पौरुष की कमी से जूझती युवा पीढ़ी

आरती को शिकायत है कि शादी के 8 सालों के भीतर ही उस की वैवाहिक जिंदगी का सारा चार्म खत्म हो गया है. उस के पति अनुराग को अब शायद उस में कोई दिलचस्पी ही नहीं रह गई है. वह देर रात औफिस से आता है, खाना खाता है और सोने चला जाता है. आरती ने अपनी शादीशुदा जिंदगी में रोमांस पैदा करने के लिए सारे जतन कर के देख लिए. पति को रिझाने के लिए वह शाम से ही बनावशृंगार में जुट जाती. पति की पसंद का भोजन बनाती है. बैडरूम को सुसज्जित करती है. खुद भी सुगंध में डूबी रहती है, तो हलकी सुगंध वाले रूम फ्रैशनर से पूरा घर भी महकाए रखती है. मगर पति की नजदीकियां पाने की उस की सारी कोशिशें बेकार चली जाती हैं.

अनुराग थकाहारा सा दफ्तर से आता है और एक उड़ती सी नजर आरती पर डाल कर अपने काम में व्यस्त हो जाता है. थोड़ी देर अपने 5 साल के बेटे राहुल से खेलता है और फिर खाना खा कर सोने चला जाता है. अब तो आरती को शक होने लगा है कि शायद उस के वैवाहिक जीवन में कोई दूसरी औरत आग लगा रही है. अनुराग का यह व्यवहार उस से अब बरदाश्त नहीं हो रहा है. प्यार और सैक्स के अभाव में दोनों के बीच दूरियां बढ़ गई हैं. कितने दिन हो जाते हैं अनुराग उसे हाथ भी नहीं लगाता. एक कमरे में एक ही बिस्तर पर दोनों अजनबियों की तरह पड़े रहते हैं.

यह समस्या सिर्फ आरती और अनुराग की नहीं, बल्कि हर 10 में से 3 कपल की है. पत्नी समझ ही नहीं पाती कि उस का पति उस से बेरुखी क्यों दिखा रहा है? वह उस से कटाकटा सा क्यों रहने लगा है? वह यह शक भी पाल बैठती है कि हो सकता है इन का कोई ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर चल रहा है. यह सोच पत्नियों  को और ज्यादा तनाव से भर देती है. कुछ पत्नियां सोचती हैं कि शायद उन का रंगरूप पहले की तरह मोहक नहीं रहा. वे सजतीसंवरती हैं कि पति को लुभा सकें. तरहतरह के व्यंजन बनाती हैं कि पति का प्यार पा सकें, मगर पति का दिल फिर भी नहीं पसीजता.

दरअसल, पत्नी के प्रति पति की बेरुखी का कारण हमेशा वह नहीं होता जो पत्नियां सोचसोच कर परेशान होती रहती हैं, बल्कि प्रौब्लम कुछ और होती है. पति की बेरुखी का कारण उन में पौरुष हारमोन की कमी हो सकती है, जिस के चलते पति शारीरिक संबंधों से दूरी बनाने लगते हैं, क्योंकि उन्हें यह डर होता है कि बिस्तर पर वे पत्नी को संतुष्ट नहीं कर पाएंगे. उन पर नामर्दगी का आरोप लगेगा. वे पत्नी की नजरों में गिर जाएंगे. अगर पत्नी को पता चल गया कि वे उसे संतुष्ट करने में अक्षम हैं तो वह किसी दूसरे पुरुष का साथ ढूंढ़ेगी और चोरीछिपे अपनी शारीरिक जरूरत पूरी करने लगेगी. ये तमाम डर पुरुष मन पर हावी हो जाते हैं और पति खामोशी ओढ़ कर पत्नी से दूरी बना लेता है और पत्नी को उस की उधेड़बुन में फंसे रहने देता है. अब पत्नी से कैसे कहे कि वह उसे बिस्तर पर संतुष्टि देने लायक नहीं रहा.

खामोशी है खतरनाक

जीवनसाथी को अपनी कमी को न बता पाने की विवशता अपराधबोध भी पैदा करती है, फिर भी आशंका और बदनामी के भय से मुंह सिले रहते हैं और दांपत्य में दूरियां और गलतफहमियां पैदा होने देते हैं.
पति द्वारा अपनी शारीरिक समस्या पर खामोशी ओढ़े रहना दंपतियों के बीच न सिर्फ दूरी बढ़ा रहा है, बल्कि कहींकहीं तो नौबत तलाक तक जा पहुंची है. पौरुष की कमी की वजह से पुरुष न सिर्फ सैक्स से दूर हो रहे हैं, बल्कि नामर्दगी के डर से उत्पन्न तनाव के कारण कई प्रकार की बीमारियां भी उन में पनप रही हैं.

हाल ही में दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल की एक रिसर्च में यह बात सामने आई है कि 60% मर्द जवानी में ही अपनी मर्दानगी खोने के कगार पर हैं. देश में  40 साल की उम्र तक पहुंचने वाला हर तीसरा पुरुष सैक्सुअल हारमोन की कमी से जूझ रहा है यानी हर तीसरा व्यक्ति टेस्टोस्टेरौन डैफिसिएंसी सिंड्रोम यानी टीडीएस से पीडि़त है. अस्पताल के 745 लोगों पर किए शोध में इस बात के खुलासे से मैडिकल जगत में हलचल मची हुई है.

डाक्टरों का मानना है कि यह परेशानी लगातार बढ़ रही है. अस्पताल ने टीडीएस का पता लगाने के लिए पहले बिना जांच किए सिर्फ लक्षण के आधार पर इस का पता लगाया. इस के लिए शोध में शामिल युवाओं से 10 सवाल पूछे गए. डाक्टर ने बताया कि सैक्स के प्रति रुचि यानी कामेच्छा, क्षमता यानी स्टैमिना और स्ट्रैंथ में कमी जैसे 3 लक्षणों के आधार पर 48.18% लोगों में टेस्टोस्टेरौन हारमोन कम पाया गया. लेकिन जब इन सभी का बायोकैमिकल टैस्ट किया गया तो आंकड़ा बढ़ कर 60.17% हो गया.

टीडीएस का खतरा

सर गंगाराम अस्पताल के यूरोलौजी विभाग के चेयरमैन डाक्टर सुधीर चड्ढा कहते हैं कि इस स्टडी से यह साफ हो रहा है कि हमारी आबादी में हर तीसरा इंसान सैक्स हारमोन की कमी से पीडि़त है. लोग डायबिटीज, हाइपरटैंशन, विटामिन डी की कमी, हार्ट डिजीज जैसे बीमारियों से पीडि़त होते हैं तो उन में टीडीएस यानी टेस्टोस्टेरौन की कमी का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.

टेस्टोस्टेरौन हारमोन पुरुषों में यौन क्षमता बनाए रखने वाला महत्त्वपूर्ण हारमोन है. किसी पुरुष में इस की कमी से सैक्स से जुड़ी परेशानियां पैदा होने लगती हैं. 40 साल की उम्र के बाद टेस्टोस्टेरौन में हर साल 0.4 से 2.6 फीसदी की कमी होने लगती है. भारत में 40 साल से अधिक उम्र का हर तीसरा व्यक्ति सैक्सुअल हारमोन की कमी से जूझ रहा है, जिस के चलते पत्नी से शारीरिक संबंध बनाने से बचने के कारण उन के वैवाहिक जीवन में असंतुष्टि, शक, कड़वाहट, तनाव और दूरियां बढ़ रही हैं. 40 साल से अधिक उम्र के वे लोग जो डायबिटीज, हार्ट डिजीज, बीपी, विटामिन डी की कमी से जूझ रहे हैं, उन्हें हर साल टीडीएस की जांच जरूर करवानी चाहिए. सैक्स संबंधों में अरुचि का मुख्य कारण तो यह है ही, तनाव, बीपी और हाइपरटैंशन का भी जनक है.

स्टडी में पाया गया कि जिन लोगों को डायबिटीज नहीं थी, उन में टीडीएस का स्तर 52.8% था और डायबिटीज वालों में यह 71.03% था. इसी प्रकार हाई बीपी के मरीजों में टीडीएस का खतरा 72.89% पाया गया और नौनबीपी वालों में यह केवल 54.86% था. कोरोनरी हार्ट डिजीज के 32 मरीज भी इस स्टडी में शामिल हुए थे. इन में से 27 यानी 84.30% में टीडीएस की बीमारी थी. डाक्टरों के मुताबिक, ऐसे लोग जिन की उम्र ज्यादा है और वे डायबिटीज, हार्ट डिजीज, बीपी, विटामिन डी की कमी से जूझ रहे हैं उन्हें हर साल टीडीएस की जांच करानी चाहिए.

क्या है टेस्टोस्टेरौन हारमोन

टेस्टोस्टेरौन हारमोन को पिट्यूटरी ग्रंथि और हाइपोथेलेमस नियंत्रित करते हैं. इस का स्रावण अंडकोष में होता है. सैक्स और शुक्राणुओं की संख्या के लिए यह हारमोन जिम्मेदार है. टेस्टोस्टेरौन हारमोन पुरुष में मर्दानगी के लक्षणों को पैदा करने वाला मुख्य कारक है. सरल भाषा में कहें तो युवावस्था में यह एक लड़के को मर्द बनाता है, जैसे चेहरे पर दाढ़ीमूंछ आना, सीने पर बाल आना, आवाज में भारीपन आना, जननांग का विकसित होना, शरीर का सुडौल होना, ताकतवर मांसपेशियां बनना सब इस हारमोन के कारण ही होता है. शारीरिक और मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य के लिए यह हारमोन पुरुषों के लिए जरूरी है. यह उम्र बढ़ने के साथ कम होने लगता है.

एक अनुमान के मुताबिक 30 से 40 की उम्र के बाद इस में हर साल 2 फीसदी की गिरावट आने लगती है. इस में क्रमिक गिरावट सेहत से जुड़ी कोई समस्या नहीं है, लेकिन जब कुछ खास बीमारियों, इलाज या चोटों के कारण यह सामान्य से कम हो जाता है, परेशानी तब शुरू होती है. अंडकोष में चोट, उस की सर्जरी, क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम और आनुवंशिकी गड़बड़ी से पिट्यूटरी ग्रंथि और हाइपोथैलेमस प्रभावित होता है, जिस से हाइपोगोनैडिज्म के हालात पैदा होते हैं.

इन्फैक्शन, लिवर और किडनी में बीमारी, शराब की लत, कीमोथेरैपी या रैडिएशन थेरैपी के कारण भी टेस्टोस्टेरौन हारमोन में कमी आती है. टेस्टोस्टेरौन की कमी वैवाहिक जीवन में कलह का कारण बनती है. इस हारमोन की कमी के चलते पति चाह कर भी पत्नी को शारीरिक सुख नहीं दे पाता.
सोशल टैबू ने जकड़ रखा है भारत में सामाजिक बंधन और शर्मिंदगी की वजह से पुरुष न तो अपनी इस कमी को उजागर करते हैं और न ही इस के इलाज के लिए डाक्टर के पास जाते हैं. इस के विपरीत वे ताकत की दवाएं, झाड़फूंक, योगा या आयुर्वेद जैसी चीजों का सहारा लेने लगते हैं, जो उन की परेशानी को और ज्यादा बढ़ा देते हैं. टेस्टोस्टेरौन की कमी एक प्रकार की बीमारी है, जिस का इलाज ऐलोपैथी में संभव है. औरतों की तरह पुरुषों में भी सैक्स हारमोन रीप्लेसमैंट संभव है. बस जरूरत है सोशल टैबू को भूल कर डाक्टर के पास जाने की.

पत्नी को विश्वास में लें

आप की जीवनसाथी को आप के जीवन पर पूरा अधिकार है. उस से अपनी बीमारी, अपनी कमी, अपनी गलतियां न छिपाएं. उसे विश्वास में लें. उसे बताएं कि आप किस तरह की समस्या का सामना कर रहे हैं. यदि आप ठीक तरीके से अपनी समस्या पत्नी को बताएंगे तो न सिर्फ आप का वैवाहिक जीवन तबाह होने से बचेगा, बल्कि आप के बीच बौंडिंग भी बढ़ेगी. इस के साथ ही जीवनसाथी का साथ और विश्वास पा कर आप में डाक्टर के पास जाने और इलाज करवाने की हिम्मत भी पैदा होगी.

जानें Pregnancy में कैसी हो सेक्स पोजीशन, पढ़ें खबर

प्रेगनेंसी के दौरान महिलाएं काफी सतर्क हो जाती हैं. कहीं गर्भस्थ शिशु को कोई हानि न पहुंचे, इस कारण वे पति से शारीरिक तौर पर भी हर संभव दूरी बनाए रखने की कोशिश करती हैं, मगर डाक्टरों के अनुसार गर्भावस्था में सेक्स किया जा सकता है.

हां, अगर प्रेगनेंट महिला की हालत नाजुक हो या फिर कोई कौंप्लिकेशन हो, तो शारीरिक संबंध नहीं बनाना चाहिए. लेकिन पत्नी से ज्यादा दिनों तक दूर रहना पति के लिए नामुमकिन हो जाता है, जिस के चलते रिश्तों में अलगाव होने की संभावना बढ़ जाती है. ऐसे में इस स्थिति को रोकने के लिए आइए जानते हैं कि गर्भावस्था में कैसे करें सेक्स:

गर्भावस्था के दौरान सेक्स के समय इन पोजीशंस के माध्यम से सुरक्षित सेक्स का आनंद भी लिया जा सकता है और इस से होने वाले बच्चे और मां को भी कोई तकलीफ न होगी.

पहली पोजीशन: पति और पत्नी एकदूसरे के सामने लेट जाएं. पत्नी अपना बायां पैर पति के शरीर पर रख दे. इस पोजीशन में सेक्स करने से गर्भ को झटके नहीं लगते.

दूसरी पोजीशन: पत्नी पीठ के बल टखने मोड़ कर अपनी टांगें पति के कंधों पर रखे, फिर सेक्स करें. इस से पेट पर कोई दबाव नहीं पड़ेगा.

तीसरी पोजीशन: पति कुरसी पर बैठे और पत्नी उस के ऊपर बैठ जाए. यह भी सेफ सेक्स में आता है.

कुछ व्यायामों के माध्यम से भी सेक्स किया जा सकता है, लेकिन इस के पहले डाक्टर से सलाह जरूर ले लें.

सावधानियां

  •  गर्भावस्था में सेक्स के दौरान पति को पत्नी का खास ध्यान रखना चाहिए. पति ज्यादा उत्तेजना में न आए और न ही पत्नी पर ज्यादा दबाव पड़े.
  •  गर्भावस्था में सेक्स करें, लेकिन किसी प्रकार का नया प्रयोग करने से बचें.
  •  सेक्स करते हुए ध्यान रहे कि पत्नी पर ज्यादा दबाव न पड़े.
  •  गर्भावस्था में प्रसव पीड़ा से पहले तक सेक्स किया जा सकता है, पर गर्भवती को इस से कोई तकलीफ  न हो तब.

गर्भावस्था में सेक्स के फायदे

प्रेगनेंसी के दौरान सेक्स मां और बच्चे दोनों की सेहत के लिए फायदेमंद होता है, आइए जानते हैं कैसे:

  •  गर्भावस्था में सेक्स करने से आप की पैल्विक मांसपेशियों में सिकुड़न बढ़ जाती है, जिस से वे प्रसव के लिए और मजबूत बनती हैं.
  •  प्रेगनेंसी के दौरान जल्दी पेशाब आना, हंसने या छींकने पर पानी निकलने आदि की समस्या आप के बच्चे के बड़े होने के कारण मूत्राशय पर पड़ने वाले दबाव की वजह से होती है. यह थोड़ा असुविधाजनक हो सकता है, लेकिन इस से आप की मांसपेशियां मजबूत होती हैं जो प्रसव के समय लाभ पहुंचाती हैं.
  •  सेक्स करने से महिला ज्यादा फिट रहती है. इस दौरान वह सिर्फ 30 मिनट में 50 कैलोरी कम कर सकती है जोकि उस की हैल्थ के लिए अच्छा है.
  •  गर्भावस्था में सेक्स करने से महिला की सहनशक्ति 78% बढ़ जाती है, जिस से प्रसव के समय उसे थोड़ा आराम महसूस होता है.
  • सेक्स के बाद रक्तचाप कम हो जाता है. अधिक रक्तचाप मां और बच्चे दोनों के लिए हानिकारक होता है, इसलिए बेहतर है कि ऐसी स्थिति में डाक्टर से सलाह लें.
  • औक्सीटोसिन हारमोन संभोग के समय शरीर से मुक्त होता है, जो तनाव को कम करने में उपयोगी होता है, जिस कारण अच्छी नींद आती है.
  •  शोधकर्ताओं का मानना है कि गर्भावस्था में सेक्स प्रीक्लेंपसिया से बचाता है. यह ऐसी स्थिति है, जिस में अचानक रक्तचाप बढ़ जाता है. ऐसा शुक्राणु में पाए जाने वाले प्रोटीन के कारण होता है जो इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है.

जब डाक्टर को कुछ जटिलताएं नजर आती हैं, तब वे सेक्स न करने की सलाह देते हैं. जटिलताएं कई प्रकार की हो सकती हैं, जैसे:

  • अगर पहले कभी गर्भपात हुआ हो तो.
  •  पहले कभी समय से पूर्व बच्चा जन्मा हो तो.
  •  किसी प्रकार का गर्भपात का जोखिम होने पर.
  • योनि से अधिक रक्तस्राव होने या तरल पदार्थ बहने की स्थिति में.
  •  एक से अधिक बच्चे होने पर.

अगर आप चाहती हैं कि आप की प्रैगनैंसी खुशहाल और सुरक्षित हो तो टोनेटोटकों जैसे गर्भ रक्षा कवच, गर्भ रक्षा हेतु चमत्कारी टोटके, पुत्र प्राप्ति के नुसखे आदि के चक्करों में उलझने से बचें, क्योंकि इस दौरान टोनेटोटके नहीं, बल्कि पतिपत्नी के बीच प्यार और अच्छे संबंध ज्यादा जरूरी हैं. इस दौरान अपने और अपने होने वाले बच्चे का पूरा ध्यान रखें. डाक्टर की सलाह पर चलें और संपूर्ण आहार लें, ताकि आप के शरीर को सभी पोषक तत्त्व पर्याप्त मात्रा में मिल सकें, जो आप के होने वाले बच्चे के विकास के लिए जरूरी हैं.

खाने की इन 4 चीजों से बढ़ सकता है स्पर्म काउंट, पढ़ें खबर

बिजी लाइफ और जिंदगी की भागदौर में खानपान में गड़बड़ी, अकसर हम लाइफ में स्वास्थ संबंधी समस्या से दो चार करा ही देती हैं. कुछ समस्या ऐसी भी होती है जो सेहत के साथ साथ आपको मानसिक रूप भी काफी कमजोर कर देती है. प्रजनन क्षमता प्रभावित होना इन्ही कुछ समस्याओं में से एक है. इसलिए आपका अपने खान-पान पर विशेष ध्‍यान रखना बहुत जरूरी है जिससे आपके स्‍पर्म काउंट बेहतर हो. स्‍वस्‍थ बच्‍चे के लिए महिला और पुरूष दोनों को अपनी डाइट में कुछ जरूरी कुछ ऐसे खाने को शामिल करने की आवश्‍यकता है. इसलिए आज हम आपके लिए लेकर आए है खाने के कुछ टिप्स जिसे अपनी डाइट में शामिल कर सकते है.

संतरा और टमाटर

विटामिन सी आपके अच्‍छे स्‍पर्म बनाने में मदद करता है. संतरा ऐसा फल है, जिसमें कि विटामिन सी की भरपूर मात्रा पाई जाती है इसलिए यदि आप बच्‍चे की प्‍लानिंग कर रहे हों, तो संतरे और अन्‍य खट्टे फलों का सेवन करें. इससे स्‍पर्म कांउट बढ़ाने में मदद मिलती है. इसके अलाव, आप टमाटर का सेवन भी कर सकते हैं, इसमें लाइकोपीन नामक एंजाइम मौजूद होता है. लाइकोपीन स्‍पर्म बढ़ाने और फर्टिलिटी बढ़ाने में सहायक होता है. अध्‍ययनों के मुताबिक, टमाटर के रस का नियमित सेवन करने से पुरुषों में बांझपन की समस्‍या को दूर करने के साथ स्‍पर्म काउंट को बढ़ाने में मदद मिलती है.

ब्रौकली

अधिकतर डाइटिंग और वजन कम करने का प्रयास करने वाले लोग ब्रौकली का सेवन करते हैं. लेकिन क्‍या आप जानते हैं ब्रौकली का सेवन कई बीमारियों को दूर करने में मदद करने के साथ गर्भवती महिलाओं और बच्‍चे की प्‍लानिंग कर रहे महिला व पुरूषों के लिए भी फायदेमंद माना जाता है. ब्रौकली में विटामिन बी1, बी2, बी3, बी6, विटामिन सी, विटामिन के, आयरन, मैग्‍नीशियम, जिंक जैसे कई पोषक तत्‍व पाये जाते हैं, जो त्‍वचा को स्‍वस्‍थ और इम्‍युनिटी पावर बढ़ाने में मदद करते हैं. इसमें मौजूद विटामिन सी और जिंक महिलाओं की प्रजनन क्षमता और पुरूषों में स्‍पर्म काउंट बढ़ाने में मददगार होते हैं.

कद्दू के बीज

जानकर हैरानी होगी लेकिन कद्दू के बीज प्रजनन क्षमता को बढ़ाने में मदद करते हैं. इसके लिए आप कद्दू के बीजों को कच्‍चा या फिर खाने के साथ मिलाकर खा सकते हैं. कद्दू के बीजों में  अमीनो एसिड और फाइटोस्‍टेरौल होता है, जो कि महिला और पुरूषों में प्रजनन क्षमता को बढ़ाने में सहायक है. अध्‍ययनों से पता चलता है कद्दू के बीजों का सेवन से शरीर में टेस्‍टोस्‍टेरोन, शुक्राणुओं की संख्‍या को बढ़ाया जा सकता है.

केला

केले स्‍वास्‍थ्‍य के लिए काफी हेल्‍दी माना जाता है. इसलिए बहुत से लोग रोलाना बनाना शेक बनाकर पीते हैं. यह आपके वजन को कम करने के साथ पाचन को बेहतर और भूख को शांत करने में मददगार है. इसमें ऐसे पोषक तत्‍व पाये जाते हैं, जो कि आपकी प्रजनन क्षमता को बढ़ाने में भी सहायक हैं. जी हां केले विटामिन बी6 की कमी को दूर कर स्‍पर्म बनाने में मददगार है. क्‍योंकि इस विटामिन की कमी से स्‍पर्म बनने में रूकावट आती है. इसके अलावा, इसमें ब्रोमिलेन एंजाइम भी स्‍पर्म बढ़ाने में मदद करता है. ऐसे में आप रोजाना बनाना शेक बनाकर या 1 या 2 केले का सेवन कर सकते हैं.

खान पान की ये चार चीजें आपके लिए फायदेमंद तो है लेकिन इसको इस्तेमाल करने से पहले अगर आप डाक्टर से सलाह लेंगे तो अच्छा होगा.

सेक्स में मर्द को भी होता है दर्द, जानें कैसे

आमतौर पर यह माना जाता है कि सेक्स के समय केवल लड़कियों को ही दर्द होता है. हकीकत यह है कि कई बार खुद लडकों को भी इस तरह के दर्द से दो चार होना पडता है. इसकी अलग अलग वजहे होती है. इनके कारण लडकें भी सेक्स से दूर होने लगते है.

लखनऊ में सेक्स रोगो के जानकार और मक्कड मेडिकल सेंटर राजेन्द्र नगर के सर्जन डाक्टर गिरीश मक्कड का मानना हैं कि आदमी के अंग में संक्रमण के कारण होने वाला सहवास पीडादायक हो जाता हैं. इसमें इतना दर्द होता है कि आदमी को सेक्स की अरूचि हो जाती है. यह दर्द कई कारणो से हो सकता है. जाने क्या है वो कारण-

अंग में दर्द का कारण:

आदमी के अंग में दर्द की पहली वजह उसके अगले हिस्से दर्द का होना होता है. कभी-कभी यह दर्द स्खलन के बाद होने लगता है. जिससे आदमी जल्द ही अपना अंग बाहर निकाल लेता है. इससे यौन असंतुष्टि का भाव भी मन में आ जाता है.

दर्द होने की आशंका में यौन संबंध ठीक तरह से नही बन पाते हैं. अंग के ऊपर मौजूद त्वचा उसकी देखभाल का काम करती है. यह त्वचा कभीकभी परेशानी का कारण भी बन जाती हैं त्वचा के अंदर अगर नियमित रूप से सफाई न की जाय तो यहां पर गंदगी फैलने लगती है. इससे अंग में पहले सूजन और छिलने बाद में सक्रंमण हो जाता है.

इसके चलते आदमी को संबंध के दौरान दर्द और जलन होने लगती है. अंग में दर्द तब भी होता है जब इसकी त्वचा पीछे नही जाती है. इससे भी दर्द होने लगता है. औरत के अंग में प्रवेश करने के कारण उसका संक्रमण भी आदमी के अंग में आ जाता है. जिससे उसकी त्वचा पर फफोले पड जाते है. जिन औरतो के अंग में संक्रमण होता है उनके साथ संबंध बनाने से यह परेशानी आ जाती है. आदमी के अंग में किसी प्रकार की चोट लगने और झटका लगने से भी दर्द होने लगता है

यह चोट लगने और शारीरिक संबंध बनाने के दौरान अचानक मुद्रा बदलने से भी हो सकता है. कभीकभी अंडकोषो में किसी तरह की खराबी आने के कारण भी दर्द होने लगता है. दरअसल यह दर्द अंडकोषो में होता है. इसका असर आदमी के अंग पर पडता है. यदि किसी वजह से मूत्र मार्ग में कोई रूकावट होती है तो अंग में दर्द होने लगता है. सूजाक जैसे रोगो में ऐसा हो जाता है. इसमें जलन दर्द और मूत्राशय तक पहुच जाता है. उम्र दराज लोगो में प्रोटेस्ट ग्रंथि का बढ जाना भी दर्द का कारण बन जाता है.

दर्द का इलाज:

डाक्टर गिरीश मक्कड़ का कहना है कि अंग में इस तरह के दर्द को लोग छिपा कर रखते है. शर्म के कारण किसी अच्छे डाक्टर को दिखाने के बजाये झोला छाप डाक्टरो के पास जाते है. यह लोग दर्द की छोटी सी वजह को इतना बड़ा करके बताते है जिससे बीमार डर जाता है. झोला छाप डाक्टरो के द्वारा इस का इलाज कभी कभी और भी ज्यादा खतरनाक हो जाता है इसलिये इस तरह की परेशानी होने पर अच्छे डाक्टर से ही इलाज कराये. अंग का दर्द भी एक तरह की बीमारी है. इसमें शर्म करने जैसा कुछ नही होता है. अच्छे डाक्टरो के पास इस तरह की बीमारी के लिये कई तरह का इलाज मौजूद होता है.

दर्द होने पर सबसे पहले मरीज के जननांगो और मूत्र प्रणाली से जुड़े अंगो की जांच की जाती है. अंग के ऊपर त्वचा, उसके आकार और प्रोस्टेट ग्रंथि का जायजा लिया जाता है. अगर त्वचा में कोई परेशानी या दाने है तो केवल साफ सफाई से ही बीमारी दूर हो जाती है. बहुत हुआ तो एक दो दिन दवा खानी पड सकती है. अपने आप भी अंगो की सफाई नियमित रूप से करनी चाहिये. अगर अंग की त्वचा जुडी हो या टांका लगा हो तो छोटा सा आपरेशन करके उसको हटाया जा सकता हैं. अगर औरत के अंग में संक्रमण से कोई परेशानी होती है तो पहले उसका इलाज करना पडता है. प्रोस्टेट ग्रंथि और अंडकोषो में दर्द कारण हो तो उसका इलाज करके परेशानी से बचा जा सकता है. साफसफाई और औरत से संबंध के दौरान कंडोम का प्रयोग करने से इस तरह की परेशानियो से बचा जा सकता है.

आदमी के अंगो में दर्द की वजह बहुत सामान्य सी बात है. इसमें डरने जैसा कुछ नही होता है. जरूरत इस बात की होती है कि जब भी परेशानी हो हमेशा अच्छे डाक्टर से ही इलाज कराये. अब तो तमाम सरकारी अस्पतालो और प्राइवेट नर्सिग होम में भी इस तरह का इलाज होने लगा है. गुप्त रोगो का इलाज करने वाले झोलाछाप डाक्टरों से इसका इलाज कराना ठीक नही रहता है. यह लोग सीधेसाधे इलाज को कठिन बना देते है. इससे बात और भी बिगड जाती है. इस तरह गुप्त रोगो को इलाज करने वाले झोलाझाप डाक्टर अपना प्रचार प्रसार ज्यादा करते है इससे लोग इनके जाल में फंस जाते है. शर्म छोड कर सही डाक्टर से इलाज कराने में आसानी से इस दर्द से राहत मिल सकती है.

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दैनिक आहार में कुछ महत्त्वपूर्ण खाद्यपदार्थ शामिल कर आप अपने उन खास पलों के रोमांच को किस तरह बढ़ा सकते हैं, जरूर जानिए:

सामन: सामन ओमेगा-3 फैटी ऐसिड डीएचए और ईपीए का एक ज्ञात प्राकृतिक स्रोत है. इस से मस्तिष्क में डोपामाइन स्तर बढ़ने में मदद मिलती है, जिस से उत्तेजना पैदा होती है. ओमेगा-3 डोपामाइन की उत्पादन क्षमता बढ़ाता है. यह मस्तिष्क के लिए एक महत्त्वपूर्ण रसायन है, जो व्यक्ति के चरमसुख की भावना को ट्रिगर करता है.

कद्दू के बीज: कद्दू के बीज जस्ता (जिंक) का एक बड़ा स्रोत हैं, जो टेस्टोस्टेरौन को बढ़ा देते हैं. इन में आवश्यक मोनोअनसैचुरेटेड वसा भी होती है, जिस से शरीर में कोलैस्ट्रौल बनता है. यौन हारमोन को ठीक से काम करने के लिए कोलैस्ट्रौल की जरूरत पड़ती है.

बैरीज: स्ट्राबैरी, ब्लैकबैरी, नीले जामुन ये सभी प्राकृतिक मूड बूस्टर हैं. स्ट्राबैरी में पर्याप्त विटामिन सी और बी होता है. ब्लैकबैरी और नीले जामुन फाइटोकैमिकल युक्त होते हैं, जो व्यक्ति के मूड को रामांटिक बनाते हैं.

केला: केला पोटैशियम का प्राकृतिक स्रोत है. पोटैशियम एक महत्त्वपूर्ण पोषक तत्त्व है, जो मांसपेशी संकुचन को बढ़ाता है और उन खास पलों में बहुत अहम होता है. साथ ही केला ब्रोमेलैन से समृद्ध होता है, जो टेस्टोस्टेरौन उत्पन्न करने के लिए जिम्मेदार होता है.

तरबूज: तरबूज में 92% पानी है, लेकिन बाकी 8% पोषक तत्त्वों से भरा होता है. तरबूज का शांत प्रभाव रक्तवाहिकाओं को शांत करता है. यह स्त्री और पुरुष दोनों के अंगों में रक्तप्रवाह सुधारता है.

लहसुन: रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल किए जाने वाला खास आहार लहसुन ऐलिकिन समृद्ध होता है, जो पुरुषों और महिलाओं दोनों के यौन अंगों में रक्तप्रवाह को बढ़ाता है. रात में शहद में भिगो कर रखा गया कच्चा लहसुन खाना लाभप्रद होता है.

केसर: केसर एक प्राकृतिक कामोद्दीपक है, जो स्त्रीपुरुष दोनों के लिए उन पलों का आनंद बढ़ाने में मददगार होता है. सब से महंगे मसालों में से एक माने जाने वाले केसर में क्रोकटोन नामक मिश्रण होता है, जो मस्तिष्क में उत्तेजना वाले हारमोन को ट्रिगर करते हुए इच्छा बढ़ाता है. केसर में पिको क्रोकिन रसायन होता है, जो स्पर्श के प्रति संवेदना बढ़ाता है.

लौंग: सदियों से पुरुष यौन रोग का इलाज करने के लिए हमारे देश में लौंग का उपयोग किया जाता है. यदि नियमितरूप से लौंग खाई जाए तो यौन गतिविधि में वृद्धि होती है. इस के अलावा लौंग सांस की गंध से छुटकारा दिलाने में भी मददगार है. लौंग के साथ जीरा एवं दालचीनी का सेवन और अधिक कामोद्दीपक है.

डार्क चौकलेट: डार्क चौकलेट ऐंटीऔक्सीडैंट से भरपूर होती है, जिस के चलते अधिक अनुभूति के लिए यह एक स्वादिष्ठ तरीका है. ऐंटीऔक्सीडैंट उम्र बढ़ने के संकेतों को कम करते हैं और यौन आनंद बढ़ाते हैं.

पालक: पालक जैसी पत्तेदार हरी सब्जियों में जबरदस्त फौलिक ऐसिड होते हैं, जो उर्वरता और कामेच्छा बढ़ाने में मदद करते हैं.

अंडे: अंडे उच्च स्तर के प्रोटीन से भरपूर होते हैं ये स्टैमिना का स्रोत हैं. इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आप इन्हें कैसे खाते हैं. इन का किसी भी तरह खाना ऊर्जा प्रदान करता है.

इस Valentines Day जानिए आखिर क्या है मेल पिल्स

मेल कौंट्रासैप्टिव पिल्स के अनुसंधान की शुरुआत हालांकि 7वें दशक के प्रारंभ में हो गई थी किंतु सफलता नहीं मिल पाने के पीछे वैज्ञानिकों की अपनी मजबूरी थी. इस की राह में पुरुषों के प्रजनन अंगों की रचना और फिजियोलौजी की जटिलताएं बारबार आड़े आती रहीं. महिलाओं में ओव्यूलेशन से ले कर फर्टिलाइजेशन और भू्रण को गर्भाशय के अंदर इंप्लांटेशन को रोक कर गर्भधारण को बाधित करना अपेक्षाकृत आसान है. पुरुषों के साथ ऐसी बात नहीं है.

महिला की एक ओवरी से पूरे महीने में मात्र एक ही अंडा निकलता है जिस को नियंत्रित करने में वैज्ञानिकों को विशेष परेशानी नहीं हुई. ओव्यूलेशन के लिए जिम्मेदार हार्मोंस की मात्रा को बाधित कर देने पर न तो अंडे का निर्माण संभव है और न ही ओव्यूलेशन. इसलिए फीमेल पिल्स की ईजाद में चिकित्सा वैज्ञानिकों को विशेष परेशानी नहीं हुई, लेकिन पुरुषों में न तो कभी वीर्य का निर्माण और न ही स्खलन बाधित होता है.

इतना ही नहीं, प्रत्येक स्खलन के दौरान वीर्य के प्रति मिलीलिटर में लगभग 100 मिलियन से भी अधिक शुक्राणु होते हैं. जहां तक प्रैग्नैंसी की बात है, इस के लिए मात्र एक ही शुक्राणु काफी होता है और वह शुक्राणु कोई भी हो सकता है. ऐसी स्थिति में, एकसाथ इतने शुक्राणुओं को नियंत्रित करना वैज्ञानिकों के लिए आसान बात नहीं थी, फिर भी इसी को आधार बना कर शुरुआती दिनों में गोसिपोल नामक गोली के निर्माण में वैज्ञानिकों को आंशिक सफलता मिली. लेकिन ऐसा देखा गया कि इस से शुक्राणुओं की संख्या में तेजी से कमी आती है और 10 फीसदी पुरुष स्थायी रूप से संतानोत्पत्ति में असमर्थ पाए गए. सो, इस के प्रयोग को तुरंत बंद कर दिया गया.

शुरुआती दौर में गोसिपोल का प्रयोग असफल साबित हुआ, किंतु इतना तो स्पष्ट हो गया कि मेल पिल्स के निर्माण में सैक्स हार्मोंस द्वारा ही सफलता मिल सकती है. अर्थात इस की विभिन्न मात्रा का प्रयोग कर ऐसी गोलियां बनाई जा सकती हैं जो शुक्राणुओं के निर्माण को न तो स्थायी रूप से बाधित करें और न ही प्रैग्नैंसी की संभावनाओं को स्थायी रूप से खत्म करें. इस के साथसाथ, वैज्ञानिकों ने इस बात को भी ध्यान में रखा कि मस्तिष्क में स्थित पिट्यूटरी ग्लैंड नामक विशेष ग्रंथि को भी नियंत्रण में रखा जाए तो शुक्राणुओं के निर्माण को नियंत्रण में रखा जा सकता है.

वैज्ञानिक इस बात पर ध्यान केंद्रित करने लगे कि शुक्राणुओं के निर्माण के लिए जिम्मेदार मस्तिष्क में स्थित पिट्यूटरी ग्लैंड द्वारा स्राव को बाधित कर दिया जाए तो बिना किसी साइड इफैक्ट या सैक्स की क्रियाशीलता को बाधित किए शुक्राणुओं की संख्या में कमी ला कर प्रैग्नैंसी को नियंत्रित किया जा सकता है. लेकिन अनुसंधान के क्रम में शीघ्र ही एक नए सैक्स हार्मोन टेस्टोस्टेरोन का पता चला जो अंडकोष से स्रावित होता है.

शोध से यह भी पता चला कि टेस्टोस्टेरोन नामक यह हार्मोन शुक्राणुओं के निर्माण से ले कर मैच्योर होने के लिए जिम्मेदार है. इतना ही नहीं, वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि यह पुरुषार्थ के साथसाथ मांसपेशियों के विकास तथा दाढ़ीमूंछ के निर्माण में भी महत्त्वपूर्ण भागीदारी निभाता है.

अब वैज्ञानिकों का सारा ध्यान इसी हार्मोन पर था. वे अपने अनुसंधान से यह पता लगाने में लग गए कि किस तरह इस हार्माेन के स्राव को नियंत्रित किया जाए. जैसेजैसे अनुसंधान आगे बढ़ता गया, इस रहस्य से परदा उठने लगा और शीघ्र ही पता चल गया कि शुक्राणुओं के निर्माण के लिए जिम्मेदार अंडकोष से स्रावित होने वाले टेस्टोस्टेरोन का तार पिट्यूटरी ग्लैंड से जुड़ा है.

इस दौरान यह भी पता चला कि जब इस की मात्रा रक्त में सामान्य से ज्यादा हो जाती है या फिर बाहर से इस का समावेश किया जाता है तो शुक्राणु का निर्माण पूरी तरह बाधित हो जाता है. लेकिन इस से कई दूसरे अवांछित साइड इफैक्ट भी देखने को मिलने लगे. चेहरे पर कीलमुंहासे, वजन में बढ़ोत्तरी के साथसाथ पौरुषग्रंथि में वृद्धि होने की शिकायतें आने लगीं.

इस के बाद वैज्ञानिकों ने एक दूसरा रास्ता निकाला. टेस्टोस्टेरोन के साथ एक दूसरा सैक्स हार्मोन प्रोजेस्टेरोन की एक निश्चित मात्रा मिला कर प्रयोग करने पर विचार किया गया. इस के पीछे वैज्ञानिकों का तर्क था कि यह हार्मोन पुरुष और महिला दोनों में रिप्रौडक्टिव हार्मोन सिस्टम के स्राव को कम कर देता है. ऐसा करने में वैज्ञानिकों को आशातीत सफलता मिली.

लंबे अनुसंधान के बाद यह तय हो गया है कि मेल पिल्स में प्रोजेस्टेरोन तथा टेस्टोस्टेरोन दोनों तरह के हार्मोन का मिश्रण जरूरी है. इस के साथ यह समस्या आने लगी कि प्रोजेस्टेरोन और टेस्टोस्टेरोन से निर्मित पिल्स के खाने के बाद आंत में जा कर पाचक रस और विभिन्न एंजाइम्स के प्रभाव से विच्छेदित हो जाता है, जिस से इस की क्रियाशीलता तथा प्रभाव दोनों कम हो जाते हैं. इसलिए शोधकर्ता अब इन दोनों हार्मोंस के मिश्रण को त्वचा में इंप्लांट करने के लिए इस के माइक्रो कैप्सूल तथा इंजैक्शन विकसित कर रहे हैं, ताकि टेस्टोस्टेरोन की क्रियाशीलता प्रभावित न हो. दुनिया के कई देशों में माइक्रो पिल्स, इंजैक्शन क्रीम, जैल आदि का निर्माण करने पर विचार किया गया.

परीक्षण अब अंतिम चरण में

पिल्स का परीक्षण दुनिया के कई देशों में अब अंतिम दौर में है. ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि वह दिन दूर नहीं जब महिलाओं की तरह पुरुष भी मैडिकल शौप से बर्थ कंट्रोल की गोलियां, क्रीम, जैल की शीशियां खरीदते, अस्पतालों में इस का इंजैक्शन लेते और परिवार नियोजन केंद्रों पर इस के सेवन के तरीकों पर चर्चा करते नजर आएंगे.

हाल ही में लगभग 1 हजार पुरुषों पर इस के इंजैक्शन का परीक्षण किया जा चुका है और 99 फीसदी कारगर भी साबित हुआ है. यह अस्थायी तौर पर रिप्रौडक्टिव हार्माेनल सिस्टम को या तो कम कर देता है या उसे पूरी तरह से रोक देता है. खास बात यह है कि यह पूरी तरह रिवर्सिबल है और इस का सेवन छोड़ देने पर 67 फीसदी पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या 6 माह के भीतर सामान्य हो जाती है. शतप्रतिशत सामान्य होने में लगभग 1 साल का समय लगता है. इस में किसी तरह के साइड इफैक्ट देखने को नहीं मिले.

यूनाइटेड नैशन वर्ल्ड और्गेनाइजेशन यूनिवर्सिटीज औफ कैलिफोर्निया, लौस एंजेल्स तथा यूनिवर्सिटीज औफ सिडनी में भी इस का परीक्षण पूरा किया जा चुका है. पौरुष को मैंटेन रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इस हार्मोन के सेवन से बिना किसी परेशानी के स्पर्म काउंट में कमी तो आई लेकिन बांझपन, उत्तेजना या इच्छा में कमी जैसे विकार देखने को नहीं मिले. यूनिवर्सिटीज औफ वाशिंगटन के पौपुलेशन सैंटर फौर रिसर्च इन रिप्रौडक्शन के विशेषज्ञ डा. एंड्रियू कोवियेलो के शब्दों में, ‘‘पुरुष कौंट्रोसैप्टिव के लिए यदि टेस्टोस्टेरोन का प्रयोग किया जाता है तो 3 महीने के बाद तक इस का स्राव होता रहता है. यानी इस का प्रयोग 3 महीने बाद तक सुरक्षित माना जा सकता है. फलस्वरूप इस के माइक्रो कैप्सूल विकसित करने की कोशिश की जा रही है जिस में गाढ़े तरल पदार्थ के रूप में हार्मोन होगा और जिसे हथेली तथा बांह की त्वचा के नीचे इंप्लांट करने की सुविधा होगी.’’

आस्टे्रलिया के शोधकर्ताओं ने पुरुषों के लिए जैब नामक नौन बैरियर कौंट्रासैप्टिव मैथड के अंतर्गत इंजैक्शन के निर्माण में सफलता पा ली है. इसे प्रोजेस्टेरोन तथा टेस्टोस्टेरोन के मिश्रण से बनाया गया है और इसे 2 से 3 माह के अंतराल में लगाने की जरूरत होती है.

यह वीर्य का निर्माण नहीं होने देता और इस का प्रभाव स्थायी भी नहीं होता है. एनजेक रिसर्च इंस्टिट्यूट यूनिवर्सिटी औफ सिडनी तथा कोनकार्ड हौस्पिटल ने 18 से 51 वर्ष के लगभग 1756 पुरुषों के बीच इस का परीक्षण करने के बाद पाया कि यह इंजैक्शन काफी तेज और प्रभावी है.

इस परीक्षण में शामिल एसोसिएट प्रोफैसर पीटर लिउ के अनुसार, ‘‘आज इस की काफी जरूरत है क्योंकि कई महिलाएं पिल्स का सेवन करना नहीं चाहतीं या फिर इसे किसी कारणवश टौलरेट नहीं कर पातीं. उसी तरह कई पुरुष ऐसे होते हैं जो अपने बंध्याकरण को देर से कराना चाहते हैं या फिर कराना नहीं चाहते.’’

परीक्षण रिपोर्ट के अनुसार जैब इंजैक्शन बंध्याकरण की तरह उतना ही इफैक्टिव है जितना महिलाओं के द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली पिल्स. इस के सेवन के बाद न तो सर्जरी और न ही दूसरी वजह से स्पर्म के निर्माण को पूरी तरह बंद करने की जरूरत होगी.

अभी मेल पिल्स मार्केट में आई भी नहीं, पर इस को ले कर तरहतरह के सवाल उठ रहे हैं. सवाल तब भी उठे थे जब फीमेल पिल्स पहली बार मार्केट में आई थी. तब यह बात उठी थी कि इस से मां के नैसर्गिक अधिकार का अतिक्रमण होगा. समाज में विकृतियां आएंगी. नैतिक, सामाजिक, वैचारिक मूल्यों में गिरावट आएगी. यौनशोषण को बढ़ावा मिलेगा. अब, लगभग 60 वर्षों के बाद जब मेल पिल्स मार्केट में आने वाली है तब भी कुछ इसी तरह के सवाल उठने लगे हैं. कहा जाने लगा है कि इस से सामाजिक तानाबाना छिन्नभिन्न हो जाएगा. पतिपत्नी और दांपत्य में दरार आएगी, तलाक में इजाफा होगा. सामाजिक कटुता और वैमनस्य बढ़ेंगे आदि.

दुनिया के मशहूर जर्नल फैमिली प्लानिंग ऐंड रिप्रौडक्टिव हैल्थकेयर में यूएसए के यूनिवर्सिटीज औफ सोशल फ्यूचर इंस्टिट्यूट के प्रो. जुडिथ इबरहार्डथ ने लगभग 140 पुरुषों और 240 महिलाओं के बीच बातचीत कर यह जानने की कोशिश की कि आम लोग इस के सेवन के प्रति कितना सहज, सतर्क तथा ईमानदार होंगे.

स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात से चिंतित हैं कि मल्टी सैक्सुअल पार्टनर तथा लिव इन रिलेशनशिप पर विश्वास करने वाले पुरुषों के बीच यदि कंडोम का प्रयोग कम हुआ तो एड्स तथा गुप्त रोग फैलने की संभावना काफी बढ़ जाएगी.

एक बात और, ऐसी महिलाएं जो प्रैग्नैंसी के बाद पुरुष को जबरदस्ती शादी करने के लिए बाध्य करती हैं, वैसे पुरुषों के लिए यह पिल्स वरदान साबित हो सकती है. साथ ही वे पुरुष जो कंडोम का इस्तेमाल करते हैं, इस पिल्स को इस्तेमाल जरूर करेंगे.

जानें लड़कों से जुड़े अनोखे 7 सवाल और उन के जवाब

आम तौर पर देखा जाता हैं की हम स्वस्थ समस्या को नजर अंदाज करते हैं फिर चाहे शरीर में दर्द हो या फिर आम सर्दी जुखाम. पर इन समस्या को इतर रखते हुए यदि हम बात करें उन स्वस्थ समस्यों की जिसे शायद कुछ लोग बताने में  हिचकिचाते हो जैसे की प्राइवेट पार्ट से जुड़ी समस्या हो या अपनी सेक्स लाइफ से जड़ी. इन्ही समस्याओं से जुड़े कुछ प्रश्न अकसर हमारे दिमाग में होते हैं पर शर्म और डाक्टर मरीज के बारे में क्या सोचेंगे यह सोचकर हम अपने प्रश्न को मन में ही रखते हैं. हैरानी की बात यह है कि यह स्थिति पुरुष और महिला दोनों के साथ होती है. इसलिए आज हम आपको पुरुषों की कुछ ऐसी बातें बता रहे हैं जिन्हें वह डाक्टर से पूछने में शर्माते हैं. जब कि पुरुष को कोई समस्या होती है तो वह उससे संबंधित घुमा फिरकर डाक्टर से उसका हल जानने की कोशिश करता हैं. अगर आप भी ऐसा ही करते हैं तो ये आपके लिए बेहद खतरनाक हो सकता हैं.

तो कौन से है वो 7  सवाल जो हम डाक्टर से पूछने में हिचकिचाते हैं.

मैनबूब्स– गायनेकोमेस्‍टिया को “मैनबूब्स” कहते हैं, जो मोटापे की निशानी और टेस्टोस्टेरोन के कम अनुपात का लक्षण है.इस हालत के कारण अज्ञात है.लेकिन कभी-कभी यह लिवर या किडनी की बीमारी के कारण होता हैं.

प्राईवेट पार्ट की बिमारी–  अधिकांश पुरुष अपने शरीर में या प्राईवेट पार्ट में कुछ ऐसी कमियों को महसूस करते हैं जिन्हें डाक्टर्स को बता पाना मुश्किल होता है. इसका कारण गलत खान-पान, उच्‍च कोलेस्‍ट्रौल, धूम्रपान, शुगर, टेस्‍टोस्‍टेरोन और अत्‍यधिक नशीली दवाओं के सेवन से हो सकता है. हृदय रोग के लिए एक संकेत के रूप में इरेक्टाइल डिसफंक्शन की भूमिका काफी जोरदार हो सकती है.इसलिए शर्म न करें, उत्सुक बनें.आपकी सेहत आपके गौरव से ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण है.

क्यों होती हैं खुजली- दोनों तरफ देखकर और यह एहसास करके कि कोई नहीं देख रहा है आप अपने बट पर जल्‍दी से खुजली कर लेते हैं.सही नहीं है.अपनी खुजली के लिये डॉक्‍टर से बात करें.आप आहार असहिष्णुता, सफाई, बवासीन, सोरायसिस और वर्म्स जैये विभिन्‍न कारणों को बहुत अधिक खुजली के लिए दोष दे सकते हैं.

पुरुष पैटर्न गंजापन – पुरुषों में बालों के झड़ने की समस्या सबसे आम है, ये जेनेटिकल डिसऔरडर है. इससे आपको बालों के बहुत अधिक पतला होने और गंजेपन की समस्‍या हो सकती है. हालांकि गंजापन के लिए कोई इलाज नहीं है. लेकिन ओरल और टापिकल दवाएं बालों के झड़ने की गति को धीमा करने का वादा करती है.

मल त्‍याग – जब मल त्‍याग की बात आती है तो प्रत्‍येक व्‍यक्ति घबरा सा जाता है. इसकी सीमा अलग-अलग लोगों के लिए एक दिन में तीन बार से लेकर एक सप्‍ताह में तीन बार तक हो सकती हैं.लेकिन, अगर आप लगातार अधिक से अधिक तीन दिन बीत जाने के बाद मल त्याग न हो रहा है या मलत्‍याग पाने के लिए कोशिश में कठिनाई महसूस कर रहे है तो आप कब्ज से पीड़ित हो सकते है. ऐसे में आप जितनी जल्दी हो सके  डाक्टर से बात करें और सलाह ले.

किडनी  की समस्या- आमतौर पर किडनी और मूत्रमार्ग में संक्रमण, यूटीआई और किडनी में पथरी के कारण यूरीन से रक्त आने की संभावना होती है. इस अवस्‍था को रक्तमेह (मूत्र में रक्त कोशिकाओं की उपस्थिति) के रूप में जाना जाता है और आपके यूरीन को चमकदार लाल, गुलाबी या जंग जैसा भूरे रंग दे सकता है.

सांसों की बदबू-  सांसों से आती बदबू आपके व्यक्तिगत और व्यावसायिक संबंधों को बर्बाद कर सकती है.यह मुंह में बैक्टीरिया के पनपने का संकेत है.यह पोस्टनसल ड्रिप, रिफ्लक्स रोग और मसूड़े की सूजन के कारण हो सकता है.अपने डॉक्टर के साथ इस समस्या पर चर्चा करें और समस्या का समाधान निकालें.

तो ये हैं वो कुछ सवाल जो हम किसी से भी कहने में हिचकिचाते हैं पर यदि हम अपनी हिचकिचाट भूल जाए तो समस्या का हल मिल जाएगा और समस्या से निजाद भी.

मैनोपौज : किस उम्र में होते हैं और क्या हैं लक्षण, रहें सावधान

तकरीबन 12 साल की उम्र के आसपास किसी लड़की को माहवारी शुरू होती है. इस का सीधा सा मतलब होता है कि अब वह धीरेधीरे जवानी की दहलीज पर आने वाली है और पूरी तरह जवान होने पर शादी के बाद मां बन सकेगी. इसी तरह उम्र के 45 से 50 साल के पड़ाव पर मैनोपौज की शुरुआत होती है, जिस में बच्चा जनने से जुड़े हार्मोन में बदलाव होते हैं और फिर बच्चा जनने की गुंजाइश खत्म होती जाती है.

शहर की हो या गांव की, किसी भी औरत के लिए यह समय बड़ा ही तनाव भरा होता है, क्योंकि हार्मोन में बदलाव के चलते उन का चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है. इस के 3 चरण होते हैं, प्री मैनोपौज, मैनोपौज और पोस्ट मैनोपौज.

मैनोपौज के लक्षण

– शरीर में अचानक से गरमी का एहसास होता है. रात को गरमी लगने के साथ पसीना आता है या फिर अचानक ठंड भी लग सकती है.

-योनि में सूखापन आने लगता है, जिस से सैक्स संबंध बनाते समय दर्द होता है या बनाने की इच्छा ही नहीं रहती है.

-बारबार पेशाब करने की इच्छा होती है और रात को नींद न आने की समस्या बढ़ने लगती है.

-जितना ज्यादा चिड़चिड़ापन बढ़ता है, तनाव भी उतना ही हावी होने लगता है.

-शरीर, आंखों और बालों में सूखेपन की शुरुआत होने लगती है. बाल झड़ने की समस्या भी पैदा हो सकती है.

-हड्डियां कमजोर हो सकती हैं.

-पेशाब संबंधित इंफैक्शन हो सकता है.

-दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है.

कंट्रोल करने के तरीके

-डाक्टर की सलाह पर दवाएं ली जा सकती हैं, पर चूंकि यह कुदरती प्रक्रिया है, तो अपने रहनसहन और खानपान पर ध्यान देना चाहिए.

-इस के अलावा जितना हो सके अपने शरीर को ठंडा रखने की कोशिश करें.

-रात को अगर गरमी लगने से बहुत ज्यादा पसीना आता है तो नहा कर सोने जाएं. सूती और आरामदायक कपड़े पहनें.

-रोजाना कसरत करें और वजन को कंट्रोल में रखें. तलाभुना खाना कम ही खाएं. इस से पेट सही रहता है और रात को नींद भी अच्छी आती है.

-अगर मानसिक तनाव बहुत ज्यादा रहने लगा है, तो किसी माहिर साइकोलौजिस्ट या थैरेपिस्ट से बात की जा सकती है. समाज के डर से ऐसा करने में झिझके नहीं. साथ ही, अपनों से दिल की बात कहें. इस से मन हलका होता है.

-डाक्टर से सलाह लें और उस के मुताबिक कैल्शियम, विटामिन डी, मैग्निशियम वगैरह के सप्लीमैंट ले सकते हैं.

-बीड़ीसिगरेट और शराब का सेवन न करें.

अगर आपको भी है सिगरेट पीने की आदत तो इस खबर को जरूर पढ़ें

Lifestyle tips in Hindi: स्मोकिंग (Smoking) करने वाले लोग अक्सर ऐसा सोचते हैं कि वह सिर्फ खुद को हानी पहुंचा रहें है परंतु उन्हे ये नहीं पता कि वे अपने साथ साथ पूरे समाज को नुकसान दे रहें हैं. सिगरेट का धुंआ एक्टिव स्मोकर से ज्यादा पैसिव स्मोकर के लिए हानिकारक (Harmful) होता है और सिगरेट पीने से समाज में बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है. स्मोकिंग करने वाले लोग शारिरिक बिमारियों (Physical Disease) के साथ साथ मानसिक बिमीरियों (Mental Disease) का भी शिकार होते चले जाते हैं.

कैसे करता है निकोटिन दिमाग पर असर –

सिगरेट में मिले निकोटिन का असर सीधा हमारे दिमाग पर होता है. आमतौर पर हर व्यक्ति स्मोकिंग करने की शुरूआत सिर्फ शौक के तौर पर करता है और वो ये सोचता है कि उसे इसकी आदत नहीं लग सकती पर कब वे स्मोकिंग करने का आदी बन जाता है उसे खुद पता नहीं चलता. नियमित रूप से सिगरेट पीने से हमारे अंदर कई सारे बदलाव आते है जैसे कि सिगरेट ना मिलने पर हमारा दिमाग काम करना बंद कर देता है , स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ जाता है और सिगरेट की तलब के कारण स्मोकर जो अपने साथ साथ दूसरों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं.

एसा नहीं है कि स्मोकर सिगरेट छोड़ने की कोशिश ही नहीं करता, वे कोशिश तो करता है परंतु नाकामयाब रहता है क्यूंकि सिगरेट में मिला निकोटिन उसके दिमाग पर इतना असर कर चुका होता है कि वे चाह कर भी स्मोकिंग करना नहीं छोड़ पाता. सिगरेट में मिला निकोटिन तय करता है कि स्मोकिंग आपके दिमाग पर किस प्रकार असर करेगी. जिस प्रकार निकोटिन की मात्रा हमारे दिमाग पर असर करेगी उसी प्रकार स्मोकिंग का असर शरीर और मन पर होगा.

स्मोकिंग करते समय निकोटिन का एक डोज़ 10 सेकेंड के अंदर दिमाग तक पहुंच जाता है और मसल्स को रिलेक्स कर देता है. निकोटिन का दिमाग तक पहुंचना हमारा मूड अच्छा करने के साथ साथ भूख भी मिटा देता है. जब भी निकोटिन की सप्लाई हमारे दिमाग में कम होती है, तभी हमें ईसकी ज़रूरत महसूस होने लगती है और फिर से स्मोकिंग करते ही सब अच्छा लगने लगता है.

युवाओं में फैलता सिगरेट का ट्रेंड-

आजकल हमारे समाज के युवा बहुत कम उम्र में ही ये सब शुरू कर देते हैं और इसका कारण है उनकी सोसाइटी. जब वे अपनी उम्र के लोगों को स्मोकिंग करते देखते है तो उनके मन में भी इसे ट्राई करने की इच्छा जाग उठती है. कई युवा अपनी मेच्योरिटी दिखाने के लिए भी स्मोकिंग करना शुरू कर देते हैं.

सिगरेट पीने वाले लोग यह साचते हैं कि स्मोकिंग करने से उनका दिमाग शांत हो जाता है व तनाव कम हो जाता है और तनाव से पीछा छुड़ाने के लिए ही अक्सर वे स्मोकिंग करते हैं परंतु ऐसा होता नहीं है क्यूंकि रिलेक्स होने की फीलिंग जल्द ही खत्म हो जाती है और फिर से स्मोकिंग करने को दिल मचलने लगता है.

घर या ऑफिस से उन्हें अनचाहा तनाव मिलते ही हल निकालने की बजाए वे स्मोकिंग करने लग जाते हैं जिससे की तनाव घटना नहीं बल्की और ज्यादा बढ़ जाता है.

कैसे छोड़ें सिगरेट-

अपना ज्यादा से ज्यादा समय परिवार और दोस्तों के साथ बिताएं और उन्हे अपनी इस आदत के बारे में बताएं जिससे की वे सब आपकी मदद कर पाएंगे.

कोशिश करें की आप सिगरेट पीने वाले लोगों के साथ भी न बैठें जिन्हे देख के आपका मन सिगरेट की ओर आकर्शित हो.

इन 5 कारणों से पिता नहीं बन पाते पुरुष

Lifestyle News in Hindi: इन्फर्टिलिटी (Infertility) एक ऐसी समस्या है जो बीमारी (Disease) ना होकर आत्मसम्मान की लड़ाई ज्यादा है. बातों बातों में एक दुसरे को मर्दानगी दिखने वाले पुरुष अगर ऐसी बीमारी को सार्वजनिक (Public) रुप से उजागर करे तो उनके पुरुषार्थ पर सवाल उठाया जाता है. जिसके चलते सही समय पर इलाज शुरु नहीं हो पाता. इसको ज्ञान की कमी कहें या फिर पुरुष प्रधान (Male Dominated) समाज में अपनी धोक जमाए रखना, जो भी हो पर इन्फर्टिलिटी एक बीमारी जिसका इलाज ना संभव है बल्कि आप इससे पुरी तरह ठीक भी हो सकते है. आपको जानकर आश्चर्य होगा पर एक सर्वे के अनुसार भारत में लगभग 2 करोड़ 75 लाख जोड़े बांझपन का शिकार हैं, यानी हर 10 में से 1 जोड़ा शादी के बाद बच्चा पैदा करने में सक्षम नहीं है.

मेडीकल साइंस की बात करें तो इन्फर्टिलिटी के बारे लोगों की राय काफी गलत है.ये जान कर हैरानी पर ज्यादातर लोगों में बांझपन का कारण उनकी गलत आदतें होती हैं. भारत में बढ़ रहे बांझपन या इन्फर्टिलिटी के पांच कारण है जिसे आपको जानना बेहद जरुरी है. तो जानते है क्या है वो 5 कारण…

1. शादी के उम्र है एक कारण

आजकल लड़के-लड़कियां कैरियर सेट हो जाने और आर्थिक रूप से सक्षम हो जाने के बाद शादी के फैसले ले रहे हैं. यही कारण है कि ज्यादातर लड़के-लड़कियां 30-32 की उम्र तक शादी के बंधन में बंधना चाहते हैं. इसके अलावा शादी के बाद भी वो कुछ समय तक बच्चे की जिम्मेदारियों से बचना चाहते हैं. चिकित्सक मानते हैं कि 35 की उम्र के बाद महिलाओं को मां बनने में सामान्य से ज्यादा मुश्किलें आती हैं. ज्यादातर मामलों में नौर्मल डिलीवरी के बजाय औपरेशन करना पड़ता है और कई जोड़ों में शुक्राणुओं की क्वालिटी भी खराब होने लगती है, जिससे उन्हें प्रेग्नेंसी में परेशानी आती है. दूसरे कारण जो आजकल अधिकांश स्त्रियों में पाये जा रहे हैं वो हैं फाइब्रायड का बनना, एन्डोमैंट्रियम से सम्बन्धी समस्याएं. उम्र के बढ़ने के कारण हाइपरटेंशन जैसी दूसरी समस्याएं भी आ जातीं हैं और इनके कारण महिलाओं में फर्टिलिटी प्रभावित होती है.

2. कुछ गलत आदतें भी है कारण

आजकल कम उम्र में सिगरेट, शराब, गुटखा और कई बार ड्रग्स की लत भी लड़के-लड़कियों में काफी बढ़ गई है. इन आदतों के कारण भी वीर्य (Sperm) की गुणवत्ता खराब होती है और स्पर्म काउंट कम होता है. यह होने वाले बच्चे में आनुवांशिक तौर पर बदलाव भी कर सकता है . इसी प्रकार से अल्कोहल भी टेस्टोस्टेरौन के उत्पादन को कम करता है. विशेषज्ञों के अनुसार किसी प्रकार की दवाओं या ड्रग्स के गलत तरीके से इस्तेमाल के कारण भी इन्फर्टिलिटी हो सकती है. स्टेरायड जैसे हार्मोन हमारे शरीर के हार्मोन के स्त‍र में बदलाव लाते हैं जो कि हमारे स्वास्‍थ्‍य को भी प्रभावित कर सकते हैं. बीमारी होने पर भी चिकित्सक की सलाहानुसार ही दवाएं लेनी चाहिए.

3. काम का बढ़ता बोझ

आजकल लगभग हर सेक्टर में काम और सफलता का दबाव पहले से ज्यादा बढ़ गया है. इस कारण से लोग ओवर टाइम, नाइट शिफ्ट या घर पर काम करने को मजबूर होते हैं. काम के साथ-साथ शरीर के लिए आराम भी बहुत जरूरी है. समय कम होने के कारण लोग न तो एक्सरसाइज करते हैं और न ही अपने खानपान पर ध्यान दे पाते हैं. इन कारणों से भी धीरे-धीरे व्यक्ति के स्पर्म की क्वालिटी पर असर पड़ता है.

4. बढ़ती बीमारियां भी है कारण

हाइपरटेंशन (हाई ब्लड प्रेशर), डायबिटीज, मोटापा जैसी समस्या आजकल युवाओं में भी आम हो गयी है. इनका प्रभाव व्यक्ति की सेक्सुअल लाइफ पर भी पड़ता है . डायबिटीज़, पी सी ओ डी (पॉलीसिस्टिक ओवरियन डिज़ीज़) के कारण महिलाओं मे बहुत सी बीमारियां आम हो गयी हैं . 60 से 70 प्रतिशत महिलाओं में ओवुलेशन की क्रिया ही नहीं होती . वज़न का बढ़ना और व्यायाम की कमी के कारण भी सही मात्रा में हार्मोन नहीं बन पाते. बचपन से ही लोगों में कंप्‍यूटर और लैपटाप पर बैठना आम है और यह कारण भी कहीं ना कहीं इन्फर्टिलिटी के जि़म्मेदार होते हैं.

5. प्रदूषण और शहरी वातावरण ये सबसे अहम कारण

शहरी वातावरण में बढ़ते प्रदूषण और टाक्सिन ने 45 से 48 प्रतिशत इन्फर्टिलिटी के मामले बढ़ा दिये हैं. जीवनशैली में बदलाव और खानपान की गलत आदतें भी अप्रत्यक्ष रूप से इन्फर्टिलिटी की जि़म्मेदार हैं. पेस्टिसाइड और प्लास्टिक का खानपान के दौरान हमारी फूड चेन में आना हार्मोन के स्तर को प्रभावित करता है. यूनिवर्सिटी आफ नार्थ कैरालिना, चैपल हिल के शोधकर्ताओं ने यह पता लगाया है कि वो महिलाएं जो नाइट शिफ्ट में काम करती हैं उनमें समय से पहले प्रसव की सम्भावना रहती है .

कैसे छुटकारा पाया जाए इन्फर्टिलिटी से

इन्फर्टिलिटी दूर करने के लिए जरूरी है कि आप अभी से अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखें. शुरुआत से अपना मोटापा, डायबिटीज और ब्लड प्रेशर कंट्रोल रखें. सिगरेट, शराब, तंबाकू उत्पादों का सेवन बिल्कुल बंद कर दें. खानपान में पौष्टिक आहार शामिल करें और रोज थोड़ी एक्सरसाइज जरूर करें. साथ ही शरीर में कुछ भी बदलाव हो तो तुरंत डाक्टर से सलाह ले और किसी भी बदलाव को अंदेखा ना करें. इन्फर्टिलिटी को बीमारी की तरह ले जिससे की आप जल्द निजाद पा सकें. समाज के डर से इसको छुपाना समस्या को और बढ़ाना है. इसलिए अगर आप भी बच्चा ना होने से परेशान है तो जल्द से जल्द अपना इलाज शुरु कराए.

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