युवाओं के सपने चूर करती अमेरिकी वीजा नीति

अमेरिका की प्रस्तावित नई वीजा नीति से दुनियाभर में खलबली मची हुई है. इस से अमेरिका में रह रहे एच1बी वीजा धारकों की नौकरी पर संकट तो है ही, वहां जाने का सपना देखने वाले युवा और उन के मांबाप भी खासे निराश हैं. एच1बी नीति का विश्वभर में विरोध हो रहा है. अमेरिकी कंपनियां और उन के प्रमुख, जो ज्यादातर गैरअमेरिकी हैं, विरोध कर रहे हैं. खासतौर से सिलीकौन वैली में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विरुद्ध प्रदर्शन हो रहे हैं. सिलीकौन वैली की 130 कंपनियां ट्रंप के फैसले का खुल कर विरोध कर रही हैं. ये कंपनियां दुनियाभर से जुड़ी हुई हैं. वहां काम करने वाले लाखों लोग अलगअलग देशों के नागरिक हैं. उन में खुद के भविष्य को ले कर कई तरह की शंकाएं हैं. हालांकि यह साफ है कि अगर सभी आप्रवासियों पर सख्ती की जाती है तो सिलीकौन वैली ही नहीं, पूरे अमेरिका का कारोबारी संतुलन बिगड़ जाएगा.

इस से उन कंपनियों में दिक्कत होगी जो भारतीय आईटी पेशेवरों को आउटसोर्सिंग करती हैं. कई विदेशी कंपनियां भारतीय कंपनियों से अपने यहां काम का अनुबंध करती हैं. इस के तहत कई भारतीय कंपनियां हर साल हजारों लोगों को अमेरिका में काम करने के लिए भेजती हैं.

आप्रवासन नीति पर विवाद के बीच अमेरिका की 97 कंपनियों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ मुकदमा ठोक दिया है. इन में एपल, गूगल, माइक्रोसौफ्ट भी शामिल हैं. इन में से अधिकतर कंपनियां आप्रवासियों ने खड़ी की हैं. उन्होंने अदालत में दावा किया कि राष्ट्रपति का आदेश संविधान के खिलाफ है. आंकड़ों का हवाला दे कर कहा गया है कि अगर इन कंपनियों को मुश्किल होती है तो अमेरिकी इकौनोमी को 23 प्रतिशत तक का नुकसान हो सकता है.

कई देश ट्रंप प्रशासन के आगे वीजा नीति न बदलने के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं. भारत भी अमेरिका में रह रहे अपने व्यापारियों के माध्यम से दबाव बना रहा है कि जैसेतैसे मामला वापस ले लिया जाए या उदारता बरती जाए. भारत के पक्ष में लौबिंग करने वाले एक समूह नैसकौम के नेतृत्व में भारतीय कंपनियों के बड़े अधिकारी इस मसले को ट्रंप प्रशासन के सामने उठाना चाह रहे हैं.

नई वीजा नीति से भारत सब से अधिक चिंतित है. 150 अरब डौलर का घरेलू आईटी उद्योग संकटों से घिर रहा है. भारत के लाखों लोग अमेरिका में काम कर रहे हैं. तय है वहां काम  कर रहे भारतीय पेशेवरों पर खासा प्रभाव पड़ेगा. इस से टाटा कंसल्टैंसी लिमिटेड यानी टीसीएल, विप्रो, इन्फोसिस जैसी भारतीय आईटी कंपनियां भी प्रभावित होंगी. आईटी विशेषज्ञ यह मान कर चल रहे हैं कि यह नीति अमल में आती है तो यह बड़ी मुसीबत के समान होगी. अगर ऐसा हुआ तो अमेरिका दुनिया को श्रेष्ठ आविष्कारक देने वाला देश नहीं रह जाएगा.

यह सच है कि दुनियाभर की प्रतिभाएं अमेरिका जाना चाहती हैं. वर्ष 2011 में आप्रवासन सुधार समूह ‘पार्टनरशिप फौर अ न्यू अमेरिकन इकोनौमी’ ने पाया कि फौर्च्यून 500 की सूची में शामिल कंपनियों में 40 प्रतिशत की स्थापना आप्रवासियों ने की. अमेरिका में 87 निजी अमेरिकन स्टार्टअप ऐसे हैं जिन की कीमत 68 अरब डौलर या इस से अधिक है. कहा जाता है कि यहां आधे से अधिक स्टार्टअप ऐसे हैं जिन की स्थापना करने वाले एक या उस से अधिक लोग प्रवासी थे, उन के 71 प्रतिशत एक्जीक्यूटिव पद पर नियुक्त थे.

गूगल, माइक्रोसोफ्ट जैसी कंपनियों के प्रमुख भारतीय हैं जो अपनी योग्यता व कुशलता से न सिर्फ इन कंपनियों को चला रहे हैं, इन के जरिए तकनीक की दुनिया में एक नए युग की शुरुआत भी कर चुके हैं. इन कंपनियों ने हजारों जौब उत्पन्न किए हैं और पिछले दशक में इन्होंने न केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मंदी से निकाला बल्कि अरबों डौलर कमाई कर के उसे मजबूत भी बनाया. ये वही कंपनियां हैं जिन के संस्थापक दुनिया के अलगअलग देशों के नागरिक हैं.

1. क्या है एच1बी वीजा

एच1बी वीजा अमेरिकी कंपनियों को अपने यहां विदेशी कुशल और योग्य पेशेवरों को नियुक्त करने की इजाजत देता है. अगर वहां समुचित जौब हो और स्थानीय प्रतिभाएं पर्याप्त न हों तो नियोक्ता विदेशी कामगारों को नियुक्ति दे सकते हैं.

1990 में तत्कालीन राष्ट्रपति जौर्ज डब्लू बुश ने विदेशी पेशेवरों के लिए इस विशेष वीजा की व्यवस्था की थी. आमतौर पर किसी खास कार्य में कुशल लोगों के लिए यह 3 साल के लिए दिया जाता है. एच1बी वीजा केवल आईटी, तकनीकी पेशेवरों के लिए नहीं है, बल्कि किसी भी तरह के कुशल पेशेवर के लिए होता है. 2015 में एच1बी वीजा सोशल साइंस, आर्ट्स, कानून, चिकित्सा समेत 18 पेशों के लिए दिया गया. अमेरिकी सरकार हर साल इस के तहत 85 हजार वीजा जारी करती आई है. कहा जा रहा है कि फर्स्ट लेडी मेलानिया ट्रंप भी अमेरिका में मौडल के रूप में स्लोवेनिया से एच1बी वीजा के तहत आई थीं.

2. प्रस्तावित आव्रजन नीति

ज्यादा से ज्यादा अमेरिकी युवाओं को रोजगार देने के उद्देश्य से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश जारी किया और सिलीकौन वैली के डैमोके्रट जोए लोफग्रेन द्वारा संसद में हाई स्किल्ड इंटिग्रिटी ऐंड फेरयनैस ऐक्ट-2017 पेश किया गया. इस के तहत इन वीजाधारकों का वेतन लगभग दोगुना करने का प्रस्ताव है. अभी एच1बी वीजा पर बुलाए जाने वाले कर्मचारियों को कंपनियां कम से कम 60 हजार डौलर का भुगतान करती हैं. विधेयक के ज्यों का त्यों पारित होने के बाद यह वेतन बढ़ कर 1 लाख 30 हजार डौलर हो जाएगा. विधेयक में कहा गया है, ‘‘अब समय आ गया है कि हमारी आव्रजन प्रणाली अमेरिकी कर्मचारियों के हित में काम करना शुरू कर दे.’’

दरअसल, अब अमेरिका में यह भावना फैलने लगी थी कि विदेशी छात्र स्थानीय आबादी का रोजगार खा रहे हैं. ट्रंप इसी सोच का फायदा उठा कर सत्ता में पहुंच गए. उन्होंने चुनावी सभाओं में अमेरिकी युवाओं से विदेशियों की जगह उन के रोजगार को प्राथमिकता देने का वादा किया था.

वास्तव में भारतीय आईटी कंपनियां अमेरिका में जौब भी दे रही हैं और वहां की अर्थव्यवस्था में योगदान भी कर रही हैं. भारतीय आईटी कंपनियों से अमेरिका में 4 लाख डायरैक्ट तथा इनडायरैक्ट जौब मिल रहे हैं. वहीं, अमेरिकी इकोनौमी में 5 बिलियन डौलर बतौर टैक्स चुकाया जा रहा है. भारत से हर साल एच1बी वीजा तथा एल-1 वीजा फीस के रूप में अमेरिका को 1 बिलियन डौलर की आमदनी हो रही है.

अमेरिका पिछले साल जनवरी 2016 में एच1बी और एल-1 वीजा फीस बढ़ा चुका है. एच1बी वीजा की फीस 2 हजार डौलर से 6 हजार डौलर और एल-1 वीजा की फीस 4,500 डौलर कर दी गई थी. हाल के वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने यह नियम बना लिया कि विदेशों से प्रतिवर्ष केवल एक लाख छात्र ही ब्रिटेन आ सकते हैं. उस ने वीजा की शर्तें बहुत कठोर कर दीं. लगभग इसी समय अमेरिका ने उदारवादी शर्तों पर स्कौलरशिप दे कर भारतीय छात्रों को आकर्षित किया. वहां पार्टटाइम काम कर के शिक्षा का खर्च जुटाना भी आसान था. अनेक भारतीय छात्र,  जिन्होंने अमेरिका में शिक्षा प्राप्त की थी, वहीं बस गए. अमेरिकी संपन्न जनता को भी सस्ती दरों पर प्रशिक्षित भारतीय छात्र मिल जाते थे जो अच्छी अंगरेजी बोल लेते थे और कठिन परिश्रम से नहीं चूकते थे.

एच1बी वीजा नीति को ले कर भारतीय आईटी कंपनियों में नाराजगी है. उन का तर्क है कि आउटसोर्सिंग सिर्फ उन के या भारत के लिए फायदेमंद नहीं है बल्कि यह उन कंपनियों व देशों के लिए भी लाभदायक है जो आउटसोर्सिंग कर रहे हैं.

नए कानून से भारतीय युवा उम्मीदों को गहरा आघात लगेगा. सालों से जो भारतीय मांबाप अपने बच्चों को अमेरिका भेजने का सपना देख रहे हैं, उन पर तुषारापात हो गया है. इस का असर दिखने भी लगा है. आईटी कंपनियां कैंपस में नौकरियां देने नहीं जा रही हैं. भारत के प्रमुख इंजीनियरिंग और बिजनैस स्कूलों के कैंपस प्लेसमैंट पर अमेरिका के कड़े वीजा नियमों का असर देखा जा रहा है. जनवरी से देश के प्रमुख आईआईएम और आईआईटी शिक्षण संस्थानों समेत प्रमुख कालेजों में प्लेसमैंट प्रक्रिया शुरू हुई पर उस में वीजा नीति का असर देखा जा रहा है.

3. प्रतिभा पलायन क्यों?

सवाल यह है कि भारतीय विदेश में नौकरी करने को अधिक लालायित क्यों है? असल में इस के पीछे सामाजिक और राजनीतिक कारण प्रमुख हैं. लाखों युवा और उन के मांबाप अमेरिका में जौब का सपना देखते हैं. बच्चा 8वीं क्लास में होता है तभी से वह और उस के परिवार वाले तैयारी में जुट जाते हैं.

इंजीनियरिंग, मैनेजमैंट व अन्य डिगरियों पर लाखों रुपए खर्र्च कर मांबाप बच्चों के बेहतर भविष्य का तानाबाना बुनने में कसर नहीं छोड़ते. आईआईटी, मैनेजमैंट में पढ़ाने वाले शिक्षक भी बच्चों के दिमाग में विदेश का ख्वाब जगाते रहते हैं. इन विषयों का सिलेबस ही विदेशी नौकरी के लायक होता है.

वहीं, मांबाप के लिए विदेश में रह कर नौकरी करने का एक अलग ही स्टेटस है. इस से परिवार की सामाजिक हैसियत ऊंची मानी जाती है. विदेश में नौकरी कर रहे युवक के विवाह के लिए ऊंची बोली लगती है. परिवार, नातेरिश्तेदारी में गर्व के साथ कहा जाता है कि हमारे बेटेभतीजे विदेश में रहते हैं. इस से सामान्य परिवार से हट कर एक खास रुतबा कायम हो जाता है.

60 के दशक में पहले अमीर परिवारों के भारतीय छात्र अधिकतर ब्रिटेन जाते थे. वहां के विश्वविद्यालय बहुत प्रतिष्ठित थे. कुछ विश्वविद्यालयों में यह प्रावधान था कि छात्र कैंपस से बाहर जा कर पार्टटाइम नौकरी कर सकते थे जिस से पढ़ाई का खर्च निकल सके पर धीरेधीरे ब्रिटिश सरकार ने पार्टटाइम काम कर के पढ़ाई की इस प्रवृत्ति को हतोत्साहित करना शुरू कर दिया. फिर ब्रिटेन में यह धारणा बनने लगी कि ये लोग स्थानीय लोगों का रोजगार छीन रहे हैं. लेकिन भारतीय आईटी इंडस्ट्री का मानना है कि अमेरिका में आईटी टैलेंट की बेहद कमी है. भारतीयों को इस का खूब फायदा मिला.

4. बदहाल सरकारी नीतियां

विदेशों में पलायन की एक प्रमुख वजह भारत की सरकारी नीतियां हैं. भारतीय प्रतिभाओं का  पलायन सरकारी निकम्मेपन, लालफीताशाही, भ्रष्टाचार की वजह से हुआ. सरकार उन्हें पर्याप्त साधनसुविधाएं, वेतन नहीं दे सकी. सरकार ब्रेनड्रेन रोकना ही नहीं चाहती. इस के लिए कानून बनाया जा सकता है पर हमारे नेताओं को डर है कि इस से जो रिश्वत मिलती है वह बंद हो जाएगी.

अमेरिका जैसे देश में युवाओं को अच्छा वेतन, सुविधाएं मिल रही हैं. वे वापस लौटना नहीं चाहते. कई युवा तो परिवार के साथ वहीं रह रहे हैं और ग्रीनकार्ड के लिए प्रयासरत हैं. कई स्थायी तौर पर बस चुके हैं. सब से बड़ी बात है वहां धार्मिक बंदिशें नहीं हैं. भारतीय दकियानूसी सोच के चंगुल से दूर वहां खुलापन, उदारता और स्वतंत्रता का वातावरण है.

दरअसल, किसी भी देश के नागरिक को दुनिया में कहीं भी पढ़नेलिखने, रोजगार पाने का हक होना चाहिए. प्रकृति ने इस के लिए कहीं, कोई बाड़ नहीं खड़ी की. आनेजाने के नियमकायदे तो देशों ने बनाए हैं पर यह हर व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार है. बंदिशें लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ हैं. इस से अमेरिका ही नहीं, दूसरे देशों की आर्थिक दशा पर भी असर पड़ेगा. तकनीक, तरक्की अवरुद्ध होगी.

इस तरह की रोकटोक से कोई नया आविष्कार न होने पाएगा. दुनिया अपने में सिकुड़ जाएगी. कोलंबस, वास्कोडिगामा अगर सीमाएं लांघ कर बाहर न निकलते तो क्या दुनिया एकदूसरे से जुड़ पाती. शिक्षा, ज्ञान, तकनीक, जानकारी, नए अनुसंधान फैलाने से ही मानव का विकास होगा, नहीं तो दुनिया कुएं का मेढक बन कर रह जाएगी. विकास से वंचित करना विश्व के साथ क्या अन्याय नहीं होगा.

अलग धार्मिक पहचान के मारे आप्रवासी

अमेरिका के कैंसास शहर में 22 फरवरी को 2 भारतीय इंजीनियरों को गोली मार दी गई. इस में हैदराबाद के श्रीनिवास कुचीवोतला की मौत हो गई और वारंगल के आलोक मदसाणी घायल हैं. गोली एक पूर्व अमेरिकी नौसैनिक ने मारी और वह गोलियां चलाते हुए कह रहा था कि आतंकियो, मेरे देश से निकल जाओ. इसे नस्ली हमला माना जा रहा है. नशे में धुत हमलावर एडम पुरिंटन की दोनों भारतीय इंजीनियरों से नस्लीय मुद्दे पर बहस हुई थी.

इसी बीच, 27 फरवरी को खबर आई कि व्हाइट हाउस में हिजाब पहन कर नौकरी करने वाली रूमाना अहमद ने नौकरी छोड़ दी. 2011 से व्हाइट हाउस में काम करने वाली रूमाना राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की सदस्य थीं. वैस्ट विंग में हिजाब पहनने वाली वे एकमात्र महिला थीं.

खबर में यह तो साफ नहीं है कि रूमाना अहमद ने नौकरी क्यों छोड़ी लेकिन उन की बातों से स्पष्ट है कि अलग धार्मिक पहचान की वजह से उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ा. वे बुर्का पहनना नहीं छोड़ना चाहती थीं. तभी उन्होंने कहा कि बराक ओबामा के समय में उन्हें कोई परेशानी नहीं थी.

भारतीय संगठन ने अमेरिका में रह रहे भारतीयों के लिए जो एडवाइजरी जारी की है उस में अपनी स्थानीय भाषा न बोलने की सलाह तो दी गई है पर यह नहीं कहा गया कि वे अपनी धार्मिक पहचान छोड़ कर ‘जैसा देश, वैसा भेष’ के हिसाब से रहें.

आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद नस्लीय हिंसा 115 प्रतिशत बढ़ी है. ट्रंप की जीत के 10 दिनों के भीतर ही हेट क्राइम के 867 मामले दर्ज हो चुके थे. वहां आएदिन मुसलमानों, अश्वेतों, भारतीय हिंदुओं व सिखों के साथ धार्मिक, नस्लीय भेदभाव व हिंसा होनी तो आम बात है लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद नस्ली घटनाओं में तेजी आई है. 11 फरवरी को सौफ्टवेयर इंजीनियर वम्शी रेड्डी की कैलिफोर्निया में गोली मार कर हत्या कर दी गई थी. जनवरी में गुजरात के हर्षद पटेल की वर्जीनिया में गोली मार कर जान ले ली गई थी.

सब से ज्यादा हमले मुसलमानों पर हो रहे हैं. काउंसिल औफ अमेरिकन इसलामिक रिलेशंस के अनुसार, पिछले साल करीब 400 हेट क्राइम दर्ज हुए थे जबकि ट्रंप के सत्ता में आने के बाद 2 महीने में ही 175 मामले सामने आ चुके हैं.

ये घटनाएं तो हाल की हैं. असल में अमेरिका की बुनियाद ही धर्म आधारित है. ब्रिटिश उपनिवेश में रहते हुए वहां ब्रिटेन ने क्रिश्चियनिटी को प्रश्रय दिया पर ईसाइयों में यहां शुरू से ही प्रोटेस्टेंटों और कैथोलिकों के बीच भेदभाव, हिंसा चली. धार्मिक आधार पर कालोनियां बनीं. बाद में हिटलर के यूरोप से यहूदी शरणार्थियों के साथ भेदभाव चला.

1918 में यहूदी विरोधी भावना का ज्वार उमड़ा और फैडरल सरकार ने यूरोप से माइग्रेंट्स पर अंकुश लगाना शुरू किया. अमेरिका में उपनिवेश काल से ही यहूदियों के साथ भेदभाव बढ़ता गया. 1950 तक यहूदियों को कंट्री क्लबों, कालेजों, डाक्टरी पेशे पर प्रतिबंध और कई राज्यों में तो राजनीतिक दलों के दफ्तरों में प्रवेश पर भी रोक लगा दी गई थी. 1920 में इमिग्रेशन कोटे तय होने लगे. अमेरिका में यहूदी हेट क्राइम में दूसरे स्थान पर होते थे. अब हालात बदल रहे हैं. माइग्रेंट धर्मों की तादाद दिनोंदिन बढ़ रही थी.

अमेरिका में 1600 से अधिक हेट क्राइम ग्रुप हैं. सब से बड़ा गु्रप राजधानी वाशिंगटन में है जिस का नाम फैडरेशन औफ अमेरिकन इमिग्रेशन रिफौर्म है. यह संगठन आप्रवासियों के खिलाफ अभियान चलाता है. इस की गतिविधियां बेहद खतरनाक बताई जाती हैं. सोशल मीडिया पर भी इस का हेट अभियान जारी रहता है. यह मुसलमानों, हिंदू, सिख अल्पसंख्यक आप्रवासियों और समलैंगिकों के खिलाफ भड़काऊ सामग्री डालता रहता है.

आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका 15,000 से अधिक धर्मों की धर्मशाला है और करीब 36,000 धार्मिक केंद्रों का डेरा है. अमेरिका में 11 सितंबर, 2001 के बाद मुसलमानों के प्रति 1,600 प्रतिशत हेट क्राइम बढ़ गया. नई मसजिदों के खिलाफ आंदोलन के बावजूद 2000 में यहां 1,209 मसजिदें थीं जो 2010 में बढ़ कर 2,106 हो गईं. इन मसजिदों में ईद व अन्य मौकों पर करीब 20 लाख, 60 हजार मुसलमान नियमित तौर पर जाते हैं. अमेरिका में 70 लाख से अधिक मुसलिम हैं.

अमेरिकी चरित्र के बारे में 2 बातें प्रसिद्ध हैं. एक, वह ‘कंट्री औफ माइग्रैंट्स’ और दूसरा, ‘कंट्री औफ अनमैच्ड रिलीजियंस डायवर्सिटी’ कहलाता है. इन दोनों विशेषताओं के कारण वहां एक धार्मिक युद्ध जारी रहता है. इस के बीच कुछ बुद्धिजीवी हैं जो धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र को प्रश्रय देने की मुहिम छेड़े रहते हैं.

पिछले 3-4 दशकों में भारत से अमेरिका में हिंदू, सिख और मुसलिम लोगों की बढ़ोतरी हुई. अन्य देशों से भी मुसलमान अधिक गए. ये लोग अपनेअपने धर्म की पोटली साथ ले गए. वहां मंदिर, गुरुद्वारे, मसजिदें, चर्च बना लिए. वहां रह रहे करीब 5 लाख सिखों के यहां बड़े शहरों में कईकई गुरुद्वारे हैं. ये गुरुद्वारे भी ऊंचीनीची जाति में बंटे हुए हैं उसी तरह जिस तरह वहां ईसाइयों में गोरेकाले, प्रोटेस्टेंटकैथोलिकों के अलगअलग चर्च बने हुए हैं.

हिंदुओं के 450 से अधिक बड़े मंदिर बने हुए हैं. बड़ेबड़े आश्रम और मठ भी हैं. इन में स्वामी प्रभुपाद द्वारा स्थापित इंटरनैशनल सोसायटी फौर कृष्णा कांशसनैस, चिन्मय आश्रम, वेदांत सोसायटी, तीर्थपीठम, स्वामी नारायण टैंपल, नीम करोली बाबा, इस्कान, शिव मुरुगन टैंपल, जगद्गुरु कृपालु महाराज, राधामाधव धाम, पराशक्ति टैंपल, सोमेश्वर टैंपल जैसे भव्य स्थल हैं. इन मंदिरों में विष्णु, गणेश, शिव, हनुमान, देवीमां और तरहतरह के दूसरे देवीदेवताओं की दुकानें हैं. सवाल है कि आखिर किसी को धार्मिक पहचान की जरूरत क्या है? सांस्कृतिक पहचान के नाम पर धर्म की नफरत को बढ़ावा दिया जाता है.

असल में नस्ली भेदभाव, हिंसा का कारण है. विदेश में जा कर लोग अपनी अलग धार्मिक पहचान रखना चाहते हैं. पूजापाठ, पहनावा, रहनसहन धार्मिक होता है. हिंदू पंडे अगर तिलक, चोटी, धोती रखेंगे तो दूसरे धर्म वालों की हंसी के साथ नफरत का शिकार होंगे ही. सिख पगड़ी, दाढ़ी और मुसलमान टोपी, दाढ़ी रखेंगे तो टीकाटिप्पणी झेलनी पड़ेगी ही. पलट कर जवाब देंगे तो मारपीट होगी. फिर शिकायत करते हैं कि उन के साथ नस्ली भेदभाव होता है, हिंसा होती है.

इस भेदभाव की वजह अमेरिका में बड़ी तादाद में फैले हुए धर्मस्थल हैं. हजारों मंदिर, मसजिद, गुरुद्वारे, चर्च बने हुए हैं. भारतीय लोग वहां इन धर्मस्थलों को बनाने में तन, मन और धन से भरपूर सहयोग देते हैं. चीनियों, जापानियों, दक्षिण कोरियाई लोगों के साथ न के बराबर भेदभाव व हिंसा होती है क्योंकि वे किसी धर्म के पिछलग्गू नहीं हैं. वे विदेशों में रह कर उन्हीं लोगों के साथ हिलमिल कर मनोरंजन का आनंद लेते हैं. उन की अपनी चीनी संस्कृति भी है पर उस में धर्म नहीं है. उन की संस्कृति में मनोरंजन है जिस में दूसरे देशों के लोग भी हंसीखुशी आनंद उठाते हैं.

आरक्षण का हल है दूसरी जाति में शादी

पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में यह साफ किया था कि अगर कोई आरक्षित कोटे यानी दलित या आदिवासी मांबाप किसी सामान्य जाति के बच्चे को गोद लेते हैं, तो उस बच्चे से आरक्षण प्रमाणपत्र का फायदा छीना नहीं जा सकता. हाईकोर्ट की जज जयश्री ठाकुर ने साफ किया कि इस बात का कोई सुबूत नहीं है कि फरियादी ने अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र गलत तरीके से हासिल किया था. दरअसल, एक मामले में फरियादी रतेज भारती ने अदालत को बताया था कि उस का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में साल 1967 में हुआ था. उस के पैदा होने के तुरंत बाद उस की मां की मौत हो गई थी. रतेज भारती जब 10 साल का था, तब उसे रामदासिया जाति के पतिपत्नी ने गोद ले लिया था. इस बाबत बाकायदा कानूनी गोदनामा तैयार कराया गया था.

साल 1992 में आरक्षित समुदाय के मांबाप की औलाद होने की बिना पर रतेज भारती ने आरक्षण का प्रमाणपत्र बनवाया था. 2 साल बाद ही उस ने इस प्रमाणपत्र की बिना पर सरकारी नौकरी भी हासिल कर ली थी.

लेकिन जनवरी, 2014 में सरकार ने यह कहते हुए रतेज भारती को नौकरी से निकाल दिया था कि चूंकि उस का गोद लिया जाना जायज नहीं है, इसलिए वह आरक्षित जाति के प्रमाणपत्र पर नौकरी करने का हकदार नहीं है.

रतेज भारती ने हिम्मत नहीं हारी और अदालत का दरवाजा खटखटाया. 2 दफा उस के जाति प्रमाणपत्र की जांच हुई और दोनों ही बार वह सही पाया गया. लिहाजा, हाईकोर्ट ने उस की नौकरी बहाली का हुक्म जारी कर दिया.

1. कोई गड़बड़झाला नहीं

 इस फैसले से एकसाथ कई अहम बातें उजागर हुईं कि आरक्षण गोद लिए गए बच्चे का हक है यानी दलित समुदाय के मांबाप ऊंची जाति वाले बच्चे को गोद लें, तो बच्चा ठीक वैसे ही आरक्षण का हकदार होता है, जैसे गोद लेने वाले मांबाप की जायदाद में वह हकदार हो जाता है और उसे दूसरे कई हक व जिम्मेदारियां भी मिल जाती हैं.

यह तो रतेज भारती के दलित मांबाप की दरियादिली थी कि जब उस अनाथ को कोई सहारा नहीं दे रहा था, तब उन्होंने उसे गोद ले कर उस की परवरिश की और पढ़ाईलिखाई की जिम्मेदारी उठाई यानी गोद लेते ही रतेज भारती ब्राह्मण से दलित हो गया.

संविधान बनाने वालों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आारक्षण से ताल्लुक रखते ऐसे मामले भी सामने आएंगे, इसलिए उन का ध्यान इस तरफ नहीं गया कि गोद लिए बच्चे की हालत पर भी गौर किया जाए, चाहे फिर वह सवर्ण मांबाप द्वारा गोद लिया गया दलित बच्चा हो या फिर दलित मांबाप द्वारा गोद लिया गया सवर्ण बच्चा.

इसी तरह संविधान में यह भी साफसाफ नहीं लिखा है कि अगर एक दलित नौजवान सवर्ण लड़की से शादी करता है, तो उन की औलाद को आरक्षण का फायदा मिलेगा या नहीं. इसी तरह कोई सवर्ण नौजवान दलित लड़की से शादी करता है, तो उस की औलाद को आरक्षण का फायदा मिलेगा या नहीं.

इस तरह के सैकड़ों मुकदमे देशभर की अदालतों में चल चुके हैं, जिन में से ज्यादातर में फैसला यह आया है कि अगर दलित और सवर्ण लड़का या लड़की शादी करते हैं, तो उन की औलाद को आरक्षण का फायदा मिलेगा. ऐसे मामलों में हालांकि अदालतों को भी फैसला लेना आसान काम नहीं होता, खासतौर से उस हालत में जब पिता सवर्ण और मां दलित हो. चूंकि बच्चे का नाम और जाति पिता से चलते हैं, इसलिए कुछ मामलों में अदालतों ने सवर्ण पिता की दलित पत्नी से हुई औलाद को आरक्षण देने में हिचकिचाहट भी दिखाई है.

यह तय है कि कानून मानता है कि बच्चे की परवरिश किस माहौल में हुई है. यह बात ज्यादा अहम है, बजाय इस के कि वह किस जाति में पैदा हुआ है.

अगर कोई ब्राह्मण या दूसरे सवर्ण मांबाप दलित बच्चे को गोद लेते हैं, तो उन की परवरिश का माहौल बदल जाता है और उसे जातिगत जोरजुल्म व उन परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ता, जिन से दलित बच्चे रूबरू होते हैं.

ऐसे मामले बहुत कम तादाद में अदालतों में जाते हैं, इसलिए थोड़ाबहुत बवाल उन पर सुनवाई और फैसले के वक्त मचता है, फिर सब भूल जाते हैं कि खामी क्या है और इस का हल क्या है.

2. शादी है जरूरी

दलितों और सवर्णों के बीच आरक्षण को ले कर हमेशा से ही बैर रहा है, पर बीते 4 सालों में यह उम्मीद से ज्यादा बढ़ा है, तो इस की एक वजह सियासी भी है, जिस के तहत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अकसर आरक्षण पर दोबारा सोचविचार की बात कहता रहता है. इस से दलितों व आदिवासियों को लगता है कि ऊंची जाति वालों की पार्टी भारतीय जनता पार्टी की सरकार उन से आरक्षण छीनना चाहती है.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में दलितों ने भाजपा को भी वोट दिए, तो ऐसा लगा कि बारबार की घुड़की के चलते दलित तबका डर गया है और भाजपा को चुनने की उस की एक वजह यह भी है कि वह उन के वोट ले ले, पर आरक्षण न छीने.

कांग्रेस भी यही बात कहती रही थी कि आरक्षण व्यवस्था को बनाए रखना है, तो उसे वोट दो. हालांकि इस बाबत उस का तरीका दूसरा था.

इन सियासी दांवपेंचों से परे एक अहम सामाजिक सच यह भी है कि अगर ऊंची और नीची जाति वाले आपस में शादी करने लगें, तो क्या हर्ज है. इस से या तो आरक्षण खत्म हो जाएगा या फिर हमेशा के लिए बना रहेगा, जिस का फायदा दोनों तबकों की नई नस्ल को मिलेगा. बजाय फिर से कोई आयोग बनाने के लिए सरकार यह फैसला ले ले कि ऊंची और नीची जाति वाले अगर आपस में शादी करें, तो उन की औलाद का आरक्षण सलामत रहेगा, तो देश की तसवीर बदल भी सकती है.

दूसरा फायदा इस से जातिवाद को खत्म करने का मिलेगा. जिस सामाजिक समरसता की बात भाजपा और संघ कर रहे हैं, वह असल में दलितों के साथ नहाने या उन के साथ बैठ कर खाना खाने से पूरी नहीं हो जाती. दूसरी जाति में बड़े पैमाने पर शादियां आपसी बैर खत्म कर सकती हैं यानी रोटी के साथसाथ बेटी के संबंध भी इन दोनों तबकों के बीच बनने चाहिए.

रोजमर्रा की जिंदगी के अलावा सोशल मीडिया पर ऊंची और नीची जाति वाले आरक्षण को ले कर एकदूसरे पर इलजाम लगाते रहते हैं और आरक्षण की समस्या के तरहतरह के हल भी सुझाते रहते हैं.

ऊंची जाति वालों का हमेशा से कहना रहा है कि नाकाबिल लोग सरकारी नौकरियों में घुस कर उन का हक मार रहे हैं, जबकि दलित समुदाय के लोग कहते हैं कि सदियों से उन पर जाति की बिना पर जुल्म ढाए जाते रहे हैं, क्योंकि वे धार्मिक और सामाजिक लिहाज से दलित और निचले हैं. अब अगर उन की तरक्की हो रही है, वे भी पढ़लिख कर सरकारी नौकरियों में आ कर अपनी दशा सुधार रहे हैं, तो हल्ला क्यों? यह तो उन का संवैधानिक हक है.

रतेज भारती दलित मांबाप के साथ खुश हैं. जातपांत का बंधन एक गोदनामे से टूटा, तो शादियों के जरीए वह बड़े पैमाने पर भी टूट सकता है. इस बाबत सोशल मीडिया पर बड़े दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण ढंग से ऐसे सुझाव दिए जा रहे हैं:

* अगर आरक्षण खत्म करना है या फिर उसे आर्थिक आधार पर लागू करना है, तो यह बहुत मामूली काम है.

* आरक्षण का फायदा ले कर जितने दलित बेहतर सामाजिक हालात में आ चुके हैं, उन का यज्ञोपवीत यानी जनेऊ संस्कार करा कर उन्हें ब्राह्मण जाति में शामिल कर लिया जाए. इस से वे आरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगे.

* फिर उतनी ही तादाद में गरीब ब्राह्मणबनिए, जो आरक्षण का फायदा लेना चाहते हैं, दलितों में अपने बेटेबेटियों की शादी करें, उन के साथ खाना खाएं, उन के साथ रोटीबेटी का रिश्ता बना कर दलित हो जाएं और आरक्षण का फायदा लें. ऐसा लगातार हर साल होते रहना चाहिए.

* हर कोई आरक्षण चाहता है, तो आजादी के इतने सालों बाद भी चल रही जाति प्रथा का जहर भी तो ले.

* जिस माली आधार पर आरक्षण छीने जाने की वकालत हो रही है, उसे सामान्य जाति का ब्राह्मणबनिया होने का हक भी तो दीजिए, क्योंकि आरक्षण से बाहर होने के बाद तो वे सामान्य जाति में होने का हक तो रखते हैं.

* गरीब ब्राह्मण आरक्षण तो ले, पर जैसा कि धार्मिक किताबों में कहा गया है कि ब्रह्मा के मुंह से पैदा हुए थे, तो इंसाफ नहीं हुआ. दलित कलक्टर और आरक्षण छोड़ देने के बाद भी दलित हो, यह कौन सा इंसाफ हुआ?

* हर दलित ब्राह्मण हो कर आरक्षण के दायरे से बाहर आना चाहेगा. यह बात और है कि कोई भी सवर्ण जाति वाला नीची जाति वालों में महज आरक्षण के लिए बेटी की शादी नहीं करने वाला.

इन बातों पर गौर किया जाना चाहिए, जो देश और समाज से जातिवाद को खत्म करने में कारगर हो सकती हैं. ये सुझाव एक चुनौती भी हैं कि क्या ऊंची जाति वाले वाकई ऐसा चाहते हैं या आरक्षण खत्म कर फिर से नीची जाति वालों को दबाए रखने के लिए उन पर पहले की तरह जुल्म ढाते रहेंगे?

इस स्कूल में लगती है ‘डीएम अंकल’ की पाठशाला

पटना के बांकीपुर स्कूल की लड़कियां सुबह से जोश में थीं और बारबार उन की निगाहें दरवाजे की ओर उठ जाती थीं. दोपहर के सवा एक बजे एक शख्स क्लासरूम में दाखिल हुए, जो किसी भी तरह से स्कूल के मास्टर नहीं लग रहे थे. दरअसल, वे शख्स थे पटना के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट संजय कुमार अग्रवाल. उन्होंने एक छात्रा खुशबू कुमारी की कौपी उठा कर पढ़ाईलिखाई के बारे में पूछा, तो उस ने कहा कि स्कूल में पढ़ाई नहीं होती है. डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट संजय कुमार अग्रवाल ने जब इस बारे में स्कूल प्रशासन से पूछा, तो पता चला कि वहां पर भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, भूगोल, हिंदी, उर्दू, टाइपिंग और संगीत के टीचर ही नहीं हैं. जब उन्होंने छात्राओं से पूछा कि वे कोचिंग क्यों जाती हैं, तो मासूम बच्चियों ने यह कह कर एक झटके में ऐजूकेशन सिस्टम की कलई खोल दी कि स्कूल में तो पढ़ाई होती ही नहीं है. सभी छात्राओं का यही दर्द था कि अगर वे कोचिंग नहीं करेंगी, तो कोर्स पूरा नहीं होगा.

बिहार की शिक्षा व्यवस्था से रूबरू होने के लिए पटना के कलक्टर संजय कुमार अग्रवाल 27 जनवरी, 2017 को एक सरकारी स्कूल में छात्राओं को पढ़ाने पहुंचे. उन्होंने पटना के तमाम सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के लिए अफसरों की एक टीम बनाई है.

शिक्षा विभाग के सूत्र बताते हैं कि अफसर अपना काम तो ठीक से करते नहीं हैं, ऐक्स्ट्रा काम वे क्या खाक करेंगे. मास्टरों का काम अफसरों से करा कर एजूकेशन सिस्टम को ठीक करने की बात सोचना खुली आंखों से सपना देखने की ही तरह है. सरकारी स्कूलों की बदहाली के लिए अफसरशाही ही जिम्मेदार है.

कुछ भी हो, सरकारी स्कूलों को दुरुस्त करने के लिए पटना के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट संजय कुमार अग्रवाल ने अनोखी पहल की है. उन्होंने 2 सौ अफसरों की एक टीम तैयार की है, जो हर हफ्ते स्कूलों में जा कर एक घंटे तक बच्चों के बीच गुजारेंगे और स्कूल की कमियों को दूर करने की कोशिश करेंगे. हर दिन अफसरों को सामान्य काम में रुकावट नहीं आए, इस के लिए रोस्टर तैयार किया गया है.

डीएम, एसडीएम, एडीएम, डीएसपी, बीडीओ, सीओ, थानेदार, सीडीपीओ और शिक्षा विभाग के तमाम बड़े अफसरों को सरकारी स्कूलों में हो रही पढ़ाई की क्वालिटी को सुधारने की मुहिम में लगाया गया है.

डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट संजय कुमार अग्रवाल ने बताया कि आमतौर पर जब कोई अफसर किसी स्कूल का दौरा करता है, तो उस के पहुंचने से पहले ही स्कूल प्रशासन वहां की तमाम व्यवस्था आननफानन दुरुस्त कर लेता है. अफसर के लौटने के बाद स्कूल की हालत फिर से बदतर हो जाती है. अब अफसर जब रोज स्कूल जाएंगे, तो वहां की हालत हमेशा दुरुस्त रहेगी. अफसर भी स्कूल की कमियों को दूर करने का काम करेंगे.

अफसर जिस किसी स्कूल में जाएंगे, वहां केवल बच्चों को किताबी या नैतिक बातें ही नहीं पढ़ाएंगे, बल्कि वहां की कमियों को भी देखेंगे और उन्हें दूर करने के उपाय करेंगे. हर अफसर स्कूल

के रजिस्टर पर अपनी हाजिरी भी लगाएगा. अफसरों के इस काम की मौनीटरिंग भी होगी.

डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट संजय कुमार अग्रवाल की पहल तो अच्छी है, पर वे अब अफसरों की मौनीटरिंग के ठोस इंतजाम करने की बात कर रहे हैं, तो मास्टरों की मौनीटरिंग के ठोस इंतजाम क्यों नहीं किए जा रहे हैं?

फीफा वर्ल्ड कप 2022 :धर्म के जाल में उलझा खूबसूरत खेल

इस बार का फीफा वर्ल्ड कप कतर देश में हुआ था और वहां की मेजबानी की हर जगह तारीफ भी हुई. हो भी क्यों न, यह फुटबाल वर्ल्ड कप अब तक का सब से महंगा खेल आयोजन जो था.

याद रहे कि कतर को साल 2010 में फुटबाल वर्ल्ड कप की मेजबानी मिली थी और तब से इस देश ने इस आयोजन को कामयाब बनाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया था. इस के लिए 6 नए स्टेडियम बनाए थे, जबकि 2 पुराने स्टेडियमों का कायाकल्प किया गया था. इस के अलावा दूसरे कामों पर भी जम कर पैसा खर्च किया गया था.

एक अंदाज के मुताबिक, कतर ने इस आयोजन पर कुल 222 अरब डौलर की भारीभरकम रकम खर्च की थी. इस से पहले का फुटबाल वर्ल्ड कप साल 2018 में रूस में कराया गया था, जिस पर कुल 11.6 अरब डौलर खर्च हुए थे.

कतर में हुए वर्ल्ड कप में दुनियाभर से आई 32 देशों की टीमें शामिल थीं और सभी चाहती थीं कि वे अपना बैस्ट खेल दिखाएं. जापान और मोरक्को ने तो सब को चौंकाया भी. जापान ने जरमनी को हराया था, तो मोरक्को कई दिग्गज टीमों को हराते हुए सैमीफाइनल मुकाबले तक जा पहुंची थी, जहां वह फ्रांस से हार गई थी. सऊदी अरब ने भी अर्जेंटीना पर जीत हासिल कर के बड़ा उलटफेर किया था.

पर इतने सारे रोमांच व खिलाडि़यों की कड़ी मेहनत के बावजूद फुटबाल वर्ल्ड कप के साथसाथ सोशल मीडिया पर एक अलग ही खेल चल रहा था, जिस पर धर्म का जाल कसा हुआ था. फीफा वर्ल्ड कप का आयोजन कराने को ले कर मिस्र के एक मौलाना यूनुस माखियान कतर पर ही बरस पड़े थे. उन्होंने अपने बयान में फुटबाल को समय की बरबादी बताते हुए लियोनेल मैसी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो जैसे खिलाडि़यों को इसलाम का दुश्मन (काफिर) कह दिया था. उन की राय थी कि फुटबाल पर खर्च करने के बजाय परमाणु बम बनाने में पैसा खर्च करना चाहिए था.

भारत के केरल में नौजवान फुटबाल के दीवाने हैं. लेकिन वहीं के समस्त केरल जाम अय्यातुल उलमा के तहत कुतुबा समिति के महासचिव नासर फैजी कूडाथायी ने अर्जेंटीना के लियोनेल मैसी, पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो और नेमार जूनियर जैसे पसंदीदा फुटबाल सितारों के बड़े कटआउट लगाने को गलत बताया और कहा कि उन्हें इस में बहुत ज्यादा पैसा खर्च करने वाले फुटबाल प्रशंसकों की चिंता है. केरल में पुर्तगाल के झंडे लहराना भी गलत है, क्योंकि उस ने कई देशों पर जबरन राज किया था.

इस के अलावा इस वर्ल्ड कप में मोरक्को की सनसनीखेज जीतों को धर्म और इसलाम से जोड़ा जाने लगा था. सोशल मीडिया पर ऐसा माहौल बनाया जा रहा था मानो मोरक्को देश की शानदार टीम फुटबाल नहीं खेल रही थी, बल्कि धर्म का प्रचार कर रही थी. उस की हर जीत पर अल्लाह का रहम था और वह फुटबाल के मैदान पर नहीं, बल्कि किसी जंग के मैदान पर उतरी थी, जो पूरी दुनिया में इसलाम की जयजयकार करवाने को बेताब थी.

इस धार्मिक एंगल को ऐसे समझते हैं. इस टूर्नामैंट में मोरक्को ने जैसे क्रिस्टियानो रोनाल्डो की टीम पुर्तगाल को हराया, तो इस के बाद इंटरनैट पर मोरक्को की जीत के चर्चे तो हुए ही, इसे ‘इसलाम की जीत’ बताया जाने लगा, जबकि खेल एक ऐसी चीज है जो देशों, धर्मों और समुदायों के बीच की सीमा को मिटा देता है.

पर मोरक्को के सैमीफाइनल मुकाबले में पहुंचने के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और पाकिस्तान क्रिकेट टीम के कप्तान रह चुके इमरान खान ने लिखा, ‘पुर्तगाल पर जीत हासिल कर फुटबाल वर्ल्ड कप के सैमीफाइनल में पहुंचने के लिए मोरक्को को मुबारकबाद. यह पहली बार है, जब एक अरब, अफ्रीकी और मुसलिम टीम फीफा वर्ल्ड कप के सैमीफाइनल में पहुंची है. सैमीफाइनल और आगे की कामयाबी के लिए उन्हें शुभकामनाएं.’

इस बात में कोई दोराय नहीं है कि मोरक्को मुसलिम बहुल अफ्रीकी देश है, पर जिस तरह से इमरान खान ने इसे सियासी और धार्मिक रंग दिया, वह मामला गड़बड़ कर गया. और भी लोगों द्वारा इसे ‘देश की जीत’ से बढ़ कर ‘इसलाम की जीत’ कह कर मामला गरमाया गया. मिशिगन की वेन स्टेट यूनिवर्सिटी में कानून पढ़ाने वाले प्रोफैसर खालिद बिदुन ने कहा कि मोरक्को के खिलाडि़यों ने हर गोल और जीत के बाद इबादत में सिर झुकाया. यह दुनियाभर के 2 बिलियन मुसलमानों की जीत है.

जरमनी के फुटबाल खिलाड़ी रह चुके मेसुत ओजिल ने ट्वीट किया, ‘यह अफ्रीकी महाद्वीप और मुसलिम जगत के लिए बड़ी उपलब्धि है.’

एक यूजर ने लिखा कि मोरक्को की जीत से ‘फिलिस्तीन को गर्व है’. अब मोरक्को की जीत फिलिस्तीन के लिए गर्व की बात कैसे हो सकती है? क्या इस गर्व को इसलाम नाम की कड़ी जोड़ती है?

दरअसल, ‘अल जजीरा’ की रिपोर्ट के मुताबिक, फिलिस्तीन में भी मोरक्को की जीत का जश्न मनाया जा रहा था. यह जश्न सिर्फ घरों में बैठ कर तालियां बजाने तक सीमित नहीं था, बल्कि लोग सड़कों पर निकल रहे थे और ड्रम बजा कर, नारे लगा कर मोरक्को के लिए अपना समर्थन जाहिर कर रहे थे.

सवाल उठता है कि अगर यह इसलाम या धर्म की जीत थी, तो सैमीफाइनल मुकाबले में फ्रांस से हारने के बाद मोरक्को के प्रशंसक उग्र क्यों हो गए थे और वे टीम की हार को क्यों पचा नहीं पाए? उन्होंने फ्रांस की राजधानी पैरिस और बैल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में क्यों उत्पात मचाया? खुद एक इसलामिक देश कतर अपने तीनों ही मैच क्यों हार गया? ईरान और सऊदी अरब भी क्यों कोई कमाल नहीं दिखा पाए?

हकीकत तो यह है कि जब लोग खेल को धर्म के चश्मे से देखने लगते हैं, तो वे खिलाडि़यों की उस लगन और मेहनत को नकार देते हैं, जिसे सालों का पसीना बहाने के बाद हासिल किया जाता है. अगर मोरक्को फुटबाल टीम की बात करें, तो इस टूर्नामैंट में उस की एकता ही सब से ज्यादा असरदार रही है.

हैरत की बात तो यह है कि 26 सदस्यीय मोरक्को टीम में से सिर्फ 12 सदस्य इस देश में पैदा हुए थे, बाकी 14 सदस्य फ्रांस, स्पेन, बैल्जियम, इटली, नीदरलैंड्स और कनाडा जैसे देशों में पैदा हुए थे.

मोरक्को को इस मुकाम तक लाने के लिए टीम के कोच वालिद रेगरागुई के रोल को भी नहीं नकारा जा सकता है, जिन्होंने चंद महीनों में ही टीम को नए रंग में रंग दिया. उन्हें साल 2022 के अगस्त महीने में टीम का कोच बनाया गया था.

इस के अलावा साल 1999 से मोरक्को पर राज कर रहे किंग मोहम्मद 6 का भी इस देश की फुटबाल टीम के विकास में खास रोल रहा है. उन्होंने इस देश में फुटबाल अकादमी बनाने के लिए पैसे से मदद की. इस का नतीजा यह हुआ कि ऐसे खिलाड़ी उभर कर सामने आए, जो मोरक्को की प्रोफैशनल लीग (बोटोला) के साथसाथ अपने देश और विदेशी लीगों में भी नाम कमा रहे हैं.

सच तो यह है कि मोरक्को की टीम ने चौथे नंबर पर रह कर भी फुटबाल की दुनिया में नाम कमाया है और यह सब खिलाडि़यों, कोच और प्रशासन की मिलीजुली और कड़ी मेहनत का नतीजा है. 18 दिसंबर, 2022 को फ्रांस और अर्जेंटीना की टीमें इसलिए फाइनल मुकाबले में आमनेसामने थीं, क्योंकि उन्होंने पूरे टूर्नामैंट में उम्दा खेल दिखाया था. इस मुकाबले का दुनियाभर के लोगों ने लाइव देख कर मजा लिया, फिर चाहे वे किसी भी धर्म को मानने वाले थे.

दोनों में से एक टीम को जीतना था और ऐसा हुआ भी. एक बेहद रोमांचक मुकाबले में अर्जेंटीना ने फ्रांस को मात दी. फ्रांस ने 2 गोल से पिछड़ने के बाद मैच के आखिरी चंद मिनटों में जैसे 2 गोल किए, तो लगा कि पिछली बार के चैंपियन को हराना इतना आसान नहीं है. ऐक्स्ट्रा टाइम में दोनों टीमों ने 1-1 गोल और दागा, जिस से मुकाबला पैनल्टी शूटआउट में चला गया, जहां अर्जेंटीना के गोलकीपर एमिलियानो मार्टिनेज ने अपने शानदार क्षेत्ररक्षण से फ्रांस का लगातार 2 बार फीफा चैंपियन बनने का सपना तोड़ दिया.

लेकिन खेल में हारजीत तो होती रहती है, पर इसे मनोरंजन का साधन ही रहने दिया जाए तो बेहतर रहेगा. सोशल मीडिया पर खिलाडि़यों की जाति, धर्म, रंग वगैरह को बीच में ला कर जो लोगों के दिलों में नफरत की दीवार ऊंची करने के मनसूबे पल रहे हैं, उन पर रोकथाम की जरूरत है, ताकि दुनिया का सब से मशहूर खेल यों ही सब का मनोरंजन करता रहे.अर्जेंटीना को जीत की बधाई और फ्रांस को सांस रोक देने वाले इस महानतम फाइनल मुकाबले का हिस्सा बनने के लिए शुक्रिया.

सोशल मीडिया बना गु्स्सा निकालने का साधन

आजकल इंटरनैट का साधन आम आदमियों का अपना गुस्सा निकालने का सहज साधन बन गया है. दिल्ली, मुंबई एयरपोर्टों पर अब बहुत अधिक भीड़ होने लगी है और लोगों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वह वायदा खूब याद आ रहा है कि वे देश के रेलवे स्टेशनों के एयरपार्टों जैसा थानेदार क्या देंगे. लीग वह रहे हैं कि एयरपोर्टों और स्टेशनों में बराबर की भीड़, पीक ने निर्माण, बाहर गाडिय़ों की अफरातफरी, धक्कामुक्की बराबर है. स्टेशन तो एयरपोर्ट नहीं बन सके पर एयरपोर्ट भारतीय स्टेशन जरूर बन गए है.

नरेंद्र मोदी सरकार को बधाई.

आम हवाई चप्पल पहनने वाला हवार्ई यात्रा तो आज भी नहीं कर रहा पर हवाई चप्पल ही ऐसी मंहगी और फैशेनबेल हो गई है कि गोवा, चैन्नै, बंगलौर में कितने ही रबड़ की ब्राडेंट चप्पलें पहने भी दिख जाएंगे. वह वादा भी भी उन्होंने पूरा कर दिया.

सोयासिटों के लिए सुविधा के नाम पर कुछ स्टेशन ठीकठाक हुए है, वंदे मातरम नाम की कुछ ट्रेनें चली हैं पर आज अब किराए इतने बढ़ा दिए गए हैं कि एक  बार ट्रेन में जा कर 4 दिन खराब करना और 4 दिन की मजूरी खराब करना से हवाई यात्रा करना ज्यादा सस्ता है. रेलों के बढ़ते दाम, हवाई यात्रा के घटते दामों ने यह वादा भी पूरा कर लिया.

वैसे भी देश की जनता हमेशा वादों को सच होता ऐसे ही मानती रही जैसी वे मूॢत के आगे मन्नत को पूरी आगे मानते रहे हैं, 4 में से 1 काम तो हरेक का अपनी मर्जी का अपनेआप हो ही जाता है बीमार ठीक हो जाते हैं, देरसबेर छोटीमोटी नौकरी लग ही जाती है, लडक़ी को काला अनपढ़ा सा पति भी मिल जाता है, 10-20 साल बाद अपना मकान बन ही जाता है, 10 में से 2-3 के धंधे भी चल निकलते हैं और इन सब को मूॢत की दया समझ कर सिर झुकाने वाले, अंटी खाली करने वालों, चुनावी में से कुछ को भी सही होता देख कर वोट डाल ही आते हैं.

जहां तक हवाई यात्रा का सवाल है, यह देश के लिए जरूरी है, जैसे आज बिजली और उस से चलने वाली चीजें जैसे फ्रिज, कूलर, पंखा, बत्ती, एसी, टीवी मोबाइल, लैटपटौप आज हरेक के लिए जरूरी है, वैसे ही हवाई यात्रा हरेक के लिए जरूरी है. पहले जो शान हवाई यात्रा में रहती थी, जब टिकट आज के रुपए की कीमत के हिसाब से मंहगे थे, वह अब कहां. उस के रुपए की कीमत वे हिसाब से मंहगे थे, वह अब कहां. उस के लिए अमीरों ने प्राईवेट जेट रखने शुरू कर दिए है. नरेंद्र मोदी भी या तो 8000 करोड़ के प्राईवेट जेट में सफर करते हैं या 20-25 किलोमीटर की यात्रा हो तो हैलीकौप्टर में आतेजाते हैं. हवाई चप्पल पहनने वाली जनता इस शान की बात भूल जाए.

हवाई यात्रा जरूरी इसलिए है कि देश बहुत बड़ा है और लोग गांवों से शहरों की ओर जा रहे हैं. उन्हें जब भी गांव वापिस जाना होता है तो उन के पास 7-8 दिन रेल के सफर के नहीं होते. वे यह काम हवाई यात्रा से घंटों में कर सकते हैं.

दुनिया भर में हवाई यात्रा अब रेल यात्रा की तरह हो गई है. ट्रेनें और पानी के जहाज तो अब खास लोगों के लिए रह जाएंगी जिन में होटलों जैसी सुविधाए होंगी. लोग चलते या तैरते होटलों का मजा लेंगे और हवाई यात्रा बस काम के लिए करेंगे.

चलन: जाति के बंधन तोड़ रहा है प्यार

गांवकसबे हों या शहर, आज नौजवान पीढ़ी अपने मनचाहे साथी के लिए जाति, धर्म और दूसरे सामाजिक बंधन तोड़ रही है. जरूरत पड़ने पर ऐसे प्रेमी जोड़े घरपरिवार छोड़ कर भाग भी रहे हैं. जाति हो या धर्म हो या फिर रुतबा, सभी पारंपरिक बेडि़यों को तोड़ते हुए आज नौजवानों का प्यार परवान चढ़ रहा है.

19 साल के विकास और 16 साल की स्नेहा की दोस्ती 2 साल पहले स्कूल में शुरू हुई थी. स्नेहा बताती है, ‘‘हमारी पहली मुलाकात स्कूल के रास्ते में हुई थी. यह पहली नजर का प्यार नहीं था. शुरुआत दोस्ती से हुई थी, फिर नंबर ऐक्सचेंज हुए और हमारी बातें होने लगीं.

‘‘मैं ने विकास से 3 वादे कराए थे. पहला, ये मुझे अपने परिवार से मिलाएंगे. दूसरा, मुझ से शादी करेंगे और तीसरा, अपना कैरियर बनाएंगे,’’ यह बताती हुई स्नेहा का चेहरा सुर्ख हो गया.

एक तरफ इन का इश्क परवान चढ़ रहा था, वहीं दूसरी तरफ स्नेहा के मातापिता का पारा. उस के पिता ने उसे फोन पर विकास से बात करते हुए सुन लिया था. अगले ही पल स्नेहा का फोन तोड़ कर फेंका जा चुका था और वह पिटाई के बाद रोते हुए एक कोने में दुबक गई थी.

विकास को जब इस सब का पता चला, तो उस ने स्नेहा को कुछ औरदिन बरदाश्त करने की बात कही. उन दोनों को यकीन था कि वे जल्द ही शादी कर लेंगे.दिसंबर की सर्दियों में दोपहर के तकरीबन 2 बजे होंगे. विकास एक कंपनी में नाइट ड्यूटी के बाद घर वापस आया था. उस की मां उस के लिए खाना गरम कर रही थीं कि तभी स्नेहा अचानक उन के घर चली आई. कड़कड़ाती सर्दी में उस के शरीर पर सिर्फ एक ढीला टौप और जींस थी.स्नेहा ने विकास की बांह पकड़ कर रोते हुए कहा, ‘‘यहां से चलो, अभी चलो. मेरे घर वाले तुम्हें मार डालेंगे…’’ और विकास उस के साथ निकल गया.

विकास के माबाप को लगा कि वे आसपास ही कहीं जा रहे होंगे, इसलिए उन्होंने दोनों को रोकने की कोशिश भी नहीं की.विकास ने उस दिन के बारे में बताया, ‘‘हम पैदल चल कर जयपुर पहुंचे और वहां हम ने रात बसअड्डे पर बिताई. हम पूरी रात जागते रहे. फिर हम ने जयपुर के पास ही एक गांव में किराए पर छोटा सा कमरा ले लिया और साथ रहने लगे.’’

स्नेहा बताती है कि वे दोनों वहां खुश थे, लेकिन विकास के परिवार को धमकियां मिल रही थीं. उस के मातापिता ने थाने में उन के लापता होने की शिकायत दर्ज कराई थी और स्नेहा के मातापिता जयपुर महिला आयोग जा चुके थे, इसलिए विकास ने अपने घर में फोन कर के अपना ठिकाना बताया.

इस बीच मैडिकल रिपोर्ट भी आगई थी, जिस में विकास और स्नेहा के बीच जिस्मानी संबंध होने की बात कही गई थी.पुलिस ने विकास को पोक्सो ऐक्ट यानी प्रोटैक्शन औफ चिल्ड्रेन फ्रोम सैक्सुअल औफैंस और रेप के आरोप में जेल में डाल दिया. उस ने जेल में 6 महीने बिताए. वहां रोज स्नेहा को याद कर के वह रोता था.क्या इस दौरान उन दोनों का भरोसा नहीं डगमगाया? एकदूसरे के पलटने का डर नहीं लगा? विकास के मन में थोड़ा डर जरूर था, लेकिन स्नेहा ने न में सिर हिलाया. उस ने कहा, ‘‘मैं ने सब समय पर छोड़ दिया था.’’

मामला अदालत में पहुंचा. स्नेहा ने जज के सामने अपने परिवार के साथ जाने से साफ इनकार कर दिया. उस ने बताया, ‘‘मैं ने कोर्ट में सचसच बता दिया कि मैं इन्हें ले कर घर से निकली थी, ये मुझे नहीं. हम दोनों अपनी मरजी से साथ हैं. इस पूरे मामले में इन की कोई गलती नहीं है.’’

जज ने फैसला सुनाया, ‘‘दोनों याचिकाकर्ता अपनी मरजी से साथ हैं. यह भी नहीं कहा जा सकता कि लड़की समझदार नहीं है. लेकिन चूंकि अभी दोनों नाबालिग हैं, इन्हें साथ रहने की इजाजत नहीं दी जा सकती.’’

जज ने विकास पर लगे पोक्सो ऐक्ट और रेप के आरोपों को भी खारिज कर दिया.राजस्थान के कोटा जिले के 28 साल के मनराज गुर्जर ने पिछले साल 30 दिसंबर को बांरा जिले की सीमा शर्मा से शादी कर ली. शादी में दोनों के परिवार खुशीखुशी शामिल हुए. राजस्थान यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान दोनों में प्यार हुआ. मनराज राजस्थान पुलिस में सबइंस्पैक्टर हैं, तो सीमा स्कूल में टीचर. पर हर किसी की कहानी इन दोनों की तरह नहीं है. जयपुर की रहने वाली दलित समाज की पूनम बैरवा को ओबीसी समुदाय के सचिन से शादी के लिए न सिर्फ सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा, बल्कि उन के परिवार ने भी उन से नाता तोड़ लिया. ऐसा भी नहीं है कि यह हौसला बड़े शहरों की ओर रुख करने वाले ज्यादा पढ़ेलिखे नौजवानों में ही देखा जा रहा है, छोटे कसबों की कहानी तो और भी हैरानी भरी है.

अलवर जिले के तिजारा थाना इलाके के एक गांव की बलाई (वर्मा) जाति की खुशबू ने घर से भाग कर यादव जाति के किशन के साथ शादी रचा ली. जयपुर के महिला एवं बाल विकास संस्थान की सहायक निदेशक तारा बेनीवाल बताती हैं, ‘‘पिछले 2 साल में जयपुर में तकरीबन 30 लड़कियों ने अंतर्जातीय विवाह प्रोत्साहन राशि के लिए आवेदन किया है.’’ अजमेर के सरवाड़ इलाके के विजय कुमार ने जब सुनीता से अंतर्जातीय शादी की, तो उन्हें न केवल परिवार से अलग होना पड़ा, बल्कि पानी, बिजली और शौचालय जैसी सुविधाओं से भी वंचित कर दिया गया. समाज ने उन का बहिष्कार कर दिया. इस दर्द को विजय कुमार कुछ यों बयान करते हैं, ‘‘लोग कहते हैं कि मैं आवारा निकल गया, बिरादरी की नाक कटा दी. आखिरी समय तक शादी तोड़ने की कोशिश की गई.’’ यहां तक कि बेटियों की आजादी पर भी बंदिश लगाई जाती है. 26 सितंबर, 2020 को अंतर्जातीय शादी करने वाली ज्योति बताती हैं, ‘‘मेरे परिवार वाले समाज के तानों से दुखी हैं. लोग कहते हैं कि बेटी को ज्यादा छूट देने की वजह से उस ने नीच जाति के लड़के से शादी कर ली. मांबाबूजी को तो यह भी फिक्र है कि दूसरे बेटेबेटियों की शादी कैसे होगी?’’

विजय कुमार अपने प्यार का राज खोलते हैं, ‘‘हम दोनों का संपर्क मोबाइल फोन के जरीए हुआ और उसी के जरीए परवान भी चढ़ा.’’जाहिर है कि मोबाइल और दूसरी तकनीकों और पढ़ाईलिखाई ने दूरियां मिटा दी हैं. जयपुर के महारानी कालेज में इतिहास की प्रोफैसर नेहा वर्मा इसी ओर इशारा करती हैं, ‘‘मर्दऔरत के बीच समाज ने जो अलगाव गढ़े थे, वे खत्म हो रहे हैं. दोनों के बीच आपसी मेल बढ़ा है, खासकर औरतें घर की दहलीज लांघ रही हैं.’’ अंतर्जातीय प्यार या शादी करने वालों को थोड़ीबहुत रियायत तो मिल भी जाती है, लेकिन अंतर्धार्मिक रिश्तों के लिए परिवार और समाज कतई तैयार नहीं होता.

अजमेर जिले के किशनगढ़ की 20 साला सकीना बानो ने जब घर से भाग कर 22 साल के अमित जाट से शादी की, तो उन्हें न केवल सामाजिक बुराई सहनी पड़ी, बल्कि उन के परिवार वालों ने अमित और उस की मां को जान से मारने और घर जलाने की धमकी तक दी.

मजबूरन उन्हें आत्मसमर्पण करना पड़ा और सकीना को पुनर्वास केंद्र भेज दिया गया. लेकिन अब अदालत के आदेश के बाद नवंबर, 2020 से दोनों पतिपत्नी की तरह रह रहे हैं. सकीना अब एक बेटे की मां बन गई है. उस के पिता अब बेहद बीमार हैं, पर बेटी से मिलना तक नहीं चाहते. अमित की मां भी सकीना को ले कर सहज नहीं हैं वहीं टोंक जिले की ही मनीषा की कहानी लव जिहाद की थ्योरी गढ़ने वाले संघी समूहों के मुंह पर करारा तमाचा है. 16 अप्रैल, 2022 को वह अपने प्रेमी मोहम्मद इकबाल के साथ घर से भाग गई.

भला समाज और परिवार को यह कैसे मंजूर होता. मनीषा के पिता जयनारायण ने इकबाल और उस के पिता हसन के खिलाफ अपहरण की प्राथमिकी दर्ज कराई. इस से बचने के लिए मनीषा और इकबाल ने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. समाज और परिवार का अडि़यल रुख ही है कि ऐसे ज्यादातर प्रेमी जोड़ों को प्यार या शादी के लिए घर से भागना पड़ रहा है. लेकिन वे उन से पीछा नहीं छुड़ा पाते, क्योंकि परिवार वाले उन के खिलाफ अपहरण और बहलाफुसला कर शादी करने का मामला दर्ज करा देते हैं. लेकिन इस से नौजवानों को कोई फर्क नहीं पड़ रहा.

इस सिलसिले में राजस्थान पुलिस के आंकड़े चौंकाने वाले हैं. प्यार के मामलों में घर छोड़ कर भागने वाले नौजवानों की  तादाद में तकरीबन 6 गुना की बढ़ोतरी हुई है. पुलिस ने राज्य में अपहरण के दर्ज मामलों की जांच के बाद खुलासा किया है कि साल 2013 में जहां प्यार की खातिर घर से भागने वालों की तादाद सिर्फ 172 थी, वहीं साल 2021 में 763 हो गई और यह तादाद सिर्फ अपहरण के दर्ज मामलों की है.ब्राह्मण जाति की अंकिता और बहुत पिछड़ी जाति से आने वाले उन के पति के परिवारों में रिश्ते सामान्य होने में 3 साल लग गए. इस के लिए अंकिता के भाई ने ही पहल की. दोनों के 2 बच्चे भी हो गए हैं, तो वहीं कई लड़कियां पुनर्वास केंद्र में अपने प्रेमी से मिलने के इंतजार में दिन काट रही हैं. तमाम दुखों के बावजूद उन का हौसला नहीं टूटा है.

बेडि़यां तोड़ते इस प्यार को मनीषा के इस हौसले में देखा जा सकता है, ‘‘हमारे रिश्ते को जाति और धर्म के बंधन में नहीं बांधा जा सकता. कोई भी मुश्किल हमें डिगा नहीं सकती.’’प्रोफैसर नेहा वर्मा कहती हैं, ‘‘समाज में जहां एक तरफ धर्म और जाति का राजनीतिकरण बढ़ा है, वहीं दूसरी तरफ इन में दरारें भी पैदा हो रही हैं. नौजवान उन को चुनौती भी दे रहे हैं. लिहाजा, बांटने वाली ताकतों की प्रतिक्रिया भी बढ़ी है. लव जिहाद का झूठा मिथक इस की मिसाल है.’’

ई मंडी किसानों के लिए दूर की कौड़ी

काफी तामझाम के साथ पिछले साल कुछ राज्यों में शुरू की गई ई मंडी फिलहाल किसानों से काफी दूर नजर आ रही है. ज्यादातर किसान इस में खास दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं. पिछले दिनों केंद्र सरकार ने माना है कि ई कृषि बाजार में किसानों की दिलचस्पी नहीं जग सकी है. इस में किसानों की दिलचस्पी बढ़ाने और ज्यादा किसानों को इस से जोड़ने के लिए योजना बनाने की दरकार है. अब ई मंडी को सहकारी बैंकों से जोड़ने की बात की जा रही है. जानकार बताते हैं कि किसानों को ई मंडी से जोड़ने के लिए सहकारी बैंकों को भी उस से जोड़ने की जरूरत है. गौरतलब है कि अधिकतर किसानों के खाते सहकारी बैंकों में ही हैं. ई मंडी किसानों और अनाज कारोबारियों के बीच जगह नहीं बना सकी है. कृषि विभाग का दावा है कि पिछले साल तक 10 राज्यों में 250 अनाज मंडियों को इलेक्ट्रोनिक सिस्टम से जोड़ा जा चुका है, जबकि हकीकत यह है कि 250 ई मंडियों में से केवल 100 ही काम कर रही हैं.

केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह का मानना है कि सभी राज्यों के कृषि विभागों को अपनेअपने राज्यों में ई मंडी को ले कर वर्कशाप आयोजित करने और किसानों को इस के बारे में जानकारी देने की जरूरत है. अभी किसानों के लिए यह मुश्किल और समझ के बाहर की चीज लग रही है, जिस वजह से किसान ई मंडी से कतरा रहे हैं. नकदी की किल्लत को दूर करने में ई मंडी की खासी भूमिका हो सकती है. औनलाइन भुगतान से किसानों और कारोबारियों को नकदी के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा.

किसान रामप्रवेश सिंह कहते हैं कि ई मंडी से जुड़ने पर बड़े किसानों और कारोबारियों को फायदा हो सकता है. कोई संगठन या समूह यदि इस से जोड़ा जाए तो उन्हें ई मंडी से ज्यादा फायदा हो सकता है. छोटे और मंझोले किसानों को खास फायदा नहीं है, इसलिए वे ई मंडी में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं.

गौरतलब है कि इलैक्ट्रानिक कृषि बाजार को पिछले 1 जुलाई को मंजूरी दी गई थी. किसानों, व्यापारियों, आयातकों, निर्यातकों को उस से जोड़ा गया है. सरकार का दावा है कि आनलाइन ट्रेडिंग होने से कृषि बाजार में पारदर्शिता आएगी. इस का सब से बड़ा मकसद किसानों को बिचौलियों से बचाना है. देश के 8 राज्यों में 21 कृषि मंडियों को इलेक्ट्रानिक मंडी का रूप दिया गया. इस के लिए राष्ट्रीय कृषि बाजार पोर्टल की शुरुआत की गई.

कृषि बाजार में बिचौलयों की गहरी पैठ है और वे किसानों के उत्पादों को काफी कम कीमत पर खेतों से ही उठा लेते हैं. किसान भी औनेपौने भाव में अपने उत्पादों को बेच देते है, क्योंकि उन्हें बाजार की जरा सी भी समझ नहीं है और न ही बाजार तक उन की पहुंच है.

गुजरात, तेलंगाना, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा में ई मंडी की शुरुआत की गई थी. उस के जरीए गेहूं, मक्का, ज्वार, चना, बाजरा, आलू, कपास समेत 25 फसलों को सूचीबद्ध किया गया है. 1 जुलाई 2018 तक 585 व्यापार बाजारों को ई मंडी से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है.

केंद्रीय कृषि मंत्री दावा करते हैं कि ई मंडी से किसानों को उन की उपज की बेहतर से बेहतर कीमत मिल सकेगी. किसानों को यह पता नहीं होता है कि उन के उत्पाद की बाजार में क्या कीमत है  किसानों के लिए किसी लाइसेंसधारी खरीदार के बारे में पता लगाना भी मुश्किल होता है. ई मंडी के जरीए किसान अपने घर बैठे ही अपने उत्पादों की कीमत और मांग का पता लगा सकेंगे.

सरकार ने काफी ई मंडियों का बुनियादी ढांचा तो तैयार कर लिया है, लेकिन किसानों की दिलचस्पी नहीं होने से वे सफेद हाथी बन कर रह गई हैं. कृषि विभाग का दावा है कि सितंबर 2016 तक करीब 47000 कारोबारियों, 26000 कमीशन एजेंटों और करीब डेढ़ लाख किसानों का ई मंडी में रजिस्ट्रेशन किया जा चुका है. इतना ही नहीं 14 राज्यों से 400 मंडियों को इलेक्ट्रोनिक सिस्टम से जोड़ने का प्रस्ताव केंद्रीय कृषि मंत्रालय को मिल चुका है. हर मंडी को विकसित करने पर 5 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं. मंडी के कारोबार को अपडेट करने के लिए 1 वाच टावर बनाया गया है और फसलों की कीमतों को दिखाने के लिए 5 एलईडी टीवी लगाए गए हैं.

किसान भले ही ई मंडी से कम जुड़ रहे हों, लेकिन सरकार इस बात के लिए अपनी पीठ थपथपा रही है कि पायलट परियोजना में ही करीब 450 करोड़ रुपए मूल्य के डेढ़ लाख टन कृषि उत्पादों का ई कारोबार हो चुका है. पायलट परियोजना में केवल 25 उत्पादों को कारोबार की मंजूरी दी गई थी, जो अब बढ़ कर 69 हो चुकी है. पहले चरण में मार्च 2018 तक 585 मंडियों के जोड़ने का लक्ष्य रखा गया था, पर मार्च 2017 तक ही 400 मंडियों के ई मंडी में तब्दील होने का अंदाजा है. कुछ पढ़े लिखे किसान ई मंडी की ओर कदम बढ़ाने लगे हैं. मंडी के सीजन में रोजाना काफी ज्यादा अनाज बिखर कर बरबाद हो जाता है.

किसान उमेश कुमार बताते हैं कि किसान मंडी में अनाज बेचने आते हैं, तो वहां तक लाने, बेचने के लिए जमीन पर रखने और उसे दोबारा पैक करने के दौरान काफी अनाज गिर कर बरबाद होता है. नीलामी के दौरान प्लेटफार्म से ले कर तोल स्टैंड तक किसानों की मेहनत से पैदा किया गया काफी अनाज बरबाद होता है. ई मंडी से किसानों के जुड़ने से उन की मेहनत की कमाई बरबाद नहीं होगी और उन की आमदनी में भी इजाफा हो सकेगा.

ई मंडी : एक नजर

 * ई मंडी एक साफ्टवेयर है, जिस में किसान अपने उत्पादों से संबंधित डाटा अपलोड कर सकते हैं.

* आनलाइन देश की विभिन्न मंडियों के उत्पादों की कीमत पता लगा सकेंगे.

* ई मंडी से जुड़ने के लिए किसानों को मंडी लाइसेंस लेना होगा, उस के बाद तमाम राज्यों की मंडियों में उत्पाद बेचने की छूट होगी.

* किसान किसी भी मंडी से अपनी फसलों का सौदा तय कर सकते हैं.

* इस से किसानों को बिचौलियों और कालाबाजारियों से छुटकारा मिल सकेगा.

* खरीदार फसलों की खरीद पर पैसा सीधे किसान या व्यापारी के बैंक एकाउंट में जमा करेंगे. मंडी शुल्क की राशि मंडी के एकाउंट में जमा करनी होगी.

किराएदार नहीं मकान मालिक बन कर जिएं, कोई धर्म कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा

जब कोई आदमी किसी के घर पर पैसे दे कर रहे तो वह उस का किराएदार कहलाता है. पर अमूमन ज्यादातर किराएदार किराए के मकान में कैसे रहते हैं, यह सब जानते हैं. उन्हें घर के रखरखाव से ज्यादा मतलब नहीं होता है.

दीपक की भी यही समस्या थी. उस का किराएदार नया शादीशुदा जोड़ा अपने में ही मगन रहता था. वे दोनों प्रेम के पंछी किराया तो समय पर देते थे, पर घर की साफसफाई पर कोई ध्यान नहीं देते थे.

एक दिन दीपक की मां छत पर कपड़े सुखाने आईं. छत की साफसफाई की जिम्मेदारी उस जोड़े की थी, क्योंकि वे पहली मंजिल पर रहते थे. पर मजाल है पिछले कई दिनों से बुहारी हुई हो. मां को गुस्सा आया और वे उस जोड़े से मिलने चली गईं. पर घर के भीतर तो और भी बुरा हाल था. पोंछे की तो छोड़िए, फर्श पर झाड़ू तक नहीं लगी थी. रसोईघर का कबाड़ा कर दिया था. दीवारों पर जाले लगे थे और बाथरूम देख कर तो वे धन्य हो गईं. नल टपक रहा था और दीवार पर सीलन के चलते पपड़ी जमा थी. शायद दीवार के भीतर पानी का कोई पाइप फट गया था, लेकिन उन्हें बताया जाना जरूरी नहीं समझा गया.

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यह हाल हर उस घर का है जहां किराएदारों ने मकान मालिक के सपनों के आंगन को नरक बना दिया है. नरक से याद आया धर्म का वह बेरहम एंगल जिस में उस के ठेकेदार धर्मभीरु जनता को यह समझाने में लगे रहते हैं कि यह शरीर और दुनिया तो किराए का घर हैं, अपना असली प्लौट तो यह दुनिया और शरीर छोड़ने के बाद मोक्ष के रूप में स्वर्ग में मिलेगा, जहां मनोरंजन के लिए अप्सराएं और देवता आप के लिए 24 घंटे हाजिर रहेंगे. और अगर कहीं कोई गड़बड़ की तो नरक भी मौजूद है, जहां आप की आत्मा को इतना सताया जाएगा कि वह अगली बार किराएदार बनने के लायक भी नहीं रहेगी.

दरअसल, स्वर्ग का लालच और नरक का डर धर्म के धंधेबाजों का वह अचूक पैतरा है जो गरीबअमीर, अनपढ़ और तालीमशुदा पर एकजैसा असर करता है. यह जो भय का भगवान है, उस ने इस दुनिया में धर्म की बेहिसाब मजबूत दुकानें खोल दी हैं और उस के ठेकेदार उन दुकानों के मालिक बन बैठे हैं जो पूजापाठ कराने के बहाने हमारे जीतेजी हमें ही स्वर्ग का टिकट बांटते हैं.

दरअसल, कोई भी इनसान पूजापाठ 2 वजह से करता है, डर या लालच. लेकिन थोड़ा सा दिमाग लगा कर समझें तो हर धर्म में यह बताया जाता है कि जब कोई मरता है तो उस की आत्मा, सोल या रूह शरीर छोड़ देती है और वही उस स्वर्ग, हैवन या जन्नत में जाती है जहां मोक्ष मिलता है. पर यह आत्मा है क्या और जब यह हमारे शरीर की नहीं हुई तो इस बात की क्या गारंटी है कि यह हमें मोक्ष दिलवा देगी?

हिंदू धर्मग्रंथों में लिखा है कि आत्मा न पानी में डूब सकती है न हवा से उड़ सकती है और न ही आग में जल सकती है. मतलब आत्मा पर किसी चीज का कोई असर नहीं होता. वह तो अमर है. तो फिर लोगों को स्वर्ग का लालच और नरक की डर क्यों दिखाया जाता है?

अगर कोई किराएदार ढंग से नहीं रहता है, घर की साफसफाई में कोताही बरतता है, तो मकान मालिक उसे नोटिस दे कर घर से निकाल देता है. पर धर्म के धंधेबाज इस का उलटा करते हैं. वे तो चाहते हैं कि आप हमेशा इस दुनिया में नकारा किराएदार बन कर रहें. न इस दुनिया की खूबसूरती को समझें और न अपने शरीर की ताकत को.

ऐसे शातिर लोग आप को उन चीजों में उलझाए रखना चाहते हैं जो आप के किसी काम की नहीं हैं, जैसे रोजगार करो या न करो पर दानी पक्के बनो. स्कूल बेशक न जाओ पर धर्मस्थलों की शोभा बनो. मंदिर, मसजिद और चर्च में भजनकीर्तन, नमाज, प्रार्थना को ही अपना सब से बड़ा सुख मानो.

इस प्रपंच में कामयाब होने लिए धर्म के ठेकेदार हमारे शरीर को सब से बड़ा हथियार बनाते हैं. वे ही इसे 4 ऐसे हिस्सों में बांट देते हैं, जो जातिवाद की जहरीली जड़ है. इस में रंगभेद का तड़का लगने से मामला और ज्यादा बिगड़ जाता है. उस के बाद धर्मभीरु लोगों का एक ही मकसद होता है कि चाहे शरीर से प्राण ही क्यों न छूट जाएं, पर धर्म का झंडा हवा में लहराता रहना चाहिए.

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जबकि सच तो यह है कि यह खूबसूरत दुनिया और हमारा निरोगी व कामकाजी शरीर ही सब से बड़ा मोक्ष है और हमें जीतेजी ही उस मोक्ष का मजा लेना है. क्या किसी किसान को खेत में पसीना बहाते हुए किसी भगवान की जरूरत पड़ती है? क्या कोई सेठ दुकान पर ग्राहकों से मोलभाव में चाहेगा कि कोई भगवान उस के काम में खलल डाले? कभी नहीं. कहने का मतलब यह है कि जब हम अपने काम में मगन होते हैं तो मोक्ष में होते हैं. हमें दीनदुनिया से कोई मतलब नहीं रहता है.

लेकिन यही बात धर्म के धंधेबाजों को खटकती है,लिहाजा वे लोगों को नकारा बनाए रखना चाहते हैं. उन्हें इस डर के साए में जीने को मजबूर करते हैं कि भगवान नहीं तो कुछ नहीं.

पर एक लाख टके का सवाल यह है कि वे खुद क्यों इसी दुनिया में रह कर ऐशोआराम से मौज काट रहे हैं? अपने धर्म के रहनुमाओं पर नजर दौड़ाइए. लाल चेहरा, सुर्ख गाल, आलीशन महल जैसे आशियाने, सरकार से मिलने वाली चाकचौबंद सिक्योरिटी, पैरों में गिरते हमआप जैसों के सिर… उन की क्या मति मारी गई है जो इस दुनिया को छोड़ कर किसी अनदेखे स्वर्ग का टिकट कटाएंगे. याद रखिए, जिस दिन इनसान ने अमर होने का फार्मूला खोज लिया, तो उसे पाने की कतार में इन्हीं पाखंडियों का पहला नंबर होगा.

होना तो यह चाहिए कि आम जनता इन शातिरों के धार्मिक प्रपंचों से बाहर निकले और अपने शरीर को सेहतमंद और काम करने लायक बनाए. अपनी मेहनत को कुदरत की नेमत समझे, इसलिए खुद को इस दुनिया में बेगैरत किराएदार न बनने दें, बल्कि एक होशियार मकान मालिक की तरह इसे अपनी जायदाद समझ कर सजाएंसंवारें. फिर किसी भगवान और उस के एजेंट की जरूरत नहीं पड़ेगी, यह गारंटी है.

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