सत्यपाल मलिक का सच और सीबीआई

कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी के प्रिय पात्र रहे सतपाल मलिक अपने कड़वे बोलों के कारण संभवत नरेंद्र मोदी की आंखों की किरकिरी बन गए हैं. यही कारण है कि एक बहुचर्चित न्यूज पोर्टल में साक्षात्कार के बाद केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने बतौर मेहमान उन्हें बुला भेजा है. मजे की बात यह है कि सत्यपाल मलिक ने सीबीआई इस निमंत्रण को अपने ट्विटर हैंडल पर बड़ी गर्मजोशी के साथ शेयर करते हुए फिर कुछ  कड़वा बोल दिया है जिसके कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी और भारतीय जनता पार्टी अब उनके सीधे निशाने पर है.

जैसा कि अब यह बात सभी जानते हैं की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो हो या फिर प्रवर्तन निदेशालय अर्थात ईडी के दुरपयोग के आरोप केंद्र सरकार पर कुछ ज्यादा ही लगने लगे हैं ऐसे में सत्य पाल मलिक की छवि कुछ इस तरह की है कि सीबीआई द्वारा उन्हें भ्रष्टाचार के एक मामले में बुलाने की खबर की प्रतिक्रिया नरेंद्र मोदी के लिए सकारात्मक नहीं की जा सकती. आज देश के आम आवाम के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता और नेता भी यह सोचने लगे हैं कि देश में यह कैसी उल्टी गंगा बहा रही है और नरेंद्र दामोदरदास मोदी पर उंगलियां उठने लगी है. आज हम पाठकों के लिए सत्यपाल मलिक के बरक्स कुछ ऐसी जानकारियां लेकर आए हैं जिन्हें पढ़ समझकर आप स्वयं निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि आखिर देश में क्या चल रहा है.

दरअसल, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने जम्मू- कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक को केंद्र शासित प्रदेश में हुए कथित बीमा घोटाले के सिलसिले में कुछ सवालों के जवाब मांगे हैं.सात महीने में यह दूसरी दफा है, जब सत्यपाल मलिक से सीबीआई पूछताछ करेगी. बिहार, जम्मू-कश्मीर, गोवा और मेघालय के राज्यपाल के रूप में जिम्मेदारियां समाप्त होने के बाद पिछले साल अक्तूबर में मलिक से पूछताछ की गई थी . सीबीआइ की ताजा कार्रवाई ‘द वायर’ को मलिक द्वारा दिए गए साक्षात्कार के महज एक सप्ताह बाद केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो का नोटिस मिल गया है.

दूसरी तरफ जैसा कि सत्यपाल मलिक का स्वभाव है उन्होंने  कहा है कि मैंने सच सच बोल दिया है, हो सकता है, इसलिए मुझे बुलाया गया हो. मैं तो किसान का बेटा हूं, मैं घबराऊंगा नहीं, सीबीआइ ने सरकारी कर्मचारियों के लिए  सामूहिक चिकित्सा बीमा योजना के ठेके देने और जम्मू-कश्मीर में कीरू जलविद्युत परियोजन से जुड़े 2,200 करोड़ रुपए के निर्माण कार्य भ्रष्टाचार के सत्यपाल मलिक के आरोपों के संबंध में प्राथमिकी दर्ज की थीं. इधर  सत्यपाल मलिक ने दावा किया कि उन्हें 23 अगस्त, 2018 से 30 अक्तूबर 2019 के बीच जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल ने रूप में कार्यकाल के दौरान दो फाइलों को मंजू देने के लिए 300 करोड़ रुपए की रिश्वत की पेशकश की गई थी. पाठकों को बता दें कि दूसरी प्राथमिकी की जलविद्युत परियोजना के सिविल कामकाज ठेके देने में कथित अनियमितताओं से जुड़ी है. सत्यपाल मलिक ने हाल ही में एक विवादास्पद साक्षात्कार में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत केंद्र सरकार पर निशाना साधा था और विशेष रूप से जम्मू कश्मीर में शासन चलाने के तरीके को लेकर उसकी आलोचना की थी.

मलिक के कथन से  उल्टा संदेश               

सीबीआइ के पूछताछ के लिए बुलाने संबंधी घटनाक्रम पर कभी मोदी के खास खास रहे सत्यपाल मलिक ने कहा कि सीबीआइ ने ‘कुछ स्पष्टीकरण’ के लिए अपने अकबर रोड स्थित गेस्ट हाउस में उपस्थित होने को कहा है.  सत्यपाल मलिक ने कहा है कि मैं राजस्थान जा रहा हूं, इसलिए मैंने उन्हें 27 से 29 अप्रैल की तारीख दी है.’ उन्होंने ट्वीट किया कि वह सच के साथ खड़े हैं. मलिक ने ‘हैशटैग सीबीआइ के साथ ट्वीट किया, ‘मैंने सच बोलकर कुछ लोगों के पाप उजागर किए हैं. कुल मिलाकर के जहां एक तरफ दिल्ली में शासन कर रही आप पार्टी के अरविंद केजरीवाल सहित उसके कई नेताओं पर सीबीआई और ईडी की गाज को हमने देखा है दूसरी तरफ बिहार में लालू परिवार भी सीबीआई और ईडी से घिरा हुआ है. छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार के कई चेहरे इनकी जद में है. यह कहा जा सकता है कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से हटकर अन्य सभी पार्टियों के ऊपर एक तरह से सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय ने दबिश दे रही है. इन सबके बीच सत्यपाल मलिक एक ऐसा चेहरा है जो अपने कार्य शैली के कारण देशभर में जाने जाते हैं उन्होंने अपनी बेबाक टिप्पणियों से लोकतंत्र को सींचने का काम किया है, ऐसी शख्सियत पर सीबीआई का फंदा सुर्खियां बटोर रहा है. देखना यह होगा कि आगे चलकर सत्यपाल मलिक खामोश हो जाते हैं या फिर और भी ज्यादा बेबाकी से अपनी बात को देश के सामने रखते हैं.

मोनिका की दास्तां

जब औरत अपने प्रेमी से मिलना चाहे तो वह हर बाधा को पार कर सकता है. दिल्ली की मोनिका की 2016 में शाद हुई पर वह पति के सामने प्रेमी के साथ फोन पर बात करती रही और उस के मना करने पर मिलती भी रही. उस के सासससुर का मकान भागीरथी विहार में था और शायद बहू के कारनामों से तंग आ कर परचून की दुकान चलाने वाले ससुर ने मकान बेचना चाहा. मोनिका मकान के मिलने वाले 1 करोड़ रुपए हथियाना चाहती थी और चूंकि ससुर उस से डरते नहीं थे उस ने उन का सफाया करना था.

मोनिका के वाउंसर प्रेमिका ने एक शातिर अपराधी को पकड़ा और दोनों की सहायाता से सासससुर दोनों की हत्या कारवा दी. पति तो प्रेमी से डरता था इसलिए उस को बाद में काबू करना मुश्किल नहीं था. पर जैसा अपराधों के मामलों में होता है, अपराधी फूल प्रूफ प्लान नहीं बना पाते. ज्यादातर अपराधी बेहद कम पढ़ेलिखे होते हैं और उन्हें अपराध पकड़े कैसे जाते हैं, इस की जानकारी कम होती है और बहुत से फ्लू छोड़ते चले जाते हैं.

महीनों की तैयारी के बाद मोनिका ने जो हत्या की उसे पुलिस ने 10 घंटे में सुलटा दिया  जबकि मामला कोई हाई प्रोफाइल नहीं था. मोनिका के सासससुर तो गए ही, वह खुद जेल में न कितने साल रहेगी और पति खुद इधरउधर भटकता रहेगा. जिन प्रेमियों ने प्रेमिका की खातिर जोखिम लिया. वे भी जेलों में सड़ेंगे अगर उन के रिश्तेदार होंगे तो उन्हें वकील मिलेगा क्या एक तरफा फैसले में जेल से जेल जाना होगा.

अपराधी आमतौर पर फंसते इसलिए हैं कि वे सोचते हैं कि पकड़े नहीं जाएंगे जबकि हर ऐसा अपराध जिस में थोड़ा बहुत प्लान किया हो, आसपास के किसी विक्टिम का हो, पकड़े जाने के अवसर बहुत होते हैं, फिल्मों में अक्सर दिखाते हैं कि अपराधी बच निकला जैसा अजय देवगन की फिल्म दृश्य में दिखाया गया है पर उस में मृतक के प्रति किसी की भी सहानुभूति नहीं थी, न सिस्टम की न जनता की. हां हमारे देश में अगर कोई अपराध है जिन में गारंटीड सजा नहीं मिलेगी तो वे हैं धर्म के मामलों में. ङ्क्षहदू अपराधी मुसलिम नागरिकों के खिलाफ जो भी कर लें,

आज कानून ऐसा हो गया हैकि उन्हें कोई कुछ नहीं कहेगा. मोनिका की गलती यह थी कि उस ने अपराध करना था मुसलिम सासससुर ढूंढती. फिर तो उस के हजार समर्थक निकल आते जो कहते कि वह तो खुद लव जेहाद की मारी थी, वह भला हत्यारिन कैसे कही जा सकती है चाहे उस ने 10 खून किए हो.

अब अपराधियों को यह भी ख्याल रखना पड़ेगा कि चप्पेचप्पे पर लगे कैमरे उन की हर गतिविधि को देख रहे हैं रिकार्ड कर रहे हैं. अब पफेन रिकार्ड और कैमरों के सहारे किसी को भी पकडऩा आसान होता जा रहा है. अपराध कम हो रहे हैं इसलिए नहीं कि मंदिर ज्यादा बन रहे हैं बल्कि इसलिए कि कैंमरे ज्यादा लग रहे हैं और ज्यादा कामयाब हो रहे हैं.

गरीबों को लूटते है अमीर लोग

साहित्य में आमतौर पर गरीबों को बड़ा उदार दिखाने की कोशिश की जाती है कि एक गरीब ही  गरीब के काम आता और ये तो अमीर हैं जो उन को लूटते हैं और जिन के पास गरीबों के लिए दिल नहीं होता. सच तो शायद इस का उलट है. गरीबों को अपनी बेवकूफियों और कम पढ़ेलिखा होने के कारण गरीब चोरउचक्कों का ज्यादा शिकार बनना पड़ता है.

कोविड के दौरान जब लाखों की तादाद में गरीब अपना छोटाछोटा सामान सिरों पर लाद कर पैदल सैंकड़ों मील अपने घर के लिए चले थे तो उन में से बहुतों को लूटा गया. कहींकहीं उन को अमीरों ने खाना खिलाया, दवाएं दीं, रात को सोने की जगह दी पर आमतौतर पर कोविड की वजह से गांवों में घुसने नहीं दिया गया और साथ ही उन का सामान भी चोरी कर लिया गया. जो थोड़ेबहुत पैसे लेकर वे चले थे, आखिर तक चोरी ही हो गए.

रेलवे स्टेशनों और रेलों में गिरोह बाकायदा गरीबों को लूटते हैं और घर ले जा रहे 4 कपड़ों, 2-3 बर्तन मोबाइल, बच्चों के खिलौने तक लूट ले जाते हैं. ये चोर अमीर नहीं, गरीब ही होते हैं. इन गरीब चोरों की बातों में गरीब मजदूर आसानी से आ जाते हैं.

रेलवे स्टेशनों के पास बनाई गई झुग्गियों में चोर अक्सर अपना ठिकाना बना लेते हैं और रिजर्व व जनरल बोगियों, प्लेटफार्मों, टिकट की लाइन, सिक्योरिटी लाइनों में से अटैचियां, बंडल चोरी कर लेते हैं.

जहां भी गाडिय़ां धीमी होती है या तकनीकी कारण से टे्रन रुकती है, चोर चढ़ कर सोते मजदूरों का सामान उठा कर भाग जाते हैं. 3-4 के गिरोह में चलने वाले ये लोग तेजी से चोरी का सामान एक से दूसरे हाथ देते हैं ताकि बेचारा मजदूर समझ ही न पाए कि हुआ क्या, उस के सिरहाने रखी अटैची गई कहां, जेब का मोबाइल गया कहां. कंपार्टमैंट में तो सभी उसी की तरह लोग होते हैं. इसलिए वह बेचारा किसी पर आरोप भी नहीं लगा पाता. बस रोता रह जाता है.

गरीबों को लूटने की आदत गरीबों को घरों से बचपन से हो जाता है. शुरू में यह छोटीमोटी चोरी एक गुब्बारा खरीदने के लिए या एक फैन खरीदने के लिए होती है पर फिर पता चलता है कि चोरी तो हर जने का हक सा है. अमीर तो ढंग से चोरी करता है गरीबगरीब को चाकू तमंचा दिखा कर भी लूट लेता है.

घरों में लूटे का सामान जब आता है तो घरवालें खुश होते हैंं. उन्हें उस गरीब के नुकसान का कोई दर्द नहीं होता जो बड़ी उमंगों से 4 चीजें घरवालों के ले जा रहा था.

यह हमारी सामाजिक समझ का बड़ा दोष है. गरीब को लूटने को गलत न कहना सब से बड़ा गुनाह है जिस का दोषी हर आदमी है जो लूट के सामान की खरीदफरोक्त करता है या घर में रखता है.

गरीब अपने घर पक्के नहीं बना सकते, वे चौकीदार नहीं रख सकते, उन्हें अपनी अटैची या जेब का ध्यान नहीं रहता, उन्हें भीड़ में चिपकचिपक कर चलना पड़ता है. उन्हें गरीबों के घरों से चोरी न करने का पाठ नहीं पढ़ाया जाता यह अफसोस है.

बड़ा अफसोस यह है कि हर मंदिर में जम कर चोरी होती है, चप्पलोंजूते तो चोरी होते ही हैं, पाकेटमारी होती है, चेन खींची जाती है, बहका कर दाम भी लिया जाता है और यह सब मंदिर वालों की जानकारी में होता है क्योंकि ये चोर वहीं बनें रहते हैं जबकि भक्त हर रोज नएनए आते हैं, मंदिरों की चोरी पाठपढ़ाती है कि भगवान भी गरीबों के हैं, गरीबों को लूटने का लाइसेंस देता हो यही हमारी धर्म हमें सिखाता है, मंदिरों से ले कर घरों तक और रेलों से ले कर बाजारों तक लूटते गरीब ज्यादा हैं, अमीर नहीं.

भाजपा, नरेंद्र मोदी और हनुमान..!

जनता पार्टी के स्थापना दिवस पर नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने मास्टर भाजपा को हनुमान सदृश्य बताया. भारतीय राजनीति में इन दिनों भाजपा जिस तरह हिंदुत्व को लेकर के पल पल ध्रुवीकरण में लगी हुई है वह सीधे-सीधे संविधान के विरुद्ध है नैतिकता के विरुद्ध है आने वाले भारत के लिए अनेक तरह के संकट लेकर आने वाला है. अगर नरेंद्र मोदी हनुमान जयंती पर भाजपा को राम से जोड़ देते हैं तो रामनवमी पर श्रीराम से इसी तरह हर एक हिंदुत्ववादी त्यौहार पर कुछ ऐसी बात करते हैं कि हिंदूवादी मतदाता भारतीय जनता पार्टी को गले लगा ले और आंख बंद करके उन्हें वोट देने लगे. यह एक जनतंत्र के लिए खतरनाक स्थिति है मगर सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठ कर के नेताओं को साथ में रखने का नाम भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी का है.

हमारे देश की राजनीति का सौंदर्य यही है कि हमने दो दल की जगह अनेक दलों को तरजीह दी है मगर भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आने के बाद बाकी सभी दलों को नेस्तनाबूद कर देना चाहती है. अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बात तो छोड़ दें भाजपा तो कांग्रेस को भी निगल जाना चाहती है.

दरअसल, हमारा देश लोकतांत्रिक है, इस सब के बावजूद भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद जिस तरह विपक्ष चाहे वह कांग्रेस हो या आप हो या समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी या अन्य छोटे बड़े राजनीतिक दल उन्हे नेस्तनाबूद करने की कोशिश की जा रही है, नेताओं को प्रताड़ित करने की चेष्टा जारी है उससे साफ संकेत मिलता है कि जैसा कि उद्धव ठाकरे ने कहा 2024 का लोकसभा चुनाव अगर नरेंद्र दामोदरदास मोदी के नेतृत्व में भाजपा अगरचे ऐन केन  जीत जाती है तो विपक्ष के लिए अंतिम चुनाव होगा. अगर हम देखते हैं तो कांग्रेस पार्टी की देश से सिमटते हुए अब कांग्रेस चुनिंदा राज्यों में ही राज कर रही है, ऐसे में छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल के  संरक्षण में कांग्रेस पार्टी के अधिवेशन पर भी  केंद्र सरकार ने ग्रहण लगाने की पुरजोर कोशिश की. यह चिंतन का विषय है कि भाजपा नेतृत्व को क्यों पीड़ा हो रही है. लोकतंत्र और देश ऐसे ही चलता आया है. यह भी सच है कि व्यवहार और हकीकत में अंतर होता  है . मगर जिस तरह अधिवेशन से पूर्व केंद्र की विधि यानी प्रवर्तन निदेशालय ने कांग्रेस के नेताओं पर गाज गिराई वह देश भर में चर्चा का विषय बन गया. जहां कांग्रेस रक्षात्मक है वही भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार आक्रमण होती जा रही है. इससे यह संकेत मिलता है कि कहीं न कहीं तो अधिवेशन से भय है. वस्तुत: भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी को यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर कांग्रेस भी आपके जैसा व्यवहार करती तो भारतीय जनता पार्टी क्या पैदा हो पाती…? क्या भाजपा आज जिस मुकाम पर पहुंची है कभी पहुंच सकती थी. लोकशाही और तानाशाही में अंतर भाजपा के बड़े नेताओं को मालूम होना चाहिए और  एक देशहित और स्वस्थ स्पर्धा के रूप में अपनी भूमिका को निभाना चाहिए.

भारतीय जनता पार्टी हिंदुत्व ऐसे ही कुछ मुद्दों पर देश की आवाम को बरगलाने का लगातार प्रयास कर रही है ठीक है देश में हिंदू बहुसंख्यक हैं मगर आजादी के बाद देश को आगे बढ़ाने का जिम्मा जिन लोगों के हाथों में था उन्होंने यह निश्चय किया कि चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम या सिख ईसाई सभी इस देश के नागरिक हैं और सबका विकास समरसता के साथ देश में होना चाहिए .

मगर,आज देश में जो हो रहा है वह सारा देश देख रहा है. कांग्रेस जिसकी जड़ें बहुत मजबूत हैं उसे अगर नेस्तनाबूद करने की ख्वाहिश‌ अगर भाजपा पाल रही है तो यह तो मुंगेरीलाल के ख्वाब ही कहे जाएंगे, क्योंकि कांग्रेस एक राजनीतिक दल ही नहीं एक विचारधारा भी है, छत्तीसगढ़  में ईडी की कार्रवाई के बाद आवेश ने भी मोर्चा संभाल लिया और महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा -छत्तीसगढ़ में पार्टी के कई नेताओं के खिलाफ है प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई को लेकर प्रधानमंत्री पर सीधा निशाना साधा. उन्होंने कहा कि कठपुतली एजेंसियों का डर दिखाकर देश की आवाज को दबाया नहीं जा सकता.

 हिंदू देवी देवता और भाजपा

जब भी कोई हिंदू त्यौहार आता है भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी  देश की बहुसंख्यक वोटरों को लुभाने के लिए कुछ ना कुछ कर जाते हैं. इस दफा संयोग से 6 अप्रैल को भारतीय जनता पार्टी का स्थापना दिवस था उसके साथ ही हनुमान जी की जयंती भी ऐसे में आप (नरेंद्र मोदी) भला कहां मौन रहने वाले थे . हनुमान जयंती के बारे में जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने भगवान हनुमान और भाजपा के बीच समानताएं बताने लगे और कहा -” पार्टी निःस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास करती है.” उन्होंने कहा -” आत्म संदेह को खत्म करने के बाद भगवान हनुमान की तरह ही भारत अपनी क्षमता का एहसास कर रहा है.” मोदी ने कहा- “अगर हम भगवान हनुमान का पूरा जीवन देखें तो उनमें ‘कर सकने वाला’ की प्रवृत्ति थी जिसकी वजह से उन्हें बड़ी सफलताएं हासिल हुईं.”दरअसल यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है अगर  कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दल भी यही करने लगेंगे तो देश रसातल को चला जाएगा

सियासी अनदेखी के शिकार मुस्लिम

राजस्थान में कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार है और यह भी एक तथ्य है कि कांग्रेस विधानसभा चुनाव में हारतीहारती बची थी तथा उसे मतगणना के दिन 200 सीटों में से जो 99 सीटें मिली थी, उन में से 96 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोट 15 हज़ार या इस से ऊपर हैं और इन 96 सीटों को जिताने में मुस्लिम वोटर कांग्रेस का सब से बड़ा मददगार साबित हुआ है।

इस के बावजूद सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कांग्रेस के बड़े नेताओं, मंत्रियों व अधिकतर विधायकों ने मुसलमानों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया है। जिस से मुसलमानों में बड़ा रोष है और जो मुसलमान कांग्रेस से जुड़े हुए हैं वे भी दबी जुबान यह स्वीकार करते हैं कि हां, कांग्रेस राज में मुसलमानों की पूरी तरह से अनदेखी हो रही है और ऐसा लग रहा है कि हम ने कांग्रेस को चुनाव जीता कर बहुत बड़ा गुनाह कर दिया है।

कांग्रेस पूरी तरह से भाजपा की बी टीम बन गई है और वो भी भाजपा की तरह मुसलमानों को दूर कर हिन्दू और हिन्दुवाद के नाम पर वोट बटोरना चाहती है, हालांकि पश्चिम बंगाल, यूपी, बिहार आदि राज्यों में वो इस बदलाव से फायदे की बजाए और कमजोर हुई है।

ताज़ा चोट उस ने गुजरात में खाई है, जहां कांग्रेस का ऐतिहासिक सफाया हुआ है। साल 2021 में 12 दिसंबर को जयपुर के विद्याधर नगर स्टेडियम में आयोजित कांग्रेस की राष्ट्रीय महारैली में राहुल गांधी ने जो भाषण दिया था, तब यह स्पष्ट हो गया था कि कांग्रेस अब भाजपा के रास्ते पर चल कर सुसाइड करेगी।

उस महारैली में राहुल गांधी ने हिंदू और हिंदुत्ववाद को ले कर लंबा व्याख्यान दिया तथा यह साबित करने की कोशिश कि कांग्रेस “सिर्फ हिंदुओं की पार्टी है और हिंदुओं का ही राज लाना है।”

तब राहुल गांधी के भाषण के बाद कांग्रेसी मुसलमान अपने आप को ठगा हुआ महसूस करने लग गए थे और आम मुसलमान तो यह खुल कर कहने लग गया कि कांग्रेस का असली चेहरा यही था, जो राहुल गांधी ने बताया है।

वहीं जो मुसलमान शुरू से ही कांग्रेस की नीतियों के खिलाफ थे, वे अब और मजबूती से अपनी बात लोगों के बीच में रख रहे हैं और बता रहे हैं कि मुसलमानों की सियासी अनदेखी जो राजस्थान में हो रही है, उस का खात्मा तभी होगा जब मुसलमान पूरी तरह से कांग्रेस से अलग हो जाएगा।

अब सवाल यह पैदा होता है कि मुसलमान कांग्रेस से अलग हो कर जाएं कहां ? जहां तक भाजपा का सवाल है तो उस की डिक्शनरी में मुसलमानों की सुनवाई और विकास जैसे शब्द ही नहीं छपे हुए हैं। भाजपा की पूरी सियासी इमारत मुस्लिम विरोध पर टिकी हुई है, उस के चाल, चरित्र और चेहरे को देख कर यह स्पष्ट है कि भाजपा को मुसलमानों का देश में वजूद ही पसंद नहीं है।

ऐसे में जाहिर है कि मुसलमान धड़ल्ले से भाजपा की तरफ नहीं जा सकता। अब बात उन मुस्लिम पार्टियों की जो मुसलमानों के मुद्दे खुलेआम उठा रही हैं, बेबाकी से उठा रही हैं। लेकिन मुसलमान बड़ी संख्या में उन से भी नहीं जुड़ रहा है, जिस की वजह यह है कि राजस्थान गंगाजमुनी तहजीब वाला राज्य है, जहां सभी कौमें मिलजुल कर रहती हैं।

साथ ही राजस्थान में एक भी विधानसभा सीट ऐसी नहीं है, जिस में मुस्लिम वोट 40 प्रतिशत या उस से अधिक हों, यानी यह तय है कि मुस्लिम वोट के बलबूते पर मुस्लिम पार्टी के जरिए विधानसभा की सीट निकालना इतना आसान नहीं है, जितना यह मुस्लिम पार्टियां बता रही हैं।

राजस्थान में इस वक्त तीन मुस्लिम पार्टियां काम कर रही हैं। जिन में पहली एसडीपीआई और दूसरी वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया। यह दोनों पार्टियां करीब 10 साल से राजस्थान में काम कर रही हैं और इन दोनों का वजूद कई राज्यों में है, हालांकि 10 साल में किसी भी राज्य में इन का एक भी विधायक नहीं बन पाया है।

दोनों पार्टियों के पास राजस्थान में अच्छाखासा कैडर भी है। कैडर के मामले में एसडीपीआई एक बड़ा संगठन है तथा ऐसा समर्पित कैडर भाजपा के बाद राजस्थान में सिर्फ एसडीपीआई के पास ही है। लेकिन इन दोनों ही पार्टियों के पास जो नेतृत्व है, वह एक तरह का गैरसियासी है और नेतृत्व में सियासी क्षमता का पूरी तरह से अभाव है। यही वजह है कि पिछले 10 साल में दोनों ही पार्टियां राजस्थान में कुछ खास नहीं कर पाई हैं।

तीसरी पार्टी एमआईएम है, जिस की चर्चा राजस्थान में खूब है। क्योंकि एमआईएम के चीफ असदुद्दीन ओवैसी मुसलमानों के मुद्दों पर संसद से ले कर विभिन्न कार्यक्रमों में खुल कर बोलते हैं, बेबाक बोलते हैं। उन की बेबाकी से प्रभावित हो कर बड़ी संख्या में एमआईएम समर्थक राजस्थान में सक्रिय हो चुके हैं।

एमआईएम राजस्थान में अपने पांव पसारने की तैयारी कर चुकी है। गत महीनों असदुद्दीन ओवैसी का जयपुर, सीकर, नागौर, चूरू और झुंझुनूं जिलों में दौरा भी हो चुका है और राजस्थान में पार्टी का गठन भी हो चुका है। जज़्बाती मुसलमान बड़ी संख्या में अपने आप को एमआईएम का समर्थक या एमआईएम का नेता बता रहे हैं तथा एमआईएम को राजस्थान में खड़ा कर मुसलमानों को सियासी कयादत देने के दावे भी कर रहे हैं, लेकिन यहां हालात ऊपर वाली दो पार्टियों से भी खराब हैं। जो लोग एमआईएम से जुड़े हुए हैं, उन में अधिकतर पूरी तरह से गैरसियासी हैं और उन में सियासी दूरदर्शिता की पूरी तरह से कमी है।

सब से अनोखी बात यह है कि यह तीनों पार्टियां मुस्लिम नेतृत्व की हैं, मुसलमानों की बात करती हैं, बेबाकी से बात करती हैं। लेकिन तीनों में आपसी तालमेल, लीडरशिप और दूरदर्शिता की कमी है। साथ ही ऐसा भी नहीं लग रहा है कि यह तीनों पार्टियां गठबंधन कर लेंगी। जिस की सब से बड़ी वजह यह है कि तीनों पार्टियां बात तो मुसलमानों की करती हैं, लेकिन सियासी व सांगठनिक विचारधारा के तौर पर तीनों अलगअलग हैं और सच तो यह है कि तीनों ही पार्टियां अंदरखाने एकदूसरे की मुखालफत भी करती हैं।

अब सवाल यह है कि ऐसे हालात में राजस्थान में मुसलमानों की सियासी सुनवाई कैसे हो ? उन के मुद्दों पर राजनेता खुल कर बात कैसे करें ? मुसलमानों की सत्ता और सियासत में भागीदारी कैसे हो ?

इस के लिए पहली बात तो यह है कि मुसलमानों का सियासी वजूद और सत्ता व सियासत में भागीदारी सिर्फ और सिर्फ छोटी क्षेत्रीय पार्टियों का साथ देने में है, जो अपनेअपने इलाके में काम कर रही हैं। दूसरी बात यह है कि उक्त तीनों मुस्लिम पार्टियों (एसडीपीआई, वेलफेयर पार्टी और एमआईएम) को पहले खुद आपस में गठबंधन करना चाहिए और उस के बाद अन्य क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन करना चाहिए।

इस तरह से यह तीनों पार्टियां राजस्थान की अन्य छोटी पॉलिटिकल पार्टियों को साथ ले कर कांग्रेस व भाजपा के खिलाफ़ महागठबंधन बनाएं और फिर पूरी ताक़त से विधानसभा चुनाव में उतरें। पूरे प्रदेश में कांग्रेस व भाजपा के खिलाफ एक लम्बी यात्रा निकालें, जो कमोबेश सभी 200 विधानसभा सीटों पर जाए।

अगर ऐसा महागठबंधन बनता है, तो न सिर्फ मुसलमानों को बल्कि सभी वंचित लोगों को सत्ता में भागीदारी मिल सकती है तथा राजस्थान को कांग्रेस व भाजपा के “5 साल तुम और 5 साल हम” वाले कंधाबदली राज से छुटकारा भी मिल सकता है।

उत्तर प्रदेश: पुजारी बन गए सरकारी अफसर

साल 2024 के लोकसभा चुनाव का प्रचार अभियान उत्तर प्रदेश में शुरू हो चुका है. भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में मोदी सरकार को तकरीबन 10 साल और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को 6 साल पूरे हो चुके हैं. इस के बाद भी चुनाव में वह पार्टी राम के नाम के सहारे ही जाना चाहती है.

इसी के तहत चैत्र महीने के नवरात्र में उत्तर प्रदेश सरकार ने अयोध्या में राम जन्मोत्सव मनाने का काम किया और पूरे नवरात्र प्रदेशभर में धार्मिक आयोजन हुए. इन आयोजनों का मकसद केवल जनता का ध्यान अपराध, महंगाई, बेरोजगारी जैसे गंभीर मुद्दों से हटाने का था.

उत्तर प्रदेश में विकास के नाम पर टूटी सड़कें हैं, जिन को ले कर भारतीय जनता पार्टी के विधायक योगेश शुक्ला ने ही अपनी शिकायत दर्ज कराई थी. ऐसे तमाम बड़े मुद्दों पर लोगों का ध्यान न जाए, इस वजह से ही पूजापाठ का सहारा लिया गया.

जिन जिलाधिकारियों को जिले के विकास और कानून व्यवस्था का काम देखना था, वे मंदिरों में पूजापाठ की व्यवस्था देखने का काम करते रहे. पूजापाठ के लिए वे गाने वालों और देवीदेवताओं का रूप धरने वालों को तलाश करते रहे. यही नहीं, संस्कृति विभाग के अफसरों समेत तमाम दूसरे अफसर इस की देखरेख में लगे रहे. ‘रामचरितमानस’ का विरोध करने वाली समाजवादी पार्टी इस पर खामोश रही और कांग्रेस की आवाज नक्कारखाने में तूती की तरह साबित हुई.

डीएम साहब के हवाले इंतजाम

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को ‘पूजापाठ वाली सरकार’ कहा जाता है. उन के तमाम फैसले इसी तरह के होते हैं. कांवड़ यात्रा के दौरान यात्रियों पर हैलीकौप्टर से फूल बरसाने, सड़कों की धुलाई करने के साथसाथ अयोध्या में हर साल दीवाली के समय दीपोत्सव करना उस का साल दर साल रिकौर्ड बनाना खासतौर पर याद किया जाता है. इस सिलसिले में नया काम नवरात्र के दिनों में जिला लैवल पर ‘रामायण पाठ’ और ‘दुर्गापाठ’ कराना जुड़ गया.

योगी सरकार ने नवरात्र में देवी मंदिरों में दुर्गा सप्तशती और रामनवमी पर अखंड रामायण पाठ का आयोजन कराने का आदेश दिया. सरकार ने प्रदेश के हर जिले में जिला, तहसील और ब्लौक स्तरीय समितियों का गठन कर के नवरात्र में देवी मंदिरों में दुर्गा सप्तशती और रामनवमी पर अखंड रामायण पाठ का आयोजन किया.

योगी सरकार ने चैत्र नवरात्र और रामनवमी पर प्रदेश के देवी मंदिरों और शक्तिपीठों में 22 मार्च से 30 मार्च तक दुर्गा सप्तशती का पाठ और देवी गायन जागरण के कार्यक्रम आयोजित किए. इन कार्यक्रमों में महिलाओं और बालिकाओं को खासतौर से जोड़ा गया.

संस्कृति विभाग ने उठाया जिम्मा

प्रमुख सचिव, संस्कृति, मुकेश कुमार मेश्राम की ओर से इस बारे में सभी मंडलायुक्तों और जिलाधिकारियों को शासनादेश जारी किया गया था. इस आयोजन के लिए हर जिले में जिला, तहसील और ब्लौक स्तरीय समितियों का गठन किया गया.

इन कार्यक्रमों को पेश करने वाले कलाकारों के मानदेय भुगतान के लिए संस्कृति विभाग ने हर जिले को जिला पर्यटन एवं सांस्कृतिक परिषद की ओर से एक लाख रुपए की धनराशि मुहैया कराई गई. आयोजन की दूसरी व्यवस्थाएं कराने के लिए जिला प्रशासन को कहा गया.

सभी कार्यक्रम दुर्गा की महिमा के अनुरूप आयोजित कराए जाने का निर्देश दिया गया था. हर जिले में चयनित देवी मंदिरों और शक्तिपीठों में होने वाले कार्यक्रमों के लिए कलाकारों का चयन जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित समिति ने किया, जिस का समन्वय संस्कृति और सूचना एवं जनसंपर्क विभागों द्वारा किया गया. इन कार्यक्रमों में स्थानीय जनप्रतिनिधियों को भी शामिल होने के लिए कहा गया.

शक्तिपीठों और देवी मंदिरों में पर्यटन व अन्य विभागों द्वारा कराए गए विकास कार्यों का सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के माध्यम से प्रिंट व इंटरनैट मीडिया पर प्रचारप्रसार किया गया.

सभी देवी मंदिरों के प्रांगण में होर्डिंगें भी लगाई गईं. हर आयोजन स्थल पर सफाई, पेयजल, सुरक्षा, ध्वनि, प्रकाश और दरी बिछावन आदि की व्यवस्था जिला प्रशासन ने कराई. सभी आयोजन स्थलों पर सक्षम स्तर से अनापत्ति प्रमाणपत्र प्राप्त करते हुए कार्यक्रमों का आयोजन भी तय किया गया.

प्रदेश स्तरीय इस कार्यक्रम में समन्वय के लिए शासन और निदेशालय स्तर से एकएक अधिकारियों को नोडल अधिकारी भी नामित किए गए थे.

इस के साथ ही साथ यह भी निर्देश था कि महत्त्वपूर्ण देवी मंदिरों और शक्तिपीठों का चयन करते हुए मंदिर का पता, फोटो, जीपीएस लोकेशन और मंदिर प्रबंधक का संपर्क नंबर, कलाकारों के नाम, पते व मोबाइल नंबर समेत कार्यक्रम के आयोजन की पूरी तैयारियों का ब्योरा 21 मार्च की शाम तक संस्कृति विभाग को भेज दिया गया. सभी जिलों में होने वाले कार्यक्रमों की सूचनाएं भी प्रतिदिन जिल नोडल अधिकारी की ओर से संस्कृति विभाग के पोर्टल पर अपडेट करने को कहा गया.

  समाजवादी पार्टी खामोश

योगी सरकार के इस कदम पर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ट्वीट कर के कहा कि ‘रामनवमी मनाने के लिए जिलाधिकारियों को एक लाख रुपए दिए जाने के प्रस्ताव का स्वागत है, पर इतनी रकम से क्या होगा, कम से कम 10 करोड़ रुपए देने चाहिए, जिस से सभी धर्मों के त्योहारों को मनाया जा सके.’

उन्होंने भाजपा सरकार से मांग की थी कि ‘वह त्योहारों पर रसोई गैस के मुफ्त सिलैंडर दे और इस की शुरुआत रामनवमी से हो.’

  कांग्रेस ने उठाए सवाल

कांग्रेस के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष ब्रजलाल खाबरी ने कहा कि ‘योगी और भाजपा सरकार महंगाई, बेरोजगारी, अडाणी और अंबानी के सवालों से लोगों का ध्यान हटाने के लिए इस तरह के आयोजन कर रही है. अब जनता इन के सच को समझ चुकी है. ये लोगों का ध्यान भटकाने और आवाज को दबाने का काम कर रहे हैं.

‘जनता लोकसभा के चुनाव में इस का जवाब देगी. हम जब भी विरोध प्रदर्शन करते हैं, हमें पुलिस का डर दिखाया जाता है. यह लोकतंत्र में अधिकारों का हनन है.’

भारत हो रहा गरीब, सरकारें अपने में मगन

देश में अमीरीगरीबी का मामला बहुत समय से चर्चा में है. दरअसल, यह एक ऐसा मसला है जो जहां एक तरफ सरकार के लिए खास है, वहीं दूसरी तरफ आम जनता में भी देश की अमीरी और गरीबी के बारे में चर्चा का दौर जारी रहता है.

अगर हम साल 2014 के बाद की मोदी सरकार के समय और उस से पहले की मनमोहन सरकार को परखें तो आज का समय आम लोगों के लिए एक बड़ी ट्रैजिडी बन कर सामने आया है. आज अगर बेरोजगारी बढ़ी है तो सीधी सी बात है कि उस के चलते गरीबी में भी बढ़ोतरी हुई है और इस की बुनियादी वजह है नोटबंदी और कोरोना काल.

बेरोजगारी का मतलब है नौजवान तबके के पास काम न होना. इस बात को गंभीरता से लेने की जरूरत है, क्योंकि अब भारत में पढ़ाईलिखाई की दर तो बढ़ी है, पर अगर नौजवानों को नौकरी या दूसरे रोजगार नहीं मिलेंगे, तो फिर यह सरकार की नाकामी ही कही जाएगी.

मगर वर्तमान सरकार यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि देश में बेरोजगारी और गरीबी बढ़ गई है. वह अपने तरीके से देशदुनिया के सामने यह बात रखने से गुरेज नहीं करती है कि देश अमीरी की तरफ बढ़ रहा है. आम लोगों की गरीबी के उलट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोच है कि दुनिया के सामने देश को सीना तान कर खड़ा होना है. चाहे चीन हो, अमेरिका हो या फिर रूस, हम किसी से कम नहीं. यह कुछ ऐसा ही है जैसे कोई पिद्दी पहलवान किसी नामचीन पहलवान के सामने ताल ठोंके. यह बात एक कौमेडी सी हो जाती है. आने वाले समय में सचमुच ऐसा हो न जाए, क्योंकि सचाई से मुंह चुराया जाना कतई उचित नहीं होता है.

अरविंद पनगढ़िया बने ढाल

आज जब देश के सामने गरीबी का सच सार्वजनिक है, महंगाई अपनी सीमाओं को तोड़ रही है, और तो और केंद्र सरकार की चाहे घरेलू गैस सिलैंडर वाली स्कीम हो या फिर पैट्रोल पौलिसी, ये दोनों खून के आंसू रुला रही हैं.

ऐसे में सरकार की तरफ से जानेमाने अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया ने मोरचा संभाल लिया है. वे कहते हैं कि कोविड 19 महामारी के दौरान भारत में गरीबी और गैरबराबरी बढ़ने का दावा सरासर गलत है.

अरविंद पनगढ़िया ने एक रिसर्च पेपर में यह भी कहा है कि असल में तो कोविड 19 के दौरान देश में गांवदेहात और शहरों के साथसाथ नैशनल लैवल पर गैरबराबरी कम हुई है.

कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर और देश के नीति आयोग में उपाध्यक्ष पद पर रह चुके अरविंद पनगढ़िया और इंटैलिंक एडवाइजर्स के विशाल मोरे ने मिल कर ‘भारत में गरीबी और असमानता : कोविड 19 के पहले और बाद में’ शीर्षक से यह रिसर्च पेपर लिखा है. इस में भारत में कोविड 19 महामारी से पहले और बाद में गरीबी और गैरबराबरी के हालात के बारे में बताया गया है. इस के लिए भारत के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के निश्चित अवधि पर होने वाले श्रमबल सर्वे में जारी घरेलू खर्च के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है.

रिसर्च पेपर में कहा गया है कि पीएलएफएस के जरीए जो गरीबी का लैवल निकला है, वह साल 2011-12 के उपभोक्ता व्यय सर्वे से निकले आंकड़ों और उस से पहले के अध्ययन से तुलनीय नहीं है. इस की वजह से पीएलएफएस और सीईएस में जो नमूने तैयार किए गए हैं, वे काफी अलग हैं.

इस के मुताबिक, तिमाही आधार पर अप्रैलजून, 2020 में कोविड 19 महामारी की रोकथाम के लिए जब सख्त लौकडाउन लागू किया गया था, उस दौरान गांवों में गरीबी बढ़ी थी, लेकिन जल्दी ही यह कोविड-19 से पहले के लैवल पर आ गई और उस के बाद से उस में लगातार गिरावट रही.

कोविड 19 के बाद सालाना आधार पर गैरबराबरी शहरी और गांवदेहात दोनों क्षेत्रों में घटी है. देश के 80 करोड़ गरीबों को सस्ता अनाज, सस्ता मकान वगैरह दे कर केंद्र सरकार खुद साबित कर रही है कि देश की जमीनी हकीकत क्या है. मगर दुनिया के चौरास्ते पर खड़े हो कर खुद को अमीर साबित करना सिर्फ छलावा ही तो है. ऐसा महसूस होता है कि हमारे देश में धार्मिकता के चलते आज भी लोग समझते हैं कि उन की बदहाली की असल वजह भगवान ही है, जिस ने उन्हें गरीब बनाया है, जबकि असल में हमारे देश की आर्थिक नीतियां और सरकार का काम करने का तरीका ऐसा है कि लोग गरीबी, बदहाली में जी रहे हैं.

हर सरकार लोगों को भरमा रही है. दिल्ली की केजरीवाल सरकार मुफ्त में महिलाओं को बस में यात्रा कराती है. कर्नाटक में राहुल गांधी बेरोजगारी भत्ते का लौलीपौप दिखाते हैं और नरेंद्र मोदी का दोहरा चेहरा तो देश देख ही रहा है. वे चाहते हैं कि विपक्षी पार्टियां तो कुछ भी न दें और वे खुद लोगों को कुछ न कुछ दे कर तथाकथित मसीहा बन जाएं. यही वजह है कि हमारा देश जापान, चीन जैसे देशों से बहुत पिछड़ गया है जो या तो बहुत छोटे हैं या फिर उन्हें आजादी बाद में मिली है.

रोजीरोटी जो न दे वह सरकार निकम्मी है!

गूगल पर बेरोजगारों के फोटो खंगालते हुए बहुत से फोटो दिखे जिन में बेरोजगार प्रदर्शन के समय तख्तियां लिए हुए थे. जिन पर लिखा था, ‘मोदी रोजी दो वरना गद्दी छोड़ो’, ‘शिक्षा मंत्री रोजी दो वरना त्यागपत्र दो’, ‘रोजीरोटी जो न दे वह सरकार निकम्मी है’.

ये नारे दिखने में अच्छे लगते हैं. बेरोजगारों का गुस्सा भी दिखाते हैं पर क्या किसी काम के हैं? रोजगार देना अब सरकारों का काम हो गया. अमेरिका के राष्ट्रपति हों या जापान के प्रधानमंत्री, हर समय बेरोजगारी के आंकड़ों पर उसी तरह नजर रखते हैं जैसे शेयर होल्डर अडाणी के शेयरों के दामों पर. पर न तो यह नजर रखना नौकरियां पैदा करता है और न ही शेयरों के दामों को ऊंचानीचा करता है.

रोजगार पैदा करने के लिए जनता खुद जिम्मेदार है. सरकार तो बस थोड़ा इशारा करती है. सरकार उस ट्रैफिक पुलिसमैन की तरह होती है जो ट्रैफिक को उस दिशा में भेजता है जहां सड़क खाली है. पर ट्रैफिक के घटनेबढ़ने में पुलिसमैन की कोई भी वैल्यू नहीं है. सरकारें भी नौकरियां नहीं दे सकतीं. हां, सरकारें टैक्स इस तरह लगा सकती हैं, नियमकानून बना सकती हैं कि रोजगार पैदा करने का माहौल बने.

हमारे देश में सरकारें इस काम को इस घटिया तरीके से करती हैं कि वे रोजगार देती हैं तो केवल टीचर्स को. हर ऐसे टीचर्स, जो रोजगार पैदा करने लायक स्टूडैंट बना सकें.

ट्रैफिक का उदाहरण लेते हुए कहा जा सकता है कि ट्रैफिक कांस्टेबल को वेतन और रिश्वत का काम दिया जाता है. खराब सड़कें बनाई जाती हैं जिन पर ट्रैफिक धीरेधीरे चले. सड़कों पर कब्जे होने दिए जाते हैं, ताकि सड़कें छोटी हो जाएं और दुकानघरों से वसूली हो सके.

ऐसे ही पढ़ाई में हो रहा है. टीचर्स अपौइंट करने, स्कूल बनवाने, बुक बनवाने, एग्जाम कराने में सरकार आगे पर नौकरी लायक पढ़ाने में कोई नहीं. सरकार जानबू?ा कर माहौल पैदा करती है कि बच्चे पढ़ें ही नहीं, खासतौर पर किसानों, मजदूरों, मेकैनिकों, सफाई करने वालों को तो पढ़ाते ही नहीं हैं. वे सिर्फ मोबाइलों पर फिल्में देखना जानते हैं. ट्रैफिक पुलिसमैन बनी सरकार अपनी जेब भर रही है.

मोदी सरकार अगर इस्तीफा दे देगी तो जो नई सरकार आएगी वह भी उसी ढांचे में ढली होगी, क्योंकि यहां पढ़ाने का मतलब होता है पौराणिक पढ़ाई जिस में पढ़ाने वाला गुरु होता है जो मंत्रों को रटवाता है और उस के बदले दानदक्षिणा, खाना, गाय, औरतें, घर पाना है और गरमियों में पंखों के नीचे और सर्दियों में धूप में सुस्ताना है. कोचिंग में वह सिर्फ पेपर लीक करवा कर पास कराने का ठेका लेता है.

जब असली काम की नौबत आती है, पढ़ालिखा सीरिया और तुर्की के मकानों की तरह भूकंप में ढह जाता है. अब जब भूकंप के लिए रेसेप तैयप एर्दोगन और बशर अल असद जिम्मेदार नहीं तो नरेंद्र मोदी क्यों? इसलिए चुप रहो, शोर न मचाओ.

मसला: दलित नेता, दलितों के दुश्मन

29अगस्त, 2022 को नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो ने जो आंकड़े प्रकाशित किए, उन से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश में साल 2021 में 1.02 फीसदी दलितों के खिलाफ जुल्म बढ़ने की रिपोर्टें दर्ज हुईं और मध्य प्रदेश में 6.4 फीसदी रिपोर्टें बढ़ीं. केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले, जो खुद दलित हैं, ने मार्च, 2022 में माना कि भारतीय जनता पार्टी के राज में साल 2018 से साल 2020 में 1,38,825 तो जुल्मों की रिपोर्टें दर्ज हुई थीं.

दिसंबर, 2022 में तमिलनाडु में कोयंबटूर के पास के एक गांव में 102 साल की एक बूढ़ी औरत की लाश को कब्रिस्तान में गाड़ने की इजाजत न देने पर झगड़ा हुआ, पर देशभर में किसी ने कुछ नहीं बोला, जबकि दीपिका पादुकोण की बिकिनी के रंग पर सारा सोशल मीडिया बेर्श्मी से रंगा हुआ है. दलित मौतों पर न रिपोर्ट छपती है, न कोई खबर, पर सोशल मीडिया में हल्ला मचता है.

10 दिसंबर, 2022 को ही कानपुर, उत्तर प्रदेश में एक दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ कर ठाकुरों के घर के सामने से गुस्साए ठाकुरों ने दलित बरातियों की उन के विवाह स्थल पर जा कर जम कर पिटाई की जो ट्विटर पर वीडियो पर देखी जा सकती है.

इन सब मामलों में हिंदू रक्षावाहिनी वाले तो चुप रहे ही, कांग्रेसी, समाजवादी और सब से बड़ी बात मायावती तक ने मुंह नहीं खोला, क्योंकि ये सब दलितों के वोट चाहते हैं, उन्हें बराबर का दर्जा नहीं दिलाना चाहते. उलटे ये जाति व्यवस्था के ग्रंथों ‘गीता’, ‘मनुस्मृति’ व पुराणों को बारबार याद करते हैं और कहने की कोशिश करते हैं कि उन में जो कहा गया है, वही आज के हिंदू बनाम पौराणिक राज में चलेगा.

दलित नेता क्यों रहे पीछे

साल 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले देशभर में दलित राजनीति चरम पर थी. दलित वोटों को समेटने और गंवा देने की बेचैनी हर तरफ देखी जा रही थी. हर पार्टी, हर नेता को सिर्फ दलित ही दिखाई दे रहा था. खुद प्रधानमंत्री नरेंद मोदी तक प्रयागराज में कुंभ स्नान के दौरान मैला ढोने वालों के पैर अपने हाथों से पखार रहे थे.

दलितों को अपने पाले में रखने की रणनीति के तहत भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘जन्म शताब्दी वर्ष’ के कार्यक्रमों में दलितों पर खासतौर पर फोकस किया था. दलितों के बीच लामबंदी तेज करने के लिए भाजपा ने पहली बार हर बूथ पर अनुसूचित मोरचा समिति तक बना डाली थी.

यही नहीं, दलितों की सब से बड़ी नेता कही जाने वाली मायावती ने अपनी दलित राजनीति और जनाधार को बचाए रखने के लिए विधानसभावार कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित किए थे, जिन में उन्होंने खुद बढ़चढ़ कर भाग लिया था. उन्होंने तब अपने सभी कोऔर्डिनेटरों को उत्तर प्रदेश में दलितों पर हो रहे जोरजुल्म के मामलों की जानकारी नियमित तौर पर प्रदेश हैडक्वार्टर भेजने का भी निर्देश दिया था.

दलितों पर अत्याचार के मामलों में पीडि़त पक्ष को कानूनी मदद मुहैया कराने के निर्देश भी दिए गए थे, मगर 17 जुलाई, 2019 को सोनभद्र में एक बड़ा दलित नरसंहार हो गया और मायावती को वहां जा कर पीडि़तों के जख्मों पर हमदर्दी का फाहा रखने का वक्त नहीं मिला.

दरअसल, उस वक्त के अपने भाई आनंद कुमार की नोएडा में कब्जाई तकरीबन 400 करोड़ रुपए की गैरकानूनी जमीन के मामले में उलझी हुई थीं, जिस पर प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग ने कार्यवाही की थी और उसे अटैच कर लिया था.

उस वक्त मायावती के लिए सोनभद्र में दलितों के नरसंहार का मामला इतना खास नहीं था, जितना उन के भाई आनंद कुमार की बेनामी जायदाद को बचाने का मामला.

मई, 2017 में सहारनपुर में दलितराजपूत हिंसा के बाद एक नए

नेता चंद्रशेखर आजाद रावण ने काफी सुर्खियां बटोरी थीं. कहा जाता है कि उन का बहुजन संगठन छुआछूत, भेदभाव, ऊंचनीच की भावनाओं को मिटा कर बहुजन समाज को उन का हक दिलाने के लिए काम कर रहा है.

साल 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान इस संगठन का काफी दबदबा दिख रहा था कि जब आचार संहिता उल्लंघन का आरोप लगा कर पुलिस ने चंद्रशेखर आजाद रावण को गिरफ्तार कर जेल भेजा और वहां से वे अस्पताल में शिफ्ट हुए तो कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी भी उन से मिलने गई थीं.

मगर चुनाव खत्म होते ही भीम आर्मी गायब हो गई. सोनभद्र के नरसंहार पर दलित हितैषी चंद्रशेखर आजाद रावण की चुप्पी भी आज तक हैरान करने वाली है.

गुजरात के वेरावल में दलितों की पिटाई के बाद भड़के दलित आंदोलन का नेतृत्व करने वाले जिग्नेश मेवाणी भी सोनभद्र में 10 दलितों की हत्याओं पर चुप रहे.

जिग्नेश मेवाणी वही नेता हैं, जिन्होंने घोषणा की थी कि अब दलित लोग समाज के लिए गंदा काम यानी मरे हुए पशुओं का चमड़ा निकालने, सिर पर मैला ढोने या नालियां या गटर साफ करने जैसा काम नहीं करेंगे.

उन्होंने सरकार से भूमिहीन दलितों को जमीन देने की मांग भी उठाई थी, मगर दलित हित की ये बड़ीबड़ी बातें चुनाव से पहले की हैं. चुनाव खत्म होते ही बातें भी खत्म हो गईं. दलित उसी दशा में हैं, उन्हीं कामों में लगे हुए हैं.

ऐक्टिविस्ट, वकील, नेता और गुजरात विधानसभा में कांग्रेस सीट पर विधायक बने जिग्नेश मेवाणी की दलितों के प्रति जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने ट्विटर अकाउंट पर दलितों की बेहाली पर कमैंट डाल कर अपनी जिम्मेदारियों की इतिश्री समझ ली.

राजग सरकार में राज्यमंत्री रामदास अठावले दलित नेता हैं. महाराष्ट्र का दलित समाज उन पर बड़ा भरोसा करता है, मगर वे सदन में अपनी बेतुकी तुकबंदियों में ही अपनी सारी ऊर्जा बरबाद कर रहे हैं. दलितों की समस्याओं का समाधान उन के बस की बात नहीं है. हां, उन्होंने क्रिकेट में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए 25 फीसदी आरक्षण की मांग जरूर रखी थी, जो कभी पूरी होगी, ऐसा लगता नहीं है.

बीकानेर के सांसद अर्जुनराम मेघवाल भी संसद में दलितों के मुद्दे पर बड़े मुखर हो कर बोलते हैं, लेकिन दलित समाज के बीच जा कर उन के दुखदर्द बांटने का मौका उन्हें भी कम ही रहता है. सोनभद्र पर भी उन का कोई बयान सुनाई नहीं पड़ा.

सुशील कुमार शिंदे हों, पीएल पुनिया या अब कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, तीनों ही कांग्रेस के सीनियर दलित नेता हैं. इन की पहचान उच्च शिक्षित, शांत और सादगी रखने वाले नेताओं के तौर पर है, जिस का कोई फायदा दमन और उत्पीड़न से त्रस्त दलित समाज को नहीं मिलता है.

कांग्रेस के यह तीनों दलित नेता व्यक्तिगत रूप से न कभी दलित समाज के बीच उठतेबैठते हैं और न ही इस समाज के दर्द और परेशानियों से उन का कोई वास्ता है. ये चुनाव के दौरान ही सोनिया गांधी, राहुल गांधी या प्रियंका गांधी वाड्रा के पीछे नजर आते हैं.

पहले उग्र रहे दलित नेता उदित राज भी भाजपा से दुत्कारे जाने के बाद कभीकभी अखबारटीवी में दलित चर्चा कर लेते हैं.

उत्तर प्रदेश के राम नगर के खटीक परिवार में जनमे उदित राज ज्यादातर वक्त अपनी राजनीतिक जमीन खोजने में बिताते हैं. जब वे भाजपा से बाहर थे, तो भाजपा को गरियाते थे, पर फिर उन का दिल बदल गया और भाजपा की गोद में जा कर सांसद बन गए थे, तब उन के सुर भाजपा वाले हो जाते थे.

वहीं 5 बार लोकसभा सांसद और स्पीकर रह चुकी मीरा कुमार से भी दलित समाज को क्या मिला? उपप्रधानमंत्री रह चुके जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार ने साल 1985 में उत्तर प्रदेश के बिजनौर से चुनावी राजनीति में प्रवेश किया था और पहले ही चुनाव में रामविलास पासवान और मायावती को भारी मतों से हराया था.

दलित नेता के रूप में दलित समाज को उन से काफी उम्मीदें थीं, मगर वे कभी अपनों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरीं. कांग्रेस ने उन का इस्तेमाल ‘दलित हितैषी’ होने का संदेश देने के लिए किया और राष्ट्रपति पद के लिए मीरा कुमार का नाम कांग्रेस की तरफ से प्रस्तावित हुआ.

हालांकि बाद में देश के इस सर्वोच्च पद पर दलित रामनाथ कोविंद बैठे, जो उत्तर प्रदेश की गैरजाटव कोरी जाति से हैं. साल 1991 में भाजपा से जुड़ने के बाद रामनाथ कोविंद 1998-2002 के बीच भाजपा दलित मोरचा के अध्यक्ष रहे. रामनाथ कोविंद के बहाने भाजपा हाशिए पर पड़ी अपनी दलित राजनीति को केंद्र में ले आई.

रामनाथ कोविंद खुद के संघर्षपूर्ण जीवन का जिक्र करने से नहीं चूके और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी राष्ट्रपति पद पर उन की उम्मीदवारी का ऐलान करते वक्त तकरीबन 5 मिनट में 5 बार ‘दलित’ शब्द का जिक्र किया.

रामनाथ कोविंद के कारण भाजपा की दलित वोटों को ले कर रस्साकशी कुछ कम हुई और हिंदुत्ववादी राजनीति को भी नया तेवर मिला. कुछ दलित वोट भाजपा के पाले में खिसका, मगर देश के सर्वोच्च पद पर कोविंद की अहमियत सजावटी ही है, उन के जरीए दलित समाज का कोई उद्धार न हुआ और न होगा. वे भाजपा के हिंदुत्व जागरण के दलित एंबेसेडर बन कर रह गए.

दरअसल, रामनाथ कोविंद की पे्ररणा तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है. संघ और भाजपा ने सिर्फ अपने एजेंडे को लागू करने के लिए रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाया था, न कि दलितों के किसी फायदे के लिए. इन छद्म दलित नेताओं से दलित समाज का कोई उद्धार होगा, उन्हें इस देश में बराबरी का हक मिलेगा, इस भरम से अब इस तबके को निकल आना चाहिए.

वर्ण व्यवस्था मजबूत कर रहा है संघ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहता है. संघ की उत्पत्ति ही इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हुई थी. इसे वह कैसे छोड़ देगा? वह ऐसा हिंदू राष्ट्र चाहता है, जिस में वर्णाश्रम व्यवस्था पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो.

कितनी विरोधाभासी बात है कि यही संघ ‘समरसता’ का नारा देता है, यानी सब के साथ समान बरताव हो, लेकिन मूर्ख से मूर्ख आदमी भी यह सवाल उठाएगा कि जातीय श्रेष्ठता के भाव से पैदा हुए शोषण, उत्पीड़न को खत्म किए बगैर समरसता कैसे हो सकती है?

दलित समाज को भी इस बात पर चिंतन करना चाहिए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहे दलितों के पांव पखारें या संघ दलितों की ओर शंकराचार्य, महामंडलेश्वर और मंदिर का पुजारी बनने का चुग्गा फेंकें, इन प्रलोभनों के पीछे छिपे सच की पड़ताल जरूरी है.

दलित, जिन्हें पहले अछूत कहा जाता था, वे भारत की कुल आबादी का 16.6 फीसदी हैं. इन्हें अब सरकारी आंकड़ों में अनुसूचित जातियों के नाम से जाना जाता है. साल 1850 से 1936 तक ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार इन्हें दबेकुचले वर्ग के नाम से बुलाती थी.

भारत में आज हिंदू दलितों की कुल आबादी तकरीबन 23 करोड़ है. अगर हम 2 करोड़ दलित ईसाइयों और 10 करोड़ दलित मुसलमानों को भी जोड़ लें, तो भारत में दलितों की कुल आबादी तकरीबन 35 करोड़ बैठती है. ये भारत की कुल आबादी के एकचौथाई से भी ज्यादा हैं.

भेदभाव, दमन, मंदिरों में प्रवेश से रोक और अत्याचारों से तंग दलित समुदाय आज बौद्ध धर्म की ओर खासा खिंचता है. बौद्ध धर्म में मूर्तिपूजा नहीं होती, इसलिए धर्म परिवर्तन के जरीए लाखों दलित बौद्ध धर्म स्वीकार कर चुके हैं.

अब हिंदू राष्ट्र के निर्माण की कल्पना पाले हिंदुत्ववादियों को यह डर सता रहा है कि कहीं बचे हुए 23 करोड़ दलित भी हिंदू धर्म न छोड़ दें. इस से उन की ताकत कम हो जाएगी.

दरअसल, मंदिरों में प्रवेश पर पाबंदी को ले कर अब दलित यह सवाल करने लगा है कि अगर हम भी हिंदू हैं तो फिर अछूत कैसे हैं? हमें मंदिरों में प्रवेश क्यों नहीं मिल सकता है और इसीलिए संघ ने ‘समरसता’ का नारा दे कर इन्हें जोड़े रखने की चाल चली है, इसीलिए एक मंदिर, एक श्मशान की बातें भी हो रही हैं. मगर वर्ण व्यवस्था को खत्म करने की बात कहीं नहीं सुनाई पड़ रही. सवर्ण दलित में रोटीबेटी के संबंध की बात भी नहीं सुनाई देती. जब तक यह नहीं तो समरसता कैसी?

दलितों को अपने साथ जोड़ने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी सभाओं के द्वार दलितों के लिए भी खोले. पर दलित वहां बैठने के लिए अपनी दरी अपने साथ लाया. सभा में सभी अपनीअपनी दरियां लाते हैं.

पहली लाइन में बैठने वाले सवर्णों की महीन रेशमी धागों से बुनी सुंदर कलाकृतियों वाली दरियां और आखिरी लाइनों में बैठने वाले निचली जाति के लोगों की मोटे धागेजूट की बनी दरियां. कौन ऊंचा और कौन दलित, यह फर्क दरी देख कर ही नजर आ जाता था, जबकि ‘समरसता’ का मंत्र दिया गया और सब की दरियों का रंग भगवा कर दिया गया है.

लिहाजा, ऊपरी तौर पर फर्क खत्म हो गया है. संघ से जुड़े दलितों की हीनभावना में भी कुछ कमी दिख रही है. सभा संदेश की तरफ उस का भी मन लगने लगा है, मगर दलितों को यह समझने की जरूरत है कि अंदरूनी तौर पर तो फर्क अभी भी ज्यों का त्यों बना हुआ है.

रेशमी भगवा दरियां और मोटे जूट की भगवा दरियों में फर्क तो है ही और यह फर्क उस पर बैठने वाले को ही अनुभव होता है यानी भगवा रंग के भीतर वर्ण व्यवस्था ज्यों की त्यों बरकरार है. फर्क वहीं का वहीं है. संघ की इस चालाकी को समझने की जरूरत है.  द्य

पाकिस्तान को तबाह किया धर्म के दुकानदारों ने

पाकिस्तान अब लगभग ढहने लगा है और बड़ी बात है कि इस ढहने में भारत का कोई हाथ नहीं है. पाकिस्तान जो एक समय-अभी 20 साल पहले-भारत से थोड़ा ज्यादा अमीर था, आज कंगाल हो गया है. डौलर के मुकाबले उस का रुपया 250-300 के पास पहुंच गया है और उस के पास न तेल खरीदने के पैसे हैं, न बिजली बनाने लायक कोयला खरीदने के. भारत के दबाव ने नहीं, पाकिस्तान के धर्म के दुकानदारों ने उसे तहसनहस कर दिया है.

पाकिस्तानी अमीर उमराव इस का पैसा ले कर कब के निकल चुके हैं और दूसरे देशों में बस गए हैं जहां उन्हें इसी धर्म की कट्टरता के कारण शक से देखा जाता है. पाकिस्तान ने पश्चिमी देशों में फैली आतंकवादी घटनाओं को अपने यहां पनपने दिया था, यह दुनिया भूली नहीं है और उस का आज सब से करीबी दोस्त चीन भी अब पाकिस्तानी कट्टरता की वजह से नाराज सा चल रहा है.

कट्टरता को हरदम अपनी हथेलियों पर रखने की वजह से पाकिस्तानी जनता पर एक जुनून चढ़ा रहता है. वहां की पसमांदा जनता को लगातार धर्म की अफीम की गोलियां खिलाई जाती हैं, ताकि वे लोग भारत में फैली जाति व्यवस्था से डरे रहें. इसी जाति व्यवस्था की वजह से इन्होंने इसलाम अपनाया था और ईरान, तुर्की, अरब देशों, उज्बेकिस्तान, तजाकिस्तान से आए ऊंचे कद के लंबेगोरे, आज पंजाबी बोलने वालों के हवाले अपने को कर दिया था. पर इन्हें मिला क्या?

जहां ऊंची जगहों पर बैठे लोग ऐयाशी की जिंदगी जी रहे हैं, आम पसमांदा मुसलमान गंदीमैली गलियों में बसे हैं और इसलाम का ढोल बजा रहे हैं. उन्हें देश की तरक्की की नहीं, इसलाम के आज बेमतलब हो चुके तौरतरीकों को लकीर का फकीर बन कर पीटने की आदत बन चुकी है.

भारत को इस का बड़ा सबक सीखना चाहिए. हम ने 1947 में धर्म की जगह संविधान, बराबरी, उदारता, धर्म को पीछे रखने का फार्मूला अपनाया और एक बेहद गरीब देश से खासे ठीकठाक पर गरीब लेकिन कंगले देश की तरह बन गए. पिछले 30 सालों में यहां जो लहरें उठाई जा रही हैं, वे हमें पाकिस्तान की राह पर ले जा रही हैं. हमारे यहां रातदिन हिंदूमुसलिम होता रहता है. कभी यूनिफौर्म सिविल कोड की बात होती है, तो कभी नैशनल रजिस्टर औफ सिटीजन्स की, जिस का निशाना भारत के मुसलमान ही हैं.

मुसलमानों को हिंदू गुंडों को ताकत दे कर बस्तियों में बंद कर दिया गया. गुजरात में 2002 में नरेंद्र मोदी की अगुआई में नमूना दिखा दिया गया. आज भारत के मुसलमानों को न आजादी से व्यापार करने को मिल रहा है, न अपनी बात कहने का. हिंदू बस्तियों में उन्हें जगह नहीं मिलती. हिंदू कंपनियों में नौकरियां नहीं मिलतीं.

हिंदी के न्यूज चैनल लगातार मुसलिम अपराधियों पर घंटों बरबाद करते रहते हैं और हिंदू गुंडों के कारनामे डिजिटल कारपेटों के नीचे छिपा देते हैं. यह पाकिस्तान की तरह बनने की कोशिश है जिस में मंदिरमठ चलाने वाले शामिल हैं ही, उन्होंने आम हिंदू को भी कायल कर दिया है कि देश की मुसीबतों की वजह इसलाम है. पाकिस्तान ने यही काम कश्मीर का नाम ले कर किया था जिस का खमियाजा आज चौथी पीढ़ी बुरी तरह सह रही है.

हमारे यहां अभी तो दूसरी पीढ़ी ही हिंदू मूर्तियों को फैला रही है पर पाकिस्तान बनने में ज्यादा देर नहीं लगेगी. इस के निशान दिखने लगे हैं. हिमालय विशाल है पर उस में भी दरारें पड़ती हैं, यह जोशीमठ याद दिला रहा है. भारत को पाकिस्तान या श्रीलंका न बनने दो.

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