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Story in Hindi : हैडमास्टर सीमा से क्यों पैसे लेना चाहते थे?

Story in Hind-

‘‘बाबूजी, आप मिठाई बांटिए,’’ सीमा ने खुश होते हुए कहा.

‘‘क्यों… क्या हुआ बेटी?’’

‘‘मेरी टीचर की नौकरी लगी है… पास के गांव में.’’

‘‘यह तो बहुत खुशी की बात है. आखिरकार मेरी बेटी जिंदगी में कुछ बन ही गई.’’

आज स्कूल का पहला दिन था. सीमा बहुत खुश थी. बाबूजी भी उन के साथ स्कूल में आए थे. पहला दिन तो ठीकठाक ही था. दूसरे दिन सीमा प्रार्थना में खड़ी थी, तभी हैडमास्टरजी मदन उस के पास आए और कहने लगे, ‘‘मैडमजी, बढ़िया नौकरी लगी है, चाय तो पिलाइए स्टाफ को.’’

‘‘जी, मैं ने तो अभी पहली तनख्वाह भी नहीं ली है. बाद में सब को चाय पिलाऊंगी,’’ सीमा ने कहा.

‘‘अरे मैडमजी, एक कप चाय के लिए महीनेभर का इंतजार करवाएंगी क्या?’’

‘‘सरजी, मैं ने कहा न कि पहली तनख्वाह मिलने के बाद चाय पिलाऊंगी. मुझे माफ कर दीजिए.’’

हैडमास्टरजी चले गए. अजीत सर पास में ही खड़े थे.

‘‘मै कुछ कहूं,’’ अजीत सर धीमी आवाज में बोले. ‘‘कहिए.’’

‘‘चाय पिला दीजिए. अगर पैसे नहीं हैं, तो मैं दिए देता हूं. तनख्वाह मिलने के बाद आप लौटा दीजिएगा.’’

‘‘मुझे किसी का उधार नहीं चाहिए.’’

इस के बाद सभी लोग क्लास में चले गए. सीमा की क्लास में 20 छात्र थे. 10 छात्र ठीकठाक पढ़ते थे, बाकी बचे 10 छात्रों को अलग से ज्यादा पढ़ाना पड़ता था.

सीमा जैसे ही स्टाफरूम में जाती थी, किसी न किसी बहाने दूसरे टीचर भी वहां आ जाते थे और उस का मजाक उड़ाते थे.

एक दिन सीमा का दिमाग गरम हो गया और वह बोल पड़ी, ‘‘क्यों एक कप चाय के लिए इतना मरे जा रहे हैं. अब तो मैं पहली तनख्वाह मिलने पर भी चाय नहीं पिलाऊंगी.’’

स्कूल के सारे टीचर और हैडमास्टर सीमा का यह जवाब सुन कर गुस्सा तो हुए, पर कोई भी कुछ नहीं बोला. लेकिन सीमा के इस करारे जवाब से उस के खिलाफ स्कूल में राजनीति शुरू हो गई.

एक दिन स्कूल में बड़े साहब आए. मदनजी फौरन नाश्ता ले कर आए. सीमा को भी बुलाया गया. उस ने एक समोसा खाया. बड़े साहब के स्कूल से जाते ही हैडमास्टरजी उस से 20 रुपए मांगने लगे.

‘‘एक समोसे के 20 रुपए?’’ सीमा ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘मैडमजी, बड़े साहब के आने में गाड़ी का पैट्रोल नहीं लगा क्या,’’ राकेशजी बोले.

सीमा ने झट से 20 रुपए उन के मुंह पर फेंके और अपनी क्लास में लौट गई. उस के पीछेपीछे अजीत सर भी क्लास में पहुंच गए.’’

‘‘आप को पैसों की कोई दिक्कत है क्या?’’ ‘‘नहीं तो.’’

‘‘तो फिर 20 रुपए के लिए इतना गुस्सा क्यों?’’ ‘‘5 रुपए के समोसे के लिए 20 रुपए क्यों?’’

‘‘क्योंकि मदनजी, राकेशजी और प्रदीपजी पैसे नहीं देंगे. उन के पैसे आप से वसूले गए हैं. हैडमास्टरजी और बड़े साहब के पैसे मैं ने दिए हैं.’’ ‘‘यह तो नाइंसाफी हुई न.’’

‘‘यहां पर ऐसे ही चलता है. किसी भी सरकारी स्कूल में ऐसे ही होता है. सीनियर लोग जैसा कहते हैं, वैसा ही करना पड़ता है. आप अभी नई हैं.’’

एक हफ्ते बाद औफिस से ट्रेनिंग की चिट्ठी आई. सीमा जानती थी कि उसे ही भेजी जाएगी. दूसरे हफ्ते फिर से ट्रेनिंग की चिट्ठी आई. फिर से उसे ही भेजी गई. कभी कोई मीटिंग हो तो भी उसे जाना पड़ता था. क्लास में 20 छात्र थे, लेकिन तकरीबन 12 छात्र ही रोज आते थे.

सीमा ने बहुत बार उन के घर के चक्कर लगाए. लेकिन जब तक उन्हें बुलाने कोई घर नहीं जाता था, तब तक वे स्कूल में आते नहीं थे. हर दिन उन छात्रों को बुलाना पड़ता था.

एक दिन सीमा के पड़ोस में रहने वाले राजू का पुराना स्कूल बैग उस ने अपने स्कूल की एक छात्रा को दे दिया. वह लड़की स्कूल में बैठती ही नहीं थी. अपनी किताबों वाली थैली क्लास में रख कर वह भाग जाती थी. लेकिन पुराना ही सही स्कूल बैग मिलने के बाद वह स्कूल में रोजाना आने लगी. यह देख कर सीमा को भी अच्छा लगने लगा था.

अब इस स्कूल में सीमा को 3 साल हो चुके थे. राकेशजी, मदनजी, प्रदीपजी और हैडमास्टरजी रोजाना एक न एक टेढ़ी बात तो बोलते ही थे, पर अजीत सर अपने शांत और मजाकिया स्वभाव से उसे शांत कर देते थे. अजीत सर का उस के प्रति प्यार भरा रवैया बाकी स्टाफ को पसंद नहीं आता था.

एक दिन अजीत सर और वे बाकी शैतान औफिस में एकसाथ बैठे थे.

‘‘क्यों भई, क्या मैडमजी से शादी करने का इरादा है?’’ राकेशजी ने पूछा. ‘‘नहीं तो,’’ अजीत सर बोले.

‘‘करना भी मत. मैडमजी हमारी बिरादरी से नहीं हैं और फिर स्कूल में ही लव मैरिज के चक्कर में सस्पैंड हो जाओगे. टीचर लोगों को लव मैरिज करना अलाउड नहीं होता. पता है न भैया,’’ मदनजी बोले.

अजीत सर ने कुछ नहीं कहा, क्योंकि मन ही मन तो वे सीमा से ही शादी के ख्वाब देख रहे थे.

एक दिन बड़े साहब सीमा की क्लास में आए. क्लास में छात्र कम थे.

‘‘20 में से सिर्फ 15 ही छात्र…’’ उन्होंने पूछा. ‘‘जी… रोज तो आते हैं.’’

‘‘आज मैं आया हूं, इसलिए नहीं आए हैं क्या?’’ ‘‘जी…’’ जवाब में क्या कहा जाए, सीमा की समझ में नहीं आ रहा था.

‘‘उठो बेटे, तुम्हारा नाम क्या है?’’ बड़े साहब ने एक छात्र से पूछा. ‘‘जी, निखिल.’’

‘‘ब्लैक बोर्ड पर अपने किसी एक दोस्त का नाम लिखो.’’

निखिल ने अपने दोस्त का नाम पीयूष की जगह पिउष लिखा.

‘‘क्या पढ़ाती हैं मैडमजी आप बच्चों को. अच्छा, तुम उठो. तुम्हारा नाम क्या है?’’ ‘‘जी, स्नेहल.’’

‘‘सूर्योदय और सूर्यास्त किस दिशा में होता है?’’

‘‘सूर्योदय पूरब दिशा से होता है और सूर्यास्त…’’ स्नेहल ने जवाब नहीं दिया.

बड़े साहब सीमा पर चिल्लाने लगे, ‘‘नोटिस दूं क्या आप को? दूं आप को नोटिस?’’

सीमा नजरें झुका कर खड़ी हो गई. दूर खड़े हैडमास्टरजी मुसकरा रहे थे. बड़े साहब क्लास से निकल गए. सीमा अजीत सर की क्लास में गई.

‘‘मुझे पता है, हैडमास्टरजी जानबूझ कर बड़े साहब को मेरी क्लास में ले कर आए थे. बड़े साहब ने मुझे डांटा तो उन के कलेजे को ठंडक पहुंची होगी.’’

‘‘अगर आप एक कप चाय पिला देतीं तो…’’

‘‘मुझ से ज्यादा तनख्वाह तो ये लोग लेते हैं और सारे काम मुझ से ही कराते हैं. ये किसी और को ट्रेनिंग में क्यों नहीं भेजते, क्योंकि वे सब बड़े साहब को और उन के बीवीबच्चों को महंगेमहंगे तोहफे देते हैं.’’

‘‘अगर आप भी अपनी तरफ से कुछ गिफ्ट दे देतीं तो…’’

सीमा को पता था कि अजीत सर के पास उस का मन शांत नहीं होगा. वह फिर से अपनी क्लास में चली गई. शाम को घर में बरतनों का बहुत शोर हो रहा था.

बाबूजी ने आवाज दी, ‘‘सीमा, क्यों इतना शोर मचा रही हो?’’

‘‘बड़े साहब आए थे स्कूल में. कहते हैं कि नोटिस देंगे,’’ सीमा ने कहा.

‘‘तो देने दो न. सरकारी नौकरी में तो यह रोज की बात होती है,’’ बाबूजी बोले.

‘‘कह रहे थे कि पढ़ाती नहीं हो तो तनख्वाह क्यों लेती हो? मैं तो रोजाना पढ़ाती हूं, बच्चे पढ़ते नहीं तो क्या करूं? रोजाना आने वाले बच्चे भी आज घर रह गए. मैं क्या करूं?’’

‘‘मेरी प्यारी बेटी, इतना उदास मत हो. एक दिन सब अच्छा हो जाएगा,’’ बाबूजी ने भरोसा जताया.

लेकिन बच्चों ने बड़े साहब के सामने जवाब क्यों नहीं दिए? नोटिस दूंगा जैसे शब्द अब भी सीमा के कानों में चुभ रहे थे. साथी टीचरों की मुसकराती शक्लें नजरों से हट नहीं रही थीं.

जो होता है, अच्छे के लिए होता है, यह सोच कर सीमा ने नई शुरुआत की. शायद उस के पढ़ानेलिखाने में ही कुछ कमी है. यह सोच कर सीमा ने नए जोश से पढ़ाना शुरू किया, पर एक दिन उस के ट्रांसफर का और्डर आ गया.

सीमा का आज इस स्कूल में आखिरी दिन था. हैडमास्टरजी बताने लगे, ‘‘आप के ट्रांसफर में मेरा कोई हाथ नहीं है. मैं ने तो बड़े साहब को बताया था कि बच्ची है, जाने दीजिए. लेकिन उन्होंने मेरी नहीं सुनी.’’

‘‘500 रुपए दे देतीं, तो यह नौबत नहीं आती,’’ मदनजी बोले.

‘‘हमारा बड़ा साहब इतना सस्ता है, वह मुझे पता नहीं था,’’ सीमा ने कहा.

‘‘जाओ अब जंगल में. जानवरों के बीच रहना. रोजाना एक घंटा बस से जाना होगा. उस के आगे 5 किलोमीटर पैदल जाना होगा. रात को घर लौटते वक्त 8 बजेंगे. हमारी बेटी जैसी हो, इसलिए बता रहे हैं. दुनियादारी सीख लो. रिश्वत देना आम बात है,’’ प्रदीपजी बोले.

‘‘आप जैसे इनसानों के साथ रहने से बेहतर है कि मैं जानवरों के साथ रहूं. अगर आप पहले ही दिन मुझे अपनी बेटी मान लेते तो आज हालात ऐसे न होते प्रदीपजी.’’

दफ्तर के बाहर अजीत सर सीमा का इंतजार कर रहे थे.

‘‘कभी कोई परेशानी हो तो फोन जरूर कीजिएगा.’’

‘‘जी जरूर. इस स्कूल में सिर्फ आप ही मुझे याद करेंगे, ऐसा लगता है,’’ कह कर सीमा वहां से चली गई. Story in Hind

Hindi Story – तरकीब : झुमरी की जवानी हासिल कर पाया रतन

Hindi Story. रतन सिंह की निगाहें पिछले कई दिनों से झुमरी पर लगी हुई थीं. वह जब भी उसे देखता, उस के मुंह से एक आह निकल जाती. झुमरी की खिलती जवानी ने उस के तनमन में एक हलचल सी मचा दी थी और वह उसे हासिल करने को बेताब हो उठा था.

वैसे भी रतन सिंह के लिए ऐसा करना कोई बड़ी बात न थी. वह गांव के दबंग गगन सिंह का एकलौता और बिगड़ैल बेटा था. कई जरूरतमंद लड़कियों को अपनी हवस का शिकार उस ने बनाया था. झुमरी तो वैसे भी निचली जाति की थी.

झुमरी 20वां वसंत पार कर चुकी एक खूबसूरत लड़की थी. गरीबी में पलीबढ़ी होने के बावजूद जवानी ने उस के रूप को यों निखारा था कि देखने वालों की निगाहें बरबस ही उस पर टिक जाती थीं. गोरा रंग, भरापूरा बदन, बड़ीबड़ी कजरारी आंखें और हिरनी सी मदमस्त चाल.

इस सब के बावजूद झुमरी में एक कमी थी. वह बोल नहीं सकती थी, पर उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था. वह अपनेआप में मस्त रहने वाली लड़की थी.

झुमरी घर के कामों में अपनी मां की मदद करती और खेत के काम में अपने बापू की. उस के बापू तिलक के पास जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा था, जिस के सहारे वह अपने परिवार को पालता था. वैसे भी उस का परिवार छोटा था. परिवार में पतिपत्नी और 2 बच्चे, झुमरी और शंकर थे. अपनी खेती से समय मिलने पर तिलक दूसरों के खेतों में भी मजदूरी का काम कर लिया करता था.

गरीबी में भी तिलक का परिवार खुश था. परंतु कभीकभी पतिपत्नी यह सोच कर चिंतित हो उठते थे कि उन की गूंगी बेटी को कौन अपनाएगा?

झुमरी इन सब बातों से बेखबर मजे में अपनी जिंदगी जी रही थी. वह दिमागी रूप से तेज थी और गांव के स्कूल से 10 वीं जमात तक पढ़ाई कर चुकी थी. उसे खेतखलिहान, बागबगीचों से प्यार था.

गांव के दक्षिणी छोर की अमराई में झुमरी अकसर शाम को आ बैठती और पेड़ों के झुरमुट में बैठे पक्षियों की आवाज सुना करती. कोयल की आवाज सुन कर उस का भी जी चाहता कि वह उस के सुर में सुर मिलाए, पर वह बोल नहीं सकती थी.

झुमरी की इस कमी को रतन सिंह ने अपनी ताकत समझा. उस ने पहले तो झुमरी को तरहतरह के लालच दे कर अपने प्रेमजाल में फांसना चाहा और जब इस में कामयाब न हुआ, तो जबरदस्ती उसे हासिल करने का मन बना लिया.

रात घिर आई थी. चारों तरफ अंधेरा हो चुका था. आज झुमरी को खेत से लौटने में देर हो गई थी. पिछले कई दिनों से उस की ताक में लगे रतन सिंह की नजर जब उस पर पड़ी, तो उस की आंखों में एक तेज चमक जाग उठी.

मौका अच्छा जान कर रतन सिंह उस के पीछे लग गया. एक तो अंधेरा, ऊपर से घर लौटने की जल्दी. झुमरी को इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि कोई उस के पीछे लगा हुआ है. वह चौंकी तब, जब अमराई में घुसते ही रतन सिंह उस का रास्ता रोक कर खड़ा हो गया.

‘‘मैं ने तुम्हारा प्यार पाने की बहुत कोशिश की…’’ रतन सिंह कामुक निगाहों से झुमरी के उभारों को घूरता हुआ बोला, ‘‘तुम्हें तरहतरह से रिझाया. तुम से प्रेम निवेदन किया, पर तू न मानी. आज अच्छा मौका है. आज मैं छक कर तेरी जवानी का रसपान करूंगा.’’

रतन सिंह का खतरनाक इरादा देख झुमरी के सारे तनबदन में डर की सिहरन दौड़ गई. उस ने रतन सिंह से बच कर निकल जाना चाहा, पर रतन सिंह ने उसे ऐसा नहीं करने दिया. उस ने झपट कर झुमरी को अपनी बांहों में भर लिया.

झुमरी ने चिल्लाना चाहा, पर उस के होंठों से शब्द न फूटे. झुमरी को रतन सिंह की आंखों में वासना की भूख नजर आई. रतन सिंह झुमरी को खींचता हुआ अमराई के बीचोंबीच ले आया और जबरदस्ती जमीन पर लिटा दिया. इस के पहले कि झुमरी उठे, वह उस पर सवार हो गया.

झुमरी उस के चंगुल से छूटने के लिए छटपटाने लगी. दूसरी ओर वासना में अंधा रतन सिंह उस के कपड़े नोचने लगा. उस ने अपने बदन का पूरा भार झुमरी के नाजुक बदन पर डाल दिया, फिर किसी भूखे भेडि़ए की तरह उसे रौंदने लगा.

झुमरी रो रही थी, तड़प रही थी, आंखों ही आंखों में फरियाद कर रही थी, लेकिन रतन सिंह ने उस की एक न सुनी और उसे तभी छोड़ा, जब अपनी वासना की आग बुझा ली.

ऐसा होते ही रतन सिंह उस के ऊपर से उठ गया. उस ने एक उचटती नजर झुमरी पर डाली. जब उस की निगाहें झुमरी की निगाहों से टकराईं, तो उस को एक झटका सा लगा.

झुमरी की आंखों में गुस्से की चिनगारियां फूट रही थीं, पर अभीअभी उस ने झुमरी के जवान जिस्म से लिपट कर जवानी का जो जाम चखा था, इसलिए उस ने झुमरी के गुस्से और नफरत की कोई परवाह नहीं की और उठ कर एक ओर चल पड़ा.

इस घटना ने झुमरी को झकझोर कर रख दिया था. वह 2 दिन तक अपने कमरे में पड़ी रही थी. झुमरी के मांबाप ने जब उस से इस की वजह पूछी, तो उस ने तबीयत खराब होने का बहाना बना दिया था.

कई बार झुमरी के दिमाग में यह बात आई थी कि वह इस के बारे में उन्हें बतला दे, पर यह सोच कर वह चुप रह गई थी कि उन से कहने से कोई फायदा नहीं. वे चाह कर भी रतन सिंह का कुछ बिगाड़ नहीं पाएंगे, उलटा रतन सिंह उन की जिंदगी को नरक बना देगा.

इस मामले में जो करना था, उसे ही करना था. रतन सिंह ने उस की इज्जत लूट ली थी और उसे इस के किए की सजा मिलनी ही चाहिए थी. पर कैसे? झुमरी ने इस बात को गहराई से सोचा, फिर उस के दिमाग में एक तरकीब आ गई.

रात आधी बीत चुकी थी. सारा गांव सो चुका था, पर झुमरी जाग रही थी. वह इस समय अमराई से थोड़ी दूर बांसवारी यानी बांसों के झुरमुट में खड़ी हाथों में कुदाल लिए एक गड्ढा खोद रही थी.

तकरीबन 2 घंटे तक वह गड्ढा खोदती रही, फिर हाथ में कटार लिए बांस के पेड़ों के पास पहुंची. उस ने कटार की मदद से बांस की पतलीपतली अनेक डालियां काटीं, फिर उन्हें गड्ढे के करीब ले आई.

डालियों को चिकना कर उन्हें बीच से चीर कर उन की कमाची बनाईं, फिर उन की चटाई बुनने लगी. अपनी इच्छानुसार चटाई बुनने में उसे तकरीबन 3 घंटे लग गए.

चटाई तैयार कर झुमरी ने उसे गड्ढे के मुंह पर रखा. चटाई ने तकरीबन एक मीटर दायरे के गड्ढे के मुंह को पूरी तरह ढक लिया. यह चटाई किसी आदमी का भार हरगिज सहन नहीं कर सकती थी.

सुबह होने में अभी चंद घंटे बचे थे. हालांकि बांसों के इस झुरमुट की ओर गांव वाले कम ही आते थे और दिन में यह सुनसान ही रहता था, फिर भी झुमरी कोई खतरा मोल लेना नहीं चाहती थी. उस ने जमीन पर बिखरे बांस के सूखे पत्तों को इकट्ठा कर उन का ढेर लगा दिया.

इस काम से निबट कर झुमरी ने बांस की चटाई से गड्ढे का मुंह ढका, पर उस पर पत्तों को इस तरह डाल दिया, ताकि चटाई पूरी तरह ढक जाए और किसी को वहां गड्ढा होने का एहसास न हो. गड्ढे से निकली मिट्टी को उस ने अपने साथ लाई टोकरी में भर कर गड्ढे से थोड़ी दूर डाल दिया.

काम खत्म कर झुमरी ने एक निगाह अपने अब तक के काम पर डाली, फिर अपने साथ लाए बड़े से थैले में अपना सारा सामान भरा और थैला कंधे पर लाद कर घर की ओर चल पड़ी.

7 दिनों तक झुमरी का यह काम चलता रहा. इतने दिन में उस ने 7 फुट गहरा गड्ढा तैयार कर लिया था. गड्ढे में उतरने और चढ़ने के लिए वह अपने साथ घर से लाई सीढ़ी का इस्तेमाल करती थी. काम पूरा कर उस ने पत्ते डाले, फिर अपने अगले काम को अंजाम देने के बारे में सोचती.

रतन सिंह ने झुमरी की इज्जत लूट तो ली थी, परंतु अब वह इस बात से डरा हुआ था कि कहीं झुमरी इस बात का जिक्र अपने मांबाप से न कर दे और कोई हंगामा न खड़ा हो जाए. परंतु जब 10 दिन से ज्यादा हो गए और कुछ नहीं हुआ, तो उस ने राहत की सांस ली. अब उसे रात की तनहाई में वो पल याद आते, जब उस ने झुमरी के जवान जिस्म से अपनी वासना की आग बुझाई थी. जब भी ऐसा होता, उस का बदन कामना की आग में झुलसने लगता था.

इस बीच रतन सिंह ने 1-2 बार झुमरी को अपने खेत की ओर जाते या आते देखा था, परंतु उस के सामने जाने की उस की हिम्मत न हुई थी. पर उस दिन अचानक रतन सिंह का सामना झुमरी से हो गया. वह विचारों में खोया अमराई की ओर जा रहा था कि झुमरी उस के सामने आ खड़ी हुई. उसे यों अपने सामने देख एकबारगी तो रतन सिंह बौखला गया था और झुमरी को देखने लगा था.

झुमरी कुछ देर तक खामोशी से उसे देखती रही, फिर उस के होंठों पर एक दिलकश मुसकान उभर उठी. उसे इस तरह मुसकराते देख रतन सिंह ने राहत की सांस ली और एकटक झुमरी के खूबसूरत चेहरे और भरेभरे बदन को देखने लगा.

इस के बावजूद जब झुमरी मुसकराती रही, तो रतन सिंह बोला, ‘‘झुमरी, उस दिन जो हुआ, उस का तुम ने बुरा तो नहीं माना?’’ झुमरी ने न में सिर हिलाया.

‘‘सच…’’ कहते हुए रतन सिंह ने उस की हथेली कस कर थाम ली, ‘‘इस का मतलब यह है कि तू फिर वह सब करना चाहती है?’’ बदले में झुमरी खुल कर मुसकराई, फिर हौले से अपना हाथ छुड़ा कर एक ओर भाग गई.

उस की इस हरकत पर रतन सिंह के तनमन में एक हलचल मच गई और उस की आंखों के सामने वो पल उभर आए, जब उस ने झुमरी की खिलती जवानी का रसपान किया था. झुमरी को फिर से पाने की लालसा में रतन सिंह उस के इर्दगिर्द मंडराने लगा. झुमरी भी अपनी मनमोहक  अदाओं से उस की कामनाओं को हवा दे रही थी.

झुमरी ने एक दिन इशारोंइशारों में रतन सिंह से यह वादा कर लिया कि वह पूरे चांद की आधी रात को उस से अमराई में मिलेगी. आकाश में पूर्णिमा का चांद हंस रहा था. उस की चांदनी चारों ओर बिखरी हुई थी. ऐसे में रतन सिंह बड़ी बेकरारी से एक पेड़ के तने पर बैठा झुमरी का इंतजार कर रहा था.

झुमरी ने आधी रात को यहीं पर उस से मिलने का वादा किया था, परंतु वह अब तक नहीं आई थी. जैसेजैसे समय बीत रहा था, वैसेवैसे रतन सिंह की बेकरारी बढ़ रही थी. अचानक रतन सिंह को अपने पीछे किसी के खड़े होने की आहट मिली. उस ने पलट कर देखा, तो उस का दिल धक से रह गया. वह झटके से उठ खड़ा हुआ. उस के सामने झुमरी खड़ी थी. उस ने भड़कीले कपड़े पहन रखे थे, जिस से उस की जवानी फटी पड़ रही थी.

जब झुमरी ने रतन सिंह को आंखें फाड़े अपनी ओर देखा पाया, तो उत्तेजक ढंग से अपने होंठों पर जीभ फेरी. उस की इस अदा ने रतन सिंह को और भी बेताब कर दिया.

रतन सिंह ने झटपट झुमरी को अपनी बांहों में समेट लेना चाहा, लेकिन झुमरी छिटक कर दूर हो गई. ‘‘झुमरी, मेरे पास आओ. मेरे तनबदन में आग लगी है, इसे अपने प्यार की बरसात से शांत कर दो,’’ रतन सिंह बेचैन होते हुए बोला.

झुमरी ने इशारे से रतन सिंह को खुद को पकड़ लेने की चुनौती दी. रतन सिंह उस की ओर दौड़ा, तो झुमरी ने भी दौड़ लगा दी. अगले पल हालत यह थी कि झुमरी किसी मस्त हिरनी की तरह भाग रही थी और रतन सिंह उसे पकड़ने के लिए उस के पीछे दौड़ रहा था.

झुमरी अमराई से निकली, फिर बांस के झुरमुट की ओर भागी. वह उस गड्ढे की ओर भाग रही थी, जिसे उस ने कई दिनों की कड़ी मेहनत से तैयार किया था. वह जैसे ही गड्ढे के नजदीक आई, एक लंबी छलांग भरी और गड्ढे की ओर पहुंच गई.

झुमरी के हुस्न में पागल, गड्ढे से अनजान रतन सिंह अचानक गड्ढे में गिर गया. उस के मुंह से घुटीघुटी सी चीख निकली. कुछ देर तक तो रतन सिंह कुछ समझ ही नहीं पाया कि क्या हो गया है. वह बौखलाया हुआ गड्ढे में गिरा इधरउधर झांक रहा था, पर जैसे ही उस के होशोहवास दुरुस्त हुए, वह जोरजोर से झुमरी को मदद के लिए पुकारने लगा. परंतु उधर से कोई मदद नहीं आई.

झुमरी की ओर से निराश रतन सिंह खुद ही गड्ढे से बाहर निकलने की कोशिश करने लगा. उस ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठा कर गड्ढे के किनारे को पकड़ना चाहा, परंतु वह उस की पहुंच से दूर था.

रतन सिंह ने उछल कर बाहर निकलने की 2-4 बार नाकाम कोशिश की. आखिरकार वह गड्ढे का छोर पकड़ने में कामयाब हो गया. उस ने अपने बदन को सिकोड़ कर अपना सिर ऊपर उठाया. उस का सिर थोड़ा ऊपर आया, तभी उस की नजर झुमरी पर पड़ी. उस के हाथों में कुदाल थी और उस की आंखों से नफरत की चिनगारियां फूट रही थीं.

इस के पहले कि रतन सिंह कुछ समझता, झुमरी ने कुदाल का भरपूर वार उस के सिर पर किया. रतन सिंह की दिल दहलाने वाली चीख से वह सुनसान इलाका दहल उठा. उस का सिर फट गया था और खून की धारा फूट पड़ी थी. गड्ढे का किनारा रतन सिंह के हाथ से छूट गया और वह गिर पड़ा था.

गड्ढे में गिरते ही रतन सिंह ने अपना सिर थाम लिया. उस की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा था और उस पर बेहोशी छाने लगी थी. उस के दिमाग में एक विचार बिजली की तरह कौंधा कि यह झुमरी का फैलाया हुआ जाल था, जिस में फंसा कर वह उसे मार डालना चाहती है.

तभी रतन सिंह के सिर पर ढेर सारी मिट्टी आ गिरी. उस ने अपनी बंद होती आंखें उठा कर ऊपर की ओर देखा, तो झुमरी टोकरी लिए वहां खड़ी थी. अगले ही पल वह बेहोशी के अंधेरों में गुम होता चला गया.

झुमरी ने मिट्टी से पूरा गड्ढा भर दिया, फिर उस पर पत्तियां डाल कर उठ खड़ी हुई. उस ने सिर उठा कर ऊपर देखा. आकाश में पूर्णिमा का चांद हंस रहा था. थोड़ी देर बाद झुमरी कंधे पर थैला लादे अपने घर को लौट रही थी. Hindi Story

Hindi Story – सफेद बाल मुरदाबाद : कैसे फंस गया मैं

Hindi Story. जैसे ही उन के जनरल प्रोविडैंट फंड के कागज आए, वैसे ही वे दफ्तर की फाइलों की ओर से भी लापरवाह हो गए. ऐसी लापरवाही कि फाइलों से उन का जैसे कभी कोई रिश्ता ही न रहा हो. उन की मेज पर फाइलों का ढेर हर रोज उन के कद से ऊंचा होता जा रहा था, पर वे बेफिक्र. जो आएगा, वह उन के इकट्ठा किए गए गंद में सड़ता रहेगा.

वे सुबह ठुमकठुमक करते दोपहर के 12 बजे तक दफ्तर पहुंचते और जिस किसी को भी सीट पर तनिक गरदन उठाए देखते, उसी के पास गपें मारने हो लेते. किसी का उन के साथ गपें मारने का मन हो या न हो, इस से उन्हे कोई लेनादेना न होता.

जिन फाइलों की उलटापलटी की बदौलत उन्होंने बाबू होने के बाद भी शहर में 4-4 प्लौट खरीदे, बीसियों कंपनियों के हिस्से खरीदे, उन फाइलों से उन की बेरुखी देखने के काबिल थी.

जैसे ही 1 बजता, वे सब से पहले कैंटीन में आ जाते और इंतजार करते रहते कि कोई आए, तो वे उस को 4 बजे तक जैसेतैसे अपनी गपों में लगाए रखें.

आज उन के जाल में शायद मेरा फंसना लिखा था. दफ्तर आतेआते बिल्ली रास्ता काट गई थी, सो जान तो मैं पहले ही गया था कि आज दफ्तर में कुछ अनहोनी होगी, पर मेरे साथ इतना बुरा होगा, ऐसा मैं ने कभी नहीं सोचा था.

कैंटीन में फंसा मैं जब भी उन के पास से उठने की नाकाम कोशिश करता, तो वे कुछ खाने को मंगवा देते और सरकारी लालची कबूतर एक बार फिर पेट भरा होने के बाद भी दाने के लालच में उन के जाल में जा फंसता.

जब मेरा पेट हद से ज्यादा भर गया, तो और मेरे कान उन की बेहूदा बातें सुन कर पक गए, तो मैं ने कैंटीन के दरवाजे की ओर देखा कि कोई दफ्तर से चाय पीने आता, तो मैं उसे इन के हवाले कर इन से छुटकारा पाता.

पर जब दफ्तर से कोई आता न दिखा, तो सच कहूं कि पहली बार मुझे अपने हाल पर रोना आया और मैं ने उन को हद से ज्यादा झेलने के बाद उन से यों ही पूछ लिया, ‘‘मोहनजी, अब रिटायरमैंट के बाद आप का क्या करने का इरादा है? रिटायरमैंट के बाद आप को कोई याद आए या न आए, पर आप की सीट पर काम कराने आने वाले आप को बेहद याद आएंगे. बेचारों को आप ने इस तरह निचोड़ा है कि अगले कई जनमों तक अगर वे इसी देश में पैदा होंगे, तो किसी सरकारी दफ्तर में जाने से पहले सौ बार सोचेंगे.’’

‘‘करूंगा क्या? अब इश्कविश्क करने से तो रहा. घुटने तो घुटने, दिल तक को गठिया हो गया है. यह तो थोड़ाबहुत दफ्तर में…

अब बीवी की सेवा करूंगा, ताकि मरने से पहले उस के कर्ज से छुटकारा पा जाऊं. बेचारी ने किसी भी मन से सही, मेरी बहुत सेवा की है. कहीं ऐसा न हो कि अगले जनम में भी उसी से पाला पड़े,’’  कह कर उन्होंने ऐसा मुंह बनाया, मानो उन के मुंह में किसी ने नीम के पत्तों का गिलास भर रस उड़ेल दिया हो.

‘‘अगर बुरा न मानो, तो मैं आप को रिटायरमैंट के बाद एक बेहतर धंधे की सलाह दे सकता हूं,’’ मैं ने कहा.

‘‘यार प्रदीप, बहुत कर लिया दफ्तर में रहते हुए धंधा. यह 35 सालों तक मैं ने धंधे के सिवा और किया ही क्या है?’’

‘‘मेरी मानो, तो अपने महल्ले में मोबाइल रीचार्ज की दुकान खोल लेना. सारा दिन आराम से कट जाएगा और इस बहाने जाती जवानी भी रुक जाएगी.’’

‘‘हमारे महल्ले में पहले से ही 4-4 रिटायरी इस धंधे में जमे हैं. ऐसे में मुझे नहीं लगता कि…’’

‘‘तो ऐसा करो कि हेयर डाई की दुकान खोल लेना. वैसे भी मैं ने नोट किया है कि ज्योंज्यों हम जैसों की उम्र के बंदों के गाल अंदर को धंसते जा रहे हैं, वे सिर से ऐसे दिखते हैं मानो उन के सिर पर अभीअभी बाल आने शुरू हुए हैं. आज के सिर हैं कि उन्हें अपने पर एक भी सफेद बाल पसंद ही नहीं.

‘‘आज के जमाने का कोई सब से बड़ा दुश्मन है, तो वे हैं सफेद बाल. आज का आदमी उतना परेशान किसी से नहीं, जितना इन सफेद बालों से है. वह मौत का सामना खुशी से कर सकता है, पर सफेद बालों के आगे अपनेआप को बहुत कमजोर पाता है.

‘‘आदमी को उतनी परेशानी रोटी न मिलने पर भी नहीं होती, जितनी परेशानी आईने के आगे खड़े हुए अचानक सिर पर एक सफेद बाल दिखने पर होती है. सिर में एक सफेद बाल दिखते ही उसे लगता है, मानो उस पर मुसीबतों का एक पहाड़ नहीं टूटा, बल्कि कई टूट पड़े हैं,’’ किसी बाबा की तरह उपदेश देते हुए मेरा गला सूख गया था, सो पानी का घूंट ले कर मैं ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘मोहनजी, इधर सफेद बाल सिर में दिखा और उधर डाई बनानेबेचने वालों की फसल कटनी शुरू. कई तो मैं ने ऐसे भी देखे हैं, जो सिर पर बाल न होने के बाद भी गंजे सिर पर ही कालिख मल लेते हैं.

‘‘ये अपने साहब देखे? सिर के तो सिर के, छाती तक के बाल काले कर के दफ्तर आने लगे हैं, ताकि अपनी शर्ट के बटन दिसंबर में भी खुले रख कर खुद को जवान होने के एहसास में डुबोए रहें. उन के दाढ़ीमूंछों के रंगे बालों को देख कर तो नौजवानों के ओरिजनल काले बालों तक को शर्म आ जाती है.

‘‘मैं जब आप की बेटी की शादी में गया था, तो अपनी दादी की उम्र की आप की महल्ले वालियों के रंगे बालों को देख कर दंग रह गया था. लगा था, आप का महल्ला तो जैसे जवानों का महल्ला हो. उन के बूढ़ी होने का पता तब चला था, जब वे कमर पर हाथ रख कर जैसेतैसे वरवधू को आशीर्वाद देने के लिए उठी थीं.

‘‘सच कहूं, आज के आदमी के पास रोटी के लिए पैसे हों या न हों, पर वह बाल डाई करने के लिए पैसे का जोड़तोड़ कर ही लेता है.

‘‘मेरा बस चले तो मैं टांगों तक के सफेद बाल रंग कर ही सांस लूं. आने वाले दिनों में देखना जो बिना डाई किए बालों के मरेंगे, उन्हें स्वर्ग के तो स्वर्ग के नरक तक के ताले नहीं खुलेंगे मिलेंगे. पता है पिछले हफ्ते अपने महल्ले में क्या हुआ था?’’

‘‘क्या हुआ था?’’ यह पूछते हुए मोहनजी का मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘महल्ले के सौ साल के एक बुजुर्ग गुजर गए.’’

‘‘तो क्या डाक्टरों के मरा बताने के बाद भी वे दोबारा जिंदा हो उठे?’’

‘‘नहीं, अब हम डाक्टरों पर विश्वास कम ही करते हैं… जब उन्हें देवभूत लेने आए, तो उन के सफेद बालों को देख कर उन्हें ले जाने से साफ मुकरते हुए बोले, ‘माफ करना, हम इन्हें नहीं ले जा सकते.’

‘‘गाड़ी अपनी कर दें क्या भैया? तुम ऊपर बिल अपना दे देना,’’ हम ने उन के आगे गिड़गिड़ाते हुए कहा. सभी को अपनेअपने घर जाने को देर जो हो रही थी. अब यहां लोगों के पास जिंदों के लिए वक्त नहीं, तो मरे हुए के साथ कौन रहे?

‘‘देवभूतों ने चाय पीतेपीते कहा. ‘ये नहीं चलेंगे. नरक में भी नहीं,’

‘‘क्यों नहीं चलेंगे? सौ साल का बंदा ऊपर ही तो चलता है.’’

‘‘यह सुन कर वे बोले, ‘तो ऐसा करो, अगर तुम इन से छुटकारा पाना चाहते हो, तो पहले इन के सफेद बाल डाई कराओ. साहब तक को सफेद बाल वालों से सख्त नफरत है.

‘‘‘जब हम कोई सफेद बाल वाली आत्मा ले जाते हैं, तो वे हमें न सुनने लायक गालियां यह कहते हुए देने लग जाते हैं कि मृत्युलोक से क्या गंद उठा लाए. कितनी बार कहा कि खूबसूरती भी कोई चीज होती है कि नहीं?’’’

इतना सुन कर मोहनजी ने मेरी पीठ थपथपाई और खुद ही मेरे पास से उठ कर मंदमंद मुसकराते हुए घर की ओर हो लिए.Hindi Story

Humor Story :जुमे का दिन और मिर्जा की मिजाजपुरसी

Humor Story. जुमे का दिन था और मैं भी मूड में था, इसलिए सोचा कि चलो, कुछ देर मिर्जा के साथ गपें लड़ाएं. हो सकता है कि लंच से पहले एक टी पार्टी भी हो जाए.

मैं ने जल्दी से नहाधो कर शेरवानी पहनी, गुलाब का बढि़या इत्र लगाया, पीतल जड़ी नक्काशी वाली बेंत हाथ में ली, सुबह के 11 बजे घर से निकल कर सीधे मिर्जा के घर का रुख किया.

मैं जैसे ही मिर्जा के घर के करीब पहुंचा, तभी मुझ पर अचानक जैसे तड़ाक से बिजली सी गिर गई. दिमाग बिजली की तरह कौंधा और पलभर में हजारों बुरे खयालात दिमाग के एक कोने से दूसरे कोने तक कौंध गए.

देखा कि मिर्जा की बैठक का दरवाजा खुला था. बाहर धूपछांव में एक टूटे से खटोले पर कोई… शायद मिर्जा एक मैली सी चादर ओढ़े लेटे थे. गली के आसपास के दोचार बड़ेबूढ़े भी पास ही बैठे थे.

यह मंजर देख कर मेरी तो जैसे रूह ही निकल गई और टांगें तो जैसे वाइब्रेशन मोड पर आ गई थीं. मेरी बेंत ने मुझ गिरते हुए को सहारा दिया.

मैं ने बड़ी मुश्किल से खुद को संभालते हुए कांपती आवाज में पूछा, ‘‘यह जनाजा किस… क्या… मिर्जा…?’’

तभी वहां बैठे एक शख्स, जिन्हें गली के लड़के ‘चचा मुकुंदा’ कहते थे और जो चारपाई के सिरहाने बैठे थे, ने अपने मुंह पर उंगली रख कर इशारे से मुझे चुप रह कर बैठने का इशारा किया.

थोड़ी देर बाद वे दबी आवाज में बोले, ‘‘जनाब, आप को खबर भी है कि मिर्जा को चोट लगी है. नींद की दवा दे रखी है, ताकि दर्द का एहसास कम हो.’’

मेरे मुंह से एक हमदर्दी भरी चीख निकलने को हुई, मगर वह जैसे गले में घुट कर रह गई.

मैं ने सवाल पूछा, ‘‘क्या किसी मोटरसाइकिल वाले ने साइड मार दी?’’

‘‘नहीं…’’

‘‘तो क्या फिसल कर सीढि़यों से लुढ़क गए?’’

‘‘नहीं…’’

तभी वहां बैठे सभी लोगों के होंठों पर हलकी सी मुसकान तैर गई. यह देख कर मेरा दिमाग 360 डिगरी पर घूम गया.

‘‘तो क्या माजरा है…’’ मेरे मुंह से निकल पड़ा, ‘‘मिर्जा को चोट लगी है और आप बेशर्मों की तरह मुसकराते हो. कुछ तो शर्म करो. बेशर्मी की भी हद होती है.’’

तभी चचा मुकुंदा ने अपना हाथ मेरी गरदन पर रख कर मुझे अपनी तरफ खींचा और मेरा कान अपने मुंह के पास ले गए.

मैं डर गया कि शायद कहीं मेरा कान ही न चबा डालें. फिर भी मैं ने न जाने क्यों अपना कान उन के मुंह के सामने कर दिया.

चचा मुकुंदा मेरे कान में कुछ फुसफुसाए, जो बस मुझे ही सुनाई दिया.

मेरे मुंह से निकला, ‘‘क्या… ऐसा हुआ… क्यों?’’

मैं ने पूरे जोश के साथ मिर्जा के कफन… माफ कीजिए चादर को मुंह से पैर तक खींच कर साइड में डाल दिया और मिजाजपुरसी की रस्म अदा करते हुए हमदर्दी के तौर पर उन्हें हिलाया.

मैं ने देखा कि मिर्जा के दाहिने हाथ पर किसी ने बांस की खपच्चियां रख कर पट्टी लपेटी हुई थी. उन की बाईं आंख सूज कर काली पड़ गई थी और भौंह के ऊपर माथे को ढके हुए सिर के चारों तरफ पट्टी लिपटी थी, जिस पर लाल दवा के निशान थे, जो सूख कर काले पड़ने लगे थे.

मिर्जा ने अपनी दाईं आंख धीरे से खोली और एक बेबसी वाला गुस्सा मेरी तरफ बम की तरह फेंका.

मैं ने हमदर्दी दिखाते हुए मिर्जा के सिर के नीचे अपना एक हाथ रखा और दूसरा हाथ उन की कमर के नीचे रख कर सहारा दिया और उन का सिर

अपनी गोद में रख कर उन से पूछा, ‘‘यह सब क्या…’’

मिर्जा का गला रुंध गया और वे कुछ न बोल सके. तब मौके की नजाकत को भांपते हुए मैं ने ही पूछा, ‘‘यार मिर्जा, यह बेलन की बात तो अकसर तुम्हारे साथ होती ही रहती थी, पर ये प्लेटेंगिलास, चम्मच के चौकेछक्के कब से? अगर कहीं तुम्हारी आंख फूट जाती तो…?’’

मिर्जा, जो अब तक कुछ सामान्य हो चुके थे, बोले, ‘‘मैं खाना खा रहा था. गले में निवाला फंस गया था. पानी मांगा था, तभी बेगम ने गुस्से में खाली गिलास मेरे ऊपर फेंका और बोलीं, ‘ले, पी पानी.’

‘‘गिलास से तो मैं ने अपनेआप को साइड में झुक कर बचा लिया, लेकिन निशाना खाली जाने से बेगम तिलमिला गईं और फिर एकदम से एक प्लेट अर्जुन के तीर की तरह फेंकी, जो मेरी आंख पर लग जाती, तो आंख ही फूट गई होती.

‘‘इतने पर भी जब वे नहीं रुकीं, तो जो हाथ में आया फेंक कर मारती गईं. उन के इन तीरों की बौछार से बचने के लिए मैं हड़बड़ा कर बाहर की तरफ भागा कि तभी न जाने कमबख्त कौन से साहबजादे ने केला खाया होगा और छिलका दरवाजे में डाल दिया. मेरा पैर उस पर पड़ा और धड़ाम से जमीन पर. अब कुहनी का फ्रैक्चर न जाने कब ठीक होगा.’’

मैं ने मिर्जा को हिम्मत दी और नकली हंसी हंसते हुए कहा, ‘‘बस… इतना ही. अरे यार मिर्जा, तुम तो खुशकिस्मत हो, जो बीवी से पिटे… मुबारक हो…’’

तभी मिर्जा के चेहरे पर ऐसे भाव आए, जैसे वे मुझे कच्चा ही चबा जाएंगे, पर बेबस थे.

वे धीरे से बोले, ‘‘ठीक है… तुम भी उड़ा लो मजाक… जिस दिन पिटोगे, तब सब पता चल जाएगा.’’

मैं ने कहा, ‘‘यार मिर्जा, तुम जो गरीबी का रोना रोते हो, वह अब दूर होने वाली है. तुम बड़े आदमी बनने वाले हो. इतने बड़े कि… जैसे…’’

तभी मिर्जा बोल पड़े, ‘‘क्या मैं अमेरिका का राष्ट्रपति बन रहा हूं? क्यों तू मेरे जख्मों पर नमक छिड़क रहा है? एक तू ही तो था, जिस से मैं मन की बात कर लेता था. और अब तू भी… ठीक है, उड़ा ले मेरी हंसी… जिस दिन भाभी की मार पड़ेगी, तब पता चलेगा.’’

मैं ने मिर्जा से ऐसे दिखावटी हमदर्दी जताई, जैसे मैं उन पर दुनिया का सब से बड़ा एहसान कर रहा हूं.

मिर्जा से मुखातिब होते हुए मैं ने कहा, ‘‘नहीं यार मिर्जा, ऐसी बात भूल कर भी अपने दिमाग में मत लाना. मैं तुम्हारा सच्चा हमदर्द हूं. कभी शक की गुंजाइश मत रखना.

‘‘देखो मिर्जा, ध्यान से सुनो. वे हैं न हमारे… अरे, वे ही जनाब अमेरिका के बिल क्लिंटन साहब. क्या वे बड़े आदमी नहीं बने, वे भी ऐसे देश के जो पूरी दुनिया को तिगनी का नाच नचाता है…

‘‘तो…’’ मिर्जा बीच में ही बोल पड़े, ‘‘मेरा मिस्टर बिल से क्या ताल्लुक?’’

मैं ने मिर्जा को टोका, ‘‘यार, यही तो कमी है तुम्हारी सोच में? अबे, वे भी अपनी बीवी से पिट कर ही इतने बड़े आदमी बने हैं. उन पर बीवी की मिसाइलों जैसे गिलासप्लेट, चम्मच से अनेक बार हमले हुए हैं.

‘‘जैसे सोना तप कर और पिट कर कुछ बनता है, ऐसे ही हमारे चचा क्लिंटन साहब भी अपनी बीवी के मिसाइलोंबमों से पिट कर अमेरिका के राष्ट्रपति बने…

‘‘यह तो भला हो उन की सहायक का, जिस ने दुनिया के सभी मर्दों को बड़ा बनने का राज दुनिया के सामने खोल दिया, वरना…’’

यह सुनते ही मिर्जा कुछ देर के लिए शांत हुए और एक लंबी उबासी ली, जैसे सचमुच ही अमेरिका के राष्ट्रपति बनने जा रहे हों. अब तक उन की नींद की गोली का असर शायद खत्म हो चुका था, तभी वे और भड़क उठे और बोले, ‘‘क्या बकवास करते हो… वह अमेरिका है और यह हिंदुस्तान… यहां ऐसा कभी नहीं हो सकता.’’

मैं ने मिर्जा को फिर झूठी तसल्ली देने की कोशिश की और कहा, ‘‘यार, चचा क्लिंटन की बात छोड़ो. अगर तुम गलीमहल्ले के नेता भी बन गए, तो भी तुम गुजरबसर लायक अमीर तो बन ही सकते हो.’’

शायद यह बात मिर्जा को जंच गई थी. उन्होंने राहत की लंबी सांस ली और फिर करवट बदल कर खर्राटे लेने शुरू कर दिए, जैसे अमीरी के ख्वाबों की दुनिया में पहुंच गए हों.

दोपहर के साढ़े 12 बज चुके थे. मैं ने मिर्जा का सिर धीरे से तकिए पर रखा और कहीं दोपहर का खाना खाने के लिए रैस्टोरैंट ढूंढ़ने लगा. मिर्जा के यहां तो लंच की उम्मीद ही नहीं थी. Humor Story

Fiction story in Hindi : सांझ का भूला

Fiction story in Hindi. सीता ने अपने नए फ्लैट का दरवाजा खोला. कुली ट्रक से सामान उतार कर सीता के निर्देश पर उन्हें यथास्थान रख गया. कुली के जाने के बाद सीता ने अपना रसोईघर काफी मेहनत से सजाया. सारा दिन घर में सामान को संवारने में ही निकल गया. शाम को सीता जब आराम से सोफे पर बैठी तो उसे अजीब सी खुशी महसूस हुई. बरसों की घुटन कम होती हुई सी लगी.

सीता को खुद के फैसले पर विश्वास नहीं हो रहा था. 50 वर्ष की उम्र में वह घर की देहरी पार कर अकेली निकल आई है. यह कैसे संभव हुआ? वैसे आचारशील परिवार की नवविवाहिता संयुक्त परिवार से अलग हो कर अपनी गृहस्थी अलग बसा ले तो कोई बात नहीं, क्योंकि ऐसा चलन तो आजकल आम है. लेकिन घर की बुजुर्ग महिला गृह त्याग दे और अलग जीने लगे तो यह सामान्य बात नहीं है. सीता के दिमाग में सारी अप्रिय घटनाएं एक बार फिर घूमने लगीं.

सीता कर्नाटक संगीत के शिक्षक शिवरामकृष्णन की तीसरी बेटी थी. पिताजी अच्छे गायक थे, पर दुनियादारी नहीं जानते थे. अपने छोटे से गांव अरिमलम को छोड़ कर वे कहीं जाना नहीं चाहते थे. उन का गांव तिरुच्ची के पास ही था. गांव के परंपरावादी आचारशील परिवार, जहां कर्नाटक संगीत को महत्त्व दिया जाता था, शहर की ओर चले गए. गांव में कुल 3 मंदिर थे. आमंत्रण के उत्सवों और शादीब्याह में गाने का आमंत्रण शिवरामकृष्णन को मिलता था. उन के कुछ शिष्य घर आ कर संगीत सीखते थे. सीता की मां बीमार रहती थीं और सीता ही उन की देखभाल करती थी. पिताजी ने किसी तरह दोनों बहनों की शादी कर दी थी. एक छोटा भाई भी था, जो स्कूल में पढ़ रहा था.

सीता अपनी मां का गौर वर्ण और सुंदर नयननक्श ले कर आई थी. घने काले बाल, छरहरा बदन और शांत चेहरा बड़ा आकर्षक था. एक उत्सव में तिरुच्ची से आए रामकृष्णन के परिवार के लोगों ने सीता को देखा और उसी दिन शाम को रामकृष्णन ने अपने बेटे रविचंद्रन के साथ सीता की सगाई पक्की कर ली. सीता के पिता ने भी झटपट बेटी का ब्याह रचा दिया.

सीता का ससुराल जनधन से वैभवपूर्ण था. उस का पति कुशल बांसुरीवादक था. वह जब बांसुरीवादन का अभ्यास करता तो राह चलते लोग खड़े हो कर सुनने लगते थे, लेकिन सीता को कुछ ही समय में पता लगा कि उस का पति बुरी संगति के कारण शराबी बन गया है और अपनी इसी लत के कारण वह कहीं टिक कर काम नहीं कर पाता.

कुल 4 वर्षों की गृहस्थी ही सीता की तकदीर में लिखी थी. रविचंद्रन फेफड़े के रोग का शिकार बन कर खांसते हुए सीता को छोड़ कर चल बसा. सासससुर पुत्र शोक से बुझ कर गांव चले गए. जेठ ने सीता को मायके जाने को कह दिया.

सीता अपने दोनों नन्हे पुत्रों को ले कर अपनी दीदी के यहां चेन्नई में रहने लगी. उस ने अपनी छूटी हुई पढ़ाई फिर से शुरू कर दी. दीदी के घर का पूरा काम अपने कंधे पर उठाए सीता गुस्सैल जीजा के क्रोध का सामना करती. उस ने किसी तरह संगीत में एम.ए. तक की शिक्षा पूरी की और शहर के प्रसिद्ध महिला कालिज में प्रवक्ता के पद पर काम करने लगी.

सीता के दोनों बेटे 2 अलग दिशाओं में प्रगति करने लगे. बड़ा बेटा जगन्नाथ पिता की तरह संगीतकार बना. वह फिल्मों में सहायक संगीत निर्देशक के रूप में काम करने लगा. अपनी संगीत टीम की एक विजातीय गायिका मोनिका को जगन्नाथ घर ले कर आया तो सीता ने पूरी बिरादरी का विरोध सहन करते हुए जगन्नाथ और मोनिका का विवाह रचाया था. दूसरा बेटा बालकृष्णन ग्रेनेट व्यापार में लग गया. अपनी कंपनी के मालिक ईश्वरन की पुत्री के साथ उस का विवाह हो गया.

सीता ने दोनों बेटों का पालनपोषण काफी मेहनत से किया था. वह उन पर कड़ा अनुशासन रखती थी. मां का संघर्ष, परिवार में मिले कटु अनुभवों ने दोनों बेटों की हंसी छीन ली थी. विवाह के बाद ही दोनों बेटे हंसनेबोलने लगे थे. सैरसपाटे पर जाना, दोस्तों को घर बुलाना, होटल में खाना दोनों को ही अच्छा लगने लगा. कुछ समय तक सीता का घर खुशहाल रहा, लेकिन सीता के जीवन में फिर आंधी आई.

भाग्यलक्ष्मी के पिता काफी संपन्न थे. इसलिए उस के पास ढेर सारे गहने और कांचीपुरम की कीमती रेशमी साडि़यां थीं. उस पर हर 2-3 दिन के बाद वह मायके जाती और वापसी पर फलमिठाइयां भरभर कर लाती थी. मोनिका यह सब देख कर जलभुन जाती थी. सीता दोनों बहुओं को किसी तरह संभालती थी. दोनों के मनमुटाव के बीच फंस कर घर का सारा काम सीता को ही करना पड़ता था.

पोंगल के त्योहार के समय बहुओं को उन के मायके से एक सप्ताह पहले ही नेग आ जाता. भाग्यलक्ष्मी के मातापिता अपनी बेटी, दामाद और सास के कपड़े आदि ले कर आ गए. भाग्यलक्ष्मी काफी खुश थी. पोंगल के पर्व के दिन सीता ने बहुओं को मेहंदी रचाने के लिए बुलाया. भाग्यलक्ष्मी ने मेहंदी रचा ली तो मोनिका का क्रोध फूट पड़ा, ‘बड़ी बहू को पहले न बुला कर छोटी बहू को पहले मेहंदी लगा दी, मुझे नीचा दिखाना चाहती हैं न आप?’

मोनिका के कठोर व्यवहार के कारण घर में कलह शुरू हो गई. बालकृष्णन का व्यापार भाग्यलक्ष्मी के परिवार से जुड़ा था. वह पत्नी का रोनाधोना देख नहीं पा रहा था. वही हुआ जिस का सीता को डर था. बालकृष्णन अपने ससुर के यहां रहने चला गया. कुछ समय तक वह सीता से मिलने आताजाता रहा पर धीरेधीरे उस का आना कम हो गया.

मोनिका अपने पति के साथ संगीत के कार्यक्रमों में जुड़ी रहती थी. घर के कामों में उस की कभी रुचि रही ही नहीं. यहां तक कि सवेरे स्नान कर रसोईघर में आने के रिवाज का भी वह पालन नहीं करती थी.

मोनिका को जाने क्यों कभी सीता के साथ लगाव रहा ही नहीं. सीता बहू को प्रसन्न रखने के लिए काफी प्रयास करती थी. इस के बाद भी मोनिका का कटु व्यवहार बढ़ता ही जाता था. यहां तक कि वह अपने बेटे मोहन को उस की दादी सीता से हमेशा दूर रखने का यत्न करती थी. सीता अंदर से टूटती रही, अकेले में रोती रही और अंत में अलग फ्लैट ले कर रहने का कष्टपूर्ण निर्णय उस ने लिया था.

आदतवश सीता सुबह 4 बजे ही जग गई. आंख खुलते ही घर की नीरवता का भान हुआ तो झट से अपना मन घर के कामकाज में लगा लिया. रसोईघर में खड़ी सीता फिर एक बार चौंकी. भरेपूरे मायके और ससुराल में हमेशा वह 5-7 लोगों के लिए रसोई बनाती थी. आज पहली बार उसे सिर्फ अपने लिए भोजन तैयार करना है. लंबी सांस लेती हुई वह काम में जुटी रही.

मन में खयाल आया कि बहू मोनिका नन्हे चंचल मोहन को संभालते हुए नाश्ता और भोजन अकेले कैसे तैयार कर पाएगी? जगन्नाथ को प्रतिदिन नाश्ता में इडलीडोसा ही चाहिए. इडली बिलकुल नरम हो, सांभर के साथ नारियल की चटनी भी हो, यह जरूरी है. दोपहर के भोजन में भी उसे सांभर, पोरियल (भुनी सब्जी), कूट्टू (तरी वाली सब्जी), दही, आचार के साथ चावल चाहिए. इतना कुछ मोनिका अकेले कैसे तैयार कर पाएगी?

सीता ने अपना लंच बौक्स बैग में रख लिया. उसे अकेले बैठ कर नाश्ता करने की इच्छा नहीं हुई. केवल कौफी पी कर वह कालिज चल पड़ी. कालिज में उसे अपने इस नए घर का पता कार्यालय में नोट कराना था. मैनेजर रामलक्ष्मी ने तनिक आश्चर्य से पूछा, ‘‘आप का अपना मकान टी. नगर में है न? फिर आप उतने अच्छे इलाके को छोड़ कर यहां विरुगंबाकम में क्यों आ गईं?’’

सीता फीकी हंसी हंस कर बात टाल गई. कालिज में कुछ ही समय में बात फैल गई कि सीता बेटेबहू से लड़ कर अलग रहने लगी है. ‘जाने इस उम्र में भी लोग कैसे परिपक्व नहीं होते, छोटों से लड़तेझगड़ते हैं. जब बड़ेबूढ़े ही घर छोड़ कर भागने लगेंगे तो समाज का क्या हाल होगा?’ इस तरह के कई ताने सुन सीता खून का घूंट पी कर रह जाती थी.

सीता को अकेला, स्वतंत्र जीवन अच्छा भी लग रहा था. रोजरोज की खींचातानी, तूतू, मैंमैं से तो छुटकारा मिल गया. घर को सुचारु रूप से चलाने के लिए वह कितना काम करती थी फिर भी मोनिका ताने देती रहती थी. सीता ने अपने वैधव्य का सारा दुख अपने दोनों बेटों के चेहरों को निहारते हुए ही झेला था पर आज स्थिति बदल गई है. आज बेटे भी मां को भार समझने लगे हैं.

बहुओं की हर बात मानने वाले दोनों बेटे अपनी मां के दिल में झांक कर क्यों नहीं देखना चाहते हैं? बहुओं का अभद्र व्यवहार सहन करते हुए क्या सीता को ही घुटघुट कर जीना होगा. सीता ने जब परिवार से अलग रहने का निर्णय लिया तब दोनों बेटे चुप ही रहे थे. सीता की आंखों में आंसू भर आए.

सीता के पति रविचंद्रन का श्राद्ध था.

सीता अपने बेटेबहुओं व पोतों के साथ गांव में ही जा कर श्राद्ध कार्य संपन्न कराती थी. गांव में ही सीता के सासससुर, बूआ और अन्य परिजन रहते हैं. जगन्नाथ ही सब के लिए टिकट लिया करता था. गांव में पत्र भेज कर पंडितजी और ब्राह्मणों से सारी तैयारी करवा कर रखता था. श्राद्ध में कुल 8 दिन बाकी हैं और अब तक सीता को किसी ने कोई खबर नहीं दी. क्या दोनों बेटे उसे बिना बुलाए ही गांव चले जाएंगे? सीता अकेले गांव पहुंचेगी तो बिरादरी में होहल्ला हो जाएगा. अभी तक तो उस के अलग रहने की बात शहर तक ही है. सीता का मन घबराने लगा. अपने अलग फ्लैट में रहने की बात वह अपने सासससुर से क्या मुंह ले कर कह पाएगी.

उस के वयोवृद्ध सासससुर आज भी संयुक्त परिवार में ही जी रहे हैं. ससुर की विधवा बहन, विधुर भाई, भाई के 2 लड़के, दूर रिश्ते की एक अनाथ पोती सब परिवार में साथ रहते हैं. उन्होंने सीता को भी गांव में आ कर रहने को कहा था, पर वह ही नहीं आई थी. क्या इतने लोगों के बीच मनमुटाव नहीं रहता होगा? क्या आर्थिक परेशानियां नहीं होंगी? पता नहीं ससुरजी कैसे इस उम्र में सबकुछ संभालते हैं?

सीता ने मन मार कर जगन्नाथ को फोन किया. मोनिका ने ही फोन उठाया. जगन्नाथ किसी फिल्म की रिकार्डिंग के सिलसिले में सिंगापुर गया हुआ था. सीता गांव जाने के बारे में मोनिका से कुछ भी पूछ नहीं पाई. बालकृष्णन भी बंगलुरु गया हुआ था. भाग्यलक्ष्मी ने भी गांव जाने के बारे में कुछ नहीं कहा.

सीता को पहली बार घर त्यागने का दर्द महसूस हुआ. क्या करे वह? टे्रन से अपने अकेले का आरक्षण करा ले? पर यह भी तो पता नहीं कि लड़कों ने गांव में श्राद्ध करने की व्यवस्था की है या नहीं? उसे अपने दोनों बेटों पर क्रोध आ रहा था. क्या मां से बातचीत नहीं कर सकते हैं? लेकिन सीता अपने बेटों से न्यायपूर्ण व्यवहार की अपेक्षा कैसे कर सकती है? उस ने स्वयं परिवार त्याग कर बेटों से दूरी बना ली है. अब कौन किसे दोष दे? सीता ने अंत में गांव जाने के लिए अपना टिकट बनवा लिया और कालिज में भी छुट्टी की अर्जी दे दी.

सीता विचारों के झंझावात से घिरी गांव पहुंची थी. उस के पहुंचने के बाद ही जगन्नाथ, मोनिका, बालकृष्णन, भाग्यलक्ष्मी, मोहन और कुमार पहुंचे. सीता ने जैसेतैसे बात संभाल ली. श्राद्ध अच्छी तरह संपन्न हुआ. सीता की वृद्ध सास और बूआ उस के परिवार के बीच में अलगाव को देख रही थीं. मोहन अपनी दादी सीता के गले लग कर बारबार पूछ रहा था, ‘‘ ‘पाटी’ (दादी), आप घर कब आएंगी? आप हम से झगड़ कर चली गई हैं न? मैं भी अम्मां से झगड़ने पर घर छोड़ कर चला जाऊंगा.’’

‘‘अरे, नहीं, ऐसा नहीं बोलते, जाओ, कुमार के साथ खेलो,’’ सीता ने मुश्किल से उसे चुप कराया.

शहर वापसी के लिए जब सब लोग तैयार हो गए तब सीता के ससुर ने अपने दोनों पोतों को बुला कर पूछा, ‘‘तुम दोनों अपनी मां का ध्यान रखते हो कि नहीं? तुम्हारी मां काफी दुबली और कमजोर लगती है. जीवन में बहुत दुख पाया है उस ने. अब कम से कम उसे सुखी रखो.’’

जगन्नाथ और बालकृष्णन चुपचाप दादा की बात सुनते रहे. उन्हें साष्टांग प्रणाम कर सब लोग चेन्नई लौट गए थे.

गांव से वापस आने के बाद सीता और भी अधिक बुझ गई थी. कितने महीनों बाद उस ने अपने दोनों बेटों का मुंह देखा था. दोनों प्यारे पोतों का आलिंगन उसे गद्गद कर गया था. बहू मोनिका भी काम के बोझ से कुछ थकीथकी लग रही थी पर उस की तीखी जबान तो पहले जैसे ही चलती रही थी. जगन्नाथ काफी खांस रहा था. वह कुछ बीमार रहा होगा.

बालकृष्णन अपने चंचल बेटे कुमार के पीछे दौड़तेदौड़ते ऊब रहा था. भाग्यलक्ष्मी बालकृष्णन का ज्यादा ध्यान नहीं रख रही थी. खैर, मुझे क्या? चलाएं अपनीअपनी गृहस्थी. मेरी जरूरत तो किसी को भी नहीं है. सब अपना घर संभाल रहे हैं. मैं भी अपना जीवन किसी तरह जी लूंगी.

सीता के कालिज में सांस्कृतिक कार्यक्रम था. अध्यापकगण अपने परिवार के साथ आए थे. अपने साथियों को परिवार के साथ हंसताबोलता देख कर सीता के मन में कसैलापन भर गया. उसे अपने परिवार की याद सताने लगी. हर वर्ष उस के दोनों बेटे इस कार्यक्रम में आते थे. सीता इस कार्यक्रम में गीत गाती थी. मां के सुरीले कंठ से गीत की स्वरलहरी सुन दोनों बेटे काफी खुश होते थे. आज सांस्कृतिक कार्यक्रम में अकेली बैठी सीता का मन व्यथित था.

सीता को इधर कुछ दिनों से अपनी एकांत जिंदगी नीरस लगने लगी थी. न कोई तीजत्योहार ढंग से मना पाती और न ही किसी सांस्कृतिक आयोजन में जा पाती. कहीं चली भी गई तो लोग उस से उस के परिवार के बारे में प्रश्न अवश्य पूछते थे. पड़ोसी भी उस से दूरी बनाए रखते थे.

एक दिन सीता ने अपने 2 पड़ोसियों की बातें सुन ली थीं :

‘‘मीना, तुम अपने यहां मत बुलाना. हमारे सुखी परिवार को उस की नजर लग जाएगी. पता नहीं, इतने बड़े फ्लैट में वह अकेली कैसे रहती है. जरूर इस में कोई खोट होगा, तभी तो इसे पूछने कोई नहीं आता है.’’

सीता यह संवाद सुन कर पसीना- पसीना हो गई थी.

दरवाजे की घंटी लगातार बज रही थी. सीता हड़बड़ा कर उठी. रात भर नींद नहीं आने के कारण शायद भोर में आंख लग गई. सीता की नौकरानी सुब्बम्मा आ गई थी. सुब्बम्मा जल्दीजल्दी सफाई का काम करने लगी. सीता ने दोनों के लिए कौफी बनाई.

‘‘अम्मां, मुझे बेटे के लिए एक पुरानी साइकिल लेनी है. बेचारा हर दिन बस से आताजाता है. बस में बड़ी भीड़ रहती है. तुम मुझे 600 रुपए उधार दे दो. मैं हर महीने 100-100 रुपए कर के चुका दूंगी,’’ सुब्बम्मा बरतन मलतेमलते कह रही थी.

‘‘लेकिन सुब्बम्मा, तुम्हारा बेटा तो तुम्हारी बात नहीं सुनता है. तुम्हें रोज 10 गालियां देता है. कमाई का एक पैसा भी तुम्हें नहीं देता…रोज तुम उस की सैकड़ों शिकायतें करती हो और अब उस के लिए कर्ज लेना चाहती हो,’’ सीता कौफी पीते हुए आश्चर्य से पूछ रही थी.

‘‘अरे, अम्मां, अपनों से ही तो हम कहासुनी कर सकते हैं. बेचारा बदनसीब मेरी कोख में जन्मा इसीलिए तो गरीबी का सारा दुख झेल रहा है. अच्छा खानाकपड़ा कुछ भी तो मैं उसे नहीं दे पाती हूं. बेटे के आराम के लिए थोड़ा कर्ज ले कर उसे साइकिल दे सकूं तो मुझे संतोष होगा. फिर मांबेटे में क्या दुश्मनी टिकती है भला…अब आप खुद का ही हाल देखो न. इन 7-8 महीनों में ही आप कितनी कमजोर हो गई हैं. अकेले में आराम तो खूब मिलता है पर मन को शांति कहां मिलती है?’’ सुब्बम्मा कपड़ा निचोड़ती हुई बोले जा रही थी.

‘‘सुब्बम्मा, तुम आजकल बहुत बकबक करने लगी हो. चुपचाप अपना काम करो,’’ सीता को कड़वा सच शायद चुभ रहा था.

‘‘अम्मां, कुछ गलत बोल गई हूं तो माफ करना. मैं आप का दुख देख रही हूं. इसी कारण कुछ मुंह से निकल गया. अम्मां,  मुझे रुपए कलपरसों देंगी तो अच्छा रहेगा. एक पुरानी साइकिल मैं ने देख रखी है. दुकानदार रुपए के लिए जल्दी कर रहा है,’’ सुब्बम्मा ने अनुनय भरे स्वर में कहा.

‘‘सुब्बम्मा, रुपए आज ही ले जाना. चलो, जल्दी काम पूरा करो. देर हो रही है,’’ सीता रसोईघर में चली गई.

सीता का मन विचलित होने लगा. ‘ठीक ही तो कहती है सुब्बम्मा. जगन्नाथ और बालकृष्णन को देखे बिना उसे कितना दुख होता है. पासपड़ोस में बेटेबहू की निंदा भी तो होती होगी. सास को घर से निकालने का दोष बहुओं पर ही तो लगाया जाता है. अपने पोतों से दूर रहना कितना दर्दनाक है. कुमार और मोहन दादी से बहुत प्यार करते हैं. आखिर परिवार से दूर रह कर अकेले जीवन बिताने में उसे क्या सुख मिल रहा है?

‘सुब्बम्मा जैसी साधारण महिला भी परिवार के बंधनों का मूल्य जानती है. परिवार से अलग होना क्या कर्तव्यच्युत होना नहीं है? परिवार में यदि हर सदस्य अपने अहं को ही महत्त्व देता रहे तो सहयोगपूर्ण वातावरण कैसे बनेगा?

‘बहू उस के वंश को आगे ले जाने वाली वाहिका है. बहू का व्यवहार चाहे जैसा हो, परिवार को विघटन से बचाने के लिए उसे सहन करना ही होगा. उस की भी मां, दादी, सास, सब ने परिवार के लिए जाने कितने समझौते किए हैं. मां को घर से निकलते देख कर जगन्नाथ को कितना दुख हुआ होगा?’ सीता रात भर करवट बदलती रही. सुबह होते ही उस ने दृढ़ निश्चय के साथ जगन्नाथ को फोन लगाया और अपने वापस घर आने की सूचना दी. सीता को मालूम था कि उसे बहू मोनिका के सौ ताने सुनने होंगे. अपने पुत्र जगन्नाथ का मौन क्रोध सहन करना पड़ेगा. बालकृष्णन और भाग्यलक्ष्मी भी उसे ऊंचनीच कहेंगे. सीता ने मन ही मन कहा, ‘सांझ का भूला सुबह को घर लौट आए तो वह भूला नहीं कहलाता.’ Fiction story in Hindi

Family Story in Hindi : आधारशिला

Family Story in Hindi : चिकित्सा महाविद्यालय के दीक्षांत समारोह में एमबीबीएस की डिगरी और 2 विषयों में स्वर्णपदक लेती हुई श्वेता को देख कर खुशी से मेरी आंखें भर आईं. वह कितनी सुंदर लग रही थी. गोरा रंग, मोहक नैननक्श. उस पर आत्मविश्वास और बुद्धिमत्ता के तेज ने उस के चेहरे को हजारों में एक बना दिया था.

मैं उस की मां हूं, क्या इसीलिए अपनी बेटी में इतना सौंदर्य देख पाती हूं? मैं ने एक निगाह अपने इर्दगिर्द बैठी भीड़ पर डाली तो पाया कई जोड़ी आंखें श्वेता को एकटक निहार रही हैं.

श्वेता की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी. अपना लक्ष्य उस ने पा लिया था. मेरा मन गर्व से भर उठा. साथ ही एक चिंता ने हृदय के किसी कोने से हलके से सिर उठाया कि अब हमें उस के लिए वर की तलाश करनी होगी. सही समय पर सही काम होना ही चाहिए, यही सफल व्यक्ति की निशानी है.

बरसों पहले की बात याद आई. नन्ही श्वेता को पैरों पर झुलाते हुए मैं उसे रटाया करती, ‘वर्क व्हाइल यू वर्क, प्ले व्हाइल यू प्ले…’

श्वेता ने यह कविता अच्छी तरह रट ली थी. जब वह अपनी तोतली आवाज में इसे सुनाती तो मैं भावविभोर हो जाती. मगर क्या इस का सही अर्थ वह समझ पाई थी.

10वीं कक्षा में पहुंचते ही वह पढ़ाई और कैरियर की नींव बनाने की उम्र में राह भटक गई थी. अनजाने प्रदेश की ओर बढ़ते हुए उस के क्रमश: दूर जाते हुए कदमों की पद्चाप को मैं मां हो कर भी पहचान नहीं पाई थी. यदि वह नेक व्यक्ति मुझे उस बात की सूचना न देता तो न जाने श्वेता का क्या होता, क्या होता हम सब का, यदि उस की जगह कोई और होता तो…

मुझे वह दिन याद आया, जब दोपहर की डाक से वह पत्र मिला था :

मीनाजी,

जितनी जल्दी संभव हो, स्कूल आ कर मुझ से मिल लें. कृपया इस बात को गुप्त रखें. श्वेता को भी इस बारे में कुछ न बताएं.

वह नाम मेरे लिए कतई अपरिचित नहीं था. 3-4 महीनों से श्वेता के मुख से वह नाम सुनतेसुनते हमें ही नहीं, शायद पड़ोसियों को भी रट गया था. मगर मैं सोचने लगी कि यह पत्र… इस का मजमून ऐसी कौन सी बात की ओर इशारा कर रहा है, जोकि बेहद गोपनीय है, और शायद गंभीर भी. मेरा हृदय कांप उठा.

‘जैसेतैसे साड़ी लपेट कर मैं ने बालों को ढीलेढाले जूड़े की शक्ल में बांध लिया. श्वेता को उस दिन बुखार था, इसलिए वह स्कूल नहीं जा पाई थी. यह बात मेरे पक्ष में थी. उसे बता कर कि आवश्यक काम से बाहर जा रही हूं, मैं निकल पड़ी.

श्वेता के स्कूल की छुट्टी 4 बजे होती थी. मैं साढ़े 3 बजे ही स्कूल पहुंच चुकी थी. अभी मुझे आधा घंटा इंतजार करना था. मैं प्रवेशद्वार के समीप ही बैंच पर बैठ गई. इस तरह चोरीछिपे इंतजार करना मुझे बड़ा अजीब लग रहा था, मगर करती भी क्या? बात कुछ समझ में नहीं आ रही थी. यदि वह श्वेता की पढ़ाई के संबंध में थी तो उस में गोपनीयता की क्या बात थी?

मासिक टैस्ट में उसे कैमेस्ट्री में अच्छे अंक मिलने लगे थे. हालांकि अन्य विषयों में वह कमजोर ही थी. 1-2 बार मैं ने इस बात के लिए उसे टोका भी था, मगर जोर दे कर कुछ नहीं कहा था. क्योंकि कैमेस्ट्री में उसे इंट्रैस्ट नहीं था, लेकिन अचानक इस वर्ष उस का इंट्रैस्ट देख कर मुझे मन ही मन बड़ा भला लगा था.

मेरी नींद पिछले महीने के टैस्ट के परिणाम के बाद भी नहीं खुली थी, अब अंगरेजी और फिजिक्स में उसे बहुत कम अंक मिले थे. उस समय भी मैं ने श्वेता को संबंधित विषयों में ध्यान देने की बस मामूली सी हिदायत ही दी थी.

हालांकि कुशाग्रबुद्धि श्वेता का अन्य विषयों में इतने कम अंक प्राप्त करना चिंता का विषय होना चाहिए था, परंतु मैं ने सोचा कि साल की शुरुआत ही है, धीरेधीरे वह सभी विषयों को गंभीरता से पढ़ने लगेगी. मैं सोचने लगी, क्या इन विषयों में कम अंक आने के कारण ही पुनीत ने मुझे बुलाया है? लेकिन भला उन्हें अन्य विषयों से क्या लेना? उन के विषय कैमेस्ट्री में तो श्वेता के बराबर ही अच्छे अंक आ रहे हैं.

‘विचारों के भंवर में मैं इस कदर डूब गई थी कि छुट्टी होने की घंटी भी मुझे सुनाई नहीं दी. जब क्लास से लड़कियों के झुंड बाहर निकलने लगे, तब मैं चौंकी. उसी समय देखा, सामने से एक युवक मेरी ओर चला आ रहा है.

‘क्या आप मीनाजी हैं?’ उस ने नम्रता से पूछा.

मेरे हां कहने पर उस ने अपना परिचय दिया, ‘मैं, पुनीत हूं. आइए, हम पास वाले कौफीहाउस में कुछ देर बैठें. दरअसल, बात जरा नाजुक है, इस तरह सड़क पर बताना ठीक नहीं होगा.’

‘ठीक है,’ कहती हुई मैं उन के साथ चल दी. इस तरह अनजान व्यक्ति के साथ आना मुझे कुछ अजीब जरूर लग रहा था, पर गए बिना चारा भी नहीं था.

‘बगल में चलते हुए मैं ने पुनीत पर एक निगाह डाली. 6 फुट लंबा कद, गोरा रंग और आंखों पर चढ़ा चश्मा, जो उन के व्यक्तित्व को और भी अधिक प्रभावशाली बना रहा था. उन की आवाज धीर गंभीर थी.

शीघ्र ही हम कौफीहाउस पहुंच गए. कौफी का और्डर दे कर वे कुछ क्षणों के लिए चुप हो गए. चारों ओर नजर दौड़ा कर उन्होंने कमीज की जेब से एक कागज का टुकड़ा निकाल कर मेरी ओर बढ़ाया, ‘पत्र है, श्वेता का, मेरे नाम.’

मैं ने थरथराते हाथों से पत्र ले कर पढ़ा. क्या नहीं था उस में, जन्मजन्मांतर का अटूट संबंध, रातरात भर जागते रहने का इजहार, याद, इंतजार, आरजू और न जाने कैसेकैसे शब्दों से भरा हुआ था वह पत्र.

पत्र पढ़तेपढ़ते मेरे आंसू निकल आए. ऐसा लगा, श्वेता की उच्चशिक्षा संबंधी सारी महत्त्वाकांक्षाओं का अंत हो गया. मेरी स्थिति को पुनीत भांप गए थे. वे कहने लगे, ‘यदि आप होश खो बैठेंगी तो श्वेता का क्या होगा.’

मैं ने उन की ओर देखा कि कहीं उन के इस वाक्य में मेरे प्रति उपहास तो नहीं, लेकिन नहीं, इस वाक्य का सहीसही अर्थ ही उन के चेहरे पर लिखा हुआ था. वे आगे बोले, ‘इस उम्र में अकसर ऐसा हो जाता है. दरअसल, श्रद्धा और प्रेम का अंतर हमें इस उम्र में समझ में नहीं आता. इसलिए आप इसे गंभीर अपराध के रूप में न लें. इसीलिए मैं ने आप से ही इस बारे में बात करना ठीक समझा. आप उस की मां हैं, उस के हृदय को समझ सकती हैं.’

‘परंतु ऐसा पत्र, जी चाहता है, उसे जान से मार डालूं.’

‘नहीं, आप इस बात को श्वेता को महसूस भी न होने दें कि आप को इस पत्र के बारे में सबकुछ मालूम है. हम इस समस्या को शांति से सुलझाएंगे. आप तो जानती ही हैं कि यदि अनुकूल परिस्थितियों में यह उम्र हवा का शीतल झोंका होती है तो प्रतिकूल परिस्थितियों में गरजता हुआ तूफान बन जाती है.’

‘आप कह तो ठीक ही रहे हैं,’ मैं ने मन ही मन उन के मस्तिष्क की परिपक्वता की सराहना की.

पुनीत से की गई 15-20 मिनट की बातचीत ने मेरे मन के बोझ को आंशिक रूप से ही सही, पर कुछ कम अवश्य किया था.

‘क्या आप ने मनोविज्ञान पढ़ा है?’ मैं ने पूछा तो वे हंस पड़े, ‘जी, बाकायदा तो नहीं, परंतु हजारों मजबूरियों से घिरा हुआ मध्यवर्गीय घर है हमारा. मैं 5 भाईबहनों में सब से बड़ा हूं. सब की अपनीअपनी समस्याएं, उन के सुखदुख का मैं गवाह बना. उन का राजदार, मार्गदर्शक, सभी कुछ. मातापिता ने परिस्थितियों से शांतिपूर्वक जूझने के संस्कार दिए और इस तरह मेरा घर ही मेरे लिए अनुभवों की पाठशाला बन गया.’

उन के गजब के संतुलित स्वर ने मेरे उबलते हुए मन को मानो ठंडक प्रदान की.

‘तो योजना के मुताबिक, आप कल हमारे घर आ रहे हैं?’ मैं ने कहा और उन से विदा ली.

मैं ने औटोरिकशा के बजाय बस से ही जाना ठीक समझा. एकांत से मुझे डर लग रहा था. बस  की भीड़ में शायद मेरा दुख अधिक तीव्रता धारण न कर पाए. मगर मेरा सोचना गलत था. भीड़भरी बस में भी मैं बिलकुल अकेली थी. मेरा दुख मेरे साथ कदम से कदम मिला कर चल रहा था.

‘बसस्टौप से धीरेधीरे कदम बढ़ाते हुए मैं घर पहुंची. मुझे देखते ही श्वेता दौड़ कर आई और मेरे गले लिपट गई, ‘ओह मां, कितनी देर लगा दी. मैं अकेली बैठी कब से बोर हो रही हूं.’

‘श्वेता, छोड़ो यह बचपना,’ मैं ने अपने गले से उस की बांहें हटाते हुए कहा.

मैं ने बेरुखी से उस के हाथ झटक तो दिए थे, पर तभी पुनीत की वह बात याद आई, ‘आप अपने व्यवहार से उसे किसी तरह का आभास न होने दें कि आप उस के बारे में सबकुछ जान चुकी हूं,’ सो, मैं ने सहज स्वर में कहा, ‘बेटे, जल्दी जा कर लेट जाओ, तुम्हें अभी भी बुखार है. थोड़ी देर में अंकित भी आता होगा, वह तुम्हें जरा भी आराम नहीं करने देगा.’

श्वेता अपने कमरे में जा कर लेट गई. मैं एक पत्रिका ले कर पढ़ने बैठ गई, पर ध्यान पढ़ने में कहां था. मेरा मन तो किसी खुफिया अधिकारी की तरह श्वेता के पिछले व्यवहार की छानबीन करने लगा. वह अकसर पुनीत की प्रशंसा किया करती थी. सो, हम भी उन की योग्यता के कायल हो चुके थे, क्योंकि पिछले साल की अपेक्षा इस साल श्वेता को कैमेस्ट्री में काफी अच्छे अंक मिले थे.

जब पढ़ाने की तारीफ से आगे बढ़ कर उस ने उन के व्यक्तित्व की तारीफ शुरू की, तब भी मुझे कुछ अजीब नहीं लगा था. मैं सोचती, 14-15 वर्ष की उम्र यों भी सिर्फ योग्यता तोलने की नहीं होती. यदि वह उन्हें स्मार्ट कहा करती है  तो यह गलत नहीं. ऐसे ही शब्द तो इस उम्र में किसी के व्यक्तित्व को नापने का पैमाना होते हैं.

जब मैं उम्र के इस दौर से गुजर रही थी, मुझे भी अपनी शिक्षिका देविका कोई आसमानी परी मालूम होती थीं. मेरी मां और बाबूजी अकसर कहा करते थे, ‘इसे हमारी कोई बात समझ में ही नहीं आती, लेकिन वही बात अगर देविका कह दें तो तुरंत मान लेगी.’

यह तो बहुत बाद में समझ आया कि देविका भी औरों की तरह साधारण सी महिला थीं. मुझे महसूस होने वाला उन का पढ़ाने का जादुई ढंग उन के अपने बच्चों पर बेअसर रहा था. उन के दोनों बेटे क्लास में मुश्किल से ही पास होते थे.

बस, इसी तरह श्वेता का भी पुनीत का अतिरिक्त गुणगान करना मुझे जरा भी संदेहजनक नहीं लगा था.

दरवाजे की डोरबैल जोर से बज रही थी. शायद अंकित आ गया था. मैं ने भाग कर दरवाजा खोला.

अंकित को दूध का गिलास पकड़ा कर मैं रात के खाने की तैयारी में लग गई. श्वेता की समस्या ने मुझे भीतर तक हिला कर रख दिया था, मगर फिर भी सोच लिया था कि जैसे भी हो, यह बात मैं इन के कानों में नहीं पड़ने दूंगी. इन का प्यार भी असीम था और गुस्सा भी. इन्हें यदि इस पत्र के बारे में पता चल जाता, तो शायद श्वेता को सूली पर चढ़ा देते.

शाम को ये लगभग 8 बजे घर पहुंचे. श्वेता और अंकित में किसी बात पर झगड़ा हो रहा था. टीवी जोरजोर से चल रहा था. इन्होंने आते ही पहले टीवी औफ किया, फिर बच्चों को जोरदार आवाज में डांटा. जब कोलाहल बंद हुआ तब मुझे खयाल आया कि मैं अपने विचारों में किस कदर खोई हुईर् थी.

‘क्या बात है, कुछ परेशान सी लग रही हो, बच्चों को इन की शैतानियों के लिए डांट नहीं रही हो?’ इन्होंने पास आ कर पूछा.

‘लीजिए, अब डांटना ही हमारे स्वस्थ होने का परिचायक हो गया. क्या मैं चुपचाप बैठी आप को अच्छी नहीं लग रही?’ मैं ने शरारत से पूछा.

‘नहीं, बिलकुल अच्छी नहीं लग रही हो. बच्चों की आवाजें, टीवी का शोर और इन सब से ऊपर तुम्हारी आवाज हो, तभी मुझे लगता है कि मैं अपने घर आया हूं’, इन्होंने नहले पे दहला मारा.

खाना खाते समय श्वेता खामोश ही रही. उस के पास सुनाने के लिए कुछ नहीं था, क्योंकि वह स्कूल जो नहीं गई थी. फिर भी एकाध बार पुनीत की तारीफ करना नहीं भूली.

योजना के मुताबिक अगले दिन पुनीत हमारे घर आए. श्वेता उन्हें देख कर आश्चर्यचकित रह गई, ‘सर, आप? यहां कैसे? आप को कैसे पता चला कि मैं यहां रहती हूं? मैं बीमार थी, क्या इसीलिए मुझे देखने आए हैं?’ उस ने सवालों की झड़ी लगा दी.

पुनीत मुसकराते हुए बोले, ‘हां भई, मैं इस तरफ किसी काम से आया था, सोचा, तुम से भी मिलता चलूं. पता तो तुम ने ही मुझे दिया था.’

‘ओह, हां. मुझे तो याद ही नहीं रहा.’ श्वेता के चेहरे पर खुशी झलक रही थी. टीवी पर फिल्म चल रही थी. श्वेता फिल्म देखते हुए हमेशा अपनेआप को भी भूल जाती थी, मगर अब उसे फिल्म से भी कोई मतलब नहीं था. उस की दुनिया तो जैसे पुनीत में ही सिमट आई थी.

‘सर, आप क्या खाएंगे?’ श्वेता इठला कर पूछ रही थी. ‘जो आप बना लाएं,’ उन्होंने शरारती स्वर में कहा.

‘जी, मैं तो सिर्फ चाय बना सकती हूं.’ ‘जी हां, मैं तो भूल ही गया था, आप तो छोटी सी बच्ची हैं, आप को भला क्या बनाना आता होगा.’

श्वेता को हंसते देख उसे गुस्सा आ रहा था.

मैं रसोई में जा कर नमकीन, मठरी और गुलाबजामुन ले आई.

‘अरे, आप तो बहुत कुछ ले आईं,’ पुनीत शिष्टता से बोले. ‘कहां बहुत कुछ है सर, आप यह लीजिए. मैं आप के लिए पकौडि़यां तल कर लाती हूं.’

‘ नहीं भई, इतना काफी है,’ कहते हुए पुनीत अपने बारे में बताने लगे कि वे एक गरीब परिवार से हैं. पिता रिटायर्ड हैं, 2 छोटी बहनें और 1 भाई अभी पढ़ रहे हैं, जिन की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है.

हमारी योजना के मुताबिक ही वे अपने परिवार के हालात के बारे में जानबूझ कर बता रहे थे. यह वास्तविकता भी थी और कुछ बढ़ाचढ़ा कर भी बताई जा रही थी, ताकि इस कठोर धरातल की ओर बढ़ते हुए श्वेता के नाजुक पांव अपनेआप कांप उठें.

इस घटना के 2-3 दिनों बाद मैं पुनीत से मिलने स्कूल गई. इस बार हम ने स्कूल के बाहर एक स्थान और समय निश्चित कर लिया था. वे आए और मेरे हाथ में एक कागज का टुकड़ा पकड़ा कर चले गए. डर था कि कहीं श्वेता हमें न देख ले. पत्र कुछ इस प्रकार था :

आदरणीय सर,

आप मेरे पत्रों के उत्तर क्यों नहीं देते? क्या मैं आप को सुंदर नहीं लगती या अपनी गरीबी की वजह से ही आप आगे बढ़ने में डर रहे हैं? सर, जब से मुझे आप की आर्थिक स्थिति का पता चला है, आप की कर्तव्यभावना देख कर मेरे मन में आप के प्रति सम्मान और अधिक बढ़ गया है. कृपया मुझे अपना लें. मैं आप का पूरापूरा साथ दूंगी. नमक के साथ सूखी रोटी खा कर भी दिन गुजार लूंगी. आप का परिवार मेरा परिवार है. हम मिलजुल कर यह जिम्मेदारी उठाएंगे.

आप की,

श्वेता.

पत्र पढ़ कर मैं ने सिर पीट लिया कि सारी योजना बेकार चली गई. नमक के साथ रोटी वाली बात पढ़ कर तो बेहद हंसी आई. खाने में पचासों नुक्स निकालने वाली श्वेता को मैं कल्पना में भी सूखी रोटी खाते हुए नहीं देख सकती थी. गरीबी उस के लिए सिर्फ फिल्मी अनुभव के समान थी. गरीबी का फिल्मीरूप जितना लुभावना होता है, असलियत उतनी ही जानलेवा. काश, श्वेता यह सब जान पाती.

2-3 दिन श्वेता अनमनी सी रही, फिर कुछ सहज हो गई. 10-15 दिनों से पुनीत का भी कोई फोन नहीं आया था. हम ने तय कर लिया था कि श्वेता यदि उन्हें कोई पत्र लिखती है तो वे पहले मुझे फोन से खबर देंगे. मुझे लगने लगा कि पुनीत की बेरुखी या गरीबी की वजह से श्वेता अपनेआप ही संभल गई है.

उस रात मैं कई दिनों बाद निश्चिंत हो कर सोई. सुबह उठी तो सब से पहले श्वेता के कमरे की ओर गई. श्वेता गहरी नींद में थी, लेकिन उस के गोरे गालों पर आंसुओं के निशान थे. लगता था, जैसे वह देररात तक रोती रही थी. मेज पर कैमेस्ट्री की कौपी रखी थी. मैं ने खोल कर देखा तो उस में से एक पत्र गिरा. सलीमअनारकली, हीररांझा आदि के उदाहरण सहित उस में अनेक फिल्मी बातें लिखी हुई थीं.

लेकिन उस पत्र की अंतिम पंक्ति मुझे धराशायी कर देने के लिए काफी थी. ‘सर, यदि आप ने मेरा प्यार स्वीकार न किया तो मैं आत्महत्या कर लूंगी.’

मैं भाग कर श्वेता के निकट पहुंची. उस की लयबद्ध सांसों ने मुझे आश्वस्त किया. फिर मैं ने उस की अलमारी की एकएक चीज की छानबीन की कि कहीं कोई जहर की शीशी तो उस ने छिपा कर नहीं रखी है, लेकिन ऐसी कोई चीज वहां नहीं मिली. मेरा धड़धड़ धड़कता हुआ कलेजा कुछ शांत हुआ. लेकिन चिंता अब भी थी.

मेरी नजरों के सामने अखबारी खबरें घूम गईं. एकतरफा प्रेम के कारण या प्रेम सफल न होने के कारण आत्महत्या की कितनी ही खबरें मैं ने तटस्थ मन से पढ़ी, सुनी थीं. लेकिन अब जब अपने ऊपर बीत रही थी, तभी उन खबरों का मर्मभेदी दुख अनुभव कर पा रही थी.

मुझे बरसों पहले की वह घटना याद आई जब कमरे में घुस आई एक नन्ही चिडि़या को उड़ाने के प्रयत्न में मैं पंखा बंद करना भूल गई थी. चिडि़या पंखे से टकरा कर मर गईर् थी. उस की क्षतविक्षत देह और कमरे में चारों ओर बिखरे कोमल पंख मुझे अकसर अतीत के गलियारों में खींच ले जाते, और तब मन में एक टीस पैदा होती.

श्वेता के संदर्भ में उस चिडि़या का याद आना मुझे बड़ा अजीब लगा. मैं ने स्कूल में पुनीत को फोन किया. मेरी कंपकंपाहटभरी आवाज सुन कर शायद वे मेरी दुश्चिंता भांप गए और बोले, ‘धीरज रखिए, मैं आधे दिन की छुट्टी ले कर आप के घर आऊंगा.’

निश्चित समय पर पुनीत आए. मैं जितनी बेचैन थी, वे उतने ही शांत लग रहे थे.

मैं ने कहा, ‘आप को सुन कर अवश्य आश्चर्य होगा, पर मैं आज कुछ अलग ही तरह की बात कहने जा रही हूं,’ मैं ने अपनेआप को स्थिर कर के कहा, ‘आप श्वेता से शादी कर लीजिए, कहीं वह प्रेम में पागल हो कर आत्महत्या न कर ले.’ यह कहतेकहते फफकफफक कर रो पड़ी.

‘अपनेआप को संभालिए. श्वेता अभी बच्ची है मेरी छोटी बहन के समान. उस की उम्र अभी शादी की नहीं, सुनहरे भविष्य के निर्माण की है, जिस की आधारशिला हमें अपने हाथों से रखनी होगी.’

‘वह तो ठीक है, लेकिन आज उस ने पत्र लिखा है, जिस में…’

‘वह पत्र उस ने मुझे दिया है, आप घबराएं नहीं. जब तक मैं उसे नकारात्मक उत्तर नहीं दूंगा, तब तक कुछ नहीं होगा. अभी तक मैं ने उस के प्रेम को स्वीकारा नहीं है, तो नकारा भी नहीं है.’

‘लेकिन यह स्थिति कब तक कायम रहेगी?’ मैं ने पूछा.

‘अधिक दिन नहीं,’ वे बोले, ‘यह तो हम जान ही चुके हैं कि श्वेता का ऐसी हरकतें करना कुछ तो उस की किशोर उम्र का परिणाम है और कुछ फिल्मों का मायावी संसार उसे यह सबकुछ करने को उकसाता रहा है, क्योंकि वह फिल्में देखने की बहुत शौकीन है.’

‘जी हां, मगर फिल्म और वास्तविकता के बीच का फर्क उसे समझाएं तो कैसे. और समझ में आने पर भी क्या प्यार का भूत उस के सिर से उतर जाएगा?’

पुनीत कहीं और देख रहे थे, जैसे उन्होंने मेरा प्रश्न सुना ही न हो, फिर एकाएक बोल पड़े, ‘अब आप निश्चिंत रहिए. उस का यह फिल्मी तिलिस्म फिल्मी ढंग से ही टूटेगा.’ और वे चले गए.

मेरे मन में आया कि पति से इतनी गंभीर बात छिपा कर मैं कहीं गलती तो नहीं कर रही हूं. मगर जब औफिस से लौटने पर इन का थकाहारा चेहरा देखती तो बस, यही लगता कि इन के सामने ऐसी गंभीर समस्या न ही रखूं. यदि मैं अपने स्तर पर यह समस्या सुलझा सकूं तो बहुत अच्छा होगा और फिर पुनीत का पूरा साथ है ही. दूसरी बात, इन के गुस्से का भी क्या ठिकाना. यदि गुस्से में आ कर इन्होंने कोई कठोर कदम उठाया तो श्वेता न जाने क्या कर बैठे.

गनीमत यही थी कि पुनीत बहुत चरित्रवान थे. यदि वे छिछोरे युवकों जैसे होते तो हम कहीं के न रहते.

अगले दिन पुनीत हमारे घर फिर आए. श्वेता हमेशा की तरह बेहद खुश हुई. अब वे अकसर ही हमारे घर आने लगे. शायद श्वेता को इस बात से विश्वास हो चला था कि वे भी उसे चाहते हैं.

जब भी वे आते, अपने बारे में कुछ न कुछ ऊलजलूल बोलते चले जाते.

श्वेता कहती, ‘सर, यह चश्मा आप पर बहुत फबता है,’ तो कहते, ‘जानती हो, इस का नंबर है माइनस फाइव. 35 की उम्र तक पहुंचतेपहुंचते मैं अंधा हो जाऊंगा.’

श्वेता भी उन की बातों से कुछ ऊबती हुईर् नजर आती.

एक रोज वे घर पर आए. ठीक उसी वक्त फ्यूज उड़ जाने से बिजली चली गई. श्वेता उन से बोली, ‘मैं फ्यूज वायर ला देती हूं, आप जोड़ दीजिए.’

‘मैं और फ्यूज?’ वे इस तरह घबराए, जैसे कोई अनोखी बात सुन ली हो, ‘श्वेता, फ्यूज तो दूर, मैं बिजली का मामूली से मामूली काम भी नहीं जानता. करंट लगने से मैं बेहद डरता हूं.’

श्वेता ने उन की ओर आश्चर्य से देखा, ‘सर, फ्यूज तो मैं भी जोड़ लेती हूं. बस, मीटर बोर्ड कुछ ऊंचा होने के कारण आप से कह रही हूं.’

श्वेता ने मेज पर स्टूल रखा और फ्यूज ठीक कर दिया. पुनीत यह सब खामोशी से देख रहे थे.

रात को खाना खाते समय श्वेता हंसतेहंसते यह घटना अपने पिताजी को सुना रही थी. इतना लंबाचौड़ा युवक और फ्यूज सुधारने जैसा साधारण काम नहीं कर सकता. उस की हीरो वाली छवि को इस घटना से बड़ा धक्का लगा था.

पर उस रोज मैं न हंस पाई. मैं जानती थी कि पुनीत ने जानबूझ कर ऐसी हरकत की थी.

एक रोज उन्होंने एक और मनगढ़ंत घटना सुनाई कि जब वे कालेज में पढ़ते थे, एक चोर घर के अंदर घुस आया. वे चुपचाप सांस रोके लेटे रहे. चोर अलमारी में रखे 5-7 सौ रुपए ले कर भाग गया.

श्वेता उन की ओर अविश्वास से ताकती रही, फिर बोली, ‘कुछ भी हो, आप को उसे पकड़ने की कोशिश तो करनी ही चाहिए थी. आप के साथसाथ समाज का भी कुछ भला हो जाता.’

‘समाज के लिए मरमिटूं, मैं ऐसा बेवकूफ नहीं हूं,’ वे बोले. फिर कुछ क्षण ठहर कर कहने लगे, ‘समाज हमारे लिए क्या करता है? यों तो लोग दहेज विरोधी बातें भी खूब करते हैं, पर मैं क्यों न लूं दहेज? क्या समाज मेरी बहनों की मुफ्त में शादी करवा देगा?’

श्वेता कुछ नहीं बोली, अपने सपनों के राजकुमार की खंडित प्रतिमा को वह किसी तरह जोड़ नहीं पा रही थी.

उस के कुछ दिन बड़ी मानसिक ऊहापोह में गुजरे. फिर एक रोज उस ने शायद अपने कमजोर मन पर विजय पा ही ली.

एक दिन वह बोली, ‘मां, कुछ लोग ऐसे क्यों होते हैं?’

‘कैसे?’ मैं उस के प्रश्न का रुख समझ रही थी, फिर भी पूछ लिया.

‘देखने में बड़े आदर्शवादी, समाज सुधारक और बड़ीबड़ी बातें करने वाले और अंदर से धोखेबाज, मक्कार और झूठे हैं. जैसे, जैसे पुनीत सर.’ आंसू छिपाती हुई वह अपने कमरे में चली गई. मुझे उस के दिए हुए ये विशेषण बिलकुल अच्छे नहीं लगे. मैं सोच रही थी कि मेरी बेटी को सही राह पर लाने वाला व्यक्ति सिर्फ महान, समझदार और व्यवहारकुशल हो सकता है और कुछ नहीं.

मैं ने उसे समझाया, ‘बेटी, दुनिया में कई तरह के लोग होते हैं. सभी हमारी आकांक्षाओं के अनुरूप  नहीं होते. वे जैसे भी होते हैं, अपनी जगह पर सही होते हैं. इसलिए उन्हें बुराभला कहना ठीक नहीं.’

श्वेता ने मुझ से बहस नहीं की, पर धीरेधीरे उस का पुराना रूप लौटने लगा. मैं खुश थी.

एक दिन पुनीत का फोन आया कि श्वेता अब उन्हें पत्र नहीं लिखती, उन से दूसरी छात्राओं की तरह  ही पेश आती है. तब मैं ने उन्हें दिल से धन्यवाद दिया.

जिस तरह नाजुक हाथों से उलझे हुए रेशम को सुलझाया जाता है, उसी तरह नफासत से उन्होंने श्वेता के दिल की गुत्थी को सुलझाया था.

उस वर्ष वह जैसेतैसे द्वितीय श्रेणी ही पा सकी, जोकि स्वाभाविक ही था. लगभग पूरा वर्ष उस ने प्रेमवर्ष के रूप में ही तो मनाया था. पर उस के बाद वह पूरी तरह पढ़ाई में जुट गई. और अब उस का सपना भी पूरा हो गया. Family Story in Hindi

Funny Story : असली जिंदगी तो ये जी रहे हैं

Funny Story. यह अलग ही तरह का शख्स था. पता नहीं कहां कौन सी साधारण बात इसे खास लगने लगे, किस बात से मोहित हो जाए, कुछ कह नहीं सकते थे. जिन बातों से एक आम आदमी को ऊब होती थी, इस आदमी को उस में मजा आता था. एक अजीब सा आनंद आता था उसे. इस की अभिरुचि बिलकुल अलग ही तरह की थी. वैसे यह मेरा दोस्त है, फिर भी मैं कई बार सोचने को मजबूर हो जाता हूं कि आखिर यह आदमी किस मिट्टी का बना है. मिट्टी सी चीज में अकसर यह सोना देखता है और अकसर सोने पर इस की नजर ही नहीं जाती.

मैं इस के साथ मुंबई घूमने गया था. हम टैक्सी में दक्षिण मुंबई के इलाके में घूम रहे थे. हमारी टैक्सी बारबार सड़क पर लगे जाम के कारण रुक रही थी. जब टैक्सी ऐसे ही एक बार रुकी तो इस का ध्यान सड़क के किनारे बनी एक 25 मंजिली बिल्ंिडग की 15वीं मंजिल पर चला गया, जहां एक कमरा खुला दिख रहा था. मानसून का समय था. आसमान में बादल छाए थे. कमरे की लाइट जल रही थी, पंखा घूमता दिख रहा था. वह बोल उठा, ‘यार, इस को कहते हैं ऐश. देखो, अपन यहां ट्रैफिक में फंसे हैं और वो महाशय आराम फरमा रहे हैं, वह भी पंखे की हवा में.’

मैं ने सोचा इस में क्या ऐश की बात है? मैं ने कहा, ‘यार, वह आदमी जो उस कमरे में दिख रहा है, वह क्या कुछ काम नहीं करता होगा? आज कोई कारण होगा कि घर पर है.’

अब वह बोला, ‘यार, अपन यहां ट्रैफिक में फंसे हैं और वह ऐश कर रहा है. यह तो एक बिल्डिंग के एक माले के एक फ्लैट की बात है, यहां तो हर फ्लैट में लोग मजे कर रहे हैं.’

मैं ने झल्ला कर कहा, ‘हां, हर फ्लैट नहीं, हर फ्लैट के हर कमरे में कहो और अपन यहां ट्रैफिक में फंसे हुए हैं.’

यह तो एक घटना मुंबई की रही. एक दिन शाम को घूमते हुए शहर के रेलवे स्टेशन पर मिल गया. मैं शाने भोपाल ट्रेन से दिल्ली जा रहा था. यह तफरीह करने आया था. चूंकि ट्रेन के लिए समय था, सो हम एक बैंच पर बैठ गए. स्टेशन पर आजा रही ट्रेनों को यह टकटकी लगा कर देखता. बोगी में बैठे लोगों को देखता. यदि किसी एसी बोेगी में कोई यात्री दिख जाता आपस में बतियाते या खाना खाते, लेटे पत्रिका पढ़ते तो यह कहता, ‘यार, देखो इन के क्या ऐश हैं. मस्त एसी में यात्रा कर रहे हैं, खापी रहे हैं, गपशप कर रहे हैं और अपन यहां कुरसी पर बैठे हैं?’

मैं ने कहा, ‘यार, इस में क्या खास बात हो गई? अपन लोग भी जाते हैं तो इसी तरह मौज करते हैं यदि तुम्हारे पैमाने से बात तोली जाए.’ मैं ने आगे कहा, ‘वैसे मैं तो रेलयात्रा को एक बोरिंग चीज मानता हूं.’ अब मेरा मित्र बोल पड़ा, ‘अरे यार, तुम नहीं समझोगे क्या आनंद है यात्रा का. मस्ती में पड़े रहो, सोते ही रहो और यदि घर से परांठेसब्जी लाए हो तो उस का भी मजा अलग ही है. काश, अपन भी ऐसे ही इस समय ट्रेन की ऐसी ही किसी बोगी में बैठे होते तो मजा आ जाता.’

मैं ने कहा, ‘तो चल मेरे साथ? असल जिंदगी जीना, मैं तो खैर बोर होऊंगा तो होते रहूंगा.’ लेकिन इस बात पर यह मौन हो गया.

इसे कौन से साधारण दृश्य अपील कर जाएं, कहना मुश्किल था. एक बार मैं और यह कार से शहर से 80 किलोमीटर दूर स्थित एक प्रसिद्ध पिकनिक स्पौट को जा रहे थे. एक जगह ट्रैफिक कुछ धीमा हो गया था. इस की नजर सड़क के किनारे खड़े ट्रकों व उस के साइड में बैठे ड्राइवरक्लीनरों पर चली गई.

वे अपनी गाडिं़यां खड़ी कर खाना पका रहे थे. ईंटों के बने अस्थायी चूल्हे पर खाना पक रहा था. एक व्यक्ति रोटियां सेंक रहा था, एक सब्जी बना रहा था. बाकी बैठे गपशप कर रहे थे. बस, इतना दृश्य इस के लिए असली जिंदगी वाला इस का जुमला फेंकने और उसे लंबा सेंकने के लिए काफी था.

यह बोल उठा, ‘देखो यार, जिंदगी इस को कहते हैं मस्त, कहीं भी रुक गए, पकायाखाया, फिर सो गए और जब नींद खुली तो फिर चल दिए और अपन, बस चले जा रहे हैं. अभी किसी होटल में ऊटपटांग खाएंगे. ये अपने हाथ का ही बना खाते हैं, इस में  किसी मिलावट व अशुद्धता की गुंजाइश ही नहीं है. ऐसी गरम रोटियां होटल में कहीं मिलती हैं क्या?

मैं ने चिढ़ कर कहा, ‘ऐसा करते हैं अगली बार तुम भी रसोई का सामान ले कर चलना. अपन भी ऐसे ही सड़क के किनारे रुक कर असली जिंदगी का मजा लेंगे. और तुरंत ही मजा लेना है तो चल आगे, किसी शहरकसबे के बाजार से अपना तवा, बेलन और किराने का जरूरी सामान खरीद लेते हैं, इस पर वह मौन हो गया.

मैं एक बार इस के साथ हवाईजहाज से बेंगलुरु से देहरादून गया. फ्लाइट के 2 स्टौप बीच में थे. एयर होस्टैस और दूसरे हौस्पिटैलिटी स्टाफ के काम को यह देखतासुनता रहा. बाद में बोला, ‘यार, असली मजे तो इन्हीं के हैं? 2 घंटे में इधर, तो 2 घंटे में उधर. सुबह उठ कर ड्यूटी पर आए तो दिल्ली में थे, नाश्ता किया था मुंबई में. लंच लिया बेंगलुरु में और डिनर लेने फिर दिल्ली आ गए. करना क्या है, बस, मुसकराहटों को फेंकते चलना है. एक बार हर उड़ान में सैफ्टी निर्देशों का प्रदर्शन करना है, बस, फिर जा कर बैठ जाना है. प्लेन के लैंड करते समय फिर आ जाना है और यात्रियों के जाते समय बायबाय, बायबाय करना है. इसे कहते हैं जिंदगी.’

मैं ने कहा, ‘यार, तुझे हर दूसरे आदमी की जिंदगी अच्छी लगती है, अपनी नहीं.’ मैं ने आगे कहा कि इन की जिंदगी में रिस्क कितना है? अपन तो कभीकभी प्लेन में बैठते हैं तो हर बार सब से पहला खयाल सहीसलामती से गंतव्य पहुंच जाने का ही आता है. अब इस बात पर यह बंदा मौन हो गया, कुछ नहीं बोला. बस, इतना ही दोहरा दिया कि असली ऐश तो ये करते हैं.

एक और दिन की बात है. यह अपने खेल अनुभव के बारे में बता कर  दूसरों की जिंदगी में फिर से तमगे पर तमगे लगा रहा था. वनडे क्रिकेट मैच देख आया था नागपुर में, बोला, ‘यार, जिंदगी हो तो खिलाड़ी जैसी. कोई काम नहीं, बस, खेलो, खेलो और जम कर शोहरत व दौलत दोनों हाथों से बटोर लो. जनता भी क्या पगलाती है खिलाडि़यों को देख कर, इतनी भीड़, इतनी भीड़, कि बस, मत पूछो.’

मैं ने कहा, ‘बस कर यार, अभी पिछले सप्ताह प्रसिद्ध गायक सोनू निगम का कार्यक्रम हुआ था, उस में भी तेरा यह कहना था कि अरे बाप रे, क्या भीड़ है. लोग पागलों की तरह दाद दे रहे हैं, झूम रहे हैं. जिंदगी तो ऐसे कलाकारों की होती है’ मैं ने आगे कहा, ‘इस स्तर पर वे क्या ऐसे ही पहुंच गए हैं. न जाने कितने पापड़ बेले हैं, कितना संघर्ष किया है. असली कलाकार तो मैं तुझे मानता हूं जो असली जिंदगी को कहांकहां से निकाल ढूंढ़ता है.’

वह बोला, ‘यार, यह सब ठीक है. पापड़आपड़ तो सब बेलते हैं, लेकिन समय भी कुछ होता है. ये समय के धनी लोग हैं और अपन समय के कंगाल? घिसट कर जी रहे हैं.’ मैं ने कहा, ‘मैं तो तुम्हारी असली जिंदगी जीने की अगली उपमा किस के बारे में होगी, उस का इंतजार कर रहा हूं. तुम्हारा यह चेन स्मोकर की तरह का नशा हो गया है कि हर दूसरे दिन किसी दूसरे की जिंदगी में तुम्हें नूर दिखता है और अपनी जिंदगी कू्रर.’

वह कुछ नहीं बोला. अब उस के मौन हो जाने की बारी थी. उस का मौन देख कर मैं ने भी अब मौन रहना उचित समझा, वरना मैं ने कुछ कहा तो पता नहीं यह फिर किस से तुलना कर के अपने को और मुझे भी नीचा फील करवा दे.

मेरे इस दोस्त का नाम तकी रजा है. महीनेभर बाद पिछले शनिवार को मैं इस से मिलने घर गया था. मैं आजकल इस के ‘असली जिंदगी इन की है’ जुमले से थोड़ा डरने लगा हूं. मुझे लग रहा था कि कहीं यह मेरे पहुंचते ही ‘असली जिंदगी तो इन की है’ कह कर स्वागत न कर दे. मैं इस के घर का गेट खोल कर अंदर दाखिल हुआ. यह लौन में ही बैठा हुआ था.

मेरी ओर इस की नजर गई. लेकिन तकी, जो ऊपर को टकटकी लगाए कुछ देख रहा था, ने तुरंत नजर ऊपर कर ली. मैं उस के सामने पड़ी कुरसी पर जा कर बैठ गया. उस के घुटनों को छू कर मैं ने कहा कि क्या बात है, सब ठीक तो है? वह मेरे यह बोलते ही बोला, ‘क्या ठीक है यार, ऊपर देख? कैसे एक तोता मस्त अमरूद का स्वाद ले रहा है?’

मैं ने ऊपर की तरफ देखा, वाकई एक सुरमी हरे रंग का लेकिन लाल रंग की चोंच, जोकि तोते की होती ही है, वाला तोता अमरूद कुतरकुतर कर खा रहा था और बारीकबारीक अमरूद के कुछ टुकड़े नीचे गिर रहे थे. थोड़ी देर बाद वह फुर्र से टांयटांय करते उड़ गया. फिर एक दूसरा तोता आ गया. उस के पीछे 2-3 तोते और आ गए. वे सब एकएक अमरूद पर बैठ गए.

एक अमरूद पर तो 2 तोते भी बैठ कर उसे 2 छोरों से कुतरने लगे. कौमी एकता का दृश्य था. तकी बोला, ‘यार, असली जिंदगी तो इन की है. जमीन पर आने की जरूरत ही नहीं, हवा में रहते ही नाश्ता, खाना, टौयलेट सब कर लिया.’ और हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि तकी ने जैसे ही यह बोला कि एक तोता, जो उस के सिर के ठीक ऊपर वाली डाल पर था, ने अपना वेस्ट मैटेरियल सीधे तकी के सिर पर ही गिरा दिया.

‘यह भी कोई तरीका है,’ कह कर तकी अंदर की ओर भागा. जब वह वापस आया तो मैं ने कहा, ‘हां यार, वाकई असली जिंदगी ये ही जी रहे हैं.’ तकी ने मुझे खा जाने वाली नजरों से देखा.

मैं ने इस के ‘असली जिंदगी ये जी रहे हैं’ वाले आगामी बेभाव पड़ने वाले डायलौग से बचने के लिए बात को आम भारतीय की तरह महंगाई को कोसने के शाश्वत विषय की ओर मोड़ दिया.

तकी बोला, ‘हां यार, यह महंगाई तो जान ले रही है.’ लेकिन थोड़ी ही देर में असली जिंदगी तो ये जी रहे हैं’ का साजोसामान ले जाती कुछ बैलगाडि़यां सामने से निकल रही थीं. ये गड़रियालुहार थे जोकि खानाबदोश जिंदगी जीते हैं. बैलगाडि़यों पर पलंग, बच्चे और सब सामान लदा दिख रहा था. अब तकी टकटकी लगा कर इन्हें ही देख रहा था. उस की आंखों ने बहुतकुछ देख लिया जो कि उसे बाद में शब्दों में प्रकट कर मेरी ओर शूट करना था. अंतिम बैलगाड़ी जब तक 25 मीटर के लगभग दूर नहीं पहुंच गई, यह उसे टकटकी लगा कर देखता ही रहा. अब वह बोला, ‘यार, जिंदगी तो इन की है?’

मैं ने कहा, ‘खानाबदोश जिंदगी भी कोई जिंदगी है?’

वह बोला, ‘यार, तुम नहीं समझोगे, इसी में जिंदगी का मजा है. एक जगह से दूसरी जगह को ये लोग हमेशा घूमते रहते हैं. कहीं भी रुक लिए और कहीं भी बनाखा लिया, और कहीं भी रात गुजार ली. भविष्य की कोई चिंता नहीं, मस्तमौला, घुमक्कड़ जिंदगी, सब को कहां मिलती है.’

मैं ने सोचा कि इस को भी यह अच्छा कह रहा है. अब तो यहां से रवानगी डालना ही ठीक होगा, वरना ‘असली जिंदगी तो इन की है’ का कोई न कोई नया संस्करण कहीं न कहीं से इस के लिए प्रकट हो जाएगा, जिसे वह मेरे पर शूट करेगा जो कि मुझे आजकल हकीकत की गोली से भी तेज लगने लगा है. Funny Story

Hindi Social Story : जीत गया जंगवीर

Hindi Social Story. ‘‘खत आया है…खत आया है,’’ पिंजरे में बैठी सारिका शोर मचाए जा रही थी. दोपहर के भोजन के बाद तनिक लेटी ही थी कि सारिका ने चीखना शुरू कर दिया तो जेठ की दोपहरी में कमरे की ठंडक छोड़ मुख्यद्वार तक जाना पड़ा.

देखा, छोटी भाभी का पत्र था और सब बातें छोड़ एक ही पंक्ति आंखों से दिल में खंजर सी उतर गई, ‘दीदी आप की सखी जगवीरी का इंतकाल हो गया. सुना है, बड़ा कष्ट पाया बेचारी ने.’ पढ़ते ही आंखें बरसने लगीं. पत्र के अक्षर आंसुओं से धुल गए. पत्र एक ओर रख कर मन के सैलाब को आंखों से बाहर निकलने की छूट दे कर 25 वर्ष पहले के वक्त के गलियारे में खो गई मैं.

जगवीरी मेरी सखी ही नहीं बल्कि सच्ची शुभचिंतक, बहन और संरक्षिका भी थी. जब से मिली थी संरक्षण ही तो किया था मेरा. जयपुर मेडिकल कालेज का वह पहला दिन था. सीनियर लड़केलड़कियों का दल रैगिंग के लिए सामने खड़ा था. मैं नए छात्रछात्राओं के पीछे दुबकी खड़ी थी. औरों की दुर्गति देख कर पसीने से तरबतर सोच रही थी कि अभी घर भाग जाऊं.

वैसे भी मैं देहातनुमा कसबे की लड़की, सब से अलग दिखाई दे रही थी. मेरा नंबर भी आना ही था. मुझे देखते ही एक बोला, ‘अरे, यह तो बहनजी हैं.’ ‘नहीं, यार, माताजी हैं.’ ऐसी ही तरहतरह की आवाजें सुन कर मेरे पैर कांपे और मैं धड़ाम से गिरी. एक लड़का मेरी ओर लपका, तभी एक कड़कती आवाज आई, ‘इसे छोड़ो. कोई इस की रैगिंग नहीं करेगा.’

‘क्यों, तेरी कुछ लगती है यह?’ एक फैशनेबल तितली ने मुंह बना कर पूछा तो तड़ाक से एक चांटा उस के गाल पर पड़ा. ‘चलो भाई, इस के कौन मुंह लगे,’ कहते हुए सब वहां से चले गए. मैं ने अपनी त्राणकर्ता को देखा. लड़कों जैसा डीलडौल, पर लंबी वेणी बता रही थी कि वह लड़की है. उस ने प्यार से मुझे उठाया, परिचय पूछा, फिर बोली, ‘मेरा नाम जगवीरी है. सब लोग मुझे जंगवीर कहते हैं. तुम चिंता मत करो. अब तुम्हें कोई कुछ भी नहीं कहेगा और कोई काम या परेशानी हो तो मुझे बताना.’

सचमुच उस के बाद मुझे किसी ने परेशान नहीं किया. होस्टल में जगवीरी ने सीनियर विंग में अपने कमरे के पास ही मुझे कमरा दिलवा दिया. मुझे दूसरे जूनियर्स की तरह अपना कमरा किसी से शेयर भी नहीं करना पड़ा. मेस में भी अच्छाखासा ध्यान रखा जाता. लड़कियां मुझ से खिंचीखिंची रहतीं. कभीकभी फुसफुसाहट भी सुनाई पड़ती, ‘जगवीरी की नई ‘वो’ आ रही है.’ लड़के मुझे देख कर कन्नी काटते. इन सब बातों को दरकिनार कर मैं ने स्वयं को पढ़ाई में डुबो दिया. थोड़े दिनों में ही मेरी गिनती कुशाग्र छात्रछात्राओं में होने लगी और सभी प्रोफेसर मुझे पहचानने तथा महत्त्व भी देने लगे.

जगवीरी कालेज में कभीकभी ही दिखाई पड़ती. 4-5 लड़कियां हमेशा उस के आगेपीछे होतीं.

एक बार जगवीरी मुझे कैंटीन खींच ले गई. वहां बैठे सभी लड़केलड़कियों ने उस के सामने अपनी फरमाइशें ऐसे रखनी शुरू कर दीं जैसे वह सब की अम्मां हो. उस ने भी उदारता से कैंटीन वाले को फरमान सुना दिया, ‘भाई, जो कुछ भी ये बच्चे मांगें, खिलापिला दे.’

मैं समझ गई कि जगवीरी किसी धनी परिवार की लाड़ली है. वह कई बार मेरे कमरे में आ बैठती. सिर पर हाथ फेरती. हाथों को सहलाती, मेरा चेहरा हथेलियों में ले मुझे एकटक निहारती, किसी रोमांटिक सिनेमा के दृश्य की सी उस की ये हरकतें मुझे विचित्र लगतीं. उस से इन हरकतों को अच्छी अथवा बुरी की परिसीमा में न बांध पाने पर भी मैं सिहर जाती. मैं कहती, ‘प्लीज हमें पढ़ने दीजिए.’ तो वह कहती, ‘मुनिया, जयपुर आई है तो शहर भी तो देख, मौजमस्ती भी कर. हर समय पढ़ेगी तो दिमाग चल जाएगा.’

वह कई बार मुझे गुलाबी शहर के सुंदर बाजार घुमाने ले गई. छोटीबड़ी चौपड़, जौहरी बाजार, एम.आई. रोड ले जाती और मेरे मना करतेकरते भी वह कुछ कपड़े खरीद ही देती मेरे लिए. यह सब अच्छा भी लगता और डर भी लगा रहता.

एक बार 3 दिन की छुट्टियां पड़ीं तो आसपास की सभी लड़कियां घर चली गईं. जगवीरी मुझे राजमंदिर में पिक्चर दिखाने ले गई. उमराव जान लगी हुई थी. मैं उस के दृश्यों में खोई हुई थी कि मुझे अपने चेहरे पर गरम सांसों का एहसास हुआ. जगवीरी के हाथ मेरी गरदन से नीचे की ओर फिसल रहे थे. मुझे लगने लगा जैसे कोई सांप मेरे सीने पर रेंग रहा है. जिस बात की आशंका उस की हरकतों से होती थी, वह सामने थी. मैं उस का हाथ झटक अंधेरे में ही गिरतीपड़ती बाहर भागी. आज फिर मन हो रहा था कि घर लौट जाऊं.

मैं रो कर मन का गुबार निकाल भी न पाई थी कि जगवीरी आ धमकी. मुझे एक गुडि़या की तरह जबरदस्ती गोद में बिठा कर बोली, ‘क्यों रो रही हो मुनिया? पिक्चर छोड़ कर भाग आईं.’

‘हमें यह सब अच्छा नहीं लगता, दीदी. हमारे मम्मीपापा बहुत गरीब हैं. यदि हम डाक्टर नहीं बन पाए या हमारे विषय में उन्होंने कुछ ऐसावैसा सुना तो…’ मैं ने सुबकते हुए कह ही दिया.

‘अच्छा, चल चुप हो जा. अब कभी ऐसा नहीं होगा. तुम हमें बहुत प्यारी लगती हो, गुडि़या सी. आज से तुम हमारी छोटी बहन, असल में हमारे 5 भाई हैं. पांचों हम से बड़े, हमें प्यार बहुत मिलता है पर हम किसे लाड़लड़ाएं,’ कह कर उस ने मेरा माथा चूम लिया. सचमुच उस चुंबन में मां की महक थी.

जगवीरी से हर प्रकार का संरक्षण और लाड़प्यार पाते कब 5 साल बीत गए पता ही न चला. प्रशिक्षण पूरा होने को था तभी बूआ की लड़की के विवाह में मुझे दिल्ली जाना पड़ा. वहां कुणाल ने, जो दिल्ली में डाक्टर थे, मुझे पसंद कर उसी मंडप में ब्याह रचा लिया. मेरी शादी में शामिल न हो पाने के कारण जगवीरी पहले तो रूठी फिर कुणाल और मुझ को महंगेमहंगे उपहारों से लाद दिया.

मैं दिल्ली आ गई. जगवीरी 7 साल में भी डाक्टर न बन पाई, तब उस के भाई उसे हठ कर के घर ले गए और उस का विवाह तय कर दिया. उस के विवाह के निमंत्रणपत्र के साथ जगवीरी का स्नेह, अनुरोध भरा लंबा सा पत्र भी था. मैं ने कुणाल को बता रखा था कि यदि जगवीरी न होती तो पहले दिन ही मैं कालेज से भाग आई होती. मुझे डाक्टर बनाने का श्रेय मातापिता के साथसाथ जगवीरी को भी है.

जयपुर से लगभग 58 किलोमीटर दूर के एक गांव में थी जगवीरी के पिता की शानदार हवेली. पूरे गांव में सफाई और सजावट हो रही थी. मुझे और पति को बेटीदामाद सा सम्मानसत्कार मिला. जगवीरी का पति बहुत ही सुंदर, सजीला युवक था. बातचीत में बहुत विनम्र और कुशल. पता चला सूरत और अहमदाबाद में उस की कपड़े की मिलें हैं.

सोचा था जगवीरी सुंदर और संपन्न ससुराल में रचबस जाएगी, पर कहां? हर हफ्ते उस का लंबाचौड़ा पत्र आ जाता, जिस में ससुराल की उबाऊ व्यस्तताओं और मारवाड़ी रिवाजों के बंधनों का रोना होता. सुहाग, सुख या उत्साह का कोई रंग उस में ढूंढ़े न मिलता. गृहस्थसुख विधाता शायद जगवीरी की कुंडली में लिखना ही भूल गया था. तभी तो साल भी न बीता कि उस का पति उसे छोड़ गया. पता चला कि शरीर से तंदुरुस्त दिखाई देने वाला उस का पति गजराज ब्लडकैंसर से पीडि़त था. हर साल छह महीने बाद चिकित्सा के लिए वह अमेरिका जाता था. अब भी वह विशेष वायुयान से पत्नी और डाक्टर के साथ अमेरिका जा रहा था. रास्ते में ही उसे काल ने घेर लिया. सारा व्यापार जेठ संभालता था, मिलों और संपत्ति में हिस्सा देने के लिए वह जगवीरी से जो चाहता था वह तो शायद जगवीरी ने गजराज को भी नहीं दिया था. वह उस के लिए बनी ही कहां थी.

एक दिन जगवीरी दिल्ली आ पहुंची. वही पुराना मर्दाना लिबास. अब बाल भी लड़कों की तरह रख लिए थे. उस के व्यवहार में वैधव्य की कोई वेदना, उदासी या चिंता नहीं दिखी. मेरी बेटी मान्या साल भर की भी न थी. उस के लिए हम ने आया रखी हुई थी.

जगवीरी जब आती तो 10-15 दिन से पहले न जाती. मेरे या कुणाल के ड्यूटी से लौटने तक वह आया को अपने पास उलझाए रखती. मान्या की इस उपेक्षा से कुणाल को बहुत क्रोध आता. बुरा तो मुझे भी बहुत लगता था पर जगवीरी के उपकार याद कर चुप रह जाती. धीरेधीरे जगवीरी का दिल्ली आगमन और प्रवास बढ़ता जा रहा था और कुणाल का गुस्सा भी. सब से अधिक तनाव तो इस कारण होता था कि जगवीरी आते ही हमारे डबल बैड पर जम जाती और कहती, ‘यार, कुणाल, तुम तो सदा ही कनक के पास रहते हो, इस पर हमारा भी हक है. दोचार दिन ड्राइंगरूम में ही सो जाओ.’

कुणाल उस के पागलपन से चिढ़ते ही थे, उस का नाम भी उन्होंने डाक्टर पगलानंद रख रखा था. परंतु उस की ऐसी हरकतों से तो कुणाल को संदेह हो गया. मैं ने लाख समझाया कि वह मुझे छोटी बहन मानती है पर शक का जहर कुणाल के दिलोदिमाग में बढ़ता ही चला गया और एक दिन उन्होंने कह ही दिया, ‘कनक, तुम्हें मुझ में और जगवीरी में से एक को चुनना होगा. यदि तुम मुझे चाहती हो तो उस से स्पष्ट कह दो कि तुम से कोई संबंध न रखे और यहां कभी न आए, अन्यथा मैं यहां से चला जाऊंगा.’

यह तो अच्छा हुआ कि जगवीरी से कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ी. उस के भाइयों के प्रयास से उसे ससुराल की संपत्ति में से अच्छीखासी रकम मिल गई. वह नेपाल चली गई. वहां उस ने एक बहुत बड़ा नर्सिंगहोम बना लिया. 10-15 दिन में वहां से उस के 3-4 पत्र आ गए, जिन में हम दोनों को यहां से दोगुने वेतन पर नेपाल आ जाने का आग्रह था.

मुझे पता था कि जगवीरी एक स्थान पर टिक कर रहने वाली नहीं है. वह भारत आते ही मेरे पास आ धमकेगी. फिर वही क्लेश और तनाव होगा और दांव पर लग जाएगी मेरी गृहस्थी. हम ने मकान बदला, संयोग से एक नए अस्पताल में मुझे और कुणाल को नियुक्ति भी मिल गई. मेरा अनुमान ठीक था. रमता जोगी जैसी जगवीरी नेपाल में 4 साल भी न टिकी. दिल्ली में हमें ढूंढ़ने में असफल रही तो मेरे मायके जा पहुंची. मैं ने भाईभाभियों को कुणाल की नापसंदगी और नाराजगी बता कर जगवीरी को हमारा पता एवं फोन नंबर देने के लिए कतई मना किया हुआ था.

जगवीरी ने मेरे मायके के बहुत चक्कर लगाए, चीखी, चिल्लाई, पागलों जैसी चेष्टाएं कीं परंतु हमारा पता न पा सकी. तब हार कर उस ने वहीं नर्सिंगहोम खोल लिया. शायद इस आशा से कि कभी तो वह मुझ से वहां मिल सकेगी. मैं इतनी भयभीत हो गई, उस पागल के प्रेम से कि वारत्योहार पर भी मायके जाना छूट सा गया. हां, भाभियों के फोन तथा यदाकदा आने वाले पत्रों से अपनी अनोखी सखी के समाचार अवश्य मिल जाते थे जो मन को विषाद से भर जाते.

उस के नर्सिंगहोम में मुफ्तखोर ही अधिक आते थे. जगवीरी की दयालुता का लाभ उठा कर इलाज कराते और पीठ पीछे उस का उपहास करते. कुछ आदतें तो जगवीरी की ऐसी थीं ही कि कोई लेडी डाक्टर, सुंदर नर्स वहां टिक न पाती. सुना था किसी शांति नाम की नर्स को पूरा नर्सिंगहोम, रुपएपैसे उस ने सौंप दिए. वे दोनों पतिपत्नी की तरह खुल्लमखुल्ला रहते हैं. बहुत बदनामी हो रही है जगवीरी की. भाभी कहतीं कि हमें तो यह सोच कर ही शर्म आती है कि वह तुम्हारी सखी है. सुनसुन कर बहुत दुख होता, परंतु अभी तो बहुत कुछ सुनना शेष था. एक दिन पता चला कि शांति ने जगवीरी का नर्सिंगहोम, कोठी, कुल संपत्ति अपने नाम करा कर उसे पागल करार दे दिया. पागलखाने में यातनाएं झेलते हुए उस ने मुझे बहुत याद किया. उस के भाइयों को जब इस स्थिति का पता किसी प्रकार चला तो वे अपनी नाजों पली बहन को लेने पहुंचे. पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी, अनंत यात्रा पर निकल चुकी थी जगवीरी.

मैं सोच रही थी कि एक ममत्व भरे हृदय की नारी सामान्य स्त्री का, गृहिणी का, मां का जीवन किस कारण नहीं जी सकी. उस के अंतस में छिपे जंगवीर ने उसे कहीं का न छोड़ा. तभी मेरी आंख लग गई और मैं ने देखा जगवीरी कई पैकेटों से लदीफंदी मेरे सिरहाने आ बैठी, ‘जाओ, मैं नहीं बोलती, इतने दिन बाद आई हो,’ मैं ने कहा. वह बोली, ‘तुम ने ही तो मना किया था. अब आ गई हूं, न जाऊंगी कहीं.’

तभी मुझे मान्या की आवाज सुनाई दी, ‘‘मम्मा, किस से बात कर रही हो?’’ आंखें खोल कर देखा शाम हो गई थी. Hindi Social Story

Vyangya Kahaani: श्मशानघाट का सौंदर्यीकरण – यही से होते हैं टेक औफ

Vyangya Kahaani. पहले अर्थी को कंधा देना नेक कार्य माना जाता था पर अब औपचारिकता हो गई है. अब तो घर से मुक्तिवाहन तक और श्मशान घाट के प्रवेशद्वार से चितास्थल तक सांकेतिक कंधे देना प्रचलन में आ गया है. अधिकांश मुक्तिवाहन नगरनिगम के ‘राइटअप’ हो चुके ट्रकों का परिमार्जित संस्करण होते हैं.

शहरों के बेतरतीब विकास को देख कर लगता है कि इन का विकास श्मशान घाट यानी कब्रिस्तान को केंद्र मान कर किया गया है. आदमी कहीं जाए या न जाए, पर यहां तो सभी को आना है. जैसे शासन की नीति है कि स्कूल सभी को जाना है, वैसे ही आदमी की नियति है कि अंत में सभी को यहीं आना है.

जिस प्रकार 2 किलोमीटर के दायरे में प्राइमरी स्कूल का शासकीय प्रावधान है, जिस से बच्चों को अधिक न चलना पड़े, वैसे ही 5 किलोमीटर के दायरे में श्मशान केंद्र होना चाहिए, जिस से ले जाने वालों को आत्मिक शांति मिल सके, जाने वाला तो चिरशांति को प्राप्त हो ही जाता है.

ऐसे ही, मुक्तिधाम की यात्रा पर दिवंगत पिताजी की अर्थी को ले कर मुक्तिवाहन से मंत्रीजी रवाना हुए. अभी कुछ ही आगे बढ़े थे कि अर्थी हिली, एक चमचा प्रकार का प्राणी बोला, ‘‘माननीय पिताजी लौट आए.’’ सभी अर्थी को देखने लगे, मंत्रीजी ने माथा छुआ, ठंडा था, नाक के आगे उंगली की, श्वास नदारद. वे गमगीन हो गए.

इतने में अर्थी के साथसाथ वाहन में सवार अन्य लोग भी हिले, फिर तो हिलनेडुलने का सिलसिला चल निकला. किसी ने पंडितजी से पूछा, ‘‘पंडितजी, पिताजी स्वर्ग ही गए हैं न?’’ पंडितजी बोले, ‘‘सौ प्रतिशत, कनागत में प्राण छोड़े हैं, स्वर्ग के दरवाजे खुले मिलेंगे.’’

‘‘पर, स्वर्ग का रास्ता बहुत खराब है,’’ मंत्रीजी धीरेधीरे बोले. ‘‘आप के हाथ में है श्रीमान. आप वसुधा के इंद्र हैं, यहां पर स्वर्गमार्ग का निर्माण कर सकते हैं. इहलोक के साथसाथ परलोक में भी आप की कीर्तिपताका फहरेगी,’’ पंडितजी ने प्रशस्तिवाचन किया.

मंत्रीजी विचारमग्न हो गए. उन्हें इस घटना ने अंदर तक हिला दिया. जैसेतैसे अंतिम संस्कार संपन्न हुआ, तेरहवीं भी धूमधाम से संपन्न हुई. प्रशासन ने मंत्रीजी की भावनाओं के अनुरूप स्वर्गमार्ग के निर्माण की योजना प्रस्तुत की जो शासन द्वारा स्वीकृति को प्राप्त हुई.

स्वर्गमार्ग का प्रचार जोरशोर से किया गया- ‘संवेदनशील शासन की पहचान, अब स्वर्ग जाना आसान.’ मार्ग के शुभारंभ हेतु माननीय मंत्रीजी के साथ प्रशासन व सम्माननीय नागरिक श्मशान घाट में उपस्थित थे. यहां की समस्याओं के समाधान हेतु यहीं बैठक आयोजित की गई.

वरिष्ठ संघ के अध्यक्ष ने माइक संभाला और बोले, ‘‘राजा हो, रंक हो, सभी को यहां आना है. यह हमारे शासन की, माननीय मंत्रीजी की संवेदनशीलता है कि वे मुर्दों की भी चिंता करते हैं. जिंदा लोग तो अपनी यात्रा कैसे भी पूरी कर लेते हैं, पर मुर्दा बेचारा क्या कर सकता है? न चल सके, न बोल सके? कैसे अपनी व्यथा कहे? उस की व्यथा को शासन ने अनुभूत किया और हमारे आदरणीय मंत्रीजी के सदप्रयासों से यह शुभ घड़ी आई. हम उन्हें हार्दिक धन्यवाद देते हैं कि अब हम निश्ंिचत हो कर मर सकेंगे, धन्यवाद.’’

श्मशान घाट तालियों से गूंज उठा, एक आक्रोशित युवा नागरिक ने माइक पकड़ा और बोला, ‘‘सर, यह तो ठीक है पर हमें यहां की समस्याओं पर भी ध्यान देना चाहिए. हम यहां आते हैं, कभीकभी हमें एकदो घंटे इंतजार भी करना पड़ता है. समय ही सोना है, जिन्हें सोना था वे तो हमेशा के लिए सो गए, पर हमें समय का सदुपयोग करना सीखना होगा. श्मशान घाट में एक साइबर कैफे हो, जिस से समय का सदुपयोग हो सके.’’

‘‘अवश्य, तुम्हारा मन नहीं भटकेगा, चैटिंग भी होगी और सैटिंग भी, दुख से प्रभावित नहीं होंगे, अच्छा सुझाव है,’’ नगीना बाबू बोले. ‘‘पुराने लोग, पुरानी बातें,’’ कुछ नवयुवक एकसाथ बोले.

‘‘शांत युवको, शांत. आप तरुण हैं, आप वर्तमान हैं, ये अतीत,’’ मंत्रीजी अब बुजुर्गवार की ओर देखते हुए बोले, ‘‘इन की सुननी पड़ेगी, चाचा, साइबर कैफ का सुझाव अच्छा है. और कोई सुझाव युवको?’’ ‘‘सर, स्वर्ग में एक स्पा भी खुल जाए तो अच्छा रहे, यहीं से फ्रैश हो कर बाहर निकलें,’’ एक आधुनिक युवक बोला.

‘‘स्विमिंग पूल और भी अच्छा रहेगा, नहाने के साथ ऐक्सरसाइज भी हो जाएगी.’’ ‘‘सत्य वचन’’, पंडितजी ने समर्थन किया, फिर बोले, ‘‘श्मशान घाट जाने से व्यक्ति अशुद्ध हो जाता है. पूर्वकाल में घाट पर स्नान करने का विधान था. घाट शब्द इसी का सूचक है, जैसे नर्मदा के घाट, गंगा के घाट वैसे ही श्मशान घाट, यहां मृत शरीर अग्नि स्नान करता है और हम जल स्नान.’’

तभी मंत्रीजी को किसी ने एक पर्ची थमा दी, पढ़ कर वे गंभीर स्वर में बोले, ‘‘भाइयो और बहनो, आवागमन निरंतर प्रक्रिया है, कल हम वहां थे, आज यहां हैं, कल कहां होंगे, कुछ नहीं पता.’’ एक अंतिम यात्रा का जुलूस वहां से गुजरा. मंत्रीजी भावविह्वल हो गए, ‘‘ये जो हमें छोड़ कर जा रहे हैं, हमारे बचपन के मित्र हैं.’’

फिर पर्ची देखते हुए बोले, ‘‘रामदयाल जी, राम की इन पर दया हो गई, अपने पास बुला लिया. हमें अभी और भुगतना है, सो, हम यहां हैं. इन के बेटे, हो सकता है, हमें न जानते हों, पर हम जानते हैं. मैं ने इन्हें बचपन में खिलाया है.’’ ‘प्रभु, आप अंतर्यामी हैं, घटघट वासी हैं,’ नगीना बाबू मन ही मन बोले फिर कहा, ‘‘आप को कौन नहीं जानता, मान्यवर. यहां का एकएक वोटर जानता है. किसी महान आत्मा ने ही यह नश्वर शरीर धारण किया है श्मशान को आबाद करने के लिए.’’

‘‘यह समय महिमामंडन का नहीं, हम श्रद्धांजलि दे कर आते हैं,’’ कहते हुए मंत्रीजी ने मृतशरीर पर पुष्पांजलि अर्पित की, हाथ जोड़े, आंखें बंद कीं, सिर झुकाया. अभी तक राम नाम सत्य है, के नारे लग रहे थे, एकाएक नारों का स्वर बदला, अब ‘मंत्रीजी जिंदाबाद, रामदयाल अमर रहें. मंत्रीजी संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं, मंत्रीजी अमर रहे,’ के नारे लगने लगे. ‘मंत्रीजी अभी मरे कहां हैं, जो अमर रहेंगे,’ नगीना बाबू सोच रहे थे.

मंत्रीजी नारों से ऊर्जा ग्रहण कर रहे थे. ऊर्जा अश्रुरूप में बह निकली. सभी भावविह्वल हो गए. रामदयाल के पुत्र व सगेसंबंधी अचंभित थे कि पापा की मित्रता मंत्रीजी से थी और उन्होंने बताया भी नहीं, कितने सिद्धांतवादी थे, मित्रता का दुरुपयोग नहीं किया. 2 बेरोजगार बेटे और एक कुंआरी बेटी छोड़ कर गए. किसी से कुछ नहीं मांगा. बेटों के हृदय में आशा की किरण फूटी. संवेदना जागी. मंत्रीजी की ओर देखते हुए वे रो पड़े, ‘‘चाचाजी, पापा तो रहे नहीं, अब आप ही सहारा हैं.’’ ‘‘बिलकुल, कभी भी आ जाना, हम हैं न,’’ मंत्रीजी ने दिलासा दी.

रामदयाल के बड़े भैया गंभीर हो गए. उन्होंने मंत्रीजी की बचपन की शक्ल याद करने की कोशिश की. असफल रहे तो हाथ जोड़ कर बोले, ‘‘भैया रामू तो रहा नहीं, अब तुम्हीं हो, तुम्हारी दोस्ती की चर्चा तो गलीगली में थी, क्या जोड़ी थी सुदामाकृष्ण की. रामू जातेजाते कह गया था, ‘भैया, हर काम का शुभारंभ मंत्रीजी करते हैं. अगर मैं मर जाऊं तो मुझे पहली लकड़ी मेरा दोस्त मंत्री दे, उसे भी याद आ जाएगा रामदयाल नहीं रहा.’ ’’

मंत्रीजी अचकचा गए. फिर बात संभालते हुए बोले, ‘‘हम किसी का अधिकार नहीं छीनते. लकड़ी देने का पहला अधिकार पुत्र को है. वही देंगे. जल्दी करें, विलंब अच्छा नहीं. राम नाम सत्य है.’’ यह कह कर मंत्रीजी ने हाथ जोड़े. वह अंतिम यात्रा आगे बढ़ गई. मंत्रीजी वापस लौट आए, फिर सिर उठा कर बोले, ‘‘सब नियति है, जो होना था, होगा पर शो मस्ट गो औन. हां, आगे कहिए?’’

‘‘सर, साइबर कैफे, स्विमिंग पूल तो ठीक हैं, पर बजट में प्रावधान नहीं है,’’ नगर निगम के अधिकारी बोले. ‘‘सड़क का प्रावधान था क्या? पर बन रही है न. सब हो जाएगा. आप सोचिए मत, सोचने का काम हमारा है. आप आदेशों का पालन करें. हमारे यहां सोचने की बहुत बुरी बीमारी है. चपरासी सोचता है औफिस हम चला रहे हैं. साहिब सोचते हैं हम, समय कहता है सब हम से चलता है,’’ मंत्रीजी ने समझाया.

‘और आप समझते हैं कि देश हम चला रहे हैं. वह तो रामभरोसे चल रहा है,’ अधिकारी मन ही मन कुड़कुड़ाते हुए सोच रहा था, प्रत्यक्ष में बोला, ‘‘सर, ठीक है.’’ ‘‘पंडितजी, आप बताइए, आप तो श्मशान आते ही रहते हैं,’’ मंत्रीजी ने बात आगे बढ़ाई.

‘‘देखिए श्रीमान, हम ने अभी तक 15,001 शरीरों का अंतिम संस्कार कराया है.’’ ‘‘फिर तो आप गिनीज बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड्स में प्रविष्टि क्यों नहीं भेज देते,’’ नगीना बाबू ने सुझाव दिया.

पंडितजी मुसकराए, ‘‘यह तो हमारा कर्म है, सांसारिक वस्तुओं से हमें क्या? हमारे यजमान हमें जीवित होने पर देते हैं और उन की संतानें मृत्यु पश्चात. श्रीमानजी, आप जैसे पुरुष मिलते कहां हैं? एक सत्यवादी हरिश्चंद्र थे जिन्होंने श्मशान अपनाया और एक आप कलियुग के हरिश्चंद्र. आप धन्य हैं.

शास्त्रों में लिखा है, मुत्युपरांत आत्माएं कुछ समय यहीं निवास करती हैं. देखिए कैसा वीरान है यह घाट, हमारे पूर्वजों की आत्माएं कितना कष्ट उठाती होंगी? क्यों न इस के सौंदर्यीकरण की सोची जाए, जिस से आत्माओं को अच्छा वातावरण मिल सके.’’ ‘‘क्यों नहीं, क्यों नहीं? अवश्य, अच्छा सुझाव है. बताइए, कितनी जमीन है, क्या व्यय आएगा?’’ मंत्रीजी ने पूछा.

‘‘सर, 20 एकड़, एक एकड़ में क्रियाकर्म, सभाएं होती हैं, जीवंत हैं, शेष 19 एकड़ अनुपयोगी है, मृतप्राय है,’’ नगरनिगम अधिकारी बोले. ‘‘इस मृतप्राय जमीन का इलाज किया जाए, इस में प्राण फूंके जाएं?’’ मंत्रीजी बोले.

‘‘सर, पैसा? निगम घाटे में है,’’ अधिकारी ने हस्तक्षेप किया. ‘‘आप यहां के हैं नहीं, आप क्या जानें यहां का दर्द, काम में अड़ंगे न लगाएं, पैसे का इंतजाम हम करेंगे,’’ मंत्रीजी तल्ख लहजे में बोले.

तभी एक सूटबूटधारी उठ कर बोला, ‘‘सर, मैं डैवलपमैंट वर्ल्ड का सीनियर कंसल्टैंट, हमारे प्रोजैक्ट रशिया, लेटिन अमेरिका, फ्रांस जैसे 50 देशों में चल रहे हैं. इंडिया में हम ने इंट्रोड्यूज किया है. पीपीपी मोड, यानी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप में यहां डैवलपमैंट किया जा सकता है. जमीन हमारी, डैवलपमैंट उन का, साथ में आय भी, 19 एकड़ लैंड वह भी सिटी के सैंटर में, मौल बन सकता है, औफिस खुल सकते हैं. श्मशान घाट चमन हो जाएगा.

ब्यूटीफुल श्मशान. फाउंटेन लग जाएंगे, आत्माएं लोग नहाएंगी, साइलैंट जोन डैवलप करेंगे, जोनल प्लानिंग ठीक रहेगी, क्रिएशन जोन, इंटरटेंमैंट जोन, बिजनैस जोन, मीटिंग जोन, सबकुछ. जब अर्थी श्मशान घाट में प्रवेश करेगी, फूलों की वर्षा होगी. सर, इट्स अ ब्यूटीफुल आइडिया, ग्रेट. यू आर ग्रेट. हाऊ सैंसिबल यू आर. आदेश हो तो प्रोजैक्ट तैयार करें.’’

सभी मंत्रमुग्ध हो कर सुन रहे थे. मंत्रीजी नगरनिगम के अधिकारी को समझाते हुए बोले, ‘‘देखो, जहां चाह, वहां राह, पैसे का भी इंतजाम हो गया. चलिए, टैंडर निकालिए, कुछ सीखें, विजन बढ़ाएं, संसार में क्या हो रहा है, देखें. फाइल के कीड़े न बनें. चलिए, प्रोजैक्ट बनाएं, सब का आभार.’’ और मंत्रीजी उठ गए. ‘यह पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप क्या होती है?’ नगीना बाबू सोच रहे थे. Vyangya Kahani

Story in Hindi : भीगा मन – वक्त की कीमत

Story in Hindi. कबीर बारबार घड़ी की ओर देख रहा था. अभी तक उस का ड्राइवर नहीं आया था.

जब ड्राइवर आया तो कबीर उस पर बरस पड़ा, ‘‘तुम लोगों को वक्त की कोई कीमत ही नहीं है. कहां रह गए थे?’’

‘‘साहब, घर में पानी भर गया था, वही निकालने में देर हो गई.’’

‘‘अरे यार, तुम लोगों की यही मुसीबत है. चार बूंदें गिरती नहीं हैं कि तुम्हारा रोना शुरू हो जाता है… पानी… पानी… अब चलो,’’ कार में बैठते हुए कबीर ने कहा.

बरसात के महीने में मुंबई यों बेबस हो जाती है, जैसे कोई गरीब औरत भीगी फटी धोती में खुद को बारिश से बचाने की कोशिश कर रही हो. भरसक कोशिश, मगर सब बेकार… थक कर खड़ी हो जाती है एक जगह और इंतजार करती है बारिश के थमने का.

कार ने रफ्तार पकड़ी और दिनभर का थकामांदा कबीर सीट पर सिरटिका कर बैठ गया. हलकीहलकी बारिश हो रही थी और सड़क पर लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से जूझ रहे थे. अनगिनत छाते, पर बचाने में नाकाम. हवा के झोंकों से पानी सब को भिगो गया था.

कबीर ने घड़ी की ओर देखा. 6 बजे थे. सड़क पर भीड़ बढ़ती जा रही थी. ट्रैफिक धीमा पड़ गया था. लोग बेवजह हौर्न बजा रहे थे मानो हौर्न बजाने से ट्रैफिक हट जाएगा. पर वे हौर्न बजा कर अपने बेबस होने की खीज निकाल लेते थे.

ड्राइवर ने कबीर से पूछा, ‘‘रेडियो चला दूं साहब?’’ ‘‘क्या… हां, चला दो. लगता है कि आज घर पहुंचने में काफी देर हो जाएगी,’’ कबीर ने कहा. ‘‘हां साहब… बहुत दूर तक जाम लगा है.’’

‘‘तुम्हारा घर कहां है?’’ ‘‘साहब, मैं अंधेरी में रहता हूं.’’ ‘‘अच्छा… अच्छा…’’ कबीर ने सिर हिलाते हुए कहा.

रेडियो पर गाना बज उठा, ‘रिमझिम गिरे सावन…’

बारिश तेज हो गई थी और सड़क पर पानी भरने लगा था. हर आदमी जल्दी घर पहुंचना चाहता था. गाना बंद हुआ तो रेडियो पर लोगों को घर से न निकलने की हिदायत दी गई.

कबीर ने घड़ी देखी. 7 बजे थे. घर अभी भी 15-20 किलोमीटर दूर था. ट्रैफिक धीरेधीरे सरकने लगा तो कबीर ने राहत की सांस ली. मिनरल वाटर की बोतल खोली और दो घूंट पानी पीया.

धीरेधीरे 20 मिनट बीत गए. बारिश अब बहुत तेज हो गई थी. बौछार के तेज थपेड़े कार की खिड़की से टकराने लगे थे. सड़क पर पानी का लैवल बढ़ता ही जा रहा था. बाहर सब धुंधला हो गया था. सामने विंड शील्ड पर जब वाइपर गुजरता तो थोड़ाबहुत दिखाई देता. हाहाकार सा मचा हुआ था. सड़क ने जैसे नदी का रूप ले लिया था.

‘‘साहब, पानी बहुत बढ़ गया है. हमें कार से बाहर निकल जाना चाहिए.’’ ‘‘क्या बात कर रहे हो… बाहर हालत देखी है…’’

‘‘हां साहब, पर अब पानी कार के अंदर आने लगा है.’’  कबीर ने नीचे देखा तो उस के जूते पानी में डूबे हुए थे. उस ने इधरउधर देखा. कोई चारा न था. वह फिर भी कुछ देर बैठा रहा.

‘‘साहब चलिए, वरना दरवाजा खुलना भी मुश्किल हो जाएगा.’’ ‘‘हां, चलो.’’

कबीर ने दरवाजा खोला ही था कि तेज बारिश के थपेड़े मुंह पर लगे. उस की बेशकीमती घड़ी और सूट तरबतर हो गए. उस ने चश्मा निकाल कर सिर झटका और चश्मा पोंछा.

‘‘साहब, छाता ले लीजिए,’’ ड्राइवर ने कहा.

‘‘नहीं, रहने दो,’’ कहते हुए कबीर ने चारों ओर देखा. सारा शहर पानी में डूबा हुआ था. कचरा चारों ओर तैर रहा था. इस रास्ते से गुजरते हुए उस ने न जाने कितने लोगों को शौच करते देखा था और आज वह उसी पानी में खड़ा है. उसे उबकाई सी आने लगी थी. इसी सोच में डूबा कबीर जैसे कदम बढ़ाना ही भूल गया था.

‘‘साहब चलिए…’’ ड्राइवर ने कहा.

कबीर ने कभी ऐसे हालात का सामना नहीं किया था. उस के बंगले की खिड़की से तो बारिश हमेशा खूबसूरत ही लगी थी.

कबीर धीरेधीरे पानी को चीरता हुआ आगे बढ़ने लगा. कदम बहुत भारी लग रहे थे. चारों ओर लोग ही लोग… घबराए हुए, अपना घर बचाते, सामान उठाए.

एक मां चीखचीख कर बिफरी सी हालत में इधरउधर भाग रही थी. उस का बच्चा कहीं खो गया था. उसे अब न बारिश की परवाह थी, न अपनी जान की.

कबीर ने ड्राइवर की तरफ देखा.  ‘‘साहब, हर साल यही होता है. किसी का बच्चा… किसी की मां ले जाती है यह बारिश… ये खुले नाले… मेनहोल…’’

‘‘क्या करें…’’ कह कर कबीर ने कदम आगे बढ़ाया तो मानो पैर के नीचे जमीन ही न थी और जब पैर जमीन पर पड़ा तो उस की चीख निकल गई.

‘‘साहब…’’ ड्राइवर भी चीख उठा और कबीर का हाथ थाम लिया.

कबीर का पैर गहरे गड्ढे में गिरा था और कहीं लोहे के पाइपों के बीच फंस गया था.

ड्राइवर ने पैर निकालने की कोशिश की तो कबीर की चीख निकल गई. शायद हड्डी टूट गई थी.

‘‘साहब, आप घबराइए मत…’’ ड्राइवर ने हिम्मत बंधाते हुए कहा, ‘‘मेरा घर नजदीक ही है. मैं अभी किसी को ले कर आता हूं.’’

कबीर बहुत ज्यादा तकलीफ में उसी गंदे पानी में गरदन तक डूबा बैठा रहा. कुछ देर बाद उसे दूर से ड्राइवर भाग कर आता दिखाई दिया. कबीर को बेहोशी सी आने लगी थी और उस ने आंखें बंद कर लीं.

होश आया तो कबीर एक छोटे से कमरे में था जो घुटनों तक पानी से भरा था. एक मचान बना कर बिस्तर लगाया हुआ था जिस पर वह लेटा हुआ था. ड्राइवर की पत्नी चाय का गिलास लिए खड़ी थी.

‘‘साहब, चाय पी लीजिए. जैसे ही पानी कुछ कम होगा, हम आप को अस्पताल ले जाएंगे,’’ ड्राइवर ने कहा.

चाय तिपाई पर रख कर वे दोनों रात के खाने का इंतजाम करने चले गए. कबीर कमरे में अकेला पड़ा सोच रहा था, ‘कुदरत का बरताव सब के साथ समान है… क्या अमीर, क्या गरीब, सब को एक जगह ला कर खड़ा कर देती है… और ये लोग… कितनी जद्दोजेहद भरी है इन की जिंदगी. दिनरात इन्हीं मुसीबतों से जूझते रहते हैं. आलीशान बंगलों में रहने वालों को इस से कोई सरोकार नहीं होता. कैसे हो? कभी इस जद्दोजेहद को अनुभव ही नहीं किया…’

कबीर आत्मग्लानि से भर उठा था. यह उस की जिंदगी का वह पल था जब उस ने जाना कि सबकुछ क्षणिक है. इनसानियत ही सब से बड़ी दौलत है. बारिश ने उस के तन को ही नहीं, बल्कि मन को भी भिगो दिया था.

कबीर फूटफूट कर रो रहा था. उस के मन से अमीरीगरीबी का फर्क जो मिट गया था. Story in Hindi

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