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Editorial: गहरी पैठ-औरतों को हुनर सिखाने से दूर रखा ताकि गुलाम बनी रहे

Editorial. दिल्ली में एक बस ड्राइवर और उस के साथी पर एक औरत के लगाए रेप चार्ज पर पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ेगी. 2012 के केस की याद दिलाते हुए इस औरत का कहना है कि बस 7 किलोमीटर तक चलाई गई जब एकएक कर के 2 जनों ने उस से रेप किया.

इस मामले में पेंच यह है कि यह औरत सैक्स वर्कर का काम कर रही है और रात के 12 बजे के करीब बस में बैठाई गई थी. औरत ने शायद पुलिस रिपोर्ट में लिखाया है कि तय 3,000 रुपए कुछ देर के लिए तय हुए थे पर बस में चढ़ने के बाद बस में सवार 3 लोगों ने रातभर सैक्स करने की मांग 1,500 रुपए में रखी. जब झगड़ा हुआ तो पुलिस थाने में शिकायत की गई.

2012 के मामले में रेप की शिकार स्टूडैंट थी जो अपने साथी के साथ देर शामको जा रही थी जब खाली बस में सवार लोगों ने उन्हें सिर्फ लिफ्ट दी थी पर बाद में लड़के को बाहर फेंक दिया और लड़की को बुरी तरह रौंदा और उस के प्राइवेट पार्ट में रौड तक सिर्फ मजे के लिए डाली.

इस मामले में औरत 4 बच्चों की मां है, उस का आदमी निठल्ला टीबी का मरीज है और पैसा कमाने के लिए वह औरत रात को सैक्स से कमाई के लिए निकली. अपने घरों से दूर रह रहे सैक्स के प्यासों से अकेले, बिना दलाल के बदन बेचना गुनाह नहीं कानून में इसलिए रेप का मामला तो लेनदेन को सुलटाने के लिए नहीं बनाया गया, यह पुलिस को देखना होगा. अगर सुलह पहले से न हो तो अदालतों को सिर खपाना पड़ेगा कि क्या करें.

असल समस्या तो यह है कि औरतों को यह क्यों आज भी कहा जा रहा है कि वे बदन किराए पर दे कर पैसे कमा सकती हैं और मर्दों को यह पाठ क्यों पढ़ाया जा रहा है कि आज भी औरत का सैक्स खरीदा जा सकता है और उस से फिर जबरदस्ती की जाती है.

गरीब औरतों को आज इतना हुनर क्यों नहीं सिखाया जा रहा कि वे बिना बदन बेचे भी अच्छा पैसा कमा लें. अभी तक बदन बेचने में ज्यादा स्किल की जरूरत नहीं होती पर दूसरे कामों में खासी स्किल सीखनी होती है. पर आफतें तो इस धंधे में भी होती हैं, क्योंकि न मालूम कौन सा ग्राहक कौन सी बीमारी ले कर चल रहा है, कितना मैला और बदबूदार है, कितना खतरनाक है और मारपीट तक को सैक्स का आनंद समझता है.

सदियों से औरतों को जानबूझ कर हुनर नहीं सिखाए गए ताकि उन्हें मनमरजी से पुरुष की सेवा में लगा कर रखा जाए. अब जब गोरों से नहीं, राजाओं, जमींदारों, सेठों, पुजारियों के आतंक से भी 1947 में आजादी मिली तो 2026 में एक 30 साला औरत को क्यों बदन का सहारा लेना पड़े. मनमरजी से सैक्स करने का उसे हक है चाहे पति से, चाहे किसी दूसरे से, पर पैसे के लिए क्यों करना पड़ रहा है. यह सरकार, समाज और धर्म निकम्मापन दिखाता है जो दावा करते हैं कि हम ही तो बचाते हैं. Editorial

Social Story : तीसरा

Social Story. गांव के लोग नए कलक्टर से गांव के बांध का उद्घाटन कराना चाहते थे, पर कलक्टर ने उन्हें कोई भाव नहीं दिया. इस से गांव वाले हैरान थे. पर जब उन्हें नए कलक्टर के बारे में पता चला, तो उन की आंखें फटी की फटी रह गईं. क्या था कलक्टर की जिंदगी का राज?

कुरुक्षेत्र शहर से तकरीबन 20 किलोमीटर दूर पिहोवा रोड पर गांव मुर्तजापुर गांव में बहुत बड़ा बांध बनाया गया. वहां बहती नदी पर खूबसूरत और चौड़ा पुल बनाया गया जिस से कि गांव के अंदर से आने और बाहर से निकलने वाले ट्रैफिक की वजह से ज्यादा परेशानी न हो.

अब बाहर से जाने वाला ट्रैफिक पुल से निकल जाएगा और गांव में गाडि़यों की भीड़ भी जमा नहीं होगी. साथ ही, बांध बनाने से किसानों को बारिश में फसल खराब होने का खतरा भी नहीं और सूखा पड़ने पर पानी का भी इंतजाम हो गया.

गांव वाले आज खुशी से फूले नहीं समा रहे. गांव की तो मानो काया ही पलट गई. सब आपस में बातें कर रहे थे कि नए कलक्टर ने तो गांव की सूरत ही बदल डाली. पंचायत ने गुजारिश की कि इस पुल और बांध का उद्घाटन भी कलक्टर के हाथों कराया जाए.

आखिर वह दिन भी आ गया. कलक्टर साहब आए और सीधे रैस्टहाउस में चले गए. सभी गांव वाले उन का धन्यवाद करना चाहते थे लेकिन कलक्टर साहब ने किसी से मिलना तो दूर अपनी शक्ल तक न दिखाई.

आखिर 2 दिन बाद उद्घाटन की पूरी तैयारी हो गई. कलक्टर साहब को न्योता भेजा गया कि उद्घाटन उन्हीं के शुभ हाथों से होगा. सरपंच खुद कलक्टर साहब से मिलने गए, तो बाहर ही उन का पीए मिल गया, ‘‘भाई, ये आप के सरजी का पूरा नाम क्या है, क्योंकि बाहर तो केवल एससी लिखा है? आप पूरा नाम बता दो ताकि इस निमंत्रण पर उन का पूरा नाम लिख दें.’’

‘‘सरपंचजी, पूरा नाम तो मैं भी नहीं जानता, मुझे भी केवल एससी ही पता है. आप एससी ही लिख दीजिए और यह निमंत्रण पत्र मुझे दे दीजिए, मैं उन्हें दे दूंगा. कलक्टर साहब आराम कर रहे हैं. इस समय उन से कोई नहीं मिल सकता.’’ ‘‘अगर कलक्टर साहब अभी आराम फरमा रहे हैं, तो हम बाद में आ जाएंगे. हम चाहते हैं कि हम गांव के कुछ लोग खुद उन्हें न्योता दें.’’ ‘‘देखिए सरपंचजी, कलक्टर साहब आज बहुत बिजी रहेंगे, इसलिए आज मिलना मुमकिन न होगा. आप फिक्र मत कीजिए, मैं आप लोगों का संदेश उन्हें दे दूंगा. वैसे भी कल आप सब ही मिल लीजिएगा उन्हें,’’ कहते हुए पीए ने टाल दिया.

अगले दिन उद्घाटन वाली जगह पर पूरा गांव खुशी से झूमता हुआ जमा था. कलक्टर साहब काली पैंट, सफेद दूधिया सी शर्ट पर डार्क रौयल ब्लू रंग का कोट पहने, सिर पर घुंघराले मैगी जैसे बाल, आंखों पर धूप का काला चश्मा, चेहरे पर मास्क लगाया हुआ, रोबीली चाल से चलते हुए आए और गांव के कुछ खास लोग उन्हें फूलमाला पहनाने लगे, लेकिन कलक्टर साहब ने हाथ के इशारे से उन्हें रोक दिया.

रिबन काट कर उद्घाटन किया गया. उस के बाद सरपंच ने कलक्टर साहब को फूलमाला पहनाने की कोशिश की, कलक्टर साहब ने हाथ रोक दिया और नत्थूलाल को स्टेज पर बुला कर कहा कि यह सम्मान उन्हें दिया जाए. ‘‘कलक्टर साहब, यह सम्मान आप के लिए है. आप ने नत्थूलाल भाई को क्यों बुलाया? मैं इस का कुछ मतलब नहीं समझा ?’’ सरपंच ने हैरानी से पूछा. नत्थूलाल चुपचाप खड़ा यह सब देख रहा था.

तब कलक्टर साहब ने अपने चेहरे से चश्मा तथा मास्क हटाया और पूरे गांव वालों के सामने जोर की आवाज में बोले, ‘‘गांव वालो, जरा गौर से देखो मुझे. क्या आप में से कोई जानता है मुझे? कोई पहचानता है मुझे? क्योंकि मैं इसी गांव की पैदाइश हूं. इस सम्मान पर मेरा हक नहीं (नत्थूलाल की तरफ इशारा कर के), बल्कि इन का हक है, इसलिए यह सम्मान इन्हें दिया जाए.’’

सभी हैरान हो कर यह सब सुन और देख रहे थे, लेकिन किसी की समझा में कुछ नहीं आ रहा था. हां, तभी बचनी दौड़ीदौड़ी स्टेज की तरफ आई और कलक्टर साहब को गले से लगा लिया. उस की आंखें आंसुओं का साथ ही नहीं छोड़ रही थीं. सरपंच हैरान से खड़े यह सब देख रहे थे. कुछ न सम?ा पाने पर वे बोले, ‘‘कलक्टर साहब….आप इस गांव की पैदाइश हैं… कौन? हैं आप और बचनी भाभी और नत्थूलाल को कैसे जानते हैं आप?’’

फिर नत्थूलाल और बचनी की तरफ मुखातिब होते हुए सरपंच बोले, ‘‘क्या आप पहचानते हैं कलक्टर साहब को?’’ लेकिन वे दोनों चुप रहे. कलक्टर साहब ने बोलना शुरू किया, ‘‘काकी, दाई अम्मां, रानी चाची, बिमला मौसी…’’ इस तरह कई नाम लिए. सब अपनाअपना नाम सुन कर हैरानी से देखने लगे कि कौन हैं ये.

‘‘क्या अभी भी आप लोगों ने नहीं पहचाना मुझे? दाई अम्मां, आप तो नहीं भूल सकती मुझे. याद करो वह दिन जब मेरा जन्म हुआ था.मुझे देखते ही मेरी नाल तक नहीं काटी थी आप ने. ‘मेरी मां खून से लथपथ पड़ी थीं और मैं नाल से मां के साथ बंधी वहीं गंदगी में पड़ी रो रही थी. मुझे साफ कर के गोद में लेना तो दूर रहा, बल्कि हाथों में से ऐसे पटका जैसे हाथों पर बिच्छू हो, जिस ने काट खाया हो.

‘‘हां… मैं वही हूं, वही तीसरा. आप तो जानते हो न तीसरा कौन? मैं वही तीसरा एससी मतलब सुशीला चौधरी. नत्थूलाल के बेटे मन्नु की औलाद, जिसे आप लोगों ने तीसरा कह कर कहीं फेंक आने के लिए मेरे दादादादी को कहा था, पर जब वे नहीं माने तो गांव वालों ने क्याक्या नहीं उन्हें कहा, कैसीकैसी धमकियां उन्हें दी गईं.

‘‘क्या कुछ नहीं मेरे मातापिता और दादादादी को सहन करना पड़ा मेरी वजह से, लेकिन इन्होंने हार नहीं मानी. न केवलमुझे दूसरे भाईबहनों की तरह पाला बल्कि उन से ज्यादा प्यार दिया और मेरे भाईबहनों ने कभी मुझे अहसास नहीं होने दिया कि मैं उन के जैसी या जैसा नहीं, बल्कि तीसरा जैंडर हूं. उन्होंने हमेशा मुझे अपने जैसा ही समझा. हमेशा मुझे बड़ी बहन का ओहदा दिया.

‘‘आज मैं जोकुछ भी हूं, इस परिवार की वजह से हूं वरना न जाने मेरा भविष्य क्या होता. अब तक मन्नु और मुनिया और उन के चारों बच्चे भी स्टेज तक आ चुके थे. बचनी ने जोर दे कर कहा, ‘‘तू कोई तीसरावीसरा नहीं है, तू मेरी बच्ची है मेरी. मेरी सब से बड़ी और सब से लाड़ली पोती है तू.’’ आंखों में आंसू लिए बचनी ने नत्थूलाल से पूछा, ‘‘आप ने मुझे बताया क्यों नहीं?’’

‘‘लेकिन फिर भी तुम ने बिना बताए जान लिया… वह कैसे?’’ ‘‘मां का दिल है न. 2 दिन से बहुत बेचैनी हो रही थी. आप से कहा भी कि मेरी बात करा दो लेकिन आप टालते रहे और मैं अंदर ही अंदर परेशान होती रही.’’

‘‘मैं समझ रहा था तेरी परेशानी, मगर मैं तुम सब के चेहरों पर यह रौनक देखना चाहता था, इसलिए मैं ने किसी को कुछ नहीं बताया. मैं ने ही सुशीला से गांव की परेशानियों का जिक्र किया था.और सुशीला ने गांव की परेशानियों का हल निकाल कर खुद भी यहां हमारे साथ रहने के लिए अपनी पोस्टिंग कुछ समय के लिए यहां करा ली.’’

सब गांव वालों को अपनी वे बातें याद आने लगीं कि कैसे उन्होंने इस बच्ची को दुत्कारा था, किस तरह से उस के मातापिता और दादादादी को इसे गांव से निकालने के लिए कहा करते थे. दाई को भी याद आ गया वह दिन जब इस बच्ची का जन्म हुआ था.

दरअसल, यह बात है आज से 26-27 साल पहले की, जब कुरुक्षेत्र से तकरीबन 20 किलोमीटर पिहोवा रोड पर मुर्तजापुर गांव के एक किसान परिवार नत्थूलाल के बेटे मन्नु की शादी गांव के ही आसाराम की बेटी मुनिया से हुई. शादी के तकरीबन एक महीने बाद ही मुनिया के पांव भारी हो गए. घर में सब परिवार, जो कि लेदे कर मातापिता, मन्नु, मुनिया और मन्नु की छोटी बहन गुडि़या, बहुत ही खुश थे? घर में नया मेहमान जो आने वाला था.

मुनिया की खूब सेवा होती, खूब लाड़ लड़ाए जाते, खूब खयाल रखा जाता. सभी बेसब्री से आने वाले मेहमान का इंतजार कर रहे थे, लेकिन एक दिन जब मुनिया को दर्द शुरू हो गया तो मुनिया की सास बचनी देवी ने झट से मुनिया को गरम दूध में कैस्ट्रौल डाल कर पिलाया और उसे ऊपर छत पर 4-5 चक्कर काटने को कहा. 2-4 घंटे के भीतर ही दर्द बढ़ गया और मुनिया को एक छोटे से अलग कमरे में लिटा दिया गया और सास दौड़ कर दाई को बुला लाई.

शाम को अंधियारा छाने लगा था कि बच्चे के रोने की आवाज आई. कमरे के बाहर खड़े सब लोग खुशी से उछल पड़े. सब एकदूसरे को बधाई देते हुए गले लगाने लगे. अब उत्सुकता यह थी कि हुआ क्या है बेटा या बेटी? सब लोग टकटकी लगा कर दरवाजे की ओर देख रहे थे कि इतने में मुंह लटकाए हुए दाई बाहर आई.

नत्थूलाल ने पूछा, ‘‘अरे भाभी, लाओ… बच्चा सब से पहले मेरी गोद में देना.’’ बचनी बोली, ‘‘न जी न, पहला हक तो दादी का है,’’ कहते हुए जैसे ही वह दाई से बच्चा लेने को पलटी, लेकिन दाई के खाली हाथ देख कर एक पल के लिए सहम गई, ‘‘भाभी, बच्चा कहां है? बच्चा लाओ और अपना नेग लो.’’

दाई को खामोश देख कर नत्थूलाल भी बोला, ‘‘हांहां भाभी, आज तो मुंहमांगा नेग मिलेगा, लेकिन लाओ पहले हमारे कुलदीपक के दर्शन तो कराओ.’’ ‘‘काहे का कुलदीपक… मैं तो उसे अंदर ही पटक आई,’’ कहते हुए दाई ने मुंह बना लिया.

दाई की बात सुन कर नत्थूलाल को गुस्सा आ गया और वह बोला, ‘‘अंदर पटक आई का क्या मतलब हुआ भाभी, लड़का हो या लड़की हमारे लिए तो कुलदीपक ही है. आज के समय में लड़के और लड़की में कोई फर्क नहीं. जैसे लड़का कुल का दीपक है तो लड़की भी तो कुल की ज्योति है न, तो हुए न दोनों कुलदीपक.

‘‘हमारी बहू का पहला बच्चा, जो भी है हमारा खून है. लाओ, हमारी गुडि़या या हमारा गुड्डू जो भी है ला कर हमारी झोली में दे दो और हमारे कलेजे को ठंडक पहुंचाओ.’’ ‘‘काहे का लड़का और काहे की लड़की भाई, वह तो तीसरा है तीसरा. मैं तो चली. बचनी, तू ही संभाल अपनी बहू को और बच्चे को फेंक आ कहीं जा के,’’ कहते हुए दाई घर से बाहर जाने के लिए कदम उठाने लगी.

‘‘तीसरा… बच्चे को फेंक आई… भाभी, क्या कह रही हो तुम, हमें कुछ समझा नहीं आ रहा,’’ नत्थूलाल बोला. ‘‘अरे भाई, तीसरा नहीं समझाते हो? वही…..जिस को सब नीची नजर से देखते हैं.’’

बचनी दौड़ती हुई अंदर गई. देखा तो मुनिया खून से लथपथ बेहोश पड़ी थी. बच्चा जारजार रोए जा रहा था, क्योंकि बच्चे के पैदा होते ही दाई उसे मुनिया की टांगों के बीच में लिटा कर सफाई किए बिना और बच्चे की नाल काटे बिना ही जाने की जो ठान ली थी.

बचनी ने अंदर का हाल देखा तो दौड़ी आई और दाई का हाथ पकड़ कर बोली, ‘‘भाभी, इस में बहू और बच्चे का क्या दोष? आप चल कर नाल काट कर बहू और बच्चे को संभालो. ऐसा न हो कोई अधर्म हो जाए हमारे हाथों से…’’ कहते हुए बचनी दाई के हाथपैर जोड़ने लगी.

अब तक नत्थूलाल भी समझ चुका था कि क्या हुआ है. उस ने झट से जेब से बिना देखे, बिना गिने मुठ्ठी भर कर रुपए निकाले और दाईं को देते हुए बोले, ‘‘भाभी, मेरी बहू और बच्चे को कुछ न होने देना.’’

नोटों से भरी मुठ्ठी देख दाई के मुंह में पानी आ गया. वह बोली, ‘‘भाई, बहू से तो मेरी को दुश्मनी न है, पर यह बच्चा कहीं भी जा के फेंक आ, नहीं तो यह गांव तुझे जीने नहीं देगा,’’ कहते हुए कमरे में जा कर बच्चे की नाल काट कर मुनिया के बदन की सफाई कर के ठीकठाक किया. लेकिन बच्चे को फिर हाथ तक न लगाया. उसे बचनी ने खुद से साफ कर के कपड़े में लपेटा.

जब दाई जाने लगी तो नत्थूलाल ने एक मुट्ठी नोटों की और थमा दी और बोला, ‘‘भाभी, किसी से कोई जिक्र न करना, आप को हमारी लाज का वास्ता. अभी हम सोचते हैं कुछ कि बच्चे का क्या करना है.’’

इतनी बात बचनी के कानों में पड़ी तो वह कमरे से बाहर आ गई. उस की गोद में बच्चा था. वह बोली, ‘‘क्यों जी, क्यों न जिक्र करें? जो भी कुदरत ने दिया इसे अस्वीकार कर दें क्या? यह भी इनसान ही है. हमारी बहू ने इनसान का बच्चा जना है, जानवर का नहीं, जो हम छिपाते फिरें,’’ कहते हुए उस ने बच्चे को सीने से लगा लिया.

नत्थूलाल भी सोचने पर मजबूर हो गया, ‘‘बचनी, कह तो तुम सही रही हो. इस में बहू और बच्चे का क्या कुसूर है,’’ और दाईं से बोला, ‘‘भाभी, मु?ो किसी की कोई चिंता नहीं. गांव वाले जब जो कहेंगे तब हम देख लेंगे.’’

अब तक मन्नु शांत खड़ा अचरज से यह सब देखसुन रहा था. मां ने उस की ?ाली में बच्चे को डालते हुए कहा, ‘‘मन्नु, इस तरह चुप क्यों है? देख अगर तू ही इसे नहीं स्वीकारेगा, तो दुनिया तो तेरे से पहले ही इसे दुत्कारेगी, इसलिए हम से पहले तु?ो इस सच को स्वीकारना होगा. ले… ले अपने बच्चे को गोद में ले कर प्यार कर.’’

मां की बात सुन कर मन्नु में भी जोश भर गया. उस ने बच्चे को गोद में ले कर प्यार किया और सीने से लगा लिया. पैसे के लालच में दाई ने अपना सारा काम तो कर दिया, मगर कहीं न कहीं उस के दिल में डर था कि इस बच्चे का ये क्या करेंगे? क्या इसे अपनाएंगे या कहीं किसी को दे आएंगे या यों ही फेंक देंगे?

खैर, दाई अपना कम निबटा कर, अपनी मेहनत से भी ज्यादा पैसे ले कर खुशी से अपने घर चली गई. अब उसे नत्थूलाल ने कहा था कि किसी से कुछ न कहे, मगर एक दिन दाई के मुंह से बात निकली और एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे के कान तक जा पहुंची.

पूरे गांव को खबर हो गई कि नत्थूलाल के बेटे मन्नु की बीवी मुनिया ने तीसरे को जन्म दिया. आसपड़ोस की औरतें पहुंच गई नत्थूलाल के घर इस बात को पुख्ता करने. उन में से एक काकी आते ही लगीं आवाज लगाने, ‘‘बचनी, अरी ओ बचनी.’’ ‘‘आओ काकी, आओ. बड़े दिनों बाद आई हो. आओ बैठो. मैं जरा बच्चे को उस की मां को पकड़ा कर आती हूं,’’ बचनी जानती थी कि इन सब को पता चल चुका है कि मुनिया का बच्चा हो गया है, तो फिर छिपाए क्यों?

‘‘न बचनी न, बैठने का समय कहां है री. पहले तो यह बता… मैं क्या सुन के आई हूं… तेरी कुलछनी बहू ने क्या जन दिया…’’ ‘‘काकी, बुरा मत मानो. मेरी सुलछनी बहू के बारे में कुछ मत कहो और रही बच्चे की बात तो जो कुदरत ने दिया वह सिरमाथे पर. अब भला इस में बहू या बच्चे का क्या दोष?’’

बचनी की बात सुन कर काकी और दूसरी औरतें चुप हो गईं, लेकिन जातेजाते काकी एक बात बचनी के कानों में डाल गईं, ‘‘देख बचनी, यह तो सही है कि जो दिया कुदरत ने दिया इस में बहू का क्या दोष, लेकिन कुदरत के किए को हम संभाल तो सकते हैं न, इस बच्चे को कहीं छोड़ आओ या इन्हीं की बिरादरी में दे दो वरना ऐसा न हो कल को गांव में तुम लोगों का हुक्कापानी ही बंद हो जाए.’’

काकी की इस तरह की सीधीसीधी धमकी से एक पल के लिए तो बचनी के प्राण कंठ में आ गए, लेकिन दूसरे ही पल हिम्मत कर के वह बोली, ‘‘काकी, कल किस ने देखा है, जो होगा देखा जाएगा.’’ इसके बाद जैसे ही नत्थूलाल और मन्नु अपने काम से घर आए तो बचनी ने सारी बात कह सुनाई.

नत्थूलाल बोला, ‘‘बचनी, तू चिंता मत कर. देखना इस बच्चे को मैं क्या से क्या बनाऊंगा. गांव वाले जो कहते हैं, करते हैं उन्हें उन का काम करने दो और हमें हमारा.’’

वह बच्चा उस परिवार में पलने लगा. उस का नाम सुशीला रखा गया. सुशीला के बाद उस के 2 भाई और 2 बहनें और हुईं. सब को पढ़ायालिखाया गया. पहले तो सुशीला को स्कूल में एडमिशन देने से मना किया गया, लेकिन नत्थूलाल और मन्नु ने भागदौड़ कर के सरकारी कागज बनवाए, जिस में साफसाफ परमिशन दी गई थी कि तीसरे जैंडर के बच्चे भी आम बच्चों के साथ पढ़ सकते हैं.

सुशीला भी अब आम बच्चों के साथ पढ़ रही थी. 10वीं के बाद जिस तरह से बाकी बच्चों को बड़े स्कूल और फिर कालेज भेजा गया, तब सुशीला को उन से अलग कर दिया गया. उसे कहां और क्यों भेजा गया, यह नत्थूलाल के सिवा कोई नहीं जानता था. आज वही बच्ची एक कलक्टर बन कर जिस गांव में जिल्लत सही, उसी गांव की भलाई के लिए दिनरात कोशिश कर रही है.

यह सब सुन कर गांव वाले जो शर्म से आंखें नीची किए खड़े थे, एकजुट हो गए. एक बुजुर्ग बोले, ‘‘सुशीला बेटी, हमें माफ कर दो. हम ने खुद को बड़ा बना कर कुदरत की रचना में भी नुक्स निकालना चाहा. अनजाने में हम से बहुत बड़ी गलती हो गई.

‘‘अब तुम थोड़े समय के लिए नहीं, बल्कि हमेशा के लिए यहीं रहोगी. इसी गांव में और हमें अपने किए का पछतावा करने का मौका दोगी.’’

हिजड़ा कहो या किन्नर या फिर तीसरा जैंडर, देखने में बिलकुल साधारण इनसान जैसे होते हैं. वे भी एक आम इनसान की तरह जीना चाहते हैं, मगर समाज उन्हें बारबार तीसरा जैंडर या अलग तरह के होने का एहसास दिलाता है, उन्हें अपने से अलगथलग रख कर भेदभाव करता है. पर कुदरत के दिए गए तोहफे से भेदभाव कैसा?

लेखक : प्रेम बजाज

Editorial : गहरी पैठ- बिहार बीजेपपी को चढ़ावे की चिंता

Editorial. जैसी उम्मीद थी, बिहार की भारतीय जनता पार्टी को मंदिरों, पूजापाठ और चढ़ावे की ज्यादा फिक्र है, बजाय दलितों, पिछड़ों, गरीबों, मजदूरों और बिहार से बाहर जाने को मजबूर हुए मजदूरों की कुछ सोचने की. पहली कैबिनेट मीटिंग में 3,615 करोड़ रुपए के प्रौजैक्ट एप्रूव किए गए जिन में मंदिरों तक जाने के रास्ते, मंदिरों की मरम्मत, मंदिरों को नई जगह देने जैसे काम शामिल हैं.

बिहार का गरीब तबका जिस का बड़ा हिस्सा अब पढ़लिख गया है, बगावत न कर दे इस के लिए पुख्ता इंतजाम किया गया है. पुलिस फोर्स को स्कूटर दिए जा रहे हैं, थाने बन रहे हैं, गाडि़यां खरीदी जा रही हैं.

इस सब का मकसद एक ही है. जनताको धर्म के नाम पर लूटते रहो, बहकाते रहो, जो सही बात बोले उसे पकड़ कर बंद कर दो. दलित, अति पिछड़े, मुसहर जैसे लोग जिन के बच्चे पढ़लिख गए वे भी बोले नहीं इस के लिए धर्म के पुजारियों का भी दबाव है, उन के लिए कथा भी कराई जा रही है, धार्मिक जलसों में नाचनेगाने को लगाया जा रहा है पर आगे बढ़ने का रास्ता नहीं दिखाया जा रहा है.

बिहार किसी जमाने में बहुत अमीर राज्य था, दूसरे उत्तर भारत के इलाकों से ज्यादा. तभी वहां नालंदा जैसा विश्वविद्यालय बना जो मीलों में फैला है. यह बात दूसरी है कि नालंदा में कोई नहर या सड़क या मकान या खेती के प्रोडक्शन की बात नहीं होती थी. पर दूसरे इलाकों में तो यह भी नहीं था और तभी कभी ग्रीक, कभी शक, कभी हूण, कभी अफगान, कभी मंगोल कब्जे करते रहते थे. बिहार में पुराने मंदिर नहीं हैं इसलिए वह चमका.

आज मंदिरों की बाढ़ आ रही है जो तराई से आने वाली बाढ़ से भी ज्यादा खतरनाक है. सम्राट चौधरी इसे और बढ़ाएंगे. 20 साल नीतीश कुमार ने इस थोड़ाबहुत कंट्रोल किया था पर भाजपा ने हेरफेर कर के उन्हें धक्का दिया है और अब मंदिरों की बात होगी.

बिहार की आम जनता आज भी सीधी और बेवकूफ है. उसे सदियों से पढ़नेलिखने नहीं दिया गया. कांग्रेसी सरकारों ने गांवगांव में स्कूल खोले पर वहां ऊंची जातियों के पढ़ाने वाले घुस गए जिन्होंने साजिश के तहत दलितों, पिछड़ों को पढ़ने नहीं दिया.

जो थोड़ीबहुत चमक बिहार में दिखती है वह तकनीक की बदौलत है. बिजली पैदा करना आसान है तो हर सड़क पर बत्ती लग सकती है, हर घर में लाइट है. बाकी अंधेरा है. सब से नीचे के पायदान पर रहने वाला बिहार अपने पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल और पड़ोसी देश नेपाल से पैसों के मामले में आधा है और यह फर्क बढ़ेगा ही, घटेगा नहीं क्योंकि अब पूजापाठ, पुलिस अत्याचार, बुलडोजर का राज आ गया है जिस में मरेगा गरीब, नीची पिछड़ी जाति का जना जिस की न आवाज है, न सुनवाई.  Editorial

Politics : अंबेडकर को सिर्फ मूर्ति बनाने की साजिश

Politics. उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने डाक्टर भीमराव अंबेडकर की विरासत को सम्मानित करने और दलित मतदाताओं के बीच पैठ मजबूत करने के लिए ‘डाक्टर अंबेडकर मूर्ति विकास योजना’ बनाई है. इस योजना के तहत उत्तर प्रदेश की हर विधानसभा में अंबेडकर की प्रतिमाओं का सौंदर्यीकरण करना, मूर्तियों के ऊपर छत्र और बाउंड्री वाल बनवाना शामिल है.

सरकार ने इस के लिए 403 करोड़ रुपए का बजट पास किया है. इस से उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों के हर क्षेत्र में 10-10 स्मारकों का विकास किया जाएगा.

इस योजना में अंबेडकर के साथ ही साथ दलितों के साथ जुड़े संत रविदास, कबीर, ज्योतिबा फुले और महर्षि वाल्मीकि जैसे महापुरुषों के स्मारकों के विकास को भी शामिल किया गया है.

उत्तर प्रदेश सरकार के इस कदम को 2027 के विधानसभा चुनाव से जोड़ कर देखा जा रहा है. पार्टी इस के जरीए दलित वोटर को जोड़ना चाह रही है. हर विधानसभा को करीबकरीब एक करोड़ रुपए इस काम के लिए मिलेंगे.

उत्तर प्रदेश की सरकार ने तय किया है कि प्रदेशभर में जहां कहीं भी  अंबेडकर की प्रतिमा होगी, वहां पर प्रतिमा के ऊपर छत्र लगाने का काम कराया जाएगा. जहां पर अंबेडकर की प्रतिमा स्थापित होगी वहां पर जो पार्क होगा. उस की बाउंड्री वाल का निर्माण और उस के सुंदरीकरण का काम भी सरकार अपने पास ले रही है.

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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के ऐशबाग में 50 करोड़ रुपए की लागत से ‘भारत रत्न’ भीमराव अंबेडकर मैमोरियल एंड कल्चरल सैंटर का निर्माण होगा. पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 28 जून को इस की आधारशिला रखेंगे. इस में अंबेडकर की 45 फुट ऊंची प्रतिमा लगेगी और अंबेडकर की पुण्यतिथि 6 दिसंबर पर इस का उद्घाटन करवाए जाने की तैयारी है.

‘भारत रत्न’ अंबेडकर के नाम पर बनने वाले मैमोरियल सैंटर में अंबेडकर की प्रतिमा के साथ ही डिजिटल लाइब्रेरी, म्यूजियम और शानदार एडिटोरियम भी बनाया जाएगा. स्मारक में पूरे साल कल्चरल प्रोग्राम का आयोजन किया जाएगा. छात्रों के लिए सैमिनार के आयोजन किए जाएंगे. यहां छात्रों को अंबेडकर पर शोध करने के लिए जरूरी चीज मुहैया करवाएगी.

यहां बनने वाली लाइब्रेरी को काफी बड़ी होगी. उस में अंबेडकर से जुड़ी किताबों का संग्रह होगा.

मूर्तियां होंगी दलित वोट का सहारा

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की नजर से दलित वोट काफी खास माने जा रहे हैं. साल 2024 के लोकसभा चुनाव में यही दलित वोट भाजपा से खिसक गया था, जिस की वजह से उत्तर प्रदेश में पार्टी को 33 सीटों का नुकसान हुआ था. ऐसे में अब भाजपा दलित वोटरों को काफी अहम मान रही है.

साल 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोट पर हर पार्टी की नजर है. उत्तर प्रदेश में तकरीबन 22 फीसदी दलित वोट हैं. यहां विधानसभा की आरक्षित 86 सीट में 84 दलितों के लिए हैं.

उत्तर प्रदेश की लगभग 150 विधानसभा सीटों पर दलित वोट ही हारजीत तय करते हैं. उत्तर प्रदेश में 4 बार मुख्यमंत्री रही मायावती दलितों की सब से बड़ी नेता मानी जाती रही हैं. 1995, 1997, 2003 और 2007 वे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं. साल 2007 बसपा की बहुमत से सरकार बनी थी.

इस के बाद धीरधीरे मायावती की ताकत कम होती गई. बसपा को लगातार 2012, 2017 और 2022 में हार का सामना करना पड़ा है. विधानसभा में बसपा से सिर्फ एक विधायक है. वहीं लोकसभा में एक भी सांसद बसपा का नहीं है. बसपा को अभी भी 9 फीसदी वोट मिलते हैं.

क्यों नहीं लग पाई पेरियार की मूर्ति

मायावती जब उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने प्रदेश के अलगअलग हिस्सों में अंबेडकर की प्रतिमाएं लगवाई थीं. अंबेडकर की पत्नी रमा बाई के नाम पर लखनऊ में एक बड़ा स्मारक भी बनवाया गया था.

मायावती ने तब लखनऊ में अपनी मूर्तियां भी लगवाई थीं, जिस को ले कर खुद भाजपा ने ही सवाल खड़े किए थे. मायावती लखनऊ में जिन दलित महापुरुषों की मूर्तियां लगवाना चाहती थी उन में एक नाम पेरियार ईवी रामास्वामी नायकर का भी था. भाजपा को ब्राह्मण विरोधी पेरियार के नाम से नफरत थी.

भाजपा और अन्य दक्षिणपंथी संगठनों ने पेरियार की मूर्ति का कड़ा विरोध किया था. उन का मानना था कि पेरियार राम विरोधी थे, जबकि असल में वे ब्राह्मण विरोधी थे. उन के विचार हिंदू देवीदेवताओं के खिलाफ थे.

मायावती के तीसरे कार्यकाल 2002-2003 के दौरान जब मूर्ति लगाने का प्रस्ताव था. तब बसपा भाजपा के सहयोग से सरकार चला रही थी. भाजपा ने मूर्ति स्थापना का विरोध करते हुए सरकार से हटने की धमकी दी थी, जिस के कारण मायावती को यह योजना स्थगित करनी पड़ी थी.

उस समय मूर्ति न लगने का कारण यह बताया गया था कि पेरियार दक्षिण भारत के समाज सुधारक थे, इसलिए उन की मूर्ति उत्तर प्रदेश में नहीं लगनी चाहिए. मूर्ति न लगने देने का कारण पेरियार के ईश्वर विरोधी और तर्कवादी विचारों को धार्मिक भावनाओं खिलाफ माना गया था.

मायावती भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनी थीं तो उन्होंने भाजपा के दबाव को माना और पेरियार की मूर्ति लगाने की योजना को टाल दिया.

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पेरियार की नीतियों का मतलब था मंदिरों की दुकानदारी खत्म होना और पंडों को किए जाने वाले दान की बचत होना. दोनों बातें जनता के लिए लाभदायक हैं, पर धर्म का प्रचार इतना जबरदस्त है कि मायावती भी कुछ न कर पाईं और कांशीराम की नीतियां भी राजनीति का शिकार हो गईं.

क्या अंबेडकर की मूर्ति से होगा लाभ

भारतीय जनता पार्टी लगातार दलित और पिछड़ी जातियों से जुड़े महापुरुषों को अपने साथ जोड़ने की योजना पर काम कर रही है. अंबेडकर के अलावा सरदार वल्लभ भाई पटेल की सब से ऊंची मूर्ति गुजरात में लगाई. उन के जन्मदिन को ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ घोषित किया. बिहार के बड़े ओबीसी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को साल 2024 में ‘भारत रत्न’ दिया.

इस का लाभ भाजपा को साल 2025 के विधानसभा चुनाव में मिला. ?ारखंड के बिरसा मुंडा के जन्मदिवस को ‘जनजाति गौरव दिवस’ घोषित किया.

इसी तरह से संत रविदास का भी महिमामंडन किया. साल 2023 में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव को भारत का दूसरा सब से बड़ा सम्मान ‘पद्म विभूषण’ दिया. निषादराज गुहा और सुहेलदेव राजभर जैसे बड़े महापुरुषों का भी भाजपा ने महिमामंडन किया.

भाजपा दूसरे विचारों के महापुरुषों का सम्मान दे कर अपनी अलग पैठ बनाने का काम कर रही है. यह बात और है कि जमीनी लैवल पर वह जातीय भेदभाव को खत्म नहीं कर पा रही है.

दूसरी ओर नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़ों से पता चलता है कि भाजपा शासन के दौरान दलित उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ी हैं. एनसीआरबी की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 की तुलना में 2022 में अनुसूचित जातियों के विरुद्ध अपराधों में 13.1 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई.

सब से अधिक मामले भाजपा शासित उत्तर प्रदेश में 15,368, राजस्थान में 8,752, मध्य प्रदेश में 7,733 और बिहार में 6,509 दर्ज किए गए थे. देश की कुल दलित उत्पीड़न की 76 फीसदी घटनाएं 5 भाजपा शासित राज्यों में हुईं.

औरतों के साथ अन्याय भी लगातार बढ़ रहा है. पढ़ीलिखी औरतों को नौकरियां नहीं मिल पा रही हैं और घरों में उन के साथ होने वाला भेदभाव एक नई शक्ल में सामने आ रहा है.

अंबेडकर के संविधान को कितना मानती है भाजपा

सब से बड़ा सवाल यह है कि भारतीय जनता पार्टी अंबेडकर की मूर्तियां तो लगवा रही है पर उन के बनाए संविधान का कितना पालन करती है? भाजपा पर चुनाव में धांधली, संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग, घरों को बुलडोजर से गिराने और फर्जी एनकांउटर के तमाम आरोप हैं. इस को ले कर कोर्ट तक ने टिप्पणियां की हैं.

इलाहाबाद हाईकोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि कानून के शासन में ‘बुलडोजर न्याय’ की कोई जगह नहीं है. कोर्ट ने कहा कि ‘सरकार या प्रशासन बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए किसी का घर नहीं तोड़ सकते हैं. केवल एफआईआर में नाम आने से कानूनी अधिकार नहीं हासिल हो जाता. सजा देने का अधिकार केवल कोर्ट को है सरकार या प्रशासन को नहीं.’

इसी मसले पर कोर्ट ने कहा कि नोटिस और सुनवाई जरूरी है. प्रभावित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का समय देना चाहिए. तुरंत बदले की कार्रवाई गलत है. अगर अवैध निर्माण के आधार पर यह हो रहा हो तो सब के साथ होना चाहिए. किसी एक का चुनाव करना कानून सम्मत नहीं है. घर तोड़ना केवल संपत्ति का नुकसान नहीं है, यह संविधान की धारा 21, जीवन और गरिमा से जुड़ा मामला होता है.

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में जावेद मोहम्मद का घर अवैध कह कर गिरा दिया गया. जावेद 2022 के सरकार विरोधी प्रदर्शन का हिस्सा थे. 2022 का ही दूसरा मामला दिल्ली का था. वह भी 2022 के प्रदर्शन के कारण किया गया था.

लोकसभा में संविधान पर चर्चा के दौरान भाजपा ने और गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि ‘अभी एक फैशन हो गया है… अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर… इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता.’ यह अमित शाह द्वारा संविधान निर्माता अंबेडकर का अपमान माना गया था. अब भाजपा उन्हीं अंबेडकर के सम्मान में उतर आई है. भाजपा सरकार के मंत्री रहे ब्राह्मण वर्ग से आने वाले पत्रकार से नेता बने अरुण शौरी ने अपनी किताब ‘वर्शिपिंग फाल्स गौड्स’ में अंबेडकर की आलोचना की थी.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अंबेडकर के विचारों में काफी मतभेद रहे हैं. अब भाजपा इन को ‘जोड़ने’ करने की कोशिश कर रही है. अंबेडकर समानता यानी इक्वैलिटी पर जोर देते थे. दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समरसता की बात करता है. इन दोनो के विचारो में अंतर है.

इक्वैलिटी यानी समानता और समरसता यानी हार्मोनी के बीच जो अंतर है, वही अंतर अंबेडकर और संघ के बीच भी है. संघ वर्चस्व के उद्देश्य के लिए सद्भाव की अवधारणा का उपयोग करता है, जबकि अंबेडकर समानता की अवधारणा का उपयोग आजादी के लिए करते थे.

अंबेडकर की अवधारणा में समानता में जीवन को सम्मान के साथ समान अधिकारों की वकालत की गई है. अंबेडकर का समता का लक्ष्य और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की समरसता को एकसमान नहीं माना जा सकता है. समरसता का मतलब है एक होना और समता का मतलब है एकसमान होना है. समरसता कायम करने के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समानता पहली शर्त है.

भाजपा इस का कहीं पालन करते नहीं दिखती है. अंबेडकर का अंतिम लक्ष्य धर्मांतरण नहीं, जाति उन्मूलन था. उन्होंने 1935 में हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा की और 1956 में बौद्ध धर्म अपना लिया था.

अब भाजपा अंबेडकर की मूर्तियों पर छत्र लगा कर उन को छत्रपति बनाना चाहती है. हिंदू धर्म में छत्र का अपना महत्त्व है. इस को ब्राह्मण, राजा और शंकराचार्य ही धारण करते हैं. छत्र के सहारे बाबा साहब को धार्मिक चोले में रखने की तैयारी  की जा रही है.

दलित समाज के नौजवानों को नौकरी और कारोबार करना है, ऐेसे में केवल बड़े महापुरुषों का महिमामंडन करने से वह वोट नहीं देने वाला है. उसे समानता चाहिए जहां उस के साथ जाति का भेदभाव और उत्पीड़न न हो सके. केवल अंबेडकर की मूर्तियां लगाने से वह वोट नहीं देने जा रहा है. Politics

Social Inequality: पूरन कुमार की मौत: ऊंचे ओहदे पर भारी जाति के सवाल

Social Inequality, लेखक – शकील प्रेम

एससी तबके को सताने की खबरें आएदिन अखबारों में छपती रहती हैं. कहीं दूल्हे को घोड़ी पर नहीं चढ़ने दिया जाता है, तो कहीं किसी एससी को बेरहमी से पीटा जाता है. यह आम एससी समाज के हालात हैं.

कहते हैं कि आम और खास में फर्क होता है, लेकिन दुख तो इस बात का है कि इस तबके को सताने के मामले में आम और खास में कोई फर्क नहीं दिखता. एससी अगर आईपीएस अफसर भी बन जाए, तो वहां भी उस का शोषण होता है. एससी अगर राष्ट्रपति भी हो तो भी दबाया जाता है. सेना, पुलिस, यूनिवर्सिटी या देश का कोई भी इंस्टिट्यूटशन हो, हर जगह एससी तबके के साथ भेदभाव और शोषण होता ही है. बस, सताने के तरीके बदल जाते हैं.

7 अक्तूबर, 2025 को हरियाणा के सीनियर आईपीएस अफसर वाई. पूरन कुमार ने चंडीगढ़ के सैक्टर 11 के अपने सरकारी आवास के बेसमैंट में अपनी सर्विस रिवौल्वर से खुद को गोली मार कर खुदकुशी कर ली थी.

वाई. पूरन कुमार 2001 बैच के एडीजीपी रैंक के अफसर थे. 8 पन्नों के सुसाइड नोट में उन्होंने 8 आईपीएस और 2 आईएएस अफसरों के नाम लिए थे. इस नोट के मुताबिक इन तमाम बड़े अफसरों ने उन्हें लगातार सताया था.

सुसाइड नोट में वाई. पूरन कुमार ने कैरियर में भेदभाव और अपने सीनियरों के द्वारा जातिवादी बरताव का जिक्र किया था. उन की पत्नी आईएएस अमनीत पी. कुमार ने भी अपनी शिकायत में कहा था कि उन के पति की खुदकुशी ‘सिस्टमैटिक उत्पीड़न’ का नतीजा है.

वाई. पूरन कुमार की खुदकुशी से 24 घंटे पहले उन के गनमैन हैड कांस्टेबल सुशील कुमार को रोहतक में शराब कारोबारी से ढाई लाख रुपए रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. पूछताछ में गनमैन ने
वाई. पूरन कुमार का नाम लिया था.

गनमैन सुशील कुमार के इसी बयान के आधार पर एफआईआर दर्ज हुई.

वाई. पूरन कुमार की पत्नी अमनीत पी. कुमार ने इस एफआईआर को एक साजिश बताया और उन्होंने कहा, ‘पूरन कुमार पहले से ही सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाते रहे थे. उन्होंने कोर्ट में कई याचिकाएं और शिकायतें लगाई हुई थीं, जिस से वे बड़े अफसरों के लिए मुसीबत बने हुए थे, इसलिए उन्हें रिश्वतखोरी की झूठी साजिश में फंसाया गया.’

वाई. पूरन कुमार ने अपने सुसाइड नोट में आला अफसरों पर जो गंभीर आरोप लगाए हैं, वे बेहद चिंताजनक हैं. एससी समाज के अफसरों को प्रशासनिक तौर पर किस तरह का उत्पीड़न झेलना पड़ता है, वाई. पूरन कुमार इस बात का उदाहरण हैं.

वाई. पूरन कुमार की खुदकुशी के कुछ ही दिनों के अंदर रोहतक में हरियाणा पुलिस के एएसआई संदीप कुमार लाठर ने सर्विस रिवौल्वर से खुद को गोली मार कर खुदकुशी कर ली. संदीप कुमार ने 6 मिनट का वीडियो और 4 पन्नों का सुसाइड नोट छोड़ा. इन में उन्होंने वाई. पूरन कुमार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए. इस घटना से एडीजीपी वाई. पूरन कुमार की खुदकुशी का मामला और पेचीदा हो गया है.

एससी समाज से निकले आईपीएस वाई. पूरन कुमार भ्रष्टाचार में शामिल थे या नहीं यह तो जांच के बाद ही पता चल पाएगा, पर अगर वे भ्रष्ट अफसर थे तो भी उन के साथ हुए जातीय भेदभाव से इनकार नहीं किया जा सकता.

अगर वाई. पूरन कुमार जैसे बड़े सरकारी अफसर ही जातिवाद की सोच का शिकार हो सकते हैं, तो निचले लैवल पर एससी मुलाजिमों के हालात का अंदाजा लगाना भी मुश्किल है. एससी तबके को कार्पोरेट सैक्टर में भी कोई राहत नहीं है. वहां भी हर लैवल पर भेदभाव होता है.

विवेक राज जो बैंगलुरु में एक कार्पोरेट अफसर थे. वे लाइफस्टाइल इंटरनैशनल प्राइवेट लिमिटेड में पोस्टेड थे. विवेक राज को उन के अपर कास्ट सीनियरों द्वारा इतना उत्पीड़न झेलना पड़ा कि उन्होंने साल 2023 में खुदकुशी कर ली थी. पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज की गई थी, लेकिन कोई गिरफ्तारी नहीं हुई.

पिछले 10 सालों में आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों में 20 से ज्यादा एससी छात्रों ने जातिवाद के चलते खुदखुशी की. वैसे भी एससी छात्रों के साथ जाति आधारित भेदभाव तो प्राथमिक कक्षाओं से शुरू हो जाता है. यही वजह है कि देश की बड़ी यूनिवर्सिटियों तक एससी तबके के छात्रों का पहुंचना भी मुश्किल होता है.

एससी तबके के छात्रों का प्राइमरी लैवल से ऊंची पढ़ाई तक पहुंचने का फीसदी काफी कम है. ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 2023-24 में एससी छात्रों का ग्रौस इनरोलमैंट रेशियो प्राइमरी लैवल (कक्षा 1-5) पर 96.8 फीसदी, सैकंडरी लैवल (कक्षा 9-10) पर 80.6 फीसदी और हायर सैकंडरी लैवल (कक्षा
11-12) पर 57.9 फीसदी है. इस के बाद ऊंची पढ़ाईलिखाई (18-23 साल) में एससी छात्रों का ग्रौस इनरोलमैंट रेशियो महज 25.9 फीसदी है.

इस का मतलब है कि प्राइमरी लैवल से शुरू करने वाले एससी छात्रों में से तकरीबन 26 फीसदी ही देश की बड़ी यूनिवर्सिटियों या उच्च शिक्षा संस्थानों तक पहुंच पाते हैं, जबकि बाकी स्टूडैंट्स इस से आगे नहीं बढ़ पाते.

देश के टौप संस्थानों जैसे आईआईटी या आईआईएम में पहुंचने वाले स्टूडैंट्स का फीसदी तो 0.1 फीसदी से भी कम है, क्योंकि इन टौप की यूनिवर्सिटियों में सीटें सीमित होती हैं और रिजर्वेशन के बावजूद कंपीटिशन ज्यादा होता है.

इतनी जद्दोजेहद के बाद कुछ छात्र इन यूनिवर्सिटियों तक पहुंच भी गए तो उन्हें हर कदम पर जातिवाद झेलना पड़ता है या उन की संस्थागत हत्याएं कर दी जाती हैं. साल 2016 में रोहित वेमुला और साल 2023 में दर्शन सोलंकी इस बात के उदाहरण हैं.

घोड़ी चढ़ने का हक नहीं

गुजरात के सांदीपाडा गांव में आकाश कोटडिया नाम के एससी नौजवान की शादी थी. गांव के ही कुछ ऊंची जाति के लोगों ने आकाश को शादी के दौरान घोड़ी पर चढ़ने से मना कर दिया. मामला इतना बढ़ा कि पुलिस को अतिरिक्त बल बुलाना पड़ा.

हालांकि, यह मामला फरवरी, 2020 का है, लेकिन इस मामले में खास बात यह है कि आकाश आर्मी का जवान था और जम्मूकश्मीर में तैनात था. वह कुछ दिन पहले छुट्टी ले कर शादी के लिए गांव आया था.

16 दिसंबर, 2024 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक दलित पुलिस कांस्टेबल के बेटे नंदराम सिंह की बरात के दौरान ऊपरी जाति के तकरीबन 40 लोगों ने हमला किया. उन्होंने दूल्हे को घोड़ी से जबरन उतार दिया. जातिवादी गालियां दीं. डीजे सिस्टम तोड़ा. औरतों से छेड़छाड़ की और बरातियों पर पथराव किया. इस मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और 5 लोगों को गिरफ्तार किया.

फरवरी, 2022 को मध्य प्रदेश के छतरपुर में 24 साल के दलित पुलिस कांस्टेबल दयाचंद अहिरवार की बरात में ऊपरी जातियों ने जम कर हंगामा किया और दूल्हे को घोड़ी से उतार दिया. अगले दिन प्रशासन ने भारी पुलिस सुरक्षा में उन्हें घोड़ी पर चढ़ाया.

इन तीनों मामलों में दूल्हे आर्मी या पुलिस में थे, इसलिए इन तीनों मामलों में पुलिस ने सक्रिय भूमिका निभाई और मामला सुर्खियों में आया. आम एससी तबके के ऐसे अनेक मामले तो खबरों में ही नहीं आ पाते या इन मामलों में कोई मुकदमा ही दर्ज नहीं होता.

इन वारदात को रोकने के लिए कई जिलों में ‘समानता समितियां’ बनाई गई हैं और एससी दूल्हों को पुलिस सुरक्षा दी जाती है फिर भी हर साल दर्जनों ऐसे मामले दर्ज किए जाते हैं.

संविधान के अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता को गैरकानूनी घोषित किया गया है, लेकिन एनसीआरबी डाटा के मुताबिक हर 20 मिनट में एससी तबके के खिलाफ ऐसे अपराध दर्ज होते हैं.

राष्ट्रपति होते हुए जातीय भेदभाव

रामनाथ कोविंद, जो 2017 से साल 2022 तक भारत के 14वें राष्ट्रपति रहे, केआर नारायणन के बाद वे भारत के दूसरे ऐसे राष्ट्रपति थे जो एससी तबके से आते थे. वे भाजपा द्वारा समर्थित राष्ट्रपति थे. यही वजह थी कि रामनाथ कोविंद की नियुक्ति को भाजपा ने ‘दलित उत्थान’ के प्रतीक के रूप में पेश किया था.

साल 2018 में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जगन्नाथ पुरी मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करना चाहते थे, लेकिन मंदिर के पुजारियों ने उन्हें रोक दिया था. मंदिर के परंपरागत नियमों के अनुसार गैरहिंदू या निचली जाति के लोगों को गर्भगृह में जाने की इजाजत नहीं है.

इसी तरह वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, जो संथाल जनजाति से आती हैं, भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति हैं, जो 2022 में राष्ट्रपति चुनी गईं.

जून, 2023 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दिल्ली के श्री जगन्नाथ मंदिर में पूजा की. एक तसवीर वायरल हुई, जिस में वे मंदिर के गर्भगृह के बाहर पूजा करती दिखीं, जबकि केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव और धर्मेंद्र प्रधान गर्भगृह के अंदर पूजा करते दिखे. आदिवासी होने के कारण उन्हें गर्भगृह में प्रवेश नहीं दिया गया.

हालांकि, विवाद बढ़ने पर मंदिर के पुजारियों ने साफ किया कि राष्ट्रपति के साथ कोई भेदभाव नहीं हुआ, बल्कि उन्होंने ऐसा करते हुए सामान्य प्रोटोकौल का पालन किया.

सितंबर, 2023 में नए संसद भवन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया. इस दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को न्योता ही नहीं दिया गया, जबकि देश का राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों का सर्वोच्च प्रतिनिधि होता है. इस हिसाब से नए बने संसद का उद्घाटन राष्ट्रपति को ही करना चाहिए.

तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ हुए इस भेदभाव को ‘सनातन धर्म आधारित जातीय भेदभाव’ कहा और दावा किया कि आदिवासी महिला होने के चलते उन्हें इस समारोह से दूर रखा गया.

इस राष्ट्रपति के साथ जातीय भेदभाव

केआर नारायणन भारत के 10वें राष्ट्रपति (1997से 2002) थे, जो एससी बैकग्राउंड से आए थे. वे केरल के उ झावूर गांव में एक अछूत परिवार में जनमे थे. उन की पूरी जिंदगी भारत की जाति व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष की मिसाल है. उन्होंने प्राइमरी ऐजूकेशन से ले कर हायर ऐजूकेशन और फिर लैक्चरर की नौकरी तक में सताया जाना और भेदभाव झेला और राष्ट्रपति बनने के बाद भी वे जातीय तानों का शिकार बने रहे.

साल 1943 में ट्रावणकोर यूनिवर्सिटी (अब केरल यूनिवर्सिटी) से एमए करने के बाद केआर नारायणन को उन की जाति के चलते लैक्चरर की नौकरी से निकाल दिया गया था. डिगरी समारोह में भी उन्हें बेइज्जत किया गया था. अपने आत्मसम्मान के लिए उन्होंने डिगरी लेने से ही इनकार कर दिया था.

बाद में, राष्ट्रपति बनने पर केआर नारारणयन उसी यूनिवर्सिटी में लौटे और अपने भाषण में उन्होंने कहा था, ‘‘मैं उन जातिवादियों को यहां नहीं देख पा रहा हूं, जिन्होंने मु झे अछूत होने के चलते नौकरी से निकाल दिया था.’’

साल 1948 में लंदन स्कूल औफ इकोनौमिक्स से अपनी पढ़ाई पूरी कर के केआर नारायणन आईएफएस के लिए चुने गए थे, लेकिन यहां भी वे सताए जाने का शिकार हुए थे. भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) में प्रवेश के लिए उन्हें ऊपरी जातियों के अफसरों का विरोध झेलना पड़ा था. तब डाक्टर बीआर अंबेडकर की मदद से वे आईएफएस में शामिल हुए.

साल 1997 में भारत के 10वें राष्ट्रपति के चुनाव में केआर नारायणन को 95 फीसदी वोट मिले थे, लेकिन तब उन पर आरोप लगे थे कि उन का चुनाव एससी कोटे के चलते हुआ न कि उन की काबिलीयत से. एक विदेशी यात्रा के दौरान उन्हें जहर देने की साजिश रची गई थी. इस साजिश के लिए दक्षिणपंथी ताकतों की भूमिका नजर आई थी.

गुजरात दंगों को रोकने के लिए राष्ट्रपति केआर नारायणन ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से सेना भेजने की मांग की थी, लेकिन उन की बात पर कोई कार्रवाई नहीं हुई थी. यही वजह थी कि साल 2002 में दूसरे कार्यकाल के लिए उन का नाम प्रस्तावित हुआ, लेकिन भाजपा ने उन्हें दोबारा राष्ट्रपति नहीं बनने दिया था. केआर नारायणन ने बाद में इसे साजिश बताया था.

ओहदे पर जाति भारी

एससीएसटी तबका सदियों से अछूत रहा है. भारत के गांव अछूतों के लिए यातना केंद्र रहे हैं. यही वजह थी कि डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने अछूतों को शहरों में बस जाने पर जोर दिया. शहरों में बस जाने से अछूतपन खत्म नहीं होता, लेकिन गांवों की बजाय रोजगार के मौके ज्यादा थे.

आजादी के बाद एससी तबके ने बड़ी तादात में शहरों की ओर पलायन किया. राहत जरूर मिली, लेकिन शहरों में भी सताया जाना खत्म नहीं हुआ.

लोकतांत्रिक नियमों के मुताबिक पढ़ाईलिखाई के दरवाजे सब के लिए खुले थे, लेकिन अछूतों के लिए सामाजिक नियम इतने कठोर थे कि उन के लिए स्कूल तक पहुंचना आसान नहीं था. गांव हो या शहर एससी तबके की पढ़ाईलिखाई के मामले में दोनों जगह जातिवादी सोच कायम रही.

इस सब के बावजूद एससी तबके के लोग ऊंची तालीम की दहलीज तक पहुंचे और सिस्टम का हिस्सा बने, लेकिन उन्हें सताए जाने का दर्द भी झेलना पड़ा.

आज भी एससीएसटी तबके के लिए मुश्किलें कम नहीं हुई हैं. शुरुआती पढ़ाईलिखाई तक पहुंच आसान हुई है, लेकिन इस से आगे का रास्ता बेहद मुश्किल है. इन मुश्किल रास्तों पर चलते हुए कुछ लोग सिस्टम का हिस्सा बन भी रहे हैं, तो वहां भी जातिवाद उन का पीछा नहीं छोड़ रहा है. सब से बड़ा सवाल यह है कि क्या इस जातिवाद को खत्म करने का कोई समाधान है?

समाधान यही है की एससीएसटी तबके को पढ़ाईलिखाई की अहमियत को सम झना होगा. प्राइमरी लैवल की पढ़ाईलिखाई में 97 फीसदी एससी बच्चे पहुंच रहे हैं, लेकिन ऊंची पढ़ाईलिखाई में यही रेशियो महज 26 फीसदी रह जाता है.

एससी तबके को सब से पहले प्राइमरी से ऊंची पढ़ाईलिखाई के बीच के इस ड्रौपआउट रेशियो को कम करना होगा. जो समाज जितना कमजोर होता है, उस के लिए संघर्ष उतना ही बड़ा होता है.

यूनिवर्सिटी की पढ़ाई तक जितने ज्यादा एससी छात्र पहुंचेंगे, उन को सताया जाना उतना ही कम होगा. नौकरियों में भी ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी हासिल करनी होगी. हर लैवल पर संगठन को मजबूत करना होगा, ताकि भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई जा सके.

एससी तबके के सांसदों और विधायकों पर लगातार दबाव बनाए रखना होगा, ताकि वे सिर्फ सत्ता सुख न भोगें, बल्कि समाज के हित में काम करें. समय लगेगा, लेकिन हालात जरूर बदलेंगे.

रहनसहन में बदलाव जरूरी

एससीएसटी और मुसलिम तबके मुख्यधारा से कटे हुए नजर आते हैं, तो इस में किस का दोष है? भारत के कल्चर का हिस्सा होते हुए भी कल्चर से अलग दिखने की नौटंकी क्यों? यहीं से समस्याएं शुरू होती हैं.

एससीएसटी और मुसलिम तबका खुलेपन और नएपन से परहेज करता है. मुसलिम अपने अकीदों के आगे किसी तरह का सम झौता नहीं कर पाते तो एससी तबका भी इसी रास्ते पर निकल पड़ा है.

एससीएसटी और मुसलिम तबके को शहरों में घर किराए पर लेना मुश्किल होता है, तो इस की वजह सिर्फ मकान मालिकों के अंदर भेदभाव भरी सोच ही नहीं है. ये लोग खुद ही मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाते.

खानपान, पहनावा और रहनसहन की आदतें नहीं बदल पाते. साफसफाई के तौरतरीके नहीं सीख पाते. घर में लड़ाई झगड़े, घर की औरतों को पीटना, घर में हमेशा शोरशराबा होना और ज्यादा बच्चे होना यह आम बात होती है, इसीलिए इन्हें कोई किराए पर नहीं रखता.

वर्ग संघर्ष कितना जरूरी

दुनिया के किसी भी समाज में इनसानों की कीमत उस की प्रोडक्टिविटी से तय होती है. परिवार भी ऐसे ही चलते हैं. आज के समय परिवार में जो जितना प्रोडक्टिव होता है उस की इज्जत भी उसी हिसाब से होती है.

परिवार का जो सदस्य प्रोडक्टिव नहीं तो वह अपने परिवार में ही हाशिए पर चला जाएगा. कोई समाज अगर प्रोडक्टिव नहीं है, तो वह भी बाकी समाजों के बीच हाशिए पर चला जाएगा.

जो जाति या समाज टौप पर है, तो उस ने अपनी जायज या नाजायज प्रोडक्टिविटी को साबित किया है और जो जाति या समाज हाशिए पर है, वह अपनी प्रोडक्टिविटी को साबित नहीं कर पाया. यही लोग वर्ग संघर्ष की बात करते हैं. किसी भी संघर्ष की कीमत होती है. जिन के पास बहुतकुछ है वे आसानी से अपना दबदबा नहीं छोड़ेंगे और जिन के पास कुछ नहीं वे किसी भी संघर्ष के लायक भी नहीं हैं, इसलिए वर्ग संघर्ष की बात ही बेमानी है.

इज्जत और सा झेदारी के लिए अपने भीतर का संघर्ष जरूरी है. प्रोडक्टिविटी में भागीदार बनना जरूरी है. इस के लिए प्रोडक्टिव होना जरूरी है. आज जमाना बदल गया है. क्रांतियां किताबों में ही अच्छी लगती हैं. धरातल पर तो जू झना होता है. एससीएसटी और मुसलिम समाज को यह बात सम झनी होगी. बराबरी के हकदार बराबरी के लोग ही होते हैं. यह कड़वी हकीकत है.

‘घेटो’ की घुटन से बाहर निकलना जरूरी

16वीं सदी में इटली के वेनिस शहर में यहूदियों को अलगथलग इलाकों, जिन्हें ‘घेटो नुओवो’ (यहूदियों की नई बस्ती) कहा जाता था, में रहने के लिए मजबूर किया गया था. ये इलाके दूर से पहचाने जा सकते थे.

इटली से ही ‘घेटो शब्द इतना मशहूर हुआ कि यह अमेरिका के नीग्रो गुलामों की अलगथलग बस्तियों के लिए भी इस्तेमाल होने लगा. ब्रिटिश, डच और फ्रांसीसी उपनिवेशों में किसी कबीलाई समुदाय या धार्मिक अल्पसंख्यक को जबरन साथ रहने के लिए मजबूर किया जाता, तो यही इलाके घेटो बन जाते थे.

घेटो की घुटनभरी गलियों में कोई भी बाहरी नहीं घुसना चाहता था. अमेरिका में घेटो गुलामों की फैक्टरियां थीं, तो यूरोप के घेटो यहूदियों को अलगथलग रखने के डिटैंशन कैंप थे. यहां केवल एकजैसे लोग रहते थे, जो घेटो में पैदा होते और यहीं मर जाते थे.

आज भी शहरोंकसबों के आसपास ऐसे इलाके मौजूद होते हैं, जो अनपढ़ता, गरीबी और अपराध के लिए बदनाम होते हैं. ये इलाके आज के घेटो हैं. अमेरिका में अफ्रीकीअमेरिकी या हिस्पैनिक समुदाय के लोग जिन इलाकों में रहते हैं, उन्हें आज भी घेटो कहा जाता है.

भारत में भी ऐसे ‘घेटो’ की कमी नहीं है. यहां तो सदियों से घेटो मौजूद रहे हैं. गांव हो या शहर एससी तबके के लिए हर लैवल पर घेटो बनाए गए थे. शहरों के घेटो आगे चल कर झुग्गी झोंपडि़यों में बदल गए. हर गांव में एक घेटो नजर आ जाएगा.

शहरों में मुसलिम बहुल इलाकों को ही देख लीजिए. ये भी घेटो ही हैं. कई दलित बहुल महल्ले भी ऐसे ही हैं, जहां घुसने में भी घुटन होती है, जबकि वहां ये लोग आराम से जीते हैं. आज के इन घेटो की पहचान खराब बुनियादी ढांचे, अनपढ़ता, सेहत से जुड़ी सेवाओं की कमी और अपराध दर में बढ़ोतरी से होती है.

भारत के घेटो एससीएसटी और मुसलिमों के लिए किसी डिटैंशन कैंप से कम नहीं हैं. आखिर मजबूरी क्या है? घेटो की दीवारों को तोड़ कर मुख्यधारा तक पहुंचना मुश्किल तो नहीं है, लेकिन घेटो में जीने की आदत पड़ गई है. यहां से निकलने का एकमात्र जरीया पढ़ाईलिखाई है, लेकिन इन समाजों को तालीम की सम झ ही नहीं है.

समस्या आप की, हल भी आप ही निकालें

एससीएसटी तबके के साथ इतिहास में गलत हुआ या आज भी गलत हो रहा है, इस बात का रोना रोते रहने से कुछ नहीं बदलेगा. मुसलिम बादशाहों ने हजार साल तक इस देश पर हुकूमत की, इस बात पर इतराने से मुसलिमों के आज के हालात नहीं बदल जाएंगे. एससीएसटी तबके और मुसलिमों को यह तय करना होगा कि वर्तमान में उन के समाज की परफौर्मैंस और प्रोडक्टिविटी क्या है?

यह इस बात से तय होगा कि आप के समाज में पढ़ाईलिखाई और सम झदारी का लैवल क्या है?

पढ़ाईलिखाई और सम झदारी का रास्ता मुश्किल है, लेकिन इस के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं है. हालात का रोना रोते रहने से हालात नहीं बदलते. नेता आते हैं और अपना उल्लू सीधा कर गायब हो जाते हैं. समाज इन नेताओं का पिछलग्गू बना रहता है. समस्या आप की है, तो बदलाव भी खुद से शुरू करना होगा. Social Inequality

Equality Struggle: दलित नौजवान – अपनी मशाल खुद बनें

Equality Struggle: हर साल 14 अप्रैल को ‘अंबेडकर जयंती’ के मौके पर ‘नीला गमछा’ गले में लटका कर डाक्टर भीमराव अंबेडकर की एक हाथ में संविधान पकड़े और दूसरे हाथ से आसमान को उंगली दिखाती मूर्ति के ‘चरणों’ में झुक कर गुलाब या गेंदे के ‘लालपीले फूल’ चढ़ा देने भर से अगर आप ने काले फ्रेम का चश्मा और कोटपैंट पहने इस इनसान की सोच पकड़ ली है, तो आप गलत दिशा में जा रहे हैं. आप की इस इनसान को ले कर भ्रामक सोच आज भी कायम है.

डाक्टर भीमराव अंबेडकर को सम झने के लिए हमें जातिवाद के उस जहरीले सांप को सम झना होगा, जिस ने अपने अहंकार में आज तक अपनी केंचुली भी नहीं बदली है. हमें समाज की बेकार सोच के उस कूड़ेदान से वह आईना बाहर निकालना होगा, जिस में शूद्रों को उन की परछाईं तक नहीं दिखती है. कितने भयावह हालात हैं न?

एक उदाहरण से समझते हैं. एक समय देश के सब से ज्यादा पढ़ेलिखे लोगों में शुमार डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने संविधान को ले कर अपने एक भाषण में कहा था, ‘मैं यहां पर संविधान की अच्छाइयां गिनाने नहीं जाऊंगा, क्योंकि मु झे लगता है संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, वह अंतत: बुरा साबित होगा, अगर उसे इस्तेमाल में लाने वाले लोग बुरे होंगे. और संविधान कितना भी बुरा क्यों न हो, वह अंतत: अच्छा साबित होगा, अगर उसे इस्तेमाल में लाने वाले लोग अच्छे होंगे.’

किसी इनसान के अच्छा या बुरा होने की इस से ज्यादा सटीक व्याख्या नहीं हो सकती, क्योंकि यह बात वह आदमी भरी संसद में बोल रहा है, जिसे अपने बचपन से ले कर आज तक जाति के नाम पर दुत्कार, पीड़ा और नफरत ही मिली है. आज भले ही उस ने अपनी पढ़ाईलिखाई से अपने विचारों को ‘शुद्ध’ कर लिया है, पर जब वह यह शिक्षा पा रहा था, तब स्कूल में उसे ‘अशुद्ध’ होने का ‘जातिगत तमगा’ देने वालों ने पूरी ‘श्रद्धा’ से चाहा था कि ब्रह्मा के पैर से जन्मा यह ‘अछूत’ अपने पुश्तैनी काम के बो झ तले दब कर कीड़ेमकोड़े की तरह मरखप जाए.

अब आज की बात करते हैं. इसी साल सितंबर का महीना और जगह उत्तर प्रदेश का बाराबंकी जिला. वहां के मसौली थाना इलाके के मलौली मजरे डापलिन पुरवा के रहने वाले निचली जाति के उदयभान निर्मल के मुताबिक, वह यूपीएसआई (उत्तर प्रदेश पुलिस सबइंस्पैक्टर) की तैयारी कर रहा था और इस के लिए वह चौराहे पर बनी क्वांटम लाइब्रेरी में रोजाना पढ़ने के लिए जाता था.

आरोप है कि रविवार, 21 सितंबर को दोपहर 2 बजे के बाद लंच हुआ और खाना खाने के लिए सभी छात्र एकत्र हुए. इसी बीच उदयभान निर्मल ने गलती से किसी दूसरे छात्र का टिफिन छू दिया. उस ऊंची जाति के प्रदुम्न ने जातिगत नफरत दिखाते हुए टिफिन दूर फेंक दिया.

पीडि़त छात्र उदयभान निर्मल के मुताबिक, प्रदुम्न ने टिफिन फेंकते हुए कहा कि तुम नीची जाति के हो, मेरे साथ बैठ कर खाना नहीं खा सकते. तुम्हारा काम जूतेचप्पल की मरम्मत करना है, पढ़ाईलिखाई करना तुम्हारा काम नहीं है.

पीडि़त उदयभान निर्मल आगे ने बताया कि प्रदुम्न ने जातिसूचक अपशब्द और गाली देने के बाद दोस्तों को फोन कर के बुला लिया और उस की बेरहमी से पिटाई कर दी. आगे कुछ कार्रवाई करने पर जान से मारने की धमकी दी.

बेइज्जती और मारपीट से दुखी दलित छात्र उदयभान निर्मल ने मसौली थाने में तहरीर दे कर कार्रवाई की मांग की है.

उदयभान निर्मल का कहना है कि वह प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है, लेकिन ‘शिक्षा के मंदिर’ (लाइब्रेरी) में भी जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा, जो बेहद दुखद और शर्मनाक है.

उदयभान ने भले ही अपने नाम के आगे ‘निर्मल’ लगा है, पर वह प्रदुम्न जैसे अगड़ी जाति वालों के मन का मैल धो नहीं पा रहा है. लाइब्रेरी, जहां शांत रह कर शिक्षा हासिल की जाती है, वहां भी प्रदुम्न के मन में ‘जातिवाद का शोर’ इतना ज्यादा हावी था कि उसे उदयभान की हलकी सी छुअन भी स्वीकार नहीं हुई.

‘तुम्हारा काम जूतेचप्पल की मरम्मत करना है, पढ़ाईलिखाई करना तुम्हारा काम नहीं है’ वाली यह सोच प्रदुम्न में अचानक से नहीं जन्मी है, बल्कि इसे तो उस के बड़े ने पालपोस कर विरासत में दिया है कि भले ही देश कितनी भी तरक्की कर जाए, संविधान कितना भी मजबूत हो जाए, पर ये दोनों तुम्हारे जूते की नोक पर रहेंगे, क्योंकि तुम ‘बह्मा की श्रेष्ठ संतान’ हो, ‘ब्लू ब्लड’ हो. तुम देश और संविधान से भी ऊपर हो. यह ‘वैचारिक बुल्डोजर’ सदियों से वंचित समाज को रौंदता आया है.

यहां सवाल उठता है कि क्या जातिवाद को खत्म करने के लिए पढ़ाईलिखाई को वंचितों का हथियार बनाया जा सकता है? हां, पर हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि निचली जाति के लोगों में पढ़ाईलिखाई को ले कर सोच क्या बनी हुई है.

पढ़ाई करने से हम देश, समाज और दुनिया के प्रति जागरूक होते हैं, अच्छा रोजगार पाते हैं, चार लोगों में अपने विचार रखने की सोच बना पाते हैं, पर साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि जिस देश और समाज में हम रह रहे हैं, उस पर धार्मिक कट्टरता बहुत ज्यादा हावी हो गई है. हर किसी को अपनेअपने ईश्वर की तलाश सी रहती है. यही वजह है कि वंचित समाज ने भी डाक्टर भीमराव अंबेडकर में अपना ईश्वर तलाशना शुरू कर दिया है. यह मूर्तिपूजा का ही नया रूप है, क्योंकि इस तलाश में भीमराव अंबेडकर के विचार तो दब गए हैं.

पाखंडी पंडेपुजारी तो चाहते हैं कि उन के मंदिरों में वे भक्त ही भेड़ की तरह सिर झुकाए चले आएं, जिन में दानपात्र भरने की ताकत है, फिर चाहे वे किसी भी समाज, समुदाय और जाति के क्यों न हों. फटेहाल दलित अंबेडकर की मूर्ति में उल झे रहें, नीले गमछे के बो झ में दबे रहें, नेता के भाषणों को सुनने वाली भीड़ बने रहें और थोड़ा सा बरगलाने पर ढेर सारे वोट सियासी रहनुमाओं के बैलेट बौक्स में दान स्वरूप चढ़ा दें, यही काफी है. वे बिना सिर के (बेदिमाग) वोटबैंक हैं, जिन्हें सिर्फ चुनाव में चूना लगाया जाता है.

यह सियासी प्रपंच तब और ज्यादा बढ़ा, जब हर नेता को यह लगा कि दलित समाज डाक्टर अंबेडकर के नाम पर एकजुट हो गया है या हो सकता है. नेताओं ने इसे अपना ‘दलित प्रेम’ बताया पर हकीकत में ऐसा नहीं है. हर दल इस समुदाय से ‘सियासी स्वार्थ’ साध रहा है, इन के घर भोजन करने की नौटंकी कर रहा है, इन्हें ‘सुरक्षित सीट’ से टिकट दे रहा है, पर भला कुछ नहीं कर रहा. खुद इस समाज से निकले नेता भी कागजी शेर बन कर रह गए हैं. अगड़ों का ‘यैसमैन’ कहलाने में इन्हें अलग तरह का सुख मिलता है.

इस बात को इस उदाहरण से सम झते हैं. ‘फौरवर्ड प्रैस’ में कंवल भारती का एक लेख छपा था, जिस में उत्तर प्रदेश में हाथरस जिले की इगलास सुरक्षित सीट से साल 2017 में चुने गए विधायक राजवीर दिलेर का जिक्र किया गया था. इन के पिता किशन लाल भी 5 बार के विधायक और एक बार के सांसद थे. पढ़ाईलिखाई इन की ज्यादा नहीं है.

राजवीर दिलेर के बारे में पत्रकार आलोक शर्मा की एक रिपोर्ट अखबार ‘टाइम्स औफ इंडिया’ में छपी थी, जिस के मुताबिक ये सवर्णों के यहां जमीन पर बैठते हैं, चाय के लिए अपना कप अपने साथ रखते हैं और कहते हैं कि ‘मेरे बाप भी जातिवाद मानते थे, और मैं भी मानता हूं’.

राजवीर दिलेर का सुरक्षित क्षेत्र जाटों का इलाका है, जिन की तादाद 90,000 है. इन्हीं के वोटों पर इस दलित की जीत निर्भर करती है. क्या इस विधायक से दलितों के लिए काम करने की उम्मीद की जा सकती है?

शायद नहीं, क्योंकि ऐसे नेता भी वोटबैंक की ताकत सम झते हैं. इन्हें भले ही ‘सुरक्षित सीट’ मिल जाती है, पर जब तक दूसरी जातियों का हाथ इन के सिर पर नहीं आता है, तब तक इन का जीतना बड़ा मुश्किल होता है.

जब नेताओं का ऐसा गठजोड़ बनता है, तो दलित तबके के गरीब और अनपढ़ लोग तो क्या, अच्छे पढ़ेलिखे और ‘वैल सैटल्ड’ लोग भी तन और मन से हताश हो जाते हैं. हरियाणा में आईपीएस वाई. पूरन कुमार की खुदकुशी का मामला इसी प्रशासनिक और राजनीतिक अंधेरगर्दी का नतीजा है, जहां एक बड़ा अफसर 7 अक्तूबर, 2025 को चंडीगढ़ में गोली मार कर अपनी जिंदगी खत्म कर लेता है.

आईपीएस वाई. पूरन कुमार आंध्र प्रदेश के रहने वाले थे. उन का जन्म 27 अक्तूबर, 1977 को हुआ था. उन्होंने आईआईएम अहमदाबाद से पीजीडीएमसी किया था. इस के बाद उन्होंने यूपीएससी की तैयारी की और ऐग्जाम क्लियर किया. वे साल 2001 बैच के हरियाणा कैडर के आईपीएस अफसर थे.

फिलहाल वाई. पूरन कुमार रोहतक रेंज के आईजी थे. 29 सितंबर, 2025 को ही उन का ट्रांसफर हुआ था. उन्हें अब रोहतक के सुनरिया में पुलिस ट्रेनिंग कालेज में आईजी के तौर पर पोस्टिंग मिली थी.

वाई. पूरन कुमार कई सालों से सिस्टम से परेशान थे. मई, 2021 में उन्होंने अंबाला के एसपी के सामने तब के डीजीपी मनोज यादव के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी. उन का आरोप था कि उन्हें उन की जाति के चलते परेशान और सताया जाता है.

नवंबर, 2023 में वाई. पूरन कुमार ने तब के मुख्य सचिव संजीव कौशल से उस समय के गृह सचिव टीवीएसएन प्रसाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की इजाजत मांगी थी. उन्होंने आरोप लगाया था कि उन की जाति के चलते उन्हें गैर कैडर पद पर तैनात किया गया था.

पिछले साल अप्रैल में वाई. पूरन कुमार ने साल 2024 के हरियाणा विधानसभा चुनावों से ठीक पहले चुनाव आयोग के सामने एक शिकायत दर्ज कराई थी, जिस में उन्होंने आरोप लगाया था कि आचार संहिता लागू होने के बाद 2 एजीजीपी को डीजीपी और 2 आईजी को एडीजीपी के तौर पर प्रमोट किया गया था.

अपने सुसाइड नोट में आपीएस वाई. पूरन कुमार ने 8 आईपीएस और 2 आईएएस अफसरों पर आरोप लगाए थे. उन्होंने जिन पर आरोप लगाया था, उन में 8 आईपीएस अमिताभ ढिल्लों, मनोज यादव, पीके अग्रवाल, संदीप खिरवार, सिबास कविराज, संजय कुमार, पंकज नैन और डाक्टर रवि किरण आदि के नाम शामिल हैं. इन के अलावा 2 रिटायर्ड आईएएस राजीव अरोड़ा और टीवीएसएन प्रसाद का नाम भी है.

अब आप सोचिए कि इतने बड़े रैंक का बड़ा सरकारी अफसर, जिस पर अपने इलाके में शांति और भाईचारा बनाने का दबाव रहता है, वह अपनी जाति की हीनता के बो झ तले दबाया जा रहा था. वह भी ऐसे लोगों द्वारा जो उसी के ‘प्रशासनिक भाईबंधु’ थे.

तो क्या जातिवाद का यह जहरीला सांप कभी भी केंचुली नहीं उतरेगा? चूंकि हमारे समाज में जातपांत बहुत गहरे तक पैठ जमाए हुए है, तो लगता है कि फिलहाल यह दूर की कौड़ी है, पर यहां एक बात जो बहुत ज्यादा अहम है, वह है इस बहुजन समाज की आपसी एकता, जिसे पढ़ाईलिखाई से और ज्यादा मजबूत किया जा सकता है.

दूसरा तरीका यह है कि जहां आप रहते हैं, उस घर, गली, महल्ले को व्यवस्थित करें. लोगों को यह मत सोचने दें कि उन का गंदगी या गरीबी में रहना पिछले जन्म का पाप है, जिसे वे आज इस जन्म में भोग रहे हैं. दुनिया की कोई भी ताकत आप को साफसुथरा और आप के आसपास की जगह को ‘नीट एंड क्लीन’ बनाने से रोक नहीं सकती है.

तीसरा, अपने आसपास के लोगों में फैली सामाजिक बुराइयों को जड़ से खत्म करने का बीड़ा उठाएं. आप कोई बड़े अफसर बने हैं, तो यह मत सम झें कि अब निकलो इस नरक से जहां हमारी पुरानी पीढि़यां जानवर से बदतर जिंदगी गुजार कर मरखप गईं. इस उलट आप की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि समाज के इस हिस्से को कैसे अंधविश्वास, नशाखोरी, बेरोजगारी, आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने से रोका जाए.

रास्ता दिखाने के लिए एक के हाथ में ही मशाल होना काफी है. अपनी मशाल खुद बनें. जातिवाद के अंधेरे से निबटने का यही एकमात्र रास्ता है. Equality Struggle

Bihar Elections 2025: दलितमुसलिम बनाम पुराणवादी व्यवस्था का चुनाव

Bihar Elections 2025: साल 2014 में जब बिहार की राजनीति भारी उथलपुथल के दौर से गुजर रही थी, तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक अहम फैसला लेते हुए भाजपा के सहयोग से महादलित मुसहर समुदाय से आने वाले नेता जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया था.

यह कोई उदारता नहीं थी, बल्कि नीतीश कुमार की मजबूरी हो गई थी, क्योंकि लोकसभा चुनाव में उन की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) 40 में से केवल 2 सीटें ही जीत पाई थी.

अपने खिलाफ पनप रहे चौतरफा असंतोष और विरोध को काबू करने के लिए उन का यह टोटका तात्कालिक तौर पर कामयाब रहा था, लेकिन दिक्कत उस वक्त खड़ी हो गई, जब जीतनराम मां झी अपने वादे से मुकर गए और यह तक कहने लगे थे कि मैं कोई रबर स्टांप सीएम नहीं हूं.

जीतनराम मांझी के मुख्यमंत्री बन जाने से हुआ क्या, दलितों के लिहाज से इस के कोई खास माने नहीं, क्योंकि उन्होंने भी दलितों के भले के लिए कुछ नहीं किया. 9 महीने के अपने कार्यकाल में जीतनराम मां झी ने जो बड़ी गलतियां की थीं, उन में से एक थी मंदिर जाना.

यों किसी भी मुख्यमंत्री का मंदिर जाना कोई हैरत की बात नहीं होती, लेकिन उन का जाना जरूर हैरत की बात थी, क्योंकि वे वक्तवक्त पर खुद को न केवल नास्तिक कहते रहे हैं, बल्कि मनुवाद सहित हिंदू धर्मग्रंथों की भी आलोचना करते रहे हैं.

मुख्यमंत्री रहते हुए जीतनराम मांझी ने साल 2015 में कहा था, ‘‘मैं भगवान में विश्वास नहीं करता क्योंकि अगर भगवान होते तो दलितों पर इतना अत्याचार क्यों होता? मंदिरों में अब भी दलितों को भेदभाव झेलना पड़ता है, इसलिए मु झे मंदिरों में कोई आस्था नहीं.’’

21 सितंबर को जीतनराम मांझी ने रामायण की कहानी को काल्पनिक बताया और 2 महीने बाद ही 19 दिसंबर को एक सभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘मैं राम में विश्वास नहीं करता. राम कोई व्यक्ति नहीं था.’’

अंबेडकर जयंती के मौके पर बोलते हुए जीतनराम मांझी ने दलितों को धार्मिक कर्मकांडों से दूर रहने का मशवरा भी दिया था. 17 मार्च, 2023 को उन का एक बयान था, ‘‘रामायण एक काल्पनिक कृति है. रावण राम से अधिक मेहनती और कर्मकांड में निपुण था.’’

इस पर जब हिंदूवादी संगठनों ने उन्हें घेरा तो उन का बयान था कि दलितों को मंदिरों में प्रवेश न देने वाले धर्म के ठेकेदारों को भी आलोचना का सामना करना चाहिए.

जीतनराम मांझी अगर अपनी बातों और बयानों पर टिके रहते तो तय है कि बड़े राष्ट्रीय नेता होते, लेकिन नीतीश कुमार और भाजपा ने उन की इतनी दुर्गति कर दी है कि मौजूदा चुनाव में वे अपने मनमुताबिक सौदेबाजी भी नहीं कर पाए. उन का और उन की हम पार्टी का क्या हुआ, यह तो नतीजे बताएंगे, पर अकसर भाजपा को दलितों की बदहाली का जिम्मेदार ठहराते रहने वाले जीतनराम मां झी और उन के जैसे दलित नेता भी इस गुनाह के कम जिम्मेदार नहीं हैं, जो अपनी खुदगर्जी के लिए जब चाहे रामनामी चादर ओढ़ लेते हैं. इन्हीं तथाकथित ‘नास्तिक’ जीतनराम मां झी की मुख्यमंत्री रहते ही एक मंदिर में जो बेइज्जती हुई थी, तो वे तिलमिला उठे थे.

बेआबरू होते दलित नेता

मामला अगस्त, 2014 का है जब जीतनराम मां झी औररंगाबाद के देव मंदिर में दर्शन और पूजन के लिए चले गए थे. यह सूर्य मंदिर है जहां छठ के दिन बेतहाशा भीड़ उमड़ती है. पूजन और दर्शन की उन की मंशा पूरी नहीं हो पाई, क्योंकि मंदिर के पुजारियों और स्थानीय ब्राह्मण नेताओं ने उन्हें यह कहते हुए मंदिर में दाखिल होने से रोक दिया था कि भले ही वे मुख्यमंत्री हों लेकिन चूंकि दलित हैं, इसलिए सीधे मंदिर में जा कर पूजा नहीं कर सकते.

बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले की तर्ज पर मंदिर से दलित होने का ‘प्रसाद’ आम दलितों की तरह ले कर जीतनराम मां झी भुनभुना और तिलमिला कर यह कहते रह गए कि जो लोग बाहर मेरे पांव पड़ते हैं वही आज मु झे मंदिर में प्रवेश नहीं करने दे रहे हैं, लेकिन इस अपमान का बदला वे नहीं ले पाए, न ही ब्राह्मणों, पंडेपुजारियों और पुराणवादियों को कोई सबक या नसीहत दे पाए, उलटे मंदिर के बाहर से ही उन्होंने पूजापाठ किया था और तरस खाने वाली एक बात यह भी थी कि उन के जाने के बाद इस मंदिर को धो कर पवित्र किया गया था.

आज उसी ब्राह्मण और बनियावादी भगवा खेमे के साथ मिल कर जीतनराम मां झी चुनाव लड़ रहे हैं, जो सदियों से दलितों को प्रताडि़त करता रहा है, भेदभाव करता रहा है और आज भी उन का शोषण बदस्तूर कर रहा है.

अब भला कौन जीतनराम मां झी और उन जैसे दोहरे चरित्र वाले दलितों से पूछे और किस को वे बताएं कि इस देश में दलित होने के माने क्या होते हैं और क्यों दलित मंदिर जा कर पूजाअर्चना करने की ख्वाहिश और जिद पर अड़े रहते हैं, जबकि शोषण, भेदभाव और जातिगत भेदभाव के उद्गम स्थल यही मंदिर हैं, जहां राज कानून संविधान या उस के आर्टिकल 17 का नहीं, बल्कि पुराणवादियों का चलता है. इस से वे कोई सम झौता किसी भी शर्त पर नहीं करते. हां, तगड़ी दक्षिणा मिले तो दलितों को भी सवर्णों की तरह पूजापाठ करने की इजाजत दे देते हैं, वह भी अहसान की शक्ल में.

प्रसंगवश यह जान लेना जरूरी है कि यही जिद कभी राष्ट्रपति रहते रामनाथ कोविंद ने भी की थी. लेकिन इन पुराणवादियों ने बख्शा उन्हें भी नहीं था.

मामला 18 अक्तूबर, 2018 का है, जब वे अपनी पत्नी सविता कोविंद सहित पुरी के जगन्नाथ मंदिर गए थे. चूंकि मामला राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद का था, लेकिन उस पर बैठा व्यक्ति कोरी यानी दलित समुदाय का था, इसलिए हल्ला कम मचा, क्योंकि मामले पर लीपापोती कर दी गई थी, पर उन्हें भी प्रवेश से रोकने की कोशिश की गई थी, उन के साथ लगभग धक्कामुक्की की गई थी. सच जो भी हो लेकिन मंदिर के अंदर जाने की इजाजत उन्हें मिल गई थी.

ठीक उसी दिन यह खबर भी सुर्खियों में रही थी कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पुरी के जगन्नाथ मंदिर को एक लाख रुपए का दान दिया. मुमकिन है कि यह सौदा रहा हो.

ऐसी सौदेबाजियां समाज में अब बेहद आम हैं, जिन के तहत पंडेपुजारी पैसे वाले दलितों के घर मनमुताबिक दक्षिणा मिल जाने पर पूजापाठ करने के लिए चले जाते हैं, क्योंकि उन का सब से बड़ा भगवान यही पैसा होता है जिस के लिए सारे धार्मिक छलप्रपंच रचे गए हैं. ये वे शिक्षित और संपन्न हो गए दलित हैं जो अपना मसीहा तो भीमराव अंबेडकर को मानते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि अंबेडकर ने कई बार बहुत साफतौर पर नसीहत दलितों को दे रखी थी कि पुराणवादियों के अत्याचारों से छुटकारा चाहिए तो स्कूलकालेजों को मंदिर सम झो और संविधान को अपना धर्मग्रंथ मानो.

बसपा के संस्थापक कांशीराम ने मंत्र यही दिया था कि मंदिर और धर्मग्रंथ छोड़ो और सीधेसीधे मनुवादियों से राजनातिक स्तर पर भिड़ो, तो जीत भी सकते हो.

ऐसा होता दिखने भी लगा था लेकिन बसपा प्रमुख मायावती ने कैसे भाजपा के सामने हथियार डालते हुए घुटने भी टेक दिए, यह हर किसी ने देखा. यह ठीक है कि मायावती कभी मंदिर नहीं गईं लेकिन इस से उन के गुनाह पर परदा नहीं डल जाता.

बिहार में यही काम जीतनराम मांझी के बाद चिराग पासवान कर रहे हैं जिन के लिए उन के पिता रामविलास पासवान विरासत में अच्छीखासी सियासी पूंजी छोड़ गए हैं.

फिल्मों और क्रिकेट में नाकाम रहे चिराग पासवान ने अपने पिता के उसूलों को तोड़तेमरोड़ते भाजपा का हाथ थामने के लिए खुद को धार्मिक और कर्मकांडी साबित करते हुए पिता की तेरहवीं धूमधाम से की थी, अपना सिर मुंडाया था, गंगा पूजन किया, मृत्युभोज दिया और ब्राह्मण पूजन भी किया था, जबकि रामविलास पासवान का मानना था कि दलितों के पिछड़ेपन और शोषण की बड़ी वजह यही ढोंग और पाखंड हैं, इसलिए वे कभी इन चक्करों में नहीं पड़े और अपनी शर्तों पर भाजपा से सम झौता करते रहे.

लेकिन अब उलटा हो रहा है. चिराग पासवान इतने बेबस हो गए हैं कि भाजपा के इशारे पर नाचते रहने के सिवा उन के पास कोई रास्ता नहीं बचा.

बिहार के ये दोनों ही नेता भाजपा की गोद में बैठ कर मायावती की तरह वोट शिफ्टिंग वाला खेल खेलते हैं. एक तरह से देखा जाए तो सीधेसीधे पुराणवादियों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं.

90 के दशक के लालू राज में दलितपिछड़े साथसाथ थे और राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को अपना रोल मौडल मानते थे. लालू प्रसाद यादव जानतेसम झते थे कि न केवल दलित पिछड़ों, बल्कि मुसलिमों की भी सब से बड़ी दुश्मन पार्टी भाजपा ही है. लिहाजा, उन्होंने खुलेआम भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उन के मनुवाद के चिथड़े उड़ाते हुए इन दोनों समुदायों को साध लिया था.

मुसलिम भी कम परेशान नहीं

19 फीसदी मुसलिम आबादी वाले बिहार में मुसलिमों की हालत भी दलितों सरीखी ही है. वे भी मुख्यधारा से दूर हैं और पुराणवादियों के धार्मिक तिरस्कार, प्रताड़ना और अनदेखी के शिकार हैं.

इन का भी दलितों की तरह कोई सियासी बड़ा नेता नहीं है. आजादी के बाद यह वर्ग कांग्रेस को अपना हितैषी सम झ कर उसे वोट करता रहा, लेकिन लालू युग की शुरुआत से ही राजद का हो लिया.

लालू प्रसाद यादव की तो राजनीति ही यादवों के साथसाथ मुसलिमों के कंधों पर टिकी थी जिसे पुख्ता करने के लिए उन्होंने ‘एमवाय’ का नारा दिया था.

साल 2024 में बिहार में 7 बड़ी सांप्रदायिक घटनाएं दर्ज की गई थीं, जिन में कोई दर्जनभर मुसलिम मारे गए थे. हिंदू तीजत्योहारों पर तो मुसलिमों की शामत सी आ जाती है. मुसलिम बहुल इलाकों से जब हिंदुओं के जुलूस वगैरह निकलते हैं, तो मुसलिम दुआ मांगने लगते हैं कि सब कुछ ठीकठाक निबट जाए, नहीं तो खैर नहीं.

नीतीश राज से उन्हें कोई एतराज या परेशानी नहीं होती, लेकिन जब भी नीतीश राम भक्तों की पार्टी के पहलू में जा बैठते हैं तो मुसलिम खुद को पहले से ज्यादा असुरक्षित और असहज महसूस करने लगते हैं.

मोदी राज में बंगलादेशी घुसपैठियों के नाम पर बिहार में मुसलिमों को निशाने पर अकसर लिया जाता रहा है. पूर्वी सीमांचल के जिलों कटिहार और किशनगंज में तो यह आएदिन की बात हो गई है जहां के मुसलिम खुद को पराया सम झने लगे हैं.

90 फीसदी मुसलिम रोज कमानेखाने वाले हैं, जो छोटेमोटे काम कर के जैसेतैसे गुजारा करते हैं. एसआईआर में दलितों के साथ मुसलिमों के नाम सब से ज्यादा कटे हैं, जिस पर कांग्रेस और राजद ने जम कर बबाल काटा था.

चुनाव आतेआते यह बहुत बड़ा मुद्दा नहीं रह गया है, लेकिन मुसलिम तबका मन बना चुका है कि अब भाजपा से चार हाथ दूर ही रहना है और जनता दल (यू) से भी परहेज करना है.

न केवल धर्म बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी मुसलिम और दलित एकदूसरे को नजदीक महसूस करते रहे हैं. 90 के दशक में दोनों ने दिल से लालू प्रसाद यादव को वोट किया था. इस के बाद नीतीश कुमार पर भी उन्होंने भरोसा जताया और पिछले चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी के साथ यह सोचते हो गए थे कि शायद वे हमे सुरक्षा दे पाएं. पर जल्द ही साफ हो गया कि ओवैसी बिहार में मुसलिम वोटों की फसल काटने आए थे, जिन की कोई जमीनी पकड़ या संगठन नहीं है. सभी से मोह भंग होने के बाद इस बार फिर यह तबका महागठबंधन की तरफ झुक रहा है, क्योंकि ज्यादातर दलित भी अब जद (यू) पर भरोसा नहीं कर रहे.

साथ होंगे दलितमुसलिम

मंडल कमीशन के बाद कमंडल की राजनीति बिहार में दूसरे हिंदीभाषी राज्यों की तरह परवान नहीं चढ़ पाई थी, तो लालू प्रसाद यादव इस की एक बड़ी वजह थे. उन की हरमुमकिन कोशिश भाजपा को रोकने की रही, क्योंकि इस के खतरे और नुकसान उन्हें सम झ आ रहे थे कि अगर कभी धोखे से भी भाजपा अपने दम पर बिहार की सत्ता पर काबिज हो पाई तो बिहार में भी पूरी तरह ब्राह्मण राज कायम हो जाएगा.

साल 2020 के चुनाव नतीजों पर नजर डालें तो साफ हो जाता है कि न केवल दलित बल्कि मुसलिम वोट भी बंटे थे. इस चुनाव में राजग को 125 सीटें मिली थीं जिन में से भाजपा को 74 और 43 जनता दल (यू) के खातें में गई थीं. हम और वीआईपी के खाते में 4-4 सीट आई थीं.

महागठबंधन में राजद को 75 और कांग्रेस को 19 सीटें मिली थीं, तो वामपंथी दल 16 सीटें ले जाने में कामयाब रहे थे. लोजपा को गिरते पड़ते एक सीट जमुई की मिल पाई थी, लेकिन ओवैसी की एआईएमआईएम को उम्मीद से ज्यादा 5 सीटें मिली थीं. हालांकि, बाद में उस के 4 विधायक राजद में चले गए थे. हैरत की बात महागठबंधन का वोट शेयर 37.5 फीसदी राजग के 37.3 फीसदी से 0.2 फीसदी ज्यादा होना रहा था.

इस चुनाव में चिराग पासवान की मंशा राजद के वोट काटने की ज्यादा थी, जिस में वे कामयाब भी रहे थे. कोई 15 सीटों पर लोजपा ने राजद के वोट काटे थे, जिन में दलितमुसलिम वोट ज्यादा थे. हालांकि, राजद से कहीं ज्यादा नुकसान जद (यू) को उठाना पड़ा था, लेकिन उस की भरपाई भाजपा ने कर दी थी.

महागठबंधन को दूसरा बड़ा नुकसान एआईएमआईएम ने पहुंचाया था, क्योंकि मुसलिम बहुल सीटें जो राजद और कांग्रेस को मिलनी तय मानी जा रही थीं, उन्हें ओवैसी की पार्टी झटक ले गई थी.

इस जीत ने साफ कर दिया था कि एआईएमआईएम को मुसलिमों के साथ साथ दलित वोट भी मिले हैं. हालांकि, 4 विधायकों के पाला बदल लेने से एआईएमआईएम की साख पर बट्टा ही लगा था. मुसलिमों को सम झ आ गया था कि इस पार्टी से उन के भले की उम्मीद करना बेकार की बात है.

बिहार में मुसलिम वोट तकरीबन 18 फीसदी और दलित वोट 19 फीसदी हैं, जो निर्णायक है और महागठबंधन के पाले में जाना तय हैं, जिस की दावेदारी 14 फीसदी यादव वोटरों की भी है. इस तरह 51 फीसदी वोट अगर महागठबंधन को मिलते हैं, तो उसकी राह में कोई रोड़ा है नहीं.

लेकिन यही अंदाजा पिछले चुनाव में भी सियासी पंडितों का था जो पूरी तरह गलत नहीं निकला था, क्योंकि मामूली ही सही पर महागठबंधन का वोट फीसदी राजग से ज्यादा था. एआईएमआईएम ने 1.25 फीसदी मुसलिम वोटों और 5 सीटों को हथियाया था तो हम और लोजपा ने कोई 7 फीसदी दलित वोटों को अपने पाले में लाने में कामयाबी हासिल कर ली थी.

इस बार इन वोटों में सेंधमारी करने की कोशिश पीके के नाम से मशहूर प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी कर रही है. लेकिन दलितमुसलिम दोनों ही दूध के जले हैं, लिहाजा छाछ होंठों तक ले जाने की हिम्मत जुटा पाएंगे, ऐसा लग नहीं रहा.

शुरू में ऐसा लग रहा था कि भूमिहार होने के चलते पीके केवल 15 फीसदी सवर्ण वोटों में सेंध लगाएंगे, लेकिन चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही उन का दखल दलितमुसलिम बहुल बस्तियों और सीटों में बढ़ा तो साफ हो गया कि उन की असल मंशा क्या है.

वैसे भी बिहार में अनिश्चितता का माहौल है खासतौर से दलितमुसलिम ज्यादा सहमे हुए हैं, जिन्हें प्रशांत किशोर लुभाने की कोशिश कर तो रहे हैं, लेकिन उन के पास कोई ठोस आधार नहीं है सिवा बातों, वादों और आश्वासनों के. ऐसे में वे खुद को बिहार का अरविंद केजरीवाल साबित कर पाएंगे, ऐसा लग नहीं रहा क्योंकि उन के पीछे न कोई अन्ना हजारे है और न ही बड़ा कोई आंदोलन है, जो लोगों का मन बदल सके.

बिहार में बहुतकुछ साफ भी है कि पुराणवादियों का दबदबा खत्म होना चाहिए और इस के लिए दलितमुसलिम एकजुट हो गए तो राजग को झटका भी लग सकता है, क्योंकि नीतीश कुमार अब सिर्फ 3 फीसदी कुर्मियों के नेता रह गए हैं और सेहत भी उन का साथ नही दे रही. राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने संविधान का हवाला और वास्ता दे कर आगाज तो अच्छा कर दिया है. Bihar Elections 2025

Untouchability: फलफूल रही है छुआछूत

Untouchability: राजग सरकार का खुला नारा है कि न स्कूल, न अस्तपाल, न सड़क, न पुल बस मंदिर ही मंदिर. अगर कभी प्योर मंदिर विरोधी रहे रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान अपनी मरजी से या दलित होने की वजह से नहीं बुलाए जाने पर सीतामढ़ी में जानकी मंदिर के बनाने पर हुए पाखंड में मौजूद नहीं थे तो अच्छा ही कहा जाएगा.

सदियों से दलितों को, जिन्हें वर्णव्यवस्था में मनुष्यों से भी बाहर रखा गया है, अगर आज भी देशभर के गांवों में, कसबों में, शहरों की स्लम बस्तियों में, स्कूलों, कालेजों में, दफ्तरों में नीचा दिखाने की कोशिश की जाती रहती है तो इसलिए कि 1932 के गोल मेज सम्मेलन के बाद गांधी अंबेडकर पूना पैक्ट और संविधान के बावजूद दलित अपनी पहचान बनाने और समझने को तैयार नहीं हैं.

जो सताया गया है, लड़ाई उसे लड़ने होती है. उसे सताने वालों की भीड़ में शामिल हो कर बचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.

यह चालबाजी की सफलता है कि जो पौराणिक ग्रंथों में समाज से बाहर माने गए. जिन्हें मुगलों और अंगरेजों ने थोड़ी इज्जत भी दी, वे आजादी के 75 साल बाद आज भी, उसी तरह छुआछूत, मजाक, पिटाई, लूट, शोषण के शिकार हैं और उसी पौराणिक सोच की वजह से आज भी उसे कर्मों का फल मानते हैं.

बहुजन समाज पार्टी की मायावती, रामनाथ कोविंद, प्रकाश अंबेडकर, सोनकर शास्त्री खुद व उन के पुत्र, वे बीसियों सांसद व विधायक जो राममंदिर लहर में रिजर्व सीटों से मंदिर वाली पार्टी से जीत कर अपना कल्याण आम दलितों की इज्जत की लाशों पर करते आ रहे हैं, कभी समझ नहीं पाएंगे कि वे कैसे ठगे जा रहे हैं.

हर दलित नेता आसानी से बिका और फिर उदित राज की तरह निकाल फेंका गया. चिराग पासवान को भी अपमान का सामना करना पड़ा था जब दिल्ली में रामविलास पासवान के मकान का सामान निकाल बाहर सड़क पर पटक दिया गया था. जब चिराग पासवान ने मंदिर पार्टी फिर जौइन कर ली तो ही इज्जत मिली.

अब अगर वे किसी वजह से जानकी मंदिर के कार्यक्रम में मौजूद नहीं थे तो उन्हें भी समझ लेना चाहिए, उन के वोटरों को भी कि इस देश के सत्ताधारी अभी भी दलितों को बराबरी की जगह देने को तैयार नहीं हैं.

इस में बड़ी बात नहीं हैं. चुनाव आतेआते उन्हें मना लिया जाएगा और औकात भी दिखा दी जाएगी. साम
दाम दंड भेद हमारे यहां सब से ज्यादा दलितों के साथ चल रहा है और चूंकि वे इस के शिकार बनने को तैयार बैठे रहे हैं, ऊंचे इस का फायदा उठा रहे हैं.

जिन के कंधों पर पूरी जाति को कीचड़ से निकालने की जिम्मेदारी है, वे कीचड़ की नाली अपनों की बस्ती की ओर मोड़ देते हैं ताकि उन के पैर बचे रह जाएं. छुआछूत इसी वजह से हजारों साल जिंदा रही और आज भी फलफूल रही है. Untouchability

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