Readers Problem: सच्ची सलाह

Readers Problem: मेरी उम्र 26 साल है और बिहार के पटना शहर में रहता हूं. मेरी अभी शादी नहीं हुई है, पर एक दोस्त है, जो मेरे ही साथ काम करती है.

वैसे तो वह बहुत अच्छी है और मु? पसंद भी करती है, पर मु? पर बहुत ज्यादा शक करती है. वह हमेशा मेरे फोन में यह चैक करती है कि मु? कौन सी लड़की मैसेज करती है या मैं सोशल मीडिया पर किस लड़की से बात करता हूं, जबकि कभी भी अपना फोन मु? नहीं दिखाती है. पूछने पर बोल देती है कि लड़की का फोन नहीं चैक करना चाहिए.

उस की इन बातों से मु? में बहुत ज्यादा तनाव रहने लगा है. मु? क्या करना चाहिए? यह बेहद आम बात है, पर अहम तभी मानी जाएगी जब आप उस लड़की को ले कर सीरियस हों और उस से शादी करने का सोच रहे हों. जैसे उस ने बड़ी चालाकी से अपना फोन देने से मना कर दिया है, वैसे ही आप भी कहें कि आजकल लड़कों का भी फोन चैक नहीं किया जाता, क्योंकि दोनों बराबर हैं. अभी तो ठीक है गाड़ी धक जाएगी, लेकिन शादी के बाद भी यही रवैया उस का रहा तो रोजरोज कलह होगी, इसलिए अभी से संभल जाइए.

मैं 24 साल की लड़की हूं. मैं हिमाचल प्रदेश के एक गांव में रहती हूं. वहां जब से पर्यटक ज्यादा आने लगे हैं, तो नशे का कारोबार भी बढ़ने लगा है. बहुत से छोटे गांव में भी लोग कुछ दिन के लिए ठहरने आते हैं और मौजमस्ती के नाम पर नशा करते हैं और पहाड़ों पर गंदगी फैलाते हैं. इतना ही नहीं, वे हुड़दंगी बन कर गंदी हरकतें भी करते हैं. गांव वाले बहुत ज्यादा परेशान रहते हैं. हम ऐसा क्या करें कि सांप भी मर जाए और लाठी भी टूटे?

आप के गांव के लोगों को सख्ती से काम लेना होगा. यह ठीक है कि आप पहाडि़यों के घर का चूल्हा टूरिस्टों के पैसे से ही जलता है, लेकिन इस का यह मतलब नहीं कि वे कुछ भी करते रहें, नशा भी फैलाएं, गंदगी भी करें और औरतों पर बुरी नजर भी डालें. यह सब रुक सकता है, बशर्ते सभी गांव वाले एकजुट हो जाएं और गांव के बाहर बोर्ड लगा दें कि इस गांव में नशा और गंदगी फैलाई तो इस की शिकायत तुरंत पुलिस को की जाएगी और उस से पहले गांव से गलत लोगों को खदेड़ दिया जाएगा.


मैं एक 42 साल का शादीशुदा आदमी हूं और दिल्ली में रहता हूं. मेरे 2 बच्चे हैं. मेरी पत्नी की उम्र 30 साल है और अब वह मु? से ज्यादा दूसरे मर्दों को रि?ाने में लगी रहती है. वह मेरे सामने ही पड़ोस के लोगों से बतियाती है और बेहूदा हंसीमजाक करती है. मेरे पूछने पर वह बोलती है कि सिर्फ मजाक करने में
क्या हर्ज है, मैं दिनभर घर पर अकेली रहती हूं तो कुछ तो टाइमपास हो.


मैं उसे कोई नौकरी करने की सलाह देता हूं तो वह साफ मना कर देती है. मैं ऐसा क्या करूं कि मेरी पत्नी को अक्ल जाए कि अपनी हद में रहना ही ठीक है? आप दोनों की उम्र का बड़ा अंतर इस परेशानी की वजह हो सकता है. आप अपनी पत्नी को सम?ाएं कि ज्यादा हंसीमजाक करने वाली औरतों के बारे में लोगों की राय अच्छी नहीं होती. वे पीठ पीछे चालू और माल जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर मजाक बनाते हैं.
पासपड़ोस की औरतों में उन के मर्दों के प्रति शक भर सकें तो उन की बीवियां अपने पतियों को उस के पास फटकने नहीं देंगी.


बेहतर तो यह भी होगा कि पत्नी को कोई ऐसा काम सौंप दें, जिस से उस के दिन के 3-4 घंटे उस में निकल जाएं. सच्ची सलाह के लिए कैसी भी परेशानी टैक्स्ट या वौइस मैसेज से भेजें. मोबाइल
नंबर : 08826099608

Hindi Story: नौजवान इंजीनियर और मौत का गड्ढा

Hindi Story: रविवार की सुबह थी. विजय घर पर अकेला था. उस के मातापिता किसी रिश्तेदार के घर गए हुए थे. आज विजय ने ठान लिया था कि घर के पीछे के आंगन में वह गड्ढा खोद कर ही दम लेगा. दरअसल, उसे एक पूरा का पूरा पेड़ शिफ्ट करना था. चूंकि पेड़ बड़ा था, तो उस ने अंदाजे से 8 फुट गहरा गड्ढा खोद डाला था.


आप सोच रहे होंगे कि पेड़ को कैसे शिफ्ट करते हैं? अमूमन तो पौधा ही लगाया जाता है, पर पूरा का पूरा पेड़ कैसे जड़ समेत मिट्टी में बोया जाता है? इस तकनीक में किसी पेड़ को उस की वर्तमान जगह से उठाने के लिए खास तरह के उपकरण का इस्तेमाल किया जाता है या पेशेवरों को बुलाया जाता है. शाखाओं या जड़ों (रूट बौल) को किसी भी नुकसान से बचाने के लिए पेड़ को सावधानी से संभालें. पेड़ को एक मजबूत गाड़ी पर रखें, यह पक्का करते हुए कि पेड़ पूरी यात्रा के दौरान हिलेडुले , उसे किसी तरह का नुकसान हो.


विजय यह एक्सपैरिमैंट कर रहा था. वह गड्ढा खोदने में इतना मशगूल था कि मिट्टी को गीला करने के लिए जो नल उस ने चलाया था, उस में लगा पाइप धीरेधीरे उस गड्ढे को भर रहा था. चूंकि विजय शारीरिक काम कर रहा था, तो उसे गरमी लग रही थी. धूप भी खिली थी. इसी बीच कब वहां अनामिका आई, उसे पता ही नहीं चला. विजय को मिट्टी में सना देख कर अनामिका को एक खुराफात सू?. उसे पता नहीं था कि गड्ढा कितना गहरा है. उसे लगा कि आज मड बाथ लिया जाए. वैसे भी घर पर कोई नहीं है.


अनामिका चुपके से विजय के पीछे गई उसे धक्का दे कर गड्ढे में धकेल दिया. अचानक हुए इस हमले से विजय हैरान रह गया. पर चूंकि अभी गड्ढा सिर्फ 5 फुट तक भरा था, तो उसे ज्यादा महसूस नहीं हुआ.
विजय ने अनामिका को देखा, तो हंस कर बोला, ‘‘इस गड्ढे में मैं अकेला क्या करूंगातुम भी जाओ.’’
अनामिका भी गड्ढे में कूद गई. वे दोनों अब वहां मस्ती करने लगे. अनामिका का मिट्टी से सराबोर बदन विजय को ललचा रहा था. उस ने अनामिका को बांहों में भर लिया और चूमने लगा.


अनामिका भी उस का साथ देने लगी. इसी बीच गड्ढे में पानी अभी भी भर रहा था. जब अनामिका की गरदन से पानी ऊपर हुआ, तो वह थोड़ा सतर्क हो गई और बोली, ‘‘चलो, अब हम बाहर निकलते हैं.’’
पर जैसे ही विजय ने उचक कर बाहर निकलने की कोशिश की, वह फिसल गया. इस के बाद उस ने कई बार कोशिश की, पर नाकाम रहा. अनामिका ने कहा, ‘‘लगता है, ऐसे बाहर नहीं निकला जाएगा. तुम मु? उठाओ. पहले मैं बाहर निकलती हूं.’’


विजय ने ऐसा ही किया. अनामिका तो बाहर चली गई, पर वह जैसे ही विजय को खींचने लगी, तो मिट्टी लगी होने की वजह से दोनों के हाथ बारबार फिसल रहे थे. इस बीच पानी और ज्यादा बढ़ गया था. अनामिका को चिंता हुई. विजय भी थोड़ा घबरा गया था. उस ने कहा, ‘‘दीवार की साइड पर एक सीढ़ी है, जल्दी लाओ.’’ अनामिका ने ऐसा ही किया. जल्दी से गड्ढे में सीढ़ी लगाई और बड़ी मुश्किल से विजय बाहर निकला. विजय की सांसें फूल रही थीं. वह बोला, ‘‘आज तो बालबाल बचे. अगर सीढ़ी होती तो बाहर निकलना मुश्किल हो जाता.’’


फिर वे दोनों बाथरूम में गए और एकसाथ नहाए. विजय ने अनामिका को अपनी बहन के कपड़े दे दिए.
अनामिका अभी भी किसी गहरी सोच में थी. विजय ने पूछा, ‘‘क्या सोच रही हो?’’ ‘‘ग्रेटर नोएडा वाला कांड तो तुम ने सुना ही होगा?’’ अनामिका ने अपने बाल सुखाते हुए कहा. ‘‘यार, बस सरसरी तौर पर पढ़ा था. क्या हुआ था?’’ विजय ने पूछा. ‘‘27 साल के एक सौफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की 16 जनवरी, 2026 की आधी रात के बाद उस समय मौत हो गई थी, जब घने कोहरे में उस की कार फिसल कर एक नाले के पास बन रहे शौपिंग कौंप्लैक्स के लिए खोदे गए गड्ढे में गिर गई थी.


‘‘युवराज मेहता के पिता राजकुमार मेहता ने बताया कि उन का बेटामेरी मदद करोमेरी मदद करो…’ चीख रहा था. लोग वीडियो बना रहे थे, पर कोई उसे बचाने के लिए कुछ नहीं कर रहा था. मैं ने उन्हें डांटा, फिर भी कोई कोशिश नहीं की गई. मेरे बेटे की मौत बेवजह हुई. ‘‘लोग राजकुमार मेहता का दर्द कभी नहीं सम? पाएंगे, जिन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने बेटे युवराज को कार में डूबते हुए देखा. राजकुमार मेहता का कहना था कि हादसे वाली जगह पर 80 कर्मचारी मौजूद थे, पर कोई भी पानी में नहीं उतरा.’’


‘‘यह तो दर्दनाक मौत थी. प्रशासन और सरकार ने क्या किया?’’ विजय ने अफसोस जताते हुए पूछा.
‘‘पुलिस ने युवराज मेहता के पिता राजकुमार मेहता की शिकायत पर 2 रियल एस्टेट डेवलपर्स एमजेड विजटाउन प्लानर्स और लोटस ग्रीन्स के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की, जिस में उस ने लोकल अफसरों पर लापरवाही का आरोप लगाया और जवाबदेही की मांग की. विजटाउन प्लानर्स के बड़े अधिकारी को गिरफ्तार कर लिया गया.’’


‘‘यह तो बहुत बड़ा सियासी मुद्दा भी बन गया. क्या विपक्ष ने सरकार को नहीं घेरा?’’ विजय ने पूछा.
‘‘बिलकुल घेरा. देखने पर यह एक साधारण सी मौत लगती है और सरकार इसे बिल्डरों की लापरवाही मान रही है या इसे भ्रष्टाचार के एंगल से खंगाल रही है, पर इस मामले पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि समस्या केवल भ्रष्टाचार नहीं समाज में जड़ें फैलाती लालच की वह लत भी है, जो भारतीय शासन की जवाबदेही निगल गई है.


‘‘दूसरी ओर राजकुमार मेहता ने कहा कि वे मुख्यमंत्री योगी से एक बार मिलना चाहेंगे. इस से उन्हें मन की शांति मिलेगी. वैसे, सरकार की ओर से उन्हें भरोसा दिया गया है कि उन्हें सही दिशा में उचित सहयोग मिलेगा. ‘‘इसी बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी योगी सरकार को घेरा. उन्होंने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि सौफ्टवेयर इंजीनियर की मौत के लिए सीधेतौर पर सरकार जिम्मेदार है.


‘‘उन्होंने आगे कहा कि हादसे वाली जगह पर पहुंचने के बाद भी सरकार और उस के तमाम महकमे इंजीनियर युवराज को बचा नहीं पाए. पानी ठंडा होने की वजह से कोई उसे बचाने के लिए आगे नहीं आया. अखिलेश यादव ने मीडिया को भी नसीहत दी कि मौत के बाद किसी की इमेज खराब करने वाले वीडियो चलाए जाएं. ‘‘ज्यादा दबाव पड़ने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मुख्य कार्यकारी अधिकारी लोकेश एम. को उन के पद से हटा दिया. हादसे की जांच के लिए 3 सदस्यीय एसआईटी का गठन किया गया. मेरठ जोन के एडीजी एसआईटी के अध्यक्ष बनाए गए.


‘‘इधर, पुलिस कमिश्नर (कानून व्यवस्था) डाक्टर राजीव नारायणी ने कहा कि यह घटना बेहद दुखद है. सूचना मिलते ही दमकल टीम सभी उपकरणों के साथ मौके पर पहुंची और बचाव का काम शुरू किया गया. एसडीआरएफ की मदद से अंतिम बचाव अभियान चलाया गया. उस समय विजिबिलिटी जीरो थी, लेकिन युवराज को बचाया नहीं जा सका.’’ ‘‘पिता राजकुमार मेहता ने बिल्डरों के खिलाफ किन धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कराई है?’’ विजय ने पूछा.


‘‘धारा 105 (अनजाने में हत्या), धारा 106 (1) (किसी व्यक्ति की लापरवाही या असावधानी के कारण हुई मृत्यु) और धारा 125 (मानव जीवन या दूसरों की व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालना) एफआईआर दर्ज की गई है,’’ अनामिका ने बताया. ‘‘यार, यह सुन कर तो मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं. बड़ा ही दिल दहलाने वाला कांड है,’’ विजय बोला. ‘‘इस पूरे मामले को राजकुमार मेहता ने कुछ इस तरह बताया था… ‘शुक्रवार की आधी रात को 12 बज कर,


20 मिनट पर मेरे पास युवराज का फोन आया. वह घर आने ही वाला था, इसलिए सम? नहीं आया कि वह मु? क्यों फोन कर रहा है. ‘‘‘मैं ने फोन उठाया. दूसरी तरफ से एक डरी हुई आवाज सुनाई दी. उस ने कहा किपापापापामैं नाले में गिर गया हूं, मैं मरना नहीं चाहताप्लीज, मु? बचा लीजिए’.
‘‘‘यह सुन कर मैं उन्हीं कपड़ों में बाहर भागा. सोसाइटी से निकलने से पहले मैं ने एक मैसेज टाइप किया और उसे सोसाइटी के ग्रुप में पोस्ट कर दिया, ताकि मदद मिल सके.


‘‘‘मेरे बेटे ने जिस नाले का जिक्र किया था, वह हमारी सोसाइटी से 200 मीटर दूर था. मैं दौड़ कर उस नाले के पास गया. वहां, मैं घने कोहरे और अंधेरे में 30 मिनट तक अपने बेटे को ढूंढ़ता रहा, आवाज लगाने की कोशिश करता रहा, ताकि कोई जवाब मिले. फिर मु? लगा कि मैं गलत जगह ढूंढ़ रहा हूं.
‘‘‘रात के साढ़े 12 के आसपास वहां वीडियो बना रहे लोगों से मैं ने कहा कि प्लीज, मेरे बेटे को बचा लीजिए. इस के बाद मैं सड़क के किनारे पहुंचा, जहां एक इमारत का निर्माण अधूरा था.
यहां बेसमैंट के लिए एक गड्ढा खोदा गया था.


‘‘‘वहां पहुंच कर मैं चिल्लाने लगा. मेरी आवाज सुन कर मेरा बेटा भी चीख उठा… ‘बचाओबचाओमेरी मदद करो…’ की आवाज सुन कर मैं सम? गई कि मेरा बेटा यहां गिर गया है. ‘‘‘मैं थोड़ा आगे बढ़ा और कोहरे में से देखा कि कार पानी में थी और मेरा बेटा उस की छत पर लेटा हुआ था. वह सड़क से तकरीबन 50 से 60 फुट दूर था. वह धीरेधीरे डूब रहा था. किनारे पर खड़े लोगों को यह बताने के लिए कि वह जिंदा है, अपने मोबाइल फोन की लाइट बारबार जलाबु? रहा था.


‘‘‘मैं ने डायल 112 पर फोन किया. मैं उसे अपनी आंखों के सामने डूबते हुए देख रहा था. वहां और भी लोग थे, लेकिन कोई मदद नहीं कर रहा था. कुछ लोग वीडियो बना रहे थे, मैं ने उन से कहा कि प्लीज, वीडियो बनाना बंद करें, मेरे बेटे की मदद करें.’’’ इतना बता कर अनामिका चुप हो गई. थोड़ी देर के बाद विजय ने पूछा, ‘‘बचाव अभियान कब शुरू हुआ?’’ ‘‘खबरों के मुताबिक, रात के तकरीबन पौने 1 बजे पुलिस और फायर ब्रिगेड की एक गाड़ी डायल 112 के साथ मौके पर पहुंची. तब तक घना कोहरा छा चुका था. सब से पहले, पुलिस और फायर ब्रिगेड ने रस्सी फेंक कर बचाव का काम शुरू किया.


‘‘पर वह रस्सी युवराज तक नहीं पहुंच रही थी. कुछ पुलिस अफसर कह रहे थे कि पानी बहुत ठंडा है और उस में उतरना मुश्किल है. कुछ का कहना था कि हादसे वाली जगह के नीचे लोहे की छड़ें हो सकती हैं.
‘‘इस के बाद क्रेन बुलाई गई, लेकिन क्रेन भी युवराज तक नहीं पहुंच पाई. वह सिर्फ 30-40 फुट तक ही जा पा रही थी. वहां मौजूद कोई भी आदमी पानी में उतरने की कोशिश नहीं कर रहा था. ‘‘पिता राजकुमार मेहता ने बताया कि गड्ढा शायद 15 से 20 फुट गहरा था, इसलिए अगर गोताखोर वहां होते तो उन के बेटे की जान बच सकती थी.


‘‘एसडीआरएफ की टीम रात के तकरीबन सवा 1 बजे पहुंची. उन लोगों के पास भी पर्याप्त संसाधन नहीं थे. इसी बीच युवराज की कार पूरी तरह पानी में डूब गई. कार के ऊपर लेटे हुए युवराज भी पानी में समा गए. सब लोग बस यह सब देखते रह गए. ‘‘सर्चलाइट, क्रेन और सीढ़ी की मदद से टीम पानी में उतरी. 2 घंटे की मशक्कत के बाद युवराज की लाश तकरीबन सवा 4 बजे बरामद की गई. ‘‘पिता राजकुमार मेहता ने कहा कि इस घटनास्थल को ले कर पहले भी शिकायतें की गई थीं, पर सब लोग सोते रहे. उन्होंने अपने बेटे की मौत के लिए नोएडा प्रशासन को दोषी ठहराया.’’


‘‘वे बिलकुल ठीक कह रहे हैं. सरकारें घर उजाड़ने के लिए बुलडोजर तो चला रही हैं, पर इस तरह के मौत के गड्ढे भरने के लिए कुछ नहीं कर रही है. बिल्डरों पर गाज गिराने से कुछ नहीं होगा. कौन सा बिल्डर चाहेगा कि उस का प्रोजैक्ट समय पर पूरा हो. पर प्रशासन के नियमकानून इतने पेचीदा बना दिए जाते हैं कि लोग कानून के शिकंजे में फंस कर रह जाते हैं. ‘‘यह हादसा तो एक इंजीनियर के साथ हुआ है और इस कांड के वीडियो भी बन गए, तभी प्रशासन इतना जल्दी कार्रवाई करता दिख रहा है. दूरदराज के इलाकों में जाने कितने युवराज अपनी जिंदगी से खेल रहे हैं, किसे इस बात की चिंता है.’’


‘‘विजय, सवाल यह नहीं है कि कौन गुनाहगार है और उसे सजा मिलेगी या नहीं, पर मुद्दा यह भी है कि क्या एक जवान लड़के की ऐसी मौत देखने के बाद उस के पिता कभी सब्र का घूंट पी सकेंगे…’’ अनामिका बोली. ‘‘कभी नहीं. इस तरह की मौत देश की तरक्की की भी पोल खोलती है, क्योंकि तरक्की का मतलब यह नहीं है कि ऊंचीऊंची इमारतें बना देना, जबकि असली तरक्की का मतलब है लोगों के मन से असुरक्षा का भाव खत्म होना.


‘‘दिल्ली के इतना पास एक पढ़ालिखा नौजवान सिर्फ इसलिए मर गया कि वह रात के अंधेरे में पानी से लबालब ऐसे गड्ढे में जा गिरा, जो वहां होना ही नहीं चाहिए था. यह देश के रहनुमाओं पर एक तरह की लानत है कि वे अपने नागरिकों को सुरक्षा देने में नाकाम हो रहे हैं,’’ विजय ने अपने दिल की भड़ास निकाली. अनामिका चुप थी. वह बाहर आंगन में खोदे गए गड्ढे को देख रही थी, जिस में अब भी गंदला पानी जमा था.  Hindi Story
   

Hindi Story: दुकान चाय की धंधा जहर का

Hindi Story: चा की दुकान, जो आम आदमी के लिए थकान मिटाने, गपशप करने और जिंदगी की हलचल से कुछ पल सुकून पाने की जगह होती है, जब उसी दुकान की आड़ में जहर का कारोबार चलने लगे, तो यह केवल एक अपराध नहीं रह जाता. पिछले 5 साल में चाय की दुकान की आड़ ले कर नशे का ऐसा नैटवर्क खड़ा किया गया कि 20 करोड़ रुपए की जायदाद खड़ी हो गई.


बिहार के मनेर क्षेत्र में रहने वाला एक शख्स, जो बाहर से एक साधारण दुकानदार दिखता था, असल में नशा तस्करी के जाल का अहम किरदार निकला. पुलिस की कार्रवाई में उस के साथ उस की बहन समेत 6 सहयोगियों की गिरफ्तारी हुई. जांच में जो बातें सामने आईं, वे चौंकाने वाली थीं. घर से 35 लाख रुपए की चरस, 25 लाख रुपए की स्मैक, 12 लाख, 20,000 रुपए नकद, हथियार, वाहन और कीमती सामान बरामद हुआ.


इस पूरे नैटवर्क की बनावट पर नजर डालें, तो यह साफ होता है कि अपराध अब अकेले शख्स का नहीं रहा, बल्कि यह एक संगठित तंत्र है, जिस में परिवार तक शामिल हो जाता है. आरोपी की बहन का रोल इस धंधे में काफी अहम बताया जा रहा है. ड्रग्स की सप्लाई नेपाल से कराई जाती थी, ताकि पुलिस की निगाहों से बचा जा सके. नेपाल भेजे गए लोग ड्रग्स ले कर लौटते थे और फिर बिहार के अलगअलग इलाकों जैसे आरा, सारण, गया वगैरह में इस की सप्लाई होती थी.


यह भी सामने आया कि आरोपी पहले भी ड्रग्स के साथ पकड़ा जा चुका था. 2 साल पहले भी उस के पास से भारी मात्रा में ड्रग्स बरामद हुई थीं, लेकिन इस के बावजूद वह फिर उसी धंधे से जुड़ गया.
नशे का यह कारोबार नौजवानों को ध्यान में रख कर फैलाया जा रहा था. चाय की दुकान, जहां नौजवान अकसर इकट्ठा होते हैं, उसे ही सप्लाई का अड्डा बनाया गया. बताया जाता है कि आरोपी ने इसी काले धंधे से करोड़ों की जमीन, मकान और वाहन खड़े कर लिए थे.


साल 2016 में बिहार में शराबबंदी लागू हुई थी. इस का मकसद साफ था, अपराध रोकना, घरेलू हिंसा कम करना और समाज को सुधारना. शुरुआती महीनों में शराबबंदी ने असर भी दिखाया था, लेकिन धीरेधीरे तस्करों ने नई राह निकाल ली. नतीजतन, देशीविदेशी शराब की जगह अब ड्रग्स और नशे के दूसरे साधनों ने बाजार में अपनी मजबूत पकड़ बना ली है.


शराबबंदी के बाद ड्रग्स का नैटवर्क कई गुना बढ़ गया है. पहले जो नशा केवल शहरों तक सीमित था, अब गांवगांव तक पहुंच गया है. गरीब तबका महुआ, स्प्रिट, खैनी, गुटका तक सीमित रहा, तो मिडिल क्लास गांजा, देशी शराब और अमीर तबका ब्राउन शुगर, चरस, प्रीमियम शराब तक अपनी पैठ बना चुका है.
पटना, भागलपुर, मुजफ्फरपुर जैसे बड़े शहर नशे के हब बन चुके हैं, वहीं गया, नालंदा, सीतामढ़ी, मधुबनी, भभुआ, रोहतास जैसे जिले भी पीछे नहीं हैं.


16 साल के आकाश ने बताया, ‘‘मैं ने पहली बार ब्राउन शुगर स्कूल के दोस्तों के साथ ली थी. शुरू में लगा कि मजा आएगा. 500 रुपए में दोस्तों के साथ  लाते थे. धीरेधीरे आदत बढ़ी. अब दिनभर बेचैनी रहती है. मिले तो शरीर में खुजली मचना और दर्द बनना शुरू हो जाता है.’’ आकाश के पिता मजदूरी करते हैं. इस ने घर के गहने और मोबाइल तक बेच दिए थे. कुछ समय पहले ही आकाश को नशा मुक्ति केंद्र ले जाया गया था, लेकिन एक एक महीने बाद फिर वह वापस उसी ढर्रे पर लौट आया.

इन पर सब से ज्यादा असर12 से किशोरों से ले कर 25 साल के नौजवान सब से ज्यादा ब्राउन शुगर का सेवन कर रहे हैं. ब्राउन शुगर भी लोग 4-5 के समूह में सेवन करते हैं. यह नशा शहर से चल कर गांव तक पहुंच गया है.औरंगाबाद जिले के एक सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल ने बताया, ‘‘हमारे स्कूल के तकरीबन 50 बच्चे ब्राउन शुगर का सेवन करते हैं. हम लोग सम? कर थक गए हैं, पर इन लोगों पर कोई असर नहीं पड़ता है. कई बच्चों ने तो स्कूल आना भी छोड़ दिया है.’’


नशा मुक्ति केंद्र, पटना के डाक्टर अजय कुमार बताते हैं, ‘‘ब्राउन शुगर और ड्रग्स का असर इतना खतरनाक है कि 3-4 महीने में ही नौजवान इस की गिरफ्त में जाते हैं. 70 फीसदी से ज्यादा मरीज इलाज के बाद भी दोबारा नशे की ओर लौट जाते हैं.’’ शराबबंदी के बाद गांवदेहात में देशी शराब बनाने का प्रचलन काफी बढ़ गया है. जहरीली शराब पीने की वजह से साल 2016 से अभी तक सरकारी रिकौर्ड के मुताबिक 190 मौतें हुई हैं. साल 2022 में सारण मशरक में सब से बड़ी घटना हुई थी, जिस में 73 लोगों की मौत हो गई थी.


जहरीली शराब की वजह से जब मौतें होने लगती हैं, तो प्रशासन और सरकार इसे छिपाने के लिए दूसरी वजह से मौत को दिखाने लगते हैं. सरकार द्वारा शराबबंदी को कामयाब बनाने के लिए बहुत कोशिश की गई, लेकिन कामयाबी नहीं मिली. शराब हर जगह मिल रही है. गैरकानूनी तौर पर शराब बेचने वाले होम डिलीवरी की सहूलियत भी दे रहे हैं. अपराध और नशे का रिश्ता पुलिस रिकौर्ड बताते हैं कि शराबबंदी के बाद चोरी, डकैती और हत्या जैसे अपराधों में बढ़ोतरी हुई है. नशे की लत पूरी करने के लिए नौजवान चोरी और अपराध का रास्ता अपना रहे हैं.


सरकार ने 50 से ज्यादा नशा मुक्ति केंद्र चलाए हैं. विशेष अभियान में हजारों गिरफ्तारियां भी हुई हैं, लेकिन तस्करों का नैटवर्क इतना मजबूत है कि पकड़ में आते ही नए लोग उन की जगह ले लेते हैं.
नशा अब केवल निजी आदत नहीं, बल्कि सामाजिक संकट बन चुका है. सरकार, समाज और परिवार को मिल कर काम करना होगा, वरना आने वाली पीढ़ी नशे के अंधेरे में खो जाएगी. Hindi Story

अपराधों को बढ़ावा देते पर्व त्योहार

पर्व, तीज, त्योहार इनसान के जीवन में खुशी लाते हैं. शुष्क जीवन में सरसता का संचार करते ये त्योहार इतने व्यर्थ हो गए हैं कि इन के लिए ‘व्यर्थ’ शब्द भी व्यर्थ हो गया है. जीवन में सरसता का संचार करने के बजाय कटुता का संचार करते हैं, तनाव पैदा करते हैं.

सब से पहली बात कि इन सारे पर्व त्योहारों को मनाने के लिए जबरन चंदा वसूली होती है. लोग अपने कलेजे पर पत्थर रख कर, मजबूरी में या डर कर, चंदा वसूलने वालों को उन की मुंहमांगी मोटी रकम देते हैं. जो जरा भी आनाकानी करता है, चंदा वसूलने वालों द्वारा मारापीटा जाता है. यदि दुकानदार मिल कर विरोध करते हैं तो उन की दुकानें लूट ली जाती हैं. ये पूजापर्व मनाने वाले लोग सार्वजनिक, सरकारी, गैरसरकारी मकानों का अतिक्रमण करते हुए बांसबल्ली के टैंट गाड़ते हैं, बिजली के खंभे से सीधी बिजली चुरा कर साजसजावट करते हैं.

आई.पी.सी. हो या सी.आर.पी.सी. हो, उन पर लागू नहीं होता और पुलिस किसी भी भारतीय कानून के तहत काररवाई कहां करती है? जो कानून पसंद, शांतिप्रिय नागरिक यदि थोड़ा सा भी विरोध करते हैं तो  इनके द्वारा प्रताडि़त होते हैं, घायल किए जाते हैं…और कई बार मौत के घाट तक उतार दिए जाते हैं. थाने में उन की रिपोर्ट तक दर्ज करने से पुलिस अधिकारी टालमटोल कर जाते हैं. थाना पुलिस एवं प्रशासन उलटा शिकायतकर्ता को ही अपमानित करते हुए भगा देता है.

जहां तहां सड़कों, नुक्कड़ों, चौराहों, आम रास्तों का अतिक्रमण कर के मिट्टी की मूर्तियां बैठाई जाती हैं. बांसबल्ली लगा कर रास्ता जाम कर दिया जाता है. आम नागरिक परेशान हो तो हो. उन्हें इस की चिंता नहीं होती.

एक ओर सरस्वती की पूजा होती है दूसरी ओर सजीव सरस्वतियों, यानी लड़कियों और युवतियों के साथ छेड़छाड़. सरस्वती को तथाकथित भक्त (जो हकीकत में ‘भक्त’ नहीं गुंडेबदमाश हुआ करते हैं) स्त्रियों, खासकर लड़कियों, किशोरियों के गालों पर गुलाल लगाने के बहाने छेड़छाड़ करते हैं. यही बात दुर्गापूजा और छठपर्व में भी देखने में आती है.

अखबारों में छपी खबरें सुबूत हैं. हाल में राजधानी दिल्ली में ठीक दशहरे के दिन अपने घर लौटती लड़की का उस के मातापिता के सामने ही अपहरण कर लिया गया. उस के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ. ऐसी घटनाओं की सूची काफी लंबी है. पिछली दीवाली के दिन दिल्ली में एक 7 वर्षीय बच्ची का अपहरण कर के बलात्कार किया गया और हत्या कर के उस की लाश रिज एरिया में फेंक दी गई. पूजा व पर्व के दिनों में गुंडे जश्न मनाने के लिए जैसे मीट, मछली, शराब का जुगाड़ किया करते हैं वैसे ही अपनी मौजमस्ती के लिए मासूम लड़कियों का अपहरण, बलात्कार और हत्या भी कर देते हैं.

त्योहारों को तत्काल बंद कर देना चाहिए जो नाना अनाचारों, व्यभिचारों, आपराधिक कृत्यों के जनक हैं. यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि इन पर्वों, त्योहारों की आड़ में घोर अपराध पनप रहे हैं. समाज गर्त में जा रहा है. लड़कियों की इज्जत लूटी जा रही है. व्यभिचार बढ़ रहा है.

अब तो ‘धर्म निरपेक्षता’ भी दांव पर लग गई है. देश की सरकार सचमुच धर्मनिरपेक्ष रहती तो हिंदुओं के पर्वत्योहारों की इतनी सरकारी छुट्टियां क्यों? यह ‘विधान’ ही गलत है. यह भारतीय संविधान के विरुद्ध है. किसी भी धर्म की कोई भी छुट्टी नहीं होनी चाहिए. जिसे जो भी पर्वत्योहार मनाना हो वह अपना आकस्मिक अवकाश (सी.एल.) का प्रयोग करे.

इस देश में बहुत से सरकारी व गैरसरकारी संस्थान ऐसे हैं जहां चौबीसों घंटे काम चलता रहता है. किसी भी पर्व व त्योहार पर वहां छुट्टी नहीं होती और लोग भय या किसी लालच में नहीं बल्कि काम के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझ कर ड्यूटी पर आते हैं. यदि सरकार के एक उपक्रम में ऐसा हो सकता है तो दूसरे विभागों में क्यों नहीं.

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