Family Story: आखिरी खत – नैना की मां और शीलू का क्या रिश्ता था?

Family Story, लेखिका- अर्चना त्यागी

नैना बहुत खुश थी. उस की खास दोस्त नेहा की शादी जो आने वाली थी. यह शादी उस की दोस्त की ही नहीं थी बल्कि उस की बूआ की बेटी की भी थी. बचपन से ही दोनों के बीच बहनों से ज्यादा दोस्ती का रिश्ता था. पिछले 2 वर्षों में दोस्ती और भी गहरी हो गई थी. दोनों एक ही होस्टल में एक ही कमरे में रह रही थीं अपनी पढ़ाई के लिए. यही कारण था कि नैना कुछ अधिक ही उत्साहित थी शादी में जाने के लिए. वह आज ही जाने की जिद पर अड़ी थी जबकि उस के पिता चाहते थे कि हम सब साथ ही जाएं. उन की भी इकलौती बहन की बेटी की शादी थी. उन का उत्साह भी कुछ कम न था.

सुबह से दोनों इसी बात को ले कर उलझ रहे थे. मैं घर का काम खत्म करने में व्यस्त थी. जल्दी काम निबटे तो समान रखने का वक्त मिले. मांजी शादी में देने के लिए सामान बांधने में व्यस्त थीं.

जाने की तैयारी में 2 दिन और निकल गए. नैना को रोक पाना अब मुश्किल हो रहा था. वह अकेले जाने की जिद पर अड़ी थी. मैं ने पति को समझाया. ‘‘काम तो जीवनभर चलता रहेगा. शादीब्याह रोजरोज नहीं होते. फिर शादी के बाद नेहा भी अपनी ससुराल चली जाएगी तो पहले वाली बात नहीं रह जाएगी. नैना रोज उस से नहीं मिल पाएगी.’’

नैना के पिता सुनील ने पूरे एक हफ्ते की छुट्टी ले ली थी

वे पहले ही अपना मन बना चुके थे. बस, नैना को चकित करना चाहते थे. नैना, मैं और उस के पापा हम तीनों शादी से 4 दिन पहले ही दीदी के घर आ गए, शादी की सभी रस्में जो निभानी थीं. नैना के पिता यानी मेरे पति सुनील ने पूरे एक हफ्ते की छुट्टी ले ली थी शादी के बाद भी बचे हुए कामों में दीदी की सहायता करने के लिए. नेहा हमारी भी बेटी जैसी ही थी. बचपन से नैना के साथ ही रही थी तो उस से अपनापन भी कुछ ज्यादा ही था.

दीदी के घर अकसर हम कार से ही जाया करते थे. इस बार तो सामान अधिक था, सो कार से जाना ही सुविधाजनक था. मांजी और पिताजी बाद में ट्रेन से आने वाले थे. हम तीनों कार से ही दीदी के घर के लिए रवाना हो गए. 5-6 घंटे के रास्ते में नैना ने एक बार भी कार को रोकने नहीं दिया. उस का उतावलापन देखते ही बनता था. शाम को लगभग 5 बजे हम उन के घर पर थे.

शादी में 4 दिन अभी शेष थे, फिर भी नेहा ने अपनी नाराजगी जाहिर की. नैना से तो उस ने बात भी न की. उस की नाराजगी इस बात से थी कि वह इस बार अकेले क्यों नहीं आ पाई. हर बार तो आती थी. क्या शादी से पहले ही उसे पराया मान लिया गया है? नैना अपने तर्क दे रही थी. पिछले हफ्ते ही परीक्षा समाप्त हुई थी. कपड़े भी सिलाने थे. कुछ और भी तैयारी करनी थी. उस के सभी तर्क बेकार गए. उस दिन तो नेहा ने उस से बात न की.

अगले दिन मुझे हस्तक्षेप करना ही पड़ा, ‘‘अब तो आ गए हैं न, अब तो बात करो.’’ मैं ने जोर दे कर कहा तो उस की समझ में कुछ बात आई. 3 दिन कैसे निकले, पता ही न चला. अगले दिन नेहा की बरात आने वाली थी. मैं दीदी के साथ ही थी. नेहा के चले जाने की बात से वे बहुत उदास थीं. लड़का विदेश में था. कुछ महीनों बाद नेहा को भी उस के साथ जाना होगा. यही सोच कर उन की आंखें बारबार भर आती थीं.

मैं ने उन्हें दुनियादारी समझाने की पूरी कोशिश की. ‘‘इतने अच्छे घर में रिश्ता हुआ है. परिवार भी छोटा ही है. खुले दिमाग के लोग हैं. विदेश में रह कर भी अपनी सभ्यता नहीं भूले हैं. हमारी नेहा बहुत खुश रहेगी उन के घर. नेहा को नौकरी करने से भी मना नहीं कर रहे हैं. और तो और, अपने व्यवसाय में उसे जिम्मेदारी देने को तैयार हैं. और क्या चाहिए हमें?’’

शादी के दिन तक ये सभी बातें जाने कितनी बार मैं ने उन के सामने बोली थीं. इस से ज्यादा कुछ जानती भी न थी मैं नेहा की ससुराल वालों के बारे में. दीदी से पूछने की कोशिश भी की पर उन्हें उदास देख कर मन में ही रोक लिए थे अपने सभी प्रश्न.

आखिर वह घड़ी आ गई जिस का हम सब को इंतजार था. नेहा की बरात आ गई. दूल्हे का स्वागत करने दरवाजे पर जाना था दीदी को. साथ मैं भी थी. आरती की थाली हाथ में पकड़े दीदी आगे चल रही थीं. मैं शादी में आई दूसरी औरतों के साथ उन के पीछे चल रही थी. मन में बड़ा कुतूहल था दूल्हे को देखने का. तभी बरात घर के सामने आ कर रुकी. दूल्हे राजा घोड़ी से नीचे उतरे और दोस्तों, रिश्तेदारों के झुंड के साथ मुख्यद्वार के सामने रुक गए.

बैंडबाजे के साथ दूल्हे को तिलक लगा कर हम ने उस का स्वागत किया. स्वागत के बाद हम लोग घर की ओर मुड़ गए और बरात स्टेज की ओर बढ़ गई. नेहा को उस की सहेलियों ने घेर रखा था. हम लोग भी वहीं खड़े हो कर वरमाला का इंतजार करने लगे. नेहा आसमान से उतरी एक परी की तरह दिख रही थी. दुलहन के लिबास में उस का रंगरूप और भी निखर गया था. कुछ देर बाद वरमाला के लिए नेहा का बुलावा आ गया.

नेहा नैना और अपनी दूसरी सहेलियों के साथ स्टेज की ओर धीरेधीरे बढ़ रही थी. दीदी सहित हम सभी औरतें उन से थोड़ी दूरी पर चल रहे थे. मैं ने अपना चश्मा अब पहन लिया था. स्वागत के समय दूल्हे को ठीक से देख न पाई थी. नेहा ने वरमाला पहनाई. सभी लोगों ने तालियां बजाईं. अब दूल्हे की बारी थी. उस ने भी वरमाला नेहा के गले में पहना दी. एक बार वापस तालियों की गड़गड़ाहट फिर से गूंज उठी. वरमाला पहनाने की रस्म पूरी होते ही दूल्हादुलहन स्टेज पर बैठ गए. अब दोनों को सामने से देख सकते थे. दूल्हे का चेहरा जानापहचाना सा लग रहा था मुझे.

लगभग 2 बजे नेहा अंदर आ गई. फेरों की तैयारियां शुरू हो गईं. पंडितजी अपने आसन पर बैठ गए. दूल्हा फेरों के लिए बैठ चुका था. पंडितजी ने अपना काम प्रारंभ कर दिया. कुछ देर बाद नेहा को भी बुलवा लिया. अधिकतर मेहमान उस समय तक विदा हो चुके थे. घर के लोग और कुछ निजी रिश्तेदार ही रुके थे. निजी रिश्तेदारों में भी हमारा परिवार ही जाग रहा था. बाकी लोग खाना खा कर सो चुके थे. सभी को अगले दिन जाना ही था.

क्या नेहा ससुराल जाकर खुश हुई?

सुबह 4 बजे नेहा की विदाई हो गई. घर में गिनती के लोग रह गए थे. पूरा घर सूनासूना लग रहा था. नैना एक कमरे में उदास बैठी थी. मैं नाश्ते की व्यवस्था करने के लिए रसोईघर में थी. दीदी भी नैना के पास ही बैठी थीं. रातभर जागने के बाद भी किसी का सोने का मन नहीं था. घर में रौनक लड़कियों के कारण ही होती है, आज सभी यह महसूस कर रहे थे.

पग फिराई की रस्म के लिए नेहा कल घर वापस आने वाली थी. घर को व्यवस्थित भी करना था. सब का नाश्ता हुआ, तब तक नैना और दीदी ने मिल कर घर की सफाई कर ली. ऊपर वाला कमरा मेहमानों के विश्राम के लिए रखा था. 11 बजे वे लोग आ गए- नेहा, प्रतीक और एकदो रिश्तेदार. उन के आते ही सब लोग उन के स्वागत में जुट गए. लड़की की ससुराल से पहली बार मेहमान घर आए थे. चाव ही अलग था. हम लोग नेहा के साथ व्यस्त हो गए. नैना और उस के पापा प्रतीक और बाकी मेहमानों के साथ ऊपर वाले कमरे में चले गए. जीजाजी ने बहुत रोका परंतु दोपहर का खाना खा कर नेहा को ले कर वे लोग लगभग 4 बजे रवाना हो गए.

हम ने जाने के लिए कहा तो दीदी ने रोना शुरू कर दिया, ‘‘भाभी, मैं अकेली रह गई हूं अब. आप तो जानते हो नेहा भी अभी जल्दी नहीं आने वाली वापस. आप को कुछ और दिन रुकना ही होगा.’’

उन्होंने जिद पकड़ ली. नैना, उस के पापा और मांजी और पिताजी उसी दिन शाम को घर लौट गए. मैं दोचार दिन के लिए रुक गई. सब के जाने के बाद दीदी ने नेहा की ससुराल से आया सामान खोला. सभी के लिए कुछ न कुछ उपहार दिया था उस की ससुराल वालों ने. मेरे लिए भी. मेरा पैकेट हाथ में दे कर दीदी बोलीं, ‘‘भाभी, घर जा कर खोलना भैया और नैना के उपहार के साथ.’’ मुझे उन की बात ठीक लगी. मन में एक प्रश्न जरूर था, ‘लड़की की ससुराल से इतने उपहार?’ प्रश्न मन में रख कर पैकेट अपने सूटकेस में रख लिए.

जब रोकना चाहें तो समय पंख लगा कर उड़ता है. शनिवार को सुनील मुझे ले जाने के लिए आए. दीदी बहुत उदास थीं. परंतु अब रुकना संभव नहीं था. नैना को भी जाना था. उसे नौकरी मिल गई थी स्नातकोत्तर के अंतिम वर्ष में ही. नेहा की शादी के कारण उस ने जाने का समय कुछ दिन बाद रखा था. रविवार सुबह ही हम घर के लिए रवाना हो गए.

घर जा कर देखा तो मांजी घर पर अकेली थीं. टीवी देखते हुए सब्जी काट रही थीं. उन के चरण स्पर्श कर के मैं ने नैना के बारे में पूछा. उन्होंने थोड़ा रोष से जवाब दिया, ‘‘किसी दोस्त के घर पर गई होगी. तुम्हारे पीछे घर पर रुकती ही कहां है? आजकल की लड़कियां थोड़ा पढ़लिख जाएं तो नौकरी तलाश कर लेती हैं. घर के कामकाज तो छोड़ो, घर पर रहना ही उन्हें नहीं भाता है.’’

मेरे बोलने से पहले ही सुनील ने बात खत्म करने के उद्देश्य से कहा, ‘‘आ जाएगी मां. किसी काम से ही गई होगी. जब जिम्मेदारी सिर पर आती है, सब निभाना सीख जाते हैं.’’ इन की बात खत्म होते ही नैना आ गई.

‘‘लो दादी, तुम्हारी दवाइयां. बहुत दूर से मिलीं,’’ दवाई दादी के पास रख कर उस ने कहा और आ कर मुझ से लिपट गई.

‘‘तुम्हारे बिना घर पर मन ही नहीं लगता मां,’’ उस ने मुझ से लिपट कर कहा. फिर थोड़ा सामान्य हो कर बोली, ‘‘मेरा उपहार तो दो जो नेहा की ससुराल वालों ने दिया है. जल्दी दो न मां.’’

‘‘ठीक है, मुझे छोड़ो और मेरे पर्स से चाबी ले लो. सूटकेस खोल कर सब के पैकेट निकाल लो.’’

मैं ने उसे अपने से अलग करते हुए कहा, ‘‘मां, अपना पैकेट तुम खोलो. पापा का उन को देती हूं.’’

मेरा पैकेट दे कर नैना मांजी को अपना उपहार दिखाने चली गई. मैं पैकेट हाथ में ले कर कमरे की ओर बढ़ गई. कपड़े भी बदलने थे. पहले पैकेट खोल लेती हूं. बेचैन रहेगी तब तक यह लड़की. मैं ने मन में सोचा. खोला तो सब से पहले एक पत्र था. लिफाफे में था. परंतु पोस्ट नहीं किया गया था. सकुचाते हुए मैं ने लिफाफे से पत्र निकाला.

‘‘मां,

‘यह मेरा आखिरी खत है. इस के बाद तो मैं आप से मिलता ही रहूंगा. मैं ने नेहा से इसीलिए शादी की है कि आप के संपर्क में रह पाऊं. नेहा बहुत अच्छी लड़की है परंतु आप से झूठ नहीं बोल सकता हूं.

‘‘क्या आप को अपना शीलू याद है मां? मैं एक दिन भी आप को नहीं भूला हूं. दादादादी मुझे बहुत प्यार करते हैं. चाचाचाची ने मुझे अपने पास विदेश में रख कर काबिल बनाया. मुझे उन से कोई शिकायत नहीं है मां. बस, यह जानना चाहता हूं कि तुम मुझे छोड़ कर क्यों गईं? क्या मजबूरी थी मां? पापा के जाने के बाद मैं आप के साथ था. फिर आप ने मुझे क्यों छोड़ा, मां वह भी बिना बताए. अब तो आप को बताना ही पड़ेगा मां. मैं आप के जवाब का इंतजार करूंगा.

‘आप का राजा बेटा,

‘शीलू.’

मेरी आंखों से आंसू टपटप गिर रहे थे. पत्र पूरा भीग चुका था. ‘लू, मेरा बेटा’. मुंह से निकला और मैं फफकफफक कर रो पड़ी. सालों पुराने जख्म हरे हो चुके थे. कुछ देर के लिए चेतना शून्य हो गई थी मेरी. बस, बोलती जा रही थी, ‘मैं तुम्हें कैसे बताती बेटा, तुम बहुत छोटे थे. तुम्हारी दादी का ही निर्णय था यह. दुर्घटना में तुम्हारे पिता की मृत्यु के बाद भी मैं उन लोगों के साथ ही रहना चाहती थी, तुम्हें ले कर रह भी रही थी. एक दिन के लिए भी उन्हें छोड़ कर कहीं नहीं गई. तुम्हारे नाना के घर भी नहीं. तुम्हारी दादी ने ही बुलाया था उन्हें.

‘घर बुला कर कहा था कि यदि अपनी बेटी का पुनर्विवाह नहीं कर सकते हो तो कोई लड़का देख कर हम ही कर देंगे. छोटे बेटे की शादी के बाद हम शीलू को ले कर उस के साथ विदेश चले जाएंगे. इसलिए शीलू की चिंता करने की जरूरत नहीं है. एक वाक्य में तुम्हें मुझ से अलग कर दिया था उन्होंने.’

तभी सुनील अंदर आए. उन्हें देख कर मैं फिर से रो पड़ी. ‘‘तुम तो सब जानते हो सुनील. तुम तो भैया के करीबी दोस्त थे न. शादी से ले कर खाली हाथ वापस घर आने तक सब तुम ने अपनी आंखों से देखा है, कानों से सुना है. किस तरह अपमानित कर के मुझे घर से निकाल दिया था उन्होंने. आखिरी बार शीलू से मिलने भी नहीं दिया था. देखो, यह चिट्ठी देखो.’’

‘‘अरे हां, देख रहा हूं भाई.’’ उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘कुछ भी भूला नहीं हूं. अब उठो. वर्तमान में आओ. शीलू ने तुम्हें हमेशा के लिए ढूंढ़ लिया है. मैं नेहा की शादी से पहले से जानता हूं कि प्रतीक ही शीलू है.’’

मैं हतप्रभ उन्हें देख रही थी. नैना भी तब तक कमरे में आ चुकी थी, बोली, ‘‘मां, अगले हफ्ते नेहा और प्रतीक आ रहे हैं घर पर. हनीमून के लिए जाते हुए वे हम लोगों से मिलते हुए जाएंगे. उठो मां, बहुत सी तैयारियां करनी हैं उन के स्वागत की.’’

सब की आवाज सुन कर मांजी भी कमरे में आ गईं. मैं उठने लगी तो वे बोलीं, ‘‘बेटा, दोनों भाईबहनों ने मुझे मना किया था तुम्हें बताने के लिए. इसीलिए मैं चुप रही. मुझे माफ करना. पहले बता दिया होता तो तुम्हारा दिल तो नहीं दुखता.’’

मैं ने उठ कर उन के पैर पकड़ लिए, बोल पड़ी, ‘‘मां, तुम ने तो मेरा दिल हमेशा के लिए खुश कर दिया है. आज जिंदगी को फिर से देखा. एक वह मां थी. एक यह मां है. एक वह समय था जब शीलू को मुझ से मिलने ही नहीं दिया गया. एक यह समय है जब शीलू मुझ से मिलने आने वाला है.’’

‘शीलू से मिल कर, उसे अपने सीने से लगा कर, उस की सारी शिकायतें दूर कर दूंगी. मेरे बेटे, तू ने अपनी मां को आज जीवन की वे खुशियां दी हैं, जो मुझ से छीन ली गई थीं. शीलू, मेरे बेटे जल्दी आ,’ मेरा मन सोचते हुए खुशी से भरा जा रहा था.

Hindi Story: इज्जत की खातिर – क्यों एक बाप ने की बेटी की हत्या

Hindi Story: सरपंच होने के नाते इंद्राज की सारे गांव में तूती बोलती थी. उन के पास से गुजरते समय लोग सहम जाते थे. किसी की जोरू भागी हो, कोई इश्क या नाजायज संबंध का मामला हो या खेती का मामला हो, सब का फैसला इंद्राज ही करते थे. आसपास के 4 गांवों के मामले इंद्राज ही निबटाते थे.

‘‘मातादीन, नीम के नीचे चारपाई बिछाओ. हम अभी आते हैं,’’ इंद्राज ने आवाज लगाई.

‘‘जी मालिक, अभी बिछाते हैं,’’ हमेशा इंद्राज के आदेशों के इंतजार में रहने वाले नौकर ने जवाब दिया.

इंद्राज एक गिलास छाछ पी कर घर से निकलते हुए बेदो देवी को आदेश देते हुए बोले, ‘‘आज पुनिया गांव से बुलावा आया है. बाहर लोग बैठे हैं. एक दिन की भी फुरसत नहीं मिलती. तुम जरा सुमन का खयाल रखना. वह कहीं आएजाए नहीं,’’ इतना कह कर इंद्राज बाहर निकल कर चारपाई पर बैठ गए.

‘‘क्या है रे छज्जू, क्या बात हो गई?’’ इंद्राज ने चारपाई के पास खड़े लोगों में से एक से पूछा, जो फरियाद ले कर आया था.

‘‘हुजूर, कालू अहीर का लड़का हमारी लड़की को जबरन उठा ले गया था और उस ने एक रात उसे अपने पास रखा भी,’’ छज्जू ने हाथ जोड़ कर कहा.

‘‘तो यह बात है…’’ अपने सिर को हिलाते हुए सरपंच ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम सब गांव पहुंचो. वहां के पंच से कह देना कि हम वहां पर पंचायत करने आ रहे हैं.

‘‘और हां, कालू से कह देना कि गांव छोड़ कर कहीं बाहर न जाए.’’

‘‘बाबूजी, पास के गांव में मेला लगा है. सुषमा और सुमरन के साथ क्या मैं भी मेला देखने चली जाऊं?’’ जब पुनिया गांव के लोग चले गए, तो सुमन इंद्राज से इजाजत लेने आई.

‘‘हमारी बेटी मेले में जा कर इठलाएबलखाए, यह हमें मंजूर नहीं,’’ इंद्राज ने अपनी कटीली रोबदार मूंछों पर हाथ फेरते हुए कहा. बेचारी सुमन अपना सा मुंह ले कर लौट गई.

सुमन के जिद करने पर उस की मां बेदो देवी ने उसे अपने पिता से इजाजत लेने को कहा. वह अपनी तरफ से बेटी को भेज नहीं सकती थी, क्योंकि वह इंद्राज के सनकी दिमाग को अच्छी तरह जानती थी.

मातादीन मोटरसाइकिल को चमका रहा था. इंद्राज के आवाज लगाने पर वह मोटरसाइकिल ले कर उन के सामने खड़ा हो गया.

इंद्राज ने मोटरसाइकिल पर अपने पीछे 2 लठैतों को भी बैठा लिया और तेजी से पुनिया गांव की ओर चल पड़ा.

मोटरसाइकिल पंचों के पास जा कर ठहरी. सभी पंच पहले से ही सरपंच इंद्राज की राह देख रहे थे.

‘नमस्ते सरपंचजी,’ सभी पंचों ने कहा.

‘‘नमस्ते,’’ इंद्राज से उन लोगों ने हाथ मिलाया और बेहद इज्जत के साथ उन्हें बीच वाले आसन पर अपने साथ बैठाया.

‘‘कालू और छज्जू हाजिर हों,’’ गांव के एक हरकारे ने जोरदार आवाज लगाई. कालू और छज्जू हाथ जोड़े सामने आ कर खड़े हो गए.

पंचों ने उन से बैठने को कहा, तो वे दोनों सहमी बिल्ली की तरह बैठ गए.

पंचों का फैसला सुनने के लिए एक तरफ औरतें और दूसरी ओर मर्द खड़ेहो गए.

‘‘हां, तो अपनीअपनी शिकायत पेश करो…’’ इंद्राज ने हांक लगाई, ‘‘छज्जू की बात तो हम सुन चुके हैं, अब कालू की बारी है.’’

‘‘जी हुजूर, छज्जू की बेटी सुमतिया अपनी मरजी से गोलू के साथ भागी थी,’’ कालू ने गिड़गिड़ाते हुए उन से कहा.

‘‘सुमतिया को तुरंत हाजिर करो,’’ दाताराम पंच ने कहा.

सुमतिया और गोलू भी वहां पहले से मौजूद थे. सुमतिया सलवारसूट में थी. पंच की पुकार पर वह सामने आ कर खड़ी हो गई.

‘‘क्यों, तू अपनी मरजी से भागी थी?’’ इंद्राज ने कड़क आवाज में पूछा.

लेकिन सुमतिया शर्म की वजह से कुछ बोल नहीं पा रही थी. वह सिर झुका कर खड़ी रही.

पंचों के दोबारा पूछने पर सुमतिया ने ‘हां’ में जवाब दिया.

‘‘गोलू ने तुम्हारे साथ कुछ गलत तो नहीं किया?’’ इस सवाल पर सुमतिया झेंप गई और कोई जवाब नहीं दे पाई.

पंचों ने सजा देने के लिए आपस में सलाह करनी शुरू कर दी. आखिर में सरपंच ने फैसला सुनाते हुए कहा, ‘‘चूंकि दोनों की बिरादरी एक है, इसलिए इन दोनों की शादी कर देनी चाहिए.’’

इस के बाद सरपंच ने छज्जू से कहा, ‘‘सुमतिया अपनी मरजी से भागी थी. गोलू उसे जबरन नहीं ले गया था. लेकिन तुम ने पंचों से झूठ बोला. तुम को तो वैसे भी अपनी बेटी एक दिन ब्याहनी ही थी, इसलिए सजा के तौर पर तुम कालू को 2 बीघा जमीन, 2 बैल और 4 तोले सोना दोगे.’’

सजा सुन कर छज्जू को पसीना आ गया. वह गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘हुजूर, यह तो बहुत ज्यादा है. मैं इतना कहां से दे पाऊंगा?’’

‘‘लड़की को काबू में नहीं रख सकता, चला है बात करने…’’ इंद्राज ने जोर से झाड़ लगाई, ‘‘अगर नहीं दे सकते, तो जमीन गिरवी रख कर मुझ से कर्ज ले लेना.’’

कर्ज के नाम से छज्जू के पैरों तले जमीन हिलने लगी. उसे पता था कि एक बार का कर्ज पीढि़यों तक नहीं चुकता. उस के दादा ने एक बार कर्ज लिया था, तो वह अभी तक चला आ रहा था, पर पंचों का फैसला उसे मानना ही पड़ा.

कुछ महीने की मुहलत लेने के बाद एक दिन छज्जू खेत के कागजात ले कर इंद्राज के पास पहुंचा.

इंद्राज उस से अंगूठा लगवाने वाले ही थे कि अचानक वहां परेशान सा मातादीन आ गया.

‘‘देखिए माईबाप, सुमन बिटिया को क्या हो गया?’’ मातादीन हांफते हुए कहने लगा, ‘‘बिटिया उलटी पर उलटी किए जा रही है. जल्दी से डाक्टर को बुला लाऊं क्या?’’इंद्राज ने सुना तो फौरन घर के अंदर की ओर भागे.

‘‘क्या हुआ सुमन को?’’ इंद्राज ने अपनी बीवी बेदो देवी से सख्त लहजे में पूछा.

‘‘होना क्या है? किसी का पाप पेट में पाल रही है,’’ बेदो देवी सुमन को पीटते हुए बोली.

‘‘कुछ बताया इस ने किस का है?’’ इंद्राज की अकड़ अब कुछ हद तक ढीली हो गई.

‘‘मुरेना, चरण अहीर का लड़का. वही सरपंच, जिस से पिछले साल आप की ठन गई थी,’’ बेदो देवी ने याद दिलाते हुए कहा, ‘‘इस कलमुंही ने तो हमारी इज्जत को रौंद कर रख दिया. हम कहीं के नहीं रहे.’’

‘‘धीरे बोलो बेदो, आसपास और भी कान हैं. अब रात को ही इस का कुछ इंतजाम करते हैं.’’

‘‘हमारे खानदान की तो इस ने नाक कटा दी. इज्जत और न मिट्टी में मिला दिया. 4 गांवों के सरपंच को अब अपने घर का फैसला करना मुश्किल होगा,’’ बेदो देवी बड़बड़ाई.

रात होते ही लड़की के नाना को बुला लिया गया. वह भी अग्रोहा गांव के सरपंच थे. तीनों ने आपस में सलाह कर सुमन को सल्फास पीने पर मजबूर कर दिया. अपनी इज्जत बचाने का उन्हें और कोई रास्ता नजर नहीं आया.

सुबह तक सुमन जिंदगी और मौत के बीच छटपटाती रही. खुदकुशी का बहाना बना कर वे लोग उसे शहर के सरकारी अस्पताल ले गए. उस की हालत से लग रहा था कि वह रास्ते में ही मर जाएगी. मगर अस्पताल पहुंचने तक वह जिंदा रही.

डाक्टर ने उसे तुरंत भरती कर लिया, लेकिन डाक्टर ने पुलिस को फोन कर दिया. डाक्टर की नजर में वह पुलिस केस था.

पुलिस आई, तो सुमन के बयान पर तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया. दूसरे दिन अखबारों में बड़ेबड़े अक्षरों में छपा, ‘इज्जत की खातिर जवान बेटी को मौत की नींद सुला दिया गया.’

Hindi Kahani: गहरी चाल – क्या थी सुनयना की चाल

Hindi Kahani: सुनयना दोनों हाथों में पोटली लिए खेत में काम कर रहे पति और देवर को खाना देने जा रही थी. उसे जब भी समय मिलता, तो वह पति और देवर के साथ खेत के काम में जुट जाती थी.

अपनी धुन में वह पगडंडी पर तेज कदमों से चली जा रही थी, तभी सामने से आ रहे सरपंच के लड़के अवधू और मुनीम गंगादीन पर उस की नजर पड़ी. वह ठिठक कर पगडंडी से उतर कर खेत में खड़ी हो गई और उन दोनों को जाने का रास्ता दे दिया.

अवधू और मुनीम गंगादीन की नजर सुनयना की इस हरकत और उस के गदराए जिस्म के उतारचढ़ावों पर पड़ी. वे दोनों उसे गिद्ध की तरह ताकते हुए आगे बढ़ गए.

कुछ दूर जाने के बाद अवधू ने गंगादीन से पूछा, ‘‘क्यों मुनीमजी, यह ‘सोनचिरैया’ किस के घर की है?’’

‘‘यह तो सुखिया की बहू है. जा रही होगी खेत पर अपने पति को खाना पहुंचाने. सुखिया अभी 2 महीने पहले ही तो मरा था. 3 साल पहले उस ने सरपंचजी से 8 हजार रुपए उधार लिए थे. अब तक तो ब्याज जोड़ कर 17 हजार रुपए हो गए होंगे,’’ अवधू की आदतों से परिचित मुनीम गंगादीन ने मसकेबाजी करते हुए कहा.

‘लाखों का हीरा, फिर भी इतना कर्ज. आखिर हीरे की परख तो जौहरी ही कर सकता है न,’ अवधू ने कुछ सोचते हुए पूछा, ‘‘और मुनीमजी, कैसी है तुम्हारी वसूली?’’

‘‘तकाजा चालू है बेटा. जब तक सरपंचजी तीर्थयात्रा से वापस नहीं आते, तब तक इस हीरे से थोड़ीबहुत वसूली आप को ही करा देते हैं.’’

‘‘मुनीमजी, जब हमें फायदा होगा, तभी तो आप की तरक्की होगी.’’

दूसरे दिन मुनीम गंगादीन सुबहसुबह ही सुनयना के घर जा पहुंचा. उस समय सुखिया के दोनों लड़के श्यामू और हरिया दालान में बैठे चाय पी रहे थे.

गंगादीन को सामने देख श्यामू ने चाय छोड़ कर दालान में रखे तख्त पर चादर बिछाते हुए कहा, ‘‘रामराम मुनीमजी… बैठो. मैं चाय ले कर आता हूं.’’

‘‘चाय तो लूंगा ही, लेकिन बेटा श्यामू, धीरेधीरे आजकल पर टालते हुए 8 हजार के 17 हजार रुपए हो गए. तू ने महीनेभर की मुहलत मांगी थी, वह भी पूरी हो गई. मूल तो मूल, तू तो ब्याज तक नहीं देता.’’

‘‘मुनीमजी, आप तो घर की हालत देख ही रहे हैं. कुछ ही दिनों पहले हरिया का घर बसाया है और अभीअभी पिताजी भी गुजरे हैं,’’ श्यामू की आंखों में आंसू भर आए.

‘‘मैं तो समझ रहा हूं, लेकिन जब वह समझे, जिस की पूंजी फंसी है, तब न. वैसे, तू ने महीनेभर की मुहलत लेने के बाद भी फूटी कौड़ी तक नहीं लौटाई,’’ मुनीम गंगादीन ने कहा.

तब तक सुनयना गंगादीन के लिए चाय ले कर आ गई. गंगादीन उस की नाजुक उंगलियों को छूता हुआ चाय ले कर सुड़कने लगा और हरिया चुपचाप बुत बना सामने खड़ा रहा.

‘‘देख हरिया, मुझ से जितना बन सका, उतनी मुहलत दिलाता गया. अब मुझ से कुछ मत कहना. वैसे भी सरपंचजी तुझ से कितना नाराज हुए थे. मुझे एक रास्ता और नजर आ रहा है, अगर तू कहे तो…’’ कह कर गंगादीन रुक गया.

‘कौन सा रास्ता?’ श्यामू व हरिया ने एकसाथ पूछा.

‘‘तुम्हें तो मालूम ही है कि इन दिनों सरपंचजी तीर्थयात्रा करने चले गए हैं. आजकल उन का कामकाज उन का बेटा अवधू ही देखता है.

‘‘वह बहुत ही सज्जन और सुलझे विचारों वाला है. तुम उस से मिल लो. मैं सिफारिश कर दूंगा.

‘‘वैसे, तेरे वहां जाने से अच्छा है कि तू अपनी बीवी को भेज दे. औरतों का असर उन पर जल्दी पड़ता है. किसी बात की चिंता न करना. मैं वहां रहूंगा ही. आखिर इस घर से भी मेरा पुराना नाता है,’’ मुनीम गंगादीन ने चाय पीतेपीते श्यामू व हरिया को भरोसे में लेते हुए कहा.

सुनयना ने दरवाजे की ओट से मुनीम की सारी बातें सुन ली थीं. श्यामू सुनयना को अवधू की कोठी पर अकेली नहीं भेजना चाहता था. पर सुनयना सोच रही थी कि कैसे भी हो, वह अपने परिवार के सिर से सरपंच का कर्ज उतार फेंके.

दूसरे दिन सुनयना सरपंच की कोठी के दरवाजे पर जा पहुंची. उसे देख कर मुनीफ गंगादीन ने कहा, ‘‘बेटी, अंदर आ जाओ.’’

सुनयना वहां जाते समय मन ही मन डर रही थी, लेकिन बेटी जैसे शब्द को सुन कर उस का डर जाता रहा. वह अंदर चली गई.

‘‘मालिक, यह है सुखिया की बहू. 3 साल पहले इस के ससुर ने हम से 8 हजार रुपए कर्ज लिए थे, जो अब ब्याज समेत 17 हजार रुपए हो गए हैं. बेचारी कुछ और मुहलत चाहती है,’’ मुनीम गंगादीन ने सुनयना की ओर इशारा करते हुए अवधू से कहा.

‘‘जब 3 साल में कुछ भी नहीं चुका पाया, तो और कितना समय दिया जाए? नहींनहीं, अब और कोई मुहलत नहीं मिलेगी,’’ अवधू अपनी कुरसी से उठते हुए बोला.

‘‘देख, ऐसा कर. ये कान के बुंदे बेच कर कुछ पैसा चुका दे,’’ अवधू सुनयना के गालों और कानों को छूते हुए बोला.

‘‘और हां, तेरा यह मंगलसूत्र भी तो सोने का है,’’ अवधू उस के उभारों को छूता हुआ मंगलसूत्र को हाथ में पकड़ कर बोला.

सुनयना इस छुअन से अंदर तक सहम गई, फिर भी हिम्मत बटोर कर उस ने कहा, ‘‘यह क्या कर रहे हो छोटे ठाकुर?’’

‘‘तुम्हारे गहनों का वजन देख रहा हूं. तुम्हारे इन गहनों से शायद मेरे ब्याज का एक हिस्सा भी न पूरा हो,’’ कह कर अवधू ने सुनयना की दोनों बाजुओं को पकड़ कर हिला दिया.

‘‘अगर पूरा कर्ज उतारना है, तो कुछ और गहने ले कर थोड़ी देर के लिए मेरी कोठी पर चली आना…’’ अवधू ने बड़ी बेशर्मी से कहा, ‘‘हां, फैसला जल्दी से कर लेना कि तुझे कर्ज उतारना है या नहीं. कहीं ऐसा न हो कि तेरे ससुर के हाथों लिखा कर्ज का कागज कोर्ट में पहुंच जाए.

‘‘फिर भेजना अपने पति को जेल. खेतघर सब नीलाम करा कर सरकार मेरी रकम मुझे वापस कर देगी और तू सड़क पर आ जाएगी.’’

सुनयना इसी उधेड़बुन में डूबी पगडंडियों पर चली जा रही थी. अगर वह छोटे ठाकुर की बात मानती है, तो पति के साथ विश्वासघात होगा. अगर वह उस की बात नहीं मानती, तो पूरे परिवार को दरदर की ठोकरें मिलेंगी.

कुछ दिनों बाद मुनीम गंगादीन फिर सुनयना के घर जा पहुंचा और बोला, ‘‘बेटी सुनयना, कर लिया फैसला? क्या अपने गहने दे कर ठाकुर का कर्ज चुकाएगी?’’

‘‘हां, मैं ने फैसला कर लिया है. बोल देना छोटे ठाकुर को कि मैं जल्दी ही अपने कुछ और गहने ले कर आ जाऊंगी कर्जा उतारने. उस से यह भी कह देना कि पहले कर्ज का कागज लूंगी, फिर गहने दूंगी.’’

‘‘ठीक है, वैसे भी छोटे ठाकुर सौदे में बेईमानी नहीं करते. पहले अपना कागज ले लेना, फिर…’’

वहीं खड़े सुनयना के पति और देवर यही सोच रहे थे कि शायद सुनयना ने अपने सोने और चांदी के गहनों के बदले पूरा कर्ज चुकता करने के लिए छोटे ठाकुर को राजी कर लिया है. उन्हें इस बात का जरा भी गुमान न हुआ कि सोनेचांदी के गहनों की आड़ में वह अपनी इज्जत को दांव पर लगा कर के परिवार को कर्ज से छुटकारा दिलाने जा रही है.

‘‘और देख गंगादीन, अब मुझे बेटीबेटी न कहा कर. तुझे बेटी और बाप का रिश्ता नहीं मालूम है. बाप अपनी बेटी को सोनेचांदी के गहनों से लादता है, उस के गहने को उतरवाता नहीं है,’’ सुनयना की आवाज में गुस्सा था.

दूसरे दिन सुनयना एक रूमाल में कुछ गहने बांध कर अवधू की कोठी पर पहुंच गई.

‘‘आज अंदर कमरे में तेरा कागज निकाल कर इंतजार कर रहे हैं छोटे ठाकुर,’’ सुनयना को देखते ही मुनीम गंगादीन बोला.

सुनयना झटपट कमरे में जा पहुंची और बोली, ‘‘देख लो छोटे ठाकुर, ये हैं मेरे गहने. लेकिन पहले कर्ज का कागज मुझे दे दो.’’

‘‘ठीक है, यह लो अपना कागज,’’ अवधू ने कहा.

सुनयना ने उस कागज पर सरसरी निगाह डाली और उसे अपने ब्लाउज के अंदर रख लिया.

‘‘ये गहने तो लोगों की आंखों में परदा डालने के लिए हैं. तेरे पास तो ऐसा गहना है, जिसे तू जब चाहे मुझे दे कर और जितनी चाहे रकम ले ले,’’ अवधू कुटिल मुसकान लाते हुए बोला.

‘‘यह क्या कह रहे हो छोटे ठाकुर?’’ सुनयना की आवाज में शेरनी जैसी दहाड़ थी.

अवधू को इस की जरा भी उम्मीद नहीं थी. सुनयना बिजली की रफ्तार से अहाते में चली गई. तब तक गांव की कुछ औरतें और आदमी भी कोठी के सामने आ कर खड़े हो गए थे. वहां से अहाते के भीतर का नजारा साफ दिखाई दे रहा था.

लोगों को देख कर नौकरों की भी हिम्मत जाती रही कि वे सुनयना को भीतर कर के दरवाजा बंद कर लें. अवधू और गंगादीन भी समझ रहे थे कि अब वे दिन नहीं रहे, जब बड़ी जाति वाले नीची जाति वालों से खुलेआम जबरदस्ती कर लेते थे.

सुनयना बाहर आ कर बोली, ‘‘छोटे ठाकुर और गंगादीन, देख लो पूरे गहने हैं पोटली में. उतर गया न मेरे परिवार का सारा कर्ज. सब के सामने कह दो.’’

‘‘हांहां, ठीक है,’’ अवधू ने घायल सांप की तरह फुंफकार कर कहा.

सभी लोगों के जाने के बाद अवधू और गंगादीन ने जब पोटली खोल कर देखी, तो वे हारे हुए जुआरी की तरह बैठ गए. उस में सुनयना के गहनों के साथसाथ गंगादीन की बेटी के भी कुछ गहने थे, जो सुनयना की अच्छी सहेलियों में से एक थी.

‘अब मैं अपनी बेटी के सामने कौन सा मुंह ले कर जाऊंगा. क्या सुनयना उस से मेरी सब करतूतें बता कर ये गहने ले आई है?’ सोच कर गंगादीन का सिर घूम रहा था.

अवधू और गंगादीन दोनों समझ गए कि सुनयना एक माहिर खिलाड़ी की तरह बहुत अच्छा खेल खिला कर गई है.

Hindi Story: हवा का झोंका

Hindi Story: ‘‘सौमित्र, मजे हैं यार तेरे…’’

‘‘क्यों निनाद, ऐसा क्या हो गया?’’

‘‘प्यारे से 2 बच्चे, अब खुद का घर भी हो गया और कार भी है. कस्तूरी जैसी समझदार बीवी है. और क्या चाहिए जिंदगी में यार…’’

गाड़ी औफिस की ओर जा रही थी. सौमित्र गाड़ी चला रहा था, तभी उन्हें अपने औफिस की ही 2 लड़कियां बस स्टौप पर खड़ी दिखीं.

‘‘निनाद, इन्हें औफिस तक छोड़ें?’’

सौमित्र ने निनाद को आगे बोलने का मौका ही नहीं दिया और सीधे जा कर उन लड़कियों के पास गाड़ी रोक दी.

‘‘शाल्मली मैडम, छोड़ दूं क्या दोनों को औफिस तक?’’

‘‘हां… हां, बिलकुल छोड़ दो,’’ दूसरी लड़की मनवा ने जल्दी से कहा और दरवाजा खोल कर गाड़ी में जा बैठी. इस के बाद शाल्मली भी बैठ गई.

‘‘आप दोनों रोज इसी बस स्टौप से बस लेती हो न?’’ सौमित्र ने पूछा.

‘‘हां,’’ मनवा ने जवाब दिया.

‘‘हम भी रोज इसी रास्ते से गुजरते हैं. आप को भी छोड़ दिया करेंगे. क्यों निनाद?’’

‘‘हां… हां, क्या हर्ज है. शाम को भी रुकना, हम साथ ही वापस जाएंगे. बस, 20-25 मिनट का रास्ता है.’’

सौमित्र को सांवले रंग की शाल्मली उस की गाड़ी में चाहिए थी. उस का मकसद कामयाब हो रहा था.

सौमित्र हैंडसम था. औफिस में उस की पोस्ट भी अच्छी थी. औफिस की सब लड़कियां उस के आगेपीछे मंडराती रहती थीं.

शाल्मली को भी वह अच्छा लगने लगा था. वह हरदम सब को हंसाता था. पार्टी करता था. नएनए रंग की शर्ट और जींस पहनता था. उस के गोरे चेहरे पर काला चश्मा जंचता था.

धीरेधीरे सौमित्र शाल्मली से नजदीकियां बढ़ाने लगा. वह बोला, ‘‘काफी छोटी उम्र में नौकरी कर रही हो तुम. सौरी, मैं बहुत जल्दी आप को तुम कह रहा हूं. तुम्हें अपनी कालेज की पढ़ाई जारी रखनी चाहिए थी.’’

‘‘मेरे पिताजी अफसर बीमार रहते हैं, इसलिए पढ़ाई बीच में रोक देनी पड़ी. घर में पैसों की तंगी है.’’

‘‘एक बात कहूं… तुम्हारा रंग सांवला है, फिर भी तुम मेरी नजर में बहुत ज्यादा खूबसूरत हो. इस औफिस में तुम्हारे जितनी अक्लमंद लड़की कोई नहीं है.’’

‘‘शुक्रिया सर.’’

‘‘शुक्रिया किसलिए. चलो, बाहर चल कर कौफी पीते हैं. थोड़ा आराम से बात कर सकेंगे,’’ सौमित्र बोला.

‘‘नहीं सर, यह थोड़ा ज्यादा ही हो जाएगा.’’

‘‘क्या ज्यादा होगा? मैं कह रहा हूं न, चलो चुपचाप.’’

शाल्मली भी चुपचाप चली गई.

इस के बाद औफिस में उन दोनों के बारे में बातें होने लगीं कि ‘सौमित्र शाल्मली के आगेपीछे घूमता है’, ‘दोनों की आज मैचिंग…’ ऐसी बातें औफिस में चलती थीं.

शाल्मली सब जानती थी, मगर उस के लिए सौमित्र यानी सुख की बौछार थी, इसलिए बदनाम होते हुए भी वह बेधड़क उस के साथ घूमती थी.

शाल्मली और सौमित्र के संबंधों को अब 6 महीने बीत चुके थे. सौमित्र अकसर शाल्मली को खुश रखने की कोशिश करता था. उस के और उस के परिवार वालों के लिए अकसर नई चीजें लाता था.

एक दिन सौमित्र शाल्मली को एक होटल पर ले गया. दोपहर के 12 बजे थे. शाल्मली को लगा कि वह हमेशा की तरह कहीं से खाना खाने ले कर आया है, इसलिए वह बेफिक्र थी.

सौमित्र द्वारा बुक किए कमरे पर वे दोनों आए.

‘‘क्या खाओगी मेरी शामू?’’

‘‘कुछ भी मंगा लो, हमेशा आप ही और्डर देते हो.’’

‘‘शाल्मली, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मैं हमेशा तुम्हें देखता रहता हूं. बस, तुम एक बार मेरी बांहों में आ जाओ.’’

‘‘यह क्या कह रहे हो सौमित्र, हम केवल अच्छे दोस्त हैं.’’

‘‘कुछ भी मत कहो. मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं, इसलिए तो अकसर तुम्हारे साथ घूमता हूं.’’

‘‘सौमित्र, एक मिनट… आप को कुछ गलतफहमी हो रही है. आप शादीशुदा हैं. मेरे मन में आप के बारे में ऐसा कुछ भी नहीं है.’’

‘‘कुछ भी नहीं है, तो फिर मेरे साथ क्यों हंसतीबोलती हो?’’

‘‘क्या हमारे बीच साफसुथरी दोस्ती नहीं हो सकती? मेरी समस्याएं आप समझते हो. पारिवारिक दिक्कतों को नजरअंदाज कर जिंदगी में मजा करना आप ने मुझे सिखाया है.

शुक्रिया सर. लेकिन शायद आप मुझे कुछ अलग ही समझने लगे हैं. मुझ से बड़ी गलती हो गई,’’ इतना कह कर शाल्मली

कमरे से बाहर जाने लगी, तभी सौमित्र ने दरवाजा बंद कर उस का रास्ता रोका.

‘‘रुको शाल्मली, क्यों इतना इतरा रही हो? सांवली तो हो तुम. तुम से कई ज्यादा खूबसूरत लड़कियां पटा सकता हूं मैं.’’

‘‘सर, मेरा तो रंग काला है, पर आप का तो मन काला है. आप शादीशुदा हैं. आप के 2 बच्चे हैं, फिर भी आप मुझ जैसी कुंआरी लड़की से शरीर सुख की चाहत कर रहे हो? चलती हूं मैं. काश, मैं आप के साथ 6 महीने औफिस के बाहर न घूमती तो यह दिन न आता. मैं आप से माफी मांगती हूं.

‘‘सर, आप मन से बहुत अच्छे हो, तो क्यों एक पल के मोह की खातिर खुद के चरित्र पर कलंक लगा रहे हो? आप की बीवी जिंदगीभर आप के साथ रहेंगी. कम से कम उस के बारे में तो सोचिए. मैं भी कल किसी के साथ ब्याह रचाऊंगी. जाने दीजिए मुझे.’’

सौमित्र दरवाजे से दूर हट गया. शाल्मली रोतेरोते होटल से बाहर निकल गई.

दूसरे दिन वे दोनों औफिस में मिले.

‘‘सौमित्र, मुझे आप से कुछ कहना है. आप एक हवा का झोंका बन कर मेरी जिंदगी में आए. आप ने मुझ पर प्यार की बौछार की. मगर इस के बाद फिर किसी लड़की की जिंदगी में प्यार की बौछार मत करना, क्योंकि औरतें काफी भावुक होती हैं. किसी पराए मर्द द्वारा जब उन की बेइज्जती होती है, तो वह पल उन के बरदाश्त के बाहर होता है.

‘‘मैं आप को अच्छी लगती हूं. मुझे भी आप का साथ अच्छा लगता है, पर इस के लिए हम नैतिकता के नियम मिट्टी में नहीं मिला सकते.’’

‘‘शाल्मली, मुझे माफ कर दो. मैं अब नए नजरिए से तुम से दोस्ती की शुरुआत करना चाहता हूं.’’

‘‘सौरी सर, अब मैं सारी जिंदगी किसी भी मर्द के साथ दोस्ती नहीं करना चाहती. मैं अपनी गलती सुधारना चाहती हूं. इन 6 महीने में आप ने मुझे जो मानसिक सहारा दिया, उस के लिए मैं आप की सारी उम्र कर्जदार रहूंगी.’’

Hindi Kahani: रज्जो – क्या था सुरेंद्र और माधवी का प्लान

Hindi Kahani: रज्जो रसोईघर का काम निबटा कर निकली, तो रात के 10 बज रहे थे. वह अपने कमरे में जाने से पहले सुरेंद्र के कमरे में पहुंची. वह उस समय बिस्तर पर आंखें बंद किए लेटा था.

‘‘साहबजी, मैं कमरे पर सोने जा रही हूं. कुछ लाना है तो बताइए?’’ रज्जो ने सुरेंद्र की ओर देखते हुए पूछा.

सुरेंद्र ने आंखें खोलीं और अपने माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘रज्जो, आज सिर में बहुत दर्द हो रहा है.’’

‘‘मैं आप के माथे पर बाम लगा कर दबा देती हूं,’’ रज्जो ने कहा और अलमारी में रखी बाम की शीशी ले आई. वह सुरेंद्र के माथे पर बाम लगा कर सिर दबाने लगी.

कुछ देर बाद रज्जो ने पूछा, ‘‘अब कुछ आराम पड़ा?’’

‘‘बहुत आराम हुआ है रज्जो, तेरे हाथों में तो जादू है,’’ कहते हुए सुरेंद्र ने अपना सिर रज्जो की गोद में रख दिया.

रज्जो सिर दबाने लगी. वह महसूस कर रही थी कि एक हाथ उस की कमर पर रेंग रहा है. उस ने सुरेंद्र की ओर देखा. सुरेंद्र बोला, ‘‘रज्जो, यहां रहते हुए तू किसी बात की चिंता मत करना. तुझे किसी चीज की कमी नहीं रहेगी. जब कभी जितने रुपए की जरूरत पड़े, तो बता देना.’’

‘‘जी साहब.’’

‘‘आज तेरी मैडम लखनऊ गई हैं. वहां जरूरी मीटिंग है. 4 दिन बाद वापस आएंगी,’’ कह कर सुरेंद्र ने उसे अपनी ओर खींच लिया.

रज्जो समझ गई कि सुरेंद्र की क्या इच्छा है. वह बोली, ‘‘नहीं साहबजी, ऐसा न करो. मुझे तो मां काका ने आप की सेवा करने के लिए भेजा है.’’

‘‘रज्जो, यह भी तो सेवा ही है. पता नहीं, आज क्यों मैं अपनेआप पर काबू नहीं रख पा रहा हूं?’’ सुरेंद्र ने रज्जो की ओर देखते हुए कहा.

‘‘साहबजी, अगर मैडम को पता चल गया तो?’’ रज्जो घबरा कर बोली.

‘‘उस की चिंता मत करो. वह कुछ नहीं कहेगी.’’

रज्जो मना नहीं कर सकी और न चाहते हुए भी सुरेंद्र की बांहों समा गई.

कुछ देर बाद जब रज्जो अपने कमरे में आ कर बिस्तर पर लेटी, तो उस की आंखों से नींद भाग चुकी थी. उस की आंखों के सामने मांकाका, 2 छोटी बहनों व भाई के चेहरे नाचने लगे.

यहां से 3 सौ किलोमीटर दूर रज्जो का गांव चमनपुर है. काका राजमिस्त्री का काम करता है. महीने में 10-15 दिन मजदूरी पर जाता है, क्योंकि रोजाना काम नहीं मिलता.

रज्जो तो 5 साल पहले 10वीं जमात पास कर के स्कूल छोड़ चुकी थी. उस की 2 छोटी बहनें व भाई पढ़ रहे थे. मां ने उस का नाम रजनी रखा था, पर पता नहीं, कब वह रजनी से रज्जो बन गई.

एक दिन गांव की प्रधान गोमती देवी ने मां को बुला कर कहा था, ‘मुझे पता चला है कि तेरी बेटी रज्जो तेरी तरह बहुत बढि़या खाना बनाती है. तू उसे सुबह से शाम तक के लिए मेरे घर भेज दे.’

‘ठीक है प्रधानजी, मैं रज्जो को भेज दूंगी,’ मां ने कहा था.

2 दिन बाद रज्जो ने गोमती प्रधान के घर की रसोई संभाल ली थी. एक दिन एक बड़ी सी कार गोमती प्रधान के घर के सामने रुकी. कार से सुरेंद्र व उस की पत्नी माधवी मैडम उतरे. कार पर लाल बत्ती लगी थी. गोमती प्रधान की दूर की रिश्तेदारी में माधवी मैडम बहन लगती थीं.

दोपहर का खाना खा कर सुरेंद्र व माधवी ने रज्जो को बुला कर कहा, ‘तुम बहुत अच्छा खाना बनाती हो. हमें तुम जैसी लड़की की जरूरत है. क्या तुम हमारे साथ चलोगी? जैसे तुम यहां खाना बनाती हो, वैसा ही तुम्हें वहां भी रसोई में काम करना है.’

रज्जो चुप रही.

गोमती प्रधान बोल उठी थीं. ‘यह क्या कहेगी? इस के मांकाका को कहना पड़ेगा.’

कुछ देर बाद ही रज्जो के मांकाका वहां आ गए थे.

गोमती प्रधान बोलीं, ‘रामदीन, यह मेरी बहन है. सरकार में एक मंत्री की तरह हैं. इस को रज्जो के हाथ का बना खाना बहुत पसंद आया, तो ये लोग इसे अपने घर ले जाना चाहते हैं रसोई के काम के लिए.’

‘रामदीन, बेटी रज्जो को भेज कर बिलकुल चिंता न करना. हम इसे पूरा लाड़प्यार देंगे. रुपएपैसे हर महीने या जब तुम चाहोगे भेज देंगे,’ माधवी मैडम ने कहा था.

‘साहबजी, आप जैसे बड़े आदमी के यहां पहुंच कर तो इस की किस्मत ही खुल जाएगी. यह आप की सेवा खूब मन लगा कर करेगी. यह कभी शिकायत का मौका नहीं देगी,’ काका ने कहा था.

सुरेंद्र ने जेब से कुछ नोट निकाले और काका को देते हुए कहा, ‘लो, फिलहाल ये पैसे रख लो. हम लोग हर तरह  से तुम्हारी मदद करेंगे. यहां से लखनऊ तक कोई भी सरकारी या गैरसरकारी काम हो, पूरा करा देंगे. अपनी सरकार है, तो फिर चिंता किस बात की.’

रज्जो उसी दिन सुरेंद्र व माधवी के साथ इस कसबे में आ गई थी.

सुरेंद्र की बहुत बड़ी कोठी थी, जिस में कई कमरे थे. एक कमरा उसे भी दे दिया गया था. माधवी मैडम ने उस को कई सूट खरीद कर दिए थे. उसे एक मोबाइल फोन भी दिया था, ताकि वह अपने घरपरिवार से बात कर सके.

रज्जो को पता चला था कि सुरेंद्र की काफी जमीनजायदाद है. एक ही बेटा है, जो बेंगलुरु में पढ़ाई कर रहा है. माधवी मैडम बहुत बिजी रहती हैं. कभी पार्टी मीटिंग में, तो कभी इधरउधर दूसरे शहरों में और कभी लखनऊ में. इन्हीं विचारों में डूबतेतैरते रज्जो को नींद आ गई थी.

अगले दिन सुरेंद्र ने रज्जो को कमरे में बुला कर कुछ गोलियां देते हुए कहा, ‘‘रज्जो, ये गोलियां तुझे खानी हैं. रात जो हुआ है, उस से तेरी सेहत को नुकसान नहीं होगा.’’ ‘‘जी…’’ रज्जो ने वे गोलियां देखीं. वह जान गई कि ये तो पेट गिराने वाली गोलियां हैं.

‘‘और हां रज्जो, कल अपने घर ये रुपए मनीऔर्डर से भेज देना,’’ कहते हुए सुरेंद्र ने 5 हजार रुपए रज्जो को दिए.

‘‘इतने रुपए साहबजी…?’’ रज्जो ने रुपए लेते हुए कहा.

‘‘अरे रज्जो, ये रुपए तो कुछ भी नहीं हैं. तू हम लोगों की सेवा कर रही है न, इसलिए मैं तेरी मदद करना चाहता हूं.’’

रज्जो सिर झुका कर चुप रही.

सुरेंद्र ने ज्जो का चेहरा हाथ से ऊपर उठाते हुए कहा, ‘‘तुझे कभी अपने गांव जाना हो, तो बता देना. ड्राइवर और गाड़ी भेज दूंगा.’’

सुन कर रज्जो बहुत खुश हुई.

‘‘रज्जो, तू मुझे इतनी अच्छी लगती है कि अगर मैडम की जगह मैं मंत्री होता, तो तुझे अपना पीए बना लेता,’’ सुरेंद्र ने कहा.

‘‘रहने दो साहबजी, मुझे ऐेसे सपने न दिखाओ, जो मैं रोटी बनाना ही भूल जाऊं.’’

‘‘रज्जो, तू नहीं जानती कि मैं तेरे लिए क्या करना चाहता हूं,’’ सुरेंद्र ने कहा.

खुशी के चलते रज्जो की आंखों की चमक बढ़ गई.

4 दिन बाद माधवी मैडम घर लौटीं. इस बीच हर रात को सुरेंद्र रज्जो को अपने कमरे में बुला लेता और रज्जो भी पहुंच जाती, उसे खुश करने के लिए.

अगले दिन रज्जो एक कमरे के बराबर से निकल रही थी, तो सुरेंद्र व माधवी की बातचीत की आवाज आ रही थी. वह रुक कर सुनने लगी.

‘‘कैसी लगी रज्जो?’’ माधवी ने पूछा.

‘‘ठीक है, बढि़या खाना बनाती है,’’ सुरेंद्र का जवाब था.

‘‘मैं रसोई की नहीं, बैडरूम की बात कर रही हूं. मैं जानती हूं कि रज्जो ने इन रातों में कोई नाराजगी का मौका नहीं दिया होगा.’’

‘‘तुम्हें क्या रज्जो ने कुछ बताया है?’’

‘‘उस ने कुछ नहीं बताया. मैं उस के चेहरे व आंखों से सच जान चुकी हूं.

‘‘खैर, मुझे तुम से कोई शिकायत नहीं. तुम कहा करते थे कि मैं बाहर चली जाती हूं, तो अकेले रात नहीं कटती, इसलिए ही तो रज्जो को इतनी दूर से यहां लाई हूं, ताकि जल्दी से वापस घर न जा सके.’’

‘‘तुम बहुत समझदार हो माधवी…’’ सुरेंद्र ने कहा, ‘‘लखनऊ में तुम्हारे नेताजी के क्या हाल हैं? वह तो बस तुम्हारा पक्का आशिक है, इसलिए ही तो उस ने तुम्हें लाल बत्ती दिला दी है.’’

‘‘इस लाल बत्ती के चलते हम लोगों का कितना रोब है. पुलिस या प्रशासन में भला किस अफसर की इतनी हिम्मत है, जो हमारे किसी भी ठीक या गलत काम को मना कर दे.’’

‘‘नेताजी का बस चले तो वह तुम्हें लखनऊ में ही हमेशा के लिए बुला लें.’’

‘‘अगले हफ्ते नेताजी जनपद में आ रहे हैं. रात को हमारे यहां खाना होगा. मैं ने सोचा है कि नेताजी की सेवा में रात को रज्जो को उन के पास भेज दूंगी.

‘‘जब नेताजी हमारा इतना खयाल रखते हैं, तो हमारा भी तो फर्ज बनता है कि नेताजी को खुश रखें. अगले महीने रज्जो को लखनऊ ले जाऊंगी, वहां 2-3 दूसरे नेता हैं, उन को भी खुश करना है,’’ माधवी ने कहा.

सुनते ही रज्जो के दिल की धड़कनें बढ़ने लगीं. वह चुपचाप रसोई में जा पहुंची. उस ने तो साहब को ही खुश करना चाहा था, पर ये लोग तो उसे नेताओं के पास भेजने की सोच बैठे हैं. वह ऐसा नहीं करेगी. 1-2 दिन बाद ही वह अपने गांव चली जाएगी.

तभी मोबाइल फोन की घंटी बज उठी. वह बोली, ‘‘हैलो…’’

‘‘हां रज्जो बेटी, कैसी है तू?’’ उधर से काका की आवाज सुनाई दी.

काका की आवाज सुन कर रज्जो का दिल भर आया. उस के मुंह से आवाज नहीं निकली और वह सुबकने लगी.

‘‘क्या हुआ बेटी? बता न? लगता है कि तू वहां बहुत दुखी है. पहले तो तू साहब व मैडम की बहुत तारीफ किया करती थी. फिर क्या हो गया, जो तू रो रही है?’’

‘‘काका, मैं गांव आना चाहती हूं.’’

‘‘ठीक है रज्जो, मेरा 2 दिन का काम और है. उस के बाद मैं तुझे लेने आ जाऊंगा. मैं जानता हूं कि मैडम व साहब बहुत अच्छे लोग हैं. तुझे भेजने को मना नहीं करेंगे. तू हमारी चिंता न करना. यहां सब ठीक है. तेरी मां, भाईबहनें सब मजे में हैं,’’ काका ने कहा.

रज्जो चुप रही. अगले दिन सुरेंद्र व माधवी ने रज्जो को कमरे में बुलाया. सुरेंद्र ने कहा, ‘‘रज्जो, 4-5 दिन बाद लखनऊ से बहुत बड़े नेताजी आ रहे हैं. यह हमारा सौभाग्य है कि वे हमारे यहां खाना खाएंगे और रात को आराम भी यहीं करेंगे.’’

‘‘जी…’’ रज्जो के मुंह से निकला.

‘‘रात को तुम्हें नेताजी की सेवा करनी है. उन को खुश करना है. देखना रज्जो, अगर नेताजी खुश हो गए तो…’’ माधवी की बात बीच में ही अधूरी रह गई.

रज्जो एकदम बोल उठी, ‘‘नहीं मैडमजी, यह मुझ से नहीं होगा. यह गलत काम मैं नहीं करूंगी.’’

‘‘और मेरे पीठ पीछे साहबजी के साथ रात को जो करती रही, क्या वह गलत काम नहीं था?’’

रज्जो सिर झुकाए बैठी रही, उस से कोई जवाब नहीं बन पा रहा था.

‘‘रज्जो, तू हमारी बात मान जा. तू मना मत कर,’’ सुरेंद्र बोला.

‘‘साहबजी, ये नेताजी आएंगे, इन को खुश करना है. फिर कुछ नेताओं को खुश करने के लिए मुझे मैडमजी लखनऊ ले कर जाएंगी. मैं ने आप लोगों की बातें सुन ली हैं. मैं अब यह गलत काम नहीं करूंगी. मैं अपने घर जाना चाहती हूं. 2 दिन बाद मेरे काका आ रहे हैं,’ रज्जो ने नाराजगी भरे शब्दों में कहा.

‘‘अगर हम तुझे गांव न जाने दें तो…?’’ माधवी ने कहा.

‘‘तो मैं थाने जा कर पुलिस को और अखबार के दफ्तर में जा कर बता दूंगी कि आप लोग मुझ से जबरदस्ती गलत काम कराना चाहते हैं,’’ रज्जो ने कड़े शब्दों में कहा.

रज्जो के बदले तेवर देख कर सुरेंद्र ने कहा, ‘‘ठीक है रज्जो, हम तुझ से कोई काम जबरदस्ती नहीं कराएंगे. तू अपने काका के साथ गांव जा सकती है,’’ यह कह कर सुरेंद्र ने माधवी की ओर देखा. उसी रात सुरेंद्र ने रज्जो की गला दबा कर हत्या कर दी और ड्राइवर से कह कर रज्जो की लाश को नदी में फिंकवा दिया. दिन निकलने पर इंस्पैक्टर को फोन कर के कोठी पर बुला लिया.

‘‘कहिए हुजूर, कैसे याद किया?’’ इंस्पैक्टर ने आते ही कहा.

‘‘हमारी नौकरानी रजनी उर्फ रज्जो घर से एक लाख रुपए व कुछ जेवरात चुरा कर भाग गई है.’’

‘‘सरकार, भाग कर जाएगी कहां वह? हम जल्द ही उसे पकड़ लेंगे,’’ इंस्पैक्टर ने कहा और कुछ देर बाद चला गया.

दोपहर बाद रज्जो का काका रामदीन आया. सुरेंद्र ने उसे देखते ही कहा, ‘‘अरे ओ रामदीन, तेरी रज्जो तो बहुत गलत लड़की निकली. उस ने हम लोगों से धोखा किया है. वह हमारे एक लाख रुपए व जेवरात ले कर कल रात कहीं भाग गई है.’’

‘‘नहीं हुजूर, ऐसा नहीं हो सकता. मेरी रज्जो ऐसा नहीं कर सकती,’’ घबरा कर रामदीन बोला.

‘‘ऐसा ही हुआ है. वह यहां से चोरी कर के भाग गई है. जब वह गांव में अपने घर पहुंचे तो बता देना. थाने  मेंरिपोर्ट लिखा दी है. पुलिस तेरे घर भी पहुंचेगी.

‘‘अगर तू ने रज्जो के बारे में न बताया, तो पुलिस तुम सब को उठा कर जेल भेज देगी.

‘‘और सुन, तू चुपचाप यहां से भाग जा. अगर पुलिस को पता चल गया कि तू यहां आया है, तो पकड़ लिया जाएगा.’’

यह सुन कर रामदीन की आंखों में आंसू आ गए. रज्जो के लिए उस के दिल में नफरत बढ़ने लगी. वह रोता हुआ बोला, ‘‘रज्जो, यह तू ने अच्छा नहीं  किया. हम ने तो तुझे यहां सेवा करने के लिए भेजा था और तू चोर बन गई.’’

रामदीन रोतेरोते थके कदमों से कोठी से बाहर निकल गया.

Hindi Story: हमसफर – क्या रेहान अपनी पत्नी की जान बचा पाया?

Hindi Story: रेहान ने तेल टैंकर की साइड वाली सीढ़ी से झुकते हुए अपने 2 साल के मासूम बेटे रेहम को गट्ठर की तरह खींच कर टैंकर की छत पर रख दिया, जिसे उस की बीवी रुखसार ने उठा रखा था. फिर रुखसार को बाजुओं में उठा कर सीढ़ी तक पहुंचाया, जो 7 महीने के पेट से थी.

रुखसार ने सीढ़ी के डंडे को कस कर पकड़ा और ऊपर चढ़ने लगी कि अचानक उस का पैर फिसल गया. गनीमत यह रही कि उस के दोनों हाथ सीढ़ी के डंडों पर मजबूती से जमे हुए थे और रेहान वहां से हटा नहीं था, वरना वह सीधे जमीन पर आ गिरती. फिर भी पेट पर कुछ चोट आ ही गई.

लौकडाउन में जब से कुछ ढील मिली थी, तब से मजदूरों का पलायन जोरों पर था. रेहान और उस के बीवीबच्चे दिल्ली के सीलमपुर इलाके में सिलाई का काम करते थे. कोरोना महामारी के चलते पिछले 2 महीने से काम बंद था. एक महीना अपनी कमाई से गुजरबसर हुआ, तो दूसरे महीने का खर्च फैक्टरी मालिक ने उठाया. उस के बाद फैक्टरी मालिक ने भी हाथ खड़े कर दिए.

रमजान का महीना चल रहा था और ईद का त्योहार सिर पर था, इसलिए घर जाना जरूरी भी था. कोई रास्ता न देख कर उन्होंने अपना बोरियाबिस्तर समेटा और गांव के लिए निकल पड़े. रास्ते में 4-5 मजदूर और साथ हो लिए.

वे सब सीलमपुर इलाके से पैदल चल कर नोएडा पहुंचे. वहां से आगे जाने के लिए कोई सवारी नहीं थी. मजदूरों ने एक तेल टैंकर के ड्राइवर से गुजारिश की, तो वह ले जाने को तैयार हुआ.

ड्राइवर ने बताया कि वह बरेली तक जा रहा है, वहां तक उन्हें छोड़ देगा. फिर कुल 8 मजदूर टैंकर की छत पर बैठे और खड़ी धूप से नजरें मिलाते हुए अपनी मंजिल की तरफ चल पड़े.

मुरादाबाद के एक चौराहे पर सत्तू पीने के लिए ड्राइवर ने टैंकर रोका. रेहान, उस की बीवी रुखसार और बच्चे रेहम को छोड़ कर बाकी सभी मजदूर सत्तू पीने के लिए उतर गए. वे दोनों मियांबीवी मन मसोस कर टैंकर की छत पर ही बैठे रहे.

तभी वहां मनोज की साइकिल रुकते देख रुखसार का चेहरा खिल उठा. उस ने चहकते हुए कहा, ‘‘अरे, वह देखो मनोज भैया.’’

रेहान ने मनोज को देख कर बस की छत से हांक लगाते हुए कहा, ‘‘ओ मनोज भाई. अरे, कहां रह गए थे. 2 दिन से अभी यहीं लटके हैं…’’

मनोज भी वहीं काम करता था, जहां रेहान करता था. लौकडाउन लगते ही मनोज के सेठ ने उस का हिसाब कर दिया, जिस में मनोज को 5,000 रुपए मिले. उन रुपए में से 3,500 रुपए की उस ने साइकिल खरीदी और इन लोगों से 2 दिन पहले ही अपने घर के लिए 1,100 किलोमीटर के लंबे सफर पर निकल पड़ा था.

मनोज ने गमछे से मुंह पोंछते हुए रेहान के सवाल का मुसकराते हुए जवाब दिया, ‘‘हां भाई. यह कोई हवाईजहाज थोड़ी है, साइकिल है साइकिल, जिसे खून जला कर चलाना पड़ता है. उतरो नीचे, सत्तू पीया जाए.’’

रेहान बोला, ‘‘न भाई, रहने दो, तुम पीयो, हम लोग ऐसे ही ठीक हैं.’’

मनोज रेहान की मजबूरी समझता था. उस ने कहा, ‘‘अरे, क्या खाक ठीक है. उतरो नीचे.’’

रेहान बोला, ‘‘पर, रेहम और रुखसार…’’

‘‘उन के लिए ऊपर ही पहुंचा देते हैं. पहले तुम तो नीचे उतरो.’’

रेहान टैंकर की छत से नीचे उतर आया.

मनोज ने सत्तू वाले से 4 गिलास सत्तू बनाने के लिए कहा.

रेहान बोला, ‘‘अरे, रेहम पूरा गिलास थोड़ी ही पी पाएगा. 3 गिलास ही रहने दो. वह अपनी अम्मी में से पी लेगा.’’

सत्तू वाले ने 2 गिलास उन लोगों की  तरफ बढ़ाए.

मनोज बोला, ‘‘चलो, ऊपर रुखसार को बढ़ाओ. रेहम के गिलास में से जो बचेगा, वह उस की अम्मी पी लेगी. बेचारी, एक तो बच्चे को दूध पिलाती है, ऊपर से पेट में बच्चा भी पल रहा है. कायदे से तो अकेले उस के लिए  ही 3 गिलास चाहिए, लेकिन क्या  किया जाए…

बहरहाल, सत्तू पीने के बाद मनोज बोला, ‘‘इस हालत में रुखसार को ले जाना और वह भी टैंकर की छत पर बैठा कर, बिलकुल ठीक नहीं.’’

रेहान बोला, ‘‘क्या करें भाई, दिल्ली में भी तो मरना ही था. खानेपीने के लाले पड़ रहे थे. अगर ईद का त्योहार न होता, तो कुछ दिन और रुक कर देखते. अब निकल गए हैं, आगे जो रब की मरजी.’’

अभी इन दोनों में बातचीत चल ही रही थी कि पुलिस वाले वहां आ धमके. 10-12 मजदूरों को इकट्ठा देखते ही उन की पुलिसिया ट्रेनिंग उफान मारने लगी और वे लगे ताबड़तोड़ लाठियां भांजने.

फिर क्या था, सब से पहले मनोज साइकिल पर सवार हो कर भाग खड़ा हुआ, फिर टैंकर के ड्राइवरखलासी भी भागे और छत पर बैठने वाले मुसाफिर भी.

आगेआगे मनोज की साइकिल और पीछे से घबराया हुआ टैंकर का ड्राइवर. उसे कुछ सुझाई नहीं दिया. मनोज रोड के दाएं से बाएं की तरफ मुड़ा ही था कि टैंकर उस पर चढ़ बैठा.

टैंकर की छत से रुखसार और रेहान ने मनोज को सड़क पर गिर कर तड़पते हुए देख लिया और चिल्लाने लगे. लेकिन ड्राइवर कहां रुकने वाला था. वह अपनी जान बचा कर भागता चला गया.

ये दोनों शौहरबीवी भी कहां मानने वाले थे, वे तब तक चिल्लाते रहे, जब तक ड्राइवर ने टैंकर रोक कर उन्हें उतार नहीं दिया.

फिर यह कुछ कहसुन पाते, इस के पहले ही टैंकर नौ दो ग्यारह हो गया.

रेहान और रुखसार अपने बच्चे और सामान से भरे 2 बैग समेत हादसे की जगह की तरफ दौड़ने लगे. तभी एक पुलिस की गाड़ी उन के पास आ कर रुकी और माजरा पूछा. फिर उन्हें अपनी गाड़ी में बैठाया और हादसे की तरफ चल पड़े.

जब तक वे लोग वहां पहुंचे, तब तक मनोज मर चुका था. रुखसार रोने लगी. उस की चीखें सुन कर अगलबगल में खड़े लोग भी आंखें पोंछने लगे. ऐसा लग रहा था कि मरने वाला मनोज उस का सगा भाई है.

फिर शुरू हुई लाश को ठिकाने लगाने की लंबी प्रक्रिया. अनजान जगह और अनजान लोग. साथ में मासूम बच्चा और भूखप्यास की जबरदस्त शिद्दत. लाश को कोई हाथ लगाने के लिए तैयार नहीं.

फिर भी दोनों शौहरबीवी ने हार नहीं मानी और पुलिस वालों, आनेजाने वालों और गांव वालों से चंदा और मदद ले कर मनोज का अंतिम संस्कार कर दोस्ती और इनसानियत का हक अदा किया.

अब इन के पैसे और हिम्मत दोनों ही जवाब दे चुके थे. इस बीच रुखसार अपने पेट में उठ रहे मीठेमीठे दर्द को दबाती रही. अब वहां से घर जाने की समस्या और भी गंभीर लगने लगी. चंद पैसे पास बचे थे, उन से बेटे के लिए दूध और बिसकुट खरीदा और रोते हुए रेहम को चुप कराया.

रात हो चुकी थी. गांव वालों ने कोरोना के डर से उन्हें पनाह देने से इनकार कर दिया. कहां जाएं? किस से मदद मांगें? आखिर थकहार कर वे बेचारे एक पेड़ के नीचे सो गए.

अगली सुबह एक और मुसीबत साथ ले कर आई. रुखसार दर्द से कराहने लगी. सलवार खून से सन गई. पैरों में खड़े होने की ताकत नहीं रही. उसे लगने लगा कि पेट में पल रहे बच्चे को नुकसान हो चुका है.

रुखसार की बोली लड़खड़ाने लगी. रेहान समझ रहा था कि रुखसार कहना कुछ चाह रही है और जबान से कुछ और निकल रहा है.

बड़ी मुश्किल से किसी तरह सरकारी अस्पताल पहुंचे. वहां डाक्टरों ने बाहरी के नाम पर उन्हें टरकाना चाहा, लेकिन रेहान उन के पैरों पर गिर कर रहम की भीख मांगने लगा. डाक्टरों ने सैकड़ों तरह के सवालजवाब और जांचपड़ताल के बाद रुखसार को कोरोना पौजिटिव ठहराया.

रुखसार की हालत बिगड़ती जा रही थी. डाक्टरों ने 4 यूनिट खून का इंतजाम करने के लिए कहा. रेहान समझ गया कि कुदरत की यही आखिरी आजमाइश है, जिस में वे खरा नहीं उतर सकता. उस ने डाक्टरों से कहा कि वे उस के बदन से खून का एकएक कतरा निचोड़ लें और उस की रुखसार को बचा लें. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

रुखसार ने दाएं हाथ में शौहर का हाथ थामा और बाएं हाथ में रेहम का. वह रेहम की मासूम सूरत को एकटक निहारने लगी. ऐसा लग रहा था कि वह अपने लख्ते जिगर को जीभर कर निगाहों में बसा लेना चाहती थी.

उधर रेहान अपनी हमसफर को जीभर के देख लेना चाहता था जो बीच सफर में ही उस का साथ छोड़ कर जा रही थी. रेहम अभी भी अपनी मां के जिस्म में दूध तलाश कर रहा था.

रेहान रुखसार की पथराई आंखों की तपिश बरदाश्त नहीं कर सका और गश खा कर वहीं गिर पड़ा. लेकिन इन सब बातों से बेखबर रेहम अपनी मां का दूध हुमड़हुमड़ कर खींच रहा था.

Hindi Story : बदल गया जीने का नजरिया

Hindi Story: सुरेश भी अकसर बिना किसी बात के उस से चिड़चिड़ा कर बोल पड़ता था. कभीकभार तो मीना के ऊपर उस का इतना गुस्सा फूटता कि अगर चाय का कप हाथ में होता तो उसे दीवार पर दे मारता. ऐसे ही कभी खाने की थाली उठा कर फेंक देता. इस तरह गुस्से में जो सामान हाथ लगता, वह उसे उठा कर फेंकना शुरू कर देता. इस से आएदिन घर में कोई न कोई नुकसान तो होता ही, साथ ही घर का माहौल भी खराब होता.

ऐसे में मीना को सब से ज्यादा फिक्र अपने 2 मासूम बच्चों की होती. वह अकसर सोचती कि इन सब बातों का इन मासूमों पर क्या असर होगा? यही सब सोच कर वह अंदर ही अंदर घुटते हुए चुपचाप सबकुछ सहन करती रहती.

मीना अपनेआप पर हमेशा कंट्रोल रखती कि घर में झगड़ा न बढ़े, पर ऐसा कम ही हो पाता था. आजकल सुरेश भी औफिस से ज्यादा लेट आने लगा था.

जब भी मीना लेट आने की वजह पूछती तो उस का वही रटारटाया जवाब मिलता, ‘‘औफिस में बहुत काम था, इसलिए आने में देरी हो गई.’’

एक दिन मीना की सहेली सोनिया उस से मिलने आई. तब मीना का मूड बहुत खराब था. सोनिया के सामने वह झूठमूठ की मुसकराहट ले आई थी, इस के बावजूद सोनिया ने मीना के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफसाफ पढ़ ली थीं.

मीना ने सोनिया को कुछ भी नहीं बताया और अपनेआप को उस के सामने सामान्य बनाए रखने की कोशिश करती रही थी. कभी उस का मन कहता कि वह सोनिया को अपनी समस्या बता दे, लेकिन फिर उस का मन कहता कि घर की बात बाहर नहीं जानी चाहिए. हो सकता है, सोनिया उस की समस्या सुन कर खिल्ली उड़ाए या फिर इधरउधर कहती फिरे.

अगले दिन जब मीना बस से कहीं जा रही थी कि तभी उस की नजर उस बस में चिपके एक इश्तिहार पर अटक गई. उस इश्तिहार में किसी बाबा द्वारा हर समस्या जैसे सौतन से छुटकारा, गृहक्लेश, व्यापार में घाटे से उबरने का उपाय, कोई ऊपरी चक्कर, प्रेमविवाह, किसी को वश में करने का हल गारंटी के साथ दिया गया था.

बाबा का इश्तिहार पढ़ते ही मीना के मन में अपने गृहक्लेश से छुटकारा पाने की उम्मीद जाग गई थी. उस ने जल्दी से अपना मोबाइल फोन निकाला और बाबा के उस इश्तिहार में दिया गया एक नंबर सेव कर लिया.

घर पहुंचते ही मीना ने बाबा को फोन किया और फिर उस ने अपनी सारी समस्याएं उन के सामने उड़ेल कर रख दीं.

दूसरी तरफ से बाबा की जगह उन का कोई चेला बात कर रहा था. उस ने कहा कि आप दरबार में आ जाइए, सब ठीक हो जाएगा. उस ने यह भी कहा कि बाबा के दरबार से कोई भी निराश नहीं लौटता है. उस ने उसी समय मीना को एक अपौइंटमैंट नंबर भी दे दिया था. मीना अब बिलकुल भी देर नहीं करना चाहती थी. वह सुरेश को पहले जैसा खुश देखना चाहती थी.

जब दूसरे दिन मीना बाबा के पास पहुंची और अपनी सारी समस्याएं उन्हें बताईं, तब बाबा ने बुदबुदाते हुए कहा, ‘‘आप के पति पर किसी ने कुछ करवा दिया है.’’

मीना हैरान होते हुए बाबा से पूछ बैठी, ‘‘पर, किस ने क्या करवा दिया है? हमारी तो किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं है… बाबाजी, ठीकठीक बताइए… क्या बात है?’’

इस पर बाबा दोबारा बोले, ‘‘आप के पति का किसी पराई औरत के साथ चक्कर है और उस औरत ने ही शर्तिया आप के पति पर कुछ करवाया है. आप के पति को उस से छुटकारा पाना होगा.’’

बाबा की बातों से मीना के मन में अचानक सुरेश की चिड़चिड़ाहट की वजह समझ आ गई.

मीना बोली, ‘‘बाबाजी, आप ही कोई उपाय बताएं… ठीक तो हो जाएंगे न

मेरे पति?’’

मीना की उलझन के जवाब में बाबा ने कहा, ‘‘ठीक तो हो जाएंगे, लेकिन इस के लिए पूजा करानी होगी और उस के बाद मैं एक तावीज बना कर दूंगा. वह तावीज रात को पानी में भिगो कर रखना होगा और अगली सुबह मरीज को बिना बताए चाय में वह पानी मिला कर

मरीज को पिलाना होगा. यह सब तकरीबन 2 महीने तक करना होगा.

‘‘मैं एक भभूत भी दूंगा जिसे उस औरत को खिलाना होगा, जिस ने आप के पति को अपने वश में कर रखा है.’’

बाबा की बातों से मीना का दिल बैठ गया था. उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि सुरेश उस के साथ बेवफाई कर सकता है.

इसी बीच बाबा ने एक कागज पर उर्दू में कुछ लिख कर उस का तावीज बना कर भभूत के साथ मीना को दिया और कहा, ‘‘मरीज को बिना बताए ही तावीज का पानी उसे पिलाना है और यह भभूत उस औरत को खिलानी है. अगर उस औरत को एक बार भी भभूत खिला दी गई तो वह हमेशा के लिए तेरे पति को छोड़ कर चली जाएगी.’’

मीना ये सब बातें बड़े ध्यान से सुन रही थी. वह सुरेश को फिर से पहले की तरह वापस पाना चाहती थी. उसे बाबा पर पूरा भरोसा था कि वे उस के पति को एकदम ठीक कर देंगे.

उस रात मीना बिस्तर पर करवटें बदलती रही. उस की नींद छूमंतर

हो चुकी थी. उस को बारबार यही खयाल आता, ‘कहीं उस औरत के चक्कर में सुरेश ने मुझे छोड़ दिया तो मैं क्या करूंगी? कैसे रह पाऊंगी उस के बगैर?’

यह सब सोचसोच कर उस का दिल बैठा जा रहा था. फिर वह अपनेआप को मन ही मन मजबूत करती और सोचती कि वह भी हार नहीं मानने वाली.

इस के बाद मीना यह सोचने लग गई कि तावीज का पानी तो वह सुरेश को पिला देगी, पर उस औरत को ढूंढ़ कर उसे भभूत कैसे खिलाएगी? वह तो उस औरत को जानती तक नहीं है. यह काम उसे बहुत मुश्किल लग रहा था.

सुबह उठते ही मीना ने सब से पहले सुरेश के लिए चाय बनाई और उस में तावीज वाला पानी डाल दिया.

इस के बाद मीना सोफे पर पसर गई. बैठेबैठे वह फिर सोचने लगी कि उस औरत को कैसे ढूंढ़े, जबकि उस ने तो आज तक ऐसी किसी औरत की कल्पना तक नहीं की है?

मीना ने आज जानबूझ कर सुरेश का लंच बौक्स उस के बैग में नहीं रखा था, जिस से लंच बौक्स देने का बहाना बना कर वह उस के औफिस जा सके और उस की जासूसी कर सके.

सुरेश के औफिस जाने के बाद मीना भी उस के औफिस के लिए निकल पड़ी.

औफिस में जा कर मीना सब से पहले चपरासी से मिली और घुमाफिरा कर सुरेश के बारे में पूछने लगी.

चपरासी ने बताया, ‘‘सुरेश सर तो बहुत भले इनसान हैं. वे और उन की सैक्रेटरी रीता पूरे समय काम में लगे रहते हैं.’’

जब मीना ने चपरासी से सुरेश से मिलवाने को कहा, तब उस ने मीना को अंदर जाने से रोकते हुए कहा, ‘‘अभी सर और रीता मैडम कुछ जरूरी काम कर रहे हैं. आप कुछ देर बाद मिलने जाइएगा.’’

मीना को दाल में काला नजर आने लगा. अब तो उस का पूरा शक सैक्रेटरी रीता पर ही जाने लगा. उसे रीता पर गुस्सा भी आ रहा था लेकिन अपने गुस्से पर काबू करते हुए वह कुछ देर के लिए रुक गई.

कुछ देर बाद जब सैक्रेटरी रीता बाहर निकली तब मीना उसे बेमन से ‘हाय’ करते हुए सुरेश के केबिन में घुस गई.

वापसी में जब मीना दोबारा रीता से मिली तो उस ने कुछ दिनों बाद अपने छोटे बेटे के जन्मदिन पर रीता को भी न्योता दे डाला.

जब रीता उस के घर आई तो मीना ने उस के खाने में भभूत मिला दी. इस काम को कामयाबी से अंजाम दे कर मीना बहुत खुश थी.

अगली शाम को जब सुरेश दफ्तर

से लौटा तो एकदम शांत था, वह रोज की तरह आते ही न चीखाचिल्लाया

और न ही मीना से कोई चुभने वाली बात की. मीना बहुत खुश थी कि बाबा के तावीज ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है. उस रात सुरेश ने मीना से बहुत सी प्यार भरी बातें की थीं और उसे अपनी बांहों में भी भर लिया था.

मीना मन ही मन बाबा का शुक्रिया अदा करने लगी. वह यही सोच रही थी कि अब कुछ दिन बाद सुरेश को उस कुलटा औरत से छुटकारा मिल जाएगा और उन की जिंदगी फिर से खुशहाल हो जाएगी.

सुरेश के स्वभाव में दिनोंदिन और भी बदलाव आता चला गया. अब उस ने बच्चों के साथ खेलना और समय देना भी शुरू कर दिया था. मीना यह सब देख कर मन ही मन बहुत खुश होती. उसे बाबा द्वारा बताए गए उपाय किसी चमत्कार से कम नहीं लगे थे.

अब मीना बाबा के पास जा कर उन का शुक्रिया अदा करना चाहती थी. कुछ दिनों बाद ही वह बाबा के लिए मिठाई और फल ले कर उन के आश्रम पहुंच गई.

जब बाबा को इस बात का पता चला तो वे बहुत खुश हुए और उन्होंने मीना से कहा, ‘‘बेटी, तुम्हारे पति को अभी कुछ और दिनों तक तावीज का पानी पिलाना पड़ेगा, वरना कुछ दिन में इस का असर खत्म हो जाएगा और वह फिर से पहले जैसा हो जाएगा.’’

मीना यह बात सुन कर अंदर तक सहम गई. उस ने बाबा के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘बाबा, आप जो कहेंगे, मैं वहीं करूंगी और जब तक कहेंगे तब तक करती रहूंगी, चाहे मुझे इस के लिए कितने ही रुपए क्यों न खर्च करने पड़ें.’’

इस पर बाबा ने उसे भरोसा देते हुए कहा, ‘‘चिंता मत कर, सब ठीक हो जाएगा. मेरे यहां से कभी कोई निराश हो कर नहीं गया है.’’

बाबा की बातें सुन कर मीना ने राहत की सांस ली. बाबा कागज के एक पुरजे पर उर्दू में कुछ मंत्र लिख कर तावीज बनाने में लगे थे कि तभी मीना के पति सुरेश का औफिस से फोन आ गया, ‘क्या कर रही हो? जरा गोलू से बात कराना.’

मीना थोड़ा हड़बड़ा कर बोली, ‘‘कुछ नहीं.’’मीना को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह सुरेश से क्या कहे कि वह कहां है और इस समय वह उस की गोलू से बात नहीं करा सकती. इसी बीच उस की नजर दीवार पर टंगे जीवन अस्पताल के कलैंडर पर पड़ी तो उस ने झट से कह दिया, ‘‘मैं अस्पताल में हूं. गोलू को घर छोड़ कर आई हूं.’’

सुरेश ने घबरा कर पूछा, ‘‘कौन से अस्पताल में?’’

मीना फिर हड़बड़ा कर कलैंडर में देखते हुए बोली, ‘‘जीवन अस्पताल.’’

मीना का इतना कहना था कि सुरेश का फोन कट गया.

थोड़ी देर बाद मीना बाबा के यहां से वापस लौट रही थी कि रास्ते में जीवन अस्पताल के सामने सुरेश को अपना स्कूटर लिए खड़ा देख वह बहुत ज्यादा घबरा गई.

उसे देख कर सुरेश एक ही सांस में कह गया, ‘‘तुम यहां कैसे? क्या हुआ मीना तुम्हें? सब ठीक तो है न?’’

सुरेश के मुंह से इतना सुन कर और अपने लिए इतनी फिक्र देख कर मीना भावुक हो उठी. उस वक्त उसे सुरेश की आंखों में अपने लिए अपार प्यार व फिक्र नजर आ रही थी.

इस के बाद तो मीना से झूठ नहीं बोला गया और उस ने सारी बातें ज्यों की त्यों सुरेश को बता दीं.

मीना की सारी बातें सुनते ही सुरेश ने हंसते हुए उस के गाल पर एक

हलकी सी चपत लगाई और फिर गले लगा लिया.

सुरेश मीना के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोला, ‘‘तुम ने ऐसा कैसे समझ लिया. भला इतनी प्यारी पत्नी से कोई कैसे बेवफाई कर सकता है. लेकिन, तुम मुझे इतना ज्यादा प्यार करती हो कि मुझे पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हो, यह जान कर आज मुझे सचमुच बहुत अच्छा लग रहा है.

‘‘पर, तुम तो पढ़ीलिखी और इतनी समझदार हो कर भी इन बाबाओं के चक्कर में कैसे पड़ गईं, जबकि पहले तो तुम खुद बाबाओं के नाम से चिढ़ती थीं? अब तुम्हें क्या हो गया है?’’

सुरेश की बातों के जवाब में मीना एक लंबी सांस लेते हुए बोली, ‘‘लेकिन, कुछ भी हो… बाबा की वजह से

आप मुझे वापस मिले हो. अब मुझे पहले वाले सुरेश मिल गए हैं. अब मुझे और कुछ नहीं चाहिए.’’

सुरेश ने प्यार से मीना का हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘‘अच्छा चलो… घर चल कर बाकी बातें करते हैं.’’

घर पहुंच कर सुरेश ने मीना की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘तुम्हें पता है न कि बाबाजी ने कोई चमत्कार नहीं किया. मैं बदला हूं सिर्फ और सिर्फ अपने दोस्त के साथ हुए एक हादसे के चलते. तुम बेकार ही यह समझ रही हो कि यह बाबा का चमत्कार है.’’

सुरेश की बातों पर मीना हैरान हो कर उसे घूरते हुए बोली, ‘‘हादसा… कैसा हादसा?’’

सुरेश ने उसे उदास मन से बताया, ‘‘मेरे एक दोस्त की पत्नी ने खुदकुशी कर ली थी और बच्चों को भी खाने में जहर दे दिया था.

‘‘जब मैं ने अपने दोस्त से पूछा कि यह सब कैसे हो गया तो उस ने बताया कि वह आजकल बहुत बिजी रहने

लगा था और काम के बोझ के चलते चिड़चिड़ा हो गया था. वह बातबात पर अपनी पत्नी पर गुस्सा होता रहता था और अकसर मारपीट पर भी उतर आता था.

‘‘पहले तो उस की पत्नी कभी उस से उलझ भी जाती थी, लेकिन कुछ दिन बाद उस ने उस से बात करना ही बंद कर दिया था और वह गुमसुम रहने लगी थी.

‘‘यह सब बताते हुए मेरा दोस्त फूटफूट कर रोने लगा था. उस ने अपने ही हाथों अपना परिवार स्वाहा कर दिया था.’’

सुरेश ने एक लंबी सांस लेते हुए आगे कहा, ‘‘अपने दोस्त की इस घटना ने मुझे अंदर तक हिला दिया था. उसी समय मैं ने सोच लिया था कि अब मैं भी अपने इस तरह के बरताव को बदल

कर ही दम लूंगा. इस तरह मेरा जीने का नजरिया ही बदल गया.’’

सुरेश की बातें सुन कर मीना बोली, ‘‘आप ने तो अपने जीने का नजरिया खुद बदला और मैं समझती रही कि यह सब बाबा का चमत्कार है और इस सब के चलते मैं हजारों रुपए भी लुटा बैठी.’’

मीना के इस भोलेपन पर सुरेश ने हंसते हुए उसे अपनी बांहों में कस कर भर लिया.

Funny Story: अर्थशास्त्री की पहली ससुराली होली

Funny Story: तिवारीजी को होली के एक हफ्ते पहले से ही ससुराल आने का लगातार फोन आ रहा था. बारबार फोन आए भी क्यों न, आखिर टौकटाइम और डाटा फ्री जो है.

तिवारीजी के लिए खुशकिस्मती की बात यह थी कि शादी के बाद उन्हें पहली बार गांवमहल्ले की सालियों और सलहजों के साथ ससुराली होली खेलने का मौका मिल रहा था.

पेशे से शिक्षक तिवारीजी उच्च विद्यालय में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक थे. शिक्षक और विषय विशेषज्ञ होने के चलते उन का सारा हिसाबकिताब भारतीय अर्थव्यवस्था की तरह संतुलित होता था. ससुराल जाने में आर्थिक समस्या लोकतांत्रिक मुद्दों की तरह आड़े आ रही थी.

महंगाई और जीएसटी की मार से जब पूरा देश जूझ रहा है, तो भला हमारे तिवारीजी कैसे महफूज रहते. कैशलैस तिवारीजी काफी होपलैस नजर आ रहे थे, क्योंकि फरवरी महीने की तनख्वाह इनकम टैक्स में जा चुकी थी और ऊपर से दुकानदार, धोबी, दूध वाले का बकाया उधार अलग.

तिवारीजी गजब धर्मसंकट में फंसे हुए थे. बड़ी, छोटी, मं?ाली हर साइज की सालियां बारबार फोन कर के न्योता दे रही थीं, साथ ही देशी घी की मिठाई और रंग, गुलाल, पिचकारी लेते आने का इमोशनल दबाव भी बनाया जा रहा था.

भारतीय बैंकिंग सिस्टम में लंदन बसने वाले को अरबों रुपए का सरकारी लोन मिल जाता है, पर ससुराल जाने वाले को 1,000 रुपए का कर्ज मिलना भी काफी मुश्किल है.

काफी मशक्कत के बाद ‘ससुराल से लौटते ही उधार चुका देने’ की शर्त पर एक दोस्त ने उन्हें 1,000 रुपए का उधार दे कर दोस्ती और इनसानियत की दोहरी जिम्मेदारी निभाई.

तिवारीजी मन ही मन सोच रहे थे, ‘सासससुर के पैर लगाई में आशीर्वाद के साथ शगुन के रूप में कुछ न कुछ नकद नारायण तो मिलेगा ही, उसी से उधार चुका दूंगा… कम से कम ससुराल जाने और आने में हुए खर्च में लगी पूंजी तो वसूल हो ही जाएगी’.

उस 1,000 रुपए में से संदेश मिठाई खरीदने के नाम पर तिवारीजी ने 500 रुपए अलग निकाल लिए. 300 रुपए किराया और बाकी बचे 200 रुपए में होली मना कर ससुराल जाने और वापसी की रूपरेखा तैयार कर ली.

‘खाली हाथ बिना संदेश मिठाई के भी कोई ससुराल जाता है भला, वह भी पहली बार, उस पर होली का मौका,’ यह सोच कर तिवारीजी मिठाई की दुकान पर पहुंच गए और मिठाई वाले से मिठाई का मोलभाव करने लगे.

‘‘रसगुल्ला 700, पेड़ा 750, चमचम 650, बरफी 700, काजू कतली 1,200, मुरब्बा 350, रसकदम 850 रुपए प्रति किलो…’’ दुकानदार भी सीडी की तरह बजते हुए अपनी मिठाइयों की कीमत बताने लगा.

तिवारीजी थोड़ा सकुचाते हुए बोले, ‘‘भैया, आप की दुकान में सब से सस्ती मिठाई कौन सी है?’’
हलवाई बोला, ‘‘जलेबी ले लो सरजी… डेढ़ सौ रुपए किलो लगेगी.’’

तिवारीजी उधेड़बुन में पड़ गए कि ‘महज 500 रुपए में क्या लूं? जलेबी तो ससुराल ले जा नहीं सकता… अगर रसगुल्ला भी लेता हूं, तो 3 पाव ही होंगे… काजू कतली आधा किलो भी नहीं आ पाएगी… देशी घी की दूसरी मिठाइयां भी ढाई सौ ग्राम से ज्यादा नहीं आ पाएंगी…’

‘‘क्या पैक कर दूं सर?’’ तिवारीजी मन में गुणाभाग कर ही रहे थे कि हलवाई के सवाल ने उन का सारा कैलकुलेशन बिगाड़ दिया.

‘‘नहीं कुछ… बस यों ही दाम का आइडिया ले रहा था…’’ बोलते हुए तिवारीजी दुकान से बाहर निकल आए.

तिवारीजी ने चारों तरफ नजर दौड़ाई. उन्हें कुछ सम?ा नहीं आ रहा था कि तभी एक फल का ठेला दिखाई दिया. फिर वहां पहुंच कर वे सभी फलों के दाम जानने लगे. अनार 200, नारंगी 80, सेब 240 रुपए किलो थे. ड्राई फ्रूट की कीमत पूछने की तिवारीजी में न ऊर्जा थी और न ही खरीदने की औकात.

काफी मोलभाव के बाद 2 किलो सेब तुलवाए और दुकानदार को 500 रुपए का नोट थमा दिया. दुकानदार ने तय कीमत काट कर 20 रुपए का नोट तिवारीजी को लौटा दिया.

तिवारीजी मन ही मन संतुष्ट थे, ‘चलो, संदेश मिठाई के बदले 2 किलो सेब से थैला भराभरा सा लगेगा… रही बात साली की, तो सेहत के नुकसान का हवाला देते हुए मिठाई और चर्म रोग, प्रदूषण, स्वच्छ भारत का हवाला देते हुए रंग पिचकारी नहीं लेने की बात कह दूंगा.

‘सेब भी अपने बजट में आ गए… और तो और, बीवीसाली के गुलाबी गालों को लालहरा करने के लिए गुलाल के 60 रुपए भी बच गए… अब होगी जानदारशानदार डिजिटल होली.’

ऐसा लग रहा था कि तिवारीजी का अर्थशास्त्र पढ़ना व पढ़ाना आज कामयाब हो गया. वे खुश मन से बसस्टैंड पहुंच कर ससुराल जाने वाली बस में सवार हो गए.

ससुराल में कदम रखते ही तिवारीजी को पता चला कि उन के ससुरजी सुबह ही सासू मां के साथ अपनी ससुराल होली मनाने निकल गए हैं. तिवारीजी को मानो 440 वोल्ट का झटका लग गया. शेयर बाजार की तरह उन का मनोबल और अर्थबल धड़ाम से नीचे गिर गया.

शगुन के रूप में पैसा वापसी का एकमात्र साधन सासससुर के वहां न होने से तिवारीजी के चेहरे का रंग लालपीला पड़ने लगा. दोस्त की उधार वापसी का उन का सारा गणित फेल जो हो चुका था.

तिवारीजी अगला कैलकुलेशन करने के लिए कुछ नया सोचते, इस से पहले एक साली ने उन के हाथ से गिफ्ट झपट लिया और दूसरी साली ने उन के ऊपर रंग का गुब्बारा मार कर ‘हैप्पी होली’ बोल कर उन का ध्यान भंग कर डाला.

Hindi Story: मरियम बनी मरजीना

Hindi Story: आज मरियम ने नहाते समय अपने बालों को अच्छी तरह धोया और बालों को खुला छोड़ने के बाद उस ने आसमानी रंग का सूट पहना. वह आईने में अपना चेहरा निहारने लगी.

सामने से आती हुई रोशनी जब मरियम के चेहरे पर पड़ी, तो उस के चेहरे की चमक और बढ़ गई. अपनी सूरत पर खुद ही फिदा हो गई थी मरियम.

भले ही मरियम की उम्र 30 साल की हो गई थी, मगर वह अब भी दिखने में एकदम जवान, सैक्सी और खूबसूरत थी.

मरियम का लंबा कद, गोरा रंग और तीखी नाक उसे एक अफगानी औरत का सा लुक देते थे. उस की छाती सुडौल और कसावट लिए हुए थी और पतली कमर वाली मरियम जब चलती थी, तो कसबे के लोग उस के उभरे हुए अंगों को आगेपीछे से ताड़ते नजर आते थे.

पर इतना होने के बाद भी मरियम की खूबसूरती भोगने वाला कोई नहीं था. वह रात को तनहा बिस्तर पर लेटती, तो अकेलेपन के चलते उसे देर तक नींद नहीं आती थी. उस का मन चाहता था कि कोई मर्द उसे अपनी बांहों में जकड़ ले और बेतहाशा चूमे, पर उसे करवटों से ही संतोष करना पड़ता था.

मरियम की जिंदगी में यह सुख आया जरूर था, पर ठहर न सका था. दरअसल, मरियम महज 20 साल की थी, तभी उसे पास के ही एक गांव के 30 साल के रईस नाम के लड़के के साथ ब्याह दिया गया था.

रईस सिर्फ नाम से ही रईस था, पैसों के नाम पर उस के पास ज्यादा कुछ न था. वह पास के शहर में मजदूरी करने जाता था, पर कभी भी उस का मन शहर में नहीं लगा. वह कभी दूसरे दिन तो कभी तीसरे दिन गांव वापस आ जाता था.

पहलेपहल तो मरियम ने रईस को दबी जबान में सम?ाने वाले लहजे में कहा कि माना कि उन दोनों का निकाह हुआ है और उसे मरियम से मुहब्बत है, पर शहर से इतनी जल्दी आना ठीक नहीं, क्योंकि आनेजाने में खर्चा होता है, उसे छुट्टी लेनी पड़ती है और फिर शहर के काम और मजदूरी का भी नुकसान होता है. इस के अलावा अम्मीअब्बू भी क्या कहते होंगे कि निकाह के बाद तो रईस एकदम जोरू का गुलाम ही हो गया है.

पर रईस पर मरियम की बातों का कोई असर नहीं होता था. वह मरियम को दोपहर में ही पकड़ लेता था और उस के नाजुक अंगों से तब तक खेलता था, जब तक उस का मन भर नहीं जाता था.

जिस्म की भूख पूरी हो जाने के बाद रईस हाथमुंह धो कर गांव घूमने निकल जाता था और फिर देर रात को ही वापस आता था. अम्मीअब्बू की डांट का तो उस पर कोई असर होता ही नहीं था.

बेचारी भोलीभाली मरियम तो सम?ाती थी कि रईस उस की मुहब्बत के चलते गांव में आता है, पर उसे तो आसपड़ोस की औरतों ने बताया था कि रईस का एक दूसरी औरत से चक्कर चल रहा है, इसलिए मरियम थोड़ा सचेत रहे. मरियम को भला रईस के खिलाफ कही गई बातों पर कब यकीन होने वाला था?

पर, उस दिन जब मरियम रईस की कमीज साफ करने से पहले जेबें टटोल रही थी, तब उसे कागजनुमा टुकड़ा मिला, जो असल में एक औरत की तसवीर थी. अब तो मरियम परेशान हो गई थी.

बड़ी बेशर्मी से रईस ने पूछताछ में कबूल भी कर लिया था कि गांव की एक औरत से उस का नाजायज रिश्ता है और ऐसा कहते हुए रईस के चेहरे पर मर्दाना ऐंठन थी.

रईस ने मरियम से यह भी कहा कि उस का यह रिश्ता कई सालों से है और वह उस औरत को किसी भी हाल में छोड़ नहीं पाएगा.

उस दिन तो मरियम ने यह बात बरदाश्त कर ली थी, पर समय बीतने के साथ रईस अपने नाजायज रिश्ते में कुछ ज्यादा ही बिजी रहने लगा और शहर की मजदूरी भी छोड़ दी. तब मरियम ने अम्मीअब्बू और रईस के सामने एतराज जताया.

रईस अपनी जोरू के इस तरह के विरोध के लिए तैयार नहीं था. उस ने गुस्से में मरियम को खूब मारा और बाद में ‘तलाक, तलाक, तलाक’ बोल कर उसे घर से निकाल दिया.

बेचारी मरियम उस समय पेट से हो चुकी थी. उस ने रईस और उस के अम्मीअब्बू से गुहार भी लगाई, पर कोई फायदा नहीं हुआ.

अब मरियम के पास मायके वापस आने के अलावा कोई चारा नहीं था. मरियम के मायके में सिर्फ उस की अम्मी ही थीं. अब्बू की मौत तो पहले ही हो चुकी थी.

एक औरत के लिए उस के मायके के दरवाजे हमेशा ही खुले रहते हैं. मरियम के साथ भी ऐसा ही हुआ. वह अब अपने मायके में ही रहने लगी थी और समय आने पर उस ने एक बेटे को जन्म दिया.

घर का खर्चा बढ़ गया था. मरियम की मां सिलाई का काम कर के घर का खर्चा चलाती थीं. मरियम भी उन का हाथ बंटाने लगी. अम्मी ने उसे सिलाई और रेशमी कपड़े पर महीन कढ़ाई के खूब गुर सिखाए. मरियम भी कढ़ाई के काम में खूब मन लगाती थी. रंगीन फूलबूटे तो ऐसा काढ़ती कि देखते ही बनते थे.

कामधाम थोड़ा ठीक चलने लगा तो अचानक ही मरियम की अम्मी का इंतकाल हो गया. बेचारी मरियम और उस का 5 साल का बेटा आदिल अब इस घर में अकेले रह गए थे.

‘‘न जाने कितने इम्तिहान बाकी हैं मेरे,’’ मरियम मन ही मन बुदबुदाती और आंसू ढुलकाती.

वह छोटा बच्चा ही मरियम की जिंदगी की एकमात्र उम्मीद था, जिस के सहारे वह समय काट देती, पर यह सब इतना आसान नहीं होने वाला था.

धीरेधीरे मरियम की दूसरी शादी के लिए उस पर आसपास के लोगों और उम्रदराज मर्दों का दबाव बनने लगा, पर मरियम ने शादी की हर बात को सिरे से खारिज कर दिया था.

‘‘जब एक बार मेरे मर्द ने मुझ से बेवफाई की है, तो दूसरी बार ऐसा नहीं होगा, इस का क्या भरोसा है?’’ मरियम की आवाज में दर्द झलकता था.

घर का खर्च चलाने के लिए मरियम ने सिलाईकढ़ाई का काम शुरू कर दिया था. वह बाजार से थोक रेट वाली दुकान से कपड़ा खरीद कर लाती और उन पर रंगबिरंगे व सुनहरे धागों से कढ़ाई करती और ऐसा कर के उस ने कई मेजपोश, आईने के कवर और चुनरी तैयार कर ली थीं.

ये सारे सामान अगर बिक जाते, तो मरियम को कुछ पैसे जरूर मिल जाते और आमदनी का एक सिलसिला भी चल निकलता.

इस काम के लिए मरियम कसबे के एक दुकानदार रफीक के पास पहुंची.

रफीक के साथ उस गांव काएक पंडित भी बैठा था, जिसे कसबे के लोग ‘बड़े पंडितजी’ कहते थे.

बड़े पंडितजी थे बड़े एक नंबर के औरतखोर. कसबे की गरीब और जरूरतमंद औरतों को घूरना और नाजायज रिश्ते बनाना उन का पसंदीदा काम था.

रफीक से बड़े पंडितजी की अच्छी बनती थी. उस ने मरियम को बैठाया और उस के आने का सबब पूछने लगा. उस की नजरें बातोंबातों में ही मरियम के जिस्म को टटोलने लगी थीं.

मरियम के उभरे सीने को देख कर रफीक के मुंह में पानी आ गया था और वह मन ही मन मरियम के जिस्म को भोगने के सपने देखने लगा था.

रफीक समझ गया था कि मरियम एक जरूरतमंद औरत है और उसे अपने कब्जे में कर पाना बहुत आसान होगा, इसलिए उस ने मरियम से कहा, ‘‘आप चिंता बिलकुल मत करो. अपना बनाया हुआ सारा सामान हमारी दुकान पर छोड़ जाया करो. हम उसे बेच कर वाजिब दाम दे दिया करेंगे.’’

बड़े पंडितजी भी चुपचाप बैठे हुए मरियम के जिस्म के उतारचढ़ाव का मुआयना कर रहे थे.

रफीक की बात सुन कर मरियम मन ही मन बहुत खुश हो गई थी. उस ने रफीक को शुक्रिया कहा और घर आ कर कढ़ाई का काम और भी तेजी से करने लगी.

कुछ ही दिनों में मरियम ने बाजार से खरीदी हुई एक सादा चुनरी पर कढ़ाई कर के उसे और भी खूबसूरत बना दिया था.

अपना काढ़ा हुआ सामान ले कर मरियम रफीक के पास गई. रफीक मरियम को देख कर फिर से खूब मीठी बातें करने लगा और बातोंबातों में मरियम के जिस्म को छूने की कोशिश भी कर लेता था.

रफीक की ऐसी हरकतों से मरियम परेशान तो महसूस कर रही थी, पर इस समय उस की मजबूरी थी, क्योंकि कसबे में रफीक की ही ऐसी दुकान थी, जो खूब चलती थी और फिर शहर में कई बड़े दुकानदारों से रफीक की अच्छी पहचान थी.

रफीक चाहे तो मरियम का धंधा चुटकियों में पनपा सकता है, ऐसा सोच कर मरियम खामोश थी, पर उस ने अपने जिस्म को समेटते हुए दुपट्टे को अपने जिस्म पर कस कर लपेट लिया था.

रफीक ने मरियम को एक हफ्ते के बाद आने को कहा, पर मरियम को तो यह एक हफ्ता बहुत लग रहा था, इसलिए वह 5वें दिन ही रफीक के पास पहुंच गई थी.

रफीक उस समय अपनी दुकान पर बैठा हुआ कुछ काम कर रहा था. पास ही बड़े पंडितजी भी बैठे हुए मोबाइल में रील देख रहे थे. मरियम को देख कर रफीक खुश हो गया. ऐसा लगा कि आज वह उस का पहले से इंतजार कर रहा था.

रफीक ने मरियम को एक स्टूल पर बिठाया. मरियम ने कुछ कहना चाहा, पर रफीक ने अनसुना कर दिया और दुकान के अंदर चला गया. वापसी में उस के हाथ में चाय के 2 गिलास थे.

‘‘लो, पहले तुम चाय पियो मरियम,’’ रफीक ने चाय आगे बढ़ाई.

पहले तो मरियम थोड़ा हिचकी, पर रफीक के बारबार कहने पर मरियम ने चाय ले ली और छोटेछोटे घूंट भरने लगी.

बड़े पंडितजी मरियम को चाय पीते देख रहे थे. चाय पीने के बाद मरियम बात शुरू करने जा ही रही थी कि उस का सिर भारी होने लगा और आंखों के सामने अंधेरा सा छाने लगा.

मरियम अपनेआप पर काबू न रख सकी और बेहोश हो कर एक ओर लुढ़क गई. रफीक को तो इसी पल का इंतजार था. उस ने तुरंत अपनी दुकान का शटर अंदर से बंद कर लिया.

बेहोश मरियम को निहारते हुए रफीक ने मरियम की सलवार का नाड़ा खोल कर एक ओर फेंक दिया और फिर कुरता भी उतार फेंका.

रफीक मरियम के नंगे जिस्म को देख कर पागल हो उठा था. वह कभी मरियम के निढाल जिस्म को अपनी बांहों में कसता, तो कभी मरियम के अंगों पर अपने होंठ रगड़ने लगता.

रफीक पर हवस का भूत बहुत हावी हो चुका था और फिर जल्दी से उस ने अपने भी कपड़े उतार फेंके और फिर मरियम के कोमल जिस्म पर हावी हो गया.

उस दौरान बड़े पंडितजी अपने मोबाइल में यह सारा गंदा काम कैद करते रहे.

रफीक के हटने के बाद बड़े पंडितजी ने भी अपने कपड़े उतार फेंके और मरियम के जिस्म का मजा लेने लगे.

मरियम के साथ कई बार सैक्स करने के बाद उस के नंगे बदन को रफीक अपने मोबाइल में कैद करना नहीं भूला था.

जब मरियम को होश आया, तब रफीक उस के पैरों के पास बैठा हुआ था और अपने मोबाइल पर वही वीडियो देख रहा था. मरियम को सम?ाते देर नहीं लगी कि उस की इज्जत लुट चुकी है.

रफीक और बड़े पंडितजी की निगाहें मरियम को पहले से ही ठीक नहीं लग रही थीं, पर उस की मजबूरी और गरीबी उसे आज इस हाल में ले आई थी कि इन दोनों भेडि़यों ने उस के साथ मुंह काला कर के कहीं का नहीं छोड़ा था.

मरियम ने भारी मन से अपने कपड़े पहने. उस के मन में तूफान सा चल रहा था. उस की आबरू लुट चुकी थी. अब उसे दुनिया में सिर्फ खुदकुशी कर लेने के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा था. दरिंदों ने इस तरह उस के जिस्म को नोचा था कि उस की हर नस दर्द हो रही थी.

‘पर, अगर मैं मर गई तो मेरे बच्चे का क्या होगा? वह किस के सहारे रहेगा?’ अपने 5 साल के बच्चे आदिल का खयाल आते ही मरियम ने तुरंत अपना फैसला बदल लिया. वह गुस्से में अपने घर पहुंची और बालटी भरभर कर नहाने लगी.

मरियम के मासूम बच्चे को भला क्या पता था कि उस की अम्मी पर क्या गुजरी है.

इस घटना को 3 दिन ही गुजरे थे कि मरियम के पास रफीक आया और अपने मोबाइल की तरफ इशारा कर के उस से आज फिर हमबिस्तर होने की मांग की और ऐसा न करने पर उसे पूरे कसबे में बदनाम कर देने की धमकी दे डाली. साथ ही, उस के धंधे को भी खत्म कर देने की बात कही.

मरियम आंसुओं में डूब गई, क्योंकि अब तो रफीक और बड़े पंडितजी उसे उस की वीडियो का डर दिखा कर न जाने कितने दिनों तक हमबिस्तरी की मांग करते रहेंगे… यह सोच कर वह परेशान हो उठी, पर अगले पल ही उसे उम्मीद की एक किरण दिखाई दी और वह उम्मीद की किरण थी कानून और पुलिस.

मरियम ने कोठरी में ताला लगाया और पुलिस चौकी पहुंच गई. वह पुलिस को आपबीती सुनाते हुए रफीक और बड़े पंडितजी को गिरफ्तार करने की मांग करने लगी.

पुलिस वालों ने चटकारे ले कर मरियम की कहानी को एक नहीं, बल्कि कई बार सुना, पर रिपोर्ट नहीं लिखी. और तो और, मरियम से यह भी कहा कि वे कैसे भरोसा करें कि उस का रेप हुआ है और मरियम से सुबूत दिखाने को कहा गया.

बेचारी मरियम शर्म से गड़ गई और बिना कुछ कहे वापस आने लगी.

मरियम पुलिस चौकी से बाहर निकली, तो उसे पीछे से किसी ने आवाज दी. वह एक 35 साल का नौजवान था. उस नौजवान ने बताया कि वह इसी कसबे का एक दलित जाति का नौजवान घामू है, जो बचपन से ही फिल्मों में जाना चाहता था और शौक के चलते कसबे में होने वाले ड्रामा और नाटकों में भाग लिया करता था, पर बड़े पंडितजी को यह कतई मंजूर नहीं था कि कोई पिछड़ी जाति का ऊंची जाति के बनाए मंच पर आए और उन के साथ उठेबैठे, इसलिए बड़े पंडितजी ने घामू को बुला कर नाटक में भाग लेने से
मना किया.

पर घामू को तो ऐक्टिंग का शौक था और कसबे के लोग भी उसे पसंद करते थे, इसलिए उस ने ऐक्टिंग को जारी रखा. उस की इस बात से बड़े पंडितजी चिढ़ गए और अपने गुरगों द्वारा घामू की 16 साल की बहन को उठवा लिया, उस के साथ रेप किया और उस की वीडियो बना कर घामू की बहन को ब्लैकमेल करने लगे. बाद में परेशान हो कर घामू की बहन ने नदी में कूद कर अपनी जान दे दी.

मरियम और घामू चलते हुए पुलिस चौकी से काफी दूर निकल आए थे.

मरियम घामू की बात तो सुन रही थी, पर यह सम?ा नहीं पाई थी कि वह उसे यह सब क्यों बता रहा है?

घामू ने मरियम को आगे बताया कि उसे एक ऐसी औरत की तलाश है, जो थोड़ी सी हिम्मत दिखाते हुए रफीक और बड़े पंडितजी के खिलाफ पुख्ता सुबूत जमा कर सके.

‘‘पर, मुझे तो सिलाईकढ़ाई और खाना बनाने के अलावा कुछ नहीं आता. ऐसे में बदला लेने जैसी बात तो मैं सोच भी नहीं सकती,’’ मरियम ने कहा,

जिस के बदले में घामू ने उसे अपना मोबाइल दिखाते हुए कहा कि मरियम, तुम बिलकुल मत घबराओ. वह उसे सबकुछ सिखा देगा, बस उसे एक नाटक खेलना होगा.

मरियम ने उन खतरनाक और गंदे किरदार वाले लोगों से किसी भी तरह का बदला लेने से इनकार कर दिया, तो घामू ने उस की हिम्मत बढ़ाते हुए कहा कि तब तो वे लोग उसे जिंदगीभर यों ही परेशान करते रहेंगे और उस के जिस्म से खिलवाड़ भी करते रहेंगे. यह बात मरियम की समझ में आ गई थी, इसलिए उस ने हां में सिर हिला दिया.

2-3 दिन बीतने के बाद घामू मरियम के घर पहुंचा. घामू ने मरियम से कहा, ‘‘देखो मरियम, तुम्हारे पास खोने को कुछ नहीं है, क्योंकि उन के पास तुम्हारी वीडियो और फोटो हैं, इसलिए अब तुम्हें मोबाइल की कुछ तकनीक सीखनी होगी और तुम अब वह करो, जो मैं तुम्हें बताता हूं.’’

घामू ने मरियम को एक प्लान बताया, जिसे सुन कर मरियम की आंखें हैरत से फैलती चली गईं.

उस दिन दोपहर में जब मरियम बाजार से आ रही थी, तब रफीक ने उसे फिर से घेर लिया और आज उस की दुकान पर आ कर शाम को रंगीन बनाने की बात कहने लगा, जिस के बदले में मरियम ने सकुचाते हुए हां कर दी.

शाम को 7 बजे मरियम रफीक की दुकान पर पहुंच गई. रफीक ने मरियम के आते ही दुकान का शटर बंद कर दिया और मरियम को दुकान के अंदर बने एक कमरे में ले गया.

यह कमरा साफसुथरा था. वहां कोने में एक दीवान पड़ा हुआ था, जिस पर बड़े पंडितजी पहले से बैठे थे और शराब पी रहे थे.

रफीक ने मरियम को अपनी बांहों में भरना चाहा, तो वह तुरंत छिटक गई और बोल्ड अंदाज दिखाते हुए बोली कि आज वह उन लोगों को मरजीना वाला डांस दिखाएगी और फिर उन का मूड बनाएगी.

‘यह मरजीना वाला डांस कौन सा होता है भाई?’ वे दोनों एक आवाज में बोले, तो मरियम ने उन्हें बताया कि मरजीना वाला डांस यानी वह डांस, जो ‘अलीबाबा और चालीस चोर’ नाम की फिल्म में मरजीना करती है.

ऐसा कहने के साथ ही मरियम ने अपना कुरता अपने बदन से अलग कर दिया, पर अंदर वह एक छोटी कुरती पहने हुए थी, जिसे देख कर रफीक और बड़े पंडितजी मूड में आ गए और पागल से होने लगे.

मरियम अपने साथ एक मिनी स्पीकर लाई थी और उस पर ‘महबूबा ओ महबूबा’ वाला गाना बजा दिया और अपनी कमर को सैक्सी अंदाज में लचकाने लगी. बीचबीच में वह किसी साकी की तरह उन दोनों को शराब भी पिला देती थी.

मरियम का सैक्सी डांस देख कर रफीक से रहा नहीं गया और उस ने मरियम को पकड़ लिया और कुछ कहने लगा, पर मरियम ने उसे पहले स्पीकर की ओर इशारा कर के गाना बंद करने को कहा और फिर अपना कुरता पहन कर वापस रफीक के सामने आ कर बैठ गई.

‘‘अब बताओ कि क्या कहना चाह रहे हो?’’ मरियम ने शांत लहजे में पूछा, तो रफीक और बड़े पंडितजी ने मरियम से कहा, ‘‘नाच बहुत हुआ, अब तुम हमारा बिस्तर गरम कर दो.’’

मरियम ने उन से पूछा, ‘‘तुम लोग किसी औरत की गंदी वीडियो क्यों बनाते हो?’’

‘‘अरे, तुम जैसी सैक्सी औरतों और लड़कियों को बेहोश कर के हम पहले तो उन का रेप करते हैं और उस के बाद उन की गंदी वीडियो अपने पास रख लेते हैं, जिस के बल पर हम बारबार उन औरतों का रेप करते हैं,’’ शराब के नशे में बड़े पंडितजी सबकुछ बोले जा रहे थे.

‘‘तो क्या मेरे अलावा और कोई भी आप के जाल में फंस चुकी है,’’ मरियम के इस सवाल के जवाब में रफीक ने कई लड़कियों के नाम गिना दिए.

‘‘लेकिन, सब से ज्यादा मजा उस नाटक करने वाले घामू की बहन के साथ आया था. बहुत कसावट भरी थी वह,’’ बड़े पंडितजी अपनी आंखों को सिकोड़ते हुए बोले.

मरियम अचानक उठी. उस ने अपना स्पीकर भी उठा लिया और उस के पीछे छिपे मोबाइल को उठा कर चल दी.

रफीक और बड़े पंडितजी उसे रोकने लगे, तो मरियम ने गुस्से से घूरते हुए कहा, ‘‘तुम लोगों के खिलाफ सारे सुबूत इस मोबाइल में आ चुके हैं. अब पुलिस ही तुम लोगों से बात करेगी,’’ और इस के बाद मरियम ने अंदर से बंद शटर को खोलने की कोशिश की, पर उस से भारी शटर नहीं खुला.

पर अचानक किसी ने बाहर से हाथ लगाते हुए शटर खोल दिया. वह और कोई नहीं, बल्कि घामू ही था और उस के साथ थी पुलिस और न्यूज चैनल के पत्रकार.

पुलिस ने पूरे हालात का जायजा लिया. मरियम ने रफीक और बड़े पंडितजी पर ब्लैकमेलिंग और यौन शोषण का आरोप लगाते हुए चोरी से बनाए गए उस वीडियो को मीडिया और पुलिस को सौंप दिया, जिस में वे दोनों शराब के नशे में अपने गलत कामों की शेखी बघार रहे थे.

पुलिस को मीडिया के दबाव में उन दोनों को गिरफ्तार करना पड़ गया था.

घामू और मरियम का बदला पूरा हो गया था. भले ही मरियम के साथ हुए रेप की बात फैल गई थी, पर कम से कम रफीक और बड़े पंडितजी अब किसी और लड़की की जिंदगी तो बरबाद नहीं कर सकेंगे.

कुछ दिन बीतने के बाद घामू मरियम के घर पहुंचा, तो मरियम उसे देख कर सहज भाव से मुसकरा दी और उस का बेटा आदिल घामू के गले लग गया.

घामू ने मरियम से उस की तारीफ करते हुए कहा कि कितनी जल्दी उस ने डांस करना और मोबाइल से चोरी से वीडियो बनाना और दूसरी बातों को सीख लिया, जिस के बदले में मरियम के गोरे गालों पर शर्म की लाली दौड़ गई थी.

मरियम को मुसकराते देख फौरन ही घामू ने उस के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया, पर मरियम चुप थी.

घामू मरियम के चेहरे पर छाई खामोशी का मतलब नहीं सम?ा पा रहा था. उस ने बेसब्री से कहा, ‘‘तुम खामोश क्यों हो मरियम?’’

‘‘पगले इतना भी नहीं जानते कि औरत की खामोशी का मतलब ही उस का इकरार होता है,’’ शरमाते हुए मरियम ने कहा, तो घामू ने भी खुशी से मरियम के माथे को चूम लिया.

ठीक उसी समय आदिल ने मोबाइल से उन दोनों की तसवीर खींच ली.

Hindi Story : डांस बार पर्यटन

Hindi Story : जीवन बीमा निगम में काम करते हुए गुप्ताजी अब रिटायरमैंट के नजदीक थे. एक बेहतरीन मैनेजर के रूप में उन्होंने अपने सेवाकाल के पूरे 34 साल गुजार दिए थे. 2 बेटों की शादी कर अपनी बड़ी पारिवारिक जिम्मेदारी पूरी कर वे संतोष के भाव से अपनी नौकरी कर रहे थे. अब तक मशीन की तरह की दिनचर्या में खास रंगों की कमी, जिसे काफी हद तक बोरिंग लाइफ कहा जा सकता है, में ही उन के दिन कट रहे थे. न पर्यटन, न तीर्थाटन, बस किसी तरह उन्होंने इतने साल बिता दिए थे.

पूजापाठी धर्मपत्नी भी बाहर घूमने की इच्छा रखने वाली कभी न रही, तो पत्नी के साथ घर छोड़ कर साथ में कभी न घूमना तय हो पाया, न कभी देवालय दर्शन की योजना पूरी हो पाई.

औफिस के 3-4 नौजवान शिरडी के सांईं बाबा के दर्शन का प्रोग्राम बना रहे थे, तो गुप्ताजी से भी चलने के लिए पूछा गया. पहले तो उन्होंने आदतन मना कर दिया, पर शाम तक विचार करने और पत्नी से मोबाइल पर सलाह करने के बाद साथ चलने की रजामंदी दे दी.

सबकुछ तय होने के बाद 3-4 दिन का कार्यक्रम राजस्थान, गुजरात के रास्ते पड़ने वाली जगहों को बहुत कम समय देते हुए दिल्ली से एक गाड़ी में 5 लोग 2 दिन में शिरडी पहुंच गए.

आस्था का सैलाब भक्तों की भीड़ के साथ दर्शन करने के बाद पूरी तरह शांत हो चुका था. गुप्ताजी अपनेआप को बहुत हलका महसूस कर रहे थे. ऐसा कि जो उन्होंने कई सालों में महसूस नहीं किया था.

एक जगह भोजन करते हुए अब आगे के प्रोग्राम के लिए चर्चा होने लगी, तो गुप्ताजी हैरान हो कर बोले, ‘‘तो यहां से वापस घर लौटने का अभी कोई प्रोग्राम नहीं है न?’’

एक साथी मजाकिया अंदाज में बोला, ‘‘हम ने पुराने पाप तो धो लिए हैं, अब कुछ नए पाप कर लेते हैं.’’

एक जोर का ठहाका लगा और दूसरे साथी ने सु?ाया, ‘‘अब यहां से गोवा चलते हैं. खूब बीयर पिएंगे और बीच पर मस्ती करेंगे.’’

सब ने गुप्ताजी की तरफ देखा, जैसे वे सब तो तय कर ही चुके हैं, अब उन को भी अपनी रजामंदी दे देनी चाहिए.

गुप्ताजी 5 मिनट तक कुछ न बोले, तो एक साथी फिर से बोला, ‘‘क्या बात है गुप्ताजी, मन क्या कह रहा है? हमारे साथ चलिए गोवा. आप की बरसों की थकान वहां मसाज करा कर मिटा देंगे.’’

गुप्ताजी ने पूरा कौर चबाया, फिर धीरे से बोले, ‘‘हमारी जवानी में मनोरंजन के नाम पर सिर्फ सिनेमाघर में मूवी देखना होता था. उन मूवीज में कैबरे और बार में डांस देख कर मन बड़ा खुश हो जाता था. कब से मेरी इच्छा रूबरू ऐसा बार डांस देखने की है.’’

गुप्ताजी की यह बात सुन कर कुछ समय के लिए बाकी लोगों की चुप्पी आंखों ही आंखों में बात करती रही. किसी को भी गुप्ताजी की मनतरंग के ऐसे धमाके की कतई उम्मीद नहीं थी.

एक साथी बोला, ‘‘डांस बार तो मुंबई में थे, जो अब बंद हो चुके हैं. यह कैसे मुमकिन है…’’

सब से पहले एक और नौजवान साथी बोला, ‘‘पहली बार तो गुप्ताजी ने कोई इच्छा जाहिर की है. हम इसे पूरा करने की कोशिश तो कर ही सकते हैं. मेरा एक दोस्त मुंबई के एक होटल में मैनेजर है. उस से बात करता हूं,’’

और उस ने तुरंत मुंबई फोन लगाया, तो छूटते ही सामने से जवाब आया, ‘अब कौन से डांस बार… वे तो कब के बंद हो चुके हैं…’

‘‘भाई, कैसे भी यह इंतजाम करना ही है. कहीं से भी पता करो, पर यह इंतजाम कराओ.’’

‘ठीक है, मैं पता करने की कोशिश करता हूं कि कहीं पर चोरीछिपे चल रहे हैं क्या…’ उधर से आवाज आई.

आधे घंटे बाद ही उस मैनेजर का फोन आया और उन्हें अंधेरी में एक बार का नाम बताते हुए वहां पहुंचने की जरूरी जानकारी दे दी गई.

दिल्ली का दल फटाफट पूरी ऊर्जा के साथ मुंबई पंहुच गया. ट्रैफिक की भीड़भाड़ को देखते हुए गाड़ी को छोड़ अंधेरी तक का सफर लोकल ट्रेन से किया गया.

अंधेरी स्टेशन के बाहर खड़ी टैक्सी को जब बार का नाम ले कर चलने के लिए कहा गया, तो 3 लोगों ने तो मना कर दिया, फिर चौथे टैक्सी वाले की जेब में चुपचाप 500 का नोट डाल कर उस से बार का नाम ले कर छोड़ने को कहा गया.

ड्राइवर बोला, ‘‘मैं चुपचाप थोड़ी दूरी पर छोड़ कर चला आऊंगा. वहां से अपनेआप चले जाना.’’

‘‘क्यों भाई, ऐसा क्या है वहां, जो तुम इतना बिदक रहे हो?’’ एक साथी ने टैक्सी ड्राइवर से पूछा.

‘‘भाई, तुम जगह ही ऐसी जा रहे हो. वहां पहुंचोगे तो पता चल जाएगा,’’ वह टैक्सी ड्राइवर बोला.

इतना सुनते ही सब लोग फुरती से गाड़ी में बैठे और तकरीबन 20 मिनट में टैक्सी ड्राइवर उन्हें बार से कुछ ही दूर उतार कर रफूचक्कर हो गया.

थोड़ी देर के बाद वे लोग उस दबेछिपे डांस बार को खोजने में कामयाब हो गए. आगे से बेकरी की दुकान से एक छोटा सा दरवाजा उन्हें एक बड़े से कमरे में ले आया, जहां उन का सामना 3 लंबेचौड़े बाउंसर से हुआ.

परखने के बाद उन्हें भीतर बने स्टेज के पास रखी गोल मेज के चारों तरफ रखी कुरसियों पर बैठा दिया गया. बीयर भी उन की मांग के मुताबिक परोस दी गई.

10 मिनट तक कोई हलचल नहीं हुई, फिर हिम्मत कर के एक नौजवान साथी बाउंसर से पूछने गया कि डांस कब और कैसे शुरू होगा.

बाउंसर ने पास आ कर धीरे से कहा, ‘‘वह देखो लड़कियां स्टेज पर आ कर खड़ी हो गई हैं. अब उन में से पसंद कर जिस भी लड़की को टिप दोगे, वह आप की पसंद के गाने पर डांस कर के दिखाएगी.’’

उस साथी ने लौट कर सब को बात बताई और गुप्ताजी की पसंद पूछी, जिन पर बीयर का नशा अब कुछकुछ चढ़ने लगा था. शादी के बाद यह उन का पहला सुरासेवन हो रहा था.

गुप्ताजी ने हौले से अपनी पसंद की लड़की की ओर इशारा किया, तो नौजवान साथी ने दौड़ कर 500 रुपए लड़की को थमाए और 1,000 के छुट्टे 10-20 रुपए के नोट में ले आया और टेबल पर जमा दिए.

‘तू चीज बड़ी है मस्तमस्त…’ गाने पर गुप्ताजी की पसंद वाली लड़की ने 5-6 मिनट तक अपने डांस से उन पांचों का मनोरंजन करने की कोशिश की. नोट भी खूब बरसाए, पर अभी मजा नहीं आया था.

फिर उस नौजवान साथी ने माहौल को गरमाने का भार अपने कंधे पर ले लिया. अपनी पैनी नजर से उस ने एक और लड़की को 500 के 2 नोट दिए और गुप्ताजी की ओर इशारा कर ‘टिपटिप बरसा पानी…’ गाने पर मदमस्त डांस करने को कहा. पैसे की मिठास ने बार डांसर को गाने की पहली बीट से ही जोश में ला दिया.

अपनी घनी जुल्फों को उस लड़की ने पूरी तरह खोल दिया और अगले 10 मिनट में मस्त हो कर वह ऐसे नाचने लगी कि गुप्ताजी भी सबकुछ भुला कर उस के साथ ठुमके लगाने लगे.

सभी लोग मजे ले रहे थे, पर एक साथी उस समूह में ऐसा था, जो सुरापान से परहेज रखता था और अब सब को लौटने के लिए कहने लगा. गुप्ताजी अभी और समय वहां बिताना चाहते थे, पर थोड़ी देर में बिल चुकता कर सब वहां से निकल गए.

गुप्ताजी नशे में चूर बारबार गा रहे थे, ‘‘टिपटिप बरसा पानी…’’ जिंदगी में पहली बार इस तरह का मजा उन्होंने लिया था, जिस ने उन्हें अपनी बरसों से दबी फैंटेसी को पूरा होने से खुद को खुद से भुला दिया था.

वे बारबार अपने सफर के साथियों के गले लग कर बस एक ही लाइन दोहराते, ‘‘टिपटिप बरसा पानी…’’ जैसे उस शाम के लिए वे बारबार धन्यवाद कह रहे हों.

रात की मस्ती होटल पहुंच कर पूरी हो गई. हावी हो रही थकान और नशे के सुरूर ने जल्दी सब को नींद के आगोश में ले लिया. अगली सुबह सब ने एकमत हो कर घर लौटने का फैसला कर लिया.

घर लौटे गुप्ताजी की चुस्ती और फुरती को देख कर घर वाले हैरान थे. सांईं बाबा की कृपा मान कर बाकी घर वाले भी जल्द ही शिरडी दर्शन जाने का विचार करने लग गए थे.

लेकिन असलियत तो गुप्ताजी ही जानते थे, जिन पर अभी तक डांस बार की लड़कियों की खुमारी नहीं
उतरी थी.

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