Hindi Family Story: दूसरी भूल – अनीता की कशमकश

Hindi Family Story: अनीता बाजार से कुछ घरेलू चीजें खरीद कर टैंपू में बैठी हुई घर की ओर आ रही थी. एक जगह पर टैंपू रुका. उस टैंपू में से 4 सवारियां उतरीं और एक सवारी सामने वाली सीट पर आ कर बैठ गई.जैसे ही अनीता की नजर उस सवारी पर पड़ी, तो वह एकदम चौंक गई और उस के दिल की धड़कनें बढ़ गईं.

इस से पहले कि अनीता कुछ कहती, सामने बैठा हुआ नौजवान, जिस का नाम मनोज था, ने उस की ओर देखते हुए कहा, ‘‘अरे अनीता, तुम?’’

‘‘हां मैं,’’ अनीता ने बड़े ही बेमन से जवाब दिया.

‘‘तुम कैसी हो? आज हम काफी दिन बाद मिल रहे?हैं,’’ मनोज के चेहरे पर खुशी तैर रही थी.

‘‘मैं ठीक हूं.’’

‘‘मुझे पता चला था कि यहां इस शहर में तुम्हारी शादी हुई है. जान सकता हूं कि परिवार में कौनकौन हैं?’’

‘‘मेरे पति, 2 बेटियां और एक बेटा,’’ अनीता बोली.

‘‘तुम्हारे पति क्या करते हैं?’’

‘‘कार मेकैनिक हैं.’’

‘‘क्या नाम है?’’

‘‘नरेंद्र कुमार.’’

‘‘मैं यहां अपनी कंपनी के काम से आया था. अब काम हो चुका है. रात की ट्रेन से वापस चला जाऊंगा,’’ मनोज ने अनीता की ओर देखते हुए कहा, ‘‘घर का पता नहीं बताओगी?’’

‘‘क्या करोगे पता ले कर?’’ अनीता कुछ सोचते हुए बोली.

‘‘कभी तुम से मिलने आ जाऊंगा.’’

‘‘क्या करोगे मिल कर? देखो मनोज, अब मेरी शादी हो चुकी?है और मुझे उम्मीद है कि तुम ने भी शादी कर ली होगी. तुम्हारे घर में भी पत्नी व बच्चे होंगे.’’

‘‘हां, पत्नी और 2 बेटे हैं. तुम मुझे पता बता दो. वैसे, तुम्हारे घर आने का मेरा कोई हक तो नहीं है, पर एक पुराने प्रेमी नहीं, बल्कि एक दोस्त के रूप में आ जाऊंगा किसी दिन.’’

‘‘शिव मंदिर के सामने, जवाहर नगर,’’ अनीता ने कहा.

कुछ देर बाद टैंपू रुका. अनीता टैंपू से उतरने लगी.

‘‘अनीता, अब तो रात को मैं वापस आगरा जा रहा हूं, फिर किसी दिन आऊंगा.’’

अनीता ने कोई जवाब नहीं दिया. घर पहुंच कर उस ने देखा कि उस की बड़ी बेटी कल्पना, छोटी बेटी अल्पना और बेटा कमल कमरे में बैठे हुए स्कूल का काम कर रहे थे.

अनीता ने कल्पना से कहा, ‘‘बेटी, मैं जरा आराम कर रही हूं. सिर में तेज दर्द है.’’

‘‘मम्मी, आप को डिस्प्रिन की दवा या चाय दूं?’’ कल्पना ने पूछा.

‘‘नहीं बेटी, कुछ नहीं,’’ अनीता ने कहा और दूसरे कमरे में जा कर लेट गई.

अनीता को तकरीबन 11 साल पहले की बातें याद आने लगीं. जब वह 12वीं जमात में पढ़ रही थी. कालेज से छुट्टी होने पर वह एक नौजवान को अपने इंतजार में पाती थी. वह मनोज ही था. उन दोनों का प्यार बढ़ने लगा. अनीता जान चुकी थी कि मनोज किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर रहा है.

मनोज के पिताजी का अपना कारोबार था और अनीता के पिताजी का भी. वे दोनों शादी करना चाहते थे, पर अनीता के पापा को यह रिश्ता बिलकुल मंजूर नहीं था.

लिहाजा, अनीता और मनोज ने घर से भागने की ठान ली. घर से 50 हजार रुपए नकद व कुछ जेवर ले कर अनीता मनोज के साथ जयपुर जाने वाली ट्रेन में बैठ गई थी.

जयपुर पहुंच कर वे 8-10 दिन होटल में रहे. पता नहीं, पुलिस को कैसे पता चल गया और उन दोनों को पकड़ लिया गया. अनीता के पापा को आगरा से बुलाया गया. मनोज को पुलिस ने नहीं छोड़ा. नाबालिग लड़की को भगाने के अपराध में जेल भेज दिया गया.

पापा को अनीता से बहुत नफरत हो गई थी, क्योंकि उस ने कहना नहीं माना था.

अनीता ने आगे पढ़ाई करने को कहा था, पर पापा ने मना कर दिया था और उस की शादी करने की ठान ली थी. उस के लिए रिश्ते ढूंढ़े जाने लगे.

सालभर इधरउधर धक्के खाने के बाद पापा को एक रिश्ता मिल ही गया था. विधुर नरेंद्र की उम्र 35 साल थी. उस की पत्नी की एक हादसे में मौत हो चुकी थी. उस की 2 बेटियां थीं. एक 5 साल की और दूसरी 3 साल की.

नरेंद्र एक कार मेकैनिक था. उस की अपनी वर्कशौप थी. पापा ने नरेंद्र से जब शादी की बात की, तो उसे सब सच बता दिया था. नरेंद्र ने सब जान कर भी मना नहीं किया था.

अनीता शादी कर के नरेंद्र के घर आ गई थी. अब वह 2 बेटियों की मां बन गई थी.

एक दिन नरेंद्र ने कहा था, ‘देखो अनीता, मुझे तुम्हारी पिछली जिंदगी से कोई मतलब नहीं. तुम भी वह सब भुला दो. इस घर में आने का मतलब है कि अब तुम्हें एक नई जिंदगी शुरू करनी है. अब तुम अल्पना और कल्पना की मम्मी हो… तुम्हें इन दोनों को पालना है.’

‘जी हां, मैं ऐसा ही करूंगी. अब कल्पना और अल्पना आप की ही नहीं, मेरी भी बेटियां हैं,’ अनीता ने कहा था.

एक साल बाद अनीता ने एक बेटे को जन्म दिया था. बेटा पा कर नरेंद्र बहुत खुश हुआ था. बेटे का नाम कमल रखा गया था.

अनीता नरेंद्र को पति के रूप में पा कर खुश थी और उस ने भी कभी शिकायत का मौका नहीं दिया था. पापामम्मी भी अपना गुस्सा भूल कर अब उस से मिलने आने लगे थे.

आज दोपहर अनीता की अचानक मनोज से मुलाकात हो गई. उसे मनोज को घर का पता नहीं देना चाहिए था.

उस के दिल में एक अनजाना सा डर बैठने लगा. वह आंखें बंद किए चुपचाप लेटी रही.

अगले दिन सुबह के तकरीबन 11 बजे अनीता रसोई में खाना तैयार कर रही थी. कालबेल बज उठी. उस ने दरवाजा खोला, तो सामने मनोज खड़ा था.

‘‘तुम…’’ अनीता के मुंह से अचानक ही निकला,’’ तुम तो कह रहे थे कि मैं रात की गाड़ी से आगरा जा रहा हूं.’’

‘‘अनीता, मुझे रात की गाड़ी से ही आगरा जाना था, पर टैंपू में तुम से मिलने के बाद मेरा दिल दोबारा मिलने को बेचैन हो उठा. होटल में रातभर नींद नहीं आई. तुम्हारे बारे में ही सोचता रहा. तुम नहीं जानती अनीता कि मैं आज भी तुम को कितना चाहता हूं,’’ मनोज ने कहा.

अनीता चुपचाप खड़ी रही. उस ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘अनीता, अंदर आने के लिए नहीं कहोगी क्या? मैं तुम से केवल 10 मिनट बातें करना चाहता हूं.’’

‘‘आओ,’’ न चाहते हुए भी अनीता के मुंह से निकल गया.

कमरे में सोफे पर बैठते हुए मनोज ने इधरउधर देखते हुए पूछा, ‘‘कोई दिखाई नहीं दे रहा है… सभी कहीं गए हैं क्या?’’

‘‘बच्चे स्कूल गए हैं और नरेंद्र वर्कशौप गए हैं,’’ अनीता बोली.

तभी रसोई से गैस पर रखे कुकर से सीटी की आवाज सुनाई दी.

‘‘जो कहना है, जल्दी कहो. मुझे खाना बनाना है.’’

‘‘अनीता, तुम अब पहले से भी ज्यादा खूबसूरत हो गई हो. दिल करता है कि तुम्हें देखता ही रहूं. क्या तुम्हें जयपुर के होटल के उस कमरे की याद आती है, जहां हम ने रातें गुजारी थीं?’’

‘‘क्या यही कहने के लिए तुम यहां आए हो?’’

‘‘अनीता, मैं तुम्हारे पति को सब बताना चाहता हूं.’’

‘‘तुम उन्हें क्या बताओगे?’’ अनीता ने घबरा कर पूछा.

‘‘मैं नरेंद्र से कहूंगा कि जयपुर में मैं अकेला ही नहीं था. मेरे 2 दोस्त और भी थे, जिन के साथ अनीता ने खूब मस्ती की थी.’’

‘‘झठ, बिलकुल झूठ,’’ अनीता गुस्से से चीखी.

‘‘यह झूठ है, पर इसे मैं और तुम ही तो जानते हैं. तुम्हारा पति तो सुनते ही एकदम यकीन कर लेगा,’’ मनोज ने अनीता की ओर देखते हुए कहा.

अनीता ने हाथ जोड़ कर पूछा, ‘‘तुम आखिर चाहते क्या हो?’’

‘‘मैं चाहता हूं कि आज दोपहर बाद तुम मेरे होटल के कमरे में आ जाओ.’’

‘‘नहीं मनोज, मैं नहीं आऊंगी. अब मैं अपनी जिंदगी में जहर नहीं घोलूंगी. नरेंद्र मुझ पर बहुत विश्वास करते हैं. मैं उन से विश्वासघात नहीं करूंगी,’’ अनीता ने मनोज से घूरते हुए कहा.

‘‘तो ठीक है अनीता, मैं नरेंद्र से मिलने जा रहा हूं वर्कशौप पर,’’ मनोज ने कहा.

‘‘वर्कशौप जाने की जरूरत नहीं है. मैं यहीं आ गया हूं,’’ नरेंद्र की आवाज सुनाई पड़ी.

यह देख अनीता और मनोज बुरी तरह चौंक उठे. अनीता के चेहरे का रंग एकदम पीला पड़ गया.

‘‘यहां क्यों आया है?’’ नरेंद्र ने मनोज को घूरते हुए पूछा, ‘‘तुझे इस घर का पता किस ने दिया?’’

‘‘अनीता ने. कल यह मुझे बाजार में मिली थी,’’ मनोज बोला.

अनीता ने घबराते हुए नरेंद्र को पूरी बात बता दी.

‘‘अबे, तुझे अनीता ने पता क्या इसलिए दिया था कि तू घर आए और उसे ब्लैकमेल करे. मैं ने तुम दोनों की बातें सुन ली हैं. अब तू यहां से दफा हो जा. फिर कभी इस घर में आने की कोशिश की, तो पुलिस के हवाले कर दूंगा,’’ नरेंद्र ने मनोज की ओर नफरत से देखते हुए गुस्साई आवाज में कहा.

मनोज चुपचाप घर से निकल गया.अनीता को रुलाई आ गई. वह सुबकते हुए बोली, ‘‘मुझे माफ कर दो. मुझ से बहुत बड़ी भूल हो गई, जो मैं ने मनोज को घर का पता दे दिया था.’’

‘‘हां अनीता, यह तुम्हारी जिंदगी की दूसरी भूल है, जो तुम ने अपने दुश्मन को घर में आने दिया. मनोज तुम्हारा प्रेमी नहीं, बल्कि दुश्मन था. सच्चे प्रेमी कभी भी अपनी प्रेमिका को घर से रुपएगहने वगैरह ले कर भागने को नहीं कहते.’’

अनीता की आंखों से आंसू बहते रहे. नरेंद्र ने उस के चेहरे से आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘अनीता, मुझे तुम पर बहुत विश्वास था, पर आज की बातें सुन कर यह विश्वास और बढ़ गया है. वैसे तो मनोज अब यहां नहीं आएगा और अगर आ भी गया, तो मुझे फोन कर देना. मैं उसे पुलिस के हवाले कर दूंगा.’’

नरेंद्र की यह बात सुन कर अनीता के मुंह से केवल इतना ही निकला, ‘‘आप कितने अच्छे हैं…’ Hindi Family Story

Hindi Romantic Story: दिव्या भाभी – ललचाए देवर चिंटू ने चली गहरी चाल

Hindi Romantic Story: दिव्या भाभी को देख कर मनचलों के दिल में धकधक होने लगती थी. देवर चिंटू भी अपनी भाभी का रसपान करने के लिए उतावला था. एक दिन वह ऐसी दवा लाया कि दिव्या भाभी पर सैक्स का भूत सवार हो गया. क्या चिंटू को अपने प्लान में कामयाबी मिली?

दिव्या भाभी को कौन नहीं जानता. पूरे गांव में चर्चे हैं उस के. यह भी अफवाह है कि गांव में अभी तक उस के जैसी सुंदर बहू नहीं आई है. बिना सिंगार किए भी लुभावनी और आकर्षक लगती है. चालढाल, नैननक्श, शरीर के किसी भी अंग में कोई कमी दिखाई देती ही नहीं.

सुंदर होने के साथ ही दिव्या भाभी बहुत हंसोड़, मजाकिया और गंदी शरारतें करने वाली है, इसलिए गलीमहल्ले का कौन सा लड़का है, जो उस से मिलने को उतावला नहीं रहता. गांव में अफवाह सी फैली हुई है कि लड़के उस की ओर चुंबक के समान खिंचे चले आते हैं.

14-15 साल वाले जिन लड़कों के जवानी के कीटाणु काटने शुरू करते हैं, वे दिन में कम से कम एक बार तो दिव्या भाभी के दरबार में हाजिरी देते ही हैं. नयानया जवान होने वाला कोई किशोर उस के दरबार में अगर एक ही दिन में 2-3 बार हाजिरी दे तो कोई हैरत की बात नहीं.

दिव्या भाभी भी इतनी शरारती है कि ऐसे लड़कों का कभी अंग पकड़ कर हिला देती है तो कभी उन की छातियों में पड़ी हुई गुठलियां भींच देती है. जब लड़के दर्द से कराहते हैं, तो उसे बड़ा मजा आता है.

दिव्या भाभी के देवर चिंटू ने अभी जवानी की दहलीज पर कदम रखा है. जवानी के कीटाणुओं ने आजकल उस के अंदर तहलका सा मचाया हुआ है. चिंटू का असली नाम अभिषेक है, लेकिन घर और आसपास के महल्ले वाले उसे चिंटू ही बुलाते हैं. स्कूल में भी उस ने यही नाम लिखवाया है.

10वीं जमात पास करते ही चिंटू ने 11वीं में दाखिला ले लिया है. उस का परिवार भी ज्यादा बड़ा नहीं है. भाईभाभी के अलावा एक दादा हैं, जो घर से दस कदम दूर घेर में पड़े रहते हैं. दादाजी की एक विधवा बहन है, जो अब यहीं रहती हैं. चिंटू और उस का बड़ा भाई मोहन, उसे फुआ के नाम से पुकारते हैं. बड़ेबूढ़ों के रूप में इन दोनों का ही चिंटू और मोहन को आशीर्वाद हासिल है, क्योंकि 2 साल पहले उन के मम्मीपापा की कार हादसे में मौत हो गई थी.

महल्ले के दूसरे लड़कों के समान ही चिंटू भी अपनी भाभी दिव्या के साथ बहुत शरारतें करता है. जब भी मौका मिलता है, उस के साथ छेड़खानी करने से नहीं चूकता. वह नहीं मानता, भाभी ‘मां’ समान होती है. उसे तो अपनी भाभी दोस्त के जैसी दिखाई देती है.

दिव्या भाभी भी जबतब मौका देख कर चिंटू के गाल पर चूंट कर निकल जाती. एक दिन जब चिंटू चारपाई पर बैठा खाना खा रहा था, तो पीछे से आ कर दिव्या ने उस के गाल पर काट भी लिया था. चिंटू के मुंह से चीख सी निकल गई थी.

देवरभाभी में अकसर ऐसी शरारतें और नोकझोंक होती ही रहती है, लेकिन उन दोनों में से बुरा कोई नहीं मानता. कुछ ही समय एकदूसरे से नाराज रहते हैं, फिर मान जाते हैं.

चिंटू अब 17वें साल में है. ऐसा उस की हाईस्कूल की मार्कशीट में लिखी गई जन्मतिथि के अनुसार है. उस का अंदाजा है कि वह 1-2 साल और भी बड़ा हो सकता है, क्योंकि पापा ने स्कूल में जन्मतिथि कम कर के लिखवाई थी.

चिंटू के अंदर विशेष कीटाणु कई साल पहले बन चुके थे. जिन्हें उस ने अनेकों बार निकाल कर देखा. वह केवल यही देखना चाहता था कि उन का रंग कैसा होता है. क्योंकि उस के किसी दोस्त ने बताया था कि पहले उन का रंग सफेद होता है, फिर पीला हो जाता है, इसलिए इस सिद्धांत पर उस ने कई बार प्रयोग कर के देखा.

जब भाभी चिंटू के साथ गंदी शरारतें करती है, तो कीटाणुओं को बारबार निकालने का मन करता है. मुसकरा कर देखने और मीठीमीठी बातें करने पर तो उस के अंदर कुलबुलाहट सी मच जाती है. एक दिन तो चिंटू को इतना जोश आया कि उस ने मौका तलाश कर भाभी का हाथ पकड़ लिया.

भाभी ने अपना हाथ यह कहते हुए छुड़ाया, ‘‘देवरजी, पहले इस लायक हो तो जाओ.’’

चिंटू नहीं समझ पाया इस का मतलब क्या है? उस ने खुद ही कई बार इस वाक्य का मतलब निकाल कर देखा, लेकिन उस का सही मतलब नहीं समझ पाया. इस वाक्य का मतलब हां है या न, इस बारे में वह बहुत भ्रमित रहा. फिर उस ने खुद ही मतलब निकाला कि प्यार के मामले में लड़कियों की न का मतलब हां ही होता है.

अक्तूबर का महीना था. सर्दियां आने को थीं. बेमौसमी बारिश ने मौसम को ज्यादा ठंडा बना दिया था. चिंटू के भैया आज घर पर नहीं थे. उन्हें जरूरी काम से एक रिश्तेदार के घर रुकना पड़ा था. इस की जानकारी उन्होंने फोन पर दिव्या को दे दी थी. दिन में तेज हवाएं चलने के चलते बिजली गुल थी. तार टूट जाने की वजह से बिजली के आने की भी उम्मीद नहीं थी.

भाभी ने शाम का खाना जल्दी ही बनाया और सब लोगों ने मिल कर खाया. रात के 9 बजे तक सब अपनेअपने कमरों में घुस गए. जिस को जो काम सही लगा, वही करने लगा.

चिंटू को अपना होमवर्क करते हुए अचानक सूझा, ‘भाभी के पास कई सारी कहानियों की किताबें हैं. कोर्स की किताबें तो पढ़ता ही रहता हूं. आज कोई अच्छी कहानी पढ़ूंगा.’’

चिंटू सीधा भाभी के कमरे में पहुंचा. बिना कुछ बोले ही दरवाजे पर खड़ा हो कर भाभी को निहारने लगा. उस समय भाभी बिस्तर पर औंधी लेटी हुई फोन को स्क्रौल कर रही थी. बगल में कोई पत्रिका रखी हुई थी. ऐसी हालत में वह एकदम हीरोइन के समान दिखाई देने लगी.

मोमबत्ती की धीमी रोशनी में उस का हर अंग मन में रोमांच पैदा करने वाला था. कौन सा अंग था भाभी का, जो नागिन के समान लहराता नहीं दिखाई दे रहा था. वाह, क्या नजारा था. उस समय दिव्या भाभी के प्रति होने वाले आकर्षण को चिंटू नहीं रोक पाया.

चिंटू ने अंदर आ कर दिव्या की कमर पर चूंटते हुए कहा, ‘‘भाभी, कोई पत्रिका दे दो. इस महीने कौनकौन सी नई आई हैं? आज कहानी पढ़ने का मन है.’’

‘‘रैक में से ले लो. वहां बहुत सी पत्रिकाएं रखी हुई हैं,’’ भाभी ने भर्राई आवाज में कहा, जैसे नशे में हो.

‘‘तुम ही उठा कर दो, मुझे क्या पता कौन सी मजेदार है,’’ चिंटू ने थोड़ा हक जताते और जिद करते हुए कहा.

नहीं चाहते हुए भी भाभी को उठ कर पत्रिका और किताबों की रैक के पास आना पड़ा. भाभी ने जैसे ही पत्रिका उठाने के लिए हाथ बढ़ाया. चिंटू ने दोनों हाथों से उसे पीछे से अपनी बांहों में कस लिया.

भाभी ने नाराजगी दिखाते हुए कहा, ‘‘यह क्या कर रहे हो… छोड़ दो, कोई आ जाएगा.’’

चिंटू और कस कर पकड़ते हुए बोला, ‘‘नहीं, आज नहीं. बरदाश्त नहीं हो रहा है. अब नहीं रहा जाता. बस एक बार.’’

छीनाझपटी सी शुरू हो गई. चिंटू कहता, ‘‘आजा.’’

भाभी कहती, ‘‘न… न…’’

तभी किसी के ‘ठपठप’ कदमों की आवाज सुनाई दी. चिंटू ने तुरंत भाभी को छोड़ कर उस का फोन उठाया और कान पर लगाते हुए झूठमूठ किसी से बतियाने का नाटक सा करने लगा, ‘‘हां ठीक है. अभी बात कर लूंगा… मैं 10 बजे तक पहुंच जाऊंगा… भाभी जल्दी ही नाश्ता बना देती है… कालेज में ही आ जाना… नहीं, अभी घर पर ही है, चाहो तो बात कर सकते हो…’’

तभी फुआ अंदर कमरे में आई. चिंटू और भाभी को शक की निगाह से देखा और बिना कुछ बोले ही लौट गई. गुस्से में फोन बिस्तर पर फेंक कर चिंटू भी अपने कमरे में आ कर सो गया.

इस घटना के बाद भाभी ने चिंटू के साथ बातचीत करना छोड़ दिया. जब कभी बोलती भी तो घुड़क कर. देखती तो घूर कर, जैसे अभी काट खाएगी. चिंटू को भाभी के इस बदले हुए बरताव की कुछ वजह पता भी थी और कुछ नहीं भी.

जब चिंटू ने भाभी से इस बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘अगर मैं तुम्हारे साथ मजाक कर लेती थी तो इस का मतलब यह नहीं कि मैं गलत हूं. फुआ देख लेती तो क्या होता? अगर तुम्हारे भाई को पता चल गया तो फिर अंजाम जानते हो कि क्या होगा?’’

चिंटू को भाभी के ये शब्द कांटे के समान चुभे. उसे अपनी बेइज्जती सी महसूस हुई. पहले लुभाया, फिर धमकाया. उस ने सोच लिया, ‘भाभी तुम से तो बदला जरूर लेना है. अब चाहे अंजाम कुछ भी हो.’

चिंटू ने अपना सारा गुनाह अपने एक दोस्त को बताते हुए कहा, ‘‘भाभी का बरताव अब बिलकुल बदल गया है. छोटी सी बात पर वह खीज कर बोलती है. एकदो बार तो बिना किसी बात के ही मुझे घुड़क भी दिया.’’

दोस्त ने सलाह दी, ‘‘यार, तुम ने कच्ची छोड़ दी, पूरा काम हो जाता तो फिर न बोलती, बल्कि और खुश होती. अगर तुम्हें पूरा काम करना है तो इस का तरीका मैं बताता हूं,’’ उस ने चिंटू के कान में फुसफुसाते हुए सारा प्लान समझा दिया.

चिंटू को सुन कर शांति मिली और थोड़ी हैरानी भी हुई, ‘‘ऐसी दवा भी आती है…’’ उस ने खुशी से झूमते हुए कहा.

कालेज की छुट्टी होते ही चिंटू मामचंद बलबीर की दुकान पर पहुंचा और दुकानदार से बोला, ‘‘भैंस गाभिन करने की दवा चाहिए.’’

‘‘भैंस कैसी है?’’ दुकानदार ने कनखियों से उस की ओर देखते हुए पूछा.

‘‘खारके की कटिया है. कभीकभार बोलती है, फिर चुप हो जाती है. हरी होने का नाम ही नहीं ले रही. बस गात फुलाए जा रही है.’’

‘‘यह लो एक पुडि़या, आधी शाम को दे देना, आधी सुबह को. रोटी या आटे के गोले में मिला कर देना. खाते ही बोलने लगेगी.’’

चिंटू ने बिल चुकाया और दवा ले कर घर आ गया. वह बहुत खुश था. आज तो होगा ही होगा. दिल में उमंग थी. जब भी भाभी के बारे में सोचता, शरीर में कामुक लहर सी दौड़ती. बारबार मन में यह भावना उठती, ‘सीधी उंगली से कभी घी नहीं निकलता, उसे टेढ़ा करना ही पड़ता है. अब देखता हूं कि भाभी कैसे बचेगी?’

शाम को खाना खाने के बाद जब सोने का समय हुआ, चिंटू ने बड़ी चालाकी से दिव्या भाभी के दूध में दवा की पुडि़या की एकचौथाई मात्रा मिला दी. घर में सोने से पहले दूध पीने का रिवाज था, इसलिए जब दिव्या सब के कमरे में एकएक गिलास दूध देने में बिजी थी, तब चिंटू को दूध में दवा मिलाने का मौका मिल गया था.

सब दूध पी कर सोने की तैयारी करने लगे. आधे घंटे के बाद ही दवा ने असर दिखाना शुरू कर दिया. पहले धीरेधीरे शरीर में कुछ हरारत सी हुई, फिर तेजी के साथ.

दिव्या ने खुद को कई बार रोकना चाहा, लेकिन सहवास की आग जो भड़की, फिर भड़कती ही चली गई.

जब उस का खुद पर से कंट्रोल खत्म हो गया तो उस ने मोहन का गरीबान पकड़ कर उस के ऊपर लेटते हुए जोश में कहा, ‘‘ओ पंडित, आज करता नहीं क्या?’’

मोहन को थोड़ी हैरानी हुई कि आज दिव्या खुद ही कह रही है, जबकि अकसर मोहन को ही बोलना पड़ता था. उस ने बिना कोई पल गंवाए दिव्या को अपनी बांहों में कसते हुए जलती आग में घी डालना शुरू कर दिया.

लेकिन आज उसे घी की नहीं पानी की जरूरत थी. और उस से भी कहीं ज्यादा बर्फ की. उस के ऊपर उन डब्बों को उलटने की जरूरत थी, जिन पर आग लिखा होता है, पर उन में रेत होता है.

मोहन से जब आग पूरी तरह शांत न हुई, तो दिव्या ने उसे अपने नीचे लिटा लिया और खुद ऊपर आ गई. आज खेत में फावड़े का काम करने के चलते मोहन काफी थका हुआ था, इसलिए केवल एक बार संबंध बना सका. वह कुछ ही मिनट में सो गया.

दिव्या सोते हुए मोहन की ओर देखने लगी और गुस्सा होने लगी. उसे अपने अंदर ज्वाला सी दहकती महसूस हो रही थी, इसलिए उस की आंखों में नींद  कहां थी. आंखें बंद करते ही मन में गंदे खयाल आने लगते. उस ने मोहन की ओर ललचाई नजरों से एक बार फिर देखा, लेकिन वह गहरी नींद में था.

जब दिव्या से बरदाश्त न हुआ तो वह धीरे से उठी और चिंटू के कमरे में चली गई. चिंटू आंख बंद किए लेटा हुआ था. लेकिन वह जाग रहा था.

चिंटू को पूरा यकीन था कि भाभी आएगी जरूर, चाहे किसी भी समय आए. दवा का असर खाली नहीं जा सकता. एक छोटी सी पुडि़या की आधी खुराक जब इतनी बड़ी भैंस को हीट पर ला सकती है, तो 50 किलो की औरत क्या चीज है.

आते ही दिव्या ने चिंटू के पास लेटते हुए कहा, ‘‘आज मैं तुम्हारे साथ सोना चाहती हूं. आओ, अपनी प्यास बुझा लो.’’

चिंटू तो ये शब्द सुनने के लिए महीनों से बेकरार था. वह लिपट गया. जी भर कर प्यार किया.

दिव्या फिर अपने कमरे में आई. कुछ देर आंखें बंद कर सोने की कोशिश की, लेकिन उसे नींद न आई. उस ने फिर ललचाई नजरों से मोहन की ओर देखा. जोश से भर कर उसे अपनी बांहों में कसना चाहा.

मोहन जाग गया और बोला, ‘‘दिव्या, क्या कर रही हो?’’ नींद टूटने से वह थोड़ा गुस्सा हो गया.

‘‘मैं नहीं जानती कि मुझे क्या हो गया है. मेरे शरीर में कोई ज्वालामुखी फट रहा है. मुझ से बरदाश्त नहीं हो रहा है,’’ वह तड़पते हुए बोली.

मोहन ने दिव्या की ओर ध्यान से देखा. उस की हालत वाकई खराब थी. शरीर उघड़ा हुआ और बहुत गरम था. वह बहुत बेचैन थी.

मोहन ने हालात को भांप कर गांव में ही अपने दोस्त डाक्टर प्रशांत को फोन मिलाया, ‘‘यार, तुम्हारी भाभी की हालत बहुत खराब है. जल्द ही आओ.’’

‘इस समय रात के 2 बजे हैं.’

‘‘हां यार, समस्या गंभीर है. आना ही पड़ेगा.’’

डाक्टर प्रशांत आधे घंटे में हाजिर हो गया. उस ने दिव्या को चौंक कर देखा. ‘‘इन्होंने कोई बहुत ज्यादा गरम चीज खाई है. इस से पूरे शरीर पर एलर्जी हो सकती है. मामला कंट्रोल करने की कोशिश करता हूं, वरना तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ेगा.’’

इस के बाद डाक्टर ने 2 इंजैक्शन दिव्या को लगाए और कुछ खाने की दवाएं दीं. उसे तुरंत ही शांति मिल गई और वह सो गई.

चिंटू खुश था. उसे लग रहा था कि उस ने अपना बदला ले लिया. भाभी कहां तो सतीसावित्री बनती थी. फिर ऐसा जादू चला कि खुद ही खिंची चली आई.

कुछ दिन बाद देवरभाभी में फिर वही हंसीमजाक, छेड़खानी और शरारतों का सिलसिला शुरू हो गया.

एक दिन भाभी ने चिंटू के साथ कोई गंदी शरारत की तो उस ने भाभी को सबकुछ बता दिया. साथ ही, बाकी बची दवा की पुडि़या भी उस के हाथ में सौंप दी.

दिव्या को पहले तो गुस्सा आया, लेकिन फिर उस की आंखें शर्म से झुक गईं. वह अपने दोनों हाथ मुंह पर रख कर शरमाती हुई तेजी से चल दी. शायद वह चिंटू के सामने पहली बार शरमाई थी.

अब जब भी दिव्या भाभी चिंटू के सामने आ जाती है, थोड़ा सा मुसकराती है और नीची निगाह कर के निकल जाती है. Hindi Romantic Story

Family Story In Hindi: किराए की कोख – कौए के घोंसले में कोयल के अंडे

Family Story In Hindi: पूरे महल्ले में सब से खराब माली हालत महेंद्र की ही थी. इस शहर से कोसों दूर एक गांव से 2 साल पहले ही महेंद्र अपनी बीवी सुनीता और 2 बच्चों के साथ इस जगह आ कर बसा था. वह गरीबी दूर करने के लिए गांव से शहर आया था, लेकिन यहां तो उन का खानापीना भी ठीक से नहीं हो पाता था.

महेंद्र एक फैक्टरी में काम करता था और सुनीता घर पर रह कर बच्चों की देखभाल करती थी. बड़ा बेटा 5 साल से ऊपर का हो गया था, लेकिन अभी स्कूल जाना शुरू नहीं हो पाया था.

सुनीता काफी सोचती थी कि बच्चे को किसी अगलबगल के छोटे स्कूल में पढ़ने भेजने लगे, लेकिन चाह कर भी न भेज सकती थी.

जिस महल्ले में सुनीता रहती थी, उस महल्ले में सब मजदूर और कामगार लोग ही रहते थे. ठीक बगल के मकान में रहने वाली एक औरत के साथ सुनीता का उठनाबैठना था.

जब उस को सुनीता की मजबूरी पता लगी, तो उस ने सुनीता को खुद भी काम करने की सलाह दे डाली. उस ने एक घर में उस के लिए काम भी ढूंढ़ दिया.

सुनीता ने जब यह बात महेंद्र को बताई, तो वह थोड़ा हिचकिचाया, लेकिन सुनीता का सोचना ठीक था, इसलिए वह कुछ कह नहीं सका.

सुनीता उस औरत द्वारा बताए गए घर में काम करने जाने लगी. वह काफी बड़ा घर था. घर में केवल 2 लोग ममता और रमन पतिपत्नी ही थे, जो किसी बड़ी कंपनी में काम करते थे.

दोनों का स्वभाव सुनीता के प्रति बहुत नरम था. ममता तो आएदिन सुनीता को तनख्वाह के अलावा भी कुछ न कुछ चीजें देती ही रहती थी.

रमन और ममता के पास किसी चीज की कोई कमी नहीं थी, लेकिन घर में एक भी बच्चा नहीं था.

रविवार के दिन ममता और रमन छुट्टी पर थे. काम खत्म कर सुनीता जाने को हुई, तो ममता ने उसे बुला कर अपने पास बिठा लिया. वह सुनीता से उस के परिवार के बारे में पूछती रही.

सुनीता को ममता की बातों में बड़ा अपनापन लगा, तो वह अचानक ही

उस से पूछ बैठी, ‘‘जीजी, आप के कोई बच्चा नहीं हुआ क्या?’’

ममता ने मुसकरा कर सुनीता की तरफ देखा और धीरे से बोली, ‘‘नहीं, लेकिन तुम यह क्यों पूछ रही हो?’’

सुनीता ने ममता की आवाज को भांप लिया था. वह बोली, ‘‘बस जीजी, ऐसे ही पूछ रही थी. घर में कोई बच्चा न हो, तो अच्छा नहीं लगता न. शायद आप को ऐसा महसूस होता हो.’’

ममता की आंखें उसी पर टिक गई थीं. वह भी शायद इस बात को शिद्दत से महसूस कर रही थी.

ममता बोली, ‘‘तुम सही कहती हो सुनीता. मैं भी इस बात को ले कर चिंता में रहती हूं, लेकिन कर भी क्या सकती हूं? मैं मां नहीं बन सकती, ऐसा डाक्टर कहते हैं…’’

यह कहतेकहते ममता का गला भर्रा गया था. सुनीता भी आगे कुछ कहने की हिम्मत न कर सकी थी. उस के पास शायद इस बात का कोई हल नहीं था.

ममता और रमन शादी से पहले एक ही कंपनी में काम करते थे, जहां दोनों में मुहब्बत हुई और उस के बाद दोनों ने शादी कर ली. कई साल तक दोनों ने बच्चा पैदा नहीं होने दिया, लेकिन बाद में ममता मां बनने के काबिल ही न रही. इस बात को ले कर दोनों परेशान थे.

सुनीता को ममता के घर काम करते हुए काफी दिन हो गए थे. ममता का मन जब भी होता, वह सुनीता को अपने पास बिठा कर बातें कर लेती थी. पर अब सुनीता ममता से बच्चा न होने या होने को ले कर कोई बात नहीं करती थी. दिन ऐसे ही गुजर रहे थे.

एक दिन ममता ने सुनीता को आवाज दी और उसे साथ ले कर अपने कमरे में पहुंच गई. उस ने सुनीता को अपने पास ही बिठा लिया.

सुनीता अपनी मालकिन ममता के बराबर में बैठने से हिचकती थी, लेकिन ममता ने उसे हाथ पकड़ कर जबरदस्ती बिठा ही लिया.

ममता ने सुनीता का हाथ अपने हाथ में लिया और बोली, ‘‘सुनीता, तुम से एक काम आ पड़ा है, अगर तुम कर सको तो कहूं?’’

ममता के लिए सुनीता के दिल में बहुत इज्जत थी, भला वह उस के किसी काम के लिए क्यों मना कर देती. वह बोली, ‘‘जीजी, कैसी बात करती हो? आप कहो तो सही, न करूं तो कहना.’’

ममता ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, ‘‘सुनीता, डाक्टर कहता है कि मैं मां तो बन सकती हूं, लेकिन इस के लिए मुझे किसी दूसरी औरत का सहारा लेना पड़ेगा… अगर तुम चाहो, तो इस काम में मेरी मदद कर सकती हो.’’

ममता की बात सुन कर सुनीता का मुंह खुला का खुला रह गया. उस को यकीन न होता था कि ममता उस से इतने बड़े व्यभिचार के बारे में कह सकती है.

सुनीता साफ मना करते हुए बोली, ‘‘जीजी, मैं बेशक गरीब हूं, लेकिन अपने पति के होते किसी मर्द की परछाईं तक को न छुऊंगी. आप इस काम के लिए किसी और को देख लो.’’

ममता हैरत से बोली, ‘‘अरे बावली, तुम से पराया मर्द छूने को कौन कहता है… यह सब वैसा नहीं है, जैसा तुम सोच रही हो. इस में सिर्फ लेडी डाक्टर के अलावा तुम्हें कोई नहीं छुएगा. यह समझे कि तुम सिर्फ अपनी कोख में बच्चे को पालोगी, जबकि सबकुछ मैं और मेरे पति करेंगे.’’

सुनीता की समझ में कुछ न आया था. सोचा कि भला ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई आदमी औरत को छुए भी नहीं और वह मां बन जाए.

सुनीता को हैरान देख कर ममता बोल पड़ी, ‘‘क्या सोच रही हो सुनीता? तुम चाहो तो मैं सीधे डाक्टर से भी बात करा सकती हूं. जब तुम पूरी तरह संतुष्ट हो जाओ, तब ही तैयार होना.’’

सुनीता हिचकिचाते हुए बोली, ‘‘जीजी, मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूं… अगर मैं तैयार हो भी जाऊं, तो मेरे पति इस बात के लिए नहीं मानेंगे.’’

ममता हार नहीं मानना चाहती थी. आखिर उस के मन में न जाने कब से मां बनने की चाहत पल रही थी. वह बोली, ‘‘तुम इस बात की चिंता बिलकुल मत करो. मैं खुद घर आ कर तुम्हारे पति से बात करूंगी और इस काम के लिए तुम्हें इतना पैसा दूंगी कि तुम 2 साल भी काम करोगी, तब भी कमा नहीं पाओगी.’’

सुनीता यह सब तो नहीं चाहती थी, लेकिन ममता से मना करने का मन भी नहीं हो रहा था.

काम से लौटने के बाद सुनीता ने अपने पति से सारी बात कह दी. महेंद्र इस बात को सिरे से खारिज करता हुआ बोला, ‘‘नहीं, कोई जरूरत नहीं है इन लोगों की बातों में आने की. कल से काम पर भी मत जाना ऐसे लोगों के यहां. ये अमीर लोग होते ही ऐसे हैं.

‘‘मैं तो पहले ही तुम्हें मना करने वाला था, लेकिन तुम ने जिद की तो कुछ न कह सका.’’

सुनीता को ऐसा नहीं लगता था कि ममता दूसरे अमीर लोगों की तरह है. वह उस के स्वभाव को पहले भी परख चुकी थी. वह बोली, ‘‘नहीं, मैं यह बात नहीं मान सकती. ऐसी मालकिन मिलना आज के समय में बहुत मुश्किल काम है. आप उन को सब लोगों की लाइन में खड़ा मत करो.’’

महेंद्र कुछ कहता, उस से पहले ही कमरे के दरवाजे पर किसी के आने की आहट हुई, फिर दरवाजा बजाया गया.

सुनीता को ममता के आने का एहसास था. उस ने झट से उठ कर दरवाजा खोला, तो देखा कि सामने ममता खड़ी थी.

सुनीता के हाथपैर फूल गए, खुशी के मारे मुंह से बात न निकली, वह अभी पागलों की तरह ममता को देख ही रही थी कि ममता मुसकराते हुए बोल पड़ी, ‘‘अंदर नहीं बुलाओगी सुनीता?’’ सुनीता तो जैसे नींद से जागी थी.

वह हड़बड़ा कर बोली, ‘‘हांहां जीजी, आओ…’’ यह कहते हुए वह दरवाजे से एक तरफ हटी और महेंद्र से बोली, ‘‘देखोजी, अपने घर आज कौन आया है… ये जीजी हैं, जिन के घर पर मैं काम करने जाती हूं.’’

महेंद्र ने ममता को पहले कभी देखा तो नहीं था, लेकिन अमीर पहनावे और शक्लसूरत को देख कर उसे समझते देर न लगी. उस ने ममता से दुआसलाम की और उठ कर बाहर चल दिया.

ममता ने उसे जाते देखा, तो बोल पड़ी, ‘‘भैया, आप कहां चल दिए? क्या मेरा आना आप को अच्छा नहीं लगा?’’

महेंद्र यह बात सुन कर हड़बड़ा गया. वह बोला, ‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तो इसलिए जा रहा था कि आप दोनों आराम से बात कर सको.’’

ममता हंसते हुए बोली, ‘‘लेकिन भैया, मैं तो आप से ही बात करने आई हूं. आप भी हमारे साथ बैठो न.’’

महेंद्र न चाहते हुए भी बैठ गया. ममता का इतना मीठा लहजा देख वह उस का मुरीद हो गया था. उस के दिमाग में अमीरों को ले कर जो सोच थी, वह जाती रही.

सुनीता सामने खड़ी ममता को वहीं बिछी एक चारपाई पर बैठने का इशारा करते हुए बोली, ‘‘जीजी, मेरे घर में तो आप को बिठाने के लिए ठीक जगह भी नहीं, आप को आज इस चारपाई पर ही बैठना पड़ेगा.’’

ममता मुसकराते हुए बोली, ‘‘सुनीता, प्यार और आदर से बड़ा कोई सम्मान नहीं होता, फिर क्या चारपाई और क्या बैड. आज तो मैं तुम्हारे साथ जमीन पर ही बैठूंगी.’’

इतना कह कर ममता जमीन पर पड़ी एक टाट की बोरी पर ही बैठ गई.

सुनीता ने लाख कहा, लेकिन ममता चारपाई पर न बैठी. हार मान कर सुनीता और महेंद्र भी जमीन पर ही बैठ गए. सुनीता ने नजर तिरछी कर महेंद्र को देखा, फिर इशारों में बोली, ‘‘देख लो, तुम कहते थे कि हर अमीर एकजैसा होता है. अब देख लिया.’’

महेंद्र से आदमी पहचानने में गलती हुई थी. तभी ममता अचानक बोल पड़ी, ‘‘सुनीता, क्या तुम मुझे चाय नहीं पिलाओगी अपने घर की?’’

सुनीता के साथसाथ महेंद्र भी खुश हो गया. एक करोड़पति औरत गरीब के घर आ कर जमीन पर बैठ चाय पिलाने की गुजारिश कर रही थी.

सुनीता तो यह सोच कर चाय न बनाती थी कि ममता उस के घर की चाय पीना नहीं चाहेंगी. जब खुद ममता ने कहा, तो वह खुशी से पागल हो उठी,

महेंद्र और सुनीता की इस वक्त ऐसी हालत थी कि ममता इन दोनों से इन की जान भी मांग लेती, तो भी ये लोग मना न करते.

चाय बनी, तो सब लोग चाय पीने लगे. इतने में सुनीता का छोटा बेटा जाग गया. ममता ने उसे देखा तो खुशी से गोद में उठा लिया और उस से बातें करने में मशगूल हो गई.

महेंद्र और सुनीता यह सब देख कर बावले हुए जा रहे थे. उन्हें ममता में एक अमीर औरत की जगह अपने घर की कोई औरत नजर आ रही थी.

थोड़ी देर बाद ममता ने बच्चे को सुनीता के हाथों में दे दिया और महेंद्र की तरफ देख कर बोली, ‘‘भैया, मैं कुछ बात करने आई थी आप से. वैसे, सुनीता ने आप को सबकुछ बता दिया होगा.

‘‘भैया, मैं आप को यकीन दिलाती हूं कि सुनीता को सिर्फ लेडी डाक्टर के अलावा कोई और नहीं छुएगा. यह इस तरह होगा, जैसे कोयल अपने अंडे कौए के घोंसले में रख देती है और बच्चे अंडों से निकल कर फिर से कोयल के हो जाते हैं, अगर आप…’’

महेंद्र ममता की बात पूरी होने से पहले ही बोल पड़ा, ‘‘बहनजी, आप जैसा ठीक समझे वैसा करें. जब सुनीता को आप अपना समझती हैं, तो फिर मुझे किसी बात से कोई डर नहीं. इस का बुरा थोड़े ही न सोचेंगी आप.’’

ममता खुशी से उछल पड़ी. सुनीता महेंद्र को मुंह फाड़े देखे जा रही थी. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि महेंद्र इतनी जल्दी हां कह सकता है. लेकिन महेंद्र तो इस वक्त किसी और ही फिजा में घूम रहा था. कोई करोड़पति औरत उस के घर आ कर झोली फैला कर उस से कुछ मांग रही थी, फिर भला वह कैसे मना कर देता.

ममता हाथ जोड़ कर महेंद्र से बोली, ‘‘भैया, मैं आप का यह एहसान जिंदगीभर नहीं भूलूंगी,’’ यह कहते हुए ममता ने अपने मिनी बैग से नोटों की एक बड़ी सी गड्डी निकाल कर सुनीता के हाथों में पकड़ा दी और बोली, ‘‘सुनीता, ये पैसे रख लो. अभी और दूंगी. जो इस वक्त मेरे पास थे, वे मैं ले आई.’’

सुनीता ने हाथ में पकड़े नोटों की तरफ देखा और फिर महेंद्र की तरफ देखा. महेंद्र पहले से ही सुनीता के हाथ में रखे नोटों को देख रहा था.

आज से पहले इन दोनों ने कभी इतने रुपए नहीं देखे थे, लेकिन महेंद्र कम से कम ममता से रुपए नहीं लेना चाहता था, वह बोला, ‘‘बहनजी, ये रुपए हम लोग नहीं ले सकते. जब आप हमें इतना मानती हैं, तो ये रुपए किस बात के लिए?’’

ममता ने सधा हुआ जवाब दिया, ‘‘नहीं भैया, ये तो आप को लेने ही पड़ेंगे. भला कोई और यह काम करता, तो वह भी तो रुपए लेता, फिर आप को क्यों न दूं?

‘‘और ये रुपए दे कर मैं कोई एहसान थोड़े ही न कर रही हूं.’’

इस के बाद ममता वहां से चली गई. महेंद्र ने ममता के जाने के बाद रुपए गिने. पूरे एक लाख रुपए थे. महेंद्र और सुनीता दोनों ही आज ममता के अच्छे बरताव से बहुत खुश थे. ऊपर से वे एक लाख रुपए भी दे गईं. ये इतने रुपए थे कि 2 साल तक दोनों काम करते, तो भी इतना पैसा जोड़ न पाते.

दोनों के अंदर आज एक नया जोश था. अब न किसी बात से एतराज था और न किसी बात पर कोई सवाल.

जल्द ही सुनीता को ममता ने डाक्टर के पास ले जा कर सारा काम निबटवा दिया. वह सुनीता के साथ उस के पति महेंद्र को भी ले गई थी, जिस से उस के मन में कोई शक न रहे.

ममता ने अब सुनीता से घर का काम कराना बंद कर दिया था. घर के काम के लिए उस ने एक दूसरी औरत को रख लिया था. सुनीता को खाने के लिए ममता ने मेवा से ले कर हर जरूरी चीज अपने पैसों से ला कर दे दी थी. साथ ही, एक लाख रुपए और भी नकद दे दिए थे.

ममता नियमित रूप से सुनीता को देखने भी आती थी. उस ने महेंद्र और सुनीता से उस के घर चल कर रहने के लिए भी कहा था, लेकिन महेंद्र ने वहां रहने के बजाय अपने घर में ही रहना ठीक सम?ा.

जिस समय सुनीता अपने पेट में बच्चे को महसूस करने लगी थी, तब से न जाने क्यों उसे वह अपना लगने लगा था. वह उसे सबकुछ जानते हुए भी अपना मान बैठी थी.

जब बच्चा होने को था, तब एक हफ्ता पहले ही सुनीता को अस्पताल में भरती करा दिया गया था. जिस दिन बच्चा हुआ, उस दिन तो ममता सुनीता को छोड़ कर कहीं गई ही न थी. सुनीता को बेटा हुआ था.

ममता ने सुनीता को खुशी से चूम लिया था. उस की खुशी का ठिकाना नहीं था. लेकिन सुनीता को मन में अजीब सा लग रहा था. उस का मन उस बच्चे को अपना मान रहा था.

अस्पताल से निकलने के बाद ममता ने सुनीता को कुछ दिन अपने पास भी रखा था. उस के बाद उस ने सुनीता को और 50 हजार रुपए भी दिए.

सुनीता अपने घर आ गई, लेकिन उस का मन न लगता था. जो बच्चा उस ने अपनी कोख में 9 महीने रखा, आज वह किसी और का हो चुका था. पैसा तो मिला था, लेकिन बच्चा चला गया था.

सुनीता का मन होता था कि बच्चा फिर से उस के पास आ जाए, लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकता था. उस की कोख किसी और के बच्चे के लिए किराए पर जो थी. Family Story In Hindi

Story In Hindi: लाल कमल – उम्मीद की किरण बना आईएएस आनंद

Story In Hindi: आईएएस यानी भारतीय प्रशासनिक सेवा में आने के बाद आनंद अभी बेंगलुरु में एक ऊंचे प्रशासनिक पद पर काम कर रहा है.

महात्मा गांधी की पुकार पर साल 1942 के आंदोलन में स्कूल छोड़ कर देश की आजादी के लिए कूद पड़ने वाले करमना गांव के आदित्य गुरुजी के पोते आनंद को देश और समाज के प्रति सेवा करने की लगन विरासत में मिली है.

आनंद बचपन से ही अपने तेज दिमाग, बड़ेबुजुर्गों के प्रति आदर और हमउम्र व बच्चों के बीच मेलजोल के साथ पढ़नेलिखने व खेलनेकूदने में भाग लेने के चलते बहुत लोकप्रिय था.

गांवसमाज के हर तीजत्योहार, शादीब्याह, रीतिरिवाज में आनंद को उमंग के साथ हिस्सा लेने में बहुत खुशी होती थी. केवल छात्र जीवन में ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक सेवा में आने के बाद भी होलीदशहरा में वह गांव आने का मौका निकाल ही लेता था.

इस बार मार्च महीने में दफ्तर के कुछ काम से उसे पटना जाना था. पटना आने के बाद आनंद ने एक दिन गांव जाने का प्रोग्राम बनाया.

आनंद को गांव आ कर काफी अच्छा लगता है, पर अब यहां बहुतकुछ बदल गया है.

यह बात आज के बच्चे सोच भी नहीं सकते कि जहां पहले कभी कच्ची सड़क पर बैलगाड़ी और टमटम के अलावा कोई दूसरी सवारी नहीं हुआ करती थी, वहां अब पक्की रोड पर

बसें और आटोरिकशा 12 किलोमीटर दूर रेलवे स्टेशन तक जाने के लिए हर 15 मिनट पर तैयार मिल जाते हैं.

यहां तक कि पटना से निकलने वाले सभी अखबार अब इस गांव में आते हैं और हौकर इन्हें घरघर तक पहुंचा जाता है. साथ ही, टैलीविजन पर भी अब हर छोटीबड़ी खबर और मनोरंजन के तमाम कार्यक्रमों समेत नईपुरानी फिल्में भी देखने को मिल जाती हैं.

अब आनंद के बाबूजी तो रहे नहीं, पर चाचा और चाची रहते हैं. उसे देखते ही उन के चेहरे पर खुशी की चमक आंखों में नमी लिए पसर गई.

आनंद ने चाचा के पैर छुए. उन्होंने उस के सिर को दोनों हाथों में ले कर चूमते हुए ढेर सारा आशीर्वाद दिया.

चाची दोनों की बातें सुनते हुए अंदर से बाहर आ गई थीं. आनंद ने उन के भी पैर छुए.

चाची ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘हम कह रहे थे कि आनंद हम को देखे बिना जा ही नहीं सकता.’’

‘‘कैसे हैं आप लोग?’’ आंखों में भर आए आंसुओं को रूमाल से पोंछते हुए आनंद ने पूछा.

‘‘तुम्हारे जैसे बेटे के रहते हमें क्या हो सकता है? हम भलेचंगे हैं. लो, कुछ चायनाश्ता कर के थोड़ा आराम कर लो, तब तक मैं खाना तैयार कर लेती हूं,’’ कह कर चाची अंदर चल पड़ीं.

‘‘बहुत परेशान न होइएगा चाची. सादा खाना ही ठीक रहेगा,’’ आनंद ने कहा और चायनाश्ता करते हुए चाचा से अपने खेतखलिहान के साथ ही साफ बागबगीचे, गांवसमाज की बातें करने लगा.

चाची के हाथ का बना खाना खाते हुए आनंद को बरबस ही बचपन की यादें ताजा हो आईं.

खाना खाने के बाद आनंद ने कुछ देर आराम किया. शाम को चाचा ने फागू को बुलाया. उन्होंने सरसों के सूखे डंठलों को खलिहान से मंगवा कर परिवार के सदस्यों की संख्या के हिसाब से एक ज्यादा होल्लरी यानी लुकाठी बनवाई.

होलिका दहन के लिए गांव की तय जगह पर लोग समय पर इकट्ठा हो गए थे. आनंद भी चाचा के जोर देने पर वहां पहुंच गया था.

वैसे, होली के इस मौके पर होने वाली हुल्लड़बाजी और नशे के असर से सहीगलत न समझ पाने वाले नौजवानों की हरकतों को आनंद बचपन से ही नापसंद करता रहा है.

आनंद को यह बात तो अच्छी लगती कि होलिका दहन में गांवमहल्ले की बहुत सी गंदगी, बेकार की चीजें, जो सही माने में बुराई की प्रतीक हैं, जला कर आबोहवा को कुछ हद तक साफ करने में मदद मिलती है. परंतु वह यह भी मानता है कि होलिका दहन के ढेर से उठती आग की लपटों से कभीकभार आसपास के हरेभरे पेड़ों और मकानों को पहुंचने वाले नुकसान से इस को मनाने के सही ढंग पर नए सिरे से सोचना चाहिए.

आनंद को देख कर गांव के बहुत से नौजवान लड़के उस के पास आ गए. उन सभी लड़कों ने अपने मातापिता से आनंद के बारे में पहले ही बहुतकुछ सुन रखा था. वे अपने बच्चों को आनंद जैसा बनने की सीख देते थे.

आनंद को भी उन से मिल कर बहुत अच्छा लगा.

आनंद ने उन नौजवानों से दोस्त की तरह कई बातें कीं, फिर होलिका दहन के बारे में भी अपने मन की बातें उन से साझा कीं. वे सभी आनंद जैसे एक बड़े ओहदे वाले शख्स की इतनी अपनेपन भरी बातों से बहुत ज्यादा प्रभावित थे.

एक लड़के सुंदर ने आगे आते हुए कहा, ‘‘आनंद अंकल, हम आप से वादा करते हैं कि आगे से सावधान रहेंगे और किसी भी दुर्घटना की नौबत नहीं आने देंगे.’’

सुधीर ने भी भरोसा दिलाते हुए कहा, ‘‘अंकल, आज होली के नाम पर न तो कोई गंदे गाने गाएगा और न ही गंदी हरकत करेगा.’’

और सच में ही उस शाम के होलिका दहन को बड़ी सादगी से मनाया गया.

आनंद ने सभी को होली की मिठाई खिलाई. उस के बाद वह अपने चाचा के साथ घर लौट आया.

चैत्र पूर्णिमा की रात थी. दालान में चारपाई पर लेटे आनंद को चांदनी में नहाई रात काफी अच्छी लग रही थी. नींद की गहराई में धीरेधीरे उतरते हुए भी आनंद के कानों में होली के गीत सुनाई पड़ रहे थे.

अचानक ही तभी कुत्तों के भूंकने की आवाजों को बीच गांव के लोगों की घबराहट भरी आवाजों का शोर जोर पकड़ता हुआ सुनाई पड़ा.

‘‘मालिक, गोलीबंदूक के साथ बसहा गांव वाले फसल लगे खेतों की सीमा पर आ कर लड़नेमरने को तैयार खड़े हैं,’’ दीनू को अपने चाचा से यह कहते हुए सुन कर चौंकता हुआ आनंद झटके से उठ बैठा.

आनंद ने अपने मोबाइल फोन से कुछ संबंधित बड़े पुलिस अफसरों से बात करने की कोशिश की.

रास्ते में दीनू ने बताया कि आधी रात के बाद गांव के कुछ अंधविश्वासी लोग देवी मां के मंदिर में जमा हुए थे.

तांत्रिक इच्छा भगत ने पहले देवी मूर्ति की लाल उड़हुल के फूलों, रोली, अबीरगुलाल से पूजा की थी, उस के बाद एक तगड़ा काला कुत्ता भैरों के रूप में वहां लाया गया.

वहां जुटे लोगों ने खुद शराब पीने के साथसाथ उस कुत्ते को भी शराब पिलाई और फूलमाला से पूजा की गई.

नए साल में अपने गांव की खुशहाली और पुराने साल आई मुसीबतों को हमेशा के लिए भगाने के लिए उन्होंने करायल, अरंडी का तेल, पीली सरसों, लाल मिर्च, सिंदूर, चावल वगैरह को एक छोटे मिट्टी के बरतन में ढक कर भैरों कहे जाने वाले कुत्ते की गरदन में बांध दिया.

तांत्रिक इच्छा भगत ने मंदिर से एक जलता हुआ दीया उठा कर कुत्ते की गरदन में सामान समेत बंधे मिट्टी के बरतन में सावधानीपूर्वक रख दिया. फिर दीए की गरमी से परेशान कुत्ता भूंकता हुआ बसहा गांव की तरफ दौड़ पड़ा.

इच्छा भगत और कुछ लोग इस बात को पक्का करना चाहते थे कि वह कुत्ता वापस उन के अपने गांव में न लौटे.

उधर खेतों की रखवाली कर रहे बसहा गांव के कुछ किसानों ने दूसरे छोर पर आग की लपटों के साथ कुत्ते की गुर्राहट भरी आवाज सुनी. कुछ ही देर में पकने को तैयार गेहूं की फसल लपटों में झालसने लगी थी.

रखवाली कर रहे किसानों को पूरा माजरा समझाने में ज्यादा समय नहीं लगा. उन्होंने दौड़ कर तमाम गांव वालों को बुला लिया. ट्यूबवैल चला कर पानी से आग बुझाने के साथसाथ कुछ लोग गोलीबंदूक के साथ इस घटना के पीछे रहे करमना गांव को सबक सिखाने को ललकारने लगे थे. हवा में गोलियों की आवाजें गूंजने लगी थीं.

इस से पहले कि करमना गांव के कुछ अंधविश्वासी और नासमझ तत्त्वों की शरारत के कारण पड़ोसी गांव वालों की होली की खुशी खूनखराबे और मातम की भेंट चढ़ जाती, आनंद अपने साथ जिला मजिस्ट्रेट और एसपी की टीम मौके पर ले कर पहुंच गया. उस ने गुस्साए लोगों को समझाबुझा कर शांत किया.

अंधविश्वास में ‘भैरव टोटका’ करने वाले इच्छा भगत व दूसरे लोगों को पुलिस पकड़ कर वहां थोड़ी ही देर में पहुंच गई.

आनंद के कहने पर उन लोगों ने बसहा गांव के लोगों से अपने गलत अंधविश्वास के चलते किए गए काम के लिए माफी मांगी.

‘‘हम आप के पैर पकड़ते हैं भैया, हमें माफ कर दीजिए. हम शपथ लेते हैं कि आगे से नासमझ और अंधविश्वास से भरा कोई काम नहीं करेंगे.’’

तब तक आग बुझाने के लिए फायर ब्रिगेड की टीम भी वहां आ चुकी थी.

तेजी से किए गए बचाव काम से आग को ज्यादा फैलने के पहले ही बुझाने में कामयाबी मिल गई थी.

आनंद ने गांव वालों की ओर से हुई गलती के लिए माफी मांगते हुए कहा, ‘‘रघुवीर, मैं तुम्हारे जज्बात को अच्छी तरह समझ सकता हूं… अपनी जिस फसल को खूनपसीना बहा कर तुम ने तैयार किया है, उस के खेत में इस तरह जल जाने के चलते हुए दिल के घाव को भरना किसी के लिए मुमकिन नहीं है. फिर भी करमना गांव के लोगों की ओर से मैं खुद जिम्मेदारी लेता हूं कि तुम्हें जो भी नुकसान हुआ है, उसे हमारे द्वारा कल ही पूरा किया जाएगा.’’

अपने खेत की तैयार फसल के जलने से नाराज रघुवीर कुसूरवारों को सबक सिखाने पर आमादा था, पर अपने स्कूल के दिनों में सही बात से आगे बढ़़ने की प्रेरणा देने वाले आदित्य गुरुजी जैसे आनंद के रूप में अभी वहां आ खड़े हो गए थे, इसलिए वह अपने गुस्से पर काबू कर गया.

रघुवीर आनंद के पैरों पर झाकता हुआ बोला, ‘‘माफ करें सर. आप की हर बात मेरे सिरआंखों पर.’’

आनंद ने रघुवीर को गले लगाते हुए कहा, ‘‘उठो रघुवीर, अब बसहापुर गांव और करमना गांव आपस में

मिल कर एकदूसरे की मुसीबतों को मिटाते हुए खुशियां लाने के लिए हमेशा तैयार रहेंगे. तुम बिलकुल चिंता मत करो.

‘‘इस बार गांव के स्कूल वाले मैदान में करमना और बसहा दोनों गांव मिल कर एकसाथ होली मनाएंगे.’’

वहां जमा दोनों गांवों के लोगों के चेहरे पर खुशी की लाली चमक उठी. ‘हांहां’ के साथ ‘होली है होली है’ की आवाजें चिडि़यों की चहचहाहट भरे माहौल में गूंज उठीं.

उसी समय गांव के पूर्वी आकाश में सूरज एक लाल कमल की तरह खिलता नजर आ रहा था. Story In Hindi

Family Story In Hindi: सौतेली मां – हामिद की दूसरी शादी

Family Story In Hindi: हामिद की शादी आज से 5 साल पहले पास के ही एक गांव में चांदनी नाम की लड़की से हुई थी. चांदनी सिर्फ नाम की ही चांदनी नहीं थी, बल्कि उस की खूबसूरती के चर्चे आसपास के गांवों में आएदिन सुनने को मिलते रहते थे. वह बला की खूबसूरत और गदराए बदन की मालकिन थी.

चांदनी की बड़ीबड़ी आंखें, सुर्ख होंठ, गुलाबी गाल, पतली कमर देख कर ऐसे लगता था जैसे आसमान की कोई अप्सरा उतर कर जमीन पर आ गई हो. यही वजह थी कि हामिद पहली ही नजर में चांदनी की खूबसूरती का दीवाना हो गया था और शादी के फौरन बाद उसे अपने साथ मुंबई ले आया था.

हामिद मुंबई में सेल्समैन था. उस की अच्छीखासी कमाई थी. चांदनी को हामिद के साथ किसी बात की कोई कमी न थी. हामिद चांदनी का ऐसा दीवाना था कि वह हर साल उस के लिए कोई न कोई सोने का जेवर बनवाता रहता था.

हामिद को चांदनी से 5 साल के अंदर 3 बच्चे पैदा हुए थे. सब से पहले बेटी और उस के बाद 2 बेटे. हामिद और चांदनी अपने बच्चों के साथ खुशीखुशी रह रहे थे. घर में किसी चीज की कोई कमी न थी. हर साल हामिद अपने बीवीबच्चों के साथ गांव आताजाता रहता था.

चांदनी एक गरीब परिवार की लड़की थी. चांदनी के घर में उस की बेवा मां, 2 छोटी बहनें और एक छोटा भाई था, जिन की गुजरबसर खेतों में काम कर के होती थी. चांदनी अपनी मां की पैसे से मदद करती रहती थी. उस की शादी को 15 साल कब गुजर गए, पता ही नहीं चला.

हामिद ने अपनी बीवी चांदनी के नाम उसी के गांव में 10 लाख रुपए का एक खेत खरीद लिया था. यही हामिद की सब से बड़ी भूल थी, जिस की वजह से चांदनी अपनी मनमानी करने लगी थी. हामिद मुंबई में ही रह रहा था. उसे यहां एक छोटी से खोली में रहते हुए काफी दिन बीत गए थे.

बच्चे बड़े हो रहे थे, इसलिए वह मुंबई में एक बड़ा घर खरीदना चाहता था. उस ने चांदनी से बात की कि गांव की जमीन बेच देते हैं और यहां घर खरीद लेते हैं. चांदनी तैयार हो गई, पर जब हामिद अपनी बीवी के साथ खेत बेचने गांव पहुंचा, तो चांदनी की मां ने चांदनी को भड़का दिया, ‘‘जमीन तेरे नाम है.

तू क्यों बेच रही है? अपने नाम की चीज मत बेच. तेरे बुरे वक्त में काम आएगी.’’ चांदनी अपनी मां के बहकावे में आ गई और हामिद से टालमटोल करने लगी. हामिद ने उसे समझाया, ‘‘इस खेत की कीमत भी अच्छी मिल रही है और हमें मुंबई में रहना है. वहां हमें बड़ा और सस्ता घर मिल रहा है.

ग्राहक तैयार है.’’ लेकिन चांदनी ने साफ मना कर दिया, ‘‘यह खेत मेरे नाम है और मैं इसे नहीं बेचूंगी.’’ हामिद ने चांदनी को बहुत समझाया, पर वह नहीं मानी. बातों ही बातों में झगड़ा होने लगा.

हामिद ने चांदनी के एक थप्पड़ मारते हुए कहा, ‘‘जब बेचना नहीं था तो मुंबई से क्यों आई? और मैं ने इसे तेरे नाम इसलिए खरीदा था कि औरत के नाम खरीदने से कम खर्चा होता है. अब हमें पैसे की जरूरत है, तो तुम मुझे धोखा दे रही हो.’’

हामिद का थप्पड़ मारना हुआ कि चांदनी की मां ने फौरन पुलिस को बुला लिया. पुलिस दोनों को थाने ले गई. दोनों की बात सुनी और उन्हें झगड़ा न करने की सलाह दी. पर अगले ही दिन चांदनी और उस की मां ने हामिद पर दहेज और खर्चे का दावा कर दिया और उस में हामिद की कमाई 80,000 रुपए महीना लिखवा दी.

उधर हामिद ने भी अपने वकील के जरीए चांदनी पर रुखसती और मानहानि का दावा कर दिया. हामिद के वकील ने चांदनी के मुताबिक बताए गए 80,000 रुपए महीने की कमाई के हिसाब से 14 साल की कमाई की चोरी का इलजाम चांदनी और उस की मां पर लगाया और कहा कि जब तुम ने बताया कि हामिद महीने के इतने सारे रुपए कमाता है, तो उस की 14 साल की कमाई कहां है? उस के नाम क्या है? तुम ने सब पैसा अपनी मां को दे दिया.

मामला बढ़ गया. मुकदमेबाजी शुरू हो गई. चांदनी अपनी मां के घर जा कर बैठ गई. उस ने बच्चों तक की सुध न ली. 7 महीने बरबाद करने के बाद हामिद अपने बच्चों को ले कर मुंबई वापस अपने काम पर लौट आया.

कुछ ही महीनों बाद हामिद की मुलाकात सोशल मीडिया पर शबनम से हो गई. दोनों की प्यार भरी बातें होने लगीं. हामिद ने शबनम को अपने और चांदनी के साथसाथ बच्चों के बारे में सब बता दिया. शबनम की उम्र महज 22 साल थी, जबकि हामिद की उम्र 45 साल थी, फिर भी दोनों के सिर पर प्यार का उफान चढ़ने लगा और एक दिन शबनम ने हामिद से कहा, ‘‘मुझे तुम से शादी करनी है.

मेरे मांबाप तो मानेंगे नहीं, अगर तुम मुझ से प्यार करते हो तो अपना पता और मुंबई आने का टिकट भेज दो. मैं मौका पा कर तुम्हारे पास आ जाऊंगी और हम शादी कर लेंगे.’’ हामिद को शबनम की यह बात जम गई और उस ने शबनम के लिए टिकट भेज दिया.

शबनम मौका देख कर मुंबई आ गई और वहां हामिद ने शबनम से कोर्टमैरिज कर ली. हामिद और शबनम दोनों खुशीखुशी रहने लगे. शबनम के आने से हामिद के बच्चे भी खुश रहने लगे. शबनम बच्चों का खयाल सगी मां से भी ज्यादा करती थी.

उन के खानेपीने का खूब खयाल रखती थी. खुद पढ़ीलिखी होने की वजह से शबनम बच्चों को खुद पढ़ाती थी. उस ने बच्चों के ऊपर इतनी मेहनत की कि वे तीनों अपनीअपनी क्लास में अव्वल आए. शादी के एक साल बाद शबनम को भी एक बेटा हुआ, जिसे पा कर हामिद और शबनम की खुशी का ठिकाना न रहा, लेकिन वक्त के साथसाथ शबनम का हामिद के बच्चों से प्यार कम होता गया.

अब वह हामिद के पहले बच्चों को नजरअंदाज करने लगी और बातबात पर उन्हें मारनेपीटने लगी. इस बात से बच्चे पूरी तरह सहम गए थे. वे शबनम से खौफ खाने लगे थे.

अब उन का पढ़ाई में भी दिल नहीं लगता था. शबनम ने हामिद से कहना शुरू कर दिया कि इन बच्चों का पढ़ाई में मन नहीं लगता. लड़की की पढ़ाई बंद करो. मैं भी दिनभर काम कर के थक जाती हूं. काम के बाद इस छोटे बच्चे को भी संभालना पड़ता है.

लड़की घर पर रहेगी, तो मेरे साथ घर के कामकाज में हाथ बंटाएगी. पहले तो हामिद ने मना किया, पर शबनम की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा और इस तरह हामिद की पहली बच्ची का भविष्य घर की चारदीवारी में कैद हो कर रह गया.

दिनभर घर का काम करने के बाद भी उस लड़की को पेट भर खाना नहीं मिलता था और छोटी सी उम्र में ही वह घर में बाल मजदूर की तरह जिंदगी बिताने के लिए मजबूर हो गई. अभी बड़ी बेटी का भविष्य अंधकारमय हुए 3 महीने ही हुए थे कि शबनम ने हामिद के बड़े बेटे की भी पढ़ाई बंद करने का मशवरा देते हुए कहा कि अब उसे अपने साथ काम पर लगाओ, ताकि तुम्हें भी कुछ आराम मिल जाए.

अगर उसे पढ़ना है तो रात वाले सरकारी स्कूल में दाखिला करा दो. अपने छोटे बेटे का भी उसी सरकारी स्कूल में दाखिला करा दो. इस से बच्चों की फीस बचेगी और किताबें व ड्रैस भी स्कूल से मुफ्त में मिल जाएंगी. हामिद को शबनम की यह बात बुरी लगी.

उस ने शबनम को समझाया, ‘‘वे तीनों मेरी औलाद हैं और मैं किस के लिए कमा रहा हूं. आज मैं जिंदा हूं तो अपनी औलाद के लिए. इन्हीं के लिए मैं मेहनत कर रहा हूं. बच्चे अगर मेरे पास न होते तो आज मैं भी न होता. ‘‘मर तो मैं उसी दिन गया था, जब चांदनी ने मुझे धोखा दिया था.

इन बच्चों की खातिर मैं ने जीने की हिम्मत की और तुम इन का ही भविष्य बरबाद करने पर तुली हो.’’ यह सुन कर शबनम खफा हो गई. हामिद को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. शबनम के रूठने से वह बेचैन हो उठा. शबनम न खाना बना रही थी, न किसी से बात कर रही थी.

बच्चों की हालत और शबनम का रूखापन हामिद को अंदर ही अंदर खाए जा रहा था. वह सोच रहा था कि अगर शबनम भी उसे छोड़ कर चली गई तो बच्चों का क्या होगा? उस ने यही फैसला लिया कि शबनम की बात मान ली जाए. हामिद ने अपने बड़े बेटे को अपने ही साथ काम पर लगा लिया और दोनों बेटों का रात के सरकारी स्कूल में दाखिला करवा दिया.

उधर चांदनी भी मुंबई आ गई. उस ने यहां हामिद के खिलाफ फिर पुलिस में शिकायत दर्ज की. पुलिस ने हामिद और शबनम को पुलिस स्टेशन बुलाया और उस से पूछा, ‘‘अपनी पहली बीवी को छोड़ कर तुम इस के साथ क्यों रह रहे हो?’’ हामिद ने सब बातें बताईं.

पुलिस ने चांदनी को बोला, ‘‘तुम्हारा मामला कोर्ट में है. वहां से कोई और्डर मिलेगा तब आना.’’ हामिद और शबनम घर आ गए. अब शबनम हामिद से जिद करने लगी कि बच्चों को उन की मां चांदनी को दे दो, भले ही उन्हें यहां कोई घर किराए पर ले कर दे दो.

हामिद की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. शबनम बच्चों को अपने पास रखने से क्यों कतरा रही थी? शादी के एक साल तक तो उस ने इन बच्चों को अपने सगे बच्चों की तरह प्यार किया, आज जब इस के खुद का बेटा हो गया तो उन से नफरत करने लगी और जिद पर अड़ी हुई है कि इन बच्चों को इन की मां चांदनी को दे दो.

उधर चांदनी को पता नहीं इन बच्चों से क्या नफरत थी कि उस ने आज तक न तो इन्हें कोर्ट से मांगा और न ही कभी बच्चों से मिलने की ख्वाहिश जाहिर की. ऐसी हालत में कैसे चांदनी से कहा जाए कि बच्चों को तुम अपने पास रख लो? समय बीतता गया.

बच्चों का भविष्य चौपट होता गया. उन के चेहरे की खुशी दब कर रह गई. उन्हें देख कर ऐसा लगता था, जैसे बच्चे हंसना ही भूल गए हों. हामिद चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा था. वह फिर से उन के सिर से मां के साए को दूर नहीं करना चाहता था.

आज बच्चे भले ही परेशानी में थे, पर उन के पास मां तो थी. उन्हें जैसा भी खाना मिल रहा था, पर भूखे तो नहीं थे. हामिद कभी बच्चों के लिए बाहर से कुछ लाता तो शबनम बच्चों को नहीं देने देती थी. भले ही वे पेट भर कर नहीं खाते थे, पर थोड़ाबहुत तो उन्हें मिल ही जाता था.

शबनम का पूरा ध्यान अपनी कोख से जनमे बच्चे पर था. हामिद ने कभी सोचा भी नहीं था कि जिन बच्चों के लिए वह शादी कर रहा है और उन के लिए नई मां ला रहा है, वह उन के साथ सौतेला बरताव रखेगी. आज उसे अहसास हो रहा था कि उस ने अपने से कम उम्र की कुंआरी लड़की से शादी कर के सब से बड़ी भूल की थी.

आज उस की वजह से ही बच्चे गुमसुम हो गए थे. सौतेली मां से बच्चों को जो दुख मिल रहा था, वह वाकई बरदाश्त के बाहर था, पर हामिद कर भी क्या सकता था. वह इस दुखभरी जिंदगी को जीने के लिए मजबूर था. Family Story In Hindi

Hindi Family Story: मैले साब – कैसी थी हवलदार की मेहमाननवाजी

Hindi Family Story: हवलदार सिंह पुलिस में नहीं, बल्कि राजनीति में थे. वे अपने क्षेत्र के विधायक थे. गांव के लोग आदर से उन्हें ‘मैले साब’ बुलाते थे. इंगलिश का एमएलए बोलने में उन्हें थोड़ी मुश्किल आती थी. विधायकजी को भी इस उपनाम से एतराज नहीं था.

वोटरों के रुझान के मद्देनजर आम चुनाव के ठीक पहले ‘मैले साहब’ ने अपनी पार्टी से बगावत कर जनवादी मोरचा का दामन थाम लिया था. पूरे देश में जनवादी मोरचा के पक्ष में लहर चल रही थी.

चुनाव में अगड़ेपिछड़े दोनों का ठीकठाक सहयोग मिला और मैले साब की नैया पार लग गई. उन की विधायकी सलामत रही और पुरानी पार्टी के उम्मीदवार की जमानत तक जब्त हो गई. राजधानी में उन का पुराना बंगला उन के ही कब्जे में रह गया.

मैले साब के परिवार में उन की पत्नी और 2 बेटियां थीं. पिछली विधायकी में ही बेटियों की जिम्मेदारी से मुक्त हो चुके थे. बेटियां ससुराल में खुश थीं. पत्नी उन के साथ ही विधायक आवास में रहती थीं. वे अकसर बीमार रहती थीं. कोविड काल में संक्रमित हुईं और अस्पताल से लौट नहीं पाईं.

गांव के पुश्तैनी मकान की देखरेख रघु करता था. घर की साफसफाई, रसोई, खेतीबारी वही देखता था. बेटियां, दामाद और बच्चे विधायक आवास पर ही आना पसंद करते थे. रघु 25 साल का हट्टाकट्टा नौजवान था और अभी कुंआरा था.

‘‘जल्दी कोई अच्छी लड़की देख कर शादी कर लो… रसोई से फुरसत ले कर खेतीबारी पर मन लगाओ…’’ मैले साब को अपनी जायदाद की चिंता थी. खेती से होने वाली सालाना आमदनी से वे संतुष्ट नहीं थे.

‘‘मैना मौसी ने लड़की पसंद कर रखी है… महीनेभर की छुट्टी लगेगी…’’ रघु ने बताया. उस की मैना मौसी का गांव पास के दूसरे जिले में था. पिछले साल तक दोनों गांव एक ही जिले में आते थे.

‘‘रजनी के बच्चों की छुट्टियां हैं… गांव आने की बात है… मैं सलाह कर के महीनेभर की छुट्टी पक्की कर दूंगा…’’ मैले साहब ने भरोसा दिलाया. रजनी उन की बड़ी बेटी थी.

रघु जब 9 साल का था, तभी उस की मां कालाजार के चपेट में आ कर गुजर गई थी. मैना मौसी ने उसे अपने पास रखा था. पिछले चुनाव में रघु ने दोस्तों के साथ अपने गांव का पोलिंग बूथ का जिम्मा लिया था. इसी दौरान जानपहचान हुई और भरोसा कर मैले साब ने गांव की अपनी गृहस्थी रघु को सौंप दी.

शादी हफ्तेभर में निबट गई. मौसी ने नई बहू को अपने ही पास रखने की बात कही.

‘‘खेतीबारी का काम तो कुछ महीनों का होता है. फुरसत मिले, आ जाना. सीता पढ़ीलिखी और होशियार है. गांव के स्कूल में बच्चों को पढ़ाती है… हफ्तेभर की भी छुट्टी होगी तो तुम्हारे पास आ जाएगी,’’ मौसी ने रघु और सीता को पास बुला कर सुझाया. सीता अपने स्कूल की नौकरी से जुड़ी थी. उसे बच्चों से काफी लगाव था.

रघु लौट कर आया तो मैले साब घर पर ही थे. बेटीदामाद, नातीनातिन सब थे. घर में चहलपहल थी. रघु मेहमानों की खातिर में जुट गया. बच्चों ने रघु अंकल से दोस्ती कर ली.

बेटीदामाद और बच्चों को विदा कर मैले साब उदास हो गए थे. उन की बड़ी बेटी अपनी मां पर गई थी. मैले साब को पत्नी की बहुत याद आ रही थी.

‘‘ह्विस्की मिलेगी…’’ मैले साब ने रघु को बुलाया… डर था… प्रदेश में शराबबंदी लागू थी.

‘‘ह्विस्की का तो पता नहीं था… चोरीछिपे देशी बिकती है…’’ रघु बोला.

‘‘नींद लाने के लिए कुछ तो करना पड़ेगा… जुगाड़ लगाओ…’’ मैले साब ने कहा.

रघु ने अपने दोस्तों से बात की… मनोहर ने गिरधारी का नाम लिया… गिरधारी शराबी और गंजेड़ी था.

‘‘शराबबंदी की ऐसीतैसी… ह्विस्की और देशी सब मिलेगी… रोकड़ा मांगता… दारू और छोकरी होना… और जिंदगी में क्या रखा है… सरकार की…’’ गिरधारी ने सरकार को गंदी गाली दी.

रघु ह्विस्की और देशी दोनों ले आया.

रघु ने चखने में भुनी मछली और बकरे का गोश्त बनाया. चखना, दारू की बोतल और गिलास बैठक में सजा कर रख दिया.

मैले साब को शराब थोड़ी चढ़ी तो बड़बड़ाने लगे… रघु को पास बुलाया और पीने की जिद की.

नानुकर करते हुए रघु ने देशी की आधी बोतल गटक ली.

‘‘मेरे पास टाइम किधर है… देश की राजधानी में मिनिस्टर बनूंगा… इधर

पूरी हवेली तुम्हारे नाम कर दूंगा… परिवार के साथ यहीं रहो… फूलोफलो… खुश रहो…’’

नशे में धुत्त मैले साब जमीन पर ही पसर गए… कुछ ही देर में खर्राटे भरने लगे.

अगले हफ्ते मैले साब राजधानी चले गए. पार्टी के एमएलए की खरीदफरोख्त और पाला बदलने की खबर थी. महामहिम के पास हाजिरी लगानी थी.

दशहरे की छुट्टी आने वाली थी. सीता को रघु के साथ रहने का ज्यादा मौका नहीं मिला था. स्कूल की दूसरी टीचर छेड़ती थी.

सरोज अकसर तंग किया करती थी… वह पेट से थी… 5वां महीना चल रहा था.

‘‘सैयां बसे परदेस… रैना कैसे बीते पिया बिन…’’ सरोज उसे छेड़ने का कोई मौका नहीं छोड़ती थी. सीता का भी मन मचल रहा था.

रघु को सीता को साथ लाने में कोई परेशानी नहीं थी. धान की फसल की कटाई पूरी हो चुकी थी. सीता के साथ मैना मौसी भी आई थी. मैले साब का मकान हवेलीनुमा था. सीता को छोड़ कर मौसी दूसरे ही दिन वापस चली गई.

शादी के बाद पहली बार कुछ दिनों के लिए साथ रहने का मौका मिला था. पूरी आजादी थी. सीता रघु की मांसल बांहों और मर्दानगी पर फिदा हो चुकी थी. वह रघु की बांहों में चिपकी रहती थी. रघु के साथ खेतों में ट्रैक्टर पर मस्ती करती थी.

इस बीच अचानक मैले साब का इनोवा गाड़ी में आना हुआ. बड़ी गाड़ी में सूबे के बड़े मिनिस्टर आए थे.

रघु मेहमान की खातिरदारी में जुट गया. सीता को रसोई संभालनी पड़ी. मिनिस्टर के साथ कई बौडीगार्ड जीप से आए थे.

चखने और दारू की फरमाइश हुई. गिरधारी ने रम और ह्विस्की के लिए हरे नोटों की गड्डियां ऐंठी. इस धंधे से उस की काफी अच्छीखासी कमाई होती थी. छापामारी होने पर महकमे के अफसर को नजराना देना पड़ता था.

मिनिस्टर साहब देर रात तक पीते रहे. सरकार पलटने की साजिश नाकाम कर पाने की खुशी थी.

सीता ने खाना परोसा था. वह मेहमानों के पास जाने से हिचकिचा रही थी. मैले साब ने रघु को मजबूर किया, तो घूंघट निकाल कर खाना परोसने आई.

घूंघट में उस की सूरत तो छिप गई, पर गदराया बदन और मस्त जवानी ने मिनिस्टर साहब को पागल बना दिया था.

मिनिस्टर साहब बिस्तर में पड़ेपड़े करवटें बदल रहे थे. बेचैनी हो रही थी. सीता भी गई थी. रात रंगीन कर अपनी प्यास और सफर की थकान मिटाना चाहते थे.

देर रात मिनिस्टर साहब ने रघु को अपने कमरे में बुलाया और अपना घिनौना प्रस्ताव रखा.

‘‘बस, एक रात की बात है… मुझे तुम्हारी जोरू से जबरदस्ती नहीं करनी… इस में मजा नहीं आता… पूरी कीमत मिलेगी…’’ मिनिस्टर साहब ने अपने गले से सोने की मोटी चेन और हीरे की कीमती अंगूठी निकाली. मुंहमांगी रकम भी देने का लालच दे कर रघु को राजी करने की कोशिश की.

‘‘गरीब की आबरू से खिलवाड़ मत करो साहब… हम दोनों ने आप की सेवा की है… इस का तो खयाल करो…’’ रघु ने साफ इनकार कर दिया. वह बेहद गुस्से में था, पर लाचार था.

सूबे के मिनिस्टर के सामने उस की हैसियत ही क्या थी. अपनी जान की कीमत पर भी सीता की आबरू बचाने को तैयार था. सीता उस की पत्नी, उस की जीवनसंगिनी थी.

मैले साब गहरी नींद में थे. उन को घटनाक्रम की बिलकुल खबर नहीं थी. मिनिस्टर साहब और रघु के बीच की तनातनी से उन की नींद उचट गई.

रघु ने किस्सा बयान किया, तो उन्हें बेहद बुरा लगा. मैले साब को अपने मेहमान से ऐसी बेहूदगी की उम्मीद नहीं थी.

‘‘सीता मेरी बेटी है… मेरी तीसरी बेटी… मेरे पुश्तैनी मकान की वारिस…’’ मैले साब ने ऐलान किया.

सीता भावुक हो गई. उसे भरोसा हुआ… वह फफक पड़ी. मैले साब ने उसे गले से लगा लिया.

मिनिस्टर साहब का नशा काफूर हो चुका था. भोरअंधेरे उन्होंने ड्राइवर को बुलाया और अपनी इनोवा में चुपचाप निकल गए. वैसे, वे अपनी इस करतूत पर शर्मिंदा नहीं थे. हवलदार सिंह उर्फ मैले साब की मेहमाननवाजी पसंद नहीं आई थी. वे अगले चुनाव में सबक सिखाने की सोच रहे थे. Hindi Family Story

Story In Hindi: अफसोस – बाबा के चंगुल में शादीशुदा सायरा

Story In Hindi: सायरा की शादी अब्दुल से  5 साल पहले हुई थी. अब्दुल की उम्र उस समय 30 साल थी और सायरा की उम्र सिर्फ 20 साल. अब्दुल देखने में सीधासादा, सांवले रंग का था, पर एक अच्छीखासी जायदाद का मालिक भी था. यही वजह थी कि सायरा और उस की मां ने अब्दुल को पसंद किया था.

शादी से पहले ही सायरा ने अब्दुल को अच्छी तरह देखभाल लिया था, जबकि सायरा के बाप और भाई इस शादी के खिलाफ थे. लेकिन सायरा और उस की मां की जिद के आगे उन की एक न चली और जल्द ही वे दोनों शादी के रिश्ते में बंध गए.सायरा जैसी बीवी पा कर अब्दुल की खुशी का ठिकाना न रहा. हो भी क्यों न… सायरा थी ही बला की खूबसूरत. उस के सुर्ख गुलाबी होंठ ऐसे लगते थे मानो गुलाब की पंखुड़ी खिलने के लिए बेताब हो.

जब सायरा हंसती थी तो उस सफेद दांत ऐसे लगते थे मानो मुंह से मोती बिखर रहे हों. लंबे, काले और घने बालों ने तो उस की खूबसूरती में चार चांद लगा दिए थे. उस की पतली कमर और गदराए बदन का तो कहना ही क्या था.शादी को अभी 4 साल ही गुजरे थे कि उन के घर में 3 बच्चों की किलकारियां गूंज चुकी थीं. सायरा की मां भी अपनी बेटी के साथ मुंबई में रहने के लिए आ गई थी.अब्दुल की दुकान भी बढि़या चल रही थी. घर में किसी बात की कोई कमी न थी.

अभी भी अब्दुल सायरा के साथ किराए के घर में रह रहा था, क्योंकि मुंबई में घर खरीदना इतना आसान न था. पर अब्दुल की कमाई इतनी थी कि बच्चों की अच्छी परवरिश और अच्छा खानपान आसानी से हो रहा था.पर एक बात बड़ी अजीब थी.

अब्दुल को देख कर कभी सायरा की दोस्त तो कभी सायरा के रिश्तेदार उसे यह तंज कसते रहते थे कि ‘तुम ने अब्दुल में क्या देख कर शादी की… कहां वह सांवला और बदसूरत, इतनी बड़ी उम्र का और कहां तुम बिलकुल हीरोइन सी खूबसूरत’.शुरूशुरू में तो सायरा उन सब की बातों को नजरअंदाज करती रही, लेकिन बारबार सब से यही बातें सुनसुन कर उस के भी दिल में भी अब्दुल के लिए नफरत जागने लगी. अब वह अब्दुल से कटीकटी सी रहने लगी.

एक दिन सायरा की मां ने उसे मशवरा दिया कि अब्दुल अपने गांव की सारी जमीन बेच दे और यहां मुंबई में अपना बड़ा फ्लैट खरीद ले. सायरा ने जैसे ही यह बात अब्दुल के सामने रखी, वह तुरंत तैयार हो गया और गांव जा कर अपने अब्बा और भाइयों से अपने हिस्से को बेचने की बात कही.

अब्दुल के अब्बा और भाइयों ने उसे काफी समझाया, पर उस ने किसी की न सुनी और अपनी बात पर अटल रहा. जल्द ही उस के अब्बा को उस के आगे झुकना पड़ा और अपना बाग, खेत और उस के हिस्से की दुकान बेचनी पड़ी. इस जल्दबाजी के सौदे में अब्दुल के भाई को काफी नुकसान उठाना पड़ा.

अब्दुल ने वापस आ कर मुंबई में  2 कमरों का फ्लैट खरीद लिया. कुछ महीनों तक तो सबकुछ सही चला, पर अब सायरा के दोस्तों की तादाद बढ़ चुकी थी. सायरा की मां भी ब्यूटीपार्लर जा कर स्मार्ट बन कर रहने लगी. अब आएदिन घर पर कोई न कोई इन दोनों की दोस्त आती रहती थीं और अब्दुल को देख कर उस पर तंज कसती रहती थीं.

अब तो खुद सायरा और उस की मां भी अब्दुल का मजाक उड़ाने में पीछे नहीं रहती थीं. अब्दुल इतना ज्यादा बेवकूफ था कि उस ने सायरा को तो पूरी आजादी दे रखी थी और खुद दिनरात काम में इतना बिजी रहता था कि उसे अपने हुलिए को सुधारने का भी खयाल नहीं आता था.

यही वजह थी कि सायरा धीरेधीरे उस से दूर होती जा रही थी. वह चाहती थी कि अब्दुल उस के नाम घर कर दे, पर अब्दुल तैयार न हुआ. सायरा ने अब्दुल से बातचीत बंद कर दी.सायरा की मां और उस की दोस्तों ने सायरा को एक बाबा का पता बताया और कहा कि बाबा ऐसा तावीज देंगे कि अब्दुल तुम्हारी उंगलियों पर नाचेगा.

अगले दिन सायरा और उस की मां बाबा के पास पहुंच गईं और सारी बात बताई. बाबा उन की बातों को सुन कर समझ चुका था कि ये लालची लोग हैं, इन्हें लूटा जाए. बाबा ने कहा, ‘‘काम तो हो जाएगा, लेकिन इस में एक महीना लगेगा और तकरीबन 5 लाख रुपए का खर्च आएगा. धीरेधीरे अब्दुल के दिमाग को काबू में करना पड़ेगा, जिस से वह तुम्हारी हर बात मान ले. इस में 7 बकरों की कुरबानी देनी पड़ेगी.

‘‘कुछ तावीज अब्दुल के तकिए के नीचे सावधानी से रखने होंगे. उसे पता न चले. कुछ तावीज तुम्हें पहनने होंगे, जो जाफरान से बनाए जाएंगे. पहले 2 लाख रुपए एडवांस और 3 लाख रुपए एक हफ्ते बाद देने पड़ेंगे.’’सायरा और उस की मां तैयार हो गईं.

अगले दिन सायरा ने उस ढोंगी बाबा को पैसे दिए और बाबा ने उसे 3 तावीज अब्दुल के तकिए के भीतर रखने के लिए दे दिए और 7 तावीज सायरा को देते हुए बोला, ‘‘ये तावीज पानी में डाल कर एकएक कर के 7 दिन तक पी लेना और हां, जब तक काम पूरा न हो जाए, तुम अपने शौहर के पास बिलकुल मत सोना.’’अब सायरा और उस की मां को पूरा भरोसा हो गया था कि अब्दुल उन का कहना मानेगा और वह घर हमारे नाम कर देगा.सायरा ने अब्दुल से बात करना बंद कर दिया. अब्दुल जब भी सायरा से बात करने की कोशिश करता, तो वह एक ही जवाब देती कि ‘पहले यह घर मेरे नाम करो. जब तक तुम मेरी बात नहीं मानोगे, मेरे साथ बात मत करना और न ही मेरे पास आना’.

अब्दुल ने सायरा को समझाने की पूरी कोशिश की, ‘‘हमारे इस झगड़े में बच्चों पर गलत असर पड़ रहा है. मेहरबानी कर के यह झगड़ा बंद कर दो.’’पर सायरा उस की एक भी बात सुनने को तैयार न थी. इस झगड़े से अब्दुल का कारोबार भी दिन ब दिन बिखरता जा रहा था.अब्दुल ने सोचा, ‘क्यों न सायरा के नाम वसीयत कर दूं… वह भी खुश हो जाएगी…’ और उस ने अगले दिन सायरा से कहा, ‘‘मैं तुम्हारे नाम वसीयत कर देता हूं. इस के बाद तो तुम खुश हो जाओगी न?’’

यह सुन कर सायरा बोली, ‘‘ठीक है, मैं कल वकील को बुला लेती हूं. तुम मेरे नाम वसीयत कर दो.’’अब्दुल यह सुन कर खुश हो गया कि अब झगड़ा खत्म हो जाएगा और उस ने मुहब्बत भरी नजरों से सायरा को देखा और अपनी बांहों में भर लिया.सायरा एक ही झटके में अब्दुल से अलग होते हुए बोली, ‘‘पहले वसीयत तो करो, उस के बाद मेरे पास आना.’’अब्दुल खुश था कि एक ही दिन की तो बात है. कल वह सायरा के नाम वसीयत कर देगा, तो फिर उस से ढेर सारा प्यार करेगा.

पर अब्दुल इस बात से अनजान था कि कल क्या ड्रामा होने वाला है. सायरा ने जब अपनी मां से इस बात का जिक्र किया, तो वह झट से बोली, ‘‘बाबाजी के तावीज का असर हो रहा है. इस बारे में पहले बाबाजी से बात करते हैं, उस के बाद कोई फैसला लेना. जब वह वसीयत के लिए तैयार हो गया है तो जल्द ही तुम्हारे नाम घर करने के लिए भी तैयार हो जाएगा, बस तुम थोड़ा सब्र करो.’’

उन्होंने जब बाबा से इस बारे में बात की, तो उन्होंने यही बोला, ‘‘एक हफ्ते में इतना असर हो गया है, तुम बाकी रकम ले कर मेरे पास आ जाओ. मैं तुम्हें कल और तावीज देता हूं. 7 बकरों की कुरबानी भी देनी है, फिर देखना कि तुम जैसा चाहोगी, वैसा ही होगा.’’अगले दिन सायरा ने अपनी बांहें अब्दुल के गले में डालते हुए कहा, ‘‘वकील कल आएगा जानू. तुम अभी काम पर जाओ.

रात में बात करते हैं.’’अब्दुल के जाते ही दोनों मांबेटी ने अब्दुल के रखे हुए पैसों में से बाकी के पैसे भी उठा लिए और उस ढोंगी बाबा के पास पहुंच गईं. बाबा ने उन से पैसे लिए और तावीज देते हुए कहा, ‘‘अभी 7 दिन का और  इंतजार करो. उसे अपने पास बिलकुल मत आने देना. इस बीच अगर वह तुम्हारा कहना मान ले, तो जल्दी उस काम को अंजाम दे देना, उस के बाद ही अपनेआप को छूने देना.’’

शाम को जब अब्दुल घर आया, तो मौका देख कर उस ने सायरा को अपनी बांहों में जकड़ लिया. सायरा झल्लाते हुए फौरन अलग हो गई. उस की आवाज सुन कर मां भी वहां आ गईं और अब्दुल को बुराभला कहते हुए बोलीं, ‘‘क्यों मेरी लड़की को परेशान करता रहता है? जब इस ने मना कर दिया है, तो क्यों इस के कमरे में आता है?’’

अब्दुल यह सब देख कर हैरान था, पर वह कुछ न बोल सका और चुपचाप अपने कमरे में चला गया.अगले दिन वकील आया, तो सायरा ने अब्दुल को फोन कर के घर बुला लिया. अब्दुल ने वकील से कहा, ‘‘मुझे अपनी बीवी सायरा के नाम वसीयत बनानी है कि मेरे मरने के बाद यह घर मेरी बीवी को मिले.’’इस पर सायरा और उस की मां बिफर गईं. सायरा बोली, ‘‘कोई वसीयत नहीं… क्या पता कि तुम बाद में बदल जाओ. घर मेरे नाम पर करो.’’अब्दुल इस बात के लिए तैयार नहीं हुआ.

अब्दुल ने सायरा को काफी समझाया. उस के हाथ जोड़े, पैर पकड़े. अपने मासूम बच्चों का वास्ता दिया, लेकिन सायरा अपनी जिद पर कायम रही और उस ने अब्दुल की एक न सुनी, क्योंकि उसे पूरा यकीन था कि बाबाजी उस का दिमाग जरूर बदलेंगे और यह घर उस का हो जाएगा.इसी बीच सायरा की मुलाकात अपने पहले आशिक से हो गई, जो शादी से पहले उस से प्यार करता था.

सायरा अपनी मां की मौजूदगी में ही उस से मिलने जाने लगी, क्योंकि वह आशिक उस की मां की दूर की बहन का बेटा था. उस की मां भी उसे पसंद करती थी, मगर गरीब होने की वजह से इन दोनों की शादी न हो पाई थी. अब्दुल इस बात से अनजान था. वह इसी उम्मीद में था कि एक न एक दिन सायरा को अपनी गलती का अहसास होगा.लेकिन अब्दुल का ऐसा सोचना गलत था. सायरा अपने उस आशिक के साथ खुश थी, जो उस का ही हमउम्र और खूबसूरत था.

अब तो सायरा अब्दुल की सूरत भी देखना पसंद नहीं करती थी. वह तो इस ताक में थी कि किसी तरह यह घर मिल जाए, फिर इसे बेच कर जिंदगी की नई शुरुआत करे.अब्दुल काफी हताश हो चुका था. आखिर वह दिन भी आ गया, जब अब्दुल ने अपना घर सायरा के नाम कर दिया.

घर नाम होते ही सायरा और उस की मां की खुशी का ठिकाना न रहा. अब तो सायरा का आशिक खुलेआम उस के घर पर आने लगा. अब्दुल कुछ बोलता तो मांबेटी उसे धमका देती थीं.अब्दुल अपना दिमागी संतुलन खो रहा था. वह तो सायरा की याद में गुम रहता, लेकिन सायरा उसे कोई भाव न देती. आखिर सायरा और उस की मां ने अब एक नया दांव चला.

उन्हें किसी भी कीमत पर अब्दुल से छुटकारा चाहिए था. जब आसपड़ोस के लोग सायरा को समझाते तो वह उन से बोलती कि अब्दुल नामर्द है. अब्दुल इन सब बातों से अनजान पागलों की तरह जिंदगी गुजार रहा था. उस की इस हालत के बारे में जब अब्दुल के भाइयों को पता चला, तो वे उसे लेने मुंबई आ गए. उन्होंने सायरा से बात की, तो वह तपाक से बोली, ‘‘मैं एक नामर्द के साथ जिंदगी नहीं गुजार सकती. मुझे इस से तलाक चाहिए.’’

अब्दुल ने जब यह सुना, तो वह दंग रह गया. कुछ ही दिनों में अब्दुल और सायरा का तलाक हो गया. अब्दुल के भाई उसे और उस के बच्चों को गांव ले गए. धीरेधीरे अब्दुल की तबीयत में सुधार आने लगा. अब उसे अपने बच्चों की फिक्र थी. वह उन के लिए कुछ करना चाहता था. एक दिन अब्दुल के पार्टनर का फोन आया और उस ने उस से वापस मुंबई आने को कहा. अब्दुल वापस मुंबई आ गया. उस के पार्टनर ने उस की दुकान और बचत उसे दी और काम संभालने को कहा.

इधर सायरा वह घर बेच कर कहीं और चली गई थी. उस का कुछ पता न था. वैसे, उड़तीउड़ती खबर अब्दुल को भी मिलती रहती थी. अब्दुल के दोस्तों ने मिल कर उस की दूसरी शादी एक बेवा औरत से करवा दी, जिस के 2 मासूम बच्चे थे और कुछ ही दिनों में अब्दुल अपने बच्चों को भी ले आया.अब्दुल ने कड़ी मेहनत की और एक छोटी सी खोली खरीद ली.

वह अपने बीवीबच्चों के साथ बेहतर जिंदगी गुजरने लगा और दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करने लगा.उधर सायरा के आशिक ने सब पैसे घूमनेफिरने में उड़ा दिए और जब सब पैसे खत्म हो गए तो वह सायरा और उस की मां को छोड़ कर चला गया, क्योंकि उस ने सायरा से शादी नहीं की थी. वह तो केवल दौलत के लालच में उस के साथ रह रहा था.

सायरा और उस की मां को अब खाने के भी लाले पड़ने लगे और मजबूर हो कर दोनों मांबेटी को दूसरों के घरों में साफसफाई का काम करना पड़ रहा था.फिर एक दिन अचानक एक ऐसी घटना घटी, जिस ने सायरा को अपाहिज बना दिया. उसे लकवा मार गया था.

सायरा अब बिस्तर पर पड़ी सोचती रहती है कि अगर वह उस ढोंगी बाबा और अपनी मां के चक्कर में न पड़ती तो यह हालत न होती.सायरा की मां ने एक दिन अब्दुल को फोन किया और सारी बातें बताईं. अब्दुल उन के बताए हुए पते पर सायरा से मिलने गया. वहां का नजारा देख कर अब्दुल का दिल रो पड़ा. सायरा सूख कर कांटा हो चुकी थी. वह एक जिंदा लाश बन कर पलंग पर पड़ी थी. उस की एक गलती ने हंसताखेलता परिवार बरबाद कर दिया था. Story In Hindi

Best Hindi Story: तपस्या – शादी को लेकर शैली का प्रयास

Best Hindi Story: शैली उस दिन बाजार से लौट रही थी कि वंदना उसे रास्ते में ही मिल गई.

‘‘तू कैसी है, शैली? बहुत दिनों से दिखाई नहीं दी. आ, चल, सामने रेस्तरां में बैठ कर कौफी पीते हैं.’’

वंदना शैली को घसीट ही ले गई थी. जाते ही उस ने 2 कप कौफी का आर्डर दिया.

‘‘और सुना, क्या हालचाल है? कोई पत्र आया शिखर का?’’

‘‘नहीं,’’ संक्षिप्त सा जवाब दे कर शैली का मन उदास  हो गया था.

‘‘सच शैली कभी तेरे बारे में सोचती हूं तो बड़ा दुख होेता है. आखिर ऐसी क्या जल्दी पड़ी थी तेरे पिताजी को जो तेरी शादी कर दी? ठहर कर, समझबूझ कर करते. शादीब्याह कोई गुड्डे-गुडि़या का खेल तो है नहीं.’’

इस बीच बैरा मेज पर कौफी रख गया और वंदना ने बातचीत का रुख दूसरी ओर मोड़ना चाहा.

‘‘खैर, जाने दे. मैं ने तुझे और उदास कर दिया. चल, कौफी पी. और सुना, क्याक्या खरीदारी कर डाली?’’

पर शैली की उदासी कहां दूर हो पाई थी. वापस लौटते समय वह देर तक शिखर के बारे में ही सोचती रही थी. सच कह रही थी वंदना. शादीब्याह कोई गुड्डे – गुडि़या का खेल थोड़े ही होता है. पर उस के साथ क्यों हुआ यह खेल? क्यों?

वह घर लौटी तो मांजी अभी भी सो ही रही थीं. उस ने सोचा था, घर पहुंचते ही चाय बनाएगी. मांजी को सारा सामान संभलवा देगी और फिर थोड़ी देर बैठ कर अपनी पढ़ाई करेगी. पर अब कुछ भी करने का मन नहीं हो रहा था. वंदना उस की पुरानी सहेली थी. इसी शहर में ब्याही थी. वह जब भी मिलती थी तो बड़े प्यार से. सहसा शैली का मन और उदास हो गया था. कितना फर्क आ गया था वंदना की जिंदगी में और उस की  अपनी जिंदगी में. वंदना हमेशा खुश, चहचहाती दिखती थी. वह अपने पति के साथ  सुखी जिंदगी बिता रही थी. और वह…अतीत की यादों में खो गई.

शायद उस के पिता भी गलत नहीं होंगे. आखिर उन्होंने शैली के लिए सुखी जिंदगी की ही तो कामना की थी. उन के बचपन के मित्र सुखनंदन का बेटा था शिखर. जब वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था तभी  उन्होंने  यह रिश्ता तय कर दिया था. सुखनंदन ने खुद ही तो हाथ मांग कर यह रिश्ता तय किया था. कितना चाहते थे वह उसे. जब भी मिलने आते, कुछ न कुछ उपहार अवश्य लाते थे. वह भी तो उन्हें चाचाजी कहा करती थी.

‘‘वीरेंद्र, तुम्हारी यह बेटी शुरू से ही मां के अभाव में पली है न, इसलिए बचपन में ही सयानी हो गई है,’ जब वह दौड़ कर उन की खातिर में लग जाती तो वह हंस कर उस के पिता से कहते.

फिर जब शिखर इंजीनियर बन गया तो शैली के पिता जल्दी शादी कर देने के लिए दबाव डालने लगे थे. वह जल्दी ही रिटायर होने वाले थे और उस से पहले ही यह दायित्व पूरा कर लेना चाहते थे. पर जब सुखनंदन का जवाब आया कि शिखर शादी के लिए तैयार ही नहीं हो रहा है तो वह चौंक पड़े थे. यह कैसे संभव है? इतने दिनों का बड़ों द्वारा तय किया रिश्ता…और फिर जब सगाई हुई थी तब तो शिखर ने कोई विरोध नहीं किया था…अब क्या हो गया?

शैली के पिता ने खुद भी 2-1 पत्र लिखे थे शिखर को, जिन का कोई जवाब नहीं आया था. फिर वह खुद ही जा कर शिखर के बौस से मिले थे. उन से कह कर शायद जोर डलवाया था उस पर. इस पर शिखर का बहुत ही बौखलाहट भरा पत्र आया था. वह उसे ब्लैकमेल कर रहे हैं, यह तक लिखा था उस ने. कितना रोई थी तब वह और पिताजी से भी कितना कहा था, ‘क्यों नाहक जिद कर रहे हैं? जब वे लोग नहीं चाहते तो क्यों पीछे पड़े हैं?’

‘ठीक है बेटी, अगर सुखनंदन भी यही कहेगा तो फिर मैं अब कभी जोर नहीं दूंगा,’ पिताजी का स्वर निराशा में डूबा हुआ था.

तभी अचानक शिखर के पिता को दिल का दौरा पड़ा था और उन्होंने अपने बेटे को सख्ती से कहा था कि वह अपने जीतेजी अपने मित्र को दिया गया वचन निभा देना चाहते हैं, उस के बाद ही वह शिखर को विदेश जाने की इजाजत देंगे. इसी दबाव में आ कर शिखर  शादी के लिए तैयार हो गया था. वह तो कुछ समझ ही नहीं पाई थी.  उस के पिता जरूर बेहद खुश थे और उन्होंने कहा था, ‘मैं न कहता था, आखिर सुखनंदन मेरा बचपन का मित्र है.’

‘पर, पिताजी…’ शैली का हृदय  अभी  भी अनचाही आशंका से धड़क रहा था.

‘तू चिंता मत कर बेटी. आखिरकार तू अपने रूप, गुण, समझदारी से सब का  दिल जीत लेगी.’

फिर गुड्डेगुडि़या की तरह ही तो आननफानन में उस की शादी की सभी रस्में अदा हो गई थीं. शादी के समय भी शिखर का तना सा चेहरा देख कर वह पल दो पल के लिए आशंकाओं से घिर गई थी. फिर सखीसहेलियों की चुहलबाजी में सबकुछ भूल गई थी.

शादी के बाद वह ससुराल आ गई थी. शादी की पहली रात मन धड़कता रहा था. आशा, उमंगें, बेचैनी और भय सब के मिलेजुले भाव थे. क्या होगा? पर शिखर आते ही एक कोने में पड़ रहा था, उस ने न कोई बातचीत की थी, न उस की ओर निहार कर देखा था.

वह कुछ समझ ही नहीं सकी थी. क्या गलती थी उस की? सुबह अंधेरे ही वह अपना सामान बांधने लगा था.

‘यह क्या, लालाजी, हनीमून पर जाने की तैयारियां भी शुरू हो गईं क्या?’ रिश्ते की किसी भाभी ने छेड़ा था.

‘नहीं, भाभी, नौकरी पर लौटना है. फिर अमरीका जाने के लिए पासपोर्ट वगैरह भी बनवाना है.’

तीर की तरह कमरे से बाहर निकल गया था वह. दूसरे कमरे में बैठी शैली ने सबकुछ सुना था. फिर दिनभर खुसरफुसर भी चलती रही थी. शायद सास ने कहा था, ‘अमरीका जाओ तो फिर बहू को भी लेते जाना.’

‘ले जाऊंगा, बाद में, पहले मुझे तो पहुंचने दो. शादी के लिए पीछे पड़े थे, हो गई शादी. अब तो चैन से बैठो.’

न चाहते हुए भी सबकुछ सुना था शैली ने. मन हुआ था कि जोर से सिसक पड़े. आखिर किस बात के लिए दंडित किया जा रहा था उसे? क्या कुसूर था उस का?

पिताजी कहा करते थे कि धीरेधीरे सब का मन जीत लेगी वह. सब सहज हो जाएगा. पर जिस का मन जीतना था वह तो दूसरे ही दिन चला गया था. एक हफ्ते बाद ही फिर दिल्ली से अमेरिका भी.

पहुंच कर पत्र भी आया था तो घर वालों के नाम. उस का कहीं कोई जिक्र नहीं था. रोती आंखों से वह देर तक घंटों पता नहीं क्याक्या सोचती रहती थी. घर में बूढ़े सासससुर थे. बड़ी शादीशुदा ननद शोभा अपने बच्चों के साथ शादी पर आई थी और अभी वहीं थी. सभी उस का ध्यान रखते थे. वे अकसर उसे घूमने भेज देते, कहते, ‘फिल्म देख आओ, बहू, किसी के साथ,’ पर पति से अपनेआप को अपमानित महसूस करती वह कहां कभी संतुष्ट हो पाती थी.

शोभा जीजी को भी अपनी ससुराल लौटना था. घर में फिर वह, मांजी और बाबूजी ही रह गए थे. महीने भर के अंदर ही उस के ससुर को दूसरा दिल का दौरा पड़ा था. सबकुछ अस्तव्यस्त हो गया. बड़ी कठिनाई से हफ्ते भर की छुट्टी ले कर शिखर भी अमेरिका से लौटा था, भागादौड़ी में ही दिन बीते थे. घर नातेरिश्तेदारों से भरा था और इस बार भी बिना उस से कुछ बोले ही वह लौट गया था.

‘मां, तुम अकेली हो, तुम्हें बहू की जरूरत है,’ यह जरूर कहा था उस ने.

शैली जब सोचने लगती है तो उसे लगता है जैसे किसी सिनेमा की रील की तरह ही सबकुछ घटित हो गया था उस के साथ. हर क्षण, हर पल वह जिस के बारे में सोचती रहती है उसे तो शायद कभी अवकाश ही नहीं था अपनी पत्नी के बारे में सोचने का या शायद उस ने उसे पत्नी रूप में स्वीकारा ही नहीं.

इधर सास का उस से स्नेह बढ़ता जा रहा था. वह उसे बेटी की तरह दुलराने लगी थीं. हर छोटीमोटी जरूरत के लिए वह उस पर आश्रित होती जा रही थीं. पति की मृत्यु तो उन्हें और बूढ़ा कर गई थी, गठिया का दर्द अब फिर बढ़ गया था. कईर् बार शैली की इच्छा होती, वापस पिता के पास लौट जाए. आगे पढ़ कर नौकरी करे. आखिर कब तक दबीघुटी जिंदगी जिएगी वह? पर सास की ममता ही उस का रास्ता रोक लेती थी.

‘‘बहूरानी, क्या लौट आई हो? मेरी दवाई मिली, बेटी? जोड़ों का दर्द फिर बढ़ गया है.’’

मां का स्वर सुन कर तंद्रा सी टूटी शैली की. शायद वह जाग गई थीं और उसे आवाज दे रही थीं.

‘‘अभी आती हूं, मांजी. आप के लिए चाय भी बना कर लाती हूं,’’ हाथमुंह धो कर सहज होने का प्रयास करने लगी थी शैली.

चाय ले कर कमरे में आई ही थी कि बाहर फाटक पर रिकशे से उतरती शोभा जीजी को देखते ही वह चौंक गई.

‘‘जीजी, आप इस तरह बिना खबर दिए. सब खैरियत तो है न? अकेले ही कैसे आईं?’’

बरामदे में ही शोभा ने उसे गले से लिपटा लिया था. अपनी आंखों को वह बारबार रूमाल से पोंछती जा रही थी.

‘‘अंदर तो चल.’’

और कमरे में आते ही उस की रुलाई फूट पड़ी थी. शोभा ने बताया कि अचानक ही जीजाजी की आंखों की रोशनी चली गई है, उन्हें अस्पताल में दाखिल करा कर वह सीधी आ रही है. डाक्टर ने कहा है कि फौरन आपरेशन होगा. कम से कम 10 हजार रुपए लगेंगे और अगर अभी आपरेशन नहीं हुआ तो आंख की रोशनी को बचाया न जा सकेगा.

‘‘अब मैं क्या करूं? कहां से इंतजाम करूं रुपयों का? तू ही शिखर को खबर कर दे, शैली. मेरे तो जेवर भी मकान के मुकदमे में गिरवी  पड़े  हुए हैं,’’ शोभा की रुलाई नहीं थम रही थी.

जीजाजी की आंखों की रोशनी… उन के नन्हे बच्चे…सब का भविष्य एकसाथ ही शैली के  आगे घूम गया था.

‘‘आप ऐसा करिए, जीजी, अभी तो ये मेरे जेवर हैं, इन्हें ले जाइए. इन्हें खबर भी करूंगी तो इतनी जल्दी  कहां पहुंच पाएंगे रुपए?’’

और शैली ने अलमारी से निकाल कर अपनी चूडि़यां और जंजीर  आगे रख दी थीं.

‘‘नहीं, शैली, नहीं…’’ शोभा स्तंभित थी.

फिर कहनेसुनने के बाद ही वह जेवर लेने के लिए तैयार हो पाई थी. मां की रुलाई फूट पड़ी थी.

‘‘बहू, तू तो हीरा है.’’

‘‘पता नहीं शिखर कब इस हीरे का मोल समझ पाएगा,’’ शोभा की आंखों में फिर खुशी के आंसू छलक पड़े थे.

पर शैली को अनोखा संतोष  मिला था. उस के मन ने कहा, उस का नहीं तो किसी और का परिवार तो बनासंवरा रहे. जेवरों का शौक तो उसे वैसे ही नहीं था. और अब जेवर पहने भी तो किस की खातिर? मन की उसांस को उस ने दबा  दिया था.

8 दिन के बाद खबर मिली थी, आपरेशन सफल रहा. शिखर को भी अब सूचना मिल गई थी, और वह आ रहा था. पर इस बार शैली ने अपनी सारी उत्कंठा को दबा लिया था. अब वह किसी तरह का उत्साह  प्रदर्शित नहीं कर  पा रही थी. सिर्फ तटस्थ भाव से रहना चाहती थी वह.

‘‘मां, कैसी हो? सुना है, बहुत बीमार रही हो तुम. यह क्या हालत बना रखी है? जीजाजी को क्या हुआ था अचानक?’’ शिखर ने पहुंचते ही मां से प्रश्नों की झड़ी लगा दी.

‘‘मेरी  तो तबीयत तू देख ही रहा है, बेटे. बीच में तो और भी बिगड़ गई थी. बिस्तर से उठ नहीं पा रही थी. बेचारी बहू ने ही सब संभाला. तेरे जीजाजी  की तो आंखों की रोशनी ही चली गई थी. उसी समय आपरेशन नहीं होता तो पता नहीं क्या होता. आपरेशन के लिए पैसों का भी सवाल था, लेकिन उसी समय बहू ने अपने जेवर दे कर तेरे जीजाजी  की आंखों की रोशनी वापस ला दी.’’

‘‘जेवर दे दिए…’’ शिखर हतप्रभ था.

‘‘हां, क्या करती शोभा? कह रही थी कि तुझे खबर कर के रुपए मंगवाए तो आतेआते भी तो समय लग जाएगा.’’

मां बहुत कुछ कहती जा रही थीं पर शिखर के सामने सबकुछ गड्डमड्ड हो गया था. शैली चुपचाप आ कर नाश्ता रख गई थी. वह नजर उठा कर  सिर ढके शैली को देखता रहा था.

‘‘मांजी, खाना क्या बनेगा?’’ शैली ने धीरे से मां से पूछा था.

‘‘तू चल. मैं भी अभी आती हूं रसोई में,’’ बेटे के आगमन से ही मां उत्साहित हो उठी थीं. देर तक उस का हालचाल पूछती रही थीं. अपने  दुखदर्द  सुनाती रही थीं.

‘‘अब बहू भी एम.ए. की पढ़ाई कर रही है. चाहती है, नौकरी कर ले.’’

‘‘नौकरी,’’ पहली बार कुछ चुभा शिखर के मन में. इतने रुपए हर महीने  भेजता हूं, क्या काफी नहीं होते?

तभी उस की मां बोलीं, ‘‘अच्छा है. मन तो लगेगा उस का.’’

वह सुन कर चुप रह गया था. पहली बार उसे ध्यान आया, इतनी बातों के बीच इस बार मां ने एक बार भी नहीं कहा कि तू बहू को अपने साथ ले जा. वैसे तो हर चिट्ठी में उन की यही रट रहती थी. शायद अब अभ्यस्त हो गई हैं  या जान गई हैं कि वह नहीं ले जाना चाहेगा. हाथमुंह धो कर वह अपने किसी दोस्त से मिलने के लिए घर से निकला  पर मन ही नहीं हुआ जाने का.

शैली ने शोभा को अपने जेवर दे  दिए, एक यही बात उस  के मन में गूंज रही थी. वह तो शैली और उस के पिता  दोनों को ही बेहद स्वार्थी समझता रहा था जो सिर्फ अपना मतलब हल करना जानते हों. जब से शैली के पिता ने उस के बौस से कह कर उस पर शादी के लिए दबाव डलवाया था तभी से उस का मन इस परिवार के लिए नफरत से भर गया था और उस ने सोच लिया था कि मौका पड़ने पर वह भी इन लोगों से बदला ले कर रहेगा. उस की तो अभी 2-4 साल शादी करने की इच्छा नहीं थी, पर इन लोगों ने चतुराई से उस के भोलेभाले पिता को फांस लिया. यही सोचता था वह अब तक.

फिर शैली का हर समय चुप रहना उसे खल जाता. कभी अपनेआप पत्र भी तो नहीं लिखा था उस ने. ठीक है, दिखाती रहो अपना घमंड. लौट आया तो  मां ने उस का खाना परोस दिया था. पास ही बैठी बड़े चाव से खिलाती रही थीं. शैली रसोई में ही थी. उसे लग रहा था कि  शैली जानबूझ कर ही उस  के सामने आने से कतरा रही है.

खाना खा कर उस ने कोई पत्रिका उठा ली थी. मां और शैली ने भी खाना खा लिया था. फिर मां को दवाई  दे कर शैली मां  के कमरे से जुड़े अपने छोटे से कमरे में चली गई और कमरे की बत्ती जला दी थी.

देर तक नींद नहीं आई थी शिखर को. 2-3 बार बीच में पानी पीने के बहाने  वह उठा भी था. फिर याद आया था पानी का जग  तो शैली  कमरे में ही  रख गई थी. कई बार इच्छा हुई थी चुपचाप उठ कर शैली को  आवाज देने की. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आज  पहली बार उसे क्या हो रहा है. मन ही मन वह अपने परिवार के बारे में सोचता रहा था. वह सगा बेटा हो कर भी घरपरिवार का इतना ध्यान नहीं रख पा रहा था. फिर शैली तो दूसरे घर की है. इसे क्या जरूरत है सब के लिए मरनेखपने की, जबकि उस का पति ही उस की खोजखबर नहीं ले रहा हो?

पूरी रात वह सो नहीं सका था. दूसरा दिन मां को डाक्टर के यहां दिखाने के लिए ले जाने, सारे परीक्षण फिर से करवाने में बीता था.

सारी दौड़धूप में शाम तक काफी थक चुका था वह. शैली अकेली कैसे कर पाती होगी? दिनभर वह भी तो मां के साथ ही उन्हें सहारा दे कर चलती रही थी. फिर थकान के  बावजूद रात को मां से पूछ कर उस की पसंद के कई व्यंजन  खाने  में बना लिए थे.

‘‘मां, तुम लोग भी साथ ही खा लो न,’’ शैली की तरफ देखते हुए उस ने कहा था.

‘‘नहीं, बेटे, तू पहले गरमगरम खा ले,’’ मां का स्वर लाड़ में भीगा हुआ था.

कमरे में आज अखबार पढ़ते हुए शिखर का मन जैसे उधर ही उलझा रहा था. मां ने शायद खाना खा लिया था, ‘‘बहू, मैं तो थक गईर् हूं्. दवाई दे कर बत्ती बुझा दे,’’ उन की आवाज आ रही थी. उधर शैली रसोईघर में सब सामान समेट रही थी.

‘‘एक प्याला कौफी मिल सकेगी क्या?’’ रसोई के दरवाजे पर खड़े हो कर उस ने कहा था.

शैली ने नजर उठा कर देखा भर था. क्या था उन नजरों में, शिखर जैसे सामना ही नहीं कर पा रहा था.

शैली कौफी का कप मेज पर रख कर जाने के लिए मुड़ी ही थी कि शिखर की आवाज सुनाई दी, ‘‘आओ, बैठो.’’

उस के कदम ठिठक से गए थे. दूर की कुरसी की तरफ बैठने को उस के कदम बढ़े ही थे कि शिखर ने धीरे से हाथ खींच कर उसे अपने पास पलंग पर बिठा लिया था.

लज्जा से सिमटी वह कुछ बोल भी नहीं पाई थी.

‘‘मां की तबीयत अब तो काफी ठीक जान पड़ रही है,’’ दो क्षण रुक कर शिखर ने बात शुरू करने का प्रयास किया था.

‘‘हां, 2 दिन से घर में खूब चलफिर रही हैं,’’ शैली ने जवाब में कहा था. फिर जैसे उसे कुछ याद हो आया था और वह बोली थी, ‘‘आप शोभा जीजी से भी मिलने जाएंगे न?’’

‘‘हां, क्यों?’’

‘‘मांजी को भी साथ ले जाइएगा. थोड़ा परिवर्तन हो जाएगा तो उन का मन बदल जाएगा. वैसे….घर से जा भी कहां पाती हैं.’’

शिखर चुपचाप शैली की तरफ देखता भर रहा था.

‘‘मां को ही क्यों, मैं तुम्हें भी साथ ले चलूंगा, सदा के लिए अपने साथ.’’

धीरे से शैली को उस ने अपने पास खींच लिया था. उस के कंधों से लगी शैली का मन जैसे उन सुमधुर क्षणों में सदा के लिए डूब जाना चाह रहा था. Best Hindi Story

Hindi Family Story: शौर्टकट – क्या था सविता के मालामाल होने का राज

Hindi Family Story: सविता के तकिए के नीचे एक महंगा मोबाइल फोन देख कर उस के पति श्यामलाल का माथा ठनक गया. उसे समझ में नहीं आया कि 6,000 रुपए महीना कमाने वाली उस की पत्नी के पास 50,000 रुपए का मोबाइल फोन कहां से आया.

सविता दूसरे घरों में झाड़ूपोंछे का काम करती थी, जबकि श्यामलाल दिहाड़ी मजदूर था. पत्नी के पास इतना महंगा मोबाइल देख कर उस के दिमाग में कई तरह के सवाल आने लगे.

इस सब के बावजूद श्यामलाल ने अपने दिल को मनाया तो जरूर, लेकिन रातभर उसे नींद नहीं आई. वह मन ही मन सोच रहा था, ‘इस के पास इतना महंगा फोन कहां से आया? इसे जगा कर पूछ लेता हूं. नहीं, अभी सोने देता हूं, बेचारी थकी होगी. कल सुबह पूछ लूंगा.’

‘‘सविता, यह किस का मोबाइल है और तेरे पास कहां से आया? यह तो काफी महंगा है,’’ अगले दिन श्यामलाल ने पूछा.

पति के हाथ में अपना मोबाइल फोन देख कर सविता के चेहरे का रंग पीला पड़ गया. उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या बोले, क्या न बोले.

‘‘मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया सविता? यह फोन है किस का?’’ श्यामलाल ने जोर दे कर पूछा.

‘‘अरे, मालकिन का है. इस में कुछ दिक्कत आ रही थी, सो उन्होंने कहा था कि इसे ठीक करवा लाओ. यह अब ठीक हो गया है तो आज उन्हें दे दूंगी,’’ यह कह कर सविता ने मोबाइल अपने हाथ में लिया और काम पर निकल गई.

लेकिन उस दिन के बाद से सविता का पति कभी उस के पास नए सोने के झुमके देखता, तो कभी पायल, कभी महंगी साड़ी, तो कभी कुछ और. एक दिन वह बड़ा और महंगा टीवी ले कर घर आई तो श्यामलाल की हैरानी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने टोकते हुए कहा, ‘‘क्या है यह सब?’’

‘‘टीवी है… दिख नहीं रहा है क्या?’’

‘‘वह तो दिख रहा है मुझे, लेकिन यह आया कहां से?’’

‘‘दुकान से आया है और कहां से आएगा.’’

‘‘देखो, ज्यादा बात को घुमाओ मत और सीधेसीधे बताओ कि इतना महंगा टीवी कहां से आया? तुम्हारी कोई लौटरी लगी है क्या? ये झुमके, पायल, साड़ी और टीवी, सब कहां से आ रहे हैं?’’

श्यामलाल की बातों को सुन कर सविता ने मुंह बनाते हुए कहा, ‘‘यह सब मेरी नई मालकिन ने दिया है. वे मेरे काम से बहुत खुश हैं. वे मुझे गिफ्ट देती हैं.’’

‘‘कोई भी मालकिन इतना महंगा गिफ्ट नहीं देती है और वह भी अपने घर काम करने वाली को.’’

‘‘आप मुझ पर शक कर रहे हैं?’’

‘‘नहीं, जो बात सच है, वही बता रहा हूं. हम दोनों जितना कमाते हैं, उस से ये सारी चीजें इस जनम में तो नहीं ही ली जा सकती हैं.’’

‘‘अब अगर कोई मुझे दे रहा है, तो आप को क्यों खुजली लग रही है? देखिए जी, मैं कोई गलत काम नहीं कर रही. आप चाहें तो मेरी मालकिन से जा कर पूछ सकते हैं,’’ श्यामलाल की बातों को सविता ने अपनी गोलमोल बातों में उलझा दिया.

श्यामलाल ने सविता की बातों को सुना तो जरूर, लेकिन वह चाह कर भी उस की बातों पर यकीन नहीं कर पा रहा था.

उधर सविता का अचानक बदला रंगढंग सभी के लिए चर्चा की बात बन गया था. उस के महल्ले वालों ने अब पीठ पीछे बातें बनानी शुरू कर दी थीं.

‘‘विमला, यह सविता ने घर पर नोट छापने की मशीन लगा रखी है क्या? कल ही नया टीवी लाई थी वह. आज देखा कि वशिंग मशीन भी. आएदिन उस के घर में एक नया सामान आ रहा है.’’

‘‘जानती हो, वे जो कान में नए झुमके पहनी थी, वे भी सोने के हैं.’’

‘‘वह तो लोगों को यही बता रही है कि उस की मालकिन उस पर मेहरबान है. भला इस तरह मालकिन लोग कब से मेहरबान होने लगी हैं हम लोगों पर? मुझे तो दाल में कुछ काला लग रहा है.’’

‘‘तुम ने तो मेरी मुंह की बात छीन ली. जरूर वह कोई गलत काम कर रही है.’’

सविता के साथ की काम करने वाली सहेलियां आपस में कानाफूसी कर रही थीं.

लोगों की बातें श्यामलाल के कानों तक भी जाती थीं. वह जब सविता से लोगों की बातें कहता, तो वह बोलती, ‘‘जलने दो. अरे, जलन नाम की भी कोई चीज होती है कि नहीं. उन की मालकिन उन के एक दिन न जाने पर पैसे काट लेती है और मेरी मालकिन मुझे गिफ्ट पर गिफ्ट दिए जा रही है. जब ऐसा होगा तो उन्हें नींद आएगी कभी? नहीं आएगी तो और वे कुछ न कुछ बातें बनाएंगी.

‘‘देखिए, अगर आप दूसरों की बातों पर भरोसा कीजिएगा, तो कभी खुश नहीं रह पाएंगे, इसीलिए कान में तेल डालिए और जिंदगी के मजे लीजिए.’’

जिस तरह से सविता ने अपने पति को यह बात कही, उसे बिलकुल भी अच्छी नहीं लगी. शक तो उसे भी अपनी पत्नी पर हो रहा था कि वह जरूर कोई गलत राह पर है, लेकिन जब तक वह उसे रंगे हाथों पकड़ नहीं लेता तो उसे क्या कहता.

‘जो मैं सोच रहा हूं, वैसा बिलकुल भी न हो. और जैसा सविता कह रही है, वैसा ही हो,’ श्यामलाल मन ही मन सोच रहा था.

एक दिन की बात है. रात के 9 बज गए थे. सविता अभी तक काम से लौटी नहीं थी. श्यामलाल उस के लिए बहुत परेशान हो रहा था.

श्यामलाल उसी समय राज अपार्टमैंट्स की तरफ निकल गया, जहां सविता काम करती थी. वह तेज चाल से अपार्टमैंट्स की ओर चला जा रहा था कि तभी उस की नजर एक पुलिस की जीप पर गई. उस ने देखा कि सविता उस जीप में बैठी हुई थी.

सविता को पुलिस जीप में बैठा देख कर श्यामलाल का दिमाग चक्कर खाने लगा. पुलिस सविता को कहां ले कर जा रही है?

‘‘सविता, सविता,’’ उस ने आवाज लगाई, लेकिन पुलिस की गाड़ी तेज रफ्तार में वहां से निकल गई.

श्यामलाल पुलिस की गाड़ी के पीछे भागने लगा. भागते हुए वह पुलिस स्टेशन पहुंचा तो देखा, सविता हवालात में थी.

‘‘क्या किया तू ने? पुलिस वाले तुझे यहां क्यों ले कर आए हैं? बता, क्या किया तू ने?’’

सविता खामोश थी. उस का चेहरा पीला पड़ा हुआ था.

तभी इंस्पैक्टर उस के पास आया और पूछा, ‘‘हां भाई, तुम इस के पति हो?’’

‘‘जी साहब, मैं इस का पति हूं.’’

‘‘क्या किया है इस ने? ऐसे पूछ रहा है, जैसे तुम को कुछ पता ही नहीं. जरूर तुम लोग मिल कर रैकेट चलाते हो. अभी रुक, तेरे को भी जेल में बंद करता हूं.’’

‘‘कौन सा रैकेट साहब? आप क्या कह रहे हैं?’’

सविता का मन हमेशा से अमीर बनने का था. वह बड़े साहब लोगों के यहां काम करती. उन की लाइफ स्टाइल को देखती. उन के कपड़ों और गाडि़यों को देखती तो उस के मन में हमेशा यही आता है कि उसे भी इन महंगी गाडि़यों में बैठना है. वह भी महंगे कपड़े पहने और इन के जैसी जिंदगी जिए. लेकिन दूसरों के यहां झाड़ूपोंछा कर के महंगे शौक पूरा करना मुमकिन नहीं था, इसलिए उस ने शौर्टकट रास्ता अपनाने का सोचा.

सविता देखने में खूबसूरत थी. उस ने सोचा, ‘मेरी खूबसूरती अगर मुझे अमीर नहीं बना सकी तो फिर यह किस काम की…’

लिहाजा, सविता जहांजहां काम करने जाती थी, उस घर के मालिक को अपनी अदा से घायल करने की कोशिश करती. लेकिन कोई भी उस के झांसे में नहीं आता था.

लेकिन एक बार विवेक नाम का एक शादीशुदा शख्स उस के जाल में फंस ही गया. हुआ यों कि विवेक की पत्नी कुछ दिनों के लिए मायके गई हुई थी. उस के जाने के अगले दिन की बात है.

‘‘अरे, कोई टैंशन नहीं है मेरे भाई. आज की रात एक बार फिर से जीते हैं बैचलर वाली लाइफ. पूरी रात मौजमस्ती होगी,’’ विवेक ने अपने दोस्तों के साथ पार्टी करने का प्लान बनाया था. उस रोज उन सब ने जबरदस्त पार्टी की. जब विवेक घर लौटा, तो उस के पैर लड़खड़ा रहे थे.

विवेक ने कुछ ज्यादा ही पी ली थी. बस, घर पहुंच कर वह तुरंत बिस्तर पर जा कर सो गया. विवेक को घर पहुंचे अभी आधा घंटा भी नहीं हुआ था कि दरवाजे की डोरबैल बजी. सविता खड़ी थी.

‘‘साहब, मेमसाब ने कहा था कि आप के लिए रात की रोटी बना दिया करूं,’’ सविता कमरे के अंदर आते हुए बोली.

‘‘रोटी… नहीं… तुम जाओ… मैं खा कर आया हूं.’’

‘‘नहीं साहब, ऐसे कैसे चली जाऊं… मेमसाब गुस्सा होंगी मेरे ऊपर,’’ यह कह कर सविता किचन में चली गई.

विवेक सविता को रोकता रहा, लेकिन वह मानी नहीं. वैसे भी उस रोज नशा विवेक पर इतना हावी था कि वह क्या कह रहा था उसे खुद भी पता नहीं चल रहा था.

विवेक की यही हालत सविता के लिए लौटरी का टिकट बन गई. जब वह नशे की हालत में सोया था, तो वह उस के बगल में जा कर लेट गई और उस के साथ कुछ फोटो अपने मोबाइल पर खींच लिए. अगले दिन सवेरे ही सविता कहने लगी, ‘‘साहब, आप ने तो कल रात मेरी इज्जत लूट ली. मैं झूठ नहीं बोल रही हूं. मोबाइल की तसवीर तो झूठ नहीं बोलेगी न.

‘‘अरे, मैं तो वापस जा रही थी, लेकिन आप ने मुझे खींच कर अंदर बुला लिया और फिर मेरे साथ वह सब किया कि मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रही.’’

‘‘सविता, यह तुम क्या कह रही हो… यह माना कि मैं नशे में था, लेकिन मैं ने ऐसा तो कुछ नहीं किया,’’ विवेक ने कहा..

फिर विवेक के आसपास सविता ने ऐसा जाल बुना कि वह उस में फंस गया. सविता उसे ब्लैकमेल करने लगी और पैसे ऐंठना शुरू कर दिया. इन्हीं पैसों से वह रईसी करने लगी. यह सिलसिला चलता रहा,

लेकिन एक दिन विवेक की पत्नी शालिनी ने बैंक की पासबुक में देखा कि विवेक हर दूसरे दिन एक मोटी रकम खाते से निकाल रहा है, तो उसे कुछ शक हुआ. उस ने उस से पूछा, तो वह टालमटोल करने लगा. लेकिन जब उस ने अपने सिर की कसम दी, तो उस ने शालिनी को सारी बात बता दी.

‘‘मुझ से बहुत बड़ी भूल हो गई. तेरे जाने के बाद एक दिन,’’ विवेक ने सारी कहानी शालिनी को बताई. लेकिन उस के लाख कहने पर भी उसे इस बात पर यकीन नहीं हुआ कि उस के पति ने उस रोज कोई बदतमीजी सविता के साथ की होगी.

एक दिन जब फिर से सविता ने 50,000 रुपए विवेक से मांगे, तो विवेक और शालिनी ने पुलिस को बुला लिया. पुलिस को सामने देख सविता के चेहरे का रंग उड़ गया.

पुलिस ने जब अपने तरीके से सविता से पूछताछ की, तो उस ने सबकुछ उगल दिया.

‘‘साहब, गलती हो गई मुझ से. विवेक साहब बेकुसूर हैं. यह वीडियो तो मैं ने उन के नशे में होने का फायदा उठा कर बनाया था.’’

फिर क्या था, सविता पर मुकदमा चला. उसे 3 साल की सजा हो गई. जिंदगी में जल्दी कामयाब होने का शौर्टकट उस पर भारी पड़ गया. Hindi Family Story

Story In Hindi: अबोध – गौरा का खतरनाक कदम

Story In Hindi: माधव कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे, 50 साल की उम्र. सफेद दाढ़ी. उस पर भी बीमारी के बाद की कमजोर हालत. यह सब देख कर घर के लोगों ने माधव को बेटी की शादी कर देने की सलाह दे दी. कहते थे कि अपने जीतेजी लड़की की शादी कर जाओ.

माधव ने अपने छोटे भाई से कह कर अपनी लड़की के लिए एक लड़का दिखवा लिया.

माधव की लड़की गौरा 15 साल की थी. दिनभर एक छोटी सी फ्रौक पहने सहेलियों के साथ घूमती रहती, गोटी खेलती, गांव के बाहर लगे आम के पेड़ पर चढ़ कर गिल्ली फेंकने का खेल भी खेलती.

जैसे ही गौरा की शादी के लिए लड़का मिला, वैसे ही उस का घर से निकलना कम कर दिया गया.

अब गौरा घर पर ही रहती थी. महल्ले की लड़कियां उस के पास आती तो थीं, लेकिन पहले जैसा माहौल नहीं था. गौरा की शादी की खबर जब उन लड़कियों को लगी, तो गौरा को देखने का उन का नजरिया ही बदल गया था.

माधव ने फटाफट गौरा की शादी उस लड़के से तय कर दी. माधव की माली हालत तो ठीक नहीं थी, लेकिन जितना भी कर सकते थे, करने में लग गए.

शादी की तारीख आई. लड़के वाले बरात ले कर माधव के घर आ गए. लड़का गौरा से बड़ा था. वह 20-22 साल का था.

गौरा को इन बातों से ज्यादा मतलब तो नहीं था, लेकिन इस वक्त उसे अपना घर छोड़ कर जाना कतई अच्छा नहीं लग रहा था. शादी के बाद गौरा अपनी ससुराल चली गई, लेकिन रोते हुए.

गौरा की शादी के कुछ दिन बाद ही माधव की बीमारी ठीक होने लगी, फिर कुछ ही दिनों में वे पूरी तरह से ठीक भी हो गए, मानो उस मासूम गौरा की शादी करने के लिए ही वे बीमार पड़े थे.

उधर गौरा ससुराल पहुंची तो देखा कि वहां घर जैसा कुछ भी नहीं था. न साथ खेलने के लिए सहेलियां थीं और न ही अपने घर जैसा प्यार करने वाला कोई.

गौरा की सास दिनभर मुंह ऐंठे रहती थीं. ऐसे देखतीं कि गौरा को बिना अपराध किए ही अपराधी होने का अहसास होने लगता.

जिस दिन गौरा अपने घर से विदा हो कर ससुराल पहुंची, उस के दूसरे दिन से ही उस से घर के सारे काम कराए जाने लगे. गौरा को चाय बनाना तो आता था, लेकिन सब्जी छोंकना, गोलगोल रोटी बनाना नहीं आता था.

जब ये बातें उस की सास को पता चलीं, तो वे गौरा को खरीखोटी सुनाने लगीं, ‘‘बहू, तेरी मां ने तु?ो कुछ नहीं सिखाया. न तो दहेज दिया और न ही ढंग की लड़की. कम से कम लड़की ही ऐसी होती कि खाना तो बना लेती…’’

गौरा चुपचाप सास की खरीखोटी सुनती रहती और जब भी अकेली होती, तो घर और मां की याद कर के खूब रोती. दिनभर घर के कामों में लगे रहना और सास भी जानबू?ा कर उस से ज्यादा काम कराती थीं.

बेचारी गौरा, जो सास कहतीं, वही करती. शाम को पति के हाथों का खिलौना बन जाती. वह तो ठीक से दो मीठी बातें भी उस से नहीं करता था. दिनभर यारदोस्तों के साथ घूमता और रात होते ही घर में आता, खाना खाता और गौरा को बेहाल कर चैन से सो जाता.

एक दिन गौरा का बहुत मन हुआ कि घर जा कर अपने मांबाप से मिल ले. मां से तो लिपट कर रोने का मन करता था.

मौका देख कर गौरा अपनी सास से बोली, ‘‘माताजी, मैं अपने घर जाना चाहती हूं. मुझे घर की याद आती है.’’

सास तेज आवाज में बोलीं, ‘‘घर जाएगी तो यहां क्या जंगल में रह रही है? यहां कौन सा तुझ पर आरा चल रहा है… घर के बच्चों से ज्यादा तेरी खातिर होती है यहां, फिर भी तू इसे अपना घर नहीं समझाती.’’

गौरा घबरा कर रह गई, लेकिन घर की याद अब और ज्यादा आ रही थी.

दिन यों ही गुजर रहे थे कि एक दिन माधव गौरा की ससुराल आ पहुंचे.

अपने पिता को देख गौरा जी उठी थी. भरे घर में अपने पिता से लिपट गई और खूब सिसकसिसक कर रोई.

माधव का दिल भी पत्थर से मोम हो गया. वे खुद रोए तो नहीं, लेकिन आंखें कई बार भीग गईं. उसी दिन शाम को वे गौरा को अपने साथ ले आए.

घर आ कर गौरा फिर उसी मनभावन तिलिस्म में खो गई. वही गलियां, वही रास्ता, वैसे ही घर, वही आबोहवा, वैसी ही खुशबू. इतने में मां सामने आ गईं. गौरा की हिचकी बंध गई, दोनों मांबेटी लिपट कर खूब रोईं.

घर में आई गौरा ने मां को ससुराल की सारी हालत बता दी और बोली, ‘‘मां, मैं वहां नहीं जाना चाहती. मु?ो अब तेरे ही पास रहना है.’’

मां गौरा को समझाते हुए बोलीं, ‘‘बेटी, अब तेरी शादी हो चुकी है. तेरा घर अब वही है. हम चाह कर भी तुझे इस घर में नहीं रख सकते.

‘‘हर लड़की को एक न एक दिन अपनी ससुराल जाना ही होता है. मैं इस घर आई और तू उस घर में गई. इसी तरह अगर तेरी लड़की हुई, तो वह भी किसी और के घर जाएगी. इस तरह तो कोई हमेशा अपने घर नहीं रुक सकता.’’

गौरा चुप हो गई. मां से अब और क्या कहती. जो सास कहती थीं, वही मां भी कहती हैं.

रात को गौरा नींद भर सोई, दूसरी सुबह उठी तो साथ की लड़कियां घर आ पहुंचीं. अभी तक सब की सब कुंआरी थीं, जबकि गौरा शादीशुदा थी. वे सब सलवारसूट पहने घूम रहीं थीं, जबकि गौरा साड़ी पहने हुए थी.

आज गौरा सारी सहेलियों से खुद को अलग पाती थी, उन से बात करने और मिलने में उसे शर्म आती थी. मन करता था कि घर से उठ कर कहीं दूर भाग जाए, जिस से न तो ससुराल जाना पड़े और न ही किसी से शर्म आए.

सुबह के 10 बजने को थे. गौरा ने घर में रखा पुराना सलवारसूट पहना, जिसे वह शादी से पहले पहना करती थी और मां के पास जा कर बड़े प्यार से बोली, ‘‘मां, तुम कहो तो मैं थोड़ी देर बाहर घूम आऊं?’’

गौरा बोलीं, ‘‘हां बेटी, घूम आ, लेकिन जल्दी घर आ जाना. अब तू छोटी बच्ची नहीं है.’’

गौरा मुसकराते हुए घर से निकल गई. उस की नजर गांव के बाहर लगे आम के पेड़ के पास गई. मन खिल उठा. लगा, जैसे वह पेड़ उस का अपना है, कदम बरबस ही गांव से बाहर की ओर बढ़ गए.

हवा के हलके ?ोंके और खेतोंपेड़ों का सूनापन, चारों तरफ शांत सा माहौल और बेचैन मन, मानो फिर से लौट पड़ा हो गौरा का बचपन. हवा में पैर फेंकती सीधी आम के पेड़ के नीचे जा पहुंची.

यह वही आम का पेड़ था, जिस के ऊपर चढ़ कर गिल्ली फेंकने वाले खेल खेले जाते थे, जहां सहेलियों के साथ बचपन के सुख भरे दिन गुजारे थे.

गौरा दौड़ कर आम के पेड़ से लिपट गई. उस मौन खड़े पेड़ से रोरो कर अपने दिल का हाल कह दिया. पेड़ भी जैसे उस का साथी था. उस ने गौरा के मन को बहुत तसल्ली दी.

थोड़ी देर तक गौरा पेड़ से लिपटी बचपन के दिनों को याद करती रही, बचपन तो अब भी था, लेकिन कोई उसे छोटी लड़की मानने को तैयार न था. सब कहते कि वह बड़ी हो गई है, लेकिन खुद गौरा और उस का दिल नहीं मानता था कि वह इतनी बड़ी हो गई है कि घर से बाहर किसी और के साथ रहने लगे. बड़ी औरतों की तरह काम करने लगे, सास की खरीखोटी सुनने लगे.

गौरा बैठी सोचती रही, मन में गुबार की आंधी चलती थी, फिर न जाने क्या सोच कर अपना दुपट्टा उतारा और आम के पेड़ पर चढ़ कर छोर को उस की डाली से कस कर बांध दिया. फिर आम के पेड़ से उतर कर दूसरा छोर अपने गले में बांध लिया.

अभी तक गौरा ठीकठाक थी. खड़ीखड़ी थोड़ी देर तक वह अपने गांव को देखती रही, फिर एकदम से पैरों को हवा में उठा लिया, शरीर का सारा भार गले में पड़े दुपट्टे पर आ गया, दुपट्टा गले को कसता चला गया, आंखें बाहर निकली पड़ी थीं, मुंह लाल पड़ गया था.

थोड़ी ही देर में गौरा की मौत हो गई. अब उसे ससुराल नहीं जाना था और न ही कोई परेशानी सहनी थी. कांटों पर चल रही मासूम सी जिंदगी का अंत हो गया था.

जिस बच्ची के खेलने की उम्र थी, उस उम्र में उसे न जाने क्याक्या देखना पड़ा था. उस की दिमागी हालत का अंदाजा सिर्फ वही लगा सकती थी.

एक भी ऐसा शख्स नहीं था, जो उस अबोध बच्ची को समझाता, लेकिन आज सब खत्म हो गया था, उस की सारी समस्याएं और उस की जिंदगी. Story In Hindi

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