‘‘अच्छा, तभी तो इतना चमकती रहती हो, एकदम चांदी की तरह… पर, मुझ से ज्यादा तो तुम्हें खतरा है… मैं ने सुना है कि अगाली तुम से शादी करना चाहता है.’’ जो चांदी अभी तक चहक रही थी, अब अचानक खामोश हो गई, फिर बोली, ‘‘हां, मुझे वह अजीब नजरों से भी घूरता है और मेरे पिताजी भी उसी की बात मानते हैं. न जाने उस ने ऐसा क्या जादू किया है पिताजी पर,’’ चांदी ने कहा. ‘‘वह कौन सा जादू है, मैं जानता हूं. दरअसल, अगाली तुम्हारे पिता को नशे का आदी बना रहा है. मैं ने खुद अपनी आंखों से तुम्हारे पिता को नशे की एक पुडि़या के लिए अगाली के सामने गिड़गिड़ाते देखा है,’’ माधव बोला. ‘‘तब तो मेरी जिंदगी तबाह होने से कोई नहीं बचा सकता, क्योंकि पिताजी को नशे की लत लगा कर अगाली मेरी शादी अपने साथ करने के लिए उन्हें राजी कर ही लेगा…’’
चांदी घबराई हुई लग रही थी, ‘‘मुझे बचा लो बाबूजी… मुझे बचा लो,’’ कह कर चांदी माधव के सीने से चिपक गई. माधव ने अपनी जिंदगी में बहुत से सांपों को पकड़ा था, पर किसी जवान लड़की के बदन को अपने हाथों में महसूस करने का यह पहला मौका था. तभी बारिश की कुछ बूंदें चांदी के खुले हुए सीने पर आ गिरीं. माधव की नजरें उस के सीने पर ही जम गईं. ‘‘क्या देख रहे हो?’’ चांदी ने पूछा. ‘‘देख रहा हूं कि तुम्हारे जिस्म पर पड़ कर यह पानी भी तुम्हारी तरह चांदी का ही हो गया है,’’ इतना कह कर माधव अपने होंठों से चांदी के सीने पर पड़ी उन बूंदों को चूमने लगा.
इस के बाद वे दोनों जवानी के जोश में सबकुछ भुला बैठे थे. इधर गांव का प्रधान बनने के बाद अगाली और भी ज्यादा तानाशाह हो गया था. उस ने चांदी के पिता को धमकी दे दी थी कि अगर आने वाले 15 दिनों में वह चांदी की शादी उस के साथ नहीं करेगा, तो वह जबरदस्ती चांदी को उठा कर ले जाएगा. इस बात से चांदी बहुत घबरा गई थी और माधव भी परेशान हो गया था.
ऐसे में एक ही रास्ता बच रहा था कि वे दोनों इस गांव से दूर भाग जाएं, पर माधव को सही समय का इंतजार था. एक दिन की बात है. चांदी ने माधव से पूछा, ‘‘क्या तुम सांप ढूंढ़ने जंगल में जा रहे हो?’’ ‘‘हां, पर क्यों…?’’ ‘‘गांव में कुछ लोग ऐसी बातें कर रहे थे कि तुम कोई ऐसी दवा बनाना जानते हो, जिस से आदमी के अंदर बहुत ताकत आ जाती है और अगाली तुम से वह दवा अपने लिए बनवा रहा है… क्या यह सच है?’’ चांदी ने पूछा. ‘‘मेरे पास उस के लिए दवा तो है, पर वह उस की ताकत नहीं बढ़ाएगी, बल्कि उस की जान ही ले लेगी,’’ माधव ने कहा. ‘‘कहां है वह दवा, जरा मैं भी तो देखूं,’’ चांदी बोली. ‘‘वह दवा तो मेरे कमरे में बैग में रखी हुई है, फिर कभी दिखाऊंगा. अभी चलो यहां से. शाम हो रही है.’’ ‘‘वह तो ठीक है, पर तुम मुझे शहर कब ले चलोगे?’’ चांदी ने पूछा.
‘‘मुझे तुम को शहर ले जाने से पहले तुम्हारे बाबूजी को भी नशे के चंगुल से निकालना होगा, नहीं तो ये कपाला और अगाली उन पर तरहतरह के जुल्म करेंगे,’’ माधव ने चांदी के हाथ को थामते हुए कहा. अभी वे दोनों रास्ते में ही थे कि सामने से कपाला और अगाली अपने गुरगों के साथ आते हुए दिखाई दिए. ‘‘अच्छा… तो यहां पर तू गांव की लड़कियों के साथ मजे ले रहा है… अब बहुत हो गया तेरा नाटक… अब या तो तू अभी यहां से भाग जा, नहीं तो पंचायत तेरा हिसाब करेगी,’’ कपाला ने कहा. ‘‘पर, मैं अभी यहां से नहीं जा सकता,’’ माधव ने कहा. ‘‘खूब समझता हूं… तुम शहरी लोग हम गांव वालों को बेवकूफ समझते हो और यहां की भोलीभाली लड़कियों को अपने जाल में फंसा कर उन्हें लूटते हो…
अब और नहीं चलेगा… इन दोनों को पकड़ कर पंचायत के सामने पेश किया जाए,’’ अगाली बोला. उन दोनों को पकड़ लिया गया और शाम को ही पंचायत बैठी. चांदी और माधव दोनों अपराधियों की तरह वहां खड़े थे. गांव के लोग हमेशा की तरह आज भी तमाशा देखने आ गए थे. इस बात से बेखबर कि जो आज इन दोनों के साथ होने वाला है, वह कल उन के साथ भी हो सकता है. ‘‘गांव वालो, इस सांप पकड़ने वाले ने गांव की लड़की के साथ गलत काम करने का अपराध किया है और चांदी ने भी इस से लगाव लगा कर के गांव की इज्जत का मजाक बनाया है, इसलिए इन दोनों को सजा दी जाएगी,’’ कपाला तांत्रिक खड़ा हो कर बोल रहा था, जबकि उस की बातें सुन कर प्रधान बना हुआ अगाली मुसकरा रहा था. ‘‘चूंकि चांदी अभी भोली है और आसानी से इस के बहकावे में आ गई है और फिर वह इसी गांव की लड़की है, इसलिए उसे सजा दी जाती है कि वह गाय के मूत्र से नहा कर अपने शरीर को पवित्र करेगी और आज रात से मेरी और प्रधान अगाली की सेवा में पूरे 21 दिन तक रहेगी, जिस से वह पवित्र हो जाएगी और उस का अपराध माफ कर दिया जाएगा. ‘‘इस के बाद उसे और उस के पिता को इसी गांव में रहने दिया जाएगा…’’
कपाला सांस लेने के लिए रुका और फिर आगे बोलना शुरू किया, ‘‘इस शहरी लड़के की सजा यह है कि इसे हर्जाने के तौर पर पंचायत को पूरे 5 लाख रुपए देने होंगे, नहीं तो इसे पशुओं का गोबर खाना होगा और मूत्र पीना होगा.’’ कपाला की बातें सुन कर माधव बुरी तरह चौंक गया, पर उस ने हिम्मत नहीं हारी और बोला, ‘‘यह सच है कि मैं ने चांदी से प्यार किया है और मैं उस से शादी भी करने को तैयार हूं, पर यह हर्जाने और गोबर खाने वाली बात तो एकदम इनसानियत के खिलाफ है और मैं इसे मानने से इनकार करता हूं.’’ ‘‘पर बबुआ, गोबर तो तुझे खाना ही पड़ेगा,’’ कहते हुए अगाली ने गोबर उठा कर माधव के मुंह में ठूंस दिया, जिस से माधव का दम घुटने लगा और उस ने गोबर अगाली के मुंह पर ही थूक दिया. यह देख कर अगाली आगबबूला हो उठा.
उस ने एक जोरदार लात माधव की दोनों टांगों के बीच मारी. गांव वाले इस सब का मजा ले रहे थे. उन्होंने माधव को मार डाला. पंचायत अपने इस फैसले पर खुश थी. अगाली चांदी को देख कर उस के साथ रात बिताने की कल्पना कर रहा था, जबकि चांदी कोने में खड़ी हुई सिसक रही थी. सब के सामने ही चांदी को पशुओं के मूत्र से नहला दिया गया. पत्थर की तरह खड़ी रही थी चांदी. वह जानती थी कि विरोध करने से उसे भी अभी यहीं पीटपीट कर मार दिया जाएगा. उसे अपने मरने का डर नहीं था, पर उस के मरने के बाद उस के बाबूजी दुनिया में अकेले रह जाएंगे, इस बात से वह परेशान थी और जिन लोगों ने माधव को मार डाला, उन से बदला लिए बगैर मरना उसे बुजदिली लग रहा था. पंचायत के फैसले के मुताबिक कल रात से चांदी को कपाला और अगाली की सेवा में जाना था, पर चांदी का मन माधव की यादों में भटक रहा था. उस का मन तो कर रहा था कि वह कपाला और अगाली से माधव की हत्या का बदला ले, पर भला वह अकेली लड़की उन दोनों का क्या कर सकती थी…
इसी ऊहापोह में चांदी परेशान थी. चांदी के जेहन में माधव की बताई हुई वह बात गूंज रही थी कि उस के बैग में कोई ऐसी दवा रखी है, जो अगाली की जान ही ले लेगी… चांदी सीधा उस के कमरे पर गई, जहां पर बैग रखा हुआ था. उसे वह दवा मिल गई, जिस की उसे तलाश थी. रात हुई तो चांदी कपाला और अगाली के पास पहुंच गई. ‘‘अरे, हमें तो तेरे इतनी जल्दी आने की उम्मीद नहीं थी… लगता है तू भी हमारी सेवा करने के लिए तरस रही है… अच्छा है… आ जा… सेवा शुरू कर हमारी,’’ अगाली ने अपनी धोती को ऊपर सरकाते हुए कहा. ‘‘हां सरकार, पर एक दिन बातों ही बातों में उस शहरी ने मुझे इस दवा के बारे में बताया था कि इसे पीने से आप की ताकत 10 गुना बढ़ जाएगी,’’ चांदी ने उन्हें एक पुडि़या दिखाते हुए कहा. अगाली को जैसे कुछ याद आया, ‘‘तो मेरे लिए दवा बना दी थी उस ने… तब तो बेचारा मुफ्त में मारा गया… कोई बात नहीं… हम इस दवा का मजा आज ही लेंगे… ऐसा करो… इस शराब के गिलास में एक पुडि़या मिला दो…’’ अगाली ने कहा. ‘‘मेरे लिए 2 पुडि़या मिलाना चांदी… क्या है न कि मेरी उम्र थोड़ी ज्यादा है, इसलिए मुझे थोड़ी ज्यादा ताकत की जरूरत पड़ेगी,’’ कपाला ने हंसते हुए कहा. इधर चांदी मन ही मन मुसकरा रही थी. उस ने उन दोनों के गिलास में पुडि़या मिला दी और खुद अपने हाथों से कपाला और अगाली को पूरी शराब पिला दी.
शराब पीते ही कपाला और अगाली का दम घुटने लगा. वे दोनों अपना गला पकड़ कर इधरउधर भागने लगे. कुछ देर बाद उन दोनों के मुंह से झाग निकलने लगा और शरीर भी नीला पड़ गया. उन दोनों की मौत हो चुकी थी. अगले दिन गांव वालों में चर्चा थी कि उस सांप पकड़ने वाले शहरी बाबू के किसी पालतू सांप ने अगाली और कपाला को काट कर शहरी बाबू की मौत का बदला लिया है. चांदी का बदला तो पूरा हो गया था, पर जिस माधव से उस ने सच्चा प्यार किया था, वह अब उस की जिंदगी में दोबारा कभी नहीं आएगा. यही वजह है कि चांदी की मांग आज भी सूनी है.
अब 1 बज रहा था. नंदिनी ने लंच किया. आज लंच करतेकरते वह अकेली मुसकराती रही. आज अचानक उसे पता नहीं क्याक्या याद आने लगा. सालों पुरानी अपनी लाल चूडि़यां याद आने लगीं. मन हुआ शुरुआती दिनों की तरह खूब सजधज कर विपिन के साथ कुछ समय बिताए. लंच कर के उस ने फिर दूरबीन उठा ली. फिर कुछ नहीं दिखा. वह भी जा कर सो गई. फिर उठ कर घर के कुछ काम निबटाए.
4 बजे चाय का कप ले कर फिर दूरबीन उठा कर स्टूल पर बैठ गई. मांबेटी वाले घर में तो कोई हलचल नहीं दिखी, पर नवविवाहित जोड़ा घर की सैटिंग में व्यस्त था. दोनों मिल कर सामान ठीक कर रहे थे. शायद नएनए आए थे फ्लैट में. बीचबीच में दोनों का रोमांस भी चल रहा था. लड़के ने पत्नी को गोद में उठा कर घुमा दिया. आकर्षक जोड़ा था.
नंदिनी ने हंस कर अपनी दूरबीन को चूम लिया. आज उसे एक नया रोमांच महसूस हो रहा था. पूरा दिन कब बीत गया, पता ही नहीं चला. सब से बड़ी बात उसे पति और बच्चों की कोई बात याद कर के गुस्सा नहीं आया. आज कोई झुंझलाहट नहीं थी मन में. एकदम खिलाखिला था मन.
5 बज रहे थे. नंदिता अपनी शाम की सैर पर जाने के लिए तैयार होने लगी. वह शाम को रोज 1 घंटा सोसायटी के पार्क में सैर करती थी. आज उस के कदमों में गजब की तेजी थी. मन में स्फूर्ति थी. सैर करते हुए सोच रही थी कि इस दूरबीन का किस्सा घर में किसी को नहीं बताऊंगी.
वह जानती है यह हरकत अच्छी नहीं है पर उसे तो आज पूरा दिन मजा आया, सहीगलत के चक्कर में नहीं पड़ेगी वह. 6 बजे आ कर वह किचन में व्यस्त हो गई. शाम को सब के आने के समय नंदिनी ने दूरबीन अपनी साडि़यों की तह में छिपा दी.
विपिन राहुल और सोनी के आने के बाद नंदिनी नाश्ते के बाद डिनर की तैयारी में व्यस्त हो गई. वह बच्चों से बीचबीच में दिन भर की बातें पूछती रही. कालेज के कुछ और सवाल पूछने पर फोन में व्यस्त राहुल झुंझला गया, ‘‘मां, कितने सवाल करती हो?’’
आज नंदिनी खुद ही अपने ऊपर हैरान रह गई. उसे राहुल की इस बात पर जरा भी गुस्सा नहीं आया. वह गुनगुनाती हुई अपने काम करती रही. डिनर के बाद विपिन न्यूज देखने लगे. बच्चे अपने रूम में चले गए. नंदिनी का मन हुआ अपनी दूरबीन उठा ले पर नहीं, यह तो असंभव था. वह घर में किसी को भनक नहीं लगने देगी. उस ने फिर बड़े ही रोमांटिक अंदाज में विपिन के गले में बांहें डाल दीं, ‘‘चलो, बाहर टहल कर आते हैं.’’
विपिन को हैरत का एक तेज झटका लगा. नंदिनी को ध्यान से देख कर पूछा, ‘‘तुम्हें क्या हुआ है?’’
नंदिनी हंस पड़ी, ‘‘बस यही पूछते रहते हो तुम्हें क्या हुआ है, कभी कुछ और भी तो कहो.’’
विपिन ने मुसकराते हुए टीवी बंद कर दिया.
दोनों टहल आए. नंदिनी का मूड बहुत अच्छा था1 उस नवविवाहित जोड़े की प्रणयलीला याद कर एक भूलीभटकी सी रोमानियत उस के मन में भी उतरती जा रही थी. उस रात उस ने अपने और विपिन के प्रणयपलों को बड़ी उमंग से जीया.
सुबह नंदिनी तीनों के जाते ही जल्दी से दूरबीन उठा कर स्टूल पर बैठ गई. मांबेटी वाले फ्लैट में मां शायद कामकाजी थी, वह साड़ी पहने तैयार थी. बेटी शायद कालेज में होगी. दोनों साथ ही निकलती थीं. घर में कोई और नहीं था. कल शायद लेट गई थीं. तभी तो नाचगा रही थीं. दोनों बहुत फ्रैश और खुश लग रही थीं.
फिर नंदिनी ने दूरबीन दूसरे फ्लैट की ओर घुमाई कि क्या कर रहे होंगे ये हीरोहीरोइन. वह खुद ही जोर से हंस दी. देखा, शायद हीरो औफिस के लिए तैयार था. हीरोइन अपने हाथ से उसे नाश्ता करा रही थी. वाह, रोमांस चल रहा है. हां, यही तो दिन हैं भई… चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात. वह खुद ही सब सोच कर मुसकराती रही. तभी श्यामा आ गई तो नंदिनी ने दूरबीन छिपा दी.
आज एक अरसे बाद नंदिनी ने विपिन को व्हाट्सऐप पर मैसेज किया, ‘आई लव यू.’
विपिन की हैरानी वाली बात स्माइली आई और ‘सेम टू ये, डियर’ का जवाब. नंदिनी विचित्र सी अनुभूतियों में घिरी घर के काम निबटाती रही. फिर वह दोपहर में ब्यूटीपार्लर गई. बढि़या फेशियल, मैनीक्योर, पैडीक्योर, एक मौडर्न हेयरकट करवाया, खुद को आईने में देख कर खुश हुई. फिर अपने लिए नई कुरती खरीदी.
घर आते ही दूरबीन उठाई पर कुछ नहीं दिखा. मांबेटी शायद शाम को ही वापस आती थीं. हीरोइन एकाधबार बालकनी में दिखाई दी. फिर शाम के समय एकदम सजीसंवरी हीरो का इंतजार करती. नंदिनी भी शाम के समय आज कुछ अलग ढंग से तैयार हुई.
शाम को सोनीराहुल आए तो नंदिनी को देखते ही सोनी बोली, ‘‘वाह, मां, कितनी अच्छी लग रही हो. वाह, नया हेयरकट, बहुत अच्छा है.’’
राहुल ने भी कहा, ‘‘ऐसे ही रहा करो मां, लुकिंग गुड.’’
विपिन तो कल से ही नंदिनी में आए परिवर्तन पर हैरान थे. नंदिनी को ऊपर से नीचे तक देखते हुए बोले, ‘‘वाह, क्या बात है. भई, क्या इरादा है?’’
नंदिनी हंसतेह हुए बोली, ‘‘अच्छा ही है.’’
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‘‘कारखाने का हिसाबकिताब तो सही है न?’’ पत्नी ने गंभीरता से पूछा.
‘‘हां, मगर तुम पूछ क्यों रही हो?’’ पति ने पूछा.
‘‘क्योंकि, आज शाम को ही पिताजी आने वाले हैं. भाई और मम्मी की हादसे में मौत के बाद वे किसी बिजनैसमैन से ही मेरी शादी करना चाहते थे, ताकि उन की फैक्टरी ठीक ढंग से चल सके. पर कालेज में मेरी एक भूल के चलते वे तुम जैसे बेरोजगार से मेरी शादी करने को मजबूर हुए.
‘‘पिछली बार भी जब वे आए थे, तो बिजनैस में गिरावट देख कर चिंतित हो गए थे. पैसा भी काफी फालतू के कामों में खर्च किया गया था.’’
‘‘नहींनहीं, इस बार ऐसा कुछ नहीं है. तुम टैंशन मत लो. वैसे भी टैंशन लेने से होने वाले बच्चे पर बुरा असर पड़ता है. डाक्टर ने तुम्हें बैड रैस्ट बोला है.
‘‘चलो, आराम कर लो,’’ पति पत्नी को कुरसी पर से उठने में मदद करता हुआ बोला, ‘‘तुम लेट कर आराम करो. मैं प्रमिला को बोल कर अनार का जूस भिजवा देता हूं.
‘‘अब इस मुसीबत से कैसे छुटकारा पाया जाए?’’ किचन में घुसता हुआ वह आदमी बड़बड़ा रहा था.
‘‘क्या हुआ सरजी?’’ रसोईघर में काम करते हुए नौकरानी प्रमिला ने पूछा.
‘‘अरे, इस काली मोटी भैंस को संभालतेसंभालते तो मैं परेशान हो गया हूं. ऊपर से शाम को इस का बाप भी आ रहा है. मैं तो पागल ही हो जाऊंगा,’’ वह आदमी झुंझलाता हुआ बोला.
‘‘वह सब तो ठीक है सरजी, मुझे भी आज से दूसरा महीना चढ़ गया है. अब बहुत ज्यादा दिनों तक यह बात छिप नहीं पाएगी. यह बात भी मैं पहले ही साफ कर चुकी हूं कि मैं यह बच्चा किसी भी कीमत पर नहीं गिराऊंगी,’’ कहतेकहते प्रमिला की आवाज में धमकीनुमा तेजी आ गई.
‘‘अरे पगली, तुझ जैसी सुंदरी तो बड़े नसीब वालों को ही मिलती है. मैं तो जिंदगीभर तुझे अपने साथ अपनी जान बना कर रखूंगा. इस समय समस्या यह है कि इस भैंस से पीछा कैसे छुड़ाया जाए?’’ वह आदमी धीरे से प्रमिला के कंधे पर हाथ रखता हुआ बोला.
‘‘मैं क्या करूं… यह सब सोचना तुम्हारा काम है,’’ प्रमिला उस आदमी के और नजदीक आते हुए बोली.
‘‘मेरी जान, जो करना है वह तो तुम्हीं को करना है,’’ वह आदमी अपनी आवाज में भरपूर शहद घोलते हुए बोला. ‘‘मतलब…?’’ प्रमिला ने पूछा.
‘‘मतलब यह कि उस भैंस को हमें रास्ते से हटाना ही होगा. बिना इस के तुम इस बंगले की मालकिन नहीं बन सकती…’’ अपनी तरफ से प्रमिला को लालच के सब्जबाग दिखाता हुआ वह आदमी बोला, ‘‘अच्छा बताओ, तुम मेरे प्यार के लिए क्या कर सकती हो?’’
‘‘मैं तो अपनी जान भी दे सकती हूं,’’ प्रमिला बोली.
‘‘जान देनी नहीं, जान लेनी है. अनार के जूस में तुम्हें यह जहर मिलाना होगा,’’ वह आदमी अपनी जेब से रूमाल के बीच रखी एक शीशी निकाल कर प्रमिला की मुट्ठी में बंद करता हुआ बोला.
‘‘अरे, पुलिस का लफड़ा हो गया तो…?’’ प्रमिला ने पूछा.
‘‘इतना पैसा किस काम आएगा. मैं ने पुलिस को पूरी तरह से सैट कर दिया है,’’ वह आदमी बोला. प्रमिला ने मुट्ठी पूरी ताकत से बंद कर ली.
‘‘शाबाश… और सुन, यह हीरे के कंगन तू अपने पास रख. इन्हें पहन कर ही तू मेरी दुलहन बनेगी,’’ वह आदमी बोला, ‘‘अब जल्दी से अनार का जूस दे आ, ताकि उस के बाप के आने से पहले उस का काम तमाम हो जाए.’’
‘‘ठीक है. अभी जूस दे कर आती हूं,’’ प्रमिला बोली.
‘‘गुड गर्ल…’’ वह आदमी गिलास ले कर जाती हुई प्रमिला की पीठ चूमते हुए बोला, ‘‘मैं बाजार से मिठाई व नाश्ता ले कर आता हूं. इस का बाप आने वाला है. दिखावा तो करना ही पड़ेगा न. तेरे लिए कौन सी मिठाई लाऊं?’’
‘‘मुझे तो काजूकतली पसंद है,’’ प्रमिला मुसकराते हुए बोली और जहर मिले हुए जूस का गिलास ले कर देने चली गई.
तकरीबन 3 घंटे बाद वह आदमी लौट आया. तब तक 2-3 खून की उलटियां होने के बाद उस की पत्नी मर चुकी थी.
उस ने अपनी योजना को कामयाब होते देख तुरंत ही बड़े शातिर तरीके से पुलिस को चित कर दिया और शक के तौर पर प्रमिला का नाम लिखवा दिया.
जहर की शीशी पर प्रमिला की उंगलियों के निशान उसे कुसूरवार साबित करने के लिए काफी थे. हीरे के कंगन उस के पास से मिलने के चलते उस पर चोरी करने का आरोप भी साबित हो गया.
एक ही घर में 3 लोगों के अलगअलग चरित्र देख कर अदृश्य कुत्ता हैरान था. एक वह औरत थी, जो अपने प्यार की खातिर दौलत के अंबार को छोड़ कर प्रेमी से शादी करने को तैयार हुई और आखिरी सांस तक उस के प्रति वफादार रही.
दूसरा वह आदमी, जिस की नजर में प्यार मतलब सिर्फ हवस था. उस का मकसद धोखा दे कर दौलत हासिल करना और मिले हुए पैसों से ऐयाशी करना था.
तीसरी प्रमिला, जो अपने फायदे और कभी न मिल पाने वाले सुख की खातिर एक मासूम को मौत के घाट उतारने तक से नहीं चूकी.
कुत्ते को अब अपने कुत्ता होने पर फख्र हो रहा था. कम से कम उन की दुनिया में लालच जैसी कोई बुराई तो नहीं है. स्वामीभक्ति और वफादारी जैसे शब्द उन के नामों के साथ जुड़े हुए हैं.
वह अदृश्य कुत्ता दूसरी जगह के लिए रवाना हो गया. दूसरा वाला बंगला भी बहुत बड़ा था. इस के बाहर लगे कटआउट से लग रहा था कि यह किसी राजनीतिक हस्ती का घर था.
अंदर जा कर उस ने देखा कि वही कटआउट की फोटो वाला आदमी सफेदझक कपड़ों में 10-20 चमचों से घिरा हुआ बैठा था. कुत्ते को याद आया कि यह तो वही शख्स था, जो कुछ महीने पहले गलियों में लोगों के पैरों में गिरगिर कर वोट मांग रहा था. अपने विरोधियों पर भ्रष्ट होने के आरोप लगाते हुए खुद को देश का सब से बड़ा ईमानदार साबित कर रहा था.
‘‘हां तो कितना ऐस्टीमेट बन रहा है इस ब्रिज का?’’ नेताजी ने सामने बैठे सूटबूटधारी से पूछा.
‘‘यह इस इलाके का सब से बिजी ब्रिज रहेगा. इस पर ट्रैफिक लोड भी बहुत ज्यादा रहेगा. हमारी कंपनी इस तरह के ब्रिज बनाने में माहिर है. हमारे हिसाब से इस ब्रिज की लागत 500 करोड़ के आसपास की आएगी,’’ वह कंपनी वाला आदमी बोला.
‘‘इस में हमारा हिस्सा कितना होगा?’’ नेताजी ने पूछा.
‘‘जी, एक फीसदी… मतलब,
5 करोड़,’’ वह आदमी बोला.
‘‘किसी की मैयत में बैठने के लिए आए हो, जो इतनी सी रकम दे रहे हो. इतने की तो शराब ही हो जाती है नेताजी की पार्टी में,’’ एक चमचा बोला.
‘‘देखिए श्रीमानजी…’’ नेताजी गंभीरता से बोले, ‘‘हमें फालतू की बात करने की और भावताव करने की आदत तो है नहीं. हम 20 फीसदी मतलब 100 करौड़ से कम तो लेंगे नहीं.’’
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राईटर – विकास कुमार सिंह
बगदाद के बादशाह मीर काफूर ने अपने विश्वासी सलाहकार आसिफ मुस्तफा को बगदाद का नया काजी नियुक्त किया, क्योंकि निवर्तमान काजी रमीज अबेदिन अब बूढ़े हो चले थे और उन्होंने बादशाह से गुजारिश की थी कि अब उन का शरीर साथ नहीं दे रहा है इसलिए उन्हें राज्य के काजी पद की खिदमत से मुक्त कर दें. बगदाद राज्य का काजी पद बहुत महत्त्वपूर्ण और जिम्मेदारी भरा होता था. बगदाद के काजी पद पर नियुक्ति की खुशी में आसिफ मुस्तफा ने एक जोरदार दावत दी. उस दावत में उस के मातहत राज्य के सभी न्यायिक दंडाधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी आमंत्रित थे. राज्य के लगभग सभी सम्मानित व्यक्ति भी दावत में उपस्थित थे.
सब लोग दावत की खूब तारीफ कर रहे थे, क्योंकि वहां हर चीज मजेदार बनी थी. आसिफ मुस्तफा सारा इंतजाम खुद देख रहा था. सुरीले संगीत की धुनें वातावरण को और भी रसमय बना रही थीं. अचानक आसिफ मुस्तफा को ध्यान आया कि उस ने एक चीज तो मंगवाईर् ही नहीं. आजकल खजूर का मौसम चल रहा है. अत: उस फल का दावत में होना जरूरी है. बगदाद में पाया जाने वाला अरबी खजूर बहुत स्वादिष्ठ होता है. दावतों में भी उसे चाव से खाया जाता है.
आसिफ ने अपने सब से विश्वसनीय सेवक करीम को बुलाया और उसे सोने का एक सिक्का देते हुए कहा, ‘‘जल्दी से बाजार से 500 अच्छे खजूर ले आओ.’’ बगदाद में खजूर वजन के हिसाब से नहीं बल्कि संख्या के हिसाब से मिलते थे. सेवक फौरन रवाना हो गया. थोड़ी देर बाद लौटा तो उस के पास खजूरों से भरा हुआ एक बड़ा थैला था.
आसिफ मुस्तफा ने कहा, ‘‘थैला जमीन पर उलटो और मेरे सामने सब खजूर गिनो.’’
करीम अपने मालिक के इस आदेश पर दंग रह गया. वह सोच भी नहीं सकता था कि उस का मालिक उस जैसे पुराने विश्वसनीय सेवक पर इस तरह शक करेगा. सब मेहमान भी हैरत से आसिफ की तरफ देखने लगे.
करीम ने फल गिनने शुरू किए. जब गिनती पूरी हुई तो वह थरथर कांपने लगा. खजूर 498 ही थे. आसिफ बिगड़ कर बोला, ‘‘तुम ने बेईमानी की है. तुम ने 2 खजूर रास्ते में खा लिए हैं. तुम्हें इस जुर्म की सजा अवश्य मिलेगी.’’
करीम ‘रहमरहम…’ चिल्लाता रहा, लेकिन आसिफ मुस्तफा जरा भी नहीं पसीजा. उस ने सिपाहियों को आदेश दिया कि करीम को फौरन गिरफ्तार कर लिया जाए. आसिफ के इस बरताव से सारे मेहमान हक्केबक्के थे कि इतनी सी बात पर एक पुराने वफादार सेवक को सजा देना कहां का इंसाफ है.
आसिफ ने आदेश दिया, ‘‘करीम की पीठ पर तब तक कोड़े बरसाए जाएं, जब तक वह अपना अपराध कबूल न कर ले.’’ उस के आदेश का पालन किया जाने लगा. करीम की चीखें शामियाने में गूंजने लगीं. जब पिटतेपिटते करीम लहूलुहान हो गया तो उस ने चिल्ला कर कहा, ‘‘हां, मैं ने 2 खजूर चुरा लिए, 2 खजूर चुरा लिए. मीठेमीठे खजूर देख कर मेरा जी ललचा गया था. मैं अपराध कबूल करता हूं. मुझे छोड़ दो.’’
उस की इस बात पर मेहमानों में खुसुरफुसुर होने लगी कि अब ईमानदारी का जमाना नहीं रहा. जिसे देखो, वही बेईमानी करता है. किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता, वफादार सेवक पर भी नहीं. सभी करीम को कोस रहे थे, जिस की वजह से दावत का मजा किरकिरा हो गया था. तभी आसिफ मुस्तफा ने कहा, ‘‘सिपाहियो, खोल दो इस की जंजीरें.’’
जंजीरें खोल दी गईं. करीम को आसिफ के सामने पेश किया गया. सारे मेहमान चुपचाप देख रहे थे कि अब आसिफ मुस्तफा उस के साथ क्या व्यवहार करता है. सब का विचार था कि करीम ने अपराध स्वीकार कर लिया है इसलिए इसे बंदीगृह में भेज दिया जाएगा या नौकरी से निकाल दिया जाएगा. लेकिन इस के बाद आसिफ मुस्तफा अपनी जगह से उठ कर करीम के पास आया. उस के शरीर से रिसते खून को अपने रूमाल से साफ किया. उस की मरहमपट्टी की और दूसरे साफ कपड़े पहनाए. सभी आश्चर्य करने लगे कि यह क्या तमाशा है. जब करीम रहम की भीख मांग रहा था, तब तो उस की पुरानी वफादारी का लिहाज नहीं किया और अब कबूल चुका है तो उस की मरहमपट्टी हो रही है.
आसिफ मुस्तफा ने करीम से माफी मांगी. फिर मेहमानों से कहने लगा, ‘‘मैं जानता हूं करीम बेकुसूर है. इस ने कोई अपराध नहीं किया. यह देखिए,’’ उस ने अपने कुरते की आस्तीन में से 2 खजूर निकाल कर कहा, ‘‘ये हैं वे 2 खजूर जिन्हें मैं ने पहले ही फुरती से निकाल लिया था. ऐसा मैं ने इसलिए किया था कि आप को बता सकूं कि लोगों को कठोर दंड दे कर जुर्म कबूल करवाना कितनी बड़ी बेइंसाफी है, लेकिन ऐसा हो रहा है. हमारा काम अपराधियों का पता लगाना और उन के अपराध के लिए उन्हें सजा देना है न कि किसी भी निर्दोष को मार कर उसे चोर साबित करना.’’ सभी आसिफ मुस्तफा की इस सच्ची बात पर वाहवाह कर उठे. उन्हें विश्वास हो गया कि आसिफ वाकई काजी के पद के योग्य है. उस के कार्यकाल में किसी निर्दोष को सजा नहीं मिलेगी और कुसूरवार बच नहीं पाएगा.
ग्राहक ने अपने लिफाफे से एक आम निकाल कर उस की ओर बढ़ा दिया, ‘‘ले, खा ले.’’ ग्राहक के बढ़े हाथ को देख कर झुमकी स्तब्ध रह गई. ताजा और साबुत लंगड़ा आम दे रहा है ग्राहक बाबू. मजाक तो नहीं कर रहा? एक पल के लिए मौन रखने के बाद इनकार में सिर हिलाते हुए उस ने तर्जनी से उन परित्यक्त आमों की ओर संकेत कर दिया. ‘‘छी…’’ ग्राहक खिलखिला कर हंस पड़ा, अरे, ‘‘पूरे समकालीन साहित्य के दलित स्त्री विमर्श की नायिका है तू. बदबूदार आम तुझे शोभा देंगे? न, न, ये ले ले.’’
ग्राहक की व्यंग्योक्ति में चुटकीभर हंसी पांडेजी भी मिलाए बिना नहीं रह सके. झुमकी ने फिर भी इनकार में सिर हिला दिया. तर्जनी उन्हीं आमों की तरफ उठी रही, मुंह से बोल न फूटे.
‘‘अजीब खब्ती लड़की है रे तू,’’ ग्राहक झुंझला उठा. झुमकी का रिरियाना और ऐसी शैली में बतियाना ग्राहक की खीझ को बढ़ा रहा था. उसे उम्मीद थी कि अच्छा आम पा कर लड़की एकदम से खिल उठेगी. पर यहां तो वही मुरगे की डेढ़ टांग. झिड़की में पुचकार का छौंक डालते हुए फनफनाया, ‘‘अरे हम अपनी मरजी से न दे रहे हैं यह आम. इतनीइतनी सरकारी योजनाएं, इतनेइतने फंड, इतनेइतने अनुदान…सारी कवायदें तुम लोगों को ऊपर उठाने के लिए ही न हो रही हैं? इन सरकारी कवायदों में एक छोटा सा सहयोग हमारा भी, बस.’’
झुमकी कभी आम को और कभी ग्राहक के चेहरे को टुकुरटुकुर ताकती रही. आंखों में भय सिमटा हुआ था. भीतर के बिखरेदरके साहस को केंद्रीभूत करती आखिरकार मिमियायी, ‘‘नहीं सर, इ आम नहीं, ऊ वाला आम दे दो.’’ ‘‘क्यों? जब हम खुद दे रहे हैं तो लेने में क्या हर्ज है रे, अयं?’’
‘‘हम भिखारी हैं, सर. अच्छा आम हमारे तकदीर में नहीं लिखा. ऊहे आम ठीक लगता है.’’ पूरे एपिसोड में पहली बार लड़की के मुंह से इतना लंबा वाक्य फूटा था. ‘‘देखा पांडेजी?’’
‘‘एक बात है, सर,’’ हथेली पर खैनी मसलते हुए पांडेजी ने कहा, ‘दलितों के लिए सरकारी सारे अनुदान, योजना वगैरावगैरा राजधानी से ऐसे कार्टून में भर कर लादान किया जाता है जिस के तल में बड़ा सा छेद बना होता. सारा कुछ ससुर रस्ते में ही रिस जाता है और कार्टून जब इन लोगन के दरवाजे आ कर लगता है तो पूरा का पूरा छूछा. हा, हा, हा.’’ ‘‘कुछ हद तक ठीक है आप की बात, पांडेजी,’’ ग्राहक भी हंसे बिना नहीं रह सका, ‘‘पर इस में सारा दोष सरकार को देना भी ठीक नहीं. कुछ दोष इन लोग का भी है. इन लोगों को भी तो अपना हक बूझना होगा, उस को पाने के लिए हाथपांव चलाना होगा. मतलब, पहल तो इन लोगों को ही न करना है. एक बार तन कर देखें तो. सारे हक मिलते चले जाते हैं कि नहीं? सब से पहले तो रिरियाना छोड़ना होगा.’’
‘‘हां साहब, ठीक कह रहे हैं आप. माओवादी लड़ाई कुछकुछ हक के प्रति सचेत हो जाने का परिणाम ही तो है,’’ पांडे ने कहा और फिर झुमकी की ओर मुखाबित होते हुए बोले, ‘लेले रे, लेले. साहब और तेरे बीच कोई बिचौलिया नहीं है न. साहब के हाथ से सीधे तेरे हाथ में आ रहा है इ अनुदान.’’
ग्राहक आगे बढ़ा और आम को झुमकी की हथेली में ठूंसते हुए हिनहिनाया, ‘‘तकदीर, मुकद्दर और भाग्य, सब बेकार बातें हैं, रे. जरूरी है हक बचाने के लिए लड़ाई की पहल. देख, इस आम की मालकिन अब तू हुई. यह पूरी तरह तेरा है. अब इस पर तेरा हक है. तकदीर तेरी मुट्ठी में कैद हो गई कि नहीं?’’ आम थामे झुमकी की हथेली थरथरा रही थी. आम की साफ पुखराजी रंगत और खरगोश सा मुलायम स्पर्श रोमांचित कर रहा था. पर आंखों में अविश्वास और डर अभी भी दुबका हुआ था.
‘‘बाबू, इ आम हम नहीं ले सकते. हम को उहे आम दिला दें,’’ फिर से लिजलिजी गिड़गिड़ाहट. ‘‘भाग सुसरी,’’ ग्राहक इस बात से उखड़ गया, ‘‘भाग, नहीं तो दू थप्पड़ लगा देंगे.’’
झुमकी चुपचाप पांडेजी की गुमटी से उतर आई और धीरेधीरे घर को जाने वाली राह पर आगे बढ़ने लगी. उसे अभी भी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि हथेली में ताजा गोराचिट्टा लंगड़ा आम दुबका हुआ है. चलतेचलते अचानक रुकी और एक ओर खड़ी हो कर आम को भरपूर नजरों से निहारने लगी. उस निहार में एकसाथ आश्वस्ति, प्यार और तृप्ति के कईकई रंग घुले हुए थे. इतने करीब से इस तरह के साबुत आम को पहली बार देख रही है.
आज तक जितने भी ग्राहक मिले, भीख में या तो एकाध सिक्का दिया या फिर परित्यक्त आमों में से एकाध दिला दिया. ताजा व पक्का आम पहली बार झोली में आया है. लग रहा था जैसे दलितों के लिए घोषित असंख्य सरकारी अनुदानों में से एक अनुदान एकदम मूर्त हो कर उस की झोंपड़ी के भीतर आ टपका हो. वह मन ही मन आम के रसीले स्वाद की कल्पना में खोने लगी. कदम तेजी से बस्ती की ओर बढ़ चले. स्टेशन लांघ कर कदम कब लाइन पार आ गए और देखतेदेखते संन्यासी मोड़ भी कब आ पहुंचा, झुमकी को पता ही नहीं चला.
तंद्रा टूटी तो सामने स्कूल का गेट दिखा. गेट बंद था. पीछे का ग्राउंड सूना. कक्षाएं समाप्त हो चुकी थीं न. झुमकी के पांव एक पल को गेट के पास थम गए. नजरें पखेरु सी उड़ती हुई पेड़ पर टंगे ‘सर्व शिक्षा अभियान’ के बोर्ड पर जा बैठीं. बोर्ड में चित्रित निश्ंिचत मुसकराहटों को देख कर मन कचोट से भर गया. वह आगे बढ़ने को उद्यत हुई ही थी कि सामने वाली पतली गली से निकल कर हवलदार निमाई बाबू प्रकट हो गए. खाकी वरदी, हाथ में रूल, आंखों में लोमड़ सी चमक.
खाकी वरदी देख कर न जाने क्यों झुमकी की जान सूखने लगती है. मन में एक किस्म का डर रेंग जाता है. इस बार भी वही हुआ. भीतर ही भीतर कलेजा धकधक करने लगा. आसपास निपट सन्नाटा. दूरदूर तक कोई भी नहीं. एहतियात बरतते हुए आम वाली हथेली को पीछे ले जा कर फ्रौक के भीतर कर लिया.
‘का रे झुमकी?’ निमाई बाबू ने खींसें निपोर दिए, ‘धंधा से लौट रही?’ ‘हां सर, एही वक्त तो लौटते हैं रोज,’ झुमकी मन ही मन फनफना उठी. हमरे काम को धंधा कहते हैं. खुद बाजार की दुकानों से और बस्ती वालों से वसूली करते हैं, वह धंधा नहीं है?
आगे पढ़िए क्या हुआ झुमकी के साथ…
निमाई बाबू भी पोस्टमौर्टमी नजरें न जाने किस चीज की तलाश में उस के बदन का नखशिख मुआयना करने लगीं. निस्तेज चेहरा, सपाट छाती और किसी पुतले की सी पतलीपतली जांघें.
‘‘तोर काछे किच्छू नेई रे? (तेरे पास कुछ भी नहीं है रे?)’’ होंठों पर लिजलिजी हंसी उभर आई और आगे बढ़ कर रूल को उस की बांह पर 2-3 बार ठकठका दिया. रूल का स्पर्श होना था कि बांह थरथरा गई और हथेली से फिसल कर आम जमीन पर आ गिरा. ‘‘अयं…?’’ निमाई बाबू की आंखें विस्मय से फैल गईं, झुक कर आम को झट से उठा लिया, ‘‘इ आम कहां से मिला रे?’’
‘‘एगो साहब भीख में दिया, सर,’’ सफाई देती हुई झुमकी की जबान अनायास ही लड़खड़ा गई. निमाई बाबू की आंखों में अविश्वास सिमट आया. एक पल को झुमकी की आंखों के भीतर ताकते रहे, निर्निमेष, फिर हाहा कर के हंस पड़े, ‘‘एतना सुंदर आम भीख में? असंभव. सचसच बता, भीख में मिला या किसी दुकान से पार किया?’’ ‘‘नहीं सर,’’ झुमकी की सांसें रुकनेरुकने को हो रही थीं, ‘‘पांडेजी की दुकान पर मिला. एक ग्राहक ने दिया. उन से पूछ लें.’’
हवलदार निमाई ने आम का एकदम करीब से अवलोकन किया. नाक के पास ले जा कर भरपूर सांस खींची तो नथुनों के भीतर महक अलौकिक सी महसूस हुई. ऐसा लगा जैसे इस महक में लंगड़ा आम की महक के अलावा भी एक अन्य सनसना देने वाली महक शामिल है. स्मृति में खलबली मच गई. ऊफ, याद क्यों नहीं आ रहा कि यह दूसरी महक कौन सी है? एकदम आत्मीय और जानीपहचानी. उत्तेजना के ये कुछेक पल बड़ी मुश्किल से ही कटे कि तभी आंखों में जुगनुओं की एकमुश्त चमक भर गई. अरे, यह महक शतप्रतिशत वही महक तो है जो दलितों के लिए घोषित मलाईदार सरकारी योजनाओं और अनुदानों से निकला करती है. खूब, ऐसी महक का स्वाद तो उन के जबान में गहराई से रचाबसा है. तभी तो… ‘‘ए,’’ निर्णय लेने में एक पल ही लगा, ‘‘ऐसा सुंदर और पका आम तुम लोग कैसे खा सकता है, रे? फिर सभ्य समाज का क्या होगा? यह आम तुझे नहीं मिल सकता.’’
‘‘हम को भीख में मिला, सर,’’ झुमकी किंकिया ही तो उठी. ‘‘हर चोर पकड़े जाने पर ऐसी ही सफाई देता. यह भीख का नहीं, चोरी का माल है,’’ निमाई बाबू के लहजे से हिकारत चू रही थी. ठीठ हिकारत.
‘‘हम सफाई नहीं दे रहे, सर. सच बोल रहे हैं. आप पांडेजी से पूछ लें.’’ ‘‘पूछने की कोईर् जरूरत नहीं. यह चोरी का ही माल है. थाना में जमा होगा,’’ निमाई बाबू की आंखों में लोलुप चमक चिलक रही थी.
‘‘हम चोरी नहीं किए,’’ झुमकी के हौसले पस्त होते जा रहे थे. ‘‘चोप्प, जबान लड़ा रही? जब हम कह रहे हैं कि चोरी का माल है तो, बस, है.’’
‘‘हमारा यकीन करें, सर.’’ ‘‘बोला न, चोप्प. एक शब्द भी बोला तो लौकअप में ले जा कर बंद कर देगा, समझी? प्रमाण लाना होगा. प्रमाण ले कर आओ, तब मिलेगा.’’
झुमकी स्तब्ध खड़ी रही. प्रमाण? हंह, भीख का प्रमाण मांग रहे? बाजार की दुकानों से और बस्ती से दैनिक वसूली करते हैं, उस का प्रमाण मांगा जाए तो…? तो दे सकेंगे? ग्राहक बाबू से कितना बोली थी कि ऐसे सुंदर आम उस जैसों के लिए नहीं होते. उन्होंने नहीं माना. बहादुरी में सरकारी योजनाओं और अनुदानों के बड़ेबड़े हवाले दे डाले. अरे, कोई भी सरकारी योजना या अनुदान सहीसलामत उन तक पहुंचता भी है? हंह, सब फुस हो गया न. उस के चेहरे पर स्याह मायूसी पुत गई. उसे महसूस हुआ जैसे हमेशा की तरह आज भी, कोई अनुदान मुट्ठी में आ जाने के बाद भी रेत की तरह फिसल कर अदृश्य हो गया है.
तभी उस की आंखें धुआंने लगीं. क्या वाकई सबकुछ इतनी आसानी से फुस हो जाने दे? ग्राहक बाबू ने कहा था न कि हक को पाने और बचाने के लिए चौकन्ना रहने के साथसाथ हाथपांव चलाते हुए संघर्ष की पहल करनी भी जरूरी है. पहल..? इस मौजूदा स्थिति में पहले के क्या विकल्प हैं, भला? वह नन्हीं जान, लंबेतगड़े निमाई बाबू से हाथापाई कर के जीत सकती है? आम छीन कर दौड़ भी पड़े तो निमाई बाबू लपक कर पकड़ लेंगे. आम तो जाएगा ही, भरपूर पिटाई भी खूब होगी. तब?
उस का छोटा सा दिमाग तेजी से कईकई विकल्पों का जायजा ले रहा था. कोईर् तो पहल करनी ही होगी हक बचाने के लिए. एकदम आसानी से सबकुछ फुस नहीं होने देगी वह. अचानक भीतर एक कौंध हुई. आंखें चमत्कृत रह गईं. कलेजा धकधक करने लगा. निमाई बाबू आम पा जाने की खुशी में चूर होते तनिक असावधान तो थे ही, झुमकी ने चीते की तरह लपक कर उन के हाथों से आम को कब्जे में लिया और पूरी ताकत से उस आम पर दांत गड़ा दिए.
लेखिका- मनजीत शर्मा ‘मीरा’
विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में, दिन का अंतिम पीरियड प्रारंभ होने ही वाला था कि अचानक माहौल में तनाव छा गया. स्पीड पोस्ट से डाकिया सभी 58 छात्रछात्राओं व प्रोफैसरों के नाम एक पत्र ले कर आया था. तनाव की वजह पत्र का मजमून था. कुछ छात्रों ने वह लिफाफा खोल कर अभी पढ़ा ही था कि प्रोफैसर मजूमदार ने धड़धड़ाते हुए कक्षा में प्रवेश किया. उन के हाथ में भी उसी प्रकार का एक लिफाफा था. आते ही उन्होंने घोषणा की, ‘‘प्लीज, डोंट ओपन द ऐनवलप.’’
अफरातफरी में उन्होंने छात्रछात्राओं से वे लिफाफे लगभग छीनने की मुद्रा में लेने शुरू कर दिए, ‘‘प्लीज, रिटर्न मी दिस नौनसैंस.’’ वे अत्यधिक तनाव में नजर आ रहे थे, लेकिन तब तक 8-10 छात्र उस पत्र को पढ़ चुके थे.
अत्यंत परिष्कृत अंगरेजी में लिखे गए उस पत्र में बेहद घृणात्मक टिप्पणियां छात्रछात्राओं के आपसी संबंधों पर की गई थीं और कुछ छात्राओं के विभागाध्यक्ष डाक्टर अमितोज प्रसाद, कुलपति डाक्टर माधवविष्णु प्रभाकर और प्रोफैसर मजूमदार से सीधेसीधे जोड़ कर उन के अवैध संबंधों का दावा किया गया था. पत्र लेखक ने अपनी कल्पनाओं के सहारे कुछ सुनीसुनाई अफवाहों के आधार पर सभी के चरित्र पर कीचड़ उछालने की भरपूर कोशिश की थी. हिंदी साहित्य की स्नातकोत्तर कक्षा में इस समय 50 छात्रछात्राओं के साथ कुल 6 प्राध्यापकों सहित विभागाध्यक्ष व कुलपति को सम्मिलित करते हुए 58 पत्र बांटे गए थे. 7 छात्र व 5 छात्राएं आज अनुपस्थित थे जिन के नाम के पत्र उन के साथियों के पास थे.
सभी पत्र ले कर प्रोफैसर मजूमदार कुलपति के कक्ष में चले गए जहां अन्य सभी प्रोफैसर्स पहले से ही उपस्थित थे. इधर छात्रछात्राओं में अटकलबाजी का दौर चल रहा था. प्रोफैसर मजूमदार के जाते ही परिमल ने एक लिफाफा हवा में लहराया, ‘‘कम औन बौयज ऐंड गर्ल्स, आई गौट इट,’’ उस ने अनुपस्थित छात्रों के नाम आए पत्रों में से एक लिफाफा छिपा लिया था. सभी छात्रछात्राएं उस के चारों ओर घेरा बना कर खड़े हो गए. वह छात्र यूनियन का अध्यक्ष था, अत: भाषण देने वाली शैली में उस ने पत्र पढ़ना शुरू किया, ‘‘विश्वविद्यालय में इन दिनों इश्क की पढ़ाई भी चल रही है…’’ इतना पढ़ कर वह चुप हो गया क्योंकि आगे की भाषा अत्यंत अशोभनीय थी.
एक हाथ से दूसरे हाथ में पहुंचता हुआ वह पत्र सभी ने पढ़ा. कुछ छात्राओं के नाम कुलपति, विभागाध्यक्ष और प्राध्यापकों से जोड़े गए थे. तो कुछ छात्रछात्राओं के आपसी संबंधों पर भद्दी भाषा में छींटाकशी की गई थी. इन में से कुछ छात्रछात्राएं ऐसे थे जिन के बारे में पहले से ही अफवाहें गरम थीं जबकि कुछ ऐसे जोड़े बनाए गए थे जिन पर सहज विश्वास नहीं होता था, लेकिन पत्र में उन के अवैध संबंधों का सिलसिलेवार ब्यौरा था.
पत्र ऐसी अंगरेजी में लिखा गया था जिसे पूर्णत: समझना हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों के लिए मुश्किल था परंतु पत्र का मुख्य मुद्दा सभी समझ चुके थे. कुछ छात्रछात्राएं, जिन के नाम इस पत्र में छींटाकशी में शामिल नहीं थे, वे प्रसन्न हो कर इस के मजे ले रहे थे तो कुछ छात्राएं अपना नाम जोड़े जाने को ले कर बेहद नाराज थीं. जिन छात्रों के साथ उन के नाम अवैध संबंधों को ले कर उछाले गए थे वे भी उत्तेजित थे क्योंकि पत्र के लेखक ने उन की भावी संभावनाओं को खत्म कर दिया था. सभी एकदूसरे को शक की नजरों से देखने लगे थे.
कुछ छात्राएं जिन्होंने पिछले माह हुए सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लिया था उन का नाम विभागाध्यक्ष अमिजोत प्रसाद के साथ जोड़ा गया था क्योंकि उन के कैबिन
में ही उस कार्यक्रम के संबंध में जरूरी बैठकें होती थीं और वे सीधे तौर पर कार्यक्रम के आयोजन से जुड़े थे. यह कार्यक्रम अत्यंत सफल रहा था और उन छात्राओं ने साफसाफ उन लोगों पर इस दुष्प्रचार का आरोप लगाया जिन्हें इस कार्यक्रम के आयोजन से दूर रखा गया था.
छात्र राजनीति करने वाले परिमल और नवीन पर ऐसा पत्र लिखने के सीधे आरोप लगाए गए. इस से माहौल में अत्यंत तनाव फैल गया. परिमल और नवीन का तर्क था कि यदि यह पत्र उन्होंने लिखा होता तो उन का नाम इस पत्र में शामिल नहीं होता, जबकि उन छात्राओं का कहना था कि ऐसा एक साजिश के तहत किया गया है ताकि उन पर इस का शक नहीं किया जा सके. एकदूसरे पर छींटाकशी, आरोप और प्रत्यारोप का दौर इस से पहले कि झगड़े का रूप लेता यह तय किया गया कि कुलपति और विभागाध्यक्ष से अपील की जाए कि मामले की जांच पुलिस से करवाई जाए. पुलिस जब अपने हथकंडों का इस्तेमाल करेगी तो सचाई खुद ही सामने आ जाएगी.
कुलपति के कमरे का माहौल पहले ही तनावपूर्ण था. उन का और विभागाध्यक्ष का नाम भी छात्राओं के यौन शोषण में शामिल किया गया था. पत्र लिखने वाले ने दावा किया था कि पत्र की प्रतिलिपि राज्यपाल और यूजीसी के सभी सदस्यों को भेजी गई है. सब से शर्मनाक था कुलपति डाक्टर माधवविष्णु पर छात्राओं से अवैध संबंधों का आरोप. वे राज्य के ही नहीं, देश के भी एक प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी, सम्मानित साहित्यकार और समाजसेवी थे. उन की उपलब्धियों पर पूरे विश्वविद्यालय को गर्व था.
जिन छात्राओं के साथ उन का नाम जोड़ा गया था वे उम्र में उन की अपनी बेटियों जैसी थीं. आरोप इतने गंभीर और चरित्रहनन वाले थे कि उन्हें महज किसी का घटिया मजाक समझ कर ठंडे बस्ते में नहीं डाला जा सकता था. छात्राएं इतनी उत्तेजित थीं कि यदि पत्र लिखने वाले का पता चल जाता तो संभवत: उस का बचना मुश्किल था.
आरोपप्रत्यारोप का यह दौर कुलपति के कमरे में भी जारी रहा. विरोधी गुट के छात्र नेता परिमल पर प्रत्यक्ष आरोप लगा रहे थे कि वे सीधे तौर पर यदि इस में शामिल नहीं है तो कम से कम यह हुआ उसे के इशारे पर है. सब से ज्यादा गुस्से में संध्या थी. वह छात्र राजनीति में विरोधी गुट के मदन की समर्थक थी और उस का नाम दूसरी बार इस तरह के अवैध संबंधों की सूची में शामिल किया गया था.
दरअसल, एक माह पहले भी एक पत्र कुलपति के कार्यालय में प्राप्त हुआ था, जिस में संध्या का नाम विभागाध्यक्ष अमितोज के साथ जोड़ा गया था. तब कुलपति ने पत्र लिखने वाले का पता न चलने पर इसे एक घटिया आरोप मान कर ठंडे बस्ते में डाल दिया था. और अब यह दूसरा पत्र था. इस बार पत्र लेखक ने कई और नामों को भी इस में शामिल कर लिया था.