Hindi Funny Story: गर्व से कहो हम भ्रष्ट हैं

Hindi Funny Story, लेखक – जे. शर्मा

बस कंडक्टर की रोचक बातों ने मेरा दिल जीत लिया था. मैं जब भी अपना 500 रुपए का कड़क नोट उस की तरफ बढ़ाता, वह बारबार मेरी अनदेखी करते हुए आगे निकल जाता और दूसरी सवारियों की टिकटें काटने लगता.

मेरा माथा ठनका कि आज कुछ न कुछ गलत हो कर रहेगा. यह 500 का नोट कई बार बहुत बड़ी मुसीबत में डाल देता है.

खैर, सब की टिकटें काटने के बाद वह बस कंडक्टर मुसकराता हुआ मेरे पास आ कर बैठते हुए बोला, ‘‘बाबूजी, मैं ने आप को पहले भी इस रूट पर देखा है. आप फूड सप्लाई महकमे में काम करते हैं न?’’

मैं ने सोचा कि शायद इस गलतफहमी में मैं टिकट लेने से बच जाऊंगा. लिहाजा, मैं ने हामी भर दी.

कंडक्टर ने अपनी बात जारी रखी, ‘‘बाबूजी, हमारे चाचा के साले का लड़का भी आप के महकमे में है.

संपत दलाल… नाम सुना होगा आप ने… बहुत ऊंची पोस्ट पर है. राजधानी में एक बड़ी सी कोठी है उस की.

‘‘वैसे, एक बात है बाबूजी कि आप के महकमे में पैसा बहुत है. राइस मिल या फ्लोर मिल वालों को जरा सा इशारा कर दो, बोरी भर कर नोट आप के आंगन में फेंक जाएंगे. आप रातभर बैठे गिनते रहो, सुबह हो जाएगी…’’

वह थोड़ी सांस ले कर आगे बोला, ‘‘मेरा तो यही मानना है कि मुझे अगले जनम में फूड सप्लाई की नौकरी मिले, चाहे चपरासी ही क्यों न बनना पड़े…

‘‘और एक बात सुनो… हमारे पड़ोस में मोहनलाल की कोठी है. वह कस्टम महकमे में चपरासी है. क्या शान है उस की. गाड़ी है, घर में एयरकंडीशनर लगा है. वह हर समय मोबाइल फोन पर बातें करता रहता है और उस के घर के लोग काजूकिशमिश ऐसे चबाते हैं, जैसे मूंगफली के दाने चबा रहे हों. यह सब देख कर मेरे मन में लड्डू फूटने लगते हैं…’’

लेकिन कुछ देर बाद वह थोड़े उदास लहजे में बोला, ‘‘और एक हम सरकारी बसों के कंडक्टर हैं कि सारी उम्र रुपए 10 रुपए का टांका लगालगा कर ही बूढ़े हो जाते हैं. पता नहीं, हमारा अच्छा समय कब आएगा.

‘‘मैं ने 2 लाख रुपए की रिश्वत दे कर अपने छोटे बेटे को म्यूनिसिपल के दफ्तर में चपरासी लगवा दिया है, लेकिन वह ससुरा तो मुफ्त में लोगों के काम करवाता फिरता है. मैं उस से कहता हूं कि 2 लाख रुपए जमा करने में मेरी कमर टेढ़ी हो गई है, वे तो वसूल कर के ला.

‘‘मैं ने भी उसे बोल दिया है कि बेटा, जल्दी ही तेरी शादी कर के तुझे अलग कर दूंगा. जब तेरे बच्चे होंगे और खर्च बढ़ेगा, तब तू खुद ही हाथपैर मारेगा. सारे उसूल धरे के धरे रह जाएंगे.

‘‘अच्छा बाबूजी, आप से हुई बातें बहुत मजे की रहीं. रास्ता कट गया. आप वह 500 रुपए का नोट दिखा रहे थे न… लाओ, मैं आप का टिकट बना देता हूं.

‘‘आजकल टिकट चैकर भी बहुत दुखी करते हैं. महीना तो बंधा है, मगर फिर भी उन की नीयत खराब रहती है. सोचते हैं कि पता नहीं कंडक्टर कितनी लूट मचाते हैं.’’

मीठीमीठी बातें करता हुआ वह कंडक्टर 35 रुपए अपनी जेब में रख लेता है और टिकट नहीं बनाता.

बाकी रुपए वापस करते हुए वह कहता है कि आप जहां कहोगे, हम वहीं उतार देंगे.

मैं भी सोचता हूं कि चलो इसी बहाने मेरे ईरिकशा के 20 रुपए बच जाएंगे. Hindi Funny Story

Best Family Story: फर्ज

Best Family Story: उस ने बाइक एक ओर खड़ी की और सामने महाराज के होटल पर जा कर कोने में पड़ी बैंच पर बैठ गया. सुनील ने उस से नमस्ते की, लेकिन वह खामोश ही रहा.

‘‘सब अपने बाप का नौकर ही समझते हैं,’’ थोड़ी देर के बाद वह बड़बड़ाया. अनायास ही उस का स्वर कुछ तेज हो गया था.

‘‘क्या हुआ दीवानजी, क्या किसी से झगड़ा हो गया?’’ सुनील ने उस से पूछा.

‘‘झगड़ा क्या होगा. इस नए थाना प्रभारी की घरवाली तो ऐसा और्डर मारती है, जैसे मैं सिपाही नहीं इस के बाप का नौकर हूं.

‘‘अगर कुछ कहो तो बस… जिसे देखो वही हम जैसे छोटे लोगों पर ही रोब दिखाता है,’’ अंदर घुमड़ रहा गुस्सा अनायास ही उस के शब्दों को गंदा कर रहा था.

‘‘आज काफी गुस्से में लग रहे हैं दीवान चाचा,’’ उस ने देखा कि मुकेश उस की बैंच पर आ कर बैठ गया था वहीं और उस से पूछ रहा था.

मुकेश उसे ‘चाचा’ ही कहता है. मुकेश वैसे तो फलों का ठेला लगाता है, लेकिन असलियत में पहले वह एक चोर था, जो अकसर छोटीमोटी चोरियां किया करता था. उस पर चोरी के 1-2 मुकदमे भी दर्ज थे. लेकिन जब से उस ने मुकेश को समझाया था, तब से मुकेश चोरी का धंधा छोड़ कर फलों का ठेला लगाने लगा था.

मुकेश की एक बहन रजनी उसे ‘बाबूजी’ कहती है. वह अकसर गश्त करतेकरते मुकेश के घर चला जाता. मुकेश की बहन अकसर कह देती कि उन के होने से उन्हें लगता ही नहीं है कि वे लोग अनाथ हैं. उसे भी न जाने क्यों उन दोनों से लगाव सा हो गया था.

वह शहर के बहुत से लोगों को जानता है, जो कोतवाली में खर्चापानी देते रहते हैं. वैसे गैरकानूनी काम करने वाले सभी पुलिस को हफ्ता देते हैं.

उसे भी कई लोगों ने खर्चा देना चाहा, लेकिन उस ने साफतौर पर लेने से मना कर दिया. पहले चोरउचक्के, गिरहकट उस के नाम से कांपते थे, लेकिन इस के बावजूद उस ने कभी वरदी का रोब डाल कर कुछ ऐंठने की कोशिश नहीं की, बल्कि वह ऐसे लोगों को गिरफ्तार करता, लेकिन साहब लोगों की मेहरबानी से वे शाम तक ही बाहर आ जाते.

और तो और उस को जम कर फटकार भी लगाई गई कि उस ने उन को गिरफ्तार ही क्यों किया. तब से उस ने फर्ज को भूल कर ऐसी भूल दोबारा नहीं की. वह जानता था कि सोने का अंडा देने वाली मुरगी को कौन हलाल करना चाहेगा.

तभी सचिन उस के आगे 2 कप चाय और प्लेट में नमकीन रख गया. वह समझ गया कि अंदर आते समय मुकेश ने चाय के लिए बोल दिया होगा.

पहले तो उस का मन नहीं हुआ कि वह चाय पिए. अभी वह एक पैग लगा आया था. नाइट ड्यूटी थी, इसलिए कोई दिक्कत नहीं थी वरना वह अकसर रात में दारू पीता है, लेकिन फिर भी वह बिना कुछ बोले चाय का गिलास उठा कर चाय पीने लगा, जिस से उसे कुछ राहत महसूस हुई.

‘‘क्या हुआ दीवान चाचा, आज काफी गुस्से में लग रहे हैं?’’ मुकेश ने दोबारा उस से पूछा.

‘‘रिटायरमैंट के 2 साल रह गए हैं. सोचता हूं कि सुकून से कट जाएं, लेकिन ये सब… सुबह विवेक साहब की बीवी ने कुछ सामान लाने को कहा था और दारोगा ने एक आदमी को लाने के लिए भेज दिया था, जिस से सामान ला कर देने में कुछ देर हो गई, बस वह बिगड़ पड़ी जैसे मैं सिपाही नहीं, बल्कि उस का घरेलू नौकर हूं,’’ वह बोला.

‘‘आजकल संजय सिपाही तो बहुत लूट रहा है,’’ मुकेश बोला.

‘‘आजकल लूट कौन नहीं रहा है. मैं तो समझता था कि नए लड़केडिपार्टमैंट के मुंह पर लगी कालिख को साफ कर कुछ नया करेंगे, लेकिन ये तो और ज्यादा खाऊ निकले.

‘‘पहले तो कभीकभी कोई फंस जाता था, उसे ही हलाल किया जाता था, लेकिन ये नए लड़के तो शिकार की तलाश में ही घूमते रहते हैं,’’ वह गहरी सांस लेते हुए बोला.

चाय का गिलास खाली हो गया था. उस ने गिलास मेज पर रख दिया. तभी बाहर कुछ शोर सुनाई दिया.

शोर सुन कर उस का ध्यान होटल से बाहर गया. उस ने देखा कि सामने 2 लड़कों में किसी बात को ले कर झगड़ा हो गया था, जो गालीगलौज के बाद हाथापाई पर उतर आये थे, जिस से वहां काफी भीड़ जमा हो गई थी.

तभी वहां बाइक से सिपाही सुधीर और संजय आ गए. वह सम?ा गया कि किसी ने उन को फोन कर दिया है. बाइक से उतरते ही वे उन दोनों लड़कों को डांटडपट कर बाइक पर बिठा कर चौकी की ओर ले गए.

यह देख कर वह समझ गया कि अब दोनों से अच्छीखासी रकम वसूल कर सुलह करवा दी जाएगी.

‘‘दीवान चाचा, आज तो दोनों की मोटी कमाई हो जाएगी. दोनों पार्टी मोटी हैं,’’ मुसकराते हुए मुकेश ने उस से कहा.

मुकेश की बात सुन कर वह कुछ नहीं बोला.

आज इतने साल ड्यूटी के बीत गए थे, लेकिन उस ने वरदी पर रिश्वत जैसा दाग लगने नहीं दिया था और न ही वह कभी अपने फर्ज से पीछे हटा, जिस का उसे इनाम भी मिला था.

एसपी साहब ने उस की बेहतर कार्यशैली के चलते उसे स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सिपाही से दीवान बना दिया था, जिस से उस को लगा था कि चलो ईमानदारी से ड्यूटी करने का उसे कुछ तो फायदा मिला.

लेकिन यह खुशी भी उस के लिए कुछ दिन की ही थी.

उस दिन वह नाइट ड्यूटी कर के घर लौट रहा था, तभी रास्ते में उस ने अनुज को देखा जो नशीले पदार्थों की तस्करी किया करता था. वह काफी दिनों से उस की रडार पर था.

आज उस ने स्मैक बेचते रंगे हाथ अनुज को गिरफ्तार कर लिया. इस दौरान 2-4 हाथ भी उस ने उसे मार दिए और उसे थाने ले आया. उस ने यह भी नहीं सोचा कि वह साहब का खास आदमी है और फिर विवेक साहब ने उस को मिली पट्टियां उतरवा दीं और वह फिर दीवान से सिपाही बन गया था.

‘‘आराम नहीं है आप की नौकरी में,’’ मुकेश बोला.

‘‘आराम और वह भी इस नौकरी में… सत्तर खसम होते हैं इस नौकरी में, एसपी साहब आए या फिर आईजी डीआईजी सब की बस जेबें गरम होनी चाहिए… कहीं से ला कर दो इन को, पर इन का पेट पहले भरो, फिर कहा जाता है कि ईमानदारी से नौकरी करो, ड्यूटी पर फर्ज निभाओ…

‘‘कर तो रहा हूं ईमानदारी से… आधी तनख्वाह तो साहब लोगों को मुरगाबकरा खिलाने में चली जाती है और आधी से घर चलाओ.

‘‘2 बार सिपाही से दीवान बना, लेकिन इस विवेक सिंह ने वह भी छीन लिया, लेकिन फिर भी दीवान भानु प्रताप ही रहूंगा… देखता हूं कौन रोकेगा मुझे,’’ वह कुछ तेज स्वर में बोला.

‘‘दीवान चाचा, आप ने लगाई हुई है शायद. आप को चढ़ गई है. ऐसा कीजिए कि आप अब घर चले जाइए. मैं भी अपने ठेले पर जाता हूं. कहीं किसी ने आप की वीडियो वगैरह बना ली तो…’’ मुकेश घबरा कर इधरउधर देखते हुए बोला और तुरंत उठ कर होटल से बाहर चला गया.

उसे भी अपनी गलती का एहसास हो गया. वह भी जानता है कि आजकल वैसे भी लोग पुलिस को अपना दुश्मन ही समझते हैं.

पता नहीं कौन मौके का फायदा उठा ले और उस की इस तरह की बेवजह की बातें मोबाइल में रिकौर्ड कर सोशल मीडिया पर वायरल कर दे और वह सफाई देता घूमता रहे.

आज कितने बरस हो गए पुलिस की नौकरी करते हुए, लेकिन आज भी हालात उस के जस के तस हैं. जितनी तनख्वाह मिलती है, उस से वह ढंग से परिवार भी नहीं चल पाता.

2 बेटियां हैं. एक की तो जैसेतैसे कर्ज ले कर शादी कर दी, लेकिन दूसरी कुंआरी घर में बैठी है. अभी तक उस के हाथ पीले नहीं कर पाया.

एक बेटा है वह भी ग्रेजुएशन करने के बाद बेरोजगारों की भीड़ में शामिल हो गया है. लड़की की शादी के बाद उस पर कर्ज भी काफी हो गया है. सभी सम?ाते हैं कि पुलिस में है, तो उस के पास बहुतकुछ होगा, लेकिन लोग यह नहीं समझते कि उस जैसे सिपाही कमाई नहीं कर पाते और हराम का पैसा लेना उस की फितरत में नहीं.

वैसे भी सभी को पता है कि हराम का पैसा जैसे आता है, वैसे ही चला जाता है. कभीकभी हालात ऐसे हो जाते हैं कि कुछ खानेपीने की इच्छा होती है, लेकिन मन मारना पड़ जाता है.

‘‘अरे भानु, तुम यहां बैठे हो और मैं तुम्हें कब से ढूंढ़ रहा हूं. तुम्हारा नंबर भी बंद बता रहा है,’’ तभी उस की तंद्रा भंग हुई. उस ने देखा कि सामने दीपक खड़ा हुआ था. वही उस से पूछ रहा था.

‘‘कहीं नहीं, नाइट ड्यूटी है बस इसीलिए चाय पीने चला आया था. शायद मोबाइल चार्ज नहीं किया था, इसीलिए स्विचऔफ हो गया होगा,’’ उस ने दीपक से कहा.

दीपक भी सिपाही की पोस्ट पर था, लेकिन उस का रहनसहन किसी अफसर से कम नहीं था. दीपक अलग से कमाता भी खूब था और साहब लोगों पर खर्च भी करता था, इसलिए साहब लोग उस से खुश भी रहते थे.

दीपक ने कई बार उसे समझाया था कि अलग से कुछ कमा लिया करो. कम से कम तनख्वाह तो बच जाएगी और घरपरिवार तो सही से चला सकोगे.

दीपक ने उसे कमाने के मौके भी दिए. एक बार वह दीपक के साथ चौकी पर बैठा हुआ था, तभी जमीनी विवाद का मामला आ गया.

दीपक ने 25,000 रुपए में मामला सैट कर दिया. उस ने मामले को निबटाने के लिए कहा और खुद एक बड़े मामले को निबटाने चला गया.

उस ने विवाद को बहुत ही सूझबूझ से निबटा दिया, लेकिन वह रुपए लेने की हिम्मत न कर सका. जब यह बात दीपक को पता चली, तो उस ने उसे बहुत सुना दिया था.

वह भी क्या करे, उस का जमीर यह कभी गवारा नहीं कर पाया कि वह किसी से हराम का पैसा ले.

‘‘कहां खो गए जनाब…’’ तभी एक बार फिर दीपक ने उस से कहा.

‘‘बस, ऐसे ही. और बताओ कैसे आना हुआ?’’ यादों के भंवर से वापस आ कर उस ने दीपक से पूछा.

‘‘मैं यह कह रहा था कि भतीजे को पुलिस में भरती क्यों नहीं करवा देते… फार्म वगैरह भरवा दो, भरती निकली है. मैं ने ऊपर साहब लोगों से 2 लाख में बात भी तय कर ली है. बस, यही तुम को बताना था,’’ दीपक ने उसे धीरे से बताया.

‘‘ठीक है, देखता हूं,’’ उस ने दीपक से कहा.

‘‘अच्छा, चलता हूं. ड्यूटी का टाइम है,’’ दीपक बोला और वहां से चला गया. वह भी उठ कर होटल से बाहर आ गया और कमरे की ओर चल दिया. सामने से निकल रहे आटोरिकशा को रोक कर उस में बैठ गया.

उसे पता बताने की जरूरत ही नहीं पड़ती, क्योंकि वह अकसर आटोरिकशा या फिर रिकशा से ही आताजाता है.

पता नहीं क्यों आज उसे एहसास हो रहा था कि अगर उस ने भी और लोगों की तरह रिश्वत ली होती तो वह
अपनी जिंदगी ऐशोआराम से जीता. वह जानता है कि उस ने जिंदगी जी नहीं बल्कि ढोई है.

ग्रेजुएशन पूरी होने के बाद रोहन ने नौकरी के लिए बहुत हाथपैर मारे, इंटरव्यू भी दिए, लेकिन बिना रिश्वत के वह नौकरी न पा सका.

उस की इतनी हैसियत नहीं थी कि वह लाख 2 लाख का इंतजाम कर सके. छोटीमोटी नौकरी वह करना नहीं चाहता, जिस के चलते रोहन आवारागर्दी करने लगा और उस के नाम पर लोगों से वसूली करने लगा, जिस की वजह भी वह खुद को समझता है.

अब तो उसे घर से मतलब ही नहीं रह गया था. उसे फिक्र थी कि रिटायरमैंट करीब है और उस के बाद मामूली सी पैंशन मिलनी है, तब कैसे गुजारा हो पाएगा.

‘‘साहब, आप का घर आ गया,’’ तभी आटोरिकशा वाले की आवाज सुन कर वह यादों के भंवर से निकल कर धरातल पर आ गया.

उस ने 10 रुपए निकाल कर आटो रिकशा वाले को दे दिए. वह जानता है कि अगर वह रुपए नहीं देगा तो भी वह रुपए नहीं मांगेगा, लेकिन वह कभी किसी गरीब का हक नहीं मारता.

कमरे पर पहुंच कर उस ने मोबाइल निकाल कर चार्जिंग पर लगा दिया और उस का स्विच औन कर दिया. फिर वह सामने रखी कुरसी पर बैठ गया. उस ने अपनी आंखें बद कर लीं.

तभी किसी ने दरवाजे को खटखटाया. उस ने उठ कर दरवाजा खोला. सामने होमगार्ड विनोद था.

‘‘साहब ने आप को तुंरत बुलाया है. आप का मोबाइल बंद था, इसलिए साहब ने आप को लेने के लिए भेजा है,’’ विनोद ने उस से कहा.

किसी अनहोनी के डर से उस का दिल घबराने लगा. वह सम?ा गया कि मैडम ने ही साहब को बताया होगा.

सुबह उस ने मैडम से गुस्से में आ कर कह दिया था, ‘‘मेमसाहब, आप अपना सामान किसी और से मंगा लिया करें, मैं आप का कोई नौकर नहीं हूं.’’

वह जानता है कि विवेक साहब उसे किसी लफड़े में डाल कर लाइन हाजिर भी करवा सकते हैं. वह पछता रहा था कि बेकार में ही वह ताव खा गया. इतने साल कट गए थे, ये 2 साल भी काट लेता. घर के हालात, कुंआरी बेटी का बोझ और बेरोजगार बेटा सब उसे भयानक सपने की तरह डराने लगे थे. उस का दिल अनायास ही धड़कने लगा था.

वह कोतवाली पहुंचा. सामने ही विवेक साहब कुरसी पर बैठे हुए थे. उन्हें देख कर उस के माथे पर पसीना आ गया था. वह सोच रहा था कि वह साहब और मेमसाहब से माफी मांग लेगा कि गलती हो गई, ज्यादा होगा तो पैरों पर गिड़गिड़ा कर माफी मांग लेगा. कम से कम नौकरी तो बच जाएगी. अनायास ही वह सोच गया.

आज उसे ऐसा लग रहा था कि वह बेवजह ही दावा करता था कि अपराधी उस से डरते हैं, जबकि आज उस में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह गलत का विरोध कर सके.

‘‘जय हिंद सर,’’ उस ने साहब को देख कर एक जोरदार सैल्यूट किया.

‘‘क्यों भानु प्रताप, आजकल यह मुकेश कुछ नहीं दे रहा है?’’ उसे देख कर विवेक साहब बोले.

वह समझ गया कि यह सारा मामला पैसों का है.

‘‘साहब, वह मुकेश अब फलों का ठेला लगा रहा है. उस ने चोरी करनी छोड़ दी है,’’ उस ने बताया.

‘‘यह नौटंकी तो ये सब करते हैं.’’

‘‘नहीं सर, मुकेश ने सचममुच गलत धंधा छोड़ दिया है.’’

‘‘इसीलिए इस को 5 लाख रुपयों की लूट में धर दिया. कल सुबह खुलासा करना है. 2 को पकड़ लिया है, एक फरार है. अब इस को भी उठवाया है.

‘‘एक घंटे में मुठभेड़ भी दिखानी है और तुम भी साथ में रहोगे,’’ विवेक साहब उसे घूरते हुए बोले.

‘‘लेकिन सर…’’ वह बोला.

‘‘मुझे मालूम है कि आजकल तुम्हारी तुम्हारी मुकेश से कुछ ज्यादा ही छन रही है. क्यों रिटायरमैंट पर अपनी फजीहत कराने पर तुले हुए हो…’’ साहब कुछ तीखे स्वर में बोले.

डकैती और मुठभेड़ का नाम सुन कर वह समझ गया कि मुकेश के साथ नाइंसाफी हो रही है. न वह उस से चोरी छुड़वाता और न वह उस से इतना लगाव रखता, तो शायद आज मुकेश को यह दिन नहीं देखने पड़ते. वह भी क्या करे, ड्यूटी तो करनी ही थी.

‘‘जय हिंद साहब,’’ तभी किसी की आवाज पर वह चौंक गया. सामने सुधीर खड़ा था, जो साहब को ‘नमस्ते’ कह कर बता रहा था.

बाहर आ कर उस ने देखा कि मुकेश के हाथों में हथकड़ी थी और उसे जेल में बंद कर दिया गया था. अंदर 2 लोग और थे जो असलियत में लुटेरे थे.

कुछ ही देर में तीनों को गाड़ी में बिठा दिया गया. साहब आगे गाड़ी में बैठ गए और वह भी 3 सिपाहियों के साथ गाड़ी में बैठ गया.

मुकेश उसे देख रहा था, लेकिन उस की मुकेश से नजरें मिलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी.

कुछ समय बाद गाड़ी रुकी. उस ने देखा कि वे लोग जंगल के किनारे आ गए थे. विवेक साहब ने मुकेश को गाड़ी से बाहर निकलवाया और एक पिस्टल उसे पकड़ा दी.

मुकेश बुरी तरह से डर कर कांप रहा था. वह डर कर भागा. साहब ने उसे इशारा किया और उस ने मुकेश के पैर पर निशाना साध कर फायर कर दिया.

एक धमाका हुआ और मुकेश वहीं गिर गया और वह भी ‘धम’ से वहीं बैठ गया. Best Family Story

Best Hindi Story: लालच

Best Hindi Story: रामपुर की फिजाओं में सरसों की बसंती महक घुली हुई थी. खेतों का पीला आवरण मानो धरती का सिंगार कर रहा था. गांव की चौपाल पर ठहाकों और बहसों का दौर हमेशा की तरह जारी था.

लेकिन इन सब के बीच पारुल एक अलग ही दुनिया में जी रही थी. रूप ऐसा कि जैसे कुदरत ने फुरसत में तराशा हो. गोरा रंग, अल्हड़ स्वभाव और आंखों में सुनहरे भविष्य की चमक. वह सपने बुनती थी कि एक छोटा सा घर हो, जीवनसाथी का अटूट साथ हो और खुशियों से भरी गृहस्थी हो.

जब पारुल की शादी विनोद से हुई, तब वह बहुत खुश थी. लाल जोड़े में लिपटी, हीरे सी दमकती पारुल उस दिन किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी. विनोद का प्यार और उपहारों की बौछार ने पारुल को यह विश्वास दिला दिया कि बस यही असली जिंदगी है.

लेकिन, समय ने करवट ली और सुनहरे सपने कालिख में बदलने लगे. विनोद के बरताव में आया बदलाव धीमे जहर की तरह था. शराब का नशा, देर रात की वापसी, और फिर वह भयावह दौर जहां प्यार की जगह गालियों ने और इज्जत की जगह मारपीट ने ले ली.

पारुल का कोमल मन अब कांच की तरह दरक चुका था. उस की वह कुदरती मुसकान, जो कभी गांव की पहचान थी, अब दहशत में बदल गई थी.

फिर आई वह काली रात, जिस ने सबकुछ बदल दिया. पतिपत्नी के बीच हुआ झगड़ा. सुबह एक सन्नाटे में तबदील हो गया. ड्राइंगरूम के बीचोंबीच विनोद की लाश पड़ी थी. छाती में गोली थी और पास पड़ी पिस्तौल पर पारुल की उंगलियों के निशान थे. उस ने अपना जुर्म कबूल तो किया, लेकिन उस की पथराई आंखों में कैद ‘क्यों’ का जवाब कोई पढ़ नहीं सका.

अदालत, जमानत और गांव वालों की कानाफूसियों के बीच पारुल एक जीतीजागती लाश बन चुकी थी. इसी अंधकार में एक जुगनू की तरह आया करण. वह अदालत जाने वाली उस की कार का ड्राइवर था. सादगी की मूरत करण ने बिना किसी सवाल के पारुल को वह सहारा दिया, जिस की उसे सख्त दरकार थी.

पारुल को लगा कि जिंदगी उसे दूसरा मौका दे रही है. दोनों ने शादी कर ली. लेकिन शायद पारुल की किस्मत में सुख का यह अध्याय भी लिखा ही नहीं था. एक सड़क हादसे में करण की मौत ने उसे फिर उसी अकेलेपन में धकेल दिया.

इस बार पारुल टूटी नहीं, बल्कि पत्थर जैसी कठोर हो गई. उस का दुख अब एक ठंडी आग बन चुका था. करण के बड़े भाई संदीप के साथ उस के संबंध हमदर्दी से शुरू हो कर एक अलग मोड़ पर पहुंच गए थे.

समाज ने थूथू की, लेकिन पारुल को अब समाज की परवाह नहीं रह गई थी. उस के दिमाग में अब केवल एक ही जुनून सवार था… हक. करण के हिस्से की वह 9 बीघा जमीन, जिसे वह अपना हक मानती थी.

सास सुशीला का यह कहना कि ‘जब बेटा ही नहीं रहा, तो बहू का हक कैसा?’ पारुल के भीतर दबे ज्वालामुखी को भड़काने के लिए काफी था. बेइज्जती का यह घूंट उस ने पी तो लिया, लेकिन उस के जेहन में एक खौफनाक साजिश ने जन्म ले लिया.

लालच और बदले की आग में पारुल ने अपनी बहन कविता और उस के प्रेमी अनिकेत को मोहरा बनाया. एक प्लान की हुई डकैती की आड़ में सास सुशीला की हत्या करवा दी गई.

शुरुआत में पुलिस भ्रमित रही, लेकिन अपराध कभी छिपता नहीं. पारुल का अचानक गायब होना ही उस के गले का फंदा बन गया. जब वह पकड़ी गई, तो उस का बयान किसी भी संवेदनशील इनसान को झकझोरने के लिए काफी था, ‘‘जो चीजें मांगने से नहीं मिलतीं, उन्हें छीनना पड़ता है.’’

अदालत का वह सीन रोंगटे खड़े करने वाला था. संदीप, जो अब अपने परिवार और अपनी प्रेमिका दोनों को खो चुका था, सिर झुकाए बैठा था. बूढ़े ससुर हरिराम की आंखों में निराशा थी.

पारुल ने आखिर तक दांवपेंच लड़ाए, खुद को बेकुसूर साबित करने की कोशिश की, पर अनिकेत के साथ हुई उस की एक फोन रिकौर्डिंग ने उस की सारी दलीलों को ढहा दिया. कानून ने भावनाओं को दरकिनार कर सुबूतों पर मुहर लगाई. पारुल को उम्रकैद की सजा मिली.

सालों बाद, काल कोठरी के अंधेरे से पारुल की एक चिट्ठी बाहर आई. संदीप के नाम लिखे उस खत में सिर्फ 4 लाइनें थीं, जिस ने उस की जिंदगी के पूरे सार को निचोड़ कर रख दिया :

‘‘काश, विनोद वाली गोली उस रात मुझे ही लगी होती, तो शायद आज कोई न मरता… न प्यार, न विश्वास और न ही इनसान.’’

संदीप ने वह चिट्ठी दीए की लौ के हवाले कर दी. कागज जल कर राख हो गया और हवा में बिखर गया.

ठीक वैसे ही जैसे पारुल के सपने उस 9 बीघा जमीन की धूल में मिल गए थे.

सूरज ढलते ही बूढ़े हरिराम की उस हवेली में ऐसी मनहूसियत उतर आती है कि कोई परिंदा भी अब पर नहीं मारता. लोग उस ‘शापित’ हवेली के साए से खौफ खाते हैं.

अब यही चर्चा है कि जिस 9 बीघा खेत के लिए पारुल ने हंसताखेलता परिवार को दांव पर लगा दिया था, आज वह बंजर पड़ी है. दौलत तो मिल गई, पर उसे भोगने वाला अब कोई नहीं बचा. वहां अब केवल सन्नाटा है. एक ऐसा सन्नाटा जो चीखचीख कर लालच के अंत की गवाही देता है. Best Hindi Story

Hindi Family Story: मकसद

Hindi Family Story, लेखिका – डा. के. रानी

वन संरक्षक के पद पर काम करते हुए अविनाश को 5 साल हो गए थे. नौकरी के दौरान उन का ज्यादातर समय बहुत अच्छा बीता था. उन की पत्नी रूही ने अपने परिवार की खातिर कभी जौब करने के बारे में सोचा ही नहीं. वे घर पर रह कर बच्चों को पूरा समय देतीं और विभागीय कार्यक्रम के साथ समाजसेवा में बढ़चढ़ कर भाग लेतीं.

समय जैसे पंख लगा कर उड़ रहा था. अविनाश की दोनों बेटियां नताशा और न्यासा पढ़ने में बहुत अच्छी थीं. नताशा अभी ग्रेजुएशन कर रही थी. पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद न्यासा का रु?ान सिविल सेवा की ओर था. वह उस के लिए तैयारी भी कर रही थी, लेकिन उस की मेहनत कामयाब नहीं हो पा रही थी.

रूही ने बेटियों को बहुत अच्छे संस्कार दिए थे. खुद भी वे संस्कारवान थीं, लेकिन अविनाश का स्वभाव थोड़ा उग्र था. घर में किसी चीज की कमी नहीं थी, लेकिन शांति की कमी थी.

रूही को अविनाश की ऊपरी कमाई से एतराज था. वे दबे स्वर में इस का कई बार विरोध भी कर चुकी थीं, लेकिन अविनाश कुछ सुनने को तैयार नहीं थे.

‘‘घर में ये जितने ठाटबाट हैं न, ये केवल तनख्वाह से नहीं आते. इस के लिए और कुछ भी करना पड़ता है,’’ अविनाश बोले.

‘‘हमारे पास सबकुछ अविनाश. हमें इस की जरूरत क्या है?’’ रूही बोलीं.

‘‘यह तुम नहीं समझोगी. अच्छा होगा कि तुम इस मामले में दखल न दिया करो और चैन की जिंदगी बसर करो. मौज करो और बेटियों को भी कुछ सिखाओ. हर समय घर के अंदर किताबों में घुसी रहती हैं. न कामयाबी हासिल कर पा रही हैं और न ही अपने लिए कोई अच्छा वर,’’ अविनाश गुस्से से बोले.

अविनाश को अपने पद का अभिमान था. अपने से छोटे कर्मचारियों को वे कुछ न समझते थे और सब के सामने कई बार उन की बेइज्जती भी कर देते थे.

औफिस में घुसते ही अविनाश सब से पहले औफिस असिस्टैंट रामदीन पर बरसते… रोज कोई न कोई नया बहाना ले कर. कभी तुम ने औफिस की सफाई ठीक से नहीं की तो कभी सामान ठीक से नहीं रखा. उन के हर काम का समय बंधा हुआ था. वे उसी के हिसाब से दूसरों से भी काम की उम्मीद रखते थे.

रामदीन को यहां काम करते हुए पूरे 30 बरस हो गए थे. 2 साल बाद उन्हें रिटायर होना था. वे बहुत मेहनती थे और दिल लगा कर काम करते थे.

पर अविनाश को तो जैसे औफिस के हर कर्मचारी से शिकायत थी. आज भी औफिस आते ही उन्होंने सब से पहले घंटी बजा कर रामदीन को बुलाया और कहा, ‘‘बड़े बाबू को बुला कर लाओ.’’

रामदीन ने बड़े बाबू को सूचना दी और अपने काम पर लग गए. बड़े बाबू जरा देर में उठ कर बौस के कमरे की ओर बढ़ गए. उन से कुछ पूछने की बजाय उन्होंने फिर घंटी बजाई और बोले, ‘‘क्या तुम ने बड़े बाबू को सही समय पर सूचना नहीं दी थी रामदीन?’’

‘‘दे दी थी साहब,’’ रामदीन ने कहा.

‘‘तो फिर वर इतनी देर से क्यों आए? तुम से अब नौकरी नहीं हो पाती तो काम छोड़ दो. बहुत सारे बेरोजगार हैं, जो यह काम करने के लिए तैयार हैं,’’ अविनाश चिल्लाए.

बात को आगे न बढ़ाते हुए रामदीन बोले, ‘‘गलती हो गई. माफ कर दीजिए.’’

लेकिन अविनाश का गुस्सा अभी उतरा नहीं था. वे इसी बात को ले कर बड़ी देर तक नसीहतें देते रहे.

बड़े बाबू सबकुछ सुन रहे थे, लेकिन उन की हिम्मत कुछ कहने की न हो सकी.

‘‘सर, आप ने मुझे बुलाया था…’’ बड़े बाबू ने पूछा.

‘‘आप यहां से जाइए. इस समय मेरा मूड ठीक नहीं है,’’ कह कर अविनाश ने बड़े बाबू को वापस भेज दिया.

अविनाश को अपने सामने हर कोई बहुत तुच्छ नजर आता था. बड़ेछोटे के बीच की खाई उन्होंने कभी पाटनी नहीं चाही थी. रामदीन बौस की बात से बहुत आहत थे. सारा दिन वे अनमने ही रहे. घर आ कर भी वे उदास थे. वे सोच रहे थे, ‘अपना बेटा पलाश कुछ बन जाए, फिर आराम करूंगा. बहुत नौकरी कर ली है.’

रूही और अविनाश न्यासा के भविष्य को ले कर चिंतित थे. न्यासा मास्टर्स करने के बाद एक कोचिंग इंस्टिट्यूट से कोचिंग ले रही थी. उम्र बढ़ रही थी और अभी भी वह कंपीटिशन में कामयाबी हासिल नहीं कर सकी थी. अविनाश चाहते थे कि वह शादी कर ले.

अविनाश ने न्यासा को कई बार समझाया, ‘‘न्यासा, कंपीटिशन के साथसाथ और जगह भी ट्राई करती रहो. कभी किस्मत साथ दे जाती है और सबकुछ देखते ही देखते बदल जाता है.’’

‘‘पापा, आप भी कंपीटिशन से यहां पहुंचे हैं. मुझे भी छोटी नौकरी नहीं करनी. आप की तरह बड़ी नौकरी से काम की शुरुआत करनी है.’’

न्यासा की बात सुन कर अविनाश को अच्छा न लगा. वे जानते थे कि उन की बात पर न्यासा हमेशा तीखा जवाब देती है. उसे पापा का बरताव जरा भी अच्छा नहीं लगता था. पढ़ाई तो वह शादी के बाद भी जारी रख सकती थी.

अच्छी पोजीशन वाला लड़का देख कर अगर पहले उस की शादी कर दी जाए, तो ज्यादा ठीक रहता. अभी अविनाश बड़े पद पर थे. न्यासा के लिए रिश्ते भी बहुत आ रहे थे, लेकिन वह सब को मना कर रही थी.

अविनाश बोले, ‘‘रूही, तुम ही न्यासा को सम?ा दो. उस की उम्र बढ़ रही है. उसे कोई लड़का पसंद हो तो बता दे. उस की खुशी की खातिर हम सबकुछ करने को तैयार हैं. शादी भी समय की अच्छी होती है.’’

‘‘यह बात तुम मुझे नहीं न्यासा को कहो. वह पहले कुछ बन कर दिखाना चाहती है. शादी का क्या है, वह तो बाद में भी हो जाएगी,’’ रूही ने अपनी बात कही.

‘‘तुम्हारी इन बातों से उसे बढ़ावा मिल रहा है. आजकल शादी के बाद भी लड़कियां पढ़लिख कर बहुतकुछ बन रही हैं. वह बाद में भी अपनी पढ़ाई जारी रख सकती है.’’

‘‘तुम उसे ले कर परेशान मत हो. जल्दी ही उसे कामयाबी मिलेगी और उस का घर भी बस जाएगा,’’ रूही ने कहा.

सबकुछ जानते हुए भी रूही ने न्यासा का ही पक्ष लिया. नौकरी पर रहते हुए बेटियों की शादी करने का मजा ही कुछ और था. पदप्रतिष्ठा के साथ अच्छे रिश्तों की कमी नहीं थी. न्यासा ने अपनी ओर से किसी लड़के में कभी उत्सुकता नहीं दिखाई थी. अभी उस का सारा ध्यान पढ़ाई पर था. इसी वजह से वह शादी को तवज्जुह नहीं दे रही थी.

अविनाश की नौकरी का एक साल बाकी रह गया था. इस दौरान अगर न्यासा को कहीं कामयाबी मिल जाती, तो वे तुरंत उस के हाथ पीले कर देते. पर न्यासा को इस बात की चिंता नहीं थी. वह जानती थी कि अच्छे पद पर कामयाबी हासिल करने के बाद उसे जीवनसाथी ढूंढ़ने में कोई परेशानी नहीं होगी. वह अपने लैवल का लड़का देख कर उससे शादी कर सकती है. उस की कई लड़कों से अच्छी दोस्ती थी, लेकिन शादी को ले कर वह अभी सीरियस नहीं थी. दोनों ही अपनी जगह पर सही थे.

पीढ़ी का अंतर साफ दिखाई दे रहा है. इसी वजह से सोच में भी फर्क आया था, लेकिन मम्मीपापा की चिंता अपनी जगह पर वाजिब थी.

न्यासा ने इस बार सिविल सर्विसेज के लिए बहुत तैयारी की थी. उसे उम्मीद थी कि उस का सिलैक्शन हो जाएगा. वह बड़ी बेसब्री से रिजल्ट का इंतजार कर रही थी, लेकिन इस बार भी उसे नाकामी का मुंह देखना पड़ा. रिजल्ट देख कर उसे बहुत तगड़ा झटका लगा था.

अविनाश के लिए भी यह बड़ी परेशानी वाली बात थी. वे बोले, ‘‘रूही, अब बहुत हो गया. कब तक कंपीटिशन के चक्कर में न्यासा अपनी जवानी इस तरह बरबाद करती रहेगी.’’

‘‘यह समय ऐसी बातों का नहीं है. तुम्हें उसे दिलासा देनी चाहिए. ऊपर से तुम उसे ताना मार रहे हो,’’ रूही ने कहा.

‘‘मैं उसे सुना नहीं रहा हूं. तुम्हारे सामने हकीकत बयां कर रहा हूं. कंपीटिशन की तैयारी जिंदगी का मजा लेते हुए भी की जा सकती है. इस बार तो उस ने घर से बाहर निकलना तक छोड़ दिया था. उस की सारी उम्मीद है इसी पर टिकी थी, लेकिन हासिल क्या हुआ?’’

‘‘कोई बात नहीं है. कभीकभी ऐसा हो जाता है. तुम्हें इस समय उसे हिम्मत बंधानी चाहिए,’’ रूही बोलीं.

‘‘अब मेरा भी सब्र टूटा जा रहा है. यह बात तुम नहीं समझोगी,’’ अविनाश ने कहा.

‘‘तुम बड़ी पोस्ट पर हो. कोई अच्छा सा लड़का देख कर न्यासा की जिंदगी संवार दो,’’ रूही ने अपनी राय दी.

‘‘कोशिश करूंगा. इस ने तो आज तक कभी किसी लड़के का जिक्र तक नहीं किया. घर से बाहर निकले तब तो अपने लिए कोई जीवनसाथी ढूंढ़ेगी. पढ़ाई के पीछे उस ने अपने सारे सपने एक तरफ रख दिए. बस, एक ही धुन ले कर चल रही है,’’ अविनाश बोले तो रूही चुप हो गईं.

एक पिता होने के चलते अविनाश की चिंता वाजिब थी, लेकिन क्या करें? रूही न्यासा को ऐसे हालात में अकेला भी तो नहीं छोड़ सकती थीं. न्यासा का भी एक सपना है. अगर वह कुछ बनना चाहती है तो मम्मीपापा का फर्ज बनता है कि उसे हर तरीके से सपोर्ट करें.

थके मन से अविनाश औफिस पहुंचे थे, लेकिन वहां पर खुशी का माहौल देख कर वे चौंक गए. उन से कुछ पूछते न बना. सब रामदीन को बधाई दे रहे थे. उन की खुशी देखते ही बनती थी. उन्हें समझ नहीं आया कि ऐसी क्या बात हो गई है, जो औफिस असिस्टैंट रामदीन औफिस का हीरो बना हुआ है. उन्होंने घंटी बजाई. रामदीन तुरंत हाजिर हो गए.

‘‘बड़े बाबू को बुलाओ,’’ अविनाश ने कहा.

‘‘जी साहब,’’ कह कर रामदीन तुरंत कमरे से बाहर निकल गए. थोड़ी देर में बड़े बाबू अविनाश के सामने हाजिर थे.

तभी रामदीन मिठाई ले कर आ गए.

‘‘यह किस खुशी में है?’’ अविनाश ने पूछा.

‘‘सर, रामदीन का बेटा सिविल सर्विस में बहुत अच्छी पोजीशन ले कर कामयाब हो गया,’’ बड़े बाबू ने खुश हो कर कहा.

यह सुनते ही अविनाश का मुंह खुला का खुला रह गया. वे कभी सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि एक औफिस असिस्टैंट का बेटा इतनी ऊंची जगह तक पहुंच सकता है.

उन्होंने मिठाई का एक टुकड़ा तोड़ा और ‘बधाई हो रामदीन’ कह कर अपनी बात खत्म कर दी. इस से आगे उन्होंने रामदीन से कुछ नहीं पूछा.

बड़े बाबू को काम समझा कर अविनाश ने उन्हें भी कमरे से विदा कर दिया था.

यह खबर अविनाश के लिए किसी धमाके से कम नहीं थी. आज तक उन्होंने रामदीन के बारे में कुछ भी जानना नहीं चाहा था. इस समय उन की दिलचस्पी रामदीन के बारे में जानने की थी, लेकिन कोई बताने वाला नहीं था. उन्हें समझ नहीं आ रहा था आखिर पूछें तो किस से?

अविनाश ने तुरंत आज का अखबार मंगवाया और उसे पलट कर देखने लगे. एक पेज पर रामदीन की परिवार के साथ तसवीर छपी थी. वे उसे ध्यान से देखने लगे. ‘कार्यालय सहायक का बेटा बनेगा डीएम’ हैडिंग देख कर वे एकसाथ सारी खबर पढ़ गए. तब जा कर उन्हें पता चला की रामदीन के परिवार में एक
बेटा और एक बेटी है. दोनों ही पढ़ने में होशियार हैं. उस के बेटे को दूसरी बार में यह कामयाबी हासिल हुई थी. हालांकि, वह रिजर्व्ड कैटेगरी का था लेकिन उस ने मैरिट में यह जगह अनरिजर्व्ड सूची में बनाई थी.

अविनाश का आज काम में मन नहीं लग रहा था. रहरह कर उन के सामने कभी रामदीन का तो कभी न्यासा का चेहरा घूम रहा था. उन्हें सम?ा नहीं आ रहा था कहां कमी रह गई जो छोटे पद पर काम करने वाले रिजर्व्ड कैटेगरी के रामदीन का बेटा पलाश इतनी बड़ी कामयाबी हासिल कर गया और सुविधाओं में पलीबढ़ी न्यासा चूक गई.

आज अविनाश औफिस से जल्दी घर चले आए थे. घर पर भी मायूसी छाई हुई थी. रूही चाय पीते हुए उन के सामने बैठी हुई थीं.

अविनाश बोले, ‘‘यही हाल रहा तो न्यासा डिप्रैशन में चली जाएगी. तुम उसे सम?ा कर शादी के लिए राजी कर लो. इस से उस की जिंदगी में खुशी लौट आएगी.’’

‘‘यह काम तुम भी तो कर सकते हो,’’ रूही बोलीं.

‘‘वह मेरी बात नहीं सुनती. हो सकता है तुम्हारी बात मान जाए. तुम्हें वह बहुत मानती है,’’ अविनाश ने कहा.

‘‘कोशिश कर के देखती हूं. मैं भी उस की खुशी चाहती हूं. कामयाबी हासिल करने के लिए हम ने उसे साधन दिए बाकी काम तो उसे ही करना है,’’ रूही बोलीं.

‘‘वह पढ़ने में अच्छी है और उसे ले कर गंभीर भी है. फिर भी पता नहीं क्यों यह नौबत आ गई,’’ अविनाश बोले.

‘‘मैं उसे शादी के लिए मना भी लूं, लेकिन उस के लिए कोई काबिल लड़का भी तो चाहिए,’’ रूही ने कहा.

‘‘जहां तक वह खुद नहीं पहुंच सकी उस पोजीशन पर उस का जीवनसाथी होगा, तो शायद वह अपनी इस कसक को भूल जाए,’’ अविनाश ने कहा.

‘‘तुम्हारे लिंक बहुत अच्छे हैं. कोशिश करोगे तो कोई अच्छा लड़का भी मिल जाएगा. अब हमें इस काम में देरी नहीं करनी चाहिए,’’ रूही बोलीं तो अविनाश चुप हो गए.

रात को डाइनिंग टेबल पर अविनाश की न्यासा से मुलाकात हो गई. वह अनमने मन से खाना खा रही थी. रूही उस की हालत को समझ रही थी. इस समय अविनाश कुछ कह कर उसे और दुखी कर सकते थे. रूही ने इशारे से उन्हें चुप रहने का संकेत किया.

अगले दिन औफिस में रामदीन का दमकता चेहरा देख कर अविनाश उन के सामने अपने को बहुत छोटा महसूस कर रहे थे. कल तक जिस आदमी की हैसियत उन के सामने कुछ नहीं थी, आज वह औफिस में सब का हीरो बना हुआ था.

कुछ देर बाद रामदीन अविनाश के सामने हाजिर हो गए. अपनी आवाज में मिठास घोलते हुए अविनाश बोले, ‘‘रामदीन, मैं तुम्हारी बेटे की कामयाबी पर बहुत खुश हूं. मेरा भी फर्ज बनता है कि मैं उसे अपने घर डिनर पर बुलाऊं. साथ बैठ कर खाना खाएंगे तो ढेर सारी बातें ही हो जाएंगी.’’

‘‘अभी तो वह अपने दोस्तों और रिश्तेदारों में बिजी है साहब. मैं पूछ कर बताता हूं,’’ रामदीन हाथ जोड़ कर बोले, तो अविनाश के चेहरे पर तनाव दिखाई देने लगा.

रामदीन की इस हरकत पर उन्हें बड़ा गुस्सा आ रहा था. हिम्मत तो देखो अपने बौस को डिनर के लिए टाल रहा था.

रामदीन ने अभी इस बात का जिक्र किसी से नहीं किया. घर आ कर वे अपनी पत्नी रूपमती से बोले, ‘‘साहब ने हम सब को डिनर पर बुलाया है बेटे की खुशी के लिए.’’

‘‘यह इज्जत तुम्हें नहीं, बल्कि बेटे की उस कामयाबी को मिल रही है, जो उस ने अपनी मेहनत से हासिल की है. इस बारे में उस से बात कर लेना. वही आपको ठीक से समझ सकेगा,’’ रूपमती बोली.

अविनाश भी दिनभर बेटी के भविष्य को ले कर मंथन कर रहे थे. उन्हें लगा कि न्यासा न सही रामदीन का बेटा आज उस पोजीशन पर पहुंच गया था, जिसे वह हासिल करना चाहती थी. अगर वह उसे शादी के लिए मना लें तो उस की जिंदगी संवर जाएगी.

तसवीर में देखने पर पलाश लंबाचौड़ा और खूबसूरत जवान लग रहा था. रामदीन के मुकाबले उस की पर्सनैलिटी बहुत अच्छी थी.

घर आ कर अविनाश ने यह बात रूही से कह दी, ‘‘जानती हो मेरा मेरे औफिस असिस्टैंट रामदीन का बेटा सिविल सर्विसेज में अच्छी पोजीशन लाया है.’’

‘‘यह तो बड़ी खुशी की बात है,’’ रूही ने कहा.

‘‘मैं ने उसे घर पर डिनर का न्योता दिया है,’’ अविनाश बोले.

‘‘तुम यह आयोजन किसी होटल में भी कर सकते हो. अगर तुम्हें उस के बेटे की कामयाबी की इतनी खुशी हुई है तो,’’ रूही तमक कर बोलीं.

‘‘बात समझा करो. होटल और घर के माहौल में फर्क होता है. मैं चाहता हूं कि न्यासा उस से एक बार मिल ले,’’ अविनाश ने अपने मन की बात कही.

‘‘कहां तुम और कहां रामदीन? हमारे स्टेटस में कुछ तो मेल होना चाहिए.’’

‘‘ये सब बाद की बातें हैं रूही. एक बार न्यासा उसे पसंद कर ले, बस उस के बाद समझ लड़का हमारा हुआ. कौन सा हमें रामदीन को बारबार घर पर बुलाना है?’’ अविनाश बोले.

उन्होंने रूही से उस की जाति भी छिपा दी थी. उन्हें एक ही धुन सवार थी कि किसी तरह न्यासा का रिश्ता सिविल सर्विस पास करने वाले लड़के से हो जाए. इतने बड़े सरकारी अफसर की जाति कहां पूछी जाती है.
‘‘कब आ रहे हैं वे डिनर के लिए?’’ रूही ने पूछा.

‘‘अभी वह लड़का पलाश अपने दोस्तों के साथ जश्न मनाने में लगा हुआ है. तुम तो ऐसे लोगों को जानती ही हो. कई दिन तक उन के पैर धरती पर नहीं पड़ेंगे,’’ अविनाश बोले.

अविनाश को पूरी उम्मीद थी कि उन के कहने पर न्यासा रामदीन के बेटे पलाश से मिलने को तैयार हो जाएगी.

एक हफ्ता बीत गया था. रामदीन ने कोई जवाब नहीं दिया था. अविनाश का सब्र चूकने लगा था. वे बोले, ‘‘रामदीन, तुम ने घर पर बात की थी डिनर के लिए?’’

‘‘जी, कहा तो था, लेकिन बेटे को यह सब अच्छा नहीं लग रहा. कह रहा था कि सोच कर बताता हूं,’’ रामदीन बोले.

अविनाश को उस से ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी. कोई और समय होता तो वे उसे उस की औकात दिखा देते, लेकिन इस समय उन्होंने चुप रहना ही ठीक सम?ा. तेवर दिखा कर बात बिगड़ भी सकती थी.

पलाश को यह समझते देर नहीं लगी थी कि क्यों अचानक अविनाश सर का उस के पापा के प्रति इतना अच्छा बरताव हो गया था.

रामदीन के बारबार कहने पर वह बोला, ‘‘पापा, उन के घर डिनर करने से पहले मैं एक बार कल ही उन से औफिस में मिल लेता हूं. अगर मुझे ठीक लगेगा तो मैं उन के घर आप सब के साथ डिनर पर चला जाऊंगा, लेकिन यह बात उन्हें पहले मत बताइएगा.’’

इस दौरान पलाश ने अविनाश के बारे में सारी जानकारी जुटा ली थी. उन का चरित्र और मकसद सब उस की समझ में आ गया था. अगर वे इतने ही बड़े दिल के होते तो उन के घर आ कर भी बधाई दे सकते थे. रामदीन इन सब बातों से अनजान थे.

अगले दिन पलाश अपने पापा के साथ ही औफिस के लिए चल पड़ा. उसे अपने बीच देख कर औफिस के बाकी लोग बहुत खुश थे. ज्यादातर तो उस के घर जा कर पहले ही बधाई दे आए थे.

‘‘आज कैसे आना हुआ पलाश?’’ बड़े बाबू ने पूछा.

‘‘पापा की तबीयत कुछ ठीक नहीं थी. उन्हें छोड़ने चला आया,’’ बात बदल कर पलाश बोला.

यह बात अविनाश तक भी पहुंच गई थी. उन्होंने खुद ही तुरंत पलाश को अपने केबिन में बुला लिया.

हैंडसम पलाश को अविनाश अपलक देखते ही रह गए. पलाश ने आगे बढ़ कर उन के पैर छुए तो उन्होंने उसे ढेर सारे आशीर्वाद के साथ गले लगा लिया और बोले, ‘‘तुम सोच भी नहीं सकते कि तुम्हारी इस कामयाबी पर मुझे कितनी खुशी हुई है.’’

‘‘यह मेरा सौभाग्य है सर.’’

‘‘कुछ दिन में तुम्हें ट्रेनिंग पर जाना होगा?’’

‘‘जी सर, अभी लैटर नहीं आया.’’

‘‘सिविल सर्विस का ठप्पा लगना अपनेआप में बहुत बड़ी बात होती है बेटा. लाखों अभ्यर्थियों में से लगभग हजार स्टूडैंट का ही सपना हर साल पूरा होता है.’’

‘‘आप इतने सीनियर औफिसर हैं. आप को इन सब बातों की पूरी जानकारी है. मेरा अनुभव आप के सामने कुछ भी नहीं है.’’

‘‘समय के साथ सबकुछ सीख जाओगे. मुझे पूरी उम्मीद है तुम एक बहुत काबिल अफसर बनोगे.’’

‘‘मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूंगा सर.’’

‘‘मुझे सर मत कहो, अंकल कह सकते हो. मैं तुम्हारे पापा की ही उम्र का हूं और अगले साल रिटायर होने वाला हूं. मैं चाहता हूं तुम एक दिन मेरे परिवार के साथ डिनर करो, जिस से हमारा आपसी मेलजोल बढ़ सके.’’

‘‘अंकल, मेरे पापा आप के सामने बैठ कर खाना खाने की जुर्रत नहीं कर सकते. मैं नहीं चाहता कि वे हीनभावना से ग्रस्त हो जाएं.’’

‘‘तुम्हारी सोच बहुत अच्छी है. अगर रामदीन नहीं आ सकते तो तुम ही आ जाओ मेरे घर डिनर पर.’’

‘‘यह नहीं हो सकता. आप का और मेरा संबंध पापा की वजह से है. मैं उन्हें दरकिनार कर शौर्टकट नहीं अपना सकता. एक साल बाद जब आप रिटायर हो जाएंगे, तब आप के और पापा के बीच में औफिस का यह रिश्ता खत्म हो जाएगा. तब मैं खुशीखुशी आप के घर डिनर के लिए आ जाऊंगा. मुझे उम्मीद है आप इस बात को अन्यथा नहीं लेंगे.’’

‘‘मुझे उस दिन का इंतजार रहेगा जब तुम अपनी ओर से हमारे घर आने के लिए उत्सुकता दिखाओगे.’’
‘‘इस के लिए थोड़ा सब्र करना होगा. तब तक मेरी ट्रेनिंग भी खत्म हो जाएगी और मुझे अच्छी पोस्टिंग भी मिल जाएगी. इस दौरान मुझे अपने साथ के प्रशिक्षुओं से मिलनेजुलने का अवसर मिलेगा. मैं ने सोच लिया है कि मैं उन में से किसी को अपना जीवनसाथी चुन लूंगा. हम साथ ही आप के घर डिनर पर आएंगे अंकल. बस, मुझे थोड़ा समय दे दीजिए,’’ पलाश बड़ी बेबाकी से मुसकरा कर बोला.

अविनाश को पलाश से ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी. वे बोले, ‘‘तुम अपने जैसी पोजीशन वाली जीवनसाथी चुनने में उत्सुक हो?’’

‘‘जी अंकल, इस से विचारों का लैवल बराबर रहता है. वह भी अपने काम में बिजी रहेगी और मैं भी,’’

एक झटके में पलाश की बातों ने अविनाश की सारी उम्मीद पर पानी फेर दिया था.

कुछ देर और इधरउधर की बात कर पलाश वापस घर चला गया था. रामदीन के कुछ कहने से पहले ही पलाश बोला, ‘‘आप निश्चिंत रहें पापा. अब इस बात को वे कभी नहीं उठाएंगे.’’

‘‘ऐसा क्या हो गया?’’

‘‘कुछ नहीं. मैं चाहता हूं पापा कि अब आप यह नौकरी छोड़ दें.’’

‘‘मैं ने सालों ईमानदारी से काम किया है और तुम्हारी कामयाबी में उस का भी बड़ा हाथ है. अब समय बचा ही कितना है? मैं अपना कार्यकाल पूरा कर इज्जत के साथ रिटायर होना चाहता हूं,’’ रामदीन बोले.

‘‘जैसी आप की मरजी,’’ कह कर पलाश ने बात खत्म कर दी.

अगले दिन सुबह पलाश ने रामदीन को कुछ समझाया और सावधान के रहने की चेतावनी भी दी. अविनाश का बरताव रामदीन के साथ वैसा नहीं रह गया था, जैसा वे कुछ दिनों से दिखाने की कोशिश कर रहे थे.

पलाश की बातों ने अविनाश को बहुत आहत किया था. उन्होंने सोच लिया था कि वे बापबेटे को अच्छा खासा सबक सिखा कर रहेंगे. जरा सी कामयाबी मिलते ही इन के पर निकल आए हैं.

हफ्तेभर बाद एक दिन अविनाश ने बड़े बाबू से एक फाइल मंगाई और बोले, ‘‘तुम जानते हो यह फाइल कितनी जरूरी है. कल इस पर फैसला होना है. तुम ने इसे पढ़ लिया न?’’

‘‘जी सर, पढ़ लिया.’’

‘‘इसे यहीं रख दो. मैं फिर पढ़ूंगा.’’

बड़े बाबू फाइल छोड़ कर चले गए. सारा दिन सामान्य बीता. अगली सुबह जब रामदीन औफिस पहुंचे तो वहां पुलिस खड़ी थी.

‘‘क्या हुआ?’’ रामदीन ने घबरा कर पूछा.

‘‘औफिस से एक जरूरी फाइल चोरी हो गई है. सर का शक तुम पर है. तुम्हीं उस कमरे में आतेजाते हो, बाकी तो कोई नहीं जाता,’’ औफिस का एक मुलाजिम रूपेश बोला.

‘‘मेरा फाइल से क्या लेनादेना?’’ रामदीन बोले.

‘‘यह तो साहब ही जानें. उन्होंने ही पुलिस बुलाई है. तुम से पूछताछ होगी.’’

पुलिस के नाम से रामदीन डर गए. उन्होंने तुरंत पलाश को फोन कर सारी बात बता दी.

पुलिस अभी रामदीन से पूछताछ कर ही रही थी की पलाश आ गया. उस ने अपना परिचय दिया, तो पुलिस वालों ने भी उसे सलाम ठोंक दिया.

‘‘पापा से पूछने से पहले मैं आप को कुछ दिखाना चाहता हूं,’’ पलाश बोला.

पलाश ने अपना लैपटौप खोला और कल की रिकौर्डिंग उन्हें दिखा दी. बड़े बाबू भी बड़े ध्यान से यह सब देख रहे थे. लैपटौप पर सामने दिखाई दे रहा था कि अविनाश ने वह फाइल आलमारी से निकाल कर अपने ब्रीफकेस में रखी और कमरे से बाहर चले गए. अविनाश को सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि उन की यह कोशिश नाकाम हो जाएगी.

‘‘थैंक यू मिस्टर पलाश,’’ पुलिस इंस्पैक्टर बोला.

‘‘हो सकता है गलती से फाइल घर चली गई हो. मुझे ध्यान नहीं रहा,’’ अविनाश अपनी खीज मिटाते हुए बोले.

‘‘लेकिन आप को यह रिकौर्डिंग कहां मिली?’’

‘‘यह बात मुझ से अच्छी तरह आप जानते होंगे इंस्पैक्टर,’’ कह कर पलाश हंस दिया.

रामदीन को संतोष था कि बेटे की वजह से आज उन की इज्जत रह गई थी. अब उन्हें समझ आ गया कि उस दिन क्यों पलाश ने उन्हें नौकरी छोड़ने के लिए कहा था? उन्हें अविनाश का मकसद पहले ही दिखाई देने लगा था, तभी वे रोज उन्हें औफिस आते हुए एक डिबिया थमा देते थे.

रामदीन के सामने आज एक बार फिर अविनाश को मुंह की खानी पड़ी. उन का चरित्र सब के सामने उजागर हो गया था.

Story In Hindi: रास्ते का कांटा

Story In Hindi: विकास पांडेय यानी भैयाजी सत्ताधारी पार्टी का नेता था, इसलिए वह अकसर सफेद रंग का कुरतापाजामा ही पहनता था. वह लंबी कदकाठी और मजबूत शरीर का मालिक था. उस का रंग गोरा था और उस पर काला चश्मा बहुत फबता था.

35 साल का विकास पांडेय अपने लुक्स पर बहुत ध्यान देता था. उस के पास तमाम तरह के परफ्यूम्स का अच्छाखासा कलैक्शन था.

लखनऊ शहर से 400 किलोमीटर दूर नगलानगर नामक कसबे में विकास पांडेय की नेतागीरी खूब फलफूल रही थी और उस का वहां के लोगों पर अच्छाखासा रोबदाब भी था.

विकास पांडेय अपनी निजी जिंदगी में थोड़ा सा परेशान था, क्योंकि उस की शादी को 5 साल हो गए थे, पर उस की पत्नी रीमा उसे औलाद का सुख नहीं दे पाई थी और हर मर्द की तरह विकास पांडेय अपनी पत्नी को ही इस के लिए जिम्मेदार मानता था और अकसर रीमा को खरीखोटी सुनाता रहता था. कई बार तो उस ने रीमा के साथ मारपीट भी की थी.

‘‘तुम मेरी राह का वह कांटा बन चुकी हो जो सिर्फ चुभने के अलावा कुछ और नहीं कर सकता,’’ विकास पांडेय रीमा को तमाम बुरे से बुरे ताने देता था. वैसे, विकास पांडेय ने रीमा को कई डाक्टरों को भी दिखाया था. डाक्टरों ने तमाम चैकअप और टैस्ट भी किए थे, पर रीमा की सभी रिपोर्ट्स नौर्मल निकली थीं. डाक्टरों ने कुछ हार्मोन बढ़ाने वाली दवाएं दीं और औलाद के लिए कोशिश करते रहने को कहा.

विकास पांडेय का एक 28 साल का कुंआरा भाई राहुल भी था, जिसे वह दिखावटी प्यार करता था.

सभी सफेदपोश नेताओं की तरह विकास पांडेय के साथ बहुत सारे चाटुकार लोग थे, जो किसी भी सभा से पहले मंच पर उस की जम कर तारीफ करते और अपने नेता के आने से पहले उस के लिए एक माहौल सा तैयार कर देते थे.

विकास पांडेय के इन चाटुकारों में फागुन नाम की एक कवयित्री भी थी, जिस की उम्र महज 25 साल थी. फागुन का शानदार फिगर और आवाज बहुत मनमोहक थी.

जब वह मंच पर अपनी मधुर आवाज में कविता पढ़ती, तो लोग वाहवाह कर उठते थे और जब वह विकास पांडेय की शान में कसीदे पढ़ती, तो भी लोग तालियां पीटने पर मजबूर हो जाते थे.

इन तालियों के बीच फागुन अपना भविष्य तलाश रही थी.उस के मन में यह विचार था कि विकास पांडेय अपनी नेतागीरी का इस्तेमाल कर के उसे कविता के बड़े मंचों तक पहुंचा देगा, पर विकास के मन में तो फागुन के लिए कुछ और ही योजना थी.

विकास पांडेय खूबसूरती का पारखी था और वह फागुन के रूप का रस चख लेना चाहता था. इस बात का इशारा उस ने फागुन को कई बार बातबात में किया भी था.

‘‘अब इस दुनिया में आगे बढ़ने के लिए हर किसी को कुछ न कुछ कीमत तो चुकानी ही पड़ती है फागुनजी,’’ एक दिन कुटिलता भरे अंदाज में विकास पांडेय ने कहा, तो फागुन हर एक शब्द का मतलब समझ गई थी.

वैसे भी विकास पांडेय दोनों हाथों से फागुन पर पैसा लुटाता था. वह उसे उस की जरूरत का हर सामान दिलाता था. फाइवस्टार होटलों में खाना खिलाने ले जाता था और हफ्ते के आखिर में अपने फार्महाउस पर भी फागुन को साथ में ले जाता था. फागुन भी विकास पांडेय की ऐशोआराम भरी जिंदगी और रुतबा देख कर दंग रह जाती थी.

फागुन विकास पांडेय के प्रति मन से तो समर्पण कर ही चुकी थी, पर उस दिन जब बारिश हो रही थी और विकास पांडेय और फागुन दोनों फार्महाउस पर थे, तब फागुन ने तन से भी समर्पण कर दिया और उस मस्त शाम में उन दोनों के बीच जिस्मानी संबंध बन गए थे.

उन दोनों के बीच की शर्म की दीवार गिर गई थी. उस दिन के बाद तो जब भी उन दोनों को मौका मिलता, तब वे जवानी का जीभर कर मजा लूटते थे.

फागुन के घर में उस के मांबाप नहीं थे, सिर्फ एक 20 साल का छोटा भाई था, जो फागुन से ज्यादा सवालजवाब नहीं करता था.

उस दिन जब फागुन और विकास पांडेय लखनऊ के ऐतिहासिक बेगम हजरत महल पार्क में होने वाली रैली के लिए जा रहे थे, तो फागुन ने अपने उभारों के तीखेपन को विकास के शरीर से टकराते हुए कहा, ‘‘अब तो लोग हमारे संबंध पर सवाल उठाने लगे हैं. मैं ज्यादा दिन आप के साथ नहीं रह सकती. मुझे अपना कोई दूसरा रास्ता अपनाना होगा और आप से दूर जाना होगा,’’ फागुन के स्वर में निराशा भरी हुई थी.

विकास पांडेय ने फागुन के कंधे पर हाथ रखा और उसे अपनी तरफ खींचते हुए कहा, ‘‘तुम्हें घबराने की जरूरत नहीं है. मुझे क्या करना है, यह मैं ने अच्छी तरह सोच लिया है.’’

इस के बाद विकास पांडेय ने फागुन को अपना पूरा प्लान बताया कि वह फागुन की शादी अपने छोटे भाई राहुल के साथ करा देगा, जिस से फागुन हमेशा के लिए विकास के पास रहेगी और वे दोनों जीभर कर बिना डरे मजे भी कर सकेंगे और दुनिया वाले उन के रिश्ते पर आवाज भी नहीं उठा पाएंगे.

फागुन यह प्लान सुन कर बिना मुसकराए न रह सकी.

‘‘पर फिर तो आप का छोटा भाई मेरे साथ रोज ही सुहागरात मनाएगा,’’

फागुन ने एक भद्दा सा इशारा करते हुए मजाकिया लहजे में कहा, तो विकास ने फागुन को निश्चिंत रहने को कहा और यह ताकीद की कि फागुन इस बात का ध्यान रखे कि राहुल किसी भी सूरत में उस के शरीर को हाथ भी न लगा पाए.

फागुन ने कुछ सोचते हुए अपनी सहमति दे दी.

विकास पांडेय ने राहुल से फागुन से शादी करने की बात कही और फागुन की तारीफ की, तो वह अपने बड़े भाई की बात नहीं टाल सका और शादी के लिए हां कर दी.

हालांकि, रीमा को यह सब बहुत अजीब सा लग रहा था, पर भला उस की सुनने वाला ही कौन था.

नगलानगर नामक कसबे में एक विशाल समारोह हुआ, जिस में फागुन और राहुल की शादी हो गई. कई बड़े नेताओं ने इस में शिरकत की. मीडिया में भी यह शादी चर्चा की बात बनी हुई थी.

फागुन अपने घर से विदा हो कर विकास पांडेय के घर चली आई थी और फागुन के भाई को होस्टल में जाना पड़ा था.

आज राहुल और फागुन की सुहागरात थी, पर राहुल अपनी पत्नी के शरीर को न छू सके, इस के लिए विकास पांडेय ने पूरा जुगाड़ कर लिया था. उस ने एक कमरे में कबाब और महंगी शराब की 2-3 बोतलें मंगवाईं और राहुल को अपने सामने बिठा कर उसे इतनी शराब पिलाई कि वह नशे में चूर हो कर वहीं सो गया.

सुहाग की सेज पर फागुन बैठी हुई थी. आधी रात में सफेद कुरतेपाजामे में विकास पांडेय कमरे में दाखिल हुआ और दुलहन बनी फागुन को अपनी बांहों में कस लिया.

फागुन ने भी जीभर कर विकास का साथ दिया. वैसे, फागुन तो राहुल की दुलहन बन कर आई थी, मगर उस ने सुहागरात विकास के साथ ही मनाई.

अगली सुबह जब राहुल का नशा उतरा, तो उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और वह अपनी नईनवेली दुलहन से उस के पास जा कर सुहागरात पर न आ पाने के चलते माफी मांगने लगा.

‘‘अरे, आप ऐसे क्यों कह रहे हैं… बड़े आयोजनों और शादीब्याह में तो यह सब होता ही है,’’ मधुर स्वर में फागुन ने कहा, तो राहुल अपराधबोध से मुक्त हो गया और दूसरे कामों में लग गया.

पर अगली रात को जब राहुल ने फागुन के जिस्म को छूना चाहा, तो फागुन ने तबीयत न ठीक होने का बहाना बना दिया. राहुल अपना सा मुंह ले कर रह गया, पर कुछ कह न सका विकास पांडेय ने अब अगले दिन से ही फागुन को अपने साथ राजनीतिक सभाओं में और दूसरी जगहों पर घूमनेफिरने के लिए ले जाना शुरू कर दिया था.

चूंकि राहुल यह जानता था कि फागुन उस के भाई विकास के साथ मंच पर कविता पाठ करने के लिए जाती है और भैया के राजनीतिक कामों में भी उन की मदद करती है, इसलिए वह कुछ विरोध भी नहीं कर सका.

राहुल ने तो अपने मन को समझा लिया था, पर रीमा को यह बात लगातार खटक रही थी कि उस के पति विकास ने उस के साथ काम करने वाली एक साधारण लड़की के साथ राहुल की शादी क्यों करा दी, जबकि राहुल के लिए तो अच्छे घरों के रिश्ते आ रहे थे?

घर में भी विकास और फागुन के बीच काफीकुछ ऐसा था, जिस में कोई सीमा और मर्यादा नहीं थी. मसलन, अपने जेठ विकास के सामने फागुन सिर पर पल्ला नहीं करती थी और उसे विकास के पास बैठने में भी कोई गुरेज नहीं था.

कई दिन तक फागुन और विकास के चालचलन को देखने के बाद रीमा को यकीन हो गया था कि उन दोनों के बीच कुछ गलत संबंध जरूर है और रीमा ने उस शाम को जब यह बात राहुल से शेयर की, तो वह भी बोला, ‘‘मेरे एक दोस्त ने भी मुझ से फागुन और भैया को ले कर कुछ कहा है और जरूर भैया और फागुन के बीच गड़बड़ है, तभी तो शादी के 2 महीने बाद भी फागुन ने मुझे अपने शरीर को हाथ तक नहीं लगाने दिया है.’’

राहुल का दुख उस की आंखों से उमड़ रहा था. उस का मन अब यहां रहने का नहीं हो रहा था और यह बात भी उस ने रीमा से बता दी थी.

दुखी राहुल और रीमा दोनों प्लान बनाने लगे कि अब आगे क्या किया जाए? काफी सोचविचार कर के वे एक नतीजे पर पहुंच गए थे.

शाम को जब फागुन और विकास वापस आए, तो राहुल ने अपने भैया को खुशीखुशी बताया कि अगले महीने की 15 तारीख को वह फागुन को ले कर पड़ोसी देश नेपाल के काठमांडू शहर जा रहा है, जहां पर वह एक प्लास्टिक फैक्टरी लगाएगा. उस ने यह भी बताया कि बाकी के शेयर होल्डरों से भी बात कर ली गई है और वे सब भी पैसा लगाने को तैयार हैं.

राहुल की बात सुन कर फागुन और विकास सन्न रह गए. अब वे दोनों रंगरेलियां कैसे मना पाएंगे? फागुन ने हैरतभरी नजरों से विकास की ओर देखा तो विकास ने उसे चुप रहने का इशारा कर दिया, मानो कुछ हुआ ही न हो.

राहुल ने फागुन को भी अपने साथ काठमांडू चलने को कहा. फागुन ने थोड़ी नानुकर की, तो बदले में राहुल नाराज हो गया, ‘‘बिना अपने पति के यहां पर तुम क्या करोगी भला? माना कि विकास भैया के साथ जाना और उन के कामों में हाथ बंटाना तुम्हारी जिम्मेदारी है और तुम्हारे काम का भी हिस्सा है, पर आखिर कब तक तुम उन के साए में रहोगी… तुम्हें मेरे साथ चलना ही होगा.’’

राहुल के सख्त स्वर के आगे शांत हो गई थी फागुन, पर उस ने यह बात एक मैसेज के द्वारा विकास से बता दी.

अगली सुबह जब राहुल अपनी बाइक से पास के शहर में किसी काम से जा रहा था तो उस की बाइक का एक्सीडैंट करवा दिया गया. इस हादसे में उस की जान तो बच गई, पर वह पूरी तरह से अपाहिज हो कर बिस्तर पर पड़ गया था. राहुल की कमर से ले कर निचले हिस्से में कोई भी हलचल नहीं थी. उस के मुंह से साफ आवाज भी नहीं निकल रही थी.

विकास और फागुन अब बहुत खुश थे, क्योंकि अब तो उन्हें रोकनेटोकने वाला कोई नहीं था.

‘‘तुम घबराओ मत… इस बार तो एक्सीडैंट ही करवाया है, अगली बार सीधा गोली चलवा दूंगा. वैसे, अब उस की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी,’’ विकास ने फागुन की पीठ सहलाते हुए कहा.

यह बात कहते हुए वह भूल गया कि रीमा ने चुपके से उन दोनों के बीच होने वाली बातों को न केवल सुन लिया है, बल्कि अपने मोबाइल में उन का यह वीडियो कैद भी कर लिया है.

रीमा इस वीडियो को ले कर सीधा पुलिस के पास जा सकती थी और विकास को अपने छोटे भाई की हत्या करवाने की साजिश के आरोप में गिरफ्तार करवा सकती थी, पर उस ने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वह जानती थी कि विकास एक रसूखदार नेता है और राजनीतिक गलियारे में उस की अच्छी पहुंच है, इसलिए इतना सुबूत नाकाफी होगा.

लिहाजा, रीमा ने शांत रहने का फैसला किया और विकास और फागुन की हरकतों को छिप कर देखती रही.

रात में जब रीमा की आंख लग जाती तब विकास धीरे से उठता और फागुन के पास उस के कमरे में चला जाता, जहां पर दोनों जवानी के मजे लेते, जबकि रीमा अपने बिस्तर पर करवटें बदलती रहती.

एक रात को जब उस से नहीं रहा गया तब रीमा ने अपनेआप से सवाल पूछा कि आखिर तेरा पति तुझे छोड़ कर दूसरी औरत के पास क्यों जाता है? आखिर तू भी तो खूबसूरत है और तेरे पास भी वह सब है जो उस के पास है? जवाब रीमा के अंदर से ही आया कि एक मर्द के अंदर दस जगह मुंह मारने की आदत होती है और उसी आदत को तेरा पति भी जी रहा है.

जिस तरह से मूल से ज्यादा प्यारा सूद होता है उसी तरह से लुच्चे लोगों के लिए घरवाली से ज्यादा आकर्षण दूसरी बाहर वाली में होता है, बाहर वाली यानी फागुन में विकास को ज्यादा मजा नजर आ रहा है.

राहुल को बिस्तर से लगे हुए 5 महीने हो गए थे और उस की तबीयत में कोई सुधार नहीं नजर आ रहा था. खुद रीमा अपने देवर का ध्यान रखती थी, पर फिलहाल तो राहुल लाचारी ओढ़े हुए बिस्तर पर ही पड़ा रहता था.

उस रात बहुत तेज बारिश हो रही थी. राहुल दवा खा कर नींद के आगोश में था, जबकि फागुन और विकास एकदूसरे से तकरीबन चिपके हुए बैठे थे और दोनों में बातें हो रही थीं.

‘‘अब आप को मेरा और ज्यादा खयाल रखना चाहिए, क्योंकि मैं आपके बच्चे की मां बनने वाली हूं,’’ फागुन ने कहा तो विकास पांडेय की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने फागुन को अपनी बांहों में भर लिया और उस के होंठों को चूमने लगा.

‘‘हमारी तरफ से भी बधाई स्वीकार करो तुम दोनों,’’ रीमा ताली बजाते हुए कमरे में आ रही थी. उसे देख कर वे दोनों बुरी तरह चौंक गए थे.

उन की चोरी पकड़ी गई थी. वे दोनों एकदूसरे से दूर छिटक गए थे, पर रीमा ने मुसकराते हुए फागुन के सिर पर हाथ फेरा और कमरे से बाहर चली गई.

विकास अवाक रह गया था कि अपने पति को अपनी देवरानी के साथ इस हालत में देख कर रीमा ने कोई चीखपुकार क्यों नहीं मचाई, बल्कि सिर्फ मुसकरा कर चली गई… ऐसा क्यों? यह बात उसे बुरी तरह से परेशान कर रही थी.

विकास अगले दिन रीमा से नजरें नहीं मिला पा रहा था, जबकि रीमा के चेहरे पर ऐसी चमक थी जो आज से पहले विकास ने कभी नहीं देखी थी. वह मुसकराए जा रही थी, गीत गुनगुनाए जा रही थी और हर बात पर इठला भी रही थी.

‘‘मुझे माफ कर दो रीमा,’’ विकास ने कहा तो रीमा अनजान सी बन गई

‘‘पर किस बात के लिए?’’ रीमा ने बनावटी ढंग से कहा.

‘‘यही कि फागुन मेरे बच्चे की मां बनने वाली है,’’ विकास ने हकलाते हुए कहा तो रीमा खिलखिला कर हंस पड़ी.

विकास के चेहरे पर कई सवालिया निशान थे. वह जल्दी से रीमा की हंसी की वजह जान लेना चाहता था.
रीमा ने जो बताया वह सुन कर विकास पांडेय की सारी नेतागीरी धरी की धरी रह गई. रीमा ने उसे बताया कि जब फागुन के पति का शरीर पूरी तरह से लकवाग्रस्त है और वह इतने महीनों से बिस्तर पर हिलडुल भी नहीं सकता, तो उस की पत्नी फागुन भला मां कैसे बन सकती है? और जब यह बात और लोगों को पता चलेगी, तब भला वे सब क्या कहेंगे?

यह सुन कर विकास सन्न रह गया था. यह बात तो उस ने सपने में भी नहीं सोची थी. यह तो भला हो रीमा जैसी अच्छी पत्नी का जो यह बात उस ने इतने आराम से उसे बता दी, नहीं तो बहुत जगहंसाई हो जाती और विपक्षी पार्टी को भी मौका मिल जाता. विकास के मन में एकसाथ कई विचार चल रहे थे.

अगले दिन विकास पांडेय फागुन को अपने साथ ले कर अपने फार्महाउस पर गया.

‘‘आज हम अपने फार्महाउस पर अपने आने वाले बच्चे का सैलिब्रेशन करेंगे,’’ विकास पांडेय ने यह कह कर फागुन को साथ चलने के लिए राजी कर लिया था.

फार्महाउस पर थोड़ाबहुत चायनाश्ता करने के बाद विकास फागुन पर बरस पड़ा कि उस ने एक अनचाहे बच्चे को बीच में क्यों आने दिया?

‘‘तुम ने गर्भनिरोधक गोलियां क्यों नहीं खाईं? अब जबकि राहुल बिस्तर पर है और हिलडुल भी नहीं सकता, ऐसे में तुम मां कैसे बन सकती हो? कभी सोचा है तुम ने,’’ विकास चीख रहा था और अब सकते में आने की बारी फागुन की थी. उस का भी ध्यान तो इस तरफ नहीं गया था. अब भला क्या होगा? अब तो इतना ज्यादा समय हो गया है कि वह चाह कर भी बच्चे को गिरा नही सकती.

फागुन ने अपने चेहरे से तनाव हटाते हुए विकास से कहा, ‘‘पर यह सब तुम्हें मेरे जिस्म को रगड़ने से पहले सोच लेना चाहिए था. अब मैं अपने बच्चे को क्यों हटाऊं?’’ सख्त लहजा था फागुन का, पर विकास यह सुन कर झुंझला गया और बाहर निकल गया.

फागुन ने महसूस किया कि विकास की गाड़ी स्टार्ट हो चुकी है और वह उसे फार्महाउस में छोड़ कर कहीं जा रहा है. फागुन ने बाहर की ओर जाना चाहा, पर दरवाजा बाहर से बंद था.

उस ने विकास के मोबाइल पर फोन मिलाया, पर विकास ने उस का फोन रिसीव नहीं किया.

इतने दिनों से फागुन विकास के साथ रह रही थी और उस की हर चाल को वह अच्छी तरह समझती थी, इसलिए फागुन यह जान चुकी थी कि हो न हो अब विकास पांडेय से उसे अपनी जान का खतरा है.

विकास पांडेय अपने घर नगलानगर पहुंच चुका था और रीमा को गले लगाते हुए वह बोला, ‘‘अब तुम मेरी हो और हमें कोई अलग नहीं कर सकता. मैं ने हमारे बीच के सारे कांटे दूर कर दिए हैं.’’

विकास की आवाज में चहक थी, पर उस की इस बात पर रीमा एक बार फिर से मुसकरा उठी, ‘‘पर अब भला क्या फायदा? इन सब बातों के लिए बहुत देर हो गई है,’’ और यह कहते हुए रीमा ने दीवार पर लगी टीवी स्क्रीन की ओर नजरें घुमा दीं, जहां पर एक लोकल न्यूज चैनल पर फागुन की लाइव तसवीरें चल रही थीं.

रीमा जोरजोर से नेता विकास पांडेय पर आरोप पर आरोप लगाए जा रही थी, ‘‘विकास पांडेय, जो रिश्ते में मेरा जेठ है, ने हमेशा से मुझ पर गलत नजर रखी और मेरा फायदा उठाने के लिए अपने छोटे भाई से मेरी शादी करा दी.

‘‘वह मुझे आगे बढ़ाने के नाम पर मेरा यौन शोषण करता रहा और आज जब मैं उस के बच्चे की मां बनने वाली हूं, तब उस ने मुझे यहां ला कर बंद कर दिया है, ताकि वह मेरा और मेरे आने वाले बच्चे का मर्डर करा सके…’’

फागुन ने सारी बातें मीडिया में कह दी थीं और अब चारों तरफ विकास पांडेय की थूथू होने लगी थी, उस का सारा रसूख धड़ाम हो चुका था.

मीडिया को तो रीमा पहले ही फार्महाउस भेज चुकी थी और अब पुलिस को भी रीमा ने ही फोन कर के बुलाया और विकास पांडेय को गिरफ्तार करने पुलिस आ चुकी थी.

विकास पांडेय लगातार इनकार करता जा रहा था, ‘‘फागुन झूठ बोल रही है. यह बच्चा मेरा नहीं है.’’

‘‘घबराइए नहीं, आजकल हर चीज मैडिकल जांच से पता चल जाती है. अगर आप बेकुसूर होंगे, तो डीएनए टैस्ट आप को बेकुसूर साबित करने में मदद करेगा,’’ इंस्पैक्टर ने विकास से कहा, पर विकास पांडेय जानता था कि वह झूठा है और अब पुलिस के शिकंजे से नहीं बच सकता है.

रीमा एक ओर चुपचाप खड़ी थी. उस ने अपने पति और देवरानी दोनों से धोखा तो खाया, पर वह सही समय पर सचेत हो गई थी. उसे अपनी राह का कांटा समझने वाला उस का पति विकास आज जेल में था.
रीमा ने एक कांटे की मदद से दूसरा कांटा निकाल दिया था.

Hindi Kahani: ढाल – रमजानी से हो गई थी कैसी भूल

Hindi Kahani: अभी पहला पीरियड ही शुरू हुआ था कि चपरासिन आ गई. उस ने एक परची दी, जिसे पढ़ने के बाद अध्यापिकाजी ने एक छात्रा से कहा, ‘‘सलमा, खड़ी हो जाओ, तुम्हें मुख्याध्यापिकाजी से उन के कार्यालय में अभी मिलना है. तुम जा सकती हो.’’

सलमा का दिल धड़क उठा, ‘मुख्याध्यापिका ने मुझे क्यों बुलाया है? बहुत सख्त औरत है वह. लड़कियों के प्रति कभी भी नरम नहीं रही. बड़ी नकचढ़ी और मुंहफट है. जरूर कोई गंभीर बात है. वह जिसे तलब करती है, उस की शामत आई ही समझो.’

‘तब? कल दोपहर बाद मैं क्लास में नहीं थी, क्या उसे पता लग गया? कक्षाध्यापिका ने शिकायत कर दी होगी. मगर वह भी तो कल आकस्मिक छुट्टी पर थीं. फिर?’

सामने खड़ी सलमा को मुख्या- ध्यापिका ने गरदन उठा कर देखा. फिर चश्मा उतार कर उसे साड़ी के पल्लू से पोंछा और मेज पर बिछे शीशे पर रख दिया.

‘‘हूं, तुम कल कहां थीं? मेरा मतलब है कल दोपहर के बाद?’’ इस सवाल के साथ ही मुख्याध्यापिका का चेहरा तमतमा गया. बिना चश्मे के हमेशा लाल रहने वाली आंखें और लाल हो गईं. वह चश्मा लगा कर फिर से गुर्राईं, ‘‘बोलो, कहां थीं?’’

‘‘जी,’’ सलमा की घिग्घी बंध गई. वह चाह कर भी बोल न सकी.

‘‘तुम एक लड़के के साथ सिनेमा देखने गई थीं. कितने दिन हो गए

तुम्हें हमारी आंखों में यों धूल झोंकते हुए?’’

मुख्याध्यापिका ने कुरसी पर पहलू बदल कर जो डांट पिलाई तो सलमा की आंखों में आंसू भर आए. उस का सिर झुक गया. उसे लगा कि उस की टांगें बुरी तरह कांप रही हैं.

बेशक वह सिनेमा देखने गई थी. हबीब उसे बहका कर ले गया था, वरना वह कभी इधरउधर नहीं जाती थी. अम्मी से बिना पूछे वह जो भी काम करती है, उलटा हो जाता है. उन से सलाह कर के चली जाती तो क्या बिगड़ जाता? महीने, 2 महीने में वह फिल्म देख आए तो अम्मी इनकार नहीं करतीं. पर उस ने तो हबीब को अपना हमदर्द माना. अब हो रही है न छीछालेदर, गधा कहीं का. खुद तो इस वक्त अपनी कक्षा में आराम से पढ़ रहा होगा, जबकि उस की खिंचाई हो रही है. तौबा, अब आगे यह जाने क्या करेगी.

चलो, दोचार चांटे मार ले. मगर मारेगी नहीं. यह हर काम लिखित में करती है. हर गलती पर अभिभावकों को शिकायत भेज देती है. और अगर अब्बा को कुछ भेज दिया तो उस की पढ़ाई ही छूटी समझो. अब्बा का गुस्सा इस मुख्याध्यापिका से उन्नीस नहीं इक्कीस ही है.

‘‘तुम्हारी कक्षाध्यापिका ने तुम्हें कल सिनेमाघर में एक लड़के के साथ देखा था. इस छोटी सी उम्र में भी क्या कारनामे हैं तुम्हारे. मैं कतई माफ नहीं करूंगी. यह लो, ‘गोपनीय पत्र’ है. खोलना नहीं. अपने वालिद साहब को दे देना. जाओ,’’ मुख्याध्यापिका ने उसे लिफाफा थमा दिया.

सलमा के चेहरे का रंग उड़ गया. उस ने उमड़ आए आंसुओं को पोंछा. फिर संभलते हुए उस गोपनीय पत्र को अपनी कापी में दबा जैसेतैसे बाहर निकल आई.

पूरे रास्ते सलमा के दिल में हलचल मची रही. यदि किसी लड़के के साथ सिनेमा जाना इतना बड़ा गुनाह है तो हबीब उसे ले कर ही क्यों गया? ये लड़के कैसे घुन्ने होते हैं, जो भावुक लड़कियों को मुसीबत में डाल देते हैं.

अब अब्बा जरूर तेजतेज बोलेंगे और कबीले वाली बड़ीबूढि़यां सुनेंगी तो तिल का ताड़ बनाएंगी. उन्हें किसी लड़की का ऊंची पढ़ाई पढ़ना कब गवारा है. बात फिर मसजिद तक भी जाएगी और फिर मौलवी खफा होगा.

जब उस ने हाईस्कूल में दाखिला लिया था तो उसी बूढ़े मौलवी ने अब्बा पर ताने कसे थे. वह तो भला हो अम्मी का, जो बात संभाल ली थी. लेकिन अब अम्मी भी क्या करेंगी?

सलमा पछताने लगी कि अम्मी हर बार उस की गलती को संभालती हैं, जबकि वह फिर कोई न कोई भूल कर बैठती है. वह मांबेटी का व्यवहार निभने वाली बात तो नहीं है. सहयोग तो दोनों ओर से समान होना चाहिए. उसे अपने साथ बीती घटनाएं याद आने लगी थीं.

2 साल पहले एक दिन अब्बा ने छूटते ही कहा था, ‘सुनो, सल्लो अब 13 की हो गई, इस पर परदा लाजिम है.’

‘हां, हां, मैं ने इस के लिए नकाब बनवा लिया है,’ अम्मी ने एक बुरका ला कर अब्बा की गोद में डाल दिया था, ‘और सुनो, अब तो हमारी सल्लो नमाज भी पढ़ने लगी है.’

‘वाह भई, एकसाथ 2-2 बंदिशें हमारी बेटी पर न लादो,’ अब्बा बहुत खुश हो रहे थे.

‘देख लीजिए. फिर एक बंदिश रखनी है तो क्या रखें, क्या छोड़ें?’

‘नमाज, यह जरूरी है. परदा तो आंख का होता है?’

और अम्मी की चाल कामयाब रही थी. नमाज तो ‘दीनदार’ होने और दकियानूसी समाज में निभाने के लिए वैसे भी पढ़नी ही थी. उस का काम बन गया.

फिर उस का हाईस्कूल में आराम से दाखिला हो गया था. बातें बनाने वालियां देखती ही रह गई थीं. अब्बा ने किसी की कोई परवा नहीं की थी.

सलमा को दूसरी घटना याद आई. वह बड़ी ही खराब बात थी. एक लड़के ने उस के नाम पत्र भेज दिया था. यह एक प्रेमपत्र था. अम्मी की हिदायत थी, ‘हर बात मुझ से सलाह ले कर करना. मैं तुम्हारी हमदर्द हूं. बेशक बेटी का किरदार मां की शख्सियत से जुड़ा होता है.’

मैं ने खत को देखा तो पसीने छूटने लगे. फिर हिम्मत कर के वह पत्र मैं ने अम्मी के सामने रख दिया. अम्मी ने दिल खोल कर बातें कीं. मेरा दिल टटोला और फिर खत लिखने वाले महमूद को घर बुला कर वह खबर ली कि उसे तौबा करते ही बनी.

मां ने उस घटना के बाद कहा, ‘सलमा, मुसलिम समाज बड़ा तंगदिल और दकियानूसी है. पढ़ने वाली लड़की को खूब खबरदार रहना होता है.’

सलमा ने पूछा, ‘इतना खबरदार किस वास्ते, अम्मी?’

वह हंस दी थीं, ‘केवल इस वास्ते कि कठमुल्लाओं को कोई मौका न मिले. कहीं जरा भी कोई ऐसीवैसी अफवाह उड़ गई तो वे अफवाह उदाहरण देदे कर दूसरी तरक्की पसंद, जहीन और जरूरतमंद लड़कियों की राहों में रोड़े अटका सकते हैं.’

‘आप ठीक कहती हैं, अम्मी,’ और सलमा ने पहली बार महसूस किया कि उस पर कितनी जिम्मेदारियां हैं.

पर 2-3 साल बाद ही उस से वह भूल हो गई. अब उस अम्मी को, जो उस की परम सहेली भी थीं, वह क्या मुंह दिखाएगी? फिर अब्बा को तो समझाना ही मुश्किल होगा. इस बार किसी तरह अम्मी बात संभाल भी लेंगी तो वह आइंदा पूरी तरह सतर्क रहेगी.

सलमा ने अपनी अम्मी रमजानी को पूरी बात बता दी थी. सुन कर वह बहुत बिगड़ीं, ‘‘सुना, इस गोपनीय पत्र में क्या लिखा है?’’

सलमा ने लिफाफा खोल कर पढ़ सुनाया.

रमजानी बहुत बिगड़ीं, ‘‘अब तेरी आगे की पढ़ाई गई भाड़ में. तू ने खता की है, इस की तुझे सजा मिलेगी. जा, कोने में बैठ जा.’’

शाम हुई. अब्बा आए, कपड़े बदल कर उन्होंने चाय मांगी, फिर चौंक उठे, ‘‘यह इस वक्त सल्लो, यहां कोने में कैसे बैठी है?’’

‘‘यह मेरा हुक्म है. उस के लिए सजा तजवीज की है मैं ने.’’

‘‘बेटी के लिए सजा?’’

‘‘हां, हां, यह देखो…खर्रा,’’ सलमा की अम्मी गोपनीय पत्र देतेदेते रुक गईं, ‘‘लेकिन नहीं. इसे गोपनीय रहने दो. मैं ही बता देती हूं.’’

और सलमा का कलेजा गले में आ अटका था.

‘‘…वह बात यह है कि अपनी सल्लो की मुख्याध्यापिका नीम पागल औरत है,’’ अम्मी ने कहा था.

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि मसजिद के मौलवी से भी अधिक दकियानूसी और वहमी औरत.’’

‘‘बात क्या हो गई?’’

‘‘…वह बात यह है कि मैं ने सल्लो से कहा था, अच्छी फिल्म लगी है, जा कर दिन को देख आना. अकेली नहीं, हबीब को साथ ले जाना. उसे बड़ी मुश्किल से भेजा. और बेचारी गई तो उस की कक्षाध्यापिका ने, जो खुद वहां फिल्म देख रही थी, इस की शिकायत मुख्याध्यापिका से कर दी कि एक लड़के के साथ सलमा स्कूल के वक्त फिल्म देख रही थी.’’

‘‘लड़का? कौन लड़का?’’ अब्बा का पारा चढ़ने लगा.

रमजानी बेहद होशियार थीं. झट बात संभाल ली, ‘‘लड़का कैसा, वह मेरी खाला है न, उस का बेटा हबीब. गाजीपुर वाली खाला को आप नहीं जानते. मुझ पर बड़ी मेहरबान हैं,’’ अम्मी सरासर झूठ बोल रही थीं.

‘‘अच्छा, अच्छा, अब मर्द किस- किस को जानें,’’ अब्बा ने हथियार डाल दिए.

बात बनती दिखाई दी तो अम्मी, अब्बा पर हावी हो गईं, ‘‘अच्छा क्या खाक? उस फूहड़ ने हमारी सल्लो को गलत समझ कर यह ‘गोपनीय पत्र’ भेज दिया. बेचारी कितनी परेशान है. आप इसे पढ़ेंगे?’’

‘शाबाश, वाह मेरी अम्मी,’ सलमा सुखद आश्चर्य से झूम उठी. अम्मी बिगड़ी बात यों बना लेंगी, उसे सपने में भी उम्मीद न थी, ‘बहुत प्यारी हैं, अम्मी.’

सलमा ने मन ही मन अम्मी की प्रशंसा की, कमाल का भेजा पाया है अम्मी ने. खैर, अब आगे जो भी होगा, ठीक ही होगा. अम्मी ढाल बन कर जो खड़ी रहती हैं अपनी बेटी के लिए.

शायद अब्बा ने खत पढ़ना ही नहीं चाहा. बोले, ‘‘रमजानी, वह औरत सनकी नहीं है. दरअसल, मैं ने ही उन मास्टरनियों को कह रखा है कि सलमा का खयाल रखें. वैसे कल मैं उन से मिल लूंगा.’’

‘‘तौबा है. आप भी वहमी हैं, कैसे दकियानूसी. बेचारी सल्लो…’’

‘‘छोड़ो भी, उसे बुलाओ, चाय तो बने.’’

‘‘वह तो बहुत दुखी है. आई है जब से कोने में बैठी रो रही है. आप खुद ही जा कर मनाओ. कह रही थी, मुख्याध्यापिका ने शक ही क्यों किया?’’

‘‘मैं मनाता हूं.’’

और शेर मुहम्मद ने अपनी सयानी बेटी को उस दिन जिस स्नेह और दुलार से मनाया, उसे देख कर सलमा अम्मी की व्यवहारकुशलता की तारीफ करती हुई मन ही मन सोच रही थी, ‘आइंदा फिर कभी ऐसी भूल नहीं होनी चाहिए.’

और सलमा यों अपने चारों ओर फैली दकियानूसी रिवायतों की धुंध से जूझती आगे बढ़ी तो अब वह कालिज की एक छात्रा है. उस के इर्दगिर्द उठी आंधियां, मांबेटी के व्यवहार के तालमेल के आगे कभी की शांत हो गईं. Hindi Kahani

Short Hindi Story: मौडर्न मिलन – कलुवा की बेलिहाज पत्नी विद्योत्तमा

Short Hindi Story: यह कुदरती और वाकई अनोखी बात थी कि रूढि़वादी और धार्मिक मांबाप ने अपनी जिस लाड़ली बेटी का नाम विद्योत्तमा रखा था, उस के मंगेतर का नाम एक पुरोहित ने नामकरण के दिन कलुवा रख दिया था. लेकिन विद्योत्तमा के रिश्ते की बात जब कलुवा से चली तो उस चालाक पुरोहित ने मंगनी के समय झट कलुवा का नाम बदल कर उसे कालिदास बना दिया. विद्योत्तमा और कालिदास का विवाह भी कर दिया गया.

सुहागरात में प्रथम भेंट पर कालिदास को अपनी दुलहन का घूंघट उठाने की जरूरत ही नहीं पड़ी. कशिश से भरी, बड़ीबड़ी मोहक अंखियों और तीखे नयननक्श वाली, बेजोड़ खूबसूरती की मलिका विद्योत्तमा ने मुसकराते हुए अपने मांग टीके पर अटके नाममात्र के घूंघट को खुद ही उलट कर अपनी गरदन पर लपेट लिया. फिर उस के एक छोर को अपने दाएं हाथ की पहली उंगली में फंसाए शरारती अदा के साथ अपने लाल रसीले होंठों और चमकदार दंतुलियों से जैसे काट खाया. फिर कालिदास के सीने से अपनी पीठ को सटाते उस ने गरदन घुमा कर तिरछी नजरें अपने दूल्हे राजा के हैरतअंगेज चेहरे पर चुभाईं. तब बोली, ‘‘हाय, डियर क्यूट. आई लव यू सो वैरी मच.’’

कालिदास के माथे पर पसीने की बूंदें उभर आईं. प्रथम मिलन का ऐसा बेलिहाज नजारा तो शायद उस के बाप के बाप तक ने कभी सपने में भी नहीं देखा होगा. तभी लगभग हकलाता हुआ सा कलुआ बोल पड़ा, ‘‘जरा संभल कर ठीक से बैठो, प्रिये. चलो, कुछ देर प्यारभरी मीठीमीठी बातें हो जाएं. यह हमारे मधुर मिलन की पहली इकलौती घड़ी है, प्राणप्यारी.’’

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‘‘मीठीमीठी बातें? ह्वाट नौनसेंस,’’ कहते हुए दुलहन बिदक कर दूर छिटक गई और बोली, ‘‘तुम्हें तो मुझ को देखते ही भूखे भेडि़ए की तरह झपटचिपट कर मेरे तनबदन को बेशुमार किसेज (चुंबनों) की झड़ी लगाते निहाल कर देना चाहिए था. अभी इतनी देर तक लबरलबर तो खूब करते रहे. क्या तुम मुझ को लव नहीं करते. डोंट यू लाइक मी? जो अभी भी मुझे अपनी बांहों में जकड़ने से हिचकते घबरा रहे हो.’’

बेचारा कालिदास सचमुच काफी घबरा गया था, लेकिन अब जल्दी ही वह अपने को हिम्मत के साथ संभालता हुआ बोला, ‘‘सुनो, मेरी प्यारी हंसिनी, मुझ को तो तुम अपने सामने एक बगले जैसा ही समझो क्योंकि मैं तो सिर्फ हाईस्कूल थर्ड डिविजन से पास हूं, जबकि तुम अंगरेजी साहित्य में फर्स्ट क्लास एम.ए. पास. मुझे ताज्जुब हो रहा है कि तुम ने मुझ जैसे चपरगट्टू भौंतर छोरे से शादी करने की बात भला कैसे मंजूर कर ली जबकि असल में मैं तुम्हारे काबिल और माफिक दूल्हा हूं ही नहीं. मैं…मैं…मैं तो…’’

दुलहन हंस पड़ी और बोली, ‘‘ओह, स्टौप आल दिस मैं मैं मिमियाना. अजी हुजूरेआला, तुम तो इन आल रिस्पेक्ट्स, हर हाल में मेरे ही काबिल हो. मैं आज भी उन ‘अधभरी गगरी’ जैसी छलकती छोकरियों में से नहीं हूं जो तितलियों की मानिंद इतराती अपने कालेज जाने में ही ऐसी अकड़ दिखाती हैं मानो वे पहले से ही डिगरीशुदा हों और अब सीधे कनवोकेशन में गाउन व हुड धारण करने की फौरमैलिटी निभाने जा रही हों. और जो आंखलड़ाऊ लव मैरिज के बाद अपने हसबैंड को लड़ाईझगड़े में सर्वेंट तक बोलने से नहीं चूकतीं.

‘‘डियर, मैं तो पहले से ही मान चुकी थी कि हम ‘मेड फौर ईच अदर’ यानी ‘इक दूजे के लिए ही बने’ हैं. तुम कम पढ़ेलिखे हो तो क्या, तुम नेक, खूबसूरत, तंदुरुस्त और उम्दा स्वभाव के नौजवान हो. फिर आजकल के योग्य लड़के तो भारीभरकम दहेज लिए बिना शादी को तैयार ही नहीं होते हैं जबकि तुम ने दहेज जैसे अशुभ नाम को अपनी जबान पर आने तक नहीं दिया. मैं तुम को उन दहेज के लालची लीचड़ों से सौगुना ज्यादा धनी मानती हूं.

‘‘तुम अपने हुनर में एक माहिर मोटर मेकैनिक हो और मुझ को पूरा यकीन है तुम बिगड़ती मोटरगाडि़यों की तरह अपने घरपरिवार रूपी गाड़ी की मेंटिनेंस में भी उस के ढीले पेचपुर्जों को सुधार कर उसे जिंदगी की खुशहाल राह पर कामयाबी के साथ दौड़ा सकते हो. तुम्हारे अंदर कोई बुरा व्यसन भी नहीं है, तो फिर यह नर्वसनेस क्यों? इनसान किताबें पढ़ कर और डिगरियां हासिल करने मात्र से विद्वान नहीं बन जाता. पढ़नेलिखने के साथ अगर इनसान उस से मिली नसीहतों को अपने जीवन में नहीं अपनाता तो वह किताबों के बोझ से लदे एक गधे जैसा ही होता है.’’

विद्योत्तमा के मुख से ऐसी बातें सुन कर कालिदास के मन में घिरे शकसंदेहों की सारी धुंध उड़नछू हो गई. वह बोला, ‘‘ओह डार्लिंग, मैं तो इस वजह से डरा हुआ था कि तुम्हारा नाम विद्योत्तमा और मेरा नाम भी कालिदास है तो कहीं तुम भी मुझे…’’

‘‘रिजेक्ट कर देती और लताड़ के साथ भगा देती. यही न?’’ खिलखिलाते हुए विद्योत्तमा बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘माई डियर साजन, तुम यह क्यों भूल गए कि वह पुराने जमाने की अपने ज्ञान के घमंड में चूर विद्योत्तमा थी लेकिन मैं तो 21वीं सदी की मौडर्न नवयुवती हूं. यानी मैं वह विद्योत्तमा हूं जो अपने पति को पति होने के नाते अपना दास, मतलब जोरू का गुलाम बना कर भले ही रख दूं, पर गुजरे वक्त की वह विद्योत्तमा कतई नहीं हूं कि हनीमून में ही अपने पति को बेइज्जत कर के घर से खदेड़ कर खुद को बगैर मर्द की (विधवा) औरत बना कर रख दूं और तब उस के लंबे अरसे के बाद अधेड़ विद्वान कालिदास हो कर लौट आने तक पलपल घुटतीसिसकती रहूं.

‘‘जब तक वह कालिदास बन कर आएगा तब तक उस की जवानी का जोशीला पोटाश तो संस्कृत के श्लोकों को पढ़नेरटने में ही खत्म हो चुका होगा. आने के बाद भी वह बजाय लंबी जुदाई से बढ़ी बेताबी के तहत रातों को मुझ से चिपट पड़ने के, ग्रंथ लिखने की खातिर कलम घिसने में मशगूल हो जाएगा और मैं अपने चेहरे पर पड़ती झुर्रियों को दर्पण में निहारती, कभी ऊंघती तो कभी उस कवि लेखक के लिए चाय बनाती बाकी बची उम्र को काटतीगुजारती रहूं.

‘‘फिर नाम में क्या रखा है, डियर. आंख के अंधे नाम नयनसुख की तरह भिखारियों में क्या कई लक्ष्मियां और धनपति नाम के औरतमर्द नहीं होते? छोड़ो इन यूजलेस बातों को अब. लम्हालम्हा गहराती मदमाती रात के साथ अब क्यों न हम भी अपने प्यार के समंदर की गहराइयों में खो जाएं? सो कम औन माइ लव, माइ स्वीट लाइफपार्टनर,’’ कहते हुए विद्योत्तमा ने कालिदास को अपनी सुडौल गोरी बांहों में बांध लिया. तब कालिदास ने भी उमड़ते प्रेम आनंद के एहसास के साथ उसे अपने दिल से सटा दिया. लग रहा था, कवि कालिदास के मेघदूतम वाले बेदखल किए गए, इश्क में तड़पते, यक्ष का भी अपनी प्यारी दिलरुबा से एक बार फिर मौडर्न मिलन हो रहा हो. Short Hindi Story

Hindi Story: खामोश जिद – क्या पूरी हो पाई रुकमा की जिद

Hindi Story: ‘‘शहीद की शहादत को तो सभी याद रखते हैं, मगर उस की पत्नी, जो जिंदा भी है और भावनाओं से भरी भी. पति के जाने के बाद वह युद्ध करती है समाज से और घर वालों के तानों से. हर दिन वह अपने जज्बातों को शहीद करती है.

‘‘कौन याद रखता है ऐसी पत्नी और मां के त्याग को. वैसे भी इतिहास गवाह है कि शहीद का नाम सब की जबान पर होता है, पर शहीद की पत्नी और मां का शायद जेहन पर भी नहीं,’’ जैसे ही रुकमा ने ये चंद लाइनें बोलीं, तो सारा हाल तालियों से गूंज गया.

ब्रिगेडियर साहब खुद उठ कर आए और रुकमा के पास आ कर बोले, ‘‘हम हैड औफिस और रक्षा मंत्रालय को चिट्ठी लिखेंगे, जिस से वे तुम्हारे लिए और मदद कर सकें,’’ ऐसा कह कर रुकमा को चैक थमा दिया गया और शहीद की पत्नी के सम्मान समारोह की रस्म अदायगी भी पूरी हो गई.

चैक ले कर रुकमा आंसू पोंछते हुए स्टेज से नीचे आ गई. पतले काले सफेद बौर्डर वाली साड़ी, माथे पर न बिंदी और काले उलझे बालों के बीच न सुहाग की वह लाल रेखा. पर बिना इन सब के भी उस का चेहरा पहले से ज्यादा दमक रहा था. थी तो वह शहीद की बेवा. आज उस के शहीद पति के लिए सेना द्वारा सम्मान समारोह रखा गया था. समारोह के बाद बुझे कदमों से वह स्टेशन की तरफ चल दी.

ट्रेन आने में अभी 7-8 घंटे बाकी थे. सोचा कि चलो चाय पी लेते हैं. नजरें दौड़ा कर देखा कि थोड़ी दूर पर रेलवे की कैंटीन है. सोचा, वहीं पर चलते हैं दाम भी औसत होंगे.

रुकमा पास खड़े अपने पापा से बोली, ‘‘पापा, चलो कुछ खा लेते हैं. अभी तो ट्रेन आने में बहुत देर है.’’

बापबेटी अपना पुराना सा फटा बैग समेट कर चल दिए.

चाय पीतेपीते पापा बोले, ‘‘क्या तुम्हें लगता है कि वे बात करेंगे या ऐसे ही बोल रहे हैं कि रक्षा मंत्रालय को चिट्ठी लिखेंगे.’’

‘‘पता नहीं पापा, कुछ भी कह पाना मुश्किल है.’’

‘‘रुकमा, तुम आराम करो. मैं जरा ट्रेन का पता लगा कर आता हूं,’’ कहते हुए पापा बाहर चले गए.

रुकमा ने अपने पैरों को समेट कर ऊपर सीट पर रख लिया और बैग की टेक लगा कर लेट गई और धीरे से सौरभ का फोटो निकाल कर देखने लगी.

देखतेदेखते रुकमा भीगी पलकों के रास्ते अपनी यादों के आंगन में उतरती चली गई. कितनी खुश थी वह जब पापा उस का रिश्ता ले कर सौरभ के घर गए थे. पूरे रीतिरिवाज से उस की शादी भी हुई थी. मां ने अपनी बेटी को सदा सुहागन बने रहने के लिए कोई भी रिवाज नहीं छोड़ा था. यहां तक कि गांव के पास वाले मन्नत पेड़ पर जा कर पूर्णमासी के दिन दीया भी जलाया था. शादी भी धूमधाम से हुई थी.

सौरभ को पा कर रुकमा धन्य हो गई थी. सजीला, बांका, जवान, सांवला रंग, लंबा गठा शरीर, चौड़ा सीना, जो देखे उसे ही भा जाए. रुकमा भी कम सुंदर न थी. हां, मगर लंबाई उतनी न थी.

सौरभ हर समय उसे उस की लंबाई को ले कर छेड़ता था. जब सारा परिवार एकसाथ बैठा हो तो तब जरूर ‘जिस की बीवी छोटी उस का भी बड़ा नाम है…’ गाना गा कर उसे छेड़ता था. वह मन ही मन खीजती रहती थी, मगर ज्यादा देर नाराज न हो पाती थी क्योंकि सौरभ झट से उसे मना लेना जानता था.

पर यह सुख कुछ ही समय रह पाया. उसी समय सीमा पर युद्ध शुरू हो गया था और सौरभ की सारी छुट्टियां कैंसिल हो गई थीं. उसे वापस जाना पड़ा था.

उस रात रुकमा कितना रोई थी. सुबह तक आंसू नहीं थमे थे, सौरभ उस को समझाता रहा था. उस की सुंदर आंखें सूज कर लाल हो गई थीं. सौरभ के जाने में अभी 2 दिन बाकी थे.

सौरभ कहता था, ‘ऐसे रोती रहोगी तो मैं कैसे जाऊंगा.’

घर में सभी लोग कहते हैं कि ये 2 दिन तुम दोनों खुश रहो, घूमोफिरो, पर जैसे ही कोई जाने की बात करता तो अगले ही पल रुकमा की आंखों से आंसू लुढ़कने लगते.

सौरभ उसे छेड़ता, ‘यार, तुम्हारी आंखों में नल लगा है क्या, जो हमेशा टपटप गिरता रहता है.’

सौरभ की इस बचकानी हरकत से रुकमा के चेहरे पर कुछ देर के लिए हंसी आ जाती, मगर अगले ही पल फिर चेहरे पर उदासी छा जाती.

जिस दिन सौरभ को जाना था, उस रात रुकमा सौरभ के सीने पर सिर रख कर रोती ही रही और अब तो सौरभ भी अपने आंसू न रोक पाया. आखिर सिपाही के अंदर से बेइंतिहा प्यार करने वाला पति जाग ही गया जो अपनी नईनवेली दुलहन के आगोश में से निकलना नहीं चाहता था, पर छुट्टी की मजबूरी थी, वापस तो जाना ही था.

‘‘रुकमा, उठ…’’ पापा ने हिलाते हुए रुकमा को जगाया और कहा, ‘‘ट्रेन प्लेटफार्म नंबर 2 पर आ रही है.’’

पापा की आवाज से रुकमा अपनी यादों से बाहर आ गई. आंखों को हाथों से मलते हुए वह उठ खड़ी हुई, जैसे किसी ने उस की चोरी पकड़ ली हो.

‘‘क्या बात है बेटी… तुम फिर से…’’

‘‘नहीं पापा… ऐसा कुछ भी नहीं…’’

थोड़ी देर में ट्रेन आ गई और रुकमा ट्रेन में बैठते ही फिर यादों में खो गई. कैसे भूल सकती है वह दिन, जब सौरभ को खुशखबरी देने को बेकरार थी लेकिन सौरभ से बात ही न हो पाई. शायद लाइन और किस्मत दोनों ही खराब थीं और तभी कुछ दिन में ही खबर आ गई कि सौरभ सीमा पर लड़ते हुए शहीद हो गए हैं. उस वक्त रुकमा ड्राइंगरूम में बैठी थी, तभी सौरभ के दोस्त उस का सामान ले कर आए थे.

आंखों और दिल ने विश्वास ही नहीं किया. रुकमा को लगा, वह भी आ रहा होगा. हमेशा की तरह मजाक कर रहा होगा. होश में ही नहीं थी. मगर होश तो तब आया जब ससुर ने पापा से कहा था, ‘रुकमा को अपने साथ वापस ले जाएं. मेरा बेटा ही चला गया तो इसे रख कर क्या करेंगे.’

उस ने अपने सासससुर को समझाया था कि वह सौरभ के बच्चे की मां बनने वाली है लेकिन उन्होंने तो उसे शाप समझ कर घर से निकाल दिया.

तभी सिर के ऊपर रखा बैग रुकमा के सिर से टकराया और वह चीख पड़ी. बाहर झांक कर देखा कि कोई स्टेशन आने वाला है. कुछ ही देर में वह झांसी पहुंच गए.

घर पहुंचते ही मां बोलीं, ‘‘बड़ी मुश्किल से यह सोया है. कुछ देर इसे गोद में ले कर बैठ जा.’’

रुकमा कुछ ही महीने पहले पैदा हुए अपने बेटे को गोद में ले कर प्यार करने लगी.

मां ने पूछा, ‘‘वहां सौरभ के घर वाले भी आए थे क्या?’’

‘‘नहीं मां,’’ रुकमा बोली.

शाम को खाने में साथ बैठते हुए पापा ने रुकमा से पूछा, ‘‘अब आगे क्या सोचा है? तेरे सामने पूरी जिंदगी पड़ी है.’’

रुकमा ने लंबी गहरी सांस लेते हुए कहा, ‘‘हां पापा, मैं ने सबकुछ सोच लिया है. मेरे बेटे ने अपने फौजी पिता को नहीं देखा, इसलिए मैं फौज में ही जाऊंगी.’’

रुकमा के मातापिता हमेशा उस के साथ खड़े रहते थे. बेटे को मां के पास छोड़ कर रुकमा दिल्ली में एमबीए करने आ गई और नौकरी भी करने लगी.

रुकमा को यह भी चिंता थी कि कार्तिक बड़ा हो रहा था. उसे भी स्कूल में दाखिला दिलाना होगा.

रुकमा यह सब सोच ही रही थी कि मां की अचानक हुई मौत से वह फिर बिखर गई और अब तो कार्तिक की भी उस के सिर पर जिम्मेदारी आ गई. उसे अब नौकरी पर जाना मुश्किल हो गया.

बेटा अभी बहुत छोटा था और घर पर अकेले नहीं रह सकता था. पापा भी अभी रिटायर नहीं हुए थे.

जब कोई रास्ता नजर नहीं आया, तभी सहारा बन कर आए गुप्ता अंकल यानी उस के साथ में काम कर रही दोस्त अर्चना के पिताजी.

अर्चना ने कहा, ‘‘रुकमा, आज मेरे भतीजे का बर्थडे है. तू कार्तिक को ले कर जरूर आना, कोई बहाना नहीं चलेगा और तू भी थोड़ा अच्छा महसूस करेगी.’’

‘‘ठीक है, मैं आती हूं,’’ रुकमा ने हंस कर हां कर दी और औफिस से बाहर आ गई.

घर आ कर कार्तिक से कहा, ‘‘आज मेरा बाबू घूमने चलेगा. वहां पर तेरे बहुत सारे फ्रैंड्स मिलेंगे.’’

‘‘हां मम्मी…’’ कार्तिक खुशी से मां के गले लग गया.

मां बेटे खूब तैयार हो कर पार्टी में पहुंचे. पार्टी क्या थी, ऐसा लग रहा था जैसे कोई शादी हो. शहर की सारी नामीगिरामी हस्तियां मौजूद थीं. तभी किसी ने पीछे से पुकारा. रुकमा ने पीछे पलट कर देखा कि उस के औफिस का सारा स्टाफ मौजूद था.

केक वगैरह काटने के बाद अर्चना ने उसे अपने पिताजी से मिलवाया. वे बोले, ‘‘बेटी, तुम्हारे बारे में सुन कर बड़ा दुख हुआ कि आज भी ऐसी सोच वाले लोग हैं. बेटी, जो सज्जन सामने आ रहे हैं, वे उसी रैजीमैंट में पोस्टेड हैं जिस में तुम्हारे पति थे. मुझे अर्चना ने सबकुछ बताया था.

‘‘कर्नल साहब, ये रुकमा हैं. फौज में जाना चाहती हैं. अगर आप की मदद मिल जाती तो अच्छा होता,’’ और फिर उन्होंने रुकमा के बारे में उन्हें सबकुछ बता दिया.

‘‘बेटी, तुम मुझे 1-2 दिन में फोन कर लेना. मुझ से जो बन पड़ेगा, मैं जरूर मदद करूंगा.’’

कर्नल के सहयोग से रुकमा देहरादून जा कर एसएसबी की कोचिंग लेने लगी और वहीं आर्मी स्कूल में पार्टटाइम बच्चों को पढ़ाने भी लगी. बेटे कार्तिक का दाखिला भी एक अच्छे स्कूल में करा दिया.

मगर मंजिल आसान न थी. हर रोज सुबह 4 बजे उठ कर फौज जैसी फिटनैस लाने के लिए दौड़ने जाती, फिर 20 किलोमीटर स्कूटी से बेटे को स्कूल छोड़ती और लाती, फिर शाम को वह फिजिकल ट्रेनिंग लेने जाती, लौट कर बच्चे का होमवर्क और घर का पूरा काम करती.

रोज की तरह रुकमा एक दिन जब बच्चे को सुलाने जा ही रही थी तभी पापा का फोन आया और फिर से वही राग ले कर बैठ गए, ‘रुकमा, मुझे समझ नहीं आ रहा कि तुम क्यों इतना सब बेकार में कर रही हो. दीपक का फिर फोन आया था. वह तुम्हें और तुम्हारे बेटे को खूब खुश रखेगा. मेरी बात मान जा बेटी, तेरे सामने पूरी जिंदगी पड़ी है, मेरा क्या भरोसा. मैं भी तेरी मां की तरह कब चला जाऊं, तो तेरा क्या होगा.’

‘‘पापा, मैं अपने बेटे कार्तिक और सौरभ की यादों के साथ बहुत खुश हूं. मैं किसी और को प्यार कर ही न पाऊंगी, यह उस रिश्तों के साथ उस से बेईमानी होगी. मैं सौरभ की जगह किसी और को नहीं दे सकती.

‘‘मुझे सौरभ से बेइंतिहा मुहब्बत करने के लिए सौरभ की जरूरत नहीं है, उस की यादें ही मेरी मुहब्बत को पूरी कर देंगी. मैं जज्बात में उबलती हुई नसीहतों की दलीलें नहीं सुनना चाहती.’’

पापा ने कहा, ‘क्या कोई इस तरह जाने के बाद पागलों सी मुहब्बत करता है.’

‘‘सौरभ मेरे दिलोदिमाग पर छाया हुआ है. एकतरफा प्यार की ताकत ही कुछ ऐसी होती है कि वह रिश्तों की तरह 2 लोगों में बंटता नहीं है. उस में फिर मेरा हक होता है,’’ यह कहते हुए रुकमा ने फोन काट दिया, फिर प्यार से सो रहे पास लेटे बेटे कार्तिक का सिर सहलाने लगी.

तभी रुकमा ने फौज में भरती का इश्तिहार अखबार में पढ़ा. रुकमा और भी खुश हो गई कि एक सीट शहीद की विधवाओं के लिए आरक्षित है. अब उसे सौरभ के अधूरे ख्वाब पूरे होते नजर आने लगे.

इन सब मुश्किल तैयारियों के बाद फौज का इम्तिहान देने का समय आ गया. मेहनत रंग लाई. लिखित इम्तिहान के बाद उस ने एसएसबी के भी सभी राउंड पास कर लिए. लेकिन यहां तक पहुंचने के बाद एक नई परेशानी खड़ी हो गई, वहां पर एक और शहीद की पत्नी थी पूजा और उस ने भी सारे टैस्ट पास कर लिए थे और सीट एक थी.

आखिरी फैसले के लिए सिलैक्शन अफसर ने अगले दिन की तारीख दे दी और कहा कि पास होने वाले को इत्तिला दे दी जाएगी.

उदास मन से रुकमा वापस आ गई, लेकिन इतने पर भी वह टूटी नहीं. उसे अपने ऊपर विश्वास था. उस का दुख बांटने अर्चना आ जाती थी और दिलासा भी देती थी. तय तारीख भी निकल चुकी थी.

रुकमा को यकीन हो गया कि उस का सिलैक्शन नहीं हुआ इसलिए फिर उस ने उसी दिनचर्या से एक नई जंग लड़नी शुरू कर दी.

तभी एक दिन औफिस से लौट कर उसे सिलैक्शन अफसर की चिट्ठी मिली जिस में उसे हैड औफिस बुलाया गया था. सिलैक्शन का कोई जिक्र न होने के चलते रुकमा उदास मन से बुलाए गए दिन पर हैड औफिस पहुंच गई. वहां जा कर देखा कि साहब के सामने पूजा भी बैठी थी.

साहब ने दोनों को बुला कर पूछा कि तुम दोनों की काबिलीयत और जज्बे को देखते हुए हम ने रक्षा मंत्रालय से 2 वेकैंसी की मांग की थी. रक्षा मंत्रालय ने एक की जगह 2 वेकैंसी कर दी हैं और तुम दोनों ही सिलैक्ट हो गई हो. बाहर औफिस से अपना सिलैक्शन लैटर ले लो.

रुकमा यह सुनते ही शून्य सी हो गई. सौरभ को याद कर उस की आंखों से झरझर आंसू बहने लगे. लैटर ले कर उस ने सब से पहले अर्चना को फोन कर शुक्रिया अदा किया.

पापा उस समय देहरादून में बेटे कार्तिक के पास थे. घर पहुंच कर रुकमा पापा से लिपट गई और खुशखबरी दी.

पापा बोले, ‘‘तू बचपन से ही जिद्दी थी, पर आज तू ने अपने प्यार को ही जिद में तबदील कर दिया. और अपने बेटे को उस के फौजी पिता कैसे थे, यह बताने के लिए तू खुद फौजी बन गई. हम सभी तेरे जज्बे को सलाम करते हैं.’’

रुकमा ने देखा कि अर्चना और उस के स्टाफ के लोग बाहर दरवाजे पर खड़े थे. रुकमा इस खुशी का इजहार करने के लिए अर्चना से लिपट गई. Hindi Story

Best Hindi Story: अजनबी – कौन था दरवाजे के बाहर

Best Hindi Story: ‘‘नाहिद जल्दी उठो, कालेज नहीं जाना क्या, 7 बज गए हैं,’’ मां ने चिल्ला कर कहा.

‘‘7 बज गए, आज तो मैं लेट हो जाऊंगी. 9 बजे मेरी क्लास है. मम्मी पहले नहीं उठा सकती थीं आप?’’ नाहिद ने कहा.

‘‘अपना खयाल खुद रखना चाहिए, कब तक मम्मी उठाती रहेंगी. दुनिया की लड़कियां तो सुबह उठ कर काम भी करती हैं और कालेज भी चली जाती हैं. यहां तो 8-8 बजे तक सोने से फुरसत नहीं मिलती,’’ मां ने गुस्से से कहा.

‘‘अच्छा, ठीक है, मैं तैयार हो रही हूं. तब तक नाश्ता बना दो,’’ नाहिद ने कहा.

नाहिद जल्दी से तैयार हो कर आई और नाश्ता कर के जाने के लिए दरवाजा खोलने ही वाली थी कि किसी ने घंटी बजाई. दरवाजे में शीशा लगा था. उस में से देखने पर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था क्योंकि लाइट नहीं होने की वजह से अंधेरा हो रहा था. इन का घर जिस बिल्डिंग में था वह थी ही कुछ इस किस्म की कि अगर लाइट नहीं हो, तो अंधेरा हो जाता था. लेकिन एक मिनट, नाहिद के घर में तो इन्वर्टर है और उस का कनैक्शन बाहर सीढि़यों पर लगी लाइट से भी है, फिर अंधेरा क्यों है?

‘‘कौन है, कौन,’’ नाहिद ने पूछा. पर बाहर से कोई जवाब नहीं आया.

‘‘कोई नहीं है, ऐसे ही किसी ने घंटी बजा दी होगी,’’ नाहिद ने अपनी मां से कहा.

इतने में फिर घंटी बजी, 3 बार लगातार घंटी बजाई गई अब.

?‘‘कौन है? कोई अगर है तो दरवाजे के पास लाइट का बटन है उस को औन कर दो. वरना दरवाजा भी नहीं खुलेगा,’’ नाहिद ने आराम से मगर थोड़ा डरते हुए कहा. बाहर से न किसी ने लाइट खोली न ही अपना नाम बताया.

नाहिद की मम्मी ने भी दरवाजा खोलने के लिए मना कर दिया. उन्हें लगा एकदो बार घंटी बजा कर जो भी है चला जाएगा. पर घंटी लगातार बजती रही. फिर नाहिद की मां दरवाजे के पास गई और बोली, ‘‘देखो, जो भी हो चले जाओ और परेशान मत करो, वरना पुलिस को बुला लेंगे.’’

मां के इतना कहते ही बाहर से रोने की सी आवाज आने लगी. मां शीशे से बाहर देख ही रही थी कि लाइट आ गई पर जो बाहर था उस ने पहले ही लाइट बंद कर दी थी.

‘‘अब क्या करें तेरे पापा भी नहीं हैं, फोन किया तो परेशान हो जाएंगे, शहर से बाहर वैसे ही हैं,’’ नाहिद की मां ने कहा. थोड़ी देर बाद घंटी फिर बजी. नाहिद की मां ने शीशे से देखा तो अखबार वाला सीढि़यों से जा रहा था. मां ने जल्दी से खिड़की में जा कर अखबार वाले से पूछा कि अखबार किसे दिया और कौनकौन था. वह थोड़ा डरा हुआ लग रहा था, कहने लगा, ‘‘कोई औरत है, उस ने अखबार ले लिया.’’ इस से पहले कि नाहिद की मां कुछ और कहती वह जल्दी से अपनी साइकिल पर सवार हो कर चला गया.

अब मां ने नाहिद से कहा बालकनी से पड़ोस वाली आंटी को बुलाने के लिए. आंटी ने कहा कि वह तो घर में अकेली है, पति दफ्तर जा चुके हैं पर वह आ रही हैं देखने के लिए कि कौन है. आंटी भी थोड़ा डरती हुई सीढि़यां चढ़ रही थी, पर देखते ही कि कौन खड़ा है, वह हंसने लगी और जोर से बोली, ‘‘देखो तो कितना बड़ा चोर है दरवाजे पर, आप की बेटी है शाजिया.’’

शाजिया नाहिद की बड़ी बहन है. वह सुबह में अपनी ससुराल से घर आई थी अपनी मां और बहन से मिलने. अब दोनों नाहिद और मां की जान में जान आई.

मां ने कहा कि सुबहसुबह सब को परेशान कर दिया, यह अच्छी बात नहीं है.

शाजिया ने कहा कि इस वजह से पता तो चल गया कि कौन कितना बहादुर है. नाहिद ने पूछा, ‘‘वह अखबार वाला क्यों डर गया था?’’

शाजिया बोली, ‘‘अंधेरा था तो मैं ने बिना कुछ बोले अपना हाथ आगे कर दिया अखबार लेने के लिए और वह बेचारा डर गया और आप को जो लग रहा था कि मैं रो रही थी, दरअसल मैं हंस रही थी. अंधेरे के चलते आप को लगा कि कोई औरत रो रही है.’’

फिर हंसते हुए बोली, ‘‘पर इस लाइट का स्विच अंदर होना चाहिए, बाहर से कोई भी बंद कर देगा तो पता ही नहीं चलेगा.’’ शाजिया अभी भी हंस रही थी.

आंटी ने बताया कि उन की बिल्ड़िंग में तो चोर ही आ गया था रात में. जिन के डबल दरवाजे नहीं थे, मतलब एक लकड़ी का और एक लोहे वाला तो लकड़ी वाले में से सब के पीतल के हैंडल गायब थे.

थोड़ी देर बाद आंटी चाय पी कर जाने लगी, तभी गेट पर देखा उन के दूसरे दरवाजे, जिस में लोहे का गेट नहीं था, से   पीतल का हैंडल गायब था. तब आंटी ने कहा, ‘‘जो चोर आया था उस का आप को पता नहीं चला और अपनी बेटी को अजनबी समझ कर डर गईं.’’ सब जोर से हंसने लगे. Best Hindi Story

Family Story In Hindi: दूसरा कोना – क्यों बदनाम हुई ऋचा?

Family Story In Hindi: ‘‘अजीब तरह का व्यवहार कर रही थी अजय की पत्नी. पूरे समय बस अपनी खूबसूरती, हंसीमजाक, ब्यूटीपार्लर उफ, कोई कह सकता है भला कि उस के पति की अभीअभी कीमोथेरैपी हुई है. उस के हावभाव, अदाओं से कहीं से भी नहीं लग रहा था कि उस के पति को इतनी गंभीर बीमारी है. मुझे तो दया आ रही है बेचारे अजय पर. ऐसे समय में उस का खयाल रखने के बजाय, उस की पत्नी ऋचा अपनी साजसज्जा में लगी रहती है,’’ घर का दरवाजा खोलने के साथ ही प्रिया ने अपने पति राकेश से कहा.

‘‘हां, थोड़ा अजीब तो मुझे भी लगा ऋचा का तरीका, पर चलो छोड़ो न, तुम क्यों अपना दिमाग खराब कर रही हो. हमें कौन सा रोजरोज उन के घर जाना है. औफिस का कलीग है, कैंसर की बीमारी का सुना तो एक बार तो देखने जाना बनता था,’’ राकेश ने प्रिया को बांहों में लेते हुए कहा.

‘‘अरे, छोड़ो क्या, मेरे तो दिमाग से ही नहीं निकल रही यह बात. कोई इतना लापरवाह कैसे हो सकता है. ऋचा पढ़ीलिखी, अच्छे परिवार की लड़की है, फिर भी ऐसी हरकतें. मुझे तो शर्म आ रही है कि  ऐसी भी होती हैं औरतें.

‘‘ऋचा औफिस की पार्टीज में भी कितना बनसंवर कर आती थी. कितना मरता था अजय उस की खूबसूरती पर. एक से एक लेटैस्ट ड्रैसेज पहनती थी वह तब भी. पर अब हालत कैसी है, कम से कम यह तो सोचना चाहिए.’’ राकेश ने प्रिया की बातों में अब हां में सिर हिलाया और कहा कि बहुत नींद आ रही है, सुबह औफिस भी जाना है, चलो सो जाते हैं.

बिस्तर पर पहुंच कर भी प्रिया के मन में ऋचा की बातें, उस की हंसी फांस की तरह चुभ रही थी. आज की मुलाकात ने रिचा को प्रिया की आंखों के सामने लापरवाह औरत के रूप में खड़ा कर दिया था. यही सब सोचतेसोचते प्रिया की आंख कब लग गई, उसे पता ही नहीं चला.

अगली सुबह औफिस जाते हुए राकेश को गुडबाय किस देने के बाद अंदर आई तो देखा राकेश अपना टिफिन भूल गए. प्रिया ने राकेश को कौल कर के रुकने को कहा. दौड़ते हुए वह राकेश का टिफिन नीचे पार्किंग में पकड़ा कर आई. ‘‘तुम एक चीज भी याद नहीं रख सकते. मैं न होती तो तुम्हारा क्या होता?’’ प्रिया ने मुसकराते हुए कहा.

राकेश ने भी उसे छेड़ते हुए कहा, ‘‘तुम न होती तो कोई और होती.’’

इस पर प्रिया ने उसे घूरने वाली नजरों से देखा. राकेश ने जल्दी से ‘आई लव यू’ कहा और बाय कहते हुए वहां से निकल गया.

सब काम निबटा कर प्रिया ने चाय बनाई और टीवी औन कर लिया. चैनल पलटतेपलटते ‘सतर्क रहो इंडिया’ पर आ कर उस का रिमोट रुका. प्रिया ने बिना पलकें झपकाए पूरा एपिसोड देख डाला. उसे फिर ऋचा का खयाल आ गया. अब वह तरहतरह की बातें सोचने लगी कि ऋचा का कहीं किसी से चक्कर तो नहीं चल रहा, कहीं वह अजय से छुटकारा तो नहीं पाना चाहती? दिनभर प्रिया के दिमागी घोड़े ऋचा के घर के चक्कर लगाते रहे.

शाम को राकेश के आने पर प्रिया ने फिर से ऋचा की बात छेड़ी तो राकेश ने थोड़ा झुंझला कर कहा, ‘‘अरे यार, क्या ऋचाऋचा लगा रखा है? उन की जिंदगी है, तुम क्यों इतना सोच रही हो?’’

प्रिया चुप हो गई. वह राकेश को नाराज नहीं करना चाहती थी. बहुत प्यार जो करती थी वह उस से.

मगर प्रिया के दिमाग से ऋचा का कीड़ा उतरा नहीं था. उस ने अपनी किट्टी की सहेलियों को भी उस के व्यवहार के बारे में बताया.

सहेलियों में से एक बोली, ‘‘जिस के पति के जीवन की डोर कब कट जाए, पता नहीं, वह पति के बारे में न सोच कर सिर्फ अपने बारे में बातें कर रही है, कैसी औरत है वह.’’

‘‘जो बीमार पति से भी इधरउधर घूमने की फरमाइश करती है, कैसी अजीब है वह,’’ दूसरी सहेली ने कहा.

‘‘ऐसी औरतें ही तो औरतों के नाम पर धब्बा होती हैं,’’ तीसरी बोली.

सब सहेलियों ने मिल कर ऋचा के उस व्यवहार का पूरा पोस्टमौर्टम कर दिया. धीरेधीरे प्रिया के दिमाग से ऋचा का कीड़ा निकल गया. हां, कभीकभार वह राकेश से अजय के बारे में जरूर पूछ लेती. राकेश का एक ही जवाब होता, ‘अजय अब शायद ही औफिस आ सके.’ प्रिया को अफसोस होता और मन ही मन सोचती कि बेचारे अजय का तो समय ही खराब निकला.

4 महीने बाद एक दिन राकेश ने औफिस से फोन पर प्रिया को बताया कि अजय की मृत्यु हो गई. प्रिया को बहुत दुख हुआ. राकेश ने प्रिया से कहा कि तुम शाम को तैयार रहना, अजय के घर जाना है. औफिस के सभी लोग जा रहे हैं.

प्रिया और राकेश अजय के घर पहुंचे. घर में कुहराम मचा हुआ था. अभी उम्र ही क्या थी अजय की, अभी 42 साल का ही तो था. ऐसे माहौल में प्रिया का मन अंदर घुसते हुए घबरा रहा था. अंदर घुसते ही सब से पहले ऋचा पर उस की नजर पड़ी. ऋचा का रंग बिलकुल सफेद पड़ा हुआ था. जो ऋचा 4 महीने पहले उसे नवयुवती लग रही थी, आज वही मानो बुढ़ापे के मध्यम दौर में पहुंच गई हो. जिस तरह ऋचा रो रही थी, प्रिया का मन और आंखें दोनों भीग गए. वह ऋचा को संभालने उस के करीब पहुंच गई.

बाहर अजय की अंतिम यात्रा की तैयारियां चल रही थीं. राकेश भी बाहर औफिस के लोगों के साथ खड़ा था. सभी अजय की जिंदादिली और हिम्मत की तारीफ कर रहे थे.

राकेश के पास ही डा. प्रकाश खड़े थे. डा. प्रकाश राकेश के बौस के खास मित्र थे. औफिस की पार्टीज में अकसर उन से मिलना हो जाया करता था. डा. प्रकाश ने कहा, ‘‘अजय जितना हिम्मत वाला था, उस से भी बढ़ कर उस की पत्नी ऋचा है.’’

राकेश ने जब यह बात सुनी तो उस के मन में उत्सुकता जाग गई. उस ने डा. प्रकाश से मानो आंखों से ही पूछ लिया कि आप क्या कह रहे हैं.

‘‘अजय का पूरा इलाज मेरी देखरेख में ही हुआ है,’’ डा. प्रकाश ने कहा, ‘‘राकेश, अजय की रिपोर्ट्स के मुताबिक उस के पास मुश्किल से एक से डेढ़ महीने का समय था. यह ऋचा ही थी जिस ने उसे 4 महीने जिंदा रखा.’’

उन्होंने आगे कहा, ‘‘जब इन लोगों को कैंसर की बीमारी का पता चला तो ऋचा डिप्रैशन में चली गई थी. अजय अपनी बीमारी से ज्यादा ऋचा को देख कर दुखी रहने लगा था. अजय की चिंता देख कर मैं ने पूछा तब उस ने सारी बात मुझे बताई. उस दिन अजय और मेरे बीच बहुत बातें हुईं. मैं ने उसे ऋचा से बात करने को कहा.

‘‘अगली बार जब वे दोनों मुझ से मिलने आए तो हालात बेहतर थे. तब ऋचा ने मुझे बताया कि उस के पति उसे मरते दम तक खूबसूरत रूप में ही देखना चाहते हैं. उस ने कहा था, ‘अजय चाहते हैं कि मैं हर वह काम करूं जो उन के ठीक रहने पर करती आई हूं. उन के साथ नौर्मल बातें करूं. हंसीमजाक, छेड़ना सब करूं. बस, उन की बीमारी का जिक्र न करूं. इन थोड़े बचे दिनों में वे एक पूरी जिंदगी जीना चाहते हैं मेरे साथ.

‘‘अजय ने मुझ से कहा, ‘तुम्हें दुखी देख कर मैं पहले ही मर जाऊंगा. मुझे मरने से पहले जीना है.’ मैं ने भी दिल पर पत्थर रख कर उन की बात मान ली. डाक्टर साहब, अब अजय काफी अच्छा महसूस कर रहे हैं.’ उस दिन यह कहतेकहते ऋचा की आंखों में आंसू आ गए थे, मगर पी लिए उस ने अपने आंसू भी अजय की खातिर.

‘‘ऋचा बहुत हिम्मती है. आज देखो, दिल पर से पत्थर हटा तो कैसा सैलाब उमड़ आया है उस की आंखों में.’’

डा. प्रकाश की बातें सुन कर राकेश का मन ग्लानि से भर गया. जिस ऋचा के लिए उस ने और प्रिया ने मन में गलत धारणा पाल ली थी, आज उसी ऋचा के लिए उस के मन में बहुत आदरभाव उमड़ आया था.

राकेश को काफी शर्म भी महसूस हुई यह सोच कर कि कैसे हम लोग बिना विचार किए एक कोने में खड़े हो कर किसी के बारे में अच्छीबुरी राय बना लेते हैं. कभी दूसरे कोने में जा कर देखने या विचारने की कोशिश ही नहीं करते. Family Story In Hindi

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