Family Story In Hindi: बबूल का पेड़ – बड़ा भाई अपने छोटे भाई से जब हुआ पराया

Family Story In Hindi: कमरे में प्रवेश करते ही नीलम को अपने जेठजी, जिन्हें वह बड़े भैया कहती थी, पलंग पर लेटे हुए दिखाई दिए. नीलम ने आवाज लगाई, ‘‘भैया, कैसे हैं आप?’’

‘‘कौन है?’’ एक धीमी सी आवाज कमरे में गूंजी.

‘‘मैं, नीलम,’’ नीलम ने कहा.

बड़े भैया ने करवट बदली. नीलम उन को देख कर हैरान रह गई. क्या यही हैं वे बड़े भैया, जिन की एक आवाज से सारा घर कांपता था, कपड़े इतने गंदे जैसे महीनों से बदले नहीं गए हों, दाढ़ी बढ़ी हुई, जैसे बरसों से शेव नहीं की हो, शायद कुछ देर पहले कुछ खाया था जो मुंह के पास लगा था और साफ नहीं किया गया था. हाथपैर भी मैलेमैले से लग रहे थे, नाखून बढ़े हुए. उन को देख कर नीलम को उन पर बड़ा तरस आया. तभी नीलम का पति रमन भी कमरे में आ गया. बड़े भाई को इस दशा में देख कर रमन रोने लगा, ‘‘भैया, क्या मैं इतना पराया हो गया कि आप इस हालत में पहुंच गए और मुझे खबर भी नहीं की.’’

भैया से बोला नहीं जा रहा था. उन्होंने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए और कहने लगे, ‘‘किस मुंह से खबर करता छोटे, क्या नहीं किया मैं ने तेरे साथ. फिर भी तू देखने आ गया, क्या यह कम है.’’

‘‘नहीं भैया, अब मैं आप को यहां नहीं रहने दूंगा. अपने साथ ले जाऊंगा और अच्छी तरह से इलाज करवाऊंगा,’’ रमन सिसकते हुए कह रहा था.

नीलम को याद आ रहे थे वे दिन जब वह दुलहन बन कर इस घर में आई थी. उस के मातापिता ने अपनी सामर्थ्य से ज्यादा दहेज दिया था लेकिन मनोहर भैया हमेशा उस का मजाक उड़ाते थे. उस के दहेज के सामान को देख कर रमन से कहते, ‘क्या सामान दिया है, इस से अच्छा तो हम लड़की को सिर्फ फूलमाला पहना कर ही ले आते.’

उन की शादी अमीर घर में हुई थी, लेकिन रमन की ससुराल उतनी अमीर नहीं थी. इसलिए वे हमेशा उस का मजाक उड़ाते थे. रोजरोज के तानों से नीलम को बहुत गुस्सा आता, पर रमन के समझाने पर वह चुप रह जाती. फिर भी बड़े भैया के लिए उस के दिल में गांठ पड़ ही गई थी. उन से भी ज्यादा तेज उन की पत्नी शालू थी जो बोलती कम थी पर अंदर ही अंदर छुरियां चलाने से बाज नहीं आती थी.

मातापिता की मृत्यु के बाद घर में मनोहर भैया की ही चलती थी. सब कुछ उन से पूछ कर होता था. एक तो मनोहर बड़े थे, दूसरे, वे एक अच्छी कंपनी में अच्छे पद पर थे. उन की शादी भी पैसे वाले घर में हुई थी जबकि रमन न सिर्फ छोटा था बल्कि एक छोटी सी दुकान चलाता था. उस की शादी एक साधारण घर में हुई थी. उस की घरेलू स्थिति ठीक नहीं थी. रमन को इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था, वह न सिर्फ अपने बड़े भाई को बहुत प्यार करता था बल्कि उन की हर बात को मानना अपना कर्तव्य भी समझता था. मनोहर अपने छोटे भाई को वह प्यार नहीं देते थे जिस का वह हकदार था, बल्कि हमेशा उस की बेइज्जती करने के बहाने ढूंढ़ते रहते. वे हमेशा यह जतलाना चाहते थे कि घर में सिर्फ वे ही श्रेष्ठ हैं और बाकी सब बेवकूफ हैं.

‘‘नीलम, कहां खो गईं. चलो, भैया का सामान पैक करो, इन को हम अपने साथ ले जाएंगे,’’ रमन की आवाज सुन कर नीलम वापस वर्तमान में आ गई.

‘‘भैया, प्रिया नहीं आती क्या आप से मिलने?’’ नीलम ने पूछा.

‘‘आती है कभीकभी, लेकिन वह भी क्या करे. उस की अपनी गृहस्थी है. हमेशा तो मेरे पास नहीं रह सकती न,’’ भैया रुकरुक कर बोल रहे थे.

‘‘और राजू और पल्लवी कहां हैं?’’ नीलम ने पूछा.

‘‘राजू तो औफिस गया होगा और पल्लवी शायद किसी ‘किटी पार्टी’ में गई होगी,’’ भैया शर्मिंदा से लग रहे थे.

नीलम को इसी तरह के किसी जवाब की उम्मीद थी. उसे अच्छी तरह याद है वह दिन जब उस की छोटी बहन सीढि़यों से गिर गई थी तो वह हड़बड़ाहट में बिना किसी को बताए अपनी मां के घर चली गई थी. बस, इतनी सी बात पर मनोहर भैया ने बखेड़ा खड़ा कर दिया था कि ऐसा भी किसी भले घर की बहू करती है क्या कि किसी को बगैर बताए मायके चली जाए.

उन दिनों भैया ही सारा घर संभालते थे. रमन भी अपनी सारी कमाई भैया के हाथ में दे देता था और कभी भी नहीं पूछता था कि भैया उन पैसों का क्या करते हैं जबकि भैया सब से यही कहते फिरते थे कि छोटे का खर्च तो वही चलाते हैं. छोटे की तो बिलकुल भी कमाई नहीं है.

नीलम की सारी अच्छाइयां, सारी पढ़ाईलिखाई, सारे गुण सिर्फ एक कमी के नीचे दब कर रह गए कि एक तो उस का मायका गरीब था, दूसरे, पति की कमाई भी साधारण थी. सारे रिश्तेदारों, दोस्तों में शालू और मनोहर नीलम और रमन को नीचा दिखाने का प्रयास करते. नीलम को अपनी इस स्थिति से बहुत कोफ्त होती पर वह चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती थी क्योंकि रमन उसे कुछ भी बोलने नहीं देता था.

एक बड़े पेड़ के नीचे जिस तरह एक छोटा पौधा पनप नहीं सकता वैसी ही कुछ स्थिति रमन की थी. पिता की मृत्यु के बाद मनोहर घर के मुखिया तो बन गए लेकिन उन्होंने रमन को सिर्फ छोटा भाई समझा, बेटा नहीं. बड़े भाई का छोटे भाई के प्रति जो फर्ज होता है वह उन्होंने कभी नहीं निभाया.

नीलम समझ नहीं पाती थी कि क्या करे? वैसे वह बहुत समझदार और शांत स्वभाव की थी, लेकिन कभीकभी शालू और मनोहर के तानों से इतनी दुखी हो जाती कि उसे लगता कि वह रमन को ही छोड़ दे. रमन का चुप रहना उसे और परेशान कर जाता, लेकिन रमन को छोड़ना तो इस समस्या का हल नहीं था. रमन तो बहुत अच्छा था. बस, उस की एक ही कमजोरी थी कि वह बड़े भाई की हर अच्छी या बुरी बात मानता था और आंख बंद कर उन पर विश्वास भी करता था.

रमन के इसी विश्वास का मनोहर ने हमेशा फायदा उठाया. उस ने पुश्तैनी मकान भी अपने नाम करवा लिया और एक दिन नीलम और रमन को अपने ही घर से जाने को कह दिया.

इतना कुछ होने पर भी रमन कुछ नहीं बोला और अपनी 4 साल की बेटी और पत्नी को ले कर चुपचाप घर से निकल पड़ा. उस दिन नीलम को अपने पति की कायरता पर बहुत गुस्सा आया, लेकिन जब रमन ही कुछ करने को तैयार नहीं था तो वह क्या कर सकती थी, पर मन ही मन उस ने सोच लिया था कि वह इस घर में अब कभी वापस नहीं आएगी और इस घर से बाहर रह कर ही अपनी और अपने परिवार की एक पहचान बनाएगी.

अब नीलम की अग्निपरीक्षा शुरू हो गई थी. घर में पैसों की तंगी बनी रहेगी, यह तो नीलम को मालूम था क्योंकि संयुक्त परिवार में बहुत से ऐसे खर्चे होते हैं जिन का पता नहीं चलता, लेकिन एकल परिवार में उन खर्चों को निकालना मुश्किल हो जाता है. फिर भी नीलम ने हार नहीं मानी और जुट गई अपना एक समर्थ संसार बनाने में. सुबह मुंहअंधेरे उठ कर घर का कामकाज करती, उस के बाद कई बच्चों को घर पर बुला कर ‘ट्यूशन’ पढ़ाती और फिर रमन के साथ दुकान पर चली जाती.

नीलम के अंदर दुकान चलाने की गजब की क्षमता थी जो शायद अभी तक उस के अंदर सुप्त पड़ी थी. उस ने अपने मीठे व्यवहार, ईमानदारी और मेहनत से न सिर्फ अपनी दुकान को बढ़ाया बल्कि रमन का आत्मविश्वास बढ़ाने में भी उस का साथ दिया.

बड़े भाई से अलग रह कर रमन को भी एहसास हो गया था कि वह कितना बुद्धू था और बड़े भाई ने उस का कितना फायदा उठाया.

मनोहर ने सोचा था कि रमन कभी भी घर से नहीं जाएगा और अगर जाता है तो जाते वक्त उस के आगे हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाएगा या फिर नीलम ही कुछ भलाबुरा कहेगी पर वह हैरान था कि दोनों ने कुछ भी नहीं कहा बल्कि चुपचाप एकदूसरे का हाथ पकड़ कर घर से चले गए. वैसे भी वे रमन से चिढ़ते थे कि उस की पत्नी हमेशा उस का कहना मानती थी जबकि वह इतना समर्थ भी नहीं था और एक उन की पत्नी शालू है, जिस ने उन का जीना मुश्किल किया हुआ था. हर वक्त उसे कुछ न कुछ चाहिए. उस की फरमाइशें खत्म होने का नाम ही नहीं लेती थीं.

मनोहर ने रमन को घर से तो निकाल दिया पर उन के अंदर आत्मग्लानि का भाव पैदा हो गया था. एक दिन रात को शराब के नशे में धुत्त हो कर मनोहर ने रमन को फोन किया, ‘चल छोटे, घर आजा, भूल जा सब कुछ.’ लेकिन नीलम और रमन ने सोच लिया था कि अब उस घर में वापस नहीं जाना है. अब मनोहर को एक नया बहाना मिल गया था अपनेआप को बहलाने का कि उस ने तो उन दोनों को वापस बुलाया था पर वे ही वापस नहीं आए और गाहेबगाहे वे अपने रिश्तेदारों को कहने लगे कि वे दोनों अपनी मरजी से घर छोड़ कर गए हैं. नीलम तो हमेशा से ही रमन को उन से दूर करना चाहती थी, पर अंदर की बात तो कोई भी नहीं जानता था कि यह सब कियाधरा मनोहर का ही है.

रमन और नीलम ने दिनरात मेहनत की. धीरेधीरे उन की दुकान एक अच्छे ‘स्टोर’ में बदल गई थी. अब उस ‘स्टोर’ की शहर में एक पहचान बन गई थी. रमन और नीलम का जीवनस्तर भी ऊंचा हो गया था. उन के बच्चे शहर के अच्छे स्कूलों में पढ़ने लगे थे. अब मनोहर उन से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश करते पर वे दोनों तटस्थ रहते.

रमन के घर छोड़ने के बाद दोनों भाइयों का आमनासामना बहुत ही कम हुआ था. एक बार मनोहर के बेटे राजू की शादी में वे मिले थे, तब रमन ने महसूस किया था कि बड़े भाई की अब घर में बिलकुल भी नहीं चलती है. जो कुछ भी हो रहा था, वह बच्चों की मरजी से ही हो रहा था. बड़े भाई के बच्चे भी उन पर ही गए थे. वे बिलकुल ही स्वार्थी निकले थे. दूसरी मुलाकात मनोहर की बेटी प्रिया की शादी में हुई थी. बड़े भैया को अनेक रोगों ने घेर लिया था. वे बहुत ही कमजोर हो गए थे. तब भी उन को देख कर रमन को बहुत दुख हुआ था पर उस वक्त वह कुछ नहीं बोला था, लेकिन शालू भाभी के जाने के बाद तो जैसे भैया बिलकुल ही अकेले पड़ गए थे. उन का खयाल रखने वाला कोई भी नहीं था. शालू जैसी भी थी, पर अपने पति का तो खयाल रखती ही थी. राजू को अपने काम और क्लबों से ही फुरसत नहीं थी. वैसे भी उसे पिता के पास बैठ कर उन का हाल जानने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. अगर वह अपने पिता का ध्यान नहीं रख सकता था तो पल्लवी को क्या पड़ी थी इन सब बातों में पड़ने की? वह भी ससुर का बिलकुल ध्यान नहीं रखती थी.

एकएक बात रमन के दिमाग में चलचित्र की तरह घूम रही थी. पुरानी घटनाओं का क्रम जैसे ही खत्म हुआ तो रमन बोला, ‘‘बड़े भैया, कल ही किसी से पता चला था कि आप गुसलखाने में गिर गए हैं. मुझ से रहा नहीं गया और आप का हाल पूछने चला आया.’’

रमन का दिल रोने लगा कि खामखां ही वह इतने दिनों तक भैया से नाराज रहा और उन की खबर नहीं ली, लेकिन अब वह उन को अपने साथ जरूर ले जाएगा, लेकिन बड़े भैया ने जाने से इनकार कर दिया, ‘‘मुझे माफ कर दे छोटे, सारी जिंदगी मैं ने सिर्फ तेरा मजाक उड़ाया है और अब जब मैं बिलकुल ही मुहताज हो चुका हूं और मेरे अपने मुझे बोझ समझने लगे हैं, इस वक्त मैं तेरे ऊपर बोझ नहीं बनना चाहता.’’

‘‘नहीं भैया, ऐसा मत कहो. क्या मैं आप का अपना नहीं, मैं ने आप को अपना भाई नहीं बल्कि पिता माना है और एक बेटे का कर्तव्य है कि वह अपने पिता की सेवा करे, इसलिए आप को मेरे साथ चलना ही पड़ेगा,’’ रमन ने विनती की.

तभी नीलम भी बोल पड़ी, ‘‘भैया, आप को हमारे साथ चलना ही पड़ेगा, हम आप को इस तरह छोड़ कर नहीं जा सकते.’’

अब तक पल्लवी भी घर पहुंच चुकी थी. उस ने चाचा और चाची को देख कर इस तरह व्यवहार किया जैसे वह उन दोनों को जानती ही नहीं. उस को इस बात की भी चिंता नहीं थी कि दुनियादारी के लिए ही कुछ दिखावा कर दे. उस का व्यवहार इस बात की गवाही दे रहा था कि अगर मनोहर को कोई अपने साथ ले जाता है तो उसे कोई परवा नहीं है. अभी तक मनोहर को आशा थी कि शायद पल्लवी उसे कहीं भी जाने नहीं देगी और उसे रोक लेगी, पर उस की बेरुखी देख कर मनोहर भैया उठ खड़े हुए, ‘‘चल छोटे, मैं तेरे साथ ही चलता हूं, लेकिन उस से पहले तुझे मेरा एक काम करना पड़ेगा.’’

‘‘वह क्या, भैया?’’ रमन ने पूछा.

‘‘तुझे एक वकील लाना पड़ेगा क्योंकि मैं यह बंगला तेरे नाम करना चाहता हूं जो धोखे से मैं ने अपने नाम करवा लिया था,’’ मनोहर ने कहा.

‘‘लेकिन मुझे यह घर नहीं चाहिए भैया, मेरे पास सब कुछ है,’’ रमन ने कहा.

‘‘मैं जानता हूं छोटे, तेरे पास सब कुछ है लेकिन जिंदगी ने मुझे यह सबक सिखाया है कि किसी से भी धोखे से ली हुई कोई भी वस्तु सदैव दुख ही देती है. मैं इतने सालों तक चैन से नहीं सो पाया और अब चैन से सोना चाहता हूं इसलिए मुझे मना मत कर और अपना हक वापस ले ले.’’

यह सब सुन कर पल्लवी के तो होश उड़ गए. उसे लगता था कि उस के ससुर का तो कोई अपना है ही नहीं, जो उन्हें अपने साथ ले जाएगा, और इतना बड़ा बंगला सिर्फ उस के हिस्से ही आएगा. लेकिन ससुर की बात सुन कर उसे लगा कि इतना बड़ा घर उस के हाथ से निकल गया है. उस ने फटाफट बहू होने का फर्ज निभाया. उस ने मनोहर को रोकने की कोशिश की, पर मनोहर ने कहा, ‘‘नहीं बहू, अब नहीं, अब मैं नहीं रुक सकता. तुम ने और मेरे बेटे ने मुझे बिलकुल ही पराया कर दिया है. इस बूढ़े और लाचार इंसान को अब अपने मतलब के लिए इस घर में रखना चाहते हो. नहीं, इस घर में तड़पतड़प कर मरने से अच्छा है मैं अपने भाई के साथ कुछ दिन जी लूं, लेकिन फिर भी मैं कहता हूं कि इस में तुम्हारी गलती कम है क्योंकि मैं ने ही बबूल का पेड़ बोया है तो आम की उम्मीद कहां से करूं.’’

कुछ देर बाद नीलम और रमन मनोहर को ले कर अपने घर जा रहे थे और पल्लवी पछता रही थी कि उस ने अपने ससुर को नहीं रोका जिन के जाने से इतना बड़ा घर हाथ से निकल गया. Family Story In Hindi

Hindi Family Story: सबक – गीता ने कौन सा कदम उठाया

Hindi Family Story: ‘‘देख लेना, मैं एक दिन घर छोड़ कर चली जाऊंगी, तब तुम लोगों को मेरी कीमत पता लगेगी,’’ बड़बड़ाते हुए गीता अपने घर से काम करने के लिए बाहर निकल गई.

गीता की इस चेतावनी का उस के मातापिता और भाईबहन पर कोई असर नहीं पड़ता था, क्योंकि वे जानते थे कि वह अगर घर छोड़ कर जाएगी, तो जाएगी कहां…? आना तो वापस ही पड़ेगा.

आजकल गीता यह ताना अकसर अपने मातापिता को देने लगी थी. वह ऊब गई थी उन का पेट पालतेपालते. आखिर कब तक वह ऐसी बेरस जिंदगी ढोती रहेगी. उस की अपनी भी तो जिंदगी है, जिस की किसी को चिंता ही नहीं है.

गीता के अलावा उस की 2 बहनें और एक भाई भी था. बाप किसी फैक्टरी में मजदूरी करता था, लेकिन अपनी कमाई का सारा पैसा शराब और जुए में उड़ा देता था.

महज 10 साल की उम्र में ही गीता ने अपनी मां लक्ष्मी के साथ घरों में झाड़ूपोंछा और बरतन साफ करने के काम में हाथ बंटाना शुरू कर दिया था. वह बहुत जल्दी खाना बनाना भी सीख गई थी, क्योंकि उस ने देखा था कि इस पेशे में अच्छे पैसे मिलते हैं और उस ने घरों में खाना बनाने का काम शुरू कर दिया. धीरेधीरे गीता ब्यूटीशियन का कोर्स किए बिना ही फेसियल, मेकअप वगैरह सीख कर थोड़ी और आमदनी भी करने लगी.

बचपन से ही गीता बहुत जुझारू थी. लक्ष्मी पढ़ीलिखी नहीं थी, लेकिन वह अपने बच्चों को पढ़ाना चाहती थी, इसलिए वह भी जीतोड़ मेहनत कर के पैसा कमाती थी, जिस से कि उस के बच्चे पढ़ सकें.

लक्ष्मी स्वभाव से बहुत सरल और अपने काम के प्रति समर्पित थी, इसलिए कालोनी में जिस के घर भी वह काम करती थी, वे उसे बहुत पसंद करते थे और जब भी उसे जरूरत पड़ती, उस की पैसे और सामान दे कर मदद करते थे.

समय बीतता गया. गीता ने प्राइवेट से इम्तिहान दे कर बीए की डिगरी हासिल कर ली. हैदराबाद में रहने से वहां के माहौल के चलते उस की अंगरेजी भी बहुत अच्छी हो गई थी.

लोग गीता की तारीफ करते नहीं थकते थे कि पढ़ाई के साथ वह घर का खर्चा भी चलाने में अपनी मां के काम को कमतर समझ कर उस की मदद करने में कभी कोताही नहीं बरतती थी.

इस के उलट गीता की दोनों बहनों ने रैगुलर रह कर पढ़ाई की, लेकिन कभी अपनी मां के काम में हाथ नहीं बंटाया, क्योंकि पढ़ाई के चलते अहंकारवश उन को उस का काम छोटा लगता था, बल्कि वे तो अपने घर का काम भी नहीं करना चाहती थीं. दिनभर पढ़ना या टैलीविजन देखना ही उन की दिनचर्या थी.

गीता उन को कुछ कहती, तो वे उसे उलटा जवाब दे कर उस का मुंह बंद कर देतीं, लक्ष्मी भी उन का पक्ष लेते हुई कहती कि अभी वे छोटी हैं, उन के खेलनेकूदने के दिन हैं.

गीता के भाई राजू ने इंटर के बाद पढ़ाई छोड़ दी. उस का कभी पढ़ाई में मन लगा ही नहीं, लेकिन सपने उस के काफी बड़े थे. दोस्तों के साथ मोटरसाइकिल पर घूमना और देर रात घर लौट कर अपनी बहनों पर रोब गांठना उस की दिनचर्या में शामिल हो गया था.

लक्ष्मी अपने लाड़ले एकलौते बेटे की हर जिद के सामने हार जाती थी, क्योंकि वह घर छोड़ कर चला जाऊंगा की धमकी दे कर अपनी हर बात मनवाना चाहता था.

एक बार राजू मोटरसाइकिल खरीदने की जिद पर अड़ गया, तो लक्ष्मी ने लोगों से उधार ले कर उस की इच्छा पूरी की. किसी ऊंची पोस्ट पर काम करने वाले आदमी, जिन के यहां दोनों मांबेटी काम करती थीं, से कह कर दूसरे शहर में राजू की नौकरी लगवाई कि अपने दोस्तों से दूर रहेगा, तो उस का काम में मन लगेगा. उस के लिए पैसों की जरूरत पड़ी, तो लक्ष्मी ने अपने कान के सोने के बूंदे गिरवी रख कर उस की भरपाई की.

एक दिन अचानक राजू अच्छीखासी नौकरी छोड़ कर गायब हो गया. पूरा परिवार उस की इस हरकत से बहुत परेशान हुआ.

कुछ महीने बाद पता चला कि राजू तो एक लड़की से शादी कर के उस के साथ इसी शहर में रह रहा है. वह लड़की किसी ब्यूटीपार्लर में काम करती थी.

लक्ष्मी और गीता को यह जान कर बड़ी हैरानी हुई कि उन लोगों ने उस का भविष्य बनाने के लिए क्याकुछ नहीं किया और उस ने लड़की के चक्कर में अपने कैरियर की भी परवाह नहीं की.

राजू के इसी शहर में रहने के चलते आएदिन उस की खबर इन लोगों को मिलती रहती थी. लक्ष्मी किसी तरह कोशिश कर के उस की नौकरी लगवाती, वह फिर नौकरी छोड़ कर घर बैठ जाता, जरूरत पड़ने पर वह जबतब लक्ष्मी से पैसे की मांग करता, तो अपने बेटे के प्यार में सबकुछ भूल कर वह उस की मांग पूरी करती.

अब गीता को अपनी मां लक्ष्मी की राजू के प्रति हमदर्दी अखरने लगी. उस का मन बगावत करने लगा कि बचपन से उस ने दोनों बहनों और भाई की जिंदगी बनाने के लिए क्याकुछ नहीं किया, लेकिन लक्ष्मी को उसे छोड़ कर सभी की बहुत चिंता रहती थी. यहां तक कि जब गीता अपने पिता को कुछ कहती, तो लक्ष्मी उसे डांटती कि वे उस के पिता हैं, उस को उन के बारे में ऐसा नहीं बोलना चाहिए.

गीता गुस्से से बोलती, ‘‘कैसे पिता…? क्या बच्चे पैदा करने से ही कोई पिता बन जाता है? जब वे हमें पाल नहीं सकते, तो उन्हें बच्चे पैदा करने का हक ही क्या था…?’’

गीता को अपनी मां लक्ष्मी से बहुत हमदर्दी रहती थी, लेकिन जवान होतेहोते उसे समझ आने लगा था कि वह अपनी हालत के लिए खुद भी जिम्मेदार है.

सुबह की निकली जब गीता रात को 8 बजे घर पहुंचती, तो देखती कि दोनों बहनें टैलीविजन देख रही हैं, मां खाना बना रही हैं, मांजने के लिए बरतनों का ढेर लगा हुआ है, तो उस का मन गुस्से से भर उठता. लेकिन किसी को भी कुछ कहने से फायदा नहीं था और वह मन मसोस कर रह जाती थी.

गीता ने अब बीऐड भी कर लिया था और वह एक स्कूल में नौकरी करने लगी थी, लेकिन उस ने खाली समय में घरों के काम में मां का हाथ बंटाना नहीं छोड़ा था. स्कूल से जो तनख्वाह मिलती थी, वह तो पूरी अपनी मां को दे देती थी, लेकिन घरों से उसे जो आमदनी होती थी, वह अपने पास रख लेती थी.

देखते ही देखते गीता 26 साल की हो गई थी, लेकिन उस की शादी की किसी को चिंता ही नहीं थी. पर उस ने अपने भविष्य के लिए सोचना शुरू कर दिया था और मन ही मन घर छोड़ने का विचार करने लगी. ऐसा कर के वह उन सब को सबक सिखाना चाहती थी.

गीता ने अब बातबात पर कहना शुरू कर दिया था कि वह घर छोड़ कर चली जाएगी, लेकिन वे लोग उस की इस बात को कभी गंभीरता से नहीं लेते थे, क्योंकि उन्हें उम्मीद ही नहीं थी कि वह कभी ऐसा कदम भी उठा सकती है. पर बात यह नहीं थी.

गीता ने मन ही मन स्कूल में बने स्टाफ क्वार्टर में रहने की योजना बनाई और एक दिन वाकई अपने घर छोड़ने की खबर कागज पर लिख कर चुपचाप चली गई.

जैसे ही घर वालों को उस के जाने की खबर मिली, सभी सकते में आ गए. सब से ज्यादा मां लक्ष्मी को झटका लगा, क्योंकि गीता की कमाई के बिना घर चलाना मुश्किल था. मां के हाथपैर फूल गए थे.

एक हफ्ता बीत गया, लेकिन गीता घर नहीं आई. उस को कई बार फोन भी किया, लेकिन गीता ने फोन नहीं उठाया. हार कर लक्ष्मी अपनी बीच वाली बेटी के साथ उस के स्कूल पहुंच गई.

लक्ष्मी के कहने पर गार्ड गीता को बुलाने गया. थोड़ी देर में गीता आ गई. उस को देख कर वे दोनों रोते हुए उस से लिपटने के लिए दौड़ीं, लेकिन गीता ने हाथ से उन्हें रोक लिया.

इस से पहले कि लक्ष्मी कुछ कहती, गीता बोली, ‘‘मुझे पता है, तुम्हें मेरी नहीं, बल्कि मेरे पैसों की जरूरत है. मैं उस घर में तभी कदम रखूंगी, जब वहां मेरे पैसे की नहीं, मेरी कद्र होगी. तुम सभी के मेरे जैसे दो हाथ हैं, इसलिए मेरी तरह तुम सभी मेहनत कर के अपने खर्चे चला सकते हो. तभी तुम्हें पता चलेगा कि पैसा कितनी मेहनत से कमाया जाता है.

‘‘अब मुझ से किसी तरह की उम्मीद मत रखना. अब मैं सिर्फ अपने लिए जीऊंगी. मुझ से कभी दोबारा मिलने की कोशिश भी नहीं करना…’’ और इतना कह कर वह वहां से तुरंत लौट गई.

अपनी बेटी की दोटूक बात सुन कर मां लक्ष्मी हैरान रह गई. वह उस के इस रूप की कल्पना भी नहीं कर सकती थी. उसे याद आया, जब डाक्टर ने लक्ष्मी के लिए ब्रैस्ट कैंसर का शक जाहिर किया था, तब गीता छिपछिप कर कितना रोती थी. उस के साथ डाक्टरों के चक्कर भी लगाने जाती थी और जब शक बेवजह का निकला, तो खुशी के आंसू उस की आंखों से बह निकले थे और आज वह इतनी कठोर कैसे हो गई? लक्ष्मी वहीं थोड़ी देर के लिए सिर पकड़ कर बैठ गई.

लक्ष्मी ने अपने सभी बच्चों को बचपन से ही हनत करना सिखाया होता और पैसे की अहमियत बताई होती, तो गीता को न अपना घर छोड़ना पड़ता और न लक्ष्मी के ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूटता.

अपने पति और बेटे के प्रति अंधे प्यार ने उन्हें निकम्मा और नकारा बना दिया था, जिस के चलते उन्होंने कभी जिम्मेदारी निभाने की कोशिश ही नहीं की. उन को मुफ्त के पैसे लेने की आदत पड़ गई थी. वे दोनों इस परिवार पर बोझ बन गए थे.

मां लक्ष्मी को गीता के जाने से अपनी गलती का एहसास हुआ, लेकिन अब पछताए होत क्या जब चिडि़या चुग गई खेत. लक्ष्मी को अब नए सिरे से घर का खर्च चलाना था, उस ने कुछ घरों से उधार लिया, यह कह कर कि हर महीने उस की पगार से काट लें. पहले ही खर्चा चलाना मुश्किल था, उस पर उधार चुकाना उस के लिए किसी बोझ से कम नहीं था.

पति और बेटे से तो उम्मीद लगाना ही बेकार था, लेकिन बीच वाली बेटी ने किसी दुकान में नौकरी कर ली और छोटी बेटी ने अपनी पढ़ाई के साथसाथ मां के साथ घरों के काम में हाथ बंटाना शुरू कर दिया, लेकिन उन को अपने खर्चों में भारी कटौती करनी पड़ी. इस वजह से वे दोनों बहनें चिड़चिड़ी सी रहने लगी थीं.

गीता के स्वभाव और उस को अपने काम के प्रति निष्ठावान देख कर उस के एक सहयोगी ने उस के सामने शादी का प्रस्ताव रखा, तो उस ने हामी भरने में बिलकुल भी देरी नहीं लगाई.

शादी के बाद गीता ने घर और स्कूल की जिम्मेदारी बखूबी निभा कर सब का मन मोह लिया और सुखी जिंदगी जीने लगी.

गीता ने जो कदम उठाया, उस से उस की जिंदगी में तो खुशी आई ही, बाकी सब को भी कम से कम सबक तो मिला कि मुफ्त की कमाई ज्यादा दिनों तक हजम नहीं होती. हो सकता है कि भविष्य में लक्ष्मी का परिवार एकजुट हो जाए, जिस से उन्हें गरीबी के दलदल से बाहर निकलने का रास्ता मिल जाए. Hindi Family Story

Long Hindi Story: सौदा – पहला भाग

Long Hindi Story, लेखक – हरे राम मिश्र

उस दिन बड़े विधवा दुलारी मनोहर लाल, जिन्हें उन की जाति के लोग ‘भैया’ और गांवमहल्ले के लोग ‘नेताजी कहते थे, की हवेली के गेट पर आंखों में आंसू भरे खड़ी थी. उस के गोरे बेदाग चेहरे की रंगत उड़ी हुई थी. वह बहुत बेचैन थी. उस के चेहरे से यह साफ दिखता था कि कुछ ऐसा जरूर हुआ है, जिस के लिए वह कतई तैयार नहीं थी.

और सचमुच, यह बड़ी चिंता की ही बात थी कि दुलारी की 17 साल की एकलौती बेटी रुपाली, जिसे वह प्यार से ‘रूपा’ बुलाती थी, जो घर की बकरियों के लिए हर रोज बिना नागा घास काटने गांव के बाहर खेतों की तरफ जाती थी, कल दोपहर घर से जाने के बाद वापस नहीं लौटी थी.

दुलारी की चिंता का एक ही केंद्र था कि आखिर उस की बेटी रुपाली कहां चली गई? वह घर क्यों नहीं लौटी? क्या गलत हो गया उस के साथ? आखिर वह कहां होगी अभी? किस हालत में होगी? ऐसे सवाल उस के जेहन में लगातार उभर रहे थे, उसे बहुत ज्यादा परेशान किए हुए थे.

एकलौती बेटी रूपा के साथ किसी अनहोनी से उपजी इस घबराहट में दुलारी को बीती शाम से ही कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. ज्योंज्यों समय बढ़ता जा रहा था, उस की चिंता भी बढ़ती जा रही थी. आखिर एक विधवा, जिस के पति ने उसे सिर्फ इसलिए छोड़ दिया हो कि उसे पहली औलाद बेटी हो गई, अपनी एकमात्र धरोहर के पास नहीं रहने पर परेशान क्यों नहीं हो?

हालांकि, छोड़ने के कुछ ही महीने बाद पति रामलाल जहरीली शराब पीने से मर गया. इस के बाद दुलारी अपनी बेटी को ले कर मायके आ गई, क्योंकि इस विधवा को ससुराल में कोई भी रहने देने के लिए तैयार नहीं था.

आम दलित की तरह रामलाल के पास भी एक ?ाग्गी से ज्यादा कोई जायदाद नहीं थी, जो जंगल महकमे की जमीन पर कब्जा कर के बनाई गई थी. इस के बाद दुलारी फिर कभी ससुराल वापस नहीं गई. इस घटना को 17 साल हो गए थे.

दुलारी धीरे बोलने वाली 35 साल की औरत थी. वह एक ऐसी विधवा थी जो भले ही मायके में रहती थी, लेकिन गांव में भी किसी से कोई खास मतलब नहीं था. अपने मांबाप की एकलौती औलाद उन के मरने के बाद उन्ही के घर में रहने लगी. उसी झोपड़ीनुमा घर में, जहां घर में कुछ बकरियां पाली गई थीं और जिन की वह देखभाल करती थी. यही उस की धरोहर थी.

हालांकि, अब दुलारी के पास सिर्फ एक कमरे का सरकार का दिया हुआ पक्का मकान था. यह भी पाने के लिए उसे अपनी जाति के सरपंच कल्लू, कई मालाएं पहनने वाले पंचायत सैक्रेटरी त्रिभुवन, पंचायत मित्र नोखे और उस के 2 मुंहबोले समर्थकों का 4 महीने तक बिस्तर गरम करना पड़ा, क्योंकि वह मकान पाने के लिए तयशुदा 20,000 रुपए की घूस देने में नाकाम थी.

लेकिन इस सब की भनक दुलारी ने अपनी बेटी को कभी नहीं लगने दी.

बेटी के आलावा घर में पाली गईं यही 4 बकरियां उस की पूंजी थीं. मांबेटी दोनों इन्हीं 4 बकरियों से अपना गुजारा करती थीं. इन से ही सुबहशाम इन का चूल्हा जलता था.

दुलारी भले ही 35 साल की थी, लेकिन उस की सादगी भरी खूबसूरती किसी को भी उस का दीवाना बना सकती थी. गांव के दलितों में यह सोच थी कि दुलारी जरूर किसी ऊंची जाति का बीज है, क्योंकि उन की जाति में औरतें इतनी खूबसूरत हो ही नहीं सकतीं.

दुलारी के कपड़े भले ही बहुत साफ नहीं होते थे, लेकिन उन में लिपटी हुई छरहरे बदन वाली दुलारी किसी का भी मन मोह लेने के काबिल थी. गोरा बदन और गोल चेहरे पर कंटीली उभरी आंखें उसे अप्सरा जैसी बना देती थीं.

दुलारी की बेटी रुपाली, जो अभी जवानी की दहलीज पर कदम रख रही थी, बस एकदम दुलारी ही लगती थी.

हवेली के मालिक मनोहर लाल दुलारी की जाति के बड़े नेता थे. वे भले ही 50 साल पार हो गए थे, लेकिन खिजाब से बाल रंगते थे और चेहरे की मालिश भी किसी विदेशी लिक्विड से बिना नागा करवाते थे. हर वक्त खद्दर का काफी भड़कीला कुरता पहनते थे. चप्पल भी ब्रिटेन की बनी पहनते थे और कौम की गरीबी पर रोज आंसू बहाते थे.

इस के साथ मनोहर लाल सफेद गमछा अपने गले में लपेटे रहते थे. मूंछें भी तावदार थीं, लेकिन दाढ़ी क्लीन शेव थी. किसी राजनीतिक सवाल पर कभी कुछ खुल कर नहीं बोलते थे. हर बात में गहरा राज छिपा रहता था, जिसे सिर्फ उन के कुछ खास शागिर्द ही समझ पाते थे.

मनोहर लाल की हवेली थोड़ी बड़ी थी, जिस के एक हिस्से को उन की जाति के ही लोगों ने कभी चंदा इकट्ठा कर के इसलिए बनवाया था, ताकि इलाके में उन के विपक्ष में सियासत कर रहा ऊंची जात का ‘ठाकुर’ ऐंठ कर नहीं चल सके और उस के सामने चुनाव में मनोहर लाल को किसी हीनभावना का शिकार नहीं होना पड़े.

जवानी के दिनों में मनोहर लाल जमींदार ठाकुरों को सबक सिखाने से ले कर, ऊंची जाति की लड़कियों को केंद्रित कर के ब्राह्मणों को गालियां देते थे, गंदे और उकसावे भरे नारे लगाते थे, जिस से इलाके के पीडि़त दलित नौजवान उन की तरफ आकर्षित हों.

इसी के बलबूते वे 2 बार विधानसभा का चुनाव भी लड़ गए और इतने वोट हासिल कर लिए कि विपक्षी राजनीति में उन्हें ‘सीरियसली’ लिया जाने लगा था. कुलमिला कर वे विधानसभा में अपनी जाति का एक बड़ा चेहरा हो चुके थे.

यही नहीं, मनोहर लाल पिछली बार ही सदन पहुंचतेपहुंचते रह गए थे. क्षेत्र में उन का दबदबा था. इस चुनाव में उन के हारने के पीछे यह दलील थी कि विधानसभा के पिछड़ों ने दलित उम्मीदवार की जगह क्षत्रिय जाति के नेता को इसलिए वोट दे दिए, ताकि ये दलित लोग मजबूत न होने पाएं, वरना खेतों में काम को मजदूर ही नहीं मिलेंगे. दलित ऐक्ट में जेल अंदर जाओगे, वह अलग समस्या आएगी, इसलिए मनोहर लाल चुनाव हार गए.

हालांकि, इस हार ने मनोहर लाल को यह सीख दी कि किसी जाति से खुला विरोध वोट का नुकसान करता है, इसलिए अब वे क्षेत्र के क्षत्रियों, ब्राह्मणों, दबंग पिछड़ों के खिलाफ ज्यादा आक्रामक नहीं रहते थे और हर कदम संभल कर उठाते थे, ताकि सामाजिक दूरी को वह पाट सकें और बाकी जातियों के वोट भी पा सकें.

जब मनोहर लाल का काम कौम से मिलने वाले चंदे से नहीं चला तो वे बालू खनन में ठेकेदारी भी करने लगे. अब यह कारोबार बड़ा हो गया था. वे खुद को एक ‘इलीट क्लास दलित’ मानते थे. उन्होंने अपनी हवेली के एक हाल में सभी दलित नेताओं की मढ़ी हुई तसवीरें लगवा रखी थीं. लेकिन उस में सिर्फ इलाके के छोटे फिगर वाले दलित नेताओं के साथ मीटिंग की जाती थी. बाकी के लिए एक बैठका रिजर्व्ड था जिस में बुद्ध, कृष्ण और राम, महावीर और नानक देव के बड़े फोटो लगे हुए थे.

यहीं नहीं, मनोहर लाल खुद को पुराने समय के किसी जमींदार के वंश से जोड़ते थे. हालांकि इतिहास उन के किसी दावे की कभी तसदीक नहीं करता था. लेकिन इस बात से वे क्षेत्र के दलितों में काफी मजबूती से खुद की पैठ बना चुके थे. इस पैठ के पीछे एक ही लौजिक था कि उन के पास दलितों के सियासी नेतृत्व की ‘दैवीय’ प्रेरणा है और दलितों को भी उन्हें ही अपना नेता मानना चाहिए.

खैर, दुलारी हवेली के गेट पर 10 मिनट से खड़ी हुई आंसू बहा रहा थी. हवेली के मुख्य गेट पर बंदूकधारी सिक्योरिटी गार्ड, जो कुरसी पर बैठा हुआ ऊंघ रहा था, सहसा दुलारी को गेट पर देख कर संभला और जोर से टोका.

‘‘क्या है? कहां से आई हो? क्या काम है?’’ सिक्योरिटी गार्ड ने एकसाथ कई सवाल दागे.

घबराहट और आंसू भरी आंखों से दुलारी ने गार्ड को देखा, लेकिन कुछ खास बोल नहीं पाई.

सिक्योरिटी गार्ड ने फिर से पूछा कि कौन है और किस से मिलना है?

दुलारी ने रोते हुए कुछ बोलना शुरू किया कि उस ?ाबरीली मूंछ वाले सिक्योरिटी गार्ड ने कहा, ‘‘10 बजे आओ, अभी नेताजी सो रहे हैं.’’

दुलारी के पास तब तक के लिए समय नहीं था. वह बहुत परेशान थी. लेकिन, वह कुछ नहीं बोली, क्योंकि सिक्योरिटी गार्ड की बड़ी मूंछें देख कर ही वह सहम गई. हवेली के गेट के बाहर ही पास में रखे गए एक सीमेंट के बैंच पर बैठ गई और 10 बजने का इंतजार करने लगी.

तकरीबन 2 घंटे बाद जब सूरज कुछ चढ़ आया तो कुछ लोग हवेली के भीतर मनोहर लाल से मिलने आए. उन की चारपहिया गाड़ी सीधे गेट के अंदर खड़ी हुई. आधे घंटे बाद गाड़ी वापस निकली, फिर कुछ दूसरे मुलाकाती भी आनेजाने लगे.

हवेली पर मिलने वालों की कुछ भीड़ हुई और दुलारी ने फिर हिम्मत बटोर कर सिक्योरिटी गार्ड से कहा कि नेताजी से मिलवा दो.

सिक्योरिटी गार्ड ने भी काफी अनमने भाव से इंटरकौम पर किसी से बात की और थोड़ी देर में दुलारी के लिए अंदर जाने का बुलावा आ गया.

दुलारी हवेली के अहाते से होते हुए बरामदे में पहुंची और रोते हुए जमीन पर बैठ गई.

पास खड़े एक लड़के ने दुलारी से कुछ पूछना शुरू किया और पौकेट डायरी में सब नोट किया.

थोड़ी देर में दुलारी को मनोहर लाल के कमरे में भेजा गया, जहां वे एक महंगे सोफे पर पाजामा और बनियान पहने बैठे हुए थे.

‘‘हां, बोलो… क्या हुआ?’’ मनोहर लाल ने पूछा.

दुलारी ने रोते हुए अपनी बेटी के वापस नहीं लौटने का दर्द मनोहर लाल से बयां किया.

‘‘थाने गई? दारोगा से मिली? बताया उस को?’’ मनोहर लाल ने पूछा.

‘‘हम किसी को नहीं जानते. हम तो आप को ही जानते हैं…’’ और दुलारी फिर जोरजोर से रोने लगी.

‘‘रुको… चुप हो जाओ… देखता हूं…’’ मनोहर लाल ने समझाते हुए कहा.

मनोहर लाल ने तुरंत अपने एक शागिर्द को इशारा किया कि दारोगा को फोन करो और इन की मदद के
लिए कहो.

इस के बाद मनोहर लाल ने दुलारी से कहा कि थाने में जा कर रिपोर्ट लिखवा दो. एक फोटो लेती जाना.

रिपोर्ट लिख जाएगी. इस के बाद मनोहर लाल के उस शागिर्द ने थाने में फोन पर थानेदार से बात की.

दुलारी को यह पता ही नहीं था कि उस का थाना कौन सा है, क्योंकि उस का थाने से कोई वास्ता कभी पड़ा ही नहीं था. मनोहर लाल के शागिर्द ने दुलारी को उस के थाने के बारे में बताया और तुरंत जा कर थानेदार से मिलने को कहा.

थकीहारी दुलारी कांपते पैरों के साथ तेजी से घर लौट आई और बेटी की एक फोटो खोज कर एक पौलीथिन में लपेट कर ब्लाउज के भीतर रख लिया. घर में उस के पास चांदी की एक अंगूठी थी, जिसे उस ने पास रख लिया, ताकि इसे गिरवी रख कर कुछ पैसा उधार ले पाए. घर में कुछ पैसे थे, जल्दी से उन्हें भी उठाया और बाजार के रास्ते थाने जाने वाले टैंपो पर सवार हो गई.

दुलारी सबकुछ बहुत जल्दीजल्दी करना चाहती थी, लेकिन जैसे उस की देह में कोई ताकत ही नहीं बची थी. यह सब करते हुए दोपहर का समय हो गया.

दुलारी को पहली बार पुलिस थाने में घुसते हुए बड़ी घबराहट हो रही थी, क्योंकि उस का वास्ता इस सब से कभी पड़ा नहीं था. वह सीधीसादी औरत थी जो किसी तरह अपनी जिंदगी बसर कर रही थी. लेकिन, फिर दुलारी किसी तरह थाने के भीतर हिम्मत कर के दाखिल हुई.

अंदर घुसते ही गेट पर मिले एक सिपाही से बेटी की गुमशुदगी के बारे में जैसे ही रोते हुए बोलना शुरू किया, तो सिपाही ने थानेदार के कमरे की तरफ इशारा कर के वहां जाने को कहा.

दुलारी ने हिम्मत कर के थानेदार के कमरे के दरवाजे पर लगा परदा उठाया. कुरसी पर बैठा थानेदार फोन पर किसी ठेकेदार को तय रकम से कम भेजने के लिए गंदीगंदी गालियां दे रहा था.

खैर, थोड़ी देर के इंतजार के बाद किसी तरह से दुलारी ने हिम्मत बटोरी और रोते हुए दरवाजे से ही कहा, ‘‘साहब, बिटिया कल से घर नहीं आई है. बिटिया तो गायब हो गई साहब…’’

‘‘क्यों? कौन हो तुम? क्या नाम है?’’ थानेदार ने कड़क कर पूछा.

दुलारी सहम गई.

‘‘कहां गई बिटिया तुम्हारी? क्या नाम है? कहां से आई हो?’’ थानेदार ने कई सवाल एकसाथ कर डाले.

‘‘रूपा…’’ दुलारी ने रोते हुए बताया, साथ ही नेताजी के बारे में भी बोला कि मनोहर नेताजी.

‘‘उफ… ठीक है… फोटो लाओ,’’ थानेदार ने अंदर बुलाया.

थानेदार ने फोटो के पीछे ही नाम, पता और उम्र सब पूछ कर लिखा. फिर थाने के मुंशी को बुलाया और फोटो दे कर गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखने के लिए कहा.

इस के बाद थानेदार ने दुलारी से कहा, ‘‘बाहर बैठो… अभी ये एक कागज देंगे’’

एक घंटे के बाद थाने के मुंशी किशोरी लाल ने, जो जाति से पिछड़े थे, खुद को कृष्ण भक्त बताते थे, ने दुलारी को अपने कमरे में बुलाया और लड़की की गुमशुदगी बाबत पूछताछ कर के एक रजिस्टर में नोट किया, फिर एक कागज में ब्योरा लिख कर एक सिपाही को, जो शायद उसी के गांव का था, दे दिया.

मुंशी किशोरी लाल बारबार रूपा के किसी लड़के के साथ जाने, प्रेम प्रसंग में भाग जाने के बाबत जानकारी चाहते थे. उन का कहना था कि आजकल की लड़कियां टीवी देख कर उड़ने लगती हैं और मांबाप थाने में आ कर ‘ड्रामा’ करते हैं.

मुंशी ने आगे कहा कि लड़की को खोजने में जो खर्च आएगा, उस का खर्चापानी दो. फिर उस ने दुलारी के पास जो चांदी की एक अंगूठी थी, ले कर अपनी जेब में रख लिया. इस समय दुलारी को सिर्फ बेटी चाहिए, इस के अलावा वह कुछ नहीं सोच रही थी.

थाने से बाहर निकल कर दुलारी तेज कदमों से चल कर घर पहुंची. शाम के 5 बज चुके थे. अनहोनी के डर में उस के हाथपैर अब भी बुरी तरह से कांप रहे थे, जैसे देह में खून ही नहीं हो.

घर में बंधी बकरियां कल से काफी भूखी थीं, जिन्हें दानापानी देना था. चिंता और हताशा में उस की भूखप्यास सब खत्म हो चुकी थी, लेकिन बकरियों को तो दानापानी देना ही होगा, क्योंकि उन्हें जिंदा रखना है.

किसी तरह घर पहुंच कर दुलारी ने एक लोटा पानी अपनी हलक में उतारा. इस के बाद उस ने बकरियों को दानापानी दिया और फिर गांव के नए बने सरपंच से मिलने उस के घर गई, जिसे वह एकदम पसंद नहीं करती थी, क्योंकि उस की निगाह में वह सिर्फ औरतों का भूखा ऐसा ऐयाश था, जिस ने दुलारी को ‘धंधे वाली’ के हालात में पहुंचाने की पूरी कोशिश की थी, क्योंकि उस ने कभी उस से 3,000 रुपए का उधार लिया था और नहीं दे पाने की हालत में वह उस के 2 जवान बकरे घर से ही जबरदस्ती खोल कर ले गया था.

हालांकि, सरपंच से दुलारी की मुलाकात नहीं हुई और वह फिर से घर लौट आई. काफी शाम हो चुकी थी. उस ने पतीले में थोड़ा चावल डाला और नमकप्याज के साथ पका कर किसी तरह उसे हलक से नीचे डाला. दालसब्जी कुछ नहीं था.

दुलारी की रात किसी तरह कटी. पूरी रात वह जागती रही. लेकिन, बिटिया का अभी कोई सुराग नहीं मिला था.

दूसरे दिन अलसुबह ही दुलारी फिर से मनोहर लाल के घर पहुंच गई थी. इस बार वह अपने साथ गांव के एक लड़के को ले कर गई थी. हालांकि, बदनामी के डर से उस ने रास्ते में बिटिया के गायब होने के बारे में कोई चर्चा नहीं की, लेकिन गांव में यह बात रायते की तरह फैनल चुकी थी, क्योंकि थाने से सरपंच को फोन पर मामले की जानकारी दी गई थी, ताकि लापता रूपा को खोजने में मदद मिल सके.

मनोहर लाल के यहां दुलारी की जाति के ही एक और आदमी, जो बगल के गांव का छुटभैया नेता था, से उस की मुलाकात हुई. वह मनोहर लाल से अपने गांव के वोट उन के लिए फिक्स करवाने के एवज में सौदा करने आया था और मछली बाजार के ग्राहक की तरह उन से ‘मोलतोल’ कर रहा था. उस नेता के बारे में दुलारी अच्छे से जानती थी कि उस का धंधापानी क्या है और कैसे वह नकली दारू का सप्लायर है, क्योंकि उसी की दी हुई दारू पीने से उस के गांव में कुछ लोगों की मौत हुई थी.

‘‘क्या हुआ…’’ देखते ही मनोहर लाल ने पूछा, ‘‘मिली बेटी आप की…’’

‘‘नहीं मिली…’’ और दुलारी रोने लगी.

‘‘थाने गई थी…’’ पूछने पर दुलारी ने हां में सिर हिलाया.

फिर मनोहर लाल ने थानेदार को अपने एक शागिर्द से फोन करवाया और दुलारी को बताया गया कि बेटी को पुलिस खोज रही है. मिलने पर सूचित करेगी. परेशान नहीं हो.

थकहार कर दुलारी फिर घर लौट आई. अब तक दोपहर का सूरज चढ़ आया था.

2 दिन बीत गए. रोतेरोते दुलारी के आंसू खत्म हो गए. दुलारी ने इन दिनों ठीक से खानापीना भी नहीं किया था और भागदौड़ में उसे तेज बुखार अलग से हो गया.

तीसरे दिन, दोपहर का समय था. दुलारी घर के भीतर अपनी खटिया पर चिंतित बैठी थी. गांव के चौकीदार लुल्लन ने आ कर दुलारी को बताया कि उस की बेटी पड़ोस के जिले के एक अस्पताल में भरती है. पुलिस जा रही है बयान लेने. तुम भी अस्पताल पहुंचो. दारोगाजी ने बोला है.

चौकीदार ने आगे कहा कि तुम्हारी बेटी नशे की हालत में तहसील के बसस्टैंड पर लावारिस मिली है, जिसे कुछ लोगों ने स्थानीय चौकी के सुपुर्द कर दिया था. पुलिस वालों ने उसे अस्पताल में भरती करवा दिया है. जाओ मिल लो.

दुलारी की आंखों में चमक आ गई. उस ने किसी तरह गांव के एक आदमी से कुछ पैसे उधार लिए और अस्पताल साथ चलने की चिरौरी की. वह अस्पताल पहुंची, तो बेटी उसे अकेले एक बिस्तर पर पड़ी मिली, जिसे कुछ पुलिस वाले और डाक्टर घेरे हुए थे और कुछ लिखापढ़ी कर रहे थे. काफी देर बाद दुलारी को अपनी बेटी रूपा से बात करने का मौका मिल पाया.

दुलारी ने देखते ही अपनी बेटी को प्यार से भींच लिया, माथा चूमा, गले लगाया. उस का हीरा उसे मिल गया था. उस ने बेतहाशा उसे चूमा, दुलारा और प्यार किया. बेटी भी मां को देख कर रोने लगी. आखिर वही तो उस का सबकुछ थी.

रूपा ने देर शाम को अपनी मां से अपने साथ रेप और मारपीट की दर्दनाक घटना बताई, जिसे गांव के बगल के यादव टोला के लड़कों ने अंजाम दिया था. दोनों लड़के गांव की ताकतवर और बहुसंख्यक पिछड़ी बिरादरी से थे, लेकिन उन की जातियां अलगअलग थीं. खैर, पुलिस ने रूपा का बयान दर्ज किया और नियमानुसार मैडिकल भी हुआ. एफआईआर भी दर्ज हुई.

दुलारी अगले 2 दिन रूपा के साथ अस्पताल और थानेअदालत के चक्कर लगाती रही.

चूंकि मनोहर लाल इस मामले में थोड़ा लगे हुए थे, इसलिए पुलिस ने जांच शुरू की. पहले आरोपी सुमेश के नाई समुदाय के लोग सामने आ गए और आरोपी के घर वाले रूपा को ही सैक्स की भूखी लड़की साबित करने लगे. ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि यह आरोपी लड़का टोले के पूर्व पंचायत सदस्य का बेटा और वर्तमान विधायक ‘मुंशीजी’ का खास आदमी था. दूसरा आरोपी युवक क्षत्रिय समुदाय का रितेश था, जिस के यहां यह सब करना ‘मर्दानगी’ की पहचान थी. इस समुदाय में अपराध पर बहस न हो कर कौन उस लड़की की मदद कर रहा है, उस पर चर्चा हो रही थी. सब जल्द ही पता चल गया. नाम मनोहर लाल का आया. बात मनोहर लाल तक, जो कुछ समय पहले ही में दिल्ली से एक बिजनेस डील कर के लौटे थे, इस धमकी के साथ पहुंचाई गई कि क्षत्रियों की इज्जत से एक ‘धंधे वाली’ की आड़ में मत खेलो. निबटना है तो निबट लो. देखते हैं चुनाव कैसे जीतते हो.

मनोहर लाल ने इस मामले को ध्यान से सुना. फिर कुछ दिन चुप रहे. उन्हें लगा कि मामला खत्म हो जाएगा. लेकिन, इधर नाई समुदाय जहां लड़के के पक्ष में जुलूस निकाल रहा था, वहीं क्षत्रिय समुदाय मनोहर लाल पर मामले को खत्म करवाने वरना सबक सीखने के लिए तैयार रहने का अल्टीमेटम दे कर पंचायत कर रहा था.

इधर दुलारी की जाति और गांव के कई छुटभैया लोग उस के पास सम?ाते के लिए दबाव बनाने के लिए रोज उस के घर पहुंच रहे थे. पुलिस आरोपियों से पैसा खाने के लिए दबाव बना कर रख रही थी. हालांकि, थानेदार की भी आरोपियों को पकड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. वह दबाव बना कर सिर्फ वसूली कर रहा था.

परेशान थी तो बस दुलारी. उस के गांव और जाति के ताकतवर लोग भी उस के साथ खड़े होने को तैयार नहीं थे. जो भी उस से मिलता, एक ही ‘डील’ करने की फिराक में रहता. जातबिरादरी के किसी नेता, कार्यकर्ता की कोई दिलचस्पी नहीं थी कि पीडि़त परिवार को ‘इंसाफ’ मिले.

इधर, आरोपी लड़कों के परिवार वालों के साथ यह मामला जातबिरादरी का सवाल दिन ब दिन बनता जा रहा था. इस मामले को सत्ताधारी विधायकों ने भी अपने हित में मोड़ना शुरू कर दिया. नया तर्क गढ़ा गया कि मनोहर लाल को वोट नहीं देने के कारण क्षत्रिय और नाई बिरादरी को बदनाम करने का खेल खेला जा रहा है. एक दलित लौंडिया कैसे रेप का आरोप लगा सकती है…? उस की हैसियत क्या है…? इसी बात पर आरोपियों ने जात की 2 सम्मिलित पंचायत भी करवाईं, जिन में कई स्थानीय नेता शामिल हुए. इस से पुलिस के साथ मनोहर लाल भी बैकफुट आ गए. वे मामले में शामिल नहीं होने की कसमें खाने लगे, क्योंकि उन्हें इस से दलित बिरादरी के वोट खिसकने का कोई डर नहीं था. डर तो बाकी जातियों के बिदकने का था. इन सब से रूपा और दुलारी तो इतने ज्यादा घबरा गईं कि उन्हें अपने ही घर में अब बहुत डर लगने लगा.

इधर, खुलेआम माइक लगा कर मनोहर लाल को ललकारा जाने लगा. मनोहर लाल को बड़े चुनावी नुकसान का डर लग गया, क्योंकि विधानसभा की 2 ताकतवर जातियों की गोलबंदी से उन का चुनाव हारना तय था. उन्हें कुछ लोगों ने सम?ाया कि एक अदद ‘लौंडिया’ के लिए अपनी सियासी पारी को कमजोर मत करो. केस में सम?ाता करवाइए और मामला निबटा दीजिए. रूपा की जाति और गांव के कई छुटभैए नेता भी यही चाहते थे, ताकि मनोहर लाल को दोनों जातियों का सपोर्ट मिल सके और वे चुनाव जीत सकें.

अब मनोहर लाल को लगा कि चुप्पी से काम नहीं चलेगा, क्योंकि मामला बिगड़ चुका है. मनोहर लाल अब अपने ‘सियासी’ नुकसान के डर से इस मामले को मैनेज कराने में लग गए. उन्होंने अपने शार्गिंदो से लड़की को सैक्स की भूखी होने का प्रचार भी करवाया. उस की मां का भी दामन दागदार बताने की पूरी कोशिश करवाई गई, ताकि यह लगे कि उन्हें इस मामले से कोई दिलचस्पी नहीं है. इस तरह पूरा एक महीना निकल गया.

लेकिन, इन सब से बहुत दूर विधवा दुलारी को बस इसी बात का संतोष था कि उस की बेटी उस के पास आ गई है. एक गरीब को और क्या चाहिए. पुलिस, थाना, वकील, कचहरी उस के बस का नहीं है. अब उसे और किसी चीज में कोई दिलचस्पी नहीं थी, क्योंकि वह रोज थानेकचहरी और वकील के पास जाने का खर्च ही नहीं उठा सकती थी. उसे तकरीबन रोज थाने बुलाया जाता और दिनभर बयान लेने के नाम पर बैठाए रखा जाता.

इस मामले का विवेचक भी दलित जाति का था, जिस के लिए एकमात्र मकसद पैसा कमाना था, क्योंकि वह एक खेत खरीदने के लिए 30 लाख की रकम किसी भी कीमत पर जल्द इकट्ठा करना चाहता था. इस केस में आरोपी, पुलिस, जाति के छोटे नेता, कार्यकर्ता सब अपने हिसाब से फायदा लेने के लिए खेल रहे थे.

लेकिन, दुलारी और रूपा इन सब से बेपरवाह और अनजान थीं. वे अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को फिर से पटरी पर लाना चाहती थीं, जो रूपा के साथ हुई घटना के बाद उतर गई थी.

दुलारी को अपनी बेटी मिल गई थी, बाकी उसे किसी ‘इज्जत’ की कोई फिक्र नहीं थी. भूखे, नंगे और गरीब लोग इंसाफ के बारे में नहीं सोचते.

तकरीबन एक हफ्ता और बीता होगा. एक दिन सुबह अचानक दुलारी को मनोहर लाल के एक शागिर्द ने हवेली पर पहुंचने का संदेश दिया. दुलारी हवेली पर गई भी. बेटी के भविष्य को ले कर लंबी भूमिका बनाने के बाद, जिस में उसे रूपा के बदनाम होने से ले कर, शादी, सुरक्षा का डर सबकुछ दिखाया गया, धमकी वाली भाषा में भी समझाया गया. बोला गया कि समझौता कर लो.

डरीसहमी दुलारी से कुछ कागजों पर अंगूठा लगवाया गया, जो बाद में अदालत में समझौते के प्रपत्र के बतौर पुलिस द्वारा जमा किया गया. हवेली से चलते वक्त उसे एक लिफाफा दिया गया, जिसे उस ने घर में खोल कर देखा. उस मे 500 के 10 नोट थे. उस के इंसाफ का ‘सौदा’ हो चुका था, जिस में, जाति के नेता, पुलिस, सरपंच सब शामिल थे. लेकिन, इस सौदे में शामिल नहीं थी तो सिर्फ दुलारी की ‘इच्छा’, जिसे पैसे और ताकत के दम पर मनोहर लाल ने हम जाति होने के बावजूद रौंदवा दिया था.

हालांकि, इस के बाद भी मनोहर लाल इस बार फिर विधायक नहीं बन पाए, क्योंकि पिछड़ों ने दलितों को इसलिए वोट नहीं दिए, ताकि वे सियासीतौर पर मजबूत न हों. शायद एक विधवा की आह ने उन के सियासी कैरियर को भस्म कर दिया था. Long Hindi Story

Story In Hindi: सफर

Story In Hindi, लेखक – सुमित सेनगुप्ता

मैं यानी अनिल दादर रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में आ कर बैठ गया हूं. स्टेशन के पास ही शापुर रैस्टोरैंट है. उन की बनाई ग्रिल्ड पौम्फ्रैट फ्राई, दाल फ्राई और रुमाली रोटी का कौम्बिनेशन मेरा हौट फेवरेट है. दादर आते ही मैं उन की दुकान में जरूर झांकता हूं. इस के लिए एक बार भारी कीमत चुकातेचुकाते बच गया था.

दरअसल, जो ट्रेन कभी 10 मिनट लेट से कुर्लाटीटी स्टेशन से नहीं छूटती थी, वह ट्रेन उस दिन 45 मिनट लेट हुई और मु झे बचाया. वह समय दुर्गापूजा की पूर्वसंध्या का था. मैं मुंबई से पटना लौट रहा था. उस समय पटना के लिए सिर्फ एक ही ट्रेन थी, वह भी हफ्ते में 2 दिन, इसलिए ज्यादातर लोग कोलकाता हो कर ही आतेजाते थे.

उस दिन कुर्ला स्टेशन तक आतेआते मैं ने मन ही मन प्रतिज्ञा कर ली थी कि आज ट्रेन मिल जाए, तो ऐसे लालच में कभी नहीं पड़ूंगा. लालच में पाप, पाप में मौत. मगर 3 महीने बाद ही वह प्रतिज्ञा तोड़ दी.

भीष्म अपनी प्रतिज्ञा निभा कर अमर हो गए और मैं हर बार अपनी प्रतिज्ञा तोड़ कर ‘हक्काबक्का’ हो रहा हूं. सिगरेट नहीं पीऊंगा कह कर कितनी बार छोड़ी है, उस का याद नहीं. ‘घर के फ्रिज की मिठाई चुराऊंगा नहीं’ कह कर पत्नी ने माफीनामा लिखवाया था. हर बार पकड़ा गया. इतनी सारी निराशाओं के बीच एक चीज नहीं बदली, वह है मेरा अडि़यल किरदार.

पेटभर खाने के बाद दोपहर 4 बजे वेटिंग रूम की कुरसी पर शरीर लटका दिया. पुणे वापसी की ट्रेन साढ़े 6 बजे आएगी. तभी वेटिंग रूम इंचार्ज आ कर मेरा टिकट देखना चाहते हैं. मैं मोबाइल की स्क्रीन खोल कर दिखाता हूं.

वे देखते ही चौंक जाते हैं और बोलते हैं, ‘‘अरे, यह ट्रेन तो सुबह साढ़े 5 बजे निकल गई है.’’

उन की बात सुन कर मेरी नींद भरी आंखों से नींद गायब. उन के हाथ से अपना मोबाइल ले कर देखता हूं…

आज खुद ही अपने लिए बेवजह की मुसीबत खड़ी कर बैठा हूं. लैपटौप पर टिकट बुक करते समय सुबह को शाम सम झ बैठा. पूरी तरह शर्मिंदा और बेइज्जत हो कर उठ खड़ा हुआ. अभी बस पकड़नी होगी, नहीं तो घर पहुंच कर और शर्मिंदा होना पड़ेगा.

कुछ दूर खड़ी पुणे जाने वाली बस. मुंबई से पुणे शहर पहुंचने के 3 पते… शिवाजीनगर, स्टेशन और स्वारगेट. स्टेशन मेरे लिए सुविधाजनक है. अच्छा है बस स्टेशन ही जाएगी. बस को 4 एजेंट घेरे हुए हैं. जहां से जो मुमकिन हो ग्राहक पकड़ कर ला रहे हैं. मेरे जाते ही वे टूट पड़ते हैं, मुमकिन हो तो मु झे गोदी में उठा कर बैठा देते.

बस काफी खाली है. खिड़की के पास सीट ले कर बैठ गया. अरे, बाप रे… 5-6 सवारियों को ले कर बस तुरंत छोड़ देती है. राहत की सांस आती है कि चलो 8 बजे तक पुणे पहुंच जाएंगे.

बस आगे बढ़ती है, दाएं मुड़ती है, फिर दाएं, उस के बाद फिर दाएं और थोड़ा आगे जा कर रुक जाती है.

यानी जहां से बस निकली थी, वहीं अब खड़ी है. फिर डेढ़ घंटे तक ऐसे ही 5 बार चक्कर काटती है.

आखिर में तंग आ कर मैं पूछता हूं, ‘‘यह सब करने का मतलब?’’

जवाब आता है, ‘‘आरटीओ औफिस के लोग खड़े हैं. ज्यादा देर खड़ी रही तो फाइन देना पड़ेगा.’’

जिंदगी में कितनी तरह के अनुभव होते हैं. आखिरकार शाम साढ़े 7 बजे बस दादर से निकलती है. तब तक सभी सीटें भर चुकी हैं. दिन शुक्रवार है, इसलिए पुणे में तैनात मुंबई के नौजवान लड़केलड़कियां वीकैंड पर घर लौट रहे हैं. बस में उन्हीं की भरमार है.

मेरे पास एक कम उम्र की लड़की बैठ गई है. उम्र न सिर्फ कम है, बल्कि ध्यान से देखा तो कद भी छोटा है. पैर पूरी तरह फुटरैस्ट तक नहीं पहुंच रहे.

तभी मेरा फोन बज उठा. फोन के दूसरी तरफ मेरी पत्नी श्रावंती. खतरा… फोन उठाते ही रास्ते के हौर्न की आवाज सुनाई देगी. मेरी नाकामी का भेद खुल जाएगा. पर फोन न उठाना भी ठीक नहीं. वह छोड़ेगी नहीं, लगातार बजाती रहेगी. फोन बंद कर दूं तो भी मुसीबत, बात न करने पर श्रावंती टैंशन लेगी. हाई ब्लडप्रैशर की पेशेंट है. अकेली घर पर है, यह भी समस्या है.

मजबूरन रिसीवर को ढकते हुए जोर से बोला, ‘‘चढ़ गया हूं, बाद में फोन करता हूं.’’

मकसद था मुंबई शहर छोड़ कर बस जब सुनसान इलाके में पहुंचेगी, तो बात कर लूंगा.

पश्चिम भारत में बेवजह हौर्न बजाने की आदत कम है. यह बात मु झे मेरे पुरानी कंपनी के डायरैक्टर मिस्टर बाफना ने कोलकाता के कैमाक स्ट्रीट औफिस में बैठ कर सम झाई थी. उस दिन लंबे समय तक लोडशैडिंग के चलते सड़क किनारे बने कौंफ्रैंस रूम की खिड़कियां खोलनी पड़ी थीं. फिर कारों के हौर्न के शोर से कान पक गए थे.

कुछ देर बाद बस एक पैट्रोल पंप पर रुकती है. जल्दी से उतर कर एक सुनसान जगह ढूंढ़ कर श्रावंती को रिपोर्ट कर देता हूं. बस की रफ्तार देख कर अंदाजा लगा लिया है कि रात 11 बजे से पहले पुणे नहीं पहुंचेगी. ट्रेन होती तो साढ़े 9 बजे ही पहुंच जाता, इसलिए पहले ही ट्रेन लेट होने की कहानी गढ़ ली है.

बस मुंबई शहर छोड़ कर मुंबईपुणे ऐक्सप्रेसवे पर चल पड़ती है. महसूस करता हूं कि पास वाली लड़की सीट पर सो गई है. बीचबीच में झुक कर मेरे कंधे से टकरा रही है. बेचारी पूरे दिन औफिस में काम कर के अब सफर कर रही है. वह मेरी छोटी बेटी जितनी है. तोरसा भी बस में मेरे कंधे पर सिर रख कर सोती थी.

कभी गोद में सिर दे कर लेट जाती थी. छोटी उम्र से ही वह मेरी बगलगीर थी.

एक बार औफिस के काम से कुछ दिनों के लिए कोलकाता जाना हुआ. तोरसा तब 3 साल की थी. जिद करने लगी कि मेरे साथ कोलकाता जाएगी. यह सुन कर कोलकाता से भाई की पत्नी दोला ने कहा, ‘‘दादा, ले आइए. मैं संभाल लूंगी.’’

चेयरकार से दोनों गए थे. वह मंजर आज भी आंखों में तैरता है. एक कोल्डड्रिंक की बोतल, चिप्स का पैकेट सामने रख कर 3 साल की बच्ची खिड़की के पास बैठी बाहर का नजारा देखतेदेखते पटना से कोलकाता पहुंच गई. हावड़ा स्टेशन पर उतर कर उस ने मेरा हाथ नहीं पकड़ा. ‘ठकठक’ कर चलने लगी.

औफिस के एक साथी गोपाल ने देख कर कहा था, ‘‘तेरी बेटी बहुत स्मार्ट है.’’

मन ही मन आज सोचता हूं, ‘जरूरत से ज्यादा सम झदार…’

22 साल पूरे होतेहोते एमबीए कर के दूल्हे के हाथ ससुराल चली गई और उस की बड़ी बहन को शादी के लिए मनाने में तो नाकों चने चबवा लिए. आखिर धमकी दे कर शादी के पीढ़े पर बैठाना पड़ा.

बस अचानक तेज ब्रेक मारती है. झटके से लड़की जाग जाती है और शर्मिंदा होती है.

वह शरमाते हुए कहती है, ‘‘सौरी अंकल, मैं सो गई थी.’’

मैं प्यार से कहता हूं, ‘‘कोई बात नहीं, तुम थक गई होगी. मेरी छोटी बेटी भी ऐसे ही सो जाती थी.’’

अब लड़की ने पूछा, ‘‘आप कहां उतरोगे?’’

मैं ने कहा, ‘‘पुणे स्टेशन.’’

सुन कर उसे राहत मिली. उस का अगला सवाल, ‘‘आप बंगाली हैं?’’

मैं ने कहा, ‘‘जी, कैसे पता चला?’’

लड़की बोली, ‘‘आप के बोलने के लहजे से. हमारे डिपार्टमैंट में बंगाली बहुत हैं.’’

अब मैं ने पूछा, ‘‘आप मराठी हो?’’

उस लड़की ने कहा, ‘‘आप को कैसे पता?’’

मैं ने जवाब दिया, ‘‘मेरे साथ वाले पड़ोसी भी मराठी हैं. आप ने अपनी ‘आई’ से बात की है न?’’

इतना सुन कर वह जोर से हंसी.

2 घंटे चलने के बाद बस एक रोड साइड ढाबे के पास रुकती है. यहां सभी उतरेंगे. कोई चाय पीएगा, कोई खाना खाएगा, कोई वाशरूम जाएगा.

मैं भी उतरा. समय देखा, तकरीबन 10 बजे हैं यानी पुणे स्टेशन पहुंचतेपहुंचते रात के 12 बज ही जाएंगे. आज पकड़ा जाऊंगा. मेरा झूठ टिकेगा नहीं, क्योंकि रात जितनी बढ़ेगी, देरी होगी, श्रावंती के फोन उतने ही बार आएंगे और किसी न किसी समय आसपास का शोर पकड़ में आ जाएगा और मैं फंस जाऊंगा.

फिर सुनसान जगह ढूंढ़ कर फोन लगाता हूं. यहां के लोग ट्रेन में ज्यादा बात नहीं करते. हौकर्स भी वैसे नहीं चलते, यह श्रावंती जानती है, इसलिए सुनसानी के आंचल में बच सकता हूं.

सब ठीक चल रहा था, श्रावंती से बात शांति से हो रही थी. अचानक हमारी बस के पास खड़ी बस भयानक आवाज में गरज उठी. श्रावंती के कान में वह आवाज जरूर पहुंची और ऐसा ही हुआ.

वह बोली, ‘‘बस की आवाज आ रही है. तुम कहां हो?’’

मैं धीरे से बोला, ‘‘अरे, खंडाला घाट के ऊपर ट्रेन खड़ी है. पास ही ऐक्सप्रैसवे है.’’

श्रावंती मान जाती है या मन ही मन सम झ जाती है. मैं बच गया. जल्दी से बात खत्म की. बोला, ‘‘बात ठीक से सुनाई नहीं दे रही. टावर नहीं मिल रहा.’’

पास वाली लड़की बस में लौट आई. एक जीरो शुगर कोक की बोतल मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोली, ‘‘अंकल, यह लीजिए.’’

उस ने नोटिस किया था कि मेरी पानी की बोतल खाली हो गई है. टैंशन में मैं भूल गया था पानी खरीदना.

हमारी बस लोनावला घाट में जाम में फंस गई. पुणे शहर के नजदीक पहुंचते ही रात का 1 बज गया. रेल स्टेशन पहुंचतेपहुंचते रात के 2 बज गए थे.

लड़की से पूछा, ‘‘आप कहां जाओगी?’’

जवाब आया, ‘‘शिवाजीनगर.’’

फिर मैं ने पूछा, ‘‘कोई आप को लेने आ रहा है?’’

कुछ देर चुप रह कर मेरी तरफ देखती हुई वह बोली, ‘‘नहीं, मैं चली जाऊंगी.’’

थोड़ा अधिकार दिखाते हुए मैं बोला, ‘‘मु झे ‘खड़की’ जाना है. चलो, तुम्हें छोड़ देता हूं. इतनी रात अकेली कैसे जाओगी.’’

लड़की ने एक आटोरिकशा बुलाया और आटोरिकशा वाले को मराठी में सम झाया कि उसे ‘शिवाजीनगर’ छोड़ कर मु झे ‘खड़की’ पहुंचाना है. मेरा फोन चार्ज खत्म हो चुका था. पहले ही श्रावंती से कह दिया था, ‘‘ट्रेन बहुत लेट है. फोन का चार्ज भी खत्म हो रहा है. तुम चिंता मत करो.’’

लड़की को उस के अपार्टमैंट के दरवाजे तक छोड़ कर विदा किया. आटोरिकशा वाला ‘खड़की’ की ओर चल पड़ा.

मैं ड्राइवर से कहा, ‘‘गाड़ी वापस मोड़ो. मु झे ‘एनआईबीएम’ जाना है.’’

आटोरिकशा वाला बोला, ‘‘लेकिन, उस ने तो ‘खड़की’ कहा था.’’

मैं ने कहा, ‘‘क्या करूं… इतनी रात अकेली कैसे छोड़ दूं? मुंबई से साथ चले थे. सच बोलने पर वह पहुंचाने को राजी नहीं थी.’’

आटोरिकशा वाला बोला, ‘‘चलिए सर, जहां बोलोगे पहुंचा दूंगा.’’ Story In Hindi

Hindi Romantic Story: ई-ग्रुप

Hindi Romantic Story: ‘‘वाह, इसे कहते हैं कि आग लेने गए थे और पैगंबरी मिल गई,’’ रवि और पूनम के लौन में अन्य दोस्तों को बैठा देख कर विकास बोला, ‘‘हम लोग तो तुम्हें दावत देने आए थे, पर अब खुद ही खा कर जाएंगे.’’

‘‘दावत तो शौक से खाइए पर हमें जो दावत देने आए थे वह कहीं हजम मत कर जाइएगा,’’ पूनम की इस बात पर सब ठहाका लगा कर हंस पड़े.

‘‘नहीं, ऐसी गलती हम कभी नहीं कर सकते. वह दावत तो हम अपनी जिंदगी का सब से अहम दिन मनाने की खुशी में कर रहे हैं यानी वह दिन जिस रोज मैं और रजनी दो से एक हुए थे,’’ विकास बोला.

‘‘ओह, तुम्हारी शादी की सालगिरह है. मुबारक हो,’’ पूनम ने रजनी का हाथ दबा कर कहा.

‘‘मुबारकबाद आज नहीं, शुक्रवार को हमारे घर आ कर देना,’’ रजनी अब अन्य लोगों की ओर मुखातिब हुईं, ‘‘वैसे, निमंत्रण देने हम आप के घर…’’

‘‘अरे, छोडि़ए भी, रजनीजी, इतनी तकलीफ और औपचारिकता की क्या जरूरत है. आप बस इतना बताइए कि कब आना है. हम सब स्वयं ही पहुंच जाएंगे,’’ रतन ने बीच में ही टोका.

‘‘शुक्रवार को शाम में 7 बजे के बाद कभी भी.’’

‘‘शुक्रवार को पार्टी देने की क्या तुक हुई? एक रोज बाद शनिवार को क्यों नहीं रखते?’’ राजन ने पूछा.

‘‘जब शादी की सालगिरह शुक्रवार की है तब दावत भी तो शुक्रवार को ही होगी,’’ विकास बोला.

‘‘सालगिरह शुक्रवार को होने दो, पार्टी शनिवार को करो,’’ रवि ने सुझाव दिया.

‘‘नहीं, यार. यह ईद पीछे टर्र अपने यहां नहीं चलता. जिस रोज सालगिरह है उसी रोज दावत होगी और आप सब को आना पड़ेगा,’’ विकास ने शब्दों पर जोर देते हुए कहा.

‘‘हां, भई, जरूर आएंगे. हम तो वैसे ही कोई पार्टी नहीं छोड़ते, यह तो तुम्हारी शादी की सालगिरह की दावत है. भला कैसे छोड़ सकते हैं,’’ राजन बोला.

‘‘पर तुम यह पार्टी किस खुशी में दे रहे हो, रवि?’’ विकास ने पूछा.

‘‘वैसे ही, बहुत रोज से राजन, रतन वगैरा से मुलाकात नहीं हुई थी, सो आज बुला लिया.’’

रजनी और विकास बहुत रोकने के बाद भी ज्यादा देर नहीं ठहरे. उन्हें और भी कई जगह निमंत्रण देने जाना था. पूनम ने बहुत रोका, ‘‘दूसरी जगह कल चले जाना.’’

‘‘नहीं, पूनम, कल, परसों दोनों दिन ही जाना पड़ेगा.’’

‘‘बहुत लोगों को बुला रहे हैं क्या?’’

‘‘हां, शादी की 10वीं सालगिरह है, सो धूमधाम से मनाएंगे,’’ विकास ने जातेजाते बताया.

‘‘जिंदादिल लोग हैं,’’ उन के जाने के बाद राजन बोला.

‘‘जिंदादिल तो हम सभी हैं. ये दोनों इस के साथ नुमाइशी भी हैं,’’ रवि हंसा.

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘शादी की सालगिरह इतने हल्लेगुल्ले के साथ मनाना मेरे खयाल में तो अपने प्यार की नुमाइश करना ही है. दोस्तों को बुलाने के लिए किसी बहाने की जरूरत नहीं होती.’’

‘‘तो आप के विचार में शादी की सालगिरह नहीं मनानी चाहिए?’’ शोभा ने पूछा.

‘‘जरूर मनानी चाहिए, लेकिन अकेले में, एकदूसरे के साथ,’’ रवि पूनम की ओर आंख मार कर मुसकराया, ‘‘पार्टी के हंगामे में नहीं.’’

‘‘तभी आज तक तुम्हारी शादी की सालगिरह की दावत नहीं मिली. वैसे, तुम्हारी शादी की सालगिरह होती कब है, रवि?’’ रतन ने पूछा.

‘‘यह बिलकुल खुफिया बात है,’’ राजन हंसा, ‘‘रवि ने बता दिया तो तुम उस रोज मियांबीवी को परेशान करने आ पहुंचोगे.’’

‘‘लेकिन, यार, इंसान शादी करता ही बीवी के साथ रहने को है और हमेशा रहता भी उस के साथ ही है. फिर अगर खुशी के ऐसे चंद मौके दोस्तों के साथ मना लिए जाएं तो हर्ज ही क्या है? खुशी में चारचांद ही लग जाते हैं,’’ रतन ने कहा.

‘‘यही तो मैं कहती हूं,’’ अब तक चुप बैठी पूनम बोली.

‘‘तुम तो कहोगी ही, क्योंकि तुम भी उसी ‘ई ग्रुप’ की जो हो,’’ रवि ने व्यंग्य से कहा.

‘‘ई ग्रुप? वह क्या होता है, रवि भाई?’’ शोभा ने पूछा.

‘‘ई ग्रुप यानी एग्जिबिशन ग्रुप, अपने प्यार की नुमाइश करने वालों का जत्था. मियांबीवी को शादी की सालगिरह मना कर अपने लगाव या मुहब्बत का दिखावा करने की क्या जरूरत है? रही बात दोस्तों के साथ जश्न मनाने की, तो इस के लिए साल के तीन सौ चौंसठ दिन और हैं.’’

‘‘इस का मतलब यह है कि शादी की सालगिरह बैडरूम में अपने पलंग पर ही मनानी चाहिए,’’ राजन ने ठहाका लगा कर फब्ती कसी.

‘‘जरूरी नहीं है कि अपने घर का ही बैडरूम हो,’’ रवि ने ठहाकों की परवा किए बगैर कहा.

‘‘किसी हिल स्टेशन के शानदार होटल का बढि़या कमरा हो सकता है, किसी पहाड़ी पर पेड़ों का झुंड हो सकता है या समुद्रतट का एकांत कोना.’’

‘‘केवल हो ही सकता है या कभी हुआ भी है, क्यों, पूनम भाभी?’’ रतन ने पूछा.

‘‘कई बार या कहिए हर साल.’’

‘‘तब तो आप लोग छिपे रुस्तम निकले,’’ राजन ने ठहाका लगाते हुए कहा.

शोभा भी सब के साथ हंसी तो सही, लेकिन रवि का सख्त पड़ता चेहरा और खिसियाई हंसी उस की नजर से न बच सकी. इस से पहले कि वातावरण में तनाव आता, वह जल्दी से बोली, ‘‘भई, जब हर किसी को जीने का अंदाज जुदा होता है तो फिर शादी की सालगिरह मनाने का तरीका भी अलग ही होगा. उस के लिए बहस में क्यों पड़ा जाए. छोडि़ए इस किस्से को. और हां, राजन भैया, विकास और रजनी के आने से पहले जो आप लतीफा सुना रहे थे, वह पूरा करिए न.’’

विषय बदल गया और वातावरण से तनाव भी हट गया, लेकिन पूनम में पहले वाला उत्साह नहीं था.

कोठी के बाहर खड़ी गाडि़यों की कतारें और कोठी की सजधज देख कर यह भ्रम होता था कि वहां पर जैसे शादी की सालगिरह न हो कर असल शादी हो रही हो. उपहारों और फूलों के गुलदस्ते संभालती हुई रजनी लोगों के मुबारकबाद कहने या छेड़खानी करने पर कई बार नईनवेली दुलहन सी शरमा जाती थी.

कहकहों और ठहाकों के इस गुलजार माहौल की तुलना पूनम अपनी सालगिरह के रूमानी मगर खामोश माहौल से कर रही थी. उस रोज रवि अपनी सुहागरात को पलदरपल जीता है, ‘हां, तो ठीक इसी समय मैं ने पहली बार तुम्हें बांहों में भरा था, और तुम…तुम एक अधखिले गुलाब की तरह सिमट गई थीं और… और पूनम, फिर तुम्हारी गुलाबी साड़ी और तुम्हारे गुलाबी रंग में कोई फर्क ही नहीं रह गया था. तुम्हें याद है न, मैं ने क्या कहा था…अगर तुम यों ही गुलाबी हो जाओगी तो तुम्हारी साड़ी उतारने के बाद भी मैं इसी धोखे में…ओह, तुम तो फिर बिलकुल उसी तरह शरमा गईं, बिलकुल वैसी ही छुईमुई की तरह छोटी सी…’ और उस उन्माद में रवि भी उसी रात का मतवाला, मदहोश, उन्मत्त प्रेमी लगने लगता.

‘‘पूनम, सुन, जरा मदद करवा,’’ रजनी उस के पास आ कर बोली, ‘‘मैं अकेली किसेकिसे देखूं.’’

‘‘हां, हां, जरूर.’’ पूनम उठ खड़ी हुई और रजनी के साथ चली गई.

मेहमानों में डाक्टर शंकर को देख कर वह चौंक पड़ी. रवि डाक्टर शंकर के चहेते विद्यार्थियों में से था और इस शहर में आने के बाद वह कई बार डाक्टर शंकर को बुला चुका है, पर हमेशा ही वह उस समय किसी विशेष कार्य में व्यस्त होने का बहाना बना, फिर कभी आने का आश्वासन दे, कर रवि को टाल देते थे. पर आज विकास के यहां कैसे आ गए? विकास से तो उन के संबंध भी औपचारिक ही थे और तभी जैसे उसे अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया.

‘‘क्यों, डाक्टर, हम से क्या नाराजगी है? हमारा निमंत्रण तो हमेशा इस बेदर्दी से ठुकराते हो कि दिल टूट कर रह जाता है. यह बताओ, विकास किस जोर पर तुम्हें खींच लाया?’’ एक गंजा आदमी डाक्टर शंकर से पूछ रहा था.

‘‘क्या बताऊं, गणपतिजी, व्यस्त तो आज भी बहुत था, लेकिन इन लोगों की शादी की सालगिरह थी. अब ऐसे खास मौके पर न आना भी तो बुरा लगता है.’’

‘‘यह बात तो है. मेरी पत्नी का भी इन लड़केलड़कियों के जमघट में आने को दिल नहीं था पर रजनी की जिद थी कि शादी की 10वीं सालगिरह पर उसे हमारा आशीर्वाद जरूर चाहिए, सो, आना पड़ा वरना मुझे भी रोटरी मीटिंग में जाना था.’’

पूनम को मेहमानों की आवभगत करते देख कर रवि उस के पास आया, ‘‘पूनम, जरा डाक्टर शंकर को आने के लिए कहो न कभी घर पर.’’

‘‘वे मेरे कहने से नहीं आने वाले.’’ पूनम अवहेलना से मुसकराई.

‘‘फिर कैसे आएंगे?’’

‘‘मेरे साथ आओ, बताती हूं.’’ पूनम ने रवि को अपने पीछेपीछे पैंट्री में आने का इशारा किया और वहां जा कर डाक्टर शंकर और गणपतिजी के बीच हुई बातचीत दोहरा दी.

‘‘तो इस का मतलब है कि वे लोग मजबूरन आए हैं. किसी को जबरदस्ती बुलाना और वह भी अपने प्यार की नुमाइश कर के, हम से नहीं होगा भई, यह सब.’’

‘‘मेरे खयाल में तो बगैर मतलब के पार्टी देने को ही आजकल लोग पैसे की नुमाइश समझते हैं,’’ पूनम कुछ तलखी से बोली.

‘‘तो आज जो कुछ हो रहा है उस में पैसे की नुमाइश नहीं है क्या? तुम्हारे पास पैसा होगा, तभी तो तुम दावत दोगी. लेकिन किसी निहायत व्यक्तिगत बात को सार्वजनिक रूप देना और फिर व्यस्त लोगों को जबरदस्ती खींच कर लाना मेरी नजर में तो ई ग्रुप की ओर से की जाने वाली अपनी प्रतिष्ठा की नुमाइश ही है. जहां तक मेरा खयाल है, विकास और रजनी में प्यार कभी रहा ही नहीं है. वे इकट्ठे महज इसीलिए रह रहे हैं कि हर साल धूमधाम से एकदूसरे की शादी की सालगिरह मना सकें,’’ कह कर रवि बाहर चला गया.

तभी रजनी अंदर आई, ‘‘कर्नल प्रसाद कोई भी तली हुई चीज नहीं खा रहे और अपने पास तकरीबन सब ही तली हुई चीजें हैं.’’

‘‘डबलरोटी है क्या?’’ पूनम ने पूछा, ‘‘अपने पास 3-4 किस्में की चटनियां हैं, पनीर है, उन के लिए 4-5 किस्मों के सैंडविच बना देते हैं.’’

‘‘डबलरोटी तो है लेकिन तेरी साड़ी गंदी हो जाएगी, पूनम. ऐसा कर, मेरा हाउसकोट पहन ले,’’ रजनी बोली, ‘‘उधर बाथरूम में टंगा होगा.’’ कह कर रजनी फिर बाहर चली गई. पूनम ने बाथरूम और बैडरूम दोनों देख लिए पर उसे हाउसकोट कहीं नजर नहीं आया. वह रजनी को ढूंढ़ते हुए बाहर आई.

‘‘भई, यह जश्न तो कुछ भी नहीं है, असली समारोह यानी सुहागरात तो मेहमानों के जाने के बाद शुरू होगी,’’ लोग रजनी और विकास को छेड़ रहे थे.

‘‘वह तो रोज की बात है, साहब,’’ विकास रजनी की कमर में हाथ डालता हुआ बोला, ‘‘अभी तो अपना हर दिन ईद और हर रात शबेरात है.’’

‘‘हमेशा ऐसा ही रहे,’’ हम तो यही चाहते हैं मिर्जा हसन अली बोले.

‘‘रजनी जैसे मिर्जा साहब की शुभकामनाओं से वह भावविह्वल हो उठी हो. पूनम उस से बगैर बोले वापस रसोईघर में लौट आई और सैंडविच बनाने लगी.

‘‘तू ने हाउसकोट नहीं पहना न?’’ रजनी कुछ देर बाद आ कर बोली.

‘‘मिला ही नहीं.’’

‘‘वाह, यह कैसे हो सकता है. मेरे साथ चल, मैं देती हूं.’’

रजनी को अतिथिकक्ष की ओर मुड़ती देख कर पूनम बोली, ‘‘मैं ने तुम लोगों के कमरे में ढूंढ़ा था.’’

‘‘लेकिन मैं आजकल इस कमरे में सोती हूं, तो यही बाथरूम इस्तेमाल करती हूं.’’

‘‘मगर क्यों?’’

‘‘विकास आजकल आधी रात तक उपन्यास पढ़ता है और मुझे रोशनी में नींद नहीं आती.’’

‘‘लेकिन आज तो तू अपने ही बैडरूम में सोएगी,’’ पूनम शरारत से बोली, ‘‘आज तो विकास उपन्यास नहीं पढ़ने वाला.’’

‘‘न पढ़े, मैं तो इतनी थक गई हूं कि मेहमानों के जाते ही टूट कर गिर पड़ूंगी.’’

‘‘विकास की बांहों में गिरना, सब थकान दूर हो जाएगी.’’

‘‘क्यों मजाक करती है, पूनम.

यह सब 10 साल पहले होता था. अब तो उलझन होती है इन सब चोचलों से.’’

पूनम ने हैरानी से रजनी की ओर देखा, ‘‘क्या बक रही है तू? कहीं तू एकदम ठंडी तो नहीं हो गई?’’

‘‘यही समझ ले. जब से विकास के उस प्रेमप्रसंग के बारे में सुना था…’’

‘‘वह तो एक मामूली बात थी, रजनी. लोगों ने बेकार में बात का बतंगड़ बना दिया था.’’

‘‘कुछ भी हो. उस के बाद विकास के नजदीक जाने की तबीयत ही नहीं होती और अब, पूनम, करना भी क्या है यह सब खेल खेल कर 2 बच्चे हो गए, अब इस सब की जरूरत ही क्या है?’’ पूनम रजनी की ओर फटीफटी आंखों से देखती हुई सोच रही थी कि रवि की ई ग्रुप की परिभाषा कितनी सही है. Hindi Romantic Story

Hindi Family Story: अबोला नहीं – बेवजह के शक ने पैदा किया तनाव

Hindi Family Story: क्यारियों में खिले फूलों के नाम जया याद ही नहीं रख पाती, जबकि अमित कितनी ही बार उन के नाम दोहरा चुका है. नाम न बता पाने पर अमित मुसकरा भर देता.

‘‘क्या करें, याद ही नहीं रहता,’’ कह कर जया लापरवाह हो जाती. उसे नहीं पता था कि ये फूलों के नाम याद न रखना भी कभी जिंदगी को इस अकेलेपन की राह पर ला खड़ा करेगा.

‘‘तुम से कुछ कहने से फायदा भी क्या है? तुम फूलों के नाम तक तो याद नहीं रख पातीं, फिर मेरी कोई और बात तुम्हें क्या याद रहेगी?’’ अमित कहता.

छोटीछोटी बातों पर दोनों में झगड़ा होने लगा था. एकदूसरे को ताने सुनाने का कोई भी मौका वे नहीं छोड़ते थे और फिर नाराज हो कर एकदूसरे से बोलना ही बंद कर देते. बारबार यही लगता कि लोग सही ही कहते हैं कि लव मैरिज सफल नहीं होती. फिर दोनों एकदूसरे पर आरोप लगाने लगते.

‘‘तुम्हीं तो मेरे पीछे पागल थे. अगर तुम मेरे साथ नहीं रहोगी, तो मैं अधूरा रह जाऊंगा, बेसहारा हो जाऊंगा. इतना सब नाटक करने की जरूरत क्या थी?’’ जया चिल्लाती.

अमित भी चीखता, ‘‘बिना सहारे की  जिंदगी तो मेरी ही थी और जो तुम कहती थीं कि मुझे हमेशा सहारा दिए रहना वह क्या था? नाटक मैं कर रहा था या तुम? एक ओर मुझे मिलने से मना करतीं और दूसरी तरफ अगर मुझे 15 मिनट की भी देरी हो जाता तो परेशान हो जाती थीं. मैं पागल था तो तुम समझदार बन कर अलग हो जाती.’’

जया खामोश हो जाती. जो कुछ अमित ने कहा था वह सही ही था. फिर भी उस पर गुस्सा भी आता. क्या अमित उस के पीछे दीवाना नहीं था? रोज सही वक्त पर आना, साथ में फूल लाना और कभीकभी उस का पसंदीदा उपहार लाना और भी न जाने क्याक्या. लेकिन आज दोनों एकदूसरे पर आरोपप्रत्यारोप लगा रहे हैं, दोषारोपण कर रहे हैं. कभीकभी तो दोनों बिना खाएपिए ही सो जाते हैं. मगर इतनी किचकिच के बाद नींद किसे आ सकती है. रात का सन्नाटा और अंधेरा पिछली बातों की पूरी फिल्म दिखाने लगता.

जया सोचती, ‘अमित कितना बदल गया है. आज सारा दोष मेरा हो गया जैसे मैं ही उसे फंसाने के चक्कर में थी. अब मेरी हर बात बुरी लगती है. उस का स्वाभिमान है तो मेरा भी है. वह मर्द है तो चाहे जो करता रहे और मैं औरत हूं, तो हमेशा मैं ही दबती रहूं? अमितजी, आज की औरतें वैसी नहीं होतीं कि जो नाच नचाओगे नाचती रहेंगी. अब तो जैसा दोगे वैसा पाओगे.’

उधर अमित सोचता, ‘क्या होता जा रहा है जया को? चलो मान लिया मैं ही उस के पीछे पड़ा था, लेकिन इस का यह मतलब तो नहीं कि वह हर बात में अपनी धौंस दिखाती रहे. मेरा भी कुछ स्वाभिमान है.’

फिर भी दोनों कोई रास्ता नहीं निकाल पाते. आधी रात से भी ज्यादा बीतने तक जागते रहते हैं, पिछली और वर्तमान जिंदगी की तुलना करते हुए मन बुझता ही जाता और चारों ओर अंधेरा हो जाता. फिर रंगबिरंगी रेखाएं आनेजाने लगती हैं, फिर कुछ अस्पष्ट सी ध्वनियां, अस्पष्ट से चेहरे. शायद सपने आने लगे थे. उस में भी पुराना जीवन ही घूमफिर कर दिखता है. वही जीवन, जिस में चारों ओर प्यार ही प्यार था, मीठी बातें थीं, रूठनामनाना था, तानेउलाहने थे, लेकिन आज की तरह नहीं. आज तो लगता है जैसे दोनों एकदूसरे के दुश्मन हैं फिर नींद टूट जाती और भोर गए तक नहीं आती.

सुबह जया की आंखें खुलतीं तो सिरहाने तकिए पर एक अधखिला गुलाब रखा होता. शादी के बाद से ही यह सिलसिला चला आ रहा था. आज भी अमित अपना यह उपहार देना नहीं भूला. जया फूल को चूम कर ‘कितना प्यारा है’ सोचती.

अमित ने तकिए पर देखा, फूल नहीं था, समझ गया, जया ने अपने जूड़े में खोंस लिया होगा. उस के दिए फूल की बहुत हिफाजत करती है न.

तभी जया चाय की ट्रे लिए आ गई. उस के चेहरे पर कोई तनाव नहीं था. सब कुछ सामान्य लग रहा था. अमित भी सहज हो कर मुसकराया है. जया के केशों में फूल बहुत प्यारा लग रहा था. अमित चाहता था कि उसे धीरे से सहला दे, फिर रुक गया, कहीं जया नाराज न हो जाए.

अमित को मुसकराते देख जया मन ही मन बोली कि शुक्र है मूड तो सही लग रहा है.

तैयार हो कर अमित औफिस चला गया. जया सारा काम निबटा कर जैसे ही लेटने चली, फोन की घंटी बजी. जया ने फोन उठाया. अमित का सेक्रेटरी बोल रहा था, ‘‘मैडम, साहब आज आएंगे नहीं क्या?’’

जया चौंक गई, अजीब सी शंका हुई. कहीं कोई ऐक्सीडैंट… अरे नहीं, क्या सोचने लगी. संभल कर जवाब दिया, ‘‘यहां से तो समय से ही निकले थे. ऐसा करो मिस कालिया से पूछो कहीं कोई और एप्वाइंटमैंट…’’

सेक्रेटरी की आवाज आई, ‘‘मगर मिस कालिया भी तो नहीं आईं आज.’’

जया उधेड़बुन में लग गई कि अमित कहां गया होगा. सेक्रेटरी बीचबीच में सूचित करता रहा कि साहब अभी तक नहीं आए, मिस कालिया भी नहीं.

बहुत सुंदर है निधि कालिया. अपने पति से अनबन हो गई है. उस की बात तलाक तक आ पहुंची है. उसे जल्द ही तलाक मिल जाएगा. इसीलिए सब उसे मिस कालिया कहने लगे हैं. उस का बिंदास स्वभाव ही सब को उस की ओर खींचता है. कहीं अमित भी…

सेके्रटरी का फिर फोन आया कि साहब और कालिया नहीं आए.

यह सेके्रटरी बारबार कालिया का नाम क्यों ले रहा है? कहीं सचमुच अमित मिस कालिया के साथ ही तो नहीं है? सुबह की शांति व सहजता हवा हो चुकी थी.

शाम को अमित आया तो काफी खुश दिख रहा था. वह कुछ बोलना चाह रहा था, मगर जया का तमतमाया चेहरा देख कर चुप हो गया. फिर कपड़े बदल कर बाथरूम में घुस गया. अंदर से अमित के गुनगुनाने की आवाज आ रही थी. जया किचन में थी. जया लपक कर फिर कमरे में आ गई. फर्श पर सिनेमा का एक टिकट गिरा हुआ था. उस के हाथ तेजी से कोट की जेबें टटोलने लगे. एक और टिकट हाथ में आ गया. जया गुस्से से कांपने लगी कि साहबजी पिक्चर देख रहे थे कालिया के साथ और अभी कुछ कहो तो मेरे ऊपर नाराज हो जाएंगे. अरे मैं ही मूर्ख थी, जो इन की चिकनीचुपड़ी बातों में आ गई. यह तो रोज ही किसी न किसी से कहता होगा कि तुम्हारे बिना मैं बेसहारा हो जाऊंगा.

तभी अमित बाथरूम से बाहर आया. जया का चेहरा देख कर ही समझ गया कि अगर कुछ बोला तो ज्वालामुखी फूट कर ही रहेगा. अमित बिना वजह इधरउधर कुछ ढूंढ़ने लगा. जया चुपचाप ड्राइंगरूम में चली गई. धीरेधीरे गुस्सा रुलाई में बदल गया और उस ने वहीं सोफे पर लुढ़क कर रोना शुरू कर दिया.

अमित की समझ में कुछ नहीं आ रहा था, फिर अब दोनों के बीच उतनी सहजता तो रह नहीं गई थी कि जा कर पूछता क्या हुआ है. वह भी बिस्तर पर आ कर लेट गया. कैसी मुश्किल थी. दोनों ही एकदूसरे के बारे में जानना चाहते थे, मगर खामोश थे. जया वहीं रोतेरोते सो गई. अमित ने जा कर देखा, मन में आया इस भोले से चेहरे को दुलार ले, उस को अपने सीने में छिपा कर उस से कहे कि जया मैं सिर्फ तेरा हूं, सिर्फ तेरा.

मगर एक अजीब से डर ने उसे रोक दिया. वहीं बैठाबैठा वह सोचता रहा, ‘कितनी मासूम लग रही है. जब गुस्से से देखती है तो उस की ओर देखने में भी डर लगने लगता है.’

तभी जया चौंक कर जग गई. अमित ने सहज भाव से पूछा, ‘‘जया, तबीयत ठीक नहीं लग रही है क्या?’’

‘‘जी नहीं, मैं बिलकुल अच्छी हूं.’’

तीर की तरह जया ड्राइंगरूम से निकल कर बैडरूम में आ कर बिस्तर पर निढाल हो गई. अमित भी आ कर बिस्तर के एक कोने में बैठ गया. सारा दिन कितनी हंसीखुशी से बीता था, लेकिन घर आते ही… फिर भी अमित ने सोच लिया कि थोड़ी सी सावधानी उन के जीवन को फिर हंसीखुशी से भर सकती है और फिर कुछ निश्चय कर वह भी करवट बदल कर सो गया.

दोनों के बीच दूरियां दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही थीं, लेकिन वे इन दूरियों को कम करने की कोई कोशिश ही नहीं करते. कोशिश होती भी है तो कम होने के बजाय बढ़ती ही जाती है. यह नाराज हो कर अबोला कर लेना संबंधों के लिए कितना घातक होता है. अबोला की जगह एकदूसरे से खुल कर बात कर लेना ही सही होता है. लेकिन ऐसा हो कहां पाता है. जरा सी नोकझोंक हुई नहीं कि बातचीत बंद हो जाती है. इस मौन झगड़े में गलतफहमियां बढ़ती हैं व दूरी बढ़ती जाती है.

लगभग 20-25 दिन हो गए अमित और जया में अबोला हुए. दोनों को ही अच्छा नहीं लग रहा था. लेकिन पहल कौन करे. दोनों का ही स्वाभिमान आड़े आ जाता.

उस दिन रविवार था. सुबह के 9 बज रहे होंगे कि दरवाजे की घंटी बजी.

‘कौन होगा इस वक्त’, यह सोचते हुए जया ने दरवाजा खोला तो सामने मिस कालिया और सुहास खड़े थे.

‘‘मैडम नमस्ते, सर हैं क्या?’’ कालिया ने ही पूछा.

बेमन से सिर हिला कर जया ने हामी भरी ही थी कि कालिया धड़धड़ाती अंदर घुस गई, ‘‘सर, कहां हैं आप?’’ कमरे में झांकती वह पुकार रही थी.

सुहास भी उस के पीछे था. तभी अमित

ने बालकनी से आवाज दी, ‘‘हां, मैं यहां हूं. यहीं आ जाओ. जया, जरा सब के लिए चाय बना देना.’’

नाकभौं चढ़ाती जया चाय बनाने किचन में चली गई. बालकनी से अमित, सुहास और कालिया की बातें करने, हंसने की आवाजें आ रही थीं, लेकिन साफसाफ कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था. जया चायबिस्कुट ले कर पहुंची तो सब चुप हो गए. किसी ने भी उसे साथ बैठने के लिए नहीं कहा. उसे ही कौन सी गरज पड़ी है. चाय की टे्र टेबल पर रख कर वह तुरंत ही लौट आई और किचन के डब्बेबरतन इधरउधर करने लगी.

मन और कान तो उन की बातों की ओर लगे थे.

थोड़ी देर बाद ही अमित किचन में आ कर बोला, ‘‘मैं थोड़ी देर के लिए इन लोगों के साथ बाहर जा रहा हूं,’’ और फिर शर्ट के बटन बंद करते अमित बाहर निकल गया.

कहां जा रहा, कब लौटेगा अमित ने कुछ भी नहीं बताया. जया जलभुन गई. दोनों के बीच अबोला और बढ़ गया. इस झगड़े का अंत क्या था आखिर?

हफ्ते भर बाद फिर कालिया और सुहास आए. कालिया ने जया को दोनों कंधों से थाम लिया, ‘‘आप यहां आइए, सर के पास बैठिए. मुझे आप से कुछ कहना है.’’

बुत बनी जया को लगभग खींचती हुई वह अमित के पास ले आई और उस की बगल में बैठा दिया. फिर अपने पर्स में से एक कार्ड निकाल कर उस ने अमित और जया के चरणों में रख दिया और दोनों के चरणस्पर्श कर अपने हाथों को माथे से लगा लिया.

‘‘अरे, अरे, यह क्या कर रही हो, कालिया? सदा खुश रहो, सुखी रहो,’’ अमित बोला तो जया की जैसे तंद्रा भंग हो गई.

कैसा कार्ड है यह? क्या लिखा है इस में? असमंजस में पड़ी जया ने कार्ड उठा लिया. सुहास और निधि कालिया की शादी की 5वीं वर्षगांठ पर होने वाले आयोजन का वह निमंत्रणपत्र था.

निधि कालिया चहकते हुए बोली, ‘‘मैडम, यह सब सर की मेहनत और आशीर्वाद का परिणाम है. सर ने कोशिश न की होती तो आज 5वीं वर्षगांठ मनाने की जगह हम तलाक की शुरुआत कर रहे होते. हम ने लव मैरिज की थी, लेकिन सुहास के मम्मीपापा को मैं पसंद नहीं आई. मेरे मम्मीपापा भी मेरे द्वारा लड़का खुद ही पसंद कर लेने के कारण अपनेआप को छला हुआ महसूस कर रहे थे. बिना किसी कारण दोनों परिवार अपनी बहू और अपने दामाद को अपना नहीं पा रहे थे. उन्होंने हमारे छोटेमोटे झगड़ों को खूब हवा दी, उन्हें और बड़ा बनाते रहे, बजाय इस के कि वे लोग हमें समझाते, हमारी लड़ाइयों की आग में घी डालते रहे. छोटेछोटे झगड़े बढ़तेबढ़ते तलाक तक आ पहुंचे थे.

‘‘सर को जब मालूम हुआ तो उन्होंने एड़ीचोटी का जोर लगा दिया ताकि हमारी शादी न टूटे. 1-2 महीने पहले उन्होंने हमें अलगअलग एक सिनेमा हाल में बुलाया और एक फिल्म के 2 टिकट हमें दे कर यह कहा कि चूंकि आप नहीं आ रहीं इसलिए वे भी फिल्म नहीं देखना चाहते. टिकटें बेकार न हों, इसलिए उन्होंने हम से फिल्म देखने का आग्रह किया. भले ही मैं और सुहास अलग होने वाले थे, लेकिन हम दोनों ही सर का बहुत आदर करते हैं, इसलिए दोनों ही मना नहीं कर पाए.

‘‘फिल्म शुरू हो चुकी थी इसलिए कुछ देर तो हमें पता नहीं चला. थोड़ी देर बाद समझ में आया कि सिनेमाहाल करीबकरीब खाली ही था. लेकिन सिनेमाहाल के उस अंधेरे में हमारा सोया प्यार जाग उठा. फिल्म तो हम ने देखी, सारे गिलेशिकवे भी दूर कर लिए. हम ने कभी एकदूसरे से अपनी शिकायतें बताई ही नहीं थीं, बस नाराज हो कर बोलना बंद कर देते थे. जितनी देर हम सिनेमाहाल में थे सर ने हमारे मम्मीपापा से बात की, उन्हें समझाया तो वे हमें लेने सिनेमाहाल तक आ गए. फिर हम सब एक जगह इकट्ठे हुए एकदूसरे की गलतफहमियां, नाराजगियां दूर कर लीं. मैं ने और सुहास ने भी अपनेअपने मम्मीपापा और सासससुर से माफी मांग ली और भरोसा दिलाया कि हम उन के द्वारा पसंद की गई बहूदामाद से भी अच्छे साबित हो कर दिखा देंगे.

‘‘उस के बाद से कोर्ट में चल रहे तलाक के मुकदमे को सुलहनामा में बदलने में सर ने बहुत मदद की. आज इन की वजह से ही हम दोनों फिर एक हो गए हैं, हमारा परिवार भी हमारे साथ है, सब से बड़ी खुशी की बात तो यही है. परसों हम अपनी शादी की 5वीं वर्षगांठ बहुत धूमधाम से मनाने जा रहे हैं, केवल सर के आशीर्वाद और प्रयास से ही. आप दोनों जरूर आइएगा और हमें आशीर्वाद दीजिएगा.’’

निधि की पूरी बात सुन कर जया का तो माथा ही घूमने लगा था कि कितना उलटासीधा सोचती रही वह, निधि कालिया और अमित को ले कर. लेकिन आज सारा मामला ही दूसरा निकला. कितना गलत सोच रही थी वह.

‘‘हम जरूर आएंगे. कोई काम हो तो हमें बताना,’’ अमित ने कहा तो निधि और सुहास ने झुक कर उन के पांव छू लिए और चले गए.

जया की नजरें पश्चात्ताप से झुकी थीं, लेकिन अमित मुसकरा रहा था.

‘आज भी अगर मैं नहीं बोली तो बात बिगड़ती ही जाएगी,’ सोच कर जया ने धीरे से कहा, ‘‘सौरी अमित, मुझे माफ कर दो. पिछले कितने दिनों से मैं तुम्हारे बारे में न जाने क्याक्या सोचती रही. प्लीज, मुझे माफ कर दो.’’

अमित ने उसे बांहों में भर लिया, ‘‘नहीं जया, गलती सिर्फ तुम्हारी नहीं मेरी भी है. मैं समझ रहा था कि तुम सब कुछ गलत समझ रही हो, फिर भी मैं ने तुम्हें कुछ बताने की जरूरत नहीं समझी. न बताने के पीछे एक कारण यह भी था कि पता नहीं तुम पूरी स्थिति को ठीक ढंग से समझोगी भी या नहीं. अगर मैं ने तुम्हें सारी बातें सिलसिलेवार बताई होतीं, तो यह समस्या न खड़ी होती.

‘‘दूसरे का घर बसातेबसाते मेरा अपना घर टूटने के कगार पर खड़ा हो गया था. लेकिन उन दोनों को समझातेसमझाते मुझे भी समझ में आ गया कि पतिपत्नी के बीच सारी बातें स्पष्ट होनी चाहिए. कुछ भी हो जाए, लेकिन अबोला नहीं होना चाहिए. जो भी समस्या हो, एकदूसरे से शिकायतें हों, सभी आपसी बातचीत से सुलझा लेनी चाहिए वरना बिना बोले भी बातें बिगड़ती चली जाती हैं. पहले भी हमारे छोटेमोटे झगड़े इसी अबोले के कारण विशाल होते रहे हैं. वादा करो आगे से हम ऐसा नहीं होने देंगे,’’ अमित ने कहा तो जया ने भी स्वीकृति में गरदन हिला दी. Hindi Family Story

Hindi Story: रबड़ का आदमी

Hindi Story, लेखक – प्रभात गौतम

इत्तिफाक से उस दिन हमारा आमनासामना हो गया. नरेश कालेज के दिनों में मेरा सहपाठी रह चुका था. हमारी आपस में कभी भी गहरी दोस्ती नहीं रही थी, पर आज वह इतना अपनापन दिखा रहा था, जैसे हम जन्मजन्मांतर के साथी हों. बिना मेरी बोरियत को समझे वह लगातार अपने कालेज के दिनों की घटनाएं दोहराए जा रहा था.

मैं कभी सड़क पर गुजरती कारों को देख रहा था, तो कभी आसमान पर छाए हलके बादलों को. किसी भी तरह जल्दी से जल्दी उस से छुटकारा पाने के लिए मैं ‘हां या न’ में उस का समर्थन जता देता था, जिस से वह और भी खुश हो रहा था.

‘‘अच्छा अभी तो मैं चलता हूं. फिर कभी घर आना. यहीं गांधीनगर में,’’ जैसे ही नरेश ने अपनी बात को खत्म किया, मैं ने अपने घर जाने का उतावलापन जाहिर कर दिया.

‘‘फिर कभी क्यों राजन… चलो, अभी चलते हैं. इसी बहाने भाभीजी के हाथों की चाय भी पी लेंगे,’’ नरेश तुरंत बोल पड़ा.

मुझे लगा कि मेरे द्वारा आसमान में उछाला गया कोई पत्थर मेरे ही सिर पर आ गिरा है. मुझे अपनी गलती का पछतावा होने लगा. कितना अच्छा होता मैं यहीं रुक कर कुछ देर और उस की बातें सुन लेता, जिस से मेरा रविवार का मजा खराब होने से तो बच जाता.

घर पर पहुंचने पर जो मेरा बुरा हाल होने वाला था, उस का मुझे आभास होने लगा था. मैं उस की बातों में सारे सामान की लिस्ट भूल चुका था, जो मुझे घर के लिए ले जाना था.

‘‘यार, थोड़ी मिठाई और नमकीन भी ले चल. भूख लगी है,’’ नरेश जैसे फिर बेशर्मी पर उतर आया.

मैं अंदर ही अंदर गुस्से से भर गया था और जेब में पड़े एकलौते नोट के जाने का शोक मनाते हुए मिठाई की दुकान की तरफ बढ़ रहा था.

घर के भीतर आते ही नरेश ‘धम्म’ से सोफे पर बैठ गया और दीवारों पर लगी पेंटिंग्स पर अपनी राय जाहिर करने लगा, जबकि मुझे सीधे लग रहा था कि वह इन के बारे में कुछ नहीं जानता.

कमरे में सजे गुलदस्ते, मूर्तियां नरेश ऐसे देख रहा था जैसे वह इसे पहली बार देख रहा हो. बातचीत को कुछ देर भी रोकना उसे गंवारा नहीं था. कोई न कोई बात खोज कर वह लगातार बोलता जा रहा था और नहीं तो वह कालेज के दिनों की क्लास के दोस्तों की बात ही छेड़ देता, जिसे वह कुछ ही देर पहले बता चुका था. यहां तक कि मुझे ही मेरी आदतों से अवगत कराने लगता था. मुझे उस के मुंह से शराब की हलकीहलकी बदबू भी आ रही थी.

‘‘अरे राजन, तुम तो आज बड़े उदास नजर आ रहे हो. कहीं भाभीजी से झगड़ा तो नहीं हो गया,’’ नरेश मेरी उदासी भांप कर बोल पड़ा.

मुझे अपने एकमात्र नोट के जाने का दुख सता रहा था जिसे बचाने के लिए मुझे अपनी औफिस की पार्टी छोड़नी पड़ी थी और औफिस से घर के लिए कभी किसी से, कभी किसी से लिफ्ट लेनी पड़ी थी.

‘‘नहीं… तो. मैं उदास कहां हूं. वह तो थोड़ी सी थकावट है,’’ मैं ने चेहरे पर बनावटी मुसकराहट लाने की कोशिश की.

‘‘तुम बैठो, मैं अभी तुम्हारे लिए चाय बनवा देता हूं,’’ मैं ने बात पलटने के अंदाज में कहा, जिस से मुझे उठ कर श्रीमतीजी को हालात समझाने का मौका भी मिल सके.

‘‘चाय आए तब तक तुम मिठाई ही ले आओ,’’ अब नरेश एकदम अनौपचारिकता पर उतर आया था, जो मुझे बेशर्मी लग रही थी. मन चाहा कि उसे इसी समय धक्का मार कर बाहर निकाल दूं, पर किसी तरह अपनेआप को रोका और कमरे से बाहर आ गया. हालांकि, मैं मन ही मन उसे ढेर सारी गालियां दे चुका था.

अपनी पत्नी को थोड़े में सारी बात समझा कर मैं दोबारा नरेश के सामने वाले सोफे पर बैठ गया. अब उसे हमारी बातचीत के विषय याद नहीं आ रहे थे. आसपास नजरें दौड़ा कर वह किसी अखबार या पत्रिका की तलाश में था, जिसे जानते हुए भी मैं अनजान बना हुआ था, क्योंकि मैं अखबार वगैरह मंगवाता ही नहीं था.

कुछ देर के लिए हमारे बीच चुप्पी बनी रही, जिसे तोड़ने के लिए नरेश अपने जूते हिला कर ‘खटखट’ की आवाज कर लेता था. कभी हम घूमते पंखे को देखते थे, कभी दीवारों पर टंगे कलैंडर में तारीखें पढ़ने लगते थे. जैसे ही वह मेरी तरफ देखता था, मैं अपने चेहरे पर बनावटी मुसकराहट तैरा लेता.

कुछ ही देर में चाय, मिठाई और नमकीन से सजी ट्रे के साथ मेरी पत्नी हमारे सामने थी, जिस को देखते ही नरेश ने फिर से अपनी बकबक शुरू कर दी. वह लगातार चाय, नमकीन की तारीफ कर प्लेट साफ किए जा रहा था. मेरे साथ होने वाली बातें बड़े यकीन से वह मेरी पत्नी को बताए जा रहा था, जो कभी मेरे साथ घटित ही नहीं हुई थीं. फिर भी हम दोनों चुपचाप उसे सुने जा रहे थे.

मुझे नरेश के द्वारा सुनाए जा रहे किसी भी चुटकुले पर हंस नहीं आ रही थी. कई बार तो मुझे वह एक डाकू या लुटेरा जैसा लगने लगा था, जो हमारे घर को लूटने पर आमदा है और हम उसे चुपचाप बैठे देख रहे हैं. पत्नी भी उस की बातों का औपचारिक जवाब दे कर चुप हो जाती थी.

आखिरकार सबकुछ खा पीने के बाद जब नरेश जाने के लिए उठा, तो मुझे कुछ संतोष हुआ. कदम बढ़ाते हुए मैं उसे बाहरी दरवाजे तक ले आया था, पर वह था कि कोई न कोई विषय पर नई बात शुरू कर देता था.

‘‘कितने बरसों बाद तो हम मिले हैं,’’ कह कर नरेश फिर से पत्नी की तरफ मुखातिब हो गया.

‘‘भाभीजी, आप क्या करती हैं? आप तो अच्छी पढ़ीलिखी हैं कहीं सर्विस क्यों नहीं कर लेतीं?’’ उस ने पत्नी से पूछा.

‘‘करना तो चाहती हूं, पर मिले भी तो,’’ पत्नी ने टालने के अंदाज में जवाब दिया.

‘‘तुम दिला दो इन्हें सर्विस,’’ मैं ने कुछ गुस्से से कहा.

‘‘आप की तो इंगलिश भी बहुत अच्छी लग रही है. आप बता रही थीं आप ने बीएड भी कर रखा है… कोई स्कूल जौईन करना चाहें तो आप कल ही आ जाओ. आप की नौकरी पक्की. अभी 20,000 से स्टार्ट करवा दूंगा, फिर आगे देख लेंगे. स्कूल का मालिक मेरा अच्छा जानकार है. एकदम जिगरी यार. समझो, अपना ही स्कूल है.’’

नरेश ने किसी नामी स्कूल का नाम बताया. मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि वह इतने बड़े स्कूल के मालिक का जानकार होगा.

इस एक वाक्य से एकदम नरेश अच्छे और भले आदमी में तबदील हो गया. जैसे मेरे सामने पैंटशर्ट पहने कोई दूत खड़ा था. मैं उस के कपड़ों में लगे परफ्यूम की भीनीभीनी महक महसूस कर रहा था. उस की बातें अब हमें बड़ी अच्छी लग रही थी.

‘‘आप खाना खा कर जाते,’’ पत्नी ने भी अब उस की मेहमाननवाजी शुरू कर दी थी.

‘‘नहीं, आप ने इतना कुछ तो खिला दिया. खाना खाऊंगा आप की पहली तनख्वाह मिलने पर,’’ कह कर नरेश आगे बढ़ने लगा.

‘‘मैं तुम्हें स्कूटर पर छोड़ देता हूं,’’ मैं भी पूरी तरह नरेश की खातिरदारी पर उतर आया था. वह मना करते हुए चुपचाप आगे बढ़ गया.

…और कमरे में वापस जाते हुए मैं नरेश की तारीफ के पुल बांधे जा रहा था. Hindi Story

News Story In Hindi: भाषा की आड़ में सियासी जंग

News Story In Hindi: बारिश का मौसम आ गया था. पहाड़ों पर रोजाना पहाड़ खिसकने और लोगों के जाम में फंसने की खबरें आ रही थीं. दिल्ली में हुई जरा सी बारिश से सड़कों पर पानी भरा, तो दिल्ली सरकार की पोलपट्टी खुल गई.

इन सब परेशानियों को नजरअंदाज करते हुए विजय ने एक शाम अनामिका को कनाट प्लेस के एक कैफे में बुलाया. शाम के 5 बज रहे थे. विजय कैफे में था, जबकि अनामिका को 6 बजे तक आना था. वह बारिश के चलते जाम में फंस गई थी.

विजय ने कहा भी था कि ओला बाइक ले लेना, पर अनामिका ने कार से आना मुनासिब सम झा, तो अब जाम की भेंट चढ़ गई थी.

कैफे बड़ा खूबसूरत था. चूंकि बारिश हो रही थी, तो वहां भीड़ भी अच्छीखासी थी. विजय के सामने की सीट पर एक साउथ इंडियन नौजवान बैठा था. उम्र होगी तकरीबन 26 साल और वह किसी अच्छी कंपनी का मुलाजिम लग रहा था. वह बैरा से टूटीफूटी हिंदी में बात कर रहा था.

विजय चूंकि हरियाणा से था, पर दिल्ली में पलाबढ़ा था, तो उस ने हरियाणवी में उस साउथ इंडियन नौजवान के मजे लेने की नीयत से पूछा, ‘‘छोरे, केरल का सै के?’’

उस साउथ इंडियन को सिर्फ केरल सम झ में आया, तो वह तिलमिला कर बोला, ‘‘मैं केरल नहीं, तमिलनाडु से आई.’’

‘आई’ सुनते ही विजय की हंसी निकल गई और वह बोला, ‘‘आ रै, तू तो छोरी लिकड़ा…’’

उस साउथ इंडियन के कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा, पर वह बोला, ‘‘मैं मलयाली नहीं, तमिल है.’’

‘‘फेर आड़े के धार लेण आया सै…’’ विजय अपनी हंसी रोकते हुए बोला.

‘‘मुझे आप की भाषा नहीं सम झ आती. मेरी हिंदी बड़ी पूअर है. वैरी लिटिल हिंदी जानती,’’ उस नौजवान ने जवाब दिया.

‘‘या हिंदी ना सै झकोई, हरियाणवी सै,’’ विजय ने फिर मजे लिए.

‘‘सर, मेरी सम झ में कुछ नहीं आती… आप क्या बोलती…’’ वह नौजवान परेशान हो कर बोला.

‘‘मैं बोलती कि तू भैंस की पूंछ सै. खाग्गड़ का खाग्गड़ हो ग्या, पर ‘बोलता’ को ‘बोलती’ बोल्लण तै बाज नी आंदा,’’ विजय ने फिर चुटकी ली.

‘‘फ्रैंड, मैं यहां कौफी पीने आई. क्या आप भी कौफी लेंगी?’’ उस नौजवान ने खी झ कर पूछा.

‘‘अरे, नहीं फ्रैंड, मैं बस मजाक कर रहा था. मेरी गर्लफ्रैंड आने वाली है. हमारी कौफी डेट है. आप भी हमें जौइन करें. मु झे बड़ी खुशी होगी,’’ विजय अब मजाक के मूड में नहीं था.

उस नौजवान को काफीकुछ सम झ में आया और वह लंबी सांस लेते हुए बोला, ‘‘आप ने तो मुझे डरा दिया था. मैं जरूर आप के साथ कौफी लेगी.’’

‘‘मेरे भाई, ‘लेगी’ नहीं ‘लूंगा’ बोलो…’’ विजय ने अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मेरा नाम विजय है और आप का क्या नाम है?’’

‘‘आप मु झे सुंदरम कह सकते हैं,’’ वह नौजवान हाथ मिलाते हुए बोला.

‘‘और मेरा नाम अनामिका है…’’ तभी पीछे खड़ी अनामिका ने अपना परिचय दिया, ‘‘और विजय, तुम क्यों इन भाई साहब के मजे ले रहे थे. बड़ी हरियाणवी निकल रही थी आज. तुम्हें किसी को उस की भाषा या बोलने के अंदाज पर जज कर के उस का मजाक नहीं बनाना चाहिए.’’

‘‘पर यार, मु झे टाइमपास करना था. सोचा कि इस की ही क्लास ले लूं,’’ विजय ने अनामिका को सफाई दी.

‘‘पर तुम यह देखो न कि हम तीनों यहां एक टेबल पर बैठे हैं, फिर भी 3 अलगअलग भाषाओं तमिल, हरियाणवी और भोजपुरी को जानते हुए कितने अपनेपन से बात या संवाद करने की कोशिश कर रहे हैं,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘यह तो सच है. अच्छा, यह बताओ कि कौन सी कौफी लोगी? और आप तमिल भाई साहब… माफ करना सुंदरम भाई साहब, कौन सी कौफी लेना पसंद करेंगे?’’ विजय बोला.

‘‘मैं फिल्टर कौफी लेगी. मु झे वही पसंद है,’’ सुंदरम ने धीरे से कहा.

‘‘पर यहां तो कौफी की कई वैराइटी हैं. आज आप कुछ नया ट्राई करो,’’ अनामिका बोली.

‘‘नया क्या?’’ सुंदरम ने पूछा, ‘‘हम तो फिल्टर कौफी ही पीते हैं.’’

‘‘ऐस्प्रैसो, कैप्पुचीनो, लैटे, अमेरिकनो, फ्लैट ह्वाइट, मोचा, फ्रैपुचीनो, मैकियाटो, कौफी क्रेमा, लुंगो…’’ अभी अनामिका ने इतना ही कहा था कि सुंदरम ने बीच में ही रोकते हुए कहा, ‘‘बस, मैं सम झ गई. जो आप को पसंद, वही मैं लेती.’’

‘‘मैं भी वही लेती,’’ विजय ने इतना कहा, तो अनामिका ने भी ठहाका लगाया. सुंदरम सम झ गया कि उस ने फिर गलत हिंदी बोली है.

अनामिका ने बैरा को बुला कर 3 कैप्पुचीनो का और्डर दिया और साथ में 3 वैज सैंडविच भी मंगाए.

‘‘जब तुम ने तमिल, हरियाणवी और भोजपुरी वाली बात कही, तो मेरे दिमाग में ‘त्रिभाषा फार्मूला’ वाला मामला याद आ गया. आजकल यह मुद्दा बहुत ज्यादा गरम है. इस पर सरकार और विपक्ष आमनेसामने है,’’ विजय ने अनामिका से कहा.

‘‘यह बड़ा पेचीदा मामला है. जब हम किसी भाषा की बात करते हैं, तो यह सोचना चाहिए कि उस के बोलने और सम झने वालों की तादाद कितनी है. अब संस्कृतनिष्ठ हिंदी की ही बात करें, तो यह आज के जमाने में किस काम की है, यह मेरी सम झ से परे है’’ अनामिका बोली.

‘‘मैं तुम्हारा मतलब नहीं सम झा?’’ विजय ने कौफी का सिप लेते हुए कहा.

‘‘राष्ट्र के उत्थान के पश्चात हम विश्वव्यापी समस्याओं पर विजय प्राप्त कर लेंगे एवं समग्र मनुष्य जाति से निवेदन करेंगे कि सन्मार्ग पर चलना ही एकमेव उद्देश्य रहे,’’ जब अनामिका ने इतनी भारीभरकम हिंदी पेश की, तो विजय के साथसाथ सुंदरम की भी आंखें फटी की फटी रह गईं.

‘‘अनामिका, मु झे नहीं पता था कि हिंदी का यह रूप भी है. लेकिन ऐसे मुश्किल शब्दों का क्या फायदा, जो सम झ में ही न आएं. और वैसे भी भाषा को ले कर जो झगड़ा महाराष्ट्र में चल रहा है, वह तो और भी डरा देने वाला है. सारे सियासी दल इसे भुना रहे हैं और पिस रही है बेचारी आम जनता,’’ विजय ने कहा.

‘‘तुम सही कह रहे हो. वहां तो मराठी और हिंदी वालों में इतनी ज्यादा ठन गई है कि लोग एकदूसरे से मारपीट करने लगे हैं.

‘‘बीते दिनों मराठी में बात नहीं करने पर एक फूड स्टौल मालिक को महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के एक नेता अविनाश जाधव ने थप्पड़ मारा था. इस घटना के विरोध में व्यापारियों के प्रदर्शन के जवाब में ठाणे में आयोजित की जाने वाली रैली से पहले मनसे के नेता आविनाश जाधव को पुलिस ने हिरासत में ले लिया,’’ अनामिका ने बताया.

‘‘महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी भाषा विवाद पर एक बड़ा बयान दिया है. उन्होंने साफ किया है कि भाषा के नाम पर किसी भी तरह की गुंडागर्दी बरदाश्त नहीं की जाएगी. भाषा के आधार पर मारपीट करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी ऐक्शन लिया जाएगा,’’ विजय ने बात को आगे बढ़ाया.

‘‘मुझे ऐसा लगता है कि ‘त्रिभाषा फार्मूला’ के नाम पर भारतीय जनता पार्टी पूरे देश में हिंदी के साथसाथ संस्कृत भाषा को भी थोपना चाहती है. साथ ही यह बात भी बड़ी अहम है कि जो भी लोग नई शिक्षा नीति बना रहे हैं, वे खुद अंगरेजी बोलने वाले हैं और इसी भाषा में पढ़ेलिखे हैं.

‘‘ऐसे लोग हिंदी या दूसरी तमाम भारतीय भाषाएं बोलने वालों को अपने से कमतर सम झते हैं. उन्हें तो हर उस गरीब और वंचित से दिक्कत है, जो सरकारी स्कूल में पढ़ कर आगे बढ़ने की सोच रहा है. आसान शब्दों में कहूं, तो यह दलितों को पढ़ाई से दूर रखने की साजिश है.

‘‘ऐसा ही कुछ अमेरिका में भी हो रहा है. वहां के गोरे लोग नस्ल के आधार पर दूसरों को सरकार द्वारा चलने वाले स्कूलों में पढ़ते देख ज्यादा खुश नहीं हैं. वे अपने बच्चों को उन प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने भेज रहे हैं, जहां की फीस बहुत ज्यादा है. डोनाल्ड ट्रंप की सरकार आने के बाद यह नस्लीय भेद खुल कर सामने आ रहा है,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘तुम सही कह रही हो. हमारे यहां भी कुछकुछ वैसा ही माहौल बनाया जा रहा है. यहां जो भाषा का विवाद है, वहां हिंदी को प्रमोट करने की राजनीतिक चाल लगती है. जब हर जगह हिंदी पढ़ना जरूरी हो जाएगा, तब हिंदी भाषा से जुड़े रोजगार भी बढ़ेंगे और सरकारी नौकरियां भी निकालनी पड़ेंगी.

‘‘सरकारी दफ्तरों में ही देख लो. जब से अंगरेजी सरकारी दस्तावेजों का हिंदी में अनुवाद का काम शुरू हुआ है, तब से राजभाषा विभाग भी बना दिए हैं, पर वहां जो शब्दश: अनुवाद होता है, वह हिंदी किसी काम की नहीं है. लोग अंगरेजी में ही ज्यादा सहज महसूस करते हैं,’’ विजय ने अपनी बात रखी.

सुंदरम को ज्यादा तो कुछ सम झ नहीं आ रहा था, पर उस ने महाराष्ट्र वाली खबरें पढ़ी थीं और तमिलनाडु में भी इसी विवाद पर सुना था. उसे इस बात की खुशी थी कि विजय और अनामिका इस मुद्दे पर बहुत अच्छी बहस कर रहे थे.

हुआ यह है कि केंद्र सरकार ने तमिलनाडु को समग्र शिक्षा योजना के तहत मिलने वाला पैसा देने से मना कर दिया है. केंद्र का कहना है कि तमिलनाडु ने नई शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 को लागू करने से इनकार कर दिया है. इसी वजह से राज्य को समग्र शिक्षा योजना का फंड नहीं दिया जा रहा है.

इस मसले पर तमिलनाडु राज्य के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिख कर कहा था कि केंद्र सरकार ने अब तक 2,152 करोड़ रुपए जारी नहीं किए हैं. शिक्षा का अधिकार अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने के लिए इस फंड की जरूरत है.

एमके स्टालिन ने यह भी कहा था कि हिंदी सिर्फ मुखौटा है और केंद्र सरकार की असली मंशा संस्कृत थोपने की है. उन्होंने कहा कि हिंदी के चलते उत्तर भारत में अवधी, बृज जैसी कई बोलियां खत्म हो गईं.

राजस्थान का उदाहरण देते हुए उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार वहां उर्दू को हटा कर संस्कृत थोपने की कोशिश कर रही है. दूसरे राज्यों में भी ऐसा होगा, इसलिए तमिलनाडु इस का विरोध कर रहा है.

‘‘किस सोच में पड़ गए सुंदरम? लगता है तुम्हें हमारी बहस सम झ नहीं आई, जो इतने चुप हो?’’ विजय ने पूछा.

‘‘मुझे अच्छा लगा. भले ही मेरी टूटीफूटी हिंदी है, पर आज इसी से मु झे आप जैसे फ्रैंड मिले हैं,’’ सुंदरम ने कहा.

‘‘अरे, एक ही मीटिंग में तुम्हारी हिंदी सुधर गई. हमारे साथ रहोगे तो हरियाणवी और भोजपुरी भी सीख जाओगे,’’ विजय ने कहा, तो वे तीनों हंसने लगे. News Story In Hindi

Story In Hindi: नाच

Story In Hindi: रोमिला को बैंक में काउंटर के पीछे बैठे और मुस्तैदी से अपना काम करते हुए जवान क्लर्क लड़केलड़कियां बड़े अच्छे लगते थे, इसलिए वह भी इन लोगों की तरह बैंक की सरकारी नौकरी ही पाना चाहती थी, पर बैंक पीओ के इम्तिहान में 2 बार नाकाम रहने के बाद से रोमिला का मनोबल बुरी तरह से टूट गया था और वह डिप्रैशन में रहने लगी.

रोमिला 25 साल की युवती थी. उस ने बीकौम करने के बाद बैंकिंग इम्तिहानों की तैयारी शुरू कर दी थी, क्योंकि आगे चल कर वह बैंकिंग में ही अपना कैरियर बनाना चाहती थी.

रोमिला को लग रहा था कि अब उसे कभी भी बैंक की सरकारी नौकरी नहीं मिल पाएगी, क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाओं में कंपीटिशन हद से ज्यादा बढ़ गया था.

रोमिला एक ठाकुर परिवार से थी और उस के पापा निरंजन सिंह भी चाहते थे कि रोमिला जल्द से जल्द बैंक पीओ का इम्तिहान पास कर ले, पर बेटी के बारबार नाकाम होने के चलते वे सरकारी नौकरी में जातिगत रिजर्वेशन के सख्त खिलाफ थे. उन्हें लगता था कि अगर पिछड़ी जाति के लड़केलड़कियों को नौकरी में रिजर्वेशन नहीं दिया जाता, तो रोमिला का चयन कब का हो जाता.

समयसमय पर निरंजन सिंह अपनी बेटी रोमिला का हौसला भी बढ़ाते रहते थे, पर इस बार रोमिला के नाकाम रहने पर उस का दुख उन से देखा नहीं गया, तो वे अपने सब से करीबी दोस्त और शहर के बड़े नामी वकील अनिल सिसौदिया के पास गए और उन से रोमिला की हालत को बताया और उपाय पूछा कि रोमिला का सरकारी नौकरी में सैलेक्शन कैसे हो? इस के लिए वे कितने भी पैसे खर्च कर सकते हैं.

अनिल सिसौदिया ने निरंजन सिंह को बताया कि सरकारी नौकरी पाना जितना मुश्किल है, उतना ही आसान भी.

अनिल सिसौदिया की इस बात पर निरंजन सिंह खी झ गए और बोले, ‘‘इतना ही आसान होता तो मेरी काबिल लड़की नौकरी पा गई होती.’’

वकील अनिल सिसौदिया ने निरंजन सिंह को बताया कि उन की बेटी अगर सवर्ण होने के नाते नौकरी नहीं पा रही है, तो उपाय बहुत आसान भी है.

‘‘क्या उपाय है?’’ निरंजन सिंह सरकारी नौकरी पाने का उपाय सुनने को बेताब हो रहे थे.

अनिल सिसौदिया ने बताया कि वे अपनी लड़की की शादी किसी दलित जाति के सीधेसादे और गरीब लड़के से कर दें, जिस से उन की बेटी का दलित जाति का सर्टिफिकेट बन जाएगा. उस सर्टिफिकेट के चलते जब बेटी को नौकरी मिल जाएगी, तो कुछ दिनों बाद उस की बेटी अपने पति पर जोरजुल्म करने का आरोप लगा कर तलाक ले ले और चुपचाप सरकारी नौकरी का मजा लेती रहे.

वकील अनिल सिसौदिया की बात सुनकर निरंजन सिंह का खून उबाल मारने लगा. उन की कनपटी लाल
हो गई.

‘‘अनिल, तुम पगला गए हो क्या… तुम मेरी बेटी को किसी निचली जाति के लड़के से ब्याहने की बात सोच भी कैसे सकते हो? यह कह कर तुम मेरी बेइज्जती कर रहे हो. इन दलित लोगों के घर में हम भला अपनी बेटी कैसे दे सकते हैं…’’ निरंजन सिंह चीख रहे थे.

वकील अनिल सिसौदिया ने निरंजन सिंह को पानी पीने को दिया और उन्हें सम झाया कि वे सिर्फ सरकारी नौकरी पाने के लिए किसी गएगुजरे, बेरोजगार और गरीब दलित जाति के लड़के से ब्याह के नाम पर कोर्टमैरिज करने को कह रहे हैं. शादी यहां से कहीं दूर जा कर होगी और आप उस बेरोजगार दलित लड़के को कोई रोजगार दिला देना या अपने पैसों के कर्ज तले दबे देना. हां, थोड़ा आत्मसमान को ठेस तो पहुंचेगी, पर फिर कुछ पाने के लिए थोड़ाबहुत सम झौता तो करना ही पड़ेगा.

निरंजन सिंह का मूड थोड़ा उखड़ा हुआ तो था, पर काफी हद तक बात उन की सम झ में आ गई थी और फिर घर जा कर उन्होंने यह बात रोमिला को बताई.

पहले तो रोमिला ने भी थोड़ी नाराजगी जताई, पर वह हर हाल में सरकारी नौकरी पाना चाहती थी, इसलिए फिर उसे यह प्रस्ताव सही लगने लगा था. एक बार वह बैंक की सरकारी नौकरी पा ले, फिर तो अपने उस दलित पति को तलाक देने में देर नहीं करेगी. इस तरह सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी.

‘पर ऐसा लड़का मिलेगा कहां? और फिर हर लड़का शादी के बाद अपनी पत्नी के साथ संबंध बनाना चाहेगा. ऐसे में अपनी इज्जत को बचाना एक बड़ी चुनौती होगी,’ रोमिला सोच रही थी.

‘हमारे आसपास देखने पर या फिर पिछड़ी बस्तियों में मरियल, लाचार और बेरोजगार दलित लड़का बड़ी आसानी से मिल ही जाता है,’ यह सोच कर निरंजन सिंह को भी बड़ी आसानी से एक लड़का मिल भी गया.

वह 35 साल का मनोज नाम का एक दलित विधुर था. उस के अंदर लड़कियों जैसी हरकतें ज्यादा थीं और वह गांव की नौटंकी में औरत बन कर नाचगाना करता था. मनोज की पत्नी मर चुकी थी.

निरंजन सिंह को लड़कियों जैसी हरकत वाले मनोज से शादी कर देना थोड़ा सुरक्षित महसूस हुआ था और उन्हें यह दलित इतना लाचार लगा कि वह हमेशा उन की बेटी से दब कर ही रहेगा, इसलिए निरंजन सिंह ने मनोज से उस की दोबारा शादी की बात चलाई, तो वह थोड़ा हैरत में पड़ गया.

मनोज अपनी पत्नी के मर जाने के बाद सदमे जैसी हालत में था और शराब की लत लगा बैठा था. वैसे, उस के पास खुद का पेट भरने के लिए भी पैसे तक नहीं थे. ऐसे में भला वह शादी की बात कैसे सोचता?

पर निरंजन सिंह ने गांव के प्रधान को अपनी तरफ कर लिया और अपनी बेटी को अनाथ दिखाते हुए झूठ
बोला कि वे अनाथ लड़कियों की शादी मनोज जैसे विधुर से कराते हैं, ताकि दोनों लोगों का भला हो सके.

प्रधान को निरंजन सिंह की बात में सचाई लगी और वे मनोज को दूसरी शादी के लिए राजी करने लगे. उन्होंने मनोज को भरोसा भी दिलाया कि कोर्ट में शादी करने पर उसे 50,000 रुपए भी मिलेंगे.

रुपयों की बात सुन कर मनोज को ठीक लगा और उस ने दोबारा शादी करने के लिए हां कर दी.

मनोज को शादी से कोई सरोकार नहीं था. उसे तो 50,000 रुपए का लालच था, जो शादी के बाद मिलने वाले थे और वह उन से जम कर शराब पी सकता था.

शहर में कोर्ट में मनोज और रोमिला की शादी करा दी गई. निरंजन सिंह के परिवार को इस तरह बेटी की शादी बड़ी अजीब सी लग रही थी, पर वे लोग जानते थे कि यह सब एक ड्रामा है और कुछ दिनों के बाद नौकरी मिलते ही रोमिला मनोज को लात मार कर वापस आ जाएगी.

रोमिला शादी कर के मनोज के साथ जाते समय थोड़ा घबरा रही थी कि जब मनोज उस के साथ शारीरिक संबंध बनाना चाहेगा, तो वह क्या करेगी? किसी दलित के साथ रहना या फिर संबंध बनाने की बात तो उस ने सोची तक नहीं थी, पर सरकारी नौकरी के लालच में वह यह सब कर रही थी.

रोमिला को डर सता रहा था कि कहीं ऐसा न हो कि मनोज उसे दबोच कर उस के साथ जबरदस्ती करने लगे. अपनी सुरक्षा के लिए उस ने एक चाकू अपनी कमर में छिपा लिया था और मनोज के टूटेफूटे घर जा कर कमरे में एक ओर खड़ी हो गई, पर मनोज ने ऐसा कुछ भी नहीं किया, बल्कि कमरे में जाते ही शराब के 2 पैग मार कर नींद के आगोश में चला गया.

मनोज के घर पर खाना बनाने के लिए गैस और दूसरा सामान नहीं था. एक गैस कनैक्शन और दूसरे सामान का इंतजाम रोमिला के पापा ने कर दिया था. आखिर कुछ महीने तो रोमिला को यहां काटने थे और अपना शहरी स्टाइल भी छिपा कर रखना था, ताकि लोगों को किसी तरह का शक न हो और जाति प्रमाणपत्र बनने में कोई परेशानी न हो.

कुछ और समय बीता तो रोमिला ने अपना नया जाति प्रमाणपत्र बनवा लिया और बैंक की नौकरी के लिए दलित बन कर आवेदन कर दिया, जहां पर उसे जातिगत रिजर्वेशन मिलना था.

बैंक पीओ का इंतजाम पास था, इसलिए रोमिला जीजान से पढ़ाई करने लगी. कभीकभी तो उसे खाने की सुध भी नहीं रहती थी और वैसे भी उसे इस बार तो अपनी कामयाबी की पूरी उम्मीद थी, क्योंकि उस के पास पिछड़ी जाति का प्रमाणपत्र भी था, पर यह सब इतना आसान नहीं होने वाला था.

इम्तिहान वाले दिन रोमिला बहुत आशावादी थी, पर प्रश्नपत्र देख कर उस के होश उड़ गए थे. सभी सवाल बेहद मुश्किल थे.

रोमिला सवालों के जवाब नहीं दे पाई और उसे तुरंत आभास हो गया कि यह प्रतियोगिता वह पास नहीं कर पाएगी. और हुआ भी यही. नतीजा आने पर रोमिला का सैलेक्शन नहीं हुआ था और वह रैंकिंग में भी बहुत पीछे रह गई थी.

यह साफ हो गया था कि प्रतियोगी परीक्षा में पास होने के लिए जातिगत रिजर्वेशन से कुछ नहीं होता, बल्कि कामयाबी तो उन्हीं को मिलती है, जो इस के सही हकदार होते हैं.

उस रात अचानक मनोज को तेज बुखार आ गया. जब मनोज से रहा नहीं गया तो उस ने रोमिला को पुकारा और दवा मांगी.

जब रोमिला बुखार की गोली ले कर गई तो मनोज आंखें बंद किए लेटा हुआ था और बड़बड़ा रहा था, ‘‘रमिया… रमिया… छोड़ दो उसे. छोड़ दो रमिया को…’’

रोमिला ने मनोज को उठा कर दवा खिलाई और रमिया के बारे में पूछने लगी.

उस दिन मनोज ने अपने दिल में छिपी हुई बातों का राज उजागर किया, ‘‘रमिया मेरी पत्नी थी. हम दोनों बहुत खुश थे. रमिया लंबी, पतली देह वाली औरत थी उस की साड़ी और चोली के बीच की कमर और गहरी नाभि मु झे बहुत पसंद थी.

‘‘रमिया खाना भी बहुत अच्छा बनाती थी, पर शायद दलित जाति का होना रमिया और मेरे लिए शाप बन
गया था.

‘‘एक दिन की बात है. गांव के ठाकुर और पंडित हमारे घर आए और रमिया पर भरपूर नजर डालते हुए ठाकुर बोले, ‘सुना है तेरी घरवाली मीट बहुत अच्छा बनाती है. चल, आज हम तेरे घर में बैठ कर तेरी पत्नी के हाथ का मीट खाएंगे.’

‘‘बड़ी जाति के लोग एक दलित के घर खाना खाएंगे, यह बात बड़ी अजीब लगी थी, पर हम दोनों को भरोसा हो गया था कि हो सकता है कि बदलते समय के साथ ऊंचनीच का भेदभाव खत्म हो गया हो.

‘‘ठाकुर और पंडित ने अपने साथ लाया हुआ बकरे का मीट रमिया को दे दिया और खुद जा कर खटिया पर बैठ कर हुक्का गुड़गुड़ाने लगे, जबकि रमिया खुशीखुशी अपनी साड़ी को अपनी सांवली कमर में खोंस कर मीट बनाने की तैयारी करने लगी थी.

‘‘तभी ठाकुर ने हम से कहा, ‘तुम नौटंकी में नाचने वाली का रोल बड़ा अच्छा निभाए थे. जरा हम भी तो देखें कि मनोज भैया कैसे नाचे थे…’

‘‘ठाकुर के मुंह से अपने हुनर की तारीफ सुन कर हम खुश हो गए और जल्दी से कमरे में जा कर औरतों का सिंगार कर के और घाघरा और चोली ओढ़ कर आ गए और दोनों के सामने नाच दिखाने लगे और खुद गाना भी गा रहे थे.

‘‘गाते समय हमारी आवाज किसी औरत की तरह ही पतली और सुरीली लग रही थी… गाने के बोल थे, ‘हमार नाम आपन मुंह से बोलो राजाजी, चोली तंग है हमारे जरा हुक तो खोलो राजाजी…’

‘‘रसोई के अंदर रमिया को यह नौटंकी अच्छी नहीं लग रही थी, पर वह चुपचाप मीट बना रही थी. ठाकुर और पंडित की नजर तो रमिया पर थी. वे दोनों रमिया का नाच देखना चाहते थे, इसलिए हमारा नाच रुकवा कर उन्होंने रमिया से नाच दिखाने को कहा.

रमिया ने थोड़ा नानुकुर तो किया पर कुछ देर बाद सामने आ कर कमर हिला कर नाच दिखाने लगी, लेकिन उन दोनों की नीयत खराब थी और उन्होंने जबरदस्ती रमिया के साथ बारीबारी गलत काम किया.

‘‘अपने साथ हुए गलत काम के चलते ही रमिया ने नदी में कूद कर अपनी जान दे दी…’’ यह कहता हुआ मनोज रो रहा था.

रोमिला भी थोड़ा दुखी थी, पर वह कर क्या भी सकती थी. वह तो पहले ही बैंक के इम्तिहान में फेल होने से दुखी थी, क्योंकि उस के सारे प्लान और किएकराए पर पानी फिर गया था. एक दलित से शादी कर के भी उसे कामयाबी नहीं मिल पाई थी.

अगले दिन की बात है. रोमिला नहाने जा रही थी कि तभी दरवाजे पर कुंडी बजने की आवाज हुई.

मनोज ने दरवाजा खोला तो देखा कि सामने गांव के कुछ नई उम्र के बिगड़ैल लड़के खड़े थे. वे गिनती में 5 थे. उन लोगों ने मनोज को धक्का दिया और अंदर आ गए.

रोमिला पर भरपूर नजर डालते हुए एक लड़का बोला, ‘‘तनिक कमर लचका कर हम सब लोगों को नाच तो दिखा दे.’’

उस लड़के की बात का रोमिला ने डरते हुए विरोध किया, तो वे सब उस पर दबाव बनाने लगे और कहने लगे कि यहां तो यही रिवाज है कि दलित औरतें नाचती हैं और लोग मजा लेते हैं और तुम ने तो दलित से शादी कर ली है, इसलिए तुम हमारे सामने नाचोगी. अगर नहीं नाची तो हम सब तुम्हारा रेप करेंगे.

रेप का नाम सुन कर रोमिला सहम गई थी. उस ने सोचा कि रेप होने से अच्छा है कि वह कमर हिला कर नाच ही दे.

तभी एक लड़के ने मोबाइल पर गाना बजा दिया, ‘लहंगा तोहार बड़ा महंगा, बड़ी गरमी बा इस लहंगे मा…’

रोमिला ने अपनी भलाई सम झते हुए नाचना शुरू कर दिया. धीरेधीरे उस ने महसूस किया कि वे शोहदे उसे हवस भरी नजरों से घूर रहे हैं और उस का नाच देखने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है.

रोमिला सोच रही थी कि काश वह जाति प्रमाणपत्र लगा कर नौकरी पाने के चक्कर में न पड़ी होती तो यह सब नहीं करना पड़ता, क्योंकि सरकारी नौकरी मेहनत करने से मिलती है, केवल पिछड़ी जाति के प्रमाणपत्र से कुछ नहीं होता. Story In Hindi

Funny Story In Hindi: अंगूठे से सोचने का जमाना

Funny Story In Hindi: अब तो कैमरे के सामने रोना भी कंटैंट है और हंसना भी रील. अब यूट्यूबर सोचता है कि थंबनेल में अधनंगी लड़की का फोटो डालूं या लाल घेरे में चुडै़ल दिखाऊं? इस नए जमाने का नारा है ‘अंगूठा ही दिमाग’ है. पहले अखबार की हैडलाइन का खौफ हुआ करता था, पर अब तो थंबनेल ऐसे चीखते हैं मानो न्यूक्लियर बटन दब गया हो.

सोशल मीडिया ज्ञान का सागर नहीं, बल्कि गलतफहमियों और धोखेबाजी का महासागर बनता जा रहा है. थंबनेल व क्लिकबेट की दुनिया में ईमानदारी पुराने जमाने का रिकौर्ड प्लेयर है, जिसे अब कोई नहीं चलाता.

थंबनेल गुरुओं के यूट्यूब चैनल अब बेईमानी व झूठ के कोचिंग चैनल जैसे हो गए हैं. बस, थोड़ा चेहरा खींचिए, लाल तीर लगाइए, मुफ्त में झूठ की गुगली फेंकिए. थंबनेल अब नए दौर की ठग कला है. थंबनेल यानी किसी वीडियो या लेख की एक झलक ध्यान खींचने के लिए, जबकि क्लिकबेट एक धोखा देने वाला टाइटिल या थंबनेल, जो आप से वीडियो क्लिक करवा लेता है.

‘मोदीजी का संसद में जोरदार भाषण’ एक थंबनेल. ‘मोदीजी फफकफफक कर रो पडे़’ एक क्लिकबेट. कैसे कंटैंटवीर लोगों को लुभा व झूठ परोस कर उन के समय व डाटा को खा रहे हैं.

बेक्रिंग ‘अभीअभी परमाणु युद्ध शुरू हो गया’ पर वीडियो खोलने पर एक महाशय अपने कुत्ते को नहलाते दिख रहे हैं. इन के कंटैंट में किसी को मूव करने का दम नहीं, तो कैमरा मूव कर कर लोगों को दिखाते हैं.

थंबनेल आज का वह सिक्सर है जो जीरो रन पर आउट होने जैसा है. वहीं क्लिकबेट वह चाय है, जिस में पत्ती नहीं पर उबाल जरूर दिखता है. इस में रसगुल्ला दिखाया जाता है, पर निकलती सूखी मठरी है. खोदा पहाड़ निकली चुहिया वाली हालत.

थंबनेल अब दरवाजे पर रखी एक खूबसूरत जूती की तरह है, पर अंदर जाओ तो असलियत नंगे पांव मिलती है. ये लोग कैमरे से नहीं कनपटी पर क्लिकबेट रख कर वीडियो बनाने में माहिर हैं. इस में कुछ नहीं को सबकुछ की तरह बेचा जाता है.

‘देखिए, मोदीजी की आंखों में आंसू’ और पता चला कि जिस सभा में वे भाषण दे रहे थे, उस इलाके में धूलभरी आंधी चल गई थी. क्लिकबेट यानी जितना बड़ा दावा उतनी छोटी बात. दर्शक गालियां भी देते हैं, पर वीडियो देखना नहीं छोड़ते.

आजकल मुद्दे नहीं मुंह के भाव बिकते हैं. जितना टेढ़ा मुंह उतना वायरल. थंबनेल का दिमागी दीवालियापन देखिए कि फोटो भगत सिंह का लगा है और प्रचवन कोई बाबाजी दे रहे हैं. दोनों हाथों से केला खाने वाली लड़की के वीडियो का टाइटिल होगा ‘इस ने वह कर दिया जो आज तक कोई नहीं, जी हां, कोई नहीं कर पाया’.

ये आज के टैलेंटेड लोग हैं, जो बिना कंटैंट के 20 मिनट का वीडियो थंबनेल व क्लिकबेट के दम पर पेल कर लोगों के समय व चैन से खेल रहे हैं. थंबनेल और पान में कैचअप डालना एकजैसे अपराध हैं.

दूल्हे की महज फोटो देख कर रिश्ता तय करने जैसा ही है अब थंबनेल खोल कर वीडियो को देखना. अब हर वीडियो ब्रेकिंग होता है. ये ब्रेक असल में वीडियो देखने वाले को इस के सडि़यल कैंटेंट के कारण ब्रेक ही कर देते हैं. आज जो सब को पता है उसे गला फाड़फाड़ कर ऐक्सक्लूसिव कहने का चलन है.

ऐक्सपायर्ड चीजें अनूठी बना दी जाती हैं.

अब ज्यादा मेहनत पहले चेहरा बिगाड़ के डर फैलाने के काम में होती है. कंटैंट बनाने का काम बाद में बिना मेहनत के चुटकियों में कर लिया जाता है. अब लोग वीडियो से ज्यादा रिऐक्शन पर रिऐक्शन करते हैं.

जहां बिना शादी के सासबहू के बीच झगडे़ जैसी हालत है.

‘वीडियो को आखिर तक देखिए… आखिरी में होगा बड़ा खुलासा…’ खुलासे तो वह बीचबीच में किसी ब्रांड के प्रमोशन का करता ही रहता है कि यह एक अनूठा औफर आज महज एक पिज्जा की कीमत पर 2 पिज्जा… केवल पहले 50 सब्सक्राइबर्स के लिए.

आखिरी तक पहुंचने तक तो आप का डाटा भी हांफने हुए दम तोड़ देता है. ये नए जमाने के डाटा खाऊ कंटैंट भाऊ हैं. इन वीडियोज रूपी चाय में कंटैंट की चीनी खोजते रह जाओगे.

असली सक्सैस मंत्र ‘जितना झूठ उतने व्यूज’. महंगाई, बेरोजगारी, जीडीपी पर कोई बात नहीं. बात तो सैलेब्रिटी के कुत्ते ने आज क्या खाया या फलां हीरो के बेटे आज कितने साल के हो गए या इन मोहतरमा ने आज 10 लाख की ड्रैस पहनी जैसी बातें ज्यादा होती हैं. झोंपड़ी की आग की वीडियो को संसद की आग कह कर देखने का लालच दिया जाता है.

सोशल मीडिया की यह यात्रा ‘फौलो फोर फैक्ट’ से ‘फौलो फोर फाल्सहुड’ तक ले आई है. कंटैंटमेकर सम झदारी से वैसे ही दूर होता जा रहा जैसे महंगाई के सरपट भागते घोडे़ की लगाम सरकार की पकड़ से, बेरोजगारी की समस्या और उस के समाधान से दूर होती जा रही है.

थंबनेल व क्लिकबेट की दुनिया में सब से तेज भाग रहा भी पहुंचता कहीं नहीं है. अब पुराने हाथ की सफाई मुहावरे की जगह अंगूठे की सफाई कहना चाहिए .

तो दोस्तो, अगली बार जब कोई कहे कि देखिए इस वीडियो ने सब को हिला दिया, तो मान कर चलिए कि आप का पूरा डाटा हिलने वाला है. अब तो अगला वीडियो नहीं, बल्कि अगला थंबनेल देखिए, ऐसा कहना चाहिए. Funny Story In Hindi

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