावीर फोगाट का घर एक ऐसे किसान का घर था, जहां सुखसुविधाओं के नाम पर जरूरत का कुछ पुराना सामान, खाना बनाने के लिए चूल्हा और ईंधन की लकडि़यां ही थीं. घर की जर्जर होती दीवारों के बंद कमरे के बाहर महावीर फोगाट अपनी औलाद की पहली रुलाई सुनने के लिए बेचैन खड़ा होता है.

दरवाजा खुलता है तो एक बुढि़या दाई मायूस सा चेहरा लिए बेटी होने की खबर देती है. ऐसा एक बार नहीं, बल्कि 4 बार होता है, क्योंकि महावीर फोगाट 4 बेटियों का बाप जो बनता है. पर हर बार जचगी दाई से ही होती है.

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वहां पर गनीमत यह होती है कि उस दाई से कोई हादसा नहीं होता है. यह भी कह सकते हैं कि आज से 25-30 साल पहले तक दाई से जचगी कराने पर इतना ध्यान नहीं दिया जाता था. लेकिन आज जब गांवदेहात के आसपास के कसबे या छोटे शहर में लेडी डाक्टर मिल जाती हैं, तो भी बहुत से लोग जचगी गांव में किसी दाई से ही करा लेते हैं.

यूनिसैफ द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक, दुनियाभर में पेट से होने  और जचगी से जुड़ी समस्याओं के चलते तकरीबन 2,90,000 औरतों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था.

अंदाजा है कि हर साल 28,00,000 गर्भवती औरतों की मौत हो जाती है, जिस के पीछे की सब से बड़ी वजह सही पोषण और उचित देखभाल का न मिल पाना होता है.

इतना ही नहीं, दुनियाभर में एकतिहाई नवजात बच्चों की मौतें अपने जन्म के दिन ही हो जाती हैं, जबकि बाकी तीनचौथाई बच्चे जन्म के एक हफ्ते के भीतर ही मर जाते हैं.

दिक्कत यह है कि आज भी भारत के बहुत से गांवों में बच्चा पैदा होने को गंभीरता से नहीं लिया जाता है, जबकि यह एक तरह से बच्चे के साथसाथ उस औरत का भी दूसरा जन्म होता है, जो मां बनती है. लिहाजा, जचगी ऐसी किसी बूढ़ी औरत से करा दी जाती है, जो दिल की थोड़ी पक्की जरूर होती है, पर उसे जचगी के समय होने वाले खतरों की उतनी जानकारी नहीं होती है, जितनी किसी माहिर डाक्टर को होती है.

इस सिलसिले में फरीदाबाद के मेवला महाराजपुर गांव की एक आंगनबाड़ी महिला हैल्पर ने बताया कि यहां की कच्ची कालोनियों में रहने वाले ज्यादातर लोग दूसरे राज्य के गरीब परिवारों के होते हैं. सरकारी अस्पताल में बच्चा जनने के लिए आधारकार्ड जैसे पहचानपत्र की जरूरत होती है और बहुत से लोगों के पास वह नहीं होता है. लिहाजा, ऐसी औरतें घर पर ही अपनी सगीसंबंधी औरतों या पड़ोस की औरतों की मदद से जचगी करा लेती हैं.

इसी गांव की रहने वाली रेखा का दूसरा बेटा गांव में ही दाई के हाथों पैदा हुआ था, जबकि पहला बेटा सरकारी अस्पताल में.

रेखा के मुताबिक, घर हो या अस्पताल, सारा काम तो जच्चा को ही करना होता है. अगर वह शरीर और मन से मजबूत है तो उस की मददगार कोई डाक्टर है या दाई, कोई फर्क नहीं पड़ता है.

पर, रेखा का यह बयान भावुकता पर ज्यादा टिका है. इस बात को एक उदाहरण से समझते हैं. मान लीजिए, कोई औरत पहली बार मां बनने वाली है और वह किसी ऐसे गांव में रहती है, जहां आसपास प्रसूति केंद्र तो है, लेकिन उस की ससुराल वाले गांव की दाई से ही जचगी कराना चाहते हैं.

चूंकि वह औरत पढ़ीलिखी है और जचगी के दौरान अपने और होने वाले बच्चे के लिए कोई जोखिम नहीं लेना चाहती है, तो अपनी ससुराल वालों की सलाह को दरकिनार कर के वह डाक्टर से मिलती है और समयसमय पर अपनी जांच कराती है. वहां डाक्टर द्वारा खून, पेशाब, ब्लड प्रैशर, वजन, पोषण वगैरह की जांच होते रहने से उस औरत को बहुत फायदा होता है, जो एक दाई उसे कभी नहीं बता पाएगी.

याद रखिए, मां बनने वाली जिन औरतों का ब्लड ग्रुप आरएच नैगेटिव होता है, उन के बच्चे की पीलिया या दूसरी किसी दिक्कत से मौत हो जाने का डर रहता है. लेकिन समय से पहले आरएच नैगेटिव ब्लड ग्रुप पता चल जाने पर सावधानी बरती जा सकती है और बच्चे में नया खून ‘ट्रांसफ्यूजन’ से यानी बदल कर उस की जान बचाई जा सकती है. गांवदेहात में क्या, बहुत सी शहर की औरतों को इस बारे में शायद ही जानकारी हो, दाई की तो छोड़ ही दीजिए.

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बहुत सी औरतें अपनी दाई से यह बात छिपा जाती हैं कि उन को पहले गर्भपात भी हो चुका है यानी उन का पेट गिर चुका है. उन की यही लापरवाही खुद उन के लिए और आने वाले बच्चे के लिए खतरनाक हो सकती है, क्योंकि अगर ऐसा हुआ है, तो दाई कुछ नहीं कर पाएगी, जबकि माहिर डाक्टर समय रहते जच्चा को बता देगी कि उसे क्याक्या सावधानियां बरतनी होंगी.

इस सिलसिले में दिल्ली के बीएल कपूर अस्पताल की गाइनोकौलोजिस्ट डाक्टर शिल्पी सचदेव ने बताया, ‘‘आमतौर पर गांवदेहात में लोग घर पर ही किसी दाई से जचगी इसलिए करा लेते हैं, क्योंकि वे प्राइवेट अस्पताल के खर्च से बचना चाहते हैं या फिर सरकारी अस्पताल में लंबी लाइनों में नहीं लगना चाहते हैं, जबकि गांव में जच्चा का कोई टैस्ट नहीं होता है. मां और बच्चे का वजन कितना है या पेट में बच्चे का सिर नीचे है या फिर उलटा है, यह भी दाई को नहीं पता होता है.

‘‘अगर मां का ब्लड ग्रुप नैगेटिव है और पिता का ब्लड ग्रुप पौजिटिव है तो जचगी में बच्चे को दिक्कत हो सकती है. इस के लिए एक इंजैक्शन लगाया जाता है. अगर पहली जचगी में यह इंजैक्शन नहीं लगता है, तो दूसरी जचगी में बच्चे को बहुत नुकसान हो सकता है.

‘‘दाई के साथ सब से बड़ी समस्या यह होती है कि बहुत बार वह साफसफाई का ध्यान नहीं रखती है. वह दस्ताने नहीं पहनती है. इस से मां और बच्चे दोनों को इंफैक्शन होने का खतरा बना रहता है. दाई के पास टांके लगाने का भी कोई पुख्ता इंतजाम नहीं होता है. दूसरे अहम उपकरण भी नहीं होते हैं.

‘‘अगर जचगी के दौरान खून ज्यादा बहने लगता है, तो दाई को सही तकनीक नहीं पता होती है कि कैसे उस पर काबू पाया जाए. इस से मां की जान को खतरा हो सकता है.

‘‘कभीकभार तो जचगी के बाद गर्भनाल अंदर ही रह जाती है. यह भी एक बहुत बड़ी समस्या है. अगर बच्चा एकदम से नहीं रोया या उस को औक्सीजन नहीं मिल पा रही है, उस के फेफड़े नहीं फूल रहे हैं, तो दाई को इस से निबटने का तरीका पता ही नहीं होता है, जबकि अस्पताल में आधुनिक उपकरण होते हैं, जिन की मदद से डाक्टर ऐसी किसी समस्या का हल तुरंत निकाल लेता है.

‘‘ऐसे बहुत से केस सुनने में आते हैं कि जब किसी बच्चे में पूरी औक्सीजन नहीं पहुंचने से वे विकलांग तक हो जाते हैं या दिमागी तौर पर वे अच्छी तरह बढ़ नहीं पाते हैं. अगर किसी औरत को थायराइड की दिक्कत होती है, तो इस का बुरा असर पैदा होने वाले बच्चे पर भी पड़ सकता है.

‘‘किसी मां के पेट में पल रहे बच्चे में अगर कोई बनावट संबंधी खराबी है, तो गांव में उस का पता ही नहीं चल पाता है, जबकि डाक्टर इन सब बातों की पूरी जानकारी रखता है.

‘‘दाई गर्भनाल काटने के लिए अच्छे ब्लेड का इस्तेमाल नहीं करती है. कपड़ा भी कैसा है, इस का ज्यादा ध्यान नहीं रखती है. इस से इंफैक्शन का खतरा बढ़ जाता है.’’

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पहले तो सुविधाएं न होने और जानकारी की कमी में लोग दाई से जचगी करा लेते थे और अगर कोई हादसा हो जाता था तो उसे ऊपर वाले का फैसला मान कर चुप्पी साध लेते थे, पर अब ऐसा करने या सोचने की कोई वजह नहीं है.

याद रखिए, अगर बच्चे सेहतमंद पैदा नहीं होंगे तो वे बड़े हो कर अपनी पूरी ताकत से देश को आगे बढ़ाने में कामयाब नहीं हो पाएंगे. दाई के पास  नहीं, बल्कि जचगी के लिए डाक्टर के पास जाएं, जच्चाबच्चा को सहीसलामत घर वापस लाएं.

कोरोनावायरस के बाद अब बर्डफ्लू फैलने का खतरा मंडराया, चेक रिपब्लिक में मिला दूसरा मामला

चीन के वुहान शहर से निकला कोरोना वायरस दुनियाभर में फैल चुका है. एशिया के बाद यूरोप, अमेरिका समते तमाम मुल्कों में इसके मरीज देखने को मिले. भारत में फिलहाल अभी तक इस वायरस से किसी की भी मौत की खबर नहीं है इसी बीच एक और बड़ी बीमारी फैलने का डर मंडराने लगा है.

चेक रिपब्लिक के कृषि मंत्रालय ने सोमवार को पार्डुबिस के मध्य चेक क्षेत्र में एवियन इंन्फ्लूएंजा (बर्डफ्लू) के दूसरे मामले के फैलने की पुष्टि की है. मंत्रालय ने एक बयान में कहा, “एच5एन8 (बर्डफ्लू) के प्रसार को रोकने के लिए 1 लाख मुर्गियों को मारना पड़ेगा.” समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार, पारडुबिक के स्लोपोटिक गांव के एक पॉल्ट्री बीडर ने रविवार को इस सप्ताहंत तुर्की के 7500 मुर्गियों में से 1300 की मौत की पुष्टि की.

इन पक्षियों में कथित रूप से एवियन इंन्फ्लूएंजा (बर्डफ्लू) के लक्षण देखे गए थे, इस बात की पुष्टि बाद में प्राग के राज्य पशु चिकित्सा संस्थान ने की थी. इसके अलावा फार्म में 1,30,000 ब्राइलर मुर्गियां भी हैं. कृषि मंत्री मिरोस्लेव तोमान ने कहा, “पूरे कंपनी परिसरों को बंद कर दिया गया है. परिसर से बाहर बीमारी को फैलने से रोकने के लिए प्रवेशद्वार पर एहतियाती उपाय अपनाए जाएंगे.”

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कोरोना वायरस की वजह से दुनिया भर के व्यापार में भी काफी फर्क देखने को मिला है. फिलहाल अब हालात कुछ सुधरने की ओर हैं. चीन में सोमवार तक 80 प्रतिशत से अधिक केंद्रीय उद्यमों में कामकाम फिर से शुरू हो गया है. नए कोरोना वायरस महामारी से केंद्रीय उद्यमों के उत्पादन लक्ष्यों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा.

चीनी राज्य परिषद के राज्य-अधिकृत संपत्ति के पर्यवेक्षण और प्रबंध आयोग के उप प्रमुख रन होंगपिन ने मंगलवार को पेइचिंग में यह बात कही. नए कोरोना वायरस निमोनिया की महामारी फैलने के बाद चीन के केंद्रीय उद्यमों ने पूरी तरह से महामारी की रोकथाम और नियंत्रण का समर्थन किया. सीओएफसीओ निगम हर दिन 200 टन से अधिक चावल वुहान पहुंचाता है.

रन होंगपिन ने कहा कि काम और उत्पादन की बहाली महामारी की रोकथाम और आर्थिक विकास की महत्वपूर्ण गारंटी है. प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार 80 प्रतिशत से अधिक केंद्रीय उद्यमों ने अपने कामकाज बहाल किया है. पेट्रोलियम, संचार, पावर ग्रिड और परिवहन आदि व्यवसाय में फिर से काम शुरू करने की दर 95 से 100 प्रतिशत तक जा पहुंची है.

कोरोना वायरस से व्यापार में होने वाले नुकसान का असर केवल चीन में नहीं बल्कि हिंदुस्तान में हुआ है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मंगलवार को कहा कि सरकार कोरोना वाइरस का घरेलू उद्योगों पर पड़ने वाले प्रभाव से निपटने के लिए जल्दी ही उपायों की घोषणा करेगी. उन्होंने चीन में फैले खतरनाक वाइरस से उत्पन्न स्थिति को लेकर उद्योग प्रतिनिधियों के साथ समीक्षा बैठक के बाद संवाददाताओं से बातचीत में यह जानकारी दी.

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