अनपढ़ता, गरीबी और बेरोजगारी से जूझता मुसलिम तबका

जिस मुसलिम कौम ने कई सदियों तक राज किया, साल 1857 की क्रांति की लड़ाई में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया, देश को अंगरेजों की गुलामी से आजाद कराने वाले आंदोलन में भाग लिया और फिर 1947 में देश को आजाद कराने में भागीदारी निभाई, आज उसी तबके की दशा चिंताजनक है.

वर्तमान दौर में यह तबका माली, सामाजिक,  पढ़ाईलिखाई, राजनीतिक व सांस्कृतिक रूप से पिछड़ रहा है. इस के जिंदगी जीने के ग्राफ में भी गिरावट देखी जा रही है.

मुसलिम समाज आज अनपढ़ता, गरीबी और बेरोजगारी से भी जू?ा रहा है. इस वजह से समाज अनैतिक कामों के जाल में फंसता चला जा रहा है. आखिर इस बदहाली का कुसूरवार कौन है?

समाज के रहनुमा गौर करें : रहबर ए कौम सम?ा ले ये हकीकत है बड़ी, कौम छोटी है, मगर इस की रिवायत है बड़ी.

इस समाज के रहनुमाओं की राजनीतिक नुमाइंदगी और शासनप्रशासन में भागीदारी नहीं के बराबर है और जो है, वह भी बौद्धिक रूप से भीरू है. इस तबके के लोग जिस राजनीतिक नुमाइंदगी के पीछे रहे, उस ने भी इन का शोषण ही किया. जो राजनीतिक दल धर्मनिरपेक्षता का ढोंग करते हैं, वे भी पीठ पीछे घात ही लगाते हैं.

इन सब बातों पर इस समाज को फिक्र करनी होगी. देश का वातावरण वर्तमान समय में दूषित है और हमें आपसी भाईचारे से रहना है.

मस्तान बीकानेरी का कहना है : दुनिया से जो डरते थे उन्हें खा गई दुनिया, वे छा गए दुनिया में जो डरते थे खुदा से.

मुसलिम समाज की हालत पर आखिरकार देश के तब के प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह ने 58 साल बाद यह महसूस किया कि मुसलिमों के सामाजिक, माली, पढ़ाईलिखाई और राजनीतिक पिछड़ेपन के कारण व निवारण के लिए कुछ किया जाए, तो फिर उन्होंने जस्टिस राजेंद्र सच्चर की अध्यक्षता में साल 2005 में एक कमेटी बनाई थी.

इस आयोग की रिपोर्ट भी चौंकाने वाली थी और मुसलिमों के हालात अनुसूचित जातियों से भी बदतर बताए गए थे. ऐसा ही कुछ जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग ने भी बताया था. इन आयोगों ने जो सु?ाव दिए, उन्हें लागू करने में भी उदासीनता ही रही. वे सु?ाव अब ठंडे बस्ते में पड़े हैं.

किसी शायर ने कहा है : बेइल्म, बेहुनर रहेगी दुनिया में जो भी कौम, कुदरत की इकतिजा है, बन के रहेगी वो गुलाम.

मुसलिमों को इल्म व हुनर की वजह से यह दशा सुधारनी जरूरी है. इस के लिए सरकारों पर निर्भर न हो कर मुसलिमों को मौडर्न पढ़ाईलिखाई के सांचे में खुद को ढालना होगा.

कहा भी तो गया है : खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले, खुदा अपने बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है.

इस के लिए समाज के जिम्मेदार लोगों को आगे आ कर गांव और शहर के लैवल पर संगठन बना कर समाज के बुद्धिजीवी तबके की मदद से सुनियोजित तरीके से क्रांतिकारी बदलाव ला कर समाज को जागरूक करने की अलख जगाई जानी चाहिए.

आज का जमाना प्रतियोगिता का है. मुसलिमों के बच्चे गाइडैंस की कमी में पिछड़ जाते हैं. बहुत से तो सामाजिक और माली वजहों से स्कूल छोड़ देते हैं, बहुत कम ही आगे की पढ़ाई तक पहुंच पाते हैं. इस समस्या से नजात पाने के लिए भी मुहिम चलानी चाहिए.

मुसलिम समुदाय के बच्चों को मनोवैज्ञानिक ढंग से मार्गदर्शन की जरूरत है, जबकि आम लोगों की सोच बन चुकी है कि मुसलिमों को नौकरी तो मिलनी नहीं है, इसलिए इस मिथक को तोड़ना भी बहुत जरूरी है.

आज के तकनीकी जमाने में देश में पढ़ेलिखे लोगों का होना बहुत जरूरी है, क्योंकि हमारे पुश्तैनी धंधे भी आधुनिक तकनीक से चलाए जाने में उन का पढ़ालिखा होना जरूरी है, इसलिए मुसलिम समाज में आमूलचूल बदलाव लाने की दिशा में ऊंची तालीम और प्रोफैशनल कोर्स, कंप्यूटर की अच्छी जानकारी की अहमियत की गाइडैंस देना जरूरी है.

इस के साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं की जानकारी देना और बच्चों को कोचिंग दिलाना जरूरी है. आज केंद्र

व राज्य सरकार की तमाम योजनाओं और दूसरे कार्यक्रमों का फायदा लेने के लिए भी उन का मार्गदर्शन किया जाए.

मुसलिमों में बढ़ चुके पिछड़ेपन को दूर करने के लिए उन्हें सामाजिक कुरीतियों और फुजूलखर्ची से भी दूर रहने की जरूरत है. यह पैसा बच्चों की तालीम पर खर्च किया जाए.

किसी ने सही कहा है : अभी वक्त है संभालो समाज को समाज के रहनुमाओ, वक्त निकल गया हाथ से तो पछताओगे तुम रहनुमाओ.

साथ ही, मुसलिम समाज के बच्चों के लिए लाइब्रेरी, होस्टल, पढ़ाईलिखाई से जुड़े संस्थानों का संचालन किया जाए और गरीब बच्चों की पढ़ाईलिखाई का पुख्ता इंतजाम कर उन्हें मैनेजमैंट, होटल, पर्यटन, चिकित्सा, पशुपालन, खेतीबारी, तमाम छात्रवृत्तियां फैलोशिप और खेलों से जुड़ी जानकारी भी दी जानी चाहिए. इस से भविष्य में मुसलिम समाज को फायदा होगा

सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के मार्केट पर एआई की सेंध

अब एआई से सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बनाए जा रहे हैं. ये हूबहू इंसानों जैसे दिखाई दे रहे हैं. भारत में नैना, कायरा, श्रव्या इन्फ्लुएंसर के मार्केट में उतर चुकी हैं. कहीं ये इन्फ्लुएंसर्स के मार्केट में सेंध न लगा दें.

गुलाबी ब्लोंड हेयर, शार्प नोज, सधे होंठ और सुराहीदार गरदन. रोलर कोस्टर सा जिस्म ऐसा कि कोई भी फिसल जाए पर जब पता चले कि सोशल मीडिया पर एटाना लोपेज नाम की यह लड़की रियल नहीं, बल्कि एआई की दुनिया की इल्यूजन है जिसे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के रूप में परोस दिया गया है तो हर कोई अपना माथा पकड़ लेगा.

आखिर कैसे इतनी हूबहू इंसान जैसी कोई चीज बनाई जा सकती है जिस के एक्सप्रैशन, अदाएं सब इंसान जैसे हों, जो आंखों से इशारा करती हो, नाचती हो, होंठ हिलाती हो और मदमस्त हो. यह कमाल एआई ने किया है. पत्थर की मूरत में जान फूंकने को सच मान लेने वाले इस अंधविश्वासी समय में एआई लोहे में जान फूंक रहा है. उस के रोबोट्स टैनिस व चैस खेल रहे हैं, खाना बना रहे हैं, नाच रहे हैं और अब कंपनियों के प्रचार के लिए रील भी बना रहे हैं.

एटाना लोपेज एआई अवतार में चर्चा का विषय काफी पहले बन चुकी थी. एटाना लोपेज एआई वाली सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर है. अपनी प्रोफाइल में वह खुद को वर्चुअल सोल बताती है. इस ने अभी सिर्फ 73 पोस्ट किए हैं पर इन 73 पोस्ट्स में इसे 2 लाख 72 हजार लोगों ने फौलो किया है. खुद को फिटनैस मौडल बताने वाली एटाना ने हर एक पोस्ट पर हजारों लाइक्स और शेयर पाए हैं और उन्हें शेयर किया गया है.

एटाना लोपेज इंस्टाग्राम के अलावा ट्विटर, टिकटौक पर भी है. ट्विटर पर खुद को स्पैनिश गौड्स औफ टैंपटेशन बताती है, वहां इंटिमेट और सिडक्टिव कंटैंट डालती है. इस के अलावा वह गेमिंग, फिटनैस की शौकीन भी है.

नाम भी पैसा भी

द फाइनैंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, एटाना लोपेज को एड एजेंसी क्लूपलैस की कोफाउंडर डिआना नूनेज ने बनाया है. नूनेज का कहना है कि वे इन्फ्लुएंसर्स की दिनोंदिन बढ़ती फीस से परेशान थीं. इस का कोई हल निकालने के लिए उन्होेंने एआई की सहायता से वर्चुअल इंफ्लुएंसर बनाने की सोची और एआई अवतार एटाना लोपेज को गढ़ दिया.

अब खबर यह है कि गुलाबी बालों वाली लोपेज हर महीने 9 लाख रुपए कमा रही है. सोशल मीडिया पर कंपनियां भी लोपेज से अपने प्रोडक्ट्स का प्रचार करवाने को हंसीखुशी पैसा देने को तैयार हैं.

पेटीएम फाउंडर और सीईओ विजय शेखर शर्मा ने एक्सो पर एक पोस्ट में लोपेज का जिक्र करते हुए लिखा था कि कैसे ह्यूमन इन्फ्लुएंसर के बजाय एआई इन्फ्लुएंसर्स आने वाले समय में मार्केटिंग के लिए फायदेमंद हैं.

एआई अवतार धीरेधीरे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की जगह लेता जा रहा है. सिर्फ एटाना लोपेज ही नहीं, इस फेहरिस्त में एक बड़ा नाम लू दो मगालू का है. उस के 68 लाख फौलोअर्स हैं. अपने पेज में वह ब्यूटी प्रोडक्ट्स का प्रचार करती है. इस के फीचर इंसानों जैसे नहीं हैं पर यह रिप्लिका बेहद फेमस है.

इसी तरह लिलमिकेला है जो 19 साल की है. जिस का जन्म 2016 में इंस्टाग्राम पर हुआ. अपने प्रोफाइल पर उस ने हैशटैग ‘ब्लैक लाइव मैटर’ लिखा हुआ है. जाहिर है यह इन्फ्लुएंसर अमेरिका में हो रहे ब्लैक पर अत्याचार पर स्टैंड लेती है. इस के इंस्टाग्राम पर 27 लाख फौलोअर्स हैं, वहीं टिकटौक पर 35 लाख और फेसबुक पर 11 लाख. यह हूबहू इंसानों जैसी है. इस की पोस्ट में दिखाई देता है कि यह पब्लिक प्लेस में घूमती है. अलगअलग जगहें ट्रैवल करती है. साथ में कंपनियों और रैस्तरां का प्रचार भी करती है.

2019 में सुपरमौडल बेला हदीद ने केल्विन क्लेन के विज्ञापनों में लिलमिकेला के साथ तसवीर खिंचवाई, जिस पर तब बात उठी थी कि यह भविष्य की एक झलक है. आज वह झलक इसलिए भी सच साबित होती दिखाई दे रही है कि यह इन्फ्लुएंसर बड़ेबड़े स्टार्स के साथ पोडकास्ट करते हुए भी नजर आ रही है.

भारत में एआई इन्फ्लुएंसर की धूम

सोशल मीडिया पर एआई इन्फ्लुएंसर सिर्फ विदेशों में ही फेमस नहीं हो रहे, इंडिया भी इस मामले में पीछे नहीं है. नैना, कायरा, टिया शर्मा और श्रव्या वे नाम हैं जो अपनी धाक जमा चुके हैं. 22 साल की नैना जो झांसी से मुंबई आई है और उस का सपना एक ऐक्ट्रैस व मौडल बनने का है. लेकिन नैना की यह स्टोरी उतनी ही फेक है जितनी वह खुद है. वह एआई से तैयार की गई है.

भारत में नैना असल और नकल के बीच बनी लाइन को ब्लर करने का काम करती है. वह खुद को भारत की पहली एआई सुपरस्टार कहती है. उस के लुक्स, हरकतें सब असल ह्यूमन की तरह हैं. उसे देख कर कोई कह नहीं सकता कि यह नकली होगी.

नैना पैपराजी से बात करती है, सैलिब्रिटी की तरह फोटो खिंचवाती है. वह ‘द नैना शो’ के नाम से पोडकास्ट चलाती है जहां सान्या मल्होत्रा, सियामी खेर जैसी बौलीवुड सैलिब्रिटीज आती हैं. वह हर तरह की वीडियो बनाती है और बताती है कि साड़ी कैसे पहनी जाए, स्टाइलिस्ट और ट्रैंडी कैसे बना जाए, बाल कैसे बनाए जाएं और मिनिमम ज्वैलरी से अच्छा लुक कैसे बनाया जाए. यानी यह एआई की जीतीजागती इन्फ्लुएंसर है जो फैशन के बारे में जानकारी देती है.

जाहिर है, एआई अब इन्फ्लुएंसर के मार्केट पर सेंध लगाने जा रहा है. कंपनियां भी इसे बढि़या चांस की तरह देख रही हैं क्योंकि इन्फ्लुएंसर्स जिस तरह किसी प्रोडक्ट के प्रचार के लिए मोटी फीस ले रहे हैं उस के मुकाबले इस तरह के डमी या डोपलैंगर्स ज्यादा किफायती साबित हो रहे हैं.

तकनीक है कमाल की

हिमांशु ने माया, ब्लैंडर और अनरियल इंजन जैसे 3डी डिजाइन टूल्स का यूज कर 2022 में कायरा को बनाया था. इन टूल्स ने वीडियो गेम और मार्वल फिल्मों में यूज की जाने वाली तकनीक के जैसे ही कायरा के चेहरे और बौडी पार्ट्स को तराशने में मदद की. वहीं दूसरी तरफ वे बताते हैं कि श्रव्या को 2023 में केवल जेनरेटिव एआई का यूज कर के बनाया गया जो बिलकुल ही रीयलिस्टिक है.

3डी टैक्नोलौजी के माध्यम से पहले कायरा जैसे डोपलैंगर्स बनाए जाते थे जिस में काफी मेहनत और रिसौर्सेज लगते थे, हालांकि इस के बावजूद कायरा से मेकर्स को फायदा हुआ है. उस ने लोरियल पेरिस, बोट, टाइटन, रियलमी और अमेरिकन टूरिस्टर जैसे बड़े ब्रैंडों के साथ कोलैबोरेट किया. कायरा के कुछ प्रचार वीडियो को 35 मिलियन यानी साढ़े 3 करोड़ से अधिक बार देखा गया है. अब एआई की हैल्प से आसानी और किफायत में ये बनाए जा रहे हैं जो ज्यादा रियल दिखाई देते हैं.

एआई इन्फ्लुएंसर कहीं न कहीं रियल इन्फ्लुएंसर्स के लिए बड़ी चुनौती साबित होते जा रहे हैं. क्योंकि अधिकतर इन्फ्लुएंसर्स का कंटैंट एकजैसा होता है. उन में वैराइटी और क्रिएटिविटी की कमी होती है. किसी ट्रैंडिंग सौंग पर अपना शरीर और होंठ हिला लेना उन्हें कंटैंट लगता है.

आमतौर पर इन्फ्लुएंसर्स के लिए रील का कंटैंट यही है तो इस अनुसार इस से कहीं ज्यादा अच्छा कंटैंट एआई देने में सक्षम है. आज एआई इस फील्ड में घुस रहा है. इस तरह के इन्फ्लुएंसर्स गढ़ने में कई हाईप्रोफाइल टीम जुट गई हैं. उन की टीम ऐसे एआई मौडल बनाने पर काम कर रही है जो एक कमांड में कुछ सैकंड के छोटे रील व वीडियो बनाने में सक्षम हों.

अलग यह है कि एआई इन्फ्लुएंसर्स कई भाषाओं में कंटैंट दे सकते हैं. इन के पास भाषा की रुकावट नहीं है. इन के पास उम्र की भी सीमा नहीं है. ये आज जिस तरह दिखाई दे रहे हैं, हर समय उसी तरह दिखाई दे सकते हैं. इसलिए इस तरह के इन्फ्लुएंसर्स ग्लोबली पौपुलर होने का दमखम रखते हैं. यही कारण भी है कि एटाना लोपेज, लिलमिकेला ग्लोबली फेमस हैं.

नामचीन भी एआई की दुनिया में

और तो और, अब फेमस सैलिब्रिटीज ने भी अपना एआई अवतार बनाना शुरू कर दिया है, जिस में बौलीवुड स्टार सनी लियोनी का नाम जुड़ा है. उस ने अपने डोपलैंगर अवतार पर कहा कि, ‘मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि यह मैं हूं. अब जब आप चाहें मुझ से बात कर सकते हैं और देख सकते हैं.’ इस इंस्टा पोस्ट पर उन्होंने ञ्चद्मड्डद्वशह्लश.ड्डद्ब को टैग किया.

पिछले साल साइंस फिक्शन पौपुलर वैब सीरीज ‘ब्लैक मिरर’ का 6ठा सीजन आया था. उस में पहले एपिसोड ‘जोआन इज औफुल’ में इसी तरह के एआई अवतार की तरफ इशारा किया गया था. उस में दिखाया गया था कि कैसे एआई की मदद से अब परदे पर एआई सैलिब्रिटीज दिखाई जाएंगी जो हूबहू असल सैलिब्रिटीज की तरह ही होंगी. इस में रियल ऐक्ट्रैस के साथ कौन्ट्रैक्ट साइन होता है, फिर उस का एआई क्लोन बना कर फिल्म बना दी जाती है. यह सब आने वाले टाइम में सच साबित हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता.

लेकिन शुरुआत अभी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के साथ हो गई है, जहां उन का बाजार अब छिनता दिखाई दे रहा है. हालांकि इस तरह के एआई इन्फ्लुएंसर के साथ समस्या यह है कि ये चाहे परोस कैसा भी कंटैंट रहे हों, इन की बुनियाद झूठ पर टिकी होगी और कहे या बताए पर जल्दी भरोसा नहीं किया जा सकता. लेकिन सोशल मीडिया की बाढ़ में कौन,कब, कहां मिक्स हो जाए, पता नहीं चलता.

लवर औन मोबाइल औफ

एक तरफ सोशल मीडिया पर रिलेशनशिप आसानी से बनने लगे हैं वहीं दूसरी तरफ इसी के चलते टूट भी रहे हैं. हद से ज्यादा सोशल मीडिया में घुसे रहना रिश्तों में खटास लाता है. जरूरी है कि पार्टनर के साथ रहते सोशल मीडिया को म्यूट कर दिया जाए.

ब्लैक शौर्ट ड्रैस पहनी 20 साल की सारा आधे घंटे से अपने मोबाइल फोन में लगी हुई है. कभी वह टेबल पर सजी डिश की फोटो खींच रही है तो कभी वैन्यू का बूमरैंग बना रही है, कभी सैल्फी क्लिक कर रही है. इस के साथ वह तुरंत ही इन्हें अपनी इंस्टा स्टोरी, व्हाट्सऐप और स्नैपचैट पर लगा रही है. यह हाल उस का तब है जब वह पहले से ही विशेष से इस वैन्यू पर अपनी कई रील बनवा चुकी है.

विशेष काफी देर से यह सब देख रहा है. लेकिन कुछ बोल नहीं रहा. वह बस इंतजार कर रहा है कि कब सारा अपना फोन साइड में रखे और उस से बातें करे. लेकिन सारा को तो फुरसत ही नहीं है सोशल मीडिया से.

हद तो तब हो गई जब सारा इंस्ट्राग्राम पर लाइव चली गई. वह भी तब जब वह अपने पार्टनर के साथ डेट पर आई है. कौफी, पिज्जा, पास्ता सब ठंडा हो गया लेकिन सारा के हाथ से फोन नहीं छूटा. यह बात विशेष को बिलकुल भी अच्छी नहीं लगी. उस का पेशेंस अब जवाब दे चुका है.

विशेष सारा से भौंहें चढ़ाते हुए कहता है, ‘‘यह हमारी डेट है, तुम्हारा कोई व्लौग वीडियो नहीं, जो तुम फोन में ही लगी रहो. मैं भी चाहूं तो फोन में लग सकता हूं, बूमरैंग बना सकता हूं पर मुझे तुम्हारे साथ वक्त बिताना है. तुम्हारी वाइब एंजौय करनी है. तुम से बातें करनी हैं. तुम्हारा हाथ पकड़ कर बैठना है. लेकिन तुम अपना मोबाइल छोड़ो तो न. मुझे तो ऐसा लग रहा है कि तुम मेरे साथ डेट पर नहीं आईं बल्कि अपने फोन के साथ आई हो.’’

यह सब सुन कर सारा ने कहा, ‘‘वेट न विशेष, अभी मैं इंस्टा पर लाइव हूं. तुम थोड़ा वेट नहीं कर सकते.’’

यह सुन कर विशेष ने थोड़ी देर इंतजार किया, फिर वहां से उठ कर चल दिया. इस के बावजूद सारा ने अपना इंस्टा लाइव बंद नहीं किया. 5 मिनट बाद जब वह असल दुनिया में आई तो देखा विशेष सामने नहीं था. उस ने उसे कौल किया.

गुस्से में विशेष ने उस की कौल नहीं उठाई. सारा ने कई बार कौल किया लेकिन इस का कोई फायदा नहीं हुआ.

कई दिन हो गए विशेष और सारा के बीच में कोई बात नहीं हुई. न सारा ने अपने बिहेवियर के लिए सौरी कहा, न ही विशेष ने पैचअप करने की कोशिश की. फिर एक दिन विशेष को अपने म्यूचुअल फ्रैंड से पता चला कि सारा किसी और को डेट कर रही है और उसे वह लड़का सोशल मीडिया में ही मिला था.

सारा का विशेष से दूसरा ब्रेकअप था. उस के दोनों ब्रेकअप होने की वजह सोशल मीडिया पर हद से ज्यादा समय बिताना था. रील्स की लत उसे ऐसी लगी है कि बातें करतेकरते वह रील भी देखती रहती है. वह हर वक्त सोशल मीडिया में ही घुसी रहती थी, फिर चाहे वह किसी रोमांटिक डेट पर आई हो या गोवा के बीच पर सनराइज का मजा ले रही हो. 24 घंटे उस के हाथ में मोबाइल ही होता था.

सोशल मीडिया की यह लत हर दूसरे यंगस्टर को है. मैट्रो सिटी में रहने वालों के रिश्ते भी सोशल मीडिया पर बन कर टूट रहे हैं. सारा और विशेष का उदाहरण ही है, जहां उन के रिलेशनशिप टूटने या उस में मनमुटाव आने का कारण सोशल मीडिया व उन का मोबाइल फोन का ज्यादा यूज करना है.

दिल्ली यूनिवर्सिटी से मास कम्यूनिकेशन करने वाली 19 साल की ईशा कहती है, ‘‘यह जो दौर चल रहा है वह दिखावट का दौर है. यंगस्टर्स पर्सनल लाइफ सोशल मीडिया पर परोसना पसंद करते हैं. असल में इन्हें लाइक, शेयर और सब्सक्राइब की लत लगी है और इसे पाने के लिए ये हौस्पिटल में बीमार पड़ी अपने परिवार की सदस्या की रील बनाने से भी नहीं हिचकिचाते.

यंगस्टर्स सोशल मीडिया का इतना दीवाना है कि वह अपने हर मूमैंट को कैप्चर करना चाहता है, चाहे वह पार्टनर के साथ प्राइवेट मूमैंट ही क्यों न हो. वह जल्दी से इन्हें इंस्टाग्राम फेसबुक, स्नैपचैट, व्हाट्सऐप जैसे सोशल साइट्स पर अपलोड करना चाहता है.

इन में ऐसे भी कुछ लोग हैं जो रियल लाइफ से ज्यादा रील लाइफ में जीते हैं. दिन में 10 बार अपना स्टेटस अपडेट करते हैं. इतने से भी मन नहीं भरता तो दूसरे के व्हाट्सऐप स्टेटस देखते रहते हैं. कभी उन की इंस्टाग्राम स्टोरी तो कभी रील देखने लगते हैं. यही है अब यंगस्टर्स की लाइफ. क्या पर्सनल क्या प्राइवेट, सब सोशल मीडिया पर देखा जा सकता है.

सोशल मीडिया पर ऐक्टिव

लोग कितना वक्त सोशल मीडिया पर बिताते हैं, वर्ल्ड स्टेटिक्स नाम के एक ट्विटर अकाउंट पर इस की जानकारी दी गई. इस रिपोर्ट के मुताबिक, नाइजीरिया सब से ऊपर है, जहां लोग करीब साढ़े 4 घंटे सोशल मीडिया पर ऐक्टिव रहते हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, सोशल मीडिया पर सब से कम जापान के लोग ऐक्टिव रहते हैं. जापान के लोग सिर्फ 49 मिनट ही सोशल मीडिया पर बिताते हैं. यही कारण है कि वे टैक्नोलौजी में सब से आगे हैं. अगर जापान टैक्नोलौजी से अपना हाथ खींच ले तो दुनिया से 16 फीसदी टैक्नोलौजी गायब हो जाए. वहीं स्वीडन में यूजर्स करीब 1 घंटे 11 मिनट हर दिन सोशल मीडिया पर बिताते हैं.

अगर भारत की बात करें तो करीब 30 देशों की इस लिस्ट में भारत का 14वां स्थान है. यहां एक यूजर एक दिन में करीब 2 घंटे 44 मिनट सोशल मीडिया पर खर्च करता है. भारत में 3 में से 1 व्यक्ति सोशल मीडिया का इस्तेमाल करता है. अमेरिका में यह 2 घंटे 11 मिनट है. चीन में 2 घंटे 1 मिनट है. इस के अलावा कनाडा, आस्ट्रेलिया, स्पेन, डेनमार्क और यूके में लोग करीब 2 घंटे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं.

पिछले कुछ सालों से सोशल मीडिया हमारी लाइफ, वर्क और रिलेशन पर इफैक्ट कर रही है. जहां एक ओर सोशल मीडिया से रिलेशनशिप बनते हैं तो बहुत से टूटते भी हैं.

सोशल मीडिया से रिलेशनशिप पर असर

सोशल मीडिया का ज्यादा यूज एक रिलेशनशिप को कितना इफैक्ट करता है, यह एक सर्वे में बताया गया. इस सर्वे में 2 हजार लोगों की प्राइवेट लाइफ, कम्युनिकेशन और ट्रस्ट का आंकलन किया गया और यह जाना गया कि वे एक कपल्स के तौर पर औनलाइन कितनी सामग्री साझा करते हैं.

सर्वे में 52 फीसदी कपल ने बताया कि वे वीक में 3 से ज्यादा बार अपने रिलेशनशिप की फोटोज, वीडियोज औनलाइन पोस्ट करते हैं. इस में हैरान करने वाली बात यह थी कि इन में से सिर्फ 10 फीसदी लोगों ने बताया कि वे अपने रिश्ते से ‘बहुत खुश’ हैं.

हर कोई सोशल मीडिया पर अपने रोमांटिक मूमैंट को दिखाना पसंद करता है, खासकर अपने वैकेशन को. लेकिन सर्वे से यह पता चला कि जो कपल यह दिखाने के लिए सोशल मीडिया पर बारबार पोस्ट करते हैं कि वे अपने पार्टनर की कितनी सराहना करते हैं.

सोशल मीडिया के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करने से रिलेशनशिप पर बुरा असर पड़ता है. जो कपल्स सोशल मीडिया पर अपनी प्राइवेट लाइफ ज्यादा शेयर करते हैं, उन के रिलेशन पर इस का नैगेटिव इफैक्ट पड़ता है. इस से कपल के बीच ट्रस्ट की कमी होती है. इस से शाई पार्टनर भी अनकंफर्टेबल फील करता है.

सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताने के कारण आप अपने पार्टनर को समय नहीं दे पाते, जिस से आपस में कम्युनिकेशन गैप हो जाता है. अपने रिलेशन को मजबूत बनाने के लिए एकदूसरे से बातचीत करते रहना बहुत जरूरी है. जो कपल अपने पार्टनर को औनलाइन दिखाना पसंद करते हैं, वे अपने रिलेशन में ज्यादा खुश नहीं होते हैं. इस के कई कारण होते हैं.

सोशल मीडिया पर बारबार पोस्ट करना, स्पैशली कपल सैल्फी, दरअसल दूसरों का अटैंशन पाने का एक तरीका होता है. जो कपल अपने रिलेशनशिप में खुश नहीं हैं, वे अपने रिलेशन में महसूस होने वाली कमी की भरपाई के लिए ज्यादा से ज्यादा कपल पोस्ट का सहारा लेते हैं.

सोशल मीडिया पर लगातार दूसरे कपल्स के खुशी के पलों को देखने से कई कपल्स में जलन और अपने रिश्ते में स्पार्क की कमी की भावना पैदा होती है. लगातार हैप्पी मूमैंट्स और रोमांटिक मूमैंट्स को पोस्ट करने से कपल्स पर एक आइडियल इमेज पेश करने का प्रैशर आ जाता है, जो स्ट्रैसफुल और नकली हो सकता है. यह आइडियल कपल दिखने का प्रैशर सोशल मीडिया पर ज्यादा ऐक्टिव रहने का एक कारण है.

जो कपल अपने रिश्तों में कम सिक्योर फील करते हैं, वे सोशल मीडिया पर ‘हैप्पी रिलेशनशिप’ की इमेज पेश करने की कोशिश करते रहते हैं. इन पोस्ट के जरिए वे खुद को यह समझाने की कोशिश करते हैं कि सबकुछ ठीक है. सोशल मीडिया का ज्यादा इस्तेमाल करने से रिश्ते के भीतर मीनिंगफुल कम्युनिकेशन और किसी बहस को सौल्व कर के तरीके तक पहुंचने पर लगने वाला समय काफी ज्यादा हो सकता है.

अगर कोई अपने पार्टनर के साथ बात करने के बजाय इंस्टाग्राम फीड को स्क्रौल करने में ज्यादा इंटरैस्ट दिखाता है तो इस से आप के रिलेशन पर नैगेटिव इफैक्ट पड़ता है. जितना ज्यादा टाइम आप अपने फोन पर बिताएंगे, उतना ही ज्यादा आप अपने पार्टनर के साथ बिताए गए हैप्पी मूमैंट और मौजमस्ती के छोटेछोटे मूमैंट्स को मिस कर देंगे.

सोशल मीडिया पर कई लोग अपने इमोशंस, अपनी पर्सनल लाइफ में चल रही प्रौब्लम्स को शेयर करते हैं. अपने रिलेशनशिप की छोटीछोटी बातें शेयर करना सही नहीं है. इस से पार्टनर हर्ट हो सकता है. बेहतर यह है कि सोशल मीडिया को बहस की जगह न बनाएं बल्कि आपस में बात कर मुद्दों को सुलझाएं.

सांप काटने से ज्यादा मौत और अंधविश्वास

महाराष्ट्र के एक गांव नारायणगांव के डाक्टर सदानंद राउत और उन की पत्नी डाक्टर पल्लवी राउत ने जहरीले सांप के काटने का इलाज आज से 35 साल पहले अपने गांव में शुरू किया था. आज उन के गांव में सांप से काटे की मृत्युदर जीरो हो चुकी है, जो काबिलेतारीफ है. इस के लिए उन्हें कई अवार्ड भी मिले हैं.

सांप काटने के इलाज के बारे में पूछने पर डाक्टर सदानंद राउत ने बताया, ‘‘मैं वर्ल्ड हैल्थ और्गनाइजेशन और नैशनल प्रोटोकोल ट्रीटमैंट गाइडलाइंस के आधार पर इलाज करता हूं. इस में ‘एंटी स्नेक वैनम’ जितनी जल्दी हो सके पीडि़त को देता हूं. इस के अलावा बाकी जो भी इमर्जैंसी लक्षण पीडि़त में दिखते हैं, उन के आधार पर इलाज करता हूं.

‘‘मेरी पत्नी डाक्टर पल्लवी भी इस काम में मेरा हाथ बंटाती हैं. इस काम को करने का मकसद हम दोनों को तब मिला था, जब एक दिन एक 8 साल की लड़की को उस के परिवार वाले हमारे पास ले कर आए थे, जिसे कोबरा सांप ने काटा था और 20 मिनट के बाद ही वह मु?ा तक पहुंची थी, लेकिन उस की मौत हो चुकी थी.

‘‘इस के बाद से हम ने स्नेक बाइट के पीडि़तों का इलाज करने का संकल्प लिया, लेकिन गांवदेहात के इलाकों में आज भी अंधविश्वास बहुत ज्यादा है और गांव वाले हमारे इलाज को सही नहीं सम?ाते थे.

‘‘वे तांत्रिक और झाड़फूंक वाले को अस्पताल में छिपा कर लाने लगे थे. अगर पीडि़त ठीक हो जाता था, तो उस का क्रेडिट तांत्रिक को मिलता था और अगर कुछ गलत हुआ, तो उस का खमियाजा मु?ो भोगना पड़ता था.’’

डाक्टर सदानंद राउत ने आगे बताया, ‘‘इस के बाद मैं गांव के लोगों को ट्रेनिंग देने के लिए वर्कशौप करने लगा. करैत सांप के काटने पर पीडि़त 2 हफ्ते तक गहरे कोमा में जा सकता है और उसे वैंटिलेटर पर रखना पड़ता है, लेकिन गांव वाले सोचते थे कि मैं पैसे बनाने के लिए पीडि़त को वैंटिलेटर पर रख रहा हूं, पर ऐसा नहीं था और इसीलिए वहां के नौजवानों को जागरूक करना जरूरी था.’’

समस्या अंधविश्वास की शुरूशुरू में 10 साल का एक बच्चा जब डाक्टर सदानंद राउत के पास करैत सांप के काटने पर कोमा की हालत में आया, तो उसे 6 दिनों तक वैंटिलेटर पर रखने के बावजूद उसे होश नहीं आया. उस के दादा और गांव के बड़े बुजुर्ग उस बच्चे को मरा हुआ सम?ा रहे थे और अस्पताल से ले जाना चाहते थे.

डाक्टर सदानंद राउत ने उस बच्चे के परिवार को मौनिटर पर दिखाया और सम?ाया कि बच्चे का दिल धड़क रहा है और वह जिंदा है. 10 दिन बाद बच्चे की आंखों की पुतली हिली और 13 दिन में वह ठीक हो गया.

अपने ‘जीरो स्नेक बाइट डैथ’ मिशन के बारे में डाक्टर सदानंद राउत बताते हैं, ‘‘इस के बाद मैं ने छोटेछोटे आदिवासी गांवों में स्कूलकालेजों और दूसरी संस्थाओं के सारे हैड को स्नेक बाइट जागरूकता मुहिम में शामिल किया. दूसरे लोग भी इस में सहयोग देने लगे, क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि यह जिंदगी बचाने की मुहिम है.

‘‘गांव के लोगों को सम?ा में आ गया था कि सांप कितना भी जहरीला क्यों न हो, काटने के तुरंत बाद में पीडि़त को अस्पताल ले आने पर उसे बचाया जा सकता है.’’

एकएक सैकंड है खास डाक्टर सदानंद राउत बताते हैं, ‘‘जहरीले सांप के काटने से ज्यादातर कार्डिएक अरैस्ट (दिल का रुकना) होता है, जो एक मिनट के अंदर ही हो जाता है. ऐसे मरीज को जल्द से जल्द डाक्टर तक पहुंचा दें, ताकि समय पर इलाज शुरू हो जाए.

‘‘ज्यादातर लोगों की मौत अस्पताल पहुंचने से पहले ही हो जाती है, इसलिए किसी तांत्रिक या ?ाड़फूंक वाले के पास न जा कर पीडि़त को तुरंत पास के किसी भी अस्पताल और डाक्टर के पास ले जाएं.’’

ऐसे बचें सांप के काटे से अगर आप ऐसे इलाके में रहते हैं, जहां पर जहरीले सांप ज्यादा पाए जाते हैं, तो इन उपायों पर जरूर ध्यान दें :

* गम शूज पहनें.

* पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें.

* घास पर काम करने से पहले छड़ी का इस्तेमाल करें.

* सही रास्ते पर चलें, जंगल के बीच से नहीं.

* रात में काम करते समय बैटरी और छड़ी का इस्तेमाल करें.

* जमीन पर न सोएं.

* मच्छरदानी का इस्तेमाल करें.

* घर को साफ रखें, ताकि चूहे अंदर न रहें.

* आसपास के पेड़ों की छंटाई करते रहें, ताकि खिड़की के पास की टहनियों से सांप कमरे में न आ सकें.

बीवी का चालचलन, शौहर का जले मन

दुनिया का सब से हसीन और खूबसूरत रिश्ता पतिपत्नी का ही माना जा सकता है, जिस में 2 अनजान लोग जिंदगी के सफर में कदम से कदम मिला कर चलते हैं, एकदूसरे के सुखदुख के भागीदार बनते हैं और घरगृहस्थी की जिम्मेदारी निभाते हुए बुढ़ापे में एकदूसरे का पूरा खयाल भी रखते हैं.

लेकिन यह रिश्ता कांच जैसा नाजुक भी बहुत होता है, जिस में एक कंकड़ भी पड़ जाए तो यह कुछ ऐसा दरकता है कि इस में सिवा अंधेरे के कुछ और नहीं दिखता. इस कंकड़ का नाम है शक.

कुछ चुनिंदा मामलों को छोड़ दें तो शक यों ही दिलोदिमाग में घर नहीं करता है. दरअसल, यह एक किस्म की बीमारी है जो अगर समय रहते दूर न हो तो यकीन में बदलने लगती है.

कामयाब और खुशहाल शादीशुदा जिंदगी की एक शर्त पतिपत्नी का एकदूसरे के प्रति ईमानदार रहना भी है और उस से भी ज्यादा अहम है एकदूसरे पर भरोसा होना. दोनों में से कोई भी इसे तोड़ता है तो जिंदगी भार बन जाती है.

हमारे समाज पर पकड़ और दबदबा मर्दों का है, जो घर के मुखिया भी होते हैं. इस नाते उन्हें औरतों के मुकाबले ज्यादा हक मिले हुए हैं, जिन का अगर वे बेजा इस्तेमाल करें तो किसी को कोई खास फर्क नहीं पड़ता, पर औरतों पर आज भी कई बंदिशें हैं. इन में से एक है बहैसियत बीवी का किसी पराए मर्द की तरफ आंख उठा कर भी न देखना, फिर मर्द भले ही इधरउधर मुंह मारता फिरे, उसे दोष नहीं दिया जाता.

इस में भी कोई शक नहीं है कि कुछ बीवियां, वजह कुछ भी हो, अगर ये बंदिशें तोड़ती हैं तो एक जुर्म का जन्म और 2 जिंदगियों का खात्मा होता है. एक शौहर अपनी बीवी की कई जिद और ज्यादतियां बरदाश्त कर लेता है, लेकिन उस की बेवफाई पर मरनेमारने की हद तक तिलमिला उठता है. ऐसा इसलिए है कि वह बीवी को अपनी जायदाद समझता है और यह बात उसे बचपन में ही समझ आ जाती है कि बीवी किसी और से सैक्स करे तो गुनाहगार होती है, जिस की सजा भी उसे ही तय करनी है.

लेकिन अकसर शौहर के शक बेबुनियाद होते हैं, पर इस का मतलब यह नहीं है कि सभी बीवियां सतीसावित्री या पाकसाफ होती हैं, बल्कि यह है कि यह समस्या का हल नहीं है. समस्या और उस के हल को समझने से पहले कुछ ताजा हादसों पर नजर डालना जरूरी है :

-छत्तीसगढ़ के जांजगीरचांपा के रहने वाले 21 साला सिक्योरटी गार्ड संजय कुमार सूर्यवंशी ने अपनी 20 साला बीवी नीलम प्रधान की बेरहमी से गला घोंट कर बीती 8 जनवरी को हत्या कर दी. पकड़े जाने के बाद संजय ने जो वजह बताई वह यह थी कि नीलम अकसर मोबाइल फोन पर बातचीत और चैटिंग में बिजी रहती थी, इसलिए उसे उस के चालचलन पर शक हो चला था. इस हादसे में हैरानी की बात यह है कि इन दोनों ने 2 साल पहले ही लव मैरिज की थी.

-राजस्थान के जोधपुर की भोपालगढ़ तहसील के गांव मिंडोली के बाशिंदे 25 साला श्रवण कुमार भील को अपनी 20 साला बीवी जतनबाई के चालचलन पर महज इसलिए शक हो गया था कि शाम को काम के बाद जब वह घर लौटता था तो बीवी घर पर नहीं मिलती थी.

5 महीने से शक की आग में जल रहे श्रवण ने आखिकार बीती 23 दिसंबर की आधी रात को बिजली के तार से गला दबा कर बीवी की हत्या कर दी. उस समय जतनबाई पेट से थी. इन दोनों की शादी 5 साल पहले हुई थी.

-छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर के बलरामपुर में होटल दीपक में एक पतिपत्नी बीती 8 जनवरी को मरे हुए मिले थे. पति विद्युत विश्वास की लाश कमरे के बाथरूम में फंदे पर झूलती मिली तो पत्नी रिक्ता मिस्त्री पलंग पर मरी पड़ी थी. इन दोनों ने भी तकरीबन डेढ़ साल पहले अदालत में लव मैरिज की थी.

अपने सुसाइड नोट में विद्युत ने साफसाफ लफ्जों में लिखा था कि उसे अपनी बीवी रिक्ता के चालचलन पर शक है, इसलिए वह उस की हत्या कर खुदकुशी कर रहा है.

-मध्य प्रदेश के नागदा के रहने वाले पेशे से ट्रक ड्राइवर राजेश ने बीती 13 जनवरी को अपनी बीवी राधाबाई का खून करने की कोशिश जिस वहशीपन से की उसे सुन हर किसी की रूह कांप उठी. उस की शादी 15 साल पहले हुई थी और 2 बेटे भी हैं.

राजेश और उस के मांबाप समेत मौसी ने राधाबाई को कमरे में बंद कर के पहले उस के साथ जी भर कर मारपीट की और फिर उस की जीभ, नाक, गाल और छातियां काट दीं. इस के बाद उस के मुंह में बेलन ठूंस दिया और राधा को मरा समझ कर चारों भाग गए, लेकिन वह बच गई थी, इसलिए उसे इलाज के लिए इंदौर भेज दिया गया.

जड़ में है धर्म भी

यहां इस बात के कोई खास माने नहीं हैं कि बीवियां भी आजकल इधरउधर मुंह मारते हुए सैक्स सुख और वह प्यार ढूंढ़ने लगी हैं, जो उन्हें शौहर से नहीं मिलता, लेकिन इसे मंजूरी नहीं दी जा सकती, क्योंकि वे गलत होती हैं, लेकिन इस के माने ये नहीं हैं कि चालचलन के शक में या बदचलनी साबित हो जाने या फिर उजागर हो जाने पर उन के साथ वहशियाना बरताव किया जाए.

यह भी ठीक है कि कोई भी शौहर अपनी बीवी की बदचलनी आसानी से बरदाश्त नहीं कर पाता है, लेकिन जब वह खुद गलत राह पर चलता है तो वकील बन कर दलीलें देने लगता है और बीवी के मामले में जज बन कर फैसला करने लगता है.

इस फसाद की एक जड़ धर्म भी है, जिस के खोखले और दोहरे उसूलों ने उसे मर्दानगी के माने बहुत गलत तरीके से सिखा रखे हैं. धार्मिक किताबों में जगहजगह यह कहा गया है कि औरत नीच है, गुलाम है, पैर की जूती है और उस का जिम्मा शौहर को खुश रखना और उस की खिदमत करते रहना है. औरत का अपना कोई वजूद नहीं है और किसी भी तरह की आजादी देने से वह गलत रास्ते पर चल पड़ती है.

यह बात भी किसी सुबूत की मुहताज नहीं है कि समाज पर दबदबा मर्दों का है, इसलिए वे न तो औरत की इज्जत करते हैं और न ही उसे बराबरी का दर्जा देते हैं, क्योंकि इस से उन की हेठी होती है.

जिस धर्मग्रंथ ‘मनुस्मृति’ को हिंदू अपना संविधान मानते हैं उस के अध्याय 9 के श्लोक 2 से ले कर 6 तक में साफसाफ हिदायत दी गई है कि ‘औरत को बचपन में पिता, जवानी में भाई और शादी के बाद पति की सरपरस्ती में रहना चाहिए. किसी भी उम्र में उसे आजाद नहीं रहना चाहिए.’

इसी किताब के अध्याय 9 के 45वें श्लोक में कहा गया है कि ‘पति पत्नी को छोड़ सकता है, गिरवी रख सकता है, बेच सकता है लेकिन औरत को यह हक नहीं है. शादी के बाद पत्नी सिर्फ पत्नी ही रहती है.’

यानी पति ऊपर लिखा कुछ भी करे यह उस का हक है. इस तरह की बातों और हिदायतों ने मर्दों को मनमानी करने की खुली छूट दे रखी है, जिस का कहर आएदिन बीवियों को भुगतना पड़ता है. उन के साथ जानवरों जैसा बरताव किया जाता है. अगर वे किसी से यों ही बात भी कर लें तो शौहर की भवें तन जाती हैं और वह उसे बदचलन मानने लगता है.

बकौल ‘मनुस्मृति’ औरत अकेलेपन का बेजा इस्तेमाल करने वाली होती है ( अध्याय 2 श्लोक 215 ) यानी औरत को अकेले छोड़ने से वह मर्दों को लुभाती है और उन्हें भी गलत रास्ते पर चलने के लिए उकसाती है.

औरतों को बदचलन साबित करने के लिए इसी किताब के अध्याय 9 श्लोक 114 में कहा गया है कि औरत सैक्स के लिए किसी भी उम्र या बदसूरती को नहीं देखती. अध्याय 9 के ही श्लोक 17 में तो हद ही कर दी गई है जिस के मुताबिक औरत सिर्फ गहने, कपड़ों और बिस्तर को ही चाहने वाली होती है. वह वासनायुक्त, बेईमान, जलनखोर और दुराचारी है.

अब जरा ‘मनुस्मृति’ के ही अध्याय 5 के श्लोक 115 पर नजर डालें तो पाएंगे कि ‘पति भले ही चरित्रहीन हो, दूसरी औरतों पर फिदा हो, नामर्द हो, जैसा भी हो औरत को पतिव्रता रहते हुए उसे देवता की तरह पूजना चाहिए.’

हिंदुओं की सब से बड़ी धार्मिक किताब ‘रामायण’ को न पढ़ने वाले आम लोग भी यह मानते हैं कि मर्यादा पुरुषोत्तम कहे जाने वाले भगवान राम ने अपनी पत्नी सीता का त्याग क्यों किया था. इस बात को धर्मगुरु भी बांचते हैं और इस पर कई फिल्में और टैलीविजन सीरियल भी बन चुके हैं. कहानी बहुत सीधी और दिलचस्प है कि रावण को मारने के बाद जब राम अयोध्या आए तो जनता ने घी के दिए जलाते हुए उन का जोरदार स्वागत किया था. अभी कुछ दिन ही बीते थे कि राम के जासूसों ने उन्हें बताया कि प्रजा सीता की पवित्रता पर शक करती है. यह शक इसलिए था कि सीता लंबे समय तक लंका में रावण की सरपरस्ती में रही थीं.

बस इतना सुनना था कि अपनी मर्यादा और राजधर्म को निभाने वाले राम ने सीता की अग्नि परीक्षा ले डाली. इस में कामयाब होने के बाद भी जनता में सीता को ले कर तरहतरह की बातें होती रहीं तो राम ने उन्हें जंगल भेज दिया. वह भी यह जानतेबूझते कि वे पेट से हैं और इस दौरान पत्नी को सब से ज्यादा जरूरत पति के साथ और प्यार की होती है.

लेकिन अपना राजधर्म निभाते हुए राम ने जो सख्ती दिखाई आज भी उस की मिसाल धर्म के ठेकेदार यह दलील देते हुए कहते देते हैं कि राजा हो तो राम जैसा जिस ने पत्नी से ज्यादा मर्यादा और प्रजा को तवज्जुह दी.

इस में कोई शक नहीं कि शक शौहर की फितरत होती है, लेकिन इस के नतीजे किसी के हक में अच्छे नहीं नकलते, इसलिए शौहरों को चाहिए कि शक होने पर वे सब्र से काम लें और बीवी की बदचलनी साबित भी हो जाए तो खुद के हाथ उस के खून से न रंगे, क्योंकि इस में नुकसान उन का भी है.

क्या करें शौहर

शक के बारे में यह कहावत मशहूर है कि इस का इलाज तो लुकमान हकीम के पास भी नहीं था, इसलिए शौहरों को बीवी पर बेवजह शक करने से बचना चाहिए. बीवी अगर खुले मिजाज वाली हो और दूसरों से हंसबोल कर बात करने वाली हो तो कुढ़ने और खुद का खून जलाने के बजाय उसे बताना चाहिए कि आप को यह सब पसंद नहीं है, लेकिन इस बाबत धौंसधपट या मारापीटी से काम नहीं लेना चाहिए.

बीबी का गैरमर्दों से हंसनाबोलना बदचलनी के दायरे में नहीं आता, इसलिए उस के स्वभाव से थोड़ा समझौता शौहर को भी करना चाहिए. अगर इस मुद्दे पर कलह होती है तो अकसर बीवियां जानबूझ कर शौहर को चिढ़ाने के मकसद से और भी ऐसा ही करती हैं, जिस से बनने के बजाय बात और बिगड़ती जाती है.

शौहर को अब चालचलन से कम अपने मर्द होने की हेठी पर गुस्सा आने लगता है, जिस के चलते वह उस की हत्या करने जैसे जुर्म को अंजाम देने भी उतारू हो आता है, जिस से उसे हासिल कुछ नहीं होता और बाकी जिंदगी जेल की सलाखों के पीछे काटनी पड़ती है. अगर बच्चे हों तो उन का भी भविष्य खराब होता है.

बीवी की बदचलनी साबित हो न हो यह अलग बात है, लेकिन हर शौहर की कोशिश यह होनी चाहिए कि वह बीवी को हर लिहाज से संतुष्ट रखे और उसे इज्जत और बराबरी का दर्जा दे. हां, बदचलनी जब साबित हो ही जाए तब बजाय उसे खुद सजा देने के तलाक के लिए अदालत में जाना चाहिए. हालांकि इस में थोड़ी दिक्कतें जरूर पेश आती हैं, लेकिन यकीन मानें कि वे उतनी नहीं होतीं जितनी हत्या के बाद पकड़े जाने पर होती हैं.

बीवी से हर समय प्यार जताते रहना भी एक अच्छा उपाय है जिस से वह हंसनेबोलने के लिए किसी और का रुख न करे. जिन शौहरों को लंबे समय या दिनों तक बाहर रहना पड़ता है, उन्हें चाहिए कि मोबाइल फोन के जरीए पत्नी से घरगृहस्थी के साथसाथ रोमांटिक बातें करते हुए प्यार जताते रहें. यह कतई न सोचें कि उन की गैरमौजूदगी में वह किसी और के साथ गुलछर्रे उड़ा रही होगी. यही शक होता है जिस की कोई जमीन नहीं होती.

याद रखें कि पतिपत्नी का रिश्ता आपसी भरोसे पर टिका होता है. अगर किसी भी वजह से यह दरकता है तो टूटता घर है. किसी दूसरे के चुगली करने पर भी बीवी पर शक करना उस के साथ ज्यादती है.

बीवियां भी समझें

अगर शौहर को आप का गैरमर्दों से हंसनाबोलना पसंद नहीं है तो उस के जज्बातों को समझते हुए धीरेधीरे यह आदत छोड़ें और याद रखें कि इस से आप का कोई नुकसान नहीं होने वाला है, लेकिन अगर पति का शक बढ़ता जाएगा तो जरूर कई दिक्कतें खड़ी होने लगती हैं.

अगर पति की आमदनी कम हो तो उसे ताने मारना उस के भीतर शक पैदा करने वाली बात भी हो सकती है.

पति अगर सैक्स में मनमुताबिक संतुष्ट न कर पाता हो तो इस की वजह बीवी को पहले खोजनी चाहिए. आजकल कमानाखाना मुश्किल होता जा रहा है. इस तनाव का असर मर्दों की सैक्स जिंदगी पर भी पड़ता है. कई बार वे टैंपरेरी नामर्दी के भी शिकार हो जाते हैं. ऐसे में बीवी को कहीं और सुख ढूंढ़ने की नादानी करने के बजाय शौहर से खुल कर बात कर डाक्टर से मशवरा लेना चाहिए. ज्यादातरर मरीज इलाज से ठीक हो जाते हैं.

इस पर भी बात न बने तो बजाय चोरीछिपे किसी और से जिस्मानी रिश्ता बनाने के पहले पति से खुल कर बात कर तलाक ले लेना ज्यादा ठीक रहता है, क्योंकि किसी की बीवी रहते नाजायज संबंध बनाना आ बैल मुझे मार जैसी बात साबित होती है और शौहर मरनेमारने पर उतारू हो आता है.

नाजायज संबंध आमतौर पर ज्यादा दिनों तक छिप नहीं पाते हैं और बिरले ही शौहर होते हैं जो आंखों देखी मक्खी निगल पाते हैं.

लुभाने वाले मर्दों से ज्यादा नजदीकियां भी पति के शक की वजह बनती हैं, इसलिए खुद को काबू में रखना चाहिए, खासतौर से उस सूरत में जब शौहर को यह पसंद न हो. आजकल ज्यादातर बीवियां मोबाइल फोन में बिजी रहती हैं, जिस पर शौहर की खीज कुदरती बात है और शक होना भी कि बीवी न जाने किस से गुटरगूं कर रही है, इसलिए मोबाइल फोन के ज्यादा इस्तेमाल से भी बचना चाहिए.

डेली व्लौग देखने का नशा, है बड़ा खतरनाक

सौरभ जोशी भारत के टौप डेली व्लौगरों में से एक है लेकिन उस के बनाए कंटैंट में ढूंढ़ने से भी कुछ काम का मिलना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है. हजारों की संख्या में यूथ उसे देखते हैं, ये यूथ न सिर्फ अपना समय बरबाद कर रहे हैं बल्कि अपने कैरियर के साथ खिलवाड़ भी कर रहे हैं.

हल्द्वानी कहां है, यह किसी को पता हो या न हो पर यूथ को जरूर यह पता है कि सौरभ जोशी हल्द्वानी में रहता है. सौरभ जोशी खुद को इन्फ्लुएंसर कहता है पर उस की वीडियो में ऐसा कुछ नहीं होता जो किसी को इन्फ्लुएंस कर पाए. न तो सीखने के लिए कुछ है, न ही जानकारी लायक कुछ.

सौरभ जोशी कोई बौलीवुड स्टार, स्पोर्ट्स पर्सन या पौलिटीशियन नहीं है. वह है एक यूट्यूबर जो अपने घर की दीवारों, कंबल-रजाइयों, कपप्लेट, घर में क्या बन रहा है, क्या खा रहा है, कहां जा रहा है, उस की कार कौन सी है, कपड़े में सब्जी गिर गई, घर के सदस्य क्या कर रहे हैं जैसी फालतू बातें बताता है. बेसिकली वह अपनी दिनचर्या बताता है पर समझ से परे यह है कि इसे देखने वाले कैसे खलिहर हैं जो अपना कामधंधा छोड़ लगे रहते हैं इस की व्यूरशिप बढ़ाने में.

खुद को स्टार मानने वाला सौरभ कुछ सिखाता नहीं है बल्कि अपना डेली रूटीन दुनिया वालों को दिखाता है. वह क्या खाता है, क्या पीता है, कहां जाता है, बस यही सब कहता है उस का व्लौग.

सौरभ जोशी के व्लौग की बात करें तो उस ने 12 नवंबर, 2023 को एक व्लौग बनाया, जिस का टाइटल था ‘दीवाली गिफ्ट’.  नाम से ही पता चल रहा था कि ये पूरा व्लौग सिर्फ और सिर्फ इस विषय पर बना है कि दीवाली पर सब को क्याक्या गिफ्ट मिला. अब वह अपने रिश्तेदारों को क्या गिफ्ट दे रहा है, यह चिंता उसे करने दो, लेकिन नहीं, युवा अपने रिश्तेदारों की चिंता छोड़ लगे पड़े हैं वीडियो देखने.

व्लौग की शुरुआत में सौरभ मिठाई के डब्बे दिखाते हुए कहता है, ‘‘आज मुझे यह सब लोगों के घर देने जाना है. अभी सुबह के 9 बज रहे हैं और हम अपनी कार ले कर जा रहे हैं क्योंकि सुपरकार हर जगह नहीं जा पाएगी और रास्ते में गड्ढे भी हैं.’’ इस तरह के इन्फ्लुएंसर अपनी लग्जरी लाइफ का बखान करते नहीं थकते. वे युवाओं को अपनी महंगी कारों को दिखा कर रिझाने की कोशिश करते हैं.

इस के बाद व्लौग में उसे लोगों के घर जा कर उन्हें दीवाली की वेलविशेस और गिफ्ट देते हुए दिखाया जाता है. इस के बाद महल्ले के बच्चों को व्लौग में दिखाया जाता है. वह एक बौबी भइया नाम के एक शख्स को आईफोन गिफ्ट देता है. साथ में, स्टाफ मैंबर को दीवाली गिफ्ट देता है. उस की भी वीडियो क्लिप सौरभ अपने व्लौग में एड कर लेता है. इस के बाद घर वालों को गिफ्ट दिया जाता है. बस, यही कहता है सौरभ जोशी का व्लौग. अब इस वीडियो को कोई महाबेवकूफ ही हो जो देखे और लाइक करे. और यदि कोई फिर भी दिलचस्पी रख रहा है तो समझ जा सकता है कि कैसे अथाह बेरोजगारी में उस की मानसिक स्थिति हिली हुई है.

इसी तरह का उस का एक और व्लौग है, जिस का न सिर्फ टाइटल घटिया है बल्कि कंटैंट भी रद्दी है या कहें कंटैंट कहां है, पता नहीं. व्लौग के थंबनेल पर लिखा है, ‘यह क्या हो गया फौरचूनर को.’

इस व्लौग में वह फौरचूनर पर चढ़ी ब्लैक पीपीएफ को उतार कर उस के ओरिजिनल कलर में लाता है. पीपीएफ को पीयूष, जो कि सौरभ का छोटा भाई है और उस का चाचा का लड़का उतार रहा होता है और सौरभ व्लौग बना रहा होता है. फिर उस का चाचा भी आ जाता है. सौरभ अपने सब्सक्राइबर्स से पूछता है कि कौनकौन चाहता है कि चाचा सुपरकार चलाएं. कमैंट करो. फिर चाची और मम्मी व्लौग में आ जाती हैं. इस के बाद मम्मी से राय ली जाती है कि पीपीएफ को कितना उतारा जाए और कितना नहीं. इस के बाद कार के बारे में बताया जाता है.

अब यह कंटैंट ऐसा है कि सामान्य दिमाग वाला इंसान अपना सिर पीट ले. वीडियो के कंटैंट को समझाने के लिए या तो आप को आइंस्टीन होना पड़ेगा या बैलबुद्धि. आगे इस वीडियो में घर का सीन दिखाया जाता है, जिस में सब चाय ले कर बैठे हैं. लेकिन सौरभ के चाचा का बेटा दूध पी रहा है. सौरभ उस से पूछता है कि हम सभी शादी क्यों करते हैं? डैली व्लौगर ‘द ग्रेट सौरभ’ की बुद्धि का स्तर उस के इस सवाल से आंका जा सकता है. बच्चा जवाब देता है कि हमें किसी के साथ की जरूरत होती है, इसलिए हम शादी करते हैं. बच्चा आगे कहता है कि, ‘मैं ने यह सब यूट्यूब से सीखा है. मैं व्लौगर बनूंगा और सब का नाम रोशन करूंगा.’

इस के बाद सौरभ अपने पैट ओरियो को दिखाता है. फिर अपने डिनर की फोटो. इन सब के बाद वह कहता है, ‘मुझे बुखार है. अभी दवाई लूंगा. 2 दिनों बाद बाहर भी जाना है.’ यही था सौरभ का व्लौग. इस वीडियो पर 3 घंटे में 1,34,81,188 व्यूज थे.

आखिर, यह किस तरह का कंटैंट है जो सौरभ जोशी बना रहा है. अब इसे देख रहे युवाओं को इस पर विचार करना चाहिए कि यह कंटैंट है भी कि नहीं. क्या इस पर समय खर्च करना सही है.

सवाल यह भी कि क्या यूथ इतना फ्री बैठा है कि सौरभ या सौरभ जैसे दूसरे यूट्यूबरों के घर में उन की पर्सनल लाइफ में क्याक्या चल रहा है, लगे रहें घंटों देखने. यह भी कि सौरभ ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर में क्या खा रहा है, टौयलेट कितने बजे जा रहा है, कौन सा टूथपेस्ट यूज कर रहा है, उस की गर्लफ्रैंड कौन है आदिआदि.

इस के आधे का आधा टाइम भी अगर युवा संसद में नेताओं की डिबेट में लगा लें तो देश के आधे मसले और झूठ बोल कर मलाई खा रहे नेताओं का सफाया यों ही हो जाए. उन्हें समझ आ जाएगा कि पकौड़े तलना रोजगार नहीं, बल्कि आजीविका है.

अगर यूथ इस तरह का फालतू कंटैंट देखेंगे वह भी पैसे दे कर तो अपना कैरियर क्या खाक बनाएंगे और जिन का थोड़ा बहुत कैरियर है वे भी अपने कैरियर की धज्जियां ही उड़ाएंगे.

सौमेंद्र जेना, जिन्हें यूट्यूब पर ‘सोमजैना’ के नाम से जाना जाता है, ने अपने हालिया वीडियो में से एक पर एक टिप्पणी के जवाब में अधिकांश भारतीय यूट्यूबर्स की सामग्री को ‘क्रिंज’ कहा है. उन्होंने कहा, ‘99 प्रतिशत भारतीय यूट्यूबर्स का कंटैंट घटिया है. लोगों की रुचि अच्छी नहीं है.’ सोम ने इस कमैंट का स्क्रीनशौट अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर भी शेयर किया. आगे उन्होंने कहा कि यह भारतीय यूट्यूब दृश्यों का दुखद सच है.

यह सच भी है. जैसे सौरभ अपने एक व्लौग में अपने नए घर का डिजाइन दिखाता है. इस व्लौग थंबनेल में उस ने ‘फाइनली न्यू घर का डिजाइन आया’ के नाम से बनाया. इस व्लौग में सौरभ हल्द्वानी में बनने वाले अपने नए घर का 3डी डिजाइन दिखाता है. वीडियो में दिख रहा है कि घर चारमंजिला है. इस में गेमिंगरूम है, जिस में स्लाइड कर के नीचे हौल तक जाया जा सकता है.

घर में डिजिटल लौक है. पूरे घर में लकड़ियों की सीढ़ियां हैं. घर में एक लिफ्ट भी है. इतना ही नहीं, घर में फायर बेस भी है. मतलब पूरा लग्जरी घर.

ग्राउंडफ्लोर की बात करें तों ग्राउंडफ्लोर में बैठने, पार्किंग और बच्चों के खेलने की जगह है. पहले फ्लोर पर दादादादी का रूम है. उस के बाद सब के रूम. सौरभ के रूम से पूरे घर का व्यू दिखेगा. उन के रुम में एक स्टडी टेबल भी है. यहां से वह अपने पूरे घर का व्लौग भी बना सकता है.

अब यह देखनेदिखाने में मन को सुकून दे सकता है पर इस का एक साइड इफैक्ट यह है कि सौरभ ने अपने पूरे घर की जानकारी पब्लिकली कर दी. सवाल है कि इस से क्या समाज के आपराधिक और असामाजिक तत्त्व के कान खड़े नहीं होंगे? सारी जानकारी तो उन्हें सोशल मीडिया से मिल ही गई है, अब बस उन्हें ऐक्शन लेना है.

ऐसी ही एक घटना उस के साथ पहले हो भी चुकी है, जिस में सौरभ ने व्लौग बनाया कि वह आज सपरिवार पहाड़ पर जाएगा. बस, इसी का फायदा उठा कर चोरों ने उस के घर सेंधमारी की और करीब डेढ़ लाख रुपए के गहनों की चोरी कर ली. यह घटना 22 अक्तूबर, 2022 की है.

आप का अपना डेली रूटीन पब्लिकली करना आप के लिए किस तरह आफत बन सकता है, यह आप सौरभ जोशी के साथ हुई घटना से समझ सकते हैं. अगर उस के घर में उस वक्त कोई होता तो यह घटना मर्डर में भी तबदील हो सकती थी.

हम अगर सौरभ जोशी के व्लौग को खंगाले तो हमें उस के व्लौग में ऐसेऐसे थंबनेल मिलेंगे जिन से लगेगा कि यह कोई व्लौग न हो कर किसी व्यक्ति की दिनचर्या हो.

जैसे कुछ थंबनेल हैं, ‘तबीयत खराब है, बट, मैगी खानी है’, ‘स्कूल से लेने गया पीयूष’, ‘कुणाली को सुपरकार में’, ‘कुणाली का टौय कलैक्शन’, ‘पीयूष वर्सेस कुणाली कार रेस’, ‘न्यू घर की पार्किंग’, ‘अम्मा को सुपरकार में बैठाया’, ‘हमारी दीवाली की लाइटिंग’, ‘फौरचूनर ठुक गई नई दिल्ली में’, ‘बहुत टाइम बाद गेम खेली’, ‘सुपरकार को पहाड़ पर ले गए’ वगैरहवगैरह. इन वीडियोज में कुछ भी इंटरैस्टिंग नहीं है जिस के चलते व्लौग देखा जाए. लेकिन अंधा यूथ दबा के सौरभ जोशी के व्लौग देख रहा है.

यूट्यूब अब एक ऐसा अड्डा बन गया है जहां लोग अपनी डेली लाइफ को कैमरे पर दिखाने लगे हैं, चाहे वह घर का काम करती हुई महिला हो, ट्यूशन जाता हुआ बच्चा हो, शौपिंग करती हुई लड़कियां हो, गायभैंस की खानापानी करती महिला हो या फिर घर में खाना बनाता हुआ यंग बौय. सभी को व्लौगर बनने का चस्का लगा हुआ है.

कोई भी व्यक्ति कैमरा उठाता है और बोलना चालू कर देता है- ‘‘हैलो गाईज, मैं आज अपनी बूआ के घर जा रही हूं, आप भी देखिए कि मुझे आज रास्ते में क्याक्या देखने को मिलेगा?’’ लोग भी उन के सफर में शामिल हो जाते हैं और अपना कीमती समय बेकार की चीजों में जाया कर देते हैं.

डेली व्लौग बनाने वाले लोग अपनी प्राइवेसी के साथ खेल रहे हैं. वे अपने पलपल की खबर दे रहे हैं. कहां रहते हैं, कहां जा रहे हैं, कब आएंगे, घर में कितने दरवाजे हैं, घर में कौनकौन है, कौन कब आता है, जाता है, औफिस कहां है, कौन बीमार है, कौन नहीं आदिआदि. वे अपनी पर्सनल लाइफ, फिर चाहे उन की मां, बहन और पत्नी हो, को सब के सामने ला रहे हैं और जब ट्रोल होने लगते हैं, गालियां खाने लगते हैं तो रोने भी लग जाते हैं.

कई बार व्लौगर कंप्लेन करते हैं कि व्यूअर्स उन की पर्सनल लाइफ के बारे में बुराभला कह रहे हैं. उन की फैमिली को रोस्ट कर रहे हैं. पर्सनल लाइफ को पब्लिक भी इन्हीं क्रिएटर्स ने किया है तो प्रतिक्रियास्वरूप कुछ भी आ सकता है. सो, क्रिएटर्स को इस के लिए तैयार रहना चाहिए.

सौरभ जोशी के यूट्यूब पर 23.5 मिलियन सब्सक्राइबर्स हैं, यानी 2 करोड़ 35 लाख के आसपास. उस ने अपने चैनल पर डेढ़ हजार के करीब व्लौग बनाए हैं. उसे इंडिया का नंबर वन डेली व्लौगर कहा जाता है पर सिर्फ नंबर के आधार पर यह पदवी दे देना सवाल छोड़ता है.

बात करें अगर सौरभ की उम्र की तो सौरभ महज 23 साल का है और उस ने सिर्फ 12वीं तक ही पढ़ाई की है. सौरभ एक ड्राइंग आर्टिस्ट भी है.

लिवइन का साइड इफैक्ट, कैसे फंस गए ओए इंदौरी

इंदौर के एमआईजी थाने में 19 दिसंबर, 2023 को एक रेप केस दर्ज कराया गया. यह केस धारा 376 के तहत दर्ज किया गया और आरोपी बनाया गया हाल के समय में फेमस यूट्यूबर ओए इंदौरी को, जो अपने इंदौरी ऐक्सैंट के लिए फेमस है.

वैसे ओए इंदौरी का असली नाम रोबिन अग्रवाल जिंदल है जो कि इंदौर का रहने वाला है, इसलिए इस ने अपने यूट्यूब चैनल का नाम भी ‘ओए इंदौरी – अब हंसेगा इंडिया’ रखा है. उस पर अब तक 2,784,323,079 व्यूज हैं. इस ने अपना यूट्यूब चैनल 2017 में शुरू किया था लेकिन कोविड में जब सब अपनेअपने घरों में बंद थे तो लोगों ने खाली बैठेबैठे यूट्यूब का खूब इस्तेमाल किया. उसी समय ओए इंदौरी फेमस हो गया.

ओए इंदौरी के वीडियोज में कौमेडी और प्रैंक देखने को मिलता है. उस का एक इंस्टाग्राम अकाउंट भी है, जिस की आईडी है श4द्गट्ठद्बठ्ठस्रशह्म्द्ब. जिस पर उस के 7.4 मिलियन फौलोअर्स हैं. इस अकाउंट पर उस ने अब तक 1,413 पोस्ट की हैं. उस के इंस्टाग्राम बायो में लिखा है- ‘आई विल मेक यू लाफ.’ हालांकि जिस तरह के कंटैंट वह बनाता था उस पर हंसना तो दूर, उसे झेलना भी एक टास्क जैसा है.

ओए इंदौरी उर्फ रोबिन सोशल मीडिया पर सामान्य स्तर के व्यूअर्स के बीच फेमस चेहरा है. साल 2019 में कलर्स टीवी के एक शो में ओए इंदौरी ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी. बिना टैलेंट के बस फौलोअर्स के दम पर लोगों को भी मुकाम मिलता है, यह इस का सटीक उदाहरण ओए इंदौरी से समझ जा सकता है. उस शो को कौमेडियन भारती सिंह और उस के पति हर्ष लिम्बाचिया ने होस्ट किया था.

असल में विवाद तब खड़ा हुआ जब एक पीड़िता ने ओए इंदौरी उर्फ रोबिन अग्रवाल जिंदल पर रेप का केस दर्ज कराया. शिकायतकर्ता युवती खुद को तलाकशुदा बता रही है. उस का कहना है कि ओए इंदौरी ने उसे शादी का झांसा दे कर उस से शारीरिक संबंध बनाए हैं और बाद में किसी और लड़की से सगाई कर ली.

युवती ने कहा कि वह जब इंदौर आई थी तो उसे घर ढूंढ़ने में परेशानी हो रही थी. उस वक्त ओए इंदौरी ने उस की हैल्प की थी. बस, तभी से वे दोनों अच्छे दोस्त बन गए थे. उस के बाद ओए इंदौरी ने उस से अपने दिल की बात कही. वे दोनों लिवइन रिलेशनशिप में आ गए. उस दौरान उन के बीच फिजिकल रिलेशन बने. तब ओए इंदौरी ने उस से कहा था कि वह उस से ही शादी करेगा.

लेकिन 23 नंवबर को ओए इंदौरी की इंस्टाग्राम पोस्ट से पता चला कि उस की इंगेजमैंट किसी और से हो चुकी है. इस के बाद युवती ने पुलिस स्टेशन में केस दर्ज कराया. इस से पहले भी युवती ने मार्च के महीने में भी रिपोर्ट दर्ज कराई थी. लेकिन आपसी समझाता होने के बाद युवती ने केस वापस ले लिया. अब चूंकि ओए इंदौरी ने अपना वादा नहीं निभाया तो युवती फिर से पुलिस स्टेशन पहुंच गई. ओए इंदौरी के खिलाफ केस दर्ज कराने वाली युवती एक प्राइवेट कंपनी में जौब करती है.

गौरतलब है कि रोबिन ने कुछ समय पहले ही इंदौर के एक बड़े होटल में सगाई की है. उस की मंगेतर भी फेमस सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर है. उस का नाम अलिशा राजपूत है. उस के इंस्टाग्राम पर 7.31 मिलियन फौलोअर्स हैं. इस रिंग सैरेमनी में सोशल मीडिया की कई हस्तियां शामिल हुई थीं.

ओए इंदौरी पर लगे रेप आरोप के बारे में एमआईजी थाने के एसआई सचिन आर्य ने बताया कि रोबिन जिंदल पुत्र मिथिलेश अग्रवाल निवासी महालक्ष्मी नगर के खिलाफ शादी का झांसा दे कर रेप करने का मामला दर्ज किया गया है. केस दर्ज होने के बाद ओए इंदौरी फरार है. फिलहाल हम उस तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. केस दर्ज होने के बाद ओए इंदौरी ने अग्रिम जमानत की याचिका दायर की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया है.

इस केस के बाद ओए इंदौरी बुरी तरह फंस गया है. साथ ही, उस का फेम भी खतरे में आ गया है. वैसे भी, किसी इन्फ्लुएंसर की लाइफ मुश्किल ही 6 महीने से ऊपर टिकती है. ओए इंदौरी जैसे किसी नामचीन इन्फ्लुएंसर के साथ यह होना अपवाद नहीं है. सोशल मीडिया की चमक, लोगों के बीच फेमस होना और खुद को बड़ा आदमी समझाने की भूल ऐसे लफड़ों में फंसा ही डालती है. लिवइन गलत नहीं पर संबंध किस से कैसे निभते हैं, यह समझ होना जरूरी है.

आजकल यंगस्टर्स बड़ी संख्या में लिव इनरिलेशनशिप को अपना रहे हैं. लिवइन रिलेशनशिप में रहते हुए आप ऐसे ही किसी केस में न फंसें, इस के लिए जरूरी है कि यंगस्टर्स को लिवइन रिलेशनशिप के बारे में सही जानकारी हो.

लिवइन के कंसीक्वेंसेस

लिवइन रिलेशनशिप का मतलब ‘शादी जैसा रिश्ता’ होता है. जब एक अनमैरिड लड़का और लड़की मैरिड कपल की तरह एक ही छत के नीचे रहते हैं तो उसे लिवइन रिलेशनशिप माना जाता है. लेकिन भारत के कानून में लिवइन रिलेशनशिप को ढंग से परिभाषित नहीं किया गया है. यहां लिवइन रिलेशनशिप को 2 अनमैरिड लोगों के बीच ‘नेचर औफ मैरिज’ के तौर पर रखा जाता है.

लिवइन रिलेशनशिप में रह रही महिला भी घरेलू हिंसा कानून का इस्तेमाल कर सकती है. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, ‘‘अगर कोई महिला किसी आदमी के साथ लिवइन में रहती है और महिला यह नहीं जानती कि आदमी पहले से मैरिड है तो इस सिचुएशन में दोनों पार्टनर्स के साथ रहने को ‘डोमैस्टिक रिलेशनशिप’ माना जाएगा.’’ ऐसी हालत में महिला को घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के तहत गुजारा भत्ता लेने का अधिकार दिया गया है.

2011 में एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि लिवइन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला को सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरणपोषण पाने का अधिकार है और महिला को यह कह कर मना नहीं किया जा सकता कि उस ने कोई वैध शादी नहीं की थी.

अगर कोई लड़का और लड़की लिवइन में रहना चाहते हैं तो दोनों का अनमैरिड होना जरूरी है. अगर किसी पार्टनर की पहले शादी हुई है तो उस के डायवोर्स के पेपर जारी होने के बाद ही वह कानूनी रूप से लिवइन में रह सकता है वरना यह व्यभिचार में आएगा.

भारत में लिवइन रिलेशनशिप का कल्चर भी बढ़ रहा है. 2018 में एक सर्वे हुआ था. इस सर्वे में शामिल 80 फीसदी लोगों ने लिवइन रिलेशनशिप को सपोर्ट किया था. इन में से 26 फीसदी ने कहा था कि अगर मौका मिला तो वे भी लिवइन रिलेशन में रहेंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने लता वर्सेस यूपी राज्य, एआईआर 2006 एससी 2522 में यह माना कि एक एडल्ट महिला अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति से शादी करने या अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति के साथ रहने के लिए आजाद थी. जैसेजैसे लोग लिवइन रिलेशनशिप को प्रायोरिटी देने लगे, रेप के झूठे केसेस बढ़ते चले गए. कई केसेस में ब्रेकअप के बाद महिला पार्टनर रेप की झठी एफआईआर फाइल कराती है.

बात करें अगर कानून की, तो भारतीय दंड संहिता 1860 के सैक्शन 375 के तहत रेप को डिफाइन किया गया है. इस में कहा गया है कि इन सिचुएशंस में माना जाएगा कि एक पुरुष ने एक महिला का ‘रेप’ किया है-

  1. अगर किसी महिला से शादी का झांसा दे कर संबंध बनाए गए हों.
  2. जब महिला के साथ उस की सहमति के बिना सैक्सुअल रिलेशन बनाया जाए.
  3. जब महिला फिजिकल रिलेशन बनाने के लिए इस डर के साथ सहमति दे कि ऐसा न करने पर उसे या उस के किसी प्रिय व्यक्ति को चोट या जान का खतरा है.
  4. जब ऐसा करने की सहमति देते समय महिला मन से अस्वस्थ हो या किसी भी तरह मानसिक रूप से बीमार हो.
  5. जब महिला नशे की वजह से या किसी अन्य मूर्खतापूर्ण या हानिकारक चीज की वजह से सैक्सुअल रिलेशन बनाने की प्रकृति और रिजल्ट्स को समझने में अक्षम है और सहमति देती है.
  6. जब महिला 16 साल की उम्र से कम है फिर चाहे सैक्स मरजी से हो या बिना मरजी के.

ओए इंदौरी के केस में देखा जाए तो शादी का झांसा दे कर फिजिकल रिलेशन बनाने के चार्जेज लग सकते हैं. अब देखना यह होगा कि इस मामले के आखिर में क्या होता है. सारे परिणाम इस सुझाव की तरफ इशारा करते हैं कि अगर आप लिवइन रिलेशनशिप में हैं या आने की सोच रहे हैं तो आप को इस के सारे कानून और अधिकार पता हों ताकि बाद में आप किसी पचड़े में न पड़ें.

निठारी हो या कॉलेज स्ट्रीट, जिस्मानी भूख की बलि चढ़ते मासूम

Society News in Hindi: देशभर में लड़कियों और छोटी बच्चियों के साथ घट रही सैक्स अपराध की तमाम घटनाओं से साबित हो चुका है कि हमारी बेटियां कहीं भी महफूज नहीं हैं. पड़ोस से ले कर घरपरिवार, रिश्तेदारों के बीच कब और कहां वे रेप की शिकार हो जाएं, कुछ कहा नहीं जा सकता.

अपनी दिमागी बीमारी और जिस्मानी भूख को अंजाम देने वाले सफेदपोश से ले कर सड़कछाप दरिंदे राजपथ से ले कर गलीमहल्लों तक में घूम रहे हैं.

दरअसल, ऐसी घटिया सोच वाले लोग डेढ़ साल से ले कर किशोर उम्र के बच्चों का इस्तेमाल अपने विकार को अंजाम देने के लिए करते हैं.

कुछ साल पहले निठारी कांड ने हमें चौंका दिया था. हालांकि मधुर भंडारकर की फिल्म ‘पेज-3’ के जरीए हम सफेदपोशों की सैक्स भूख को जान चुके हैं, लेकिन सैक्स से जुड़ी लोगों की घटिया सोच किस हद तक दरिंदगी का रूप ले सकती है, इस का पता हमें राजधानी नई दिल्ली समेत देश के अलगअलग हिस्सों में कुछ समय पहले घटी घटनाओं से चला है.

मध्य कोलकाता की कालेज स्ट्रीट में चौथी क्लास का एक बच्चा ट्यूशन पढ़ने के लिए ट्यूटर के घर जाने में हर रोज आनाकानी करता था. उस बच्चे ने कई बार बताने की कोशिश की कि वह ट्यूटर उसे अच्छा नहीं लगता, पर मां डांटडपट कर उसे ट्यूशन पढ़ने के लिए छोड़ आया करती थी.

एक दिन अचानक बच्चा जख्मी हालत में रोतेरोते घर पहुंचा, पर वह कुछ भी बताने से इनकार करता रहा. बाद में उस ने बताया कि शुरू से ही ट्यूटर उस की मासूमियत का फायदा उठा कर लाड़दुलार के बहाने इधरउधर हाथ लगाया करता था, पर आखिर में मामला जहां आ कर पहुंचा था, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था.

कुछ समय पहले पिंकी विरानी की एक किताब आई थी, ‘बिटर चौकलेट: चाइल्ड सैक्सुअल एब्यूज इन इंडिया’. इस में छपे सर्वे में बताया गया है कि

90 फीसदी मामलों में बच्चे घर पर अपने नौकरचाकर से ले कर ट्यूटर, बालिग, पारिवारिक सदस्यों से ले कर सगेसंबंधियों, यहां तक कि बाप की भी हैवानियत के शिकार होते हैं.

साल 2006 में निठारी कांड ने भी खास से ले कर आम लोगों के होश उड़ा दिए थे. मोनिंदर सिंह पंढेर और सुरेंद्र कोली पर बच्चों को अगवा कर उन का बलात्कार करने के बाद हत्या ही नहीं, बल्कि बच्चों का मांस पका कर खाने जैसी दरिंदगी के मामले ने सब को हिला दिया था.

नोएडा के पौश इलाके से सटे निठारी गांव से एक के बाद एक गरीब तबके के बच्चे गायब होते रहे.

जांच में 19 बच्चों का मामला सामने आया, जिन में से 14 साल की रिंपी हालदार के मामले में मोनिंदर सिंह पंढेर और सुरेंद्र कोली को विशेष सीबीआई अदालत ने फांसी की सजा सुनाई.

निठारी से सबक नहीं लिया

निठारी कांड से हम ने सबक नहीं लिया. अब तो आएदिन हमारी बेटियां न केवल रेप की शिकार हो रही हैं, बल्कि दरिंदगी की शिकार हो कर उन की जान पर भी बन आती है.

इस साल मार्च में मंगोलपुरी, दिल्ली में 7 साल की और फिर अप्रैल में संगम विहार में 8 साल की, गांधीनगर में 5 साल की, नजफगढ़ में 3 साल की, गोविंदपुरा में 5 साल की और एक चार्टर्ड बस में 10 साल की मासूम के साथ ऐसी घटनाएं सामने आईं. इन में मजदूर, पड़ोसी, बस ड्राइवर से ले कर स्कूली टीचर तक के नाम सामने आए.

वहीं मध्य प्रदेश में सिवनी, इंदौर, भोपाल और मारूगढ़ व उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ में हाल में बच्चियों के साथ हुए रेप ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया.

मनोवैज्ञानिक नजरिया

कोलकाता में इंस्टीट्यूट औफ विहेवियरल साइंस की श्रीलेखा विश्वास का कहना है कि हाल में बच्चों के साथ भारत में हुई दरिंदगी ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है, लेकिन नाबालिगों के साथ सैक्स हिंसा केवल भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी हो रही है. चिंता की बात यह है कि अभी भी इस बारे में भारत में जागरूकता की कमी है.

दरअसल, इस तरह के मामले दिमागी बीमारी के होते हैं और विहेवियरल साइंस में इसे ‘पेडोफिलिया’ कहते हैं. इस सोच वाले लोग छोटी सी उम्र के नन्हेमुन्ने बच्चों की नंगी तसवीर में भी अपने लिए ‘सुख’ ढूंढ़ लेते हैं.

श्रीलेखा आगे कहती हैं कि ज्यादातर मामलों में पाया गया है कि बच्चे पड़ोसियों और ट्यूटर जैसे परिचितों व पारिवारिक या दोस्तों द्वारा सैक्स की हिंसा के शिकार होते हैं.

इन का यह भी कहना है कि बच्चों को इस बात की खबर ही नहीं होती है कि सामने वाला शख्स किस नजर से इन्हें देख रहा है.

दरअसल, बच्चे सामने वाले के छूने को समझ ही नहीं पाते हैं. वे इसे लाड़दुलार समझ बैठते हैं. हर ऐसा आदमी जो सैक्स भावना से बच्चों को प्यारदुलार करता है, ‘पेडोफिलिक’ होता है.

ऐसी दिमागी बीमारी वाले लोग अकसर पहले बच्चों के प्राइवेट हिस्सों को छू कर उन्हें जोश में लाते हैं. कभीकभी बच्चे उन की इस हरकत का मजा लेने लगते हैं और तब इन का काम आसान हो जाता है. लेकिन अगर कभी पकड़े गए, तो सारा कुसूर बच्चों के सिर मढ़ देते हैं, इसलिए मांबाप को उन की किसी बात पर भरोसा नहीं करना चाहिए, बल्कि बच्चा कभी कोई शिकायत करे, तो तसल्ली से उस की बातों को सुनना चाहिए.

लेकिन यह दुख की बात है कि हमारे देश और समाज में बच्चों की भावना को तूल नहीं दिया जाता है. कई बार देखा जाता है कि बच्चे को किसी खास शख्स का लाड़दुलार रास नहीं आता है. कुछ सगेसंबंधियों को वे बिलकुल पसंद नहीं करते. बाकायदा कुछ लोगों से वे चिढ़ते हैं. वे उन के पास नहीं जाना चाहते हैं. बच्चा न चाहे तो ज्यादा जोर नहीं देना चाहिए.

हमारे आसपास हर जगह ऐसी तमाम मुखौटाधारी रिश्तेदार व दोस्त भरे पड़े हैं. जाने कब, कहां और कैसे हमारे बच्चे किसी की जिस्मानी भूख के शिकार हो जाएं, कहा नहीं जा सकता, इसीलिए मांबाप को खुद तो सचेत रहना ही चाहिए, साथ ही बच्चों को भी जागरूक बनाना चाहिए.

बच्चा अगर ऐसी किसी बात की ओर इशारा करता है या शिकायत करे, तो उस की बातों को गंभीरता से लें. उन के भीतर हिम्मत पैदा करें. अगर कभी कोई हादसा हो गया, तो हिम्मत से काम लें. बच्चे से खुल कर बात करें. अगर बच्चा खुल कर न कह पाए या कहना न चाहे, तो उस की अनकही बातों को समझाने की कोशिश करें.

एक समय के बाद बच्चों को यह समझना जरूरी है कि छिपा कर किया हुआ या मन को अच्छा नहीं लगने वाला कोई भी काम ठीक नहीं होता. ऐसे काम से दूर रहना चाहिए. अगर कोई और करे, तो चुप रह जाना चाहिए.

बच्चों को समझाना होगा कि अगर कोई प्यारदुलार के बहाने बदन के किसी हिस्से को हाथ लगाए, तो फौरन मांबाप को बताएं.

बच्चों का जिस्मानी शोषण केवल मर्द करते हैं, गलत है. आरतें भी बच्चों का यौन शोषण करती हैं.

अनजान लोग ही ऐसा काम करते हैं, ऐसा भी नहीं है. ज्यादातर मामलों में पारिवारिक सदस्य, जानने वाले लोग भी बच्चों का जिस्मानी शोषण करते हैं.

जानें कौन-से क्रिकेटर करते हैं अंधविश्वास पर यकीन, सचिन और कोहली भी हैं इसमें शामिल

21से 24 दिसंबर, 2023 को मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में भारत और आस्ट्रेलिया की महिला क्रिकेट टीम के बीच टैस्ट मैच हुआ था, जिसे भारत ने बहुत बड़े अंतर से जीत कर कमाल कर दिया था. महिला टैस्ट क्रिकेट के इतिहास में पहली बार भारत ने आस्ट्रेलिया को हराया था. इस से पहले दोनों देशों के बीच 10 टैस्ट मैच खेले गए थे, जिन में से आस्ट्रेलिया को 4 मुकाबलों में जीत मिली थी, जबकि 6 मैच बेनतीजा रहे थे.

पर असली खबर तो यह है कि इस जीत को भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान और हैड कोच ने धार्मिक जामा पहना दिया. कप्तान हरमनप्रीत कौर ने 26 दिसंबर, 2023 को मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर में जा कर पूजाअर्चना की थी. उन के साथ टीम के हैड कोच अमोल मजूमदार भी मौजूद थे.

इतना ही नहीं, कभी भारतीय क्रिकेट टीम में सलामी बल्लेबाज रहे और अब भारतीय जनता पार्टी के सांसद गौतम गंभीर भी इसी साल के फरवरी महीने में उज्जैन के महाकाल मंदिर में दर्शन करने गए थे. उन्होंने वहां सुबह की भस्म आरती में भी हिस्सा लिया था.

हालिया भारतीय क्रिकेट टीम की रीढ़ की हड्डी कहे जाने वाले विराट कोहली कुछ समय पहले बिलकुल भी बल्लेबाजी नहीं कर पा रहे थे. उन की कप्तानी भी चली गई थी और सोशल मीडिया पर उन की खराब बल्लेबाजी की खूब खिंचाई भी हो रही थी. इस के बाद वे खबरों में इस बात को ले कर चर्चित हुए कि ‘इस मंदिर में जाते ही खुले भाग्य’.

बता दें कि इसी साल की शुरुआत में विराट कोहली अपनी पत्नी अनुष्का शर्मा के साथ उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में दर्शन करने पहुंचे थे. इस दौरान उन दोनों ने तकरीबन डेढ़ घंटे तक मंदिर के नंदी हाल में बैठ कर भस्म आरती की थी और उस के बाद दोनों ने मंदिर के गर्भगृह में जा कर पंचामृत पूजन अभिषेक किया था.

यही नहीं, पिछले साल वे दोनों उत्तराखंड के नीम करौली बाबा के आश्रम में पहुंचे थे और जनवरी महीने में उन्हें वृंदावन में नीम करोली बाबा के समाधि स्थल पर भी देखा गया था. उन्हें वृंदावन के स्वामी प्रेमानंदजी महाराज के आश्रम में भी देखा गया था.

इस के बाद लोगों ने विराट कोहली की अच्छी बल्लेबाजी को बाबा और मंदिर जाने का कारनामा बता दिया. एक फैन ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘कोहली किस बाबा से मिला था, एड्रैस बताओ. एकदो ख्वाहिश पूरी करवानी हैं.’

इसी तरह सचिन तेंदुलकर का पूरा परिवार सत्य सांईं बाबा का परम भक्त कहा जाता है. जब बाबा का निधन हुआ था, तब वे हैदराबाद में थे. यह खबर मिलते ही उन्होंने खुद को होटल के कमरे में बंद कर लिया था. कहते हैं कि क्रिकेटर सुनील गावस्कर ने सचिन की मुलाकात सत्य सांईं बाबा से कराई थी.

सोशल मीडिया पर मंदिरों का प्रचार

जब कोई नामचीन क्रिकेटर या कोई दूसरा सैलेब्रिटी किसी मंदिर में जा कर माथा टेकता है और उस की खबर मीडिया में आती है, तो सोशल मीडिया उसे हाथोंहाथ लेता है. विराट कोहली जैसे नामचीन लोगों के किसी मंदिर, बाबा आदि के बारे में सोशल मीडिया पर किए गए कमैंट, फोटो और वीडियो आम लोगों के दिमाग पर गहरा असर करते हैं. वे मन में बिठा लेते हैं कि अगर बड़े लोगों के बिगड़े काम ऐसे बन रहे हैं, तो हमें भी वहीं जाना चाहिए.

अभी हाल ही में उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर, नीम करौली बाबा, वृंदावन के स्वामी प्रेमानंद के आश्रम और मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर सोशल मीडिया पर बहुत ज्यादा ट्रैंड कर रहे हैं और इस अंधविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं कि जब कोई राह न सूझे, तो किसी के दरबार में जा कर माथा टेक दो.

जो लोग क्रिकेटरों को अपने ‘भगवान’ का दर्जा देते हैं, वे तो आंख मूंद कर उन की हर चीज को फौलो करते हैं. तभी तो आज हर छोटेबड़े मंदिर, आश्रम में लोगों की भीड़ देखी जा सकती है. नतीजतन, लोग किसी से कर्ज ले कर भी ऐसी जगह जाते हैं, ताकि उन की मुसीबतें दूर हो जाएं, पर कर्ज लेने के बाद तो उन की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ जाती हैं, यह उन्हें समझ में नहीं आता है.

घोर अंधविश्वासी क्रिकेटर

वैसे तो किसी न किसी तरह का अंधविश्वास हर देश के क्रिकेटर में देखा जा सकता है, पर कुछ क्रिकेटर अपनी पोंगापंथी हरकतों से चर्चा में बने रहते हैं. ‘क्रिकेट के भगवान’ के नाम से मशहूर महान भारतीय बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर बल्लेबाजी करने के लिए मैदान में उतरने से पहले हमेशा बायां पैड पहनते थे, जबकि राहुल द्रविड़ जब बल्लेबाजी करने के लिए तैयार होते थे, तो हमेशा पहले दायां पैड पहनते थे.

एक जमाने के दिग्गज क्रिकेटर मोहिंदर अमरनाथ फील्डिंग करते समय अपनी पैंट की जेब में लाल रूमाल रखते थे. भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रहे मोहम्मद अजहरुद्दीन के गले में काला तावीज बंधा रहता था. फील्डिंग के दौरान कई बार उन्हें वह तावीज चूमते हुए भी देखा जा सकता था.

एक बार ‘द कपिल शर्मा शो’ में आए वीरेंद्र सहवाग और मोहम्मद कैफ ने खुलासा किया था कि उन के कप्तान सौरव गांगुली बहुत ज्यादा अंधविश्वासी थे. मोहम्मद कैफ ने बताया कि एक बार तो सौरव गांगुली मैच में अपने गले में पहनी माला को पकड़े बैठे रहे थे और प्रार्थना करते रहे थे.

इसी तरह वीरेंद्र सहवाग ने कहा था कि दादा (सौरव गांगुली) के गले में जो चेन है, उस में दुनिया के जितने भगवान हैं उन की फोटो मिलेंगी आप को. दुनिया के जितने पत्थर होते हैं नीलम, मोंगा सब उन के पास हैं.

कहने का मतलब है कि जितने क्रिकेटर, उन के उतने ही अंधविश्वास. हैरत तो तब होती है, जब ये लोग अपने हुनर के आगे अपने अंधविश्वास को तरजीह देते हैं और आम लोगों के मन में भर देते हैं कि अगर आप का भाग्य खराब है तो खेल खराब होना तय है, जबकि खेल में हारजीत होना कोई नई बात नहीं है. कोई जीतता है, तो कोई हारता है.

अगर किस्मत और गंडेतावीज, बाबाआश्रम, मठमंदिर और पूजाअर्चना आदि इतने ही ताकतवर होते, तो पिछले वनडे वर्ल्ड कप में लगातार 10 मैच जीतने वाली भारतीय क्रिकेट टीम देशभर में हो रहे हवनपूजन के बावजूद फाइनल मुकाबले में नहीं हारती. लिहाजा, अपने हुनर और मेहनत पर यकीन करें और इन फुजूल के चक्करों में मत पड़ें.

तालिबान ने लड़कियों से ज्यादा पढ़ने का हक छीना

भा रत की केंद्र सरकार कितना ही गरीबों की भलाई की स्कीमों का ढोल पीट ले, पर एक कड़वी हकीकत यह भी है कि आज भी गरीबी और सामाजिक भेदभाव के चलते दलित और आदिवासी बच्चियों की पढ़ाई छोड़ने की दर सब से ज्यादा है. सरकारी स्कूलों में ऐसी बच्चियों के साथ मिड डे मील परोसने तक में भेदभाव किया जाता है.

कितनी हैरत और शर्म की बात है कि देश आजाद होने के इतने साल बाद आज भी कोई बच्चा नाम और जाति सब से पहले सीखता है और दूसरे बच्चे किस जाति के हैं, यह भी वह अपनेआप सीख जाता है. यही फर्क आगे स्कूली जीवन में भी दिखता है, तभी तो वंचित समाज की लड़कियां जल्दी पढ़ाई छोड़ देती हैं और उन के घर बैठने से या तो वे बाल मजदूरी करती हैं या फिर जल्दी ही कम उम्र में ब्याह दी जाती हैं.

पर भारत का पड़ोसी देश अफगानिस्तान तो एक कदम और आगे निकल गया है. आप ही सोचिए कि सालभर पढ़ाई करने के बाद जब कोई बच्चा इम्तिहान पास करता है, तो नई जमात में पहुंचने का जोश और खुशी हद पर होती है. भविष्य के सुंदर सपने आंखों में तैरते हैं, मगर अफगानिस्तान में छठी जमात पास करने वाली लड़कियों की आंखों में आंसू हैं. वजह, अफगानिस्तान का दमनकारी तालिबानी शासन छठी जमात के बाद लड़कियों को आगे पढ़ने की इजाजत नहीं देता.

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में रहने वाली 13 साला सेतायेश साहिबजादा अपने भविष्य को ले कर चिंतित है और अपने सपनों को पूरा करने के लिए स्कूल न जा पाने के चलते उदास है.

सेतायेश साहिबजादा कहती है, ‘‘मैं अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकती. मैं टीचर बनना चाहती थी, लेकिन अब मैं पढ़ नहीं सकती, स्कूल नहीं जा सकती.’’

13 साल की बहारा रुस्तम काबुल के बीबी रजिया स्कूल में 11 दिसंबर, 2023 को आखिरी बार स्कूल गई थी. उसे पता है कि उसे अब आगे पढ़ने का मौका नहीं दिया जाएगा. तालिबान के राज में वह फिर से क्लास में कदम नहीं रख पाएगी. उस की सारी सहेलियां छूट जाएंगी. अब वह उन के साथ खेल नहीं पाएगी. उन से अपने सुखदुख नहीं बांट पाएगी.

लड़कियों की पढ़ाई पर रोक

अफगानी लड़कियां तालिबानी शासन, जो शरीयत पर चलता है, के तहत छठी जमात पास करने के बाद घरों में कैद कर दी जाएंगी. उन की शादी हो जाएगी, फिर वे बच्चे पैदा करेंगी, नौकरों की तरह ताउम्र किसी दूसरे के घर के काम करेंगी, मारीपीटी जाती रहेंगी, फिर एक दिन मर कर जलील जिंदगी से छुटकारा पा लेंगी.

अफगानी औरतें एक ऐसी जिंदगी जी रही हैं, जहां वे अपना कोई फैसला नहीं ले सकती हैं. किसी के आगे अपनी कोई राय नहीं रख सकती हैं. अपनी मरजी से कोई काम नहीं कर सकती हैं. उन्हें कोई हक नहीं है. वे सार्वजनिक जगहों पर नहीं जा सकतीं. उन्हें नौकरियों से बैन कर उन के घरों तक ही सिमटा दिया गया है.

अफगानिस्तान में इस साल लड़कियों व औरतों की एक पीढ़ी से पढ़ाईलिखाई का हक छीन लिया गया है. अगर यह सिलसिला जारी रहा, तो अफगानिस्तान में महिला डाक्टर, महिला नर्सें नहीं होंगी. महिलाओं की गर्भ संबंधी दिक्कतों का इलाज, बच्चे की डिलीवरी सब अशिक्षित घरेलू दवाएं करेंगी. वे बचेंगी या मरेंगी, इस की चिंता किसी को नहीं है. शरीयत का शासन अफगानी औरतों की जिंदगी को उस काल में धकेल रहा है, जब इनसान जंगलों में रहा करता था.

धर्म की सत्ता

धर्म की बुनियाद पर खड़े हुए देश और दुनिया में जहां भी धर्म सत्ता चला रहा है, उस देश और समाज में औरतों की औकात दासी की है. वे सिर्फ आदमी के हुक्म की गुलाम हैं. आदमी औरत को घर में कैद कर के रखे, जब चाहे उस के जिस्म को रौंदे, सालदरसाल उस से बच्चे पैदा करवाए, यह आदमी के लिए धर्मसम्मत है. वह हुक्म देता है कि औरत उस का घर साफ करे, उस के लिए लजीज खाना पकाए, बरतन मांजे, उस के बच्चे पाले, उस के घर वालों की खिदमत करे और अगर उस ने इस में कहीं कोई कोताही दिखाई, तो आदमी हंटरों की मार से उस का पूरा जिस्म लहूलुहान कर दे या उसे गोली से उड़ा दे, इस की इजाजत धर्म देता है.

औरत के लिए धर्म से बड़ा दुश्मन कोई नहीं है. अपनी बीवी का दूसरे मर्द से बलात्कार कराने का रास्ता धर्म बताता है. अपनी पत्नी को गर्भावस्था में छोड़ देने और उसे जंगल जाने के लिए मजबूर करने पर धर्म पुरुष की बुराई नहीं करता, बल्कि उसे पुरुषोत्तम बना देता है. एक स्त्री को भरी सभा में नंगा करने पर तमाम धार्मिक लोगों की जबान तालू से चिपक जाती है.

बड़ेबड़े हथियार उठाने वाले सूरमाओं के हाथों को लकवा मार जाता है, नसों का खून बर्फ हो जाता है. धर्म के हाथों औरत की इस बदहाली की कहानियों से धर्मग्रंथ भरे पड़े हैं और मूर्ख औरतें ऐसे धर्मग्रंथों को सिर पर उठाए फिरती हैं.

अफगानिस्तान में जब तालिबानी अपना दबदबा कायम करने की कोशिशों में थे, तब शरीयत का शासन चाहने वालों में औरतें भी शामिल थीं. हैरानी होती है कि जिस धर्म को हथियार बना कर प्राचीनकाल से मर्द औरत पर हावी रहा, उस पर जोरजुल्म करता रहा, उस को अपना गुलाम बनाए रखा, उस धर्म का त्याग करने के बजाय औरत दिनरात उस के महिमामंडन और प्रसार में क्यों लगी है?

दुनियाभर में चाहे कोई भी धर्म हो, औरतें बढ़चढ़ कर खुशीखुशी सारे कर्मकांडों को पूरा करती हैं. क्या औरतों को आज तक यह समझ में नहीं आया कि धर्म की जंजीरों में उन की खुशहाली और आजादी दम तोड़ रही हैं? क्या औरत कभी यह बात समझोगी कि अनपढ़ लोग कभी भी आजाद और खुशहाल नहीं हो सकते? फिर वह अफगानिस्तान हो या भारत.

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