Story in Hindi : भभूत का कमाल – स्वामीजी का जादू या जंजाल

Story in Hindi. आज फिर बिस्तर पर निढाल पड़े पति को शीला आंखों में आंसू लिए नफरत की नजरों से देख रही थी. आधी रात जवानी पर थी, लेकिन शीला तड़प रही थी. वजह, उस की कोख अभी तक नहीं भरी थी.

शीला का पति नामर्द जो निकला था. वह काम से आते ही थकामांदा खापी कर सो जाता. कभीकभार उस की नसों में खून दौड़ जाता, तो थोड़ी देर के लिए वह शीला से प्यार जता देता. फिर शीला जल बिन मछली की तरह आधी भूख लिए तड़प कर रह जाती.

शीला सोचने लगी कि कुछ तो उपाय करना चाहिए. पड़ोस की लालमती को भी 7 साल के बाद बच्चा हुआ था.

यह सब शायद स्वामीजी की कृपा थी, जो लालमती को औलाद सुख मिला.

स्वामी कृपानंद पास के गांव धरमपुर में तालाब के किनारे आश्रम बना कर रहते थे. लालमती स्वामीजी के पास जा कर दवा और भभूत लाई थी.

एक दिन लालमती बता रही थी कि स्वामीजी दवा और भभूत देते हैं, जिसे पतिपत्नी को 3 महीने तक खानी पड़ती है.

‘अब मैं लालमती से मिलूंगी, तभी काम बनेगा,’ यह सोचतेसोचते शीला न जाने कब सो गई.

सुबह हुई, तो शीला आंखें मलते हुए उठी. वह जल्दी से नहाईधोई, फिर घर के सारे काम निबटा कर लालमती के घर जा पहुंची.

लालमती अपने बेटे को खाना खिला रही थी. यह देख कर शीला के अंदर भी टीस उभरी. काश, मुझे भी एक ऐसी औलाद मिल जाए, तो क्या कहने. शीला ने लालमती के सामने अपने मन की बात कह दी.

लालमती हंसते हुए उस से बोली, ‘‘बिलकुल न घबराओ बहन, मैं भी तुम्हारी तरह 7 साल तक बच्चे के लिए परेशान हुई, तमाम डाक्टरों से इलाज कराया, लेकिन आखिर में स्वामीजी की मेहरबानी से ही यह औलाद मिली.

‘‘तुम चाहो, तो मेरे साथ आज ही स्वामीजी के पास चलो. वैसे, स्वामीजी रविवार और मंगलवार को ही ज्यादा औरतों की कोख भरने के लिए भभूत देते हैं और झाड़फूंक भी करते हैं.’’

‘‘चलो, अभी चलें,’’ शीला आंखों में चमक लिए बोली. वे दोनों स्वामीजी के पास चल दीं.

स्वामीजी की कुटिया एकांत में बनी थी. उस के आसपास 2-3 किलोमीटर दूर गांव बसे थे. स्वामीजी के पास जा कर दोनों उन के पैरों पर गिर पड़ीं और उन का आशीर्वाद लिया.

स्वामीजी 6 फुट के हट्टेकट्टे कसरती बदन के मालिक थे. उन्होंने जब शीला को पैर छूते देखा, तो उस के उभारों पर नजर रखते हुए वे चिडि़या को जाल में फंसाने की बात सोचने लगे.

शीला के सिर पर हाथ रख कर सहलाते हुए उन्होंने आशीर्वाद दिया, ‘‘तुम्हारी इच्छा पूरी हो.’’

शीला को यह सुन कर रोना आ गया. आंखों में आंसू भर कर वह बोली, ‘‘स्वामीजी, 5 साल से अभी तक मेरी इच्छा पूरी नहीं हुई. अब तो मैं बड़ी उम्मीद ले कर आप के पास आई हूं.’’

वे बोले, ‘‘मेरे दरबार से अभी तक कोई भी खाली हाथ नहीं लौटा है. बताओ, क्या बात है?’’

शीला से पहले ही लालमती बोल पड़ी, ‘‘बाबाजी, जो मेरी समस्या थी, वही शीला की भी है. 5 साल हो गए, अभी तक इस की गोद नहीं भरी है.’’

‘‘ठीक है, कुछ पूजा करनी होगी. तकरीबन 5 हजार रुपए लग जाएंगे और तुम अपने पति को भी साथ लाना. परसों मंगलवार को पूजा होगी,’’ स्वामीजी ने शीला से मुखातिब होते हुए कहा.

कुछ प्रसाद और भभूत दे कर उन्होंने शीला और लालमती को घर भेज दिया.

शाम को शीला ने अपने पति को सारी बातें बताईं. उस का पति रमेश स्वामीजी के पास जाने को तैयार हो गया, क्योंकि वह भी औलाद की चाह में तमाम ओझागुनियों, मुल्लामौलवियों को दिखा चुका था.

रमेश हर पल अंधविश्वास में पड़ कर अनापशनाप सोचता रहता. उसे लगता कि किसी पड़ोसी ने उस के घर पर कुछ तंत्रमंत्र कर दिया है. दूसरे दिन लालमती के साथ शीला और उस का पति रमेश स्वामीजी के आश्रम में पहुंचे.

स्वामीजी बोले, ‘‘बेटा, घबराओ मत. सब ठीक हो जाएगा. घर पर भी हवन करना होगा. अब तुम पूजा का सामान ले आओ. 7 दिनों तक पूजा करनी पड़ेगी. मंत्रों का जाप भी करना होगा.’’

रमेश की आंखों पर धर्म की पट्टी पड़ चुकी थी. स्वामीजी पर भरोसा कर के वह सामान लेने चला गया. इधर बंद कमरे में पहले ही एक गिलास में पानी भर कर उस में नशीली गोली मिला दी गई थी. कुछ देर बाद स्वामीजी ने वह पानी शीला को पीने के लिए दिया, फिर शीला की जवानी का भरपूर मजा लूटा.

इस तरह रोज झाड़फूंक व पूजापाठ का झांसा दे कर स्वामीजी शीला की इज्जत से खेलते रहे.

शीला को भी सबकुछ मालूम हो गया, क्योंकि पहले ही दिन पानी पीने के बाद नशा छाया और होश में आने पर उसे एहसास हो गया कि स्वामीजी उस के साथ क्या कर चुके हैं.

एक दिन स्वामीजी ने शीला से फिर गिलास में पानी मंगवाया, तो शीला बोल पड़ी, ‘‘स्वामीजी, अब गिलास और पानी की जरूरत नहीं. अब तो जो हो रहा है, वह वैसे भी हो सकता है, क्योंकि बच्चे पैदा करना मेरे पति के बस की बात नहीं.

‘‘आप मुझे बेहोशी में लूट ही चुके हैं. अब जब तक बच्चा ठहर नहीं जाता, तब तक मैं खुद को आप को सौंपती हूं.’’

यह सुन कर स्वामीजी और शीला खूब देर तक वासना का खेल खेलते रहे. कुछ दिनों बाद शीला के पैर भारी हो गए.

रमेश कभीकभार शीला के साथ सो पाता था और स्वामीजी की दी गई भभूत खाता रहता था.

शीला को एक दिन सुबहसुबह उलटी होती देख रमेश शीला से पूछ बैठा, ‘‘क्या पैर भारी हो गए?’’

शीला ने मुसकरा कर ‘हां’ में सिर हिलाया.

रमेश खुशी से समझाते हुए बोला, ‘‘यह सब स्वामीजी की भभूत का कमाल है.’’ खुश हो कर रमेश ने स्वामीजी को 5 हजार रुपए दे दिए. Story in Hindi

Family Story : मेरी स्वीट मिट्ठी- नाना की रिटायरमेंट बाद क्या हुआ

Family Story. मेरे नाना रिटायरमैंट के बाद सपरिवार कोलकाता में बस गए थे. उन का कोलकाता के बाहर बसी एक नामचीन डैवलपर की टाउनशिप में बड़ा सा फ्लैट था.

मेरी नानी पश्चिम बंगाल के मिदनापुर की थीं. वे अच्छीखासी पढ़ीलिखी थीं. वे महिला कालेज में प्रिंसिपल के पद पर थीं. नाना ने उन की इच्छा के मुताबिक कोलकाता में बसने का फैसला लिया था.

मैं अपनी मम्मी के साथ दुर्गा पूजा में कोलकाता गया था. मैं ने रांची से एमबीए की पढ़ाई की थी. कैंपस से ही मेरा एक मल्टीनैशनल कंपनी में सैलेक्शन हो चुका था. औफर लैटर मिलने में अभी थोड़ी देरी थी.

मिट्ठी से मेरी मुलाकात कोलकाता में दुर्गा पूजा के दौरान हुई. कौंप्लैक्स के मेन गेट पर वह सिक्योरिटी गार्डों से उलझ गई थी.

शाम के समय पास की झुग्गी बस्ती से कुछ बच्चियां दुर्गा पूजा देखने आई थीं. चिथड़ों में लिपटी बच्चियों को सिक्योरिटी गार्ड ने रोक दिया था.

टाउनशिप के बनने के दौरान मजदूरों ने वहां सालों अपना पसीना बहाया था. ये उन्हीं की बच्चियां थीं.

मिट्ठी वहां अकसर जाती थी. वह उन की चहेती दीदी थी. वह बच्चों के टीकाकरण में मदद करती थी. स्कूलों में उन को दाखिला दिलाती थी. बच्चियों को पूजा पंडाल तक ले जाने और प्रसाद दिलाने में मिट्ठी को तमाम विरोध का सामना करना पड़ा था.

मिट्ठी विजयादशमी के दिन भी दिखाई दी थी. लाल बौर्डर की साड़ी में वह बेहद खूबसूरत दिख रही थी. मिट्ठी मुझे भा गई थी.

मम्मी जल्दी मेरे फेरे कराना चाहती थीं. उन्होंने रांची शहर के कई रिश्ते भी देखे थे. नानी से सलाहमशवरा करने के लिए मम्मी मुझे कोलकाता ले कर आई थीं.

‘‘अमोल खुद अपना ‘जीवनसाथी’ चुनेगा… मेरा पोता अपने लिए बैस्ट साथी चुनेगा… एकदम हीरा…’’ नानी मेरी अपनी पसंद की बहू के हक में थीं.

‘‘गोरीचिट्टी, देशी मेम बहू बनेगी…’’ मम्मी की यही सोच थी. सुंदर, सुशील, घर के कामों में माहिर बहू उन की पसंद थी.

‘‘भाभी, हमारी बहू तो फर्राटेदार अंगरेजी में बतियाने वाली सांवलीसलोनी और स्मार्ट होगी…’’ छोटी मामी ने भी अपनी पसंद जताई थी.

‘‘मुझे मिट्ठी पसंद है…’’ मैं ने छोटी मामी को अपनी पसंद बताई.

मिट्ठी कौंप्लैक्स में ही रहती थी. मेरी मम्मी समेत परिवार के सभी लोग मिट्ठी की हरकतों से अनजान नहीं थे.

‘‘कौंप्लैक्स में मिट्ठी की इमेज ज्यादा अच्छी नहीं है. वह तेजतर्रार है… अमीरजादों के साथ आवारागर्दी करती है… मोटरसाइकिल से स्टंट करती है… बेहद बिंदास है… शौर्ट्स पहन कर घूमती है…’’ छोटी मामी ने मुझे जानकारी दी.

‘‘मुझे बोल्ड लड़कियां पसंद हैं…’’

‘‘उम्र में भी बड़ी है…’’

मैं ने उम्र की बात को भी नकार दिया.

‘‘मिट्ठी कैंपस के लड़कों के साथ टैनिस… क्रिकेट… बास्केटबाल खेलती है… मौडलिंग करती है… कंडोम की मौडलिंग… उस के मम्मीपापा ने कितनी आजादी दे रखी है…’’ मेरी बात से छोटी मामी शायद नाराज हो गई थीं.

‘‘मैं क्या सुन रही हूं…? मेरी रजामंदी बिलकुल नहीं है… नहीं… मैं मिट्ठी को बहू नहीं बना सकती…’’ मम्मी बेहद नाराज थीं. उन्होंने मुझ से दूरी बना ली थी.

मैं मिट्ठी को अपना मान चुका था. शीतयुद्ध का अंत हुआ. नानी को भनक लगी. उन्होंने सब को अपने कमरे में बुलाया. सब की बातों को बड़े ही ध्यान से सुना.

‘‘अमोल ने जिद पकड़ ली है… बदनाम लड़की से रिश्ता करने पर तुले हैं…’’ छोटी मामी ने नानी को बताया.

‘‘यह बदनाम लड़की कौन है…? कहां की है…?’’ नानी ने सवाल किया.

‘‘अपने कौंप्लैक्स की ही है… अपनी मिट्ठी… आवारागर्दी, गुंडागर्दी करती है… पूजा के पंडाल में हंगामा भी किया था… आप ने सुना होगा…’’ छोटी मामी ने मिट्ठी की खूबियों का बखान किया.

‘‘मिट्ठी तो अच्छी बच्ची है… कई बार मंदिर में मिली है… मेरे पैर छुए हैं… मैं ने आशीर्वाद दिया है… वह बदनाम कैसे हो सकती है,’’ नानी छोटी मामी से सहमत नहीं थीं.

‘‘क्या अच्छे परिवार की बच्चियां पराए जवान लड़कों के साथ क्रिकेट… बास्केटबाल और टैनिस खेलती हैं? कंडोम की मौडलिंग करती हैं? छोटे कपड़े पहनती हैं? मुंहफट और बेशर्म होती हैं?’’ मम्मी ने एकसाथ कई बातें बताईं और सवाल उठाए.

‘‘मैं ने अपने लैवल पर इन बातों की पड़ताल की है… जानकारियां इकट्ठी की हैं… मैं मिट्ठी से मिला हूं. वह मर्दऔरत के समान हक की बात करती है… वह एक समाजसेविका है… उसे कई मर्द दोस्तों का भी साथ मिला है… सब मिल कर काम करते हैं… ऐक्टिव रहने के लिए फिटनैस जरूरी है…

‘‘सामाजिक कामों के लिए रुपएपैसों की जरूरत पड़ती है. कंडोम की मौडलिंग में कोई बुराई नहीं है… बढ़ती आबादी को कंडोम से ही रोका जा सकता है… इन पैसों से बस्ती के गरीब बच्चों के स्कूल की फीस दी जा सकती है…

‘‘मिट्ठी बोल्ड है… गलतसही की पहचान और परख उसे है… वह अपने काम में जुटी है… जानती है कि वह गलत

रास्ते पर नहीं है… फुजूल की कानाफूसी और बदनामी की उसे कोई परवाह नहीं है. सब बकवास है…’’ मैं ने नानी की अदालत में मिट्ठी का पक्ष रखा.

‘‘मेरे पोते ने बैस्ट लड़की को चुना है. मिट्ठी ही मेरी बहू बनेगी…’’ नानी ने सहज भाव से अपना फैसला सुनाया. मुझे गले से लगाया… रिश्ते के लिए खुद पहल करने की बात कही. Family Story

Family Story in Hindi : जिंदगी की तलाश में – कैसे बदला कृष्ण का जीवन

Family Story in Hindi. शाम गहराने लगी थी, मगर बाहर के अंधेरे से घोर अंधेरा कृष्ण के भीतर छाने लगा था. अपने चेहरे को हथेलियों से ढके, आंखें मूंदे उस ने मोबाइल के ईयरफोन कान में ठूंस कर सुनीता की आवाज दबाने की नाकाम कोशिश में अपना सारा ध्यान गाने पर लगा दिया था, ‘जिंदगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए…’

गाना खत्म होतेहोते कृष्ण की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली. उस के जी में आया कि वह अपने हालात पर खूब फूटफूट कर रोए… मगर उस से ऐसा नहीं हो सका और अंदर की हूक आंखों से आंसू बन कर बहती रही.

कृष्ण ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की जिंदगी इस मोड़ पर आ कर खड़ी हो जाएगी, जहां वह कहीं का नहीं रहेगा… काश, वह उस नर्स के इश्क में न फंसा होता… काश… उस ने घर वालों की बात मानी होती… काश… उस ने अपने और अपने परिवार के बारे में सोचा होता… काश… काश… काश… मगर अब क्या हो सकता था… जिंदगी इसी काश में उलझ कर रह गई थी.

कृष्ण को अच्छी तरह याद है कि पिता की अचानक हुई मौत के बाद उन की जगह पर उस की नौकरी लगते ही उस के जैसे पंख उग आए थे. जवानी का जोश और मुफ्त में मिली पिताजी की जगह रेलवे की नौकरी के बाद दोस्तीयारी में पैसे उड़ाना, मोटरसाइकिल पर सजसंवर कर इधर से उधर चक्कर काटना, मौका मिलते ही दोस्तों के साथ मौजमस्ती मारना… बस, यही उस का रोज का काम बन गया था. तब न उसे दोनों बहनों के ब्याह की चिंता थी और न विधवा मां की सेहत की फिक्र.

एक दिन दोस्तों के साथ पिकनिक पर भीग जाने पर कृष्ण को बुखार चढ़ गया था. अस्पताल में नर्स से सूई लगवाते हुए उस की नजरों से घायल हो कर कृष्ण उस का दीवाना हो उठा था, जब नर्स ने अपने मदभरे नैनों में ढेर सारा प्यार समेटे हुए पूछा था, ‘‘सूई से डरते तो नहीं हो? आप को सूई लगानी है.’’

कृष्ण उस नर्स की हिरनी सी बड़ीबड़ी आंखों को बस देखता रह गया था. सफेद पोशाक में गोलमटोल चेहरे वाली नर्स की उन आंखों ने जैसे उसे अपने अंदर समा लिया था. उसे लगा था, जैसे खुशबू से सराबोर हवा ने उसे मदहोश कर दिया हो, जैसे पहाड़ों पर घटाएं बरसने को उमड़ पड़ी हों…

नर्स ने बांह ऊंची करने के लिए कृष्ण का हाथ अपने कोमल हाथों में लिया, तो वह कंपकंपा कर बोला था, ‘‘डर तो लगता है, पर आप लगाएंगी तो लगवा लूंगा.’’

इतना कहते हुए नर्स ने शर्ट की बांह ऊपर चढ़ा दी थी. नर्स ने हौले से सूई लगा कर कृष्ण की आंखों में झांकते हुए पूछा था, ‘‘दर्द तो नहीं हुआ?’’

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं.’’

‘‘आप का नाम क्या है?’’

‘‘कृष्ण.’’

‘‘मतलब कृष्ण कन्हैया हैं आप… गोपियों के कन्हैया…’’ नर्स ने इंजैक्शन की जगह को रुई से रगड़ते हुए मुसकरा कर कहा था.

कृष्ण अपने घर चला आया था. शरीर का बुखार तो अब उतर चुका था, मगर नर्स के इश्क का बुखार उस पर इस कदर हावी हो गया था कि आंखें बंद करते ही नर्स की बड़ीबड़ी हिरनी सी आंखें नजर आती थीं.

बुखार उतरने के बाद भी कृष्ण कई बार अस्पताल के चक्कर लगा आता. नर्स से किसी न किसी बहाने दुआसलाम कर आता. नर्स भी उस से मुसकरा कर बात करती.

उसी दौरान क्रिसमस पर हिम्मत कर कृष्ण ने नर्स को रास्ते में रोक कर ‘मैरी क्रिसमस’ कह कर लाल गुलाबों का गुलदस्ता थमा दिया था. नर्स

ने भी मुसकरा कर उस का तोहफा कबूल कर लिया था.

बस, फिर वे दोनों मिलने लगे थे. प्यार हो चुका था, इजहार हो चुका था. घर में क्या हो रहा है, कृष्ण को कुछ परवाह न थी. वह उस नर्स को मोटरसाइकिल पर पीछे बैठा कर घूमता… उस के प्यार में झूमता, मस्ताता बस.

उधर ब्याह लायक बहनें कृष्ण के इस आवारापन की हरकतों को देख कर मजबूरन मां को संभालने की खातिर अपना घर बसाने की सोच भी न पाती थीं. अगर उन्होंने ब्याह रचा लिया, तो दिल की मरीज विधवा मां को कौन संभालेगा? बस, इसी एक बड़े सवाल ने उन्हें कुंआरी रहने पर मजबूर कर दिया था. वे दोनों घर में ही ब्यूटीपार्लर खोल कर रोजीरोटी कमाने लगी थीं.

फिर अचानक ही नर्स का तबादला और उसी के चलते ही कृष्ण का घर से और दूर हो जाना… वह कईकई दिन घर से 200 किलोमीटर दूर अपने प्यार के नशे में चूर पड़ा रहता.

और एक दिन जैसे बिजली गिरी थी कृष्ण पर. नर्स के घर का दरवाजा बिना खटखटाए घनघोर घटाओं में भीगता वह अचानक अंदर दाखिल हुआ था, तो सामने का नजारा देख कर उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई थी. वह नर्स किसी और मर्द के साथ बिस्तर पर थी.

कृष्ण को यह सब देख कर ऐसा लगा था, जैसे किसी ने उस के दिल में छुरा भोंक दिया हो, जैसे सारा आसमान घूमने लगा हो… उसे लगा था कि वह खून से लथपथ हो कर वीरान रेगिस्तान में अकेला घायल खड़ा हो और तमाम चीलकौए उसे नोंच खाने को उस पर मंडरा रहे हों… कितने वादे… कितनी कसमें खाई थीं… कैसे कहती थी वह नर्स, ‘मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती कृष्ण… मैं मर जाऊंगी, जो तुम मेरे न हुए…’

कृष्ण को लगा था कि जमीन फट जाए और वह उस में समा जाए… जैसे नर्स के क्वार्टर की दीवारें आग से भभक उठी हों, वैसे ही नफरत की आग में भभक उठा था कृष्ण.

कृष्ण नर्स को कुछ कह पाता, उस से पहले ही नर्स ने उस से रूखी आवाज में कहा था, ‘‘बेवकूफ इनसान, तुम को इतना भी नहीं पता कि किसी लड़की के घर का दरवाजा खटखटा कर अंदर आना चाहिए…’’ फिर गुर्राते हुए नफरत भरे अंदाज में उस ने घूरते हुए कृष्ण से कहा था, ‘‘ऐसे घूर कर क्या देख रहे हो मुझे? ये नए डाक्टर साहब हैं. मेरे नए फ्रैंड… अभी एक हफ्ता पहले ही डिस्पैंसरी में पोस्टिंग हुआ है…’’

कृष्ण मुट्ठी भींचे सब सुनता रहा था. जी में आया कि नर्स का गला ही घोंट दे, मगर वह कुछ और कहती, उस से पहले ही वह मुड़ कर मोटरसाइकिल स्टार्ट कर निकल पड़ा था तेज रफ्तार से घर की ओर… जैसे वह जल्दी से जल्दी दूर… बहुत दूर भाग जाना चाहता हो… जैसे नर्स की आवाज उस का पीछा कर रही हो और वह

उसे सुनना नहीं चाहता हो… वह टूट गया था अंदर ही अंदर.

इसी तरह उदासी और तनहाई में दिन रगड़रगड़ कर बीत रहे थे कि एक दिन अचानक ही कृष्ण के कानों में किसी की दिल भेद देने वाली रुलाई सुनाई पड़ी.

‘अरे, यह तो सुनीता के रोने की आवाज है,’ कृष्ण पहचान गया था. सुनीता, उस की पड़ोसन… मजबूर, बेसहारा सी, मगर निहायत ही खूबसूरत, जिसे उस का पति रोज शराब पी कर बिना बात मारता है और वह उस की मार खाती जाती है. आखिर जाए भी तो कहां… उस का इस दुनिया में कोई नहीं… मामा ने मामी की रोजरोज की चिकचिक से तंग आ कर उसे एक बेरोजगार शराबी से ब्याह कर मानो अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली थी.

कृष्ण, जो अपने प्यार में नाकाम हो कर टूट चुका था, न जाने क्यों अचानक ही उठ कर सुनीता के घर की ओर लपका. वह  रोजरोज सुनीता को यों पिटते नहीं देख सकता.

कृष्ण ने दरवाजा खोल कर पिटती सुनीता को हाथ से पकड़ा ही था कि वह उस के सीने से इस कदर लिपट पड़ी, जैसे कोई बच्चा मार के डर से लिपट जाता है.

‘‘बचा लो इस राक्षस से, वरना मुझे यह मार ही डालेगा…’’ सुनीता कृष्ण से लिपट कर फूट पड़ी थी. पता नहीं, कृष्ण के टूटे दिल को सुनीता के यों सीने से लग जाने से कितना सुकून मिला था. उस ने उसे अपनी बांहों में भर लिया था.

‘‘मैं तुम्हें इस तरह पिटता नहीं देख सकता सुनीता…’’

‘‘अबे हट, बड़ा आया सुनीता का आशिक. तू होता कौन है इसे बचाने वाला…?’’ कहते हुए सुनीता के पति ने कृष्ण को जोर का धक्का दे दिया और खुद कमरे में रखी हौकी उठा कर कृष्ण के ऊपर लपका. अगर पड़ोसी न बचाते, तो वह नशे में कृष्ण के सिर पर हौकी दे मारता.

मगर अब सुनीता कृष्ण के सामने आ खड़ी थी उसे बचाने के लिए. सारा महल्ला तमाशा देख रहा था.

सुनीता के पति ने तमाम महल्ले वालों के सामने चीखचीख कर कहा, ‘‘आशिक बनता है इस का… कब से चल रहा है तुम्हारा चक्कर… रख सकता है हमेशा के लिए इसे… चार दिन ऐश करेगा और छोड़ देगा… इतना ही मर्द है तो ले जा हमेशा के लिए और रख ले अपनी बीवी बना कर… मुझे इस की जरूरत भी नहीं…’’

सुनीता और सारा महल्ला खामोश हो कर कृष्ण के जवाब का इंतजार करने लगे. सुनीता उस से लिपटी कांप रही थी. कृष्ण के जवाब के इंतजार में उस का दिल जोरजोर से धड़कने लगा था.

‘‘हां, बना लूंगा अपनी बीवी… एक औरत पर हाथ उठाते, भूखीप्यासी रखते, जुल्म करते शर्म नहीं आती… बड़ा मर्द बनता है… देख, कैसा मारा है इसे…’’ कृष्ण ने जेब से रूमाल निकाल कर सुनीता के होंठों से बहता खून पोंछ दिया.

सुनीता कृष्ण के सीने से लगी आंखों में आंसू लिए बस उसे ही देखती रह गई, जैसे कहना चाह रही हो, ‘मेरे लिए इतना रहम… आखिर क्यों? मैं तो शादीशुदा और एक बच्ची की मां… फिर भी…’

किसी ने पुलिस को भी फोन कर दिया. फिर क्या, पुलिस के सामने ही सुनीता ने कृष्ण को और कृष्ण ने सुनीता को स्वीकार कर लिया. महिला थाने में रिपोर्ट, फिर फैमिली कोर्ट से आसानी से तलाक हो गया.

पता नहीं, कृष्ण ने अपने पहले प्यार को भुलाने के लिए या सुनीता पर इनसानियत के नाते तरस खा कर उसे घर वालों, महल्ले वालों और रिश्तेदारों की परवाह किए बगैर अपना लिया था… फिर किराए का अलग मकान… सुनीता की बेटी का नए स्कूल में दाखिला और लोन पर ली गई नई कार…

शायद अपने पहले प्यार को भुलाने की कोशिश में कृष्ण ने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया था और सुनीता उसे और उस के द्वारा मुहैया कराए गए ऐशोआराम पा कर निहाल हो गई थी.

उधर, कृष्ण सुनीता की बांहों में पड़ा उस की रेशमी जुल्फों से खेलता और नर्स के साथ बिताए पलों को सुनीता के साथ दोहराने की कोशिश करता. पड़ोस में रहने के चलते शायद सुनीता उस के पहले प्यार के बारे में सबकुछ जानती थी.

कृष्ण को न बूढ़ी मां की चिंता थी, न दोनों बहनों के प्रति फर्ज का भान. हां, कभी सुनीता को उस ने मांबहनों के साथ रहने के लिए दबाव दिया था, तो सुनीता ने दोटूक शब्दों में कह दिया था, ‘‘मैं उस महल्ले में तुम्हारी मांबहनों के साथ कभी नहीं रह सकती. लोग तुम्हारे और नर्स के किस्से छेड़ेंगे, जो मुझ से कभी बरदाश्त नहीं होगा…’’

समय के साथसाथ कृष्ण का अपने पहले प्यार को भुलाने और जोश में आ कर सुनीता को अपनाने की गलतियों का अहसास होने लगा.

सुनीता ऐशोआराम की आदी हो गई. वह कृष्ण के उस पर किए गए उपकार को भी भूल गई और एक लड़के को जन्म देने के बाद तो उस के बरताव में न जाने कैसा बदलाव आया कि कृष्ण अपने किए पर पछताने लगा.

कभीकभार मां के पास रुक जाने, दोस्तयारों के पास देर हो जाने पर सुनीता उसे इतना भलाबुरा कहने लगी कि उस का जी करता उसे जहर ही दे दे. वह अकसर नर्स को ले कर ताना मारने लगी. न समय पर नाश्ता, न समय पर खाना… कृष्ण के लेट घर आने पर खुद खा कर बेटी को ले कर सो जाना उस का स्वभाव बन गया.

सुनीता तो अब नर्स और कृष्ण के पहले प्यार को ले कर ताना मारती रहती थी. ज्यादा कुछ बोलने पर वह दोटूक कह देती थी, ‘‘नर्स ने धोखा दिया तुम्हें इस चक्कर में मुझे अपना लिया, वरना इतने बदनाम आदमी से कौन रचाता ब्याह? मुझे अपना कर कोई अहसान नहीं कर दिया तुम ने… अभी भी मुझे क्या पता कहांकहां जाते हो… किसकिस के साथ गुलछर्रे उड़ाते हो…’’

तब काटो तो खून नहीं वाली हालत हो जाती थी कृष्ण की. वह चीख पड़ता, ‘‘हां… उड़ाता हूं… खूब उड़ाता हूं गुलछर्रे… तेरी इच्छा है तो तू भी उड़ा ले…’’ और निकल जाता कार ले कर दूर जंगलों में.

एक दिन कृष्ण तेज बुखार से तपता जब नजदीकी डिस्पैंसरी में इलाज कराने पहुंचा, तो सन्न रह गया. हाथ

में इंजैक्शन लिए उस की वही नर्स खड़ी थी.

कृष्ण ने उस के हाथ से परची छीन ली. नर्स ने आसपास देखा. दोपहर के डेढ़ बजे का समय था. मरीज जा चुके थे. उस के और कृष्ण के अलावा वहां कोई नहीं था.

नर्स ने कृष्ण के हाथ से दोबारा परची ली और कहा, ‘‘मुझे माफ कर दो. मैं आप के पैर पड़ती हूं. मुझ से बहुत बड़ी भूल हुई, जो मैं ने आप को…’’

बाकी शब्द नर्स के गले में अटक कर रह गए. कान पकड़ कर आंखों में आंसू भरे वह कृष्ण के कदमों में झुक गई.

कृष्ण का गुस्सा नर्स को यों गिड़गिड़ाते देख बुखार की गरमी से जैसे पिघल गया. उस ने बुखार से तपते अपने हाथों से उठाते हुए पहली बार नर्स को उस के नाम से पुकारा, ‘‘बस भी करो मारिया. मैं अब…’’

कहतेकहते रुक गया कृष्ण और अपनी बांहें खोल कर मारिया के सामने कर दीं.

‘‘पास ही स्टाफ क्वार्टर है, मैं उसी में रहती हूं. अभी एक हफ्ता पहले ही ट्रांसफर हुआ है यहां. आप को देखने की कितनी तमन्ना थी… आज पूरी हो गई. प्लीज आना… ए 41 नंबर है र्क्वाटर का,’’ कहते हुए मारिया ने आंसुओं से भरी आंखों से कृष्ण को इंजैक्शन लगा दिया.

घर आ कर कृष्ण निढाल सा पलंग पर पड़ गया. आंखों में मारिया की आंसुओं भरी आंखें और फूल

सा कुम्हलाया चेहरा था. आसमान में बादलों की गड़गड़ाहट के साथ तेज चमकती बिजली थी. कृष्ण पलंग पर आंखें मूंदे यों ही पड़ा रहा और आज के दिन के बारे में सोचता रहा…

सुनीता ने एक बार भी कृष्ण से तबीयत खराब होने के बावजूद खानेपीने, दवा वगैरह के बारे में नहीं पूछा. बस, नए दिलाए हुए मोबाइल फोन से वह चिपकी रही.

आज तीसरा दिन था. बुखार अभी भी महसूस हो रहा था, मगर रविवार के दिन डाक्टर कम ही मिलता है, फिर भी कृष्ण किसी तरह उठा और डिस्पैंसरी की ओर चल दिया. उस की सोच के मुताबिक डाक्टर नहीं आया था. मारिया ही डिस्पैंसरी संभाल रही थी.

कृष्ण को देखते ही मारिया गुलाब के फूल सी खिल उठी, ‘‘ओह कृष्ण… अब कैसा है आप का तबीयत?’’

केरल की होने के चलते मारिया के हिंदी के उच्चारण कुछ बिगड़े हुए होते थे. उस ने कृष्ण की कलाई को अपने नरम हाथों से पकड़ कर नब्ज टटोलने की कोशिश की ही थी कि तभी कृष्ण ने हाथ खींच लिया.

‘‘मैं ठीक हूं.’’

‘‘अभी तक नाराज हो…’’ कहते हुए मारिया ने कृष्ण को अपनी बांहों में भर लिया. कृष्ण को लगा जैसे वह कोयले की तरह धूधू कर जल उठा हो. जैसे उसे 104 डिगरी बुखार हो गया हो. तभी मारिया ने मौका पा कर अपने पंजों पर खड़े हो उस के होंठों पर अपने धधकते होंठ रख दिए.

मारिया की आंखों में नशा उतरने लगा था. डिस्पैंसरी खाली थी. खाली डिस्पैंसरी के एक खाली कमरे की हवा मारिया की गरम सांसों से गरम हो चली थी.

‘‘कृष्ण, मुझे माफ कर दो. देखो न, आप की मारिया आप से अपने प्यार की भीख मांग रही है. अभी भी वही आग, वही कसक और वही प्यार बाकी है मारिया में… एक बार, सिर्फ एक बार…’’

कृष्ण, जो मारिया का साथ पा कर कुछ पल को अपने होश खो बैठा था, ने मारिया को दूर धकेल दिया और बोला, ‘‘मुझे तुम से घिन आ रही है. तुम प्यार के नाम पर कलंक हो. मैं तुम से प्यार नहीं, बल्कि नफरत करता हूं. मुझे कभी अपनी सूरत भी मत दिखाना…’’

इतना कहता हुआ कृष्ण डिस्पैंसरी से बाहर चला गया था. मारिया ‘धम्म’ से कुरसी पर बैठ गई.

कृष्ण नफरत से भरा भनभनाता सीधे अपने घर की तरफ निकल पड़ा था. उसे लग रहा था जैसे उस के चारों ओर आग जल रही हो, जिस में वह जला जा रहा हो… मारिया ने जैसे उस के अंदर आग भर दी थी… प्यार की नहीं, नफरत की आग. बस, उसी आग में जलता जब घर पहुंचा तो वहां का नजारा देख हैरान रह गया.

घर के दरवाजे पर सुनीता का पहला पति सुनीता का हाथ अपने हाथों में लिए उस से कह रहा था, ‘‘चिंता मत करो, मैं जल्दी आऊंगा…’’ फिर कृष्ण को देख कर वह नजरें झुकाए हुए चुपचाप वहां से खिसक लिया.

कृष्ण ने सुनीता के गाल पर एक करारा तमाचा जड़ दिया और बोला, ‘‘मक्कार… धोखेबाज… बता, कब से चल रहा है यह सब?’’

सुनीता गाल को सहलाते हुए कृष्ण पर चिल्लाई, ‘‘जब से तुम्हारा नर्स के साथ चक्कर चल रहा है. कहां से आ रहे हो? मारिया से मिल कर न? अपने गरीबान में झांक लो, तब मुझे कुछ कहना. वे आएंगे… तुम उन्हें रोक भी नहीं सकते… उन की बेटी मेरे पास है… क्या कर लोगे तुम?’’

कृष्ण को लगा कि वह चक्कर खा कर वहीं गिर पड़ेगा. उस ने सपने में भी ऐसा नहीं सोचा था. इतना बड़ा धोखा.

कृष्ण चल पड़ा था अपने घर की ओर. मांबहनों के पास. टूटे कदम और बोझिल मन लिए. जा कर ‘धम्म’ के पलंग पर पड़ गया था. उसे लगा जैसे वह न घर का रहा न घाट का… न मांबहनों का हो पाया और न मारिया या सुनीता का… आखिर उसे उस के भटकने की सजा जो मिल गई थी.

कृष्ण की आंखों में आंसू थे. सुनीता की गूंजती आवाज दबाने के लिए उस ने मोबाइल फोन के ईयरफोन कानों में ठूंस लिए थे, ‘जिंदगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए… जब ये सोचा तो घबरा गए… आ गए, हम कहां आ गए…’ Family Story in Hindi

Humour : एक शाम थाने के नाम

Humour. एक लंबी सांस लेने के बाद प्रभु दयाल अपने घर की ओर जा रहा था कि उस ने देखा कि लालबत्ती के पास कुछ लोग जमा हो रहे हैं.

माजरा क्या है, यह जानने के लिए जब वह उन लोगों के पास पहुंचा तो पता चला कि जेब काटने के दौरान मिले माल के बंटवारे को ले कर 2 जेबकतरे आपस में झगड़ रहे थे.

तभी गश्त पर निकले 2 पुलिस वाले मोटरसाइकिल पर वहां आ धमके. होशियार लोग तो वहां से खिसक गए, लेकिन प्रभु दयाल पुलिस वालों के हत्थे चढ़ गया.

एक पुलिस वाला प्रभु दयाल की कलाई जोर से पकड़ कर बोला, ‘‘चल, थाने चल. चौकचौराहे पर झगड़ाफसाद करता है, दंगा करता है…’’

घबराया हुआ प्रभु दयाल घिघियाते हुए बोला, ‘‘अरे भाई साहब, मैं शरीफ आदमी हूं. मैं ने कुछ नहीं किया है. मुझे क्यों पकड़ रहे हैं? दंगा करने वाले बदमाश तो भाग गए.’’

दूसरा पुलिस वाला थोड़ा अकड़ कर बोला, ‘‘थाने चल, वहीं तुझे सब बताएंगे.’’

चौकचौराहे पर पुलिस के डंडे खाने के बजाय प्रभु दयाल ने थाने चलने में ही भलाई समझी.

थाने में प्रभु दयाल को जिस सबइंस्पैक्टर के सामने पेश किया गया, वह पहले से ही थाने लाए गए कुछ लोगों से निबटने में लगा था.

सबइंस्पैक्टर एक नौजवान को डांट रहा था, ‘‘देखो, तुम ने सरकारी जमीन को घेर कर रेहड़ी लगा रखी है. तुम्हारी अच्छी आमदनी होती है, तो फिर बीट कांस्टेबल से झगड़ा क्यों करते हो?

‘‘आपसी तालमेल से सब ठीकठाक चलता रहेगा. बीट कांस्टेबल जो कहता है मान लो, अकेले सब हजम करना तो ठीक नहीं है.’’

वह नौजवान घिघियाता हुआ बोला, ‘‘साहबजी, कोई नौकरी न मिलने पर ही यह काम शुरू किया था.

‘‘देखने से ही ऐसा लगता है कि हमें खूब कमाई हो रही है, पर हकीकत में ऐसा नहीं है. पुलिस वाले हर महीने पैसे बढ़ा कर लेना चाहते हैं. बताइए, उन को हम कैसे खुश रखें? आप मालिक हैं, हमें इंसाफ दीजिए.’’

सबइंस्पैक्टर पानी के साथ दवा की गोली गटकते हुए बोला, ‘‘हम फुजूल में किसी को तंग नहीं करना चाहते. तुम थोड़े कहे को ही ज्यादा समझो. बीट अफसर को खुश रखो. अब भाग लो यहां से. आगे से कोई शिकायत नहीं आनी चाहिए. पानी में रह कर मगर से बैर न पालो.’’

अब अगला नंबर एक एसटीडी बूथ चलाने वाले का था. सबइंस्पैक्टर उस आदमी से बोला, ‘‘लालाजी, तय रेट से ज्यादा पैसा वसूल रहे हो. बहुत बड़ा जुर्म है यह. जेल में चक्की पीसनी पड़ेगी. तुम्हारे खिलाफ जो शिकायतें आई हैं, उन का निबटारा कर लो, नहीं तो तुम्हारे साथ बुरा हो सकता है. समझ गए न?’’

अब अगला नंबर प्रभु दयाल का था. सबइंस्पैक्टर प्रभु दयाल को घूरते हुए बोला, ‘‘आंखों पर चश्मा, जेब में पैन. तुम तो काफी पढ़ेलिखे लगते हो, फिर भी चौकचौराहे पर दंगा क्यों कर रहे थे? सबकुछ खुद ही बता दो. मेरा गुस्सा बहुत बुरा है. तुम मुझे गुस्सा मत दिलाना, नहीं तो बड़ी मार खाओगे.’’

प्रभु दयाल बोला, ‘‘गुस्सा आप की सेहत के लिए अच्छा नहीं है साहब. हाई ब्लड प्रैशर के मरीज को तो गुस्से से हमेशा दूर ही रहना चाहिए.’’

सबइंस्पैक्टर हैरान हो कर बोला, ‘‘तुम्हें कैसे पता है कि मैं हाई ब्लड प्रैशर का मरीज हूं? यह तो कमाल है.’’

प्रभु दयाल बोला, ‘‘साहबजी, यह तो छोटी सी बात है. मुझे तो यह भी मालूम है कि कुछ देर पहले आप कोर्ट में पेश होने वाले बदमाशों की फाइल की लिखापढ़ी में लगे थे. मैं ठीक कह रहा हूं न?’’

सबइंस्पैक्टर को लगा जैसे उस के सामने एक ऐसा आदमी खड़ा है, जो दीवारों के आरपार देख सकता है.

लोहा गरम देख प्रभु दयाल ने एक और चोट की, ‘‘साहबजी, मुझे तो यह भी पता?है कि आज आप ने चावल और रोटी के साथ कौन सी सब्जी खाई है. आज आप ने लंच में कद्दू की सब्जी खाई है. ठीक कहा न?’’

सबइंस्पैक्टर को ऐसा लग रहा था, जैसे उस की कुरसी के नीचे से जमीन खिसक रही है. ऐसे सच्चे भविष्य बताने वाले से तो उस का जिंदगी में कभी सामना ही नहीं हुआ था.

सबइंस्पैक्टर प्रभु दयाल के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘आप तो सबकुछ जानते हैं. मैं और मेरे बीवीबच्चों के बारे में भी कुछ बताइए. मैं खुशकिस्मत हूं कि आप जैसे बड़े लोगों के दर्शन हो गए.

‘‘यहां पास ही में मेरा फ्लैट है. क्या आप मेरे घर चल कर कुछ चायनाश्ता करेंगे? इसी बहाने ही सही, आप के साथ मिलनेबैठने का मौका मिल जाएगा.’’

प्रभु दयाल बोला, ‘‘फिर किसी दिन सही. आज बस इतना ही.’’

सबइंस्पैक्टर जैसे ही प्रभु दयाल के पैर छूने को आगे बढ़ा, प्रभु दयाल दूर हटते हुए बोला, ‘‘अजी साहब, ऐसा गजब मत कीजिए. अभी तो मैं अपने घर लौटना चाहूंगा, फिर किसी दिन फुरसत से आऊंगा.’’

सबइंस्पैक्टर गरजा, ‘‘मुबारक सिंह, भाई साहब को थाने की जीप में घर छोड़ कर आओ.

‘‘और हां, रास्ते में भोलू हलवाई की दुकान से साहब के बच्चों के लिए 5 किलो देशी घी के गुलाब जामुन दिलवा देना.’’

उधर महल्ले वाले प्रभु दयाल को थाने की जीप से उतरते व पुलिस द्वारा अदब से सलाम मारते देख हैरान थे. कुछ नौजवान भी वहां खड़े थे. उन में से एक ने कान में फुसफुसा कर कहा, ‘‘हमें तो पहले से ही शक था कि अपने में मस्त रहने वाला हमारा यह पड़ोसी प्रभु दयाल बड़ी ऊंची चीज है. थाने की जीप में आया है.’’

इधर, सारी बातें जानने के बाद प्रभु दयाल की बीवी हैरान हो कर पूछ रही थी, ‘‘शेर के मुंह में जाने के बाद भी आप सहीसलामत वापस कैसे आ गए? और साथ में देशी घी के गुलाब जामुन भी ले आए. कैसे हुआ यह चमत्कार? आप को तो ज्योतिष के बारे में कुछ भी नहीं आता, फिर वहां आप भविष्य बताने वाले कैसे बन गए?’’

प्रभु दयाल थोड़ा मुसकरा कर बोला, ‘‘अगर ज्योतिष के द्वारा कुछ बताया जा सकता, तो वाजपेयीजी समय से पहले चुनाव करा कर गद्दी नहीं खोते. ओसामा बिन लादेन कहां छिपा है, यह कब का पता लग गया होता. ज्योतिष के नाम पर जो बातें मैं ने सबइंस्पैक्टर को बताई थीं, वे तो कोई भी बता सकता था…’’

प्रभु दयाल ने राज खोला, ‘‘मैं ने देखा था कि पानी मंगा कर सबइंस्पैक्टर ने एनवास-10 की गोली गटकी थी. इस का मतलब यही था कि वह हाई ब्लड प्रैशर का मरीज है.

‘‘लिखते हुए शायद रिफिल लीक कर गई थी, जिस से उस की उंगली में स्याही लगी थी. इस से साफ जाहिर था कि उस ने थोड़ी देर पहले लिखाई का काम किया है.

‘‘उस की मूंछों में कद्दू की सब्जी का एक छोटा टुकड़ा फंसा हुआ था यानी दोपहर को उस ने कद्दू की सब्जी खाई थी.

‘‘मैं बेकुसूर था और बेमतलब ही फंसाया जा रहा था, सो बचने के लिए ही सबइंस्पैक्टर के सामने मैं ने कुछ बातें हवा में उछाल दी थीं. मेरे बुरे समय पर हाजिरजवाब होने की नीति काम कर गई थी.

‘‘मैं ने उन से एक बार भी नहीं कहा कि मैं कोई पहुंचा हुआ पीरपंडित या भविष्य बताने वाला हूं. अब वह अपनी समझ से खुद ही यह मानने लगा था कि मैं कोई बहुत बड़ा ज्योतिषी हूं, तो उस हालत में मैं क्या कर सकता था? अंधविश्वासी लोग अकसर अपने जाल में खुद ही फंस जाते हैं.’’

प्रभु दयाल की बीवी बोली, ‘‘आप ने तो कहीं भी कोई गलतबयानी नहीं की. दूसरों की मेहनत की कमाई और हक पर हिस्सापत्ती चाहने वाले ऐसे लोगों को तो सेर का कोई सवा सेर मिलते ही रहना चाहिए.’’

फिर पत्नी अपने बड़े बेटे को बुला कर बोली, ‘‘बेटा, गुलाब जामुन की यह हांड़ी गरीबों में दे आ. कहीं इस धौंसपट्टी की कमाई को खाने से हमारे बच्चों पर भी बुरा असर न पड़ जाए.’’ Humour

Humour :ठोको ताली- शिल्पा ने कैसे सिखाया अनूप और सीमा को सबक?

Humour :

“शिल्पा आज अनूप का फोन आया था.”

“ओफ्फो!! फिर से…”

“अरे! परेशान होने की बात नहीं मैंने कह दिया हम दो दिन के लिए बाहर जा रहे हैं.”

“हम इस तरह कब तक मुंह चुराएंगे, कुछ ऐसा करना पड़ेगा कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.”
अनूप शिल्पा के छोटे भाई का दोस्त है. इसीलिए शिल्पा से पहले से परिचित भी है. नई शादी और उसके ही शहर में रहने के कारण शिल्पा जब भी कुछ नया बनाती उन दोनों को बुला लेती. वह नहीं जानती थी कि वह आ बैल मुझे मार वाला काम कर रही है.

वैसे भी शिल्पा को खाना बनाना और खिलाना दोनों में ही मजा आता था. पर अब तो अनूप और उसकी पत्नी सीमा कभी भी किसी समय आ धमकते और खाने की फरमाइश कर देते.

शिल्पा ने तो उन्हें अंगुली पकड़वाई थी पर वह तो पौंचा ही पकड़ बैठे. उस दिन शिल्पा खाने से फुरसत ही हुई थी कि ये दोनों आ गये.

“शिल्पा दी आज तो आपके हाथ की कढ़ी चावल खाने का बहुत मन हो रहा है.”
“दी, कढ़ी बनाती भी तो इतनी अच्छी है.” मस्का लगाते हुए सीमा बोली.
“दी, वो पकौड़े वाली कढ़ी बनाना और थोड़े पकौड़े ज्यादा बना लेना सूखे खाने के लिए.”

शिल्पा के तो तन बदन में आग सी लग गयी थी फिर भी बनावटी मुस्कान ओढ़कर खाना बनाया. शिल्पा ने अब इन्हें सबक सिखाने का मनसूबा बना लिया था.

शर्मा जी के बेटे की बर्थडे पार्टी से लौटने के बाद शिल्पा काफी थकावट महसूस कर रही थी और बर्तन वाली न आने से बर्तन भी पड़े थे. थोड़ी देर आराम करने की सोच कर लेट गई. तभी उसे अनूप की आवाज सुनाई दी “जीजा जी आज हमारा मन आलू के पराठें खाने का हो रहा था और दीदी के हाथ के पराठों का तो जवाब ही नहीं. बाजार में भी इतने अच्छे नहीं मिलते.”

शिल्पा ने एक चुन्नी सिर पर बांधी और बाहर आकर बोली “मेरे सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा है अच्छा हुआ सीमा तुम आ गयीं पहले तो सबके लिए चाय बना लाओ.”

पति को चुप रहने का इशारा करती हुई “और हां कुकर धोकर आलू उबलने रख देना, बाई नहीं आई न. आज मैं तुम्हें आलू के पराठें बनाना सिखाऊंगी. आखिर तुम्हें भी तो अनूप की पसंद सीखना होगी.”

प्यार से “तुम तो अपनी हो, तो तुमसे कहने में क्या संकोच मेरी तो तबीयत ठीक नहीं है तो तुम्हें ही चारों के लिए पराठें बनाना होगें.”

चाय से ज्यादा तो सीमा का मन उबल रहा था.”क्या मैं नौकरानी हूं? जो बर्तन भी साफ करूं और सबके लिए पराठें भी बनाऊं.” अनूप से भी बात नहीं कर पा रही थी.

उसने अनूप को व्हाट्सएप पर सारी परेशानी बताई. और साथ ही उपाय भी.

चाय पीने के बाद कप रखने के बहाने अंदर जाकर सीमा ने अनूप को फोन लगाया .

फोन उठाते ही अनूप बोला. जी सर अभी घर पहुंच रहा हूं

“किसका फोन था?” शिल्पा ने पूछा.

“वो दीदी बौस का फोन है घर पर आ रहे हैं तो हमें निकलना पड़ेगा.”

“कोई बात नहीं फिर कभी, जब भी आओगे हम सीमा के हाथ के पराठें खा लेगें.”

अब तो अनूप और सीमा ऐसे नौ दो ग्यारह हुए कि शिल्पा के घर का रास्ता ही भूल गये.

लेखिका- मधु जैन 

Hindi Crime Story : पिंजरे का पंछी – झूठी ख्वाहिशों का दलदल

Hindi Crime Story. कामिनी दरवाजे के बाहर खड़ी थी. खूब सजधज कर. सामने उसे एक अधेड़ उम्र का आदमी आता दिखाई दिया. उसे लगा कि वह उस की ओर चला आ रहा है. पर यह क्या? वह उस के बगल में खड़ी लड़की के पास चला गया और उस से बातें करने लगा. कामिनी सोचने लगी, ‘अब मेरी जवानी ढलने लगी है, शायद इसीलिए लड़के तो दूर अधेड़ भी मेरे पास आने से कतराने लगे हैं. आज भी मैं कुछ कमा नहीं पाई. अब मैं दीदी को क्या जवाब दूंगी? यही हाल रहा तो एक दिन वे मुझे यहां से निकाल बाहर करेंगी.’

इस के बाद कामिनी पुरानी यादों में खो गई. कामिनी के मातापिता गरीब थे. उस की मां लोगों के बरतन साफ कर के घर का खर्चा चलाती थी.

मातापिता ने कामिनी को अपना पेट काट कर पढ़ाना चाहा और उसे शहर के एक स्कूल में भरती किया. उन का सपना था कि कामिनी भी पढ़लिख कर समाज में नाम कमाए.

एक दिन स्कूल से छुट्टी होने के बाद कामिनी घर आने के लिए आटोरिकशा का इंतजार करने लगी. तभी उस के सामने एक कार आ कर रुकी. उस कार से एक अधेड़ आदमी बाहर आया. वह कामिनी से बोला, ‘बेटी, यहां क्यों खड़ी हो?’

‘मुझे घर जाना है. मैं आटोरिकशा का इंतजार कर रही हूं.’  ‘बेटी, तुम्हारा घर कहां है?’ वह आदमी बोला. ‘देवनगर,’ कामिनी बोली. ‘मुझे भी देवनगर जाना है. हमारे साथ कार में बैठ जाओ.’

उस आदमी की बात सुन कर कामिनी उस की कार में बैठ गई. कार में 2 आदमी और भी बैठे थे.

कार को दूसरी तरफ अनजानी जगह पर जाते देख कामिनी हैरानी से बोली, ‘अंकल, आप कह रहे थे कि आप को देवनगर जाना है, पर आप तो…’

‘बेटी, मुझे जरूरी काम याद आ गया. मैं किसी दोस्त से मिलने जा रहा हूं. तुम्हें ये लोग तुम्हारे घर छोड़ देंगे,’ कामिनी की बात पूरी होने से पहले ही वह आदमी बोला.

कार आगे दौड़ने लगी. कार को दूसरी दिशा में जाते देख कामिनी बोली, ‘अंकल, यह तो देवनगर जाने का रास्ता नहीं है. आप मुझे कहां ले जा रहे हैं?’

‘बेटी, हम तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ देंगे. उस से पहले हम तुम से एक बात करना चाहते हैं. हम कोई गैर नहीं हैं. हम तुम्हें और तुम्हारे मातापिता को अच्छी तरह से जानते हैं.

‘एक दिन हम ने तुम्हें अपनी सहेली से कहते सुना था कि तुम हीरोइन बनना चाहती हो. तुम चाहो तो हम तुम्हें किसी फिल्म में हीरोइन का रोल दिला देंगे. तब दुनियाभर में तुम्हारा नाम होगा. तुम्हारे पास इतनी दौलत हो जाएगी कि तुम अपने मांबाप के सारे सपने पूरे कर सकोगी.

‘हीरोइन बनने के बाद तुम अपने मातापिता से मिलने जाओगी, तो सोचो कि वे कितने खुश होंगे? कुछ दिनों के बाद तुम्हें फिल्म में रोल मिल जाएगा, तब तक तुम्हें अपने मातापिता से दूर रहना होगा.’

कामिनी की आंखों में हीरोइन बनने का सपना तैरने लगा. वह ख्वाब देखने लगी कि उसे बड़े बैनर की फिल्म मिल गई है. पत्रपत्रिकाओं और टैलीविजन के खबरिया चैनलों में उस के नाम की चर्चा हो रही है. समाज में उस के मातापिता की इज्जत बढ़ गई है. उस के पुराने मकान की जगह पर अब आलीशान कोठी है. सब उसी में रह रहे हैं.

‘बेटी, क्या सोच रही हो?’ उस आदमी के सवाल ने कामिनी का ध्यान भंग किया. ‘अंकल, मैं फिल्म में हीरोइन बनने को तैयार हूं,’ कामिनी ने कहा.

2-3 घंटे के सफर के बाद वह कार शहर से दूर एक इलाके में पहुंच गई. कामिनी को इस जगह के बारे में पता नहीं था. कार से उतर कर वे दोनों आदमी कामिनी को ले कर एक मकान में गए.

दरवाजे पर खटखट करने पर एक मोटी औरत बाहर आई. वहां आसपास खड़ी लड़कियां उसे ‘दीदी’ कह कर पुकार रही थीं.

उन आदमियों को देख कर वह औरत बोली, ‘ले आए तुम नई को?’

‘बेटी, तुम्हें कुछ दिन यहीं रहना है. उस के बाद हम तुम्हें फिल्म बनाने वाले के पास ले चलेंगे,’ एक आदमीने कहा और वे दोनों वहां से चले गए.

दीदी ने कामिनी के रहने का इंतजाम एक अलग कमरे में कर दिया. वहां सुखसुविधाएं तो सभी थीं, पर कामिनी को वहां का माहौल घुटन भरा लगा.

3 दिन के बाद दीदी कामिनी से बोली, ‘आज हम तुम्हें एक फिल्म बनाने वाले के पास ले चलेंगे. वे जो भी कहें, सबकुछ करने को तैयार रहना.’

कुछ देर बाद एक कार आई. उस में 2 आदमी बैठे थे. दीदी के कहने पर कामिनी उस कार में बैठ गई. एक घंटे के सफर के बाद वह एक आलीशान कोठी में पहुंच गई. वहां वे आदमी उसे एक कमरे में ले गए.

उस कमरे में एक आदमी बैठा था. उसे वहां के लोग सेठजी कह रहे थे. कामिनी को उस कमरे में छोड़ वे दोनों आदमी बाहर निकले. जाते समय उन में से एक ने कामिनी से कहा, ‘ये सेठजी ही तुम्हारे लिए फिल्म बनाने वाले हैं.’

सेठजी ने कामिनी को कुरसी पर बिठाया. इंटरव्यू लेने का दिखावा करते हुए वे कामिनी से कुछ सवालपूछने लगे. इसी बीच एक आदमी शरबत के 2 गिलास ले कर वहां आया. एक गिलास सेठजी ने पीया और दूसरा गिलास कामिनी को पीने को दिया.

शरबत पीने के बाद कामिनी पर बेहोशी छा गई. उसे जब होश आया, तो उस ने अपने सामने सेठजी को मुसकराते हुए देखा. वह दर्द से कराह रही थी. ‘मेरे साथ धोखा हुआ है. मैं तुम सब को देख लूंगी. मैं तुम्हें जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दूंगी,’ कामिनी चिल्लाई.

‘तुम्हारे साथ कोई धोखा नहीं हुआ है. तुम फिल्म में हीरोइन बनना चाहती थीं. लो, देख लो अपनी फिल्म,’ कह कर सेठजी ने कंप्यूटर में सीडी डाल कर उसे दिखा दी.

सीडी को देख कर कामिनी सन्न रह गई. उस फिल्म में सेठजी उस की इज्जत के साथ खेलते दिखाई दिए. ‘वैसे तो यह फिल्म हम किसी को नहीं दिखाएंगे. अगर तुम ने हमारी शिकायत पुलिस से की, तो हम इसे सारी दुनिया में पहुंचा देंगे,’ कंप्यूटर बंद करते हुए सेठजी बोले.

कमिनी को इस घटना से सदमा पहुंच गया. वह बेहोश हो गई. कुछ देर बाद वे दोनों आदमी कामिनी को कार में बैठा कर दीदी के पास ले गए. कामिनी गुमसुम रहने लगी. वह न कुछ खाती थी, न किसी से बातें करती थी.

एक दिन दीदी कामिनी के कमरे में आ कर बोली, ‘देखो, यहां जो भी लड़की आती है, वह अपनी इच्छा से नहीं आती. वह कुछ दिनों तक तेरी तरह गुमसुम रहती है, बाद में खुद को संभाल लेती है. इस दलदल में जो एक बार पहुंच गई, वह चाह कर भी वापस नहीं जा सकती.

‘अगर तुम यहां से चली भी गई, तो तुम्हारा समाज तुम्हें फिर से नहीं अपनाएगा, इसलिए तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम अब यहीं के समाज में रहने का मन बनाओ. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.’

दूसरे दिन दीदी ने कामिनी को कार में बिठा कर दूसरे आदमी के पास भेजा. अब वह इसी तरह कामिनी को इधरउधर भेजने लगी. एक दिन दीदी ने कामिनी से कहा, ‘तुझे इधरउधर जाते हुए काफी समय हो गया है. अब मैं तुझे एक नया काम सिखाऊंगी.’

‘नया काम… मतलब?’ कामिनी चौंकते हुए बोली. ‘मतलब यह है कि अब तुझे किसी सेठ के पास नहीं जाना है. तुझे यहीं दुकान में रह कर ग्राहकों को अपनी ओर खींचना है.’ ‘किस दुकान में?’ ‘यहीं.’ ‘लेकिन यह तो मकान है, दुकान कहां है?’

‘यही मकान तुम्हारे धंधे की दुकान है. जैसे शोरूम में अलगअलग डिजाइन के कपड़े सजा कर रखे रहते हैं, वैसे ही तुम्हें यहां सजधज कर आधे कपड़ों में रहना है. तुम्हें कुछ नहीं करना है. बस, यहां से गुजरने वाले मर्दों को ललचाई नजरों से देखना है.’

दीदी के समझाने पर कामिनी सोचने लगी, ‘यहां रहने वाली सभी लड़कियां इस शोरूम की चीजें हैं. शोरूम में रखी चीजों को ग्राहक देख कर पसंद करता है. खरीदने के बाद वे चीजें उसी की हो जाती हैं. ग्राहक उस चीज की इज्जत करता है. हम जिस्म के सौदे की वे चीजें हैं, जिन्हें ग्राहक कुछ देर के लिए खरीद कर मजा ले कर चला जाता है

‘वासना के भूखे दरिंदे हमारे पास आ कर अपनी भूख मिटाते हैं. हम भी चाहते हैं कि हमारा दिल किसी के लिए धड़के. वह एक हो. वह हम पर मरमिटने को तैयार हो. हम भी समाज के रिश्तों की डोर से बंधें.’

पिंजरे में बंद पंछी की तरह कामिनी का मन फड़फड़ा रहा था.

एक दिन कामिनी ने सोच लिया कि वह इस दुनिया से बाहर आ कर रहेगी. ज्यादा से ज्यादा इस कोशिश में उस की जान चली जाएगी. जिस्म के शोरूम की चीज बने रहने से अच्छा है कि वह मौत को गले लगा ले. अगर वह बच गई, तो समाज का हिस्सा बन जाएगी.

कामिनी ने दीदी को भरोसे में ले लिया. अपने बरताव और काम से उस ने दीदी पर असर जमा लिया. दीदी को यकीन हो गया था कि कामिनी ने खुद को यहां की दुनिया में ढाल लिया है.

एक दिन मौका देख कर कामिनी वहां से भाग गई और ट्रेन में बैठ कर अपने घर चली गई. इतने सालों के बाद कामिनी को देख कर उस के भाई खुश हो गए. उन्होंने कामिनी को बताया कि मातापिता की मौत हो चुकी है. वह अपने भाई विनोद और सोहन के साथ रहने लगी.

भाइयों को दुख न पहुंचे, यह सोच कर उस ने अपने बीते दिनों के बारे में कुछ नहीं बताया. कामिनी का भाई विनोद एक कंपनी में काम करता था. उस कंपनी का मालिक रवींद्र नौजवान था. एक दिन वह विनोद के जन्मदिन की पार्टी में उस के घर आया. विनोद ने उस से कामिनी का परिचय कराया. उसे कामिनी पसंद आ गई. धीरेधीरे रवींद्र और कामिनी के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं.

एक दिन दोनों ने प्रेमविवाह कर लिया. रवींद्र और कामिनी एकदूसरे को बहुत प्यार करते थे. शादी के बाद कामिनी रवींद्र के साथ शहर में किराए के मकान में रहने लगी. एक दिन रवींद्र की कंपनी में बैठक चल रही थी. रवींद्र को याद आया कि उस की जरूरी फाइल तो घर पर ही रह गई है. रवींद्र ने सुपरवाइजर प्रदीप को वह फाइल लेने अपने घर भेज दिया.

रवींद्र के घर पहुंच कर प्रदीप ने दरवाजे पर खटखट की. थोड़ी देर बाद कामिनी बाहर आ गई. ‘कामिनी, तू यहां? तू ने मुझे पहचाना?’ कामिनी को देख कर प्रदीप बोला. ‘नहीं तो,’ कामिनी बोली. ‘वहां मैं तुम्हारे पास कई बार आया करता था. क्या तुझे यहां साहब किराए पर लाए हैं?’

प्रदीप की बात सुन कर कामिनी चुप रही. प्रदीप कामिनी को बांहों में भरने लगा. वह उसे चूमने की कोशिश करने लगा. ‘परे हट जाओ मेरे सामने से,’ कामिनी चिल्लाई. ‘जानम, मैं ने तुम्हें कई बार प्यार किया है. आज यहां तू और मैं ही तो हैं. मेरी इच्छा पूरी नहीं करोगी?’ ‘नहीं, तुम्हें मुझ से तमीज से बात करनी चाहिए. मैं तुम्हारे साहब की बीवी हूं,’ कामिनी चिल्लाई.

‘तमीज से?’ प्रदीप हंस कर बोला. ‘मैं साहब को तुम्हारे बारे में सबकुछ बता दूंगा,’ प्रदीप बोला. ‘नहीं, तुम ऐसा नहीं करोगे. मेरी जिंदगी बरबाद हो जाएगी.’

‘ठीक है. अगर तुम अपनी जिंदगी बरबाद होने से बचाना चाहती हो, तो मैं जब चाहूं तुम्हें मेरी इच्छा पूरी करनी होगी. तुम्हें यह काम आज और अभी से करना होगा. जिस दिन तुम ने मेरा कहा नहीं माना, मैं तुम्हारी पूरी कहानी साहब को बता दूंगा,’ जातेजाते प्रदीप कामिनी से बोला.

अब प्रदीप रवींद्र की गैरहाजिरी में समयसमय पर कामिनी से मिलने आने लगा.

एक दिन किसी काम से रवींद्र अपने घर समय से पहले आ गया. उस ने प्रदीप और कामिनी को एकसाथ देख लिया. उस ने प्रदीप और कामिनी को बुरी तरह डांटा. उस ने प्रदीप को नौकरी से हटाने की धमकी दी. प्रदीप ने रवींद्र को कामिनी के बारे में सबकुछ बता दिया. रवींद्र ने कामिनी का साथ छोड़ दिया. कामिनी के बारे में जब उस के भाइयों को पता चला, तो उन्होंने भी उसे अपने साथ रखने से मना कर दिया.

कामिनी के पास फिर उसी दुनिया में लौटने के सिवा कोई रास्ता नहीं रह गया था. ‘‘कामिनी, आज भी कुछ कमाया या नहीं?’’ दीदी की बात सुन कर कामिनी यादों से बाहर आ गई. Hindi Crime Story

Humorous Family Story : सिगरेट की लत

Humorous Family Story. उन की इस आदत से मैं वाकिफ हूं फिर भी पतिदेव की हुक्मउदूली नहीं कर सकती. खाना मेज पर रखेरखे ठंडा हो गया. अपनी आदत के अनुसार वह घंटे भर बाद वापस आए. चाहे कितना कुछ कहूं पर चिकने घड़े की तरह उन पर कुछ असर ही नहीं होता है. मेरा दिल तो शादी के बाद से ही पतिदेव को सिगरेट पीता देख कर सुलगना शुरू हो गया था. मैं जब भी उन के होंठों पर सौतन की तरह सिगरेट को चिपके देखती कसमसा कर रह जाती.

अब तो सिगरेट पीने की लत, शौक से जनून की हद तक बढ़ गई है और घर की तमाम कीमती चीजें फुंकनी शुरू हो गई हैं. कभी सोफे के कवर पर सिगरेट का जला निशान दिखाई देता है तो कभी कारपेट पर. सिगरेट पीने की कोई एक जगह तो बन नहीं सकती, इसलिए तकिए के कवर भी सिगरेट के वार से बच नहीं पाते. अखबार या पत्रिका पढ़तेपढ़ते हाथ में सिगरेट दबाए कब पतिदेव नींद में खर्राटे लेने लगते हैं, उन्हें खुद पता नहीं चलता है.

वह तो जब मैं काम खत्म कर सोने के लिए कमरे में आती हूं तो रजाई व गद्दे से उठते धुएं का रहस्य समझ में आता है. दुखी हो कर एक बार तो मैं ने पतिदेव को धमकी भी दे डाली थी, ‘‘या तो तुम सिगरेट पीना बंद कर दो, वरना मैं तुम से दोगुनी सिगरेट पीना शुरू कर दूंगी.’’ पतिदेव ने ठहाका लगाते हुए कहा, ‘‘यह शुभ काम तुम जितनी जल्दी चाहो शुरू कर लो.’’

पति को खुश देख कर सोचा कोई और चाल चलनी होगी, सो मैं ने ऐलान कर दिया, ‘‘आज से आप घर के अंदर सिगरेट नहीं पिएंगे.’’ ‘अंधा क्या चाहे दो आंखें.’ यह कहावत यहां बिलकुल सटीक बैठी. अब तो पान की दुकान पर देर रात तक मित्रमंडली में जमे रहने का उन्हें एक बहाना मिल गया. अब मैं पति के इंतजार में कुढ़ती रहती हूं. कुछ कह भी नहीं पाती.

मसूरी में हिमपात हुआ तो पति ने मुझे खुश करने के लिए स्नोफाल देखने का प्रोग्राम बना डाला. वहां पहुंचे तो स्नोफाल नहीं देख सके, क्योंकि दिल्ली की बरसात की तरह स्नोफाल रूपी बादल बरस चुके थे. हां, वहां पहुंच कर बर्फ पर पैर फिसलने का खतरा मुझे जरूर लग रहा था. नीचे से आते हुए लोगों पर वहां पहले पहुंचे लोग बर्फ का गोला बना कर फेंक रहे थे.

मेरी कनपटी पर ऐसे ही एक बर्फ का गोला लगने से मैं स्वयं को संभाल नहीं पाई और फिसल गई. आखिर वही हुआ जिस के लिए मैं डर रही थी. हिम्मत कर के उठी तब तक दूसरा गोला सिर पर पड़ा और दोबारा गिर पड़ी. अब दर्द से कराहती हुई मैं वापस उतरने लगी. दूर से अपनी गाड़ी के पास भीड़ लगी देख कर मन में एकसाथ शंका के कई बुलबुले बनने व फूटने लगे.

आखिर में मेरी सोच सिगरेट पर जा कर अटक गई. मुझे लगा कि शायद गाड़ी चलाते समय पति के हाथ में सिगरेट जलती ही होगी और नींद का झोंका आया होगा और हाथ की जलती सिगरेट छूट कर नीचे गिर गई होगी. जब फर्श का कारपेट जल कर गाड़ी में धुआं भर गया होगा तो उसे देख कर लोगों ने शीशा तोड़ कर आग बुझाई होगी. पता नहीं क्या सोच कर मैं दुखी नहीं थी.

शायद मैं सोच रही थी कि आज के बाद पति हमेशा के लिए ही सिगरेट छोड़ देंगे, क्योंकि बहुत बड़ा नुकसान होतेहोते बच गया. रात को खाना खाने से पहले मैं ने पति को बाहर जाते देख कर पूछा, ‘‘कहां जा रहे हैं?’’ ‘‘सिगरेट खत्म हो गई है. बाहर पीने जा रहा हूं.’’ ‘‘क्या…आप ने अब भी सिगरेट छोड़ने का फैसला नहीं किया?’’ ‘‘तुम क्या समझती हो कि मेरी सिगरेट से गाड़ी जलने लगी थी?’’ ‘‘और क्या.

इस में कोई शक है क्या?’’ ‘‘मैडम, तुम्हारी पूजापाठ की वजह से आज गाड़ी में आग लग जाती. घर से कहीं जाओगी तो गाड़ी में अगरबत्ती जलाना नहीं भूलती हो. आगे से यह सब नहीं चलेगा, समझीं.’’ मैं आंखें फाड़े आश्चर्य से पति को देख रही थी. Humorous Family Story

लेखक- मंजरी सक्सेना

 

Family Story : दुनिया बदल गई

Family Story. कोरोना ने भुवन रावत और उन के परिवार को चंड़ीगढ़ से दोबारा उन के पहाड़ी गांव में पहुंचा दिया. वहां भुवन ने दूध का धंधा किया जिस में उन के दोस्त भोला ने काफी मदद की. इस बीच भोला और उर्मिला नजदीक आ गए. आगे क्या हुआ?

औरत हमेशा आदमी के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने की कोशिश करती है. कितनी भी मुसीबतें आ जाएं वह उस की हिम्मत बनाए रहती है. वह अपने आदमी को हारते हुए देखना नहीं चाहती.

वह औरत हिम्मत, साहस और संघर्ष का प्रतीक है. वह अपने परिवार रूपी घोंसले को कभी भी टूटते हुए देखना नहीं चाहती. इस के लिए कुदरत ने उसे कला कौशल प्रदान किए हैं और इन्हीं कलाओं से वह अपने नीड़ को संवार कर रखती है.

फिर भी कुछ अलग कहानी बन ही जाती है, इसीलिए शायद कहते हैं कि कुदरत के खेल निराले होते हैं, इनसान की सोच से भी परे. शायद यही कुदरत का वह रहस्यमयी चेहरा है, जिसे इनसान सदियों से पढ़ने की कोशिश में लगा है.

पौड़ी गढ़वाल में एक छोटा सा कसबा है बैजरो. पहाड़ों के बीच और एक छोटी नदी के दोनों किनारों पर बसा सुंदर सा कसबा. उसी कसबे के थे भुवन रावत और उन की पत्नी थी उर्मिला रावत. अब भुवन रावत चंडीगढ़ में अपने परिवार के साथ रहते थे.

चंडीगढ़ में रहते उन्हें लगभग 10 साल हो गए थे. वहां एक जानीमानी कंपनी में वे जूनियर इंजीनियर थे. उन की पत्नी उर्मिला ने भी एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी करनी शुरू कर दी थी. वह जूनियर स्कूल के बच्चों को पढ़ाती थी. दोनों पतिपपत्नी अभी 38 और 35 साल के थे और उन के 3 बच्चे थे.

भुवन रावत का परिवार साल में 1-2 बार बैजरो हो आता था, जहां भुवन के बुजुर्ग मातापिता और सगेसंबंधी रहते थे.

चंडीगढ़ में भुवन रावत का परिवार आराम से किराए के फ्लैट में रह रहा था. उन की जिंदगी में कोई खास परेशानी नहीं थी. वर हर महीने अपने बुजुर्ग मातापिता को खर्चा भी भेज देते थे, लेकिन मुसीबतें कभी भी बता कर नहीं आतीं.

ऐसे ही दबे पांव कोरोना आया. बड़ेबड़े ज्योतिष, भविष्यवक्ता और वैज्ञानिक भी इस के बारे में सटीक भविष्यवाणी और आकलन न कर सके. भ्रामक जानकारियां आती रहीं और कोरोना किसी भयंकर आदमखोर की तरह इनसानों को निगलने लगा. लकड़बग्घों के मजबूत जबड़ों की तरह नौकरियों और कामधंधों को चबाने लगा. सब तरफ आफत की मार.

आखिरकार एक दिन भुवन रावत की कंपनी वालों ने भी उन से इस्तीफा लिखवा लिया. उर्मिला को तो स्कूल वालों ने बिना किसी औपचारिकता के ही घर बैठा दिया.

देशदुनिया में कहीं भी कुछ हो सब से पहले गाज स्कूलों पर ही गिरती है. स्कूल बंद, स्कूल बंद और स्कूल बंद. शिक्षा को सरकारों ने तमाशा बना कर रख दिया है.

भुवन और उर्मिला की नौकरी गई तो फ्लैट का किराया भरना भी मुश्किल लगने लगा. जमापूंजी तिनकों की तरह उड़ने लगी. लोकडाउन की अनिश्चितता ने भुवन जैसे लोगों को कहीं का नहीं छोड़ा.

भुवन ने कुछ कंपनियों में अपना बायोडाटा भेजा था, लेकिन उन्हें जल्दी ही मालूम हो गया कि कहीं से कोई जवाब आने वाला नहीं.

कंपनियां धड़ाधड़ कर्मचारियों की छंटनी कर रही थीं. बचेखुचे कर्मचारियों से कमरतोड़ ‘वर्क फ्रोम होम’ करवाया जा रहा था. फिर ऐसे समय में उन्हें कौन नौकरी देता?

आखिरकार भुवन ने भी परिवार सहित अपना बोरिया बिस्तर बांधा और मौका देख कर बैजरो जाने की राह पकड़ी. जैसेतैसे वे सब बैजरो पहुंचे, लेकिन इस बार वहां आने में बड़ा फर्क था. जब आप के पास नौकरी होती है तो आप का रुतबा और सम्मान होता है, समाज आप पर गर्व करता है, लेकिन जैसे ही आप की नौकरी जाती है, समाज की नजर भी बदल जाती है. आप दीनहीन से हो जाते हैं.

यही भुवन के साथ हुआ. हर कोई उन से नौकरी खोने के बारे में पूछता और फिर पीठ पीछे उन का मजाक उड़ाया जाता, लेकिन भुवन को तो सब से अधिक चिंता रोजीरोटी के जुगाड़ की थी. पेट भरा हो तो फिर आदमी कुछ और सोच सकता है.

पहाड़ की खेती अब भुवन के बस की बात नहीं थी. कई सालों से उन के खेत बंजर पड़े थे. उन को खेती लायक बनाने में ही बड़ी लागत आने वाली थी. फिर बीज, खाद आदि का खर्चा और उस के बाद बारिश होने का इंतजार. पहाड़ों में सिंचाई के लिए नलकूप तो होते नहीं कि स्विच औन किया और सिंचाई शुरू. वहां की खेती तो आज भी बारिश भरोसे ही है. बारिश न हो तो फसल ही सूख जाए. बारिश समय पर हो जाए तो फसल आने का लंबा इंतजार.

भुवन ने रोजीरोटी कमाने के दूसरे औप्शन भी सोचे, लेकिन उन्हें कुछ भी सही नहीं लगा. तनाव और चिंता की लकीरें उन के चेहरे पर साफ नजर आ रहीं थीं. तब एक रात सोते समय उन की पत्नी उर्मिला ने उन से पूछा, ‘‘क्यों जी, आप इतने परेशान क्यों हैं?’’

‘‘उर्मिला, परेशान न होऊं तो क्या होऊं? अब पैसा ही नहीं बचा. सब तो लोकडाउन में चंडीगढ़ में ही स्वाह हो गया. यह भी भरोसा नहीं कि यह लोकडाउन कब खत्म होगा? हम चंडीगढ़ पहले ही छोड़ देते तो अच्छा होता. कुछ पैसे तो हमारे हाथ में होते.’’

‘‘लेकिन इस में आप की क्या गलती? किसे पता था कि लोकडाउन खत्म ही नहीं होगा. रेलों तक का तो चक्का जाम हो गया.’’

‘‘हां, वह तो है उर्मिला. गलती तो किसी की नहीं. सरकार भी उलझन में है कि लोकडाउन खत्म करे कि नहीं. जो भी हो खानेकमाने के लिए कुछ तो करना ही पड़ेगा. मैं तो चाय की दुकान ही खोल लेता लेकिन यहां तो पर्यटक ही नहीं आते. गिनेचुने औफिस हैं, वे भी बंद ही चल रहे हैं.’’

उर्मिला जानती थी कि समस्या अनिश्चित और विकराल है और भुवन परेशान हैं. उस ने भुवन को अपने आगोश में लेते हुए और उस के होंठों को चूमते हुए कहा, ‘‘तुम ज्यादा चिंता मत करो जी, सब ठीक हो जाएगा.’’

इस के बाद दोनों प्यार की दुनिया में समा गए. उर्मिला जानती थी कि दुख को हरने की सब से अच्छी दवा सैक्स ही है. इस के बाद भुवन तो गहरी नींद सो गया लेकिन उर्मिला परिवार को संबल देने के बारे में सोचने लगी और उसे तब तक नींद नहीं आई जब तक कि वह एक फैसले पर नहीं पहुंच गई.

सुबह को उठ कर उर्मिला ने अपने मायके थैलीसैंण फोन लगाया और अपने पिता से पूछा, ‘‘बाबूजी, आप की दूध, दही और पनीर की दुकान है. कुछ टिप्स बताओ, हम भी लोकडाउन खत्म होने तक यही काम करने की सोच रहे हैं.’’

फिर उर्मिला के पिता ने उसे सारी बातें अच्छे से समझा दीं. उर्मिला ने अपनी योजना भुवन से सांझा की. वे खुश हो कर बोले, ‘‘अरे वाह उर्मिला, यह काम तो बहुत सही रहेगा. इस में ज्यादा पैसा भी नहीं लगाना पड़ेगा और अलग से दुकान भी नहीं खोलनी पड़ेगी. बाहर वाले कमरे में जो गली की ओर खुलता है, वहीं से यह काम शुरू किया जा सकता है.’’

‘‘हां, लेकिन आप को एक काम करना होगा.’’ ‘‘वह क्या? बोलो?’’ ‘‘तुम को किसी दूध वाले को तलाशना होगा जो सही दाम में दूध दे दे और पैसों के लिए एकदम से तकादा न करे.’’

‘‘तुम इस की चिंता मत करो उर्मिला. मैं 2-3 ऐसे दूध वालों को जानता हूं जो सही रेट में अच्छा दूध दे देंगे और पैसों के लिए एकदम से तकादा भी नहीं करेंगे.’’

भुवन का बचपन का दोस्त था भोला जो अब दूध का काम करता था. भुवन की बात सुन कर उस ने कहा, ‘‘भुवन यार, तू चिंता मत कर. तू तो अपने बचपन का साथी है. मैं तुझे दूध भी अच्छा ला कर दूंगा और अपनी जानपहचान वालों को बता कर तेरा दही और पनीर का काम भी चलवा दूंगा. हिसाबकिताब तू सप्ताह भर बाद कर दिया करना. हमारी बचपन की दोस्ती किस दिन काम आएगी…’’

अगले दिन से ही भोला ने भुवन के घर दूध देना शुरू कर दिया. उर्मिला उस दूध से दही जमाती और पनीर तैयार करती. क्वालिटी का पूरा ध्यान रखती. धीरेधीरे यह काम चल निकला. कौन सा घर था जहां दही और पनीर की जरूरत नहीं थी… यह काम चूंकि घर और गली में हो रहा था, तो पुलिस की नजर भी नहीं पड़ती थी.

धीरेधीरे भुवन पहाड़ी रास्तों से आसपास के गांवों में दूधपनीर की सप्लाई का काम करने लगे. आसपास के गांव से वे और्डर ले आते, फिर उसी हिसाब से दूधपनीर तैयार किया जाता. इस से भोला को भी अच्छा मुनाफा होने लगा.

जब से भुवन दहीपनीर के सप्लाई के काम में बिजी हो गए थे, तब से हिसाबकिताब का जिम्मा उर्मिला ने संभाल लिया था. इस से भोला और उर्मिला सीधे एकदूसरे के संपर्क में आ गए थे. कब दोनों की आंखें चार हुईं कुछ पता ही नहीं चला.

भुवन को इस का अहसास तो हुआ लेकिन उन्होंने इसे अपना केवल वहम समझ  कर टाल दिया. उन्होंने खुद को आधुनिक और शिक्षित आदमी मान कर शक करने को केवल गंवारपन समझा. उन्होंने सोचा कि उर्मिला दहीपनीर का यह काम करेगी तो भोला से दूध लेने, दूध का और्डर देने और हिसाबकिताब करने के लिए उस से बोलना तो पड़ेगा ही.

लेकिन भुवन यह भूल गए कि आग और घी को पास पास रखेंगे तो आग एक न एक दिन तो भड़केगी ही. उर्मिला में अभी जवानी की लहर थी. उन्माद का उछाल था. भोला उर्मिला को ‘भाभी’ कहता था और वह उसे ‘देवरजी’ कह कर पुकारती थी, इसलिए देवरभाभी की ठिठोली को मंजूरी भी मिल जाती थी.

हलकीफुलकी मजाकमस्ती तो भुवन के सामने भी हो जाती थी और उस समय भुवन कुढ़ कर रह जाता था, लेकिन भोला और उर्मिला के बीच जो चल रहा था उसे तो बस उन दोनों के दिल ही जानते थे.

फिर एक दिन… भुवन किसी काम से रामनगर गए हुए थे. रामनगर जाने का सीधा सा मतलब ही यह था कि बिलकुल सुबह निकलना और फिर देर शाम या अगले दिन वापस आना.

भोला जब दूध देने आया तो उसे भुवन दिखाई नहीं दिया. ‘‘भाभी, आज भुवन कहीं नहीं दिखाई दे रहा.’’ ‘‘वे रामनगर गए हैं देवरजी.’’ ‘‘बच्चे भी दिखाई नहीं दे रहे.’’ ‘‘अरे देवरजी, कल थैलीसैंण से उन का मामा आया था. बच्चे नानी के घर जाने की जिद करने लगे तो उन का मामा उन्हें कुछ दिन के लिए अपने साथ ले गया.’’

शिकारी का मुआयना पूरा हो चुका था. भोला ने कहा, ‘‘तो फिर अकेली हो?’’ ‘‘अकेली कहां हूं देवरजी, तुम हो तो,’’ उर्मिला ने मुसकराते हुए मस्ती भरी हुई आंखों से कहा.

भोला एकदम से कुछ नहीं कह सका. उस ने मुसकरा कर एक नजर उर्मिला पर डाली, फिर नजरें झुका लीं. उर्मिला समझ गई कि भोला कहने में हिचकिचा रहा है. तब वह बोली, ‘‘देवरजी, उन से कोई काम था क्या?’’

भोला ने बहाना बनाते हुए कहा, ‘‘हां भाभी, आज कुछ पैसों की जरूरत थी.’’ ‘‘तो खुल कर कहो न कि कुछ पैसे चाहिए. इतना हिचकिचा क्यों रहे हो, पैसे ही तो मांग रहे हो कुछ और थोड़े ही मांग रहे हो.’’

‘‘हां भाभी, मिल जाती… मतलब पैसे मिल जाते तो…’’ उर्मिला यह सुन कर मुसकरा पड़ी और भोला की चाहत को समझ  गई. उस ने कहा, ‘‘आओ देवरजी, पैसे ले लो.’’ ‘‘कहां?’’ भोला ने पूछा.

‘‘अरे देवरजी, पैसे यहां खुले में थोड़े ही रखें हैं. वे तो अंदर कोठरी में हैं. लेने हैं तो आ जाओ,’’ उर्मिला ने कोठरी की ओर जाते हुए कहा.

भोला उर्मिला के पीछेपीछे कोठरी में पहुंच गया. कोठरी में अंधेरा था. उर्मिला ने उस के ठीक सामने खड़े हो कर नशीले अंदाज में पूछा, ‘‘कितने चाहिए, देवरजी?’’ ‘‘जितने तुम दे सको,’’ भोला ने मस्ती के मूड में कहा.

‘‘फिर चाबी से ताला खोलो और गिनगिन कर ले लो,’’ उर्मिला ने अपना सिर भोला की छाती पर रखते हुए कहा.

भुवन को जल्दी ही पता चल गया कि उन के घर में बहुतकुछ पक रहा है. भोला और उर्मिला सभी सीमाएं लांघ चुके हैं. भुवन को एक बार को इस बात का पछतावा हुआ कि उन्होंने समय पर दखलअंदाजी न कर के बड़ी गलती कर दी, लेकिन उन्होंने बेवफाई की आग में जलने से बेहतर दूसरा रास्ता अपनाया. जो बेवफाई और धोखे का दर्द उन्हें मिला है, वैसा ही दर्द और धोखे का मजा वे उन्हें भी चखाना चाहते थे. लेकिन कैसे?

भुवन जानते थे कि भोला की शादी माला से हुई है और माला तो उन की बचपन की साथी थी. वह मासों गांव की रहने वाली थी और मासों भुवन का ननिहाल था. वहां उन्होंने बचपन के बहुत दिन गुजारे थे. बचपन में वे माला के साथ खूब खेलेकूदे थे. वे बचपन के अपने प्यार को अभी तक नहीं भूले थे और बचपन का वह प्यार अचानक से हिलोरें मारने लगा था.

बिना देरी किए भुवन ने कुछ ही दिनों में भोला के घर तक पहुंच बना ली. एक दिन जब भोला दूध बांटने के लिए निकला हुआ था तो भुवन किसी बहाने से उस के घर पहुंच गए. आज माला से उन की अकेले में शादी के बाद पहली मुलाकात थी. माला ने उन की खूब आवभगत की और उसे बिना चाय पिलाए न जाने दिया.

इस मुलाकात से भुवन समझ  गए कि माला के अंदर बचपन के प्रेम की पुरानी आग फिर सुलग उठी है. वर इस मौके को अब कैसे हाथ से जाने दें? उन्होंने सुलगती आग को भड़काने के लिए खूब हवा दी. उन की उम्मीद से पहले ही आग धधक उठी. कहते हैं कि औरत प्रेम में अंधी और आदमी पागल हो जाता है. भोला उर्मिला के प्यार में इतना बावला हो गया था कि उसे यही पता नहीं चला कि उस के घर में भुवन ने सेंधमारी कर दी है.

तब एक दिन भोला के घर में, ‘‘भुवन, तुम तो मुझे  बचपन में ही छोड़ कर चले गए थे. कभी तो मुझे  याद कर लेते.’’

‘‘माला, ऐसी बात नहीं है. बस हालात ही कुछ ऐसे बन गए थे. मैं तो हमेशा तुम्हारी यादों में तड़पता रहा. कहो तो दिल चीर कर दिखाऊं,’’ भुवन ने शातिराना पासा फेंका.

‘‘झूठे कहीं के,’’ माला ने भुवन के गाल पर चिकोटी काटते हुए कहा. फिर वह ऐसे ही खिलखिला कर हंसी जैसे ऐसी शरारत पर वह बचपन में हंसा करती थी. ‘‘झूठा मत कहो, माला, नहीं तो सच का ठप्पा ही लगा दूंगा.’’

‘‘ओहो, खुद को बड़े बहादुर बनते हो. जरा हिम्मत है तो लगा कर दिखाओ अपना सच का ठप्पा,’’ भुवन को उकसाते और मुसकराते हुए माला ने कहा.

इतना कह कर माला अपना दुपट्टा उतार कर नशीली आंखों से मुसकराते और भुवन को ललचाते हुए पलंग पर हाथ टिका कर और पैर लटका कर बैठ गई.

फिर बिना किसी देरी के भुवन ने माला के पूरे बदन को अपने प्रेम की सच्चाई के ठप्पे से तरबतर कर दिया.

जैसे कि हर मजे में सजा छिपी होती है, भुवन और भोला के संबंधों में जबरदस्त खटास पैदा हो गई. इस के बाद भी वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे थे. न ही उर्मिला भोला को छोड़ने को तैयार थी और न ही माला भुवन को.

इश्क चीज ही ऐसी होती है जिस का जितना विरोध किया जाए वह उतना ही भड़कता है. इस के सामने बड़ेबड़े परिवार तबाह हो गए, लेकिन इश्क न झुका. तूफान आता है तबाही लाता है, मगर इश्क खुद तबाही को न्योता देता है.

मामला पंचायत तक पहुंचा तो इश्क और मचला, और वफादार हुआ, और मजबूत हुआ, और बेशर्म हुआ. उर्मिला ने भोला के साथ रहने की कसम खाई तो माला किसी भी सूरत में भुवन का साथ छोड़ने को तैयार नहीं. बच्चों की उम्र देखते हुए पंचायत ने उन्हें मांओं के सुपुर्द किया. बच्चे भी ऐसा ही चाहते थे. बिना कोर्टकचहरी के सारे फैसले हो गए, लेकिन भविष्य में कोई कानूनी अड़चन न आए, इसलिए वकील कर के इन संबंधों को कानूनी मंजूरी दिलाई गई.

कुछ ही दिनों के बाद लोकडाउन हटा तो दुनिया बदल चुकी थी. भोला के साथ उर्मिला तो भुवन के साथ माला थी. भुवन को फिर से उसी कंपनी में नौकरी मिल गई. भुवन माला और उस के बच्चों को ले कर चंडीगढ़ के लिए बस में सवार हो गया.

उन को ले कर लोग आज भी चर्चा करते हैं कि लोकडाउन ने सच मैं दुनिया बदल दी. आदमी सोचता कुछ है और होता कुछ है तो क्या आदमी सच में हालात का गुलाम है?

Romantic story in Hindi : नहले पर दहला

Romantic story in Hindi. बड़े शहरों में ऐसा बहुत कम होता है कि कोई आसपास रह रहे लोगों पर अपनी निगाहें जमाए रखे और कोई क्या कर रहा है, कहां जा रहा है, किस से मिल रहा है, यह सब एक खुफिया जासूस की तरह अपनी पैनी नजरों से देखता रहे.

21वीं सदी की ऐसी दौड़धूप से भरी जिंदगी में भला किसे ऐसा वक्त मिलता होगा? फिर ऐसी हरकत करने से कोई फायदा भी तो नहीं है. ख्वाहमख्वाह समय की बरबादी और दिमाग को परेशान करना. बड़े शहरों के बुद्धिमान लोग ऐसा कभी नहीं करेंगे, लेकिन वहां सभी बुद्धिमान ही रहते हों, ऐसा तो कभी नहीं होगा. वहां कुछ अक्ल के कच्चे और सनकी लोग आज भी मौजूद हैं.

इस कहानी का हीरो भी कुछ ऐसी ही सनक से भरा हुआ था. उस का बिहारी दास नाम था. फिर उसे काम भी अपनी पसंद का ही मिला था. उसे एक कुरियर कंपनी में डिलीवरी बौय की नौकरी मिल गई थी, जिस वजह से उसे इधरउधर भटकने का मौका मिलता था. यह काम वह बड़े जोश से करता था. फिर रोजाना 100-150 लिफाफे 2-3 घंटे में ही उन के पते पर पहुंचा कर वह अपना काम पूरा कर डालता था. इस के बाद सारा दिन उसे कुछ नहीं करना होता था.

तब वह भला क्या करता? बारीबारी से एक पान की दुकान और ट्रैवल एजेंसी की दुकान पर बैठ कर अपना टाइमपास करता रहता था. उस का घर दसमंजिला बिल्डिंग के एक फ्लैट में तीसरी मंजिल पर था. उस बिल्डिंग में रह रहे सभी लोगों को वह करीबकरीब जानता था. हां, यह बात अलग थी कि सभी से वह गहरी पहचान नहीं बना पाया था.

उसी बिल्डिंग में एक अधेड़ उम्र के शख्स तिवारीजी रहते थे, जो किसी बैंक में काम करते थे और अकेले रहते थे. बिहारी दास ने अपनी कुछ घंटों की मुलाकात में यह जान लिया था कि उन की पत्नी की उन से बनती नहीं थी और दोनों अलग रह रहे थे.

वैसे तो वे अकेले ही रहते थे, मगर उन के घर पर एक खूबसूरत लड़की को बिहारी दास ने कई बार आतेजाते देखा था. फिर जब उन से पूछा गया कि वह कौन है, तब उन्होंने कुछ अनमने भाव से कह दिया था कि वह उन की भतीजी है.

मगर, बिहारी दास की पैनी नजर ने उन के झूठ को पहचान लिया था. बाद में तिवारीजी ने बिहारी दास से बात करना छोड़ दिया था, लेकिन बिहारी दास ने ठान लिया था कि वह तिवारीजी का भांड़ा जरूर फोड़ कर रहेगा.

जैसा कि बड़े शहरों में होना लाजिमी है, बिहारी दास की बिल्डिंग में हलकेफुलके गैरकानूनी काम भी होते थे, जिन के बारे में उसे सब पता था. 10वीं मंजिल पर एक मसाज पार्लर चल रहा था, जहां लड़केलड़कियों की भीड़ लगी रहती थी. वहां मसाज के बहाने कुछ और ही चल रहा था.

हालांकि कुछ महीने पहले बिहारी दास ने फोन कर के वहां पुलिस भी बुला ली थी, जिस ने अचानक छापा मार कर मसाज पार्लर के मालिक सज्जन सिंह के साथ पैसों का गुपचुप लेनदेन किया और वहां से चल दी थी.

सज्जन सिंह को कतई पता नहीं चला कि आखिर पुलिस को सूचना किस ने दी थी. बिहारी दास मन ही मन खुश हो रहा था.

जैसा कि बिहारी दास का स्वभाव था, वह हमेशा ध्यान रखता कि बिल्डिंग के फ्लैट में कौन आजा रहा है, कौन सा फ्लैट खाली हुआ और किस ने खरीदा या कौन नया किराएदार आया है या आई है और किराएदार क्या करते हैं. यह सब वह अपनेआप चालाकी से जान लेता था.

अपनी इस हरकत के चलते बिहारी दास अकसर घर से बाहर रहता था और किसी अमीर कारोबारी की तरह देरी से घर लौटता था.

बिहारी दास की पत्नी राधिका ने उस से एतराज भी जताया था, ‘‘आखिर क्या करते रहते हो सारा दिन? रात को जल्दी क्यों नहीं लौटते?’’

‘‘शहर में अगर टिकना हो तो हमेशा चौकन्ना रहना पड़ता है,’’ बिहारी दास फख्र से बताता था.

बिहारी दास की पत्नी राधिका खूबसूरत थी, मगर उसे शायद इस का एहसास न था. उस की नजर हमेशा बाहर आजा रही लड़कियों पर टिकी रहती. कई बार तो सड़क के किनारे चलतेचलते अपने मोबाइल फोन पर बात कर रही किसी लड़की की बातों को वह पास से गुजरते हुए सुनने की कोशिश करता. वह प्यार से बात कर रही है या नाराज हो कर, यह पकड़ने की कोशिश करता.

कई बार तो बिहारी दास लड़की से कुछ ही दूरी पर खड़ा रह जाता और जब तक वह बातें पूरी न कर लेती, वह वहीं खड़ा रहता. फिर अगर लड़की गुस्से में अपना मोबाइल फोन बंद कर लेती तो वह मन ही मन हंस पड़ता, ‘बेचारी… अपने यार से खफा है.’

तिवारीजी पर अब बिहारी दास अपनी पैनी आंखें गड़ाए हुए था. बिल्डिंग में जैसे ही वह उस लड़की को देखता, उस के पीछे चल देता और देखता कि वह तिवारीजी के घर ही गई है या नहीं. फिर वह बिल्डिंग के सामने पान की दुकान पर बैठ कर उस लड़की के बाहर निकलने का इंतजार करता रहता. जब वह चली जाती, तब वह तिवारीजी के घर किसी बहाने पहुंच जाता.

‘‘आप के पास क्या 2,000 रुपए के खुले हैं?’’

जब तिवारीजी उसे खुले पैसे दे देते, तो वह बातचीत शुरू कर देता था.

‘‘वह मिस जो आप के यहां आई थी, उस की स्कूटी स्टार्ट नहीं हो रही थी. तुरंत सुखबीर गैराज वाले को बुला लिया और उस ने ठीक करा दी. क्या वह बहुत दूर रहती है?’’

‘‘हां, रहती तो दूर है, मगर शहर में दूर क्या और नजदीक क्या? स्कूटी तो हर किसी के लिए जरूरी है,’’ तिवारीजी ने कुछ नाराजगी से बोला. इस पर बिहारी दास खिसिया कर रह गया.

एक दिन शाम को दीपक की पान की दुकान पर बैठे बिहारी दास ने उसी लड़की को किसी लड़के के साथ बिल्डिंग से निकलते हुए देखा.

‘‘अरे, इस के साथ यह लड़का कौन हैं…’’ बिहारी दास के मुंह से अचानक ही यह सवाल निकल पड़ा.

‘‘ये तो रोज ही साथसाथ निकलते हैं…’’ पान वाले दीपक ने उन की ओर देखते हुए कहा, ‘‘मैं इन्हें हरदम इसी वक्त देखता हूं.’’

‘‘यह तो तिवारीजी की भतीजी है,’’ बिहारी दास ने उन्हीं दोनों पर नजर जमाए हुए शक जाहिर किया, ‘‘कहीं तिवारीजी कोई खेल तो नहीं खेल रहे?’’

बिहारी दास ने मन में ठान लिया कि वह तिवारीजी की भतीजी की सचाई का पता लगा कर ही रहेगा.

‘‘देख दीपक…’’ बिहारी दास ने गंभीरता से कहा, ‘‘आइंदा तू जब भी इन दोनों को यहां आते या निकलते देखे, तो फौरन मुझे बता देना. मेरा फोन नंबर है न तेरे पास?’’

दीपक ने सहयोग देने के लिए हामी भरी.

अगले ही दिन रात को अपने दोस्तों के साथ जब बिहारी दास एक रैस्टोरैंट में खाना खा रहा था कि तभी दीपक का फोन आ गया.

‘दासजी, जल्दी आइए. वह लड़की किसी के साथ अभीअभी बिल्डिंग के अंदर गई है.’

चूंकि बिहारी दास खाना अधूरा छोड़ कर नहीं निकल सकता था, इसलिए उसे अपने घर वापस आतेआते एकाध घंटा बीत गया. वह जल्दी ही लिफ्ट से सीधा 5वीं मंजिल पहुंच गया, जहां तिवारीजी का फ्लैट था. वह किसी बहाने तिवारीजी के फ्लैट में घुस कर उस की भतीजी और उस लड़के को रंगे हाथ पकड़ना चाहता था.

बिहारी दास जल्दीजल्दी फर्लांग भरते हुए फ्लैट के दरवाजे पर पहुंचा और उस ने सीधे ही डोरबैल बजाई.

कुछ देर बाद दरवाजा खुला और वह लड़की, जिसे तिवारीजी अपनी भतीजी कह रहे थे, बिहारी दास के सामने खड़ी थी.

‘‘जी, आप को किस से मिलना है?’’

बिहारी दास को देख कर वह लड़की हैरान थी.

‘‘जी, मैं… तिवारीजी का पड़ोसी हूं. उन से मिलना था,’’ बिहारी दास कुछ सहम कर बोला, फिर उस ने अंदर झांक कर देख लिया. वह लड़का सोफे पर लेटे हुए टीवी देख रहा था.

‘‘आप… आप दास बाबू तो नहीं?’’ वह लड़की घूर कर बिहारी दास के चेहरे को देख रही थी, ‘‘तिवारी अंकल आप का जिक्र करते रहते हैं. आप तीसरी मंजिल पर रहते हैं न?’’

‘‘जी, बिलकुल,’’ बिहारी दास को एक झटका सा लगा, ‘क्या तिवारी ने इसे सबकुछ बता दिया है?’ वह सोचने लगा.

‘‘आप की बीवी का नाम राधिका है न?’’ कह कर वह लड़की मुसकरा दी, ‘‘अंकल आप के यहां ही गए हैं. कहते हैं, राधिका चाय अच्छी बनाती हैं. मैं पी कर आता हूं.

‘‘मैं रोजाना शाम को उन के लिए खाना बनाने अपने मंगेतर के साथ आती हूं. वे अभी आप ही के यहां गए होंगे. आप अंदर आइए न,’’ वह लड़की बड़ी मीठी आवाज में बोल कर उसे अंदर आने की गुजारिश करने लगी.

लेकिन, बिहारी दास को बिजली सा झटका लगा, ‘तिवारीजी और मेरे घर… वह भी मेरी गैरहाजिरी में…’

एक ही पल में बिहारी दास पर मानो पहाड़ सा टूट पड़ा. वह उलटे पैर वहां से निकल कर सीधा लिफ्ट से उतर कर अपने फ्लैट की तरफ दौड़ा. उस के दिमाग को अनेकानेक शक ने घेर लिया. उसे लगा कि अपना खेल खत्म होने जा रहा है. उस का पड़ोसी तिवारी उस से कहीं गुना ज्यादा चालाक निकला.

वह हरगिज भरोसे के लायक शख्स नहीं था, फिर बिहारी दास की बीवी राधिका तो बेचारी भोली थी. कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गई.

बिहारी दास के पैर रास्ते में ही भारीपन महसूस करने लगे. अब वह धीरेधीरे सहम कर अपने फ्लैट के दरवाजे तक पहुंचा ही था कि तुरंत दरवाजा खुला और तिवारीजी हंसते हुए बाहर निकले.

‘‘अरे, दासजी आप… आप तो हमेशा रात को देरी से लौटते हैं. आज जल्दी लौट आए,’’ फिर तीर सा पैना व्यंग्य कसते हुए तिवारीजी बोले, ‘‘राधिका भाभीजी चाय बढि़या बनाती हैं. अब तो हमें उस की आदत सी हो गई है.’’

तिवारीजी चल पड़े, मगर बिहारी दास को लगा मानो उस के पैर तले जमीन सरकने लगी थी. अपने घर में घुसते ही वह बैठक में रखे सोफे पर ढेर हो गया.

लेखक- रामचरन हर्षाना

Family Story : समय के साथ

Family Story : रामलाल की सचिवालय में चपरासी की ड्यूटी थी. वह अपने परिवार के साथ मंत्रीजी के बंगले पर ही रहता था. जब वह सरकारी नौकरी में लगा था, तब गांव में उस की 2 बीघा जमीन थी और एक छोटा सा टूटाफूटा घर था, मगर आज 50 बीघा जमीन और 2-2 आलीशान मकान हैं. तीजत्योहार के अलावा शादीब्याह में जब रामलाल अपनी शानदार कार से बीवीबच्चों के साथ गांव में आता है, तब उसे देख कर कोई यह कह नहीं सकता कि वह चपरासी है. उस के बीवीबच्चों के कीमती कपड़ों को देख कर लोग यही समझते हैं कि वे सब किसी बड़े सरकारी अफसर के परिवार वाले हैं.

एक बार रामलाल गांव में अपने फार्महाउस पर था, तभी वहां पर किसी गांव के बड़े सरकारी स्कूल में चपरासी की नौकरी करने वाला उस के गांव का भोलाराम आया.

भोलाराम बोला, ‘‘रामलालजी, हम लोग एक ही समय पर सरकारी नौकरी में लगे थे, मगर तुम आज कहां से कहां पहुंच गए और मैं गरीब चपरासी ही रह गया हूं. तुम्हारी इस तरक्की के बारे में मुझे भी कुछ बताओ भाई.’’

‘‘मेरी तरक्की का राज यही है कि मैं सचिवालय में नौकरी करते हुए समय के साथ चलने लगा था और तुम गांव में ही रह कर अपनी पुरानी दकियानूसी बातों के कारण यह फटेहाल जिंदगी बिता रहे हो…

‘‘मैं ने अपनी दोनों बेटियों को शहर में खूब पढ़ायालिखाया और तुम ने अपनी बेटियों को घर में ही बिठा रखा है. अगर वे शहर में पढ़तीं, तो आज अच्छी नौकरियां कर रही होतीं. मेरी एक बेटी अब तहसीलदार होने वाली है और दूसरी बेटी कलक्टर,’’ रामलाल ने उसे अपनी तरक्की का राज बताया, तो भोलाराम उस से बोला, ‘‘तो मुझे भी अब अपनी दोनों बेटियों के लिए क्या करना चाहिए ’’

‘‘तुम अपनी दोनों बेटियों को हमारे साथ शहर भेज दो. मेरी दोनों बेटियां उन्हें कुछ ऐसा सिखा देंगी कि उन की और तुम्हारी जिंदगी बन जाएगी. कुछ ही दिनों में वे उन्हें ऐसा बदल देंगी कि उन्हें देख कर तुम यह कह ही नहीं पाओगे कि वे दोनों तुम्हारी ही बेटियां हैं…’’

रामलाल की इन बातों को सुन कर भोलाराम ने अपनी दोनों बेटियों को उन के साथ भेजने की हां कर दी.

भोलाराम ने अपने घर जा कर ये सभी बातें अपनी बीवी सावित्री को बताईं, तो वह उस से बोली, ‘‘शहर में जा कर हमारी दोनों बेटियां कहीं शहर की लड़कियों की तरह मौजमस्ती करने न लग जाएं ’’

‘‘मौजमस्ती तो हमारी ये दोनों बेटियां अपने गांव में रहते हुए भी कर रही हैं. कहने को उन की उम्र 16 और 18 साल है, लेकिन अभी से उन में आवारा लड़कों के साथ मजे लेने की आदत पड़ चुकी है.’’

सावित्री बोली, ‘‘तुम अपनी बेटियों के बारे में यह सब क्यों कह रहे हो ’’

‘‘कुछ दिन पहले जब मैं दोपहर में अपने खेतों पर गया था, तब बाजरे के खेतों में हमारी ये दोनों बेटियां उषा और शर्मिला बिलकुल नंगधड़ंग हो कर गांव के 2 लड़कों के साथ वही सब कर रही थीं, जो पति अपनी पत्नी के साथ करता है. मैं ने ये सब बातें तुम्हें इसलिए नहीं बताईं कि सुन कर तुम्हें दुख होगा.’’

सावित्री यह सुन कर दंग रह गई.

भोलाराम उस से बोला, ‘‘हमारी दोनों बेटियों को लड़कों के साथ सोने का चसका लग गया है. अगर वे किसी के साथ घर से भाग गईं, तो इस से हमारी गांव में इतनी बदनामी होगी कि हम लोग किसी को मुंह दिखाने नहीं रहेंगे, इसलिए उन्हें रामलाल के साथ शहर भेज देते हैं.’’

सावित्री बोली, ‘‘लेकिन, रामलाल के बारे में हमारी पड़ोसन माला कह रही थी कि वह अपनी लड़कियों को मंत्रीअफसरों के अलावा ठेकेदारों के साथ सुलाता है, तभी तो आज वह उन की कमाई से इतना पैसे वाला बना है. जब उस की दोनों बेटियां छोटी थीं, तब वह अपनी बीवी रीना को उन के साथ सुलाता था.’’

‘‘अपनी बीवी और बेटियों को पराए मर्दों के साथ सुला कर रामलाल ने आज अपनी हैसियत बना ली है. वे सभी लोग आज ऐशोआराम की जिंदगी जी रहे हैं और हम लोग अपनी दकियानूसी बातों के चलते गांव में ऐसी फटेहाल जिंदगी बिता रहे हैं…’’ भोलाराम थोड़ा रुक कर बोला, ‘‘हमें भी अब रामलाल की तरह समय के साथ चलना चाहिए. हमारी दोनों बेटियां गांव के लड़कों को मुफ्त में ही अपनी जवानी के मजे दे रही हैं.

‘‘अगर ये दोनों शहर में मंत्रीअफसरों व ठेकेदारों को मजे देंगी, तो हम लोग भी रामलाल की तरह पैसे वाले हो जाएंगे और फिर उन दोनों की अच्छे घरों में शादियां कर देंगे. आजकल लोग आदमी का किरदार नहीं, बल्कि उस की हैसियत देखते हैं.’’

सावित्री ने अपनी दोनों बेटियों को रामलाल के साथ शहर भेजने का मन बना लिया.

शहर भेजने की ये बातें जब उन की दोनों बेटियों ने सुनी, तो वे खुशी से झूम उठीं.

सावित्री ने उन दोनों को खुल कर कह दिया, ‘‘यहां पर तुम दोनों बहनें बाजरे के खेतों में चोरीछिपे लड़कों के साथ सोती हो, लेकिन शहर में पैसे कमाओगी. लेकिन जरूरी उपाय करना मत भूलना.’’

दोनों बहनें मन ही मन सोच रही थीं कि बाजरे के खेत में तो किसी के आने के डर से वे पूरे मजे नहीं ले पाती थीं. उन्हें हमेशा यह डर लगा रहता था कि कभी कोई वहां पर आ कर उन्हें देख न ले. शहर में तो एसी लगे कमरे होते हैं, वहां पर किसी के आने का उन्हें डर भी नहीं रहेगा.

जब वे दोनों बहनें रामलाल और उस के परिवार के साथ उन की एसी कार में बैठीं, तो एसी की ठंडीठंडी हवा खाते हुए उन्हें कब नींद आ गई, पता नहीं लगा.

रामलाल की बेटियों में से एक ने ही उन्हें जगा कर कहा, ‘‘अब शहर आने वाला है. वहां के एक मौल से तुम्हारे लिए कुछ ढंग के कपड़े लेने हैं, जिन्हें पहन कर तुम दोनों बहनें खूबसूरत लगोगी.’’

जब वे लोग शहर पहुंचे, तो एक बड़े से मौल में उन दोनों के लिए ढंग के कपड़े खरीदे गए. वहीं पर उन के बाल सैट करा कर उन्हें वे कपड़े पहनाए गए. आईने में खुद को देख कर वे दोनों बहनें बड़ी इतरा रही थीं.

जब वे दोनों रामलाल के घर आईं, तो मंत्रीजी भी उन्हें देख कर चौंक गए. उन दोनों को नहला कर मैकअप करा कर जब रामलाल की बेटी उन्हें मंत्रीजी के कमरे में छोड़ने गई, तो मंत्रीजी भूखे भेडि़ए की तरह उन पर झपट पड़े थे.

कुछ ही देर में मंत्री के साथ भी वही हुआ, जो बाजरे के खेत में उन लड़कों से होता था. मंत्री की तो खुशी की कोई सीमा ही नहीं थी. उन्होंने कुछ दिन बाद दोनों बहनों को एक ठेकेदार से एक लाख रुपए दिलवा दिए.

अपनी दोनों बेटियों की एक लाख रुपए की कमाई देख कर भोलाराम तो खुशी से पागल ही हो गया था. भोलाराम ने भी अब समय के साथ चलना सीख लिया था, पर उसे यह नहीं मालूम था कि यह मौज कितने दिन चलेगी. जैसे ही लड़कियों में कुछ बीमारी हुई नहीं या और दूसरी जवान लड़कियां दिखी नहीं कि वे वापस गांव में नजर आएंगी.

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