पापा के लिए- भाग 3: सौतेली बेटी का त्याग

तभी इतनी देर से विचारों की कशमकश में हिचकोले सी खाती मैं ने, उन की बात बीच में काटते हुए कहा, ‘‘नहीं मम्मी, हम सब को, पूरे परिवार को आप की बहुत जरूरत है. पापा को किडनी मैं दूंगी और कोई नहीं.’’

मेरी बात सुन कर मम्मी एकदम चीख कर ऐसे बोलीं, मानो बरसों का आक्रोश आज एकसाथ लावा बन कर फूट पड़ा हो, ‘‘दिमाग तो सही है तेरा नेहा. उस आदमी के लिए अपना जीवन दांव पर लगा रही है, जिस ने तुझे कभी अपना माना ही नहीं, जिस ने कभी दो बोल प्यार के नहीं बोले तुझ से… तू उसे अपने शरीर की इतनी कीमती चीज दे रही है… नहीं, कभी नहीं, यह बेवकूफी मैं तुझे नहीं करने दूंगी मेरी बच्ची, कभी नहीं. अभी तेरे सामने पूरा जीवन पड़ा है. पराए घर की अमानत है तू. अरे, जिन बच्चों पर वे अपना सर्वस्व लुटाते रहे, वे करें यह सब. अमन का फर्ज बनता है यह सब करने का, तेरा नहीं. तू ही है सिर्फ क्या उन के लिए.’’

‘‘मैं उन के लिए चाहे कुछ न हूं लेकिन मेरे लिए वे बहुत कुछ हैं. मैं ने तो दिल से उन्हें अपना पापा माना है मम्मी. मैं अपने पापा के लिए कुछ भी कर सकती हूं और फिर मम्मी, प्यार का प्रतिकार प्यार ही हो, यह कोई जरूरी तो नहीं.’’

मम्मी मुझे हैरत से देखती रह गई थीं. उन का पूरा चेहरा आंसुओं से भीग गया था. शायद सोच रही थीं – काश, इस बेटी के दिल को भी पढ़ा होता उन्होंने कभी. इस बेटी को भी गले लगाया होता कभी. अपने दोनों बच्चों की तरह कभी इस की भी पढ़ाई, होमवर्क और ऐग्जाम्स की फिक्र की होती. कभी डांटा होता, तो कभी पुचकारा होता इसे भी. कभी झिड़का होता तो कभी समझाया होता इसे भी. मगर उन्होंने तो कभी इसे नजर भर देखा तक नहीं और यह है कि…

और फिर किसी की भी नहीं सुनी मैं ने. पापा ने भले न बनाया हो, मैं ने अपनी एक किडनी दे कर उन्हें अपने शरीर का एक हिस्सा बना ही लिया. दोनों को हौस्पिटल से एक ही दिन डिस्चार्ज किया गया. मैं गाड़ी में कनखियों से बराबर देख रही थी कि पापा बराबर मुझे ही देख रहे थे. उन की आंखों में आंसू थे. कुछ कहना चाह रहे थे, मगर कह नहीं पा रहे थे. ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे उन के दिल के अनकहे शब्द मेरे दिल को स्नेह की तपिश से सहला रहे हों, जिस से बरसों से किया मेरे प्रति उन का अन्याय शीशा बन कर पिघला जा रहा हो.

घर आने के भी कई दिनों बाद एक दिन अचानक वे मेरे कमरे में आए. मुझे तो अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ. आज तक वो मेरे इतने करीब, वे भी अकेले में आए भी तो नहीं थे और आज वे मेरे करीब, बिलकुल मेरे करीब. मेरे बैड पर बैठ गए थे. मैं ने उन की तरफ देखा. वे उदासी भरी, दर्दभरी, आंसुओं भरी आंखों से मुझे देख रहे थे. मैं भी देखती ही रही उन्हें… अपने पापा को. मुझे तो अब तक कि जिंदगी का एक दिन भी या यह कहूं कि एक लमहा भी याद नहीं, जब उन्होंने मुझे देखा भी हो. आंखों ही आंखों में उन्होंने बहुत कुछ कह दिया और बहुत कुछ मैं ने सुन लिया. मुझे लगा कि अगर एक शब्द भी उन्होंने जबानी बोला तो अपने आंसुओं के वेग को न मैं थाम सकूंगी और शायद न वे. भरभरा कर बस गिर ही पड़ूंगी अपने पापा की गोद में, जिस के लिए मैं अतृप्त सी न जाने कब से तरस रही थी. फड़फड़ाए ही थे उन के होंठ कुछ कहने को कि तड़प कर उन के हाथ पर अपना हाथ रख दिया मैं ने. बोली ‘‘न पापा न, कुछ मत कहना. मैं ने कोई बड़ा काम नहीं किया है. बस अपने पापा के लिए अपना छोटा सा फर्ज निभाया है.’’

अंतत: रोक ही नहीं सकी खुद को, रो ही पड़ी फूटफूट कर. पापा भी रो पड़े जोर से. उन्होंने मुझे अपने से लिपटा लिया, ‘‘मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची… माफ कर दे अपने इस गंदे से पापा को… बेटी है मेरी तू तो, दुनिया की सब से अच्छी बेटी है तू तो.’’

जिन लफ्जों और जिस स्नेह से मैं अब तक अपने ख्वाबों में ही रूबरू होती रही थी, आज हकीकत बन कर मेरे सामने आया था. इन पलों ने सब कुछ दे दिया था मुझे. बरसों के गिलेशिकवे आंसुओं के प्रवाह में बह गए थे. तभी पापा को देख कर मम्मी भी वहीं आ गईं तो उन्होंने मम्मी को भी अपने गले से लगाते हुए कहा, ‘‘तुम दोनों के साथ मैं ने बहुत अन्याय किया है, अतीत की यादों में इतना उलझा रहा कि वर्तमान के इतने खूबसूरत साथ और रिश्ते को नकारता रहा. मुझे माफ कर दो तुम दोनों… मुझे माफ कर दो…’’

बरसों बाद ही सही, यह परिवार आज मेरा भी हो गया था. मम्मी की भी आंखें खुशी से भीग गई थीं.

उस के बाद तो जैसे मेरी जिंदगी ही बदल गई. पापा ने मुझे और अमन दोनों को एकसाथ एम.बी.ए. में ऐडमिशन दिला दिया था. वे चाहते थे कि अब हम दोनों भाईबहन नई सोच और नई तकनीक से उन की कंपनी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दें. अमन का तो मुझे पता नहीं, लेकिन मैं अपने पापा के लिए कुछ भी करूंगी…

Father’s Day Special: पापा जल्दी आ जाना- भाग 2

मम्मी स्वभाव से ही गरम एवं तीखी थीं. दोनों की बातें होतीं तो मम्मी का स्वर जरूरत से ज्यादा तेज हो जाता और पापा का धीमा होतेहोते शांत हो जाता. फिर दोनों अलगअलग कमरों में चले जाते. सुबह तैयार हो कर मैं पापा के साथ बस स्टाप तक जाना चाहती थी पर मम्मी मुझे घसीटते हुए ले जातीं. मैं पापा को याचना भरी नजरों से देखती तो वह धीमे से हाथ हिला पाते, जबरन ओढ़ी हुई मुसकान के साथ.

मैं जब भी स्कूल से आती मम्मी अपनी सहेलियों के साथ ताश और किटी पार्टी में व्यस्त होतीं और कभी व्यस्त न होतीं तो टेलीफोन पर बात करने में लगी रहतीं. एक बार मैं होमवर्क करते हुए कुछ पूछने के लिए मम्मी के कमरे में चली गई थी तो मुझे देखते ही वह बरस पड़ीं और दरवाजे पर दस्तक दे कर आने की हिदायत दे डाली. अपने ही घर में मैं पराई हो कर रह गई थी.

एक दिन स्कूल से आई तो देखा मम्मी किसी अंकल से ड्राइंगरूम में बैठी हंसहंस कर बातें कर रही थीं. मेरे आते ही वे दोनों खामोश हो गए. मुझे बहुत अटपटा सा लगा. मैं अपने कमरे में जाने लगी तो मम्मी ने जोर से कहा, ‘निकी, कहां जा रही हो. हैलो कहो अंकल को. चाचाजी हैं तुम्हारे.’

मैं ने धीरे से हैलो कहा और अपने कमरे में चली गई. मैं ने उन को इस से पहले कभी नहीं देखा था. थोड़ी देर में मम्मी ने मुझे बुलाया.

‘निकी, जल्दी से फे्रश हो कर आओ. अंकल खाने पर इंतजार कर रहे हैं.’

मैं टेबल पर आ गई. मुझे देखते ही मम्मी बोलीं, ‘निकी, कपड़े कौन बदलेगा?’

‘ममा, आया किचन से नहीं आई फिर मुझे पता नहीं कौन से…’

‘तुम कपड़े खुद नहीं बदल सकतीं क्या. अब तुम बड़ी हो गई हो. अपना काम खुद करना सीखो,’ मेरी समझ में नहीं आया कि एक दिन में मैं बड़ी कैसे हो गई हूं.

‘चलो, अब खाना खा लो.’

मम्मी अंकल की प्लेट में जबरदस्ती खाना डाल कर खाने का आग्रह करतीं और मुसकरा कर बातें भी कर रही थीं. मैं उन दोनों को भेद भरी नजरों से देखती रही तो मम्मी ने मेरी तरफ कठोर निगाहों से देखा. मैं समझ चुकी थी कि मुझे अपना खाना खुद ही परोसना पड़ेगा. मैं ने अपनी प्लेट में खाना डाला और अपने कमरे में जाने लगी. हमारे घर पर जब भी कोई आता था मुझे अपने कमरे में भेज दिया जाता था. मैं टीवी देखतेदेखते खाना खाती रहती थी.

‘वहां नहीं बेटा, अंकल वहां आराम करेंगे.’

‘मम्मी, प्लीज. बस एक कार्टून…’ मैं ने याचना भरी नजर से उन्हें देखा.

‘कहा न, नहीं,’ मम्मी ने डांटते हुए कहा, जो मुझे अच्छा नहीं लगा.

खाने के बाद अंकल उस कमरे में चले गए तथा मैं और मम्मी दूसरे कमरे में. जब मैं सो कर उठी, मम्मी अंकल के पास चाय ले जा रही थीं. अंकल का इस तरह पापा के कमरे में सोना मुझे अच्छा नहीं लगा. जाने से पहले अंकल ने मुझे ढेर सारी मेरी मनपसंद चाकलेट दीं. मेरी पसंद की चाकलेट का अंकल को कैसे पता चला, यह एक भेद था.

वक्त बीतता गया. अंकल का हमारे घर आनाजाना अनवरत जारी रहा. जिस दिन भी अंकल हमारे घर आते मम्मी उन के ज्यादा करीब हो जातीं और मुझ से दूर. मैं अब तक इस बात को जान चुकी थी कि मम्मी और अंकल को मेरा उन के आसपास रहना अच्छा नहीं लगता था.

एक दिन पापा आफिस से जल्दी आ गए. मैं टीवी पर कार्टून देख रही थी. पापा को आफिस के काम से टूर पर जाना था. वह दवा बनाने वाली कंपनी में सेल्स मैनेजर थे. आते ही उन्होंने पूछा, ‘मम्मी कहां हैं.’

‘बाहर गई हैं, अंकल के साथ… थोड़ी देर में आ जाएंगी.’

‘कौन अंकल, तुम्हारे मामाजी?’ उत्सुकतावश उन्होंने पूछा.

‘मामाजी नहीं, चाचाजी…’

‘चाचाजी? राहुल आया है क्या?’ पापा ने बाथरूम में फे्रश होते हुए पूछा.

‘नहीं. राहुल चाचाजी नहीं कोई और अंकल हैं…मैं नाम नहीं जानती पर कभी- कभी आते रहते हैं,’ मैं ने भोलेपन से कहा.

‘अच्छा,’ कह कर पापा चुप हो गए और अपने कमरे में जा कर तैयारी करने लगे. मैं पापा के पास पानी ले कर आ गई. जिस दिन पापा मेरे सामने जाते मुझे अच्छा नहीं लगता था. मैं उन के आसपास घूमती रहती थी.

‘पापा, कहां जा रहे हो,’ मैं उदास हो गई, ‘कब तक आओगे?’

‘कोलकाता जा रहा हूं मेरी गुडि़या. लगभग 10 दिन तो लग ही जाएंगे.’

‘मेरे लिए क्या लाओगे?’ मैं ने पापा के गले में पीछे से बांहें डालते हुए पूछा.

‘क्या चाहिए मेरी निकी को?’ पापा ने पैकिंग छोड़ कर मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा. मैं क्या कहती. फिर उदास हो कर कहा, ‘आप जल्दी आ जाना पापा… रोज फोन करना.’

‘हां, बेटा. मैं रोज फोन करूंगा, तुम उदास नहीं होना,’ कहतेकहते मुझे गोदी में उठा कर वह ड्राइंगरूम में आ गए.

तब तक मम्मी भी आ चुकी थीं. आते ही उन्होंने पूछा, ‘कब आए?’

‘तुम कहां गई थीं?’ पापा ने सीधे सवाल पूछा.

‘क्यों, तुम से पूछे बिना कहीं नहीं जा सकती क्या?’ मम्मी ने तल्ख लहजे में कहा.

‘तुम्हारे साथ और कौन था? निकिता बता रही थी कि कोई चाचाजी आए हैं?’

‘हां, मनोज आया था,’ फिर मेरी तरफ देखती हुई बोलीं, ‘तुम जाओ यहां से,’ कह कर मेरी बांह पकड़ कर कमरे से निकाल दिया जैसे चाचाजी के बारे में बता कर मैं ने उन का कोई भेद खोल दिया हो.

‘कौन मनोज, मैं तो इस को नहीं जानता.’

‘तुम जानोगे भी तो कैसे. घर पर रहो तो तुम्हें पता चले.’

‘कमाल है,’ पापा तुनक कर बोले, ‘मैं ही अपने भाई को नहीं पहचानूंगा…यह मनोज पहले भी यहां आता था क्या? तुम ने तो कभी बताया नहीं.’

‘तुम मेरे सभी दोस्तों और घर वालों को जानते हो क्या?’

‘तुम्हारे घर वाले गुडि़या के चाचाजी कैसे हो गए. शायद चाचाजी कहने से तुम्हारे संबंधों पर आंच नहीं आएगी. निकिता अब बड़ी हो रही है, लोग पूछेंगे तो बात दबी रहेगी…क्यों?’

और तब तक उन के बेडरूम का दरवाजा बंद हो गया. उस दिन अंदर क्याक्या बातें होती रहीं, यह तो पता नहीं पर पापा कोलकाता नहीं गए.

Father’s Day Special:अपनाअपना क्षितिज- भाग 1: एक बच्चे के लिए तड़पते सत्यव्रत

प्रशांत को देखते ही प्रभावती की जान में जान आ गई. प्रशांत ने भी जैसे ही मां को देखा दौड़ कर उन के गले लग गया, ‘‘मां, यह कैसी हालत हो गई है तुम्हारी.’’

प्रभावती के गले से आवाज ही न निकली. बहुत जोर से हिचकी ले कर वह फूटफूट कर रो पड़ीं. प्रशांत ने उन्हें रोकने की कोई चेष्टा नहीं की. इस रोने में प्रभावती को विशेष आनंद मिल रहा था. बरसों से इकट्ठे दुख का अंबार जैसे किसी ने धो कर बहा दिया हो.

थोड़ी देर बाद धीरे से  प्रशांत स्वयं हटा और उन्हें बैठाते हुए पूछा, ‘‘मां, पिताजी कहां हैं?’’

‘‘अंदर,’’ वह बड़ी कठिनाई  से बोलीं. एक क्षण को मन हुआ कि कह दें, पिताजी हैं ही कहां. पर जीभ को दांतों से दबा कर खुद को बोलने से रोक लिया. सच बात तो यह थी कि वह अपने जिस पिता के बारे में पूछ रहा था वह तो कब के विदा हो चुके थे. अवकाश ग्रहण के 2 माह बाद ही या एक तरह से सुशांत के पैरों पर खड़ा होते ही उन की देह भर रह गई थी और जैसे सबकुछ उड़ गया था.

अपनी आवाज की एक कड़क से, अपनी भौंहों के एक इशारे से पिताजी का जो व्यक्तित्व इस्पात की तरह सब के सामने  बिना आए ही खड़ा हो जाता था, वह पिताजी अब उसे कहां मिलेंगे.

प्रशांत दूसरे कमरे की ओर बढ़ा तो तुरंत प्रभावती के पैरों पर रजनी आ कर झुक गई और साथ ही 7 बरस का नन्हा प्रकाश. उन्होंने पोते को भींच कर छाती से लगा लिया. मेले में बिछुड़ गए परिवार की तरह वह सब से मिल रही थीं. पूरे 7 साल बाद प्रशांत और रजनी से भेंट हो रही थी. वह प्रकाश को तो चलते हुए पहली बार देख रही थीं. उस की डगमग चाल, तुतलाती बोली, कच्ची दूधिया हंसी, यह सब वह देखसुन नहीं सकी थीं. साल दर साल केवल उस के जन्मदिन पर उन के पास प्रकाश का एक सुंदर सा फोटो आ जाता था औैर उन्हें इतने से ही संतोष कर लेना पड़ता था कि अब मेरा प्रकाश ऐसे दिखाई देने लगा है.

7 साल पहले जब वह कुल 9 माह का था, तभी प्रशांत घर छोड़ कर अपने परिवार को ले कर वहां से दूर बंगलौर चला गया था. इस अलगाव  के पीछे मुख्य कारण था प्रशांत और सुशांत की आपसी नासमझी और उन के पिता द्वारा बोया गया विषैला बीज. सुशांत डाक्टर था और प्रशांत कालिज में शिक्षक. बस, यही अंतर दोनों के मध्य उन के पिता के कारण बड़ा होता चला गया और इतना बड़ा कि फिर पाटा न जा सका.

उन के पिता सत्यव्रत शुरू से ही चाहते थे कि दोनों बच्चे डाक्टर बनें. इस के लिए उन्होंने अपनी सीमित आय की कभी परवा नहीं की. उन का बराबर यही प्रयत्न रहा कि उन के बच्चों को कभी किसी चीज का अभाव न खटके.

सत्यव्रत दफ्तर से लौटने के बाद बच्चों की पढ़ाई  पर ध्यान देते. उन का पाठ सुनते, उन्हें समझाते, उन की गलतियां सुधारते, उन्हें स्वयं नाश्ता परोसते, उन के कपड़े बदलते, बत्ती जलाते, मसहरी लगाते पुस्तकें खोल कर रखते. बच्चे पढ़तेपढ़ते सोने लगते तो पंखा चला देते. दूध का गिलास थमाते. कभी अपने हिस्से का दूध भी दोनों के गिलास में उडे़ल देते. सोचते, ‘बहुत पढ़ते हैं दोनों. गिलास भर दूध से इन का क्या होगा.’

भविष्य के दर्पण में उन्हें 2 डाक्टर बेटों का अक्स दिखाई पड़ता और वह दोगुनेचौगुने गर्व से झूम उठते. अपने इस सपने को बुनने में बस, इसी बात का कोई ध्यान नहीं रखा कि असल में उन के बेटे क्या चाहते हैं. उन की रुचि किस बात में है, डाक्टर बनने में या इंजीनियर अथवा कुछ और बनने में.

सत्यव्रत इस मामले में एक तानाशाह की तरह थे. जो सोच लिया वह बच्चों को पूरा करना ही है. वह सदा यही सोच कर चलते थे, पर ऐसा हो कहां सका. बड़े लड़के प्रशांत को डाक्टर बनने में कोई रुचि  नहीं थी. उस का कविताओं, कहानियों, पेंटिंग, साहित्य में खूब मन लगता था. कई बार वह पढ़ाई  के ही मध्य में आड़ीतिरछी लकीरें खींचता पकड़ा जाता था. कभी रेखागणित की आकृतियां बनातेबनाते पन्ने पर कविता लिखने लगता था.

सत्यव्रत की नजर उस पर पड़ जाती तो जैसे आग में घी पड़ जाता. खूब कस कर धुनाई होती उस की. खाना बंद कर दिया जाता. उसे सोने नहीं दिया जाता. यहां तक कि प्यास से उस का कंठ सूखने लगता, पर वह नल में मुंह नहीं लगा सकता था.

वह अकसर कहा करते, ‘साहित्य, पेंटिंग, कविता भी कोई विषय हैं?’

प्रभावती सन्न रह जातीं. हाथ जोड़ कर कहतीं, ‘मेरे बेटे को इतना मत सताओ.  उस की तो तारीफ होनी चाहिए कि वह इतनी बढि़या कहानियां लिखता है. तुम्हें कब अक्ल आएगी पता नहीं.’

‘कविता, कहानी से पेट नहीं भरता,’ वह चीख कर कहते, ‘जानती हो न कि कितने कवि और लेखक भूखों मरते हैं?’

वह इतने से ही बस न करते. कहते, ‘मैं जानता हूं, तुम्हीं प्रशांत का दिमाग बिगाड़ रही हो. पर अच्छी तरह समझ लो इसे कवि या शिक्षक नहीं, डाक्टर बनना है. इस का भोजन अभी तो एक दिन ही बंद हुआ है, कभी हफ्ते भर भी बंद किया जा सकता है.’

डर से प्रभावती के हाथ फूल जाते, क्या कहें बेटे को. हर व्यक्ति एक ही बात को आसानी से नहीं सीख सकता. किसी के लिए हिसाब आसान है तो किसी के लिए इतिहास. प्रकृति ने सब की समझ का पैमाना एक कहां रखा है? पर वह यह भेद अपने पति को न समझा पातीं. उन्हें  तमाशाई  बन कर चुपचाप सबकुछ देखना, सहना पड़ता.

सब से बुरी हालत तो प्रशांत की हो गईर्र्  थी. अपनी और पिता की इच्छाओं के मध्य वह झूलता रहता था. न वह कविता लिखना छोड़ सकता था न पिता की तमन्ना पूरी करने से पीछे हटना चाहता था. दिनरात किताब उस की आंखों के आगे लगी रहती थी. इस चक्कर में आंखों पर मोटे फे्रम का चश्मा चढ़ गया था. चेहरे की चमक खो गई थी. वह किसी से कुछ कहता नहीं था. बस, भीतर ही भीतर छटपटाता रहता था.

इस के विपरीत सुशांत की आंखोंं के आगे बस, एक ही सपना तैरता रहता था, डाक्टर बनने का. उस के लिए उसे न पिता से मदद लेने की जरूरत थी न मां से. प्रशांत को बड़ी तेजी से पीछे छोड़ता हुआ सुशांत अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहा था.

Mother’s Day Special: मां की उम्मीद

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Mother’s Day Special: एक थी मां- कहानी एक नौकरानी की

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मां की उम्मीद- भाग 3 : क्या कामयाब हो पाया गोपाल

बाहर सड़क किनारे, बिजली के खंभे के नीचे पड़े, पेड़ के एक तने पर ही बैठ कर गोपाल की बाकी की पढ़ाई शुरू हो गई थी और तब तक चलती रही जब तक अगले दिन के इम्तिहान की तैयारी पूरी नहीं हो गई.

कुछ दिन बाद जब इंटरमीडिएट इम्तिहान का नतीजा निकला तो गोपाल को खुद भी विश्वास नहीं हुआ कि उस ने पूरे उत्तर प्रदेश राज्य में पहला नंबर हासिल किया था.

रिजल्ट देख कर बड़े भैया भी खुश हुए और बोले, ‘‘तुम्हारे नंबर अच्छे आए हैं, अब तुम्हे कहीं न कहीं क्लर्क की नौकरी तो मिल ही जाएगी. चलो, मैं कल ही कहीं बात करता हूं.’’

गोपाल ने तुरंत कहा, ‘‘नहींनहीं, मुझे नौकरी नहीं करनी है, बल्कि मुझे आगे पढ़ाई करनी है और मां के सपने को पूरा करना है. वे चाहती हैं कि मैं खूब पढ़ाई कर के एक बड़ा अफसर बनूं.’’

बड़े भैया ने कुछ अनमने से हो कर कहा था, ‘‘अब मैं तुम्हारा खर्चा और नहीं उठा सकता हूं. समय आ गया है कि अब तुम खुद कुछ कमाना शुरू करो.’’

यह सुन कर गोपाल को अच्छा नहीं लगा था, पर इतने अच्छे नंबर और बोर्ड में पहला नंबर आने से उस का आत्मविश्वास बढ़ गया था, ‘‘पर भैया, मैं ने बोर्ड में टौप किया है. मुझे लगता है कोई न कोई कालेज तो

मेरी फीस माफ कर ही देगा. आप मुझे बस 50 रुपए दे दीजिए.’’

‘‘अच्छा ठीक है. जब मुझे ट्यूशन के पैसे मिलेंगे, मैं तुम्हे दे दूंगा,’’ भाई की यह बात सुन कर गोपाल का दिल बल्लियों उछलने लगा था.

अगले महीने की पहली तारीख को बड़े भैया ने गोपाल के हाथ में 50 रुपए रख दिए और उस ने उसी रात कानपुर की ट्रेन पकड़ ली थी.  उस ने कानपुर के डीएवी कालेज के प्रिंसिपल कालका प्रसाद भटनागर के बारे में बहुत अच्छी बातें सुनी थीं. बस अपनी जिंदगी बनाने के लिए वह कानपुर चला आया था.

गरमी की छुट्टियां चालू हो गई थीं, पर प्रिंसिपल साहब अपने दफ्तर में बैठे थे. उस की हाई स्कूल और इंटरमीडिएट की मार्कशीट देखी तो बोले, ‘‘तुम्हे कहीं जाने की जरूरत नहीं है. तुम्हारा एडमिशन बस यहां हो गया है. तुम्हारी फीस माफ और होस्टल का खर्चा भी. हमारे कालेज को तुम्हारे जैसे बच्चों की जरूरत है. मुझे पूरा यकीन है कि तुम हमारे कालेज का नाम रोशन करोगे.’’

प्रिंसिपल साहब के कमरे से निकला तो गोपाल का दिल खुशी से फूला न समा रहा था. अपना टिन का बक्सा उठाए वह होस्टल पहुंच गया और अपने 4 साल उस ने इसी कमरे में बिताए थे.  बीए के इम्तिहान में फर्स्ट डिवीजन आई तो उस की एमए की फीस भी माफ हो गई थी और आज एम ए का रिजल्ट भी आने वाला था.

‘अरे ओ भैया. यहां बैठ कर क्या दिन में ही सपने देख रहे हो.. चलोचलो, जल्दी चलो. प्रिंसिपल साहब अपने दफ्तर में आप को बुलाए हैं,’’ दफ्तर का चपरासी गोपाल को बुलाने आया था.

गोपाल तत्काल उठा और भाग कर कमरे में जा कर कमीज पहन कर आ गया. उस का दिल तेजी से धड़क रहा था कि प्रिंसिपल साहब ने उसे क्यों बुलाया है? शायद रिजल्ट आ गया होगा. अगर रिजल्ट अच्छा न हुआ तोड़ अगर फर्स्ट डिवीजन न आई तो क्या होगा? क्या उसे होस्टल खाली करना पड़ेगा? इम्तिहान देते हुए तबीयत इतनी खराब थी…

दफ्तर के पास पहुंच कर गोपाल ने देखा कि उस का सब से बड़ा प्रतिद्वंद्वी विद्या चरण भी वहां पहुंचा हुआ था. उसे भी दफ्तर में बुलाया गया था. दोनों की आंखें मिलीं तो लगा कि वे एकदूसरे को नापने की कोशिश कर रहे थे.

चपरासी ने दोनों को अंदर आने का इशारा किया.

प्रिंसिपल साहब बहुत गंभीर स्वभाव के इनसान थे. उन्होंने अपना चश्मा एडजस्ट किया और दोनों को देखा.

उन के स्वभाव के उलट आज उन के चेहरे पर मंद मुसकराहट थी, ‘‘तुम लोगों का रिजल्ट आ गया  है. तुम ने हमारे कालेज का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है. मैं ने सोचा कि तुम्हे खुद ही बता दूं…’’

ऐसा कहते हुए प्रिंसिपल अपनी कुरसी से उठ कर आगे आए और विद्या चरण से हाथ मिलाते हुए बोले,

‘‘मुबारक हो विद्या, तुमने कालेज में टौप किया है.’’

विद्या चरण का चेहरा खुशी से चमक उठा और वह तुरंत प्रिंसिपल साहब के पैर छूने को झुक गया. साथ ही वह तिरछी नजर से उसे भी देख रहा था मानो कह रहा हो, ‘ले बेटा, बड़ा चौड़ा हो रहा था कि फर्स्ट तो मैं ही आऊंगा. पता लग गई अपनी औकात.’

गोपाल का फर्स्ट आने का सपना चकनाचूर हो गया था, पर आंखें झुकाए वह वहां खड़ा रहा था. किसी तरह आंसू छिपाने की कोशिश कर रहा था.

उस का प्रतिद्वंद्वी आखिरकार उस से जीत गया था.

गोपाल वहां खड़ा हुआ अपने पैर के अंगूठे को देखे जा रहा था और उस ने ध्यान भी नहीं दिया कि कब प्रिंसिपल साहब उस के पास आकर खड़े हो गए और उसे अपने गले लगा लिया, ‘‘और तुम तो मेरे चमत्कारी बच्चे हो. तुम ने हम सब की छाती चौड़ी कर दी है. तुम ने यूनिवर्सिटी में टौप किया है. पहली बार हमारे कालेज से किसी लड़के ने यूनिवर्सिटी में टौप किया है. जल्दी ही अपना गोल्ड मैडल लेने के लिए तैयार हो जाओ.’’

यह सुन कर गोपाल सकते में आ गया. उसे अपने कानों पर यकीन ही नहीं हो रहा था. आंखों में आए दुख के आंसू अब खुशी के आंसुओं में बदल गए थे.

प्रिंसिपल साहब ने बात आगे बढ़ाई, ‘‘हमारे कालेज में एक लैक्चरर की जगह खाली है. मैं चाहता हूं कि तुम यहां जौइन कर लो. मुझे पता है कि तुम प्रशासनिक सेवाओं में जाना चाहते हो पर तुम्हारी उम्र अभी कम है. अगले साल तक यहीं पढ़ाओ और अपनी तैयारी भी करो.

कालेज का भी फायदा और तुम्हारा भी. क्या खयाल है?’’

‘‘जैसी आप की आज्ञा सर,’’ कहते हुए गोपाल ने हाथ जोड़ कर सिर झुका दिया और उस के हाथ प्रिंसिपल साहब के पैरों की ओर बढ़ गए.

प्रिंसिपल साहब के दफ्तर से जब गोपाल बाहर निकला, उस की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी थी. कड़ी मेहनत, दृढ निश्चय और कुछ कर दिखाने की इच्छा और उन सब के पीछे थी उस की मां की उम्मीदें जिन की ताकत ने आज उसे एक कामयाब जिंदगी की चौखट पर ला कर खड़ा कर दिया था.

एक थी मां- भाग 3: कहानी एक नौकरानी की

मेरे आते ही गोलू का पास के ही एक नर्सरी स्कूल में एडमिशन करा दिया गया था. गोलू को स्कूल छोड़ने और लाने के लिए मैं ही जाती थी.

वह जब मुझे प्यार से अपनी आवाज में ‘कश्मीरा दीदी’ कहता था, तो सुन कर मुझे बहुत अच्छा लगता था. गोलू को देख कर मुझे बारबार मेरे अपने भाई अमर की याद आती रहती थी. पता नहीं, अब वह घर में अकेले कैसे रहता होगा.

साकेत अंकल ने गोलू को घर पर पढ़ाने के लिए एक टीचर रख लिया था. आंटी के कहने पर वे टीचर मुझे भी पढ़ाने लगे थे. मैं भी मन लगा कर पढ़ने लगी थी.

समय बीतता रहा. कैसे 2 साल बीत गए, कुछ पता ही नहीं चला. अब तो मुझे कभी एहसास भी नहीं होता था कि मैं इस घर की नौकरानी हूं. मैं भी घर के एक सदस्य की तरह वहां रह रही थी.

मैं सिर्फ रक्षाबंधन के दिन ही हर साल अपने घर जाती थी और भाई को राखी बांध कर वापस आ जाती थी. मैं गोलू को भी राखी बांधती थी.

देखतेदेखते अंकल के यहां 6 साल गुजर गए. अब गोलू 10 साल का हो गया था. इसी साल अंकल ने एक सरकारी स्कूल से मुझे मैट्रिक का इम्तिहान दिलवा दिया था और मैं अच्छे अंक से पास भी हो गई थी.

सिकंदरपुर में अब मेरा भाई भी पढ़ने लगा था. इतने साल में अंकल द्वारा दिए हुए पैसे से पिताजी ने अपना कर्जा चुका दिया था और अब वे एक ठेले पर फल बेचने लगे थे.

मां अभी भी पहले जैसे ही अपनी दुनिया में मस्त रहती थीं. उन्हें किसी की कोई परवाह नहीं थी. इसी बीच मेरे दादाजी इस दुनिया से चल बसे थे.

बाकी सबकुछ अब ठीक से चल रहा था, मगर अचानक एक दिन मुझे एक ऐसी बुरी खबर मिली कि सुन कर मेरी जान हलक में आ गई. मेरे मासूम भाई अमर को किसी ने मार कर सड़क किनारे फेंक दिया था. सुबह सड़क के किनारे उस की लाश मिली थी.

मैं यह खबर सुन कर मानो मर सी गई थी, मगर मेरे मुंहबोले भाई गोलू और अंकलआंटी के प्यार के चलते मैं अपनेआप को संभाल पाई थी.

अमर की मौत के बाद अब मेरा अपने घर जाना भी बंद हो गया था. पिताजी जब कभी बलिया आते तो मुझ से मिल लेते थे. कभीकभार फोन कर के भी बात कर लेते थे, पर अपनी मां के लिए तो मैं कब की पराई हो गई थी.

धीरेधीरे सबकुछ पहले जैसा होता जा रहा था. इसी बीच मैं ने इंटर भी पास कर लिया था. भले ही मैं स्कूल या कालेज कभी गई नहीं थी, मगर घर पर ही पढ़पढ़ कर मैं सभी इम्तिहान अच्छे नंबरों से पास करती जा रही थी.

अंकल ने अब मेरा कालेज में भी एडमिशन करा दिया था. मैं अपनेआप को बहुत खुशनसीब समझती थी कि मुझे अपने मांबाप से भी ज्यादा चाहने वाले पराए मांबाप मिले थे.

मगर मेरी खुशी ज्यादा दिन तक नहीं रह सकी थी, तभी तो एक दिन सुबह एक और दिल दहला देने वाली खबर मुझे मिली. पिताजी का भी किसी ने रात में घर के अंदर ही खून कर दिया था.

यह सुनते ही मेरे ऊपर तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. कोई धीरेधीरे हमेशा के लिए मुझ से दूर करता जा रहा था. पहले भाई और अब पिताजी को भी किसी ने जान से मार दिया था. आखिर मेरे भाई या पिताजी ने किसी का क्या बिगाड़ा था? कौन था, जो ये हत्याएं कर रहा था?

पर कहते हैं न कि पाप का घड़ा एक न एक दिन तो भरता ही है और जब भरता है तो वह किसी न किसी दिन फूटता ही है. ऐसा ही कुछ हुआ इस बार.

पिताजी का खून करने वाले गुनाहगार के गुनाह की काली करतूत का काला चिट्ठा इस बार पुलिस ने खोल दिया था. खून किसी और ने नहीं, बल्कि मेरी अपनी मां ने ही अपनी ऐयाशी को छिपाने के लिए अपने प्रेमी के साथ मिल कर किया था.

इतना ही नहीं, जिस रात मैं ने मां के कमरे में एक अनजान आदमी को देखा था, अपनी उसी पोल के खुलने के डर से चाल चल कर मुझे घर से दूर नौकरानी बना कर मेरी मां ने ही मुझे बलिया भेजा था. मां ने ही दुकान में आग लगवा कर मुझे घर से दूर करने की चाल चली थी.

यही नहीं, मेरी उस अपनी मां ने ही अपनी हवस की आग को जलाए रखने के लिए अपने ही हाथों अपने बेटे का भी गला दबा कर जान से मारा था. शायद अमर को जन्म देने वाली अपनी मां की हकीकत का पता चल गया था.

मेरी मां और उन के प्रेमी को कोर्ट से आजीवन कैद की सजा मिली थी. यह सुन कर मेरे सीने में अपनी मां के प्रति धधकती आग को कुछ ठंडक मिली थी.

एक बार फिर से अपने मुंहबोले भाई गोलू और पराए मातापिता के प्यार के चलते मैं बीती बातें भुला कर पहले जैसी होने की कोशिश करने लगी थी.

अब मैं ने ग्रेजुएशन कर ली थी. गोलू भी 12वीं पास कर गया था. अब वह आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली जाने वाला था. इसी बीच मेघना आंटी ने अपनी नौकरी भी छोड़ दी थी.

साकेत अंकल के औफिस में काम करने वाला एक लड़का पंकज हमेशा किसी न किसी काम से घर आया करता था. वह देखने में हैंडसम था. मैं भी अब 24 साल की बला की खूबसूरत लड़की हो गई थी.

अचानक एक दिन मैं अंकल और आंटी के साथ बैठी बातें कर रही थी कि आंटी ने मेरे सामने पंकज के साथ शादी करने की बात रख दी. मैं उन की बात को कैसे टालती और वह भी पंकज जैसे अच्छे लड़के के साथ.

अंकल ने पंकज को मेरी हकीकत बता दी थी. पंकज या उन के परिवार वालों ने भी कोई एतराज नहीं जताया.

आज मेरी यानी आप की कश्मीरा की शादी पंकज से हो रही थी.

मैं अभी अपने बैडरूम में आईने के सामने खड़ी हो कर अपनी जिंदगी के उतारचढ़ाव रूपी भंवर में गोते लगा रही थी कि अचानक पीछे से किसी ने छू कर मेरी तंद्रा भंग कर दी.

मैं जब खयालों की दुनिया से हकीकत में आई, तो देखा कि सामने मेरा मुंहबोला भाई गोलू और मुंहबोली मां मेघना खड़ी थीं.

दोनों की आंखों में मेरे इस घर को छोड़ कर अब नए घर में जाने की टीस आंसू के रूप में साफ झलक रही थी. मैं दोनों से लिपट कर जोरजोर से रोने लगी. जिंदगी में पहली बार आज मुझे बेपनाह सुख हो रहा था. सब को ऐसी मां मिले, भले पराई ही सही.

मैं अहम हूं- भाग 3: शशि की लापरवाही

फिर उस के कमाने से क्या फायदा हुआ, सिवा इस के कि घर का खर्चा पहले से बढ़ गया. सब कपड़े धोबी को जाने लगे और कपड़ों का नुकसान भी ज्यादा होने लगा. अब महरी को भी काम बढ़ जाने से ज्यादा पैसे देने पड़ते थे. आटो का खर्च अलग, इस प्रकार मासिक खर्च बढ़ ही गया. इस के अलावा घर और बच्चे अव्यवस्थित हो गए सो अलग. सास बेचारी दिनभर काम में पिसती रहती. और जब  नहीं कर पाती तो बड़बड़ाती रहती. इन्हीं 2 महीनों में घर की शांति भंग हो गई. जिस पर उस ने जो कल्पना की थी कि अपनी तनख्वाह से घर की सजावट के लिए कुछ खरीदेगी, उसे कार्यरूप से परिणत करना कितना मुश्किल है, यह उसे तुरंत पता लग गया. उसे कुछ कहने में ही झिझक हो रही थी. कहीं अजय यह न समझ ले कि उस ने सिर्फ इन दिखावे की चीजों के लिए ही नौकरी की है. अजय के मन में हीनभावना भी आ सकती है. पर यह सब उसे पहले क्यों नहीं सूझा? खैर, अब तो सुध आई. ‘बाज आई ऐसी नौकरी से,’ उस ने मन ही मन सोचा, ‘बच्चे जरा बड़े हो जाएं तो देखा जाएगा.’

अगले दिन उस ने अजय के चपरासी के हाथों एक महीने का नोटिस देते हुए अपना त्यागपत्र तथा एक दिन के आकस्मिक अवकाश की अरजी भेज दी. अजय ने यही समझा कि शायद तबीयत खराब होने से 1-2 दिन की छुट्टी ले रखी है. बादल उमड़घुमड़ रहे थे और बारिश की हलकीहलकी बूंदें भी पड़नी शुरू हो चुकी थीं. बहुत दिनों बाद उस रात को दोनों चहलकदमी को निकले. अजय ने पूछा, ‘‘क्यों, अचानक तुम्हारी तबीयत को क्या हो गया, तुम ने कितने दिन की छुट्टी ले ली है?’’

शशि बोली, ‘‘हमेशा के लिए.’’ अजय परेशान सा उस की ओर देखने लगा, ‘‘सच, शशि, सच, अब तुम नहीं जाओगी स्कूल? चलो, अब कमीजपैंट में बटन नहीं टांकने पड़ेंगे. धोबी को डांटने का काम भी अब तुम संभाल लोगी. हां, अब रात को थके होने का बहाना भी नहीं कर सकतीं. पर यह तो बताओ, नौकरी छोड़ क्यों दी?’’

शशि उस के उतावलेपन को देख कर हंसते हुए मजा ले रही थी. उसे पति पर दया भी आई, बोली, ‘‘हां, मुझे नौकरी नहीं छोड़नी चाहिए थी, जनाब दरजी तो बन ही जाते. अजीब आदमी हो, कम से कम एक बार तो मुंह से कहा होता कि शशि, तुम्हारे स्कूल जाने से मुझे कितनी परेशानी होती है.’’ डियर, हम तो शुरू से कहना चाहते थे, पर हमारी बात आप को तब जंचती थोडे़ ही. हम ने भी सोचा कर लेने दो थोड़े मन की, अपनेआप सब हाल सामने आएगा तो जान जाएगी. पर यह उम्मीद नहीं थी कि तुम इतनी जल्दी नौकरी छोड़ने को तैयार हो जाओगी. खैर, तुम ने अपनी परिस्थिति पहचान ली तो सब ठीक है,’’ फिर थोड़ा रुक कर बोले, ‘‘हां, शशि सद्गृहिणी बनना कितना कठिन है. तुम जब अपने इस दायित्व को अच्छे से निभाती हो तो मुझे कितना गर्व होता है, मालूम है? यह मत सोचो कि मैं तुम्हें घर से बांधने की कोशिश कर रहा हूं. मेरी ओर से पूरी छूट है, तुम पढ़ोलिखो, कुछ नया सीखो, पर अपने दायित्व को समझ कर.’’

फिर कुछ दूर दोनों मौन चलते रहे. अजय को लग रहा था कि शशि कुछ पूछना चाह रही है, पर हिचक रही है. 2-3 बार उस ने शशि की ओर देखा, मानोे हिम्मत बंधा रहा हो. ‘‘इंदु को देख कर आप को यह नहीं लगता कि वह कितनी लायक औरत है, उस ने अपना घर कैसे सजा लिया है. तब आप को मुझ में कमी नहीं लगती?’’ आखिर शशि ने पूछ ही लिया. अजय इतना खुल कर हंसे कि राह के इक्कादुक्का लोग भी मुड़ कर उन की ओर देखने लगे. आखिर हंसने का यह कैसा और कौन सा मौका है, शशि समझ न पाई. जब उन की हंसी रुकी तो बोले, ‘‘तुम को क्या लगता है कि मनोज बहुत खुश है. वह क्या कह रहा था मालूम है? ‘यार, जबान का स्वाद ही चला गया. मनपसंद चीजें खाए अरसा हो गया. श्रीमतीजी दफ्तर से आ कर परांठे सेंक देती हैं, बस. इतवार के दिन वे छुट्टी के मूड में रहती हैं. देर से उठना, आराम से नहानाधोना, फिर होटल में खाना, पिक्चर, बस. यार, तू बड़ा सुखी है. यहां तो हर महीने मांबाप को रुपए भेजने पर टोका जाता है. आखिर मांबाप के प्रति कुछ फर्ज भी तो है कि नहीं?

‘‘और सुनोगी? उस दिन हमारे बच्चों को देख कर बोला, ‘यार, तुम्हारे बच्चे कितने सलीके से रहते हैं. इच्छा तो होती है कि इंदु को बताऊं कि देखो, इन बच्चों को शिष्टचार की कोई सीख कौन्वैंट या पब्लिक स्कूल से नहीं, बल्कि मां के सिखाने से मिली है.’

‘‘मैं ने यह सुन कर कैसा अनुभव किया होगा, तुम अनुमान लगा सकती हो, यही तुम्हारी जीत थी, और तुम्हारी जीत यानी मेरी जीत. इंदु की आधी तनख्वाह तो अपनी साडि़यों, मेकअप, होटल और सैरसपाटे में खर्च हो जाती है. बेटे को छात्रावास में रखने का खर्च अलग. उस में अहं की भावना है, और ‘मेरे’ की भावना से ग्रस्त वह यही समझती है कि उस के नौकरी करने से ही घर में इतनी चीजें आई हैं. जहां यह ‘मेरे’ की भावना आई, घर की सुखशांति नष्ट समझो.’’ कुछ रुक कर अजय बोले, ‘‘चलो, शशि, अब घर चलें, काफी दूर निकल आए हैं,’’ फिर धीरे से बोले, ‘‘आज के बाद रात को थकान का बहाना न चलेगा.’’

शशि को गुदगुदी सी हुई और बहुत दिनों बाद उस के मन में बसी बेचैनी दूर जाती लगी.

बयार बदलाव की- भाग 3 : नीला की खुशियों को किसकी नजर लग गई थी

‘चलोचलो उठो, तुम्हारी नहीं, मेरी मम्मी हैं. पूरे महीने मु?ो मम्मी के पास नहीं फटकने दिया. खुद ही चिपकी रहीं,’’ छेड़ता हुआ रमन उसे धकेलने लगा. नीला और भी बांहें फैला कर मम्मी की गोद से चिपक गई. देख कर रमन हंसने लगा.

शाम को जाने की सारी तैयारी हो गई. वे दोनों मम्मीपापा को छोड़ने एयरपोर्ट चले गए. एयरपोर्ट के बाहर मम्मीपापा को छोड़ने का समय आ गया. वह दोनों को नमस्कार कर उन के गले लग गया. उस का खुद का मन भी बहुत उदास हो रहा था. पर उसे पता था वह तो कल से काम में व्यस्त हो जाएगा पर नीला को मम्मीपापा की कमी शिद्दत से महसूस होगी.

पापा से गले लग कर नीला मम्मी के गले से चिपक गई. मम्मी ने भी प्यार से उसे बांहों में भींच लिया. वह थोड़ी देर तक अलग नहीं हुई तो वह सम?ा गया कि भावुक स्वभाव की नीला रो रही है. मम्मी की आंखें भी भर आई थीं. नीला को अपने से अलग कर उस की आंखें पोंछती हुई प्यार से बोलीं, ‘‘जल्दी आएंगे बेटा. अब तुम आओ छुट्टी ले कर,’’ रमन भी पास में जा कर खड़ा हो गया. नीला के इर्दगिर्द बांहों का घेरा बनाते हुए बोला, ‘‘जी मम्मी, जल्दी ही आएंगे.’’

‘‘अच्छा बेटा,’’ मम्मीपापा ने दोनों के गाल थपके और सामान की ट्रौली धकेलते, उन्हें हाथ हिलाते हुए एयरपोर्ट के अंदर चले गए. रमन और नीला भरी आंखों से उन्हें जाते हुए देखते रहे. रमन सोच रहा था, बदलाव की बयार तो बहनी ही चाहिए चाहे वह मौसम की हो या विचारों की, तभी जीवन सुखमय होता है.

’’ मां उस के चेहरे पर मुसकराती नजर डाल कर बोलीं, ‘‘अभी वह बच्ची है. कल को बच्चे होंगे तो कई बातों में वह खुद ही परिपक्व हो जाएगी.’’

‘‘जी मम्मी, मैं भी यही सोचता हूं.’’

‘‘और बेटा, आजकल लड़की क्या और लड़का क्या, दोनों को ही समानरूप से गृहस्थी संभालनी चाहिए. वरना लड़कियां, खासकर महानगरों में, नौकरियां कैसे करेंगी जहां नौकरों की भी सुविधा नहीं है.’’

‘‘जी मम्मी, मैं इस बात का ध्यान रखूंगा.’’

थोड़ी देर दोनों चुप रहे, फिर एकाएक रमन बोल पड़ा, ‘‘मम्मी, सच बताऊं तो मैं नहीं सोच पा रहा था कि आप नीला की पीढ़ी की लड़कियों के रहनसहन की आदतों व पहननेओढ़ने के तरीकों को इतनी स्वाभाविकता से ले लेंगी, इसलिए…’’ कह कर उस ने नजरें ?ाका लीं.

‘‘इसीलिए हमें आने के लिए नहीं बोल रहा था,’’ मम्मी हंसने लगीं, ‘‘तेरे मातापिता अनपढ़ हैं क्या?’’

‘‘नहीं मम्मी, आप की पीढ़ी तो पढ़ीलिखी है. मेरे सभी दोस्तों के मातापिता उच्चशिक्षित हैं पर पता नहीं क्यों बदलना नहीं चाहते.’’

‘‘बदलाव बहुत जरूरी है बेटा. समय को बहने देना चाहिए. पकड़ कर बैठेंगे तो आगे कैसे बढ़ेंगे? रिश्ते भी ठहर जाएंगे, दूरियां भी बढ़ेंगी…’’

‘‘यह सम?ा सब में नहीं होती मम्मी,’’ यह बोला ही था कि तभी उस के पापा आ गए. नीला भी आंखें मलतेमलते उठ कर आ गई और मम्मी की गोद में सिर रख कर गुडमुड कर लेट गई. मम्मी हंस कर प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरने लगीं.

‘‘चलोचलो उठो, तुम्हारी नहीं, मेरी मम्मी हैं. पूरे महीने मु?ो मम्मी के पास नहीं फटकने दिया. खुद ही चिपकी रहीं,’’ छेड़ता हुआ रमन उसे धकेलने लगा. नीला और भी बांहें फैला कर मम्मी की गोद से चिपक गई. देख कर रमन हंसने लगा.

शाम को जाने की सारी तैयारी हो गई. वे दोनों मम्मीपापा को छोड़ने एयरपोर्ट चले गए. एयरपोर्ट के बाहर मम्मीपापा को छोड़ने का समय आ गया. वह दोनों को नमस्कार कर उन के गले लग गया. उस का खुद का मन भी बहुत उदास हो रहा था. पर उसे पता था वह तो कल से काम में व्यस्त हो जाएगा पर नीला को मम्मीपापा की कमी शिद्दत से महसूस होगी.

पापा से गले लग कर नीला मम्मी के गले से चिपक गई. मम्मी ने भी प्यार से उसे बांहों में भींच लिया. वह थोड़ी देर तक अलग नहीं हुई तो वह सम?ा गया कि भावुक स्वभाव की नीला रो रही है. मम्मी की आंखें भी भर आई थीं. नीला को अपने से अलग कर उस की आंखें पोंछती हुई प्यार से बोलीं, ‘‘जल्दी आएंगे बेटा. अब तुम आओ छुट्टी ले कर,’’ रमन भी पास में जा कर खड़ा हो गया. नीला के इर्दगिर्द बांहों का घेरा बनाते हुए बोला, ‘‘जी मम्मी, जल्दी ही आएंगे.’’

‘‘अच्छा बेटा,’’ मम्मीपापा ने दोनों के गाल थपके और सामान की ट्रौली धकेलते, उन्हें हाथ हिलाते हुए एयरपोर्ट के अंदर चले गए. रमन और नीला भरी आंखों से उन्हें जाते हुए देखते रहे. रमन सोच रहा था, बदलाव की बयार तो बहनी ही चाहिए चाहे वह मौसम की हो या विचारों की, तभी जीवन सुखमय होता है.

मां की उम्मीद- भाग 2 : क्या कामयाब हो पाया गोपाल

गोपाल डर से कांप रहा था और उस के दिल की धड़कन तेज होती जा रही थी. पर जैसे ही उन लड़कों के हाथ उस की चोटी पर पहुंचते कि क्लास टीचर आते हुए दिख गए. उन्हें देखते ही सब लड़के अपनीअपनी डैस्क की ओर भाग गए और उस की जान बच गई.

क्लास टीचर ने सब की हाजिरी लगाई और पूछा, ‘‘आज नया लड़का कौन आया है क्लास में?’’

कुछ देर पहले हुई घटना से गोपाल अभी भी डरा हुआ था. डरतेडरते उस ने अपना हाथ उठाया था. मास्टरजी ने अपने मोटे चश्मे को नाक के ऊपर चढ़ाया और उस की ओर कुछ पल ध्यान से देखा, मानो उस का परीक्षण कर रहे हों, फिर बोले, ‘‘गणित में पक्के हो?’’

गोपाल को समझ में नहीं आया कि क्या जवाब दे. मास्टरजी ने एकाएक उस पर सवालों की बौछार कर दी थी, ‘‘खड़े हो जाओ और जल्दीजल्दी बताओ कि 97 और 83 कितना हुआ?’’

गोपाल ने एक पल सोचा और बोला, ‘‘180.’’

‘‘सोलह सत्ते कितना?’’

‘‘एक सौ बारह,’’ गोपाल ने तुरंत जवाब दिया.

‘‘तेरह का पहाड़ा बोलो,’’ टीचर ने आगे कहा.

‘‘तेरह एकम तेरह,

तरह दूनी छब्बीस, तेरह तिया उनतालीस… तेरह नम एक सौ सत्रह, तेरह धाम एक सौ तीस,’’ गोपाल एक ही सांस में तेरह का पहाड़ा पढ़ गया.

‘‘उन्नीस का पहाड़ा आता है?’’

‘‘जी आता है. सुनाऊं क्या?’’ गोपाल का आत्मविश्वास अब बढ़ रहा था.

‘‘नहीं रहने दो,’’ टीचर की आवाज अब कुछ नरम हो गई थी.

‘‘तुम्हें पहाड़े किस ने सिखाए?’’

‘‘मां ने घर पर ही सिखाए हैं,’’ गोपाल ने दबी आवाज में जवाब दिया था.

‘‘तुम्हारी मां कितनी पढ़ीलिखी हैं?’’ मास्टरजी की आवाज में अविश्वास था.

‘‘नहीं गुरुजी, मां पढ़ीलिखी नहीं हैं.  उन्होंने तो मुझे सिखाने के लिए मेरे बड़े भाई से पहाड़े सीखे थे.’’

‘‘हम्म… बैठ जाओ,’’ मास्टरजी की आवाज में गोपाल को कुछ तारीफ के भाव दिखे और वह बैठ गया. लगा, तनाव अब कुछ कम हो गया था.

मास्टरजी क्लास टीचर होने के अलावा बच्चों को गणित भी पढ़ाते थे. वे बहुत लायक मास्टर थे, बहुत मेहनत से छात्रों को पढ़ाते थे और उन से ऊंची उम्मीद भी रखते थे. उम्मीद पूरी न होने पर उन का पारा चढ़ जाता था और गुस्सा उतरता था बच्चों की हथेलियों पर, उन की छड़ी की लगातार मार से. और इस छड़ी की मार से सभी बच्चे बहुत डरते थे. उन का मकसद तो बस इतना था कि उन का कोई छात्र गणित में कमजोर न रह जाए.

ऐसे ही धीरेधीरे एक महीना निकल गया. उन 3 शैतानों की तिगड़ी गोपाल को परेशान करने का और मजाक बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ती थी. कभी उस के बालों का मजाक तो कभी उस के कपड़ों का. असहाय सा हो कर गोपाल सब सहता था, इस के अलावा उस के पास और कोई चारा भी तो नहीं था.

वे 3 थे, शारीरिक रूप से बलशाली थे और शहर के दबदबे वाले परिवारों से थे. वे तीनों तो स्कूल भी रोज कार से आते थे और उन का ड्राइवर उन का बस्ता और खाने का डब्बा क्लास तक छोड़ कर जाता था.

उन की तुलना में तो गोपाल एक बेहद गरीब परिवार से था, जिसे स्कूल की फीस देना भी मुश्किल लगता था, अपनी साइकिल चला कर 5 किलोमीटर दूर से आता था. खाने के डब्बे में तो बस 2 नमकीन रोटी और अचार होता था.

यों ही दिन निकलते गए और तिमाही इम्तिहान का समय आ गया था. तिमाही इम्तिहान के नंबर बहुत अहम थे, क्योंकि उस के 25 फीसदी सालाना इम्तिहान के नतीजे में जुड़ते थे, इसीलिए सभी छात्रों से यह उम्मीद होती थी कि वे इन इम्तिहानों को गंभीरता से लें.

इम्तिहान होने के तकरीबन एक हफ्ते बाद जब मास्टरजी हाथ में 35 कापियां लिए घुसे, क्लास में सन्नाटा सा छा गया था. मास्टरजी ने कापियां धम्म से मेड़ पर पटकीं, अपनी छड़ी ब्लैकबोर्ड पर टिकाई और हुंकार भरी,

‘मुरकी वाले…’’

‘‘जी मास्टरजी,’’ गोपाल डर के मारे स्प्रिंग लगे बबुए की तरह उछल कर खड़ा हो गया था.

‘‘यह तुम्हारी कौपी है?’’

‘‘जी

मास्टरजी,’’ गोपाल की जबान डर से लड़खड़ा गई थी.

‘‘इधर आओ,’’ मास्टरजी की रोबदार आवाज कमरे में गूंजी तो गोपाल के हाथपैर ठंडे होने

लगे और वह धीरेधीरे मास्टरजी की मेज की तरफ बढ़ा.

‘‘अरे, जल्दी चल. मां ने खाना नहीं दिया क्या आज?’’

गोपाल तेजी से भाग कर मास्टरजी की मेज के पास पहुंच गया. मन ही मन वह खुद को मास्टरजी की बेंत खाने के लिए भी तैयार कर रहा था.

मास्टरजी ने गोपाल को दोनों कंधों से पकड़ा और क्लास की तरफ घुमा दिया. उस के कंधों पर हाथ रखेरखे मास्टरजी बोले, ‘‘यह लड़का छोटा सा लगता है. रोज साइकिल चला कर गांव से स्कूल आता है,

पर पूरी क्लास में बस एक यही है जिस के 100 में से 100 नंबर आए हैं. शाबाश मेरे बच्चे, तुम ने मेरा दिल खुश कर दिया,’’ कहते हुए मास्टरजी ने गोपाल की पीठ थपथपाई तो उसे चैन की सांस आई.

अब मास्टरजी ने आखिरी बैंच की ओर घूर कर देखा और आवाज लगाई, ‘‘ओए मोटे, ओ मंदबुद्धि, अरे ओ अक्ल के दुश्मन… तीनों इधर आगे आओ. तुम तीनों तो मेरी क्लास के लिए काले धब्बे हो. तीनों को अंडा मिला है.’’

अब जो हुआ, वह तो गोपाल ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. मास्टरजी ने उसे अपनी छड़ी पकड़ाई और कहा, ‘‘तीनों के हाथों पर 10-10 बार मारो. तभी इन को अक्ल आएगी.’’

गोपाल अकबका कर खड़ा रह गया. उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करे. एक लड़के ने फुसफुसा कर कहा, ‘‘धीरे से… नहीं तो…’’

गोपाल ने धीरे से उस लड़के की हथेली पर छड़ी मारी तो मास्टरजी की ऊंची आवाज कान में पडी, ‘‘जोर से मारो, नहीं तो डबल छडि़यां तुम्हारे हाथों पर पड़ेंगीं.’’

यह सुन कर तो गोपाल की हवा सरक गई और अगले 5 मिनट तक छडि़यों की आवाज कमरे में गूंजती रही.

और इस तरह से छोटे से गांव का वह छोटा सा लड़का अपनी क्लास का बेताज का बादशाह बन गया था. आने वाले 4 सालों में उस का सिक्का चलता रहा था. उसे समझ आ गया था कि पढ़ाई में सब से ऊपर रह कर ही वह अपने आत्मसम्मान को बचा सकता था.

अचानक होस्टल की बिजली चली गई और गरमी का एहसास गोपाल को अतीत से वर्तमान में खींच लाया. उठ कर वह कमरे के बाहर आ गया और बरामदे की दीवार पर बैठ गया. जून का महीना था, सुबह के 11 बज चुके थे और हवा गरम थी. पूरा होस्टल खाली पड़ा था. तकरीबन सभी छात्र गरमियों की छुट्टी में घर चले गए थे, पर वह वहीं रुक गया था. घर जा कर क्या करता, यहां रह कर लाइब्रेरी से किताबें ले कर वह आने वाली प्रतियोगात्मक परीक्षाओं की तैयारी कर सकता था.

आज सोमवार था और लाइब्रेरी बंद थी, इसलिए गोपाल बरामदे की दीवार पर बैठा नीले आकाश की ओर देख रहा था जहां कुछ पक्षी ऊंची उड़ान भर रहे थे. क्या वह भी कभी ऐसी उड़ान भर पाएगा? सोचतेसोचते ध्यान फिर से अतीत की गलियों में भटक गया.

4 साल पहले, देहरादून में माता वाले बाग के पास वह एक छोटा सा कमरा जहां गोपाल और उस के बड़े भाई रहते थे. रात का समय था. कमरे में बान की 2 चारपाइयां पड़ी थीं. उन के बीच एक लकड़ी का फट्टा रखा था और उस फट्टे पर मिट्टी के तेल वाली एक लालटेन रखी थी, जिस से दोनों को रोशनी मिल रही थी.

गोपाल इंटरमीडिएट इम्तिहान की तैयारी कर रहा था और बड़े भैया एमए की. दोनों भाई अपनीअपनी चारपाई पर पालथी मार कर बैठे हुए थे, किताब गोद में थी और इम्तिहान की तैयारी चल रही थी. कमरे में सन्नाटा था,

बस कभीकभी पन्ना पलटने की आवाज आती थी.

लालटेन की लौ अचानक भभकने लगी.

‘‘चलो, अब सो जाते हैं. लगता है लालटेन में तेल खत्म हो रहा है,’’ बड़े भैया ने चुप्पी तोड़ी.

‘‘पर मेरी पढ़ाई तो पूरी नहीं हुई है,’’ गोपाल ने दबा हुआ सा विरोध किया.

‘‘समझा करो न. घर में और तेल नहीं है. अगर कल ट्यूशन के पैसे मिल गए तो मैं तेल ले आऊंगा. अब किताबें रख दो और सो जाओ. मैं भी सो रहा हूं.  और कोई तरीका नहीं है,’’ कहते हुए बड़े भैया ने किताबें जमीन पर रख दीं और करवट बदल कर लेट गए.

लालटेन की लौ एक बार जोर से भड़की और लालटेन बुझ गई. कोठरी में पूरी तरह अंधकार छा गया था.

गोपाल ने अंधेरे में ही किताबें उठाईं और दबे पैर कमरे के बाहर निकल गया.

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