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बड़बोला: कैसे हुई विपुल की बहन की शादी- भाग 5

‘‘बोलो, विपुल, अगर मेरे बस में होगा तो जरूर करूंगा.’’ यहां नवयुग सिटी में सरकार ने प्लाट काटे हैं. डैडी ने नवगांव का मकान बेच कर यहां एक प्लाट खरीदा है और कोठी बनवानी है. आप को मालूम है कि ठेकेदार, मजदूरों के सिर पर बैठना पड़ता है, नहीं तो वे काम नहीं करते. सुबह कुछ देर से आने की इजाजत मांगनी है, शाम को देर तक बैठ कर आफिस का काम पूरा कर लूंगा, कोई काम पेंडिंग नहीं होगा. हम ने यहां किराए पर मकान ले लिया है, शाम को डैडी कोठी के कंस्ट्रेक्शन का काम देख लेंगे. बस, 1 महीने की बात है, सर.’’

मैं ने उस को इजाजत दे दी और सोचने लगा कि 1 महीने में कौन सी कोठी बन कर तैयार होती है, तभी महेश केबिन में आया. ‘‘विपुल अंगरेजों के जमाने का बड़बोला है, जिंदगी में कभी नहीं सुधरेगा.’’

‘‘अब क्या हो गया?’’ ‘‘सर, सेक्टर 20 में तो 25 और 50 गज के प्लाट प्राधिकरण काट रहा है, वहां कौन सी कोठी बनवाएगा. मकान कहते शर्म आती है, इसलिए कोठी कह रहा है. यदि उस की 50 गज में कोठी है, तो सर, मेरा 100 गज का मकान तो महल की श्रेणी में आएगा.’’

मैं महेश की बातें सुन कर हंस दिया और जलभुन कर महेश विपुल को जलीकटी सुनाने लगा. खैर, विपुल ने 1 महीना कहा था, लेकिन लगभग 4 महीने बाद मकान बन कर तैयार हो गया. मकान के गृहप्रवेश पर विपुल ने पूरे स्टाफ को आमंत्रित किया, लेकिन स्टाफ ने कोई रुचि नहीं दिखाई. सब बड़े आराम से आफिस के काम में जुट गए. मेरे कहने पर सब ने एकजुट हो कर विपुल के यहां जाने से मना कर दिया.

‘‘महेश, बड़े प्रेम से विपुल ने गृहप्रवेश पर बुलाया है, हमें वहां जाना चाहिए.’’ ‘‘सर, मुझे चलने को मत कहिए, उस की कोठी मैं बरदाश्त नहीं कर सकूंगा. मैं अपने झोंपड़े में खुश हूं.’’

‘‘महेश, आफिस से 2 घंटे जल्दी चल कर बधाई दे देंगे, उस की कोठी हो या झोंपड़ा, हमें इस से कुछ मतलब नहीं. वह अपनी कोठी में खुश और हम अपने झोंपड़े में खुश.’’

यह बात सुन कर महेश खुशी से उछल पड़ा और बोला, ‘‘कसम लंगोट वाले की, आप की इस बात ने दिल बागबाग कर दिया. अब आप का साथ खुशीखुशी.’’ शाम को 4 बजे हम आफिस से चल कर विपुल की कोठी पहुंचे. 50 गज के प्लाट पर दोमंजिला मकान था विपुल का. महेश ने चुटकी ली, ‘‘यार, कोठी के दर्शन करवा, बड़ी तमन्ना है, दीदार क रने की.’’

‘‘हांहां, देखो, यह ड्राइंगरूम, रसोई, बैडरूम…’’ अपनी आदत से मजबूर साधारण काम को भी बढ़ाचढ़ा कर बताने लगा कि कोठी के निर्माण में 50 लाख रुपए लग गए. ‘‘सुधर जा, विपुल, 5 के 50 मत कर.’’

‘‘नहींनहीं, आप को पता नहीं है कि हर चीज बहुत महंगी है. जिस चीज को हाथ लगाओ, लाखों से कम आती नहीं है,’’ विपुल आदत से मजबूर सफाई देने लगा. ‘‘विपुल, समय बड़ा बलवान है, इतना झूठ बोलना छोड़ दे, एक

दिन तेरा सच भी हम झूठ मानेंगे. सुधर जा.’’ ‘‘बाई गौड, झूठ की बात नहीं है, बिलकुल सच है,’’ विपुल सफाई पर सफाई दे रहा था.

हम ने वहां से खिसकने में ही अपनी बेहतरी समझी. विपुल से बहस करना बेकार था. हम ने उसे शगुन का लिफाफा पकड़ाया और विदा ली. मकान से बाहर आ कर हम दोनों के मुख से एकसाथ बात निकली :

‘‘विपुल कभी नहीं सुधरेगा. बड़बोला था, बड़बोला है और बड़बोला रहेगा.’

Friendship Day Special: पंचायती राज – कैसी थी उनकी दोस्ती

उस दिन मुनिया अपने मकान में अकेली थी कि शोभित को अपने पास आया देख कर उस का मन खुशी से झूम उठा. उस ने इज्जत के साथ शोभित को पास बैठाया. पास के मकानों में रहते हुए शोभित और मुनिया में अच्छी दोस्ती हो गई थी. दोनों बचपन से ही एकदूसरे के घर आनेजाने लगे थे. कब उन के बीच प्यार का बीज पनपने लगा, उन्हें पता भी नहीं चला. अगर उन दोनों में मुलाकातें न हो जातीं, तो उन के दिल तड़पने लगते थे.

कुछ देर की खामोशी को तोड़ते हुए शोभित बोला, ‘‘मुनिया, मैं कई दिनों से तुम से अपने मन की बात कहना चाहता था, लेकिन सोचा कि कहीं तुम्हें या तुम्हारे परिवार वालों को बुरा न लगे.’’ ‘‘तो आज कह डालो न. यहां कोई नहीं है. तुम्हारी बात मेरे तक ही रहेगी,’’ कह कर वह हंसी थी.

‘‘मुनिया, तुम मेरे दिल में इस तरह बस गई हो कि तुम्हें एक बार दिन में देख न लूं, तो मुझे चैन नहीं पड़ता. मैं तुम्हें चाहने लगा हूं. तुम से इतनी मुहब्बत हो गई है कि मैं रातरात भर तुम्हारी याद में सपने देखता रहता हूं.’’ यह सुन कर मुनिया खुशी से पागल हो गई, लेकिन अपनी इच्छा को दबाते हुए उस ने पूछा, ‘‘क्या तुम नहीं जानते हो कि अगर हमारे रिश्ते की भनक तुम्हारे घर वालों को लग गई, तो इस का क्या नतीजा होगा?’’

शोभित बोला, ‘‘मैं तुम से सच्चा प्यार करता हूं. मुझे किसी की परवाह नहीं है.’’ मुनिया ने उस की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘मैं तो तुम्हें बहुत पहले से अपने दिल में बसा चुकी हूं, लेकिन आज तक कह नहीं पाई. मुझे डर लगता है कि समाज शायद हमारी इस चाहत को कभी नहीं समझेगा.’’

‘‘वह सब तुम मुझ पर छोड़ दो,’’ इतना कह कर शोभित ने मुनिया को खींच कर अपनी बांहों में कस लिया और उस के गालों व होंठों को चूमने लगा. मुनिया उस के प्यार में मदहोश होती रही और उसे प्यार करने लगी. हरिराम और विक्रम पाल एक ही गांव में शुरू से पासपास रहते रहे थे. हरिराम का अपना निजी पुश्तैनी पक्का शानदार मकान था, जिस के सामने विक्रम पाल का मकान छोटा सा खपरैलदार बना था, फिर भी फैलाव में वह थोड़ा बड़ा था.

हरिराम ऊंची जाति का था और विक्रम पाल को लोग नीची जाति का मानते जरूर थे, लेकिन उस का गांव वालों के साथ उठनाबैठना बराबर का था. गांव में अंतर्जातीय विवाह की प्रथा नहीं थी, फिर भी गांव के कुछ लड़के व लड़कियां प्रेमजाल में फंस कर गांव छोड़ कर दूर जा बसे थे.

गांव के लड़के मुनिया और शोभित की प्रेम कहानी को चटकारे ले कर फैलाने लगे. एक दिन यह खबर शोभित के पिता हरिराम के कानों में पहुंची. उन्होंने शोभित की पिटाई कर दी. शोभित ने भी कसम खा ली थी कि वह मुनिया को अपना जीवनसाथी बना कर रहेगा, चाहे इस के लिए उसे कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े. वह भूल गया था कि एक ऊंचे खानदान वाले निचले खानदान की लड़की को बहू बनाना कभी पसंद नहीं करेंगे. वह यह भी अच्छी तरह जानता था कि प्यार करने वालों को गांवनिकाला दिया जा चुका था.

इधर हरिराम कुछ लोगों को साथ ले कर मुनिया के पिता विक्रम पाल के दरवाजे पर पहुंच कर गुस्से में दरवाजा पीटने लगा. विक्रम पाल के बाहर आने पर हरिराम चिल्लाते हुए बोला, ‘‘तुम्हारी बेटी ने कैसे इतनी हिम्मत कर ली कि उस ने मेरे बेटे को अपने झूठे प्रेमजाल में फंसा कर सारे गांव में हमारी बेइज्जती का डंका पिटवा दिया.’’

‘‘मैं आप की बात समझा नहीं,’’ विक्रम पाल ने शांत लहजे में पूछा. ‘‘सारे गांव में ढिंढोरा पिट चुका है और तुम्हें खबर नहीं लगी. पूछो अपनी बेटी से कि उस ने क्यों मेरे बेटे पर अपना प्रेमजाल फैलाया? तुम उसे अपने हाथों से नहीं मारोगे, तो वह मार दी जाएगी. पड़ोस में रहने का यह मतलब नहीं है कि तुम लोग हमारे सिर पर चढ़ कर बैठने की कोशिश करो, हमारी बराबरी करने की हिम्मत करोगे.’’

‘‘वे दोनों नादान हैं. गलती कर दी होगी. उम्र का तकाजा है. हमें समझदारी से काम लेना चाहिए, वरना गांव का माहौल बिगड़ जाएगा. उन्हें माफ कर दो. मैं मुनिया को समझा दूंगा,’’ विक्रम पाल ने गुजारिश की. ‘‘तुम अपनी बेटी पर लगाम कसो, वरना,’’ कहते हुए हरिराम अपने लोगों के साथ वापस चला गया.

उस गांव में खाप पंचायत का बोलबाला था, जिस के तालिबानी फरमानों ने बहुत से नौजवान प्रेमी जोड़ों के सपने उजाड़ दिए थे. शोभित और मुनिया को अपने ऊपर होने वाले जुल्म की फिक्र न थी. वे दोनों छिपते हुए अपने किसी दोस्त के यहां मिलते रहे.

एक दिन मुनिया की सहेली ने उसे समझाया, ‘‘तुम जितनी भोली और नासमझ हो, तुम्हारा शोभित वैसा नहीं है. वह पैसे वाला है. तुम्हारा उस से कोई मुकाबला नहीं हो सकता. ‘‘ये बड़े घर के लोग छोटों की इज्जत को खरीदने की चीज समझते हैं, पर घर की बहू नहीं बना सकते. अफसोस इस बात का है कि हम नीची जाति की लड़कियों से वे मनोरंजन तो कर सकते हैं, पर अपने घर में जगह नहीं दे सकते.’’

‘‘अब मैं क्या करूं? न तो उसे छोड़ते बनता है, न ही उस के बगैर मैं जिंदा रह सकूंगी,’’ निराश हो कर मुनिया ने कहा. ‘‘निराश मत हो. शोभित से मिल कर मंदिर में शादी कर लो. उस के बाद जो होगा देखा जाएगा.’’

‘‘इस से तो बात बढ़ेगी.’’ ‘‘तब प्रेम की दुहाई मत दो और शोभित से नाता तोड़ दो. इसी में तुम्हारी भलाई है,’’ सहेली ने कहा.

गांव में छोटी सी बात भी बहुत जल्दी फैल जाती है, फिर मुनिया और शोभित के मिलने की बात कैसे छिप सकती थी. गांव की पंचायत बैठ गई. लोग इकट्ठा होने लगे. कुछ परदानशीं औरतें और शहर से पढ़ कर लौटी लड़कियां भी वहां थीं. ऐसा लग रहा था, जैसे गांव का पूरा समाज वहां जमा हो रहा था.

मुनिया के सिर पर आंचल था. उस की मांग में सिंदूर और माथे पर लाल टीका लगा था. मुनिया और शोभित ने गुपचुप शादी रचा ली थी. पंचायत में हरिराम ने हंगामा करते हुए चीख कर कहा, ‘‘इस नीच लड़की मुनिया ने मेरे बेटे शाभित पर इतना दबाव डाला कि उस ने हमारी इज्जत को दरकिनार करते हुए उस से शादी कर ली. इस पापिन को मौत की सजा दी जाए, ताकि गांव की दूसरी बहूबेटियों की इज्जत बनी रहे.’’

कुछ लोगों ने उस की शिकायत को जायज माना. ‘‘इस में सारा कुसूर हरिराम का है. शुरू से ही शोभित और मुनिया साथ खेलतेखाते रहे और आज उन्हें ऊंचनीच समझाई जा रही है. बाप को अपने बेटे के चालचलन पर काबू करना था. उस समय हरिराम को याद नहीं आया कि उन का बेटा नीचे कुल की लड़की के साथ बैठ कर उस की जूठी रोटी खाता था.

‘‘मैं तो कहता हूं कि शोभित ने मेरी बेटी के साथ फरेब किया है. मौत का भागी तो वह होगा,’’ हरिराम के जवाब में विक्रम पाल ने अपनी सफाई दी. दोनों पक्षों में देर तक बहस चलती रही. बाद में पंचायत ने फैसला सुनाया, ‘मुनिया और उस के परिवार को गांव से निकाल दिया जाए, क्योंकि नीची जाति की लड़की से ऊंचे जाति के लड़के की शादी नहीं हो सकती. दोनों की शादी एक तमाशा है.’

उसी समय शहर से पढ़ कर आई कुछ लड़कियों में से एक चिल्लाने लगी, ‘‘पंचायत को इसी तरह का गलत फैसला सुनाना था, तो हमें शहर पढ़ने क्यों भेजा गया? वहां तो हम सभी को हर जाति, हर तबके की लड़कियों के साथ खानापीना पड़ता था. ऐसे में हम सभी लड़कियों को इस गांव में रहने का कोई हक नहीं. हमें भी गांव से निकाल देना चाहिए. ‘‘गांव के जो लड़के शहर में जा कर नीची जाति की लड़कियों से जिस्मानी संबंध बना कर खुद को पाकसाफ कहते हुए गांव लौटते हैं, उन्हें भी गांव से निकाल देना चाहिए.’’

‘‘पंचायत का फैसला अटल है. तुम लोगों की सारी बातें बकवास हैं,’’ एक पंच ने कहा. ‘‘आप लोगों का ऐसा तालिबानी फरमान हम नहीं मानेंगीं. हम बड़े सरकारी अफसरों को इस मामले की जानकारी दे कर इंसाफ मांगेंगीं. आप लोगों का इसी तरह मनमानी आदेश चलता रहा, तो देश को आगे बढ़ाने की तरफ ध्यान देने के बजाय नौजवान पीढ़ी ऐसी खाप पंचायतों के फरमानों में ही उलझ कर दम तोड़ने लगेंगी.

‘‘यही नहीं, दूसरे गांव में भी ऐसी खाप पंचायतें खुद को कानून से ऊपर मान कर गैरकानूनी कदम उठा रही हैं, जिस का हम विरोध करेंगीं,’’ उन लड़कियों में से दूसरी ने उठ कर कहा. उसी समय पुलिस इंस्पैक्टर दलबल के साथ वहां पहुंचे और बोले, ‘‘किसी ने कलक्टर साहब को फोन किया है कि किसी नीची जाति की लड़की के साथ आप की पंचायत नाइंसाफी कर रही है, इसलिए मुखियाजी को चल कर कोर्ट में अपनी सफाई देनी होगी. तब तक के लिए पंचायत का आदेश माना नहीं जाएगा. लड़की को सताया न जाए, वरना हमें कानूनी कार्यवाही करनी पड़ेगी.’’ उसी समय पंचायत खत्म हो गई. शोभित और मुनिया दोबारा अपने दोस्त के मकान की ओर चले गए.

तभी ‘हमारी जीत हुई… हम साथसाथ रहेंगे…’ का शोर हुआ.

Friendhsip Day Special: एक अच्छा दोस्त-सतीश से क्या चाहती थी राधा

सतीश लंबा, गोरा और छरहरे बदन का नौजवान था. जब वह सीनियर क्लर्क बन कर टैलीफोन महकमे में पहुंचा, तो राधा उसे देखती ही रह गई. शायद वह उस के सपनों के राजकुमार सरीखा था.

कुछ देर बाद बड़े बाबू ने पूरे स्टाफ को अपने केबिन में बुला कर सतीश से मिलवाया.

राधा को सतीश से मिलवाते हुए बड़े बाबू ने कहा, ‘‘सतीश, ये हैं हमारी स्टैनो राधा. और राधा ये हैं हमारे औफिस के नए क्लर्क सतीश.’’

राधा ने एक बार फिर सतीश को ऊपर से नीचे तक देखा और मुसकरा दी.

औफिस में सतीश का आना राधा की जिंदगी में भूचाल लाने जैसा था. वह घर जा कर सतीश के सपनों में खो गई. दिन में हुई मुलाकात को भूलना उस के बस में नहीं था.

सतीश और राधा हमउम्र थे. राधा के मन में उधेड़बुन चल रही थी. उसे लग रहा था कि काश, सतीश उस की जिंदगी में 2 साल पहले आया होता.

राधा की शादी 2 साल पहले मोहन के साथ हुई थी. वह एक प्राइवेट कंपनी में असिस्टैंट मैनेजर था. घर में किसी चीज की कमी नहीं थी, मगर मोहन को कंपनी के काम से अकसर बाहर ही रहना पड़ता था. घर में रहते हुए भी वह राधा पर कम ही ध्यान दे पाता था.

यों तो राधा एक अच्छी बीवी थी, पर मोहन का बारबार शहर से बाहर जाना उसे पसंद नहीं था. मोहन का सपाट रवैया उसे अच्छा नहीं लगता था. वह तो एक ऐसे पति का सपना ले कर आई थी, जो उस के इर्दगिर्द चक्कर काटता रहे. लेकिन मोहन हमेशा अपने काम में लगा रहता था.

अगले दिन सतीश समय से पहले औफिस पहुंच गया. वह अपनी सीट पर बैठा कुछ सोच रहा था कि तभी राधा ने अंदर कदम रखा.

सतीश को सामने देख राधा ने उस से पूछा, ‘‘कैसे हैं आप? इस शहर में पहला दिन कैसा रहा?’’

सतीश ने सहज हो कर जवाब दिया, ‘‘मैं ठीक हूं. पहला दिन तो अच्छा ही रहा. आप कैसी हैं?’’

राधा ने चहकते हुए कहा, ‘‘खुद ही देख लो, एकदम ठीक हूं.’’

इस के बाद राधा लगातार सतीश के करीब आने की कोशिश करने लगी. धीरेधीरे सतीश भी खुलने लगा. दोनों औफिस में हंसतेबतियाते रहते थे.

हालांकि औफिस के दूसरे लोग उन की इस बढ़ती दोस्ती से अंदर ही अंदर जलते थे. वे पीठ पीछे जलीकटी बातें भी करने लगे थे.

राधा के जन्मदिन पर सतीश ने उसे एक बढि़या सा तोहफा दिया और कैंटीन में ले जा कर लंच भी कराया.

राधा एक नई कशिश का एहसास कर रही थी. समय पंख लगा कर उड़ता गया. सतीश और राधा की दोस्ती गहराती चली गई.

राधा शादीशुदा है, सतीश यह बात बखूबी जानता था. वह अपनी सीमाओं को भी जानता था. उसे तो एक अजनबी शहर में कोई अपना मिल गया था, जिस के साथ वह अपने सुखदुख की बातें कर सकता था.

सतीश की मां ने कई अच्छे रिश्तों की बात अपने खत में लिखी थी, मगर वह जल्दी शादी करने के मूड में नहीं था. अभी तो उस की नौकरी लगे केवल 8 महीने ही हुए थे. वह राधा के साथ पक्की दोस्ती निभा रहा था, लेकिन राधा इस दोस्ती का कुछ और ही मतलब लगा रही थी.

राधा को लगने लगा था कि सतीश उस से प्यार करने लगा है. वह पहले से ज्यादा खुश रहने लगी थी. वह अपने मेकअप और कपड़ों पर भी ज्यादा ध्यान देने लगी थी. उस पर सतीश का नशा छाने लगा था. वह मोहन का वजूद भूलती जा रही थी.

सतीश हमेशा राधा की पसंदनापसंद का खयाल रखता था. वह उस की हर बात की तारीफ किए बिना नहीं रहता था. यही तो राधा चाहती थी. उसे अपना सपना सच होता दिखाई दे रहा था.

एक दिन राधा ने सतीश को डिनर पर अपने घर बुलाया. सतीश सही समय पर राधा के घर पहुंच गया.

नीली जींस व सफेद शर्ट में वह बेहद सजीला जवान लग रहा था. उधर राधा भी किसी परी से कम नहीं लग रही थी. उस ने नीले रंग की बनारसी साड़ी बांध रखी थी, जो उस के गोरे व हसीन बदन पर खूब फब रही थी.

सतीश के दरवाजे की घंटी बजाते ही राधा की बांछें खिल उठीं. उस ने मीठी मुसकान बिखेरते हुए दरवाजा खोला और उसे भीतर बुलाया.

ड्राइंगरूम में बैठा सतीश इधरउधर देख रहा था कि तभी राधा चाय ले कर आ गई.

‘‘मैडम, मोहनजी कहां हैं? वे कहीं दिखाई नहीं दे रहे,’’ सतीश ने पूछा.

राधा खीज कर बोली, ‘‘वे कंपनी के काम से हफ्तेभर के लिए हैदराबाद गए हैं. उन्हें मेरी जरा भी फिक्र नहीं रहती है. मैं अकेली दीवारों से बातें करती रहती हूं. खैर छोड़ो, चाय ठंडी हो रही है.’’

सतीश को लगा कि उस ने राधा की किसी दुखती रग पर हाथ रख दिया है. बातोंबातों में चाय कब खत्म हो गई, पता ही नहीं चला.

राधा को लग रहा था कि सतीश ने आ कर कुछ हद तक उस की तनहाई दूर की है. सतीश कितना अच्छा है. बातबात पर हंसतामुसकराता है. उस का कितना खयाल रखता है.

तभी सतीश ने टोकते हुए पूछा, ‘‘राधा, कहां खो गई तुम?’’

‘‘अरे, कहीं नहीं. सोच रही थी कि तुम्हें खाने में क्याक्या पसंद हैं?’’

सतीश ने चुटकी लेते हुए जवाब दिया, ‘‘बस यही राजमा, पुलाव, रायता, पूरीपरांठे और मूंग का हलवा. बाकी जो आप खिलाएंगी, वही खा लेंगे.’’

‘‘क्या बात है. आज तो मेरी पसंद हम दोनों की पसंद बन गई,’’ राधा ने खुश होते हुए कहा.

राधा सतीश को डाइनिंग टेबल पर ले गई. दोनों आमनेसामने जा बैठे. वहां काफी पकवान रखे थे.

खाते हुए बीचबीच में सतीश कोई चुटकुला सुना देता, तो राधा खुल कर ठहाका लगा देती. माहौल खुशनुमा हो गया था.

‘काश, सब दिन ऐसे ही होते,’ राधा सोच रही थी.

सतीश ने खाने की तारीफ करते हुए कहा, ‘‘वाह, क्या खाना बनाया?है, मैं तो उंगली चाटता रह गया. तुम इसी तरह खिलाती रही तो मैं जरूर मोटा हो जाऊंगा.’’

‘‘शुक्रिया जनाब, और मेरे बारे में आप का क्या खयाल है?’’ कहते हुए राधा ने सतीश पर सवालिया निगाह डाली.

‘‘अरे, आप तो कयामत हैं, कयामत. कहीं मेरी नजर न लग जाए आप को,’’ सतीश ने मुसकरा कर जवाब दिया.

सतीश की बात सुन कर राधा झूम उठी. उस की आंखों के डोरे लाल होने लगे थे. वह रोमांटिक अंदाज में अपनी कुरसी से उठी और सतीश के पास जा कर स्टाइल से कहने लगी, ‘‘सतीश, आज मौसम कितना हसीन है. बाहर बूंदों की रिमझिम हो रही?है और यहां हमारी बातोें की. चलो, एक कदम और आगे बढ़ाएं. क्यों न प्यारमुहब्बत की बातें करें…’’

इतना कह कर राधा ने अपनी गोरीगोरी बांहें सतीश के गले में डाल दीं. सतीश राधा का इरादा समझ गया. एक बार तो उस के कदम लड़खड़ाए, मगर जल्दी ही उस ने खुद पर काबू पा लिया और राधा को अपने से अलग करता हुआ बोला, ‘‘राधाजी, आप यह क्या कर रही?हैं? क्यों अपनी जिंदगी पर दाग लगाने पर तुली हैं? पलभर की मौजमस्ती आप को तबाह कर देगी.

‘‘अपने जज्बातों पर काबू कीजिए. मैं आप का दोस्त हूं, अंधी राहों पर धकेलने वाला हवस का गुलाम नहीं.

‘‘आप अपनी खुशियां मोहनजी में तलाशिए. आप के इस रूप पर उन्हीं का हक है. उन्हें अपनाने की कोशिश कीजिए,’’ इतना कह कर सतीश तेज कदमों से बाहर निकल गया.

राधा ठगी सी उसे देखती रह गई. उसे अपने किए पर अफसोस हो रहा था. वह सोचने लगी, ‘मैं क्यों इतनी कमजोर हो गई? क्यों सतीश को अपना सबकुछ मान बैठी? क्यों इस कदर उतावली हो गई?

‘अगर सतीश ने मुझे न रोका होता तो आज मैं कहीं की न रहती. बाद में वह मुझे ब्लैकमेल भी कर सकता था. मगर वह ऐसा नहीं है. उस ने मुझे भटकने से रोक लिया. कितना महान है सतीश. मुझे उस की दोस्ती पर नाज है.’

बड़बोला: कैसे हुई विपुल की बहन की शादी- भाग 4

‘‘सर, इस में नाराजगी की क्या बात है. आप इतनी दूर से आए हैं, कुछ तो लीजिए,’’ पकौड़ों की प्लेट मेरे आगे करते हुए विपुल ने कहा. एक पकौड़ा खाते हुए मैं सुषमा से बोला, ‘‘छोड़ो नाराजगी, भूखे पेट रहना ठीक नहीं, कुछ खा लो,’’ लेकिन सुषमा टस से मस नहीं हुई. उस ने कुछ नहीं खाया.

सुषमा और महेश ने अपनी नाराजगी विपुल को जाहिर कर दी. बाकी स्टाफ चुप रहा, लेकिन मेरे समेत सभी दुखी थे. हम विपुल के घर गए तो वहां घर के साथ वाला प्लाट खाली था, जहां खाने का प्रबंध था. शहरी वातावरण से बिलकुल उलट दरियों पर बैठ कर खाने का प्रबंध था. शादी का माहौल देख कर पूरा स्टाफ दंग रह गया. तभी बरात आ गई. आतिशबाजी के नाम पर बंदूक के दोचार फायर देखने को मिले.

भूख से बुरा हाल हुआ जा रहा था, इसलिए चुपचाप दरियोें पर बैठ गए, लेकिन सुषमा ने तो जैसे प्रण कर लिया था. वह अपने इरादे से नहीं पलटी. उस ने खाना तो दूर, पानी की एक बूंद भी नहीं ली. विपुल ने काफी आग्रह किया, लेकिन सब बेकार. महेश का मन खाने से अधिक वापस जाने की जुगाड़ में लगा था. अत: गुस्से में भुनभुनाता बोला, ‘‘कसम लंगोट वाले की, ऐसी बेइज्जती कभी नहीं हुई. विपुल से ऐसी उम्मीद नहीं थी. सर, मुझे चिंता वापस जाने की है. यहां रहने का कोई इंतजाम नहीं है, रात को कोई बस भी नहीं जाती है. सुबह आफिस कैसे पहुंचेंगे. स्टाफ की लड़कियां परेशान हैं, उन के घर कैसे सूचना दें कि हम यहां फंस गए हैं.’’

हमारी बातें सुन कर साथ में बैठे वरपक्ष के एक सज्जन बोेले, ‘‘आप कितने व्यक्ति हैं, हमारी एक बस खाना खत्म होने के बाद वापस मेरठ जाएगी. हम आप को नवयुग सिटी के बाईपास पर छोड़ देंगे. शहर के अंदर बस नहीं जाएगी, क्योंकि वहां जाने से हमें देर हो जाएगी.’’

यह बात सुन कर पूरा स्टाफ खुशी से झूम उठा. जहां दो पल पहले खाने का एक निवाला गले के नीचे जाने में अटक रहा था, अब भूख से ज्यादा खाने लगे. ऐसा केवल खुशी में ही हो सकता है. वरपक्ष के उस सज्जन को धन्यवाद देते हुए हम सब बस में जा बैठे. यह उन का बड़प्पन ही था कि बस में जगह न होते हुए भी हम 8 लोगों को बस में जगह दी, स्टाफ की लड़कियों को सीट दी और खुद ड्राइवर के केबिन में बोनट पर बैठ गए. रात के 1 बजे नवयुग सिटी के बाईपास पर बस ने हमें उतारा. चारों तरफ सन्नाटा, सब से बड़ी समस्या बस अड्डे जाने की थी, जहां हमारे स्कूटर खड़े थे. मन ही मन सब विपुल को कोस रहे थे कि कहां फंसा दिया, कोई आटो- रिकशा भी नहीं मिला. आधे घंटे इंतजार के बाद एक रोडवेज की बस रुकी, तब जान में जान आई. हालांकि बस ने पीछे से किराया वसूल किया. उस समय हम कोई भी किराया देने को तैयार थे, हमारा लक्ष्य केवल अपने घरों को पहुंचने का था.

अगले दिन गिरतापड़ता आफिस पहुंचा. पूरे आफिस में सन्नाटा. सिर्फ कंप्यूटर आपरेटर श्वेता ही आफिस में थी. मैं कुरसी पर बैठेबैठे कब सो गया, पता ही नहीं चला. दोपहर के 2 बजे महेश ने आ कर मुझे जगाया. बाकी समय हम दोनों सिर्फ शादी की बातें करते रहे. श्वेता के कान हमारी तरफ थे. हम ने तो अपनी भड़ास कह कर निकाल दी, लेकिन वज्रपात श्वेता पर हुआ, बेचारी के सारे सपने टूट गए. कहां तो उस ने एक राजकुमार से शादी का सपना संजोया था और वह राजकुमार फक्कड़ निकला. बात को बढ़ाचढ़ा कर कहने की आदत तो बहुतों की होती है, लेकिन 1 का 500 विपुल बना गया. श्वेता इस आडंबरपूर्ण झूठ को सह नहीं सकी और उस ने 3-4 दिन बाद त्यागपत्र दे दिया. आफिस में सब विपुल के व्यवहार

से नाराज थे, लेकिन हम कर भी कुछ नहीं सकते थे. जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा वाली कहावत आखिर चरितार्थ हो गई. एक दिन शाम को जब विपुल आफिस से निकला तो श्वेता के भाई ने अपने 3 दोस्तों के साथ उसे घेर लिया और हाकी से उस की जम कर पिटाई करने लगे. विपुल अपने बचाव में जोरजोर से चिल्लाने लगा, लेकिन ऐसे मौके पर लोग केवल तमाशबीन बन कर रह जाते हैं, कोई बचाने नहीं आता. तभी हम और महेश वहां से गुजरे तो भीड़ देख कर महेश रुक गया. विपुल की आवाज सुन कर महेश मुझ से बोला, ‘‘सर, यह तो अपना विपुल है.’’

विपुल को पिटता देख कर हम दोनों उसे बचाने की कोशिश करने लगे. उस के बचाव के चक्कर में हम भी पिट गए. हमारे कपड़े भी फट गए. हमें देख कर भीड़ में से कुछ लोग बचाव को आगे बढ़े तो हमलावर भाग गए. विपुल की बहुत पिटाई हुई थी. आंखें सूज गईं, शरीर पर जगहजगह नीले निशान पड़ गए थे. उसे पास के नर्सिंगहोम में इलाज के लिए ले गए, जहां उसे 2 दिन रहना पड़ा. ‘‘देख लिया अपने बड़बोलेपन का नतीजा, इतनी सुंदर सुशील कन्या का दिल तोड़ दिया. क्याक्या सपने संजो कर रखे थे उस ने, सब बरबाद कर दिया. शुक्र कर हम वहां पहुंच गए वरना तेरा तो क्रियाकर्म आज हो जाता. मैं तो कहता हूं कि अब भी समय है, संभल जा और आज की पिटाई से सबक ले.’’

विपुल चुपचाप सुनता रहा. महेश का भाषण जले पर नमक का काम कर रहा था, लेकिन कड़वी दवा तो पीनी ही पड़ती है. ऐसा आदमी अपनी आदत से मजबूर होता है, फिर उसी रास्ते पर चल पड़ता है. कुछ दिन खामोश रहने के बाद विपुल की बोलने की आदत फिर शुरू हो गई, लेकिन अब स्टाफ के लोग उस की बातों को गंभीरता से नहीं लेते थे. एक दिन विपुल मेरे केबिन में आया और बोला, ‘‘सर, आप की हेल्प की जरूरत है.’’

बड़बोला: कैसे हुई विपुल की बहन की शादी- भाग 3

विपुल की बहन की शादी के दिन पूरे आफिस का स्टाफ नए शानदार चमकते कपड़े पहन कर आफिस आया. ऐसा लगा मानो आफिस बरातघर बन गया हो. महेश को संबोधित करते हुए मैं ने पूछा, ‘‘क्या बात है, श्वेता नजर नहीं आ रही?’’

‘‘सर, आप भी क्या मजाक करते हैं, शादी से पहले अपनी ससुराल कैसे जा सकती है. बस, आज बहन की शादी हो जाए, अगले महीने विपुल का भी बैंड बजा समझें.’’ लंच के बाद सभी बस अड्डे पहुंच गए. थोड़ी देर इंतजार करने के बाद नवगांव की बस मिली. लगभग 4 बजे बस चली. बस चलते ही महेश और सुषमा शादी की बातें करने लगे, खासतौर से शादी के इंतजाम के बारे में और मैं उन की पिछली सीट पर बैठा मंदमंद मुसकराने लगा. तभी मेरे साथ सीट पर बैठे सज्जन ने बीड़ी सुलगाई और मेरे से पूछा, ‘‘भाई साब, क्या आप भी इन लोगों के साथ नवगांव जा रहे हैं बिहारी की छोरी की शादी में?’’

‘‘आप की बात मैं समझा नहीं,’’ मैं ने बीड़ी वाले सज्जन से पूछा. बीड़ी का कश लगाते हुए उस ने कहा, ‘‘मेरा नाम बांके है. मैं और बिहारी अनाज मंडी में दलाली करते हैं. बिहारी का छोरा नवयुग सिटी में किसी बड़े दफ्तर में काम करता है. ऐसा लगता है कि आप लोग उसी दफ्तर में काम करते हैं और उस की बहन की शादी में जा रहे हैं. मैं आप लोगों की बातों से समझ गया कि आप वहीं जा रहे हो, क्योंकि इतनी लंबी बातें पूरे नवगांव में बिहारी का खानदान ही कर सकता है. अगर इतना ही अमीर होता तो उस का लड़का 3 हजार की नौकरी करता, ठाट से 18 ट्रक चलाता.

‘‘बिहारी के महल्ले में रहता हूं, आप सब जिस दाल मिल की बात कर रहे हैं उसे बंद हुए 10 साल हो गए हैं. मैं और बिहारी उस दाल मिल में नौकरी करते थे. जब मिल बंद हुई तब से अनाज मंडी में दलाली कर रहे हैं,’’ बीड़ी का कश लगाते हुए बांके की आवाज में व्यंग्य था. बांके की बातें सुन कर हम सब सकते में आ गए. सब की बोलती बंद हो गई और भौचक से एकदूसरे की शक्ल देखने लगे. साहस जुटा कर बड़ी मुश्किल से आवाज निकाल कर सुषमा बोली, ‘‘अंकल, आप सच कह रहे हो, कहीं मजाक तो नहीं कर रहे हो.’’

बांके ने एक और बीड़ी सुलगाई, फिर कश लगाते हुए बोला, ‘‘नवगांव पहुंच कर देख लेना. मेरी कोई दुश्मनी थोड़े है. इतना गपोड़ी निकलेगा, पता नहीं था. पूरा नवगांव बिहारी को एक नंबर का गपोड़ी मानता है पर बेटा तो बाप से भी दस कदम आगे निकला.’’

अब बाकी का रास्ता काटना दूभर हो गया. सभी इस सोच में थे कि जल्दी से नवगांव आ जाए और हकीकत से सामना करें. तभी बस एक पुरानी बिल्ंिडग के सामने रुकी. तब बांके ने कहा, ‘‘नवगांव आ गया, यह खंडहर ही दाल मिल है, जहां बिहारी क ा छोरा 18 ट्रक चला रहा है.’’ हम सब टूटे मन से बस से उतरे. अब करते भी क्या, कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था. जो दाल मिल 10 साल से बंद है उस की हालत खंडहर से कम क्या और ज्यादा क्या. कच्ची टूटी सड़क पर हम कारपेट ढूंढ़ते रह गए. अब स्टाफ का सब्र टूट गया, सब विपुल को गालियां निकालने लगे, अपनी झूठी शान के लिए विपुल इतना बड़ा झूठ बोलेगा, इस की उम्मीद किसी को नहीं थी.

तभी सामने से एक तांगे में कुछ कारपेट और कुरसियों के साथ विपुल आता दिखाई दिया. उसे देख कर सुषमा जोर से चिल्लाई, ‘‘विपुल के बच्चे, नीचे उतर. हमें बेवकूफ बना कर कहां जा रहा है. इन टूटी गड्ढे वाली सड़कों पर चल कर हमारी टांगें टूट गई हैं और तू मजे में तांगे की सवारी कर रहा है.’’ हमें देख कर विपुल तांगे से नीचे आ कर बोला, ‘‘आइए सर, कारपेट बिछने के लिए गली में जा रहे हैं. बांके अंकल, तांगे का सामान घर पहुंचवा दो, मैं सर के साथ हवेली जाता हूं.’’

महेश ने विपुल का कालर पकड़ कर पूछा, ‘‘बेटे, इतना झूठ बोलने की क्या जरूरत थी. इतने महंगे कपड़े पहन कर आए, सब खराब करवा दिए, अगर सच बता देता तब भी शादी में आते, तब और ज्यादा खुशी होती. पागल बना कर रख दिया, अब राष्ट्रपति भवननुमा हवेली के दर्शन भी करवा दे, उस को भी देख कर तृप्त हो जाएं.’’ शायद विपुल को हमारे आने की उम्मीद नहीं थी. एक पल के लिए वह हमें देख कर सन्न रह गया, लेकिन हर बड़बोले की तरह चतुराई से बातें बनाने लगा. ऐसे व्यक्ति आदत से मजबूर…हार नहीं मानते. बात को पलटते हुए बोला, ‘‘आइए सर, हवेली चलते हैं. आप सफर में थक गए होंगे, कुछ जलपान कर लेते हैं.’’

थोड़ी देर पैदल चलने के बाद हम सब हवेली में पहुंच गए. हवेली एक पुरानी इमारत निकली. हवेली को देख कर लगता था कि किसी समय जमींदार की रिहाइश रही होगी, जो अब एक धर्मशाला बन कर रह गई है, जिस के 2 तरफ कमरे बने हुए थे और बाकी 2 तरफ खाली मैदान. रोशनी के नाम पर 3-4 खंभों पर बल्ब लटक रहे थे. 2-3 कमरों में कुछ हलचल हो रही थी, जहां वरपक्ष के पुरुष तैयार हो रहे थे, कुछ महिलाएं तैयार हो कर तांगे पर बैठ कर जा रही थीं. तभी विपुल ने सफाई देते हुए कहा, ‘‘हमारे यहां औरतें बरात के साथ नहीं जातीं, इसीलिए पहले हमारे घर जा रही हैं.’’

हलवाई ने विपुल के आग्रह पर कुछ पकौड़े तल दिए और चाय बना दी. जलीभुनी बैठी सुषमा जलीकटी सुनाने लगी, ‘‘विपुल, तू ने यह अच्छा काम नहीं किया, इतना झूठ तो कोई अपने दुश्मन से भी नहीं बोलता. सारा मेकअप खराब हो गया, इतनी महंगी साड़ी धूल से सन गई, ड्राईक्लीनिंग के पैसे तेरे से लूंगी.’’ ‘‘हांहां, क्यों नहीं,’’ झेंपती हंसी के साथ विपुल बोला.

‘‘इतनी भूख लग रही है और खिलाने को तुझे ये सड़े हुए बैगन और सीताफल के पकौड़े ही मिले थे. नहीं चाहिए तेरी दावत. इस से तो उपवास अच्छा,’’ कहते हुए सुषमा ने पकौड़े की प्लेट विपुल को ही पकड़ा दी. विपुल ने एक पकौड़ा मुंह में डालते हुए कहा, ‘‘सुषमा, नाराज नहीं होते, फाइव स्टार होटल से अच्छे पकौड़े हैं.’’ ‘‘तेरे घर का एक बूंद पानी भी नहीं पीना,’’ सुषमा तमतमाती हुई बोली.

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