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Hindi Family Story: कबाड़ – क्या यादों को कभी भुलाया जा सकता है?

Hindi Family Story: ‘‘सुनिए, पुताई वाले को कब बुला रहे हो? जल्दी कर लो, वरना सारे काम एकसाथ सिर पर आ जाएंगे.’’

‘‘करता हूं. आज निमंत्रणपत्र छपने के लिए दे कर आया हूं, रंग वाले के पास जाना नहीं हो पाया.’’

‘‘देखिए, शादी के लिए सिर्फ 1 महीना बचा है. एक बार घर की पुताई हो जाए और घर के सामान सही जगह व्यवस्थित हो जाए तो बहुत सहूलियत होगी.’’

‘‘जानता हूं तुम्हारी परेशानी. कल ही पुताई वाले से बात कर के आऊंगा.’’

‘‘2 दिन बाद बुला ही लीजिए. तब तक मैं घर का सारा कबाड़ निकाल कर रखती हूं जिस से उस का काम भी फटाफट हो जाएगा और घर में थोड़ी जगह भी हो जाएगी.’’

‘‘हां, यह ठीक रहेगा. वैसे भी वह छोटा कमरा बेकार की चीजों से भरा पड़ा है. खाली हो जाएगा तो अच्छा है.’

जब से अविनाश की बेटी सपना की शादी तय हुई थी उन की अपनी पत्नी कंचन से ऐसी बातचीत चलती रहती थी. जैसेजैसे शादी का दिन नजदीक आ रहा था, काम का बोझ और हड़बड़ाहट बढ़ती जा रही थी.

घर की पुताई कई सालों से टलती चली आ रही थी. दीपक और सपना की पढ़ाई का खर्चा, रिश्तेदारी में शादीब्याह, बाबूजी का औपरेशन वगैरह ऐसी कई वजहों से घर की सफाईपुताई नहीं हुई थी. मगर अब इसे टाला नहीं जा सकता था. बेटी की शादी है, दोस्त, रिश्तेदार सभी आएंगे. और तो और लड़के वालों की तरफ से सारे बराती घर देखने जरूर आएंगे. अब कोई बहाना नहीं चलने वाला. घर अच्छी तरह से साफसुथरा करना ही पड़ेगा.

दूसरे ही दिन कंचन ने छोटा कमरा खाली करना शुरू किया. काफी ऐसा सामान था जो कई सालों से इस्तेमाल नहीं हुआ था. बस, घर में जगह घेरे पड़ा था. उस पर पिछले कई सालों से धूल की मोटी परत जमी हुई थी. सारा  कबाड़ एकएक कर के बाहर आने लगा.

‘‘कल ही कबाड़ी को बुलाऊंगी. थक गई इस कबाड़ को संभालतेसंभालते,’’ कमरा खाली करते हुए कंचन बोल पड़ीं.

आंगन में पुरानी चीजों का एक छोटा सा ढेर लग गया. शाम को अविनाश बाहर से लौटे तो उन्हें आंगन में फेंके हुए सामान का ढेर दिखाई दिया. उस में एक पुराना आईना भी था. 5 फुट ऊंचा और करीब 2 फुट चौड़ा. काफी बड़ा, भारीभरकम, शीशम की लकड़ी का मजबूत फ्रेम वाला आईना. अविनाश की नजर उस आईने पर पड़ी. उस में उन्होंने अपनी छवि देखी. धुंधली सी, मकड़ी के जाले में जकड़ी हुई. शीशे को देख कर उन्हें कुछ याद आया. धीरेधीरे यादों पर से धूल की परतें हटती गईं. बहुत सी यादें जेहन में उजागर हुईं. आईने में एक छवि निखर आई…बिलकुल साफ छवि, कंचन की. 29-30 साल पहले की बात है. नईनवेली दुलहन कंचन, हाथों में मेहंदी, लाल रंग की चूडि़यां, घूंघट में शर्मीली सी…अविनाश को अपने शादी के दिन याद आए.

संयुक्त परिवार में बहू बन कर आई कंचन, दिनभर सास, चाची सास, दादी सास, न जाने कितनी सारी सासों से घिरी रहती थी. उन से अगर फुरसत मिलती तो छोटे ननददेवर अपना हक जमाते. अविनाश बेचारा अपनी पत्नी का इंतजार करतेकरते थक जाता. जब कंचन कमरे में लौटती तो बुरी तरह से थक चुकी होती थी. नौजवान अविनाश पत्नी का साथ पाने के लिए तड़पता रह जाता. पत्नी को एक नजर देख पाना भी उस के लिए मुश्किल था. आखिर उसे एक तरकीब सूझी. उन का कमरा रसोईघर से थोड़ी ऊंचाई पर तिरछे कोण में था. अविनाश ने यह बड़ा सा आईना बाजार से खरीदा और अपने कमरे में ऐसे एंगल (कोण) में लगाया कि कमरे में बैठेबैठे रसोई में काम करती अपनी पत्नी को निहार सके.

इसी आईने ने पतिपत्नी के बीच नजदीकियां बढ़ा दीं. वे दोनों दिल से एकदूसरे के और भी करीब आ गए. उन के इंतजार के लमहों का गवाह था यह आईना. इसी आईने के जरिए वे दोनों एकदूसरे की आंखों में झांका करते थे, एकदूसरे के दिल की पुकार समझा करते थे. यही आईना उन की नजर की जबां बोलता रहा. उन की जवानी के हर पल का गवाह था यह आईना.

आंगन में खड़ेखड़े, अपनेआप में खोए से, अविनाश उन दिनों की सैर कर आए. अपनी नौजवानी के दिनों को, यादों में ही, एक बार फिर से जी लिया. अविनाश ने दीपक को बुलाया और वह आईना उठा कर अपने कमरे में करीने से रखवाया. दीपक अचरज में पड़ गया. ऐसा क्या है इस पुराने आईने में? इतना बड़ा, भारी सा, काफी जगह घेरने वाला, कबाड़ उठवा कर पापा ने अपने कमरे में क्यों लगवाया? वह कुछ समझ नहीं पा रहा था. वह अपनी दादी के पास चला गया.

‘‘दादी, पापा ने वह बड़ा सा आईना कबाड़ से उठवा कर अपने कमरे में लगा दिया.’’

‘‘तो क्या हुआ?’’

‘‘दादी, वह कितनी जगह घेरता है? कमरे से बड़ा तो आईना है.’’

दादी अपना मुंह आंचल में छिपाए धीरेधीरे मुसकरा रही थीं. दादी को अपने बेटे की यह तरकीब पता थी. उन्होंने अपने बेटे को आईने में झांकते हुए बहू को निहारते पकड़ा भी था.

दादी की वह नटखट हंसी… हंसतेहंसते शरमाने के पीछे क्या माजरा है, दीपक समझ नहीं सका. पापा भी मुसकरा रहे थे. जाने दो, सोच कर दीपक दादी के कमरे से बाहर निकला.

इतने में मां ने दीपक को आवाज दी. कुछ और सामान बाहर आंगन में रखने के लिए कहा. दीपक ने सारा सामान उठा कर कबाड़ के ढेर में ला पटका, सिवा एक क्रिकेट बैट के. यह वही क्रिकेट बैट था जो 20 साल पहले दादाजी ने उसे खरीदवाया था. वह दादाजी के साथ गांव से शहर आया था. दादाजी का कुछ काम था शहर में, उन के साथ शहर देखने और बाजार घूमने दीपू चल पड़ा था. चलतेचलते दादाजी की चप्पल का अंगूठा टूट गया था. वैसे भी दादाजी कई महीनों से नई चप्पल खरीदने की सोच रहे थे. बाजार घूमतेघूमते दीपू की नजर खिलौने की दुकान पर पड़ी. ऐसी खिलौने वाली दुकान तो उस ने कभी नहीं देखी थी. उस का मन कांच की अलमारी में रखे क्रिकेट के बैट पर आ गया.

उस ने दादाजी से जिद की कि वह बैट उसे चाहिए. दीपू के दादाजी व पिताजी की माली हालत उन दिनों अच्छी नहीं थी. जरूरतें पूरी करना ही मुश्किल होता था. बैट जैसी चीजें तो ऐश में गिनी जाती थीं. दीपू के पास खेल का कोई भी सामान न होने के कारण गली के लड़के उसे अपने साथ खेलने नहीं देते थे. श्याम तो उसे अपने बैट को हाथ लगाने ही नहीं देता था. दीपू मन मसोस कर रह जाता था.

दादाजी इन परिस्थितियों से अच्छी तरह वाकिफ थे. उन से अपने पोते का दिल नहीं तोड़ा गया. उन्होंने दीपू के लिए वह बैट खरीद लिया. बैट काफी महंगा था. चप्पल के लिए पैसे ही नहीं बचे, तो दोनों बसअड्डे के लिए चल पड़े. रास्ते में चप्पल का पट्टा भी टूट गया. सड़क किनारे बैठे मोची के पास चप्पल सिलवाने पहुंचे तो मोची ने कहा, ‘‘दादाजी, यह चप्पल इतनी फट चुकी है कि इस में सिलाई लगने की कोई गुंजाइश नहीं.’’

दादाजी ने चप्पल वहीं फेंक दीं और नंगे पांव ही चल पड़े. घर पहुंचतेपहुंचते उन के तलवों में फफोले पड़ चुके थे. दीपू अपने नए बैट में मस्त था. अपने पोते का गली के बच्चों में अब रोब होगा, इसी सोच से दादाजी के चेहरे पर रौनक थी. पैरों की जलन का शिकवा न था. चेहरे पर जरा सी भी शिकन नहीं थी.

हाथ में बैट लिए दीपक उस दिन को याद कर रहा था. उस की आंखों से आंसू ढलक कर बैट पर टपक पड़े. आज दीपू के दिल ने दादाजी के पैरों की जलन महसूस की जिसे वह अपने आंसुओं से ठंडक पहुंचा रहा था.

तभी, शाम की सैर कर के दादाजी घर लौट आए. उन की नजर उस बैट पर गई जो दीपू ने अपने हाथ में पकड़ रखा था. हंसते हुए उन्होंने पूछा, ‘‘क्यों बेटा दीपू, याद आया बैट का किस्सा?’’

‘‘हां, दादाजी,’’ दीपू बोला. उस की आंखें भर आईं और वह दादाजी के गले लग गया. दादाजी ने देखा कि दीपू की आंखें नम हो गई थीं. दीपू बैट को प्यार से सहलाते, चूमते अपने कमरे में आया और उसे झाड़पोंछ कर कमरे में ऐसे रख दिया मानो वह उस बैट को हमेशा अपने सीने से लगा कर रखना चाहता है. दादाजी अपने कमरे में पहुंचे तो देखा कि दीपू की दादी पलंग पर बैठी हैं और इर्दगिर्द छोटेछोटे बरतनों का भंडार फैला है.

‘‘इधर तो आइए… देखिए, इन्हें देख कर कुछ याद आया?’’ वे बोलीं.

‘‘अरे, ये तुम्हें कहां से मिले?’’

‘‘बहू ने घर का कबाड़ निकाला है न, उस में से मिल गए.’’

अब वे दोनों पासपास बैठ गए. कभी उन छोटेछोटे बरतनों को देखते तो कभी दोनों दबेदबे से मुसकरा देते. फिर वे पुरानी यादों में खो गए.

यह वही पानदान था जो दादी ने अपनी सास से छिपा कर, चुपके से खरीदा था. दादाजी को पान का बड़ा शौक था, मगर उन दिनों पान खाना अच्छी आदत नहीं मानी जाती थी. दादाजी के शौक के लिए दादीजी का जी बड़ा तड़पता था. अपनी सास से छिपा कर उन्होंने पैसे जोड़ने शुरू किए, कुछ दादाजी से मांगे और फिर यह पानदान दादाजी के लिए खरीद लिया. चोरीछिपे घर में लाईं कि कहीं सास देख न लें. बड़ा सुंदर था पानदान. पानदान के अंदर छोटीछोटी डब्बियां लौंग, इलायची, सुपारी आदि रखने के लिए, छोटी सी हंडिया, चूने और कत्थे के लिए, हंडियों में तिल्लीनुमा कांटे और हंडियों के छोटे से ढक्कन. सारे बरतन पीतल के थे. उस के बाद हर रात पान बनता रहा और हर पान के साथ दादादादी के प्यार का रंग गहरा होता गया.

दादाजी जब बूढ़े हो चले और उन के नकली दांत लग गए तो सुपारी खाना मुश्किल हो गया. दादीजी के हाथों में भी पानदान चमकाने की आदत नहीं रही. बहू को पानदान रखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. अत: पानदान स्टोर में डाल दिया गया. आज घर का कबाड़ निकाला तो दादी को यह पानदान मिल गया, दादी ने पानदान उठाया और अपने कमरे में ले आईं. इस बार सास से नहीं अपनी बहू से छिपा कर.

थरथराती हथेलियों से वे पानदान संवार रही थीं. उन छोटी डब्बियों में जो अनकहे भाव छिपे थे, आज फिर से उजागर हो गए. घर के सभी सदस्य रात के समय अपनेअपने कमरों में आराम कर रहे थे. कंचन, अविनाश उसी आईने के सामने एकदूसरे की आंखों में झांक रहे थे. दादादादी पान के डब्बे को देख कर पुरानी बातों को ताजा कर रहे थे. दीपक बैट को सीने से लगाए दादाजी के प्यार को अनुभव कर रहा था जब उन्होंने स्वयं चप्पल न खरीद कर उन पैसों से उसे यह बैट खरीद कर दिया था. नंगे पांव चलने के कारण उन के पांवों में छाले हो गए थे.

सपना भी कबाड़ के ढेर में पड़ा अपने खिलौनों का सैट उठा लाई थी जिस से वह बचपन में घरघर खेला करती थी. यह सैट उसे मां ने दिया था.

छोटा सा चूल्हा, छोटेछोटे बरतन, चम्मच, कलछी, कड़ाही, चिमटा, नन्हा सा चकलाबेलन, प्यारा सा हैंडपंप और उस के साथ एक छोटी सी बालटी. बचपन की यादें ताजा हो गईं. राखी के पैसे जो मामाजी ने मां को दिए थे, उन्हीं से वे सपना के लिए ये खिलौने लाई थीं. तब सपना ने बड़े प्यार से सहलाते हुए सारे खिलौनों को पोटली में बांध लिया था. उस पोटली ने उस का बचपन समेट लिया था. आज उन्हीं खिलौनों को देख कर बचपन की एकएक घटना उस की आंखों के सामने घूमने लगी थी. दीपू भैया से लड़ाई, मां का प्यार और दादादादी का दुलार…

जिंदगी में कुछ यादें ऐसी होती हैं, जिन्हें दोबारा जीने को दिल चाहता है, कुछ पल ऐसे होते हैं जिन में खोने को जी चाहता है. हर कोई अपनी जिंदगी से ऐसे पलों को चुन रहा था. यही पल जिंदगी की भागदौड़ में कहीं छूट गए थे. ऐसे पल, ये यादें जिन चीजों से जुड़ी होती हैं वे चीजें कभी कबाड़ नहीं होतीं. Hindi Family Story

Romantic Story In Hindi: विसाल ए यार – इश्क की अंगड़ाई

Romantic Story In Hindi: दिल्ली के साउथ कैंपस के लोधी रोड पर बने दयाल सिंह कालेज में रोहित बीकौम का स्टूडैंट था और उसी की क्लास में आयशा नाम की एक खूबसूरत लड़की पढ़ती थी.

रोहित मिडिल क्लास फैमिली से था, जो एक सैकंड हैंड बाइक पर कालेज जाता था. परिवार में एक बहन और एक छोटा भाई था. दोनों ही अभी स्कूल में पढ़ते थे.

मां कम पढ़ीलिखी थीं, मगर उन का सपना बच्चों को अच्छी ऊंची तालीम दिलाना था. पिता दर्जी थे और वे दिनरात मेहनत करते थे, ताकि बच्चों को अच्छी परवरिश दे सकें.

इधर आयशा दिल्ली के नामचीन कपड़ा कारोबारी की बेटी थी. कभी वह क्रेटा गाड़ी से कालेज आ रही थी, तो कभी इनोवा से, कभी होंडा सिटी से तो कभी औडी कार से… मतलब, उस के घर में कई कारें थीं और परिवार के नाम पर केवल एक छोटा भाई और पिता.

भाई के जन्म के कुछ ही समय बाद किसी बीमारी के चलते आयशा की मां चल बसी थीं. पिता ने दोनों को बड़े लाड़प्यार से पाला था.

आयशा बेशक अमीर लड़की थी, पर उसे पैसे का घमंड छू तक नहीं गया था. लेकिन हां, जिद की पक्की थी वह. जो कह दिया या सोच लिया वह तो कर के ही रहना है, फिर चाहे उस में कितनी ही मुश्किलें क्यों न आएं.

आयशा की इसी जिंदादिली पर रोहित मरमिटा था, मगर वह यह नहीं जानता था कि आयशा इतने बड़े घराने से है. आखिरकार दोनों का इश्क अंगड़ाई लेने लगा.

‘‘आयशा, हमारा ग्रेजुएशन का यह आखिरी साल है. तुम ने आगे के बारे में क्या सोचा है? क्या तुम आगे पढ़ोगी या कुछ और?’’

‘‘रोहित, मैं तो अभी आगे पढ़ने की सोच रही हूं, मगर मैं तुम्हारे सिवा किसी और को अपना लाइफ पार्टनर नहीं बना सकती. अगर तुम्हें शादी की जल्दी हो तो मैं अपना प्लान बदल भी सकती हूं. तुम्हारे लिए मैं कुछ भी कर सकती हूं, मगर तुम्हारे बिना नहीं रह सकती. तुम न मिले तो मैं मर जाऊंगी.’’

‘‘आयशा, मैं भी तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊंगा, लेकिन अभी मैं इस लायक भी नहीं कि अपने परिवार का बोझ उठा सकूं. मुझे अभी आगे और पढ़ना है, ताकि मैं किसी अच्छी पोस्ट पर जौब कर सकूं और तुम्हें और अपने परिवार को हर वह खुशी दे सकूं, जिस के तुम सब हकदार हो. तुम्हें इंतजार करना होगा.’’

‘‘मैं मरते दम तक भी इंतजार करूंगी, लेकिन एक बार तुम्हें मेरे पापा से मिल लेना चाहिए. तब तक मेरी भी पढ़ाई पूरी हो जाएगी, फिर हम दोनों मिल कर अपना परिवार संभाल लेंगे.’’

‘‘ठीक है. मैं कल ही तुम्हारे पापा से मिलता हूं.’’

अगले दिन रोहित आयशा के पापा से मिलने गया, तो आयशा के पापा ने उस से कहा, ‘‘अरे रोहित, आओ बेटा. मुझे तुम्हारे बारे में आयशा ने सब बता दिया है. बेटा, तुम ने बहुत सही फैसला लिया कि एक बार सैट हो कर ही शादी के बारे में सोचना है.’’

‘‘जी हां अंकल, पहले इनसान को परिवार पालने लायक बनना चाहिए, उस के बाद ही परिवार को आगे बढ़ाने का सोचना चाहिए. आप से मुझे यही उम्मीद थी. आयशा… अब मेरी अमानत है आप के पास. ठीक है तो मैं चलता हूं.’’

जैसे ही रोहित जाने के लिए उठा, आयशा के पापा ने उस के हाथ पर

50 लाख रुपए का चैक रख दिया, जिसे रोहित हैरानी से देखते हुए बोला, ‘‘अंकल, यह सब क्या है?’’

‘‘बेटा, यह मेरी तरफ से एक छोटी सी मदद है, जो तुम्हारा भविष्य बनाने में काम आएगी. और अब मेरी बेटी को भूलने की कोशिश करो, ताकि मैं उस की शादी किसी अच्छे और ऊंचे घराने में कर सकूं.’’

‘‘अंकल, आप मेरी मदद कर रहे हैं या मेरे प्यार का सौदा?’’

‘‘कुछ भी समझ लो. अभी मैं तुम्हें प्यार से समझा रहा हूं, कहीं ऐसा न हो कि मुझे सख्ती से काम लेना पड़े.’’

रोहित चैक ठुकरा कर चला गया और जातेजाते कह गया, ‘‘अगर हमारा प्यार सच्चा है, तो कोई भी हमें मिलने से नहीं रोक सकता.’’

‘‘पहले इस लायक बन कर दिखाओ,’’ आयशा के पापा को भी अब गुस्सा आने लगा.

आयशा ने लाख कहा कि वह रोहित के बिना जिंदा नहीं रह सकती, पर उस के पापा ने उस की एक न सुनी और फरमान सुना दिया कि अगले महीने आयशा की शादी उन के दोस्त के बेटे आशीष से कर दी जाएगी.

अगले महीने आयशा की शादी बिजनैस टायकून सुरेश मेहता के बेटे आशीष मेहता से करा दी गई. लेकिन जब आयशा विदा होने लगी, तब उस ने पापा को एक नजर देख कर कहा, ‘‘पापा, अब तक मैं आप के साए तले थी, आप का हर हुक्म मानने को मजबूर थी, लेकिन अब मैं अपना हर फैसला लेने के लिए आजाद हूं.’’

‘‘आशीष, मैं किसी और से प्यार करती हूं, इसलिए मैं आप के साथ पत्नी धर्म नहीं निभा सकती,’’ आयशा ने सुहागरात पर ही अपने पति से साफ लफ्जों में कह दिया.

‘‘अगर ऐसा है, तो तुम ने अपने पापा से क्यों नहीं कहा? अब मुझे कहने से क्या फायदा? अब कानूनन तुम मेरी पत्नी हो और तुम पर मेरा हक है.’’

‘‘मगर, किसी की मरजी के खिलाफ उस का शरीर पाना भी कानूनन जुर्म है, यह तो आप जानते ही होंगे, इसलिए आप मुझे तलाक दे दें, ताकि मैं भी अपनी नई जिंदगी शुरू कर सकूं और आप भी.’’

‘‘मैं तुम्हें तलाक नहीं दे सकता. यह सब तुम्हें पहले सोचना था. हमारी इज्जत की धज्जियां उड़ जाएंगी… क्या कहेंगे लोग कि बिजनैस टायकून मेहता का बेटा बीवी को नहीं संभाल सका. मैं तुम्हें किसी कीमत पर तलाक नहीं दूंगा.’’

‘‘तो ठीक है, इस के जिम्मेदार आप खुद होंगे, मैं उसे नहीं छोड़ सकती.’’

और वही हुआ, जो एक पत्नी को नहीं करना चाहिए था. आयशा अकसर रोहित से मिलती, उस पर अपने हुस्न का जाल बिछाती, मगर रोहित खुद पर काबू पा लेता.

आग भला घी से कितना दूर रहेगी. जब घी और आग पासपास होंगे, तो आग बढ़ेगी भी, भड़केगी भी. एक दिन रोहित भी बहक गया और दोनों के जिस्मानी संबंध बन गए.

अब आयशा रोहित को कहती कि वह उस से जिस्मानी संबंध बनाए रखे, ताकि किसी तरह उस का पति उसे तलाक दे दे. अगर रोहित कहता कि ऐसा करना गलत है, तो आयशा बीमार होने का नाटक करती. एक बार उस ने कार से जानबूझ कर अपना ऐक्सिडैंट भी किया, ताकि रोहित की हमदर्दी उसे मिल सके… और उधर अपने पति आशीष से भी कुछ न छिपाती, ताकि वह परेशान हो कर उसे तलाक दे दे.

लेकिन आयशा का पति अपने खानदान और अपने स्टेटस की वजह से उसे तलाक नहीं देना चाहता था. उस ने आयशा को बहुत समझाया कि वह गलत काम न करे.

जैसेजैसे समय बीतता गया, रोहित को भी आयशा के जिस्म का चसका लगता गया. साथ ही, आयशा के पति के पैसे पर ऐश करने का भी वह आदी हो गया था. वह अब आयशा को किसी कीमत पर नहीं छोड़ना चाहता था, यहां तक कि उस की पढ़ाई का खर्च भी आयशा ही उठाती थी.

अचानक रोहित के पिता की मौत हो गई और इधर आयशा के पति ने भी आयशा के सारे बैंक अकाउंट सील करवा दिए. आयशा का घर से निकलना भी बंद कर दिया.

अब न तो आयशा के पास पैसा था और न ही रोहित के पापा की कमाई. सारी जिम्मेदारी रोहित पर आ गई. रोहित और आयशा का मिलना बंद हो गया.

इत्तिफाक से एक अच्छेखासे परिवार की एकलौती लड़की का रिश्ता रोहित के लिए आया और मां के समझाने पर रोहित ने शादी कर ली और ससुर का सारा बिजनैस संभालने लगा, जिस से रोहित का परिवार सैटल हो गया.

कुछ समय तक तो आयशा चुप रही, मगर उसे तन की भूख जब हद से बढ़ कर सताने लगी और रोहित से मिलने भी न दिया गया, तो उस ने खुदकुशी करने की कोशिश की.

आयशा के खुदकुशी करने वाले मुद्दे पर भी ससुराल वालों के लिए ही मुसीबत खड़ी होगी, इसलिए उस के पति आशीष ने अब अपने मातापिता से कुछ भी छिपाना ठीक नहीं समझा.

सारी बात जान कर आशीष के मातापिता ने आशीष को आयशा से तलाक के लिए राजी कर लिया.

इधर आयशा का तलाक हुआ और जैसे ही खुशीखुशी वह रोहित से मिलने उस के घर गई, सामने ही रोहित अपनी पत्नी के साथ नजर आया.

‘‘अरे आयशा, आओ… बड़े अच्छे मौके पर आई हो. आज मेरे बेटे का नामकरण है. आओ, तुम भी मेरे बेटे को आशीर्वाद दो.’’

आयशा हैरान सी खड़ी कभी रोहित को देखती, तो कभी उस के साथ खड़ी उस की पत्नी को, जिस की गोद में प्यारा सा बच्चा था. दूर कहीं से ‘मिर्जा गालिब’ फिल्म का सुरैया का गाना चल रहा था… ‘ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल ए यार होता…’ Romantic Story In Hindi

Hindi Romantic Story: गुनाहों का रिश्ता – सुदीप का किरण के लिए प्यार

Hindi Romantic Story: ‘‘किरण, क्या तुम मुझसे नाराज हो?’’

‘‘नहीं तो.’’

‘‘तो फिर तुम ने मुझसे अचानक बोलना क्यों बंद कर दिया?’’

‘‘यों ही.’’

‘‘मुझ से कोई गलती हो गई हो, तो बताओ… मैं माफी मांग लूंगा.’’

‘‘ऐसा कुछ नहीं है सुदीप. अब मैं सयानी हो गई हूं न, इसलिए लोगों को मुझ पर शक होने लगा है कि कहीं मैं गलत रास्ता न पकड़ लूं,’’ किरण ने उदास मन से कहा.

‘‘जब से तुम ने मुझे अपने से अलग किया है, तब से मेरा मन बेचैन रहने लगा है.’’

सुदीप की बातें सुन कर किरण बोली, ‘‘अभी तक हम दोनों में लड़कपन था, बढ़ती उम्र में जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती हैं. दूसरों के कहने पर यह सब समझ में आया.’’

‘‘तुम ने कभी मेरे बारे में सोचा है कि मैं कितना बेचैन रहता हूं?’’

‘‘घर का काम निबटा कर जब मैं अकेले में बैठती हूं, तो दूसरे दोस्तों की यादों के साथसाथ तुम्हारी भी याद आती है. हम दोनों बचपन के साथी हैं. अब बड़े हो कर भी लगता है कि हम एकदूसरे के हमजोली बने रहेंगे.’’

‘‘तो दूरियां मत बनाए रखो किरण,’’ सुदीप ने कहा.

यह सुन कर किरण चुप हो गई.

जब सुदीप ने अपने दिल की बात कही, तो किरण का खिंचाव उस की ओर ज्यादा बढ़ने लगा.

दोनों अपने शुरुआती प्यार को दुनिया की नजरों से छिपाने की कोशिश करने लगे. लेकिन जब दोनों के मिलने की खबर किरण की मां रामदुलारी को लगी, तो उस ने चेतावनी देते हुए कहा कि वह अपनी हद में ही रहे.

उसी दिन से सुदीप का किरण के घर आनाजाना बंद हो गया.

लेकिन मौका पा कर सुदीप किरण के घर पहुंच गया. किरण ने बहुत कहा कि वह यहां से चला जाए, लेकिन सुदीप नहीं माना. उस ने कहा, ‘‘मैं ने तुम से दिल लगाया, तुम डरती क्यों हो? मैं  तुम से शादी करूंगा, मु?ा पर भरोसा करो.’’

‘‘सुदीप, प्यार तो मैं भी तुम से करती हूं, लेकिन… जैसे अमीर और गरीब का रिश्ता नहीं होता, इसी तरह से ब्राह्मण और नीची जाति का रिश्ता भी मुमकिन नहीं, इसलिए हम दोनों दूर ही रहें तो अच्छा होगा.’’

सुदीप पर इस बात का कोई असर नहीं पड़ा.

वह आगे बढ़ा और किरण को बांहों में भर कर चूमने लगा. पहले तो किरण को अच्छा लगा, लेकिन जब सुदीप हद से ज्यादा बढ़ने लगा, तो वह छिटक कर अलग हो गई.

‘‘बस सुदीप, बस. ऐसी हरकतें जब बढ़ती हैं, तो अनर्थ होते देर नहीं लगती. अब तुम यहां से चले जाओ,’’ नाखुश होते हुए किरण बोली.

‘‘इस में बुरा मानने की क्या बात है किरण, प्यार में यही सब तो होता है.’’

‘‘होता होगा. तुम ने इतनी जल्दी कैसे सम?ा लिया कि मैं इस के लिए राजी हो जाऊंगी?’’

‘‘बस, एक बार मेरी प्यास बुझ दो. मैं दोबारा नहीं कहूंगा. शादी से पहले ऐसा सबकुछ होता है.’’

‘‘नहीं सुदीप, कभी नहीं.’’

इस तरह सुदीप ने किरण से कई बार छेड़खानी की कोशिश की, पर कामयाबी नहीं मिली.

कुछ दिन बाद किरण के मातापिता  दूसरे गांव में एक शादी में जातेजाते किरण को कह गए थे कि वह घर से बाहर नहीं निकलेगी और न ही किसी को घर में आने देगी.

उस दिन अकेली पा कर सुदीप चुपके से किरण के घर में घुसा और अंदर

से किवाड़ बंद कर किरण को बांहों में कस लिया.

अपने होंठ किरण के होंठों पर रख कर वह देर तक जबरदस्ती करता रहा, जिस से दोनों के जिस्म में सिहरन पैदा हो गई, दोनों मदहोश होने लगे.

किरण के पूरे बदन को धीरेधीरे सहलाते हुए सुदीप उस की साड़ी ढीली कर के तन से अलग करने की कोशिश करने लगा.

किरण का ध्यान टूटा, तो उस ने जोर से धक्का दे कर सुदीप को चारपाई से अलग किया और अपनी साड़ी ठीक करते हुए गरजी, ‘‘खबरदार, जो तुम ने मेरी इज्जत लूटने की कोशिश की. चले जाओ यहां से.’’

‘‘चला तो जाऊंगा, लेकिन याद रखना कि तुम ने आज मेरी इच्छा पूरी नहीं होने दी,’’ सुदीप गुस्से में चला गया.

उस के जाने के बाद किरण की आंखों से आंसू निकल आए.

मां के लौटने पर किरण ने सारी सचाई बता दी. रामदुलारी ने उसे चुप रहने को कहा.

किरण के पिता सुंदर लाल से रामदुलारी ने कहा, ‘‘लड़की सयानी हो गई है, कुछ तो फिक्र करो.’’

‘‘तुम इसे मामूली बात सम?ाती हो? आजकल लड़की निबटाने के लिए गांठ भरी न हो, तो कोई बात नहीं करेगा. भले ही उस लड़के वाले के घर में कुछ न हो.’’

‘‘तो क्या यही सोच कर हाथ पर हाथ धर बैठे रहोगे?’’

‘‘भरोसा रखो. वह कोई गलत काम नहीं करेगी.’’

सुंदर लाल की दौड़धूप रंग लाई और एक जगह किरण का रिश्ता पक्का हो गया.

किरण की शादी की बात जब सुदीप के कानों में पहुंची, तो वह तड़प उठा.

एक रात किरण अपने 8 साला भाई के साथ मकान की छत पर सोई थी. उस के बदन पर महज एक साड़ी थी.

किरण और सुदीप के मकानों के बीच दूसरे पड़ोसी का मकान था, जिसे पार करता हुआ सुदीप उस की छत पर चला गया.

सुदीप किरण की बगल में जा कर लेट गया. किरण की नींद खुल गई. देखा कि वह सुदीप की बांहों में थी. पहले तो उस ने सपना सम?ा, पर कुछ देर में ही चेतना लौटी. वह सबकुछ सम?ा गई. उस ने सुदीप की बेजा हरकतों पर ललकारा.

‘‘चुप रहो किरण. शोर करोगी, तो सब को पता चल जाएगा. बदनामी तुम्हारी होगी. मैं तो कह दूंगा कि तुम ने रात में मु?ो मिलने के लिए बुलाया था,’’ कहते हुए सुदीप ने किरण का मुंह हथेली से बंद कर दिया.

इस के बाद सुदीप किरण के साथ जोरजबरदस्ती करता रहा और वह चुपचाप लेटी रही.

किरण की आंखें डबडबा गईं. उस ने कहा, ‘‘सुदीप, आज तुम ने मेरी सारी उम्मीदों को खाक में मिला दिया. आज तुम ने मेरे अरमानों पर गहरी चोट पहुंचाई है. मैं तुम से प्यार करती हूं, करती रहूंगी, लेकिन अब मेरी नजरों से दूर हो जाओ,’’ कह कर वह रोने लगी.

उसी समय पास में सोए किरण के छोटे भाई की नींद खुली.

‘मांमां’ का शोर करते हुए वह छत से नीचे चला गया और वहां का देखा हाल मां को  सुनाया. सुंदर लाल भी जाग गया. दोनों चिल्लाते हुए सीढ़ी से छत की ओर भागे. उन की आवाज सुन कर सुदीप किरण को छोड़ कर भाग गया.

दोनों ने ऊपर पहुंच कर जो नजारा देखा, तो दोनों के रोंगटे खड़े हो गए. मां ने बेटी को संभाला. बाप छत पर से सुदीप को गालियां देता रहा.

दूसरे दिन पंचायत बैठाने के लिए किरण के पिता सुंदर लाल ने ग्राम प्रधान राजेंद्र प्रसाद से गुजारिश करते हुए पूरा मामला बतलाया और पूछा, ‘‘हम लोग पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराना चाहते हैं. आप हमारे साथ चलेंगे, तो पुलिस कार्यवाही करेगी, वरना हमें टाल दिया जाएगा.’’

‘‘सुंदर लाल, मैं थाने चलने के लिए तैयार हूं, लेकिन सोचो, क्या इस से तुम्हारी बेटी की गई इज्जत वापस लौट आएगी?’’

‘‘फिर हम क्या करें प्रधानजी?’’

‘‘तुम चाहो, तो मैं पंचायत बैठवा दूं. मुमकिन है, कोई रास्ता दिखाई पड़े.’’

‘‘आप जैसा ठीक सम?ों वैसा करें,’’ कहते हुए सुंदर लाल रोने लगा.

दूसरे दिन गांव की पंचायत बैठी.

गांव के कुछ लोग ब्राह्मणों के पक्ष में थे, तो कुछ दलितों के पक्ष में.

कुछ लोगों ने सुदीप को जेल भिजवाने की बात कही, तो कुछ ने सुदीप से किरण की शादी पर जोर डाला.

शादी की बात पर सुदीप के पिता बिफर पड़े, ‘‘कैसी बातें कहते हो?

कहीं हम ब्राह्मणों के यहां दलित

ब्याही जाएगी.’’

कुछ नौजवान शोर मचाने लगे, ‘जब तुम्हारे बेटे ने दलित से बलात्कार किया, तब तुम्हारा धर्म कहां था?’

‘‘ऐसा नहीं होगा. पहली बात तो यह कि सुदीप ने ऐसा किया ही नहीं. अगर गलती से किया होगा, तो धर्म नहीं बदल जाता,’’ सुदीप की मां बोली.

‘‘तो मुखियाजी, आप सुदीप को जेल भिजवा दें, वहीं फैसला होगा,’’ किरण की मां रामदुलारी ने कहा.

ग्राम प्रधान राजेंद्र प्रसाद ने पंचों की राय जानी, तो बोले, ‘पंचों की राय है कि सुदीप ने जब गलत काम किया है, तो अपनी लाज बचाने के लिए किरण से शादी कर ले, वरना जेल जाने के लिए तैयार रहे.’

यह सुन कर ब्राह्मण परिवार सन्न रह गया.

पंचायत ने किरण की इच्छा जानने की कोशिश की. किरण ने भरी पंचायत में कहा, ‘‘मेरी इज्जत सुदीप ने लूटी है. इस वजह से अब मु?ो उसी के पास अपनी जिंदगी महफूज नजर आती है.

‘‘गंदे बरताव की वजह से मैं सुदीप से शादी नहीं करना चाहती थी, लेकिन अब मैं मजबूर हूं, क्योंकि इस घटना को जानने के बाद अब मु?ा से कोई शादी नहीं करना चाहेगा.’’

सुदीप के पिता ने दुखी मन से कहा, ‘‘मेरी इच्छा तो किरण की शादी वहशी दरिंदे सुदीप के साथ करने की नहीं थी, फिर भी मैं किरण की शादी सुदीप से करने को तैयार हूं.’’

किरण व सुदीप के घरपरिवार में शादी पर रजामंदी हो जाने पर पंचायत ने भी यह गुनाहों का रिश्ता मान लिया. Hindi Romantic Story

Hindi Family Story: वजह – प्रिया से लड़के वालों ने क्यों रिश्ता तोड़ लिया

Hindi Family Story: ‘‘अरे,संभल कर बेटा,’’ मैट्रो में तेजी से चढ़ती प्रिया के धक्के से आहत बुजुर्ग महिला बोलीं.

प्रिया जल्दी में आगे बढ़ गई. बुजुर्ग महिला को यह बात अखर गई. वे उस के करीब जा कर बोलीं, ‘‘बेटा, चाहे कितनी भी जल्दी हो पर कभी शिष्टाचार नहीं भूलने चाहिए. तुम ने एक तो मुझे धक्का मार कर मेरा चश्मा गिरा दिया उस पर मेरे कहने के बावजूद मुझ से माफी मांगने के बजाय आंखें दिखा रही हो.’’

अब तो प्रिया ने उन्हें और भी ज्यादा गुस्से से देखा. मैं जानती हूं, प्रिया को गुस्सा बहुत जल्दी आता है. इस में उस की कोई गलती नहीं. वह घर की इकलौती लाडली बेटी है. गजब की खूबसूरत और होशियार भी. वह जल्दी नाराज होती है तो सामान्य भी तुरंत हो जाती है. उसे किसी की टोकाटाकी या जोर से बोलना पसंद नहीं. इस के अलावा उसे किसी से हारना या पीछे रहना भी नहीं भाता.

जो चाहती उसे पा कर रहती. मैं उसे अच्छी तरह समझती हूं. इसीलिए सदैव उस के पीछे रहती हूं. आगे चलने या रास्ते में आने का प्रयास नहीं करती.

मुझे जिंदगी ने भी कुछ ऐसा ही बनाया है. बचपन में अपनी मां को खो दिया था. पिता ने दूसरी शादी कर ली. सौतेली मां को मैं बिलकुल नहीं भाती थी. मैं दिखने में भी खूबसूरत नहीं. एक ही उम्र की होने के बावजूद मुझ में और प्रिया में दिनरात का अंतर है. वह दूध सी सफेद, खूबसूरत, नाजुक, बड़ीबड़ी आंखों वाली और मैं साधारण सी हर चीज में औसत हूं.

जाहिर है, पापा की लाडली भी प्रिया ही थी. मेरे प्रति तो वे केवल अपनी जिम्मेदारी ही निभा रहे थे. पर मैं ने बचपन से ही अपनी परिस्थितियों से समझौता करना सीख लिया था. मुझे किसी की कोई बात बुरी नहीं लगती. सब की परवाह करती पर इस बात की परवाह कभी नहीं करती कि मेरे साथ कौन कैसा व्यवहार कर रहा है. जिंदगी जीने का एक अलग ही तरीका था मेरा. शायद यही वजह थी कि प्रिया मुझ से बहुत खुश रहती. मैं अकसर उस की सुरक्षाकवच बन कर खड़ी रहती.

आज भी ऐसा ही हुआ. प्रिया को बचाने के लिए मैं सामने आ गई, ‘‘नहींनहीं आंटीजी, आप प्लीज उसे कुछ मत कहिए. प्रिया ने आप को देखा नहीं था. वह जल्दी में थी. उस की तरफ से मैं आप से माफी मांगती हूं, प्लीज, माफ कर दीजिए.’’

‘‘बेटा जब गलती तूने की ही नहीं तो माफी क्यों मांग रही है? तूने तो उलटा मुझे मेरा गिरा चश्मा उठा कर दिया. तेरे जैसी बच्चियों की वजह से ही दुनिया में बुजुर्गों के प्रति सम्मान बाकी है वरना इस के जैसी लड़कियां तो…’’

‘‘मेरे जैसी से क्या मतलब है आप का? ओल्ड लेडी, गले ही पड़ गई हो,’’ बुजुर्ग महिला को झिड़कती हुई प्रिया आगे बढ़ गई.

मुझे प्रिया की यह बात बहुत बुरी लगी. मैं ने बुजुर्ग महिला को सहारा देते हुए खाली पड़ी सीट पर बैठाया और उन्हें चश्मा पहना कर प्रिया के पास लौट आई.

हम दोनों जल्दीजल्दी घर पहुंचे. प्रिया का मूड औफ हो गया था. पर मैं उसे लगातार चियरअप करने का प्रयास करती रही.

मैं सिर्फ प्रिया की रक्षक या पीछे चलने वाली सहायिका ही नहीं थी वरन उस की सहेली और सब से बड़ी राजदार भी थी. वह अपने दिल की हर बात सब से पहले मुझ से ही शेयर करती. मैं उस के प्रेम संबंधों की एकमात्र गवाह थी. उसे बौयफ्रैंड से मिलने कब जाना है, कैसे इस बात को घर में सब से छिपाना है और आनेजाने का कैसे प्रबंध करना है, इन सब बातों का खयाल मुझे ही रखना होता था.

प्रिया का पहला बौयफ्रैंड 8वीं क्लास में उस के साथ पढ़ने वाला प्रिंस था. उसी ने पीछे पड़ कर प्रिया को प्रोपोज किया था. उस की कहानी करीब 4 सालों तक चली. फिर प्रिया ने उसे डिच कर दिया. दूसरा बौयफ्रैंड वर्तमान में भी प्रिया के साथ था. अमीर घर का इकलौता चिराग वैभव नाम के अनुरूप ही वैभवशाली था. प्रिया की खूबसूरती से आकर्षित वैभव ने जब प्रोपोज किया तो प्रिया मना नहीं कर सकी.

आज भी प्रिया उस के साथ रिश्ता निभा रही है पर दिल से उस से जुड़ नहीं सकी है. बस दोनों के बीच टाइमपास रिलेशनशिप ही है. प्रिया की नजरें किसी और को ही तलाशती रहती हैं.

उस दिन हमें अपनी कजिन की शादी में नोएडा जाना था. मम्मी ने पहले ही ताकीद कर दी थी कि दोनों बहनें समय पर तैयार हो जाएं. प्रिया के लिए पापा बेहद खूबसूरत नीले रंग का गाउन ले आए थे जबकि मैं ने अपनी पुरानी मैरून ड्रैस निकाल ली.

नई ड्रैस प्रिया की कमजोरी है. इसी वजह से जब भी पापा प्रिया को पार्टी में ले जाना चाहते तो इसी तरह एक नई ड्रैस उस के बैड पर चुपके से रख आते.

आज भी प्रिया ने नई डै्रस देखी तो खुशी से उछल पड़ी. जल्दी से तैयार हो कर निकली तो सब दंग रह गए. बहुत खूबसूरत लग रही थी.

‘‘आज तो तू बहुतों का कत्ल कर के आएगी,’’ मैं ने प्यार से उसे छेड़ा तो वह मुझे बांहों में भर कर बोली, ‘‘बहुतों का कत्ल कर के क्या करना है, मुझे तो बस अपने उसी सपनों के राजकुमार की ख्वाहिश है जिसे देखते ही मेरी नजरें झपकना भूल जाएं.’’

‘‘जरूर मिलेगा मैडम, मगर अभी सपनों की दुनिया से जरा बाहर निकलिए और पार्टी में चलिए. क्या पता वहीं कोई आप का इंतजार कर रहा हो,’’ मैं ने उसे छेड़ते हुए कहा तो वह हंस पड़ी.

पार्टी में पहुंच कर हम मस्ती करने लगे. करीब 1 घंटा बीत चुका था. अचानक प्रिया मेरी बांह पकड़ कर खींचती हुई मुझे अलग ले गई और कानों में फुसफुसा कर बोली, ‘‘प्रज्ञा वह देखो सामने. ब्लू सूट पहने मेरे सपनों का राजकुमार खड़ा है. मुझे तो बस इसी से शादी करनी है.’’

मैं खुशी से उछल पड़ी, ‘‘सच प्रिया? तो क्या तेरी तलाश पूरी हुई?’’

‘‘हां,’’ प्रिया ने शरमाते हुए कहा.

सामने खड़ा नौजवान वाकई बहुत हैंडसम और खुशमिजाज लग रहा था. मैं ने कहा, ‘‘मुझे तेरी पसंद पर नाज है प्रिया, मैं पता लगाती हूं कि यह है कौन? वैसे तब तक तुझे उस से दोस्ती करने का प्रयास करना चाहिए.’’

वह रोंआसी हो कर बोली, ‘‘यार यही तो समस्या है. वह पहला लड़का है जो मुझे भाव नहीं दे रहा. मैं ने 1-2 बार प्रयास किया पर वह अपने घर वालों में ही व्यस्त है.’’

‘‘यार कुछ लड़के शर्मीले होते हैं. हो सकता है वह दूसरे लड़कों की तरह बोल्ड न हो जो पहली मुलाकात में ही दोस्ती के लिए उतावले हो उठते हैं.’’

‘‘यार तभी तो यह लड़का मुझे और भी ज्यादा पसंद आ रहा है. दिल कर रहा है कि किसी भी तरह यह मेरा बन जाए.’’

‘‘तू फिक्र मत कर. मैं इस के बारे में सारी बात पता करती हूं. सारी कुंडली निकलवा लूंगी,’’ मैं ने उस लड़के की तरफ देखते हुए कहा.

जल्द ही कोशिश कर के मैं ने उस लड़के से जुड़ी काफी जानकारी इकट्ठी कर ली. वह हमारी कजिन के फ्रैंड का भाई था. उस का नाम मयूर था.

वह कहां काम करता है, कहां रहता है, क्या पसंद है, घर में कौनकौन हैं जैसी बातें मैं ने प्रिया को बता दीं. प्रिया ने फेसबुक, लिंक्डइन जैसी सोशल मीडिया साइट्स पर जा कर उस लड़के के बारे में और भी जानकारी ले ली. प्रिया ने फेसबुक पर मयूर को फ्रैंड रिक्वैस्ट भी भेजी पर उस ने स्वीकार नहीं की.

अब तो मैं अकसर देखती कि प्रिया उस लड़के के ही खयालों में खोई रहती है. उसी की तसवीरें देखती रहती है या उस की डिटेल्स ढूंढ़ रही होती है. मुझे समझ में आ गया कि प्रिया को उस लड़के से वास्तव में प्यार हो गया है.

एक दिन मैं ने यह बात पापा को बता दी और आग्रह किया कि वे उस लड़के के घर प्रिया का रिश्ता ले कर जाएं. पापा ने उस के परिवार वालों से बात चलाई तो पता चला कि वे लोग भी मयूर के लिए लड़की ढूंढ़ रहे हैं. पापा ने अपनी तरफ से प्रिया के लिए उन्हें प्रपोजल दिया.

रविवार के दिन मयूर और उस के परिवार वाले प्रिया को देखने आने वाले थे. प्रिया बहुत खुश थी. अपनी सब से अच्छी ड्रैस पहन कर वह तैयार हुई. मैं ने बहुत जतन से उस का मेकअप किया. मेकअप कर के बालों को खुला छोड़ दिया. वह बेहद खूबसूरत लग रही थी.

मगर आज पहली दफा प्रिया मुझे नर्वस दिखाई दे रही थी. जब प्रिया को उन के सामने लाया गया तो मयूर और उस की मां एकटक उसे देखते रह गए. मैं भी पास ही खड़ी थी. मयूर ने तो कुछ नहीं कहा पर उस की मां ने बगैर किसी औपचारिक बातचीत के जो कहा उसे सुन कर हम सब सकते में आ गए.

लड़के की मां ने कहा, ‘‘खूबसूरती और आकर्षण तो लड़की में कूटकूट कर भरा है, मगर आगे कोई बात की जाए उस से पहले ही क्षमा मांगते हुए मैं यह रिश्ता अस्वीकार करती हूं.’’

प्रिया का चेहरा उतर गया. पापा भी इस अप्रत्याशित इनकार से हैरान थे. अजीब मुझे भी बहुत लग रहा था. आखिर प्रिया जैसी खूबसूरत और पढ़ीलिखी बड़े घर की लड़की को पाना किसी के लिए भी हार्दिक प्रसन्नता की बात होती और फिर प्रिया भी तो इस रिश्ते के लिए कितनी उत्साहित थी.

पापा ने हाथ जोड़ते हुए धीरे से पूछा, ‘‘इस इनकार की वजह तो बता दीजिए. आखिर मेरी बच्ची में कमी क्या है?’’

लड़के की मां ने बात बदली और मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘मुझे यह लड़की पसंद है. यदि आप चाहें तो मैं इसे अपनी बहू बनाना पसंद करूंगी. आप घर में बात कर के जब चाहें अपना जवाब दे देना.’’

पापा ने उम्मीद के साथ मयूर की ओर देखा तो वह भी हाथ जोड़ता हुआ बोला, ‘‘अंकल, जैसा मम्मी कह रही हैं मेरा जवाब भी वही है. मैं भी चाहूंगा कि प्रज्ञा जैसी लड़की ही मेरी जीवनसाथी बने.’’

प्रिया रोती हुई अंदर भाग गई. मैं भी उस के पीछेपीछे अंदर चली गई. उन्हें बिदा कर मम्मीपापा भी जल्दी से प्रिया के कमरे में आ गए.

मगर प्रिया किसी से भी बात करने को तैयार नहीं थी. रोती हुई बोली, ‘‘प्लीज, आप लोग बाहर जाएं, मैं अभी अकेली रहना चाहती हूं.’’

हम सब बाहर आ गए. इस समय मेरी स्थिति अजीब हो रही थी. समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या कहूं. कुसूरवार न होते हुए भी आज मैं सब की आंखों में चुभ रही थी. मम्मी मुझे खा जाने वाली नजरों से देख रही थीं तो प्रिया भी नजरें चुरा रही थी. मुझे रात भर नींद नहीं आई.

अगली सुबह भी प्रिया बहुत उदास दिखी. उस की नजरों में दोषी मैं ही थी और यह बात सहन करना मेरे लिए बहुत कठिन था. मैं ने तय किया कि मैं मयूर के घर वालों के इनकार की वजह जान कर रहूंगी. प्रिया को छोड़ कर उन्होंने मुझे क्यों चुना जबकि प्रिया मुझ से लाख गुना ज्यादा खूबसूरत और स्मार्ट है, होशियार है. मैं तो कुछ भी नहीं.

बात की तह तक पहुंचने का फैसला कर मैं मयूर के घर पहुंच गई. बहुत आलीशान और खूबसूरत घर था उन का. महरी ने दरवाजा खोला और मुझे अंदर आने को कहा. घर बहुत करीने से सजा था. मैं ड्राइंगरूम का जायजा ले रही थी कि तभी बगल के कमरे से चश्मा पोंछती बुजुर्ग महिला निकलीं.

मुझे उन्हें पहचानने में एक पल भी नहीं लगा. यह तो मैट्रो वाली वही बुजुर्ग महिला थीं जिन का चश्मा कुछ दिन पहले प्रिया ने गिरा दिया था. मैं ने उन्हें चश्मा उठा कर दिया था. मुझे सहसा सारी बात समझ में आने लगी कि क्यों प्रिया को रिजैक्ट कर उन्होंने मुझे चुना.

सामने से मयूर की मां निकलीं. मुसकराती हुई बोलीं, ‘‘बेटा, मैं समझ सकती हूं कि तू क्या पूछने आई है. शायद तुझे अपने सवाल का जवाब मिल भी गया होगा. दरअसल, उस दिन मैट्रो में मैं भी वहीं थी और सब कुछ अपनी नजरों से देखा था. खूबसूरती, रंगरूप, धन, इन सब से ऊपर एक चीज होती है और वह है संस्कार. हमें एक सभ्य और व्यवहारकुशल बहू चाहिए बिलकुल तुम्हारे जैसी.’’

मैं ने आगे बढ़ कर दोनों के पांव छूने चाहे पर अम्मांजी ने मुझे गले से लगा लिया.

घर पहुंची तो प्रिया ने पहले की तरह रूखेपन से मेरी तरफ देखा और फिर अपने काम में लग गई.

मैं उस के पास जा कर धीरे से बोली, ‘‘कल के इनकार की वजह जानने मैं मयूर के घर गई थी. तुझे याद हैं वे बुजुर्ग महिला, जिन का चश्मा मैट्रो में तेरी टक्कर से नीचे गिर गया था? दरअसल, वे बुजुर्ग महिला मयूर की दादी हैं और इसी वजह से उन्होंने तुझे न कह दिया.

पर तू परेशान मत हो प्रिया. तेरी पसंद के लड़के को मैं कभी अपना नहीं बनाऊंगी. मैं न कह कर आई हूं.’’

प्रिया खामोशी से मेरी तरफ देखती रही. उस की आंखों में रूखेपन की जगह बेचारगी और अफसोस ने ले ली थी. थोड़ी देर चुप बैठने के बाद वह धीरे से उठी और मुझे गले लगाती हुई बोली, ‘‘पागल है क्या? इतने अच्छे रिश्ते के लिए कभी न नहीं करते. मैं करवाऊंगी मयूर से तेरी शादी.’’

मैं आश्चर्य से उसे देखने लगी तो वह मुसकराती हुई बोली, ‘‘आज तक तू मेरे लिए जीती रही है. आज समय है कि मैं भी तेरे लिए कुछ अच्छा करूं. खबरदार जो न कहा.’’

मेरे दिल पर पड़ा बोझ हट गया था. मैं ने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया. Hindi Family Story

Hindi Romantic Story: सागर से मुझ को मिलना नहीं है – कहानी अल्हड़ गंगा की

Hindi Romantic Story: गंगा गांव की एक भोलीभाली और बेहद खूबसूरत लड़की थी. उस की मासूम खूबसूरती को वैसे तो शब्दों में ढालना बहुत ही मुश्किल है, पर यह समझ लीजिए कि गंगा को देख कर ऐसा लगता था, जैसे खेतों की हरियाली उसी पर छाई हुई है…

अल्हड़, मस्त गंगा पूरे गांव में घूमतीफिरती… कभी गन्ना चूसते हुए, तो कभी बकरी के बच्चे को पकड़ने के लिए… गांवभर के मुस्टंडे आंखें

भरभर कर उसे देखा करते और ठंडी आहें भरते थे, पर गंगा किसी को घास नहीं डालती थी.

गांव के सरपंच के बेटे की शादी का मौका था… सरपंच के घर खूब रौनक थी… दूरदराज के गांवों से भी ढेरों मेहमान आए थे.

गंगा के पिता लक्ष्मण सिंह और सरपंच में गहरी दोस्ती थी, सो गंगा का पूरा परिवार उस शादी में घराती के रोल में बिजी था. कई सारे इंतजाम लक्ष्मण सिंह के ही जिम्मे थे…

गंगा की मां पार्वती घर के कामों को निबटाने में सरपंच की पत्नी का हाथ बंटा रही थी. गंगा के लिए तो यह शादी जैसे कोई त्योहार, कोई उत्सव जैसी थी… नएनए कपड़े पहनना, सजनासंवरना और नाचगाने में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेना…

‘‘अरी ओ गंगा… कुछ काम भी कर लिया कर… सारा दिन यहां से वहां मटकती फिरती है…’’ पार्वती ने कहा.

‘‘अरी अम्मां, काम करने के लिए तू तो है… अभी तो मेरी खेलनेकूदने की उम्र है,’’ गंगा खिलखिलाते हुए बोली.

‘‘देख तो… ताड़ जैसी हो गई है… कल हाथ पीले हो गए, तो अपनी ससुराल में खिलाएगी… पत्थर…’’ पार्वती गुस्सा दिखाते हुए बोली.

‘‘अम्मां… तू फिक्र मत कर… मेरी ससुराल में नौकरचाकर होंगे… मैं नहीं करूंगी कोई कामधाम,’’ गंगा ने तपाक से जवाब दिया.

‘‘तेरे मुंह में गुड़ की डली मेरी लाडो… तेरी खातिर ऐसी ही ससुराल देखेंगे…’’ बीच में गंगा के पिता लक्ष्मण सिंह बोले.

‘‘यह लो… सेर को सवा सेर. समझाने के बजाय उस की हां में हां मिला रहे हो… ओ गंगा के बापू… क्यों इतना सिर चढ़ा रहे हो… लड़की जात है… दोचार गुण सीख लेगी तो ससुराल में काम आएंगे…’’ गंगा की मां तुनक कर बोली.

‘‘क्यों इस के पीछे पड़ी रहती हो… जब ब्याह होएगा… तो सब अपनेआप सीख जाएगी…’’ लक्ष्मण सिंह ने कहा.

‘‘बापू… यह देखो… यह घाघरा और चोली सिलवाई है… अम्मां की बनारसी साड़ी से… कैसी है बापू?’’ गंगा ने पिता से पूछा.

‘‘बहुत बढि़या है… मेरी लाडो एकदम रानी लगती है रानी…’’ लक्ष्मण सिंह खुश होते हुए बोले.

गंगा लहंगाचोली को अपने तन से लगा कर हिलहिल कर खुद को निहार रही थी.

शाम को सरपंच के यहां से बरात निकलनी थी. गंगा के मांबापू पहले ही वहां पहुंच चुके थे. गंगा सजसंवर कर जब वहां पहुंची, तो सब के मुंह खुले के खुले रह गए…

हर कोई गंगा को ही देख रहा था… सब को अपनी तरफ देखते हुए देख कर गंगा शरमा गई. शर्म के मारे उस के गाल और गुलाबी हो गए…

दूसरे गांवों के सरपंच भी वहां आए हुए थे. सीमन गांव के सरपंच और उन का बेटा निहाल भी इस शादी में आए थे… निहाल बांका जवान था. गठा हुआ शरीर और रोबदार चेहरामोहरा… झबरीली मूंछें और गुलाबी होंठ.

गंगा और निहाल ने एकसाथ एकदूजे को देखा. निहाल से नजरें मिलते ही गंगा का दिल जोरजोर से धड़कने लगा और निहाल तो बस एकटक गंगा को ही देखे जा रहा था… मानो उस की आंखें गंगा के सिवा कुछ देखना ही नहीं चाहती हों.

‘‘चलो चलो… जल्दी करो… वर निकासी का समय हो गया,’’ किसी ने कहा.

गंगा और निहाल की तंद्रा टूटी. बरात गई और बरात वापस भी आ गई… लेकिन गंगा और निहाल तो जैसे एकदूसरे में ठहर गए थे… प्यार का बीज फूट चुका था.

‘‘गंगा…’’ किसी ने धीरे से गंगा को पुकारा.

गंगा ने देखा कि एक कोने में निहाल खड़ा था… उस ने गंगा को इशारा किया कि घर के पीछे आ जाओ.

गंगा का दिल जोर से धड़क रहा था, पर निहाल से मिलने की बेताबी भी थी… सब से नजरें बचा कर गंगा घर के पिछवाड़े में पहुंच गई, जहां निहाल बेसब्री से उस का इंतजार कर रहा था.

‘‘गंगा…’’ निहाल ने गंगा के कान

में कहा.

गंगा का पूरा शरीर सिहर गया… मानो निहाल की सांसें, खून के साथ उस की धमनियों में बहने लगी हों.

‘‘हम आज अपने गांव वापस जा रहे हैं,’’ निहाल ने गंगा से कहा.

यह सुन कर गंगा की आंखों में आंसू आ गए और उस ने पलकें उठा कर निहाल को देखा.

‘‘अरी पगली, रोती क्यों हो… अब मैं तुम्हें ब्याह कर हमेशा के लिए साथ ले जाऊंगा,’’ निहाल ने गंगा के आंसू पोंछते हुए कहा.

गंगा थरथर कांप रही थी. निहाल ने उस का माथा चूम लिया. गंगा को ऐसा एहसास पहले कभी नहीं हुआ था. वह लता की तरह निहाल से लिपट गई.

निहाल उसे उठा कर पिछवाड़े में मवेशियों के लिए बनी कोठरी में ले गया. गंगा सुधबुध खो बैठी थी और निहाल बेताब था. उस अंधेरी कोठरी में अचानक बिजलियां चमकीं… कई सारे जुगनू टिमटिमाने लगे… जज्बातों की बारिश जैसे थमने का नाम ही नहीं ले रही थी… बांध टूट गए…

कुछ ही पलों में सबकुछ शांत था, मानो एक भयंकर तूफान आया और

फिर थम गया, जो छोड़ गया कुछ निशानियां… जिन्हें अब गंगा समेट

रही थी.

‘‘गंगा, मैं जल्दी ही आऊंगा और तुम्हें अपनी दुलहन बना कर ले जाऊंगा,’’ निहाल बोला.

गंगा शांत थी. उसे कुछ कहनेसुनने का समय ही न मिला. निहाल फुरती से कोठरी से बाहर निकल गया.

गंगा पिघली जा रही थी. निहाल के प्यार और इस अनोखे एहसास से घिरी गंगा कोठरी से बाहर निकली. निहाल अपने पिता के साथ वापस गांव के लिए निकल चुका था.

गंगा नहीं जानती थी कि जिस पर उस ने अपना सबकुछ लुटा दिया है, वह कौन है, किस गांव का है और उसे लेने कब आएगा.

मदमस्त लहराती चंचल गंगा एकाएक शांत और गंभीर हो गई थी. रातदिन आहट रहती कि अब निहाल आए या उस की कोई खबर ही आ जाए… कई महीने बीत गए, पर निहाल नहीं आया.

पार्वती और लक्ष्मण सिंह समझ नहीं पा रहे थे कि खिलीखिली सी उन की बेटी क्यों पलपल मुरझा रही है.

नदी किनारे बैठ आंसू बहाती गंगा हताश हो गई… उस का धीरज अब जवाब दे चुका था. अम्मांबापू का ब्याह के लिए जोर देना… जैसे गंगा को भीतर ही भीतर मार रहा था.

एक दिन नदी की आतीजाती लहरों को देखतेदेखते जाने कौन सा तूफान गंगा के दिल में उठा कि उस ने नदी में छलांग लगा दी. गंगा डूबने लगी. उस का दम घुटने लगा. सांसें उखड़ने लगीं. एकाएक हाथपैर मारती गंगा के हाथ में लकड़ी का एक भारी लट्ठा आ गया. गंगा उस के सहारे तैर कर नदी के किनारे आ गई.

पानी में कूदने, डूबने और मौत का सामना कर लौटी गंगा के मन में एक ही विचार बारबार कौंध रहा था कि जानबूझ कर पानी में कूदने या अनजाने में पानी में गिरने पर इनसान कितना छटपटाता होगा… कितनी तकलीफदेह मौत होती होगी… उस समय उसे अगर एक लकड़ी मिल जाए… तो कितनों की जान बच सकती है… बस, उस ने कुछ सोच कर जंगल से लकडि़यां तोड़ीं और उन से एक नाव तैयार की और उतार दी नदी में.

अब गंगा ने तय किया कि उस की जिंदगी का एक यही मकसद होगा… वह इस नाव से सब को पार लगाएगी और डूबतों के प्राण बचाएगी…

गंगा अब ‘नाव वाली गंगा’ कहलाने लगी. गरीब जरूरतमंदों को नदी पार कराने वाली गंगा… डूबतों की जान बचाने वाली गंगा…

अम्मांबापू की उस के आगे एक न चली. गंगा ने शादी करने से साफ मना कर दिया. कह दिया कि ब्याह की बात की तो वह नदी में कूद कर अपनी जान दे देगी. अम्मांबापू ने हार मान ली.

महीने बीते… साल गुजरे… नाव वाली गंगा नहीं बदली. वह डटी रही नदी किनारे… पार करवाती रही नदी… न जाने कितनी जानें बचाईं उस की नाव ने.

इस बार बारिश बहुत हुई. कई गांव के खेतखलिहान, घरजमीन सब बाढ़ की भेंट चढ़ गए. गंगा के गांव में भी बाढ़ ने तहलका मचाया, लेकिन गंगा औरों की तरह गांव छोड़ कर भागी नहीं, बल्कि बाढ़ में डूबे लोगों को बचा कर उन की देखरेख करती रही.

बाढ़ का पानी अब उतार पर था. गंगा अपनी नाव के साथ नदी किनारे बैठी थी कि तभी किसी ने नदी में छलांग लगा दी. गंगा ने लपक कर अपनी नाव उस तरफ चला दी. उस ने देखा कि एक नौजवान डूब रहा था, घबरा कर हाथपैर मार रहा था.

गंगा ने पास पहुंच कर उसे बड़ी मुश्किल से अपनी नाव पर चढ़ा लिया और उस की पीठ दबा कर पानी निकाला.

‘‘क्यों कूदे…?’’ गंगा ने औंधे पड़े उस नौजवान से पूछा.

‘‘मेरा तो सबकुछ लूट गया है. खेतखलिहान, घरजायदाद सब बरबाद हो गया और परिवार भी… सब बह गए. अब मैं

जी कर भी

क्या करूंगा… क्यों बचाया तुम ने?’’ उस  नौजवान ने उलटा लेटे हुए ही जवाब दिया.

‘‘तूफान तो आते हैं और चले जाते हैं… पर इस का यह मतलब तो नहीं है कि जिंदगी खत्म हो गई. एक तूफान से क्या घबराना. हिम्मत करो और फिर जीना शुरू करो. हो सकता?है कि कुछ बहुत अच्छा हो जाए…’’ गंगा ने कहा.

इतना सुन कर वह नौजवान पलटा. गंगा का मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘निहाल…’’ गंगा बुदबुदाई.

‘‘गंगा…’’ निहाल गंगा को देख कर हैरान रह गया.

‘‘मैं ने तुम्हें धोखा दिया. उसी

की सजा मुझे मिली है,’’ निहाल रोते

हुए बोला.

गंगा की आंखों से झरझर आंसू बह रहे थे.

‘‘गंगा, क्या तुम मुझे एक मौका और नहीं दोगी?’’ निहाल ने गंगा की आंखों में आंखें डाल कर पूछा.

गंगा अवाक थी. उस ने निहाल पर एक तीक्ष्ण निगाह डाली और बोली, ‘‘तुम ने पश्चाताप कर लिया. इस से तुम्हारे तनमन का मैल धुल गया है, लेकिन तुम्हारा और मेरा मेल मुमकिन नहीं है. आओ, तुम्हें नदी किनारे लगा दूं, क्योंकि बीच मंझधार में छोड़ना मेरी फितरत नहीं है.’’

निहाल को नदी किनारे पर उतार कर गंगा की नाव चल पड़ी. निहाल देखता रहा दूर तक, उथली लहरों पर गंगा को चप्पू चलाते हुए.

नदी की कलकल से मानो यही आवाज सुनाई दे रही थी :

‘सागर से मुझ को मिलना नहीं है,

सागर से मिल कर मैं खारी हो जाऊंगी.’ Hindi Romantic Story

Story In Hindi: आखिरी झूठ – जब सपना ने किया अपने झूठ का खुलासा

Story In Hindi: दिल्ली रेलवे स्टेशन से नंगलडैम शहर के लिए जैसे ही राहुल रेलगाड़ी के कंपार्टमैंट में चढ़ा, उस ने नजर खाली बर्थ की तरफ दौड़ाई, लेकिन स्लीपिंग कंपार्टमैंट में अधिकतर सीटें खाली पड़ी थीं. उस ने अपना सामान एक बर्थ पर रख कर देखा तो एक युवती खिड़की के पास वाली लंबी बर्थ पर अकेली बैठी थी. उस की उम्र यही कोई 22-23 के आसपास की रही होगी. वह गुलाबी रंग के सूट में थी. दिसंबर का महीना था. वह आकर्षण और रूपलावण्य से भरपूर इतनी सुंदर लग रही थी मानो जैसे कोई अप्सरा धरती पर उतर आई हो.

टिकट चैकर के पास जा कर राहुल ने उस लड़की के पास वाली सीट अपने लिए बुक करवा ली. राहुल एक कंपनी में जौइन करने के लिए नंगल जा रहा था. असिस्टैंट मैनेजर का पद था. गाड़ी रात को 10 बजे चल कर नंगल सवेरे 5 बजे पहुंचती थी. वह खुश था, ‘काफी समय के लिए यात्रा में इतनी सुंदर युवती का साथ रहेगा,’ ऐसा वह मन ही मन सोचने लगा.

राहुल लगभग 25 वर्ष के आसपास था. एक क्षण के लिए उस ने सोचा, ‘क्यों न वह अपना परिचय देते हुए, उस युवती के पास बैठ कर उस से नजदीकी बढ़ाए.’

‘‘मेरा नाम राहुल है. मैं नंगल जौब जौइन करने जा रहा हूं. आप का क्या नाम है? आप कहां जा रही हैं?’’ पूछते हुए उस की बेसब्री जाहिर थी. वह उस के चेहरे को गौर से देख रहा था.

‘‘हम दोनों हमउम्र हैं, पहले तो मैं यह कहूंगी कि आप की जगह तुम शब्द का इस्तेमाल कीजिए. मेरा नाम सपना है. मैं नंगल डैम शहर में सिविल अस्पताल में इंटर्नशिप के लिए जा रही हूं. 3 महीने मैं नंगल शहर में ही रहूंगी.’’

राहुल को सपना का अनौपचारिक होना अच्छा लगा. उसे भी लड़कियों को तुम कह कर संबोधित करना अच्छा लगता था. सपना की सीट पर बैठ कर उस से बातें करना उसे बहुत अच्छा लगा. सपना ने बताया उस का परिवार दिल्ली में रहता है. दोनों ने एकदूसरे को अपनेअपने परिवार के बारे में विस्तार से बताते हुए बातचीत शुरू की. दोनों के ही परिवार दिल्ली में रहते थे.

राहुल के पिता पुस्तक प्रकाशक थे, उन का अच्छाखासा व्यापार था. मां हाउसवाइफ थीं. सपना के पिता तलाकशुदा थे, मां झगड़ालू और क्लेश करने वाली थीं इसलिए मां और पिता का तलाक कई वर्ष पहले ही हो चुका था. बचपन से यौवनावस्था तक सपना का जीवन संघर्षमय रहा था. वह पिता के साथ दिल्ली में रहती थी. डाक्टरी की पढ़ाई भी उस ने दिल्ली में ही की और अब इंटर्नशिप के लिए नंगल जा रही थी.

यह सब सुन कर राहुल का मन सपना के लिए सहानुभूति से भर उठा और भावविभोर हो कर उस ने कहा, ‘‘सपना, मुझे तुम्हारे संघर्षमय जीवन के बारे में जान कर बहुत दुख हुआ है. तुम बहुत बहादुर और सैल्फमेड लड़की हो. मुझे यह देख कर अच्छा लगा कि तुम कैरियर बनाने के प्रति जागरूक और प्रयत्नशील हो. नंगल पहुंच कर अपनी इंटर्नशिप शुरू करो. मुझे तुम कभी भी किसी भी प्रकार की सहायता के लिए बगैर हिचकिचाहट के कह सकती हो. हम अपने मोबाइल नंबर एकदूसरे को दे देते हैं,’’ राहुल ने जेब से एक कागज निकाल कर उस पर अपना मोबाइल नंबर लिखा और सपना को दे दिया, ‘‘फील फ्री टू कौंटैक्ट मी.’’

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सपना ‘थैंक्स’ कहते समय बहुत खुश दिखाई दी. सोने से पहले कानों में हैडफोन लगा कर उस ने अपना मनपसंद संगीत सुना. राहुल ने देखा सपना उनींदी आंखों से उस की ओर मुसकरा कर निहार रही थी. मधुर आवाज में ‘गुडनाइट’ कहते हुए उस ने कंबल ओढ़ लिया.

यों तो एमबीए की पढ़ाई के दौरान कई युवतियों के संपर्क में रहने वाला राहुल आश्चर्यचकित था कि इतनी सुंदर युवती उस के जीवन में अब तक नहीं आई थी. अपनी बर्थ पर लेटे हुए टकटकी लगाए वह सपना को देख कर खुश हो रहा था. उसे इस बात की भी प्रसन्नता थी कि 3 महीने नंगल में सपना का साथ मिलेगा. भविष्य के विषय में सोचते हुए कब उसे नींद आ गई पता ही नहीं चला.

सवेरे 4 बजे गाड़ी आनंदपुर साहब स्टेशन पर 15 मिनट के लिए रुकी. सपना अभी सो ही रही थी. राहुल 2 कप चाय ले आया. सपना गहरी नींद में थी. राहुल ने उस के गाल पर हलके स्पर्श के साथ उसे जगाया. सपना को अच्छा लगा. ‘‘गुडमौर्निंग,’’ कहते हुए सपना ने चाय का गिलास राहुल से ले लिया. राहुल का बरसों के इंतजार के बाद इतनी सुंदर युवती से जो सामना हुआ था. उस ने मन में सोचा, ‘पापा को फोन पर बताएगा कि उन के लिए बहू तलाश ली है,’ दूसरी तरफ मन में यह बात भी आई कि अभी बहुत जल्दी होगी. सब्र करना ठीक होगा. अभी एकदूसरे को जानना बाकी है.

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नंगल स्टेशन पर पहुंचने के बाद राहुल कंपनी के गैस्ट हाउस की ओर चला गया.

‘‘सपना, तुम अपने वूमन होस्टल पहुंच कर फोन करना,’’ राहुल ने कहा.

‘‘ठीक है, लैटअस विश ईच अदर बैस्ट औफ लक’’ सपना ने मुसकराते हुए कहा और अस्पताल से आई हुई वैन में बैठ गई.

दोनों ने अपनीअपनी जौब जौइन कर ली. राहुल और सपना दोनों के लिए नए शहर में रहना एक अद्भुत अनुभव था. एकदूसरे से मिलना और साथसाथ समय बिताना उन्हें अच्छा लगने लगा. नंगल डैम पर एक रेस्तरां था. वहां से चारों ओर का बहुत ही सुहावना दृश्य दिखता था. रविवार के दिन इसी रेस्तरां में वे दोनों घंटों साथसाथ समय बिताते थे. लंच यहीं पर करते थे. कभीकभी सपना राहुल के साथ उस के गैस्ट हाउस में भी घंटों बैठी रहती थी. ज्योंज्यों नजदीकियां बढ़ रही थीं त्योंत्यों उन का रिश्ता स्वाभाविक रूप से गहरा होता जा रहा था.

एक दिन राहुल ने सपना से कहा, ‘‘तुम अपने पापा का पूरा पता मुझे दे दो ताकि मैं दिल्ली जा कर उन से मिल सकूं या फिर मैं अपने मातापिता को तुम्हारे पापा के पास भेज कर उन की जानपहचान करवा सकूं.’’

सपना बोली, ‘‘अभी पापा से मिलवाना या तुम्हारा दिल्ली जा कर उन से मिलना जल्दबाजी होगी. मैं अभी पता नहीं देना चाहती.’’

राहुल की समझ में नहीं आया कि ऐसी क्या बात है, जो वह अपने पापा का पता उसे नहीं दे रही है.

समयसमय पर जब कभी मौका मिलता, राहुल अपना प्रेम व्यक्त करता रहता. वह सपना से कहा करता कि जब हम दोनों एकदूसरे के इतने नजदीक आ चुके हैं, तो समझ में नहीं आता कि क्यों तुम उन बातों से परहेज करती हो जो इस उम्र में नौजवान युवकयुवतियां करते हैं. राहुल ने अपनी जेब से सोने की एक अंगूठी निकाली और सपना को पहनाते हुए कहा, ‘‘यह मेरा तुम्हारे लिए पहला गिफ्ट है. मुझे पता ही नहीं चला कि मैं कब तुम से प्यार करने लगा. मेरे जीवन में यह पहला अनुभव है,’’ उस ने भावुक हो कर सपना को गले लगाना चाहा, लेकिन सपना ने उसे मना करते हुए अनुरोध किया, ‘‘नहीं, राहुल अभी ऐसा कुछ मैं स्वीकार नहीं करूंगी. जब कभी हम विवाह के बंधन में बंध जाएंगे तो मैं प्रौमिस करती हूं कि तुम्हें जी भर कर प्यार करूंगी. अभी बस इतने से ही काम चलाना होगा,’’ कहते हुए उस ने राहुल का हाथ अपने हाथ में ले कर सहलाया और चूम लिया, ‘‘इन हाथों ने मुझे अंगूठी पहनानी चाही इसलिए इन्हें चूम कर मैं अपने प्यार का इजहार कर रही हूं.’’

एक दिन दोनों गैस्ट हाउस के लौन में बैठे चाय का आनंद ले रहे थे. दोनों एकदूसरे को अपने कालेज के दिनों के बारे में विस्तार से बता रहे थे. सपना ने बताया कि कैसे लड़के उस के करीब आने का प्रयत्न करते थे, लेकिन वह किसी के प्रति आकर्षित नहीं होती थी. अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर के अपना टौप करने का उद्देश्य वह पूरा करना चाहती है.

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‘‘सपना, मैं एक बार फिर तुम से कह रहा हूं कि मुझे अपने डैडी का ऐड्रैस और मोबाइल नंबर दे दो. जैसा तुम ने बताया था कि डैडी बिलकुल अकेले हैं, तुम्हारी मां उन्हें छोड़ कर जा चुकी हैं. मेरा उन से मिलना जरूरी है, कहीं ऐसा न हो कि वे कोई और लड़का तुम्हारे लिए देख लें,’’ राहुल ने सपना को समझाते हुए कहा.

‘‘मुझे भी पापा की चिंता है कि कैसे वे मेरी अनुपस्थिति में समय गुजारते होंगे. उन्हें खाना भी बाहर से मंगाना पड़ता होगा. पहली बार उन से दूर आ कर मैं यहां रह रही हूं,’’ सपना ने कहा.

राहुल बोला, ‘‘मुझे तुम से पूरी सहानुभूति है. मैं जानता हूं कि मां के बिना तुम्हारा जीवन कितना कष्टमय रहा होगा. सपना, मैं तो यही कामना करता हूं कि तुम्हारी मां वापस तुम्हारे घर आ जाए. तुम्हारी शादी का इंतजाम वे संभाल लें.’’

सपना का उदास चेहरा राहुल से देखा नहीं जाता था. अपना प्यार, अपने हावभाव उस पर उडे़लता हुआ वह यही कहता था, ‘‘मैं तुम्हारे जीवन को खुशियों से भर दूंगा. यह मेरी दिली तमन्ना है.’’

सपना की इंटर्नशिप का 2 महीने का समय बीत चुका था और वह 2-3 दिन की छुट्टी ले कर दिल्ली अपने पापा के पास जा रही थी. राहुल ने जोर दे कर सपना को बताया कि वह भी उस के साथ दिल्ली जाएगा. बेशक सपना ने आनाकानी की लेकिन वह नहीं माना और दोनों ने टिकट बुक करा लिए.

राहुल यह नहीं समझ पा रहा था कि हर बार सपना इस बात पर हिचकिचाती क्यों है कि राहुल उस के पापा से दिल्ली जा कर न मिलें. राहुल के दृढ़निश्चय का परिणाम यह हुआ कि दोनों दिल्ली सपना के पापा के पास पहुंच गए.

राहुल को इस बात का अनुमान था कि सपना अपने साथ राहुल को दिल्ली लाने के बारे में अपने पापा को फोन पर बता चुकी होगी. उस के घर पहुंचने पर राहुल आश्चर्यचकित था. सपना के पापा के साथ उस की मम्मी भी घर पर मौजूद थीं.

राहुल ने प्रश्न किया, ‘‘सपना, तुम ने तो बताया था कि तुम्हारे मम्मीपापा का तलाक हो चुका है. मम्मी साथ नहीं रहती हैं.’’

सपना ने कहा, ‘‘मुझे भी सरप्राइज हुआ था जब पापा ने फोन पर बताया था कि तलाक की प्रक्रिया पूरी होने से पहले उन का मम्मी से समझौता हो गया है और वे खुशीखुशी उन के साथ रहने के लिए चली आई हैं. मैं इस बात से बहुत खुश हूं,’’ वह अपनी मां के गले लग कर बहुत रोई. सपना के पापा की आंखें भी आंसुओं से भर आई थीं.

सब ने मिलबैठ कर एकसाथ नाश्ता किया. चाय पी कर माहौल को अनुकूल देख कर सपना ने शरारत भरी मुसकराहट के साथ राहुल से कहा, ‘‘मेरी पूरी बात धैर्य से सुन लो. प्रतिक्रिया बाद में देना. मम्मीपापा में कभी कोई मतभेद या तलाक हुआ ही नहीं था. मैं ने तुम से झूठ बोला था. तुम से सहानुभूति प्राप्त करने और प्यार पाने के लिए मैं ने ऐसा किया था. तुम से मिलते ही पहली नजर में ही मैं ने तुम्हें चुन लिया था. दुनिया में तुम से बेहतर जीवन साथी तो हो ही नहीं सकता,’’ क्षण भर को वह रुकी, फिर राहुल से पूछा, ‘‘क्या तुम मुझे माफ कर सकोगे. मेरा तरीका गलत हो सकता है पर मेरा मकसद अपने लिए योग्यप्रेमी को पाना था. यह मेरा आखिरी झूठ था. भविष्य में कभी झूठ का सहारा नहीं लूंगी.’’ सपना के मातापिता हक्केबक्के हो कर अपनी पुत्री को निहार रहे थे. सपना ने कहा, ‘‘पापा, आई एम सौरी.’’

राहुल की खुशी उस के चेहरे पर झलक रही थी. ‘‘तुम्हारे अब तक के मधुर व्यवहार और प्रगाढ़ प्रेम को देखते हुए यह गलती माफ करने योग्य है,’’ अपनी स्वीकृति व्यक्त करते हुए उस ने सपना के मातापिता के पैर छूकर आशीर्वाद लिया. Story In Hindi

Hindi Story: एक अकेली – परिवार के होते हुए भी क्यों अकेली पड़ गई थी सरिता?

Hindi Story: सरिता घर से निकलीं तो बाहर बादल घिर आए थे. लग रहा था कि बहुत जोर से बारिश होगी. काश, एक छाता साथ में ले लिया होता पर अपने साथ क्याक्या लातीं. अब लगता है बादलों से घिर गई हैं. कभी सुख के बादल तो कभी दुख के. पता नहीं वे इतना क्यों सोचती हैं? देखा जाए तो उन के पास सबकुछ तो है फिर भी इतनी अकेली. बेटा, बेटी, दामाद, बहन, भाई, बहू, पोतेपोतियां, नाते-रिश्तेदार…क्या नहीं है उन के पास… फिर भी इतनी अकेली. किसी दूसरे के पास इतना कुछ होता तो वह निहाल हो जाता, लेकिन उन को इतनी बेचैनी क्यों? पता नहीं क्या चाहती हैं अपनेआप से या शायद दूसरों से. एक भरापूरा परिवार होना तो किसी के लिए भी गर्व की बात है, ऊपर से पढ़ालिखा होना और फिर इतना आज्ञाकारी.

बहू बात करती है तो लगता है जैसे उस के मुंह से फूल झड़ रहे हों. हमेशा मांमां कह कर इज्जत करना. बेटा भी सिर्फ मांमां करता है.  इधर सरिता खयालों में खो जाती हैं: बेटी कहती थी, ‘मां, तुम अपना ध्यान अब गृहस्थी से हटा लो. अब भाभी आ गई हैं, उन्हें देखने दो अपनी गृहस्थी. तुम्हें तो सिर्फ मस्त रहना चाहिए.’  ‘लेकिन रमा, घर में रह कर मैं अपने कामों से मुंह तो नहीं मोड़ सकती,’ वे कहतीं.  ‘नहींनहीं, मां. तुम गलत समझ रही हो. मेरा मतलब सब काम भाभी को करने दो न…’

ब्याह कर जब वे इस घर में आई थीं तो एक भरापूरा परिवार था. सासससुर के साथ घर में ननद, देवर और प्यार करने वाले पति थे जो उन की सारी बातें मानते थे. घर में किसी चीज की कमी नहीं थी पर बहुत पैसा भी नहीं था. घर का काम और बच्चों की देखभाल करते हुए समय कैसे बीत गया, वे जान ही न सकीं.

कमल शुरू से ही बहुत पैसा कमाना चाहते थे. वे चाहते थे कि उन के घर में सब सुखसुविधाएं हों. वे बहुत महत्त्वा- कांक्षी थे और पैसा कमाने के लिए उन्होंने हर हथकंडे का इस्तेमाल किया.   पैसा सरिता को भी बुरा नहीं लगता था लेकिन पैसा कमाने के कमल के तरीके पर उन्हें एतराज था, वे एक सुकून भरी जिंदगी चाहती थीं. वे चाहती थीं कि कमल उन्हें पूरा समय दें लेकिन उन को सिर्फ पैसा कमाना था, कमल का मानना था कि पैसे से हर वस्तु खरीदी जा सकती है. उन्हें एक पल भी व्यर्थ गंवाना अच्छा नहीं लगता था. जैसेतैसे कमल के पास पैसा बढ़ता गया, उन (सरिता) से उन की दूरी भी बढ़ती गई.

‘पापा, आज आप मेरे स्कूल में आना ‘पेरैंटटीचर’ मीटिंग है. मां तो एक कोने में खड़ी रहती हैं, किसी से बात भी नहीं करतीं. मेरी मैडम तो कई बार कह चुकी हैं कि अपने पापा को ले कर आया करो, तुम्हारी मम्मी तो कुछ समझती ही नहीं,’ रमा अपनी मां से शर्मिंदा थी क्योंकि उन को अंगरेजी बोलनी नहीं आती थी.

कमल बेटी को डांटने के बजाय हंसने लगे, ‘कितनी बार तो तुम्हारी मां से कहा है कि अंगरेजी सीख ले पर उसे फुरसत ही कहां है अपने बेकार के कामों से.’  ‘कौन से बेकार के काम. घर के काम क्या बेकार के होते हैं,’ वे सोचतीं, ‘जब घर में कोई भी नौकर नहीं था और पूरा परिवार साथ रहता था तब तो एक बार भी कमल ने नहीं कहा कि घर के काम बेकार के होते हैं और अब जब वे रसोईघर में जा कर कुछ भी करती हैं तो वह बेकार का काम है,’ लेकिन प्रत्यक्ष में कुछ नहीं कहा.

उस दिन के बाद कमल ही बेटी रमा के स्कूल जाने लगे. पैसा आने के बाद कमल के रहनसहन में भी काफी बदलाव आ गया था. अब वे बड़ेबड़े लोेगों में उठनेबैठने लगे थे और चाहते थे कि पत्नी भी वैसा ही करे. पर उन को ऐसी महफिलों में जा कर अपनी और अपने कीमती वस्त्रों व गहनों की प्रदर्शनी करना अच्छा नहीं लगता था.  एक दिन दोनों कार से कहीं जा रहे थे. एक गरीब आदमी, जिस की दोनों टांगें बेकार थीं फिर भी वह मेहनत कर के कुछ बेच रहा था, उन की गाड़ी के पास आ कर रुक गया और उन से अपनी वस्तु खरीदने का आग्रह करने लगा. सरिता अपना पर्स खोल कर पैसे निकालने लगीं लेकिन कमल ने उन्हें डांट दिया, ‘क्या करती हो, यह सब इन का रोज का काम है. तुम को तो बस पर्स खोलने का बहाना चाहिए. चलो, गाड़ी के शीशे चढ़ाओ.’

उन का दिल भर आया और उन्हें अपना एक जन्मदिन याद आ गया. शादी के बाद जब उन का पहला जन्मदिन आया था. उन दिनों उन के पास गाड़ी नहीं थी. वे दोनों एक पुराने स्कूटर पर चला करते थे. वे लोग एक बेकरी से केक लेने गए थे. कमल के पास ज्यादा पैसे नहीं थे पर फिर भी उन्होंने एक केक लिया और एक फूलों का गुलदस्ता लेना चाहते थे. बेकरी के बाहर एक छोटी बच्ची खड़ी थी. ठंड के दिन थे. बच्ची ने पैरों में कुछ भी नहीं पहना था. ठंड से वह कांप रही थी. उस की हालत देख कर वे रो पड़ी थीं. कमल ने उन को रोते देखा तो फूलों का गुलदस्ता लेने के बजाय उस बच्ची को चप्पलें खरीद कर दे दीं. उस दिन उन को कमल सचमुच सच्चे हमसफर लगे थे. आज के और उस दिन के कमल में कितना फर्क आ गया है, इसे सिर्फ वे ही महसूस कर सकती थीं.

तब उन की आंखें भर गई थीं. उन्होंने कमल से छिपा कर अपनी आंखें पोंछ ली थीं.  सरिता की एक आदत थी कि वे ज्यादा बोलती नहीं थीं लेकिन मिलनसार थीं. उन के घर में जो भी आता था वे उस की खातिरदारी करने में भरोसा रखती थीं पर कमल को सिर्फ अपने स्तर वालों की खातिरदारी में ही विश्वास था. उन्हें लगता था कि एक पल या एक पैसा भी किसी के लिए व्यर्थ गंवाना नहीं चाहिए.

सरिता की वजह से दूरदूर के रिश्तेदार कमल के घर आते थे और उन की तारीफ भी करते थे. ‘सरिता भाभी तो खाना खिलाए बगैर कभी भी आने नहीं देती हैं’ या फिर ‘सरिता भाभी के घर जाओ तो लगता है जैसे वे हमारा ही इंतजार कर रही थीं’, ‘वे इतने अच्छे तरीके से सब से मिलती हैं’ आदि.  लेकिन उन की बेटी ही उन्हें कुछ नहीं समझती है. रमा ने कभी भी मां को अपना हमराज नहीं बनाया. वह तो सिर्फ अपने पापा की बेटी थी. इस में उस का कोई दोष नहीं है. उस के पैदा होने से पहले कमल के पास बहुत पैसा नहीं था लेकिन जिस दिन वह पैदा हुई उसी दिन कमल को एक बहुत बड़ा और्डर मिला था और उस के बाद तो उन के घर में पैसों की रेलमपेल शुरू हो गई.

कमल समझते थे कि यह सब उस की बेटी की वजह से ही हुआ है. इसलिए वे रमा को बहुत मानते थे. उस के मुंह से निकली हर बात पूरा करना अपना धर्म समझते थे. जिस से रमा जिद्दी हो गई थी. सरिता उस की हर जिद पूरी नहीं करती थी, जिस के चलते वह अपने पापा के ज्यादा नजदीक हो गई थी.  धीरेधीरे रमा अपनी ही मां से दूर होती गई. कमल हरदम रमा को सही और सरिता को गलत ठहराते थे. एक बार सरिता ने रमा को किसी गलत बात के लिए डांटा और समझाने की कोशिश की कि ससुराल में यह सब नहीं चलेगा तो कमल बोल पड़े, ‘हम रमा का ससुराल ही यहां ले आएंगे.’

उस के बाद तो सरिता ने रमा को कुछ भी कहना बंद कर दिया. कमल रमा की ससुराल अपने घर नहीं ला सके. हर लड़की की तरह उसे भी अपने घर जाना ही पड़ा. जब रमा ससुराल जा रही थी तो सब रो रहे थे. सरिता को भी दुख हो रहा था. बेटी ससुराल जा रही थी, रोना तो स्वाभाविक ही था.  सरिता को मन के किसी कोने में थोड़ी सी खुशी भी थी क्योंकि अब उन का घर उन का अपना बनने वाला था. अब शायद सरिता अपनी तरह अपने घर को चला सकती थीं. जब से वे इस घर में आई थीं कोई न कोई उन पर अपना हुक्म चलाता था. पहले सास का, ननद का, फिर बेटी का घर पर राज हो गया था, लेकिन अब वे अपना घर अपनी इच्छा से चलाना चाहती थीं.

रमा अपने घर में खुश थी. उस ने अपनी ससुराल में सब के साथ सामंजस्य बना लिया था. जिस बात की सरिता को सब से ज्यादा फिक्र थी वैसी समस्या नहीं खड़ी हुई. सरिता भी खुश थीं, अपना घर अपनी इच्छा से चला कर, लेकिन उन की खुशी में फिर से बाधा पड़ गई. रमा घर आई और कहने लगी, ‘पापा, मां तो बिलकुल अकेली पड़ गई हैं. अब भैया की शादी कर दो.’  सरिता चीख कर कहना चाहती थीं कि अभी नहीं, कुछ दिन तो मुझे जी लेने दो. पर प्रत्यक्ष में कुछ नहीं कह पाईं और कुछ समय बाद रमा माला को ढूंढ़ लाई. माला उस के ससुराल के किसी रिश्तेदार की बेटी थी.

माला बहुत अच्छी थी. बिलकुल आदर्श बहू, लेकिन ज्यादा मीठा भी सेहत को नुकसान देता है. इसलिए सरिता उस से भी कभीकभी कड़वी हो जाती थी. माला बहुत पढ़ीलिखी थी. वह सरिता की तरह घरघुस्सू नहीं थी. वह मोहित के साथ हर जगह जाती थी और बहुत अच्छी अंगरेजी भी बोल लेती थी, इसलिए मोहित को उसे अपने साथ हर जगह ले जाने में गर्व महसूस होता था. उस ने रमा को भी अपना बना लिया था. रमा उस की बहुत तारीफ करती थी, ‘मां, भाभी बहुत अच्छी हैं. मेरी पसंद की हैं इसलिए न.’

सरिता को हल्के रंग के कपड़े पसंद थे. आज तक वे सिर्फ कपड़ों के मामले में ही अपनी मालकिन थीं लेकिन यहां भी सेंध लग गई. माला सरिता को सलाह देने लगी, ‘मां, आप इतने फीके रंग मत पहना करें, शोख रंग पहनें. आप पर अच्छे लगेंगे.’  कमल कहते, ‘अपनी सास को कुछ मत कहो, वे सिर्फ हल्के रंग के कपड़े ही पहनती हैं. मैं ने कितनी बार कोशिश की थी इसे गहरे रंग के कपड़े पहनाने की पर इसे तो वे पसंद ही नहीं हैं.’

‘कब की थी कोशिश कमल,’ सरिता कहना चाहती थीं, ‘एक बार कह कर तो देखते. मैं कैसे आप के रंग में रंग जाती,’ पर बहू के सामने कुछ नहीं बोलीं.

आज सुबह रमा को घर आना था. उन्होंने रसोई में जा कर कुछ बनाना चाहा. पर माला आ गई, ‘मां, लाइए मैं बना देती हूं.’

‘नहीं, मैं बना लूंगी.’

‘ठीक है. मैं आप की मदद कर देती हूं.’

उन्होंने प्यार से बहू से कहा, ‘नहीं माला, आज मेरा मन कर रहा है तुम सब के लिए कुछ बनाने का. तुम जाओ, मैं बना लूंगी.’

माला चली गई. पता नहीं क्यों खाना बनाते समय उन्हें जोर से खांसी आ गई. मोहित वहां से गुजर रहा था. वह मां को अंदर ले कर आया और माला को डांटने के लिए अपने कमरे में चला गया. सरिता उस के पीछे जाने लगीं ताकि उसे समझा सकें कि इस में माला का कोई दोष नहीं है. वे कमरे के पास गईं तो देखा दोनों भाईबहन बैठे हुए हैं. रमा आ चुकी थी और उन से मिलने के बजाय पहले अपनी भाभी से मिलने चली गई थी.

उन्होंने जैसे ही अपने कदम आगे बढ़ाए, रमा की आवाज उन के कान में पड़ी, ‘मां को भी पता नहीं क्या जरूरत थी किचन में जाने की.’

तभी मोहित बोल पड़ा, ‘पता नहीं क्यों, मां समझती नहीं हैं, हर वक्त घर में कुछ न कुछ करती रहती हैं जिस से घर में कलह बढ़ती है, मेरे और माला के बीच जो खटपट होती है उस का कारण मां ही होती हैं.’

‘क्या मैं माला और मोहित के बीच कलह का कारण हूं,’ सरिता सोचती ही रह गईं.

तभी माला की अवाज सुनाई पड़ी, ‘मैं तो हर वक्त मां का खयाल रखती हूं पर पता नहीं क्यों, मां को तो जैसे मैं अच्छी ही नहीं लगती हूं. अभी भी तो मैं ने कितना कहा मां से कि मैं करती हूं पर वे मुझे करने दें तब न.’

‘मैं समझती हूं, भाभी. मां शुरू से ही ऐसी हैं,’ रमा की आवाज आई.

‘मां को तो बेटी समझ नहीं पाई, भाभी क्या समझेगी,’ सरिता चीखना चाहती थीं पर आवाज जैसे गले में ही दब गई.

‘अच्छा, तुम चिंता मत करो, मैं समझाऊंगा मां को,’ यह मोहित की आवाज थी.

‘कभी मां की भी इतनी चिंता करनी थी बेटे,’ कहना चाहा  सरिता ने पर आदत के अनुसार फिर से चुप ही रहीं.

‘मैं देखती हूं मां को, कहीं ज्यादा तबीयत तो खराब नहीं है,’ माला बोली.

‘जब अपने ही मुझे नहीं समझ रहे तो तू क्या समझेगी जिसे इस घर में आए कुछ ही समय हुआ है,’ सरिता के मन ने कहा.

इधर, आसमान में बिजली के कड़कने की तेज आवाज आई तो वे खयालों की दुनिया से बाहर आ गईं. दरअसल, दोपहर का खाना खाने के बाद जब वे बाजार जाने के लिए घर से निकली थीं तो सिर्फ बादल थे पर जब जोर से बरसात होने लगी तो वे एक बारजे के नीचे खड़ी हो गई थीं. और अब फिर सोचने लगीं कि अगर वे भीग कर घर जाएंगी तो सब क्या कहेंगे? रमा अपनी आदत के अनुसार कहेगी, ‘मां को बस, भीगने का बहाना चाहिए.’

कमल कहेंगे, ‘कितनी बार कहा है कि गाड़ी से जाया करो पर नहीं’.  मोहित कहेगा, ‘मां, मुझे कह दिया होता, मैं आप को लेने पहुंच जाता.’

बहू कहेगी, ‘मां, कम से कम छाता तो ले ही जातीं.’

सरिता ने सारे खयाल मन से अंतत: निकाल ही दिए और भीगते हुए अकेली ही घर की तरफ चल पड़ीं. Hindi Story

Hindi Kahani: अधूरे जवाब – क्या अपने प्यार के बारे में बता पाएगी आकांक्षा?

Hindi Kahani, लेखक – संदीप कुमरावत

कैफे की गैलरी में एक कोने में बैठे अभय का मन उदास था. उस के भीतर विचारों का चक्रवात उठ रहा था. वह खुद की बनाई कैद से आजाद होना चाहता था. इसी कैद से मुक्ति के लिए वह किसी का इंतजार कर रहा था. मगर क्या हो यदि जिस का अभय इंतजार कर रहा था वह आए ही न? उस ने वादा तो किया था वह आएगी. वह वादे तोड़ती नहीं है…

3 साल पहले आकांक्षा और अभय एक ही इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ते थे. आकांक्षा भी अभय के साथ मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही थी, और यह बात असाधारण न हो कर भी असाधारण इसलिए थी क्योंकि वह उस बैच में इकलौती लड़की थी. हालांकि, अभय और आकांक्षा की आपस में कभी हायहैलो से ज्यादा बात नहीं हुई लेकिन अभय बात बढ़ाना चाहता था, बस, कभी हिम्मत नहीं कर पाया.

एक दिन किसी कार्यक्रम में औडिटोरियम में संयोगवश दोनों पासपास वाली चेयर पर बैठे. मानो कोई षड्यंत्र हो प्रकृति का, जो दोनों की उस मुलाकात को यादगार बनाने में लगी हो. दोनों ने आपस में कुछ देर बात की, थोड़ी क्लास के बारे में तो थोड़ी कालेज और कालेज के लोगों के बारे में.

फिर दोनों की मुलाकात सामान्य रूप से होने लगी थी. दोनों के बीच अच्छी दोस्ती हो गई थी. मगर फिर भी आकांक्षा की अपनी पढ़ाई को ले कर हमेशा चिंतित रहने और सिलेबस कम्पलीट करने के लिए हमेशा किताबों में घुसे रहने के चलते अभय को उस से मिलने के लिए समय निकालने या परिस्थितियां तैयार करने में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती थी. पर वह उस से थोड़ीबहुत बात कर के भी खुश था.

दोस्ती होते वक्त नारी सौंदर्य के प्रखर तेज पर अभय की दृष्टि ने भले गौर न किया हो पर अब आकांक्षा का सौंदर्य उसे दिखने लगा था. कैसी सुंदरसुंदर बड़ीबड़ी आंखें, सघन घुंघराले बाल और दिल लुभाती मुसकान थी उस की. वह उस पर मोहित होने लगा था.

शुरुआत में आकांक्षा की तारीफ करने में अभय को हिचक होती थी. उसे तारीफ करना ही नहीं आता था. मगर एक दिन बातों के दौरान उसे पता चला कि आकांक्षा स्वयं को सुंदर नहीं मानती. तब उसे आकांक्षा की तारीफ करने में कोई हिचक, डर नहीं रह गया.

आकांक्षा अकसर व्यस्त रहती, कभी किताबों में तो कभी लैब में पड़ी मशीनों में. हर समय कहीं न कहीं उलझी रहती थी. कभीकभी तो उसे उस के व्यवहार में ऐसी नजरअंदाजगी का भाव दिखता था कि अभय अपमानित सा महसूस करने लगता था. वह बातें भी ज्यादा नहीं करती थी, केवल सवालों के जवाब देती थी.

अपनी पढ़ाई के प्रति आकांक्षा की निष्ठा, समर्पण और प्रतिबद्धता देख कर अभय को उस पर गर्व होता था, पर वह यह भी चाहता था कि इस तकनीकी दुनिया से थोड़ा सा अवकाश ले कर प्रेम और सौहार्द के झरोखे में वह सुस्ता ले, तो दुनिया उस के लिए और सुंदर हो जाए. बहुत कम ऐसे मौके आए जब अभय को आकांक्षा में स्त्री चंचलता दिखी हो. वह स्त्रीसुलभ सब बातों, इठलाने, इतराने से कोसों दूर रहा करती थी. आकांक्षा कहती थी उसे मोह, प्रेम या आकर्षण जैसी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं. उसे बस अपने काम से प्यार है, वह शादी भी नहीं करेगी.

अचानक ही अभय अपनी खयालों की दुनिया से बाहर निकला. अपनेआप में खोया अभय इस बात पर गौर ही नहीं कर पाया कि आसपास ठहाकों और बातचीतों का शोर कैफे में अब कम हो गया है.

अभय ने घड़ी की ओर नजर घुमाई तो देखा उस के आने का समय तो कब का निकल चुका है, मगर वह नहीं आई. अभय अपनी कुरसी से उठ कैफे की सीढि़यां उतर कर नीचे जाने लगा. जैसे ही अभय दरवाजे की ओर तेज कदमों से बढ़ने लगा, उस की नजर पास वाली टेबल पर पड़ी. सामने एक कपल बैठा था. इस कपल की हंसीठिठोलियां अभय ने ऊपर गैलरी से भी देखी थीं, लेकिन चेहरा नहीं देख पाया था.

लड़कालड़की एकदूसरे के काफी करीब बैठे थे. दोनों में से कोई कुछ नहीं बोल रहा था. लड़की ने आंखें बंद कर रखी थीं मानो अपने मधुरस लिप्त होंठों को लड़के के होंठों की शुष्कता मिटा वहां मधुस्त्रोत प्रतिष्ठित करने की स्वीकृति दे रही हो.

अभय यह नजारा देख स्तब्ध रह गया. उसे काटो तो खून नहीं, जैसे उस के मस्तिष्क ने शून्य ओढ़ लिया हो. उसे ध्यान नहीं रहा कब वह पास वाली अलमारी से टकरा गया और उस पर करीने से सजे कुछ बेशकीमती कांच के मर्तबान टूट कर बिखर गए.

इस जोर की आवाज से वह कपल चौंक गया. वह लड़की जो उस लड़के के साथ थी कोई और नहीं बल्कि आकांक्षा ही थी. आकांक्षा ने अभय को देखा तो अचानक सकते में आ गई. एकदम खड़ी हो गई. उसे अभय के यहां होने की बिलकुल उम्मीद नहीं थी. उसे समझ नहीं आया क्या करे. सारी समझ बेवक्त की बारिश में मिट्टी की तरह बह गई. बहुत मुश्किलों से उस के मुंह से सिर्फ एक अधमरा सा हैलो ही निकल पाया.

अभय ने जवाब नहीं दिया. वह जवाब दे ही नहीं सका. माहौल की असहजता मिटाने के आशय से आकांक्षा ने उस लड़के से अभय का परिचय करवाने की कोशिश की. ‘‘साहिल, यह अभय है, मेरा कालेज फ्रैंड और अभय, यह साहिल है, मेरा… बौयफ्रैंड.’’ उस ने अंतिम शब्द इतनी धीमी आवाज में कहा कि स्वयं उस के कान अपनी श्रवण क्षमता पर शंका करने लगे.  अभय ने क्रोधभरी आंखें आकांक्षा से फेर लीं और तेजी से दरवाजे से बाहर निकल गया.

आकांक्षा को कुछ समझ नहीं आया. उस ने भौचक्के से बैठे साहिल को देखा. फिर दरवाजे से निकलते अभय को देखा और अगले ही पल साहिल से बिना कुछ बोले दरवाजे की ओर दौड़ गई. बाहर आ कर अभय को आवाज लगाई. अभय न चाह कर भी पता नहीं क्यों रुक गया.

आधी रात को शहर की सुनसान सड़क पर हो रहे इस तमाशे के साक्षी सितारे थे. अभय पीछे मुड़ा और आकांक्षा के बोलने से पहले उस पर बरस पड़ा, ‘‘मैं ने हर पल तुम्हारी खुशियां चाहीं, आकांक्षा. दिनरात सिर्फ यही सोचता था कि क्या करूं कि तुम्हें हंसा सकूं. तमाम कोशिशें कीं कि गंभीरता, कठोरता, जिद्दीपन को कम कर के तुम्हारी जिंदगी में थोड़ी शरारतभरी मासूमियत के लिए जगह बना सकूं. तुम्हें मझधार के थपेड़ों से बचाने के लिए मैं खुद तुम्हारे लिए किनारा चाहता था. मगर, मैं हार गया. तुम दूसरों के साथ हंसती, खिलखिलाती हो, बातें करती हो, फिर मेरे साथ यह भेदभाव क्यों? तकलीफ तो इस बात की है कि जब तुम्हें किनारा मिल गया तो मुझे बताना भी जरूरी नहीं समझा तुम ने. क्यों आकांक्षा?’’

आकांक्षा अपराधी भाव से कहने लगी, ‘‘मैं तुम्हें सब बताने वाली थी. तुम्हें ढेर सारा थैंक्यू कहना चाहती थी. तुम्हारी वजह से मेरे जीवन में कई सारे सकारात्मक बदलावों की शुरुआत हुई. तुम मुझे कितने अजीज हो, कैसे बताऊं तुम्हें. तुम तो जानते ही हो कि मैं ऐसी ही हूं.’’

आकांक्षा का बोलना जारी था, ‘‘तुम ने कहा, मैं दूसरों के साथ हंसती, खिलखिलाती हूं. खूब बातें करती हूं. मतलब, छिप कर मेरी जासूसी बड़ी देर से चल रही है. हां, बदलाव हुआ है. दरअसल, कई बदलाव हुए हैं. अब मैं पहले की तरह खड़ ूस नहीं रही. जिंदगी के हर पल को मुसकरा कर जीना सीख लिया है मैं ने. तुम्हारा बढ़ा हाथ है इस में, थैंक्यू फौर दैट. और तुम भी यह महसूस करोगे मुझ से अब बात कर के, अगर मूड ठीक हो गया हो तो.’’ अब वह मुसकराने लगी.

अभय बिलकुल शांत खड़ा था. कुछ नहीं बोला. अभय को कुछ न कहते देख आकांक्षा गंभीर हो गई. कहने लगी, ‘‘तुम्हें तो खुश होना चाहिए. तुम मेरे नीरस जीवन में प्यार की मिठास घोलना चाहते थे तो अपनी ही इच्छा पूरी होने पर इतने परेशान क्यों हो गए? मुझे साहिल के साथ देख कर इतना असहज क्यों हो गए? मेरे खिलाफ खुद ही बेवजह की बेतुकी बातें बना लीं और मुझ से झगड़ रहे हो. कहीं…’’ आकांक्षा बोलतेबोलते चुप हो गई.

इतना सुन कर भी अभय चुप ही रहा. आकांक्षा ने अभय को चुप देख कर एक लंबी सांस लेते हुए कहा, ‘‘तुम ने बहुत देर कर दी, अभय.’’

यह सुन कर उस के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई. हृदय एक अजीब परंतु परिपूर्ण आनंद से भर गया. उस का मस्तिष्क सारे विपरीत खयालों की सफाई कर बिलकुल हलका हो गया. ‘तुम ने बहुत देर कर दी, अभय,’ इस बात से अब वह उम्मीद टूट चुकी थी जिसे उस ने कब से बांधे रखा था. लेकिन, जो आकांक्षा ने कहा वह सच भी तो था. वह न कभी कुछ साफसाफ बोल पाया न वह समझ पाई और अब जब उसे जो चाहिए था मिल ही गया है तो वह क्यों उस की खुशी के आड़े आए.

अभय ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘कम से कम मुझ से समय से मिलने तो आ जातीं.’’ यह सुन कर आकांक्षा हंसने लगी और बोली, ‘‘बुद्धू, हम कल मिलने वाले थे, आज नहीं.’’ अभय ने जल्दी से आकांक्षा का मैसेज देखा और खुद पर ही जोरजोर से हंसने लगा.

एक झटके में सबकुछ साफ हो गया और रह गया दोस्ती का विस्तृत खूबसूरत मैदान. आकांक्षा को वह जितना समझता है वह उतनी ही संपूर्ण और सुंदर है उस के लिए. उसे अब आज शाम से ले कर अब तक की सारी नादानियों और बेवकूफीभरे विचारों पर हंसी आने लगी. उतावलापन देखिए, वह एक दिन पहले ही उस रैस्टोरैंट में पहुंच गया था जबकि उन का मिलना अगले दिन के लिए तय था.

अभय ने कुछ मिनट लिए और फिर मुसकरा कर कहा, ‘‘जानबूझ कर मैं एक दिन पहले आया था, माहौल जानने के लिए आकांक्षा, यू डिजर्व बैटर.’’ Hindi Kahani

Family Story In Hindi: वापसी – खुद टूटकर, घर को जोड़ती वीरा की कहानी

Family Story In Hindi: दिल्ली पहुंचने की घोषणा के साथ विमान परिचारिका ने बाहर का तापमान बता कर अपनी ड्यूटी खत्म की, लेकिन वीरा की ड्यूटी तो अब शुरू होने वाली थी. अंडमान निकोबार से आया जहाज जैसे ही एअरपोर्ट पर रुका, वीरा के दिल की धड़कनें यह सोच कर तेज होने लगीं कि उसे लेने क्या विजेंद्र आया होगा?

अपने ही सवालों में उलझी वीरा जैसे ही बाहर आई कि सामने से दौड़ कर आती विपाशा ‘मांमां’ कहती उस से आ कर लिपट गई.

वीरा ने भी बेटी को प्यार से गले लगा लिया.

‘5 साल में तू कितनी बड़ी हो गई,’ यह कहते समय वीरा की आंखें चारों ओर विजेंद्र को ढूंढ़ रही थीं. शायद आज भी विजेंद्र को कुछ जरूरी काम होगा. विपाशा मां को सामान के साथ एक जगह खड़ा कर गाड़ी लेने चली गई. वह सामान के पास खड़ी- खड़ी सोचने लगी.

5 साल पहले उस ने अचानक अंडमान निकोबार जाने का फैसला किया, तो  महज इसलिए कि वह विजेंद्र के बेरुखी भरे व्यवहार से तिलतिल कर मर रही थी.

विजेंद्र ने भरपूर कोशिश की कि अपनी पत्नी वीरा से हमेशा के लिए पीछा छुड़ा ले. उस ने तो कलंक के इतने लेप उस पर चढ़ाए कि कितना ही पानी से धो लो पर लेप फिर भी दिखाई दे.

यही नहीं विजेंद्र ने वीरा के सामने परेशानियों के इतने पहाड़ खड़े कर दिए थे कि उन से घबरा कर वह स्वयं विजेंद्र के जीवन से चली जाए. लेकिन वीरा हर पहाड़ को धीरेधीरे चढ़ कर पार करने की कोशिश में लगी रही.

अचानक ही अंडमान में नौकरी का प्रस्ताव आने पर वह एक बदलाव और नए जीवन की तैयारी करते हुए वहां जाने को तैयार हो गई.

अंडमान पहुंच कर वीरा ने अपनी नई नौकरी की शुरुआत की. उसे वहां चारों ओर बांहों के हार स्वागत करते हुए मिले. कुछ दिन तो जानपहचान में निकल गए लेकिन धीरेधीरे अकेलेपन ने पांव पसारने शुरू कर दिए. इधर साथ काम करने वाले मनचलों में ज्यादातर के परिवार तो साथ थे नहीं, सो दिन भर नौकरी करते, रात आते ही बोतल पी कर सोने का सहारा ढूंढ़ लेते.

छुट्टी होने पर घर और घरवाली की याद आती तो फोन घुमा कर झूठासच्चा प्यार दिखा कर कुछ धर्मपत्नी को बेवकूफ बनाते और कुछ अपने को भी. ऐसी नाजुक स्थिति में वे हर जगह हर किसी महिला की ओर बढ़ने की कोशिश करते, पट गई तो ठीक वरना भाभीजी जिंदाबाद. अंडमान में वीरा अपने कमरे की खिड़की पर बैठ कर अकसर यह नजारे देखती. कई बार बाहर आने के लिए उसे भी न्योते मिलते पर उस का पहला जख्म ही इतना गहरा था कि दर्द से वह छटपटाती रहती.

कंपनी से वीरा को रहने के लिए जो फ्लैट मिला था, उस फ्लैट के ठीक सामने पुरुष कर्मचारियों के फ्लैट थे. बूढ़ा शिवराम शर्मा भी अकसर शराब पी कर नीचे की सीढि़यों पर पड़ा दिख जाता. कैंपस के होटलों में शिवराम खाना कम खाता रिश्ते ज्यादा बनाने की कोशिश करता. उस के दोस्ती करने के तरीके भी अलगअलग होते थे. कभी धर्म के नाते तो कभी एक ही गांव या शहर का कह कर वह महिलाओं की तलाश में रहता था. शिवराम टेलीफोन डायरेक्टरी से अपनी जाति के लोगों के नाम से घरों में भी फोन लगाता. हर रोज दफ्तर में उस के नएनए किस्से सुनने को मिलते. कभीकभी उस की इन हरकतों पर वीरा को गुस्सा भी आता कि आखिर औरत को वह क्या समझता है?

कभीकभी उस का साथी बासु दा मजाक में कह देता, ‘बाबू शिवराम, घर जाने की तैयारी करो वरना कहीं भाभीजी भी किसी और के साथ चल दीं तो घर में ताला लग जाएगा,’ और यह सुनते ही शिवराम उसे मारने को दौड़ता.

3 महीने पहले आए राधू के कारनामे देख कर तो लगता था कि वह सब का बाप है. आते ही उस ने एक पुरानी सी गाड़ी खरीदी, उसे ठीकठाक कर के 3-4 महिलाओं को सुबहशाम दफ्तर लाने और वापस ले जाने लगा था. शाम को भी वह बेमतलब गाड़ी मैं बैठ कर यहांवहां घूमता फिरता.

एक दिन अचानक एक जगह पर लोगों की भीड़ देख कर यह तो लगा कि कोई घटना घटी है लेकिन कुछ समझ में नहीं आ रहा था. भीड़ छंटने पर पता चला कि राधू ने किसी लड़की को पटा कर अपनी कार में लिफ्ट दी और फिर उस के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी तो लड़की ने शोर मचा दिया. जब भीड़ जमा हो गई तो उस ने राधू को ढेरों जूते मारे.

वीरा अकसर सोचती कि आखिर यह मर्दों की दुनिया क्या है? क्यों औरत को  बेवकूफ समझा जाता है. दफ्तर में भी वीरा अकसर सब के चेहरे पढ़ने की कोशिश करती. सिर्फ एकदो को छोड़ कर बाकी के सभी एक पल का सुख पाने के लिए भटकते नजर आते.

वीरा की रातें अकसर आकाश को देखतेदेखते कट जातीं. जीने की तलाश में अंडमान आई वीरा को अब धरती का यह हिस्सा भी बेगाना सा लग रहा था. बहुत उदास होने पर वह अपनी बेटी विपाशा से बात कर लेती. फोन पर अकसर विपाशा मां को समझाती रहती, उस को सांत्वना देती.

5 साल बाद विजेंद्र ने बेटी विपाशा के माध्यम से वीरा को वापस आने का न्योता भेजा, तो वह अकसर यही सोचती, ‘आखिर क्या करे? जाए या न जाए. पुरुषों की दुनिया तो हर जगह एक सी ही है.’ आखिरकार बेटी की ममता के आगे वीरा, विजेंद्र की उस भूल को भी भूल गई, जिस के लिए उस ने अलग रहने का फैसला किया था.

वीरा को याद आया कि घर छोड़ने से पहले उस ने विजेंद्र से कहा था कि मैं ने सिर्फ तुम्हें चाहा है, कभी अगर मेरे कदम डगमगाने लगें या मुझे जीवन में कभी किसी मर्द की जरूरत पड़ी तो वापस तुम्हारे पास लौट आऊंगी. आखिर हर जगह के आदमी तो एक जैसे ही हैं. इस राह पर सब एक पल के लिए भटकते हैं और वह भटका हुआ एक पल क्या से क्या कर देता है.

कभी वीरा सोचती कि बेटी के कहने का मान ही रख लूं. आज वह ममता की भूखी, मानसम्मान से बुला रही है, कहीं ऐसा न हो, कल को उसे भी मेरी जरूरत न रहे.

अचानक वीरा के कानों में विपाशा के स्वर उभरे, ‘‘मां, तुम कहां खोई हो जो तुम्हें गाड़ी का हार्न भी नहीं सुनाई पड़ रहा है.’’

वीरा हड़बड़ाती हुई गाड़ी की ओर बढ़ी. घर पहुंच कर विपाशा परी की तरह उछलने लगी. कमला से चाय बनवा कर ढेर सारी चीजों से मेज सजा दी.

सामने से आते हुए विजेंद्र ने एक पल को उसे देखा, उस की आंखों में उसे बेगानापन नजर आया. घर का भी एक अजीब सा माहौल लगा. हालांकि गीतांजलि अब  विजेंद्र के जीवन से जा चुकी थी, फिर भी वीरा को जाने क्यों अपने लिए शून्यता नजर आ रही थी. हां, विपाशा की हंसी जरूर उस के दिल को कुछ तसल्ली दे देती.

वह कई बार अपनेआप से ही बातें करती कि ऊपरी तौर पर वह लोगों के लिए प्रतिभासंपन्न है लेकिन हकीकत में वह तिनकातिनका टूट चुकी थी. जीने के लिए विपाशा ही उस की एकमात्र आशा थी.

विजेंद्र की कुछ मीठी यादों के सहारे वीरा अपना दुख भूलने की कोशिश करती, वह तो बेटी के प्रति मां की ममता थी जिस की खुशी के लिए उस ने अपनी वापसी स्वीकार कर ली थी. वह सोेचती, जब जीना ही है तो क्यों न अपने इस घर के आंगन में ही जियूं, जहां दुलहन बन के आई थी.

वीरा की वापसी से विपाशा की खुशी में जो इजाफा हुआ उसे देख कर काम वाली दादी अकसर कहती, ‘‘बेटा, निराश मत हो. विजेंद्र एक बार फिर से वही विजेंद्र बन जाएगा, जो शादी के कुछ सालों तक था. मैं जानती हूं कि तुम्हें विजेंद्र की जरूरत है और विपाशा को तुम्हारी. क्या तुम विपाशा की खुशी के लिए विजेंद्र की वापसी का इंतजार नहीं कर सकतीं?

‘‘आखिर तुम विपाशा की मां हो और समाज ने जो अधिकार मां को दिए हैं वह बाप को नहीं दिए. तुम्हारी वापसी इस घर के बिखरे तिनकों को फिर से जोड़ कर घोंसले का आकार देगी. खुद पर भरोसा रखो, बेटी.’’ Family Story In Hindi

Story In Hindi: कारखाने वाली – डर के साए में सलमा?

Story In Hindi: शाम को होटल वापस आते समय अचानक जब सलमा से सामना हो गया, तो अनवर एकदम घबरा गया. ‘‘अरे अनवर, तुम…?’’ उसे देखते ही सलमा के बदसूरत चेहरे पर पहचान की चमक और होंठों पर मुसकान आ गई. ‘‘हां… मैं…’’ अनवर को अपनी आवाज गले में फंसती महसूस हुई. ‘‘कब आए?’’ ‘‘2 दिन हुए.’’ ‘‘हमारे घर क्यों नहीं आए?’’ सलमा ने पूछा. ‘‘दफ्तर के काम में उलझा हुआ हूं.’’ ‘‘तो ठीक है, अब घर चलो,’’ सलमा बोली. ‘‘अभी?’’ अनवर का दिल उछल कर गले में आ गया, ‘‘अभी… अभी नहीं. फिर कभी…’’ ‘‘तो ठीक है…

कल तुम 10 बजे हर हाल में मेरे घर आओगे और… दोपहर का खाना हमारे साथ खाओगे…’’ सलमा बोली, ‘‘मैं भी जल्दी में हूं. ज्यादा देर भी नहीं रुक सकती. वे और मुन्नी राह देख रहे होंगे.’’ ‘‘वे कौन…?’’ अनवर ने पूछा. फिर उसे अपनी बेवकूफी का एहसास हुआ, ‘‘वे से मतलब शौहर से है न?’’ ‘‘हां,’’ सलमा का काला चेहरा शर्म से चमक उठा. ‘‘तो तुम्हारी शादी हो गई?’’ अनवर को यकीन नहीं हुआ. ‘‘हां… शादी हुए 2 साल हो चुके हैं. कल तुम घर आ रहे हो न? अच्छा अपना मोबाइल नंबर तो दो’’ ‘‘हांहां, जरूर आऊंगा… और मेरा मोबाइल नंबर है…’’ अनवर ने जवाब में नंबर दिया और आगे बढ़ गया. सलमा को देखते ही अनवर पर जो घबराहट छाई थी,

उस की शादी की बात सुनते ही वह दूर हो गई. कुछ पल पहले वह सलमा से पीछा छुड़ाने के लिए उस से वादा कर रहा था कि वह उस के घर जरूर आएगा. लेकिन अंदर ही अंदर यह सोच रहा था कि सलमा के घर जाने के बजाय वह यह शहर छोड़ कर भाग जाएगा. परंतु जैसे ही सलमा ने बताया कि उस की शादी हो चुकी है और उस की एक बच्ची भी है, तो अनवर का सारा डर दूर हो गया. उस ने तय कर लिया कि अब वह सलमा के घर जरूर जाएगा. सलमा की शादी हो गई?है, अनवर रास्तेभर इसी बारे में सोचता रहा. कोई और उस से यह बात कहता हो, वह यकीन नहीं करता. पर सलमा ने खुद कहा था, तो यकीन न करने का सवाल ही नहीं उठता था. सलमा की शादी उस के लिए ही नहीं, हर उस आदमी के लिए हैरानी की बात हो सकती थी, जो सलमा को जानता था.

अनवर जब भी इस शहर में आता था, इस बात से डरता रहता था कि कहीं सलमा से आमनासामना न हो जाए. सलमा का सामना करना उस के बस की बात नहीं थी. उसे अचानक वह पुरानी वारदात याद हो आई. वह नहीं चाहता था कि फिर उसे एक बार उस तरह की किसी वारदात का सामना करना पड़े. इसलिए कादिर चाचा की मौत के बाद भी अफसोस करने वह उन के घर नहीं गया. पर उस वारदात के लिए न तो अनवर खुद को मुजरिम समझता है और न ही सलमा को. उसे तो उस दिन के बाद से सलमा से हमदर्दी हो गई थी. पहली बार उसे एक औरत की ख्वाहिशों को समझने का मौका मिला था. पर वह सलमा से सिर्फ हमदर्दी ही रख सकता था. वह न तो उस के लिए कुछ कर सकता था, न ही सोच सकता था. सलमा अनवर के पिता के एक दोस्त कादिर चाचा की लड़की थी. वह बहुत बदसूरत थी, काला रंग, पिचका हुआ चेहरा, छोटीछोटी आंखें, बड़ी सी भद्दी नाक और बाहर निकले दांत.

अनवर के अब्बा और कादिर चाचा की दोस्ती इतनी गहरी थी कि कादिर चाचा जब भी उन के शहर आते, तो उन के घर ही ठहरते थे. उस के अब्बा भी जब कभी कादिर चाचा के शहर जाते, उन के घर ही रुकते थे. अनवर का भी अकसर उस शहर में आनाजाना होता था. ऐसी हालत में उस के अब्बा उसे खासतौर से ताकीद करते थे कि वह कादिर चाचा से जरूर मिले और यदि वहां रुकना पड़े तो उन के घर ही रुके. कादिर चाचा से 2 बेटे थे, जिन की शादियां हो चुकी थीं. वे अपनेअपने कारोबार के लिए दूसरे शहरों में जा बसे थे. उस की मां की बहुत पहले ही मौत हो चुकी थी. कादिर चाचा की सेहत भी ठीक नहीं रहती थी. उन का जिंदगी से मोह खत्म हो गया था. केवल एक चिंता थी,

जो उस मोह की डोर को बांधे हुए थी. सलमा की शादी की चिंता उन्हें दिनरात सताती रहती थी. वह 22 साल की हो गई थी. पढ़नेलिखने में बहुत तेज थी, इसलिए अच्छे नंबरों से बीए पास करने के बाद उसे नौकरी भी मिल गई थी. इस तरह वह अपने पैरों पर खड़ी हो गई थी. लेकिन भला कौन बेवकूफ सलमा जैसी बदसूरत लड़की से शादी करने के लिए तैयार हो सकता था. माना कि वह एक कमाऊ लड़की थी, कादिर चाचा ने भी उस की शादी के लिए काफी पैसा जमा कर रखा था, सलमा के दोनों भाई अपनी बहन के दहेज में मुंहमांगी चीजें देने को तैयार थे, पर इन तमाम बातों के बावजूद भी कोई सलमा से ब्याह करने को तैयार नहीं होता था. भला जिस लड़की के चेहरे पर एक पल के लिए भी नजरें जमाना मुश्किल हो, उस के साथ जिंदगीभर का नाता जोड़ने के लिए कौन तैयार हो सकता था.

जब भी कादिर चाचा अनवर के अब्बा से दुख भरी आवाज में सलमा के ब्याह के बारे में बातें करते तो उस के अब्बा दिलासा देने के लिए, यही कहते थे, ‘तुम धीरज रखो कादिर, कुदरत ने सारी लड़कियों के जोड़े बनाए हैं… सलमा का भी जरूर बनाया होगा. दुनिया में कोई न कोई ऐसा नेक आदमी तो होगा ही, जो सलमा की बदसूरती के बावजूद उसे अपना लेगा.’ पर कादिर चाचा यही कहते थे, यह सब दिल को बहलाने की बातें हैं. मैं अपनी बेटी की शादी की तमन्ना सीने में लिए इस दुनिया से चला जाऊंगा. एक दिन अनवर को उस शहर में रुकना था. इसलिए वह कादिर चाचा के घर चला गया. रात का भोजन कर के वह घूमने के लिए बाहर चला गया. कादिर चाचा को कहीं बाहर जाना था, इसलिए वह कह गए थे कि रात को देर से घर आएंगे. सलमा ने खाना लाजवाब बनाया था. इसलिए अनवर कुछ ज्यादा ही खा गया था. इसलिए वह घूमने निकल गया. वह साढ़े 9 बजे के करीब वापस घर आया और पलंग पर लेट गया. सलमा शायद कोई काम कर रही थी. थोड़ी देर बाद जब वह कमरे में आई, तो अनवर ने कोई ध्यान नहीं दिया. पर जब वह कमरे का दरवाजा भीतर से बंद करने लगी, तो वह चौंक पड़ा,

‘क्या बात है?’ वह घबरा कर बोला, ‘यह तुम क्या कर रही हो? तुम क्या चाहती हो?’ ‘वही, जो एक जवान लड़की एक लड़के से चाहती है,’ सलमा उस के करीब आ कर खड़ी हो गई. ‘सलमा, तुम पागल तो नहीं हो गई?’ अनवर बौखला गया. ‘अनवर, तुम मेरे जज्बातों को समझने की कोशिश करो,’ कहते हुए सलमा उस से लिपट गई, ‘माना कि मैं बदसूरत हूं… इतनी बदसूरत कि कोई मुझे एक नजर भर के लिए भी नहीं देख सकता है, पर फिर भी मैं एक औरत हूं. मेरे भी जज्बात हैं… मैं उन को मार कर किस तरह जिंदा रह सकती हूं. मैं अपने जज्बातों को पूरा करने के लिए कई आदमियों से कह चुकी हूं. पर वे मेरी ओर देखना भी पसंद नहीं करते. ‘अनवर, तुम मेरे जज्बातों को समझने की कोशिश करो. माना कि मेरा चेहरा बदसूरत है. पर मेरा शरीर तो वैसा ही है, जैसा एक आम औरत का होता?है. मैं तुम्हें वैसा ही सुख दे सकती हूं, जैसा कि कोई दूसरी औरत दे सकती है. मेरी प्यास बुझा दो… मैं अभी तक कुंआरी हूं…’ अनवर शादीशुदा था. एक मर्द के अंदर किसी औरत का जिस्म कैसा तूफान उठा सकता?है,

यह वह अच्छी तरह जानता था. सचमुच सलमा के जिस्म से उसे वही सुख मिल सकता था, जो उसे अपनी बीवी से मिलता था. तभी उस के भीतर का कोई चीखा, ‘यह गलत है.’ ‘हट जाओ,’ कहते उस ने एक जोरदार थप्पड़ सलमा को मारा और उसे दूर धकेल दिया. सलमा फर्श पर गिर कर सिसकने लगी. अनवर ने अपनी उखड़ी हुई सांसें दुरुस्त कीं और फिर अपना सामान उठा कर तेजी से घर से निकल गया. उस के बाद अनवर फिर कभी कादिर चाचा के घर नहीं आया. उस घटना के बाद से अनवर ने उस घर से सारे रिश्ते ही तोड़ लिए थे और सलमा के बारे में सोचना भी छोड़ दिया था. उसे महसूस होता था कि सलमा जिस हालात में गुजर रही है, वह काफी खतरनाक है. ऐसे में वह कभी भी भटक सकती है. अनवर जब भी इस शहर में आता, यही डर दिल में बना रहता कि कहीं सलमा से सामना न हो जाए. अभी तक ठीक था, पर आज सामना हो गया था. पर अब अनवर सलमा से बचना नहीं चाहता था. वह उस के घर जाना चाहता था. और उस के उस नेक पति से मिलना चाहता था, जिस ने सलमा जैसी बदसूरत लड़की को अपनाया था. दूसरे दिन सुबह 10 बजे जब अनवर सलमा के घर पहुंचा, तो वह उस की राह देख रही थी. ‘‘मुझे यकीन था कि तुम जरूर आओगे.

फिर भी शक तो था ही कि आते हो या नहीं,’’ कहते हुए सलमा ने उसे अंदर आने के लिए कहा. घर बहुत शानदार था. लगता है, कुछ काम हो रहा था, क्योंकि यह घर दूसरी मंजिल पर था और आवाजें निचली और ऊपर वाली मंजिलों से आ रही थीं. ‘‘इन से मिलो, यह हैं मेरे शौहर लतीफ साहब,’’ कहते हुए उस ने सोफे पर बैठे एक आदमी की तरफ इशारा किया. ‘‘अस्सलामु अलैकुम,’’ सोफे पर बैठे सलमा के शौहर ने अनवर को पहले सलाम कर दिया. ‘‘वालेकुम सलाम,’’ जवाब देते हुए अनवर हैरानी से सलमा के अंधे पति को देखने लगा. उस की उम्र 25-26 साल के आसपास थी. जिस्म गठीला और रंग गोरा था. ‘‘अनवर भाई, सलमा अकसर आप के और आप के घर वालों के बारे में बताया करती है. मैं आप को देख तो नहीं सकता, पर महसूस कर सकता हूं,’’ लतीफ बोला. इस बीच सलमा छोटी सी बच्ची को ले आई और बोली, ‘‘यह है मेरी बेटी मुन्नी.’’ अनवर ने बच्चे को देखा. वह सचमुच खूबसूरत थी. बच्ची उसे देख कर हंसने लगी, तो उस ने उसे चूम लिया. ‘‘अनवर भाई,

शादी से पहले मुझे चारों ओर से ठोकरें मिलती थीं. मेरी जिंदगी तो अंधेरों से भरी थी. अनाथ आश्रम में पला और बड़ा हो कर दरबदर की ठोकरें खाने सड़कों पर निकल आया. ‘‘अनाथ आश्रम में मुझे खराद का काम सिखाया गया था. ऐसे में सलमा ने मुझे सहारा दिया… मुझ से शादी कर के मुझे अपने पैरों पर खड़ा किया. ‘‘लोग कहते हैं कि वह बहुत बदसूरत है, पर खूबसूरती और बदसूरती क्या?है, मैं तो कुछ भी नहीं जानता. मेरे लिए तो सलमा से खूबसूरत औरत इस दुनिया में है ही नहीं… सलमा ने ही मुझे खराद का काम लोगों को सिखा कर छोटा सा कारखाना खुलवा दिया.’’ सलमा चाय ले आई थी. प्याला लेते हुए अनवर उसे देखने लगा. जिंदगी के सुख और खुशियां उस के अंगअंग से फूट रही थीं. ‘‘इन के हाथों का कमाल है कि ये हर पुरजे को छू कर समझ लेते हैं और कारीगरों से बढि़या काम करा लेते हैं. हमारे यहां दूरदूर से लोग काम कराने आते हैं,’’ चाय रखते हुए सलमा बोली,

‘‘अब लोग मुझे बौड़म सलमा नहीं कारखाने वाली सलमा कह कर बुलाती हैं अनवर,’’ सलमा ने राज बताया. सलमा एक बदसूरत औरत थी, पर उस ने अपनी होशियारी से इतना शानदार समझौता किया था कि उस की जिंदगी खुशियों से भर गई. उस ने लतीफ जैसे एक अंधे नौजवान से शादी कर के उसे सहारा दिया था और बदले में उसे मिला था एक नेक पति. अगर वह समझौता नहीं करती तो शायद उम्रभर तरसती ही रहती. पहली बार सलमा को देख कर अनवर के दिल में खुशी और बेफिक्री की लहर दौड़ गई. Story In Hindi

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