प्राइवेट स्कूलों पर भारी है सराकरी स्कूल!

आमतौर पर समझा यही जाता है कि आईआईटी, मेडिकल कालेजों, इंजीनियङ्क्षरग कालेजों में पढ़ाई के दरवाजे सिर्फ प्राइवेट इंग्लिश मीडियम स्टूडेंट्स के लिए खुली हैं. दिल्ली के सरकारी स्कूलों के 2200 से ज्यादा सरकारी स्कूलों के युवाओं ने नीट, जेईई मेन व जेईई एडवांस एक्जाम क्वालीफाई करके साबित किया है कि स्कूल या मीडिया नहीं स्कूल चलाने बालों की मंशा ज्यादा बड़ा खेल खेलती है.

अरङ्क्षवद केजरीवा की आम आदमी पार्टी जो एक तरफ धर्मभीरू है, भाजपा की छवि लिए घूमती है, दूसर और भाजपा की केंद्र सरकार और उस के  दूत उपराज्यपाल के लगातार दखल से परेशान रहती है, कुछ चाहे और न करे, स्कूलों का ध्यान बहुत कर रही है. सरकारी स्कूलों के एक शहर के इतने सारे युवा इन एक्जाम में पास हो जाएं जिन के लिए अमीर घरों के मांबाप लाखों तो कोङ्क्षचग में खर्च करते हैं, बहुत बड़ी बात है.

यह पक्का साबित करता है कि गरीबी गुरबत और ज्ञान न होना जन्मजात नहीं, पिछले जन्मों के कर्मों का फल नहीं, ऊंचे समाज की साजिश है. एक बहुत बड़ी जनता को गरीबी में ही नहीं मन से भी फटेहाल रख कर ऊंचे लोगों ने अनपढ़ सेवकों की एक पूरी जमात तैयार कर रखी है जो मेहनत करते हैं, क्या करते हैं पर उस में स्विल की कमी है, लिखनेपढऩे की समझ नहीं हैै.

सरकारी स्कूल ही उन के लिए एक सहारा है पर गौ भक्त राज्यों में ऊंची जातियों के टीचर नीची जातियों के छात्रों के पहले दिन से ऊंट फटका कर निकम्मा बना देते हैं कि उन में पढऩे का सारा जोश ठंडा पड़ जाता है और वे या तो गौर रक्षक बन डंडे चलाना शुरू कर देते हैं या कांवड ढोने लगते हैं. केजरीवाल की सरकार के स्कूलों में उन्हें पढऩे की छूट दी, लगातार नतीजों पर नजर रखी. ये लोग चाहे जैसे भी घरों से लाए, पढऩे की तमन्ना थी और जरा सा हाथ पकडऩे वाले मिले नहीं कि सरकारी स्कूलों ने 2000 से ज्यादा को इंजीनियङ्क्षरग और मेडिकल कालेजों की खिड़कियां खोल दीं.्र

यह अपनेआप एक अच्छी बात है और यदि सही मामलों में देश में लोकतंत्र आना है तो जरूरी है कि स्कूली शिक्षा सब के एि एक समान हो, चाहे जिस भी भाषा में हो पर अंग्रेजी में न हो, प्राईवेट कोङ्क्षचग स्कूली शिक्षा के दौरान न हो.

सत्ता में बराबर की भागीदारी चाहिए तो वोटरों को खयाल रखना होगा कि जो पौराणिक तरीके चाहते हैं उन्हें सत्ता में रखे या जो पुराणों में बनाई गई ऊंची खाईयों को पाटने वालों को वोट दें. वोट से पढ़ाई का स्टैंडर्ड बदला जा सकता है. यूपी, मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों को हाल क्या है, इस को दूसरों राज्यों के स्कूलों से मुकाबला कर के देखा जा सकता है कि जयश्रीराम का नारा काम का है. ज्ञानविज्ञान और तर्क का नारा.

ऊंची जाति के लोग गरीबों को मानते है गटर

दलितों, गरीबों, पिछड़ों को ऊंची जातियों के लोग किस तरह से गटर की और गंदे नाले की तरह का मानते हैं, यह एक बहुत ही बेचैन करने वाले वीडियो से समाने आया, मध्यप्रदेश के भारतीय जनता पार्टी केदारनाथ शुक्ला के एक वर्कर परवेश पर आरोप है कि उस ने खुलेआम चुपचाप बैठे एक आदिवासी लडक़े…..करा और उस दौरान आराम से सिगरेट के कश लगाता रहा. यह किस ने वीडियो में कैच कर के जगजाहिर कर दिया, वह असल में सिटिजन जर्नलस्टि अवार्ड का हकदार है क्योंकि आमतौर पर ऊंची जातियों के लोग अक्सर पिछड़ों, दलितों और गरीबों पर ही नहीं, अपनी ही जाति की औरतों को  बेइज्जत करने के लिए करते रहते हैं पर कोई रिकार्ड नहीं रहता.

यह तो नहीं कहा जा सकता कि पार्टी की नीति ऐसी है कि खुलेआम आदिवासियों के इस कदर बेइज्जत किया जाए पर यह पक्का है कि जो सनातन धर्म का नाम ले कर पौराणिक कहानियों में भरोसा ही नहीं करते, कुछ ऐसा सा करने वालों की पूछा करते है और आज सरकारें उन्हें पैसा और सुविधाएं दोनों दे रही हैं.

हमारे धर्म ग्रंथ ऐसी कहानियों से भरे हैं जिस में तरहतरह के श्राप औरतों और नीची जातियों के लोगों को दिए जाते हैं या उन्हें नीचा दिखाने के लिए पाप योनि का हकदार धर्मग्रंथों के हिसाब से माना जाता है, जो पिछड़े और दलित है वे मानते हैं कि उन्होंने पिछले जन्मों में कुछ पाप किए होंगे इसलिए वे इस जन्म में बूढ़े से भी गएबीते हैं. 75 साल के संविधान और 200 साल की पढ़ाई और साइंस की जानकारी भी देश की बड़ी जनता को इस दलदल से निकाल नहीं पाई.

ङ्क्षहदी फिल्म ‘श्री इडियट’ में रैङ्क्षगग के दौरान एक लडक़े का दूसरे नए लडक़े के कमरे के दरवाजे पर भूलना भी इसी सोच का नतीजा है. पुलिस थानों में नीची जातियों के अपराधियों पर अक्सर इस तरह पेशाब करने के किस से छपते रहते हैं.

जो समाज गौमूत्र की पावन मानता हो, उस के मन में कहीं बैठ जाता है कि वह नीची जाति के जने पर पेशाब कर के बड़ा गलत काम नहीं कर रहा. पिछड़ी और निचली जातियों के लोगों को अपने घरों की दीवारों पर पेशाब करना पड़ता है क्योंकि और जगह नहीं होतीं. समाज ने पेशाब को इस तरह का ढांचा बनाया है कि कुछ आदमी जानवरों की तरह अपने ही मलमूत्र में पड़े रहने के आदी हो जाएं.

एक नई, चुनी हुई, साइंस के गुणगान करने वाली, अपने को विश्वगुप्त बनाने वाली सरकार के मुंह पर ही मध्य प्रदेश के सघि जिले का यह वीडियो एक तमाचा है पर जिस बेफ्रिकी से वह भक्त पेशाब करता है, साबित करता है कि एक ताकतवर कौम किस तरह देश के गरीबों की बेइज्जती करना अपना पैदाइशी हक समझती है.

कमजोर होती भाजपा

खेमेबाजी हमारे देश के हर गांव की एक खासियत है. 1000 घरों के गांव में 4.5 खीमे होना आम बात है और जाति, धर्म, काम, पैसे के नाम पर बने ये खेमे एकदूसरे से लड़ते ज्यादा रहते हैं, गांव की देखभाल, आम जगहों को बनवाने, सिक्योरिटी पर कम ध्यान देते है. हर खेमा दूसरे से लड़ता रहता है और दूसरे में सेंध लगाना रहता है कि कैसे उसे कमजोर किया जाए. गांव के भले की सोचने की फुर्सत किसी को नहीं होती.

हमारी राजनीति में यह अर्से से चल रहा है पर 2014 में वादा किया गया था कि भारतीय जनता पार्टी को मिली भारी भरकम जीत के बाद दलबदल खत्म हो जाएगा क्योंकि देश की कट्टर हो चुकी ङ्क्षहदू जनता के बड़े हिस्से ने नरेंद्र मोदी को वोट दिया था.

अफसोस यही है कि 2014 के बाद सुॢखयों नहीं बनती हैं कि भाजपा ने सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल दूसरी पाॢटयों को तोडऩे और अपने में मिलाने में किया और ङ्क्षहदूङ्क्षहदू करते हुए भी उस के हाथ से सत्ता फिसलती नजर आती रही.

उस की वह जनता के पास जा कर नहीं, खेमों में सेंध लगा कर या पुलिस को दूसरे खेमों के सरगनों को परेशान करने में लगाती रही. देश का कल्याण तो हवा हो गया है, पार्टी का कल्याण ही अकेला मकसद बच गया है.

महाराष्ट्र में 2 साल पहले जब पुराने साथी शिवसेना के उद्धव ठाकरे से समझौता नहीं हुआ और शिवसेना ने नेशनल कांग्रेस और इंडियन कांग्रेस के साथ मिल कर सरकार बना ली तो बजाए अगले चुनाव तक इंतजार करने के उस ने खीज में आ कर तीनों पाॢटयों के विधायकों की खरीद शुरू कर दी. पहले एकनाथ ङ्क्षशदे को शिवसेना को तोड़ा और अब एनसीपी के अजीत पंवार को तोड़ कर एक टेढ़ीमेढ़ी ऊंची इमारत बना ली.

ऐसा काम पहले ही वह कर्नाटक व मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों और गोवा, मेघालय, मिजोरम, अरुणांचल में कर चुकी है.

यह साबित करता है भाजपा के खेमे की हवेली चाहे कितनी बड़ी दिखती हो, उस के सामने से गुजरने वाले चाहे चप्पल को बगल में दबा कर और सलाम कर के गुजरते हो, मन में लोगों को कोई भरोसा नहीं है कि खेमेदार कुछ भला करेगा. इसलिए भाजपा के खेमेदारों को लाठी और पैसे के दम पर हमारे खेमों में तोडफ़ोड़ करनी पड़ रही है.

यह भारतीय जनता पार्टी की कमजोरी दिखाती है कि उसे केंद्र में भारी सीटें मिलने के बावजूद राज्यों में दलबदलूओं के सहारे सरकारें चलाना पड़ रहा है. मतलब यह है कि पार्टी को जनता से डर  लगता है जीते हुए विधायकों और सांसदों से नहीं.

महाराष्ट्र में जो हुआ वह वैसे पौराणिक युकों से ङ्क्षहदू राजा करते आए हैं पर हमेशा उन्होंने छल से राज्य किया है. अमृत मंथन में भी दस्युओं को मिला कर देवताओं ने अमृत निकाला पर बजाए बांटने के सारा हड़प गए. यही आज हो रहा है.

संसद में कर्मकांड और प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी

देश के नए संसद भवन के उद्घाटन के दरमियान प्राचीन रीति-रिवाजों के नाम पर जिस तरह कर्मकांड दुनिया और हमने देखे हैं उससे यह संदेश गया है कि आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु की वैज्ञानिक सोच से इतर आज का भारत यह है जो हवन और कर्मकांड में विश्वास रखता है . क्योंकि इसके बगैर न तो देश की तरक्की हो सकती है और न ही समाज की. संभवत नरेंद्र दामोदरदास मोदी को यह विश्वास और आस्था है कि पंडित पुरोहितो के सामने समर्पण करने से देश दुनिया का सरताज बन सकता है और तथाकथित रूप से विश्व गुरु भी.

यह सब देखने के बाद कहा जा सकता है कि आज देश उस चौराहे पर खड़ा है जहां से एक बार फिर पोंगा पंथ और पुरातन पंथी विचारधारा को  सरकार और  सबसे ज्यादा प्रधानमन्त्री का प्रश्रय मिला है.

दरअसल, यह देश में  हिंदुओं की तुष्टिकरण के कारण और बहुलता के कारण यह सब किया जा रहा है. जो सीधे-सीधे संविधान और अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो जाने वाले लाखों लोगों का अवमान है. यह बताता है कि लोकतंत्र में सत्ता के लिए वोटों की राजनीति का भयावह चित्र कैसा हो सकता है. हमारे देश के संविधान में स्पष्ट रूप से अंकित है कि लोकतांत्रिक गणराज्य है. मगर आज हिंदुत्व वाली सोच कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र दामोदरदास मोदी संविधान की भावना से हटकर के वह सब कर रहे हैं जो इसके पहले 75 वर्षों में कभी भी नहीं हुआ. और मजे‌ बात की लोग कह रहे हैं कि नए भारत का आगाज हो गया है. यह हास्यास्पद है की ऐसा महसूस कराया जा रहा है मानो बीते 75 साल हमारे देश के लिए अंधकार के समान थे और नरेंद्र मोदी की सत्ता आने के बाद देश सही अर्थों में आजाद हुआ है विकास की ओर बढ़ रहा है और दुनिया का नेतृत्व करेगा. मगर यह सब बातें मीडिया का हो हल्ला है. सच्चाई यह है कि देश जिस तरह अपनी संविधान की सीमाओं से हटकर के पीछे की ओर जा रहा है उससे देश की छवि दुनियां में पूरी तरह से बदल रही है जो भविष्य के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती.

नेहरू और नरेन्द्र मोदी

तथ्य यह  है कि प्रधानमंत्री मोदी विपक्ष को सम्मान नहीं देते और उनके कार्य व्यवहार से महसूस होता है मानो विपक्ष को समाप्त कर देना चाहते हैं.  नरेंद्र मोदी बारंबार विपक्ष को नजरअंदाज कर और हंसी उड़ाते दिखाई देते हैं. अगर ऐसा नहीं है तो जब संसद के निर्माण का विचार नरेंद्र मोदी सरकार को आया तो उन्होंने विपक्ष से मिल बैठकर विचार विमर्श क्यों नहीं किया. जब उद्घाटन का समय आया तब उन्होंने विपक्ष के साथ विचार-विमर्श क्यों नहीं किया. देश सत्ता और विपक्ष के माध्यम से ही चलता है.  मगर नरेंद्र दामोदरदास मोदी की सोच  है कि विपक्ष को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाए. यही कारण है कि नई संसद के उद्घाटन के दरमियान कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों ने संसद भवन के उद्घाटन का बहिष्कार कर दिया. मगर उन्हें मनाने के लिए सकारात्मक   पहल नरेंद्र मोदी सरकार ने नहीं की. बल्कि  हुआ यह कि सरकार के चर्चित चेहरों द्वारा चाहे वह राजनाथ सिंह को या फिर स्मृति ईरानी द्वारा विपक्ष का मजाक बनाया गया और उन पर प्रश्नचिन्ह उठाए गए. इस संदर्भ में शरद पवार ने जो कहा है वह सौ फीसदी दी सच है.

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार के मुताबिक,- “नए संसद भवन के बनाने से मैं खुश नहीं हूं. मैंने सुबह कार्यक्रम देखा है, अच्छा है मैं वहां नहीं गया. नई संसद मे जो कार्यक्रम हुआ उससे हम देश को पीछे ले जा रहे हैं.”

शरद पवार देश वरिष्ठ राजनेता है अगर उन्होंने उद्घाटन समारोह पर यह टिप्पणी की है तो यह देश की दुनिया की आवाज ही कही जा सकती है. उनके मुताबिक -“उद्घाटन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  की विभिन्न रस्मों से यह प्रदर्शित हुआ  की देश को दशकों पीछे ले जाया जा रहा है , देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वैज्ञानिक सोच रखने वाले समाज की परिकल्पना की थी, लेकिन नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह में जो कुछ हुआ वह इसके ठीक उलट है.”

सचमुच यह दुखद है और जिसका टेलीकास्ट दुनियाभर में हुआ है सारी दुनिया जानती है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां सभी जाति समुदाय के लोग प्रेम और सद्भाव के साथ रहते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के एक कार्यक्रम से मानो सब कुछ मिट्टी पलीद हो गया.

संसद भवन का उद्घाटन के दौरान वहां हवन किया गया तथा लोकसभा अध्यक्ष के आसन के निकट राजदंड (सेंगोल) स्थापित किया गया. यह साला ढकोसला दुनिया ने देखा है और इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है. जिसका दूरगामी असर भारत की राजनीति पर भविष्य पर पड़ने वाला है.

दरअसल,प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा आधुनिक भारत की अवधारणा की बात करने और नई दिल्ली में नए संसद भवन में की गई विभिन्न रस्मों में बहुत बड़ा अंतर है. जो सिर्फ हिंदुत्व की स्थापना और हिंदू तुष्टीकरण के कारण किया गया है. यह पूरी तरह संविधान की भावना के विपरीत है. वस्तुत: यह लोग ऐसे हैं कि अगर आज हिंदुओं की जगह कोई दूसरा जाति समुदाय बहुसंख्यक हो जाए तो यह लोग उनके पैरों में भी लोटने लगेंगे.

नए संसद भवन के उद्घाटन के अवसर पर देश के सभी छोटे बड़े नेताओं बुद्धिजीवियों ने अपने विचार रखे हैं ,ऐसे समय में शरद पवार का बयान अत्यंत महत्वपूर्ण है नए संसद भवन के उद्घाटन के संपूर्ण कार्यक्रम पर उनका यह कहना कि विज्ञान पर समझौता नहीं किया जा सकता. नेहरू ने वैज्ञानिक सोच वाले समाज का निर्माण करने की ओर निरंतर प्रयास किया. लेकिन आज नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह में जो कुछ हुआ, वह उससे ठीक उलट है जिसकी नेहरू ने परिकल्पना की थी.

उड़ीसा मेंं हुआ ट्रेन हादसा

उड़ीसा के बालासोर में 3 ट्रेनों के एक्सीडैंट में 300 लोगों के मरने की खबर है पर बहुत से लोग जनरल बोगियों में मरे लोगों की मौतों की बात नहीं कर रही जिन का कोई रिकार्ड नहीं रहता. सोशल मीडिया पर कहा जा रहा है कि खुली खिड़कियों वाले इन डिब्बों में मजदूर लोग सफर करते हैं और वे बिना रिजर्वेशन वाले टिकट लेते हैं.

यह बात इस से साबित होती है कि  एक औरत ने अपने 3 बच्चों को खिडक़ी से बाहर साथ में उगी घास पर फेंक दिया था जिस से वे बच गए. बच तो वह औरत और उस का मर्द भी गया. उस का मर्द चैन्नै में पलंबर का काम करता है.

रेल मंत्रालय ने बड़े गर्व से कहा है कि रिजर्व कंपार्टमैंटों में बहुत कम मौतें हुई हैं क्योंकि जो डिब्बें दो सवारी गाडिय़ों के चपेट में आए वे जनरल बोगियां थीं. ऊंचे पैसे वालों के बचने पर रेल मंत्रालय राहत की सांस ले रहा है. मजदूरों के मरने की गिनती नहीं हो पा रही तो यह प्रधानमंत्री, मंत्री और रेलवे के लिए अच्छा है. क्योंकि उन के लिए तो वे सफर करें तो पैदल ही करें तो ठीक.

यह न भूलें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तावड़तोड़ ऊंचे लोगों के लिए वंदेभारत ट्रेनों का उद्घाटन कर रहे हैं जिन की रफ्तार आम ट्रेनों से 10-20 किलोमीटर रखें प्रति घंटा ही ज्यादा है पर दाम बहुत ज्यादा हैं ताकि मजदूर किस्म के लोग उस में सफर न कर सकें.

आजकल नई ट्रेनों, स्टेशनों, प्लेटफार्मों, तीर्थ यात्रियों के दल जाने पर प्रधानमंत्री खुद मौजूद रहते हैं इसलिए रेलवे की सारी सोच इस पर है कि रेलें नईनई चलाई जाएं, स्टेशनों में एयरकंडीशंड लाउंज बनें, लक्जरी सामान बिके, खाना मंहगा हो, पिज्जा, वर्गर मिले. पहले की तरह प्लेटफार्म पर ठेलों पर कुछ रुपए में 6 पूरी और सब्जी मिलना बंद हो गया है. यही हाल ट्रेन में डब्बों का है. ट्रेनें अमीरों के लिए चह रही हैं जिन्हें दिखावट चाहिए, सुरक्षा का ख्याल भी नहीं करते वे.

यह सोच गहरे नीचे तक रेल कर्मचारियों में पहुंच गई है. तेज चलो, सुरक्षा तो भगवान के हाथ में है. आखिर इतने मंदिर क्यों बन रहे हैं. उड़ीसा जहां यह हादसा हुआ तो मंदिर से पटा हुआ हर नेता, हर अफसर ऊंची जाति का पूजापाठी है. वहां तो भगवान तो वरदान देते हैं या दंड देते हैं.

जरूर यह गलती उन मरने वालों मजदूरों की है जो बिना दानपुण्य किए ट्रेन में चले. साष्टांग प्रणाम करने वाले, धर्माचार्यों के साए में रहने वाले प्रधानमंत्री, रेलमंत्री, रेल बोर्ड के चेयरमैन थोड़े ही दूसरों के पापों के जिम्मेदार होंगे.

देश की गरीबी

इस देश की गरीबी की वजह इस को मुगलों या अंगरेजों का लूटना नहीं है जो आज भी हमारे नेता कहते रहते हैं. असली वजह तो निकम्मापन है और अपना कीमती समय बेमतलब के कामों में बिताना है. खाली बैठे खंभे पर चढ़ना और उतरना ही यहां काम कहा जाता है और यह समाज, घर और सरकार में हर समय दिखता है.

जहां इन में किसी भी नई चीज का पहले शिलान्यास शामिल है और फिर भूमि पूजन, महीनों में बनने वाली चीज में बरसों लगाना और फिर उद्घाटन करना और आखिर में बारबार मरम्मत करने के लिए बंद करना भी शामिल है. 2,000 के 2016 में चालू किए नोट सिर्फ 7 साल में बदलने का हुक्म इसी निकम्मेपन की निशानी है. पूरे देश को 2016 की तरह फिर फिरकनी की तरह घुमा दिया है कि अपने बक्सों को खंगालो कि कहीं कोई 2,000 का मुड़ातुड़ा नोट इधरउधर न पड़ा हो और उसे बदलवाओ.

गनीमत यह अखंड 100 दिन का जागरण थोड़े कम पैमाने पर है. इसलिए नहीं कि सरकार समझदार हो गई है, इसलिए कि नोट कम हैं और काफी महीनों से नोट बैंकों से ही नहीं दिए जा रहे थे. पूरे देश का कितना समय इस पूरे पागलपन में बरबाद होगा, इसे गिनना असंभव है पर यह देश तो वह है जहां एक जेसीबी चलती है तो देखने वाले 100-200 खाली बैठे लोग मिल जाते हैं. यहां बेकार, बेरोजगार, धर्म के नाम पर घंटों वही लाइनें किसी मूर्ति के सामने आंख बंद कर के बैठने वालों के लिए इस समय की कीमत कैसी है, यह जांचना मुश्किल है.

सरकार ने पहले 2,000 के नोट थोपे, जब जरूरत नहीं थे और अब वापस लिए जब यह भी जरूरी नहीं थे. हाल के सालों में करोड़ों की रिश्वतें भी 500 रुपए के नोटों से लीदी जा रही थीं. सोशल मीडिया पर टैक्स अफसरों द्वारा जारी फोटो इस बात का सुबूत हैं कि 500 रुपए के नोटों में रिश्वत का पैसा रखना ही एक परंपरा बन गई थी. अब महीनों तक कई करोड़ नोटों को बेमतलब में घरों से बैंकों तक, बैंकों से वाल्टों तक, वाल्टों से रिजर्व बैंक तक और रिजर्व बैंक में इन्हें संभालने में लोग लगे रहेंगे.

गरीब देश के लोगों के आटे में पानी जबरन डाल दिया गया है कि अब उसे सुखाओ, फिर सड़े को छांटो और फिर दोबारा पीसो. यह सरकार निकम्मी है यह तो मालूम है पर पूरे देश को भी निकम्मा मानती है इस का एक और उदाहरण है. निकम्मों को बेबात में काम पर लगाना इस देश में बहुत आता है और इसी वजह से इस देश का आम आदमी अमेरिकी से  30-32 गुना कम पैसे वाला है. चीनी भी भारतीय से आज 8 गुना अमीर हैं, जबकि 1960 के आसपास दोनों बराबर थे.

यह ऐसे ही नहीं हो रहा. इस के लिए सरकार तरहतरह से मेहनत करती है. सूबों की परीक्षा 2 बार ली जाने लगी है, एक बोर्ड की और एक क्यूट की. पेपर लीक हो गया कह कर बारबार परीक्षा टाली जाती है, फिर दोबारा साल 2 साल में होती है. अदालतों में मामले 10 साल से कम तो चलते ही नहीं. टूटीगंदी सड़कों पर ध्यान तब जाता है जब टैंडर से पैसा निकलवाने की साजिश हो और वहां भी सड़क जो 4 दिन में बननी चाहिए 4 महीने में बनती है, फिर कोई और विभाग तोड़ने आ  जाता है.

निकम्मेपन को थोपने वाली सरकार को बारबार वोट मिलते हैं. पहले कांग्रेस को मिलते रहे, अब भाजपा को मिल रहे हैं. 2,000 के नोटों को वापस लेना निकम्मेपन की पटेल जैसी मूर्ति बनाना है. गुजरात के पटेल जैसी सैकड़ों मूर्तियां देशभर में बन रही हैं. उतनी बड़ी नहीं, पर खासी वही और सब 2,000 के नोटों के बदलने वाली बेमतलब की निकम्मी सोच की निशानी हैं.

नया संसद भवन : नरेंद्र मोदी की टेढ़ी चाल

बिना किसी मांग के,देश में आवश्यकता के, एक तरह से रातों-रात देश में एक नया संसद भवन बना दिया गया है. जी हां यह सच्चाई है कि फिलहाल यह मांग उठी  ही नहीं थी कि देश को नवीन संसद भवन चाहिए और ना ही इसकी आवश्यकता महसूस की गई थी . मगर जैसे कभी राजा महाराजाओं को सपना आता था और सुबह घोषणा हो जाती थी भारत जैसे हमारे विकासशील एक गरीब देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने अचानक संसद भवन का निर्माण कराना शुरू कर दिया. शायद उन्हें पहले के जमाने के राजा महाराजाओं  के कैसे नए नए शौक चराते हैं . जैसे मुगल बादशाहों ने ताजमहल बनवाया लाल किला बनवाया और इतिहास में अमर हो गए प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी भी इतिहास में अमर होना चाहते हैं. यही कारण है कि संसद भवन का उद्घाटन भी देश की संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से करवाने की बजाय स्वयं करने के लिए लालायित है.

नए संसद भवन का उद्घाटन को लेकर  विपक्ष ने केंद्र सरकार पर हमले तेज कर दिए है सबसे पहले पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और अब विपक्ष के नेता एक सुर में मांग कर रहे हैं कि उद्घाटन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से ही किया जाना चाहिए. यह मांग एक तरह से देश के संविधानिक प्रमुख होने के कारण राष्ट्रपति से कराया जाना गरिमा मय  लोकतंत्र को मजबूत बनाने वाली होगी. क्योंकि संविधान के अनुसार हमारे देश में राष्ट्रपति ही सर्व प्रमुख है उन्हीं के नाम से प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार काम करती है.

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने राष्ट्रपति से ही नई संसद का उद्घाटन कराने की मांग दोहराई  और कहा कि ऐसा होने पर लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सरकार को प्रतिबद्धता दिखेगी. आज  राष्ट्रपति का पद महज प्रतीकात्मक बन कर रह गया है.”

खड़गे ने ट्वीट कर कहा ,” ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार ने दलित और आदिवासी समुदायों से राष्ट्रपति इसलिए चुना ताकि राजनीतिक लाभ लिया जा सके.”

दूसरी तरफ पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह के लिए आमंत्रित नहीं किया गया है. और अब मौजूदा राष्ट्रपति को भी समारोह के लिए आमंत्रित नहीं किया जा रहा है. कांग्रेस अध्यक्ष मलिकार्जुन खरगे ने कहा, ” संसद भारतीय गणराज्य की सर्वोच्च विधायी संस्था है और राष्ट्रपति सर्वोच्च संवैधानिक पद है.राष्ट्रपति सरकार, विपक्ष और हर नागरिक का प्रतिनिधित्व करती है. वह भारत की प्रथम नागरिक है.उन्होंने आगे कहा  अगर संसद के नए भवन का उद्घाटन राष्ट्रपति करती हैं, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक मर्यादा के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को प्रतिबिबित करेगा.”

क्या यह राष्ट्रपति पद का अवमान नहीं है

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी जी देश की जनता या सवाल कर रही है की देश के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद पर आसीन द्रोपदी मुर्मू के साथ उनके पद का अपमान नहीं है .  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हर चीज में मैं मैं करना शोभा नहीं देता.  दूसरी तरफ राजनीतिक पार्टियों में भी इस मुद्दे पर सवाल उठाने खड़े कर दिए हैं.

आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा, ” नवनिर्मित संसद भवन के उद्घाटन के लिए राष्ट्रपति की जगह प्रधानमंत्री को आमंत्रित करना न केवल राष्ट्रपति का अपमान है बल्कि ये पूरे आदिवासी समाज का अपमान है. साथ ही यह फैसला दर्शाता है कि भारतीय जनता पार्टी की मानसिकता आदिवासी विरोधी, दलित विरोधी और पिछड़ी विरोधी है.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा ने कहा, ” संसद के शिलान्यास से लेकर अब उद्घाटन तक राष्ट्रपति को छोड़ कर बड़ा फैसला लेना संवैधानिक रूप से सही नहीं है. उन्होंने कहा कि संसद के उद्घाटन के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को आमंत्रित करना चाहिए.  प्रधानमंत्री के लिए संसद के नए भवन का उद्घाटन करना संवैधानिक रूप से सही नहीं होगा. ऐसा किसी बड़े लोकतंत्र ने ऐसा नहीं किया है. हमारा मत है कि संविधान का सम्मान नहीं हो रहा और ये न्यायोचित नहीं है.”

तृणमूल सांसद सौगत राय के  मुताबिक  राहुल गांधी ने जो मांग उठाई है, उससे हम भी सहमत हैं. नए संसद भवन का उद्घाटन प्रधानमंत्री की बजाय भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जाना चाहिए. ससद में लोकसभा और राज्यसभा दोनों है. प्रधानमंत्री है पार्टी के नेता हैं, जिनके पास सदन में बहुमत है और राष्ट्रपति संसद का प्रतिनिधित्व करते हैं. जहां तक बात वर्तमान राष्ट्रपति जो पति मुर्मू की है अनुसूचित जनजाति का प्रयोग करती हैं जिसका ढोल भाजपा ने उन्हें राष्ट्रपति बनाते समय खूब बजाया  था और आज जब उनसे संसद का उद्घाटन नहीं करवाने का नाटक जारी है और यही आवाज उठ रही है कि यह राष्ट्रपति पद का अपमान है ऐसे में अगर राष्ट्र पति महामहिम मुर्मू राष्ट्रपति पद से त्यागपत्र दे देती हैं तो जहां नरेंद्र दामोदरदास मोदी की बड़ी किरकिरी होगी वही इस ऐतिहासिक समय में द्रोपदी मुर्मू का कद बढ़कर इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो जाएगा. अनुसूचित जनजाति का आप गौरव बन जाएंगी.

किरन रिजिजू : न्यायपालिका मजबूत केंद्र कमजोर

एक कहावत बन गई है -” आर एस एस और भाजपा कभी कच्ची गोटिया नहीं खेलते.” प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी के स्नेह पात्र देश के कानून मंत्री किरण रिजिजू के मामले में देश में यही प्रतिक्रिया आई है कि नरेंद्र दामोदरदास मोदी की सरकार के संपूर्ण कार्यकाल की यह घटना अपने आप में अनोखी और अलग है .

कानून मंत्री के रूप में किरन रिजिजू जिस तरह कुछ ज्यादा सक्रिय थे वह अपने आप में एक इतिहास है. न्यायपालिका से टकराव लेकर उन्होंने जिस तरह भाजपा की नीतियों को आगे बढ़ाया वह तो शाबाशी के लायक था मगर मिल गया दंड!

संपूर्ण घटनाक्रम को देखा जाए तो देश हित में यह अच्छा हुआ है. यह संदेश चला गया है कि न्यायपालिका नरेंद्र दामोदरदास मोदी के शासन में भी सर्वोच्च स्थान रखती है अन्यथा जिस तरह देश के कानून मंत्री के रूप में किरण रिजिजू ने खुलकर घेरा बंदी की थी वह सीधे-सीधे सरकार और न्यायपालिका और केंद्र के टकराव को दर्शाती थी. ऐसा महसूस होता था मानो किरण रिजिजू जो बोल रहे हैं वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सहमति से ही क्योंकि इसी तरह उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ भी बीच-बीच में शिगूफा छोड़ते रहते है . यही कारण है कि एक मामला भी अवमानना का उच्चतम न्यायालय में दर्ज हो कर चल रहा है. ऐसे में अचानक कानून मंत्री को पद से हटाना यह संदेश देता है कि देश की नरेंद्र मोदी सरकार न्यायालय का सम्मान करती है और किसी भी तरह टकराव का संदेश नहीं देना चाहती. यह सकारात्मकता देश के लिए एक अच्छा संदेश लेकर आया है. क्योंकि आर एस एस की भावनाओं को अमलीजामा पहनाने वाली भारतीय जनता पार्टी सरकार ने अगर यू-टर्न लिया है तो यह देश हित में माना जा सकता है. इसके साथ ही हम एक बड़ा यक्ष प्रश्न भी उठाने जा रहे हैं जो आज देश के सामने है नरेंद्र मोदी सरकार जल्दी से बैकफुट पर नहीं जाती अपनी किसी भी गलती को मानने को तैयार नहीं होती अपने विशिष्ट सहयोगी की गलती को भी मानने को तैयार नहीं होती और न ही आसानी से यू टर्न लेती है इसका सबसे ज्वलंत मामला है दिल्ली के जंतर मंतर में बैठी महिला पहलवान बेटियों का जो कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष और सांसद बृजभूषण सिंह का इस्तीफा और कार्रवाई के लिए लंबे समय से आंदोलनरत हैं मगर केंद्र सरकार मानो आंखें मूंदकर बैठी हुई है. ऐसे में किरण रिजिजू का कानून मंत्री से इस्तीफा लेकर मंत्रालय बदल देना एक बड़ी घटना है जो संकेत देती है कि अगर नरेंद्र दामोदरदास मोदी ऐसा नहीं करते तो आने वाले समय में मुसीबत बढ़ जाती और नरेंद्र मोदी सरकार को जवाब देना भी मुश्किल पड़ जाता.

केंद्र का यूं टर्न और देश हित

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अप्रत्याशित रूप से बड़ा बदलाव करते हुए किरेन रिजिजू से कानून मंत्रालय वापस ले लिया. उनकी जगह अब अर्जुन राम मेघवाल को कानून मंत्रालय का जिम्मा दिया गया है.

दरअसल,अब यह कहा जा रहा है यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने में देरी, न्यायपालिका से सार्वजनिक टकराव ऐसी कई चीजें थीं, जिसे लेकर प्रधानमंत्री उनके लिए नाराज थे. केंद्र सरकार कॉमन सिविल कोड को लेकर गंभीर है. इसे लेकर कई बैठकें भी हो चुकी हैं. बीजेपी शासित राज्यों में इसे लागू भी किया जा रहा है. इस कानून को देशव्यापी लागू करने का जिम्मा कानून मंत्रालय को सौंपा गया था जिसमें लगातार देरी हो रही थी. माना जा रहा है कि इस बात को लेकर प्रधानमंत्री काफी नाराज थे. यही नाराजगी किरन रिजिजू को भुगतना पड़ी.

कहा जा जा रहा है कि न्यायपालिका और कानून मंत्री के बीच सार्वजनिक टकराव और क़ानून मंत्री के न्यायपालिका को लेकर दिये गए बयानों से सरकार में “उच्च स्तर” पर नाराजगी थी. सरकार नहीं चाहती थी कि न्यायपालिका के साथ टकराव सार्वजनिक रूप से दिखे. मगर यह भी सच है कि इसे बहुत पहले ही नरेंद्र मोदी सरकार को रोक देना चाहिए था.

दरअसल, तकरीबन डेढ़ महीने पहले कानून मंत्री के न्याय पालिका को लेकर दिए गए एक सार्वजनिक बयान ने “सरकार” को नाराज कर दिया . तब ही तय हो गया था कि किरण रिजिजू को कानून मंत्रालय से हटाया जाएगा, लेकिन कर्नाटक चुनाव को वजह से रिजिजू को कुछ दिनों का जीवन दान मिल गया था.
15 दिन पहले ये तय हो गया था कि कर्नाटक चुनाव के बाद किरण रिजिजू से कानून मंत्रालय ले लिए जाएगा. अब, रिजिजू को भू-विज्ञान मंत्रालय दिया गया है. अब कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कानून मंत्री के रूप में किरण रिजिजू ने जो क्षति पहुंचाने का काम किया है उसके बरक्स उन्हें कोई भी दूसरा मंत्रालय नहीं दिया जाना चाहिए था. जिससे यह संदेश जाता कि देश की सर्वोच्च न्यायपालिका के खिलाफ बुलंदी के साथ कानून मंत्री के रूप में प्रदर्शन करने वाले किरण रिजिजू को दंड मिला है. कपिल सिब्बल से लेकर की अनेक कानून विदो ने किरण रिजिजू की आलोचना की है जो जायज कही जाएगी. मगर हमारा सवाल यह है कि कानून मंत्री का पद तो ले लिया गया मकर उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का क्या होगा. क्या सरकार उन पर भी कोई एक्शन ले सकने की स्थिति में है.

कर्नाटक में रिजर्वेशन एक अहम मुद्दा

रिजर्वेशन से पहले दलितों का और बाद में ओवीसी कास्यों का हाल सुथरा हो ऐसा नहीं है पर फिर भी जो थोड़ी भी सीटें उन जातियों की मिली. इन जातियों को हमारे पौराणिक ग्रंथ बारबार पाप का फल कहते रहते हैं और यही ङ्क्षहदू सोच की जड़ में है कि ये खुद अपनी बुरी हालत के लिए जिम्मेदार हैं. हालत तो यह है कि सदियों की पढ़ाई पट्टी की वजह से पिछड़ी व अछूत जातियां खुद को दोषी मान कर जोरशोर से पूजापाठ करती है ताकि अगले जन्म में वे इस जंजाल में न फंसे.

इस रिजर्वेशन के बावजूद ऊंची जातियां आज भी देश, समाज, सरकारी, व्यापारों, पढ़ाई, सेना, शासन, पुलिस, सेना में सब से ऊंचे स्थान पर बैठी है. दिक्कत यह है कि कहने को ये लोग पढ़ेलिखे हैं, मेरिट वाले हैं पर यही ऐसा भारत बना रहे हैं जो हर पैमाने पर ओवीसी देशों से भी गया गुजरा है.

कर्नाटक के चुनावों में रिजर्वेशन एक बड़ा मुद्दा रहा है क्योंकि मुसलमानों को मिलने वाला 4′ रिजर्वेशन हटा कर भारतीय जनता पार्टी कट्टर ङ्क्षहदू वोटरों को कह रही है कि लो तुम्हारे लिए 2 पुष्पक विमान उतार दिया है. उन्हें भरोसा दिलाया जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी को वोट करते रहो तो बाकि 50′ रिजर्वेशन भी एक न एक दिन खत्म हो जाएगा और पौराणिक आदेश की जन्म के हिसाब से ही पद मिलेंगे, ऊंचे घरों वाले खुद ब खुद ऋषिमुनि बन जाएंगे, राजाओं के पुत्र राजा बन जाएंगे और दासों के पुत्र दास रह जाएंगे और सब की औरतें पापों की गठरियों की तरह मानी जाती रहेंगी.

अगर मेरिट वाले 50′ लोगों ने कुछ किया होता तो यह देश हर पैमाने पर पिछड़ा न होता. आगे उन्होंने कुछ किया होा तो देश के 2 बड़े शहर दिल्ली और मुंबई झुग्गीझोपडिय़ों के यहां नहीं होते जहां न पानी है, न सीवर न वर्षा से बचाव, न गरर्मी की तड़प से बचाव.

अगर मेरिट से आए 50′ लोगों ने सरकार चलाते हुए ढंग से देश चलाया होता तो लाखों भारतीयों को भाग कर दूसरे देशों में जाना नहीं पड़ता. हालत तो यह है कि भूख और बेकारी के कारण भारत के लोग अफ्रीका के गरीबों में गरीब देश सूडान तक पहुंचा रहे हैं कि 2 रोटी का इंतजाम हो सके और आजकल सूडान के लोगों की आपसी लड़ाई में फंसे हुए हैं.

मेरिट की दुहाई की वजह से देश का मीडिया गोदी मीडिया बन कर मोदी मीडिया बना हुआ है. गोदी मीडिया को ङ्क्षहदूमुसलिम, मोदी वाह, भाजपा वाह इसलिए करना अच्छा लगता है कि शायद इस तरह वे रिजर्वेशन को खत्म कर सकें. गोदी मीडिया, चाहे टीवी वाला हो या ङ्क्षप्रट वाला कभी पिछड़ों, दलितों और मुसलमानों व सिखों के नेताओं की बात नहीं करता क्योंकि वे सब रिजर्वेशन को सही मानते हैं.

रिजर्वेशन के बावजूद जनरल कर वालों के 50′ से ज्यादा पदों पर बैठे लोग में जनरल कास्ट की आधी औरतें क्यों नहीं है. क्यों उन्होंने अपनी ही कास्ट की औरतों को मौका नहीं दिया. वे इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी, ममता बैनर्जी, जयललिता, मायावती अपने बलबूते पर कुछ बनीं पर सरकारी पदों पर औरतों की गिनती न के बराबर है क्यों.

जो लोग मेरिट की दुहाई देते हैं वे अपने ही घरों की औरतों को जब बरावर का मौका, बरावर की इज्जत नहीं दे सकते वे भला कैसे पिछड़े शूद्रों और दलित अछूतों को ओबीसी व एएसी कोर्ट की जगह दे सकते हैं.

रिजर्वेशन पाने के बाद कुछ का हाल सुथरा पर उन के हाथ इतने बंधे हैं और रिजर्वेशन पा कर कुछ बने अपने को इतना हन समझते हैं कि वे अपने लोगों के लिए कुछ करते दिखना भी नहीं चाहते. रामनाथ कोङ्क्षवद हो, द्रौपदी मुर्मू, के.आर. नारायण, ये एक पूजापाठी रहे हैं और वर्ण व्यवस्था को मानने वाले जो दूसरे दलिलों पिछड़ों आदिवासियों के लिए कुछ भी करने को तैयार नहीं रहे या हैं. इसी वजह से रिजर्वेशन के बावजूद व दलितों, पिछड़ों का हाल सुधरा है न देश का.

रिजर्वेशन की मांग कर रहे है लोग

एक सर्वे में यह पाया गया है कि राजस्थान में 93′ लोग अपनी जाति के हिसाब सरकारी नौकरियों, स्कूलोंकालेजों में सीटों के हिसाब से रिजर्वेशन मांग रहे है और अगर यही रहा तो जिन्हें मेरिट वाली सीट कहां जाता है वे बस 7′ बचेंगी यानी 100 में से 7.

शड्यूल कास्ट जो पहले अछूत कहे जाते थे और आज भी समाज में अछूत ही हैं और हिंदू वर्ण व्यवस्था के हिस्सा भी नहीं थे राजस्थान की आबादी में 1.28 करोड़ हैं. इन्हें 16′ आरक्षण मिलता है और इसी के बल पर रिजर्व सीटों की वजह से 34 विधायक और 4 सांसद हैं.

आदिवासी आबादी का 12′ यानी 71 लाख हैं. इन के 33 विधायक और 3 सांसद हैं. ये लोग गांवों में रहने लगे है पर पहले जंगलों या रेगिस्तान में रहते थे. 75 सालों में कुछ कपड़ों और बरतनों के अलावा इन्हें कुछ ज्यादा मिला हो, ऐसा नहीं लगता. अदर बैकवर्ड कास्ट में ऊपरी जातियों की गिनती 3.5 करोड़ यानी 21′ है और ये आबादी के हिसाब से 27′ आरक्षण चाहते हैं. इन्हीं में से कट कर बनाई गई मोस्ट वैकवर्ड कास्ट को 56′ रिजर्वेशन मिला है पर इन की गिनती नहीं हुई है क्योंकि जाति जनगणना में जाति पूछी जाती है पर जनता को बताई नहीं जाती.

ईडब्लूएस को 10′ का आरक्षण मिला है जो ऊंची जातियों के लिए जिन में ज्यादातर ब्राह्मïण ही आते हैं जो पूजापाठ से दान बसूल नहीं पाते. ये लोग आबादी का शायद 3-4′ है पर 14′ रिजर्वेशन मनवां रहे हैं. लड़ाई मोटे तौर पर उन 36′ सीटों के लिए हो जो ऊंची जातियों के लिए उलटे रिजर्वेशन की शक्ल ले चुकी है और आबादी का 8-9′ होने पर भी मलाईदार पोस्टें इन्हीं के हाथों में आती हैं. ये लोग पहले 100′ पोस्टों पर होते को पर अब धीरेधीरे इन की गिनती घट रही है पर ताकत नहीं क्योंकि इन में भयंकर एकजुटता है और अपने मनमुटाव से बाहर नहीं आने देते.

3′ ब्राह्मïणों ने, 3-4′ राजपूतों ने सारी मोटी पोस्टों पर कब्जा कर रखा है क्योंकि ये कई पीढिय़ों से पढ़ेलिखे हुए है और इन के घरों में पढ़ाई पर बहुत जोर दिया जाता है. राजस्थान के बनिए आरक्षण के चक्कर में नहीं पड़ते और वे दुकानदारी में सफल हो जाते हैं और देशभर में फैले हुए हैं जहां बनिए की अकल, बचत, सूझबूझ से ये एक तरह से सब से अमीर वर्ग है बिना रिजर्वेशन के. रिजर्वेशन सिर्फ सरकारी नौकरियों के लिए मांगा जाता है क्योंकि इन में पक्की नौकरी के साथसाथ हर जगह ऊपरी रिश्वत की कमाई का मौका है. शायद ही कोई सरकारी दफ्तर होगा जहां से ऊपरी कमाई की जा सकती. बच्चों के बाल गृहों तक में खाने के टैंडर से ले कर बच्चों को सेक्स के लिए भेज कर कमाई की जाती है.

दिक्कत यह है कि सरकारी पैसे का लालच स्वर्ग पाने के लालच की तरह है. अगर मंदिरों, मसजिदों, चर्चों की स्वर्ग मिलने की कहानियां सही हैं और अगर पूजापाठियों की गिनती देखी जाए तो तर्कों में तो सन्नाटा छाया हुआ होगा क्योंकि हर कोई स्वर्ग में पूजापाठ के बल पर पहुंच रहा है. जैसे इस झूठ, फरेब से सदियों से धर्म का धंधा का चल रहा है, नेताओं का धंधा रिजर्वेशन के नाम पर चल रहा है. मुट्ठी भर सरकारी नौकरियों के लालच में पूरी जनता से वोट बसूले जाते हैं और इसीलिए राजस्थान में 93′ सीटों पर दावेदारी है. ऐसा हर राज्य में है जबकि रिजर्वेशन के बल पर फायदा थोड़ों को ही हो पाता है.

नेताओं के पास पंडेपादरियों की तरह इस से अच्छी आसान बात कहने के अलावा वैसे ही कुछ नहीं होता.

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