Rakhi Special : एक बहन की चिट्ठी शहीद भाई के नाम

Rakhi Special –

हमारे प्रिय भैया,

आप मेरी चिट्ठी की बड़ी बेताबी से राह देखा करते हैं, यह मुझे मालूम है, क्योंकि लौटने पर आप ने खुद कहा था, ‘इस बार मेरे दोस्तों ने जब तक मुझ से पार्टी नहीं ले ली, मुझे तेरी राखी नहीं दी.’

उस नादान उम्र में भी मैं सोचा करती थी कि इस एक राखी ने भैया का कितना खर्च करवा दिया. पर, मैं जानती थी कि राखी बंधवाने की खुशी में आप कितने चहक उठते हैं.

जब आप यहां होते थे, तो राखियां और तोहफे भी आप ही ले आते थे. आप के चेहरे पर खिलखिलाती खुशी उस वक्त मेरी समझ से परे थी, पर आज उन्हीं पलों की याद में आंखों से आंसू निकल पड़ते हैं.

आप कुछ दिनों की छुट्टी लेकर आए थे. आप ने जिद की थी, ‘चल, तेरी राखी की नई ड्रैस ले लें.’

तब मैं ने कहा था, ‘भैया, आप लौट आइए, फिर दिलवा देना.’

आप को पुलिस कमांडो की पोस्ट के लिए अकोला का ट्रांसफर और्डर मिल चुका था. हम बहुत खुश थे कि बस कुछ ही दिनों में आप फिर से हमारे साथ होंगे.

भैया, आप का चुलबुला स्वभाव सारे घर को हिला देता था. आप के आने पर सारा घर खुशी से झूम उठता था. आप ने कई पुरस्कार जीते थे. आप की दमदार आवाज में वह रचना तो मेरे दिलोदिमाग में बस सी गई है, जिस पर तालियों की आवाज गूंज उठी थी, ‘तन समर्पित, मन समर्पित, जीवन का कणकण समर्पित, चाहता हूं देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूं…’

देश पर कुरबान होने की चाह कई बार आप के मुंह से निकल जाया करती थी और आप की वह चाह पूरी भी हुई.

हम उन 13 दिनों का इंतजार कर रहे थे, जब आप लौट कर आने वाले थे. यही सोच कर मैं ने आप को चिट्ठी भी नहीं लिखी कि आप आने वाले ही तो हैं. पूरे घर में आप का पलपल इंतजार हो रहा था. आप के लौट आने में सिर्फ 2-3 दिन बाकी थे.

उस दिन सुबहसुबह आप के छोटे भाई घर आए और अब्बू की गोद में सिर रख कर रोने लगे. हमें लगा कि आप के घर पर कुछ हुआ है, शायद आप की मां या बाबूजी… पर, उन की भर्राई आवाज निकली, ‘राजू अब इस दुनिया में नहीं रहा,’ कानों पर यकीन नहीं हो रहा था, पर वे रोतेरोते कहे जा रहे थे.

गढ़चिरोली के अहेरी में पुलिस चौकी के उद्घाटन के लिए जाते समय सुरंग लगा कर नक्सलवादियों ने आप के ग्रुप की 3 जीपों को उड़ा दिया था, जिन में शहीद हुए 7-8 जवानों में से एक आप भी थे.

भैया, मैं तो आप की धर्म बहन हूं, आप के दोस्त की बहन. जब इन 20-22 सालों में हम आप को नहीं भुला पाए, तो सोचिए कि आप के बिना आप के मांबाबूजी की क्या हालत रही होगी? फर्ज की सूली पर चढ़ कर आप की आरजू पूरी हो गई… लेकिन, आप के साथ जीने की हमारी आरजू का क्या?

भैया, हमें नाज है कि आप ने अपने वतन की खातिर अपनी जान कुरबान की. उन लोगों को कौन समझए, जो इस तरह किसी की जान से भी प्यारों को बिना किसी गुनाह के अपनों से दूर कर देते हैं? क्यों उन्हें एहसास नहीं होता कि किसी अपने के चले जाने के बाद उस के परिवार वालों की हालत क्या होती होगी?

सच कहती हूं भैया, याद आप की बहुत आती है. छलक पड़ते हैं आंखों से आंसू, जब कोई बात आप की याद आती है.

आप की बहन,

अर्जिन.

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Family drama : बदनसीब बाप – साबिर क्यों था अपने बेटों का कुसूरवार

Family drama.साबिर बिजनौर जिले के एक शहर में अपने परिवार के साथ रहता था. घर में बीवी शबनम और 2 बेटों तसलीम और शमीम के अलावा कोई और नहीं था.

साबिर का लकड़ी पर नक्काशी करने का कारोबार था. वह लकड़ी की जूलरी बनाता और उन पर नक्काशी कर के खूबसूरत डिजाइन तैयार करता था, जिसे वह ऐक्सपोर्ट कर के अच्छाखासा पैसा कमा लेता था.

घर में किसी चीज की कोई कमी न थी. उस के दोनों बेटे भी बड़े होशियार थे और बचपन से ही उस के काम में हाथ बंटाते थे. यही वजह थी कि जवान होतेहोते वे भी अच्छे कारीगर बन गए थे.

साबिर बचपन से ही अपने बड़े बेटे तसलीम से ज्यादा प्यार करता था. इस की वजह यह थी कि छोटा बेटा शमीम पिछले कुछ समय से आवारा लड़कों की संगत में रहता था और खूब फुजूलखर्ची करता था, जबकि तसलीम अपने बाप की हर बात मानता था और बिना उन की मरजी के कोई काम नहीं करता था.

ज्योंज्यों छोटा बेटा शमीम बड़ा होता जा रहा था, उस के खर्चे भी बढ़ते जा रहे थे. आवारा दोस्तों ने उसे निकम्मा बना दिया था. बाप की डांटडपट से तंग आ कर वह अपने दोस्तों के साथ मुरादाबाद चला गया और काफी अरसे तक वहीं रहा. वह जो कमाता था उसे अपने आवारा दोस्तों के साथ रह कर घूमनेफिरने पर खर्च कर देता था.

बड़ा बेटा तसलीम अपने अब्बा के साथ रह कर उन के हर काम में हाथ बंटाता था, जिस की वजह से उन का कामधंधा जोरों पर था और खूब तरक्की हो रही थी. अब्बा ने अपने भाई की बेटी सायरा से तसलीम का रिश्ता तय कर दिया था.

कुछ महीनों के बाद तसलीम की शादी थी, इसलिए छोटा बेटा शमीम भी घर आया हुआ था. घर में खुशी का माहौल था, पर शमीम मुरादाबाद जा कर और ज्यादा बिगड़ गया था. वह बदचलन भी हो गया था.

घर में मेहमानों का आनाजाना शुरू हो गया था. शादी में कुछ दिन बाकी रह गए थे. शमीम अपने चाचा के घर अपनी होने वाली भाभी सायरा से मिलने गया था.

जब शमीम घर पहुंचा, तो घर पर कोई नहीं था. बस, सायरा ही अकेली वहां थी, बाकि सब लोग शादी की खरीदारी के लिए बाजार गए थे.

सायरा शमीम को जानती थी, इसलिए उस ने शमीम को अंदर आने दिया और उसे बैठा कर चाय बनाने रसोईघर में चली गई.

कुछ देर बाद जब सायरा चाय बना कर वापस आई, तो पसीने की बूंदें उस के चेहरे पर मोतियों की तरह चमक रही थीं. रसोईघर की गरमी की वजह से उस का चेहरा सुर्ख हो गया था. गुलाबी होंठ ऐसे खिल रहे थे, जैसे कोई गुलाब हो.

शमीम सायरा को एकटक देखता रहा. इतनी हसीन लड़की को देख कर उस के अंदर का शैतान जाग उठा.

शमीम के दिल में हलचल मच चुकी थी. उस ने बिना वक्त गंवाए सायरा को अपनी बांहों में भर लिया और उस के होंठों पर चुंबनों की बौछार कर दी. उस की यह हरकत देख कर सायरा ने शोर मचाना शुरू कर दिया.

आवाज सुन कर आसपास के लोग आ गए और शमीम को पकड़ कर उस के घर ले गए और पूरा वाकिआ साबिर को बताना शुरू कर दिया.

साबिर ने शमीम को डांटते हुए घर से धक्के मार कर भगा दिया और बाद में अपनी जायदाद से भी बेदखल कर दिया. उस ने अपना घर अपने बड़े बेटे तसलीम के नाम कर दिया.

अगले दिन तसलीम की बरात जाने वाली थी. घर के सभी लोग अपनेअपने काम में मसरूफ थे कि तभी घर के पास एक गली से तसलीम के चीखने की आवाज आई.

लोग उधर दौड़े तो देखा कि तसलीम खून में लथपथ पड़ा कराह रहा था और उस के पास हाथ में चाकू लिए शमीम खड़ा हुआ चिल्ला रहा था, ‘‘मेरा हिस्सा तू कैसे ले सकता है? यह घर मेरा भी है. तू अकेला इस का मालिक कैसे बन सकता है? मैं अपने हिस्से के लिए किसी की भी जान ले सकता हूं…’’

किसी ने फौरन पुलिस को फोन कर दिया और कुछ लोगों ने हिम्मत कर के शमीम को पकड़ लिया.

तसलीम को अस्पताल में भरती कराया गया, पर कुछ ही देर में ही उस ने दम तोड़ दिया.

शमीम को पुलिस ने गिरफ्तार कर हत्या का मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेज दिया.

बदनसीब बाप की दोनों औलादें उस से जुदा हो गईं. एक जेल पहुंच गया और दूसरा दुनिया ही छोड़ कर चला गया.

साबिर इस घटना के लिए खुद को कुसूरवार मान रहा था और लोगों से कहता फिरता था, ‘‘मैं ने खुद अपने बेटे को मार डाला. छोटे बेटे का हिस्सा अगर बड़े बेटे के नाम न करता, तो आज वह उस के खून का प्यासा न होता और ऐसा कदम न उठाता…’’Family drama

Hindi Short Story : सांझ का बरगद

Hindi Short Story. गांव के बाहर एक पुराना बरगद का पेड़ था. उस की फैली शाखाएं दूरदूर तक छाया देती थीं. लोग कहते थे कि वह बरगद जितना पुराना है, उतनी ही पुरानी उस की कहानियां हैं.

उसी बरगद की ही तरह थे रामनारायणजी. 70 साल की उम्र में भी उन का दबदबा पूरे कसबे में था. लोग इज्जत से उन्हें ‘मास्टर साहब’ कहते थे. उन्होंने जिंदगीभर स्कूल में बच्चों को पढ़ाया था. पत्नी सरला के न रहने के बाद उन का संसार केवल एक इनसान तक सिमट गया था, उन की बेटी सृष्टि.

सृष्टि जब 5 साल की थी, तभी उस की मां चल बसी थीं. रामनारायणजी ने दूसरी शादी नहीं की. उन्होंने अपनी जिंदगी की हर इच्छा, हर शौक और हर सपना बेटी के लिए त्याग दिया. वे उस के लिए पिता भी बने, मां भी बने और दोस्त भी.

सृष्टि बड़ी हुई. वह पढ़ने में तेज थी. शहर की यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर बन गई. वहीं उस की मुलाकात अभिषेक से हुई.

अभिषेक शांत स्वभाव का नौजवान था. दोनों ने ब्याह कर लिया. शादी के बाद सृष्टि शहर में बसना चाहती थी, लेकिन रामनारायणजी अकेले थे.

‘‘बेटा, मैं तुम्हें रोकना तो नहीं चाहता…’’ रामनारायणजी ने कहा, ‘‘लेकिन इस घर की दीवारें तुम्हारे बिना बहुत खाली हो जाएंगी.’’

सृष्टि रुक गई. अभिषेक ने भी कुछ नहीं कहा. वह जानता था कि सृष्टि अपने पिता से बेहद प्रेम करती है.

धीरेधीरे साल बीतते गए. घर में 2 बच्चे भी हो गए, आरव और अन्वी.

पर एक विचित्र बात होने लगी. घर में हर फैसले का केंद्र रामनारायणजी होते. बच्चे किस स्कूल में पढ़ेंगे? कहां घूमने जाएंगे? कौन सी कार खरीदी जाएगी? यहां तक कि सृष्टि कौन सा रिसर्च सब्जैक्ट चुनेगी? हर बात में आखिरी फैसला उन का होता.

रामनारायणजी कभी आदेश नहीं देते थे. बस कहते, ‘‘मैं तो तुम्हारे भले के लिए कह रहा हूं.’’

यह सुन कर सृष्टि चुप हो जाती और अभिषेक भी.

एक दिन यूनिवर्सिटी से सृष्टि को विदेश में 2 साल के रिसर्च कार्यक्रम का प्रस्ताव मिला. यह उस की जिंदगी का सब से बड़ा मौका था. वह खुशी से भर उठी.

रात को सृष्टि ने सब से पहले अपने पिता को बताया. रामनारायणजी कुछ देर चुप रहे, फिर मुसकराए और बोले, ‘‘बहुत अच्छा है,’’ लेकिन उन की आंखों की नमी सृष्टि से छिपी नहीं.

अगले कई दिनों तक रामनारायणजी कुछ उदास रहने लगे. खाना कम खाने लगे. बच्चों के साथ भी कम बोलते.

सृष्टि बेचैन हो उठी. एक शाम उस ने कहा, ‘‘मैं मना कर देती हूं पापा.’’

रामनारायणजी ने तुरंत सिर उठाया, ‘‘नहीं बेटा, मैं तुम्हारे रास्ते में क्यों आऊंगा?’’ पर उन की आवाज कांप रही थी.

सृष्टि समझ  गई और उस ने प्रस्ताव ठुकरा दिया.

उस रात अभिषेक बहुत देर तक छत पर अकेला बैठा रहा. पहली बार उस के भीतर कुछ टूट सा गया था.

कुछ महीनों बाद आरव के स्कूल में एक नाटक हुआ. विषय था ‘पिंजरे का सब से सुंदर पक्षी’.

नाटक में एक बच्चा पक्षी बनता है जिसे उस का मालिक बहुत प्यार करता है. उसे सब से अच्छा खाना देता है. सोने का पिंजरा देता है. हर खतरे से बचाता है, लेकिन उड़ने नहीं देता.

आखिर में पक्षी कहता है, ‘‘मुझे तुम से शिकायत नहीं है. बस इतना दुख है कि तुम ने मेरे पंखों पर भरोसा नहीं किया.’’

नाटक खत्म हुआ. पूरा हाल तालियों से गूंज उठा, लेकिन रामनारायणजी के चेहरे का रंग बदल गया था. वे एकटक मंच की ओर देख रहे थे, जैसे कोई पुराना आईना अचानक सामने आ गया हो.

उस रात रामनारायणजी बहुत देर तक जागते रहे. सरला की तसवीर सामने रखी थी. वे धीरे से बोले, ‘‘मैं ने तुम्हारी बेटी को संभालतेसंभालते शायद उसे उड़ना ही नहीं सिखाया,’’ उन की आंखें भर आईं.

अगली सुबह रामनारायणजी ने सृष्टि को बुलाया, ‘‘बेटा, क्या वह रिसर्च कार्यक्रम फिर से मिल सकता है?’’

सृष्टि चौंक गई, ‘‘शायद हां पापा.’’

रामनारायणजी ने सृष्टि का हाथ पकड़ लिया और कहा, ‘‘तो अप्लाई कर दो.’’

‘‘लेकिन आप अकेले…’’ ‘‘नहीं…’’ रामनारायणजी ने बीच में ही रोक दिया, ‘‘पेड़ का काम छाया देना है, जड़ों से बांधना नहीं.’’

सृष्टि की आंखें नम हो गईं. सालों बाद उसे लगा कि उस के कंधों से कोई अदृश्य भार उतर रहा है.

6 महीने बाद सृष्टि विदेश चली गई. अभिषेक और बच्चे भी उस के साथ थे.

एयरपोर्ट पर विदा करते समय रामनारायणजी मुसकरा रहे थे. इस बार उन की आंखों में आंसू थे, पर अपराधबोध नहीं, बल्कि गर्व था.

हवाईजहाज आसमान में उड़ गया. रामनारायणजी देर तक उसे देखते रहे, फिर धीमे से बोले, ‘‘अब समझा हूं सरला, प्रेम पकड़ना नहीं होता. प्रेम तो वह साहस है, जिस में हम अपने प्रियजनों को उन की दिशा में उड़ने देते हैं.’’

बरगद की शाखाओं पर बैठे पक्षी उसी समय उड़ान भर रहे थे. और पहली बार मास्टर साहब को उन की उड़ान सुंदर लगी, अकेलापन नहीं. Hindi Short Story

-मुकेश कुमार बिस्सा

Family Story in Hindi – बेटी के लिए : पिता की इच्छा का संसार

Family Story in Hindi. शिवचरण अग्रवाल बाजार से लौटते ही कुरसी पर पसर गए. मलीन चेहरा, शिथिल शरीर देख पत्नी माया ने घबरा कर माथा छुआ, ‘‘क्या हुआ… क्या तबीयत खराब लग रही है. भलेचंगे बाजार गए थे…अचानक से यों…’’

कुछ देर मौन रख वह बोले, ‘‘लौटते हुए अजय की दुकान पर उस का हालचाल पूछने चला गया था. वहां उस ने जो बताया उसे सुन कर मन खट्टा हो गया.’’

‘‘ऐसा क्या बता दिया अजय ने जो आप की यह हालत हो गई?’’ माया ने पंखा झलते हुए पूछा.

‘‘वह बता रहा था कि कुछ दिन पहले उस की दुकान पर समधीजी का एक रिश्तेदार आया था…उसे यह पता नहीं था कि अजय मेरा भांजा है. बातोंबातों में मेरा जिक्र आ गया तो वह कहने लगा, ‘अरे, उन्हें तो मैं जानता हूं…बड़े चालाक और घटिया किस्म के इनसान हैं… दरअसल, मेरे एक दूर के जीजाजी के घर उन की लड़की ब्याही है…जीजाजी बता रहे थे कि शादी में जो तय हुआ था उसे तो दबा ही लिया, साथ ही बाद में लड़की के गहनेकपडे़ भी दाब लेने की पूरी कोशिश की…क्या जमाना आ गया है लड़की वाले भी चालू हो गए…’ रिश्तेदारी का मामला था सो अजय कुछ नहीं बोला मगर वह बेहद दुखी था…उसे तो पता ही है कि मैं ने मीनू की शादी में कैसे दिल खोल कर खर्च किया है, जो कुछ तय था उस से बढ़चढ़ कर ही दिया, फिर भी मीनू के ससुर मेरे बारे में ऐसी बातें उड़ाते फिरते हैं… लानत है….’’

तभी उन की छोटी बेटी मधु कालिज से वापस आ गई. उन की उतरी सूरत देख उस का मूड खराब न हो अत: दोनों ने खुद को संयत कर किसी दूसरे काम में उलझा लिया.

आज का मामला कोई नया नहीं था. साल भर ही हुआ था मीनू की शादी को मगर आएदिन कुछ न कुछ फेरबदल के साथ ऐसे मामले दोहराए जाते पर शिवचरण चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे…इन हालात के लिए वह स्वयं को ही दोषी मानते थे.

आज शिवचरण की आंखों के सामने बारबार वह दृश्य घूम रहा था जब कपूर साहब ने उन से अपने बड़े बेटे के लिए मीनू का हाथ मांगा था.

रजत कपूर उन के नजदीकी दोस्त एवं पड़ोसी दीनदयाल गुप्ता के बिजनेस पार्टनर थे. बेहद सरल, सहृदय और जिंदादिल. दीनदयाल के घर शिवचरण की उन से आएदिन मुलाकातें होती रहीं. जैसे वह थे वैसा ही उन का परिवार था. 2 बेटों में बड़ा बेटा कंप्यूटर इंजीनियर था और छोटा एम.बी.ए. पूरा कर अपने पिता का बिजनेस में हाथ बंटा रहा था. एक ऐसा हंसताखेलता परिवार था जिस में अपनी लड़की दे कर कोई भी पिता अपनी जिंदगी को सफल मानता. ऐसे परिवार से खुद रिश्ता आया था मीनू के लिए.

कपूर साहब भी अपने बड़े बेटे के लिए देखेभाले परिवार की लड़की चाह रहे थे और उन की नजर मीनू पर जा पड़ी. उन्होंने बड़ी विनम्रता से निवेदन किया था, ‘शिवचरण भाईसाहब, बेटी जैसे अब तक आप के घर रह रही है वैसे ही आगे हमारे घर रहेगी. बस, तन के कपड़ों में विदा कर दीजिए, मेरे घर में बेटी नहीं है, उसे ही बेटी समझ कर दुलार करूंगा.’

इतना अपनापन से भरा निवेदन सुन कर शिवचरण गद्गद हो उठे थे. कितनी धुकधुक रहती है पिता के मन में जब वह अपनी प्यारी बेटी को पराए हाथों में सौंपता है. मन आशंकाओं से भरा रहता है. रातदिन यही चिंता लगी रहती है कि पता नहीं बेटी सुखी रहेगी या नहीं, मानसम्मान मिलेगा या नहीं…मगर इस आग्रह में सबकुछ कितना पारदर्शी… शीशे की तरह साफ था.

शिवचरण ने जब इस बात पर अपनी पत्नी के साथ बैठ कर विचार किया तो धीरेधीरे कुछ प्रश्न मुखरित हो उठे. मसलन, ‘परिवार और लड़का तो वाकई लाखों में एक है मगर… हम वैश्य और वह पंजाबी…घर वालों को कैसे राजी करेंगे…’

यह सचमुच एक गंभीर समस्या थी. शिवचरण का भरापूरा कुटुंब था जिस में इस रिश्ते का जिक्र करने का मतलब था सांप की पूंछ पर पैर रखना. वैसे तो सभी तथाकथित पढे़लिखे समकालीन भद्रजन थे मगर जब किसी के शादीब्याह की बात आती तो एकएक पुरातन रीतिरिवाज खोजखोज कर निकाले जाते. मसलन, जाति, गोत्र, जन्मपत्री, मांगलिक-अमांगलिक…और यहां तो बात विजातीय रिश्ते की थी.

बेटी के सुखद भविष्य के लिए शिवचरण ने तो एक बार सब को दरकिनार करने की सोच भी ली थी मगर माया नहीं मानी.

‘शादीब्याह के मसले पर घरपरिवार को साथ ले कर चलना ही पड़ता है. अगर अभी नजरअंदाज कर दिया तो सारी उम्र ताने सुनते रहेंगे…तुम्हें कोई कुछ न बोले मगर मैं तो घर की बड़ी बहू हूं. तुम्हारी अम्मां मुझे नहीं बख्शेंगी.’

और अम्मां से पूछने पर जो कुछ सुनने को मिला वह अप्रत्याशित नहीं था.

‘क्या हमारी बिरादरी में कोई अच्छा लड़का नहीं मिला जो दूसरी बिरादरी का देखने चल दिया.’

‘नहीं, अम्मां, खुद ही रिश्ता आया था. बेहद भले लोग हैं. कोई दानदहेज भी नहीं लेंगे.’

‘तो क्या पैसे बचाने को ब्याह रहा है वहां? तेरे पास न हों तो मुझ से ले लेना…अरे, बेटी के ब्याह पर तो खर्च होता ही है…और मीनू घर की बड़ी लड़की है, अगर उसे वहां ब्याह दिया तो सब यही समझेंगे कि लड़की तेज होगी, खुद से पसंद कर ब्याह कर बैठी. फिर छोटी को कहीं ब्याहना भी मुश्किल हो जाएगा.’

अम्मां ने तिवारीजी को भी बुलवा लिया. लंबा तिलक लगाए वह आए तो अम्मां ने खुद ही उन के पांव नहीं छुए, सब से छुआए. 4 कचौड़ी, 6 पूरी और 2 रसगुल्लों का नाश्ता करने के बाद समस्या पर विचार कर के वह बोले, ‘यजमान, यह आप की मरजी है कि आप विवाह कहां करें पर आप ने जाति के बाहर विवाह किया तो मैं आप के घर में पैर नहीं रखूंगा. आखिर सनातन प्रथा है यह जाति की. आप जैसे नए लोग तोड़ते हैं तभी तो तलाक होते हैं. न कुंडली मिली, न अपनी जाति का, न घर के रीतिरिवाज का पता. आप सोच भी कैसे सकते हैं.’

अम्मां और तिवारीजी के आगे शिवचरण के सभी तर्क विफल हो गए और उन्हें इस रिश्ते को भारी मन से मना करना पड़ा. दीनदयाल ने यह बात विफल होती देख वहां अपनी भतीजी की बात चला दी और आज वह कपूर साहब के घर बेहद सुखी थी.

जब शिवचरण मीनू के लिए सजातीय वर खोजने निकले तो उन्हें एहसास हुआ कि दूल्हामंडी में से एक अदद दूल्हा खरीदना कितना कठिन कार्य था. जो लड़का अच्छा लगता उस के दाम आसमान को छूते और जिस का दाम कम था वह मीनू के लायक नहीं था. कपूर साहब के रिश्ते पर चर्चा के समय जिन सगेसंबंधियों ने मीनू के लिए सुयोग्य वर खोज लाने और हर तरह का सहयोग देने की बात की थी इस

समय वे सभी पल्ला झाड़ कहीं गायब हो गए थे.

भागदौड़ कर के अंत में एक जगह बात पक्की हुई. रिश्ता तय होते समय लड़के के मातापिता का रवैया ऐसा था जैसे लड़की पसंद कर उन्होंने लड़की वालों पर एहसान किया है. उस समय शिवचरण को कपूर साहब का नम्र निवेदन बहुत याद आ रहा था. उस दिन जो उन के कंधे झुके तो आज तक सीधे नहीं हुए थे.

अतीत की यादों में खोए शिवचरण को तब झटका लगा जब पत्नी ने आ कर कहा कि दीनदयाल भाई साहब आए थे और आप के लिए एक निमंत्रण कार्ड दे गए हैं.

उस दिन दीनदयाल के घर एक पारिवारिक समारोह में शिवचरण की मुलाकात उन के बड़े भाई से हो गई जो अब कपूर साहब के समधी थे. उन की बात चलने पर वह गद्गद हो कर बोले, ‘‘बस, क्या कहें, हमारी बिटिया को तो बहुत अच्छा घरवर मिल गया. ऐसे सज्जन लोग कहां मिलते हैं आजकल…उसे हाथों पर उठा कर रखते हैं…बेटी ससुराल में खुश हो, एक बाप को और क्या चाहिए भला…’’ शिवचरण के चेहरे पर एक दर्द भरी मुसकान तैर आई.

घर आ कर मन और अधिक अपराधबोध से ग्रसित हो गया. वह खुद पर बेहद नाराज थे. बारबार स्वयं को कोस रहे थे कि क्यों मैं उस समय जातिवाद की ओछी मानसिकता से उबर नहीं पाया…क्यों सगेसंबंधियों और बिरादरी की कहावत से डर गया…अपनी बेटी का भला देखना मेरी अपनी जिम्मेदारी थी, बिरादरी की नहीं. दीनदयाल भी तो हमारी जाति के ही हैं. उन्हें तो कोई फर्क नहीं पड़ा वहां रिश्ता करने से…उन का मानसम्मान उसी तरह बरकरार है…सच तो यह है कि आज के भागदौड़ भरे जीवन में किसी के पास इतना समय नहीं कि रुक कर किसी दूसरे के बारे में सोचे…‘लोग क्या कहेंगे’ जैसी बातें पुरानी हो चुकी हैं. जो इन्हें छोड़ आगे नहीं बढ़ते, आगे चल कर वे मेरी ही तरह रोते हैं.

शिवचरण अखबार पढ़ रहे थे तभी दीनदयाल उन से मिलने आए तो बातोंबातों में वह अपनी व्यथा कह बैठे, ‘‘क्या बताऊं भाईजी, कपूर साहब जैसा समधी खोने का दर्द अभी तक दिल में है…एक विचार आया है मन में…अगर उन के छोटे बेटे के लिए मधु का रिश्ता ले कर जाऊं तो…जब वह आए थे तो मैं ने इनकार कर दिया था, न जाने अब मेरे जाने पर कैसा बरताव करेंगे, यही सोच कर दिल घबरा रहा है.’’

‘‘नहीं, भाई साहब, उन्हें मैं अच्छी तरह जानता हूं, दिल में किसी के लिए मैल नहीं रखते…वह तो खुशीखुशी आप का रिश्ता स्वीकारते मगर आप ने यह फैसला लेने में जरा सी देर कर दी. अभी 2 दिन पहले ही उन के छोटे बेटे का रिश्ता तय हुआ है.’’

एक बार फिर शिवचरण खुद को पराजित महसूस कर रहे थे.

वह अपनी गलती का प्रायश्चित्त करना चाह रहे थे मगर उन्हें मौका न मिला. सच ही है, कुछ भूलें ऐसी होती हैं जिन को भुगतना ही पड़ता है.

‘‘फोन की घंटी बज रही थी. शिवचरण ने फोन उठाया, ‘‘हैलो.’’

‘‘नमस्ते, मामाजी,’’ दूसरी ओर से अजय की आवाज आई, ‘‘वह जो आप ने मधु के लिए वैवाहिक विज्ञापन देने को कहा था, उसी का मैटर कनफर्म करने को फोन किया है…पढ़ता हूं…कोई सुधार करना हो तो बताइए :

‘‘अग्रवाल, उच्च शिक्षित, 23, 5 फुट 4 इंच, गृहकार्य दक्ष, संस्कारी कन्या हेतु सजातीय वर चाहिए.’’

‘‘बाकी सब ठीक है, अजय. बस, ‘अग्रवाल’ लिखना जरूरी नहीं और ‘सजातीय’ शब्द की जगह लिखो, ‘जातिधर्म बंधन नहीं.’’’

‘‘मगर मामाजी, क्या आप ने सगेसंबंधियों से इस बारे में…’’

‘‘सगेसंबंधी जाएं भाड़ में….’’ शिवचरण फोन पर चीख पडे़.

‘‘और मामीजी…’’

‘‘तेरी मामी जाए चूल्हे में…अब मैं वही करूंगा जो मेरी बेटी के लिए सही होगा.’’

शिवचरण ने फोन रख दिया…फोन रख कर उन्हें लगा जैसे आज वह खुल कर सांस ले पा रहे हैं और अपने चारों तरफ लिपटे धूल भरे मकड़जाल को उन्होंने उतार फेंक. Family Story in Hindi

Story in Hindi : नया सवेरा

Story in Hindi. बात उन दिनों की है, जब मैं डाक्टरी के पेशे में नयानया आया था. शाम के 5 बजे एक खूबसूरत लड़की एक अधेड़ उम्र की औरत के साथ मेरे क्लिनिक में आई. उस औरत की गोद में एक छोटा बच्चा भी था.

बातचीत के दौरान उस अधेड़ औरत से पता चला कि वह हमारे महल्ले में रहने वाली किसी औरत की बहिन है, जिसे मैं जानता था, पर उस से मेरी बातें नहीं होती थीं.

लड़की का रंग बहुत गोरा तो नहीं था, लेकिन चेहरे की बनावट, नाक में छोटी सी नथ, बांह पर चांदी का कड़ा, कपड़े और लिपस्टिक तो उस पर ऐसे फब रहे थे, मानो उसे किसी फिल्म के मेकअप आर्टिस्ट ने सजाया हो. उसे देख कर किसी भी नौजवान का दिल फिसल सकता था. मैं ने उसे देखा तो देखता ही रह गया.

वह लड़की झेंपते हुए बोली, ‘‘डाक्टर साहब, आप इस तरह क्या देख रहे हैं?’’

उस की सवालिया नजरों से मैं सहम गया और हड़बड़ाहट में कहा, ‘‘कुछ… कुछ नहीं… हां, आप की नथ आप पर खूब जंच रही है.’’

यह सुन कर वह लड़की मुसकराने लगी. मैं ने डाक्टरी अंदाज में पूछा, ‘‘कहिए, क्या हुआ है आप को?’’

अभी वह लड़की कुछ कह पाती, इस से पहले ही मैं ने उसे अपने पास वाली कुरसी पर बैठने का इशारा किया.

मैं ने उस की परेशानी सुनी और कुछ देर तक उस का चैकअप किया. इस के बाद कुछ दवाएं लिख दीं, साथ में कुछ परहेज भी बता कर 5 दिन बाद आने को कहा.

वह लड़की 5 दिन बाद आई. उस के चेहरे से गुलाब जैसी ताजगी झलक रही थी. आज उस के साथ वह अधेड़ औरत नहीं आई थी. लेकिन यह क्या, उस की गोद में वही बच्चा खेल रहा था.

मैं ने पूछा, ‘‘आप का नाम क्या है? क्या यह आप का बच्चा है?’’

उस लड़की ने कहा, ‘‘मेरा नाम नाहिदा है. अभी मेरी शादी को कुछ दिन ही हुए हैं. यह मेरा पहला बच्चा है.’’

यह सुन कर मुझे ऐसा लगा, मानो किसी ने मेरे अरमानों पर पानी फेर दिया हो. मैं थोड़ा संभला और कहा, ‘‘आइए, आप का चैकअप कर लूं.’’

मैं ने चैकअप करने के बाद कहा, ‘‘अब आप बिलकुल ठीक हैं. थोड़ा परहेज करना, तलीभुनी चीजें व मिर्चमसाले का ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना और जब कभी आप को कोई तकलीफ हो, तो आ जाना.’’

‘जी अच्छा’ कह कर नाहिदा उठी और मैं दूसरे मरीजों को देखने लगा.

एक महीना गुजर जाने के बाद अचानक नाहिदा मेरे पास आई और बोली, ‘‘सलाम डाक्टर भैया.’’

यह सुन कर मैं सकते में रह गया. फिर मैं ने कहा, ‘‘कहो नाहिदा, कैसे आना हुआ? सब खैरियत तो है न?’’

उस ने मुसकरा कर कहा, ‘‘वैसे तो सब ठीक ही है, पर देखिए न भैया, ये हमें भद्दी और बदसूरत कहते हैं. क्या हमारा फिगर बोल्ड और खूबसूरत नहीं हो सकता?’’

नाहिदा की बातें सुन कर मैं मुसकराने लगा और दिलासा देते हुए बोला, ‘‘घबराओ नहीं. तुम्हारी परेशानी का हल है मेरे पास.’’

मेरा इतना कहना था कि नाहिदा को मानो दुनिया की सब से बेशकीमती चीज मिल गई हो.

देखते ही देखते कुछ महीनों में ही नाहिदा और भी खूबसूरत लगने लगी. इस दौरान वह मेरे दिल के और भी करीब आ गई.

वह जब भी मेरे सामने आती, मैं उसे ललचाई नजरों से देखता. मन कहता, ‘काश, यह मेरी दुलहन बन कर हमारे घर आती, तो कितना अच्छा होता.’

लेकिन मैं कैसे अपनी मुहब्बत का इजहार करता, अब तो हमारा रिश्ता भी भाईबहिन का था.

नाहिदा का शौहर भी कई बार मुझ  से मिल चुका था. मैं उस के घर भी जा चुका था.

वक्त गुजरता गया. हमारी मुलाकात को 4 साल हो चुके थे. इस बीच उस ने अपनी और अपने शौहर की बहुत सी अच्छीबुरी बातें मुझे  बताईं, जो आज भी मेरे सीने में दफन हैं.

मैं सोचता हूं कि पढ़ीलिखी होने के बावजूद नाहिदा ने लफंगे मंसूर मियां से कैसे शादी कर ली? लेकिन यह बात भी मुझ से छिपी नहीं थी. शायद जवानी के जोश में हर लड़केलड़की को कहीं न कहीं एक बार ठोकर खानी ही पड़ती है.

नाहिदा भी उसी ठोकर की मारी थी. लेकिन उस का शौहर औरों के लिए जैसा भी हो, नाहिदा और अपने बच्चे को अपनी जान से भी ज्यादा चाहता था.

समय के साथ सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. नाहिदा को जब मेरी जरूरत होती, एक बार फोन की घंटी घनघना देती थी. मैं फोन पर ही दवा लिखवा देता था.

नाहिदा जब भी मुझ  से मिलने आती, काफी सजधज कर आती. बाहर निकलते समय सजनासंवरना उस की आदतों में शुमार था. बाली, चूडि़यां, बिंदी और चप्पलों के रंग देख कर तो मैं दंग ही रह जाता था.

आज सुबह से ही मेरे मन में अजीब सी बेचैनी थी. मैं ने आखिरकार यह फैसला ले लिया कि आज नाहिदा से अपने मन की बातें कह दूंगा. फिर चाहे रिश्ता रहे या न रहे, परवाह नहीं.

दोपहर की तेज धूप में मैं जिस्म को तपाता, पसीने से तरबतर अचानक उस के घर जा पहुंचा और अपनी आदत के मुताबिक बिना संकोच किए जैसे ही दरवाजे को धक्का दिया, वह खुल गया और मैं नाहिदा के बैडरूम में जा कर खड़ा हो गया.

पर यह क्या? वहां जो नजारा मुझे  देखने को मिला, शायद मैं सपने में भी नहीं सोच सकता था.

नाहिदा एक जालीदार नाइटी पहने हुए बैठी थी. उस के साथ चिपक कर एक नौजवान ठीक ऐसे बैठा था, मानो मंसूर मियां हो.

मेरे अचानक वहां पहुंच जाने पर नाहिदा के होश उड़ गए. उस ने हकलाते हुए कहा, ‘‘भैया आप? अचानक? क्या दरवाजा खुला था?’’

मैं ने कहा, ‘‘हां, तभी तो मैं अंदर आया.’’

यह सुनते ही नाहिदा की जबान से निकल पड़ा, ‘‘लगता है कि मैं कुंडी लगाना भूल गई थी.’’

मुझे देख कर वह नौजवान दूसरे कमरे में चला गया, जो ठीक नाहिदा के बैडरूम के सामने था.

मैं ने नाहिदा से पूछा, ‘‘क्या मंसूर मियां यहां नहीं हैं?’’

वह बोली, ‘‘नहीं, वे किसी काम से कोलकाता गए हुए हैं.’’

अब मुझे यह साफ समझ आ रहा था कि नाहिदा कितनी गिरी हुई औरत है, जो अपने शौहर की गैरमौजूदगी में जम कर फायदा उठाना जानती है.

मैं ने पलंग पर पड़ी चादर उस के ऊपर फेंकते हुए जिस्म को ढकने का इशारा किया और उस के बैडरूम से बाहर निकल आया.

वह कहने लगी, ‘‘बैठिए न भैया, अभी तो आप आए हैं.’’

यह सुन कर मानो मेरे खून में उबाल आ गया. मैं ने उसे एक तमाचा जड़ दिया. वह खड़ी मेरा मुंह देखती रह गई.

नाहिदा अपनी सफाई में कुछ कह पाती, उस से पहले ही मैं उस पर बरस पड़ा, ‘‘नाहिदा, तुम इतना गिर सकती हो, यह मैं सोच भी नहीं सकता था. जो औरत अपने शौहर के साथ इतना बड़ा धोखा कर सकती है, वह दूसरे के चलतेफिरते जमीनी रिश्ते को क्या समझेगी? मैं तो फिर भी तुम्हारा मुंहबोला भाई ठहरा. खैर, आइंदा तुम मुझ  से मिलने की कोशिश मत करना,’’ ऐसा कह कर मैं वहां से निकल पड़ा.

अब मुझे  एहसास हो रहा था कि मैं रंगरंगीली दुनिया के पीछे भाग रहा था. नाहिदा के बारे में सोचतेसोचते मैं कब सो गया, पता ही नहीं चला.

अगले दिन जब मेरी आंख खुली, तो सुबह के 6 बज चुके थे. सूरज की किरणें रोशनी बिखेर चुकी थीं. मेरी जिंदगी का ‘नया सवेरा’ हो चुका था. Story in Hindi

-डा. एसएम अजहर हुसैन

Story in Hindi : हैडमास्टर सीमा से क्यों पैसे लेना चाहते थे?

Story in Hind-

‘‘बाबूजी, आप मिठाई बांटिए,’’ सीमा ने खुश होते हुए कहा.

‘‘क्यों… क्या हुआ बेटी?’’

‘‘मेरी टीचर की नौकरी लगी है… पास के गांव में.’’

‘‘यह तो बहुत खुशी की बात है. आखिरकार मेरी बेटी जिंदगी में कुछ बन ही गई.’’

आज स्कूल का पहला दिन था. सीमा बहुत खुश थी. बाबूजी भी उन के साथ स्कूल में आए थे. पहला दिन तो ठीकठाक ही था. दूसरे दिन सीमा प्रार्थना में खड़ी थी, तभी हैडमास्टरजी मदन उस के पास आए और कहने लगे, ‘‘मैडमजी, बढ़िया नौकरी लगी है, चाय तो पिलाइए स्टाफ को.’’

‘‘जी, मैं ने तो अभी पहली तनख्वाह भी नहीं ली है. बाद में सब को चाय पिलाऊंगी,’’ सीमा ने कहा.

‘‘अरे मैडमजी, एक कप चाय के लिए महीनेभर का इंतजार करवाएंगी क्या?’’

‘‘सरजी, मैं ने कहा न कि पहली तनख्वाह मिलने के बाद चाय पिलाऊंगी. मुझे माफ कर दीजिए.’’

हैडमास्टरजी चले गए. अजीत सर पास में ही खड़े थे.

‘‘मै कुछ कहूं,’’ अजीत सर धीमी आवाज में बोले. ‘‘कहिए.’’

‘‘चाय पिला दीजिए. अगर पैसे नहीं हैं, तो मैं दिए देता हूं. तनख्वाह मिलने के बाद आप लौटा दीजिएगा.’’

‘‘मुझे किसी का उधार नहीं चाहिए.’’

इस के बाद सभी लोग क्लास में चले गए. सीमा की क्लास में 20 छात्र थे. 10 छात्र ठीकठाक पढ़ते थे, बाकी बचे 10 छात्रों को अलग से ज्यादा पढ़ाना पड़ता था.

सीमा जैसे ही स्टाफरूम में जाती थी, किसी न किसी बहाने दूसरे टीचर भी वहां आ जाते थे और उस का मजाक उड़ाते थे.

एक दिन सीमा का दिमाग गरम हो गया और वह बोल पड़ी, ‘‘क्यों एक कप चाय के लिए इतना मरे जा रहे हैं. अब तो मैं पहली तनख्वाह मिलने पर भी चाय नहीं पिलाऊंगी.’’

स्कूल के सारे टीचर और हैडमास्टर सीमा का यह जवाब सुन कर गुस्सा तो हुए, पर कोई भी कुछ नहीं बोला. लेकिन सीमा के इस करारे जवाब से उस के खिलाफ स्कूल में राजनीति शुरू हो गई.

एक दिन स्कूल में बड़े साहब आए. मदनजी फौरन नाश्ता ले कर आए. सीमा को भी बुलाया गया. उस ने एक समोसा खाया. बड़े साहब के स्कूल से जाते ही हैडमास्टरजी उस से 20 रुपए मांगने लगे.

‘‘एक समोसे के 20 रुपए?’’ सीमा ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘मैडमजी, बड़े साहब के आने में गाड़ी का पैट्रोल नहीं लगा क्या,’’ राकेशजी बोले.

सीमा ने झट से 20 रुपए उन के मुंह पर फेंके और अपनी क्लास में लौट गई. उस के पीछेपीछे अजीत सर भी क्लास में पहुंच गए.’’

‘‘आप को पैसों की कोई दिक्कत है क्या?’’ ‘‘नहीं तो.’’

‘‘तो फिर 20 रुपए के लिए इतना गुस्सा क्यों?’’ ‘‘5 रुपए के समोसे के लिए 20 रुपए क्यों?’’

‘‘क्योंकि मदनजी, राकेशजी और प्रदीपजी पैसे नहीं देंगे. उन के पैसे आप से वसूले गए हैं. हैडमास्टरजी और बड़े साहब के पैसे मैं ने दिए हैं.’’ ‘‘यह तो नाइंसाफी हुई न.’’

‘‘यहां पर ऐसे ही चलता है. किसी भी सरकारी स्कूल में ऐसे ही होता है. सीनियर लोग जैसा कहते हैं, वैसा ही करना पड़ता है. आप अभी नई हैं.’’

एक हफ्ते बाद औफिस से ट्रेनिंग की चिट्ठी आई. सीमा जानती थी कि उसे ही भेजी जाएगी. दूसरे हफ्ते फिर से ट्रेनिंग की चिट्ठी आई. फिर से उसे ही भेजी गई. कभी कोई मीटिंग हो तो भी उसे जाना पड़ता था. क्लास में 20 छात्र थे, लेकिन तकरीबन 12 छात्र ही रोज आते थे.

सीमा ने बहुत बार उन के घर के चक्कर लगाए. लेकिन जब तक उन्हें बुलाने कोई घर नहीं जाता था, तब तक वे स्कूल में आते नहीं थे. हर दिन उन छात्रों को बुलाना पड़ता था.

एक दिन सीमा के पड़ोस में रहने वाले राजू का पुराना स्कूल बैग उस ने अपने स्कूल की एक छात्रा को दे दिया. वह लड़की स्कूल में बैठती ही नहीं थी. अपनी किताबों वाली थैली क्लास में रख कर वह भाग जाती थी. लेकिन पुराना ही सही स्कूल बैग मिलने के बाद वह स्कूल में रोजाना आने लगी. यह देख कर सीमा को भी अच्छा लगने लगा था.

अब इस स्कूल में सीमा को 3 साल हो चुके थे. राकेशजी, मदनजी, प्रदीपजी और हैडमास्टरजी रोजाना एक न एक टेढ़ी बात तो बोलते ही थे, पर अजीत सर अपने शांत और मजाकिया स्वभाव से उसे शांत कर देते थे. अजीत सर का उस के प्रति प्यार भरा रवैया बाकी स्टाफ को पसंद नहीं आता था.

एक दिन अजीत सर और वे बाकी शैतान औफिस में एकसाथ बैठे थे.

‘‘क्यों भई, क्या मैडमजी से शादी करने का इरादा है?’’ राकेशजी ने पूछा. ‘‘नहीं तो,’’ अजीत सर बोले.

‘‘करना भी मत. मैडमजी हमारी बिरादरी से नहीं हैं और फिर स्कूल में ही लव मैरिज के चक्कर में सस्पैंड हो जाओगे. टीचर लोगों को लव मैरिज करना अलाउड नहीं होता. पता है न भैया,’’ मदनजी बोले.

अजीत सर ने कुछ नहीं कहा, क्योंकि मन ही मन तो वे सीमा से ही शादी के ख्वाब देख रहे थे.

एक दिन बड़े साहब सीमा की क्लास में आए. क्लास में छात्र कम थे.

‘‘20 में से सिर्फ 15 ही छात्र…’’ उन्होंने पूछा. ‘‘जी… रोज तो आते हैं.’’

‘‘आज मैं आया हूं, इसलिए नहीं आए हैं क्या?’’ ‘‘जी…’’ जवाब में क्या कहा जाए, सीमा की समझ में नहीं आ रहा था.

‘‘उठो बेटे, तुम्हारा नाम क्या है?’’ बड़े साहब ने एक छात्र से पूछा. ‘‘जी, निखिल.’’

‘‘ब्लैक बोर्ड पर अपने किसी एक दोस्त का नाम लिखो.’’

निखिल ने अपने दोस्त का नाम पीयूष की जगह पिउष लिखा.

‘‘क्या पढ़ाती हैं मैडमजी आप बच्चों को. अच्छा, तुम उठो. तुम्हारा नाम क्या है?’’ ‘‘जी, स्नेहल.’’

‘‘सूर्योदय और सूर्यास्त किस दिशा में होता है?’’

‘‘सूर्योदय पूरब दिशा से होता है और सूर्यास्त…’’ स्नेहल ने जवाब नहीं दिया.

बड़े साहब सीमा पर चिल्लाने लगे, ‘‘नोटिस दूं क्या आप को? दूं आप को नोटिस?’’

सीमा नजरें झुका कर खड़ी हो गई. दूर खड़े हैडमास्टरजी मुसकरा रहे थे. बड़े साहब क्लास से निकल गए. सीमा अजीत सर की क्लास में गई.

‘‘मुझे पता है, हैडमास्टरजी जानबूझ कर बड़े साहब को मेरी क्लास में ले कर आए थे. बड़े साहब ने मुझे डांटा तो उन के कलेजे को ठंडक पहुंची होगी.’’

‘‘अगर आप एक कप चाय पिला देतीं तो…’’

‘‘मुझ से ज्यादा तनख्वाह तो ये लोग लेते हैं और सारे काम मुझ से ही कराते हैं. ये किसी और को ट्रेनिंग में क्यों नहीं भेजते, क्योंकि वे सब बड़े साहब को और उन के बीवीबच्चों को महंगेमहंगे तोहफे देते हैं.’’

‘‘अगर आप भी अपनी तरफ से कुछ गिफ्ट दे देतीं तो…’’

सीमा को पता था कि अजीत सर के पास उस का मन शांत नहीं होगा. वह फिर से अपनी क्लास में चली गई. शाम को घर में बरतनों का बहुत शोर हो रहा था.

बाबूजी ने आवाज दी, ‘‘सीमा, क्यों इतना शोर मचा रही हो?’’

‘‘बड़े साहब आए थे स्कूल में. कहते हैं कि नोटिस देंगे,’’ सीमा ने कहा.

‘‘तो देने दो न. सरकारी नौकरी में तो यह रोज की बात होती है,’’ बाबूजी बोले.

‘‘कह रहे थे कि पढ़ाती नहीं हो तो तनख्वाह क्यों लेती हो? मैं तो रोजाना पढ़ाती हूं, बच्चे पढ़ते नहीं तो क्या करूं? रोजाना आने वाले बच्चे भी आज घर रह गए. मैं क्या करूं?’’

‘‘मेरी प्यारी बेटी, इतना उदास मत हो. एक दिन सब अच्छा हो जाएगा,’’ बाबूजी ने भरोसा जताया.

लेकिन बच्चों ने बड़े साहब के सामने जवाब क्यों नहीं दिए? नोटिस दूंगा जैसे शब्द अब भी सीमा के कानों में चुभ रहे थे. साथी टीचरों की मुसकराती शक्लें नजरों से हट नहीं रही थीं.

जो होता है, अच्छे के लिए होता है, यह सोच कर सीमा ने नई शुरुआत की. शायद उस के पढ़ानेलिखाने में ही कुछ कमी है. यह सोच कर सीमा ने नए जोश से पढ़ाना शुरू किया, पर एक दिन उस के ट्रांसफर का और्डर आ गया.

सीमा का आज इस स्कूल में आखिरी दिन था. हैडमास्टरजी बताने लगे, ‘‘आप के ट्रांसफर में मेरा कोई हाथ नहीं है. मैं ने तो बड़े साहब को बताया था कि बच्ची है, जाने दीजिए. लेकिन उन्होंने मेरी नहीं सुनी.’’

‘‘500 रुपए दे देतीं, तो यह नौबत नहीं आती,’’ मदनजी बोले.

‘‘हमारा बड़ा साहब इतना सस्ता है, वह मुझे पता नहीं था,’’ सीमा ने कहा.

‘‘जाओ अब जंगल में. जानवरों के बीच रहना. रोजाना एक घंटा बस से जाना होगा. उस के आगे 5 किलोमीटर पैदल जाना होगा. रात को घर लौटते वक्त 8 बजेंगे. हमारी बेटी जैसी हो, इसलिए बता रहे हैं. दुनियादारी सीख लो. रिश्वत देना आम बात है,’’ प्रदीपजी बोले.

‘‘आप जैसे इनसानों के साथ रहने से बेहतर है कि मैं जानवरों के साथ रहूं. अगर आप पहले ही दिन मुझे अपनी बेटी मान लेते तो आज हालात ऐसे न होते प्रदीपजी.’’

दफ्तर के बाहर अजीत सर सीमा का इंतजार कर रहे थे.

‘‘कभी कोई परेशानी हो तो फोन जरूर कीजिएगा.’’

‘‘जी जरूर. इस स्कूल में सिर्फ आप ही मुझे याद करेंगे, ऐसा लगता है,’’ कह कर सीमा वहां से चली गई. Story in Hind

Story in Hindi : सांप का बच्चा

Story in Hindi. अरमान सिंह खूंख्वार डाकू था. लोग उस का नाम सुनते ही कांप उठते थे. हत्या, अपहरण और लूट जैसे कई संगीन मामलों में पुलिस को उस की तलाश थी.

अरमान सिंह का बेटा था रमेश. स्मार्ट और शरीफ. वह कालेज में पढ़ता था, लेकिन कालेज के तमाम छात्र उस से कटेकटे से रहते थे. उस के बारे में कहा जाता कि ‘सांप का बच्चा आखिर सांप ही होता है’.

रमेश को अपने पिता की खुराफाती जिंदगी बिलकुल पसंद नहीं थी. उस ने कई बार उन से कहा भी था कि वे डाका डालना छोड़ दें, लेकिन हर बार अरमान सिंह के चेहरे पर फीकी मुसकान थिरक उठती. वह कहता, ‘बेटा, मैं जुर्म की दुनिया में इतना आगे बढ़ चुका हूं कि अब पीछे मुड़ना मुमकिन नहीं. अगर मैं पीछे मुड़ना चाहूंगा, तो पुलिस मुझे मार डालेगी. बेहतर यही होगा कि मुझे  मेरे हालात पर छोड़ दो. कभी न कभी तो मेरा अंत हो ही जाएगा.’

रमेश अपने पिता की मजबूरी जान कर चुप हो जाता था.

उस साल प्रदेश की सरकार समय से पहले गिर गई. नतीजतन, राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया. पहले जो गुंडे और डाकू बेखौफ हो कर घूमा करते थे, वे अब गीदड़ों की तरह मांदों में छिप कर रहने लगे. गांव के लोगों को नया बल मिला. वे बेखौफ हो कर गुंडों की खबर पुलिस को देने लगे.

एक दिन आधी रात के वक्त सन्नाटे को चीरती हुई दूर से फायरिंग की आवाज आ रही थी. इस आवाज से रमेश की नींद टूट गई. वह बेचैनी से कमरे में टहलने लगा.

अचानक उसे लगा, जैसे गोलीबारी की आवाज नजदीक आती जा रही है. उस ने खिड़की खोल कर बाहर झांका, तो उस के मुंह से चीख निकल गई. खून से लथपथ अरमान सिंह बदहवास सा भागा आ रहा था और पुलिस के दर्जनों जवान गोलियां बरसाते हुए उस का पीछा कर रहे थे.

रमेश के देखते ही देखते अरमान सिंह का जिस्म छलनी हो गया और वह अपनी आखिरी चीख के साथ वहीं ढेर हो गया. रमेश को अपने पिता की मौत का गम तो बहुत हुआ, पर दिल में कहीं न कहीं चैन का एहसास भी हुआ.

चौधरी दिलीप सिंह गांव के महाजन थे. गांव के गरीब और लाचार किसानों को कर्ज दे कर एक का 3 वसूल करना उन का धर्म था.

जब अरमान सिंह जिंदा था, तब वह चौधरी दिलीप सिंह से मासिक रंगदारी लिया करता था. कभीकभी ऐसा होता कि अगर अरमान सिंह को आने में देर हो जाती, तो चौधरी साहब खुद ही जा कर रंगदारी दे आते.

अरमान सिंह की मौत से चौधरी दिलीप सिंह भी आजादी का एहसास कर रहे थे.

घर में जो जमापूंजी थी, उसे रमेश ने श्राद्ध के समय ब्राह्मणों को दान वगैरह देने में खर्च कर दिया. कुछ दिनों बाद वह खुद भी एकएक चीज को तरसने लगा. गांव के लोग तो उस से कन्नी काटते ही रहते थे, कोई भी मदद करने को तैयार न था.

उस से किसी को भी हमदर्दी न थी, क्योंकि उन्हें यह यकीन था कि सांप का बच्चा सांप ही होता है. क्या पता कहीं दूध पिलाने वाले को ही डस ले.

फसल के कर्ज के लिए चौधरी साहब के दरबार में किसानों की भीड़ बढ़ने लगी थी. लोग वहां जाते, अपना दुखड़ा सुनाते, कर्ज लेते और चौधरी साहब का गुण गाते हुए लौट जाते.

एक दिन रमेश भी हिम्मत कर के चौधरी दिलीप सिंह के दरबार में जा पहुंचा. चौधरी साहब तब आराम फरमा रहे थे. उसे देखते ही वे बोले, ‘‘अरे बेटा, तुम… आओआओ, क्या काम है?’’

‘‘जी… आप तो जानते ही हैं कि खेती का समय है और मेरे पास फूटी कौड़ी तक नहीं है. अगर खादबीज के लिए कुछ पैसे दे देते, तो बड़ी मेहरबानी होती. फसल कटते ही मैं सूद समेत वापस कर दूंगा.’’

चौधरी साहब सोच में पड़ गए. वे रमेश को कर्ज नहीं देना चाहते थे और साथ ही उसे नाराज भी नहीं करना चाहते थे. इसलिए कुछ देर सोच कर वे बोले, ‘‘कर्ज देने में कोई हर्ज तो नहीं है बेटे… तुम कोई गैर थोड़े हो… लेकिन तुम देर से आए, मेरे पास जो पैसे थे, वे मैं किसानों में बांट चुका हूं…’’

फिर कुछ देर रुक कर वे बोले, ‘‘खैर, जब तुम मेरे पास आ गए हो, तो बेफिक्र रहो… 5-6 दिनों में मैं कोई न कोई इंतजाम कर ही दूंगा.’’

चौधरी साहब की मीठी बातों को रमेश अच्छी तरह जानता था. वह चुपचाप वहां से लौट आया.

रमेश के जाने के बाद चौधरी साहब चिंता में डूब गए कि कहीं यह सांप का बच्चा कोई गड़बड़ न कर दे.

सुबह रमेश चौधरी साहब के यहां कर्ज लेने गया था और उसी रात उन के यहां डाका पड़ गया. डाकू नकदी और काफी जेवर लूट कर ले गए. उन्होंने चौधरी साहब को खूब पीटा भी था.

डकैती होने के बाद पुलिस की कई जीपें गांव में आईं. थानेदार ने अपने कड़क पुलिसिया अंदाज में चौधरी साहब से कई सवाल पूछे. उस का आखिरी सवाल था, ‘‘क्या आप को किसी पर शक है?’’

चौधरी साहब ने कराहते हुए जवाब दिया, ‘‘हां, अरमान सिंह के बेटे रमेश पर मुझे  शक है.’’

थानेदार की बांछें खिल गईं, ‘‘आप शक की बात करते हैं जनाब, उस का तो पूरा खानदान ही डकैतों का है. यह जरूर उसी के गिरोह का काम होगा. मैं अभी जा कर उस के घर की तलाशी लेता हूं. आप बेफिक्र रहिए.’’

थानेदार ने तुरंत अपने दलबल के साथ रमेश का घर घेर लिया और तलाशी ली. फिर उसे पकड़ कर थाने लाया और रातभर खूब पीटा गया. लेकिन पक्के सुबूतों और गवाहों के न होने के चलते उसे छोड़ दिया गया.

कानून की नजरों में रमेश बेकुसूर साबित हो चुका था, लेकिन समाज की नजरों में उस पर ऐसा काला धब्बा लगा, जिसे मिटाने में शायद सदियां लग जातीं.

लोगों के दिलोदिमाग में यह बात बैठ गई कि रमेश ने भी अपने पिता के नक्शेकदम पर चलना शुरू कर दिया है. इस तरह समाज के तमाम लोग उसे डर और नफरत की नजर से देखने लगे.

इस बात को कई महीने बीत गए. एक दिन की बात है, अचानक गांव की उत्तर दिशा में आग की लपटें उठती दिखाई पड़ीं. चारों ओर से लोग एकदूसरे को मदद के लिए पुकारते हुए दौड़ पड़े.

वहां का नजारा बड़ा ही डरावना था. चौधरी दिलीप सिंह की हवेली में आग लगी हुई थी. आग की लपटें पूरी हवेली को अपनी गिरफ्त में ले चुकी थीं.

काले बादलों की तरह हर तरफ आसमान में काला धुआं छा गया था. चारों ओर चीखपुकार मची थी. लोग बालटियों में पानी भरभर कर आग पर फेंक रहे थे, पर लपटें आकाश छूती जा रही थीं.

अचानक एक औरत की जोरजोर से चिल्लाने की आवाज उभरने लगी. लोगों ने देखा कि वह औरत चिल्लाती हुई आग की तरफ भागी जा रही है.

3-4 लोगों ने झट से उसे कस कर दबोच लिया. एक बोला, ‘‘अरे, यह तो चौधराइन है… पर यह आग की तरफ क्यों भागी जा रही है?’’

‘‘मरने का इरादा तो नहीं है?’’ दूसरे ने कहा.

चौधरी साहब की बीवी रोती हुई चिल्लाए जा रही थी, ‘‘मुझे छोड़ दो. मेरी बेटी जल रही है… कोई मेरी बेटी को बचा ले… हाय, मेरी बेटी…’’

सैकड़ों लोगों की नजरें जलती हवेली की तरफ उठी थीं. उन्होंने देखा कि चौधरी साहब की 7 साल की लड़की पिंकी लपटों के बीच घिरी छटपटा रही थी, पर किसी में यह हिम्मत न थी कि वह आगे बढ़ कर उस को बचा ले. कोई भी अपनी जान आफत में नहीं डालना चाहता था.

अचानक कंबल ओढ़े हुए एक नौजवान तेजी से आग की लपटों को चीरता हुआ पिंकी के पास जा पहुंचा. उस ने पलक झपकते ही पिंकी को कंबल में लपेटा और दोबारा लपटों को चीरता हुआ बाहर आ गया.

बाहर आते ही पिंकी कूद कर अपनी बेहाल मां से जा मिली, लेकिन तब तक उस नौजवान के शरीर में आग लग चुकी थी. वह तड़प कर गिर पड़ा. देखते ही देखते उस के बदन से आग की लपटें उठने लगीं. लोगों ने झट से उस पर पानी डाला, तो आग बुझ गई.

सब ने देखा कि अधजला रमेश दर्द से तड़प रहा था. चारों ओर मची अफरातफरी अचानक शांत हो गई. लोग सन्न खड़े रमेश को देख रहे थे.

उधर रमेश की आंखों के सामने अंधेरा तैरने लगा और इधर लोगों की नफरत पछतावे में बदलती चली गई.

रमेश ने अपनी बुझती आंखों से पिंकी की तरफ देखा. वह डरी हुई मां से चिपटी थी. रमेश के चेहरे पर संतोष की एक मुसकान उभरी और इस के साथ ही उस ने आखिरी सांस ली.

किसी ने दर्दभरी आवाज में धीरे से कहा, ‘‘काश, हम पहले यह समझ पाते कि रमेश डाकू नहीं है.’’

लोगों की आंखों से आंसू बह रहे थे. हवेली में लगी आग की लपटें बुझने लगी थीं, लेकिन बड़ीबड़ी चिनगारियां अभी भी धधक रही थीं.

चौधरी दिलीप सिंह आंखें बंद किए बुत बने खड़े थे, मानो अपनेआप से किसी सवाल का जवाब पूछ रहे हों. Story in Hindi

Middle Class Life : मकान बनाने से पहले

Middle Class Life. रोटी, कपड़ा और मकान इनसान की बुनियादी जरूरतें हैं. मेरे पास कपड़े थे और रोटियां भी, लेकिन मकान किराए का था. मेरे पिताजी का कहना था कि इस बुनियादी जरूरत को जल्दी से जल्दी पूरा कर लेना चाहिए, क्योंकि दूसरे के मकान में थूकने का भी डर होता है और अपने मकान में मनमानी करने की पूरी छूट होती है, इसलिए इस मनमानी को पूरा करने के लिए मेरे मन में उतावलापन मचा हुआ था.

लेकिन मकान का इंतजाम करना बड़ी टेढ़ी खीर होती है. मैं ने नौकरी करते हुए रिश्वतखोरी को बढ़ावा दिया, ताकि जैसेतैसे मैं अपना एक गरीबखाना बना सकूं.

मेरे हर दोस्त ने अपना यह शौक पलक झपकते ही पूरा कर लिया था. कई तो ऐसे थे, जिन के पास हर आवास योजना में एक मकान था. वे हमेशा मकान जैसी अचल जायदाद बनाने में लगे रहे और मैं हमेशा चंचला लक्ष्मी के पीछे पड़ा रहा.

एक दिन मेरे साथ अनहोनी हो गई. मैं ने एक हाउसिंग सोसाइटी में मकान लेने का फार्म भरा हुआ था. इत्तिफाक कहिए कि मुझे प्लौट अलौट हो गया.

यह सुनते ही मेरा शरीर रोमांचित हो उठा. पत्नी समेत बच्चे बल्लियां उछल पड़े. मदहोशी का एक ऐसा आलम था कि उसे मैं यहां बयान नहीं कर सकता.

मुझे रातदिन मकान के रंगीन सपने आने लगे. खाली जमीन पर सपनों में कोठी बनने लगी. उस को बनाने को ले कर घरेलू बैठकों का सिलसिला शुरू हो गया. नक्शे बनने लगे. सुझाव आने लगे.

पत्नी का कहना था कि अमुक कमरे में पंखा लगेगा, तो मेरा सुझाव था कि कूलर लगवाया जाएगा. बच्चे पढ़ने के बजाय चुपकेचुपके कोर्स की कौपियों में मकान के नक्शे बनाने लगे. बाहर लौनपेड़पौधे और ऊपर खुली बालकनी पर जोर दिया जाने लगा.

मैं इस सारी मुहिम में शामिल तो होता था, लेकिन हमेशा एक हताशा मुझे घेरे रहती थी कि मकान की नींव कैसे खुद पाएगी.

मेरे एक दोस्त हैं महेशजी. 2-3 महीने बाद एक दिन जब वे अचानक मिले, तो उन का हुलिया व चेहरे का भूगोल देख कर मेरे होश फाख्ता हो गए.

मैं ने पूछा, ‘‘क्यों, क्या मकान बनवा रहे हो?’’ वे खुश हो कर बोले, ‘‘आप को कैसे पता चला?’’

मैं ने कहा, ‘‘वह तो आप की शक्ल देख कर ही पता चल गया है. यह आप की बढ़ी हुई दाढ़ी, पिचके हुए गाल, धंसी हुई आंखें, बिना इस्तिरी किए कपड़े… कौन कह सकता है कि आप मकान नहीं बनवा रहे हैं?’’

वे बोले, ‘‘बस, पूछिए मत. भूल कर भी इस करमजले मकान का नाम मत लेना भाई. मुझे पता होता कि यह ऐसे गुल खिलाएगा, तो मैं नींव में सब से पहले खुद कूद जाता.’’ ‘‘क्यों, ऐसा क्या हुआ?’’

‘‘हुआ यह कि जनाब, इस देश में जिन की पत्नियां कमाएं और जो बीड़ी पीता हो, उस का तो ऊपर वाला ही मालिक है. बस, मकान में जो कारीगर आते हैं, वे हर 15 मिनट के बाद बीड़ी पीते हैं. भला बताइए कि वे आप की जान नहीं लेंगे, तो और क्या करेंगे?’’ ‘‘लेकिन, मैं क्या करूं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘करना क्या है, इमली के पत्ते पर दंड पेलिए. मकान तो साक्षात काल है, जो मुंह खोले खड़ा है. जो जाता है, वही उस में समा जाता है,’’ महेशजी बोले.

मैं ने कहा, ‘‘जरा, सोचसमझ कर बोलिए. मकान के मामले में कुछ तो अच्छा बोलिए.’’

उन्होंने कहा, ‘‘तुम मेरे हालात देखने के बाद अगर रिस्क लेना चाहते हो, तो शौक से ले लो. मकान वही बना सकता है, जिस का दो नंबर का धंधा हो.’’

‘‘जब एक नंबर ही नहीं है, तो दो नंबर का सवाल ही कहां से आता है?’’

‘‘फिर तो हरि कीर्तन करो. मकान एक ऐसा लड्डू है, जिसे खाने वाला और नहीं खाने वाला दोनों पछताते हैं. मैं ने बनाया है, जान गले में आ गई. लोन के तमाम फौर्म भर कर पैसा उगाह लिया, लेकिन मकान अभी तक अधूरा है. मैं समझता हूं कि अगर मैं ने मकान पूरा बनाया, तो या तो मकान रहेगा या फिर मैं,’’ वे बोले.

यह सुन कर मेरे भी रोंगटे खड़े हो गए. मैं बस इतना ही कह पाया, ‘‘अगर ऐसी बात है, तो मैं मकान न बनाने की शपथ खाता हूं. जिस मकान को बनाने से आदमी को जिंदा ही स्वर्ग नसीब होता है, तो फिर मैं किराए के मकान में ही रह लूंगा.’’

वे हंसते हुए चले गए. उस दिन के बाद से मैं रोज नक्शे बनाता हूं, मकान के स्टाइल पर विचार करता हूं, लेकिन जमीन की बाउंड्रीवाल ही नहीं बन पाती, तो मकान क्या बनेगा. Middle Class Life

Hindi Story : औलाद की चाहत – कैसे भरी सायरा की कोख

Hindi Story. उस्मान की शादी को 5 साल हो गए थे, मगर अभी भी उसे बाप होने का सुख नहीं मिला था. उस्मान की बीवी सायरा की गोद नहीं भरी तो उस्मान के अब्बा बेचैन रहने लगे. उन्हें यह चिंता सताने लगी कि वे पोते या पोती का मुंह देखे बिना ही इस दुनिया से चले जाएंगे.

तभी किसी ने उन्हें बताया कि पास वाले गांव में एक पहुंचे हुए मुल्लाजी आए हुए हैं. वे जिस किसी को भी तावीज देते हैं, उस की हर मुराद पूरी हो जाती है.

इतना सुनना था कि उस्मान के अब्बा अगले ही दिन उन मुल्लाजी के पास पहुंच गए.

मुल्लाजी ने कहा, ‘‘मैं घर आ कर पहले आप की बहू को देखूंगा कि उस पर किस का साया है. और हां, साए को दूर करने में खर्चा भी आएगा.’’

‘‘आप पैसे की परवाह मत करो, बस मेरे बेटे और बहू को औलाद का सुख दे दो.’’

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उस्मान के अब्बा उसी वक्त मुल्लाजी को अपने साथ ले आए और उन्हें बैठक में बिठा कर उन्होंने उस्मान व सायरा को बताया, ‘‘इन मुल्लाजी के तावीज से तुम्हारी औलाद की चाहत जरूर पूरी होगी, बस तुम दोनों को इन की हर बात माननी पड़ेगी.’’

थोड़ी देर के बाद उस्मान की बीवी सायरा को बैठक में बुलाया गया. जैसे ही मुल्लाजी की नजर सायरा पर पड़ी, वे उसे पाने के लिए बेताब हो गए. हों भी क्यों न, सायरा थी ही इतनी खूबसूरत. सुर्ख गाल, गुलाबी होंठ, गदराया बदन जिसे देखते ही कोई भी मदहोश हो जाए.

मुल्लाजी किसी भी कीमत पर सायरा को अपनी बांहों में भरना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अपनी चाल चली और उस के मखमली पेट पर हाथ रखते हुए उस्मान के अब्बा से कहा, ‘‘तुम्हारे एक दुश्मन ने जादूटोने से इस की गोद बांध रखी है. जब तक इस को खोला नहीं जाएगा, तब तक यह मां नहीं बन पाएगी.

‘‘इस काम में 3 दिन लगेंगे और यह काम रात को 12 बजे अकेले में बंद कमरे में करना पड़ेगा और इस में काफी पैसा भी लगेगा, क्योंकि जाफरान से 3 तावीज बनाने पड़ेंगे.’’

उस्मान और सायरा को तो औलाद की इतनी ज्यादा चाहत थी कि उन्होंने फौरन हां कर दी. उस्मान के अब्बा ने 50,000 रुपए उस ढोंगी मुल्लाजी को दे दिए. उन्होंने उन के घर में से एक कमरा ले लिया और कहा, ‘‘जब तक पूरा इलाज न हो, तब तक कोई भी कमरे में मेरी बिना इजाजत के अंदर न आए.’’

मुल्लाजी शाम ढलते ही कमरे के अंदर लुबान जला कर कुछ बुदबुदाने लगे. कभी उन की आवाज तेज हो जाती, तो कभी शांत.

मुल्लाजी कभी किसी से बात करने का नाटक करते और चिल्लाते, ‘‘तू इसे छोड़ कर चला जा, वरना तु?ो यहीं भस्म कर दूंगा. क्यों इस बच्ची की कोख पर बैठा है? क्यों इसे मां नहीं बनने दे रहा है? इस मासूम ने तेरा क्या बिगाड़ा है?’’

इस तरह मुल्लाजी ने कई घंटे तक यह नाटक जारी रखा और रात ढलते ही उन्होंने सायरा को अपने कमरे में बुलाया और उसे एक तावीज देते हुए बोले, ‘‘इसे अपनी शर्मगाह में रख लो और चुपचाप लेट जाओ. एक घंटे तक बिलकुल भी हिलनाडुलना नहीं.

‘‘और हां, इस एक घंटे के लिए अपने बदन पर कोई भी सिला हुआ कपड़ा मत पहनना. बिना सिला हुआ कपड़ा जैसे चादर वगैरह से अपना बदन ढक लो.’’

सायरा तो औलाद की चाहत में अंधी हो चुकी थी. वह उस पाखंडी मुल्लाजी की हवस भरी नजरों को भांप नहीं पा रही थी. सायरा ही क्या, उस का शौहर और ससुर भी औलाद की चाहत में कुछ नहीं सम?ा पा रहे थे, इसलिए उन्होंने सायरा को उस पाखंडी मुल्लाजी के पास अकेले बंद कमरे में भेज दिया था. उन की आंखों पर अंधविश्वास की पट्टी जो बंधी हुई थी.

उधर बंद कमरे में सायरा ने अपने बदन से सारे कपड़े अलग किए और चादर ओढ़ कर एक चटाई पर लेट गई.

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उस पाखंडी मुल्लाजी ने सायरा के पास आ कर अगरबत्ती जलाई, पूरे कमरे को खुशबू से महकाया और कुछ बुदबुदाने लगे. फिर वे सायरा से बोले, ‘‘अपनी आंखें बंद कर के चुपचाप लेटी रहो और कुछ भी बोलने की कोशिश मत करना, वरना सारा कियाधरा बेकार हो जाएगा, फिर तुम कभी भी मां नहीं बन पाओगी.’’

सायरा चुपचाप लेटी थी और पाखंडी मुल्लाजी तावीज ले कर उस के होंठों से रगड़ते हुए कुछ बुदबुदाने का नाटक करते हुए धीरेधीरे उस के बदन को सहलाने लगे. उन की इस हरकत पर सायरा हैरान थी, पर औलाद पाने की चाहत में वह कुछ बोलने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी, जिस का वे पाखंडी मुल्लाजी फायदा उठा रहे थे.

मुल्लाजी सायरा का बदन सहलाते रहे और उस तावीज को उस की शर्मगाह के पास ले जा कर छेड़छाड़ करने लगे. जल्द ही सायरा की जवानी उफान पर आ गई और वह मुल्लाजी की इस हरकत से मदहोश होने लगी.

सायरा की हवस जाग उठी थी. पाखंडी मुल्लाजी की इस हरकत ने उस के अंदर जोश भर दिया और इस का फायदा उठा कर उस मुल्लाजी ने उस के साथ खूब मजा किया. औलाद पाने की चाहत में सायरा उन के सामने पूरी तरह से बिछ चुकी थी.

इसी तरह उन पाखंडी मुल्लाजी ने 3 दिन तक सायरा की देह के मजे लिए और उस के जिस्म से खूब खेला. 3 दिन बाद उन्होंने उस्मान और उस के अब्बू से कहा, ‘‘जल्दी ही तुम्हें खुशखबरी मिल जाएगी,’’ और वहां से चले गए.

एक हफ्ता गुजर गया, पर सायरा को उम्मीद की कोई किरण नजर न आई. वह सम?ा चुकी थी कि उन पाखंडी मुल्लाजी ने दौलत के साथसाथ उस की इज्जत भी लूट ली है.

उस्मान और उस के अब्बू हैरान थे कि उन की बहू अभी भी पेट से नहीं हुई. उन्होंने पास के गांव जा कर उन मुल्लाजी से मिलना चाहा, तो पता चला कि वे तो यहां एक परिवार से लाखों रुपए ले कर भाग गए हैं.

अब उस्मान और उस के अब्बा को अपने ऊपर पछतावा हो रहा था कि वे क्यों पाखंडी मुल्लाजी की बातों में आ गए. बाद में उन्होंने एक अस्पताल में जा कर एक लेडी डाक्टर से सायरा का चैकअप कराया, तो उन्होंने बताया कि सायरा की बच्चेदानी में सूजन है, जिस की वजह से वह मां नहीं बन पा रही है. 2-3 महीने के इलाज से सब ठीक हो जाएगा.

और हुआ भी यही. 3 महीने के इलाज के बाद सायरा को बच्चा ठहर गया और वक्त पूरा होने के बाद उस ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया.

इस तरह न जाने कितनी सायरा औलाद की चाहत में अपनी इज्जत गंवा बैठती हैं और न जाने कितने उस्मान दौलत के साथसाथ अपने घर की आबरू भी पाखंडी मुल्लाओं को सौंप देते हैं. Hindi Story

Romantic Story : नो बौल विद फ्री हिट : प्यार की सच्ची कहानी

Romantic Story. कोलकाता से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर समीर ने कुछ  ही दिन पहले नौकरी जौइन की थी. वह वहां के गार्डन रीच वर्कशौप में ट्रेनिंग ले रहा था जो रक्षा मंत्रालय के अधीन भारत सरकार का एक उद्यम है. वहां जहाज निर्माण से ले कर उन के रखरखाव की भी सुविधा है.

कोलकाता के मटियाबुर्ज महल्ला में स्थित गार्डन रीच वर्कशौप देश का जहाज बनाने का प्रमुख कारखाना है. यह मुख्य शहर से दूर है. समीर झारखंड के धनबाद शहर का रहने वाला है, जिसे कोल कैपिटल औफ इंडिया भी कहा जाता है. यही उस की एक साल की ट्रेनिंग थी. कोलकाता में वह धर्मतल्ला में एक कमरे के फ्लैट में एक अन्य युवक के साथ शेयर कर के रहता था.

मटियाबुर्ज धर्मतल्ला से लगभग 13 किलोमीटर दूर है. इस का भी एक इतिहास है, अवध के नवाब वाजिद अली शाह ने अंगरेजों के चंगुल से भाग कर यहीं आ कर शरण ली थी. मटियाबुर्ज बहुत गंदा इलाका था और वहां मुख्यता: अनस्किल्ड लेबर ही रहते थे. ज्यादातर मजदूर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से आते हैं.

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समीर वर्कशौप जाने के लिए फ्लैट से थोड़ी दूर पैदल चल कर धर्मतल्ला बस स्टौप से सुबह 8 बजे की बस पकड़ता था. 9 बजे तक उसे औफिस पहुंचना होता था. उस के फ्लैट से कुछ दूरी पर स्थित एक फ्लैट से एक युवती भी रोज उसी बस को पकड़ती थी.

शुरू में तो समीर को उस में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन लगातार एक ही स्टैंड से रोज बस पकड़ने, एक ही बस में आनेजाने से समीर का उस युवती के प्रति खासा आकर्षण हो गया था.

वैसे, दोनों में कभी कोई बातचीत नहीं हुई थी, पर कभीकभी नजरें चुरा कर समीर उसे देख लेता था. वह गेहुएं रंग के चेहरे वाली भोलीभाली युवती थी. कभीकभी भीड़ के कारण यदि उसे सीट नहीं मिलती तो वह उस युवती के बगल वाली लेडीज सीट पर जा बैठता था. तब वह युवती थोड़ा और सिमट कर खिड़की से बाहर देखने लगती थी. कभी वह उसे देखती तो समीर झट से अपनी आंखें दूसरी ओर फेर लेता.

समीर उस से बातचीत करना चाहता था पर खुद पहल न कर पाया. उस युवती ने भी उस से आगे बढ़ कर कभी हायहैलो तक न की.

एक दिन अचानक बसों की हड़ताल हो गई. सुबह तो समीर और उस युवती को बस मिल गई थी, पर लौटते वक्त बसें नहीं चल रही थीं. तो समीर अपने बौस की कार से घर आ रहा था. कंपनी की गाड़ी थी, ड्राइवर चला रहा था. कार में पीछे की सीट पर समीर अपने बौस और कंपनी के एक और अफसर के साथ बैठा था तभी समीर ने खिद्दीरपुर बस स्टौप पर उस युवती को देखा. पहले तो उसे संकोच हुआ पर उस ने साहस कर बौस से उस युवती को लिफ्ट देने की विनती की.

बौस ने हंसते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है, कोई चक्कर चल रहा है क्या?’’

समीर बोला, ‘‘नो सर, मैं तो उस का नाम भी नहीं जानता. बस, काफी दिनों से हम दोनों एक ही बस पकड़ते हैं. आज तो उसे बस मिलने से रही और टैक्सी की भी डिमांड इतनी ज्यादा है कि वह भी उसे शायद न मिले.’’

ड्राइवर ने कार रोक कर हौर्न बजाया पर युवती ने उन की ओर देखा ही नहीं. तभी समीर ने खिड़की से बाहर सिर निकाल कर आवाज दी. ‘‘हैलो मैडम, आप ही को बोल रहा हूं. आज कोई बस नहीं मिलने वाली और टैक्सी की भी किल्लत है. हमारी कार में बैठ जाएं, बौस हमें धर्मतल्ला स्टौप पर ड्रौप कर देंगे.’’

पहले तो वह संकोच कर रही थी, पर बाद में समीर के कहने पर वह आ कर ड्राइवर की बगल वाली सीट पर थैंक्स कह कर बैठ गई. पिछली सीट पर तो 3 लोग पहले से ही बैठे थे.

धर्मतल्ला स्टौप पर उतर कर समीर और उस युवती ने बौस को थैंक्स कहा. समीर का भी थैंक्स करते हुए वह अपने घर की ओर चल दी. समीर सोच रहा था कि आज वह थैंक्स के अलावा और कुछ भी बात करेगी, पर ऐसा नहीं हुआ. समीर मन ही मन चिढ़ गया और उस ने भी आगे कुछ नहीं कहा. दोनों अपनेअपने घर की ओर चल दिए.

लेकिन अगले दिन बस स्टौप पर समीर ने उस युवती से गुडमौर्निंग कहा तो उस ने होंठों ही होंठों में कुछ कहा और मुसकरा कर सिर झुका कर बस का इंतजार करने लगी. इसी तरह कुछ दिनों तक समीर गुडमौर्निंग कहता और वह होंठ फड़फड़ा कर धीरे से गुडमौर्निंग का जवाब दे देती.

एक बार 2 दिनों से वह युवती बस स्टौप पर नहीं मिली तो समीर का मन बेताब हो गया. तीसरे दिन जब वह मिली तो समीर ने अपने पुराने अंदाज में गुडमौर्निंग कहा. युवती आज खुल कर मुसकराई और उस ने धीरे से गुडमौर्निंग कहा. बस आई और दोनों बस में चढ़े, लेकिन युवती से कोई बात नहीं हो पाई.

अगले दिन जब समीर को युवती की बगल वाली सीट पर बैठने का मौका मिला तो वह उस से पूछ बैठा, ‘‘आप की तबीयत तो ठीक है? आप इधर बीच में 2 दिन नहीं आई थीं.’’

‘‘ऐसे ही, घर में कुछ काम था,’’ युवती ने जवाब दिया.

समीर बोला, ‘‘अच्छा, अपना नाम तो बताएं. मेरा नाम समीर है.’’

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फिर दोनों हंस पड़े. दरअसल, समीर की शर्ट की जेब पर उस का आईडी कार्ड टंगा था, जिसे युवती ने पहले ही देख लिया था. अगले दिन बस स्टौप पर समीर ने फिर उस का नाम पूछा तो वह बोली, ‘‘समझ लें, जिस का कोई नाम नहीं होता उसे क्या कहते हैं…’’

‘‘उसे तो अनामिका कहते हैं,’’ समीर बोला. इस बीच कोई लेडी पैसेंजर आ गई और समीर को सीट छोड़नी पड़ी. उस ने खड़ा होते हुए कहा, ‘‘तब तो तुम्हारा नाम अनामिका होना चाहिए.’’

अब दोनों में थोड़ीबहुत बातचीत होने लगी थी और कुछ मेलजोल भी बढ़ गया था. कुछ हफ्ते बाद एक दिन औफिस से समीर को जल्दी छुट्टी मिली तो वह बस से लौट रहा था कि रास्ते से अनामिका भी उसी बस में चढ़ी. दोपहर में बस में उतनी भीड़ नहीं थी तो वह भी समीर के बगल वाली सीट पर बैठ गई और पूछा, ‘‘आज का दिन वर्कशौप में कैसा रहा? इस समय तो कभी तुम्हें लौटते देखा नहीं है.’’

समीर बोला, ‘‘आज तो बौस ने मुझे सरप्राइज दिया है. उन्होंने कहा कि बाकी 2 महीने की ट्रेनिंग रांची के मैरिन इंजन प्लांट में लेनी है. कंपनी की एक फैक्टरी वहां भी है और टे्रनिंग के बाद मेरी पोस्टिंग भी उसी फैक्टरी में होगी. 3-4 दिनों में जाना होगा.’’

अनामिका बोली, ‘‘चलो, अच्छी बात है. तुम्हारी ट्रेनिंग पूरी होने जा रही है. यहां मेरे औफिस में भी मेरे ट्रांसफर की बात चल रही है.’’

अगले दिन समीर को वर्कशौप नहीं जाना था, फिर भी वह रोज की तरह बस स्टौप पर अनामिका से मिलने पहुंच गया. पर आज वह नहीं आई थी. दूसरे दिन वह समीर को उसी स्टौप पर मिली तो उस ने पूछा, ‘‘क्या बात है, मैं कल भी यहां आया था पर तुम नहीं मिलीं?’’

अनामिका बोली, ‘‘कल लड़के वाले मुझे देखने आए थे, इसलिए औफिस नहीं जा सकी थी.’’

समीर ने निराश होते हुए बस ‘ओह’ कहा और चुप हो गया.

अनामिका ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

समीर के ‘कुछ नहीं’ कहते ही बस आ गई और अनामिका चढ़ते हुए बोली, ‘‘शाम को 4 बजे वाली बस से लौटूंगी.’’

हालांकि अनामिका ने उसे शाम को स्टौप पर मिलने को नहीं कहा था, पर समीर वहां मौजूद था. शायद अनामिका की भी यही इच्छा रही होगी. उस के बस से उतरते ही समीर बोला, ‘‘चलो, आज बगल वाले कौफी हाउस में बैठ कर कौफी पीते हैं.’’

अनामिका सहर्ष तैयार हो गई. दोनों ने साथ बैठ कर कौफी पी. वहां समीर ने पूछा, ‘‘कल तुम्हें लड़के वाले देखने आए थे न? तो मेरा विकेट तो डाउन हो गया न. मैं क्लीन बोल्ड हो गया.’’

अनामिका बोली, ‘‘नहीं. वह नो बौल थी. तुम आउट होने से बच गए.’’

‘‘क्या मतलब?’’ कहते हुए समीर के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई.

‘‘उन्होंने मुझे रिजैक्ट कर दिया,’’ अनामिका बोली.

‘‘पर ऐसा क्यों किया. जो भी हो, मेरे लिए तो अच्छा ही है. मुझे नो बौल पर एक और चांस तो मिला.’’

अनामिका बोली, ‘‘एक और चांस नहीं, फ्री हिट का मौका भी मिला है.’’

‘‘क्या मतलब?’’ समीर ने पूछा तो वह बैग से एक लिफाफा निकाल कर समीर की ओर बढ़ाती हुई बोली,

‘‘यह देखो, आज मुझे भी ट्रांसफर और्डर मिला है. मेरी पोस्टिंग भी रांची में हुई है, हुआ न नो बौल विद फ्री हिट.’’ और दोनों हंसते हुए कौफी हाउस से निकल पड़े. Romantic Story

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