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Hindi Romantic Story: प्यार का नशा

Hindi Romantic Story: गीता का ब्याह तो रामशरण से हुआ था, लेकिन वह उसे नहीं चाहती थी. उस का दिल तो अपने पुराने आशिक सुखराम से लगा हुआ था.

शादी के पहले ही संगीता उसे अपना सबकुछ दे बैठी थी. शादी तो घर वालों ने उस की पसंद पूछे बिना ही रामशरण से कर दी थी. उस ने भी घर वालों को अपनी पसंद नहीं बताई थी.

रामशरण चौकीदार था. उस की अकसर नाइट ड्यूटी रहा करती थी. वह सीधासादा आदमी था. रात को 8 बजे टिफिन ले कर घर से निकलता, तो सुबह 8 बजे ही लौटता.

संगीता रात को घर में अकेली रहती. रात को देर तक वह अपने आशिक सुखराम से मोबाइल पर बातें करती थी. वीडियो काल कर के भी अपना हालेदिल बयां करती थी.

आशिक सुखराम संगीता के मायके वाले गांव में रहता था. कभीकभार वह संगीता से मिलने आया करता था.

वह पूरी रात वहीं गुजारता, ऐश करता और सुबह चला जाता.

ऐसा कई महीने तक चलता रहा.

संगीता के पड़ोसियों में सुखराम को ले कर खुसुरफुसुर हुआ करती थी. कोई पूछता, तो संगीता कह देती, ‘‘मेरे सुक्खू भैया हैं, कभीकभार मिलने आ जाते हैं.’’

पड़ोसी इतने नादान नहीं थे. उन्हें शक हो गया था कि चुपचाप रात को आने वाला भैया नहीं, बल्कि सैयां है. कई औरतें इस बारे में खूब रस लेले कर बातें किया करती थीं.

बूढ़ी सुखिया काकी कहती थीं, ‘‘बेचारा रामशरण कमातेकमाते मर रहा है और इधर यह छैलछबीली औरत पराए मर्द के साथ पाप कर रही है. नरक में जाएगी, नरक में. कहे देती हूं कि एक दिन भुगतेगी.

‘‘मैं ने दुनिया देखी है. पराया मर्द किसी का सगा हुआ है क्या… रस ले कर छोड़ देगा. आजकल तो लोग हत्या भी कर देते हैं. कोई बताओ रे, बेचारा रामशरण इस पापलीला से अनजान है अभी तक.’’

जब रामशरण से किसी ने कुछ नहीं बताया, तो एक दिन सुबह सुखिया काकी ने ही हिम्मत दिखाई. उन्होंने काम से लौट रहे रामशरण को अपने घर के पास रोक लिया और पूछा, ‘‘आ गए बेटा…’’

‘‘हां काकी, कैसी हो?’’

‘‘मैं तो ठीक हूं बेटा, तुम अपनी सुनाओ. खड़ी कर दो साइकिल, आओ बैठ जाओ थोड़ा सुस्ता लो.’’

रामशरण जा कर सुखिया काकी के घर में बैठ गया.

‘‘कल रात को तुम्हारा साला आया था. तुम से मुलाकात हुई कि नहीं? वह अकसर रात को आता है,’’ सुखिया काकी ने बताया.

‘‘मु झे कुछ नहीं पता काकी. मेरा कोई साला नहीं है. मेरी पत्नी संगीता अपने मातापिता की एकलौती औलाद है. मैं उस से पूछूंगा कि कौन आता है,’’ रामशरण को शक हुआ.

‘‘लेकिन बेटा, मेरा नाम मत लेना. मु झे तो लगता है कि तुम्हारे साथ धोखा हो रहा है. बुरा मत मानना, लेकिन मुझे तुम्हारी औरत का चालचलन ठीक नहीं लगता.’’

रामशरण घर गया. पहले तो उस के मन में आया कि वह संगीता से पूछे कि कौन आता है, लेकिन बाद में उस ने सोचा कि वह खुद ही पकड़ेगा, पूछताछ करना ठीक नहीं होगा.

उसी दिन रामशरण ने महल्ले के एक लड़के से बात की, ‘‘राजू, मेरे घर की देखभाल किया कर. पता चला है कि कोई आता है.’’

‘‘आप को आज पता चला है, वह तो कई महीने से आ रहा है. चाची कहती हैं कि वह उन का भैया है. अब वह दिखाई पड़ गया, तो आप को फोन करूंगा.

‘‘आप खुद ही पूछ लेना कि वह कौन है. कोई गलत आदमी होगा, तो उस की कुटाई की जाएगी तबीयत से,’’ राजू बोला.

समय गुजरता गया. एक रात रामशरण का फोन बज उठा. उस ने देखा कि राजू का फोन है. उस ने कहा, ‘‘हां, राजू बोल, क्या बात है?’’

‘चाचा, कुछ देर पहले ही वह आदमी आप के घर आया है. आ जाओ जल्दी से.’

‘‘ठीक है बेटा, आता हूं.’’

कुछ देर में रामशरण घर पहुंच गया और उस ने दरवाजा खटखटाया.

‘‘कौन है?’’ अंदर से संगीता की आवाज आई.

‘‘मैं हूं, दरवाजा खोलो,’’ रामशरण बोला.

यह सुन कर संगीता घबरा गई.

उस ने सुखराम को जल्दी से पलंग के नीचे छिपाया और फिर जा कर दरवाजा खोला.

‘‘आज रात को ही कैसे आ गए?’’ संगीता ने पूछा.

‘‘ब्लड प्रैशर की दवा भूल गया था. वही लेने आया हूं.’’

‘‘रुको, मैं ला देती हूं.’’

‘‘नहीं, रहने दो. मैं दवा यहीं खाऊंगा,’’ यह कह कर रामशरण अंदर चला गया.

संगीता दवा और पानी लेने चली गई. इधर रामशरण ने तंबाकू रगड़ना शुरू कर दिया.

‘‘यह क्या? आए हो दवा खाने और तंबाकू खाने लगे. तंबाकू खाते हो, इसीलिए ब्लड प्रैशर बढ़ता है.
फेंको तंबाकू और दवा खाओ,’’ संगीता बोली.

लेकिन रामशरण तंबाकू रगड़ता ही रहा. तंबाकू तेज था. उस ने तंबाकू हथेली पर जोर से ठोंका, तो उस की झार से पलंग के नीचे छिपे सुखराम को खांसी आ गई. अब तो संगीता को काटो तो खून नहीं. वह बुरी तरह घबरा गई.

‘‘कौन हो भाई? कहां छिपे हो? सामने आओ,’’ रामशरण ने कहा.

जब सुखराम नहीं निकला, तो रामशरण ने उसे खींच कर निकाला और पूछा, ‘‘कब से यह खेल चल रहा है?’’

घबराहट के मारे सुखराम कुछ बोल नहीं सका.

‘‘घबराओ नहीं, बोलो… मैं मारपीट नहीं करूंगा भाई,’’ रामशरण बोला.

फिर भी सुखराम कुछ नहीं बोल पाया.

‘‘यह बेचारा नहीं बोल पा रहा है, तो तुम ही बता दो मेरी जान,’’ रामशरण ने संगीता की ओर देख कर कहा.

‘‘पूछ ही रहे हो तो सबकुछ सचसच बता देती हूं. यह मेरा प्रेमी है. मैं इसे ही पसंद करती हूं. इस के बिना जी नहीं सकती,’’ संगीता बोली.

‘‘ठीक है, लेकिन मुझ से शादी क्यों की? मु झे पहले ही बता दिया होता. मैं बिलकुल तुम से शादी न करता. लेकिन अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है.

तुम इस से शादी कर लो,’’ रामशरण ने कहा.

उसी बीच सुखराम भाग खड़ा हुआ.

बाहर राजू डंडा लिए खड़ा था. उस ने सुखराम को पकड़ लिया और पिटाई शुरू कर दी. शोर सुन कर महल्ले के तमाम लोग आ गए वहां. कुछ और लोग भी सुखराम की धुनाई करने लगे.

रामशरण ने बाहर निकल कर उन लोगों को मना किया और कहा, ‘‘इसे जाने दो.’’

राजू ने कहा, ‘‘किस मिट्टी के बने हो चाचा? हमें इसे कूटने दो.’’

‘‘नहीं, जाने दो, मत मारो,’’ रामशरण शांत भाव से बोला.

लोगों ने सुखराम को छोड़ दिया. वह जान बचा कर भागा.

लोग तरहतरह की बातें कर रहे थे. ज्यादातर लोग रामशरण की हंसी उड़ा रहे थे. उसे डरपोक और नामर्द कह रहे थे. उन का कहना था कि पकड़े गए आदमी को खूब कूट कर पुलिस के हवाले करना था.

रामशरण अगले ही दिन संगीता को ले कर उस के मायके गया और उस के मातापिता से सारा हाल कह सुनाया. इतना ही नहीं, उस ने पंचायत बैठा दी और कहा, ‘‘मैं संगीता की शादी सुखराम से करा देना चाहता हूं. इस से मेरी नहीं निभेगी. उसे बुलाया जाए.’’

पता लगाया गया तो सुखराम घर में मिल गया. कुछ लोग उसे पंचायत में खींच लाए.

मुखिया गजाधर काका ने सुखराम से पूछा, ‘‘क्या तुम संगीता से ब्याह करोगे?’’

‘‘मैं क्यों ब्याह करूं… मेरे जैसे इस के कई यार होंगे. बुलाती थी तो चला जाता था. जब यह अपने पति की नहीं हुई, तो मेरी क्या होगी? यह तो मु झ से अपने पति को मरवाने की बात कहती थी. अच्छा हुआ कि मैं हत्या के पाप से बच गया,’’ सुखराम बोला.

सुखराम की यह बात सुन कर पंचायत सन्न रह गई.

रामशरण ने कहा, ‘‘अब मैं कुछ नहीं कर सकता. मैं तो दोनों की शादी कराने आया था. अब मैं इस औरत को नहीं रख सकता. मेरी कोई गलती हो तो आप लोग बताएं.’’

मुखिया ने कहा, ‘‘तुम ठीक कह रहे हो. तुम्हारा कोई कुसूर नहीं है. यह झूठे प्यारवार का चक्कर ही बहुत खराब है. यह हमारे देश में, समाज में तेजी से बढ़ रहा है. इस के चलते हत्याएं हो रही हैं.

‘‘समाज को जागना होगा, वरना बच्चों की इसी तरह जिंदगी बरबाद होगी. मैं बहुत चिंतित हूं. यह समस्या कैसे दूर होगी? क्या हमारे लड़केलड़कियां इसी तरह नाक कटाएंगे?’’

संगीता बहुत रोईगिड़गिड़ाई, लेकिन रामशरण उसे अपने साथ नहीं ले गया.

संगीता अपने मायके में रह कर मेहनतमजदूरी करने लगी. वह पछता रही थी कि अगर नाजायज प्यार में न पड़ती, तो उस की जिंदगी तबाह न होती. Hindi Romantic Story

Best Hindi Story: बचाने वाला महान

Best Hindi Story: दलित गर्लफ्रैंड को बाइक से 500 मीटर घसीटा उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में एक नौजवान ने अपनी प्रेमिका को बाइक से तकरीबन 500 मीटर तक सड़क पर घसीट दिया. इस दौरान वह लड़की चीखतीचिल्लाती रही, लेकिन आरोपी प्रेमी ने उसे नहीं छोड़ा. घसीटने की वजह लड़की के आधे से ज्यादा कपड़े फट गए. हालांकि, लड़की की आवाज सुन कर कुछ गांव वाले मदद के लिए दौड़े, तो हड़बड़ाहट में आरोपियों की बाइक फिसल कर गिर गई. इस के बाद वे दोनों आरोपी पैदल भाग निकले. लड़का ओबीसी समाज का और लड़की दलित समाज की बताई गई. उन दोनों में इश्कबाजी का मामला था और इसी चक्कर में उन के बीच झगड़ा हो गया था. जाति प्यार पर हावी हो गई थी.

पंच मेलाराम की नजरें काफी दिनों से अपने घर के साथ चौराहे पर नुक्कड़ वाली जगह पर लगी हुई थीं. वहां पर गरीब हरिया की विधवा बहू गुलाबो मिट्टी की कच्ची झोंपड़ी में बच्चों के लिए टौफीबिसकुट, पैनपैंसिलों, कौपियों वगैरह की दुकान चलाती थी.

पंच मेलाराम नुक्कड़ वाली वह जगह हरिया से खरीदना चाहता था. दरअसल, उस का म झला बेटा निकम्मा व आवारा था, इसलिए मेलाराम गुलाबो की दुकान की जगह पर अपने उस बेटे को शराब की दुकान खोल कर देना चाहता था.

विधवा गुलाबो के घर में अपाहिज सास व 2 बेटियों के अलावा बूढ़ा शराबी ससुर हरिया भी था, जो दो घूंट शराब पीने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था.

पंच मेलाराम ने हरिया को शीशे में उतार लिया था. उसे हर रोज खूब देशी दारू पिला रहा था, ताकि नुक्कड़ वाली जगह उसे मिल जाए.

वह जगह हरिया के नाम नहीं थी. मकान की मालकिन पहले हरिया की अपाहिज पत्नी संतरा थी. बेटे नरपाल की शादी हो गई, तो बहू गुलाबो आ गई.

गुलाबो बेहद मेहनती, गुणवान, अच्छे चरित्र की औरत थी. वह अपनी सास की प्यारी बहू बन गई थी.

नरपाल भी बाप की तरह शराबी था. कभीकभी जंगल में जंगली जानवरों का शिकार कर के मांस बेच कर वह कुछ पैसे कमाता था.

सास ने मकान बहू गुलाबो के नाम कर दिया था. उसे यकीन था कि मकान बहू के नाम होगा तो बचा रहेगा, नहीं तो बापबेटा शराब के लालच में उसे बेच खाएंगे.

नरपाल एक दिन घने जंगल में जंगली जानवर का शिकार करने गया और वापस नहीं आया. 4 दिन बाद तलाश करने पर नरपाल के कपड़े मिले.

कपड़े मिलने का सब ने यही मतलब लगाया कि कोई जंगली जानवर उसे खा गया है. अब वह दुनिया में नहीं रहा.

बेचारी गुलाबो जवानी में विधवा हो गई. जवान होती बेटियों और अपाहिज सास की जिम्मेदारी उस पर आ गई थी.

एक दिन शाम के समय हरिया ने बहू से कहा कि अगर दुकान वाली जगह मेलाराम को बेच दी जाए, तो अच्छे पैसे मिल जाएंगे. अपने रहने वाले दोनों कच्चे मिट्टी के बने कमरे पक्के हो जाएंगे. खर्चे के लिए पैसा बच जाएगा.

‘‘पिताजी, दुकान वाली जगह बेच दी, तो घर का चूल्हा नहीं जलेगा. कच्चे मकान में रहा जा सकता है, पर भूखे पेट जिंदा रहना मुश्किल है. जगह बेच कर पैसा कितने दिन चलेगा?’’ गुलाबो ने दूर की बात सोचते हुए कहा, तो हरिया कुछ देर के लिए चुप हो गया.

दुकान के बाहर पंच मेलाराम खड़ा ससुरबहू की बातें सुन रहा था. वह भीतर आ गया और गुलाबो की भरीपूरी छाती पर नजरें टिकाते हुए चापलूसी भरे लहजे में बोला, ‘‘देखो हरिया, तुम्हारी बहू विधवा हो गई तो क्या हुआ, हमारे गांव की इज्जत है. शाम होते ही यहां चौक में कितने आवारा किस्म के लोग खड़े हो कर बेहूदा इशारे करते हैं.’’

‘‘यही बात तो मैं इसे सम झा रहा हूं. नुक्कड़ वाली जगह बेच कर जो पैसा मिलेगा, उस से पक्का मकान बनवा लेंगे. कुछ पैसा जरूरत के लिए बच भी जाएगा. आगे की आगे देखी जाएगी. मेरी दोनों पोतियां बड़ी हो रही हैं. सभी मिल कर काम करेंगे, तो हमारे बुरे दिन गुजर जाएंगे,’’ हरिया ने अपनी बात कही.

‘‘पिताजी, जगह बेचने का पैसा तो सालभर का खर्चा नहीं चला पाएगा. दोनों बेटियां जवान हो रही हैं. इन की शादियां भी करनी हैं. सासू मां भी दूसरों की मुहताज हैं,’’ गुलाबो ने कहा.

गुलाबो की बात पर मेलाराम हमदर्दी जताते हुए बोला, ‘‘गुलाबो, तू अपने रोजगार की चिंता मत कर. मैं सरकारी स्टांप पेपर पर लिख कर दूंगा. तुम्हारी दुकान पर मैं शराब की दुकान खोलूंगा. महीनेभर मैं कम से कम 10-12 लाख रुपए की आमदनी होगी. उस कमाई में से 25 फीसदी हिस्सा तुम्हारा होगा. महीने के महीने तुम्हें तुम्हारा हिस्सा मिल जाएगा.’’

‘‘वह तो बाद की बात है काका. काम चलने में सालभर लग जाएगा. इस से पहले हम खाएंगे क्या?’’

‘‘उस की चिंता मत कर गुलाबो. तुम हमारे खेतों में काम करो. 5 हजार रुपए हर महीना दूंगा. जब हमारी शराब की दुकान चल पड़ेगी, तुम काम छोड़ देना. लाखों रुपए तुम्हें तुम्हारा हिस्सा मिला करेगा. देखना मौज करोगी,’’ कहते हुए मेलाराम ने 5 हजार रुपए उस के सामने लहरा दिए.

‘‘रुपए रख लो बहू. 5 हजार रुपए हर महीने मिलेंगे. जब हमारी दुकान में दारू का कारोबार चल निकलेगा, तो तुम्हारा हिस्सा लाखों में मिलेगा. तब खेतों में काम करना छोड़ देना,’’ ससुर हरिया ने हरेहरे नोटों को ललचाई नजरों से देखते हुए कहा.

इधर गुलाबो भी सोच में पड़ गई. वह छोटी सी दुकान में हर महीने मुश्किल से हजारबारह सौ रुपए ही कमा पाती थी. इसी मामूली से काम में उस का सारा दिन खत्म हो जाता था.

अगर मेलाराम के खेतों में काम करने से 5 हजार रुपए महीना मिल जाए, तो 2 हजार रुपए में घर का खर्चा चला कर वह 3 हजार रुपए बचा सकती है. इस तरह 2-3 साल काम करेगी, तो अपनी दुकान की जगह बेचे बगैर ही वह अपने दोनों कमरे पक्के बनवा सकती है.

अभी गुलाबो सोच ही रही थी कि मेलाराम ने 5 हजार रुपए गुलाबो के सामने रख दिए. जब उस ने दूसरे दिन काम पर आने को कहा, तो गुलाबो ने गंभीर लहजे में अपने मन की बात कही, ‘‘ठीक है काका, आप के खेतों में काम जरूर करूंगी, मगर मैं अपनी सास और पति की निशानी अपने मकान का एक कोना तक नहीं बेचूंगी. पहले ही कहे देती हूं.’’

‘‘अरे हरिया, तू अपनी बहू को ठंडे दिमाग से सम झाना. मैं जो भी काम करूंगा, उस में तुम्हारा भी फायदा होगा,’’ कहते हुए मेलाराम चला गया.

‘‘बहू सारे रुपए संभाल ले. कल से काम पर जाना शुरू कर दे. तुम्हारी दुकान पर मैं काम कर लूंगा. बूढ़ा आदमी हूं, बैठा रहूंगा,’’ हरिया ने आगे की योजना बनाते हुए कहा.

रुपए ले कर गुलाबो सास के पास गई और सारी बात बताई, तो सास ने नुक्कड़ वाली दुकान की जगह बेचने से साफ मना कर दिया. वह बहू के मेलाराम के खेतों में काम करने के पक्ष में नहीं थी, मगर उसे अपनी बहू पर यकीन था.

गुलाबो को काम करते हुए महीनेभर से ऊपर हो गया था. दूसरे महीने का पैसा भी मेलाराम ने दिया नहीं था. शाम को जाते समय गुलाबो ने पैसे मांगे, तो मेलाराम ने उसे रुकने को कहा. उस के साथ काम करने वाली दूसरी औरतें जा चुकी थीं.

दरअसल, मेलाराम ने खेत पर भी मकान बना रखा था. वह उस में खेतों की रखवाली करने या फसल में रात को पानी देने के लिए रुकता था.

शाम हो चली थी. दूरदूर तक सन्नाटा पसरा था. गुलाबो को लगा कि अगर ज्यादा देर हो गई, तो अकेले गांव जाना मुश्किल होगा.

मेलाराम अपने कमरे में था. वह काफी समय से बाहर निकल नहीं रहा था. गुलाबो परेशान हो कर कमरे में घुस गई. महीने का पैसा मांगा, तो मेलाराम ने झपट कर उसे अपनी बांहों में कस लिया और उस की साड़ी खोलने लगा.

गुलाबो ने मेलाराम को अपने से दूर कर उसे उस की बूढ़ी उम्र का एहसास कराना चाहा, ‘‘यह क्या पागलपन है? तुम मेरे बाप की उम्र के हो. ऐसी घिनौनी हरकत तुम्हें शोभा नहीं देती.’’

तभी बाहर से गुलाबो की 12 साला बेटी उसे तलाश करती हुई वहां आ गई. उस ने अपनी मां से छेड़छाड़ करते मेलाराम को पीछे से काट खाया, तो वह गाली बकते हुए बुरी तरह बिदक गया.

मेलाराम ने मासूम बच्ची को जोर से धक्का दिया. वह दीवार से जा टकराई. उस के सिर से खून बह निकला. चोट लगने से वह बेहोश हो गई.

गुस्से में मेलाराम दूसरे कमरे से तलवार उठा लाया, जो उस ने पहले से छिपा कर रखी थी. वह दहाड़ते हुए बोला, ‘‘देख गुलाबो, अगर तू अपनी जवानी का खजाना मु झ पर नहीं लुटाएगी, तो मैं तेरी हत्या कर के तेरी जवान होती बेटी की इज्जत लूट लूंगा.’’

‘‘बेटी के साथ मुंह काला मत करना. हम मांबेटी तो पहले ही मुसीबत की मारी हैं,’’ बेचारी गुलाबो अपनी हालत पर सिसक उठी.

मेलाराम के हाथ में चमकती तलवार देख कर वह घबरा उठी थी. अगर उस की हत्या हो गई, तो उस की बेटी को बचाने कौन आएगा?

‘‘ठीक है. अगर अपनी जवान होती बेटी की आबरू बचाना चाहती है, तो तू पहले सफेद कागज पर लिख कि अपनी नुक्कड़ वाली दुकान मु झे बेच रही है. साथ ही, जिस्म से सारे कपड़े उतार दे.

‘‘बूढ़ा आदमी हूं, थोड़ेबहुत मजे लूटूंगा. तेरी बेटी को तेरे साथ हिफाजत से घर छोड़ आऊंगा. तेरा महीने का पैसा इस शर्त पर दूंगा कि हर शाम मेरी इच्छा पूरी कर के जाया करेगी.’’

‘‘कमीने, अपने घर की एक इंच जगह नहीं बेचूंगी. तेरी यह इच्छा कभी पूरी नहीं होगी,’’ गुलाबो नफरत से गरजी.

‘‘ठीक है, तू ऐसे नहीं मानेगी. पहले तेरी बेटी का गला धड़ से अलग करता हूं,’’ गुर्राते हुए उस ने चमकती तलवार उस की बेटी की गरदन पर रख दी.

ऐसा दिल दहला देने वाला नजारा देख कर गुलाबो कांप उठी. वह नीच गांव से दूर खेतों में मांबेटी की हत्या कर के लाशें दबा देगा. कोई पूछेगा नहीं. उन दोनों का खात्मा हो जाएगा. उस का पति जिंदा नहीं है. ससुर शराबी है. अपाहिज सास भीख मांगती फिरेगी.

अभी गुलाबो सोच में उल झी थी कि मेलाराम फिर गरजा, ‘‘अरे, सोच क्या रही है? जल्दी से सादा कागज पर अपना नाम लिख. अपने सुलगतेमचलते जिस्म से कपड़े उतार, नहीं तो तेरी बेटी का खात्मा हो गया, समझ ले.’’

मजबूर गुलाबो ने सामने पड़े कागज पर दस्तखत कर अपना बदन मेलाराम को सौंप दिया.

गुलाबो का मादक बदन मेलाराम के दिलोदिमाग में वासना का तूफान जगाने लगा था.

मेलाराम ने जवानी में ऐसा मचलता हुस्न नहीं देखा था. वह अभी आगे बढ़ता कि बाहर से आती कुछ आवाजें सुन कर चौंक उठा. आवाजें उस के मकान के नजदीक से आ रही थीं.

गुलाबो ने फटाफट अपने कपड़े पहन लिए, तभी उस की छोटी बेटी हांफती हुई आई और मां से लिपटते हुए बोली, ‘‘मां… मां, बाहर देखो, पापा आ रहे हैं. अपने साथ पुलिस को भी ला रहे हैं.’’

‘‘यह तू क्या कह रही है गुडि़या? तेरे पापा को तो जंगली जानवर…’’ गुलाबो इतना कह पाई थी कि आंधीतूफान की तरह गुस्से की आग में सुलगता हुआ उस का पति नरपाल वहां आ पहुंचा.

उस ने मेलाराम को देखते ही दबोच लिया और उसे इतना मारा कि उस के दोनों हाथ टूट गए और एक आंख फूट गई. अगर पुलिस वाले नहीं बचाते, तो नरपाल मेलाराम को मार ही डालता.

हैरानी में डूबी गुलाबो ने नरपाल से पूछा, ‘‘तुम्हें तो जंगली जानवर…’’

‘‘नहीं…नहीं, मु झे जंगली जानवर क्या खाएंगे, मु झे तो मेलाराम और इस के दोनों बेटों ने जंगल में पकड़ लिया था. मैं नशे में था. ये तीनों हमारा मकान हड़पना चाहते थे.

‘‘मना करने पर इन लोगों ने मु झे बुरी तरह मारापीटा और बेहोशी की हालत में नंगा कर के नदी में बहा दिया. इन का अंदाजा था कि लोग सम झेंगे कि मु झे जंगली जानवर खा गए.’’

नरपाल की बात सुन कर तो गुलाबो ने वह कागज फाड़ डाला, जिस पर मेलाराम ने उस से दस्तखत कराए थे.

गुलाबो आगे बढ़ कर नरपाल से लिपट गई.

‘‘ऐसा हादसा तुम्हारे शराब पीने की आदत के चलते हुए था. पंच मेलाराम हमारे मकान की नुक्कड़ वाली जगह पर शराब की दुकान खोलना चाहता था,’’ गुलाबो ने पति की शराब पीने की आदत पर अपना विरोध जताया.

‘‘गुलाबो, नशा समाज के लिए अभिशाप है. मैं इस का बुरा नतीजा भुगत चुका हूं. अगर एक भला आदमी मुझे बेहोशी की हालत में बहती नदी से न बचाता, तो मेरी बेटी और पत्नी के साथ पता नहीं क्या हो जाता.

‘‘अब मैं न शराब पीऊंगा और न ही शराब की दुकान खुलेगी. अब ये शैतान जेल जाएंगे,’’ नरपाल ने इतना कहा, तो गुलाबो पति की बांहों में समा गई. Best Hindi Story

Story In Hindi: पुराना खाता

Story In Hindi: मंथन की एक राशन की दुकान थी. यह दुकान महल्ले में ही थी, जिस से अगलबगल के लोग सामान खरीद कर ले जाते थे.

मंथन की यह दुकान बहुत पुरानी थी. उस के दादापरदादा के समय की, जिस में पुरानी काठ की लकडि़यों का फर्नीचर था. हर साल दीवाली पर पेंट होने से दुकान अच्छी कंडीशन में थी.

जब से मंथन ने दुकान संभाली थी, तब से वह ग्राहकों पर खास ध्यान देने लगा था. वह सब ग्राहकों से मुसकरा कर बातें करता था. उस के बात करने के तरीके में एक तरह का अपनापन था. लिहाजा, सबकुछ ठीकठाक चल रहा था.

मंथन के पिताजी की तबीयत बहुत ज्यादा खराब रहने लगी थी. लिहाजा, ज्यादातर मंथन ही दुकान पर बैठता था. एक दिन की बात है. खुशबू, जो रजत की बहन थी, सामान लेने मंथन की दुकान पर गई.

मंथन की कदकाठी बढि़या और चेहरा बहुत ही खूबसूरत था. गोरा रंग, घुंघराले बाल, लंबी नाक, चौड़ी छाती. टीशर्ट और लोअर में भी वह काफी फब रहा था.

रजत के पिताजी अजय बाबू पहले घर का राशनपानी लेने मंथन के यहां जाते थे, लेकिन इधर अब वे भी बीमार रहने लगे थे. रजत को औफिस के कामों से ही समय नहीं मिल पाता था, तो वह भला राशनपानी कैसे ला पाता.

रजत की नईनई शादी हुई थी, लिहाजा, वे लोग नईनवेली बहू को घर से बाहर भेजना ठीक नहीं सम झते थे. सौदा लाने के लिए अब खुशबू ही मंथन की दुकान पर आनेजाने लगी थी.

उस दिन जब खुशबू ने मंथन को देखा, तो देखती ही रह गई. सामान ले कर वह कब की घर पहुंच चुकी थी, लेकिन उस का मन घर में नहीं लग रहा था. बारबार उस का ध्यान मंथन की पर्सनैलिटी को देख कर री झा जा रहा था.

खुशबू की एक सहेली थी, जो उस के घर के बगल में ही रहती थी. उस का नाम सलोनी था. सलोनी और खुशबू हमउम्र होने के साथसाथ पक्की सहेलियां भी थीं.

खुशबू अपने दिल की सारी बातें सलोनी को और सलोनी अपने दिल की सारी बातें खुशबू को बताती थी. दोनों का दिल एकदूसरे के बिना नहीं लगता था.

उसी दिन शाम को खुशबू ने अपने दिल की बात सलोनी को बताई, ‘‘सलोनी, मैं तु झे एक बात बताना चाहती हूं. पता नहीं यह कहना ठीक रहेगा भी या नहीं. कैसे कहूं, मु झे बहुत शर्म आती है.’’

‘‘अरे, दोस्तों से कैसी शर्म. दोस्ती ही एक ऐसा रिश्ता है, जिस में लोग अपने दिल की हर बात बता देते हैं. अब बोल भी दे…’’ सलोनी ढलते सूरज को देखते हुए बोली.

‘‘तुम मंथन को जानती हो…’’

‘‘हां, हमारे महल्ले में राशन की दुकान वाला…’’

‘‘हां, वही,’’ खुशबू बोली.

‘‘अरे यार, उसे कौन नहीं जानता… महल्ले की सब लड़कियां उस पर मरती हैं. वे रीता भाभी हैं न… उन का चक्कर मंथन से सालभर पहले से चल रहा था.

‘‘रीता भाभी के पति को जब रीता और मंथन के अफेयर की खबर सुनाई पड़ी, तो उन्होंने रीता भाभी की जम कर पिटाई कर दी थी और राशन लेने के लिए खुद जाने लगे थे.

‘‘और वह गुडि़या, जो मंथन के किराएदार की बेटी थी, के साथ भी मंथन का चक्कर चल रहा था. मंथन है ही इतना खूबसूरत कि उस पर किसी का भी दिल आ जाए.

‘‘हमारे महल्ले की सब औरतों में चर्चा है कि मंथन को जो भी औरत या लड़की देखती है, तो वह उस की हो कर रह जाती है. सब को लगता है कि मंथन का किसी न किसी से चक्कर चल रहा है.

‘‘मंथन का तो पड़ोस की शालू से भी अफेयर था. पता नहीं क्या हुआ होगा. शालू और मंथन के बारे में तो महल्ले की लड़कियां 2 साल पहले चर्चा कर रही थीं.’’

‘‘यानी मंथन मु झे नहीं मिलेगा,’’ कहते हुए खुशबू का चेहरा उतर गया.

‘‘ऐसा कैसे कह सकती हो,’’ सलोनी ने चुटकी ली.

‘‘अब जब इतने सारे गुण हैं, तो वह मु झ बेशक्ल लड़की को क्यों प्यार करेगा? वह इतना हैंडसम है कि उस को कहने भर की देर है, कोई भी लड़की उस के लिए मरने को तैयार हो जाएगी… मेरी तो किस्मत ही खराब है,’’ खुशबू बोली.

‘‘तू किसी से कमतर क्यों रहने लगी… आज भी जब तू महल्ले से गुजरती है, तो लोगों की आंखें तु झ पर से हट नहीं पातीं. तू कम थोड़ी है. महल्ले के लड़के तो तु झ पर जान छिड़कते हैं. तू एक बार कह कर तो देख, वे तेरे लिए कुछ भी कर सकते हैं,’’ सलोनी ने कहा.

‘‘देख, मु झ से फालतू की बात मत कर. मैं ऐसीवैसी लड़की नहीं हूं, जो हर किसी को अपना दिल देती फिरूं. मैं केवल और केवल मंथन की हूं…’’ खुशबू ने कहा.

शाम कब की रात में ढल चुकी थी. खाना खा कर बिस्तर पर लेटी खुशबू छत को ताकती रही. वह लगातार करवटें बदलती रही, लेकिन नींद आंखों से गायब रही. उसे बारबार सलोनी के बताए लड़कियों के नाम याद आ रहे थे. रीता भाभी, गुडि़या, शालू… उन के पासंग में भी नहीं ठहरती थी वह. सांवला रंग, औसत देह, लेकिन उस की छातियां भरीभरी थीं और उस के कूल्हे भारी थे, जो उस के सांवलेपन में भी चार चांद लगाते थे. फिर पता नहीं कब उसे नींद आ गई.

सुबह खुशबू की नींद देर से खुली. सलोनी कब से आ कर उस के घर पर बैठी थी. कितनी बार आवाज लगाई थी, ‘‘सलोनी, जल्दी करो. जल्दी से तैयार हो जाओ. हम लोग कालेज के लिए लेट हो रहे हैं…’’

खुशबू नहाधो कर कालेज के लिए निकली, लेकिन उस का मन कालेज में भी नहीं लगा. किसी तरह कालेज खत्म कर के वह घर लौटी.

अब खुशबू मंथन की दुकान पर किसी न किसी बहाने जाने लगी. जब उसे सामान की लिस्ट थमाई जाती, तो वह जानबू झ कर कुछ सामान लाती और कुछ सामान छोड़ देती.

मंथन भी खुशबू की आंखों की भाषा को बखूबी सम झ रहा था. एक दिन मौका पा कर वह खुशबू से बोला, ‘‘अच्छा, एक बात बताओ. तुम मु झे देख कर इतना मुसकराती क्यों हो?’’

खुशबू हंसते हुए बोली, ‘‘आप को देख कर कहां मुसकराती हूं. मेरी सूरत ही ऐसी है कि लोगों को मेरा चेहरा मुसकराता हुआ दिखता है. इस में मैं क्या करूं?’’

यह सुन कर मंथन मुसकरा कर रह गया.

एक दिन खुशबू ने 500 रुपए के नोट में छिपा कर एक कागज पर अपना मोबाइल नंबर लिख दिया और घर आ गई, लेकिन उस के दिल में खलबली सी मची हुई थी.

रात को वह सोने के लिए छत पर चली गई और मंथन के फोन का इंतजार करने लगी. रात के तकरीबन 1 बजे उस का मोबाइल वाईब्रेट करने लगा. नया नंबर था. खुशबू का दिल बल्लियों उछलने लगा.

खुशबू ने फोन रिसीव किया. दूसरी तरफ की आवाज को सुनने की गरज से वह धीरे से बोली, ‘‘हैलो…’’

दूसरी तरफ से मंथन की आवाज आई, ‘अभी तक जाग रही हो?’

‘‘हां,’’ वह धीरे से बोली.

‘अब तो चांदतारे सब सो गए और तुम जाग रही हो. भला किस के इंतजार में?’

‘‘कौन सो गया है और कौन जाग रहा है. मैं तो सदियों से नहीं सोई… तुम्हारा इंतजार कर रही हूं इस छत पर,’’ खुशबू बोली.

‘अच्छा, तो तुम भी छत पर सो रही हो, ताकि मु झ से बातें कर सको. कहो तो आ जाऊं तुम्हारे पास? 2-4 छतों का ही तो फासला है,’ मंथन बोला.

‘‘नहीं, मत आना,’’ खुशबू बोली.

‘वैसे, मैं भी आज छत पर सोया हूं,’ मंथन ने बताया.

इस के बाद मंथन और खुशबू में ढेर सारी बातें हुईं. अब तो यह रोज की बात थी. खुशबू और मंथन छत पर ही सोते थे. सोते क्या थे, सोने का बहाना करते थे और प्रेम की पेंगे भरते थे.

सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. एक साल पलक झपकते ही बीत गया. अगले साल खुशबू की रिश्ते की बात चलने लगी, पर वह शादी की बात को टालती रहती थी.

इधर शहर में एक बहुत बड़ा शौपिंग मौल खुल गया था. मंथन से कम दाम पर सामान बेचने वाला. शहर के लोग उधर ही भाग रहे थे.

मंथन के पिता अब चल फिर नहीं पाते थे. परिवार की जिम्मेदारी का सारा बो झ अब मंथन के कंधों पर आ गया था. वह ज्यादा तनाव में रहने लगा था.

एक दिन जब मंथन ने सुबह दुकान खोली थी, तब उस की दुकान में बहुत से ग्राहक सामान लेने आए हुए थे. तभी रजत अपने पापा अजय बाबू के साथ मंथन की दुकान पर पहुंचा और उस ने इशारे से मंथन को बताया, ‘‘जैम की शीशी, होरलिक्स का डब्बा और चौकलेट का पैकेट दे दो.’’

मंथन ने चौकलेट का पैकेट, जैम की शीशी और होरलिक्स का पैसा जोड़ कर बिल बनाया.

परची थमाते हुए मंथन बोला, ‘‘रजत बाबू, 700 रुपए हो गए.’’

रजत ने एमआरपी और चीजों के दाम को मिलाया. दाम ठीकठाक ही लगाए गए थे, लेकिन 1-2 सामान में एमआरपी से 2-3 रुपए ही कम निकले.

रजत ने आंखें तरेरते हुए कहा, ‘‘मंथन, तुम ने तो एमआरपी पर ही सब सामान के दाम लगा दिए हैं… जबकि मौल में अभी भारी डिस्काउंट चल रहा है. हम वहीं से सब सामान लेंगे. चलिए पापा…’’

रजत के पापा ये सब बातें बहुत ध्यान से सुन रहे थे. वे बोले, ‘‘मौल तो आज खुला है बेटा, इस से पहले मैं और तुम्हारे दादाजी भी इसी दुकान से सामान खरीदते रहे हैं. तब मंथन के दादाजी दुकान चलाते थे. इन लोगों ने खूब साथ दिया है हमारा. यह रिश्ता एक दिन में नहीं बना है, बल्कि इस को बनने में सालोंसाल लगे हैं.’’

‘‘आप की तरह मैं बेवकूफ नहीं हूं पापा, जो इन से महंगे दाम पर सामान खरीदूं. आखिर हम भी पैसा बहुत मेहनत से कमाते हैं. जब और लोग कंपीटिशन कर रहे हैं, तो इन को भी तो दाम कम करना चाहिए. ये लोग पहले की तरह अब ज्यादा पैसे नहीं ले सकते. अब जमाना बदल गया है,’’ रजत ने कहा.

‘‘रजत बेटा, तुम शायद कोरोना के समय को भूल गए हो. उस समय तुम इसी मंथन के यहां से सामान ले जाते थे. और तुम्हें यह भी पता होना चाहिए कि उस समय तुम्हारे बैंक से तुम्हारी सैलरी नहीं आ रही थी. तब भी हम लोगों को घर बैठे सामान आसानी से मिल जाता था.

‘‘और इसी मंथन की दुकान से तुम ने दसियों हजार रुपए का राशन खाया है. उस समय यही मंथन पीछे के दरवाजे से हमें चीजें मुहैया करवाता था.

‘‘उस समय ये बड़ेबड़े मौल न जाने किस बिल में समा गए थे. तब पुलिस के न जाने कितने लाठीडंडे खा कर मंथन सामान इधरउधर से जुगाड़ कर के पूरे महल्ले को देता था.

‘‘फिर भी मैं वहीं से सामान लूंगा. मौल बैस्ट है मेरे लिए,’’ इतना कह कर रजत वहां से चला गया.

बात आईगई हो गई. अजय बाबू और रजत दोनों खुशबू पर शादी के लिए जोर दे रहे थे. 6 महीने और बीत गए. जो अजय बाबू मंथन के परिवार को इतना अच्छा कहते थे, जब उन को पता चला कि मंथन और खुशबू एकदूसरे से प्यार करते हैं, तो उन के जातिवाद ने सिर उठा लिया.

एक दिन अजय बाबू मंथन की दुकान पर तमतमाए हुए पहुंचे और मंथन को कई झापड़ रसीद कर दिए.
अजय बाबू का शरीर गुस्से से कांप रहा था. वे तमतमाए हुए लहजे में बोले, ‘‘हम ने तुम लोगों को जरा सा मुंह क्या लगा लिया, तुम अपनी औकात से बाहर आ कर हमारे सिर पर चढ़ गए. कहां हम कुलीन ब्राह्मण और कहां तुम बनिया. तुम लोगों को हमेशा अपनी औकात में रहना चाहिए. हमारी बहनबेटियों से खिलवाड़ करते हो… हद में रहा करो, नहीं तो होश ठिकाने लगा दूंगा.’’

दिन बीतते चले गए. कई साल गुजर गए. उम्र निकल जाने के चलते खुशबू के लिए रिश्ते भी अब आने बंद हो गए थे. इधर परिवार और 2 बहनों की शादी की जिम्मेदारी मंथन के कंधों पर थी. वह जैसे बलिदान की वेदी पर झूल गया.

एक दिन अचानक अजय बाबू को लकवा मार गया. अब वे बिस्तर से उठ भी नहीं पाते थे. खुशबू ने पूरे मन से अपने पापा की सेवा की, पर जल्दी ही वे चल बसे.

इतना ही नहीं, एक दिन रजत अपनी कार से औफिस जा रहा था कि तभी उस की कार सामने से आ रही दूसरी कार से टकरा गई और रजत के कार के परखच्चे उड़ गए.

रजत को अस्पताल में भरती करवाया गया. रजत अब महीनों तक बिस्तर से उठ नहीं सकता था. डाक्टर कह रहे थे कि इतने बड़े हादसे में अगर वह बच गया है, तो यही बहुत बड़ी बात है.

रजत की बैंक की प्राइवेट नौकरी थी, जो छूट गई. उस की पत्नी सविता के घर वालों ने कुछ महीनों तक मदद की, उस के बाद उन्होंने भी हाथ खींच लिए.

पूरे 2 साल तक रजत बिस्तर पर रहा. बच्चों की फीस जमा नहीं करवा पाने के चलते स्कूल ने बच्चों के नाम काट दिए. अब रजत के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ने जाते थे.

एक दिन की बात है. घर में राशन खत्म हो गया था और बच्चे भूख से बिलबिला रहे थे. रजत के पापा अगर जिंदा होते, तो जरूर मंथन से कह कर राशन ले आते.

कुछ सोच कर सविता ने सारी बात जा कर मौल वाले दुकानदार को बताई, पर उस दिन सविता के पैरों तले की जमीन खिसक गई, जब मौल वाले ने सामान उधार देने से साफ मना कर दिया. उस ने बहुत सारे ग्राहकों के सामने ही सविता की बेइज्जती भी कर दी. सविता बेइज्जती का घूंट पी कर वहां से चली आई.

घर आ कर सविता ने सारी घटना रजत को बताई. रजत अपनी बेबसी पर दांत पीस कर रह गया था. उस के पैर अभी पूरी तरह से ठीक नहीं हुए थे. कमर की हड्डी भी टूट गई थी. वह लाचार था.

खैर, उड़तेउड़ते यह बात मंथन को पता चली. उस का और अजय बाबू का पुराना संबंध था. इस नाते वह घर का पूरा राशन रजत के यहां देने चला आया.

रजत और सविता दोनों हैरान से मंथन को ताक रहे थे.

मंथन ने रजत को नमस्ते किया और पूछा, ‘‘आप कैसे हैं?’’

रजत को जवाब देते न बना, फिर भी वह मंथन से बोला, ‘‘ठीक हूं. धीरेधीरे रिकवरी हो रही है.’’

‘‘आप के ऐक्सीडैंट के बारे में सुना था, लेकिन दुकान में भीड़भाड़ रहने के चलते आप से मिलने नहीं आ सका. कुछ झिझक भी थी. पता नहीं आप क्या सोचेंगे? वैसे, कुछ दिनों से बच्चों को स्कूल जाते नहीं देखा. वे स्कूल जाते हैं न?’’

‘‘स्कूल तो जाते हैं, लेकिन अब प्राइवेट स्कूल में नहीं, बल्कि सरकारी स्कूल में जाते हैं, लेकिन इधर उन की स्टेशनरी खत्म हो गई है, इसलिए हफ्तेभर से वे स्कूल नहीं जा रहे हैं.’’

‘‘हां, इधर मैं भाभी को भी देखता हूं, वे सुबहसुबह शायद बच्चों को पढ़ाने जाती हैं.’’

‘‘हां, बगल में प्राइमरी स्कूल है. वहीं 6-7 हजार रुपए की प्राइवेट नौकरी कर रही है. वहीं बच्चों को पढ़ाने जाती है. बेचारी को मेरे ऐक्सीडैंट के बाद बाहर निकलना पड़ गया. अब क्या करूं… सविता की कमाई तो मेरी दवादारू में ही खर्च हो जाती है.’’

‘‘पढ़ाने या काम करने में कोई बुराई थोड़ी ही है. सविता भाभी तो ज्ञान का दीपक जला रही हैं… आप के परिवार के लिए कुछ राशन ले कर आया हूं. आप मेरे पुराने खाते को फिर से चालू कर दीजिए.’’

‘‘मंथन, मु झे शर्मिंदा मत करो. मैं पहले ही अपनी नजरों में गिर चुका हूं. मैं अपने बरताव पर शर्मिंदा हूं.’’

‘‘मुसीबत के समय ही तो अपने लोग काम आते हैं. अगर कल को मेरे ऊपर कोई मुसीबत आन पड़ी तो आप लोग मेरी मदद करने आएंगे न? आप बच्चों को स्कूल भेजिए. आप स्टेशनरी का सामान मेरी दुकान से मंगवा लीजिएगा. सब्जीभाजी भी भिजवा दूंगा. जब आप ठीक हो जाएंगे, तब मेरा हिसाब कर दीजिएगा.’’

‘‘सब्जी तो आप नहीं बेचते हैं, फिर सब्जी कैसे देंगे?’’ सविता ने पूछा.

‘‘मेरा एक दोस्त आजकल सब्जी बेच रहा है. उस के यहां से खरीद कर मैं आप को भिजवा दूंगा और पैसे हिसाब में लिख दूंगा.

‘‘अच्छा, अब मैं चलता हूं. दुकान पर लड़का अकेला है,’’ कह कर मंथन चलने को हुआ.

‘‘दुकान पर चले जाना, लेकिन पहले मेरी बहन खुशबू के हाथ की चाय तो पी लो,’’ रजत बोला.

इस के बाद रजत ने खुशबू को इशारा किया, तो वह किचन में चाय बनाने चली गई. थोड़ी देर बाद गरमागरम चाय आ गई.

चाय खत्म कर मंथन बाहर जाने लगा कि तभी रजत ने टोका, ‘‘बहुत दिनों से मेरे मन में एक बात चल रही थी. इतना उपकार तो तुम ने मु झ पर दिया है, लेकिन अभी मैं चलनेफिरने में नाकाम हूं. मेरी खुशबू के प्रति भी कुछ जिम्मेदारी है. मु झे यह भी मालूम है कि तुम दोनों एकदूसरे से बहुत प्यार करते हो. मेरे पिताजी पुराने खयालात के थे, लेकिन अब दुनिया बदल रही है. मु झे भी नए ढंग से सोचना होगा.

‘‘तुम दोनों बेकुसूर होते हुए भी सजा काट रहे हो, इसलिए मेरी तुम से एक गुजारिश है कि तुम मेरी बहन को स्वीकार कर लो. बहुत दुख दिया है मैं ने तुम दोनों को. आज से मु झे तुम मेरी जिम्मेदारियों से मुक्त करो.

‘‘मेरी बहन जहां और जिस के साथ खुश रहेगी, वहीं उस की शादी होनी चाहिए. लेकिन मेरी माली हालत बहुत खराब है. मैं दहेज नहीं दे सकता.’’

‘‘दहेज नहीं दे सकते… मतलब मु झे मुफ्त में आप की बहन से शादी करनी पड़ेगी?’’ मंथन बोला.

खुशबू ने कनखियों से मंथन को ताका. उस को लगा कि अब फिर से वह कुंआरी रह जाएगी. मंथन तो दहेज ले कर ही मानेगा.

तभी मंथन खिलखिला कर हंस पड़ा, ‘‘भाई साहब, आप की बहन को मैं एक जोड़े में विदा करवा कर ले जाऊंगा. अभी मेरी दुकान बहुत बढि़या चल रही है. मैं अपनी दोनों बहनों की शादी कर चुका हूं. हर तरह की जिम्मेदारी का बो झ खत्म हो गया है.

‘‘खुशबू जैसी सम झदार जीवनसाथी पा कर मेरा काम और भी आसान हो गया है. अच्छा, अब मैं चलता हूं. आप लोग शादी की तारीख तय कीजिए.’’

अब रजत, सविता और खुशबू के चेहरे पर खुशी नजर आ रही थी. Story In Hindi

Best Hindi Kahani: दूसरी शादी – परवेज की बेबसी

Best Hindi Kahani: अफरोज के जाने के बाद परवेज की जिंदगी थम सी गई थी. बच्चे अकेले से हो गए थे. अपनों ने जो रंग दिखाया था, उस ने परवेज को झकझोर कर रख दिया था. बच्चों की आंखों में मां की तड़प, उन की बेबसी, उन की मासूमियत भरी आवाज और अपनों से मिले दर्द से वे सहम गए थे.

चाची का बच्चों की औकात से ज्यादा काम करवाना, उन के बच्चों का मारना, तंग करना, खाना न देना, उन को बारबार ‘तुम्हारी तो मां भी नहीं है’ कह कर मजाक उड़ाना, कहीं बाहर जाओ तो बच्चों का दिनभर चड्डी में ही टौयलैट किए हुए ही भूखेप्यासे रहना… बच्चों की ऐसी बुरी दशा और बेबसी देख कर परवेज पूरी तरह टूट चुका था.

कोरोना की दूसरी लहर ने देशभर में मौत का जो नंगा नाच नचाया था, उस से कोई शहर ही नहीं, बल्कि गांवमहल्ला और शायद कोई खानदान ऐसा बचा हो, जो इस की चपेट में न आया हो.

अफरोज के जाने के बाद परवेज अकेला अपने मासूम बच्चों के साथ गांव में रहता था. उस की बड़ी बेटी 8 साल की, उस से छोटी बेटी 5 साल की और उस से छोटा बेटा डेढ़ साल का था.

जो लोग कल तक परवेज की इज्जत करते थे, उस के बच्चों की देखभाल भी करते थे, आज अफरोज के जाने के बाद वे उन से आंखें चुराने लगे थे. लौकडाउन की वजह से परवेज का कामधंधा चौपट हो गया था. कहीं से कोई आमदनी का जरीया न था, ऊपर से इन बच्चों को छोड़ कर वह कहीं जा भी नहीं सकता था.

परवेज के बच्चे अपने चाचा के बच्चों के साथ खेलने की कोशिश करते, तो वे इन्हें मार कर भगा देते. उन की चाची मासूम बच्ची से घर का झाड़ूपोंछा करवाती थीं. जब वह थक जाती तो रोते हुए परवेज के पास आती और कहती कि चाची अपने बच्चों को तो खाना देती हैं, हमें नहीं देतीं.

एक दिन तो हद ही हो गई. परवेज किसी काम से बाहर गया था. लौटा तो देखा कि उस की छोटी बेटी और बेटा कमरे में बैठे रो रहे थे. परवेज ने उन से पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

बेटी ने बताया, ‘‘चाची मुझ से बड़ा कुकर धुलवा रही थीं. वह मुझ से नहीं उठ रहा था, तो मुझे डांटने लगीं. उन्होंने मुझे खाना नहीं दिया, तो कोई बात नहीं. कम से कम मेरे भाई को तो खाने को कुछ दे देतीं, वह सुबह से भूखा था.’’

यह सुनते ही परवेज का दिल रोने लगा, पर वह कर भी क्या सकता था. कुछ दिनों बाद उसे काम के सिलसिले में वापस मुंबई जाना था. घर पर पड़ेपड़े कई महीने गुजर गए थे.

जब परवेज ने अपनी बड़ी बेटी को बताया, तो वह बोली, ‘‘अब्बा, हम अकेले कैसे रहेंगे? हमें भी साथ ले चलो.’’ परवेज ने उसे समझाया, ‘‘मैं वहां पहुंच कर कुछ ही दिनों में तुम सब को भी ले जाऊंगा.’’

अचानक बेटी बोली, ‘‘आप नई अम्मी ले आओ. हमें भी अम्मी चाहिए. आप दूसरी शादी कर लो.’’

परवेज अफरोज को नहीं भुला पा रहा था और फिर नई मां बच्चों की सही ढंग से देखभाल कर पाएगी या नहीं, इस की कोई गारंटी नहीं थी. लेकिन बच्ची की जिद ने उसे मजबूर कर दिया और वह भी यही सोचने लगा कि कम से कम बच्चों को वक्त पर खाना तो मिलेगा और देखभाल करने वाला कोई तो होगा.

इस तरह परवेज दिल पर पत्थर रख कर मुंबई आ गया और कुछ ही दिन हुए थे कि उस का काम भी चल निकला और जल्द ही उस के लिए एक रिश्ता आ गया, जो उस के एक दोस्त ने बताया था.

उस ने परवेज को एक फोटो दिखाया और बोला, ‘‘यह हिना है. इस के 2 बच्चे हैं. शौहर का अभी एक साल पहले इंतकाल हुआ है. यह अभी अपनी मां के घर है. तुम हां बोलो, तो मैंबात चलाऊं?’’

परवेज ने हिना के मासूम बच्चों के बारे में सुन कर हां कर दी, क्योंकि वह भी अपने बच्चों की मां के न होने का दुख जानता था.

अगले दिन परवेज ने हिना, उस के मांबाप और दोनों बच्चों को अपने ही घर बातचीत करने के लिए बुला लिया. उन्होंने परवेज से काम और बच्चों के बारे मे पूछा, उस के बाद उन्होंने बताया कि हिना के दोनों बच्चों को बचपनसे ही डायबिटीज है. इन्हें इंसुलिन लगती है. अगर तुम्हें यह रिश्ता मंजूर हो तो बताओ.

परवेज ने उन मासूम बच्चों को देखा, जो महज 8 साल और 6 साल के थे. फिर मासूम से चेहरे वाली हिना पर नजर डाली जो अभी जवान ही थी, हां कर दी और अगले ही हफ्ते उन का निकाह हो गया.

निकाह के तीसरे ही दिन हिना ने परवेज को बच्चों को लाने के लिए गांव भेज दिया. कुछ ही दिनों में वह अपने बच्चों को मुंबई ले आया.

हिना जैसी मां पा कर परवेज के बच्चे भी खुश हो गए. हिना ने दिलोजान से बच्चों का खयाल रखना शुरू कर दिया. वह अपने हाथों से उन्हें खाना खिलाती, उन की देखभाल करती और उन्हें कभी मां की कमी महसूस न होने देती. परवेज ने भी उस के बच्चों का अच्छे प्राइवेट स्कूल में दाखिल करा दिया था.

एक दिन हिना ने परवेज को अपनी कहानी सुनाई कि उस के रोंगटे खड़े हो गए. उस ने बताया, ‘‘जब मेरे शौहर का इंतकाल हुआ, तो हम घूमने गुजरात गए थे. उन्हें पहले से ही डायबिटीज थी. वहां पर हम और उन के दोस्तों के परिवार घूमने गए थे कि अचानक इन की तबीयत खराब हो गई. दोस्तों ने इलाज कराने में कोई कमी न छोड़ी, फिर भी वे न बच पाए.

‘‘जब मेरी सास को पता चला, तो वे मुझे धक्का देते हुए बोलीं कि तू ने मेरे बेटे को मार दिया. मैं तो अपने होश में न थी, उन के ये अल्फाज सुन कर बेहोश हो गई. जब होश आया तो मेरा सबकुछ लुट चुका था. मेरा अपनी सुसराल में रहना दूभर हो चुका था.

‘‘मेरे बच्चे भी डायबिटीज के मरीज थे, जो सूख कर कांटा हो गए थे. जेठानी सारा काम मुझ से करवाती थीं. मेरे बच्चों को कभी खाना मिलता, कभी नहीं मिलता. सास ने जीना मुश्किल कर रखा था. आखिर में मुझे अपने मांबाप के घर जाना पड़ा.

‘‘वहां मुझे दो वक्त का खाना तो मिल रहा था, लेकिन शौहर की कमी ने झकझोर कर रख दिया था. अम्मीअब्बा को हमेशा यही बात सताती रहती थी कि बिना शौहर के मेरा और बच्चों का क्या होगा. मेरी भाभी भी बच्चों पर गुस्सा होती रहती थीं. उन्हें कभी किचन में नहीं घुसने दिया जाता था.’’

पर, अब हिना बहुत खुश थी. शादी के एक साल बाद परवेज के घर एक चांद सा बेटा हुआ. जो रिश्तेदार उन्हें दुत्कारते थे, आज खुशीखुशी मिलते हैं. हिना की सास भी मिलने आती रहती हैं. परवेज का भाईभाभी रोज फोन पर बच्चों से बात करते हैं और छुट्टियों में मुंबई आ जाते हैं.

आज परवेज का घरपरिवार खुशहाल है. उस का कामधंधा भी अच्छा चल रहा है. घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं है. बुरा वक्त कब निकल गया, पता ही नहीं चला. Best Hindi Kahani

Best Story In Hindi: जुल्म की सजा – समरथ सिंह की कारगुजारी

Best Story In Hindi: उत्तर प्रदेश के बदायूं, शाहजहांपुर और फर्रुखाबाद जिलों की सीमाओं को छूता, रामगंगा नदी के किनारे पर बसा हुआ गांव पिरथीपुर यों तो बदायूं जिले का अंग है, पर जिले तक इस की पहुंच उतनी ही मुश्किल है, जितनी मुश्किल शाहजहांपुर और फर्रुखाबाद जिला हैडक्वार्टर तक की है.

कभी इस गांव की दक्षिण दिशा में बहने वाली रामगंगा ने जब साल 1917 में कटान किया और नदी की धार पिरथीपुर के उत्तर जा पहुंची, तो पिरथीपुर बदायूं जिले से पूरी तरह कट गया. गांव के लोगों द्वारा नदी पार करने के लिए गांव के पूरब और पश्चिम में 10-10 कोस तक कोई पुल नहीं था, इसलिए उन की दुनिया पिरथीपुर और आसपास के गांवों तक ही सिमटी थी, जिस में 3 किलोमीटर पर एक प्राइमरी स्कूल, 5 किलोमीटर पर एक पुलिस चौकी और हफ्ते में 2 दिन लगने वाला बाजार था.

सड़क, बिजली और अस्पताल पिरथीपुर वालों के लिए दूसरी दुनिया के शब्द थे. सरकारी अमला भी इस गांव में सालों तक नहीं आता था.

देश और प्रदेश में चाहे जिस राजनीतिक पार्टी की सरकार हो, पर पिरथीपुर में तो समरथ सिंह का ही राज चलता था. आम चुनाव के दिनों में राजनीतिक पार्टियों के जो नुमाइंदे पिरथीपुर गांव तक पहुंचने की हिम्मत जुटा पाते थे, वे भी समरथ सिंह को ही अपनी पार्टी का झंडा दे कर और वोट दिलाने की अपील कर के लौट जाते थे, क्योंकि वे जानते थे कि पूरे गांव के वोट उसी को मिलेंगे, जिस की ओर ठाकुर समरथ सिंह इशारा कर देंगे.

पिरथीपुर गांव की ज्यादातर जमीन रेतीली और कम उपजाऊ थी. समरथ सिंह ने उपजाऊ जमीनें चकबंदी में अपने नाम करवा ली थीं. जो कम उपजाऊ जमीन दूसरे गांव वालों के नाम थी, उस का भी ज्यादातर भाग समरथ सिंह के पास गिरवी रखा था.

समरथ सिंह के पास साहूकारी का लाइसैंस था और गांव का कोई बाशिंदा ऐसा नहीं था, जिस ने सारे कागजात पर अपने दस्तखत कर के या अंगूठा लगा कर समरथ सिंह के हवाले न कर दिया हो. इस तरह सभी गांव वालों की गरदनें समरथ सिंह के मजबूत हाथों में थीं.

पिरथीपुर गांव में समरथ सिंह से आंख मिला कर बात करने की हिम्मत किसी में भी नहीं थी. पासपड़ोस के ज्यादातर लोग भी समरथ सिंह के ही कर्जदार थे.

समरथ सिंह की पहुंच शासन तक थी. क्षेत्र के विधायक और सांसद से ले कर उपजिलाधिकारी तक पहुंच रखने वाले समरथ सिंह के खिलाफ जाने की हिम्मत पुलिस वाले भी नहीं करते थे.

समरथ सिंह के 3 बेटे थे. तीनों बेटों की शादी कर के उन्हें 10-10 एकड़ जमीन और रहने लायक अलग मकान दे कर समरथ सिंह ने उन्हें अपने राजपाट से दूर कर दिया था. उन की अपनी कोठी में पत्नी सीता देवी और बेटी गरिमा रहते थे.

गरिमा समरथ सिंह की आखिरी औलाद थी. वह अपने पिता की बहुत दुलारी थी. पूरे पिरथीपुर में ठाकुर समरथ सिंह से कोई बेखौफ था, तो वह गरिमा ही थी.

सीता देवी को समरथ सिंह ने उन के बैडरूम से ले कर रसोईघर तक सिमटा दिया था. घर में उन का दखल भी रसोई और बेटी तक ही था. इस के आगे की बात करना तो दूर, सोचना भी उन के लिए बैन था.

कोठी के पश्चिमी भाग के एक कमरे में समरथ सिंह सोते थे और उसी कमरे में वे जमींदारी, साहूकारी, नेतागीरी व दादागीरी के काम चलाते थे. वहां जाने की इजाजत सीता देवी को भी नहीं थी.

समरथ सरकार के नाम से पूरे पिरथीपुर में मशहूर समरथ सिंह की कोठी में बाहरी लोगों का आनाजाना पश्चिमी दरवाजे से ही होता था. इस दरवाजे से बरामदे में होते हुए उन के दफ्तर और बैडरूम तक पहुंचा जा सकता था.

कोठी के पश्चिमी भाग में दखल देना परिवार वालों के लिए ही नहीं, बल्कि नौकरचाकरों के लिए भी मना था.

अपने पिता की दुलारी गरिमा बचपन से ही कोठी के उस भाग में दौड़तीखेलती रही थी, इसलिए बहुत टोकाटाकी के बाद भी वह कभीकभार उधर चली ही जाती थी.

गांव की हर नई बहू को ‘समरथ सरकार’ से आशीर्वाद लेने जाने की प्रथा थी. कोठी के इसी पश्चिमी हिस्से में समरथ सिंह जितने दिन चाहते, उसे आशीर्वाद देते थे और जब उन का जी भर जाता था, तो उपहार के तौर पर गहने दे कर उसे पश्चिमी दरवाजे से निकाल कर उस के घर पहुंचा दिया जाता था.

आतेजाते हुए कभी गांव की किसी बहूबेटी पर समरथ सिंह की नजर पड़ जाती, तो उसे भी कोठी देखने का न्योता भिजवा देते, जिसे पा कर उसे कोठी में हर हाल में आना ही होता था.

समरथ सिंह की इमेज भले ही कठोर और बेरहम रहनुमा की थी, पर वे दयालु भी कम नहीं थे. खुशीखुशी आशीर्वाद लेने वालों पर उन की कृपा बरसती थी. अनेक औरतें जबतब उन का आशीर्वाद लेने के लिए कोठी का पश्चिमी दरवाजा खटखटाती रहती थीं, ताकि उन के

पति को फसल उपजाने के लिए अच्छी जमीन मिल सके, दवा व इलाज और शादीब्याह के खर्च वगैरह को पूरा करने हेतु नकद रुपए मिल सकें.

लेकिन बात न मानने से समरथ सिंह को सख्त चिढ़ थी. राधे ने अपनी बहू को आशीर्वाद लेने के लिए कोठी पर भेजने से मना कर दिया था. उस की बहू को समरथ के आदमी रात के अंधेरे में घर से उठा ले गए और तीसरे दिन उस की लाश कुएं में तैरती मिली थी.

अपनी नईनवेली पत्नी की लाश देख कर राधे का बेटा सुनील अपना आपा खो बैठा और पूरे गांव के सामने समरथ सिंह पर हत्या का आरोप लगाते हुए गालियां बकने लगा.

2 घंटे के अंदर पुलिस उसे गांव से उठा ले गई और पत्नी की हत्या के आरोप में जेल भेज दिया. बाद में ठाकुर के आदमियों की गवाही पर उसे उम्रकैद की सजा हो गई.

राधे की पत्नी अपने एकलौते बेटे की यह हालत बरदाश्त न कर सकी और पागल हो गई. इस घटना से घबरा कर कई इज्जतदार परिवार पिरथीपुर गांव से भाग गए.

समरथ सिंह ने भी बचेखुचे लोगों से साफसाफ कह दिया कि पिरथीपुर में समरथ सिंह की मरजी ही चलेगी. जिसे उन की मरजी के मुताबिक जीने में एतराज हो, वह गांव छोड़ कर चला जाए. इसी में उस की भलाई है.

समरथ सिंह की बेटी गरिमा जब थोड़ी बड़ी हुई, तो समरथ सिंह ने उस का स्कूल जाना बंद करा दिया. अब वह दिनरात घर में ही रहती थी.

गरमी के मौसम में एक दिन दोपहर में उसे नींद नहीं आ रही थी. वह लेटेलेटे ऊब गई, तो अपने कमरे से बाहर निकल कर छत पर चली गई और टहलने लगी.

अचानक उसे कोठी के पश्चिमी दरवाजे पर कुछ आहट सुनाई दी. उस ने झांक कर देखा, तो दंग रह गई. समरथ सिंह का खास लठैत भरोसे एक औरत को ले कर आया था. कुछ देर बाद कोठी का पश्चिमी दरवाजा बंद हो गया और भरोसे दरवाजे के पास ही चारपाई डाल कर कोठी के बाहर सो गया.

गरिमा छत से उतर कर दबे पैर कोठी के बैन इलाके में चली गई. अपने पिता के बैडरूम की खिड़की के बंद दरवाजे के बीच से उस ने कमरे के अंदर झांका, तो दंग रह गई. उस के पिता नशे में धुत्त एक लड़की के कपड़े उतार रहे थे. वह लड़की सिसकते हुए कपड़े उतारे जाने का विरोध कर रही थी.

जबरन उस के सारे कपड़े उतार कर उन्होंने उस लड़की को किसी बच्चे की तरह अपनी बांहों में उठा कर चूमना शुरू कर दिया. फिर वे पलंग की ओर बढ़े और उसे पलंग पर लिटा कर किसी राक्षस की तरह उछल कर उस पर सवार हो गए.

गरिमा सांस रोके यह सब देखती रही और पिता का शरीर ढीला पड़ते ही दबे पैर वहां से निकल कर अपने कमरे में आ गई. उसे यह देख कर बहुत अच्छा लगा और बेचैनी भी महसूस हुई.

अब गरिमा दिनभर सोती और रात को अपने पिता की करतूत देखने के लिए बेचैन रहती.

अपने पिता की रासलीला देखदेख कर गरिमा भी काम की आग से भभक उठती थी.

एक दिन समरथ सिंह भरोसे को ले कर किसी काम से जिला हैडक्वार्टर गए हुए थे. दोपहर एकडेढ़ बजे उन का कारिंदा भूरे, जिस की उम्र तकरीबन 20 साल होगी, हलबैल ले कर आया.

बैलों को बांध कर वह पशुशाला के बाहर लगे नल पर नहाने लगा, तभी गरिमा की निगाह उस पर पड़ गई. वह देर तक उस की गठीली देह देखती रही.

जब भूरे कपड़े पहन कर अपने घर जाने लगा, तो गरिमा ने उसे बुलाया. भूरे कोठरी के दरवाजे पर आया, तो गरिमा ने उसे अपने साथ आने को कहा.

गरिमा को पता था कि उस की मां भोजन कर के आराम करने के लिए अपने कमरे में जा चुकी है.

गरिमा भूरे को ले कर कोठी के पश्चिमी दरवाजे की ओर बढ़ी, तो भूरे ठिठक कर खड़ा हो गया. गरिमा ने लपक कर उस का गरीबान पकड़ लिया और घसीटते हुए अपने पिता के कमरे की ओर ले जाने लगी.

भूरे कसाई के पीछेपीछे बूचड़खाने की ओर जाती हुई गाय के समान ही गरिमा के पीछेपीछे चल पड़ा.

पिता के कमरे में पहुंच कर गरिमा ने दरवाजा बंद कर लिया और भूरे को कपड़े उतारने का आदेश दिया. भूरे उस का आदेश सुन कर हैरान रह गया.

उसे चुप खड़ा देख कर गरिमा ने खूंटी पर टंगा हंटर उतार लिया और दांत पीसते हुए कहा, ‘‘अगर अपना भला चाहते हो, तो जैसा मैं कह रही हूं, वैसा ही चुपचाप करते जाओ.’’

भूरे ने अपने कपड़े उतार दिए, तो गरिमा ने अपने पिता की ही तरह उसे चूमनाचाटना शुरू कर दिया. फिर पलंग पर ढकेल कर अपने पिता की तरह उस पर सवार हो गई.

भूरे कहां तक खुद पर काबू रखता? वह गरिमा पर उसी तरह टूट पड़ा, जिस तरह समरथ सिंह अपने शिकार पर टूटते थे.

गरिमा ने कोठी के पश्चिमी दरवाजे से भूरे को इस हिदायत के साथ बाहर निकाल दिया कि कल फिर इसी समय कोठी के पश्चिमी दरवाजे पर आ जाए. साथ ही, यह धमकी भी दी कि अगर वह समय पर नहीं आया, तो उसकी शिकायत समरथ सिंह तक पहुंच जाएगी कि उस ने उन की बेटी के साथ जबरदस्ती की है.

भूरे के लिए एक ओर कुआं था, तो दूसरी ओर खाई. उस ने सोचा कि अगर वह गरिमा के कहे मुताबिक दोपहर में कोठी के अंदर गया, तो वह फिर अगले दिन आने को कहेगी और एक न एक दिन यह राज समरथ सिंह पर खुल जाएगा और तब उस की जान पर बन आएगी. मगर वह गरिमा का आदेश नहीं मानेगा, तो वह भूखी शेरनी उसे सजा दिलाने के लिए उस पर झूठा आरोप लगाएगी और उस दशा में भी उसे जान से हाथ धोना पड़ेगा.

मजबूरन भूरे न चाहते हुए भी अगले दिन तय समय पर कोठी के पश्चिमी दरवाजे पर हाजिर हो गया, जहां गरिमा उस का इंतजार करती मिली.

अब यह खेल रोज खेला जाने लगा. 6 महीने बीततेबीतते गरिमा पेट से हो गई. भूरे को जिस दिन इस बात का पता चला. वह रात में ही अपना पूरा परिवार ले कर पिरथीपुर से गायब हो गया.

गरिमा 3-4 महीने से ज्यादा यह राज छिपाए न रख सकी और शक होने पर जब सीता देवी ने उस से कड़ाई से पूछताछ की, तो उस ने अपनी मां के सामने पेट से होना मान लिया. फिर भी उस ने भूरे का नाम नहीं लिया.

सीता देवी ने नौकरानी से समरथ सिंह को बुलवाया और उन्हें गरिमा के पेट से होने की जानकारी दी, तो वे पागल हो उठे और सीता देवी को ही पीटने लगे. जब वे उन्हें पीटपीट कर थक गए, तो गरिमा को आवाज दी.

2-3 बार आवाज देने पर गरिमा डरते हुए समरथ सिंह के सामने आई. उन्होंने रिवाल्वर निकाल कर गरिमा को गोली मार दी.

कुछ देर तक समरथ सिंह बेटी की लाश के पास बैठे रहे, फिर सीता देवी से पानी मांग कर पिया. तभी फायर की आवाज सुन कर उन के तीनों बेटे और लठैत भरोसे दौड़े हुए आए.

समरथ सिंह ने उन्हें शांत रहने का इशारा किया, फिर जेब से रुपए निकाल कर बड़े बेटे को देते हुए कहा, ‘‘जल्दी से जल्दी कफन का इंतजाम करो और 2 लोगों को लकड़ी ले कर नदी किनारे भेजो. खुद भी वहीं पहुंचो.’’

समरथ सिंह के बेटे पिता की बात सुन कर आंसू पोंछते हुए भरोसे के साथ बाहर निकल गए.

एक घंटे के अंदर लाश ले कर वे लोग नदी किनारे पहुंचे. चिता के ऊपर बेटी को लिटा कर समरथ सिंह जैसे ही आग लगाने के लिए बढ़े, तभी वहां पुलिस आ गई और दारोगा ने उन्हें चिता में आग लगाने से रोक दिया.

यह सुनते ही समरथ सिंह गुस्से से आगबबूला हो गए और तकरीबन चीखते हुए बोले, ‘‘तुम अपनी हद से आगे बढ़ रहे हो दारोगा.’’

‘‘नहीं, मैं अपना फर्ज निभा रहा हूं. राधे ने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई है कि आप ने अपनी बेटी की गोली मार कर हत्या कर दी है, इसलिए पोस्टमार्टम कराए बिना लाश को जलाया नहीं जा सकता.’’

समरथ सिंह ने दारोगा के पीछे खड़े राधे को जलती आंखों से देखा. वे कुछ देर गंभीर चिंता में खड़े रहे, फिर रिवाल्वर से अपने सिर में गोली मार ली.

इस घटना को देख कर वहां मौजूद लोग सन्न रह गए, तभी पगली दौड़ती हुई आई और दम तोड़ रहे समरथ सिंह के पास घुटनों के बल बैठ कर ताली बजाते हुए बोली, ‘‘देखो ठाकुर, तेरे जुल्मों की सजा तेरे साथ तेरी औलाद को भी भोगनी पड़ी. खुद ही जला कर अपनी सोने की लंका राख कर ली.’’

जैसेजैसे समरथ सिंह की सांस धीमी पड़ रही थी, वहां मौजूद लोगों में गुलामी से छुटकारा पाने का एहसास तेज होता जा रहा था. Best Story In Hindi

Hindi Family Story: गेहूं, गहने और चक्की – शुभम की मम्मी का गुस्सा

Hindi Family Story: ‘‘शुभम… ओ शुभम,’’ मीता देवी के चीखने का स्वर  कुछ इस तरह का था कि शुभम  सिर से  पांव तक सिहर उठा. वह अचानक यह समझ नहीं सका कि उस से कहां क्या गड़बड़ हो गई. अपनी मां मीता के उग्र स्वभाव से वह क्या, घर और महल्ले तक के लोग परिचित थे. इसलिए शुभम अपनी ओर से कोशिश करता था कि ऐसा कोई काम न करे कि उस की मां को क्रोध आए. फिर भी जानेअनजाने कभी कुछ ऐसा हो ही जाता था कि मां का पारा सातवें आसमान पर पहुंच जाता.

‘‘क्या हुआ, मां,’’ कहता हुआ शुभम तेजी से सीढि़यां फलांगते हुए मां के सामने आ खड़ा हुआ.

‘‘तुम से गेहूं पिसवाने के लिए कहा था, उस का क्या हुआ?’’ मां मीता ने छूटते ही शुभम से पूछा.

‘‘वह तो मैं सुबह ही चक्की पर पिसने को दे आया था.’’

‘‘वही तो मैं पूछ रही हूं कि ऐसी क्या आफत आ गई थी जो तुम सुबहसुबह ही गेहूं पिसने के लिए चक्की पर रख आए?’’ मीता कुछ इस तरह बोली थीं कि शुभम हक्का- बक्का रह गया.

‘‘आप को समझ पाना तो असंभव है, मां. आप ने इतनी जल्दी मचाई कि नूरे की चक्की बंद थी तो मैं 30 किलो गेहूं साइकिल पर रख कर चौराहे तक ले गया. वहां एक नई चक्की खुली है, जहां गेहूं रख कर आया हूं.’’

‘‘सत्यानाश, नूरे की चक्की बंद थी तो गेहूं वापस नहीं ला सकते थे क्या? यों तो 10 बार कहने पर भी तुम्हारे कान पर जूं नहीं रेंगती लेकिन आज इतने आज्ञाकारी बन गए कि फौरन ही हुक्म बजा लाए. अब क्या होगा? मैं तो बरबाद हो गई, लुट गई.’’

‘‘बरबाद आप नहीं मैं हो जाऊंगा, मां. कल मेरी एम.एससी. की प्रतियोगी परीक्षा है और आप यह रोनाधोना ले कर बैठ गई हैं,’’ शुभम को भी गुस्सा आ गया था.

‘‘तुम्हें पता भी है कि तुम ने क्या किया है?’’

‘‘क्या कर दिया, मां! मैं ने आप से कहा था कि कल परीक्षा के बाद गेहूं पिसवा दूंगा. आज काम चला लीजिए तो आप ने इतना शोर मचाया कि मैं अपना सब काम छोड़ कर गेहूं पिसवाने भागा.’’

‘‘गेहूं के कनस्तर में एक पोटली में मेरे 40 तोले के सोने के जेवर रखे थे,’’ यह कह कर मीता विलाप कर उठी थीं.

‘‘क्या कह रही हो, मां? गहने क्या गेहूं के कनस्तर में रखे जाते हैं? घर में 2 स्टील की अलमारी हैं. बैंक में आप का लौकर है और गहने वहां…’’ शुभम के आश्चर्य की सीमा न थी.

‘‘कल गुंजन के विवाह में जाने के लिए गहने बैंक से निकाले थे और चोरों के भय से कनस्तर में छिपा कर रखे थे. तुम नहीं जानते, समय कितना खराब है. काश, आज तुम गेहूं पिसवाने नहीं गए होते…’’ इतना कह मां सिर पर दोहत्थड़ मार कर फूटफूट कर रो पड़ी थीं.

‘‘किसी को घर बैठे 40 तोले सोने के गहने मिल जाएं तो क्यों लौटाने लगा? फिर भी मैं प्रयत्न करता हूं,’’ कहता हुआ शुभम साइकिल ले कर बाहर निकल गया था.

मीता का जोरजोर से दहाडें़ मार कर रोना सुन कर पड़ोसी भी जमा हो गए थे.

हंगामा सुन कर गली में क्रिकेट खेलता उन का छोटा बेटा सत्यम आ गया और कालिज से लौट कर सोई हुई उन की बेटी सत्या भी जाग गई और मां को ढाढ़स बंधाने लगी.

पड़ोसियों ने पूरी कहानी सुन कर शुभम के पिता मुकेश को फोन कर दिया तो वह भी आननफानन में दफ्तर से आ गए और पत्नी को ही पूरे मामले के लिए दोषी ठहराने लगे.

‘‘भूल जाओ गहनों को, कोई मूर्ख ही घर आई लक्ष्मी को लौटाता है. जीवन भर की गाढ़ी कमाई खर्च कर गहने बनवाए थे. सोचा था बच्चों के काम आएंगे. सारे गहने चले गए चक्की वाले के यहां. वह तो घी के दीपक जला रहा होगा,’’ मुकेशजी अपनी भड़ास निकाल रहे थे.

‘‘यों हिम्मत नहीं हारते, मुकेश बाबू, शुभम आता ही होगा. सब ठीक हो जाएगा,’’ पड़ोसी मुकुल नाथ बोले थे.

शुभम की प्रतीक्षा में मानो समय ठहर सा गया था. आंगन के बीचोंबीच आंखें मूंदे कराहती हुई मीताजी अर्द्ध- चेतना में पड़ी थीं और उन के चारों ओर जमा महिलाएं अपनेअपने ढंग से उन्हें ढाढ़स बंधा रही थीं. साथ ही विस्तार से इस बात की चर्चा भी हो रही थी कि कैसे जाने वाली चीज के पैर लग जाते हैं.

यह चर्चा कुछ और देर चलती पर तभी शुभम की साइकिल दरवाजे पर आ कर रुकी और वहां मौजूद लोगों में सर- सराहट सी फैल गई. बिसूरती हुई मीताजी उठ बैठी थीं. कई जोड़ी निगाहें शुभम के चेहरे पर टिकी थीं. वह चुपचाप साइकिल खड़ी कर के घर की सीढि़यां चढ़ने लगाथा.

‘‘कहां जा रहे हो, शुभम? मैं कब से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं,’’ आखिर, मुकेश बाबू का धैर्य जवाब दे गया तो वह बोल पडे़.

‘‘मेरी प्रतीक्षा…क्यों?’’ शुभम बोला था.

‘‘तुम अपनी मां के गहने लेने गए थे न?’’

‘‘हां, पापा, मैं चक्की तक गया था पर वहां ताला लगा हुआ था.’’

‘‘देखा, मैं कहती थी न कि मुआ चक्की वाला मेरे गहने ले कर भाग गया होगा. अब क्या होगा?’’ और फिर उन्होंने इस प्रकार बिलखना शुरू किया कि वहां मौजूद औरतों की आंखों से भी जलधारा बह चली.

उधर आसपड़ोस के पुरुषों ने मुकेश बाबू को घेर लिया और उन्हेंअनेक प्रकार की सलाह देने लगे.

‘‘मेरी मानो तो तुम्हें पुलिस को सूचित कर देना चाहिए. जब पुलिस के डंडे उस पर पडें़गे तो वह सब उगल देगा,’’ एक पड़ोसी ने सलाह दी थी.

‘‘उगलने को वह कौन सा मेरे घर चोरी करने आया था. अब कौन सा मुंह ले कर मैं पुलिस के पास जाऊं? वे उपहास ही करेंगे कि जब गहनों की पोटली खुद ही चक्की वाले के हवाले कर दी तो क्या आशा ले कर आए हो पुलिस के पास?’’ मुकेशजी क्रोध में बोले थे.

‘‘देखा, मैं कहती थी न…’’ मीता देवी ने अभी इतना ही कहा था कि मुकेशजी ने झल्लाते हुए कहा, ‘‘अरे, अब कहने को क्या रह गया है? तुम यह रोनाधोना बंद करो और अपनेअपने कामधंधे से लगो. और आप लोग भी अपने घरों को जाइए, व्यर्थ ही हम लोगों ने रात के 10 बजे आप सब को परेशान किया.’’

‘‘कैसी बातें करते हैं, मुकेश बाबू, दुखतकलीफ में मित्र व पड़ोसी काम नहीं आएंगे तो कौन आएगा,’’ उन के पड़ोसी नितिन राय बोले तो वह दांत पीस कर रह गए थे.

मुकेश बाबू अच्छी तरह जानते थे कि अपनेअपने घर पहुंच कर सब उन की पत्नी की मूर्खता पर ठहाके लगाएंगे. इसीलिए वह जल्दी से जल्दी पड़ोसियों से छुटकारा पा कर एकांत चाहते थे. पर पड़ोसी थे कि जाने का नाम ही नहीं ले रहे थे. तभी उन्होंने शुभम को आवाज लगाई और वह डरासहमा उन के सामने आ खड़ा हुआ था.

‘‘गेहूं ले जाने से पहले तुम कनस्तर देख नहीं सकते थे? पर तुम्हारे पास जितनी अक्ल है उतना ही तो काम करोगे.’’

‘‘मुझे क्या पता था कि गेहूं पिसाने के कनस्तर में गहने भी रखे जा सकते हैं. मैं ने तो गेहूं तुलवाए भी थे. मुझे तो कोई पोटली नजर नहीं आई.’’

‘‘नजर आती भी कैसे? तुम्हारा ध्यान तो कहीं और ही रहता है.’’

‘‘पापा, आप तो बेवजह मुझ पर गुस्सा कर रहे हैं. भला, गेहूं तुलवाते समय कहां ध्यान जा सकता है,’’ शुभम भी तीखे स्वर में बोला था.

‘‘देखा आप सब ने? यह है आज की संतान. एक तो इतना नुकसान कर दिया उस की चिंता नहीं है, ऊपर से अपनी मां को ही दोषी ठहरा रहा है,’’ मुकेश बाबू अचानक उग्र रूप धारण कर कुछ इस प्रकार चीखे थे कि शुभम सकते में आ गया और चुपचाप एक कोने में बैठ कर रोने लगा.

‘‘चक्की बंद है. आधी रात होने को आई. इस समय चक्की वाले का पता करना भी कठिन है,’’ एक पड़ोसी ने विचार जाहिर किए थे.

‘‘मैं भी यही सोच रहा हूं कि आप लोग भी चल कर विश्राम कीजिए. कब तक इस ठंड में यहां बैठे रहेंगे,’’ मुकेश बाबू ने सलाह दी थी.

‘‘ठीक है, फिर हम सब चलते हैं,’’ एकएक कर सभी पड़ोसी उठ खडे़ हुए थे.

‘‘आप तनिक भी चिंता मत कीजिए, मुकेश बाबू,’’ जातेजाते भी नितिन राय बोले थे, ‘‘कल दुकान खुलने का समय होते ही हमसब आप के साथ चलेंगे और कुछ दूरी पर आड़ में खडे़ हो जाएंगे. पहले शुभम को भेज कर देखेंगे. उस ने गहने देने में कुछ आनाकानी की तो पुलिस की सहायता लेंगे.’’

मुकेश बाबू को छोटा बेटा और बेटी सहारा दे कर अंदर के कमरे में ले गए थे. शुभम का तो उन के सामने जाने का साहस ही नहीं हो रहा था.

‘‘आज तो लगता है भूखे ही सोना पड़ेगा, शुभम भैया,’’ सत्यम ने कहा तो शुभम को भी याद आया कि उस ने दोपहर के भोजन के बाद कुछ भी नहीं खाया था.

‘‘भूख तो मुझे भी लग रही है. ऊपर से कल मेरी प्रतियोगी परीक्षा भी है,’’ शुभम ने हां में हां मिलाई थी.

शुभम इस ऊहापोह के बीच भी खुद को शांत कर कुछ पढ़ने का प्रयत्न कर रहा था. तभी सत्या ने कुछ खाद्य पदार्थों के साथ उस के कमरे में प्रवेश किया.

‘‘भैया, जो कुछ फ्रिज में मिला, मैं ले आई हूं,’’ सत्या धीमे स्वर में बोली थी.

शुभम ने प्लेट में नजर डाली तो ब्रेड, मक्खन और कुछ फल रखे थे.

‘‘यह सबकुछ आज खा लिया तो कल नाश्ते का क्या होगा? मां बहुत डांटेंगी,’’ शुभम बोला था.

‘‘भैया, तुम सब से बडे़ हो पर सब से अधिक डरपोक. अरे, आज तो खा लो, कल डांट खा लेंगे,’’ सत्यम हंस कर ब्रेड पर मक्खन लगाते हुए बोला था.

सत्यम और सत्या को खाते देख शुभम को भी लगा कि बिना कुछ खाए वह पढ़ने में ध्यान नहीं लगा सकेगा.

‘‘यह हुई न बात,’’ शुभम को खाते देख सत्यम बोला, ‘‘भैया, आप कुछ बोलते क्यों नहीं. गेहूं में गहने मां ने रखे थे पर मां और पापा आप को ही दोष दिए जा रहे हैं.’’

‘‘तुम नहीं समझोगे. सब से बड़ा होने पर सबकुछ सहना पड़ता है. हर बात में पलट कर वार नहीं कर सकते,’’ शुभम अपने विशेष अंदाज में बोला था.

‘‘अच्छा हुआ जो मैं सब से बड़ा न हुआ,’’ सत्यम मुसकराया था.

‘‘नहीं तो क्या होता?’’ शुभम ने पूछा तो सत्यम बोला, ‘‘अभी तो भैया, मैं खुद जानने का प्रयत्न कर रहा हूं. पता चलते ही आप को सूचित करूंगा.’’

खापी कर सत्यम, सत्या और शुभम सो गए. जब नींद खुली तो पौ फट रही थी. शुभम केवल यही कामना कर रहा था कि गहनों का झमेला सुलझ जाए ताकि वह समय पर परीक्षा भवन तक पहुंचने में सफल हो सके अन्यथा न जाने क्या होगा.

9 बजते ही पड़ोसी जमा होने लगे थे. सलाह करने के बाद सब चक्की की ओर चल पड़े. चक्की अब भी बंद थी. सभी चक्की की उलट दिशा में फुटपाथ पर खडे़ हो गए और उन्होंने शुभम को चक्की के सामने बनी सीढि़यों पर जा बैठने का आदेश दिया.

थोड़ी ही देर में चक्की वाला आ पहुंचा था.

‘‘क्या हुआ? बडे़ सवेरे आ गए. घर में आटा नहीं था क्या?’’ उस ने आते ही शुभम से पूछा था.

‘‘मुझे परीक्षा देने के लिए जाना था. मां ने कहा आटा ले आओ. इसीलिए जल्दी आना पड़ा.’’

‘‘बस, यही बात थी क्या?’’

‘‘नहीं, सच तो यह है कि मां ने 40 तोले गहनों की पोटली गेहूं में छिपा कर रखी थी. मुझे पता नहीं था. गलती से मैं पोटली सहित कनस्तर का गेहूं आप की चक्की पर रख गया था.’’

‘‘कौनकौन से गहने थे?’’ चक्की वाले ने प्रश्न किया.

‘‘वह तो मुझे पता नहीं.’’

‘‘तो बेटे, फिर अपनी मां के साथ आना चाहिए था न?’’

दोनों के बीच बातचीत होते देख कर मुकेश बाबू और पड़ोसी खुद को रोक नहीं सके और सड़क पार कर चक्की के सामने आ खडे़ हुए थे.

‘‘पोटली मेरे पास है. उसे खोल कर देखते ही मेरे तो होश उड़ गए थे. गरीब आदमी हूं. दूसरे की अमानत की रक्षा कर पाऊंगा या नहीं, इसी तनाव में पूरी रात कटी. जाओ, अपनी मां को बुला लाओ. वह अपने गहने सहेज लें तो मैं चैन की सांस ले सकूं,’’ चक्की वाला बोला था.

उस की यह बात सुन कर मुकेश बाबू तथा अन्य सभी हक्केबक्के रह गए थे. वे सब तो सीधी उंगली से घी न निकलने की स्थिति में उंगली टेढ़ी करने का मन बना कर आए थे पर यहां तो मामला ही दूसरा था. कैसा मूर्ख व्यक्ति था, घर आई लक्ष्मी लौटा रहा था.

शीघ्र ही शुभम अपनी मां मीता को ले कर आ गया. उन्होंने पोटली में बंधे गहने पहचान कर ले लिए थे. बहुत जोश में वहां पहुंचे लोग उस की ईमानदारी का प्रतिदान देने की युक्ति सोच रहे थे. मुकेश बाबू ने थानापुलिस से निबटने के लिए जेब में जो 5 हजार रुपए रखे थे वह उस के सामने रख दिए.

‘‘यह क्या है, बाबूजी?’’ चक्की वाले ने प्रश्न किया था.

‘‘मैं बहुत साधारण व्यक्ति हूं. तुम्हारे उपकार का प्रतिदान तो नहीं चुका सकता पर यह छोटी सी तुच्छ भेंट स्वीकार करो,’’ मुकेश बाबू का स्वर भर्रा गया था.

‘‘आप लोगों के चेहरों पर आए राहत और संतोष के भाव देख कर मुझे सबकुछ मिल गया. आप की अमानत आप को लौटा कर कोई उपकार नहीं किया है मैं ने.’’

लाख कहने पर भी चक्की वाले ने कुछ भी लेना स्वीकार नहीं किया था. मुकेश बाबू और अन्य पड़ोसियों को अचानक उस का कद बहुत ऊंचा लग रहा था और अपना बहुत बौना, जिस के बारे में बिना कुछ जाने वे कल से अनापशनाप आरोप लगाते रहे थे. उसे किसी प्रकार कुछ दे कर वे शायद अपने अपराधबोध को कम करना चाह रहे थे. पर ईमानदारी और बेईमानी के दो पाटों के बीच का असमंजस बड़ा विचित्र था जो गहने मिलने पर भी उन्हें आनंदित नहीं होने दे रहा था. Hindi Family Story

Story In Hindi: नारद मुनि और नेताजी

Story In Hindi: नेताजी जब से केंद्र में मंत्री बने हैं, मदमस्त हो चले हैं. कहीं लाठियां चलवा रहे हैं, तो कहीं गोलियां. आम आदमी उन की नजर में चींटी, मच्छर सी बखत रखता है. जब देश में त्राहित्राहि मची तो देवलोक कंपायमान होने लगा. त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश के आसन नेताजी के अन्याय, शोषण, अत्याचार के ताप में हिलनेडोलने लगे. त्रिदेव की भृकुटि तनी.

अंततः तीनों ने आर्यवर्त के कल्याण के लिए रपट मंगाने देवश्री नारद मुनि का स्मरण किया. तत्क्षण ‘नारायण… नारायण’ कहते हुए मुनिवर नारद प्रगट हुए. हाथों में वीणा थी. ब्रह्मदेव ने कहा, ‘सुपुत्र, आ गए.’

नारद मुनि ने त्रिदेव को प्रणाम किया और कहा, ‘भगवन, आप के आसन डोल रहे हैं. यह स्थिति आ गई है. ओफ… अब तीनों लोकों के स्वामी भी सुरक्षित नहीं, तो भला इस सृष्टि का कौन मालिक होगा?’

ब्रह्मदेव के चेहरे पर नाराजगी उभर आई, ‘पुत्र, मर्यादा भंग न करो.’

‘नारायण… नारायण… क्षमा, प्रभु…’ नारद मुनि मुसकराए.

‘तुम्हारी मुसकराहट जहर की मानिंद जान पड़ती है. पर, आज तुम्हें एक काम करना है,’ ब्रह्मदेव ने शांत भाव से कहा, ‘वत्स, पृथ्वीलोक में एक नेता के दुष्कर्म के फलस्वरूप हमारे आसन डोलने लगे हैं. तुम्हें आज ही वहां जाना है.’

‘नारायण, नारायण…’ नारद मुनि ने हाथ जोड़ कर त्रिदेव को नमन कर गंतव्य को प्रस्थान किया. नेताजी  शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रहे प्रदर्शनकारियों को घंटाघर के पास पिटवा रहे थे, पुलिस गोलियां चला रही थी. इस दौरान देवश्री नारद प्रकट हुए. देखा, लोगों के चेहरे पर गुस्सा है, पुलिस लाठियों से ऐसे पीट रही है मानो धोबी अपने गधे को पीट रहा हो.

नेताजी कलक्ट्रेट पुलिस अधीक्षक सहित अपने समर्थकों के साथ एक पेड़ की छांव में बैठे ठहाके लगा रहे हैं, तभी नारदमुनि नेताजी के समक्ष अवतरित हुए और चिरपरिचित शैली में ‘नारायणनारायण’ उन के श्रीमुख से नि:स्तृत हुआ. नारदमुनि को देखते ही नेताजी चौंके. देवश्री ने कहा, ‘नेताजी, मैं नारदमुनि.’

नेताजी उठ खड़े हुए, ‘मुनिवर, मेरा अहोभाग्य.’

नारदमुनि हाथ मटकाते हुए बोले, ‘अहोभाग्य कहो या दुर्भाग्य, हमें तुम्हारे कामकाज की समीक्षा के लिए ब्रह्म, शिव और विष्णु द्वारा भेजा गया है.

नेताजी गंभीर हो कर बोले, ‘मुनिवर, हालांकि यह चिंता की बात है. मगर, कोई बात नहीं. हम ने जब यहां कई जांच आयोग और गुप्तचर एजेंसियों की जांच का सामना करने में सफलता पाई है, तो फिर आप की जांच का भी सामना करेंगे.’

नारदमुनि कहने लगे, ‘नारायणनारायण इतना कौन्फिडेंस…? तुम्हें पता है, तुम्हारी प्राणीमात्र को सतानेकुचलने की नीति के कारण देवलोक भी कंपायमान हो चला है.’

नेताजी सोचते हुए बोले, ‘अच्छा, अर्थात जैसेजैसे हम अपनी स्थिति मजबूत करते जा रहे हैं, देवलोक की भी हमारी ताकत के आगे चूलें हिलने लगी हैं मुनिवर. यह आप ने बड़ी अच्छी खबर दी.’

नारदमुनि बोले, ‘नारायणनारायण नेताजी, तुम बड़े अजीब प्राणी हो. हर चीज में अपना फायदा ढूंढ़ने लगते हो. देवलोक डोल रहा है तुम्हारे अत्याचार से और तुम…’

नेताजी कहने लगे, ‘मुनिवर, आप का देवलोक बड़ा सेंसेटिव है. न तो आप लोगों को किसी का वोट चाहिए, ना ही समर्थन, फिर भी कुरसी हिलने लगी है. देवश्री, यहां तो हम लोग 5 साल के लिए जनता के वोट पर कुरसी, पद, प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं. तब भी बेफिक्र रहते हैं.

‘ऐसे में हम आप लोगों से ज्यादा प्रतिभावान हैं. हमें पता है कि कब, कहां और कैसे जनता को रिमोट करना है.’

नारदमुनि बोले, ‘नारायणनारायण, तुम हमें सिखाओगे…? हम्म…? तुम्हारी नब्ज हमारे हाथ में है, यह भूल गए?’

नेताजी बोले, ‘नहींनहीं मुनिवर, ऐसा कैसे हो सकता है? मैं अच्छी तरह जानता हूं कि आप मेरी कौन्फिडेंस रिपोर्ट तैयार कर त्रिदेव के समक्ष पेश करेंगे.’

नारदमुनि कहने लगे, ‘वाह, वाह, तुम तो वाकई इंटेलिजेंट नेता हो.’

नेताजी बोले, ‘मुनिवर, मैं यह भी जानता हूं कि आप रिपोर्ट पक्की बनाएंगे. अगर इंद्रदेव आते तो कुछ मेनका, रंभा से उन का मन बहला कर रिपोर्ट चेंज की जा सकती थी, मगर आप तो…’

नारदमुनि बोले, ‘बिलकुल रिपोर्ट सौ फीसदी सच्ची बनेगी.’

नेताजी बोले, ‘नारायणनारायण, तो बनाओ. ले लो बयान. एकएक आंदोलनकारी से.’

नारद मुनि के समक्ष एकएक सत्याग्रही आता गया. बयान दर्ज होते गए. नेताजी मुसकराते रहे. जिलाधीश, पुलिस कप्तान आपस में ठिठोली करते रहे. अधीनस्थ कर्मचारी से सुश्रुवा में लगे रहे. अंततः  नारदमुनि की रिपोर्ट पूरी हुई.

मुनिवर देवलोक को प्रस्थान करने की सोचने लगे. नेताजी ने हाथ जोड़ कर उन की ओर देखा. नारदमुनि की आंखें झुक गईं. रिपोर्ट में सब ठीकठाक है, फिर देवलोक कंपायमान क्यों है, समझ नहीं आता.

यह सुन उपस्थित शासनप्रशासन ‘हो… हो’ कर हंस रहा था. Story In Hindi

Long Hindi Story: सुबह की किरण – दो सहेलियों का प्यार

Long Hindi Story: ‘‘आ ओ, तुम यहां बैठ जाओ,’’ समीर ने प्रीति को अपने बगल में खड़ा देखा तो अपनी सीट से उठते हुए कहा.

‘‘नहीं, तुम बैठो, मुझे अगले स्टैंड पर उतरना है.’’

‘‘तुम बैठो, तुम्हें खड़ा होने में तकलीफ हो रही है,’’ उस ने फिर आग्रह किया तो प्रीति उस की सीट पर बैठ गई.

बस में खचाखच भीड़ थी. तिल भर भी पैर रखने की जगह नहीं थी. प्रीति का एक पैर जन्मजात खराब था. इसलिए थोड़ा लंगड़ा कर चलती थी. नीलम ठीक उस के पीछे खड़ी थी. मुसकराती हुई बोली, ‘‘चलो तुम्हारी तकलीफ समझाने वाला कोई तो मिला.’’

अगले स्टैंड पर दोनों सहेलियां उतर गईं. समीर भी उन के पीछेपीछे उतरा.

‘‘तुम्हारी सहेली के साथ मैं ने अन्याय किया,’’ वह प्रीति को देखते हुए मुसकरा कर बोला, ‘‘लेकिन क्या करूं, सीट एक थी और तुम दो.’’

‘‘कोई बात नहीं, अगली बार तुम मुझे लिफ्ट दे देना,’’ नीलम भी मुसकराते हुए बोली तो समीर ने पूछा, ‘‘वैसे, तुम दोनों यहां कहां रहती हो?’’

‘‘बगल में ही, गौरव गर्ल्स होस्टल में,’’ नीलम ने बताया.

‘‘अच्छा है, अब तो हमारा इसी स्टैंड से कालेज आनाजाना होता रहेगा. मैं भी थोड़ी दूर पर ही रहता हूं. मेरे बाबूजी एक कंपनी में जौब करते हैं और यहीं उन्होंने एक अपार्टमैंट खरीदा हुआ है.’’ समीर, प्रीति और नीलम एक ही कालेज में थे. आज कालेज में उन का पहला दिन था.

प्रीति आगरा की रहने वाली थी और नीलम लखनऊ की. दोनों गौरव गर्ल्स होस्टल में एक रूम में रहती थीं. प्रीति के पिताजी एक अच्छे ओहदे वाली सर्विस में थे, किंतु असमय उन का देहांत हो गया था जिस के कारण उस की मां को अनुकंपा के आधार पर उसी औफिस में क्लर्क की नौकरी मिल गई थी.

प्रीति के बाबूजी बहुत पहले अपना गांव छोड़ कर आगरा में आ गए थे और यहीं उन्होंने एक छोटा सा मकान बना लिया था. गांव की जमीन और मकान उन्होंने बेच दिया था. प्रीति की मां चाहती थीं कि वह आईएएस की तैयारी करे ताकि एक ऊंची पोस्ट पर जा कर अपनी विकलांगता के दर्द को भुला सके, इसलिए उन्होंने उसे दिल्ली में एमए करने के लिए भेजा था. प्रीति को शुरू से ही साइकोलौजी में गहरी रुचि थी और बीए में भी उस का यह फेवरेट सब्जैक्ट था इसलिए उस ने इसी सब्जैक्ट से एमए करने का विचार किया. प्रीति को शुरू से ही कुछ सीखने और अधिकाधिक ज्ञानार्जन करने की इच्छा थी. वह साइकोलौजी में शोध कार्य करना चाहती थी और भविष्य में किसी कालेज में लैक्चरर बनने की ख्वाहिश पाले हुए थी.

नीलम एक बड़े बिजनैसमैन की बेटी थी. उस के पिताजी चाहते थे कि उन की बेटी दिल्ली के किसी कालेज से एमए कर ले और उस की सोसायटी मौडर्न हो जाए क्योंकि आजकल बिजनैसमैन के लड़के भी एक पढ़ीलिखी और मौडर्न लड़की को शादी के लिए प्रेफर करते थे. इसलिए उस ने दिल्ली के इसी कालेज में ऐडमिशन ले लिया था और ईजी सब्जैक्ट होने के कारण साइकोलौजी से एमए करना चाहती थी. समीर के पिताजी उसे आईएएस बनाना चाहते थे और समीर भी इस के लिए इच्छुक था, इसलिए वह भी साइकोलौजी से एमए करने के लिए कालेज में ऐडमिशन लिए हुए था.

प्रीति एक साधारण परिवार की थी और स्वभाव से भी बहुत ही सरल, इसलिए उस की वेशभूषा और पोशाकें भी साधारण थीं. पर वह सुंदर व स्मार्ट थी. उसे बनावशृंगार और मेकअप पसंद नहीं था किंतु दूसरी ओर नीलम सुंदर और छरहरे बदन की गोरी लड़की थी और अपने शरीर की सुंदरता पर उस का सब से ज्यादा ध्यान था. वह मेकअप करती और प्रतिदिन नईनई ड्रैस पहनती. कालेज में जहां प्रीति अपनी किताबों में उल?ा रहती वहीं नीलम अपनी सहेलियों के साथ गपें मारती और मस्ती करती.

एक दिन प्रीति लंच के समय कालेज की लाइब्रेरी में कुछ किताबों से कुछ नोट्स तैयार कर रही थी. तभी नीलम उस के पास आई और बोली, ‘‘अरे पढ़ाकू, यह लंच का समय है और तुम किताबों से माथापच्ची कर रही हो जैसे रिसर्च कर रही हो. चलो चल कर कैफेटेरिया में चाय पीते हैं.’’

‘‘तुम जाओ, मैं थोड़ी देर बाद आऊंगी,’’ प्रीति ने कहा तो नीलम चली गई.

तभी उस ने महसूस किया कि उस के पीछे कोई खड़ा है. उस ने पलट कर पीछे की ओर देखा तो समीर था.

बस में मिलने के बाद समीर आज पहली बार उस के पास आ कर खड़ा हुआ था. क्लास में कभीकभी उस की ओर देख लिया करता था, किंतु बात नहीं करता था.

‘‘प्रीति सभी लोग कैफेटेरिया में चाय पी रहे हैं और तुम यहां बैठ कर नोट्स बना रही हो? अभी तो परीक्षा होने में काफी देर है. चलो, चाय पीते हैं.’’

‘‘बाद में आऊंगी समीर, थोड़े से नोट्स बनाने बाकी हैं, पूरा कर लेती हूं.’’

‘‘अब बंद भी करो,’’ समीर ने उस की नोटबुक को समेटते हुए कहा.

‘‘अच्छा चलो,’’ प्रीति भी किताबों को नोटबुक के साथ हाथ में उठाते हुए उठ खड़ी हुई.

जब समीर और प्रीति कैफेटेरिया में पहुंचे तो वहां पहले से ही नीलम अपनी कुछ क्लासमेट्स के साथ बैठ कर चाय पी रही थी. अगलबगल और भी कई लड़केलड़कियां थीं.

‘‘आ गई पढ़ाकू,’’ सविता ने उस को देखते हुए चुटकी ली.

‘‘मैं ने कहा, तो मेरे साथ नहीं आई. अब समीर के एक बार कहने पर आ गई. हां भई, उस दिन बस में उठ कर अपनी सीट जो तुम्हें औफर की थी. अब उस का कुछ खयाल तो रखना ही पड़ेगा न.’’ नीलम की बात सुन कर उस की सहेलियां हंसने लगीं.

समीर कुछ झोंप सा गया. बात आईगई हो गई किंतु इस के बाद प्रीति और समीर अकसर आपस में मिलते. प्रीति को साइकोलौजी के कई टौपिक्स पर बहुत ही अच्छी पकड़ थी. उस ने साइकोलौजी में कई जानेमाने लेखकों की पुस्तकों का अध्ययन किया था. जब कभी क्लास में कोई लैक्चरर आता तो उस विषय के ऐसे गंभीर प्रश्नों को उठाती कि सभी उस की ओर ताकने लगते.

समीर को उस के पढ़ने में काफी मदद मिलती. समय के साथसाथ उन के बीच आपसी लगाव बढ़ रहा था. उन के बीच का गहराता संबंध कालेज में चर्चा का विषय था. कुछ साथी उस पर चुटकियां लेने से नहीं चूकते.

‘लंगड़ी ने समीर को अपने रूपजाल में फंसा लिया है,’ कोई कहता तो कोई उन दोनों की ओर इशारा करते हुए अपने मित्र के कान में कुछ फुसफुसाता, जिस का एक ही मतलब होता था कि उन दोनों के बीच कुछ पक रहा है. अब वह किसकिस को जवाब देता. इसलिए चुप रहता.

वैसे भी समीर अपने कैरियर के प्रति सीरियस था. उसे आईएएस की तैयारी करनी थी जिस में साइकोलौजी को मुख्य विषय रखना था. वह इस विषय के बारे में अधिकाधिक जानकारी प्राप्त कर लेना चाहता था. उधर प्रीति को इसी विषय के किसी टौपिक पर रिसर्च करना था. इसलिए दोनों के अपनेअपने इंटरैस्ट थे. किंतु लगातार एकदूसरे के साथ संपर्क में रहने के कारण उन के अंदर प्रेम का भी अंकुरण होने लगा था जिस को दोनों महसूस तो करते किंतु इस की आपस में कभी चर्चा नहीं करते.

ऐसे ही कब 2 वर्ष गुजर गए उन्हें पता ही नहीं चला. दोनों ने एमए फर्स्ट डिवीजन से पास कर लिया. फिर समीर ने आईएएस की तैयारी के लिए दिल्ली में ही एक कोचिंग जौइन कर ली और प्रीति एक प्रोफैसर के अंडर पीएचडी करने लगी.

नीलम ने किसी तरह एमए किया और घर चली गई. उस के पिता ने उस की शादी एक बिजनैसमैन से कर दी. उस के निमंत्रण पर प्रीति उस की शादी में गई. उस ने समीर को भी निमंत्रण दिया था लेकिन किसी कारणवश समीर नहीं पहुंच पाया. नीलम ने प्रीति से वादा किया था कि भले ही वह उस से दूर है लेकिन जब कभी वह याद करेगी वह जरूर उस से मिलेगी. बिछुड़ते वक्त दोनों सहेलियां खूब रोईं.

इधर समीर और प्रीति के बीच दूरी बढ़ी तो लगाव भी कम होने लगा. उन के बीच कुछ महीनों तक तो फोन पर संपर्क होता रहा, फिर धीरेधीरे वह समाप्त हो गया. यही दुनियादारी है. कभी समीर जब तक उस से एक बार नहीं मिल लेता उसे चैन न मिलता, अब उसे उस की याद ही नहीं रही. प्रीति ने भी उस से बात करनी बंद कर दी.

जीवन किसी का भी हर वक्त एकजैसा कहां रहता है. यह कोई जानता भी तो नहीं कि कब किस के साथ क्या घट जाए. प्रीति अभी दिल्ली में ही थी कि एक दिन सुबह सुबह ही उसे खबर मिली कि उस की मां को हार्टअटैक आया है और वह अस्पताल में भरती है. सुनते ही वह आगरा के लिए भागी किंतु वहां पहुंचने पर मालूम हुआ कि उस की मां अब दुनिया में नहीं रहीं.

प्रीति पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. वह फफक कर रोने लगी. अब उस का एकमात्र सहारा मां भी उसे छोड़ गई थीं. अस्पताल में वह मां के शव को पकड़ कर रो रही थी. उस को सांत्वना देने वाला कोई नहीं था. उस की मां के औफिस वाले आए हुए थे. उन लोगों ने कहा, ‘‘बेटी, अब अपने को संभाल…यह समय रोने का नहीं है. उठो, अब मां का दाहसंस्कार करने की सोचो…अब आग भी तुम्हें ही देनी है.’’

इस दुखभरी घड़ी में अपनों की कितनी याद आती है. उस ने समीर को फोन लगाया लेकिन उस का फोन तो डैड था. शायद उस ने नंबर बदल लिया था. अंतिम बार जब उस से भेंट हुई थी तो कहा था, अब दूसरा सिम लेगा. हारथक कर उस ने नीलम को याद किया. नीलम से उस की शादी में अंतिम बार भेंट हुई थी. वैसे भी उस से कभीकभी बातें होती रहती थीं. उस के हस्बैंड की प्रयागराज में एक बड़ी कपड़े की दुकान थी. वह खुले विचारवाला युवक था, इसलिए नीलम को कहीं आनेजाने में रोक नहीं थी.

नीलम खबर सुनते ही आगरा के लिए अपनी गाड़ी से चल पड़ी. प्रीति के जिम्मे अभी काफी काम थे. अस्पताल का बिल चुकाना, मां का दाहसंस्कार क्रिया करना और अकेले पड़े घर को संभालना. एक युवती जिस को दुनियादारी का भी कोई ज्ञान न हो और जिस की जिंदगी मां पिता की छत्रछाया में बीती हो, व जिस को घर संभालने का कोई व्यावहारिक ज्ञान न हो, अचानक इस तरह की विपत्ति पड़ने पर क्या स्थिति हो सकती है, यह तो वही समझा सकती है जिस के सिर पर यह अचानक बोझ आ पड़ा हो.

इस स्थिति में पड़ोसी भी बहुत काम नहीं आते सिवा सांत्वना के कुछ शब्द बोल देने के. और जिस का कोई अपना न हो उस के लिए तो यह क्षण बड़े ही धैर्य रखने और आत्मबल बनाए रखने का होता है और वह भी तब जब कोई अपना बहुत ही करीबी उसे छोड़ कर चला गया हो. सब से बड़़ी दिक्कत यह थी कि उस के पास पैसे नहीं थे और मां के बैंक अकाउंट का उस के पास कोई लेखाजोखा न था. पिछले महीने मां ने उस के खाते में जो पैसा ट्रांसफर किया था वह अब तक खर्च हो चुका था.

नीलम से वह कुछ मांगना तो न चाहती थी किंतु उस के पास इस के सिवा कोई रास्ता भी नहीं बचा था, इसलिए उस ने उस से कुछ मदद करने के लिए कहा. नीलम ने चलते वक्त चैकबुक और अपना डैबिट कार्ड भी पास में रख लिया. नीलम ने गांव के अपने सहोदर चाचाजी को बुला लिया जिन्होंने प्रीतिकी मां के दाहसंस्कार करवाने में बहुत मदद की. नीलम ने अस्पताल के सारे बिल भर दिए और मां के दाहसंस्कार व पारंपरिक विधि में होने वाले दूसरे आवश्यक खर्च को वहन किया.

प्रीति दकियानूसी विचारों वाली युवती नहीं थी, इसलिए उस ने विद्युत शवदाह द्वारा अपनी मां का दाहसंस्कार किया और अन्य पारंपरिक क्रियाएं भी बहुत सादे ढंग से संपन्न कीं. जब तक प्रीति सारी क्रियाओं से निबट नहीं गई तब तक नीलम उस के साथ रही.

परिस्थितियां चाहे जितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों मनुष्य को उस से तो बाहर निकलना ही पड़ता है और प्रीति भी इस से निकल तो गई किंतु वह जिस खालीपन का एहसास कर रही थी उसे भरना बहुत ही मुश्किल था.

कुछ समय बाद नीलम प्रयागराज लौट गई और प्रीति अपने मकान को एक विश्वस्त आदमी को किराए पर दे कर अपना रिसर्च वाला काम पूरा करने के लिए दिल्ली लौट आई. उसे पता चला कि उस की मां ने अपने नाम से एक इंश्योरैंस भी कराया था जिस का अच्छाखासा पैसा नौमिनी होने के कारण उसे मिल गया.

मां के बैंक अकाउंट में भी काफी पैसे थे, इसलिए उस को अपने रिसर्च के काम में कोई दिक्कत न आई. उस ने नीलम का सारा पैसा लौटा दिया. समय बीतता गया और उस के साथसाथ प्रीति भी पहले से ज्यादा सम?ादार व परिपक्व होती गई. उसे आगरा के ही एक कालेज में लैक्चरर की नौकरी मिल गई.

इस दुनिया में कहां किसी को किसी से मतलब होता है. वह अकेली थी. समीर जो कभी उस के दिल के करीब आ चुका था उस से भी उस का संपर्क टूट गया था. नीलम अपने घर चली गई थी जिस से कभीकभी फोन पर बातचीत होती रहती थी.

लड़कियों की शादी में तो वैसे ही काफी दिक्कतें होती हैं और उस का तो एक पैर भी खराब था. और उस की शादी के बारे में सोचने वाला भी कोई नहीं था. जो लोग उस के संपर्क में आते थे, वे उस की सुंदरता से आकर्षित हो कर आते थे न कि उस का जीवनसाथी बनने के लिए. इसलिए ऐसे लोगों से वह हमेशा ही अपने को दूर रखती थी. अब तो उस की जिंदगी का एक ही मकसद था घर से कालेज जाना, वहां मनोयोग से छात्रों को पढ़ाना और शाम को घर लौट कर मनोविज्ञान की पुस्तकों का गहरा अध्ययन करना.

इधर, वह मनोविज्ञान पर एक किताब लिख रही थी जिस से उस का खालीपन कट जाता था. कालेज के उस के सहकर्मी पढ़ाने में कम कालेज की आपसी राजनीति में ज्यादा इंटरैस्ट लेते थे और उन की इन बेवजह की चर्चाओं से वह अपने को हमेशा ही दूर रखती थी, इसलिए उन लोगों से भी उस का ज्यादा संबंध नहीं था.

किंतु कालेज के प्रिंसिपल उस को बहुत सम्मान देते थे क्योंकि उन की निगाहों में उसे इतनी कम उम्र में काफी अच्छी जानकारी थी, इसलिए वे उस की हर संभव मदद भी करते थे. कालेज के छात्र भी उस की कक्षाओं को कभी भी नहीं छोड़ते थे क्योंकि उस से अच्छा लैक्चर देने वाला कालेज में कोई अन्य लैक्चरर नहीं था.

एक दिन सुबह उस ने अखबार में देखा कि समीर नाम का कोई आईएएस अधिकारी उस के शहर में जिला अधिकारी बन कर आया हुआ है.

समीर नाम ने ही उस के दिल में हलचल पैदा कर दी. वह सोचने लगी यह वही समीर तो नहीं जो कभी उस के दिल के बहुत करीब हुआ करता था और घंटों मनोविज्ञान के किसी टौपिक पर उस से चर्चा करता था. क्या समीर आईएएस बन गया?

यह प्रश्न उस के जेहन में कौंध रहा था और वह बहुत देर तक समीर के साथ बिताए गए उन पलों को याद कर रही थी जो 5 वर्ष बाद भी अभी तक वैसे ही तरोताजा थे जैसे यह बस कुछ पलों पहले की बात हो.

यही पता लगाने के लिए एक दिन वह उस के औफिस पहुंची तो पता लगा कि साहब अभी मीटिंग में व्यस्त हैं. दूसरे दिन समीर से मिलने के लिए उस के चैंबर में जाना चाहा तो, दरवाजे पर खड़े चपरासी ने उसे रोक दिया और उस से स्लिप मांगी. उस ने सोचा, पता नहीं वही समीर है या कोई और, इसलिए उस ने चैंबर में उस से मिलने का विचार त्याग दिया. वह सोचने लगी वैसे तो जिलाधिकारी आम आदमी के हितों के लिए जिला में पदस्थापित होता है और उस से मिलने के लिए कोई भी व्यक्ति स्वतंत्र है लेकिन अफसरशाही ने आम आदमी से जिलाधिकारी को कितना दूर कर दिया है.

वैसे जिलाधिकारी से उस के द्वारा समयसमय पर लगाए जाने वाले जनता दरबार में भी आसानी से भेंट हो सकती थी किंतु उस के बारे में जानने की तीव्र जिज्ञासा इतनी थी कि वह बहुत समय तक इस के लिए इंतजार नहीं कर सकती थी. सो, जिलाधिकारी द्वारा राजस्व से संबंधित मुकदमों की सुनवाई के लिए किए जाने वाले कोर्ट के दौरान उस ने उसे देखने का मन बनाया.

उसे किसी ने बताया था कि उस दिन जिलाधिकारी न्यायालय में मुकदमे की सुनवाई करेंगे. जब वह उस के न्यायालय में पहुंची तो समीर मुकदमे की कोई फाइल देख रहा था. वह न्यायालय में खड़ी थी किंतु समीर ने उसे नहीं देखा और वह ?ाट न्यायालय के कमरे से बाहर आ गई. फिर अपने घर पहुंची. अब उस ने सोचा कि वह उस के आवास में जा कर मिलेगी. जब वह उस के आवास पहुंची तो फिर चपरासी ने स्लिप मांगी. उसे लगा, वह तो लड़की है, लोग जाने उस के बारे में क्याक्या सोचने लगें, इसलिए उस से बिना मिले ही वापस घर लौट आई.

समीर को जिला में पदस्थापित हुए 4 महीने से अधिक हो गए थे, किंतु उन दोनों की मुलाकात नहीं हुई थी. अब तक मनोविज्ञान पर प्रीति की लिखी पुस्तक ‘आने वाली पीढि़यां और मनोविज्ञान’ को छापने के लिए दिल्ली का पाठ्यपुस्तकों से संबंधित एक प्रकाशक तैयार हो गया था. पुस्तक की पांडुलिपि उस ने प्रकाशक को सौंप दी थी जो अब मुद्रण के लिए भेजी जा चुकी थी.

अगले महीने उस की प्रतियां तैयार हो कर आ जाने वाली थीं और पुस्तक का विमोचन उस के कालेज के हौल में होना तय हुआ था. प्रिंसिपल के आग्रह पर जिलाधिकारी समीर ने भी विमोचन समारोह में आना स्वीकार कर लिया था और उसी के हाथों उस की पुस्तक का विमोचन होना था.

काम की बहुत ज्यादा व्यस्तता के कारण समीर का ध्यान इस ओर नहीं गया था कि इस की लेखिका वही प्रीति है जो कभी दिल्ली में उस के साथ मनोविज्ञान में एमए कर रही थी. पिंसिपल साहब खुद इन्विटेशन ले कर गए थे और प्रीति ने उन से कभी समीर की चर्चा नहीं की थी.

प्रीति यह सोच कर काफी उत्सुक और रोमांचित थी कि उस की पुस्तक का विमोचन समीर के हाथों होगा और उसी के द्वारा वह सम्मानित की जाएगी. वह सोच रही थी कि वह क्षण कैसा होगा जब वह पहली बार इतने दिनों के बाद समीर के सामने जाएगी. आज वह दिन आ ही गया था.

रात में उसे नींद ठीक से नहीं आई थी. बारबार उसे समीर की बातें, उस के साथ घंटों मनोविज्ञान के विभिन्न पहलुओं पर हुई चर्चाएं याद आ रही थीं. उस समय समीर उस से बारबार कहता था कि वह आईएएस बन कर समाज की सेवा करना चाहता है और अब उस की मनोकामना पूरी हो गईर् थी. उस ने जो सोचा था उसे वह मिल गया था.

क्या समीर की शादी हो गई है या अभी भी वह कुंआरा है, यह प्रश्न भी उस के मन में बारबार कौंध रहा था. वह सोच रही थी कि यदि समीर की शादी हो गई है तो उस की पत्नी कैसी होगी. यदि समीर ने उसे देख कर पुरानी बातों को कुरेदना शुरू किया तो उस की पत्नी की प्रतिक्रिया क्या होगी? कहीं वह उस के संबंधों को ले कर आशंकित तो न हो जाएगी.

उस के मन में पहली बार इतना उत्साह था. दिल में हलचल थी. वहीं, अंदर से समीर से मिलने का एक मधुर एहसास भी था. उस ने अपनी सब से अच्छी साड़ी निकाली और पहली बार अपना इतनी देर तक शृंगार किया. आज सच में वह काफी सुंदर लग रही थी.

पुस्तक विमोचन समारोह के लिए कालेज के हौल को काफी सजाया गया था. शहर के कई गणमान्य व्यक्तियों को भी बुलाया गया था. दूसरे कालेजों के शिक्षक और कई विद्वानों को भी आमंत्रित किया गया था. सब के खानेपीने का इंतजाम पुस्तक के प्रकाशक की ओर से था.

वह कालेज रिकशा से जाती थी, किंतु आज प्रिंसिपल ने उसे लाने के लिए अपनी गाड़ी ड्राइवर के साथ भेजी थी और कालेज के एक जूनियर लैक्चरर को भी साथ लगा दिया था.

जब वह कालेज के हौल में पहुंची तो अधिकतर मेहमान आ चुके थे. लाउडस्पीकर पर कोई पुराना संगीत काफी कम आवाज में बज रहा था. पुस्तक विमोचन की सारी आवश्यक तैयारियां कर ली गई थीं. अब जिलाधिकारी के आने की प्रतीक्षा थी.

तभी जिलाधिकारी समीर के आने का माइक पर अनाउंसमैंट हुआ. समीर के स्टेज पर पहुंचते ही सभी उपस्थित मेहमान उस के सम्मान में खड़े हो गए.  प्रिंसिपल ने समीर का स्टेज पर स्वागत किय??ा और उन्हें अपनी बगल में विशेष अतिथि के रूप में बैठाया. ठीक उस के बगल में प्रीति भी बैठी हुई थी. प्रीति ने समीर को देख कर हाथ जोड़े तो वह अप्रत्याशित रूप से उस को स्टेज पर देख कर विस्मित होते हुए बोला, ‘‘अरे तुम, प्रीति?…यहां?’’

‘‘क्या आप एकदूसरे को पहचानते हैं?’’ प्रिंसिपल ने पूछा.

‘‘हम दोनों ने एक ही साथ दिल्ली में एक ही कालेज से साइकोलौजी में एमए किया है.’’

‘‘लेकिन प्रीति ने यह कभी नहीं बताया,’’ प्रिंसिपल ने अब प्रीति की ओर मुखातिब होते हुए कहा, ‘‘क्यों प्रीति, इतना बड़ा राज तुम छिपाए हुए हो. मुझे तो कम से कम बताया होता.’’

प्रीति प्रिंसिपल को क्या बताती कि उस ने कई बार समीर से मिलने की कोशिश की थी लेकिन कुछ संकोच, कुछ झिझक और परिस्थितियों ने उसे उस से नहीं मिलने दिया और चाह कर भी वह समीर से अपने संबंधों को अपने सहकर्मियों के साथ साझा न कर पाई.

‘‘समीर तुम से मिलने की मैं ने बहुत बार कोशिश की, लेकिन मिल नहीं पाई,’’ वह सकुचाते हुए धीरे से बोली.

‘‘अब यह बहानेबाजी न चलेगी प्रीति. फंक्शन के बाद मैं तुम्हारे घर पर आऊंगा. मां कैसी हैं?’’

सुनते ही प्रीति की आंखें नम होने लगीं और वह इस का कोई जवाब नहीं दे पाई तो प्रिंसिपल ने मामले की नाजुकता को समझाते हुए, बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा, ‘‘इत्मीनान से इस संबंध में बातें होंगी. अभी हम लोग पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम शुरू करते हैं.’’

पुस्तक का विमोचन करते हुए समीर ने प्रीति की सादगी, नम्रता और उस के कोमल भावों की विस्तृत चर्चा करते हुए अपने कालेज के दिनों की यादों को सब के साथ सा?ा करते हुए कहा कि प्रीति कालेज में एक ऐसी लड़की थी जिस से हमारे प्रोफैसर भी बहुत प्रभावित थे. प्रीति को साइकोलौजी पर जितनी पकड़ है उतनी बहुत कम लोगों को होती है. हमें गर्व है कि इस शहर में हमारे बीच प्रीति जैसी एक विदुषी हैं.’’

समीर की बातों से पूरा हौल तालियों से गड़गड़ाने लगा तब प्रीति ने महसूस किया कि समीर, जिस के बारे में उस ने सोचा था कि वह उसे भूल गया है, बिलकुल उस की थोथी समझा थी. उस के दिल में उस के प्रति अभी भी उतना ही लगाव और प्रेम है जितना कालेज के दिनों में हुआ करता था.

फंक्शन के बाद समीर ने उस से उस का फोन नंबर लिया और उस के घर की लोकेशन नोट करते हुए कहा कि इस रविवार को वह उस के साथ ही लंच करेगा. अपना विजिटिंग कार्ड उसे थमाते हुए उस ने रविवार को इंतजार करने के लिए कहा.

फंक्शन के बाद उस के सभी सहकर्मी उस को आंखें फाड़ कर देख रहे थे. समीर ने सभी लोगों के बीच जिस प्रकार प्रीति की प्रशंसा की थी और सम्मान दिया था उस का किसी को भी अनुमान नहीं था. प्रीति ने घर आ कर पूरे घर को साफ किया, ड्राइंगरूम में सोफे को करीने से लगाया और घर के बाहर पड़े हुए गमलों को ठीक से लगाया और उन में पानी दिया.

मां के गुजर जाने के बाद प्रीति अंदर से काफी टूट गई थी. घर में कोई नहीं था और उस का जीवन अकेलेपन के दौर से गुजर रहा था, इसलिए पूरा घर ही अस्तव्यस्त पड़ा हुआ था. किंतु समीर ने जब से कहा था कि रविवार को उस के घर आ कर उस के साथ लंच करेगा उस के शरीर में एक नया ही उत्साह पैदा हो गया था, मनमयूर नाचने लगा था और जीवन के प्रति एक नया नजरिया पैदा हो गया था.

रविवार को सुबह से ही प्रीति समीर के लिए लंच की तैयारी में लगी हुई थी. इस बीच फोन पर उस ने प्रयागराज से नीलम को भी बुला लिया था. वह पुस्तक विमोचन समारोह में कुछ जरूरी कामों में व्यस्त रहने के कारण नहीं आ पाई थी. नीलम भी समीर से मिलने के लिए उत्साहित थी. एक लंबे समय के बाद तीनों एकसाथ एक टेबल पर मिलने वाले थे.

समीर ने उसे फोन पर सूचना दी थी कि वह रविवार को 2 बजे के बाद आएगा, उसे एक जरूरी मीटिंग में शामिल होना है क्योंकि जिले में सोमवार को सीएम का दौरा होने वाला था. किंतु वह उस दिन 12 बजे ही आ गया.

‘‘सीएम साहब का दौरा रद्द हो गया तो मैं जल्दी आ गया,’’ आते ही वह बोला. उस का घर एक संकरी गली में था. उस की गाड़ी सड़क पर खड़ी थी. बौडीगार्ड साथ में था.

उसे अचानक आया देख प्रीति और नीलम दोनों उठ खड़ी हुईं.

नीलम को देख कर उस ने सोफे पर बैठते हुए कहा, ‘‘अरे तुम कब आईं. तुम भी आगरा में ही रहती हो क्या?’’

‘‘नहीं, तुम्हारे बारे में प्रीति ने बताया तो मिलने आ गई,’’ नीलम मुसकराते हुए बोली.

‘‘अच्छा हुआ तुम आ गईं. मैं इस शहर में पिछले 4 महीने से हूं लेकिन प्रीति को मेरी कभी याद न आई.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है समीर, तुम से मिलने का मैं ने कई बार सोचा लेकिन मिलने की हिम्मत न हुई.’’ प्रीति ने कहा.

‘‘क्यों, मैं तुम्हारे लिए गैर कब से हो गया. यह क्यों नहीं कहतीं कि तुम मु?ा से मिलना ही नहीं चाहती थीं.’’ अब प्रीति उस से क्या कहती और कहती भी तो क्या उस की सफाई से समीर की उलाहना दूर हो जाती?

‘‘अच्छा, अब बता मां जी कहां हैं?’’

‘‘समीर, अब प्रीति की मां इस दुनिया में नहीं हैं,’’ नीलम ने बताया.

कुछ देर तक समीर चुप रहा, फिर बोला, ‘‘सौरी प्रीति, मैं ने तुम्हारे दिल के दर्द को कुरेदा. अब घर में कौन रहता है?’’

‘‘इस के साथ अब कोई रहने वाला नहीं है समीर. यह नितांत अकेलापन का जीवन जीती है. अपनी दुनिया में खोई हुई. जिस तरह कालेज में किताबों में खोई रहती थी, अब भी किताबें ही इस की साथी हैं,’’ नीलम बोली.

समीर थोड़ी देर तक घर में इधरउधर देखते रहा. उस की मां और बाबूजी का फोटो सामने की दीवार पर टंगा हुआ था. उस ने सोचा उस का ध्यान अब तक उन फोटो पर क्यों नहीं गया जो वह प्रीति को बारबार मां की याद दिलाता रहा. उस ने हाथ जोड़ कर उस के मातापिता के फोटो के सामने जा कर उन्हें प्रणाम किया और प्रीति से बोला, ‘‘जिंदगी इसी का नाम है. यह कोई नहीं जानता कि किस की जिंदगी उस को किस तरह जीने के लिए मजबूर करेगी. तुम से बिछुड़ने के बाद मैं एक बौयज होस्टल में शिफ्ट कर गया जहां सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाले लड़के रहते थे. घर में पढ़ने का माहौल नहीं था.

‘‘वहां एक दिन किसी ने मेरा स्मार्टफोन चुरा लिया. उस फोन में बहुत सारी इन्फौर्मेशन थीं, उसी में तुम्हारा फोन नंबर भी था. मैं ने तुम्हें खोजने का प्रयास किया किंतु तुम्हें ढूंढ़ नहीं पाया. फिर मेरी कोचिंग की क्लासेज चलने लगीं और परीक्षा की तैयारी में इतनी बुरी तरह उल?ा कि फिर तुम्हारी ओर ध्यान ही नहीं गया और इसी बीच मेरे बाबूजी का तबादला कंपनी वालों ने दूसरे शहर में कर दिया जहां वे मां के साथ शिफ्ट कर गए.

‘‘मैं इकलौती संतान था. घर में कोई रहने वाला नहीं था, इसलिए पिताजी ने 3 कमरों के इस अपार्टमैंट में एक कमरा निजी उपयोग के लिए रख कर 2 कमरे किराए पर दे दिए. लेकिन प्रीति तुम चाहतीं तो मेरे घर जा कर मेरे किराएदार से मेरा फोन नंबर मांग सकती थीं क्योंकि कभीकभी मैं वहां जाया करता था और किराएदार को मेरा फोन नंबर मालूम था. तुम तो मेरे घर आई थीं. मेरे मातापिता तुम्हें बहुत ही लाइक करते थे. मां तो हमेशा ही तुम्हारे सरल स्वभाव की प्रशंसा करती थीं और पिताजी अकसर कहा करते थे कि किसी भी व्यक्ति का गुण प्रधान होता है न कि उस का शरीर.

‘‘मेरे मांबाबूजी इसी हफ्ते यहां घूमने आने वाले हैं. मैं तुम्हें उन से मिलवाऊंगा.’’

‘‘हां समीर, मुझे भी उन से मिलने की बहुत इच्छा है. उन से मिले हुए काफी दिन हो गए हैं. उन के आने के बाद तुम मुझे फोन करना, मैं उन से मिलने जरूर आऊंगी. लेकिन तुम अपनी पत्नी को ले कर क्यों नहीं आए?’’

समीर ने हंसते हुए कहा, ‘‘अभी तुम्हारी जैसी कोई मिली नहीं.’’

‘‘क्यों मजाक करते हो समीर. मेरे जैसी कोई मिले भी नहीं. हैंडीकैप होना एक अभिशाप से कम नहीं है.’’

‘‘ऐसा न कहो प्रीति, आज भी मनोविज्ञान के क्षेत्र में तुम्हारा मुकाबला करने वाला इस शहर में कोई नहीं है.’’

यह तो प्रीति नहीं जानती थी कि समीर के साथ उस का क्या रिश्ता है किंतु अंदर ही अंदर यह जान कर कि वह अब तक कुंआरा है उस के मन के तार झांकृत हो उठे.

इस बीच समीर के मांबाबूजी के आने का वह बेसब्री से इंतजार करती रही और फिर कुछ ही दिनों बाद समीर ने उसे फोन कर बताया कि उस के मांबाबूजी आए हुए हैं और उस से मिलना चाहते हैं. आज रात का डिनर उन के साथ करोगी तो उसे खुशी होगी.

प्रीति तो इसी अवसर का इंतजार कर रही थी, इसलिए उस ने उस के निमंत्रण को सहर्ष स्वीकार कर लिया. उसे अंदर आने से कोई न रोके, इसलिए समीर ने उस को लाने के लिए अपनी प्राइवेट कार भेज दी थी.

प्रीति को लेने समीर अपने आवास के गेट तक स्वयं आया. जब वह उस के साथ ड्राइंगरूम में पहुंची तो उस के मांबाबूजी उस का इंतजार कर रहे थे. उस ने उन के पैर छुए. उन्होंने उसे अपनी बगल में बैठा लिया.

‘‘समीर तुम्हारी हमेशा चर्चा करता है. सुना मां भी नहीं रहीं. घर में अकेली हो. बेटी मैं समझा सकती हूं तुम्हारी तकलीफ को. लड़की वह भी अकेली,’’ समीर की मां बोलीं.

‘‘बेटी, अब आगे क्या करना है?’’ समीर के बाबूजी ने पूछा.

‘‘क्या करूंगी बाबूजी. दिन में कालेज में पढ़ाती हूं, रात में अध्ययन, कुछ लेखन.’’ उस ने नम्रता से कहा.

‘‘अभी क्या लिख रही हो?’’

‘‘अभी तो कुछ नहीं. इस पुस्तक का रिस्पौंस देख लेती हूं कैसा है, फिर आगे का प्लान बनाऊंगी.’’

‘‘यह पुस्तक ‘आनेवाली पीढि़यां और मनोविज्ञान’ मैं ने पढ़ी. समीर ने दी थी. यह सच है कि मनोविज्ञान के स्थापित सिद्धांत आने वाली पीढि़यों के संदर्भ में वैसे ही न रहेंगे.’’

‘‘बाबूजी, आप भी क्या न… आते ही पुस्तक की चर्चा में लग गए. घर और बाहर रातदिन यही तो यह करती है. आज तो हम एंजौय करें. वैसे प्रीति, मैं तुम से पूछना भूल गया था, सारे आइटम वेज ही रखे हैं. मांबाबूजी वैजिटेरियन हैं.’’

‘‘मैं भी वैजिटेरियन ही हूं.’’

खाना खाने के बाद जब प्रीति जाने को हुई तो मां ने उसे रोका.

‘‘बेटी, तुम्हारी शादी की कहीं बात चल रही है क्या?’’

प्रीति कुछ न बोल पाई. जवाब देती भी क्या. उस की शादी के लिए कौन बात करने वाला था.

‘‘सम?ा गई बेटी. अब तो तुम्हारे घर में तुम्हारे सिवा कोई है नहीं जिस से तुम्हारी शादी के बारे में बात की जाए. समीर तुम्हारी बहुत प्रशंसा करता है. आईएएस में उस के सिलैक्शन के बाद कई अमीर घराने के लोग अपनी बेटियों की शादी के लिए आए. वे सभी अपनी दौलत के बल पर समीर को खरीदना चाहते थे.

‘‘समीर का इस संबंध में स्पष्ट मत था कि शादी मन का मिलन होता है, सिर्फ शरीर का नहीं और जो लड़की अपने बाप की हैसियत के बल पर इस घर में आएगी वह कभी भी अपना दिल उसे न दे पाएगी. बेटी, अगर तुम्हें कोई आपत्ति न हो और समीर से तुम्हारा मन मिलता हो तो इस घर में तुम्हारी जैसी बहू पा कर हम प्रसन्न होंगे. समीर के पिताजी की भी यही इच्छा है. समीर भी यही चाहता है. अब सबकुछ तुम पर निर्भर करता है. तुम इत्मीनान से फैसला ले कर बताना. कोई जल्दी नहीं है, हम तुम्हारे जवाब का इंतजार करेंगे.’’

‘‘लेकिन मांजी, कहां समीर की पोस्ट और कहां मैं एक साधारण कालेज की लेक्चरार.’’

‘‘अब लज्जित न करो प्रीति,’’ समीर बोला, ‘‘मेरे और तुम्हारे संबंधों के बीच हमारी पोस्ट और हैसियत बीच में कहां से आ गई, इसी से बचने के लिए तो मैं ने

अब तक किसी शादी का प्र्रस्ताव स्वीकार नहीं किया.’’

प्रीति ने लज्जा से सिर झांका लिया.

उस ने समीर के मांबाबूजी के पैर छूते हुए कहा, ‘‘आप लोगों का आदेश मेरे लिए आज्ञा से कम नहीं.’’

फिर उस की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे.

समीर उसे छोड़ने उस के घर तक गया. जब वह लौटने लगा तो उस ने प्रीति को अपने गले से लगा लिया. और बोला, ‘‘प्रीति पतिपत्नी का रिश्ता बराबर का होता है, आज भी मैं वही समीर हूं जो कालेज के दिनों में हुआ करता था और आगे भी ऐसे ही रहूंगा.’’

समीर के गले लगी प्रीति को ऐसा लग रहा था मानो सारे जहां की खुशियां उसे मिल गई हैं. रात का सियाह अंधेरा अब समाप्त हो चुका था. सुबह की नई किरणें फूटने लगी थीं. Long Hindi Story

Hindi Family Story: सच्चा रिश्ता – साहिल ने कैसे दिखाई हिम्मत

Hindi Family Story: साहिल आज काफी मसरूफ था. सुबह से उठ कर वह जयपुर जाने की तैयारी में लगा था. उस की अम्मी उस के काम में हाथ बंटा रही थीं और समझा रही थीं, ‘‘बेटे, दूर का मामला है, अपना खयाल रखना और खाना ठीक समय पर खा लिया करना.’’ साहिल अपनी अम्मी की बातें सुन कर मुसकराता और कहता, ‘‘हां अम्मी, मैं अपना पूरा खयाल रखूंगा और खाना भी ठीक समय पर खा लिया करूंगा. वैसे भी अम्मी अब मैं बड़ा हो गया हूं और मुझे अपना खयाल रखना आता है.’’

साहिल को इंटरव्यू देने जयपुर जाना था. उस के दिल में जयपुर घूमने की चाहत थी, इसलिए वह 10-15 दिन जयपुर में रहना चाहता था. सारा सामान पैक कर के साहिल अपनी अम्मी से विदा ले कर चल पड़ा.

अम्मी ने साहिल को ले कर बहुत सारे ख्वाब देखे थे. जब साहिल 8 साल का था, तब उस के अब्बा बब्बन मियां का इंतकाल हो गया था. साहिल की अम्मी पर तो जैसे बिजली गिर गई थी. उन के दिल में जीने की कोई तमन्ना ही नहीं थी, लेकिन साहिल को देख कर वे ऐसा न कर सकीं. अम्मी ने साहिल की अच्छी परवरिश को ही अपना मकसद बना लिया था. इसी वजह से साहिल को कभी अपने अब्बा की कमी महसूस नहीं हुई थी. तभी तो साहिल ने अपनी अम्मी की इच्छाओं को पूरा करने के लिए एमए कर लिया था और अब वह नौकरी के सिलसिले में इंटरव्यू देने जयपुर जा रहा था.

साहिल को विदा कर के उस की अम्मी घर का दरवाजा बंद कर घर के कामों में मसरूफ हो गईं. उधर साहिल भी अपने शहर के बस स्टैंड पर पहुंच गया. जयपुर जाने वाली बस आई, तो साहिल ने बस में चढ़ कर टिकट लिया और एक सीट पर बैठ गया.

साहिल की आंखों से उस का शहर ओझल हो रहा था, पर उस की आंखों में अम्मी का चेहरा रहरह कर सामने

आ रहा था. अम्मी ने साहिल को काफी मेहनत से पढ़ायालिखाया था, इसलिए साहिल ने भी इंटरव्यू के लिए बहुत अच्छी तैयारी की थी. बस के चलतेचलते रात हो गई थी. ज्यादातर सवारियां सो रही थीं. जो मुसाफिर बचे थे, वे ऊंघ रहे थे.

रात के अंधेरे को रोशनी से चीरती हुई बस आगे बढ़ी जा रही थी. एक जगह जंगल में रास्ता बंद था. सड़क पर पत्थर रखे थे. ड्राइवर ने बस रोक दी. तभी 2-3 बार फायरिंग हुई और बस में कुछ लुटेरे घुस आए. इस अचानक हुए हमले से सभी मुसाफिर घबरा गए और जान बचाते हुए अपना सारा पैसा उन्हें देने लगे.

एक लड़की रोरो कर उन से दया की भीख मांगने लगी. वह बारबार कह रही थी, ‘‘मेरे पास थोड़े से रुपयों के अलावा कुछ नहीं है.’’ मगर उन जालिमों पर उस की मासूम आवाज का कुछ असर नहीं हुआ. उन में से एक लुटेरा, जो दूसरे सभी लुटेरों का सरदार लग रहा था, एक लुटेरे से बोला, ‘‘अरे ओ कृष्ण, बहुत बतिया रही है यह लड़की. अरे, इस के पास देने को कुछ नहीं है, तो उठा ले ससुरी को और ले चलो अड्डे पर.’’

इतना सुनते ही एक लुटेरे ने उस लड़की को उठा लिया और जबरदस्ती उसे अपने साथ ले जाने लगा. वह डरी हुई लड़की ‘बचाओबचाओ’ चिल्ला रही थी, पर किसी मुसाफिर में उसे बचाने की हिम्मत न हुई.

साहिल भी चुप बैठा था, पर उस के दिल के अंदर से आवाज आई, ‘साहिल, तुम्हें इस लड़की को उन लुटेरों से छुड़ाना है.’ यही सोच कर साहिल अपनी सीट से उठा और लुटेरों को ललकारते हुए बोला, ‘‘अरे बदमाशो, लड़की को छोड़ दो, वरना अच्छा नहीं होगा.’’

इतना सुनते ही उन में से 2-3 लुटेरे साहिल पर टूट पड़े. वह भी उन से भिड़ गया और लड़की को जैसे ही छुड़ाने लगा, तो दूसरे लुटेरे ने गोली चला दी. गोली साहिल की बाईं टांग में लगी. साहिल की हिम्मत देख कर दूसरे कई मुसाफिर भी लुटेरों को मारने दौड़े. कई लोगों को एकसाथ आता देख लुटेरे भाग खड़े हुए, पर तब तक साहिल की टांग से काफी खून बह चुका था. लिहाजा, वह बेहोश हो गया.

ड्राइवर ने बस तेजी से चला कर जल्दी से साहिल को एक अस्पताल में पहुंचा दिया. सभी मुसाफिर तो साहिल को भरती करा कर चले गए, पर वह लड़की वहीं रुक गई. डाक्टर ने जल्दी ही साहिल की मरहमपट्टी कर दी.

कुछ देर बाद जब साहिल को होश आया, तो सामने वही लड़की खड़ी थी. साहिल को होश में आता देख कर वह लड़की बहुत खुश हुई.

साहिल ने उसे देख राहत की सांस ली कि लड़की बच गई. पर अचानक इंटरव्यू का ध्यान आते ही उस के मुंह से निकला, ‘‘अब मैं जयपुर नहीं पहुंच सकता. मेरे इंटरव्यू का क्या होगा?’’ लड़की उस की बात सुन कर बोली, ‘‘क्या आप जयपुर में इंटरव्यू देने जा रहे थे? मेरी वजह से आप की ये हालत हो गई. मैं आप से माफी चाहती हूं. मुझे माफ कर दीजिए.’’

‘‘अरे नहीं, यह आप क्या कह रही हैं? आप ने मेरी बात का गलत मतलब निकाल लिया. अगर मैं आप को बचाने न आता, तो पता नहीं मैं अपनेआप को माफ कर भी पाता या नहीं. खैर, छोडि़ए यह सब. अच्छा, यह बताइए कि आप यहां क्यों रुक गईं? मुझे लगता है कि सभी मुसाफिर चले गए हैं.’’ लड़की ने कहा, ‘‘जी हां, सभी मुसाफिर रात को ही चले गए थे. आप के पास भी तो किसी को होना चाहिए था. अपनी जान की परवाह किए बिना आप ने मेरी जान बचाई. ऐसे में मेरा फर्ज बनता था कि मैं आप के पास रुकूं. मैं आप की हमेशा एहसानमंद रहूंगी.’’

‘‘यह तो मेरा फर्ज था, जो मैं ने पूरा किया. अच्छा, यह बताइए कि आप कल जयपुर जा रही थीं या कहीं और…?’’

इतना सुनते ही लड़की की आंखों में आंसू आ गए. वह बोली, ‘‘आप ने मेरी जान बचाई है, इसलिए मैं आप से कुछ नहीं छिपाऊंगी. मेरा नाम आरती?है. मेरे पैदा होने के कुछ साल बाद ही पिताजी चल बसे थे. मां ने ही मुझे पाला है. ‘‘मेरे ताऊजी मां को तंग करते थे. हमारे हिस्से की जमीन पर उन्होंने कब्जा कर लिया. उन्होंने मेरी मां से धोखे में कोरे कागज पर अंगूठा लगवा लिया और हमारी जमीन उन के नाम हो गई.

‘‘एक महीने पहले मां भी मुझे छोड़ कर चल बसीं. मेरे ताऊजी मुझे बहुत तंग करते थे. उन के इस रवैए से तंग आ कर मैं भाग निकली और उसी बस में आ कर बैठ गई, जो बस जयपुर जा रही थी. ‘‘मैं ने 12वीं तक की पढ़ाई की है. सोचा था कि कहीं जा कर नौकरी कर लूंगी,’’ यह कह कर आरती चुप हो गई.

साहिल को आरती की कहानी सुन कर अफसोस हुआ. कुछ देर बाद आरती बोली, ‘‘अब आप को होश आ गया है, 2-4 दिन में आप बिलकुल ठीक हो जाएंगे. अच्छा तो अब मैं चलती हूं.’’

साहिल ने कहा, ‘‘पर कहां जाएंगी आप? अभी तो आप ने बताया कि अब आप का न कोई घर है, न ठिकाना. ऐसे में आप अकेली लड़की. बड़े शहर में नौकरी मिलना इतना आसान नहीं होता. ‘‘वैसे, मेरा नाम साहिल है. मजहब से मैं मुसलमान हूं, पर अगर आप हमारे घर मेरी छोटी बहन बन कर रहें, तो मुझे बहुत खुशी होगी.’’

‘‘लेकिन, आप तो मुसलमान हैं?’’ आरती ने कहा. साहिल ने कहा, ‘‘मुसलमान होने के नाते ही मेरा यह फर्ज बनता है कि मैं किसी बेसहारा लड़की की मदद करूं. मुझे हिंदू बहन बनाने में कोई परहेज नहीं, अगर आप तैयार हों, तो…’’

आरती ने साहिल के पैर पकड़ लिए, ‘‘भैया, आप सचमुच महान हैं.’’ ‘‘अरे आरती, यह सब छोड़ो, अब हम अपने घर चलेंगे. अम्मी तो तुम्हें देख कर बहुत खुश होंगी.’’

एक हफ्ते बाद साहिल ठीक हो गया. डाक्टर ने उसे छुट्टी दे दी. साहिल आरती को ले कर अपने घर पहुंचा. दरवाजा खटखटाते हुए उस ने आवाज लगाई, तो उस की अम्मी ने दरवाजा खोला.

साहिल को देख कर वे चौंकीं, ‘‘अरे साहिल, सब खैरियत तो है न? तू इतनी जल्दी कैसे आ गया? तू तो 15 दिन के लिए जयपुर गया था. क्या बात है?’’ ‘‘अरे अम्मी, अंदर तो आने दो.’’

‘‘हांहां, अंदर आ.’’ साहिल जैसे ही लंगड़ाते हुए अंदर आया, तो उस की अम्मी को और धक्का लगा, ‘‘अरे साहिल, तू लंगड़ा क्यों रहा है? जल्दी बता.’’

साहिल ने कहा, ‘‘सब बताता हूं, अम्मी. पहले मैं तुम्हें एक मेहमान से मिलवाता हूं,’’ कह कर साहिल ने आरती को आवाज दी. आरती दबीसहमी सी अंदर आई.

खूबसूरत लड़की को देख कर साहिल की अम्मी का दिल खुश हो गया, पर अगले ही पल अपने को संभालते हुए वे बोलीं, ‘‘साहिल, ये कौन है? कहीं तू ने… ‘‘अरे नहीं, अम्मी. आप गलत समझ रही हैं.’’

अपनी अम्मी से साहिल ने जयपुर सफर की सारी बातें बता दीं. सबकुछ सुन कर साहिल की अम्मी बोलीं, ‘‘बेटा, तू ने यह अच्छा किया. अरे, नौकरी तो फिर कहीं न कहीं मिल ही जाएगी, पर इतनी खूबसूरत बहन तुझे फिर न मिलती. बेटी आरती, आज से यह घर तुम्हारा ही है.’’

इतना सुनते ही आरती साहिल की अम्मी के पैरों में गिर पड़ी. ‘‘अरे बेटी, यह क्या कर रही हो. तुम्हारी जगह मेरे दिल में बन गई. अब तुम मेरी बेटी हो,’’ इतना कह कर अम्मी ने आरती को गले से लगा लिया.

साहिल एक ओर खड़ा मुसकरा रहा था. अब साहिल के घर में बहन की कमी पूरी हो गई थी. आरती को भी अपना घर मिल गया था. उस की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए थे. Hindi Family Story

Story In Hindi: रावण अब भी जिंदा है – क्या मीना बचा पाई इज्जत

Story In Hindi: मीना सड़क पर आ कर आटोरिकशे का इंतजार करने लगी, मगर आटोरिकशा नहीं आया. वह अकेली ही बूआ के यहां गीतसंगीत के प्रोग्राम में गाने आई थी. तब बूआ ने भी कहा था, ‘अकेली मत जा. किसी को साथ ले जा.’ मीना ने कहा था, ‘क्यों तकलीफ दूं किसी को? मैं खुद ही आटोरिकशे में बैठ कर चली जाऊंगी?’

मीना को तो अकेले सफर करने का जुनून था. यहां आने से पहले उस ने राहुल से भी यही कहा था, ‘मैं बूआ के यहां गीत गाने जा रही हूं.’ ‘चलो, मैं छोड़ आता हूं.’

‘नहीं, मैं चली जाऊंगी,’ मीना ने अनमने मन से कह कर टाल दिया था. तब राहुल बोला था, ‘जमाना बड़ा खराब है. अकेली औरत का बाहर जाना खतरे से खाली नहीं है.’

‘आप तो बेवजह की चिंता पाल रहे हैं. मैं कोई छोटी बच्ची नहीं हूं, जो कोई रावण मुझे उठा कर ले जाएगा.’ ‘यह तुम नहीं तुम्हारा अहम बोल रहा है,’ समझाते हुए एक बार फिर राहुल बोला था, ‘जब से दिल्ली में चलती बस में निर्भया के साथ…’

‘इस दुनिया में कितनी औरतें ऐसी हैं, जो अकेले ही नौकरी कर रही हैं…’ बीच में ही बात काटते हुए मीना बोली थी, ‘मैं तो बस गीत गा कर वापस आ जाऊंगी.’ यहां से उस की बूआ का घर

3 किलोमीटर दूर है. वह आटोरिकशे में बैठ कर बूआ के यहां पहुंच गई थी. वहां जा कर राहुल को फोन कर दिया था कि वह बूआ के यहां पहुंच गई है. फिर वह बूआ के परिवार में ही खो गई. मगर अब रात को सड़क पर आ कर आटोरिकशे का इंतजार करना उसे महंगा पड़ने लगा था.

जैसेजैसे रात गहराती जा रही थी, सन्नाटा पसरता जा रहा था. इक्कादुक्का आदमी उसे अजीब सी निगाह डाल कर गुजर रहे थे. जितने भी आटोरिकशे वाले गुजरे, वे सब भरे हुए थे. जब कोई औरत किसी स्कूटर के पीछे मर्द के सहारे बैठी दिखती थी, तब मीना भी यादों में खो जाती थी. वह इसी तरह राहुल के स्कूटर पर कई बार पीछे बैठ चुकी थी.

आटोरिकशा तो अभी भी नहीं आया था. रात का सन्नाटा उसे डरा रहा था. क्या राहुल को यहां बुला ले? अगर वह बुला लेगी, तब उस की हार होगी. वह साबित करना चाहती थी कि औरत अकेली भी घूम सकती है, इसलिए उस ने राहुल को फोन

नहीं किया. इतने में एक सवारी टैंपो वहां आया. वह खचाखच भरा हुआ था. टैंपो वाला उसे बैठने का इशारा कर रहा था. मीना ने कहा, ‘‘कहां बैठूंगी भैया?’’

वह मुसकराता हुआ चला गया. तब वह दूसरे टैंपों का इंतजार करने लगी, मगर काफी देर तक टैंपो नहीं आया. तभी एक शख्स उस के पास आ कर बोला, ‘‘चलोगी मेरे साथ?’’

‘‘कहां?’’ मीना ने पूछा. ‘‘उस खंडहर के पास. कितने पैसे लोगी?’’ उस आदमी ने जब यह कहा, तब उसे समझते देर न लगी. वह आदमी उसे धंधे वाली समझ रहा था.

वह भी एक धंधे वाली औरत बन कर बोली, ‘‘कितना पैसा दोगे?’’ वह आदमी कुछ न बोला. सोचने लगा. तब मीना फिर बोली, ‘‘जेब में कितना माल है?’’

‘‘बस, 50 रुपए.’’ ‘‘जेब में पैसा नहीं है और आ गया… सुन, मैं वह औरत नहीं हूं, जो तू समझ रहा है,’’ मीना ने कहा.

‘‘तब यहां क्यों खड़ी है?’’ ‘‘भागता है कि नहीं… नहीं तो चप्पल उतार कर सारा नशा उतार दूंगी तेरा,’’ मीना की इस बात को सुन कर वह आदमी चलता बना.

अब मीना ने ठान लिया था कि वह खाली आटोरिकशे में नहीं बैठेगी, क्योंकि उस ड्राइवर में अकेली औरत को देख कर न जाने कब रावण जिंदा हो जाए? ‘‘कहां चलना है मैडम?’’ एक आटोरिकशा वाला उस के पास आ कर बोला. जब मीना ने देखा कि उस की आंखों में वासना है, तब वह समझ गई कि इस की नीयत साफ नहीं है.

वह बोली, ‘‘कहीं नहीं.’’ ‘‘मैडम, अब कोई टैंपो मिलने वाला नहीं है…’’ वह लार टपकाते हुए बोला, ‘‘आप को कहां चलना है? मैं छोड़ आता हूं.’’

‘‘मुझे कहीं नहीं जाना है,’’ वह उसे झिड़कते हुए बोली. ‘‘जैसी आप की मरजी,’’ इतना कह कर वह आगे बढ़ गया.

मीना ने राहत की सांस ली. शायद आटोरिकशे वाला सही कह रहा था कि अब कोई टैंपो नहीं मिलने वाला है. अगर वह मिलेगा, तो भरा हुआ मिलेगा. मगर अब कितना भी भरा हुआ टैंपो आए, वह उस में लद जाएगी. वह लोगों की निगाह में बाजारू औरत नहीं बनना चाहती थी. मीना को फिल्मों के वे सीन याद आए, जब हीरोइन को अकेले पा कर गुंडे उठा कर ले जाते हैं, मगर न जाने कहां से हीरो आ जाता है और हीरोइन को बचा लेता है. मगर यहां किसी ने उस का अपहरण कर लिया, तब उसे बचाने के लिए कोई हीरो नहीं आएगा.

मीना आएदिन अखबारों में पढ़ती रहती थी कि किसी औरत के साथ यह हुआ, वह हुआ, वह यहां ज्यादा देर खड़ी रहेगी, तब उसे लोग गलत समझेंगे. तभी मीना ने देखा कि 3-4 नौजवान हंसते हुए उस की ओर आ रहे थे. उन्हें देख वह सिहर गई. अब वह क्या करेगी? खतरा अपने ऊपर मंडराता देख कर वह कांप उठी.

वे लोग पास आ कर उस के आसपास खड़े हो गए. उन में से एक बोला, ‘यहां क्यों खड़ी है?’’ दूसरे आदमी ने जवाब दिया, ‘‘उस्ताद, ग्राहक ढूंढ़ रही है.’’

तीसरा शख्स बोला, ‘‘मिला कोई ग्राहक?’’ पहले वाला बोला, ‘‘अरे, कोई ग्राहक नहीं मिला, तो हमारे साथ चल.’’

मीना ने उस अकेले शख्स से तो मजाक कर के भगा दिया था, मगर यहां 3-3 जिंदा रावण उस के सामने खड़े थे. उन्हें कैसे भगाए? वे तीनों ठहाके लगा कर हंस रहे थे, मगर तभी पुलिस की गाड़ी सायरन बजाती हुई आती दिखी.

एक बोला, ‘‘चलो उस्ताद, पुलिस आ रही है.’’ वे तीनों वहां से भाग गए. मगर मीना इन पुलिस वालों से कैसे बचेगी?

पुलिस की जीप उस के पास आ कर खड़ी हो गई. उन में से एक पुलिस वाला उतरा और कड़क आवाज में बोला, ‘‘इतनी रात को सड़क पर क्यों खड़ी है?’’

‘‘टैंपो का इंतजार कर रही हूं,’’ मीना सहमते हुए बोली. ‘‘अब रात को 11 बजे टैंपो नहीं मिलेगा. कहां जाना है?’’

‘‘सर, सांवरिया कालोनी.’’ ‘‘झूठ तो नहीं बोल रही है?’’

‘‘नहीं सर, मैं झूठ नहीं बोलती,’’ मीना ने एक बार फिर सफाई दी. ‘‘मैं अच्छी तरह जानता हूं तुम जैसी धंधा करने वाली औरतों को…’’ पुलिस वाला जरा अकड़ कर बोला, ‘‘अब जब पकड़ी गई हो, तो सती सावित्री बन रही हो. बता, वे तीनों लोग कौन थे?’’

‘‘मुझे नहीं मालूम सर.’’ ‘‘झूठ बोलते शर्म नहीं आती तुझे,’’ पुलिस वाला फिर गरजा.

‘‘मैं सच कह रही हूं सर. वह तीनों कौन थे, मुझे कुछ नहीं मालूम. मुझे अकेली देख कर वे तीनों आए थे. मैं वैसी औरत नहीं हूं, जो आप समझ रहे हैं,’’ मीना ने अपनी सफाई दी. ‘‘चल थाने, वहां सब असलियत का पता चल जाएगा. चल बैठ जीप में… सुना कि नहीं?’’

‘‘सर, मुझे मत ले चलो. मैं घरेलू औरत हूं.’’ ‘‘अरे, तू घरगृहस्थी वाली औरत है, तो रात के 11 बजे यहां क्या कर रही है? ठीक है, बता, तेरा पति कहां है?’’

‘‘सर, वे तो घर में हैं.’’ ‘‘मतलब, वही हुआ न… तू धंधा करने के लिए रात को अकेली निकली है और अपने पति की आंखों में धूल झोंक रही है. तेरा झूठ यहीं पकड़ा गया…

‘‘अच्छा, अब बता कि तू कहां से आ रही है?’’ ‘‘बूआ के यहां गीतसंगीत के प्रोग्राम में आई थी सर. वहीं देर हो गई.’’

‘‘फिर झूठ बोल रही है. बैठ जीप में,’’ पुलिस वाला अब तक उस पर शिकंजा कस चुका था. ‘‘ठीक है सर, अगर आप को यकीन नहीं हो रहा है, तो मैं उन्हें फोन कर के बुलाती हूं, ताकि आप को असलियत का पता चल जाए,’’ कह कर वह पर्स में से मोबाइल फोन निकालने लगी.

तभी पुलिस वाला दहाड़ा, ‘‘इस की कोई जरूरत नहीं है. मुझे मालूम है कि तू अपने पति को बुला कर उस के सामने अपने को सतीसावित्री साबित करना चाहेगी. सीधेसीधे क्यों नहीं कह देती है कि तू धंधा करती है.’’ मीना की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा था कि तभी अचानक राहुल उसे गाड़ी से आता दिखाई दिया. उस ने आवाज लगाई, ‘‘राहुल… राहुल.’’

राहुल पास आ कर बोला, ‘‘अरे मीना, तुम यहां…’’ अचानक उस की नजर जब पुलिस पर पड़ी, तब वह हैरानी से आंखें फाड़ते हुए देखता रहा.

पुलिस वाला उसे देख कर गरजा, ‘‘तुम कौन हो?’’ ‘‘मैं इस का पति हूं.’’

‘‘तुझे झूठ बोलते हुए शर्म नहीं आती,’’ पुलिस वाला अपनी वरदी का रोब दिखाते हुए बोला, ‘‘तुम दोनों मुझे बेवकूफ बना रहे हो. अपनी पत्नी से धंधा कराते हुए तुझे शर्म नहीं आती. चल थाने में जब डंडे पड़ेंगे, तब भूल जाएगा अपनी पत्नी से धंधा कराना.’’ यह सुन कर राहुल हाथ जोड़ता हुआ बोला, ‘‘आप यकीन रखिए सर, यह मेरी पत्नी है, बूआ के यहां गीत गाने अकेली गई थी. लौटने में जब देर हो गई, तब बूआ ने बताया कि यह तो घंटेभर पहले ही निकल चुकी है.

‘‘जब यह घर न पहुंची, तब मैं इसे ढूंढ़ने के लिए निकला. अगर आप को यकीन न हो, तो मैं बूआ को यहीं बुला लेता हूं.’’ ‘‘ठीक है, ठीक है. तुम झूठ तो नहीं बोल रहे हो,’’ पुलिस वाले ने जरा नरम पड़ते हुए कहा.

‘‘अकेली औरत को देर रात को बाहर नहीं भेजना चाहिए,’’ पुलिस वाले को जैसे अब यकीन हो गया था, इसलिए अपने तेवर ठंडे करते हुए वह बोला, ‘‘यह तो मैं समय पर आ गया, वरना वे तीनों गुंडे आप की पत्नी की न जाने क्या हालत करते. फिर आप लोग पुलिस वालों को बदनाम करते.’’ ‘‘गलती हमारी है. आगे से मैं ध्यान रखूंगा,’’ राहुल ने हाथ जोड़ कर माफी मांगते हुए कहा.

पुलिस की गाड़ी वहां से चली गई. मीना नीचे गरदन कर के खड़ी रही.

राहुल बोला, ‘‘देख लिया अकेले आने का नतीजा.’’ ‘‘राहुल, मुझे शर्मिंदा मत करो. रावण तो एक था, मगर इस 2 घंटे के समय में मुझे लगा कि आज भी कई रावण जिंदा हैं.

‘‘अगर आप नहीं आते, तो वह पुलिस वाला मुझे थाने में बैठा देता,’’ कह कर मीना ने मन को हलका कर लिया.

‘‘तो बैठो गाड़ी में…’’ गुस्से से राहुल ने कहा, ‘‘बड़ी लक्ष्मीबाई बनने चली थी.’’ मीना नजरें झुकाए चुपचाप गाड़ी में जा कर बैठ गई. Story In Hindi

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