Family Story : 9वीं फेल

Family Story : शोभा अपने भैया शोभन की बात सुन कर एकदम से हैरान रह गई. पापा को भैया यह क्या कह गए कि 9वीं फेल वे क्या जानें कि पढ़ाई और डिगरी क्या चीज होती है.

पापा 9वीं फेल हैं या पास हैं, यह तो बाद की बात है, पर उन्होंने जो इतना बड़ा कारोबार अपने बूते खड़ा किया है, क्या वह ऐसे ही कर दिया है? क्या वे नहीं देख और जान रहे हैं कि न जाने कितने नौजवान मैडिकल और इंजीनियरिंग की बड़ीबड़ी डिगरियां लिए सड़कों पर धूल फांक रहे हैं?

आंगन में खड़े शोभा के पापा जगदीश एकदम से जड़ हो कर आसमान की तरफ देखते रह गए. उन्हें ऐसा लग रहा था कि उन्होंने जोकुछ पाया है, क्या वह सब बेकार गया है? उन्होंने जोकुछ बिना किसी डिगरी के हासिल किया है, क्या वह यों ही भाग्य भरोसे मिल गया है?

नहीं, यह संयोग नहीं है कि जगदीश शहर के जानेमाने कारोबारी हैं. वे शहर की एक मशहूर साड़ी दुकान के मालिक हैं, जिन के तहत स्टाफ के 20-20 लोग खटते हैं… और भैया उन्हें 9वीं फेल बता रहे हैं.

9वीं फेल… मतलब क्या है? यही न कि पापा कमअक्ल हैं और उन की समाज में कोई इज्जत नहीं है?

‘‘भैया, यह आप क्या कह रहे हैं…? क्या आप को पापा के बारे में जानकारी नहीं है कि गांव का स्कूल बनवाने में इन का कितना बड़ा योगदान है? स्कूल की जमीन खरीदने से ले कर उस की इमारत बनवाने तक में इन्होंने पैसे से भरपूर मदद की है…’’

शोभा अपने भैया शोभन को जैसे झकझोर रही थी, ‘‘इस शहर में न जाने कितनी ही सभासोसाइटियों के वे सदस्य हैं. ठीक है कि ज्यादा बिजी होने की वजह से वे हर जगह नहीं जा पाते हैं, लेकिन पापा ने फर्श से अर्श तक का एक लंबा फासला तय किया है और तुम इन को कह रहे हो कि ये 9वीं फेल हैं. क्या डिगरियों से ही अक्ल का वास्ता रहता है?’’

‘‘शोभा, तुम अपना ज्यादा ज्ञान मत झाड़ो…’’ शोभन अपनी बाइक स्टार्ट करते हुए बोला, ‘‘जो सच है, वह सच है. मैं ने क्या गलत कहा है?’’

‘‘हां, तुम गलत कह रहे हो. जरा, सुनो तो…’’

मगर, तब तक शोभन अपनी बाइक ले कर जा चुका था.

शोभा की मां शारदा रसोईघर में थीं. उन्होंने यह बात सुनी ही नहीं या फिर शायद अनसुनी कर दी. उन्हें हमेशा ऐसा लगता है कि शोभन कभी गलत नहीं कह सकता. बेटे गलत नहीं हो सकते.

आज रविवार को साप्ताहिक बंदी की वजह से जगदीश घर पर ही थे. उन्हें कहीं जाना था. शायद किसी फंक्शन में. उस के लिए उन्होंने बढि़या कपड़े भी निकाले थे, मगर अब उन का मूड खराब हो चुका था. वे कुरतापाजामा पहन कर बाहर निकल गए. अब शायद वे शाम की सैर करने के लिए पार्क जाना चाह रहे थे.

शोभा शुरू से ही ऐसा देखती आई है. जब भी पापा तनाव में होते हैं, तब वे या तो पार्क में चले जाते हैं या फिर गंगा किनारे टहलने निकल जाते हैं.

‘‘पापा, आप रुकिए, मैं चाय बना कर लाती हूं…’’ शोभा जगदीश से मनुहार करते हुए बोली, ‘‘आप के साथ मैं भी चाय ले लूंगी. आप से मुझे बहुत सारी बातें करनी हैं.’’

मगर जब तक शोभा चाय बना कर लाती, तब तक जगदीश कपड़े पहन कर निकल चुके थे.

शोभा ने चाय के दोनों प्याले वहीं रख दिए. अब चाय क्या पीना. पापा तो निकल चुके हैं. उन्हें भैया की बातों से गहरी चोट लगी थी. भैया ने उन पर जो आरोप लगाया, वह क्या सही है? क्या सिर्फ डिगरी ही कामयाबी का पैमाना है?

भैया यह जानते हैं, फिर भी वे बोल कर निकल गए. ठीक है कि पापा कुछ पुराने जमाने के हैं, जींसटीशर्ट की जगह साधारण पैंटशर्ट पहनते हैं, मगर वे किसी भी मामले में किसी से कम हैं क्या, जो उन्हें अनदेखा किया जाए?

इधर शोभा अपने भैया शोभन की हरकतों को देख और महसूस कर रही थी कि पापा की बातें और बरताव उन्हें अच्छा नहीं लगता. उन्हें लगता है कि पापा किसी सरकारी औफिस के बड़े अफसर होते, तो कितना अच्छा रहता. पढ़ेलिखे लोगों का कुछ अलग ही रुतबा होता है. लेकिन इतनी बड़ी दुकान चलाने के लिए भी तो पढ़ाईलिखाई जरूरी है.

शोभन को पापा से हजार शिकायतें थीं… जैसे पापा की बातों में गंवई पुट है. उन में वह आत्मविश्वास नहीं है, जो किसी स्मार्ट इनसान में होना चाहिए. उन के कपड़े पहनने और चलने का ढंग भी ठीक नहीं है. पता नहीं, लोग उन्हें कैसे झेल लेते हैं. पहली ही नजर में दिख जाता है कि वे 9वीं फेल हैं.

अपने पापा की पढ़ाई के प्रति शोभन की हीनभावना कोई एक दिन में नहीं उपजी थी. उसे याद है, जब उस ने 12वीं पास करने के बाद एक कालेज में फार्म भरा था, तब पापा उस के साथ गए थे.

वहां दिए गए फार्म के एक कौलम में जब पापा ने 8वीं पास लिखा था, तब कालेज का बाबू मुसकरा कर बोला था, ‘चलो, अच्छा है. बाप 8वीं पास है, तो बेटा 12वीं पास कर गया. सबकुछ ठीकठाक रहा, तो कालेज भी पास कर ही जाएगा.’

तब शोभन खुद कमउम्र का था, इसलिए उस क्लर्क को वह जवाब नहीं दे पाया था, मगर अब तो वह सबकुछ देखसमझ रहा है. इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद वह पुणे से मैनेजमैंट की पढ़ाई कर रहा है.

शोभा सोच रही थी कि आजकल की पढ़ाई में कितना खर्च है, इसे तो शोभन भैया समझ ही रहे होंगे. उन के पीछे वह भी तो पढ़ाई कर रही है. अपनी पढ़ाई के वक्त वह भी पापा के साथ कालेज गई थी. पापा की बड़ी इच्छा थी कि शोभा मैडिकल की पढ़ाई करे.

‘‘देख रही हो न कि पटना का माहौल कितना खराब है. लोगों की सेहत भी अच्छी नहीं रहती है. बुढ़ापे में तो और भी दिक्कत होती है. तुम डाक्टर बनोगी, तो मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी. नहीं तो डाक्टरों के चोंचले और नखरों से माथा खराब रहता है,’’ जगदीश ने शोभा से कहा था.

शोभा का सिर दर्द करने लगा था. उस ने टैलीविजन औन कर दिया. वहां भी वही रूटीन टाइप की चीजें. मोबाइल फोन में भी उस का मन नहीं लगा. वह बिस्तर पर लेट गई और आंखें बंद कर लीं.

जबजब शोभा घर आती है, तो एक चक्कर वह गांव का भी लगा लेती है. वहां उस के बड़े पापा और चाचा रहते हैं. वहां उसे कोई दिक्कत नहीं होती. आराम से वह खेतबागानों में घूमती है, तो उसे बड़ा अच्छा लगता है.

ठीक है कि गांव में बड़ी गंदगी है, मगर इन शहरों में क्या कम गंदगी है. बड़ी सड़कों को छोड़ कर जरा गलियों में घुसने से ही शहर की चमकदमक और हकीकत का पता चल जाता है.

गांव में एक ठहरी हुई सी जिंदगी जरूर है, मगर उस में कुछ तो अपनापन है ही. ठीक है कि वहां गरीबी, बीमारी, बेरोजगारी भी है. सड़कें टूटीफूटी और गलियां काले कीचड़ से बजबजाती बदबू छोड़ती हैं. लेकिन वहां के घर कोई माचिस के डब्बों की तरह नहीं हैं, जो आदमी उसांस भरने लगे. ज्यादातर लोग वहां भी ऊबे हुए से हैं, फिर भी लोगों के चेहरे पर एक निश्चिंतता सी है. कोई भागादौड़ी नहीं है.

चाचा शोभा से हंस कर कहते, ‘‘तुम को गांव बहुत अच्छा लगता है. चलो, अच्छा है. पर गांव में डाक्टर की कमी है. तुम यहीं आ कर अपनी प्रैक्टिस करना. जगदीश तो गांव छोड़ कर पटना भाग गया. तुम उस की कमी पूरी कर देना.’’

‘‘तुम भी क्या बात करते हो. शादी के बाद शोभा अपने ससुराल जाएगी कि यहां रहेगी…’’ बड़े ताऊजी हंस कर कहते, ‘‘वैसे, शोभा बेटी जहां भी जाएगी, वहां की शोभा ही बढ़ाएगी. इस के जन्म के साथ ही मंझले के कारोबार में इजाफा हुआ था. तभी तो उस ने अपनी दुकान का नाम ‘शोभा साड़ी शौप’ रखा है. और तुम देखना, वह इस की शादी भी किसी बड़े शहर में ही करेगा.’’

‘‘मगर, शोभा तो खेत और बागानों में ही घूम कर खुश होती है. कहती है कि यहां बड़ी शांति है. उसे नहीं पता कि यहां धर्म और जाति में गांव कितना बंटा हुआ है. बहुत राजनीति है गांव में,’’ चाचा शोभा से कहते.

‘‘शहर भी धर्म और जाति में बंटे हुए हैं चाचाजी…’’ शोभा हंस कर कहती, ‘‘आप ने वहां के अंदरूनी हालात को नहीं देखा है न. बस, उस के ऊपर प्रशासनिक अनुशासन या डर का एक मुलम्मा चढ़ा हुआ है, इसलिए वह दिखाई नहीं देता. और वहां के राजनीतिक हालात के बारे में तो पूछिए ही मत.’’

‘‘मगर, वहां कोई एकदूसरे के काम में दखलअंदाजी नहीं करता,’’ चाचा बोले, ‘‘तभी तो जगदीश अपने कारोबार में कामयाब हुआ है.’’

‘‘सो तो है ही. बाबूजी के मरने के बाद हम अनाथ हो गए थे. उस समय जगदीश 8वीं क्लास में पढ़ता था. अब घर कैसे चले, सो उस की चिंता हमें खाने लगी थी. मैं तो निरा बेवकूफ ठहरा. खेतीबारी करने के अलावा कुछ जानता ही नहीं था.

‘‘ऐसे में जगदीश ने हिम्मत कर के दुर्गापूजा के वक्त पंडाल के पास ही एक खिलौने की दुकान लगा ली थी. उस में उसे कुछ मुनाफा हुआ, तो उस ने दीवाली में पटाकों की दुकान खोल ली.

‘‘इस तरह वह छोटेछोटे काम करता रह गया. इस चक्कर में वह मुश्किल से 8वीं जमात ही पास कर पाया था. मगर उसे दुकानदारी कर कमाई करने का जो भूत सवार हुआ, तो उस में लगता ही गया.

‘‘बाद में उस ने स्कूल के पास ही एक स्टेशनरी की दुकान खोल ली थी. इस का असर यह हुआ कि उस की दुकान तो चल गई, लेकिन वह 9वीं जमात पास नहीं कर पाया. मगर लेनदेन में वह काफी कुशल था, सो महाजन भी उसे रुपए देने में आनाकानी नहीं करते थे.

‘‘आगे चल कर जब वह पटना से माल उठाने लगा, तो काम और भी चल निकला. देखतेदेखते उस की दुकान बहुत बढ़ गई थी, लेकिन उस की पढ़ाई चौपट हो गई थी,‘‘ ताऊजी ने कहा.

‘‘लेकिन, जगदीश ने मेरी पढ़ाई पर बहुत ध्यान दिया था…’’ चाचा बोले, ‘‘उस ने मुझे कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दी. वह तो मेरा पढ़ाई में मन नहीं लगता था, इसलिए ज्यादा पढ़ नहीं पाया. फिर भी उस के दबाव की वजह से मैं मैट्रिक पास कर गया था.

‘‘पढ़ाई के लिए जगदीश की जो लगन थी, उसी ने शायद तुम लोगों को पढ़ाने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी है. उसे लगता था कि नई पीढ़ी का पढ़ालिखा होना बहुत जरूरी है, इसलिए वह तुम को और शोभन को पढ़ाने में कोई कमी नहीं कर रहा था.’’

‘‘सो तो है ही चाचाजी…’’ शोभा गर्व से बोली, ‘‘हमारी पढ़ाई के लिए पापा हमेशा सजग रहे. हम ने जो पढ़ना और बनना चाहा, उस के लिए वे हमेशा तैयार रहे. कभी कोई कमी नहीं होने दी.

‘‘शोभन भैया इंजीनियरिंग की तैयारी के लिए कोटा जाना चाहते थे. सो, वहां भी उन्हें भेज कर पूरी तैयारी कराई. खर्च की तो कभी उन्होंने परवाह ही नहीं की.’’

‘‘तुम तो सब जानती हो शोभा बेटी. अब तुम्हें क्या बताना…’’ ताऊजी बोले.

मगर आज वही शोभन भैया पापा को क्या कह गए. क्या वे नहीं जानते कि पापा ने यहां तक पहुंचने के लिए कितनी मेहनत की है. ठीक है कि वे ज्यादा पढ़ेलिखे नहीं हैं, मगर इस के लिए क्या वे ही कुसूरवार हैं? क्या उन दिनों के हालात कुसूरवार नहीं हैं, जिन की वजह से वे आगे पढ़ नहीं पाए थे?

फिर भी पापा ने थोड़ी सी पूंजी से अपना कारोबार गांव में शुरू किया था. सीजनल टाइम में वे पटना से अपने गांव में सामान लाते थे और बेचते थे. इस के लिए उन्हें गांव के महाजन से सूद पर पैसा लेना पड़ता था.

बाद में पापा सीजनल धंधों को दरकिनार कर सिर्फ कपड़े के कारोबार में हाथ आजमाने लगे थे. कपड़ों की पहचान और ग्राहकों की पसंद को ध्यान में रख कर उन्होंने अपनी दुकान को खूब आगे बढ़ा लिया था.

धीरेधीरे पापा को पटना आतेजाते वहां के हाटबाजार का भी हाल मालूम चल गया था. तब उन्हें लगा था कि अगर वे पटना में अपनी एक दुकान खोल लें, तो उन्हें अपने कारोबार में अच्छा फायदा हो सकता है.

एक कारोबारी को जब रुपए की जरूरत हुई, तो उसे अपनी दुकान बेचनी पड़ी. तब पापा ने अपनी जमापूंजी लगा कर वह दुकान खरीद ली थी. दुकान का नाम भी उन्होंने शोभा के नाम पर ‘शोभा साड़ी शौप’ रखा था.

पापा का मानना था कि जैसे ही शोभा का जन्म हुआ, तो उन के कारोबार में तरक्की हुई थी और वे इस दुकान को खरीदने में कामयाब हुए थे. फिर तो धीरेधीरे वे कारोबार को बढ़ाते ही चले गए थे. जिस के बाद सब से पहले किराए का मकान ले कर अपने परिवार को बुलाया.

शोभा उस समय छोटी सी प्यारी बच्ची थी. पूरे प्यार के साथ उन्होंने उस का दाखिला एक नर्सरी स्कूल में कराया था. शोभन भैया उन दिनों गांव के एक सरकारी स्कूल में दूसरी क्लास में पढ़ते थे. फिर काफी भागदौड़ के बाद एक अच्छे स्कूल में शोभन का दाखिला मोटा डोनेशन दे कर हुआ था.

एक तो भैया पहले ये ही फुजूलखर्च थे, उन की पढ़ाई भी महंगी होती थी. उन के लिए पापा ने ट्यूशनें रखीं. पढ़ाई में औसत होने के चलते उन की पढ़ाई पर खर्च भी खूब होता था. इस सब के बावजूद पापा ने कभी खर्चों में नानुकर नहीं की. समय निकाल कर वे शोभन की किताबकौपियां देख लिया करते थे.

उधर उन की दुकान चल निकली थी. अब पापा एक मकान भी खरीद चुके थे और दुकान भी बड़ी हो चुकी थी. दुकान में 5-5 नौकर थे, जिन्हें वे अपना स्टाफ कहते थे.

समय किस रफ्तार से आगे बढ़ता है. गांवघर कब के पीछे छूट गए. शोभा पढ़ाई में होशियार तो थी ही, पापा की हमेशा से यही इच्छा रही थी कि वह डाक्टर बने, तो इस दिशा में उस ने अपनी कोशिश जारी रखी.

यही वजह थी कि शोभा खुद अच्छी पढ़ाई कर मैडिकल का ऐंट्रैंस ऐग्जाम पास कर मुजफ्फरपुर के एक सरकारी मैडिकल कालेज में पढ़ाई कर रही थी, जबकि शोभन कोलकाता के एक प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेज में बीटैक की पढ़ाई कर रहा था.

इस के लिए शोभन ने कोटा में 2 साल रह कर आईआईटी के लिए कोचिंग ली थी. अभी तो खैर वह पुणे में एमबीए की पढ़ाई कर रहा है.

इस बीच पापा को कभी इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि वे 9वीं फेल हैं. और आज शोभन उन पर ताना कस रहा है कि वे कुछ नहीं जानते.

अचानक शोभा को कुछ खटका सा हुआ, तो वह जाग गई.

‘‘अरे, तुम इतनी जल्दी सो गई?’’ शोभन उस से पूछ रहा था, ‘‘अभी तो 9 ही बजे हैं. तबीयत ठीक नहीं है क्या तुम्हारी? छुट्टियों में आई हो, तो कहीं घूमनेटहलने जाना चाहिए.

‘‘बाजार की रंगीनियों की तरफ तो देखो. चारों तरफ साफसफाई है. दुकानें कितनी सजीधजी हैं. चौकचौराहों पर पंडाल लगे हैं. सड़कें रोशनियों से जगमगा रही हैं. बाहर लोगों के हुजूम के हुजूम खरीदारी के लिए निकले हुए हैं. कितना भला और अच्छा दिख रहा है शहर.’’

‘‘वह तो ठीक है भैया कि सबकुछ अच्छाभला दिख रहा है, मगर तुम ने पापा को जो कहा, वह अच्छा था क्या? पापा खुद पढ़ नहीं पाए, इस के पीछे की वजह को हमें जानना चाहिए कि नहीं? तुम ने उन्हें 9वीं फेल कहा. उन को इस बात से कितनी चोट लगी होगी, इस का अंदाजा तुम्हें है क्या?’’

‘‘तुम ने ठीक कहा शोभा…’’ शोभन बोला, ‘‘पढ़ाई के लिए कीमत चुकानी होती है और जब पैसा न हो, तो कोई कैसे पढ़ सकता है? अब देखो न, मैं अविनाश के घर गया था. उस ने अपनी बीटैक की पढ़ाई छोड़ दी है.

‘‘वह कह रहा था कि उस के पापा के रैस्टोरैंट में जबरदस्त घाटा हुआ है, जिस से उन पर भारी कर्ज है. उन्होंने अपने कई स्टाफ की छुट्टी कर दी है. और वह बता रहा था कि अब वह पापा के रैस्टोरैंट में ही उन की मदद करेगा.’’

‘‘शायद तुम नहीं जानते कि हमारे पापा के साथ भी ऐसे हालात कई बार हो चुके हैं, लेकिन उन्होंने हमारी पढ़ाई छुड़वाने की बात कभी नहीं की. तुम ने उन पर इतना बड़ा आरोप लगा दिया. कितने दुखी होंगे वे, इस का अंदाजा है तुम्हें?’’ शोभा बोली.

‘‘सौरी शोभा, अब तुम मेरा अपराधबोध और ज्यादा न बढ़ाओ. मैं पापा से माफी मांग लूंगा.’’

‘‘तो यह काम अभी होना चाहिए,’’ शोभा ने कहा.

‘‘इस की कोई जरूरत नहीं है…’’ अचानक पापा अंदर आए, ‘‘मैं तो अपने अंदर के अधूरेपन को तुम्हारी पढ़ाई से पूरा कर रहा हूं. तुम खुश रहो, मुझे कुछ और नहीं चाहिए.’’

शोभन सिर झुकाए खड़ा था.

पापा शोभा को अपने गले से लगाते हुए बोले, ‘‘मेरी छोटी सी गुडि़या अब बड़ी और समझदार हो गई है.’’

Social Story : करारा जवाब

Social Story : अशरफ महक को ब्याह तो लाया था, पर बिस्तर पर जाते ही वह ढेर हो जाता था. महक के अरमान पूरे नहीं होते थे. वह हवस की आग में जलने लगी थी. तभी सलीम उस की जिंदगी में आया और दोनों में नाजायज रिश्ता बन गया. एक दिन अशरफ को इस की भनक लग गई. आगे क्या हुआ?

उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर का रहने वाला अशरफ नईनई शादी कर के महक को अपने घर लाया था. महक जैसी खूबसूरत बीवी पा कर उस की खुशी का ठिकाना नहीं था.

अशरफ खुश होता भी क्यों न, महक तो सचमुच की महक थी. गोरा बदन, गुलाबी होंठ, सुर्ख गाल, काले घने लंबे बाल और जब वह हंसती थी, तो उस के सफेद दांत ऐसे लगते थे, जैसे मोती बिखर रहे हों.

सुहागरात पर जब अशरफ ने महक का घूंघट उठाया, तो उस के मुंह से अनायास ही निकल गया, ‘‘वाह, क्या बेशकीमती तोहफा मिला है मुझे…’’

अशरफ से अपनी तारीफ सुन कर महक शरमा गई और अपनी हथेली से अपने चेहरे को ढकते हुए बोली, ‘‘इतनी तारीफ मत करो मेरी.’’

‘‘मैं तो सिर्फ तुम्हारे उस हुस्न की तारीफ कर रहा हूं, जिस पर सिर्फ मेरा हक है. सम?ा में नहीं आता कि इस हुस्न को यों ही रातभर देख कर गुजारूं या इस का स्वाद चखूं…’’

महक धीरे से बोली, ‘‘आप बड़े शरारती हो.’’

अशरफ ने कहा, ‘‘शरारत अभी की ही कहां है. अभी तो तुम्हारे हुस्न को देख कर आंखों को ठंडक पहुंचाई है, दिल की ठंडक दूर करना तो अभी बाकी है.’’

इस के बाद अशरफ ने बड़े प्यार से महक के गहने उतारने शुरू किए. वह एकएक कर महक के गहने उतारता रहा और उस के हुस्न की तारीफ करता रहा.

इसी तरह महक के हुस्न की तारीफ करतेकरते आधी रात गुजर गई, पर अशरफ आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रहा था.

महक का दिल जोरों से धड़क रहा था. अशरफ के एकएक अल्फाज और उस के हाथों की छुअन से महक के बदन में सरसराहट दौड़ रही थी.

काफी रात बीत जाने के बाद अशरफ ने महक के कपड़े उतारने शुरू किए.

महक के गोरे और कमसिन बदन को देख कर अशरफ धीरेधीरे आगे बढ़ रहा था. वह उस की नाभि पर अपने गरमागरम होंठ रख कर उसे चूम रहा था.

महक मदहोश होती जा रही थी. उस ने हिम्मत कर के अशरफ को अपने ऊपर खींच लिया. पर यह क्या, अशरफ अभी उस के शरीर में उतरा ही था कि तभी ढेर हो गया. वह करवट ले कर लेट गया.

महक अशरफ की इस हरकत पर हैरान रह गई. उस के तनबदन में तो मानो आग लगी हुई थी, पर उस का शौहर तो शुरू होने से पहले ही ढेर हो गया था.

महक अशरफ के उठने का इंतजार कर रही थी, क्योंकि अशरफ उस के तनबदन में आग सुलगा कर खुद लुढ़क गया और उसे हवस की आग में जलता हुआ छोड़ दिया.

काफी देर बाद अशरफ फिर उठा और महक से बोला, ‘‘मैं थक गया हूं. आज मूड सही नहीं है. हम कल सारी कसर पूरी करेंगे.’’

महक अशरफ के चेहरे को गौर से देख रही थी और सोच रही थी, ‘क्या अरमान संजोए थे सुहागरात के और क्या हो गया…?’

यह अब रोज की बात हो गई. अशरफ बिस्तर पर बातों से महक को खुश करने की कोशिश करता रहता था. कभी उस की खूबसूरती की तारीफ कर के, तो कभी उसे गले लगा कर या फिर उसे अपनी बांहों में भर कर, पर जब महक का दिल करता कि अशरफ उस की जिस्मानी भूख मिटाए, तो अशरफ वक्त से पहले ही ढेर हो जाता और महक के तनबदन में आग लगा कर उसे जलता हुआ छोड़ देता.

काफी दिनों तक ऐसा ही चलता रहा. अब महक को अशरफ की हरकतों पर गुस्सा आने लगा था और उस ने एक दिन अशरफ से बोल ही दिया, ‘‘तुम अपनी आग को तो शांत कर लेते हो, पर मेरी आग को भड़का कर बीच रास्ते में ही मुझे तनहा छोड़ देते हो. ऐसा कब तक चलेगा?’’

अशरफ बोला, ‘‘मैं रोज तो तुम्हें खुश करने के लिए सैक्स करता हूं. बताओ, क्या हम एक भी दिन बिना सैक्स के रहे हैं? और मैं कितना सैक्स करूं?’’

महक बोली,‘‘हां, सैक्स करते हो, पर तुम सिर्फ अपनी ख्वाहिश का खयाल रखते हो, मेरा नहीं. तुम्हारा तो रोज हो जाता है, पर मुझे संतुष्ट कौन करेगा?

‘‘मेरा भी दिल है, मेरी भी उमंगें हैं. तुम तो अपना कर के एक तरफ को मुंह कर के सो जाते हो और मुझे सुलगता हुआ बीच रास्ते में ही छोड़ देते हो.’’

अशरफ झल्लाते हुए बोला, ‘‘करता तो मैं रोज हूं. और कितना करूं. मैं भी इनसान हूं, कोई जानवर नहीं.’’

महक समझ गई कि उसे खुश करना अशरफ के बस की बात नहीं है. वह सिर्फ बातों से ही उसे खुश करना जानता है.

महक अशरफ की बात सुन कर हैरान रह गई. उस ने अपने जज्बात को दफन कर दिया और चुप रहना ही बेहतर समझ.

कई महीनों तक ऐसा ही चलता रहा. जिस्मानी सुख न मिलने की वजह से और दिनरात अशरफ की अधूरी हरकत सोचते रहने से महक के सिर में दर्द रहने लगा.

महक पूरी तरह टूट चुकी थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे, किस से अपना दुखड़ा रोए. कौन उस की सुनेगा, उलटा उसे ही बदचलन सैक्स की प्यासी कहेगा.

एक दिन महक अपनी छत पर कपड़े उतारने गई. शाम का समय था. महक ने हलका गुलाबी रंग का सूट पहना हुआ था. वह छत पर टंगे कपड़े उतार ही रही थी कि उस का दुपट्टा नीचे गिर गया.

महक ने इधरउधर देखा कि कोई है तो नहीं कि तभी उस की नजर पड़ोस वाली छत पर खड़े सलीम पर पड़ी, जो अपनी हसरत भरी निगाहों से महक की खूबसूरती को ताड़ रहा था.

दुपट्टा हटते ही महक के बडे़बड़े उभार दिखने लगे. सलीम से रहा नहीं गया और वह बोल उठा, ‘‘भाभी, आप तो कसम से कयामत ढा रही हो.’’

अपनी तारीफ सुन कर महक मुसकरा दी और जल्दी से नीचे चली गई.

सलीम मन ही मन सोच रहा था कि महक उस के प्यार के जाल में फंस सकती है और अपने खूबसूरत बदन की खुशबू उसे भी दे सकती है.

सलीम वैसे तो अशरफ के घर पर कम ही आताजाता था, पर अब वह किसी न किसी बहाने उस के घर आनेजाने लगा.

सलीम एक अमीर बाप की औलाद था, जो अपने रहनसहन और घूमनेफिरने पर काफी ज्यादा पैसा खर्च करता था.

जब अशरफ काम के सिलसिले में घर से बाहर जाता, तो सलीम कुछ न कुछ ले कर अशरफ के घर चला जाता और ‘भाभीभाभी’ कह कर महक को गिफ्ट देता रहता था.

धीरेधीरे सलीम की दोस्ती महक से बढ़ती गई. अब सलीम कभी महक के लिए कपड़े, तो कभी कोई दूसरा गिफ्ट लाने लगा.

महक सलीम की इस अदा पर फिदा होती जा रही थी. शादी के 3 महीने गुजर जाने के बाद भी अशरफ ने अभी तक महक को कोई गिफ्ट तो दूर की बात है, एक जोड़ी कपड़ा तक न दिया था.

सर्दी के दिन थे. सलीम अपनी छत पर कसरत कर रहा था. उस ने अंडरवियरबनियान पहन रखा था और उठकबैठक लगा रहा था, तभी महक किसी काम से छत पर गई और सलीम के मजबूत बदन को आंखें फाड़ कर देखने लगी.

सलीम ने पूछा, ‘‘क्या हुआ भाभी, क्या देख रही हो?’’

महक बोली, ‘‘कुछ नहीं, बस देख रही हूं कि तुम ने अपनी देह तो अच्छी बना रखी है. पर, पता नहीं कि कोई दम भी है या नहीं.’’

सलीम मौका भांपते हुए बोला, ‘‘भाभी, एक मौका दे कर तो देखो, दम का भी पता चल जाएगा.’’

महक ने इठलाते हुए कहा, ‘‘सब मर्द ऐसे ही बोलते हैं, पर वक्त आने पर ढेर हो जाते हैं. औरत को खुश करना हर किसी के बस की बात नहीं.’’

सलीम ने भी जवाब दिया, ‘‘भाभी, अभी तुम ने हमारा जलवा देखा ही कहां है. इजाजत दो तो मैं अभी आ जाऊं तुम्हारी छत पर?’’

महक हंसते हुए बोली, ‘‘ठीक है, तो आ जाओ. हम भी तो देखें कि कितना दम है तुम्हारे अंदर.’’

सलीम ने बिना वक्त गंवाए दीवार फांदी और महक को अपनी मजबूत बांहों में जकड़ लिया.

इस से पहले कि महक कुछ बोल पाती, सलीम ने अपने गरम होंठ महक के गुलाबी होंठों पर रख दिए और
चूसने लगा.

सलीम की इस हरकत से महक मदहोश होने लगी, तो उस ने भी सलीम के मजबूत शरीर को अपनी बांहों में कस कर भर लिया.

सलीम महक की गरदन को चूमते हुए उस के उभारों को सहलाने लगा. वह उसे तकरीबन दबोच चुका था. दोनों के बदन एकदूसरे से रगड़ खाने लगे थे. वह महक पर हावी होने लगा था. दोनों की गरम सांसें एकदूसरे से टकराने लगी थीं.

महक सिसक उठी. सलीम ने तभी महक को छत पर लिटा दिया और उस के कपड़े उतार कर बदन से
खेलने लगे.

थोड़ी ही देर में वे दोनों सर्दी के इस मौसम में पसीने से सराबोर हो गए. सलीम महक पर पूरी तरह हावी हो चुका था. महक थक चुकी थी, पर सलीम अभी भी नहीं रुका था. कुछ देर के बाद वे दोनों निढाल हो गए.

सलीम ने जल्दी से कपड़े पहने और फौरन दीवार फांद कर अपनी छत पर चला गया.

महक ने जल्दीजल्दी अपने कपड़े पहने और वह भी नीचे आ गई. वह अपने बिस्तर पर लेट कर सलीम के बारे में सोचने लगी और मुसकराने लगी.

अब तो महक पूरी तरह से सलीम की कायल हो चुकी थी. सलीम से मिले जिस्मानी सुख को वह भूल नहीं पा रही थी. अब महक और सलीम को जब भी मौका मिलता, वे एकदूसरे से अपनी जिस्मानी जरूरत पूरी कर लिया करते थे.

महक के सिर का दर्द खुद ब खुद ठीक हो गया. अब वह महकने और चहकने लगी.

सलीम महक को जिस्मानी सुख तो दे ही रहा था, साथ ही उस पर काफी पैसा भी लुटा रहा था.

दोनों की प्रेमकहानी अब तूल पकड़ने लगी, तो अशरफ को भी इस बात का पता चल गया. उस ने महक को काफी समझाया, पर वह नहीं मानी.

थकहार कर अशरफ ने पंचायत बुलाई, जिस में सलीम और अशरफ के साथ महक भी आई.

सरपंच ने महक से सवाल किया, ‘‘तुम अपने शौहर के होते हुए सलीम से नाजायज रिश्ता क्यों रखती हो?’’

महक काफी देर तक चुप रही, फिर उस ने पंचायत को एक ऐसा करारा जवाब दिया, जिसे सुन कर पूरी पंचायत क्या अशरफ भी हैरान रह गया.

महक सारी शर्म छोड़ कर बोली, ‘‘जब अशरफ अपनी बीवी को जिस्मानी सुख दे ही नहीं सकता, तो मैं क्या करती. मेरी भी तमन्ना है, जज्बात हैं. मुझे भी किसी ऐसे मर्द की जरूरत है, जो मेरे बदन की प्यास बुझ सके.

‘‘हर शादीशुदा औरत की तमन्ना होती है कि उसे अपने शौहर से जिस्मानी सुख मिले, पर अशरफ तो मेरे बदन की आग भड़का कर खुद ढेर हो जाता है. अपने शरीर को तो वह ठंडा कर लेता है, पर मैं अपने शरीर की आग को कैसे ठंडा करूं?

‘‘बस, इसीलिए मैं ने सलीम से अपनी जरूरत पूरी की, जिस ने मुझे वह सुख दिया, जो अशरफ के बस की बात नहीं थी.’’

महक की बातें सुन कर पंचायत खामोश हो गई. अशरफ का सिर भी शर्म से झुक गया.

पंचायत के लोग अपनेअपने घर चले गए. अशरफ भी उठा और अपना सिर झुकाए घर चला गया, क्योंकि उस के पास महक के इस करारे जवाब का कोई जवाब नहीं था.

Social Story : नशा

Social Story : बड़ा बेटा शंकर शराबी निकला और पत्नी को लकवा मार गया. इस बात से गणपत की कमर टूट गई. घर में बेटी की कमी न हो, तो गणपत ने शंकर का ब्याह करा दिया. पर बहू ललिता पति का प्यार पाने को तरस गई. क्या गणपत के घर में खुशियां लौटीं?

वह तीनों ही टाइम नशे में चूर रहता था. कभीकभी बेहद नशे में उसे देखा जाता था. वह चलने की हालत में नहीं होता था. पूरे शरीर पर मक्खियां भिनभिना रही होती थीं. उसे कोई कुछ नहीं कहता था. न घर वाले खोजखबर लेते थे और न बाहर वालों का उस से कोई मतलब होता था.

शरीर सूख कर ताड़ की तरह लंबा हो गया था. खाने पर कोई ध्यान ही नहीं रहता था उस का. कभी घर आया तो खा लिया, नहीं तो बस दे दारू, दे दारू.

वह सुबह दारू से मुंह धोता तो दोपहर तक दारू पीने का दौर ही चलता रहता था. दोपहर के बाद गांजे का जो दौर शुरू होता, तो शाम तक रुकने का नाम नहीं लेता था.

दोस्त न के बराबर थे. एक था बीरबल, जो उस के साथ देखा जाता था और दूसरा था एक ?ाबरा कुत्ता, जो हमेशा उस के इर्दगिर्द डोलता रहता था.

‘बहिरा दारू दुकान’ उस का मुख्य अड्डा होता था. वहीं से उस की दिन की शुरुआत होती और रात भी वहीं से शुरू होती, जिस का कोई पहर नहीं होता था. लोगों को अकसर ही वह वहीं मिल जाता था.

सुबहसुबह बहिरा भी उस का मुंह देखना नहीं चाहता था, लेकिन ग्राहक देवता होता है, उसे भगा भी नहीं सकता. पीता है तो पैसे भी पूरे दे देता है और बहिरा को तो पैसे से मतलब था. पीने वाला आदमी हो या कुत्ता, उसे क्या फर्क पड़ता?

अब कहोगे कि बिना नाम उसे रबड़ की तरह खींचते जा रहे हो… ऐसा नहीं था कि मांबाप ने उस का नाम नहीं रखा था या नाम रखना भूल गए थे.

मांबाप ने बड़े प्यार से उस का नाम शंकर रखा था, पर उन्हें क्या पता था कि बड़ा हो कर शंकर ऐसा निकलेगा.

कोई बुरा बनता है, तो लोग उसे नहीं, बल्कि उस की परवरिश को गाली देते हैं. किसी बच्चे को अच्छी परवरिश और अच्छी तालीम नहीं मिले, तो वह बिगड़ ही जाता है. मतलब कि बिगड़ने की पूरी गारंटी रहती है.

लेकिन शंकर के साथ ऐसा नहीं था. बचपन में जितना लाड़प्यार उसे मिलना चाहिए था, वह मिला था. जैसी परवरिश और जिस तरह की पढ़ाईलिखाई उसे मिलनी चाहिए थी, उस का भी पूरापूरा इंतजाम किया गया.
जब तक शंकर गांव के स्कूल में पढ़ा, तब तक घर में ट्यूशन पढ़ाने रोजाना शाम को एक मास्टर आया करता था, ताकि पढ़ाई में बेटा पीछे न रहे.

ऐसी सोच रखने वाले मांबाप गांव में कम ही मिलते हैं. जब वह बड़ा हुआ, तो रांची जैसे शहर के एक नामी स्कूल आरटीसी में उस का दाखिला करा दिया और होस्टल में ही उस के रहने का इंतजाम भी कर दिया. यहां भी ट्यूशन का इंतजाम कर दिया गया.

बस, यहीं से शंकर पर से मांबाप का कंट्रोल खत्म होना शुरू हो गया था. हालांकि, हर महीने उस का बाप गणपत उस से मिलने जाता था और घर की बनी ऐरसाठोंकनी रोटी बना कर उस की मां तुलसी देवी बाप के हाथों भिजवा देती थी, ताकि बेटे को कभी घर की कमी महसूस न हो और बाजार की बासी चीजें खाने से भी बचे.

पर न जाने क्या था या शायद समय ठीक नहीं था, शंकर बाहरी चीजें खाने पर ज्यादा जोर देने लगा था. घर की बनी रोटियां उसे उबाऊ लगती थीं और बक्से में पड़ीपड़ी रोटियां सूख कर रोटा हो जाती थीं. बाद में शंकर उसे बाहर फेंक देता था.

यह बात मां को पता चली, तो उसे बड़ा दुख हुआ और तब उस ने घर से कुछ भी भेजना बंद कर दिया.

‘‘खाओ बाजार की चीजें जितनी खानी हों. एक दिन बीमार पड़ोगे, तब समझोगे तुम,’’ तुलसी देवी ने एक दिन झल्ला कर कह दिया था.

शंकर का बाप गणपत एक कंपनी में डोजर औपरेटर था. हर महीने घर में 80-90 हजार रुपए ले कर आता था. वह चाहता था कि इन पैसों से उस का बेटा पढ़लिख कर डाक्टरइंजीनियर बने, बड़ा आदमी बने, तभी उस के पैसे का मान रहेगा, नहीं तो यह पैसा बेकार है उस के लिए, पर बेटे का चालचलन देख कर उस का मन घबरा उठता था.

इसी बीच तुलसी देवी को लकवा मार गया. उसे तत्काल रांची के एक अस्पताल में भरती कराया गया. पूरा शरीर लकवे की चपेट में आ गया था.

शंकर को भी इस की खबर मिली, पर रांची में रहते हुए भी वह मां को देखने तक नहीं आया. इम्तिहान का बहाना बना कर और पहले से तय दोस्तों के संग पिकनिक मनाने हुंडरू फाल चला गया. शाम को होस्टल लौटा, तो नशे में उस के पैर लड़खड़ा रहे थे.

होस्टल इंचार्ज ने जोर से फटकार लगाई, ‘‘पिकनिक मनाने की छुट्टी लोगे और बाहर जो मरजी करोगे, आगे से ऐसा नहीं होगा.’’

‘‘सौरी सर, आगे से ऐसा नहीं होगा,’’ शंकर ने कहा. बहकने की यह उस की शुरुआत थी.

लकवाग्रस्त पत्नी के गम में डूबे गणपत की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि उस के घरपरिवार की गाड़ी कैसे चलेगी? घर की देखरेख, खानेपीने का इंतजाम कैसे होगा? आज उसे अपनेआप पर भी कम गुस्सा नहीं आ रहा था.

आज एक बेटी होती तो कम से कम रसोई की चिंता तो नहीं होती उसे. 2 बेटों के बाद ही उस ने पत्नी की नसबंदी करवा दी थी.

बड़ा बेटा शंकर और छोटा बेटा गुलाबचंद था, जो डीएवी स्कूल मकोली में क्लास 6 में पढ़ रहा था.

तुलसी देवी कहती रही, ‘‘कम से कम एक बेटी तो होने देता.’’

गणपत ने तब उस की एक नहीं सुनी थी, ‘‘बहुएं आएंगी, उन्हीं को तुम अपनी बेटी मान लेना.’’

आज गणपत का दिमाग कुछ काम नहीं कर रहा था. बिस्तर पर लेटी पत्नी को वह बारबार देखता और कुछ सोचने सा लगता.

तभी उसे छोट साढ़ू भाई की कही एक बात याद आई, ‘‘आप की कोई बेटी नहीं है तो क्या हुआ, मेरी 3 बेटियों में से एक आप रख लीजिए. बेटी की कमी भी पूरी हो जाएगी और उस की पढ़ाईलिखाई भी यहां ठीक से हो पाएगी.’

अचानक गणपत ने छोटे साढ़ू को फोन लगा दिया, ‘‘साढ़ू भाई, नमस्कार. आप लोगों को तो मालूम हो ही चुका है कि शंकर की मां को लकवा मार गया है और इस वक्त वह अस्पताल में पड़ी है.’’

‘जी हां, हमें यह जान कर बहुत दुख हुआ. अभी वे कैसी हैं? डाक्टर का क्या कहना है?’

‘‘कुछ सुधार तो है, पर डाक्टर का कहना है कि लंबा इलाज चलेगा. कई साल भी लग सकते हैं. हो सकता कि वह पूरी तरह कभी ठीक न हो पाए, यह भी डाक्टर कहता है…’’

गणपत एक पल को रुका था, फिर बोला, ‘‘साढ़ू भाई, याद है, आप ने एक बार मुझ से कहा था कि आप के 2 बेटे हैं और मेरी 3 बेटियां हैं, मेरी एक बेटी आप अपने पास रख लीजिए, बेटी की कमी भी पूरी हो जाएगी.

‘‘आज मैं सरिता को मांगता हूं. आप मुझे सरिता को दे दीजिए, उस की पढ़ाईलिखाई और शादीब्याह की सारी जिम्मेदारी मेरी. इस समय एक बेटी की मुझे सख्त जरूरत है साढ़ू भाई.’’

‘ठीक है, मैं सरिता की मां से बात करूंगा.’

2 दिन बाद गणपत के साढ़ू भाई का फोन आया, ‘माफ करना साढ़ूजी, सरिता की मां इस के लिए तैयार नहीं हैं.’

‘‘ओह, कोई बात नहीं है साढ़ू भाई. सब समय का फेर है. समस्या मेरी है तो समाधान भी मू?ो ही ढूंढ़ना होगा,’’ यह कह कर गणपत ने फोन काट दिया था.

तुलसी देवी के लकवे की तरह गणपत की सोच को भी उस वक्त लकवा मार गया था, जब शंकर के स्कूल वालों की ओर से एक दिन सुबहसुबह फोन पर कहा गया, ‘आप के बेटे शंकर को स्कूल और होस्टल से निकाल दिया गया है. जितना जल्दी हो सके, आ कर ले जाएं.’

यह सुन कर गणपत को लगा कि उस का संसार ही उजड़ गया है और उस के लहलहाते जीवन की बगिया में आसमानी बिजली गिर पड़ी हो.

गणपत अस्पताल के कौरिडोर से हड़बड़ी में उतरा और सड़क पर पैदल ही स्कूल की ओर दौड़ पड़ा. अपने समय में वह फुटबाल का अच्छा खिलाड़ी हुआ करता था. अभी जिंदगी उस के साथ फुटबाल खेल रही थी.

स्कूल पहुंच कर गणपत स्कूल वालों के आगे साष्टांग झक गया और बोला, ‘‘बेटे ने जो भी गलती की हो, आखिरी बार माफ कर दीजिए माईबाप. दोबारा ऐसा नहीं होगा.’’

‘‘आप की सज्जनता को देखते हुए इसे माफ किया जाता है. ध्यान रहे, फिर ऐसा न हो,’’ स्कूल के प्रिंसिपल की ओर से कहा गया.

स्कूल गलियारे में ही गणपत को शंकर के गुनाह का पता चल गया था. स्कूल में होली की छुट्टी की सूचना निकल चुकी थी.

2 दिन बाद स्कूल का बंद होना था. उस के पहले स्कूल होस्टल में एक कांड हो गया, जिस में शंकर भी शामिल था.

दरअसल, लड़के के भेष में बाजार में सड़क किनारे बैठ हंडि़या बेचने वाली 2 लड़कियों को कुछ लड़के चौकीदार की मिलीभगत से होस्टल के अंदर ले आए थे. रातभर महफिल जमी, दारूमुरगे का दौर चला. दो जवान जिस्मों को दारू में डुबो कर उन के साथ खूब मस्ती की गई.

अभी महफिल पूरे उफान पर ही थी कि तभी होस्टल पर प्रबंधन की दबिश पड़ी. होस्टल इंचार्ज समेत 5 लड़के इस कांड में पकड़े गए.

होस्टल इंचार्ज और चौकीदार को तो स्कूल प्रबंधन ने तत्काल काम से हटा दिया और छात्रों के मांबाप को फोन कर हाजिर होने को कहा गया.

गणपत माथे पर हाथ रख कर वहीं जमीन पर बैठ कर रोने लगा. बेटे को ले कर उस ने जो सपना देखा था, वह सब खाक होता दिख रहा था.

फिर भी उस ने शंकर से इतना जरूर कहा, ‘‘अगले साल तुम को मैट्रिक का इम्तिहान देना है, बढि़या से तैयारी करो,’’ और वह अस्पताल लौट आया.

3 महीने बाद तुलसी देवी को अस्पताल के बिस्तर से घर के बिस्तर पर शिफ्ट कर दिया गया.

घर में तुलसी देवी की देखभाल के लिए कोई तो चाहिए? इस सवाल ने गणपत को परेशान कर दिया.

बड़ी भागदौड़ कर के वह प्राइवेट अस्पताल की एक नर्स को मुंहमांगे पैसे देने की बात कर घर ले आया.

तुलसी देवी को अपनी सेवा देते हुए अभी नर्स गीता को 2 महीने ही पूरे हुए थे कि एक दिन उस ने सुबहसुबह गणपत को यह कह कर चौंका दिया, ‘‘अब मैं यहां काम नहीं कर सकूंगी.’’

‘‘क्यों…? किसी ने कुछ कहा क्या या हम से कोई भूल हुई?’’ गणपत ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘नहीं, पर यहां की औरतें अच्छी नहीं हैं.’’

‘‘मैं समझ गया. बगल वाली करेला बहू ने कोई गंदगी फैलाई होगी. ठीक है, तुम जाना चाहती हो, जाओ. मैं रोकूंगा नहीं. कब जाना है, बता देना…’’

गणपत जैसे सांस लेने को रुका था, फिर शुरू हो गया, ‘‘आप को अस्पताल में ‘सिस्टर गीता’ कहते होंगे लोग, और मैं आप को अपनी छोटी बहन समझता हूं…’’ बोलतेबोलते गणपत का गला भर आया और आंखें छलक पड़ीं.

इसी के साथ गणपत तुरंत बाहर चला गया. गीता उसे जाते हुए देखती रह गई.

शंकर ने बेमन से मैट्रिक बोर्ड का इम्तिहान दिया और 3 महीने बाद उस का नतीजा भी आ गया. वह सैकंड डिवीजन से पास हुआ था.

रिजल्ट कार्ड ला कर बाप के हाथ में रखते हुए उस ने कहा, ‘‘इस के आगे मैं नहीं पढ़ूंगा. पढ़ाई में मेरा मन नहीं लगता. यह रिजल्ट आप रख लीजिए,’’ इसी के साथ वह घर से निकल पड़ा. गणपत हैरान सा बेटे को जाते हुए देखता रहा.

एक हफ्ते तक जब शंकर घर नहीं लौटा, तब किसी ने कहा कि वह कोलकाता चला गया है.

गणपत के साथ यह सब क्यों हो रहा था? वह हैरान था. परेशानी के चक्रव्यूह ने चारों तरफ से उसे घेर रखा था और वह रो भी नहीं सकता था, मर्द जो ठहरा.

दोपहर को गणपत काम से घर लौटा. गीता तुलसी देवी को खाना खिला रही थी. साबुनतौलिया लिए वह सीधे बाथरूम में चला गया. नहा कर आया, तो गीता ने खाना लगा दिया.

‘‘इस घर में बहू आ जाएगी, तभी मैं जाऊंगी,’’ गीता बोली.

‘‘बहू…’’ कहते हुए गणपत ने गीता पर नजर डाली और खाना खाने लगा. उस की मरी हुई भूख जाग उठी थी.

खाना खा कर उठा तो गणपत फिर बुदबुदाया, ‘‘बहू…’’ उसे भी लगा कि शंकर को सुधारने का अब एक ही रास्ता है कि उस की शादी करा दी जाए. बहू अच्छेअच्छे नशेबाजों की सवारी करने में माहिर होती है, ऐसा गणपत का मानना था.

शंकर के लिए शादी जरूरी थी या नहीं, पर उस घर को एक बहू की सख्त जरूरत थी. यही सोच कर गणपत ने संगीसाथियों के बीच बात चलाई और एक दिन नावाडीह की पढ़ीलिखी, सुशील और संस्कारी किसान की बेटी ललिता के साथ बेटे की शादी तय कर दी गई.

ललिता बहुत खूबसूरत तो नहीं थी, लेकिन बदसूरत भी नहीं थी. वह किसी के शरीर में उबाल ला सकती है, ऐसी जरूर थी.

एक दिन गणपत ने शंकर से कहा, ‘‘हम ने तुम्हारे लिए एक लड़की पसंद की है, किसी दिन जा कर देख लो और शादी का दिन पक्का कर लो.’’

‘‘आप की पसंद ही मेरी पसंद है,’’ शंकर ने कहा.

शंकर की बरात में उस के साथी नशे में झूम रहे थे. बरात जब दुलहन के दरवाजे पर पहुंची, तो घराती हैरान थे कि न जाने ललिता के लिए यह कैसा दूल्हा पसंद किया है.

शादी का मुहूर्त निकला जा रहा था और शंकर अपने साथियों के साथ डीजे पर अब भी नाच रहा था. वह भूल चुका था कि वह बराती नहीं, बल्कि दूल्हा है और उसे शादी भी करनी है.

तभी वहां शंकर के होने वाले 2 साले आए और चावल की बोरी की तरह शंकर को उठाया और सीधे मंडप में ले जा कर धर दिया. तब भी शंकर का नशा कम नहीं था.

पंडित बैठा विवाह के श्लोक पढ़ रहा था, पर शंकर अपनी ही दुनिया में जैसे मगन था. वह न पंडित की किसी बात को सुन रहा था और न ही उस की तरफ उस का ध्यान था. उसे देख कर लगता नहीं था कि वह शादी करने आया है.

दुलहन विवाह मंडप में लाई गई. तब भी शंकर होश में नहीं था. जब सिंदूरदान की बेला आई, सभी उठ खड़े हुए और जब शंकर को उठने को बोला गया, तो वह बड़ी मुश्किल से उठ खड़ा हुआ था. तभी गणपत आगे बढ़ा और बेटे के हाथ से दुलहन की मांग भरी गई.

बेटी का बाप करीब आ कर गणपत से बोला, ‘‘समधीजी, मैं आप के भरोसे अपनी बेटी दे रहा हूं. देखना कि इसे कोई तकलीफ न हो.’’

‘‘आप निश्चिंत रहें, आप की बेटी हमारे घर में राज करेगी, राज,’’ गणपत ने बेटी के बाप से कहा.
दुलहन के बाप के दिल में ठंडक पड़ी. दोनों एकदूसरे के गले लगे.

घर में बहू आ गई. गणपत ने नर्स गीता को ढेर सारे उपहार दे कर बहन की तरह विदाई करते हुए कहा, ‘‘बहुत याद आओगी, आती रहना.’’

‘‘इस घर को मैं कभी भुला नहीं पाऊंगी,’’ गीता ने कहा.

ललिता को इस घर में आए सालभर हो चुका था, पर और बहुओं की तरह उस की जिंदगी में अभी तक सुहागरात नहीं आई थी. दो दिलों में बहार का आना अभी बाकी था, पर जैसेजैसे समय बीतता गया, शादी उस के लिए एक पहेली बन गई.

देखने के लिए तो पूरा घर और सोचने के लिए खुला आसमान था. काम के नाम पर रातभर तारे गिनना और दिनभर सास की सेवा में गुजार देना होता. परंतु पति का प्यार अभी तक उस के लिए किसी सपने की तरह था. कुलटा बनना उस के संस्कार में नहीं था.

‘घर के बाहर जिस औरत की साड़ी एक बार खुल जाती है, तो बाद में समेटने का भी मौका नहीं मिलता…’ विदा करते हुए बेटी के कान में मां ने कहा था.

सालभर में ही ललिता ने रसोई से ले कर रिश्तों तक को सूंघ लिया था. सास तुलसी देवी को लकवा मारे 2 साल से ऊपर का समय हो चला था. अब करने को कुछ बचा नहीं था.

सासससुर के मधुर संबंधों को भी जैसे लकवा मार गया था. इस कमी को ललिता का ससुर कभी सोनागाछी तो कभी लछीपुर जा कर पूरा कर आता था.

शुरू में तो ललिता को इस पर यकीन ही नहीं हुआ, लेकिन पड़ोस की एक काकी ने एक दिन जोर दे कर कह ही दिया था, ‘‘यह झूठ नहीं है, सारा गांव जानता है.’’

फिर भी ललिता चुप रही. अब उस ने रिश्तों की जमीन टटोलनी शुरू कर दी थी.

शंकर में कोई बदलाव नहीं हुआ था. जैसा पहले था, वैसा ही आज भी था. आज भी उसे नूनतेल और लकड़ी से कोई मतलब नहीं था. पत्नी को वह उबाऊ और बेकार की चीज समझने लगा था.

ललिता रंग की सांवली थी, पर किसी को भी रिझ सकती थी. कमर तक लहराते उस के लंबेलंबे काले बाल किसी का भी मन भटकाने के लिए काफी थे. उस का गदराया बदन पानी से लबालब भरे तालाब की तरह था, लेकिन शंकर था कि वह उस की तरफ देखता तक नहीं था.

ऐसे में जब शंकर घर से जाने लगता, तो ललिता उस का रास्ता रोक कर खड़ी हो जाती और कहती, ‘‘कहां चले, अब कहीं नहीं जाना है, घर में रहिए.’’

‘‘देखो, तुम मुझे रोकाटोका मत करो, खाओ और चुपचाप सो जाओ.

तुम मुझ से ऐसी कोई उम्मीद न करना, जो मैं दे न सकूं. नाहक ही तुम को तकलीफ होगी.’’

इस के बाद शंकर घर से निकल जाता, तो लौटने में कभी 10-11 बज जाते, तो कभी आधी रात निकल जाती थी. ललिता छाती पर हाथ रख कर सो जाती. आंसू उस का तकिया भिगोते रहते. कैसा होता है पहला चुंबन और कैसा होता है उभारों का पहला छुअन… उन का मसला जाना. उस की सारी इच्छाएं अधूरी थीं.

छुट्टी के दिन गणपत घर से बाहर निकल रहा था कि ललिता ने टोक दिया, ‘‘हर हफ्ते जिस जगह आप जाते है, वहां नहीं जाना चाहिए.’’

‘‘बहू, इस तरह टोकने और कहने का क्या मतलब है…?’’ गणपत ठिठक कर खड़ा हो गया.

‘‘मैं सब जान चुकी हूं. सास को लकवा मारना और हर हफ्ते आप का बाहर जाना, यह इत्तिफाक नहीं है. उसे जरूरत का नाम दिया जा सकता है. पर जरा सोचिए, जो बात आज सारा गांव जान रहा है, कल वही बात छोटका बाबू गुलाबचंद को मालूम होगी, तब उस पर क्या गुजरेगी, इस पर कभी सोचा है आप ने?’’

‘‘ऐसा कुछ नहीं है, जैसा तुम समझ रही हो बहू.’’

‘‘आप को नहीं मालूम कि गांव में कैसी चर्चा है. सब बोलते हैं कि पैसे ने बापबेटे का चालचलन बिगाड़ दिया है. बेटा नशेबाज है और बाप औरतबाज.’’

‘‘बहू…’’ गणपत चीख उठा था, ‘‘कौन है, जो इस तरह बोलता है? किस ने तुम से यह बात कही? मुझे बताओ…’’

‘‘इस से क्या होगा? गंदगी से गुलाब की खुशबू नहीं आएगी… बदबू ही फैलेगी.’’

सालभर में ऐसा पहली बार हुआ था, जब छुट्टी के दिन गणपत कहीं बाहर नहीं गया. बहू की बातों ने उसे इस कदर झकझोर डाला कि वह सोच में पड़ गया. वापस कमरे में पहुंचा और कपड़े बदल कर सो गया, पर बहू की बातों ने यहां भी उस का पीछा नहीं छोड़ा, ‘बेटा नशेबाज और बाप औरतबाज…’

लेटेलेटे गणपत को झपकी आ गई और वह सो गया. दोपहर को उसे जोर से प्यास लगी. उस ने बहू को आवाज दी. वह पानी ले कर आई.

गणपत ने गटागट पानी पी लिया. ललिता जाने लगी, तो उस ने कहा, ‘‘तुम्हारा कहा सही है, मैं जो कर रहा था गलत है, आगे से ऐसा नहीं होगा.’’

ललिता के मुंह से भी निकल गया, ‘‘मैं यह मानती हूं कि आप अभी भरपूर जवान हैं, बूढ़े नहीं हुए हैं. आप का शरीर जो मांगता है, उसे मिलना चाहिए. लेकिन, आप जिस जगह जा रहे हैं, वह जगह सही नहीं है.’’

‘‘तुम ठीक कह रही हो बहू.’’

‘‘आप बाहर की दौड़ लगाना छोडि़ए और घर में रहिए. आप को किसी चीज की कमी नहीं होगी,’’ कहते हुए ललिता अपने कमरे में चली गई.

गणपत पहली बार ललिता को गौर से देख रहा था और उस की कही बातों का मतलब निकाल रहा था.

उस दिन के बाद से गणपत ने बाहर जाना छोड़ दिया. छुट्टी के दिन वह या तो घर में रहता या फिर किसी रिश्तेदार के यहां चला जाता. इस बदलाव से खुद तो वह खुश था ही, भूलते रिश्तों को भी टौनिक मिल गया था.

उस दिन भी गणपत घर में ही था. दोपहर का समय था. पत्नी के कमरे में बैठा उस की देह सहला रहा था. मुद्दतों के बाद तुलसी देवी पति का साथ पा कर बेहद खुश थी.

कमरा शांत था. किसी का उधर आने का भी कोई चांस नहीं था. शंकर अपनी मां के कमरे में कभी आता नहीं था. अपनी मां को कब उस ने नजदीक से देखा है, उसे याद नहीं. ललिता अपने कमरे में लेटी ‘सरिता’ पत्रिका पढ़ रही थी. पत्रिका पढ़ने की उस की यह आदत नई थी. उस वक्त तुलसी देवी का हाथ पति की जांघ पर था.

उसी पल खाना ले कर ललिता कमरे में दाखिल हुई. अंदर का नजारा देख कर वह तुरंत बाहर जाने लगी. तभी उसे ससुर की आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘रुको, सास को खाना खिलाओ, मैं बाहर जा रहा हूं.’’

रात के 10 बज चुके थे. ललिता ने सास को खाना और दवा खिला कर सुला दिया था. ससुर को खाना देने के लिए बहू बुलाने गई, तो उन्हें कमरे के बाहर बेचैन सा टहलते पाया. बहू ललिता बोली, ‘‘खाना खा लेते, रोटी ठंडी हो जाएगी.’’

‘‘खाने की इच्छा नहीं है. तुम जाओ और खा कर सो जाओ…’’

‘‘आप को क्या खाने की इच्छा है, बोलिए, बना दूंगी.’’

‘‘कुछ भी नहीं, मेरा मन ठीक नहीं है,’’ कह कर गणपत अपने कमरे में जाने लगा. तभी ललिता की आवाज सुनाई दी, ‘‘आप का मन अब मैं ही ठीक कर सकती हूं. मैं ने एक दिन आप से कहा था कि जब घर में खाने के लिए शुद्ध और स्वादिष्ठ भोजन रखा हो, तो खाने के लिए बाहर नहीं जाना चाहिए. वह घड़ी आ चुकी है,’’ कह कर ललिता अपने कमरे की तरफ मुड़ गई. उस की चाल में एक नशा था.

गणपत बड़ी देर तक वहीं खड़ा रहा. नहीं… नहीं… ऐसा ठीक नहीं होगा, दुनिया क्या कहेगी… रिश्तों का क्या होगा… समाज जानेगा… उस का कौन जवाब देगा… देखो, घर की बात है और दोनों को एकदूसरे की जरूरत भी है…

आगे बढ़ने के लिए जैसे कोई उसे उकसा रहा था, पीछे से धकिया रहा था… आगे बढ़ो… आगे बढ़ो… दुनिया जाए भाड़ में…

अंदर से कमरे का दरवाजा बंद कर गणपत ने सामने देखा, अंगड़ाई लेता हुआ एक जवां जिस्म बांहें फैलाए खड़ा था.

गणपत बेकाबू हो चुका था. शायद वह भी इसी पल के इंतजार में था. वह ललिता के कमरे में चला गया.

थोड़ी देर के बाद शंकर ने घर में कदम रखा. पहले वह रसोई में गया. उस ने 2 रोटी खाई और अपने कमरे की ओर बढ़ा. दरवाजा अंदर से बंद था. धक्का दिया, पर खुला नहीं.

शंकर बाहर जाने को मुड़ा कि तभी अंदर से हलकीहलकी आवाजें सुनाई पड़ीं.

‘‘तुम दोनों कभी मिले नहीं थे क्या?’’ गणपत ललिता से पूछ रहा था.

‘‘नहीं… आह… आप तो बुलडोजर चला रहे हैं,’’ ललिता बोली.

‘‘अब तो यह बुलडोजर हर दिन चलेगा.’’

‘‘और शंकर का क्या होगा?’’

‘‘अब तुम उस के बारे में सोचना छोड़ दो.’’

‘‘फिर मैं किस की रहूंगी?’’

‘‘अभी किस की हो?’’

‘‘आप को क्या कहूंगी? ससुर या शाहजहां?’’

‘‘शाहजहां… आज से तुम मेरी और मैं तुम्हारा. अब से तुम्हारी सारी जिम्मेदारी मेरी.’’

बाहर खड़े शंकर ने अंदर की सारी बातें सुनीं. इस से पहले कि कोई उसे वहां देख ले, दबे पैर वह घर से जो निकला, लौट कर फिर कभी उस घर में नहीं आया.

गणपत की बगिया में ललिता ने अपना घोंसला बना लिया था.

लेखक – श्यामल बिहारी महतो

Family Story : मुखियाजी की छोटी पतोहू

Family Story : 70 साल के मुखियाजी दिलफेंक इनसान थे. वे अपने कुएं पर पानी भरने आई औरतों को खूब ताड़ते थे. निचली जाति की रामकली पर तो वे फिदा थे. एक दिन रामकली के पति रामलाल को पुलिस पकड़ कर ले गई. रामकली मुखियाजी के पास गई. आगे क्या हुआ.

मुखियाजी थे तो 70 साल के, लेकिन उन का कलेजा किसी जवान छोकरे जैसा ही जवान था. उन के कुएं पर पानी भरने के लिए जब औरतें आतीं, तब वे हुक्का पीते रहते और उन को निहारते रहते.

मुखियाजी को इस बात से कोई मतलब नहीं था कि कौन सी औरत उन के बारे में क्या सोच रही है. वे किसी औरत को कभी कनखियों से भी देखते थे. उन की नजर हमेशा गांव की औरतों के घूंघट पर ही रहती थी.

मुखियाजी हमेशा इस ताक में रहते थे कि कब पानी खींचने में घूंघट खिसके और वे उस औरत का चेहरा अच्छी तरह से देख कर तर हो जाएं. वे इस बात को जानते थे कि कोई औरत उन पर इस उम्र में दिलफेंक होने का लांछन नहीं लगाएगी.

अगर पानी भरने वाली औरत किसी निचली जाति की होती, तब तो मुखियाजी चहक उठते. सोचते, ‘भला इस की क्या मजाल, जो मेरे बारे में कुछ भी कह सके.’ अगर उस समय कुएं पर कोई और नहीं होता, तब वे तुरंत उस औरत के साथ बालटी की रस्सी खींचना शुरू कर देते. वे बोलते, ‘‘अरी रामलाल
की बहुरिया, तू इतनी बड़ी बालटी नहीं खींच सकती. रामलाल से कह कर छोटी बालटी मंगवा लेना. लेकिन वह क्यों लाएगा? वह तो अभी तक सो रहा होगा.’’

तब रामलाल की बहुरिया रामकली लाज के मारे सिकुड़ जाती थी, लेकिन वह रस्सी छोड़ भी नहीं सकती थी, क्योंकि मुखियाजी रस्सी को इसलिए नहीं पकड़ते थे कि वह उस रस्सी को छोड़ दे, वरना बालटी कुएं में गिरने का डर था.

रामकली लजा कर उस कुएं से पानी भर ले जाती. फिर सोचती कि अब यहां से पानी नहीं ले जाएगी, लेकिन बेचारी करती भी क्या? लाचार थी. उस गांव में दूसरा कुआं ऐसा नहीं था, जिस का पानी मीठा हो.

मुखियाजी रोज रामकली की बाट जोहते. रामकली सुबहसवेरे जल्दी आ कर पहले पानी भर लाती. फिर झाड़ूबुहारी करती और तब पति को जगाती.

रामकली सोचती कि सवेरेसवेरे कुएं पर मुखियाजी आ जाते हैं, इसलिए घर की झाड़ूबुहारी बाद में कर लिया करेगी, पानी पहले लेती आएगी.

अगले दिन जब रामकली भोर में मुखियाजी के कुएं पर पानी लाने गई, तब मुखियाजी हुक्का छोड़ कर उस के पास जा पहुंचे और बोले, ‘‘रामकली, आजकल तुम बड़ी देर से आती हो. रामलाल तुम को देर तक नहीं छोड़ता है क्या?’’ और फिर उन्होंने उस का हाथ पकड़ लिया.

रामकली लजा गई. वह धीरे से बोली, ‘‘बाबाजी, यह क्या कर रहे हो, कुछ तो शर्मलिहाज करो.’’

फिर भी मुखियाजी नहीं हटे. वे किसी बेहया की तरह बोले, ‘‘रामकली, तेरा दुख मुझ से अब नहीं देखा जाता है.

तू इतनी ज्यादा मेहनत करती है, जबकि रामलाल घर में पड़ा रहता है.’’

तकरीबन 35 साल पहले मुखियाजी की घरवाली 3 बेटों को छोड़ कर चल बसी थी. उस के बाद मुखियाजी ने किसी तरह जवानी काट दी. 2 बेटों को पुलिस महकमे में जुगाड़ लगा कर भरती करा दिया. एक बेटा शहर का कोतवाल बन गया था, जबकि दूसरा छोटा बेटा थानेदार था और तीसरा बेटा गांव में खेतीबारी करता था.

एक दिन मुखियाजी रामकली से बोले, ‘‘कोतवाल की अम्मां से तेरा चेहरा पूरी तरह मिलता है. तेरी ही उम्र में तो वह चली गई थी. जब मैं तुझे देखता हूं, तब मुझे कोतवाल की अम्मां याद आ जाती है.’’

सचाई यह थी कि कोतवाल की अम्मां काले रंग की थी. वह मुखियाजी को कभी पसंद नहीं आई थी, जबकि रामकली गोरीचिट्टी और खूबसूरत होने के चलते उन को खूब अच्छी लगती थी.

जब रामकली कुएं के पास आती, तब मुखियाजी अपनी घोड़ी के पास पहुंच कर कहते, ‘‘आज तो तेरे ऊपर सवारी करूंगा.’’

मुखियाजी इसी तरह के और भी फिकरे कसते थे. तब बेचारी रामकली लाज के मारे सिकुड़ जाती. वह सोचती कि बूढ़ा पागल हो गया है.

एक दिन रामकली ने सहम कर अपने पति रामलाल से कहा, ‘‘सुनोजी, ये मुखियाजी कैसे आदमी हैं? हर समय मुझे ही निहारते रहते हैं.’’

तब रामलाल खड़ा हो गया और बौखला कर बोला, ‘‘देख रामकली, तू अपनेआप को बड़ी सुंदरी समझती?है, बडे़बूढ़ों पर भी आरोप लगाने से नहीं चूकती है. आगे से कभी ऐसी बात कही तो समझ लेना…’’

मुखियाजी के पास तो इलाके के दारोगाजी, तहसीलदार सभी आते थे. गांव वालों का काम उन दोनों के दफ्तरों से पड़ता है. अपना काम निकलवाने के लिए मुखियाजी सिपाही को भी ‘दारोगाजी’ कहते थे.

कोतवाल के बाप से ‘दारोगाजी’ सुन कर सिपाही फूले न समाते थे. मुखियाजी का हुक्म मानने में वे तब भी नहीं हिचकिचाते थे.

रामकली को देख कर मुखियाजी के दिमाग में एक कुटिल बात आई, ‘क्यों न रामलाल को किसी केस में फंसा दिया जाए? जब रामलाल जेल में होगा, तब रामकली मदद के लिए मेरे पास खुद ही चली आएगी.’

मुखियाजी ने उन सिपाहियों को समझाया, ‘‘रामलाल देर रात कहीं से लौट कर आता है. ऐसा मालूम पड़ता है कि यह बदमाशों से मेलजोल बढ़ा रहा है. काम कुछ नहीं करता है, फिर भी उन सब का खानापीना ठीक चल रहा है.’’

यह सुन कर सिपाही चहक उठे. उन्होंने सोचा कि मुखियाजी कोतवाल साहब से इनाम दिलवाएंगे. अगर मौका लग गया, तो तरक्की दिलवा कर हवलदार भी बनवा देंगे.

अंधियारी रात में चौपाल से लौटते समय रामलाल को पकड़ कर सिपाही थाने ले गए. सुबह सारी बात मालूम होने पर रामकली मुखियाजी के पास आई और पूरी बात बताई.

तब अनजान बने मुखियाजी ने गौर से सारी बातें सुनीं. वे बोले, ‘‘ठीक है, ठीक है, आज मैं बड़े दारोगाजी के पास जाऊंगा. तू 2 घंटे बाद कुछ खर्चेपानी के लिए रुपए लेती आना.’’

2 घंटे बाद रामकली 300 रुपए ले कर मुखियाजी के पास आई, तब वे बोले, ‘‘आजकल 300 रुपए को कौन पूछता है? कम से कम 1,000 रुपए तो चाहिए.’’

थोड़ी देर रुकने के बाद मुखियाजी बोले, ‘‘कोई बात नहीं, एक बात सुन…’’ और फिर घर की दीवार की ओट में मुखियाजी ने रामकली का हाथ पकड़ लिया और बोले, ‘‘तू बिलकुल कोतवाल की अम्मां जैसी लगती है.’’

उसी समय मुखियाजी की पतोहू दूध का गिलास ले कर उन की तरफ धीरे से आई. अपने बूढ़े ससुर को जवान रामकली का हाथ पकड़े देख कर वह हैरान रह गई. उस के हाथ से दूध का गिलास छूट गया. रामकली की आंखों से टपटप आंसू गिरने लगे.

मुखियाजी ने पलटा खाया और बोले, ‘‘मेरे छोटे बेटे की तो 4 बेटियां ही हैं. उस का भी तो खानदान चलाना है. मैं तो अपने बेटे का दूसरा ब्याह करूंगा.’’

‘‘रामकली…’’ मुखियाजी बोले, ‘‘तू बिलकुल चिंता मत कर. तेरा रामलाल आएगा और आज ही आएगा, चाहे 1,000 रुपए मुझे ही क्यों न देने पड़ें. मेरे रहते पुलिस की क्या मजाल, जो रामलाल को पकड़ कर ले जाए. मैं तो तुझे देख रहा था, तू तो इस गांव की लाज है.’’

कुछ घंटे बाद मुखियाजी रामलाल को छुड़ा लाए. रामलाल और रामकली दोनों मुखियाजी के सामने सिर झुका कर खड़े थे. वे अहसानों तले दबे थे.

कुछ दिनों के बाद मुखियाजी ने अपने छोटे बेटे की सगाई पड़ोस के गांव के लंबरदार की बेटी से कर दी. बरात विदा हो रही थी. बरातियों में चर्चा थी, ‘मुखियाजी को अपने छोटे बेटे का वंश भी चलाना है.’

दूसरी तरफ अंदर कोठे में छोटे थानेदार की बहुरिया टपटप आंसू बहा कर अपने कर्मों को कोस रही थी. उस की चारों बेटियां अपनी सौतेली मां के आने का इंतजार डरते हुए कर रही थीं.

लेखक – बृजबाला

Social Story : गलत रास्ता

Social Story : ‘‘अरे निपूती, कब तक सोती रहेगी… चाय के लिए मेरी आंखें तरस गई हैं और ये महारानी अभी तक बिस्तर में घुसी है. न बाल, न बच्चे… ठूंठ को शर्म भी नहीं आती,’’ कमला का अपनी बहू सलोनी को ताने देना जारी था.

अब क्या ही करे, सलोनी को तो कुछ समझ ही नहीं आता था. सुबह जल्दी उठ जाए तो सुनती कि सुबहसुबह बांझ का मुंह कौन देखे. देर से उठे तो भी बवाल. अब ये ताने सलोनी की जिंदगी का हिस्सा थे.

पति राकेश के होते भी सलोनी की विधवा जैसी जिंदगी थी. राकेश मुंबई में रहता था और सलोनी ससुराल में सास और देवर महेश के साथ रहती थी. बेचारी पति के होते हुए भी अब तक कुंआरी थी.

शादी की पहली रात को ही सलोनी को माहवारी आ गई थी, फिर उस की सास ने उसे अलग कोठरी में डाल दिया था. 7 दिन बाद जब उसे कोठरी से निकाला गया, तो राकेश मुंबई जाने की तैयारी कर रहा था.
दूसरी बार जब राकेश नए घर आया, तो उस के आते ही उसे मायके भेज दिया गया था.

ऐसे ही सालभर का समय निकल गया था. सलोनी का राकेश के साथ कोई रिश्ता बन ही नहीं पाया था. उस के बाद भी निपूती और बांझ का कलंक झेलना, सो अलग.

अब सलोनी ने सोचा कि राकेश से बात करे, पर राकेश के हिसाब से तो मां बिलकुल भी गलत नहीं हैं. शादी के बाद तो बच्चा होना ही चाहिए. अब उसे कौन समझाए कि बच्चा शादी करने भर से नहीं हो सकता, उस के लिए साथ में सोना भी पड़ता है.

धीरेधीरे सलोनी को पता चला कि राकेश नामर्द है और उस के साथ सो कर भी वह बच्चा पैदा नहीं कर
सकती. शायद इसीलिए वह उस से दूर भागता है और अपनी मां के साथ मिला हुआ है.

अब सलोनी को कोई हल नजर नहीं आ रहा था. मायके में मां नहीं थीं. पिता से क्या कहे. एक भाई था, वह भी काफी छोटा था. उस से भी कुछ नहीं कहा जा सकता था.

सलोनी का देवर महेश अपने भाई और मां के बरताव के बारे में सबकुछ जानता था. उस के मन में कई बार आता कि मां को खरीखोटी सुना दे, पर वह चुप रह जाता था.

आखिर एक दिन जब राकेश घर आया, उस दिन काफी देर तक पतिपत्नी में नोकझोंक हुई. उस बातचीत के कुछ हिस्से महेश के कानों में भी पड़े, पर वह चुप ही रहा.

2-3 दिन रह कर राकेश वापस मुंबई लौट गया था. सलोनी की सास अपनी बहन के घर गई थी. घर पर सलोनी और महेश ही थे.

अचानक सलोनी ने देखा कि महेश उस के कमरे में आ कर चुपचाप उस के पास खड़ा हो गया था. उस ने अपनी भाभी से कहा, ‘‘तुम इस घर से भाग जाओ.’’

सलोनी ने कहा, ‘‘मैं अब कहां जाऊंगी. पिताजी ने बड़ी मुश्किल से मेरी शादी की है. मैं वापस जा कर उन का दुख नहीं बढ़ा सकती.’’

सलोनी ने अब अपने पैरों पर खड़ा होने की ठान ली. हालांकि वह सिर्फ 12वीं जमात पास थी. उस ने एक औनलाइन शौपिंग कंपनी की पार्सल डिलीवरी का काम शुरू किया. लड़की होने की वजह से उसे यह काम आसानी से मिल गया.

शुरूशुरू में सलोनी पास के एरिया में ही डिलीवरी के लिए जाती थी, बाद में उस ने एक स्कूटी खरीद ली और दूरदूर तक पार्सल डिलीवर करने के लिए जाने लगी.

पैसा आने और लोगों से मिलनेजुलने से सलोनी में एक अलग तरह का आत्मविश्वास आने लगा, जिस से उस की रंगत बहुत ही निखर गई. अब उस की सास भी उसे कम ताने देती थी, पर उसे बांझ कहने से नहीं चूकती थी.

एक रविवार की दोपहर को सलोनी आराम कर के उठी, तो उस ने देखा कि महेश चोर नजरों से उसे ही देख रहा था.

सलोनी ने सोचा कि अपने पैरों पर तो वह खड़ी हो गई है, अब उसे अपने माथे पर लगे कलंक को भी धोना है. उस ने मौका देख कर एक दिन महेश से कहा, ‘‘तुम मुझे एक बच्चा दे दो.’’

महेश सोच में पड़ गया. उसे लगा कि यह पाप है. उसे सोच में देख कर सलोनी बोली, ‘‘देवरजी, इस पाप के साथ ही मैं अपने माथे पर लगे कलंक को धो सकती हूं. यही मेरे लिए सब से बड़ा पुण्य है.

‘‘मैं उस अपराध की सजा क्यों भुगतूं, जो मैं ने किया ही नहीं है. इस से तो अच्छा होगा कि मैं पाप कर के अपने माथे पर लगे बांझ वाले कलंक को धो दूं.’’

अब कमरे में पाप हो रहा था, जिस से एक कलंक को धुलना था. महेश की बांहों में समाते हुए सलोनी सोच रही थी, पाप और पुण्य की नई परिभाषा.

धीरेधीरे सलोनी अपने देवर महेश से वह सुख हासिल करने लगी, जो उसे पति ने कभी नहीं दिया था और महेश और उस पर कोई उंगली न उठा सके, इस के लिए सलोनी ने अपने देवर की शादी एक बिना पढ़ीलिखी गरीब लड़की से करा दी.

सास सब समझती, इसलिए वह अपनी छोटी बहू को रीतिरिवाज और पूजापाठ के बहाने अकसर घर से दूर ही रखती थी, जिस से उसे अपने पति और जेठानी के बीच के नाजायज रिश्ते की कोई भनक तक नहीं लगे.

समय के साथसाथ सलोनी एक बच्चे की मां बन गई और उस की नौकरी भी अब पक्की हो गई थी. राकेश सब जानतेसमझते हुए भी चुप ही रहता था और अब तो वह सामाजिक रूप से एक बच्चे का पिता भी बन गया था.

सलोनी ने अपनी जिंदगी से भागने का रास्ता नहीं चुना, बल्कि उसी ससुराल में डट कर मुकाबला किया और अब बड़े ही सुकून से रह रही थी. कभीकभी गलत रास्ता भी जिंदगी की गाड़ी को पटरी पर ला देता है.

Family Story : अपने लोग – आनंद ने आखिर क्या सोचा था

Family Story : ‘‘आखिर ऐसा कितने दिन चलेगा? तुम्हारी इस आमदनी में तो जिंदगी पार होने से रही. मैं ने डाक्टरी इसलिए तो नहीं पढ़ी थी, न इसलिए तुम से शादी की थी कि यहां बैठ कर किचन संभालूं,’’ रानी ने दूसरे कमरे से कहा तो कुछ आवाज आनंद तक भी पहुंची. सच तो यह था कि उस ने कुछ ही शब्द सुने थे लेकिन उन का पूरा अर्थ अपनेआप ही समझ गया था.

आनंद और रानी दोनों ने ही अच्छे व संपन्न माहौल में रह कर पढ़ाई पूरी की थी. परेशानी क्या होती है, दोनों में से किसी को पता ही नहीं था. इस के बावजूद आनंद व्यावहारिक आदमी था. वह जानता था कि व्यक्ति की जिंदगी में सभी तरह के दिन आते हैं. दूसरी ओर रानी किसी भी तरह ये दिन बिताने को तैयार नहीं थी. वह बातबात में बिगड़ती, आनंद को ताने देती और जोर देती कि वह विदेश चले. यहां कुछ भी तो नहीं धरा है.

आनंद को शायद ये दिन कभी न देखने पड़ते, पर जब उस ने रानी से शादी की तो अचानक उसे अपने मातापिता से अलग हो कर घर बसाना पड़ा. दोनों के घर वालों ने इस संबंध में उन की कोई मदद तो क्या करनी थी, हां, दोनों को तुरंत अपने से दूर हो जाने का आदेश अवश्य दे दिया था. फिर आनंद अपने कुछ दोस्तों के साथ रानी को ब्याह लाया था.

तब वह रानी नहीं, आयशा थी, शुरूशुरू में तो आयशा के ब्याह को हिंदूमुसलिम रंग देने की कोशिश हुई थी, पर कुछ डरानेधमकाने के बाद बात आईगई हो गई. फिर भी उन की जिंदगी में अकेलापन पैठ चुका था और दोनों हर तरह से खुश रहने की कोशिशों के बावजूद कभी न कभी, कहीं न कहीं निकटवर्तियों का, संपन्नता का और निश्ंिचतता का अभाव महसूस कर रहे थे.

आनंद जानता था कि घर का यह दमघोंटू माहौल रानी को अच्छा नहीं लगता. ऊपर से घरगृहस्थी की एकसाथ आई परेशानियों ने रानी को और भी चिड़चिड़ा बना दिया था. अभी कुछ माह पहले तक वह तितली सी सहेलियों के बीच इतराया करती थी. कभी कोईर् टोकता भी तो रानी कह देती, ‘‘अपनी फिक्र करो, मुझे कौन यहां रहना है. मास्टर औफ सर्जरी (एमएस) किया और यह चिडि़या फुर्र…’’ फिर वह सचमुच चिडि़यों की तरह फुदक उठती और सारी सहेलियां हंसी में खो जातीं.

यहां तक कि वह आनंद को भी अकसर चिढ़ाया करती. आनंद की जिंदगी में इस से पहले कभी कोई लड़की नहीं आई थी. वह उन क्षणों में पूरी तरह डूब जाता और रानी के प्यार, सुंदरता और कहकहों को एकसाथ ही महसूस करने की कोशिश करने लगता था.

आनंद मास्टर औफ मैडिसिन (एमडी) करने के बाद जब सरकारी नौकरी में लगा, तब भी उन दोनों को शादी की जल्दी नहीं थी. अचानक कुछ ऐसी परिस्थितियां आईं कि शादी करना जरूरी हो गया. रानी के पिता उस के लिए कहीं और लड़का देख आए थे. अगर दोनों समय पर यह कदम न उठाते तो निश्चित था कि रानी एक दिन किसी और की हो जाती.

फिर वही हुआ, जिस का दोनों बरसों से सपना देख रहे थे. दोनों एकदूसरे की जिंदगी में डूब गए. शादी के बाद भी इस में कोई फर्क नहीं आया. फिर भी क्षणक्षण की जिंदगी में ऐसे जीना संभव नहीं था और रानी की बड़बड़ाहट भी इसी की प्रतिक्रिया थी.

आनंद ने यह सब सुना और रानी की बातें उस के मन में कहीं गहरे उतरती गईं. रानी के अलावा अब उस का इतने निकट था ही कौन? हर दुखदर्द की वह अकेली साथी थी. वह सोचने लगा, ‘चाहे जैसे भी हो, विदेश निकलना जरूरी है. जो यहां बरसों नहीं कमा सकूंगा, वहां एक साल में ही कमा लूंगा. ऊपर से रानी भी खुश हो जाएगी.’

आखिर वह दिन भी आया जब आनंद का विदेश जाना लगभग तय हो गया. डाक्टर के रूप में उस की नियुक्ति इंगलैंड में हो गई थी और अब उन के निकलने में केवल उतने ही दिन बाकी थे जितने दिन उन की तैयारी के लिए जरूरी थे. जाने कितने दिन वहां लग जाएं? जाने कब लौटना हो? हो भी या नहीं? तैयारी के छोटे से छोटे काम से ले कर मिलनेजुलने वालों को अलविदा कहने तक, सभी काम उन्हें इस समय में निबटाने थे.

रानी की कड़वाहट अब गायब हो चुकी थी. आनंद अब देर से लौटता तो भी वह कुछ न कहती, जबकि कुछ महीनों पहले आनंद के देर से लौटने पर वह उस की खूब खिंचाई करती थी.

अब रात को सोने से पहले अधिकतर समय इंगलैंड की चर्चा में ही बीतता, कैसा होगा इंगलैंड? चर्चा करतेकरते दोनों की आंखों में एकदूसरे के चेहरे की जगह ढेर सारे पैसे और उस से जुड़े वैभव की चमक तैरने लगती और फिर न जाने दोनों कब सो जाते.

चाहे आनंद के मित्र हों या रानी की सहेलियां, सभी उन का अभाव अभी से महसूस करने लगे थे. एक ऐसा अभाव, जो उन के दूर जाने की कल्पना से जुड़ा हुआ था. आनंद का तो अजीब हाल था. आनंद को घर के फाटक पर बैठा रहने वाला चौकीदार तक गहरा नजदीकी लगता. नुक्कड़ पर बैठने वाली कुंजडि़न लाख झगड़ने के बावजूद कल्पना में अकसर उसे याद दिलाती, ‘लड़ लो, जितना चाहे लड़ लो. अब यह साथ कुछ ही दिनों का है.’

और फिर वह दिन भी आया जब उन्हें अपना महल्ला, अपना शहर, अपना देश छोड़ना था. जैसेजैसे दिल्ली के लिए ट्रेन पकड़ने का समय नजदीक आ रहा था, आनंद की तो जैसे जान ही निकली जा रही थी. किसी तरह से उस ने दिल को कड़ा किया और फिर वह अपने महल्ले, शहर और देश को एक के बाद एक छोड़ता हुआ उस धरती पर जा पहुंचा जो बरसों से रानी के लिए ही सही, उस के जीने का लक्ष्य बनी हुई थी.

लंदन का हीथ्रो हवाईअड्डा, यांत्रिक जिंदगी का दूर से परिचय देता विशाल शहर. जिंदगी कुछ इस कदर तेज कि हर 2 मिनट बाद कोई हवाईजहाज फुर्र से उड़ जाता. चारों ओर चकमदमक, उसी के मुकाबले लोगों के उतरे या फिर कृत्रिम मुसकराहटभरे चेहरे.

जहाज से उतरते ही आनंद को लगा कि उस ने बाहर का कुछ पाया जरूर है, पर साथ ही अंदर का कुछ ऐसा अपनापन खो दिया है, जो जीने की पहली शर्त हुआ करती है. रानी उस से बेखबर इंगलैंड की धरती पर अपने कदमों को तोलती हुई सी लग रही थी और उस की खुशी का ठिकाना न था. कई बार चहक कर उस ने आनंद का भी ध्यान बंटाना चाहा, पर फिर उस के चेहरे को देख अकेले ही उस नई जिंदगी को महसूस करने में खो जाती.

अब उन्हें इंगलैंड आए एक महीने से ऊपर हो रहा था. दिनभर जानवरों की सी भागदौड़. हर जगह बनावटी संबंध. कोई भी ऐसा नहीं, जिस से दो पल बैठ कर वे अपना दुखदर्द बांट सकें. खानेपीने की कोई कमी नहीं थी, पर अपनेपन का काफी अभाव था. यहां तक कि वे भारतीय भी दोएक बार लंच पर बुलाने के अलावा अधिक नहीं मिलतेजुलते जिन के ऐड्रैस वह अपने साथ लाया था. जब भारतीयों की यह हालत थी, तो अंगरेजों से क्या अपेक्षा की जा सकती थी. ये भारतीय भी अंगरेजों की ही तरह हो रहे थे. सारे व्यवहार में वे उन्हीं की नकल करते.

ऐसे में आनंद अपने शहर की उन गलियों की कल्पना करता जहां कहकहों के बीच घडि़यों का अस्तित्व खत्म हो जाया करता था. वे लंबीचौड़ी बहसें अब उसे काल्पनिक सी लगतीं. यहां तो सबकुछ बंधाबंधा सा था. ठहाकों का सवाल ही नहीं, हंसना भी हौले से होता, गोया उस की भी राशनिंग हो. बातबात में अंगरेजी शिष्टाचार हावी. आनंद लगातार इस से आजिज आता जा रहा था. रानी कुछ पलों को तो यह महसूस करती, पर थोड़ी देर बाद ही अंगरेजी चमकदमक में खो जाती. आखिर जो इतनी मुश्किल से मिला है, उस में रुचि न लेने का उसे कोई कारण ही समझ में न आता.

कुछ दिनों से वह भी परेशान थी. बंटी यहां आने के कुछ दिनों बाद तक चौकीदार के लड़के रामू को याद कर के काफी परेशान रहा था. यहां नए बच्चों से उस की दोस्ती आगे नहीं बढ़ सकी थी. बंटी कुछ कहता तो वे कुछ कहते और फिर वे एकदूसरे का मुंह ताकते. फिर बंटी अकेला और गुमसुम रहने लगा था. रानी ने उस के लिए कई तरह के खिलौने ला दिए, लेकिन वे भी उसे अच्छे न लगते. आखिर बंटी कितनी देर उन से मन बहलाता.

और आज तो बंटी बुखार में तप रहा था. आनंद अभी तक अस्पताल से नहीं लौटा था. आसपास याद करने से रानी को कोई ऐसा नजर नहीं आया, जिसे वह बुला ले और जो उसे ढाढ़स बंधाए. अचानक इस सूनेपन में उसे लखनऊ में फाटक पर बैठने वाले रग्घू चौकीदार की याद आई, जो कई बार ऐसे मौकों पर डाक्टर को बुला लाता था. उसे ताज्जुब हुआ कि उसे उस की याद क्यों आई. उसे कुंजडि़न की याद भी आई, जो अकसर आनंद के न होने पर घर में सब्जी पहुंचा जाती थी. उसे उन पड़ोसियों की भी याद आई जो ऐसे अवसरों पर चारपाई घेरे बैठे रहते थे और इस तरह उदास हो उठते थे जैसे उन का ही अपना सगासंबंधी हो.

आज पहली बार रानी को उन की कमी अखरी. पहली बार उसे लगा कि वह यहां हजारों आदमियों के होने के बावजूद किसी जंगल में पहुंच गई है, जहां कोई भी उन्हें पूछने वाला नहीं है. आनंद अभी तक नहीं लौटा था. उसे रोना आ गया.

तभी बाहर कार का हौर्न बजा. रानी ने नजर उठा कर देखा, आनंद ही था. वह लगभग दौड़ सी पड़ी, बिना कुछ कहे आनंद से जा चिपटी और फफक पड़ी. तभी उस ने सुबकते हुए कहा, ‘‘कितने अकेले हैं हम लोग यहां, मर भी जाएं तो कोई पूछने वाला नहीं. बंटी की तबीयत ठीक नहीं है और एकएक पल मुझे काटने को दौड़ रहा था.’’

आनंद ने धीरे से बिना कुछ कहे उसे अलग किया और अंदर के कमरे की ओर बढ़ा, जहां बंटी आंखें बंद किए लेटा था. उस ने उस के माथे पर हाथ रखा, वह तप रहा था. उस ने कुछ दवाएं बंटी को पिलाईं. बंटी थोड़ा आराम पा कर सो गया.

थका हुआ आनंद एक सोफे पर लुढ़क गया. दूसरी ओर, आरामकुरसी पर रानी निढाल पड़ी थी. आनंद ने देखा, उस की आंखों में एक गलती का एहसास था, गोया वह कह रही हो, ‘यहां सबकुछ तो है पर लखनऊ जैसा, अपने देश जैसा अपनापन नहीं है. चाहे वस्तुएं हों या आदमी, यहां केवल ऊपरी चमक है. कार, टैलीविजन और बंगले की चमक मुझे नहीं चाहिए.’

तभी रानी थके कदमों से उठी. एक बार फिर बंटी को देखा. उस का बुखार कुछ कम हो गया था. आनंद वैसे ही आंखें बंद किए हजारों मील पीछे छूट गए अपने लोगों की याद में खोया हुआ था. रानी निकट आई और चुपचाप उस के कंधों पर अपना सिर टिका दिया, जैसे अपनी गलती स्वीकार रही हो.

Family Story : वापसी

Family Story : पूरे देश में अब अनलौक की शुरुआत हो चुकी थी. औफिस, बाजार वगैरह खुल गए थे. लौकडाउन के दौरान बड़े पैमाने पर काम से लोगों की हुई छंटनी का असर हर तरफ दिख रहा था.

लौकडाउन के समय भारी तादाद में मजदूर अपनेअपने गांव लौट गए थे. गांवों के हालात कोई अच्छे नहीं थे. वहां का समाज अपने लोगों को काम और भोजन मुहैया करा पाने में नाकाम साबित हुआ था. लिहाजा, मजदूर फिर से वापस शहरों की तरफ रुख कर रहे थे. उसी शहर की तरफ जिस ने मुसीबत में सब से पहले उन का साथ छोड़ा था.

दूसरे मजदूरों की तरह अब्दुल भी लौकडाउन में परिवार समेत अपने गांव लौट आया था. उस ने तय कर लिया था कि अब वह नोएडा कभी वापस नहीं जाएगा. पीढि़यों से जिस गांव में उस का परिवार रहता आया हो, वहां उसे दो जून की रोटी कमाने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए.

नोएडा में अब्दुल एक बहुमंजिला औफिस के बाहर सड़क के किनारे चाय का छोटा सा स्टाल लगाता था, जिस से वह इतना कमा लेता था कि परिवार का गुजारा चल जाता था. यह बात उस को मालूम थी कि गांव में केवल खेती के मौसम में ही काम आसानी से मिल पाता?है. खेती के मौसम के बाद बाकी के महीनों में वह गांव से सटे ब्लौक में चाय का स्टाल लगाया करेगा. गांव में खर्च भी कम होता है, तो उस का काम कम आमदनी में भी चल जाएगा.

धान रोपनी के मौसम में अब्दुल और उस की बीवी को धान बोने का काम मिल गया. 2 महीने आराम से कट गए. धान रोपनी के बाद अब्दुल फिर से बेरोजगार हो गया था. उस ने अपनी छोटी सी जमापूंजी से एक ठेला खरीदा और ब्लौक के एक नुक्कड़ के पीछे चाय का स्टाल लगाना शुरू कर दिया.

कुछ ही दिनों में अब्दुल का धंधा चल निकला. आमदनी ठीकठाक होने लगी. यह सोच कर अब्दुल बहुत खुश था कि परिवार का पेट पालने के लिए अब उसे अपना गांव छोड़ कर कहीं नहीं जाना पड़ेगा.

हालांकि अब्दुल को उसे इलाके के लोग पहचानते थे, फिर भी उस की कमाई कुछ लोगों को खटकने लगी थी. पहले किसी ने कल्पना ही नहीं की थी कि नुक्कड़ के पीछे के एक कोने में भी कोई कामधंधा चल सकता है.

एक दिन कुछ लोफर लड़के बाइक से उस के स्टाल पर आए और उन में से एक लड़के ने, जो खुद को नेता समझता था, अब्दुल से कड़क आवाज में पूछा, ‘‘यहां तुम्हें किस ने ठेला लगाने की इजाजत दी है?’’

‘‘मालिक, यह जगह खाली थी तो रोजीरोटी कमाने के लिए मैं यहां ठेला लगाने लगा,’’ अब्दुल सहमते हुए बोला.

‘‘पता है न कि आगे नुक्कड़ पर देवी स्थान है?’’

‘‘जी…’’

‘‘फिर यह जगह हिंदुओं की हुई न. यहां किसी गैरहिंदू का होना इस जगह को अपवित्र कर रहा है. तुम इस जगह को खाली कर कहीं और अपना कामधंधा करो. समझ गए न…’’ दूसरे लड़के ने धमकाते हुए कहा.

फिर वे लड़के वहां से तेजी से मोटरसाइकिल घुमाते हुए निकल गए. अब्दुल उन लड़कों में से एक को पहचान गया था. वह लड़का उस के बेटे शकील का दोस्त था. जब शकील जिंदा था, तो वह उस के घर आयाजाया करता था.

शकील नोएडा में राजमिस्त्री का काम करता था. 2 साल पहले नोएडा में एक बहुमंजिला इमारत के बनने के दौरान हुए एक हादसे में उस की मौत हो गई थी. उन शोहदों की धमकी से अब्दुल डर गया था. फिर उस ने खुद को समझाया कि ये बच्चे जानबूझ कर मजे के लिए ऐसी हरकत कर रहे होंगे. शायद अब वह दोबारा आएंगे भी नहीं.

‘‘यह गांवसमाज सब का है. 50 साल की उम्र में मैं ने अपने गांव या आसपास के गांवों में कभी हिंदूमुसलमान होते नहीं देखा है. बिरजू काका, छोटा काकी, मूलचंद दादा जैसे बड़ेबुजुर्गों की छांव में राम नारायण, बेचू, महेंद्र जैसे कितनों दोस्तों के साथ मैं ने हंसीखुशी अपनी जिंदगी गुजारी है.

‘‘नदी में नहाना हो या बाग में घुस कर आम चुराना, ताजिया देखने जाना हो या दुर्गा पूजा का मेला देखने, मजहब की पहचान कभी आड़े नहीं आई. होली और ईद सब ने मिल कर साथ मनाई,’’ शाम में घर जाते हुए अब्दुल सोच रहा था.

अब्दुल उन गुंडों की बात को उन की दिल्लगी समझ कर भूल गया और उसी जगह पर ठेला लगाता रहा.

2-4 दिन बाद वही गुंडे फिर से आए और उन में से एक फट पड़ा, ‘‘ऐ बूढ़े, अपनी जान प्यारी नहीं है क्या? समझाया था न कि यह जगह हिंदुओं की है, सो अब यहां से हट कर कहीं और अपना ठेला लगाओ.’’

‘‘यह जमीन सरकारी है. यह सिर्फ हिंदुओं की नहीं, सब की है,’’ अब्दुल ने हिम्मत दिखाते हुए जवाब दिया.

अब्दुल के जवाब को सुन कर वे लोग तिलमिला उठे. वे अब्दुल से गालीगलौज करने लगे. उन में से एक ने अब्दुल को 2 थप्पड़ जड़ दिए.

यह मजमा देखने के लिए लोगों की भीड़ लग गई. भीड़ से एक दबी सी आवाज आई कि किसी निहत्थे आदमी को इस तरह मारना गलत है.

यह सुन कर नेताटाइप लड़का चिल्लाया, ‘‘हमारे हिंदू धर्म की बेइज्जती करता है. हम लोगों से ही इस की रोजीरोटी चलती है और ये हमारे ही देवीदेवता के बारे में अनापशनाप बकता?है.’’

उस लड़के की बात सुन कर अब्दुल अवाक रह गया. उस ने तो धर्म के नाम पर एक शब्द भी नहीं बोला था. वह अपने बचाव में कुछ कहना चाह रहा था. लेकिन कोई सुनने को तैयार ही नहीं था. लड़कों के लातमुक्कों से वह बेहोश हो रहा था.

अब्दुल ने हिंदू देवीदेवताओं की बेइज्जती की है, यह सुन कर भीड़ गुस्सा हो गई थी. हालांकि कुछ लोग अब्दुल को बचाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उन्हें भी विरोध का सामना करना पड़ रहा था.

अब्दुल बुरी तरह लहूलुहान हो कर सड़क के किनारे तड़प रहा था. भीड़ में से किसी ने अब्दुल को अस्पताल तक पहुंचा दिया. मरहमपट्टी करा कर अब्दुल एक बिस्तर पर लेट गया.

‘अगर राम नारायण या महेंद्र में से कोई वहां होता, तो उन लोगों की मजाल नहीं होती कि मुझे पीट सके. अपनी जवानी के दिनों में अपने दोस्तों साथ मिल कर न जाने कितनी शरारतें की थीं. बिरजू काका की तंबाकू चुरा कर दोस्तों के साथ हुक्का पीने का मजा ही कुछ और था,’ बिस्तर पर लेटेलेटे अब्दुल पुराने दिन याद कर रहा था.

इस वारदात की खबर मिलते ही अब्दुल के समुदाय के कुछ लोग उस से मिलने अस्पताल आए. अब्दुल के साथ हुई हैवानियत का बदला लेने के लिए उन में से कुछ लोग उतावले थे.

अब्दुल उन लोगों की मंशा समझ गया कि ये लोग सिर्फ अपने निजी फायदे को पूरा करने के लिए इस मौके का भुनाना चाह रहे हैं.

‘‘चाचाजान, आप हम लोगों के साथ सिर्फ खड़े रहो, फिर देखो कि हम खून का बदला खून से कैसे लेते हैं,’’ एक नौजवान गुस्से में बोल रहा था.

‘तो ये गुंडेटाइप के नेता हर जगह पैदा हो गए हैं. जब मैं लौकडाउन में गांव लौटा, तो इन में से किसी ने मेरी कोई खोजखबर नहीं ली. अब अपनी नेतागीरी चमकाने के लिए आज अचानक से ये मेरे हिमायती बन कर आ गए हैं,’ अब्दुल ने यह सोचते हुए आंखें बंद कर लीं और कोई जवाब नहीं दिया.

उन तथाकथित नेताओं को अब्दुल से कोई मदद नहीं मिली. वे बैरंग लौट गए.

2 हफ्ते के बाद अब्दुल को अस्पताल से छुट्टी मिली. अस्पताल से लौटते हुए उस ने देखा कि जिस जगह पर वह स्टाल लगाया करता था, वहां किसी और का स्टाल लगा हुआ था. वह समझ गया कि यह सारा तमाशा उस जगह को हथियाने के लिए किया गया था.

धर्म को तो बस हथियार बनाया गया. उस को इस बात का मलाल था कि उस की पिटाई उस अपराध के लिए हुई, जो उस ने कभी की ही नहीं थी. सिर्फ धर्म का नाम ले लेने पर कोई और उसे बचाने के लिए आगे नहीं आया.

वह यह भी समझ रहा था कि वहां मौजूद सभी लोग वैसे नहीं रहे होंगे, पर उन गुंडों के डर से किसी ने कुछ बोलने की हिम्मत नहीं दिखाई होगी.

नोएडा में काम करते हुए जब अब्दुल ने अखलाक और तबरेज की हत्या की वारदात के बारे में सुना था, तो उसे अपने गांवसमाज की याद आई थी. उसे गर्व होता था कि उस के गांव में सांप्रदायिकता की विषबेल नहीं फैली थी और ऐसी कोई उम्मीद भी नहीं थी.

अब्दुल हमेशा सपना देखा करता था कि कुछ पैसे कमा कर वह वापस अपने गांव चला जाएगा. लौकडाउन में अब्दुल उसी समाज के भरोसे परिवार समेत वापस आ गया था. पर वह समाज उसे अब कहीं दिखाई नहीं दे रहा था.

अब्दुल का दिल टूट गया था. गांव के नौजवान भी इस घटना का कुसूरवार उसे ही ठहरा रहे थे. भरे मन से अब्दुल ने परिवार समेत नोएडा वापस लौटने का फैसला किया.

ट्रेन में बैठने से पहले अब्दुल ने पीछे मुड़ कर भरे मन से अपने गांव की ओर देखा और फिर आंख पोंछते हुए अपनी सीट पर आ कर बैठ गया.

ट्रेन ने जैसे ही रफ्तार पकड़ी, अब्दुल के सब्र का बांध टूट गया. वह दहाड़ें मार कर रोने लगा.

लेखक – सुजीत सिन्हा

Funny Story : वीकली ऑफ – पति महोदय की फरमाइशें

Funny Story : साप्ताहिक छुट्टी के दिन खूब मजे करने के इरादे से सुबह उठते ही रवि ने किरण से   2-3 बढि़या चीजें बनाने को कहा और बताया कि उस के 2 दोस्त सपत्नीक हमारे घर लंच पर आ रहे हैं. इस से पहले कि किरण रवि से पूछ पाती कि नाश्ते में आज क्या बनाया जाए आंखें मलते हुए रवि के बेडरूम से आ रही रोजी और बंटी ने अपनी मम्मी को बताया कि वह इडली और डोसा खाना चाहते हैं.

पति और बच्चों की फरमाइशें सुन कर किरण रसोईघर में जाने के लिए उठी ही थी कि  उसे याद आया कि गैस तो खत्म होने को है.

‘‘रवि, स्कूटर पर जा कर गैस एजेंसी से सिलेंडर ले आओ, गैस खत्म होने वाली है. कहीं ऐसा न हो कि मेहमान घर आ जाएं और गैस खत्म हो जाए.’’

‘‘ओह, एक तो हफ्ते भर बाद एक छुट्टी मिलती है वह भी अब तुम्हारे घर के कामों में बरबाद कर दूं. तुम खुद ही रिकशे पर जा कर गैस ले आओ, मुझे अभी कुछ देर और सोने दो.’’

‘‘मैं कैसे ला सकती हूं, बच्चों के लिए अभी नाश्ता तैयार करना है और साढ़े 8 बज रहे हैं, अब और कितनी देर सोना है तुम्हें,’’ किरण ने अपनी मजबूरी जाहिर की.

‘‘जाओ यार यहां से, तंग मत करो, लाना है तो लाओ, नहीं तो खाना होटल से मंगवा लो, पर मुझे कुछ देर और सोने दो, वीकली रेस्ट का मजा खराब मत करो.’’

‘‘छुट्टी मनाने का तुम्हें इतना ही शौक है तो दोस्तों को दावत क्यों दी,’’ खीझते हुए किरण बोली और माथे    पर बल डालते हुए रसोई की तरफ बढ़ गई.

‘‘बहू, पानी गरम हो गया?’’ जैसे ही यह आवाज किरण के कानों में पड़ी उस का पारा और भी चढ़ गया, ‘‘पानी कहां से गरम करूं, पिताजी, गैस खत्म होने वाली है और रवि को छुट्टी मनाने की पड़ी है.’’

1 घंटे बाद रवि उठा और     गैस एजेंसी से गैस का सिलेंडर और मंडी से सब्जियां ला कर उस ने किरण के हवाले कर दीं.

‘‘स्नान कर के मैं तैयार हो जाता हूं,’’ रवि बोला, ‘‘कहीं पानी न चला जाए, बच्चे कहां हैं?’’

सिलेंडर आया देख किरण थोड़ी ठंडी हुई और फिर बोली, ‘‘बच्चे पड़ोस के बच्चों के साथ खेलने गए हैं,’’

‘‘चलो, अच्छा हुआ, तुम शांति से काम कर सकोगी, नाश्ता तो कर गए हैं न,’’ कहते हुए रवि बाथरूम में घुस गया.

‘‘नाश्ता कहां कर गए हैं, गैस तो चाय रखते ही खत्म हो गई थी,’’ किरण की आवाज रवि के बाथरूम का दरवाजा बंद करते ही टकरा कर लौट आई.

‘10 बजने को हैं, यह शांति अभी तक क्यों नहीं आई? सारे बर्तन साफ करने को पड़े हैं, कपड़ों से मशीन भरी पड़ी है,’ किरण मन ही मन बुदबुदाई.

‘‘रवि, जरा मीना के यहां फोन कर के पता करना, यह शांति की बच्ची अभी तक क्यों नहीं आई,’’ लेकिन बाथरूम में चल रहे पानी के शोर में किरण की आवाज दब कर रह गई.

स्नान कर के जैसे ही रवि बाथरूम से निकला तो देखा कि किरण बर्तन साफ करने में जुटी है. भूख ने उस के पारे को और बढ़ा दिया, ‘‘अब क्या खाना भी नहीं मिलेगा?’’

‘‘खाओगे किस में, एक भी बर्तन साफ नहीं है.’’

‘‘शांति कहां हैं, जब यह वक्त पर आ नहीं सकती तो किसी और को काम पर रख लो, कम से कम खाना तो वक्त पर मिले,’’ 2 अलगअलग बातों को एक ही वाक्य में समेटते हुए रवि बोला.

‘‘तुम से बोला तो था कि फोन कर के मीना के यहां से शांति के बारे में पूछ लो लेकिन तुम सुनते कब हो. अब छोड़ो, 5 मिनट इंतजार करो, मैं बना देती हूं तुम्हारे लिए कुछ खाने को.’’

‘‘बाबूजी ने नाश्ता कर लिया?’’ रवि ने पूछा.

‘‘हां, उन्हें दूध के साथ ब्रैड दे दी थी. वैसे भी वह हलका ही नाश्ता करते हैं.’’

नाश्ते से फ्री होते ही किरण बिना नहाएधोए रसोई में दोपहर का खाना बनाने में जुट गई.

‘‘आप के दोस्त आते ही होंगे, काम जल्दी निबटाना होगा. ऐसा करो, कम से कम तुम तो तैयार हो जाओ…और तुम ने यह क्या कुर्तापायजामा पहन रखा है, कम से कम कपड़े तो बदल लो.’’

‘‘अरे भई, कपड़े निकाल कर तो दो, और उन्हें आने में अभी 1 घंटा बाकी है.’’

‘‘अलमारी से कपड़े निकाल नहीं सकते. आप को तो हर चीज हाथ में चाहिए,’’ खीजती हुई किरण अलमारी से कपड़े भी निकालने लगी, ‘‘अभी सब्जियां काटनी हैं, आटा गूंधना है, कितना काम बाकी है.’’

सब्जियां गैस पर चढ़ा कर किरण नहाने चली गई. बच्चों को भी नहला कर किरण ने तैयार कर दिया.

थोड़ी देर बाद ही रवि के दोस्त अपने बीवीबच्चों के साथ घर आ गए. हाल में बैठा कर रवि उन की खातिरदारी में लग गया. किरण, पानी लाना, किरण, खाना लगा दो, किरण, ये ला दो, वो ला दो के बीच चक्कर लगातेलगाते किरण थक चुकी थी लेकिन रवि की फरमाइशें पूरी नहीं हो रही थीं.

शाम 4 बजे जब सारे मेहमान चले गए तब जा कर कहीं किरण ने चैन की सांस ली.

वह थोड़ी देर लेटना चाहती थी लेकिन तभी बाबूजी की आवाज ने उस के लेटने के अरमान पर पानी फेर दिया, ‘‘बहू, जरा चाय तो बना दो, सोचता हूं थोड़ी दूर टहल आऊं.’’

किरण ने चाय बना कर जैसे ही बाबूजी को दी कि बच्चे उठ गए, रवि सो चुका था. बच्चों को कुछ खिलापिला कर अभी उसे थोड़ी फुर्सत हुई थी कि काम वाली शांति बाई ने बेल बजा कर उस के चैन में खलल डाल दिया.

शांति को देखते ही किरण भड़क उठी, ‘‘क्या शांति, यह तुम्हारे आने का टाइम है. सारा काम मुझे खुद करना पड़ा. नहीं आना होता है तो कम से कम बता तो दिया करो, तुम्हें मालूम है कि कितनी परेशानी हुई आज,’’ एक ही सांस में किरण बोल गई.

‘‘क्या करूं बीबीजी, आज मेरे मर्द को काम पर नहीं जाना था, सो कहने लगा कि आज तू मेरे पास रह,’’ शांति ने अपनी रामकहानी सुनानी शुरू कर दी.

‘‘चल छोड़ अब रहने दे, जल्दी से कपड़े धो ले, पानी आ गया, सारे कपड़े गंदे हो गए हैं,’’ 2 घंटे शांति के साथ कपड़े धुलवाने और साफसफाई करवाने के बाद किरण डिनर बनाने में जुट गई. सब को खाना खिला कर जब रात को वह बिस्तर पर लेटी तो रवि अपनी रूमानियत पर उतर आया.

‘‘अब तंग मत करो, सो जाओ चुपचाप, मैं भी थक गई हूं.’’

‘‘क्या थक गई हूं, रोज तुम्हारा यही हाल है. कम से कम छुट्टी वाले दिन तो मान जाया करो.’’

‘‘छुट्टी, छुट्टी, छुट्टी, तुम्हारी तो छुट्टी है, पर मुझ से क्यों ट्रिपल शिफ्ट में काम करवा रहे हो?’’

Short Story : आशीर्वाद – क्या हुआ नीलम की कहानी का अंजाम

Short Story : नीलम ने आलोक के लिए चाय ला कर मेज पर रख दी और चुपचाप मेज के पास पड़ी कुरसी पर बैठ केतली से प्याले में चाय डालने लगी. आलोक ने नीलम के झुके हुए मुख पर दृष्टि डाली. लगता था, वह अभीअभी रो कर उठी है. आलोक रोजाना ही नीलम को उदास देखता है. वैसे नीलम रोती बहुत कम है. वह समझता है कि नीलम के रोने का कारण क्या हो सकता है, इसलिए उस ने पूछ कर नीलम को दोबारा रुलाना ठीक नहीं समझा. उस ने कोमल स्वर में पूछा, ‘‘मां और पिताजी ने चाय पी ली?’’ ‘‘नहीं,’’ नीलम के स्वर में हलका सा कंपन था.

‘‘क्यों?’’ ‘‘मांजी कहती हैं कि उन्हें इस कदर थकावट महसूस हो रही है कि चाय पीने के लिए बैठ नहीं सकतीं और पिताजी को चाय नुकसान करती है.’’

‘‘तो पिताजी को दूध दे देतीं.’’ ‘‘ले गई थी, किंतु उन्होंने कहा कि दूध उन्हें हजम नहीं होता.’’

आलोक चाय का प्याला हाथ में ले कर मातापिता के कमरे की ओर जाने लगा तो नीलम धीरे से बोली, ‘‘पहले आप चाय पी लेते. तब तक उन की थकान भी कुछ कम हो जाती.’’ ‘‘तुम पियो. मेरे इंतजार में मत बैठी रहना. मां को चाय पिला कर अभी आता हूं.’’

नीलम ने चाय नहीं पी. गोद में हाथ रखे खिड़की से बाहर देखती रही. काश, वह भी हवा में उड़ते बादलों की तरह स्वतंत्र और चिंतारहित होती. नीलम के पिता एक सफल डाक्टर थे. पर उन की सब से बड़ी कमजोरी यह थी कि वे किसी को कष्ट में नहीं देख सकते थे. जब भी कोई निर्धनबीमार उन के पास आता तो वे उस से फीस का जिक्र तक नहीं करते, बल्कि उलटे उसे फल व दवाइयों के लिए कुछ पैसे अपने पास से दे देते. परिणाम यह हुआ कि वे जितना काम व मेहनत करते थे उतना धन संचित नहीं कर पाए. फिर उन की लंबी बीमारी चली, जो थोड़ाबहुत धन था वह खत्म हो गया.

उन की मृत्यु के बाद सिर्फ एक मकान के अलावा और कोई संपत्ति नहीं बची थी. सब से बड़ी बहन होने के नाते नीलम ने घर का भार संभालना अपना कर्तव्य समझा. उस ने एक स्कूल में अध्यापिका की नौकरी कर ली. छोटी बहन पूनम मैडिकल कालेज में चौथे साल में थी और भाई अनुनय बीए द्वितीय वर्ष में. आलोक ने जब नीलम के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा तो उस ने साफ इनकार कर दिया था. उस का कहना था कि जब तक पूनम पढ़ाई पूरी कर के कमाने लायक नहीं हो जाती, तब तक वह विवाह की बात सोच भी नहीं सकती. इस पर आलोक ने आश्वासन दिया था कि विवाह में वह कुछ खर्च न होने देगा और विवाह के पश्चात भी नीलम अपना वेतन घर में देने के लिए स्वतंत्र होगी. आलोक का यह तर्क था कि वह एक मित्र के नाते उस के परिवार के प्रति सबकुछ नहीं कर सकता जो परिवार का सदस्य बन जाने के पश्चात कर सकेगा.

यह तर्क नीलम को भी ठीक लगा था. कभीकभी अपनी चिंताओं के बीच वह खुद को बहुत ही अकेला व असहाय सा पाती थी. उस ने सोचा यदि उसे आलोक जैसा साथी, जो उस की भावनाओं को अच्छी तरह समझता है, मिल गया तो उस की चिंताएं कम हो जाएंगी. फिर भी नीलम की आशंका थी कि अकेली संतान होने के कारण आलोक से उस के मातापिता को बहुत सी आशाएं होंगी और इसलिए शायद उन्हें दहेजरहित लड़की को अपनी बहू बनाने में आपत्ति हो सकती है, पर आलोक ने इस बात को भी टाल दिया था. उस का कहना था कि उस के मातापिता उसे इतना अधिक प्यार करते हैं कि उस की इच्छा के सामने वे दहेज जैसी बात पर सोचेंगे भी नहीं.

आलोक के पिता प्रबोध राय एक साधारण औफिस असिस्टैंट की हैसियत से ऊपर न उठ सके थे. आलोक उन की आशाओं से बहुत अधिक उन्नति कर गया था. घर के रहनसहन का स्तर भी ऊंचा उठ गया था. आलोक सोचता था कि उस के मातापिता उस की अर्जित आय से ही इतने अधिक संतुष्ट हैं कि नीलम के वेतन की आवश्यकता अनुभव नहीं करेंगे. यही उस की भूल थी, जिसे वह अब समझ पाया था. उस के मातापिता ने पुत्र का विवाह बिना दहेज लिए केवल इसलिए किया था कि बहू अपने वेतन से वह कमी पूरी कर देगी. जब उन की वह आशा पूरी नहीं हुई तो वे क्षुब्ध हो उठे. उन्हें इस भावना ने जकड़ लिया कि उन्हें धोखा दिया गया. आलोक कमरे में पहुंचा तो उस की मां सुमित्रा अपने पलंग पर लेटी हुई थीं. प्रबोध राय पास ही पड़ी कुरसी पर बैठे समाचारपत्र देख रहे थे. आलोक बोला, ‘‘मां, नीलम कह रही थी कि आप थकान महसूस कर रही हैं. चाय पी लीजिए, थकान कुछ कम हो जाएगी.’’

‘‘रहने दे बेटा, चाय के लिए मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है.’’ ‘‘तो बताइए फिर क्या लेंगी? नीलम पिताजी के लिए मौसमी का रस निकाल रही है, आप के लिए भी निकाल देगी.’’

‘‘रहने दे, मैं रस नहीं पिऊंगी. मैं तेरी मां हूं. क्या मुझे अच्छा लगता है कि मैं अपने खर्चे बढ़ाबढ़ा कर तेरे ऊपर बोझ बन जाऊं? क्या करूं, उम्र से मजबूर हूं. अब काम नहीं होता.’’ ‘‘तो फिर क्यों नहीं नीलम को रोटी बनाने देतीं? वह तो कहती है कि सुबह आप दोनों के लिए पूरा भोजन बना कर स्कूल जा सकती है.’’

‘‘कैसी बातें कर रहा है, आलोक? 7 बजे का पका खाना 12 बजे तक बासी नहीं हो जाएगा? तू ने कभी अपने पिताजी को ठंडा फुलका खाते देखा है?’’ फिर एक ठंडी सांस ले मां बोलीं, ‘‘मांबाप पुत्र का विवाह कितने अरमानों से करते हैं. घर में बहू आएगी, रौनक होगी. शरीर को आराम मिलेगा,’’ फिर एक और लंबी सांस छोड़ कर बोलीं, ‘‘खैर, इस में किसी का क्या दोष? अपनाअपना समय है. श्यामसुंदर लाल 25 लाख रुपए नकद और एक कार देने का वादा कर रहे थे.’’

‘‘कैसी बातें करती हो, मां? जो लड़की इतनी रकम ले कर आती वह क्या आप को रस निकाल कर देती? कार में उसे फिल्में दिखाने और शौपिंग कराने में ही मेरा आधे से ज्यादा वेतन स्वाहा हो जाता. ऊपर से उस के उलाहने सुनने को मिलते कि उस के मायके में तो इतने नौकरचाकर काम करते थे. और मां, यदि मेरा विवाह अभी हुआ ही न होता तो क्या होता? यदि नीलम कुछ लाई नहीं, तो वह अपने ऊपर खर्च भी तो कुछ नहीं कराती. तुम से इतनी बार मैं ने कहा है कि नौकर रख लो, पर तुम्हें तो नौकर के हाथ का खाना ही पसंद नहीं. अब तुम ही बताओ कि यह समस्या कैसे हल हो?’’ सुमित्रा के पास जो समाधान था, वह उस के बिना बताए भी आलोक जानता था, सो, वह चुप रही. आलोक ही फिर बोला, ‘‘थोड़े दिन और धीरज रखो, मां, पूनम ने आखिरी वर्ष की परीक्षा दे दी है. अब उस का खर्च तो समाप्त हो ही जाएगा. अनुनय भी 1-2 वर्ष में योग्य हो जाएगा और उस के साथ नीलम का उस का उत्तरदायित्व भी खत्म हो जाएगा. वह नौकरी छोड़ देगी.’’

‘‘अरे, एक बार नौकरी कर के कौन छोड़ता है? फिर वह इसलिए धन जमा करती रहेगी कि बहन का विवाह करना है.’’

आलोक हंस कर बोला, ‘‘इतने दूर की चिंता आप क्यों करती हैं मां? पूनम डाक्टर बन कर स्वयं अपने विवाह के लिए बहुत धन जुटा लेगी.’’ ‘‘मुझे तो तेरी ही चिंता है. तेरे अकेले के ऊपर इतना बोझ है. मुझे तो छोड़ो, इन्हें तो फल इत्यादि मिलने ही चाहिए, नहीं तो शरीर कैसे चलेगा?’’

तभी नीलम 2 गिलासों में मौसमी का जूस ले कर कमरे में आई. आलोक हंस कर बोला, ‘‘देखो मां, तुम तो केवल पिताजी की आवश्यकता की बात कह रही थीं, नीलम तो तुम्हारे लिए भी जूस ले आई है. अब पी लो. नीलम ने इतने स्नेह से निकाला है. नहीं पिओगी तो उस का दिल दुखेगा.’’ इस प्रकार की घटनाएं अकसर होती रहतीं. मां का जितना असंतोष बढ़ता जाता है, आलोक का पत्नी के प्रति उतना ही मान और अनुराग. विवाह के पश्चात नीलम ने एक बार भी सुना कर नहीं कहा कि आलोक ने उसे जो आश्वासन दिए थे वे निराधार थे. उस ने कभी यह नहीं कहा कि आलोक के मातापिता की तरह उस के मातापिता ने भी उसे योग्य बनाने में उतना ही धन खर्च किया था. तब क्या उस का उन के प्रति इतना भी कर्तव्य नहीं है कि वह अपने बहनभाई को योग्य बनाने में सहायता करे. वह तो अपने सासससुर को संतुष्ट करने में किसी प्रकार की कसर नहीं छोड़ती. स्कूल से आते ही घरगृहस्थी के कार्यों में उलझ जाती है.

कभी उस ने पति से कोई स्त्रीसुलभ मांग नहीं की. अपने मायके से जो साडि़यां लाई थी, अब भी उन्हें ही पहनती, पर उस के माथे पर शिकन तक नहीं आती थी. नीलम ने सरलता से परिस्थितियों से समझौता कर लिया था, उसे देख आलोक उस से काफी प्रभावित था. यही बात वह अपने मातापिता को समझाने का प्रयत्न करता था, किंतु वे तो जैसे समझना ही नहीं चाहते थे. वे घर के खर्चों को ले कर घर में एक अशांत वातावरण बनाए रखते, केवल इसलिए कि वे बहू को यह बतलाना चाहते थे कि वह अपने बहनभाई के ऊपर जो धन खर्च करती है वह उन के अधिकार का अपहरण है. नीलम स्कूल के लिए तैयार हो रही थी. उसे सास की पुकार सुनाई दी तो बाहर निकल आई. पड़ोस के 2 लड़कों ने उन्हें बताया कि प्रबोध राय जब अपने नियम के अनुसार सुबह की सैर के बाद घर लौट रहे थे, तब एक स्कूटर वाला उन्हें धक्का दे कर भाग निकला और वे सड़क पर गिरे पड़े हैं. नीलम तुरंत घटनास्थल पर पहुंची. ससुर बेहोश पड़े थे. नीलम कुछ लोगों की सहायता से उन्हें उठा कर घर लाई.

उस ने जल्दी से पूनम को फोन किया, पूनम ने कहा कि वे चिंता न करें, वह जल्दी ही एंबुलेंस ले कर आ रही है. नीलम ने छुट्टी के लिए स्कूल फोन कर दिया और घर आ कर अस्पताल के लिए जरूरी सामान रखने लगी. तभी पूनम आ गई. जितनी तत्कालीन चिकित्सा करना संभव था, उस ने की और उन्हें अस्पताल ले गई.

पूनम अपने स्वभाव व व्यवहार के कारण पूरे अस्पताल में सर्वप्रिय थी. यह जान कर कि उस का कोई निकट संबंधी अस्पताल में भरती होने आया है, उस के मित्रों और संबंधित डाक्टरों ने सब प्रबंध कर दिए. घबराहट के कारण सुमित्रा को लग रहा था कि वह शक्तिरहित होती जा रही है. सारे अस्पताल में एक हलचल सी मची हुई थी. वह कभी सोच भी नहीं सकती थी कि कभी उस के रिटायर्ड पति को इस प्रकार का विशेष इलाज उपलब्ध हो सकेगा. बीचबीच में नीलम आ कर सास को धीरज बंधाने का प्रयत्न करती.

आलोक औफिस के कार्य से कहीं बाहर गया हुआ था. नीलम ने उसे भी इस घटना की सूचना दे दी. अनुनय समाचार पाते ही तुरंत आ गया था. दवाइयों के लिए भागदौड़ वही कर रहा था. मदद के लिए उस के एक मित्र ने उसे अपनी कार दे दी थी. 5-6 घंटे बाद प्रबोध राय कमरे में लाए गए. पूनम ने बारबार नीलम की सास को तसल्ली दी कि प्रबोध राय जल्दी ही ठीक हो जाएंगे. वातावरण में एक ठहराव सा आ गया था. सुमित्रा ने कमरे में चारों ओर देखा. अस्पताल में इतना अच्छा कमरा तो काफी महंगा पड़ेगा. जब उस ने अपनी शंका व्यक्त की तब अनुनय बोला, ‘‘मांजी, आप 2 बेटों की मां हो कर खर्च की चिंता क्यों करती हैं? मेरे होते यदि आप को किसी प्रकार का कष्ट हो तो मैं बेटा होने का अधिकार कैसे पाऊंगा?’’

नीलम हंस कर बोली, ‘‘मांजी, आज इस ने पिताजी को अपना रक्त दिया है न, इसीलिए यह बढ़बढ़ कर आप का बेटा होने का दावा कर रहा है.’’ यह सुन सुमित्रा की आंखें छलछला आईं. वे सोच रही थीं कि यदि नीलम ने बहन की पढ़ाई में सहायता न की होती तो क्या आज पूनम डाक्टर होती और क्या उस के पति को ये सुविधाएं मिल पातीं, श्यामसुंदर लाल का पुत्र क्या अपनी बहन को दहेज के बाद उस के ससुर को खून देने की बात सोचता?

प्रबोध राय जब घर आए, तब तक सुमित्रा की मनोस्थिति बिलकुल बदल चुकी थी और सारी कमजोरी भी गायब हो चुकी थी. रात को पति को जल्दी भोजन करा कर वे नीलम के लिए कार्डीगन बुन रही थीं. तभी उन्हें अनुनय के आने की आवाज सुनाई दी. प्रसन्नता से उन का मुख उज्ज्वल हो उठा. अनुनय ने एक डब्बा ला कर उन के पैरों के पास रख दिया और पूछने पर बोला, ‘‘मांजी, मैं ने एक पार्टटाइम जौब कर लिया है. पहला वेतन मिला तो आप से आशीर्वाद लेने चला आया.’’

यह सुन कर सुमित्रा चकित रह गईं. वे रुष्ट हो कर बोलीं, ‘‘क्या तेरा दिमाग खराब हुआ है? पढ़ना नहीं है, जो पार्टटाइम जौब करेगा?’’ ‘‘पढ़ाई में इस से कुछ अंतर नहीं पड़ता, मां. बेशक अब आवारागर्दी का समय नहीं मिलता.’’

‘‘मैं तेरी बात नहीं मानूंगी. जब तक तू नौकरी छोड़ने का वादा नहीं करेगा, मैं इस डब्बे को हाथ भी नहीं लगाऊंगी.’’ ‘‘और मांजी, आप तो जीजाजी से भी ज्यादा धमकियां दे रही हैं. चलिए, मैं ने आप की बात मान ली. अब शीघ्र डब्बा खोलिए,’’ अनुनय ने आतुरता से कहा.

डब्बा खोला तो सुमित्रा स्तब्ध रह गईं और डबडबाई आंखों से बोलीं, ‘‘पगले, मैं बुढि़या यह साड़ी पहनूंगी? अपनी जीजी को देता न?’’ ‘‘पहले मां, फिर बहन. अच्छा मांजी, अब जल्दी से आशीर्वाद दे दो,’’ और अनुनय ने सुमित्रा का हाथ अपने सिर पर रख लिया. सुमित्रा हंसे बिना न रह सकीं, ‘‘तू तो बड़ा शातिर है, आशीर्वाद लेने के लिए भी रिश्वत देता है. तुम सब भाईबहन सदा प्रसन्न रहो और दूसरों को प्रसन्न रखो, मैं तो कामना करती हूं.’’

Family Story : उस का घर – दिलों के विभाजन की गंध

Family Story : बहुत अजीब थी वह सुबह. आवाजरहित सुबह. सबकुछ खामोश. भयानक सन्नाटा. किसी तरह ही आवाज का नामोनिशान न था. उस ने हथेलियां रगड़ीं, सर्दी के लिए नहीं, सरसराहट की आवाज के लिए. खिड़की खोली, सोचा, हवा के झोंके से ही कोई आवाज हो सकती है. लकड़ी के फर्श पर भी थपथपाया कि आवाज तो हो. कुछ भी, कहीं से सुनाई तो पड़े. पेड़ भी सुन्न खड़े थे, आवाजरहित.

उस ने अपनी घंटी बजाई, थोड़ी आवाज हुई…आवाज होती थी, मर जाती थी, कोई अनुगूंज नहीं बचती थी. ये कैसे पेड़ थे. कैसी हवा थी, हरकतरहित जिस में न सुर, न ताल. उस ने खांस कर देखा. खांसी भी मर गई थी जैसे प्रेरणा, उस की दोस्त…अब उस की कभी आवाज नहीं आएगी. वह क्या गई, मानो सबकुछ अचानक मर गया हो. यह सोच कर उस के हाथपैर ठंडे पड़ने लगे. शायद वह प्रेरणा की मौत की खबर को सहन नहीं कर पा रहा था. पिछले सप्ताह ही तो मिली थी उसे वह.

अब तक तो अंतिम संस्कार भी हो गया होगा. हैरान था वह खुद पर. अब तक हिम्मत क्यों नहीं जुटा पाया उस के घर जाने की. शायद लोगों को उस की मौत का मातम मनाते देख नहीं सकता था, या फिर प्रेरणा की छवि जो उस के जेहन में थी उसे संजो कर रखना चाहता था.

अंतिम संस्कार हुए 4 दिन हो चुके थे. तैयार हो कर उस ने गैराज से कार निकाली और भारी मन से चल दिया. रास्तेभर यही सोचता रहा, वहां जा कर क्या कहेगा. आज तक वह किसी शोकाकुल माहौल में गया नहीं. वह नहीं जानता था कि ऐसी स्थिति में क्या कहना चाहिए, क्या करना चाहिए. यही सोचतेसोचते प्रेरणा के घर की सड़क भी आ गई. उस का दिल धड़कने लगा. दोनों ओर कतारों में पेड़ थे. उस का मन तो धुंधला था ही, धुंध ने वातावरण को भी धुंधला कर दिया था. उस ने अपना चश्मा साफ किया, बड़ी मुश्किल से उस के घर का नंबर दिखाई दिया. घर बहुत अंदर की तरफ था. उस ने कार बाहर ही पार्क कर दी. कार से पांव बाहर रखते ही उस के पांव साथ देने से इनकार करने लगे. बाहर लगे लोहे के गेट की कुंडी हटाते ही, लोहे के टकराव से, कुछ क्षणों के लिए वातावरण में एक आवाज गूंजी. वह भी धीरेधीरे मरती गई. पलभर को उसे लगा, मानो प्रेरणा सिसकियां भर रही हो…

वहां 3 कारें खड़ी थीं. घर के चारों ओर इतने पेड़ लगे थे कि उस के मन के अंधेरे और बढ़ने लगे. एक भयानक नीरवता चारों ओर घिरी थी. लगता था हमेशा की तरह ब्रिटेन की मरियल धूप कहीं दुबक कर बैठ गई थी. बादल बरसने को तैयार थे.

मन के भंवर में धंसताधंसता न जाने कब और कैसे उस के दरवाजे पर पहुंचा. दिल की धड़कन बढ़ने लगी. एक पायदान दरवाजे के बाहर पड़ा था. उस ने जूते साफ किए और गहरी सांस ली. उस ने घंटी बजाने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि दरवाजा खुला. शायद लोहे के गेट की गुंजन ने इत्तला दे दी होगी. प्रेरणा के पति ने उस के आगे बढ़े हाथ को अनदेखा कर, रूखेपन से कहा, ‘‘अंदर आओ.’’

उस ने अपना हाथ पीछे करते कहा, ‘‘आई एम राहुल. प्रेरणा और मैं एक ही कंपनी में काम करते थे.’’

‘‘आई एम सुरेश, बैठो,’’ उस ने सोफे की ओर इशारा करते कहा.

सोफे पर बैठने से पहले राहुल ने नजरें इधरउधर दौड़ाईं और कुछ बिखरी चीजें सोफे से हटा कर बैठ गया. राहुल को विश्वास नहीं हुआ, हैरान था वह, क्या सचमुच यह प्रेरणा का घर है. यहां तो उस के व्यक्तित्व से कुछ भी तालमेल नहीं खाता. दीवारें भी सूनीसहमी खड़ी थीं. उन पर न कोई पेंटिंग, न ही कोई तसवीर. अखबारों के पन्ने, कुशन यहांवहां बिखरे पड़े थे. टैलीविजन व फर्नीचर पर धूल चमक रही थी. बीच की मेज पर पड़े चाय के खाली प्यालों में से चाय के सूखे दाग झांकझांक कर अपनी मौजूदगी का एहसास करा रहे थे.

हर तरफ वीरानगी थी. लगता था मानो घर की दीवारें तक मातम मना रही हों. दिलों के विभाजन की गंध सारे घर में फैली थी. अचानक उस की नजर एक कोने में बैठे 2 उदास कुत्तों पर पड़ी जो सिर झुकाए बैठे थे. शायद वे भी प्रेरणा की मौत का मातम मना रहे थे.

‘‘राहुल, चाय?’’

‘‘नहींनहीं, चाय की आवश्यकता नहीं, आ तो मैं पहले ही जाता, सोचा, अंतिम संस्कार के बाद ही जाऊंगा, तब तक लोगों का आनाजाना कुछ कम हो जाएगा.

‘‘वैसे, प्रेरणा ने आप का जिक्र तो कभी किया नहीं. हां, अगर आप पहले आ जाते तो अच्छा ही रहता, आप का नाम भी उस के चाहने वालों की सूची में आ जाता. सच पूछो तो मैं नहीं जानता था कि हिंदी में कविता और कहानियों की इतनी मांग है. क्या आज के युग में भी सभ्य इंसान हिंदी बोलता या पढ़ता है?’’ प्रेरणा के पति ने बड़े पस्त और व्यंग्यात्मक लहजे में कहा.

‘‘प्रेरणा तो बहुत अच्छा लिखती थी. उस की एकएक कविता मन को छू लेने वाली है. व्यक्तिगत दुखसुख व प्रेम के रंगों की सुगंध है. ऐसी संवदेनाएं हैं जो पाठकों व श्रोताओं को आपबीती लगती हैं. आप ने तो पढ़ी होंगी,’’ राहुल ने कहा.

इतना सुनते ही एक कुटिल छिपी मुसकराहट उस के चेहरे पर फैल गई. उस ने राहुल की बात को तूल न देते हुए संदर्भ बदल कर कहना शुरू किया, ‘‘अच्छा हुआ, आप वहां नहीं थे. कैसे बेवकूफ बना गई वह मुझे, मैं जान ही नहीं पाया कि मेरी पार्टनर कितनी फ्लर्ट थी. कितने दोस्त आए थे अंतिम संस्कार के मौके पर. उस वक्त हमारे परिवार का समाज के सामने नजरें उठाना दूभर हो गया था. उम्रभर मना करता रहा, ऐसी प्रेमभरी कविताएं मत लिखो, बदनामी होगी, लोग क्या कहेंगे. वही हुआ जिस का डर था. लोग कानाफूसी कर रहे थे, बुदबुदा रहे थे, ‘पति हैं, बच्चे हैं…’ किस के लिए लिखती थी?’’ इतना कह कर कुछ क्षण वह चुप रहा, फिर बिफरता सा बोला, ‘‘राहुल, कहीं वह तुम्हारे लिए तो…’’ उस की जबान बेलगाम चलती रही.

राहुल हैरान था, क्या यह वही दरिंदा है जिस से वह एक बार कंपनी के सालाना डिनर पर मिला था. राहुल कसमसाता रहा, तय नहीं कर पा रहा था कि उस की प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए. पलभर को उस का मन किया कि उठ कर चला जाए, फिर मन को समझाते बुदबुदाया, ‘मैं उस के स्तर पर नहीं गिर सकता.’ वक्त की नजाकत को देखते वह गुस्से को पी गया. मन में तो उस के आया कि इस पत्थरदिल से साफसाफ कह दे, हां, हां, था रिश्ता.

मानवता के रिश्ते को जो नाम देना चाहो, दे दो. जीवन का सच तो यह है कि प्रेरणा मेरे जीवन में रोशनी बन कर आई थी और आंसू बन कर चली गई.

वहां बैठेबैठे राहुल को एक घंटा हो चुका था. अभी तक घर में अक्षुब्ध शांति थी. चुप्पी को भंग करते राहुल ने पूछ ही लिया, ‘‘सर, बच्चे दिखाई नहीं दे रहे?’’

‘‘श्रुति तो कालेज गई है, रुचि सहेलियों के साथ बाहर गई है. सारा दिन घर में बैठ कर करेगी भी क्या. मैं उस की मां की मौत को बड़ा मुद्दा बना कर उन की पढ़ाई में विघ्न नहीं डालना चाहता. घर को बिखरते नहीं देख सकता. मेरा घर मेरे लिए सबकुछ है, इसे बनाने में मैं ने बहुत पैसा और जान लगाई है. प्रेरणा ने तो पीछा छुड़ा लिया है सभी जिम्मेदारियों से. बच्चों की पढ़ाई, विवाह, घर का लोन सब मुझे ही तो चुकाना है. इस के लिए पैसा भी तो चाहिए,’’ वह भावहीन बोलता गया.

राहुल ने सबकुछ जानते हुए भी विरोध का नहीं, मौन के हथियार को अपनाना सही समझा. सोचने लगा, जो तुम नहीं जानते, मैं वह जानता हूं. मैं ने ही तो करवाया था प्रेरणा के मकान के लिए इतना बड़ा लोन सैंक्शन. फिर लोन का इंश्योरैंस कराने के लिए उसे बाध्य भी किया. इस सुरेश पाखंडी ने प्रेरणा को बदले में क्या दिया? आंसू, यातनाएं, उम्रभर आजादी से कलम न उठा पाने की बंदिशें? एक मैं ही था जिसे वह पति के नुकीले शब्दों के कंकड़ों से पड़े दाग दिखा सकती थी. उस की हंसी तक खोखली हो चुकी थी. अकसर वह कहती थी कि उसे अपना घर कभी अपना नहीं लगा. वह सीखती रही अशांति में भी शांति से जीने की कला. वह खुद पर मुखौटा चढ़ा कर उम्रभर खुद को धोखा देती रही.

राहुल की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. वह प्रेरणा की लिखनेपढ़ने की जगह देखने को उतावला हो रहा था. अभी तक उसे कोई सुराग नहीं मिला था. कभी बाथरूम इस्तेमाल करने का बहाना कर के दूसरे कमरों में झांक कर देखा, कहीं भी स्टडी टेबल दिखाई नहीं दी. राहुल टटोलता रहा. चाय पीतेपीते जब राहुल से रहा नहीं गया, तो हिम्मत बटोर कर उस ने पूछ ही लिया, ‘‘सर, क्या मैं प्रेरणा का अध्ययन करने का स्थान देख सकता हूं. आई मीन, जहां बैठ कर वह पढ़ालिखा करती थी?’’

‘‘क्यों नहीं,’’ वह व्यंग्यात्मक लहजे में बोला, ‘‘आओ मेरे साथ, वह देखो, सामने,’’ उस ने गार्डन में एक खोके की ओर इशारा किया और फिर बोला, ‘‘वह जो आखिर में कमरा है वही था उस का स्टडीरूम.’’

राहुल भलीभांति जानता था कि जिसे वह कमरा कह रहा है वह कमरा नहीं, 5×8 फुट का लकड़ी का शैड है. मुरगीखाने से भी छोटा. शैड को खोलते ही राहुल का दिमाग चकरी की तरह घूमने लगा. शैड के चारों और मकड़ी के जाले लगे थे. सीलन की गंध पसरी थी. शैड फालतू सामान से भरा था. उस की दीवारों पर फावड़ा, खुरपी, कैंची, फौर्क वगैरह टंगे थे.

एकदो पुराने सूटकेस और पेंट के खाली डब्बे पड़े थे. आधा हिस्सा तो घास काटने वाली मशीन ने ले लिया था, बाकी थोड़ी सी जगह में पुराना लोहे का बुकशैल्फ था, जिस पर शायद प्रेरणा किताबें, पैन, पेपर रखती रही होगी. कुछ मोमबत्तियां और बैट्री वाली हैलोजन की बत्तियां पड़ी थीं. दीवार से टिकी 2 फुट की फोल्ंिडग मेज और फोल्ंिडग गार्डनकुरसी पड़ी थीं. एक छोटा सा पोर्टेबल हीटर भी पड़ा था. फर्श पर चूहे व कीड़ेमकोडे़ दौड़ रहे थे. बिजली का वहां कोई प्रबंध नहीं था. हां, एक छोटी सी प्लास्टिक की खिड़की जरूर थी जहां से दिन की रोशनी झांक रही थी. अविश्वसनीय था कि कैसे एक इंसान दूसरे से किस हद तक क्रूर हो सकता है.

डरतेडरते राहुल ने उस से पूछ ही लिया, ‘‘भला बिना बिजली के कैसे लिखती होगी? डर भी तो लगता होगा?’’

‘‘डर, वह सामने 2 कुत्ते देख रहे हो, प्रेरणा के वफादार कुत्ते. उस की किसी चीज को हाथ लगा कर तो देखो, खाने को दौड़ पड़ेंगे.

‘‘प्रेरणा के अंगरक्षक या बौडीगार्ड, जो चाहे कह लो. यह कहावत तो सुनी होगी तुम ने, ‘जहां चाह वहां राह? मेरे सामने उसे लिखने की इजाजत ही कहां थी. मुझे तो बच्चों की मां और मेरी पत्नी चाहिए थी, लेखिका नहीं. मैं नहीं चाहता था मेरे घर में कविताओं के माध्यम से प्रेम का इजहार हो. देखो न, अब बेकार हैं उस की सब किताबें. कौन पढ़ना चाहेगा इन्हें? बच्चे तो पढ़ेंगे नहीं. नौकर से कह कर बक्से में रखना ही है. तुम चाहो तो ले जा सकते हो वरना रद्दी वाला ले जाएगा या फिर मैं गार्डन में लोहड़ी जला दूंगा,’’ उस ने क्रूरता से कहा.

राहुल को लगा उस के कानों में किसी ने किरचियां डाल दी हों. राहुल उसे कह भी क्या सकता था, वह प्रेरणा का पति था. बस, बड़बड़ाता रहा, ‘जा, थोड़ा सा दिल खरीद कर ला, कैसा मर्द है समानता का दर्जा तो क्या, उसे उस के हिसाब से जीने का हक तक न दे सका. तुम क्या जानो कुबेर का खजाना. लेखन का भी एक अनूठा नशा होता है. पत्रिका या किताबों पर अपना नाम देख कर अपने लिखे शब्दों को देख कर जो शब्द धुएं की तरह मन में उठते हैं और हमेशा के लिए कागज पर अंकित हो जाते हैं, दुनिया में कोई और चीज उन से अधिक स्थायी नहीं हो सकती.’

‘‘सर, कुछ किताबें तो रख लेते यादगार के लिए.’’

‘‘यादगार, बेकार की बातें क्यों करते हो. औरत भी कोई याद रखने की चीज है क्या. हां, प्रेरणा ने 2 बच्चियां जरूर दी हैं, उन के लिए मैं आभारी हूं. जानवर भी घर में रहता है तो उस से मोह हो ही जाता है.’’

राहुल अब वहां पलभर भी रुकना नहीं चाहता था. सोचने लगा, इतनी तौहीन, कठोर शब्दों के बाण. शाबाशी है प्रेरणा को, जो ऐसी बंदिशों व घुटनभरी जिंदगी की रेलपेल से पिस्तेपिस्ते भी अपना काम करती रही.

भारी मन से गार्डन से अंदर आतेआते राहुल का पांव हाल में पड़े एक खुले गत्ते के डब्बे से टकराया, जिस में से प्रेरणा का सभी सामान और ट्रौफियां उचकउचक कर झांक रहे थे.

‘‘लगी तो नहीं तुम्हें? मैं तो इन्हें देख कर आपे से बाहर हो जाता हूं. नौकर से कह कर इन्हें बक्से में रखवा दिया है. इन्हें कबाड़ी वाले को धातु के भाव दे दूंगा.’’

उस की हृदयहीन बातें राहुल के हृदय को बींधती रहीं. कितनी आसानी से समेट लिया था सुरेश ने सबकुछ. प्रेरणा की 25 वर्षों की मेहनत के अध्याय को चार दिन में अपने जीवन से निकाल कर फेंक दिया था उस ने. अभी तो उस की राख भी ठंडी नहीं हुई थी, उस का तो नामोनिशान तक मिटा दिया इस बेदर्द ने.

इतनी  नफरत, आखिर क्यों? फिर वह मन ही मन ही बड़बड़ाने लगा, ‘हो सकता है प्रेरणा की तरक्की से जलता हो. इस का क्या गया, खोया तो मैं ने है अपना सोलमेट. अब किस से करूंगा मन की बातें. कौन सुनेगा एकदूसरे की कविताएं,’ बहुत रोकतेरोकते भी राहुल की आंखें भर्रा गईं.

राहुल की भराई आंखें देख कर सुरेश का चेहरा तमतमा उठा, भौंहों पर बल पड़ गए, माथे की रेखाएं गहरा गईं. उस के स्वर में कसैलापन झलका, वह बोला, ‘‘आई सी, राहुल, कहीं तुम वह तो नहीं हो जिस के साथ वह रात को देरदेर तक बातें करती रहती थी, आई मीन उस के बौयफ्रैंड?’’

इतना सुनते ही राहुल की सांस रुक गई. निगाह ठहर गई. उसे लगा जैसे किसी ने उस के गाल पर तमाचा जड़ दिया हो या फिर पंजा डाल कर उस का दिल चाकचाक कर दिया हो. प्रेरणा तो उस की दोस्त थी, केवल दोस्त जिस में न कोई शर्त, न आडंबर, खालिस अपनेपन की गहनता. प्रेरणा के पास नई राह पर चलने का हौसला नहीं था. उस की खामोशी शब्दों में परिभाषित रहती थी. ऐसी थी वह.

राहुल वहां से भाग जाना चाहता था. वह अपनी खामोश गीली आंखों में चुपचाप प्रेरणा की असहनीय पीड़ा को गले लगाए, उस की कुर्बानियों पर कुर्बान महसूस करता अपने घर को निकलने की तैयारी करने लगा. उसे संतुष्टि थी कि अब प्रेरणा आजाद है. उसे याद आया प्रेरणा अकसर कहा करती थी, ‘भविष्य क्या है, मैं नहीं जानती. इतना जरूर जानती हूं कि सीतासावित्री का जीवन भी इस देश में गायभैंस के जीवन जैसा है, जिन के गले की रस्सी पर उस का कोई अधिकार नहीं.’’

जैसे ही राहुल अपना पैर चौखट के बाहर रखने लगा, उस ने दोनों बक्सों की ओर देखा और सोचा, ‘प्रेरणा की 25 वर्षों की अमूल्य कमाई मैं इस विषैले वातावरण में दोबारा मरने के लिए नहीं छोड़ सकता.’’

राहुल ने प्रेरणा के पति की ओर देखते इशारे से पूछा, ‘‘सर, क्या मैं इन्हें ले जा सकता हूं?’’

‘‘शौक से, लेकिन इन कुत्तों से इजाजत ले लेना?’’

राहुल ने दोनों बक्सों को छूते हुए, कुत्तों की ओर देखा. कुत्ते पूंछ हिला रहे थे. उस ने बक्से कार में रखे. कुत्ते उस के पीछेपीछे कार तक गए, मानो, कह रहे हों प्रेरणा का घर तो कभी उस का था ही नहीं.

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