News Kahani: सैक्स स्कैंडल और साजिश

उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद के एक गांव रत्न खेड़ा में चौधरी सुमेर सिंह का दबदबा था. वे गांव के मुखिया थे और उन की अंटी भी मजबूत थी. घर क्या पूरी कोठी थी और नौकरचाकर भी हमेशा काम पर लगे रहते थे.

चौधरी सुमेर सिंह का एकलौता बेटा था सुमित, जो अपने घर के पीछे बने एक बड़े से कमरे में एनजीओ चलाता था, जहां गरीब दलित घरों की जवान लड़कियों को सिलाईकढ़ाई सिखाई जाती थी. पर यह सब काम लोगों को भरमाने के लिए किया जाता था. सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे तक एनजीओ का काम होता था, पर उस के बाद वही कमरा सैक्स का दंगल बन जाता था.

दरअसल, सुमित अपनी कुछ खास गरीब लड़कियों और चमचों के साथ मिल कर पोर्न फिल्में बनाता था और अपने परमानैंट ग्राहकों को भेजता था. वे ग्राहक देशी अनब्याही लड़कियों के पोर्न वीडियो देखने के शौकीन थे और सुमित को पैसा भी देते थे. फिर वे उन वीडियो को चाहे देश में बेचें या विदेश में, सुमित को इस बात से कोई मतलब नहीं था.

सुमित के पिता चौधरी सुमेर सिंह को इस धंधे की खबर थी या नहीं, यह वही बता सकते थे, पर यह जरूर था कि सुमित अपने पिताजी की बहुत इज्जत करता था. वह अपनी मां का लाड़ला था और दिखने में बड़ा हैंडसम था.

सुमित की टीम में 2 लड़कियां खास थीं, माला और सुनहरी. 21 साल की माला गोरी थी और उस के नैननैक्श भी अच्छे थे. 24 साल की सुनहरी के आने से पहले वही सुमित की चहेती थी, पर जब से सुनहरी आई थी, तब से माला के भाव कम हो गए थे.

माला माल थी, तो सुनहरी कमाल थी. वह भले ही गरीब घर की दलित लड़की थी और उस का रंग भी दबा हुआ था, पर देह की खरा सोना थी. बड़े उभार, लंबे बाल और मदमस्त चाल सुनहरी को गजब का रूप देते थे.

सुमित को भी सुनहरी बड़ी पसंद थी और वह उसे माला से भी ज्यादा पैसे देता था. यह बात माला को खाए जा रही थी. उसे सुनहरी से जलन होने लगी थी.

एक दिन माला ने सुमित से पूछा, ‘‘आप सुनहरी को इतना सिर पर क्यों चढ़ा रहे हो? आप और मैं ऊंची जाति के हैं और वह दलित घर की गरीब लड़की, फिर वह सब से ज्यादा पैसे क्यों लेती है? मुझ में क्या कोई कमी है?’’

‘‘तुम में कोई कमी नहीं है, पर वह बिस्तर पर एकदम खुल जाती है. उस का सैक्स वाला वीडियो एकदम असली लगता है और तुम बर्फ सी ठंडी पड़ी रहती हो. शूट करने में मजा ही नहीं आता है. और फिर उस के वीडियो की आज मार्केट में डिमांड है,’’ सुमित ने हकीकत बता दी.

माला को यह बात खल गई. उस ने सुनहरी को सबक सिखाने की सोच ली. उधर, जब से सुनहरी इस धंधे में आई थी, तब से उस की जिंदगी बदल गई थी. घर वाले खुश थे और अब भूखों मरने की नौबत नहीं आती थी.

सुनहरी की मां को वैसे तो घर आता पैसा बुरा नहीं लगता था, पर बेटी के लक्षण देख कर वे थोड़ा चिंतित थीं. एक दिन उन्होंने सुनहरी को टोक दिया, ‘‘बेटी, जब से तू एनजीओ में जाने लगी है, तब से हमें दो वक्त की रोटी तो वक्त पर मिल रही है, पर तू कोई गलत काम तो नहीं कर रही है न?’’

‘‘अरे मां, गलतसही के चक्कर में मत पड़ो और जिंदगी का मजा लो. आज से 6 महीने पहले कोई इस घर में    झांकता तक नहीं था और आज मेरे लिए रिश्ते आ रहे हैं. मां, यह सब पैसे की ही माया है और फिलहाल इस माया का मजा उठाओ,’’ सुनहरी ने इतना कहा और एनजीओ के लिए निकल गई.

एनजीओ में अभी सुमित नहीं आया था. माया को मौका मिल गया और उस ने सुनहरी को छेड़ते हुए कहा, ‘‘ऐसी क्या घुट्टी पिला दी, जो सुमित सर तेरे ही सुर में सुर मिला रहे हैं? यह चार दिन की चांदनी है मेरी जान, फिर कब उन की नजर से उतरेगी, तुझे पता भी नहीं चलेगा.’’

‘‘तू अपनी देख. मु   झे क्या करना है, मैं जानती हूं. बड़ी आई सलाह देने वाली,’’ सुनहरी भी मुंहफट थी, तो एकदम से बोल पड़ी.

यह सुन कर माला सुलग गई. हद तो तब हो गई, जब सुमित ने पीछे से आ कर यह बात सुन ली और माला को ही डांट दिया.

सब के सामने अपनी इज्जत उतरते देख कर माला को बड़ा गुस्सा आया और उस ने बदला लेने की ठान ली. वह जानती थी कि सुमित सारे वीडियो एक पैन ड्राइव में संभाल कर रखता है,

तो उस ने मौका ताड़ कर एक दिन वह पैन ड्राइव चुरा ली और चौधरी सुमेर सिंह के जानी दुश्मन जगत सेठ के यहां जा पहुंची.

जगत सेठ को सुमेर सिंह का दबदबा रास नहीं आता था. दरअसल, वह गांव का मुखिया बनना चाहता था, पर गांव वाले सुमेर सिंह पर आंख मूंद कर भरोसा करते थे. वह हमेशा इस फिराक में रहता था कि किसी तरह सुमेर सिंह को नीचा दिखा दे, पर उसे मौका नहीं मिल रहा था.

आज माला को अपने पास देख कर जगत सेठ पहले तो हैरान हुआ, फिर अपनी खीज मिटाते हुए बोला, ‘‘तुम इस समय यहां क्या कर रही हो? मैं ने तुम्हें मना किया है न कि ऐसे ही मेरे पास मत आया करो.’’

माला बड़ी बेचैन थी. वह सुनहरी की उस दिन की बात पर आज भी सूखी लकड़ी की तरह सुलग रही थी, ‘‘कल की आई यह कल्लो, मु   झे भाषण दे रही है. इस की औकात क्या है मेरे आगे. सुमित ने पता नहीं क्यों इस के इतने ज्यादा रेट बढ़ा रखे हैं. न शक्ल और न सूरत, बस इसे इज्जत की जरूरत.’’

‘‘मैं सम   झा नहीं कि तुम क्या कह रही हो. तुम तो सुमित की मुंहलगी हो, फिर आज मेरे दरवाजे पर कैसे आई?’’ जगत सेठ ने माला से पूछा.

‘‘देखो जगत सेठ, सारा गांव जानता है कि आप का और चौधरी सुमेर सिंह का छत्तीस का आंकड़ा है. आप को वह फूटी आंख नहीं सुहाता है. आप का बस चले तो आज ही उस के घर के दरवाजे पर कुर्की का परचा चिपकवा दो,’’ माला ने कहा.

‘‘तो तू क्या आज उस की कुर्की कराने यहां आई है?’’ जगत सेठ ने    झल्लाते हुए माला से पूछा.

‘‘उस से बड़ा कांड है जगत सेठजी, बस आप की मदद चाहिए. फिर देखना कि मैं कैसे इस सुनहरी का सारा सुनहरापन मिट्टी में मिलाती हूं,’’ माला जैसे बदले की आग में सुलग रही थी.

‘‘पहेलियां मत बु   झाओ. कोई अंदर की खबर है तो दो, वरना अपना रास्ता नापो. मेरे पास फालतू समय नहीं है तेरी राम कहानी सुनने का,’’ जगत सेठ ने दोटूक कहा.

माला ने समय न गंवाते हुए वह पैन ड्राइव जगत सेठ के हाथ में थमा दी, जिस में बेहूदा वीडियो की भरमार थी. माला इतनी शातिर थी कि उस ने अपने वीडियो पहले ही अलग कर दिए थे. इस पैन ड्राइव में दूसरी लड़कियों के वीडियो थे, जिन्हें सुमित और उस के चमचे शूट किया करते थे.

सारे वीडियो देख कर जगत सेठ की आंखों में चमक आ गई, ‘‘अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे…’’ वह बुदबुदाया और फिर माला से बोला, ‘‘वाह, मेरी जानेमन, आज तो तू ने मेरा दिल ही जीत लिया. अब मैं चौधरी सुमेर सिंह को कैसे कंगाल और अपनी माला को मालामाल बनाता हूं, बस तू देखती रहना.’’

माला उछल कर जगत सेठ से लिपट गई और उसे चूम लिया. जगत सेठ ने वह पैन ड्राइव अपनी इलैक्ट्रोनिक तिजोरी में रखी और माला को बैडरूम में ले गया.

अगले दिन जगत सेठ अपने खास दोस्त इंस्पैक्टर ताराचंद के साथ थाने में चाय पी रहा था. ताराचंद वह पैन ड्राइव देख चुका था. उस ने जगत सेठ से पूछा, ‘‘अब आगे क्या करना है? सुबूत तो एकदम पक्का है. सुमित एनजीओ की आड़ में लड़कियों के गंदे वीडियो बनाने का धंधा कर रहा है. उस के बाप को इस गोरखधंधे की भनक तो होगी, पर आंख बंद किए बैठा होगा.’’

‘‘ताराचंद, मुझे उन दोनों के चेहरे झुके देखने हैं तेरे थाने में. बड़ी अकड़ दिखाते हैं अपने चौधरी होने की. उन की सारी हेकड़ी न निकाल दी, तो मेरा नाम भी जगत सेठ नहीं.’’

उसी शाम को चौधरी सुमेर सिंह के घर पर पुलिस की रेड पड़ गई. सुमित को अंदाजा नहीं था कि माला उसे जहरीली नागिन की तरह डस लेगी. कोठी के उस खास कमरे का सारा सामान जब्त कर लिया, जहां पर सारे वीडियो शूट हुए थे.

सुनहरी और बाकी लड़कियों को उस कमरे से धर दबोचा था. सुमित का बाकी स्टाफ भी पुलिस के हत्थे चढ़ चुका था. चौधरी सुमेर सिंह उस समय कोठी में नहीं थे. उन्हें तो इस सारे कांड की भनक तक नहीं थी.

थोड़ी देर में सब थाने में थे. सुनहरी सम   झ चुकी थी कि माला ने ही यह मुखबिरी की है और हो न हो, इस में जगत सेठ का भी हाथ है. वे दोनों कई दिनों से एकसाथ देखे गए थे. पर माला यह कह कर टाल जाती थी कि जगत सेठ उसे अपनी रातें रंगीन करने के लिए बुलाता है और इनाम भी खूब देता है.

पुलिस इंस्पैक्टर ताराचंद ने सुमित को हड़काते हुए कहा, ‘‘यह क्या रायता फैला रखा है तुम ने… एनजीओ की आड़ में पोर्न वीडियो बनाए जा रहे हैं. अपने बाप की इज्जत का तो लिहाज कर लिया होता.’’

सुमित जानता था कि ताराचंद एक नंबर का घूसखोर है, पर फिलहाल उस के हाथ में सुमित की दुखती रग थी, तो उस ने कहा, ‘‘अरे थानेदार साहब, आप भी पता नहीं किस पैन ड्राइव की बात कर रहे हैं. वैसे भी हमारे यहां काम करने वाली सब लड़कियां बालिग हैं और अपनी मरजी से लोगों के मनोरंजन के लिए ऐसी फिल्में बनाती हैं.

‘‘पूछ लो किसी से भी कि हम ने किसी के साथ कोई जोरजबरदस्ती की हो. सब को अपनी मेहनत का पैसा एडवांस में मिल जाता है और किसी को इस काम से कोई शिकायत नहीं है.’’

‘‘हां भई, तुम तो पुण्यात्मा हो और समाज की भलाई का काम कर रहे हो. ये तुम्हारी साथी सब दूध की धुली हैं और देश की तरक्की के लिए नए रोजगार पैदा कर रही हैं. पैन ड्राइव में जो सैक्स का नंगा नाच दिख रहा है, वह तो आजकल बहुत मामूली बात है न,’’ इंस्पैक्टर ताराचंद ने सुमित पर ताना कसा.

‘‘साहब, आप चाहते क्या हो, यह बताओ? मु   झे पता है कि यह सब माला की करतूत है. लड़ाई मेरे और उस के बीच की थी, फिर वह हम सब के पेट पर क्यों लात मारना चाहती है…’’ सुमित कुछ बोलता, उस से पहले ही सुनहरी ने अपनी बात रख दी.

‘‘आप की तारीफ?’’ इंस्पैक्टर ताराचंद ने सुनहरी को ऊपर से नीचे तक घूरते हुए देखा. सुनहरी का रंग जरूर काला था, पर उस के जिस्म में अजीब सी कसावट थी.

‘‘जी, मेरा नाम सुनहरी है और मैं दलित समाज की लड़की हूं. सुमित साहब ने हम से कभी कोई जबरदस्ती नहीं की है, बल्कि ये तो हमारे घरपरिवार का पेट पाल रहे हैं.’’

‘‘मतलब, जो तुम लोग कर रहे हो, वह कानूनन गलत नहीं है?’’ इंस्पैक्टर ताराचंद ने पूछा.

‘‘कानून का तो आप जानो, पर हम ने कुछ गलत नहीं किया है. यह तो हर जगह हो रहा है. न जाने कितने वीडियो बनाने वाले रोज पकड़े जाते हैं. हाल ही में कर्नाटक में एक तथाकथित बड़ा स्कैंडल सामने आया है, जिस में एचडी देवेगौड़ा के बेटे एचडी रेवन्ना और पोते प्रज्वल रेवन्ना का नाम शामिल है.’’

इंस्पैक्टर ताराचंद ने आंखें तरेरते हुए सुनहरी से पूछा, ‘‘तुझे पूरा मामला पता भी है?’’

सुनहरी बोली, ‘‘साहब, बेशक मैं इस धंधे में देह खपा रही हूं, पर दीनदुनिया में कौन सी खबर गरम तवे पर तेल सी उछल रही है, इस की पूरी तह में जाती हूं. 10वीं जमात पास हूं, इस का मतलब यह नहीं है कि मु   झ में पढ़ने की ललक नहीं है.’’

इंस्पैक्टर ताराचंद ने उबासी लेते हुए कहा, ‘‘ज्यादा ज्ञान मत बांच, खबर क्या जानती है यह बता…’’

सुनहरी ने बताया, ‘‘खबर में छपा था कि कार्तिक गौड़ा नाम का एक आदमी रेवन्ना परिवार का पुराना ड्राइवर हुआ करता था. उस ने तकरीबन 15 साल तक रेवन्ना परिवार की गाडि़यां चलाई थीं, पर फिर न जाने क्यों धीरेधीरे रेवन्ना परिवार से उस के रिश्ते खराब होने लगे.

‘‘इस के बाद कार्तिक ने नौकरी छोड़ दी. उस की मानें तो रेवन्ना परिवार ने उस की जमीन पर कब्जा कर लिया था और इस बात की खिलाफत करने पर प्रज्वल ने उस के और उस की पत्नी के साथ मारपीट भी की थी. वह अपने साथ हुई इस ज्यादती के खिलाफ इंसाफ चाहता था.

‘‘चूंकि कार्तिक को रेवन्ना परिवार की काली करतूतों की खबर थी, उस ने अलगअलग लड़कियों के साथ रेवन्ना के बेहूदा वीडियो से भरा एक पैन ड्राइव हासिल कर लिया. इस पैन ड्राइव के साथ उस ने भारतीय जनता पार्टी के एक नेता देवराज गौड़ा से मुलाकात की.

‘‘उधर, प्रज्वल ने 1 जून, 2023 को इसे ले कर अदालत में दस्तक दी थी और कहा था कि वीडियो के सहारे उस की इमेज खराब की जा रही है.’’

‘‘पर, प्रज्वल रेवन्ना को किसी का गंदा वीडियो बनाने की जरूरत ही क्यों पड़ी?’’ इंस्पैक्टर ताराचंद अब इस मामले की परतें प्याज की तरह खोलना चाहता था.

सुनहरी ने थूक गटका और बोली, ‘‘दरअसल, यह मामला तब शुरू हुआ था, जब रेवन्ना परिवार में रसोइए के तौर पर काम कर चुकी एक औरत ने एफआईआर दर्ज करवाई है, जो एचडी रेवन्ना की पत्नी भवानी की रिश्तेदार बताई जाती है.

‘‘उस औरत ने अपनी शिकायत में बताया है कि जब उस ने रेवन्ना परिवार में रसोइए के तौर पर काम करने की शुरुआत की, उस के 4 महीने बाद उस का जिस्मानी शोषण शुरू हो गया था.

‘‘प्रज्वल रेवन्ना उस औरत की बेटी को फोन कर के उस के साथ गंदी बातें किया करता था. पीडि़ता ने बताया है कि साल 2019 में जब रेवन्ना परिवार के बेटे सूरज की शादी थी, तब उसे काम के लिए बुलाया गया था, लेकिन इस के बाद से जबजब मौका मिलता, रेवन्ना उसे अपने कमरे में अकेले बुलाया करते थे.

‘‘उस परिवार में 6 औरतें और काम करती थीं. सभी की सभी डरी होती थीं खासकर प्रज्वल रेवन्ना के घर आने पर औरतें सहम जाती थीं. यहां तक कि घर में काम करने वाले कुछ मर्द नौकरों ने भी उन्हें सावधान रहने को कहा था. इस तरह सभी डरेसहमे अपनी बारी का इंतजार किया करते थे.

‘‘पीडि़ता ने यह भी आरोप लगाया है कि जब रेवन्ना की पत्नी घर पर नहीं होती थीं, तो वे उसे स्टोररूम में बुला कर फल देने के बहाने उस के साथ गलत हरकत करता था. उस का यौन शोषण करता था.

‘‘कई बार उस के किचन में काम करने के दौरान रेवन्ना ने उस के साथ ज्यादती की थी, जबकि प्रज्वल उस की बेटी को वीडियो काल कर उस से गंदी बातें करता था, जिस के बाद उस की बेटी ने उस का नंबर ब्लौक कर दिया था.’’

‘‘हो सकता है, उस औरत ने आपसी रजामंदी से यह सब किया हो और बाद में रेवन्ना परिवार से फायदा उठाने के लिए यह नाटक रचा हो?’’ इंस्पैक्टर ताराचंद को अब सुनहरी से अपने इस सवाल का जवाब चाहिए था.

‘‘देखो साहब, मुझे यह तो नहीं पता कि कौन सच्चा है और कौन    झूठा, पर इतना तो सम   झ में आता ही है कि दाल में कुछ तो काला है. इस मामले में आईपीसी की धारा 354 (ए) यानी यौन शोषण, 354 (डी) यानी पीछा करना, 506 यानी जान से मारने की धमकी देना और 509 यानी बातें या इशारों से महिला की गरिमा का अपमान करना जैसी धाराएं शामिल हैं.

‘‘पुलिस सूत्रों की मानें, तो रेवन्ना की शिकार लड़कियों और औरतों में ज्यादातर वे ही शामिल हैं, जो किसी राजनीतिक सपने को पूरा करने या फिर अपने किसी काम को ले कर उन से मिलने आया करती थीं.’’

‘‘कानून का बड़ा ज्ञान है तुझे तो. धाराएं रटी हुई हैं. इन का मतलब भी समझती है?’’ इंस्पैक्टर ताराचंद ने सुनहरी की जानकारी से कुढ़ कर कहा.

ताराचंद ऊंची जाति का था और जातिवाद उस की रगरग में भरा था. वह यह बात कैसे सहन कर लेता कि एक दलित लड़की थाने में खड़ी हो कर धड़ल्ले से अपनी बात रख दे.

‘‘साहब, आप ने पूछा तो बता दिया. वैसे भी हम लोगों के पढ़नेलिखने की कद्र ही कहां है. हमारे समाज में तो औरत को घर की जूती समझा जाता है. ऐसी जूती जिसे किसी भी समाज का कोई भी ऐरागैरा पहनना अपना जन्मजात हक सम   झता है.

‘‘आज हम जितनी भी लड़कियां पकड़ी गई हैं न, उन में से ज्यादातर वंचित समाज की हैं और उन की इज्जत तो कम उम्र में ही लुट जाती है. मुझे तो कई साल पहले ही एक दबंग की बिगड़ैल औलाद ने खेत में धर लिया था. मना किया तो लातघूंसों से मेरी खातिरदारी की थी, रेप किया सो अलग.’’

‘‘पर, अब तो तू अपनी मरजी से वीडियो बनवा रही थी न?’’

‘‘बिलकुल बनवा रही थी और मु   झे इस का कोई अफसोस भी नहीं है. पैसा इनसान की हर कमजोरी को ताकत में बदल देता है. चौधरी साहब के बेटे ने भले ही हमारी वीडियो बनवाई हैं, पर हमें इस का कोई मलाल नहीं है. पैसा भी तो दिया है. और फिर आज की तारीख में कोई भी हमें पैसे से कमजोर नहीं कह सकता है. घर में सुखसुविधा का सारा सामान है. छोटी बहन पढ़ रही है. मांबाप को दो वक्त की रोटी मिल रही है.

‘‘साहब, इस देश में जो औरतों और लड़कियों की तरक्की का ढोल पीटा जा रहा है न, उस की पोल तो वाराणसी का रैडलाइट एरिया मंडुआडीह ही खोल देता है. देश का सब से ताकतवर नेता वहां से लोकसभा का इलैक्शन लड़ता है, पर क्या यह सामाजिक कोढ़ खत्म हो पाया? नहीं न. और होगा भी नहीं.

‘‘प्रज्वल मामले में भी शायद लीपापोती कर दी जाए, तो क्यों न हमें भी शांति से जीने दिया जाए. सब खाकमा रहे हैं, तो किसी के बाप का क्या जाता है.’’

सुनहरी के मुंह से इतना सुन कर इंस्पैक्टर ताराचंद ने चौधरी सुमेर सिंह के बेटे सुमित की ओर देखा और बोला, ‘‘लड़की की बात में दम है. आज मामला थाने में और फिर कल कोर्ट में जाएगा, तो बदनामी तो इस गांव की ही होगी न. किसी को कुछ नहीं मिलेगा.

‘‘ऐसा करो कि इस मामले को यहीं रफादफा करने के 2 लाख रुपए दे दो. तुम लोग कुछ दिन शांत रहना और फिर दोबारा जुट जाना वीडियो बनाने के धंधे में.

‘‘पर, एक बात का खयाल रखना कि दोबारा अपनी निजी लड़ाई को इस तरह थाने में मत घसीटना, वरना मैं लिहाज नहीं करूंगा. बाकी हमें भी कभीकभार अपनी जवानी का रस चखा देना,’’ सुनहरी को ताड़ते हुए इंस्पैक्टर ताराचंद ने अपनी बात खत्म की.

सुनहरी ने एक आंख दबाते हुए कहा, ‘‘इस में कौन सी बड़ी बात है. आप हमारा खयाल रखें और हम आप का. आप की सेवा करने में तो अलग ही मजा है. जब भी फोन कर देंगे, आप की सेवा में हाजिर हो जाऊंगी.’’

सुमित ने थोड़ी देर में ही इंस्पैक्टर ताराचंद को 2 लाख रुपए पकड़ा दिए और अपनी लड़कियों और दूसरे स्टाफ को ले कर वहां से चला गया. अब उन्हें बेखौफ हो कर वीडियो जो बनाने थे.

मौत को बांध रखा था : क्यों खुश था सौरभ

करनाल में नामी फर्नीचर शोरूम, “लाल फर्नीचर” जिसकी करनाल, कुरूक्षेत्र, लाडवा, समालखा में कई ब्रांच थी.

शोरूम के मालिक शाह जी के नाम से जाने जाते, शाह जी का एक छोटा भाई अतुल इंग्लैंड रहता था.

यहां इंडिया में शाह जी का पत्नी और एक बेटी के अलावा और कोई रिश्तेदार नहीं था.

शाह जी बहुत बार छोटे भाई अतुल को इंडिया आने को कहते मगर अतुल एक ही जवाब देता,” भाई यहां इन्सान की कद्र उसके हुनर से है, उसकी पहचान उसकी काबलियत से है, इंडिया में इन्सान को केवल प्रापर्टी, धन-दौलत, जायदाद से ही अच्छा और बड़ा समझा जाता है, उसके हुनर की कोई कद्र नहीं, फिर ऐसे में कैसा भविष्य होगा इन्सान का? ”

और शाह जी चुप हो जाते, ऐसा नहीं वो ये बातें मानते थे, मगर वो बहस ना करना चाहते, वो समझते थे कि इन्सान की कीमत उसके गुणों से है.

शाह जी की बेटी निहारिका, शाह जी की ही तरह, किसी से कोई फालतू बात ना करनी, बस केवल अपने काम से काम रखना.

निहारिका ने जब कालिज में एडमिशन लिया, उसी की क्लास में सौरभ नाम का एक लड़का सुन्दर, सजीला जवान, जब वो निहारिका को देखता है तो देखता ही रह जाता है, बेशक निहारिका साधारण सी, ना कोई मेकअप, ना कोई स्टाइलिश कपड़े.

फिर भी ना जाने उसमें क्या कशिश थी, वो निहारिका की तरफ खिंचने लगा, उसने कई बार कोशिश की, कि निहारिका से बात करे, और भी बहुत से लड़के निहारिका से बात करने की कोशिश करते, यहां तक कि कोई -कोई तो धमकी भी देता कि उससे बात करें, वरना वो उसे नुकसान पहुंचा सकते हैं.

कालिज ऐसा स्थान होता है जहां जोड़ियां बनते देर नहीं लगती. लेकिन निहारिका किसी को भी बात करने का अवसर तक ना देती. बस सुबह एक गाड़ी आती जिसमें एक अधेड़ उम्र का शख्स दिखने में ड्राइवर जैसा वो गाड़ी उसे छोड़ कर जाती और क्लास खत्म होते ही गाड़ी आ जाती और निहारिका चुपचाप उस गाड़ी में बैठ कर चली जाती.

ग्रेजुएशन के बाद सौरभ ने इंटिरियर डिजाइनर का कोर्स चुना जब सेंटर में गया तो देखा इत्तेफ़ाकन निहारिका भी इंटिरियर डिजाइनर का कोर्स करने आई है.

दोनों में हाए हैलो होती है, लेकिन इतना समय साथ रहने के बावजूद भी निहारिका ने किसी को भी अभी तक अपना फोन नंबर नही दिया था, किसी से अगर बात करनी हो तो केवल इंटरनेट से ही करती थी मैसेज द्वारा. इंटिरियर डिजाइनर का कोर्स दो साल का था, सौरभ को खुशी हुई कि इस बहाने दो साल निहारिका के साथ और रहने का मौका मिला.

इधर शाह जी की तबीयत कुछ खराब रहने लगी थी, कितनी बार पत्नी और बेटी ने डाक्टर को दिखाने को कहा, लेकिन शाह जी टालते रहे, उन्हें लगा शायद काम की अधिकता से थकावट हो जाती है.

लेकिन एक दिन निहारिका, ” पापा आज मैं क्लास नहीं जा रही, आप  जल्दी से तैयार हो जाएं, हम डाक्टर के पास चल रहे हैं”

शाह जी,” अच्छा बाबा मैं आज, अभी डाक्टर के पास जाऊंगा मगर तुम अपनी क्लास मिस मत करो”

निहारिका पापा से प्रोमिस लेकर क्लास चली गई और शाह जी चले बेटी से किया वादा निभाने डाक्टर के पास.

डाक्टर चैकअप करने के बाद कुछ टैस्ट करवाते हैं और रिपोर्ट आने पर शाह जी को पता चलता है कि उन्हें गुर्दे का कैंसर है, जो काफी ज्यादा फैल चुका है. शाह जी दवाई लेकर आते हैं, मगर यह बात किसी को नहीं बताते, बस इतना कहते हैं कि हल्का सा किडनी इनफैक्शन है जो डायलिसिस के बाद ठीक हो जाएगा. लेकिन अब उन्हें निहारिका की चिंता सताती है, निहारिका का इंटिरियर का दूसरा साल चल रहा है, शाह जी उसे साथ-साथ एडवांस कम्प्यूटर कोर्स भी  करवाते हैं और उसकी सरकारी नौकरी की कोशिश करते हैं लेकिन यहां किस्मत साथ नहीं देती.

कहीं अगर शादी की बात करते हैं तो इकलौती बेटी होने की वजह से सबका ध्यान उनकी प्रोपर्टी की ओर जाता है. अक्सर यही सुनने में मिलता है कि निहारिका बहुत साधारण सी है लेकिन चलो प्रोपर्टी तो अच्छी खासी है इसलिए अच्छी जगह रिश्ता हो सकता है, अर्थात जो भी देखता प्रोपर्टी ही देखता.

इन‌सब बातों से शाह जी का मन खिन्न हो गया उन्होंने इंग्लैंड में अपने भाई से बात की तो उन्होंने कहा कि आइलेट का कोर्स करवा दें निहारिका को और यहां इंग्लैंड भेज दें वहां इन्सान की दौलत की नहीं,  इन्सान की कद्र है, उसके हुनर की कद्र है.

शाह जी निहारिका को आइलट्स का कोर्स करवा देते हैं, जिसमें निहारिका अच्छा रैंक लाती है.

शाह जी के पास समय बहुत कम रह गया है लेकिन किसी को भी इस बात की भनक नहीं. एक महीने बाद ही निहारिका को इंग्लैंड जाना है.

निहारिका पापा से बार-बार किडनी चेंज कराने को कहती हैं, लेकिन शाह जी नहीं मानते, क्योंकि वो जानते हैं ये कैंसर है किडनी चेंज भी होगा तो भी कैंसर फिर से होगा, इसलिए कहते हैं,” बस थोड़ी सी डायलिसिस और उसके बाद हमेशा के लिए छुट्टी, बिल्कुल ठीक”

धीरे-धीरे निहारिका के जाने का दिन नज़दीक आ रहा है, निहारिका पैकिंग करते हुए, ईश्वर से प्रार्थना भी कर रही है कि पापा को जल्द ठीक कर दें, और बार-बार पापा को भी देखती है. उसके पापा खुश हैं कि उनकी बेटी दहेज के कलंक से बच गई. यहां तो बेटियों को दहेज के खर्चे की लिस्ट और लड़कों को घर बैठे कमाई का जरिया माना जाता है.

आज निहारिका की फ्लाइट है और शाह जी की डायलिसिस की टर्न भी.

निहारिका, ” पापा आप जाईए अस्पताल, मैं एअरपोर्ट खुद चली जाऊंगी”

” ठीक है बेटा जाओ, खुश रहो”

निहारिका को आशीर्वाद देते हुए शाह जी अस्पताल के लिए चल दिए, लेकिन ना जाने क्यों निहारिका का मन बैचैन था, उसे ऐसा लगा जैसे वो पापा को आखिरी बार मिल रही है, शायद फिर कभी मेल ना हो.

सौरभ को रात को बुखार था  इसलिए रात भर अच्छे से नींद नहीं आई, सुबह जब कुछ बुखार कम हुआ तो नींद की झपकी आ गई, लेकिन अचानक मोबाइल की घररर-घरररर से नींद खुली तो देखा मैसेंजर काॅल था.

जैसे ही फोन उठाया हैलो बोलने से पहले ही उधर से आवाज़ आई,” पापा चले गए छोड़कर हमेशा के लिए”

सौरभ कुछ ना बोल सका, केवल सोचता रहा उस शख्स के बारे में जिसने अपनी बेटी को एक अच्छा भविष्य देने के लिए अपनी मौत को बांध कर रख लिया था. अपनी बेटी का सुनहरा भविष्य बनाकर अब वो फ्री हो गया, मुक्त हो गया हर चिंता से.

महादान : कैसा था मनकूलाल

सर्दी का मौसम था. धूप खिली हुई थी. गांव की चौपाल पर बैठे लोग कहकहे लगा रहे थे कि लेकिन अचानक वे चुप हो गए. थोड़ी ही दूरी पर कंजूस मनकूलाल आता दिखाई दिया. सिर पर पुरानी टोपी, सस्ती सूती कमीज, धोती और टूटी चप्पलों को पैरों में घसीटता सा वह चला आ रहा था.

मनकूलाल पहले से ही जानता था कि चौपाल पर बैठे लोग उस पर ताने कसेंगे, इसलिए वह दूर से ही मुसकराने लगा. जैसे ही वह करीब आया, एक नौजवान ने पूछा, ‘‘क्यों कंजूस चाचा, आज इधर कैसे?’’

‘‘हाट जा रहा हूं भाई,’’ मनकूलाल ने उसी तरह मुसकराते हुए जवाब दिया.

‘‘अरे, तो पैदल क्यों जा रहे हो? बस भी तो आने वाली है.’’

‘‘मैं तो पैदल ही जाऊंगा. बेकार में 25 रुपए खर्च हो जाएंगे. हाट यहां से है ही कितना दूर. इतनी दूर तो शहर के लोग सैर करने जाते हैं.’’

‘‘अरे, तो जनाब सैर करने जा रहे हैं?’’ दूसरे नौजवान ने ताना कसते हुए कहा.

तभी वहां एक जोरदार ठहाका गूंज उठा. पर मनकूलाल पर इस का कोई असर नहीं हुआ. वह उसी तरह मुसकराता चला गया.

चौपाल पर बैठे लोगों में से एक ने कहा, ‘‘यह कभी नहीं सुधरेगा.’’

‘‘उस के पास बहुत रुपए हैं, पर खर्च तो वह एक पाई भी नहीं करता,’’ दूसरा आदमी बोला.

‘‘अरे, यह सब कहने की बातें हैं…’’ एक अधेड़ आदमी बुरा सा मुंह बना कर बोला, ‘‘कंजूस का धन कौए खाते हैं. अभी पिछले दिनों उस के घर चोरी हो गई थी. अभीअभी उस का छोटा बेटा बीमार पड़ गया था. एक हफ्ते तक अस्पताल में भरती रहा. न जाने कितना रुपया खर्च हुआ होगा…’’

मनकूलाल के बारे में ऐसी बातें आएदिन होती थीं. गांव के लोग उसे नफरत की नजर से देखते थे. वह ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था. गांव में उस की

20 बीघा जमीन थी. उसी से उस की गृहस्थी चलती थी.

उत्तर प्रदेश के दूरदराज इलाके में बसे इस गांव में कोई भी अमीर नहीं था. सभी मनकूलाल की तरह मामूली किसान थे. वह गांव के लोगों की नजरों में इसलिए भी गिरा हुआ था, क्योंकि वह किसी धरमकरम के मामले में कभी दान नहीं देता था. गांव में नौटंकी हो या रामलीला, मंदिर बन रहा हो या मसजिद, वह कभी चंदा नहीं देता था. गांव में कोई भी साधुसंत आया हो, तो मनकूलाल उस के सामने नाक रगड़ने नहीं जाता था.

आज तक उस ने किसी ब्राह्मण से पूजापाठ नहीं करवाया था. एक बार गांव में साधुओं की टोली चंदा मांगने के लिए आई. गांव में इतने साधु एकसाथ चंदा लेने कभी नहीं आए थे, इसलिए गांव वाले उन के साथ घूम कर चंदा दिलवा रहे थे. गांव वालों की श्रद्धा देख कर साधु फूले नहीं समा रहे थे.

उन्हें लग रहा था कि इस गांव में तो खूब दानदक्षिणा मिलेगी. जब से गांवदेहात में मंदिरों की कायाकल्प होने लगी थी, तब से साधुसंतों की खूब आवभगत होने लगी थी.

जब साधुसंतों की टोली मनकूलाल के घर पहुंची, तब वह खेतों की ओर जाने की तैयारी कर रहा था. साधु सीधे उस के पास पहुंच कर चंदा मांगने लगे, पर मनकूलाल ने चंदा देने से साफ इनकार कर दिया. गांव वालों के समझाने पर भी वह टस से मस नहीं हुआ.

तब एक साधु तैश में आ कर बोला, ‘‘अधर्मी, हम कोई अपने लिए चंदा नहीं मांग रहे हैं, बल्कि हम यज्ञ करने के लिए पैसा इकट्ठा कर रहे हैं.’’

‘‘यज्ञ करने से क्या होगा बाबा?’’ मनकूलाल ने पूछा.

‘‘अरे मूर्ख, इतना भी नहीं जानता कि यज्ञ करने से क्याक्या फायदे होते हैं? राम ने अश्वमेध यज्ञ क्यों करवाया

था? युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ क्यों करवाया था?’’

साधु के रुकते ही मनकूलाल बोला, ‘‘बाबा, वे राजा लोग थे. उन के कई चोंचले होते थे. हम तो अपना पेट ही बड़ी मुश्किल से भर रहे हैं, फिर बेकार में इन चोंचलों में पैसा खर्च कर के क्या फायदा?’’

साधु मनकूलाल का मुंह देखते रह गए. उन से कुछ बोलते नहीं बना. पर गांव वालों के सामने अपनी हेठी न हो जाए, यह सोच कर एक साधु बोला, ‘‘अरे, वे सब चोंचले नहीं करते थे. सुन, यज्ञ से आदमी का बहुत भला होता है, दुनिया में शांति होती है, देवता खुश होते हैं, पानी अच्छा बरसता है,’’ कह कर उस साधु ने अपने पीछे खड़े गांव के लोगों की तरफ देखा.

‘‘मैं इतना जानकार तो नहीं हूं और दुनियादारी की बात नहीं जानता. पर आज से पहले भी तो बहुत से यज्ञ करवाए गए हैं, उन से क्या हुआ? कौन सी शांति आई? गरीबी कहां दूर हुई? हमारे गांव में तो रोज ही झगड़े होते हैं. लोग हर साल ही तंगी में जीते हैं. हर साल बारिश कम होती है,’’ कह कर मनकूलाल खामोश हो गया.

साधु खिसिया गए और उसे अधर्मी, पापी वगैरह कहते हुए चले गए. उस दिन से गांव वाले मनकूलाल से ज्यादा ही नफरत करने लगे. वे सोचते थे कि मनकू को साधुओं का ‘शाप’ जरूर लगेगा. पूरा साल गुजर गया, पर उस का कुछ नहीं बिगड़ा.

अगले साल उस इलाके में बारिश न होने के चलते अकाल जैसी हालत पैदा हो गई. लोग भूखे मरने लगे. ऐसी हालत में साहूकारों ने भी मुंह फेर लिया. सरकारी दावों में खूब प्रचार किया गया कि इतने करोड़ भूखों का पेट भरा गया है, पर हकीकत में सरकारी मदद गांव तक पहुंच ही नहीं पाई थी.

मनकूलाल के गांव वाले पहले ही गरीब थे. गांव में ऐसा एक भी परिवार नहीं था, जो दूसरे परिवार की मदद कर सके. पूरे गांव में हाहाकार मचा हुआ था. पर गांव के 10-12 परिवार, जो मजदूरी कर के गुजारा करते थे, बहुत ही बुरी हालत में दिन बिता रहे थे. वे परिवार गांव से शहर जाने के लिए मजबूर हो गए थे. इस के चलते गांव के सभी लोग बेहद दुखी थे, पर वे कर भी क्या सकते थे, क्योंकि वे तो खुद ही बड़ी मुश्किल से दिन गुजार रहे थे. जिस दिन वे मजदूर परिवार ट्रैक्टरट्रौली पर अपना सामान लाद कर रवाना होने वाले थे, तब गांव के सभी लोग वहां इकट्ठे हो गए थे.

उसी समय मनकूलाल वहां आया. उस के हाथ में लाल कपड़े की छोटी सी पोटली थी. गांव के मुखिया को वह गठरी देते हुए मनकूलाल ने कहा, ‘‘यह मेरी 10 सालों की जमापूंजी है. रुपया मुसीबत के समय ही काम आता है. आज अपने गांव में भी मुसीबत आई हुई है. ऐसे समय में मेरा पैसा गांव के काम आ जाए, तो मैं खुद को धन्य समझूंगा.’’

मुखिया हैरान रह गया. वह कभी मनकूलाल की तरफ देखता, तो कभी पोटली में लिपटे रुपयों की तरफ. वहां खड़े सभी लोगों की भी यही हालत थी. एक आदमी ने खुश हो कर रुपए गिने, तो उस की खुशी की सीमा न रही. वे इतने रुपए थे कि उन से तंगहाली में आ गए सभी परिवारों के लिए सालभर का अनाज आ सकता था. मुखिया ने यह बात गांव के सब लोगों को बताई, तो वे वाहवाह कर उठे.

कुछ लोग तो शर्म के मारे मनकूलाल से आंखें नहीं मिला पा रहे थे. गांव छोड़ कर जाने वाले परिवार रुक गए. मनकूलाल के लिए उन के दिल इज्जत से भर गए थे. पूरा गांव जिस इनसान को अधर्मी, कंजूस और न जाने क्याक्या समझता था, वही आज मुसीबत के समय गांव के काम आया था.

अब गांव वाले सोच रहे थे कि मनकूलाल कंजूस नहीं, किफायती था. थोड़े खर्चे से काम चलाता था. वह उन की तरह अंधविश्वासी और मूर्ख नहीं था. वह जानता था कि दान कहां देना है. मुसीबत के समय दिया जाने वाला दान ही ‘महादान’ है. वही सच्चा धर्म है. बाकी सब बेकार की बातें हैं.

सब लोगों ने मनकूलाल को यकीन दिलाया कि अब वे भी बचत करेंगे और उस की पाईपाई सूद समेत सालभर में चुका देंगे.

मनकूलाल ने कहा, ‘‘मुझे तुम्हारा भला चाहिए, सूद नहीं.’’

इस पर मुखिया बोला, ‘‘सूद तो तुम्हारा हक है. भला तुम इन गरीबों

को बिना लिखतपढ़त के उधार दे कर

ही क्या कम कर रहे हो… यह पैसा तो तुम्हें लेना ही होगा, जब भी वे लोग

दे सकेंगे.’’

मनकूलाल मुसकरा कर रह गया. उस ने मुखिया की बात का मान रखा.

एआई तकनीक का चक्रव्यूह : मोबाइल फोन से लूटे रुपए

दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके में रहने वाली 24 साल की प्रतिभा एक बड़ी कंपनी में इंफौर्मेशन टैक्नोलौजी डिपार्टमैंट के सपोर्ट सिस्टम में काम करती थी. वह अपने काम में माहिर थी. उस का पूरा परिवार इलाहाबाद में रहता था, बस यहां पश्चिम विहार में उस का 18 साल का छोटा भाई राघव साथ में रहता था. राघव का कालेज में पहला साल था और वह मैट्रो से कालेज आताजाता था.

प्रतिभा के घर वाले उस के लिए लड़का ढूंढ़ रहे थे, लेकिन वह अपने औफिस के एक लड़के दीपक को पसंद करती थी. दोनों में खूब जमती थी और वे डेट पर भी जाते थे.

प्रतिभा का औफिस ओखला में था और वह मैट्रो से आनाजाना करती थी. 10 से 6 बजे का औफिस था. सुबह 8 बजे घर से निकलना और रात के 8 बजे तक घर वापसी.

एक दिन प्रतिभा औफिस के काम में मगन थी. सोमवार था शायद. दोपहर के 12 बजे उस के मोबाइल फोन की घंटी बजी. ह्वाट्सएप काल थी. अनजान नंबर होने के बावजूद प्रतिभा ने वह काल पिक कर ली, ‘‘हैलो…’’

सामने से एक रोबीली मर्दाना आवाज आई, ‘आप प्रतिभा बोल रही हैं?’

‘‘जी कहिए, क्या काम है?’’ प्रतिभा ने कहा.

‘काम तो ऐसा है मैडमजी कि आप के छोटे भाई ने बहुत बड़ा कांड कर दिया है,’ उस आवाज ने यह कह कर अचानक बम सा फोड़ दिया.

‘‘मतलब…?’’ राघव का खयाल आते ही प्रतिभा के तनबदन में डर की ?ार?ारी सी फैल गई.

‘मतलब, राघव ने तगड़ा क्लेश कर दिया है और वह अभी पुलिस हिरासत में है,’ उस रोबीली आवाज की सख्ती धीरेधीरे बढ़ने लगी थी.

‘‘क्या बकवास कर रहे हैं आप? राघव तो अभी कालेज में होगा,’’ अपना सारा डर दबाते हुए प्रतिभा बोली. पर तब तक उस के माथे पर पसीना आ गया था.

‘तेरा भाई कालेज में ड्रग्स लेते पकड़ा गया है. पैडलर है वह. ड्रग्स की स्मगलिंग भी करता है,’ इतना सुनते ही प्रतिभा को मानो लकवा सा मार गया.

‘और सुन, मैं बोल रहा हूं स्पैशल पुलिस विंग का इंस्पैक्टर. हमारा काम ही ऐसे स्लीपर पैडलर को पकड़ना है. अब तो वह लंबे समय के लिए गया जेल में,’ उस आदमी की आवाज मानो और भी कड़क होती जा रही थी.

प्रतिभा की अब तक घिग्घी बंध चुकी थी. उस के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था. उसे लगा कि जैसे वह किसी गहरे अंधे कुएं में गिर गई है और कोई उस पर मिट्टी डाल रहा है. उसे चक्कर सा आ गया.

इतने में प्रतिभा के साथ वाली सीट पर बैठी सुधा को शक हुआ कि कुछ तो गड़बड़ है. उस ने प्रतिभा का हाथ पकड़ कर झिड़का. हाथ एकदम ठंडा पड़ा हुआ था. प्रतिभा जैसे नींद से जागी और उसे अहसास हुआ कि वह तो औफिस में बैठी है.

प्रतिभा ने तुरंत मोबाइल फोन पर हाथ रखा और सुधा को इग्नोर करते हुए वाशरूम की तरफ बढ़ गई. सुधा ने इशारे से दीपक को बुलाया.

दीपक उस कंपनी में कंप्यूटर इंजीनियर था और जैसे ही उस ने सुधा से प्रतिभा के बारे में सुना, तो वह दबे पैर प्रतिभा के पीछे गया.

‘‘आप मेरे भाई से बात कराइए,’’ प्रतिभा उस फोन करने वाले से कह रही थी.

थोड़ी देर तक दूसरी तरफ से आवाज नहीं आई, तो प्रतिभा ने कहा, ‘‘हैलो…’’

‘दीदी, प्लीज मुझे बचा लो. मैं आगे से ऐसा काम नहीं करूंगा. दीदी, इन्होंने मुझे बहुत मारा. मेरा हाथ तोड़ दिया है. पुलिस वाले अंकल को किसी भी तरह मना लो. मेरा कैरियर खत्म हो जाएगा. प्लीज दीदी…’ इतना कहते ही आवाज आनी बंद हो गई.

यह तो राघव की आवाज थी. प्रतिभा के दिल में तेज चुभन सी हुई और उस के पैर लड़खड़ा गए.

‘‘प्रतिभा, सब ठीक है न?’’ पीछे खड़े दीपक ने उसे संभालने की कोशिश की.

प्रतिभा एकदम से गरजी, ‘‘तुम यहां क्या कर रहे हो? दफा हो जाओ. मैं ठीक हूं…’’

दीपक ने बहुत कोशिश की कि प्रतिभा उसे फोन पकड़ा दे, पर वह नाकाम रहा और वहां से चला गया.

‘हां जी मैडम, फिर क्या विचार है आप का? इस लड़के को छोड़ दें या बना दें कोई पक्का केस?’ फोन पर आवाज आई.

‘‘आप को क्या चाहिए?’’ प्रतिभा गिड़गिड़ाई.

‘‘जी, वैसे तो हम पुलिस वाले रिश्वत लेने में विश्वास नहीं करते हैं, पर आप के भाई ने कांड ही इतना बड़ा कर दिया कि बिना पैसे लिए छोड़ नहीं सकते. ऐसा करो, आप 50,000 रुपए हमारे खाते में डलवा दो और अपने भाई को छुड़वा लो.’

प्रतिभा ने आव देखा न ताव और तुरंत उस आदमी द्वारा बताए गए एक खाते में 20,000 रुपए ट्रांसफर कर दिए.

‘‘देखो, मैं ने पैसे भेज दिए हैं. अब आप मेरे भाई को छोड़ दो…’’ प्रतिभा अपनी बात पूरी कर पाती, इस से पहले ही फोन कट गया.

प्रतिभा हैरान रह गई. उस ने दोबारा वही नंबर मिलाया, पर नहीं लगा. वह सम?ा गई कि उस के साथ कोई धोखाधड़ी हुई है. हालांकि, उस ने 20,000 रुपए ट्रांसफर कर दिए थे, फिर भी उस ने मोबाइल एसएमएस पर चैक किया. 20,000 रुपए का चूना लग चुका था. फिर उस ने यह सोच कर तसल्ली कर ली कि चलो, भाई तो महफूज है.

प्रतिभा सीट पर आई ही थी कि दोबारा उसी आदमी का फोन आ गया, ‘मैडम, यह आप ने क्या कर दिया. सिर्फ 20,000 रुपए ही भेजे हैं. अब तो हमारे बड़े साहब नाराज हो गए हैं. वे बोल रहे हैं कि ड्रग्स का मामला है, कम से कम 2 लाख रुपए और लगेंगे.’

प्रतिभा बोली, ‘‘आप मु?ो थोड़ा समय दें. मु?ो इतने सारे रुपए जमा करने में 2 घंटे से ज्यादा का समय लगेगा.’’

उधर से आवाज आई, ‘जल्दी कर जो करना है…’ और फोन कट गया.

प्रतिभा को रोते देख कर आसपास का स्टाफ वहां जमा हो गया. थोड़ी देर के बाद प्रतिभा ने बताया कि पिछले 15 मिनट में उस की जिंदगी में कितना बड़ा तूफान तबाही मचा कर गया है.

सब लोग हैरान थे कि अगर राघव अपने कालेज में था, तो फिर वह आवाज किस की थी, जिसे राघव सम?ा लिया गया? साइबर क्राइम का यह कैसा घिनौना रूप है, जो आप को पैसे के साथसाथ दिमागी तौर पर भी तोड़ देता है?

दीपक ने कहा, ‘‘आजकल मोबाइल फोन पर लोगों को इस तरह ?ाठ के जाल में बरगलाया जाता है कि अच्छाभला पढ़ालिखा इनसान भी गच्चा खा जाता है.

‘‘इसे एक सच्ची खबर से सम?ाते हैं. हाल ही में मुंबई में रहने वाले एक सीनियर सिटीजन के पास कनाडा से एक फोन आया. यहां ठग ने पीडि़त शख्स से कहा कि मैं आप के बेटे का दोस्त बोल रहा हूं. उस ने हूबहू बेटे के दोस्त की आवाज में बात की थी. इसी के साथ ठग ने

3 लाख रुपए की चपत लगा दी.

‘‘यह 2 मार्च, 2024 का मामला है. पुलिस ने बताया कि 63 साल के शिकायत करने वाले आदमी की

2 बेटियां और एक बेटा है. तीनों विदेश में रहते हैं. 2 मार्च को उन के पास एक अनजान नंबर से ह्वाट्सएप पर वौइस काल आई.

‘‘काल करने वाले ने अपना नाम विकास गुप्ता बताया. चूंकि पीडि़त विकास गुप्ता को बचपन

से जानते थे और काल करने वाले की आवाज विकास गुप्ता से मिलतीजुलती थी, इसलिए पीडि़त ने उस आवाज पर भरोसा कर लिया.

‘‘इस के बाद फोन करने वाला यह कहते हुए रोने लगा कि वह मुसीबत में है और उसे तुरंत पैसों की जरूरत है. इस के बाद पीडि़त ने काल करने वाले के खाते में 2 लाख रुपए ट्रांसफर कर दिए और अपने

2 दोस्तों से भी 50-50 हजार रुपए और ट्रांसफर करवा दिए.

‘‘जब जालसाज ने फिर से पैसों की मांग की तो पीडि़त को शक हुआ कि कुछ गड़बड़ है. उस ने काल करने वाले को वीडियो काल किया, जिस का जवाब नहीं दिया गया, तब पुष्टि हुई कि उन के साथ धोखाधड़ी हुई है.’’

दीपक की बात सुन कर सब हैरान रह गए. फिर एक लड़की सुरभि ने दूसरी खबर का हवाला देते हुए कहा, ‘‘सर, यह तो एकदम ताजा मामला है. साइबर ठगों ने एआई डीपफेक की मदद से आईआईटी से इंजीनियरिंग कर रहे छात्र की आवाज में उस की मां को ह्वाट्सएप काल कर 40,000 रुपए हड़प लिए.

‘‘आईआईटी कानपुर में पढ़ रहे इंजीनियरिंग के एक छात्र उत्कर्ष सिंह ने बताया कि बीती 3 अप्रैल को किसी अनजान शख्स ने उन की मां सरिता देवी को ह्वाट्सएप काल की. किसी पुलिस वाले की डीपी लगे नंबर से काल करने वाले ने खुद को पुलिस वाला बताते हुए कहा कि उन के बेटे को दुष्कर्म व हत्या के मामले में पकड़ा गया है.

‘‘इतना ही नहीं, यकीन दिलाने के लिए शातिरों ने आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस (एआई) से बेटे की आवाज में एक संदेश भी सुनाया, जिस में बेटा खुद को बचा लेने की गुहार लगा रहा था. उस ने कहा कि मेरे दोस्तों ने मु?ो फंसा दिया है, मु?ो बचा लीजिए.

‘‘बेटे की आवाज सुनाई देने पर तुरंत मां ने बताए गए बैंक खाते में 40,000 रुपए ट्रांसफर कर दिए. हालांकि, जब रुपए देने के बाद मांबेटे की आपस में बात हुई, तो इस साइबर ठगी का पता चला.’’

‘‘पर, यह हूबहू आवाज कैसे मिला दी जाती है?’’ किसी ने सवाल किया.

दीपक ने बताया, ‘‘जहां तक मैं जानता हूं, आजकल बहुत से ऐसे वौइस इंजन टूल हैं, जो सिर्फ छोटे से औडियो से ही क्लोन वौइस जैनरेट करने की ताकत रखते हैं. इस के साथ ही ये कई भाषाओं में काम कर सकते हैं.

‘‘इतना ही नहीं, ये टूल्स आवाज के साथसाथ किसी इनसान की शक्ल से भी लोगों को बेवकूफ बना सकते हैं. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस नई तकनीक के गलत इस्तेमाल पर अपनी चिंता जाहिर की है.

‘‘एक एआई ऐक्सपर्ट अतुल रौय ने बताया है, ‘एआई के जरीए क्लोन बनाना अब आसान हो गया है, जिस का फायदा अपराधी भी उठा रहे हैं. ऐसे में जरूरी है कि हम सतर्क रहें और अपनी जानकारी को बढ़ाएं.’

‘‘आप को याद होगा कि कुछ साल पहले एक वैब सीरीज आई थी ‘जामताड़ा-सब का नंबर आएगा’. इस में इसी मुद्दे को उठाया गया था कि मोबाइल फोन में सिम बदलबदल कर कैसे लोगों को लालच दे कर उन से पैसा किसी अनजान अकाउंट में डलवाया जाता था.

‘‘अब एआई तकनीक ने इस साइबर क्राइम को और ज्यादा भयावह बना दिया है. पर अगर जरा सी सावधानी बरती जाए, तो समय रहते बचा भी जा सकता है.’’

‘‘पर कैसे?’’ दीपक के एक साथी ने पूछा.

‘‘जब भी आप के पास कोई काल आए तो सामने वाले की पहचान पूरी होने के बाद ही अपनी जानकारी उसे दें. स्कैमर्स आप को काल लगाते हैं और पर्सनल जानकारी मांगते हैं, इसलिए कोई काल करने के साथ ही पैसे या पर्सनल जानकारी मांगे, तो सम?ा जाएं कि स्कैमर्स हैं.

‘‘पर भारत में लोग अभी भी इस सब तकनीकी से अनजान हैं. एक खबर के मुताबिक, दुनिया में आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस वौइस स्कैम का सब से ज्यादा भारत के ही लोग शिकार हो रहे हैं. एक सर्वे में शामिल 47 फीसदी से ज्यादा भारतीयों ने माना है कि या तो वे खुद पीडि़त हैं या ऐसे किसी को जानते हैं, जो वौइस स्कैम का शिकार हुआ है.’’

फिर दीपक ने कुछ आंकड़ों का हवाला दिया कि दुनिया के 7 देशों में 7,054 लोगों पर किए गए सर्वे की रिपोर्ट इस तरह है :

* 83 फीसदी लोग यह पता लगाने में नाकाम हैं कि उन के पास आया स्पैम काल किसी मशीन या सौफ्टवेयर की मदद से किया गया है या सच में कोई इनसान बोल रहा है.

* 66 फीसदी भारतीयों ने बताया है कि ऐसे वौइस स्कैम वाले ज्यादा काल किसी दोस्त या परिवार के सदस्य से आते हैं, जिसे पैसे की तत्काल जरूरत होती है.

* स्कैम वौइस काल में सब से ज्यादा दावा किया गया था ‘मैं लुट गया हूं’ (70 फीसदी). इस के बाद ‘कार हादसा हो गया’ (69 फीसदी), ‘फोन खो गया या पर्स खो गया’ (65 फीसदी) या ‘विदेश में हू्ं पैसे की तुरंत जरूरत है’ (62 फीसदी) जैसे बहाने बनाए गए.

‘‘तो फिर ठगी का शिकार लोग क्या करें और कहां गुहार लगाएं?’’ किसी ने दीपक से सवाल किया.

‘‘आज हमारे औफिस में यह कांड हुआ है, तो मैं प्रतिभा से कहूंगा कि वह पहले तो खुद को संभाले और फिर सब से पहले अपने बैंक अकाउंट से धोखाधड़ी कर के निकाले गए पैसों को वापस लेने के लिए अपने बैंक से बात करे. अगर बैंक की ब्रांच दूर है, तो फोन कर के कस्टमर केयर को जानकारी दे.

‘‘जिस के साथ भी यह कांड हुआ है, वह तुरंत पुलिस को जानकारी दे. धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज करने के लिए अपने स्थानीय पुलिस स्टेशन से संपर्क करें. आप साइबर सुरक्षा अधिकारियों को भी रिपोर्ट कर सकते हैं, जैसे कि नैशनल साइबर सिक्योरिटी एजेंसी या नैशनल इनफार्मेशन सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन.’’

सब लोग दीपक की बात बड़े ध्यान से सुन रहे थे और प्रतिभा उसे देखे जा रही थी. वह चुप हो गया. जब सब लोग चले गए, तो प्रतिभा ने दीपक से कहा, ‘‘बांट दिया ज्ञान… अब काम करने का समय आ गया है. उस आदमी का लालच बढ़ गया है. उस ने 2 लाख रुपए की डिमांड की है. हमारे पास बस 2 घंटे हैं उसे ट्रेस करने के लिए.’’

दीपक ने एक आंख दबाते हुए कहा, ‘‘तुम तो बड़ी दिलेर निकली, जो 20,000 रुपए का रिस्क ले लिया. अगर वह ट्रेस नहीं हो पाया तो…?’’

‘‘ट्रेस तो उस का बाप भी होगा. तुम किस मर्ज की दवा हो. चलो, अपने अड्डे पर और करते

हैं उस बेवकूफ का सबकुछ हैक,’’ प्रतिभा बोली.

‘‘अजी, आप की खातिर हम उसे ट्रेस तो कर देंगे, पर इस गरीब को क्या इनाम मिलेगा?’’ दीपक थोड़ा रोमांटिक होते हुए बोला.

‘‘डार्लिंग, आज यह मिशन पूरा होते ही मैं सारी रात तुम्हारे साथ अपार्टमैंट्स पर रहूंगी, क्योंकि राघव तो इलाहाबाद गया हुआ है. फिर निकाल लेना अपने दिल के अरमान. पूरी रात जश्न मनेगा.’’

दरअसल, प्रतिभा और दीपक एक एआई कंपनी के लिए काम करते थे. दीपक किसी के भी फोन से उस इनसान की सारी जानकारी निकाल लेता था, जिसे हैकिंग कहते हैं. अब जब उस आदमी का 2 लाख रुपए लेने के लिए फोन आएगा, तब प्रतिभा उसे बातों में उल?ा कर रखेगी और दीपक उस की लोकेशन से फोन के जरीए उसे हैक कर लेगा.

थोड़ी देर में वे दोनों एक ऐसे औफिस में बैठे थे, जो उन्हीं की कंपनी में गुप्त तरीके से बना हुआ था. वहां सिर्फ स्पैशल लोग ही जा सकते थे, जैसे आज प्रतिभा और दीपक का मिशन था.

2 घंटे होते ही उस आदमी का फोन आ गया. दीपक ने प्रतिभा को सम?ा दिया कि वह किसी तरह उसे बातों में उल?ा कर उस बैंक अकाउंट तक पहुंच जाए, फिर वह उसे हैक कर लेगा.

प्रतिभा बोली, ‘‘देखिए भाई साहब, मैं आप को

2 लाख रुपए तो एकसाथ नहीं दे पाऊंगी, पहले 10,000 रुपए आप के अकाउंट में आएंगे और फिर उस के आधे घंटे के बाद पूरी रकम आप को मिल जाएगी.’’

‘यह क्या नौटंकी है. जो करना है जल्दी कर. अगर बड़े साहब नाराज हो गए, तो रकम बढ़ जाएगी. फिर मत रोना,’ यह कहते हुए उस आदमी ने अपना अकाउंट नंबर बता दिया. थोड़ी देर में ही उस के खाते में 10,000 रुपए चले गए.

इधर दीपक अपना काम कर रहा था. वह हैकिंग का मास्टर था. उस ने नई तकनीक की मदद से उस आदमी का फोन हैक कर के उस के बैंक अकाउंट में सेंध लगा दी थी. उस आदमी ने भी लापरवाही बरतते हुए अपना फोन स्विच औफ नहीं किया था और न ही सिमकार्ड बदला था.

5 मिनट में ही दीपक ने उस आदमी का फोन पूरी तरह से हैक कर लिया था. इतना ही नहीं, उस के सोशल मीडिया अकाउंट से 10 और दोस्तों के फोन हैक कर के उन के बैंक अकाउंट की डिटेल भी अपने कब्जे में ले ली थी.

दीपक को यह सब जानने के बाद शक हुआ कि यह कोई बड़ा गिरोह है, जो साइबर क्राइम को अंजाम देता है और इस गिरोह के सरगना विदेश में बैठे हैं और बड़े जालिम हैं.

दीपक ने अपनी करामात दिखाते हुए उन सब के अकाउंट से 1-1 लाख रुपए एक अनजान बैंक अकाउंट में भेज दिए.

इस के बाद दीपक ने प्रतिभा से कहा, ‘‘अभी उस आदमी का फोन आएगा. उसे पता चल चुका होगा कि उस के बैंक अकाउंट से पैसे कहीं ट्रांसफर हुए हैं. अब तुम उसे दिन में तारे दिखा देना.’’

‘‘मैं भी फोन आने का इंतजार कर रही हूं,’’ इतना कह कर प्रतिभा ने दीपक को चूम लिया.

वही हुआ भी. ह्वाट्सएप काल आ गया. उधर से आवाज आई, ‘यह सब क्या माजरा है? मेरे अकाउंट से पैसे कहां चले गए. क्या किया है तुम ने?’

‘‘क्या हुआ?’’ प्रतिभा ने ?ाठी हैरानी जताते हुए कहा.

‘तुम ने किया क्या है और तुम हो कौन?’ उस आदमी की हेकड़ी जैसे निकल रही थी.

‘‘क्या किसी पुलिस वाले को कोई चूना लगा गया? अपने बड़े साहब को बता दो या फिर मैं तुम्हारे आका का भी फोन हैक करूं. खुद को बड़ा शातिर सम?ाता है न.

‘‘बेटा, अभी तुम इस खेल के नए खिलाड़ी हो. तुम ने गलत इनसान से पंगा ले लिया है. तेरे ही क्या, तेरे और दूसरे 10 साथियों के अकाउंट से पैसे ट्रांसफर हुए हैं, वे भी तेरे बैंक अकाउंट में. उन का फोन आने ही वाला होगा.

‘‘तुम लोगों ने आम जनता की जिंदगी जहन्नुम कर रखी है. उन की गाढ़ी कमाई को साइबर क्राइम से लूट लेते हो और फिर कोई सुबूत भी नहीं छोड़ते. पर, मैं जहां नौकरी करती हूं, वहां आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस पर ही काम होता है.

‘‘तू ने हमें अपना शिकार नहीं बनाया है, बल्कि हम ने तु?ो किसी चूजे की तरह फांसा है. ज्यादा चूंचपड़ की तो ऐसा हाल करेंगे कि जिंदगीभर किसी को बेवकूफ नहीं बना पाएगा.

‘‘और हां, यह मत सम?ा लेना कि मु?ो किसी तरह का नुकसान पहुंचा पाएगा. तेरे फरिश्ते भी मु?ा तक नहीं पहुंच पाएंगे, पर हम लोग तेरी एकएक रग से वाकिफ हो चुके हैं. मु?ो कहीं भी और कभी भी एक खरोंच तक आई, तो तेरे पूरे गिरोह का बैंड बजा देंगे. वैसे भी तेरी तो उलटी गिनती शुरू हो चुकी है…’’ प्रतिभा ने अपना असली रूप दिखा दिया.

इतना सुनना था कि दूसरी तरफ से फोन कट गया. दीपक और प्रतिभा ने एकदूसरे को देखा और खिलखिला कर हंस दिए. उन के औफिस स्टाफ को भी नहीं मालूम था कि वे किस तरह से यह खुफिया काम करते हैं.

दीपक प्रतिभा के बालों में हाथ फेरते हुए बोला, ‘‘डार्लिंग, उस आदमी को तो तुम ने दिन में तारे दिखा दिए हैं, अब आज रात का क्या सीन है?’’

प्रतिभा बोली, ‘‘जो वादा किया था, आज रात को पूरा होगा. फिर कर लेना अपने मन की.’’

इस के बाद वे दोनों अपना मिशन पूरा कर के औफिस की तरफ चल दिए, जहां वे आम मुलाजिमों की तरह काम करते थे.

मुआवजा : क्यों हो रही थी मीटिंग पर मीटिंग

दोपहर को कलक्टर साहब और उन के मुलाजिमों का काफिला आया था. शाम तक जंगल की आग की तरह खबर फैल गई कि गांव और आसपास के खेतखलिहान, बागबगीचे सब शहर विकास दफ्तर के अधीन हो जाएंगे. सभी लोगों को बेदखल कर दिया जाएगा.

रामदीन को अच्छी तरह याद है कि शाम को पंचायत बैठी थी. शोरशराबा और नारेबाजी हुई. सवाल उठा कि अपनी पुश्तैनी जमीनें छोड़ कर हम कहां जाएंगे? हम खेतिहर मजदूर हैं. गायभैंस का धंधा है. यह छोड़ कर हम क्या करेंगे?

पंचायत में तय हुआ कि सब लोग विधायकजी के पास जाएंगे. उन्हें अपनी मुसीबतें बताएंगे. रोएंगे. वोट का वास्ता देंगे.

इस के बाद मीटिंग पर मीटिंग हुईं. बड़े जोरशोर से एक धुआंधार प्लान बनाया गया, जो इस तरह था:

* जुलूस निकालेंगे. नारेबाजी करेंगे. जलसे करेंगे.

* लिखापढ़ी करेंगे. मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखेंगे.

* विधायकजी से फरियाद करेंगे. उन्हें खबरदार करेंगे.

* कोर्टकचहरी जाएंगे.

* सरकारी मुलाजिमों को गांव या उस के आसपास तक नहीं फटकने देंगे.

* चुनाव में वोट नहीं डालेंगे.

* आखिर में सब गांव वाले बुलडोजर व ट्रकों के सामने लेट जाएंगे. नारे लगाएंगे, ‘पहले हमें मार डालो, फिर बुलडोजर चलाओ’.

लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. जब नोटिस आया, तो कुछ ने लिया और बहुतों ने वापस कर दिया. नोटिस देने वाला मुलाजिम पुलिस के एक सिपाही को साथ ले कर आया था. वह सब को सम?ाता था, ‘नोटिस ले लो, नहीं तो दरवाजे पर चिपका देंगे. लोगे तो अच्छा मुआवजा मिलेगा, नहीं तो सरकार जमीन मुफ्त में ले लेगी. न घर के रहोगे और न घाट के.’

आज रामदीन महसूस करता है कि मुलाजिम की कही बात में सचाई थी. अपनेआप को जनता का सेवक कहने वाले सरपंचजी कन्नी काटने लगे थे. विधायकजी वोट ले कर फरार हो गए थे.

रामदीन पढ़ालिखा न था. उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था.

‘‘इस कागज का हम क्या करेंगे?’’ रामदीन पूछ बैठा.

‘‘अपने पट्टे के कागज ले कर दफ्तर जाना. वहां तुम्हारी जमीन की कीमत आंकी जाएगी. उस के बाद सरकार अपना भाव निकालेगी और तुम्हें उसी के मुताबिक ही भुगतान होगा,’’ डाकिए ने सम?ाया.

3 गांवों पर इस का असर पड़ा था. इतमतपुर, इस्माइलपुर और गाजीपुर. गांव वाले खेतों से ध्यान हटा कर सरकारी दफ्तर के चक्कर काटने लगे. उन्हें तमाम सवालों का दोटूक जवाब मिलता, ‘फाइलें खुल रही हैं. जानते हो न, सरकारी कामकाज कैसे चलता?है… चींटी की चाल.’

दफ्तर के बाहर ‘सरकारी काम में रुकावट न डालें’ का नोटिस भी लगा दिया गया था.

गांव वाले दफ्तर के बाहर से ही उलटे पैर लौटा दिए जाने लगे थे. लोहे की सलाखों वाला फाटक ऐसे बंद कर दिया गया था मानो जेल हो.

6 महीने बीते. अचानक चारों तरफ ट्रैक्टर, ट्रक, बुलडोजर और टिड्डियों की तरह आदमी मंडराने लगे. खड़ी फसल, आम और अमरूद के बाग देखते ही देखते उजाड़ दिए गए. जहां हरियाली थी, वहां अब पीली मिट्टी का सपाट मैदान हो गया था.

गुस्साए गांव वालों ने ‘पहले पैसा दो, फिर जमीन लो’, ‘हम कहां जाएंगे’, ‘हायहाय’ के नारे लगाए थे. नारेबाजी हुई, फिर पत्थरबाजी भी हुई थी.

पुलिस आई. गिरफ्तारियां हुईं. पुलिस ने जीभर कर लोगों की पिटाई की. मुकदमा चला सो अलग.

25 आदमी कुसूरवार पाए गए. 6-6 महीने की सजा हुई. रामदीन भी उन में से एक था.

जब रामदीन घर लौट कर आया, तब तक सबकुछ बदल चुका था. दरवाजे पर नोटिस चिपका हुआ था. जहां उस का बगीचा था, वहां ‘इंदिरा आवास योजना’ का बड़ा सा बोर्ड लगा था. जिस ने गरीबी मिटाने का नारा लगाया था, उसी के नाम पर कालोनी बन रही है.

घर में खाने के लाले पड़े हुए थे. आमदनी के नाम पर 4 भैंसें व 2 गाएं ही बची थीं. रामदीन दिहाड़ी के लिए निकल पड़ा था. वह भी कभी मिलती और कभी नहीं.

सोतेसोते रामदीन चौंक कर उठ बैठता. वह टकटकी बांधे छत को ताकता रहता. यह मकान भी खाली करना था. खुले आसमान की छत ही उस की जिंदगी का अगला पड़ाव होगा.

फिर दफ्तर के चक्कर लगाना रामदीन का रोज का काम हो गया था. दफ्तर के बरामदे में ‘नोटिस पर भुगतान के लिए मिलें’ का दूसरा नोटिस लग चुका था, इसीलिए वह दफ्तर में घुस गया था.

एक बाबू ने बताया, ‘‘सरकार के पास पैसा नहीं है.’’

दूसरा बाबू बोला, ‘‘तुम्हारा तो नाम ही नहीं है.’’

तीसरे ने कहा, ‘‘फाइलें बन गई हैं.’’

चौथे ने हंस कर कहा था, ‘‘मैं ही सब करूंगा… पहले मेरी दराज में तो कुछ डालो.’’

जितने मुंह उतनी ही बातें. रामदीन को तो खुद ही खाने के लाले पड़े थे, फिर किसी को चायपानी क्या कराता? उन की जेबें कैसे गरम करता?

चपरासी भी बख्शिश के चक्कर में बड़े साहब से मिलाने के लिए टालमटोल कर रहा था. 50 रुपए जेब में रखने के बाद ही उस ने साहब के कमरे का दरवाजा खोला था.

रामदीन साहब के पैरों में गिर कर रो पड़ा था. गिड़गिड़ाते हुए उस ने कहा था, ‘‘साहब, 3 साल हो गए हैं, एक पैसा भी नहीं मिला है. मैं पढ़ालिखा नहीं हूं. घर में खाने के लाले पड़े हैं.’’

साहब ने हमदर्दी दिखाई थी, वादा भी किया था, ‘‘घर से बेदखल करने से पहले तुम्हें कुछ न कुछ जरूर भुगतान किया जाएगा.’’

रामदीन इस तरह खुश हो कर घर लौटा था, जैसे दुनिया ही जीत ली हो. लेकिन जल्दी ही भरम टूटा. 6 महीने बाद भी वह वादा वादा ही रहा.

पुलिस घरों में घुसघुस कर सामान बाहर फेंकने लगी. सरकारी हुक्म की तामील जो हो रही थी.

रामदीन अपने घर वालों और जानवरों को ले कर अपने मौसेर भाई के यहां कुकरेती जा कर बस गया.

एक दिन रामदीन को लोगों ने बताया कि मामला कोर्ट में पहुंच गया है. जनता का भला करने वाले कुछ लोगों ने वहां अर्जी लगाई थी.

बातबात में रामदीन ने एक दिन अपने एक ग्राहक, जो एक दारोगा की बीवी थी, को अपनी कहानी सुना दी. दारोगाइन को उस पर तरस आ गया. दारोगाजी ने कागज देखे, 2-3 अर्जियां लिखीं. वे उस के साथ भी गए.

इस से दफ्तर के बाबुओं की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई थी. रामदीन की फाइलें दौड़ने लगी थीं.

एक महीने में ही रामदीन के नाम के 3 चैक बने. एक 50,000 का, दूसरा 20,000 का और तीसरा 30,000 का. ये तीनों चैक खेत, मकान और बगीचे के एवज में थे.

पहला चैक मिलते ही रामदीन के दिन फिर गए. दारोगाजी उस के लिए भले इनसान साबित हुए थे. वह उन्हें दुआएं देता रहा और मुफ्त में दूध भी.

बाकी चैक पाने के लिए दफ्तर के चक्कर काटना रामदीन का अब रोजाना का काम बन गया था. बहुत से बाबू व अफसर उसे अच्छी तरह पहचान गए थे. वह उन्हें पान, सिगरेट, गुटका भी देता या कभी चाय भी पिलाता.

बाबू रामदीन को खबर देते. उसे बताया गया था कि पहले 8 रुपए वर्गफुट के हिसाब से मिलने वाले थे, अब शायद 10 रुपए वर्गफुट के हिसाब से मिलेंगे.

एक दिन दफ्तर में रामदीन को उस का पड़ोसी राम खिलावन मिल गया. बातचीत से उसे पता चला कि शायद कोर्ट जमीन के भाव बढ़ा कर 10 या 13 रुपए वर्गफुट कर दे.

राम खिलावन ने बताया, ‘‘जानते हो रामदीन, सरकार हम से 10 रुपए वर्गफुट के हिसाब से जमीन खरीद कर सौ या 150 रुपए तक के भाव में बेच रही है.’’

दूसरी किस्त का चैक कुछ ही दिनों में मिलने वाला था. आखिरी चैक तो कोर्ट के फैसले के बाद ही मिलेगा.

रामदीन दुखी हो कर सोचने लगा, ‘सरकार 10 रुपए दे कर सौ रुपए में बेच रही है. एक फुट पर 90 रुपए का फायदा. महाजन को भी मात दे दी. क्या यही है जनता का राज?’

दारोगा साहब का तबादला हो गया था, लेकिन वह उसे एक समाजसेवक से मिलवा गए थे.

अब बाबुओं के तेवर बदल गए, ‘तुम उस के बूते पर बहुत कूदते थे, अब लेना ठेंगा.’

कुछ तो कहते, ‘इतनी सी बात भी तुम्हारी सम?ा में नहीं आती कि हम सरकारी मुलाजिम हैं. हमारे पास कलम है, ताकत?है.’

उस समाजसेवक की कोशिशों के बावजूद दूसरी किस्त लेने के लिए 5,000 रुपए बाबुओं की जेबों में डालने पड़े और इतना ही समाजसेवक साहब को भी खर्चापानी देना पड़ा.

रामदीन दौड़ता रहा. कभी दफ्तर में तो कभी कोर्टकचहरी में. उस ने मकान बनवा लिया था. अब उस के पास 10 भैंसें, 4 गाएं, 2 बैल और 2 बीघा जमीन भी थी.

जिंदगी में नई सुबह आई थी. लेकिन सब से ज्यादा फर्क रामदीन की सोच में आया था. वह जान गया था कि अनपढ़ होना मुसीबत की जड़ है.

रामदीन के 4 में से 3 बच्चे स्कूल में पढ़ते थे. पहला छठी में, दूसरा तीसरी में, तीसरी बिटिया पहले दर्जे में. चौथा बेटा 3 साल का था. वह अगले साल उस का दाखिला कराएगा. वह खुद भी अपने बच्चों से पढ़ता था.

कोर्ट का फैसला जल्दी ही आ गया. अदालत ने 13 रुपए वर्गफुट का भाव लगाया था. साथ ही, एक अधबना मकान लोगों से आधा पैसा ले कर देना था. 10 साल के इंतजार के बाद उस के और दूसरे गांव वालों के चेहरों पर मुसकान दिखी थी.

कोर्ट में अर्जी लगाने वाली संस्था के वकीलों के हाथों में चैक थे और चेहरों पर गहरी मुसकान. कुल 15 फीसदी देना होगा. 6 फीसदी वकीलों को, 5 फीसदी बाबुओं व अफसरों को और 4 फीसदी गैरसरकारी संस्था को.

सभी भोलेभाले लोग हैरान रह गए थे. सरपंच, नेता, पार्टी, पंडा, वकील, सरकारी दफ्तर क्या ये सभी दलाल हैं, मुरदों के भी कफन खसोटने वाले?

फर्क सिर्फ इतना है कि पंडे धर्म के नाम पर पूजा कराने, वकील कचहरी में फैसला कराने, नेता, समाजसेवक लोगों का भला कराने, बाबू दफ्तरों के काम कराने के पैसे लेते हैं.

दलाली के भी अलगअलग नाम हैं. जैसे चढ़ावा, दक्षिणा, फीस, चंदा और चायपानी. सभी का एक ही मकसद है, लोगों की जेब खाली कराना.

लोगों में बातचीत हो रही थी. जलसे हुए. बाद में कुल 10 फीसदी पर आम राय हो गई.

10 साल बीत चुके थे, पर मुआवजे की किस्तें अभी भी अधूरी थीं. चींटियों की चाल चल रही थी सारी सरकारी कार्यवाही. जब तक सांस है, आस भी है. कभी न कभी मुआवजा तो मिलेगा ही.

मेघनाद : मेघनाद और श्वेता का प्रेम संसार

‘मेघनाद…’ हमारे प्रोफैसर क्लासरूम में हाजिरी लेते हुए जैसे ही यह नाम पुकारते, ‘खीखी’ की दबीदबी आवाजें आने लगतीं. एक तो नाम भी मेघनाद, ऊपर से जनाब 6 फुट के लंबे कद के साथसाथ अच्छेखासे सांवले रंग के मालिक भी थे. उस पर घनीघनी मूंछें. कुलमिला कर मेघनाद को देख कर हम शहर वाले उसे किसी फिल्मी विलेन से कम नहीं सम झते थे.

पास ही के गांव से आने वाला मेघनाद पढ़ाई में अव्वल तो नहीं था लेकिन औसत दर्जे के छात्रों से तो अच्छा ही था.

आमतौर पर क्लास में पीछे की तरफ बैठने वाला मेघनाद इत्तिफाक से एक दिन मेरे बराबर में ही बैठा था. जैसे ही प्रोफैसर ने उस का नाम पुकारा कि ‘खीखी’ की आवाजें आने लगीं.

मेरे लिए अपनी हंसी दबाना बड़ा ही मुश्किल हो रहा था. मु झे लगा कि मेघनाद को बुरा लग सकता है, लेकिन मैं ने देखा कि वह खुद भी मंदमंद मुसकरा रहा था.

कुछ दिनों से मैं नोट कर रहा था कि मेघनाद चुपकेचुपके श्वेता की तरफ देखता रहता था. कालेज में लड़कियों की तरफ खिंचना कोई नई बात नहीं थी लेकिन श्वेता अपने नाम की ही तरह खूब गोरी और बेहद खूबसूरत थी. क्लास के कई लड़के उस पर फिदा थे लेकिन श्वेता किसी को भी घास नहीं डालती थी.

मैं ने यह बात खूब मजे लेले कर अपने दोस्तों को बताई.

एक दिन जब प्रोफैसर महेश ने मेघनाद का नाम पुकारा तो कोई जवाब नहीं आया. उन्होंने फिर से नाम पुकारा लेकिन फिर भी कोई जवाब नहीं आया.

मेघनाद कभी गैरहाजिर नहीं होता था इसलिए प्रोफैसर महेश ने सिर उठा कर फिर से उस का नाम लिया. अब तक क्लास की ‘खीखी’ अच्छीखासी हंसी में बदल गई थी.

इतने में श्वेता ने मजाक उड़ाते हुए कहा, ‘‘सर, वह शायद लक्ष्मणजी के साथ कहीं युद्ध कर रहा होगा.’’

यह सुन कर सभी हंसने लगे. यहां तक कि प्रोफैसर महेश भी अपनी हंसी न रोक पाए.

तभी सब की नजर दरवाजे पर पड़ी जहां मेघनाद खड़ा था. आज उस की ट्रेन लेट हो गई थी तो वह भी थोड़ा लेट हो गया था. उस ने श्वेता की बात सुन ली थी और उस का चेहरा उतर गया था.

मुझे मेघनाद का उदास सा चेहरा देख कर अच्छा नहीं लगा. शायद उस को लोगों की हंसी से ज्यादा श्वेता की बात बुरी लगी थी.

बीएससी पूरी कर के मैं दिल्ली आ गया और फिर अगले 10 सालों में एक बड़ी मैडिकल ट्रांसक्रिप्शन कंपनी में असिस्टैंट मैनेजर बन गया.

कालेज के मेरे कुछ दोस्त सरकारी टीचर बन गए तो कुछ अपना कारोबार करने लगे.

कालेज के कुछ पुराने छात्रों ने 10 साल पूरे होने पर रीयूनियन का प्रोग्राम बनाया. अनुराग, अजहर, विनोद, इकबाल, पारुल वगैरह ने प्रोग्राम के लिए काफी मेहनत की.

प्रोग्राम में अपने पुराने साथियों से मिल कर मु झे बहुत अच्छा लगा.

यों तो प्रोग्राम में अपनी क्लास के करीब आधे ही लोग आ पाए, फिर भी उन सब से मिल कर काफी अच्छा लगा.

मेरे सहपाठी हेमेंद्र और दीप्ति शादी कर के मुंबई में रह रहे थे तो संजय एक बड़ी गारमैंट कंपनी में वाइस प्रैसीडैंट बन गया था. अतीक जरमनी में सीनियर साइंटिस्ट के पद पर था. वह प्रोग्राम में तो नहीं आ पाया लेकिन उस ने हम सब को अपनी शुभकामनाएं जरूर भेजी थीं.

वंदना एक कामयाब डाक्टर बन गई थी. हमारे टीचरों ने भी हम सब को अपनेअपने फील्ड में कामयाब देख कर अपना आशीर्वाद दिया. कुलमिला कर सब से मिल कर बहुत अच्छा लगा.

हमारे सीनियर मैनेजर मनीष सर 2 साल के लिए अमेरिका जा रहे थे. उन की जगह कोई नए सीनियर मैनेजर हैदराबाद से आ रहे थे. मेरे साथी असिस्टैंट मैनेजर ऋषि, जिन को औफिस में सब ‘पार्टी बाबू’ के नाम से बुलाते थे, ने नए सीनियर मैनेजर के स्वागत में एक छोटी सी पार्टी करने का सु झाव दिया. हम सभी को उन की बात जंच गई और सभी लोग पार्टी की तैयारियों में लग गए.

तय दिन पर नए सीनियर मैनेजर औफिस में पधारे और उन को देखते ही मेरे आश्चर्य की कोई सीमा न रही. मेरे सामने मेघनाद खड़ा था. वह भी मु झे देख कर तुरंत पहचान गया और बड़ी गर्मजोशी से आ कर मिला.

मेघनाद बड़ा आकर्षक लग रहा था. सूटबूट में आत्मविश्वास से भरपूर फर्राटेदार अंगरेजी में बात करता एक अलग ही मेघनाद मेरे सामने था. अपने पहले ही भाषण में उस ने सभी औफिस वालों को प्रभावित कर लिया था.

थोड़ी देर बाद चपरासी ने आ कर मुझ से कहा कि सीनियर मैनेजर आप को बुला रहे हैं. मेघनाद ने मेरे और परिवार के बारे में पूछा. फिर वह अपने बारे में बताने लगा कि ग्रेजुएशन करने के बाद वह कुछ साल दिल्ली में रहा, फिर हैदराबाद चला गया. पिछले साल ही उस ने हमारी कंपनी की हैदराबाद ब्रांच जौइन की थी. फिर उस ने मु झे रविवार को सपरिवार अपने घर आने की दावत दी.

रविवार को मैं अपनी श्रीमती के साथ मेघनाद के घर पहुंचा. घर पर मेघनाद के 2 प्यारेप्यारे बच्चे भी थे. लेकिन असली  झटका मु झे उस की पत्नी को देख कर लगा. मेरे सामने श्वेता खड़ी थी. मेरे हैरानी को भांप कर मेघनाद भी हंसने लगा.

‘‘हैरान हो गए क्या…’’ मेघनाद ने हंसते हुए कहा, फिर खुद ही वह अपनी कहानी बताने लगा, ‘‘दिल्ली आने के बाद नौकरी के साथसाथ मैं एमबीए भी कर रहा था. वहां मेरी मुलाकात श्वेता से हुई थी. फिर हमारी दोस्ती हो गई और कुछ समय बाद शादी. वैसे, मुझ में इन्होंने क्या देखा यह आज तक मेरी सम झ में नहीं आया.’’

श्वेता ने भी अपने दिल की बात बताई, ‘‘कालेज में तो मैं इन को सही से जानती भी नहीं थी, पता नहीं कहां पीछे बैठे रहते थे. दिल्ली आकर मैं ने इन के अंदर के इनसान को देखा और समझा. मैं ने अपनी जिंदगी में इन से ज्यादा ईमानदार, मेहनती और प्यार करने वाला इनसान नहीं देखा.’’

मेघनाद और श्वेता के इस प्रेम संसार को देख कर मुझे वाकई बड़ी खुशी हुई. सच ही है कि आदमी की पहचान उस के नाम या रंगरूप से नहीं, बल्कि उस के गुणों से होती है. और हां, अब मुझे मेघनाद नाम सुन कर हंसी नहीं आती, बल्कि फख्र महसूस होता है.

अनपढ़ : कालू डकैत ने फूलबतिया को क्यों उठाया

फूलबतिया को कालू डकैत उठा कर ले गया था. उस की ससुराल वाले कालू का कुछ नहीं बिगाड़ पाए. पर कालू के ऐनकाउंटर के बाद फूलबतिया वहां से भाग गई. फिर वह रमेसरा से मिली और उस की घरवाली के रूप में रहने लगी. आगे क्या हुआ?

‘‘र मेसरा ने फूलबतिया से घर कर लिया है,’’ कंटीर मिसर अपने पड़ोसी देवेन को बता रहे थे.

‘‘अच्छा, मगर रमेसरा तो सीधासादा है,’’ देवेन बोले.

‘‘तभी तो फूलबतिया ने उसे फंसा लिया होगा. कौन नहीं जानता कि फूलबतिया को कालू डकैत उठा ले गया था,’’ कंटीर मिसर बोल रहे थे.

पूरे गांव के लोग परेशान थे. वजह, 2 महीने पहले कालू डकैत और उस के गिरोह के 4 सदस्य पुलिस ऐनकाउंटर में मारे गए थे. पूरा गिरोह ही खत्म हो गया था.

फूलबतिया को वही कालू 4 साल पहले उठा ले गया था. वह उसी की मंगेतर थी. कालू ने जीभर कर उसे भोगा और ऐनकाउंटर के बाद फूलबतिया रमेसरा से घर कर बैठी.

रमेसरा सीधासादा मजदूर था, जो दिल्ली में मजदूरी करता था. साल में एक बार घर आता था. उस के पिताजी सालों पहले गुजर चुके थे. उस ने पिछले साल अपनी मां को भी खो दिया था. वह 35-36 साल का होगा, जबकि फूलबतिया भी 30-32 साल के पास की होगी.

फूलबतिया के बाकी सभी बहनभाइयों की शादी हो चुकी थी. सो, वह आराम से रमेसरा से ब्याह कर बैठी.

काली और दोहरे बदन की अंगूठाछाप फूलबतिया खुद को कालू डकैत से कम नहीं समझती थी. वह तो अच्छा था कि पुलिस को सबक सिखाने वालों की टीम में वह नहीं शामिल थी.

‘चलो, उस पुलिस वाले साहब ने हमारा अड्डा और धंधा चौपट कर दिया है. उसे सबक सिखाना है. उसे बीवीबच्चों के सामने ही निबटा देना है,’ ऐनकाउंटर पर जाने से पहले कालू डकैत अपने साथियों से बोला था.

‘यही ठीक रहेगा. कल शाम को शैतान सिंह के घर धावा बोलना है,’ दूसरे साथी ने कहा था.

‘मैं भी साथ चलूंगी,’ फूलबतिया कालू के सामने ऐंठते हुए बोली थी.

‘तू यहीं रह. उस के लिए हम 4 ही काफी हैं. तू अच्छा सा मुरगाभात बना कर रखना,’ कालू डकैत ने कहा था.

‘अरे हरिया, शैतान सिंह को कल शाम का समय बोल दे. देख लें उस के पुलिस बल में कितनी औकात है?’ कालू दहाड़ा था.

पुलिस आखिर पुलिस होती है. वे चारों फिल्मी अंदाज में वहां गए और शैतान सिंह ने तो नहीं, हां सिर्फ 2 पुलिस वालों ने उन्हें ही निबटा दिया था.

उन चारों का अंतिम संस्कार हो, उस के पहले ही फूलबतिया वहां से भाग गई थी. उसे रमेसरा अच्छा मुरगा लगा था, जिस से आसानी से हलाल किया जा सकता था. इधर फूलबतिया के घर वालों ने उस से नाता ही तोड़ लिया था.

हुआ यह था कि भारी बरसात में फूलबतिया डाकुओं के अड्डे से भाग निकली थी और साड़ी में भीगती भागी जा रही थी. अचानक रेलवे स्टेशन पर जो गाड़ी दिखी, उस में चढ़ गई. उसी गाड़ी से रमेसरा भी अपने गांव से जा रहा था.

‘अरे, आप तो भीग गई हैं. आइए, बैठ जाइए,’ रमेसरा ने एक तरफ फूलबतिया को अपने पास सरकते हुए उसे बिठाया था.

‘यह गाड़ी कहां जा रही है?’ फूलबतिया धीरे से पूछ बैठी थी.

‘दिल्ली… आप को कहां जाना है?’ रमेसरा ने इनसानियत के नाते पूछा था.

‘मेरा कोई ठिकाना नहीं है. आप कहां से आ रहे हैं?’

‘बिहार से,’ रमेसरा बोला.

‘कहीं आप सतीश के लड़के रामेश्वर यानी रमेसरा तो नहीं है?’ फूलबतिया उसे पहचानते हुए बोली थी.

‘बिलकुल ठीक पहचाना. मैं वही रमेसरा हूं. दिल्ली में काम करता हूं. मगर आप…?’ रमेसरा ने हैरानी से पूछा था.

‘मैं फूलबतिया हूं, पास वाले गांव के सुगना की बेटी,’ वह जवाब देते हुए बोली थी.

‘अच्छा…’ कह कर रमेसरा सोचने लगा था, मगर जब कुछ याद नहीं आया, तो वह शांत बैठ गया था. अचानक उस का ध्यान फूलबतिया के कपड़ों पर गया. भीगी चोली में बड़े व लटके दोनों उभार अजीब दिख रहे थे.

‘आप को कहां जाना है?’ रमेसरा ने पूछा था.

इस पर फूलबतिया रोने लगी थी. अपनी पहचान का समझ कर वह उस के साथ दिल्ली पहुंच गई थी. फिर तो 15 दिनों के अंदर ही उस ने रमेसरा का घर संभाल लिया था.

दिल्ली में फूलबतिया सरल भाव से रह रही थी, जबकि सब उसे रमेसरा की पत्नी बता रहे थे. वह भी पत्नी जैसा ही बरताव कर रही थी.

‘आप मेरे से शादी कर लो,’ एक दिन फूलबतिया रमेसरा से सीधे बोली थी.

‘देख रही हो, लोग आप को मेरी लुगाई समझ रहे हैं. आप को बुरा नहीं लगता?’ रमेसरा ने हैरान होते हुए पूछा था.

‘कैसा बुरा? मुझे कुछ भी खराब नहीं लगता. आप मुझ लाचार और बेबस औरत को अपने घर में रखे हैं, मेरा पूरा ध्यान रखते हैं,’ फूलबतिया मुसकराते हुए बोली थी.

‘मगर, आप का पति और परिवार वाले…’ रमेसरा ने पूछा था.

‘कोई नहीं है. मेरा परिवार मुझे कालू डकैत को सौंप कर अलग हो चुका है. कालू और उस की टीम मारी जा चुकी है.’

‘तुम तो डकैत रह चुकी हो. किसी बात पर नाराज हुई तो मेरा भी खात्मा कर डालोगी. कोई भरोसा नहीं है तुम्हारा,’ रमेसरा डरते हुए बोला था.

‘अरे नहीं, मैं एक औरत हूं. पत्नी के रूप में घर चलाती हूं. फिर डकैत की जिंदगी बेकार की है. पुलिस की गोली से या आपस में ही खत्म हो जाती है,’ फूलबतिया समझाते हुए बोली थी.

‘फिर तुम कैसे वहां पहुंच गई?’ रमेसरा ने पूछा था.

‘आज से 6 साल पहले मेरी शादी मोहित मंडल से करवाई गई थी. शादी के बाद एक साल तो ठीक बीता, पर फिर कालू डकैत मुझे उठा ले गया. ससुराल और पीहर वालों में से किसी ने भी मेरी हिफाजत नहीं की.

‘मेरा पति भी कुछ नहीं कर सका और बाद में एक सड़क हादसे में चल बसा. तब से मैं कालू के साथ ही थी. वह गिद्ध की तरह मुझे नोचताखसोटता था. अभी कुछ दिन पहले उस के सारे लोग मारे गए.’

‘तुम तो मोस्ट वांटेड होगी?’ रमेसरा पूछ बैठा था.

‘नहीं, मैं अलग थी. कालू के किसी कारोबार या डकैती से मेरा कुछ भी लेनादेना नहीं था. पुलिस कभी भी मेरे पास नहीं आई, न ही मुझ से कोई मतलब है,’ फूलबतिया रोते हुए बोली थी.

‘मुझ से क्या चाहती हो? मैं तुम्हारे किस काम आ सकता हूं,’ रमेसरा ने पूछा था.

‘तुम मुझ से शादी कर लो. शादी क्या चादर डाल दो,’ फूलबतिया थोड़ा शरमाते हुए बोली थी.

‘‘ठीक है, मेरा तो कोई है नहीं. तुम्हारे घर वालों को तो कोई एतराज नहीं होगा न?’ रमेसरा बोला था.

‘कौन घर वाले? जो डकैत के हवाले कर गए या जो मुझे कभी झांकने नहीं आए? तुम ईमानदार हो, मुझे कभी हाथ नहीं लगाया. गलत नजर से नहीं देखा. तुम एक अबला समझ कर मुझे अपने पास रखे हो और इतना मान दे रहे हो.’

अब रमेसरा शांत भाव से फूलबतिया को देखने लगा था. वह एक घरेलू अनपढ़ लग रही थी. इस तरह वह अपनी वीरान जिंदगी में एक मौका समझ बैठा था.

फिर एक रात तकरीबन 8 बजे रमेसरा काम से घर वापस आया. घर में आते ही फूलबतिया पर नजर पड़ी. वह खाना बना रही थी. उस ने हाथपैर धोए और खाना खाया. वह भी खाने लगी. खा कर जब दोनों लेटे तो वह न जाने क्यों उसे छूने लगा.

फूलबतिया हंसते हुए उस से सट गई और पूरा सुख दिया. रमेसरा को खूब मजा आ रहा था. वह भी पूरा साथ दे रही थी. पहली बार दोनों जीभर कर खेल रहे थे.

‘आओ, आप आराम से अपनी इच्छा शांत करो,’ फूलबतिया ने कहा था.

‘नहीं, यह पाप था,’ रमेसरा शांत होने पर पछताते हुए बोला था.

‘कोई पाप नहीं था. यह मजा है. फिर मैं तेरी जोरू हूं. सब पत्नी से सब सोते हैं, फिर पाप कैसा?’ वह बोली थी.

रमेसरा उस के बाद काम में खो गया. सुबह से शाम तक का काम और फिर अपने घर पर पत्नी तो अद्भुत थी ही. जब भी इच्छा होती जैसी भी इच्छा होती, वह अपनी इच्छा शांत करता. पत्नी हमेशा साथ देती थी.

डकैत भी प्यार के भूखे होते हैं. फूलबतिया एक पत्नी की तरह घर संभाल रही थी, समय पर भोजन, पानी, सबकुछ संभाल रखा था.

हद तो तब हो गई, जब फूलबतिया ने 70,000 रुपए का आटोरिकशा खरीद कर रमेसरा को चलाने के लिए दे दिया.

‘रोज 500 रुपए घरखर्च के और बाकी बैंक की किस्त,’ रमेसरा फूलबतिया के हाथ में पैसे देते हुए बोला था.

‘काहे की किस्त? मैं ने अपनी जमा रकम से आटोरिकशा लिया है. तुम घरखर्च के जो पैसे देते थे, उसी में से बचा कर पूरे एक लाख में से 70,000 रुपए की खरीदी है. बाकी कभी परेशानी, बीमारी या आफत के लिए.’

अब रमेसरा फूलबतिया को पूरी तरह से बांहों में भर कर चूमने लगा.

‘कौन कहता है कि तुम ऐसीवैसी हो. तुम तो किसी भी पत्नी से अच्छी हो.’

‘दिनरात काम करने की जरूरत नहीं है. आराम से जितना काम हो उतना करना. मुसीबत के लिए पैसे जोड़ रखे हैं. जल्दी ही यह झुग्गी भी अपनी होगी.’

‘क्या?’ रमेसरा ने हैरान हो कर कहा.

‘अरे, 70,000 रुपए इस के दे दिए हैं. 2 लाख की झुग्गी है. सालभर में अपनी हो जाएगी,’ फूलबतिया खुशी से झूम कर बोली.

रमेसरा निश्चिंत भाव से फूलबतिया को देख रहा था.

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