Story In Hindi: कलंक – आखिर किसने किया रधिया की बेटी गंगा को मैला

Story In Hindi: अपनी बेटी गंगा की लाश के पास रधिया पत्थर सी बुत बनी बैठी थी. लोग आते, बैठते और चले जाते. कोई दिलासा दे रहा था तो कोई उलाहना दे रहा था कि पहले ही उस के चालचलन पर नजर रखी होती तो यह दिन तो न देखना पड़ता.

लोगों के यहां झाड़ूबरतन करने वाली रधिया चाहती थी कि गंगा पढ़ेलिखे ताकि उसे अपनी मां की तरह नरक सी जिंदगी न जीनी पड़े, इसीलिए पास के सरकारी स्कूल में उस का दाखिला करवाया था, पर एक दिन भी स्कूल न गई गंगा. मजबूरन उसे अपने साथ ही काम पर ले जाती. सारा दिन नशे में चूर रहने वाले शराबी पति गंगू के सहारे कैसे छोड़ देती नन्ही सी जान को?

गंगू सारा दिन नशे में चूर रहता, फिर शाम को रधिया से पैसे छीन कर ठेके पर जाता, वापस आ कर मारपीट करता और नन्ही गंगा के सामने ही रधिया को अपनी वासना का शिकार बनाता.

यही सब देखदेख कर गंगा बड़ी हो रही थी. अब उसे अपनी मां के साथ काम पर जाना अच्छा नहीं लगता था. बस, गलियों में इधरउधर घूमनाफिरना… काजलबिंदी लगा कर मतवाली चाल चलती गंगा को जब लड़के छेड़ते, तो उसे बहुत मजा आता.

रधिया लाख कहती, ‘अब तू बड़ी हो गई है… मेरे साथ काम पर चलेगी तो मुझे भी थोड़ा सहारा हो जाएगा.’

गंगा तुनक कर कहती, ‘मां, मुझे सारी जिंदगी यही सब करना है. थोड़े दिन तो मुझे मजे करने दे.’

‘अरी कलमुंही, मजे के चक्कर में कहीं मुंह काला मत करवा आना. मुझे तो तेरे रंगढंग ठीक नहीं लगते. यह क्या… अभी से बनसंवर कर घूमतीफिरती रहती है?

इस पर गंगा बड़े लाड़ से रधिया के गले में बांहें डाल कर कहती, ‘मां, मेरी सब सहेलियां तो ऐसे ही सजधज कर घूमतीफिरती हैं, फिर मैं ने थोड़ी काजलबिंदी लगा ली, तो कौन सा गुनाह कर दिया? तू चिंता न कर मां, मैं ऐसा कुछ न करूंगी.’

पर सच तो यही था कि गंगा भटक रही थी. एक दिन गली के मोड़ पर अचानक पड़ोस में ही रहने वाले 2 बच्चों के बाप नंदू से टकराई, तो उस के तनबदन में सिहरन सी दौड़ गई. इस के बाद तो वह जानबूझ कर उसी रास्ते से गुजरती और नंदू से टकराने की पूरी कोशिश करती.

नंदू भी उस की नजरों के तीर से खुद को न बचा सका और यह भूल बैठा कि उस की पत्नी और बच्चे भी हैं. अब तो दोनों छिपछिप कर मिलते और उन्होंने सारी सीमाएं तोड़ दी थीं.

पर इश्क और मुश्क कब छिपाए छिपते हैं. एक दिन नंदू की पत्नी जमना के कानों तक यह बात पहुंच ही गई, तो उस ने रधिया की खोली के सामने खड़े हो कर गंगा को खूब खरीखोटी सुनाई, ‘अरी गंगा, बाहर निकल. अरी कलमुंही, तू ने मेरी गृहस्थी क्यों उजाड़ी? इतनी ही आग लगी थी, तो चकला खोल कर बैठ जाती. जरा मेरे बच्चों के बारे में तो सोचा होता. नाम गंगा और काम देखो करमजली के…’

3 दिन के बाद गंगा और नंदू बदनामी के डर से कहीं भाग गए. रोतीपीटती जमना रोज गंगा को कोसती और बद्दुआएं देती रहती. तकरीबन 2 महीने तक तो नंदू और गंगा इधरउधर भटकते रहे, फिर एक दिन मंदिर में दोनों ने फेरे ले लिए और नंदू ने जमना से कह दिया कि अब गंगा भी उस की पत्नी है और अगर उसे पति का साथ चाहिए, तो उसे गंगा को अपनी सौतन के रूप में अपनाना ही होगा.

मरती क्या न करती जमना, उसे गंगा को अपनाना ही पड़ा. पर आखिर तो जमना उस के बच्चों की मां थी और उस के साथ उस ने शादी की थी, इसलिए नंदू पर पहला हक तो उसी का था.

शादी के 3 साल बाद भी गंगा मां नहीं बन सकी, क्योंकि नंदू की पहले ही नसबंदी हो चुकी थी. यह बात पता चलते ही गंगा खूब रोई और खूब झगड़ा भी किया, ‘क्यों रे नंदू, जब तू ने पहले ही नसबंदी करवा रखी थी तो मेरी जिंदगी क्यों बरबाद की?’

नंदू के कुछ कहने से पहले ही जमना बोल पड़ी, ‘आग तो तेरे ही तनबदन में लगी थी. अरी, जिसे खुद ही बरबाद होने का शौक हो उसे कौन बचा सकता है?’

उस दिन के बाद गंगा बौखलाई सी रहती. बारबार नंदू से जमना को छोड़ देने के लिए कहती, ‘नंदू, चल न हम कहीं और चलते हैं. जमना को छोड़ दे. हम दूसरी खोली ले लेंगे.’

इस पर नंदू उसे झिड़क देता, ‘और खोली के पैसे क्या तेरा शराबी बाप देगा? और फिर जमना मेरी पत्नी है. मेरे बच्चों की मां है. मैं उसे नहीं छोड़ सकता.’

इस पर गंगा दांत पीसते हुए कहती, ‘उसे नहीं छोड़ सकता तो मुझे छोड़ दे.’

इस पर गंगू कोई जवाब नहीं देता. आखिर उसे 2-2 औरतों का साथ जो मिल रहा था. यह सुख वह कैसे छोड़ देता. पर गंगा रोज इस बात को ले कर नंदू से झगड़ा करती और मार खाती. जमना के सामने उसे अपना ओहदा बिलकुल अदना सा लगता. आखिर क्या लगती है वह नंदू की… सिर्फ एक रखैल.

जब वह खोली से बाहर निकलती तो लोग ताने मारते और खोली के अंदर जमना की जलती निगाहों का सामना करती. जमना ने बच्चों को भी सिखा रखा था, इसलिए वे भी गंगा की इज्जत नहीं करते थे. बस्ती के सारे मर्द उसे गंदी नजर से देखते थे.

मांबाप ने भी उस से सभी संबंध खत्म कर दिए थे. ऐसे में गंगा का जीना दूभर हो गया और आखिर एक दिन उस ने रेल के आगे छलांग लगा दी और रधिया की बेटी गंगा मैली होने का कलंक लिए दुनिया से चली गई. Story In Hindi

Hindi Story: वक्त का दोहराव – शशांक को आखिर कौन सी बात याद आई

Hindi Story: शशांक दबे पांव छत पर पहुंचा. पूरे महल्ले में निस्तब्धता छाई हुई थी. कहीं आग से झुलसे मकान, टूटी दुकानें, सड़कों पर टूटी लाठियां, ईंटपत्थर और कहींकहीं तो खून के धब्बे भी नजर आ रहे थे. कितना खौफनाक मंजर था. हिंदू-मुसलिम दंगे ने नफरत की ऐसी आग लगाई है कि इंसान सभ्यता की सभी हदों को लांघ कर दरिंदगी पर उतर आता है.

राजनीतिबाज न जाने कब बाज आएंगे अपनी रोटियां सेंकने से. शशांक के अंतर में अपने दादाजी के कहे वो शब्द याद आ रहे थे कि नेता लोग राजनीति खेल जाते हैं और कितने ही लोग अपनी जान से खेल जाते हैं…

भारत-पाकिस्तान का बंटवारा. मानो एक हंसतेखेलते परिवार का दोफाड़ कर दिया गया. कौन अपना, कौन पराया. हिंदू-मुसलमानों के मन में ऐसा जहर घोला कि देखते ही देखते कल तक एक ही थाली में साथसाथ खाते दोस्त एकदूसरे की जान के दुश्मन बन बैठे. अपने पिताजी के मुंह से सुनी थी उस ने उस वक्त की दास्तान. आज वही कहानी फिर से उस की आंखों के सामने पसरने लगी थी…

हवेलीनुमा दोमंजिला घर और बहुत बड़ा चौक, चौक को पार कर के एक बहुत बड़ा दरवाजा, दरवाजा क्या था, पूरा किले का दरवाजा था, बड़ीबड़ी सांकल, सेफ पोल, बड़ेबड़े ताले उस दरवाजे को खोलना व बंद करना हर एक के बस की बात नहीं थी. मास्टर जीवन लाल ही उसे अपने मुलाजिमों के साथ मिल कर खोलते व बंद करते थे.

लेकिन आज यह क्या, वही दरवाजा, ऐसे लगता था कि बस अब गिरा तब गिरा. लगता भी क्यों न, आज एक बहुत बड़ा झुंड उस दरवाजे को धकेल रहा था, पीट रहा था, यह कैसा झुंड था?

मास्टर जीवनलाल जिन का इस पूरे शहर में नाम था, इज्जत थी, रुतबा था, आज वही मास्टरजी अपने पूरे परिवार के साथ इस हवेली में सांस रोके बैठे हैं.

परिवार में पत्नी, 3 बेटे, 3 बेटियां, बहू, सालभर का एक पोता सभी तो हैं, हंसता खेलता परिवार है.

कुछ समय से चल रही हिंदू मुसलमानों की आपस की दूरियां दिख तो रही थीं पर हालात ऐसे हो जाएंगे, किसी ने सोचा भी न था.

मुसलमान और हिंदू एकदूसरे के खून के प्यासे हो गए थे, आपस में इतनी नफरत होगी, कभी किसी ने सोचा भी न था. यह क्या हो गया भाइयो, जन्मजन्म से एकदूसरे के साथ रहते आए परिवार एकदूसरे से इतनी नफरत क्यों करने लगे.

हालात ऐसे हो गए थे कि जवान लड़कियों को उठा कर ले जाया जा रहा था.  बूढ़ों को मार दिया जा रहा था. मास्टर जीवन लाल अपनी तीनों जवान लड़कियों और बहू को हवेली की ऊपर वाली मंजिल पर पलंग के नीचे छिपाए हुए थे और दरवाजे की तरफ टकटकी लगाए देख रहे थे. कभी भी दरवाजा टूट सकता था.

मास्टर जीवन लाल का बड़ा बेटा, कटार लिए खड़ा था कि दरवाजा खुलते ही वह अपनी तीनों बहनों व पत्नी को इसलिए मार डालेगा कि कोई उन्हें उठा कर नहीं ले जा पाए. बहनें व पत्नी सामने मौत खड़ी देख ऐसे कांप रही थीं जैसे आंधी में डाल पर लगा पत्ता फड़फड़ा रहा हो.

पर यह क्या, दरवाजे के पीटने और धकेलते रहने के बीच एक आवाज उभरी. वह आवाज थी मास्टर जीवन लाल के किसी विद्यार्थी की. वह कह रहा था कि अरे, क्या कर रहे हो. यह तो मेरे मास्टरजी का घर है. इस घर को छोड़ दो. आगे चलो, और देखते ही देखते बाहर कुछ शांति हो गई.

रात का यह तूफान जब गुजर गया तो मास्टर जीवन लाल ने सोचा कि यहां से अपने पूरे परिवार को सहीसलामत कैसे बाहर निकाला जाए. इस सोच में वे दरवाजा खोल कर बाहर निकले तो बाहर का भयानक दृश्य देख कर रो पड़े. लाशें पड़ी हैं, कोई तड़प रहा है, कोई पानी मांग रहा है. जिस गली में वे और उन का परिवार बड़ी शान से होली, दीवाली, ईद मनाते थे, पड़ोसियों के साथ हंसीमजाक, मौजमस्ती होती थी, वही गली आज खून से नहाई हुई है. सभी आज कितने बेबस व लाचार हैं, किस को पानी पिलाएं, किस को अस्पताल पहुंचाएं. रात आए तूफान से घबराए, आगे आने वाले तूफान से अपने परिवार को बचाने के लिए वे क्या करें. अपनी तीनों जवान बेटियों को आगे आने वाले तूफान से बचाने की गरज से सबकुछ अनदेखा कर के वे आगे बढ़ गए.

मास्टर जीवन लाल जब बाहर का जायजा लेने निकले तो उन्हें पता चला कि हिंदुओं से यह जगह खाली कराई जा रही है. हिंदुओं को किसी तरह लाहौर तक पहुंचाया जा रहा है और वहां से आगे.

मास्टर जीवन लाल ने यह सुना तो वे जल्दी ही अपने परिवार की हिफाजत के लिए वापस मुड़े और घर पहुंच कर उन्होंने बीवी व बच्चों से कहा कि घर खाली करने की तैयारी करो. अब यहां से सबकुछ छोड़छाड़ कर जाना होगा.

इतना सुनते ही पूरा परिवार शोक में डूब गया. ऐसा होना लाजिमी भी है. सालों से यहां रह रहे थे. यहीं पैदा हुए, यहीं बड़े हुए, यहीं पढ़े और फिर उन से कहा जाए कि यहां तुम्हारा कुछ नहीं है, तुम यहां से जाओ, कैसा लगेगा. खैर, मास्टर जीवन लाल ने हिम्मत दिखाते हुए सब को तैयार किया और जरूरी कागजात व कुछ पैसे लिए. फिर उस आलीशान हवेली को हमेशा के लिए आंसुओं से अलविदा किया.

पैर हवेली के बाहर निकले तो इतने भारी थे कि उठ ही नहीं रहे थे. दिल हाहाकार कर रहा था. परंतु फिर भी उन्होंने अपने परिवार को देखा हिम्मत की और चल पड़े.

अब मास्टर जीवन लाल बिना छत, बेसहारा अपने परिवार के साथ खुले आसमान के नीचे खड़े थे. अब उन के पास कुछ न था. हाय समय का फेर देखो, कुछ समय पहले तो खुशियों की लहरें उठ रही थीं और अब यह क्या हो गया. यह कैसा तूफान था. इस तूफानी बवंडर में कैसे फंस गए. कब बाहर निकलेंगे इस तूफान से, पता नहीं.

अब मास्टर जीवन लाल के पास एक ही मकसद था कि अपने परिवार को सहीसलामत हिंदुस्तान पहुंचाया जाए. मास्टर जीवन लाल को पता चला कि ट्रक भर कर लोगों को लाहौर तक पहुंचाया जा रहा है. बहुत कोशिश के बाद मास्टर जीवन लाल की बहू व पत्नी को एक ट्रक में जगह मिल गई. और पीछे रह गईं मास्टरजी की बेटियां व बेटे.

उफ्फ अब क्या करें अब जो रह गए उन्हें किस के सहारे छोड़ें और जो चले गए उन्हें आगे का कुछ पता नहीं. मास्टरजी इस कशमकश में खड़े थे कि फिर लोगों का जनून उभरा. मार डालो, काट डालो की आवाजें. मास्टरजी फिर से परेशान हो गए. अब वे बेटियों को कहां छिपाएं. मास्टरजी की आंखों से आंसू बह निकले.

इतने में मास्टरजी को एक फरिश्ते की आवाज सुनाई दी. सलाम अलैकम, भाईजान. मास्टरजी ने जब उस ओर देखा तो मास्टरजी के सामने चलचित्र की तरह पुरानी घटनाएं याद आ गईं. दो जिस्म एक जान हुआ करते थे. दोनों परिवार एकसाथ सारे तीजत्योहार एकसाथ मनाते थे. फिर अचानक सलीम भाई को विदेश जाना पड़ गया. और अब मिले तो इस हाल में. न हवेली अपनी थी, न ही देश अपना रह गया था. सबकुछ खत्म हो चुका था. मास्टरजी लुटेपिटे खड़े थे.

सलीम भाई ने मास्टरजी को गले लगा लिया. मास्टरजी का हाल देख कर सलीम भाई भी रो पड़े. सलीम भाई ने मास्टरजी को एक बहुत बड़ी तसल्ली दी, कहा कि भाईजान, आप की बेटियां मेरी बेटियां. अब तुम इन की फिक्र छोड़ो और लाहौर जा कर भाभीजी और बहू को खोजो. मास्टरजी के पास अब कोई चारा भी नहीं था. सलीम भाई का विश्वास ही था, और वे आगे बढ़ गए.

कितना सहा होगा उस वक्त लोगों ने जब अपनी जड़ों से उखड़ कर रिफ्यूजी बन गए होंगे. धर्म क्या यही सिखाता है हमें, तोड़ दो रिश्तों को, मानवीय संवेदनाओं का खून कर दो.

बरसों पुरानी हिंदू, मुसलमान की वह नफरत आज भी बरकरार है तो इन नेताओं की वजह से, धर्म के ठेकेदारों की वजह से, अंधविश्वास की गठरी उठाए लोगों की अंधभक्ति की वजह से.

काश, जल्दी ही हमें समझ में आ जाए कि धर्म तो दिलों को मिलाता है, चोट पर मरहम लगाता है. खून की नदियां नहीं बहाता, बच्चों को रुलाता नहीं, औरतों की इज्जत नहीं उतारता, बसेबसाए घरों को उजाड़ता नहीं. काश, यह बात आने वाली हमारी पीढ़ी जल्दी ही समझ जाए. Hindi Story

Hindi Family Story: व्यापार

Hindi Family Story: सरजू स्टेशन पर कुलीगीरी करता था और सारी कमाई गांजे में उड़ा देता था. उस की पत्नी तारा मजदूरी कर के जैसेतैसे परिवार का पेट पालती थी. एक बार सरजू एक पाड़ी खरीद लाया. जब वह हट्टीकट्टी भैंस हुई तो सरजू ने वह कर दिया, जो तारा ने सपने में भी नहीं सोचा था.

हलकीहलकी बूंदाबांदी हो रही थी. पछुआ हवा के थपेड़ों को अपने नंगे बदन पर झेलते हुए कमर में अधटंगी धोती बांधे सरजू जब अपनी झोंपड़ी के नजदीक आया, तो उस के नथुनों में मांस भुनने की खुशबू आने लगी.

झोंपड़ी के बाहर जरा सी खुली जमीन की पट्टी पर एक तरफ बेटी मालती झोंटा बिखेरे आटा गूंद रही थी. दूसरी तरफ चूल्हे पर रखी देगची में उस की बीवी तारा कलछी से शायद मांस भून रही थी. लक्ष्मण और राधा मां से सटे बैठे लोभी निगाहों से देगची को देख रहे थे.

‘‘आज पैसा मिल गया?’’ सरजू की करारी आवाज से तारा चौंक गई. उस ने एक उचटती नजर उस पर डाली और दोबारा मांस भूनने में लग गई.

सरजू का जी जलभुन गया. वह सोचने लगा, ‘यही तो इस की सब से बुरी आदत है. कभी कुछ पूछो तो बोलेगी नहीं, जैसे बोलने में टका खर्च होता है. पैसा तो मिल ही गया होगा, तभी तो आज मांस बन रहा है.’

फिर इधरउधर देख कर सरजू ने बेटी मालती से पूछा, ‘‘क्यों री, अशोक कहां गया है?’’

मालती सुघड़ सयानी बन कर घर के काम में हाथ बंटा रही थी. वैसे तो रोज काम के नाम पर वह बहाना बनाती थी, पर अब महीनों बाद घर में सालन जो बन रहा था, तो उस के मुंह में पानी आ रहा था. गले में थूक गटक कर उस ने कहा, ‘‘क्या मालूम.’’

‘‘अच्छा, जा तू ही दुकान से पुडि़या लेती आना.’’

आटा अधगुंदा छोड़ कर मालती उठ खड़ी हुई. सरजू ने 20 रुपए का नोट दिया, ‘‘3 पुडि़या लाना, एक बंडल बीड़ी भी.’’

पुडि़या, यानी गांजा. 3 पुडि़यां सरजू की 24 घंटे की खुराक थीं. पहले तो बहुत पीता था, पर इधर महंगाई बढ़ गई थी, इसलिए 3 में ही संतोष करना पड़ता था.

‘‘छोटुआ कह रहा था कि यहीं 5 कोस पर एक गांव है… नाम नहीं याद पड़ रहा है. वहां मवेशी बिकने आते हैं. सोच रहा हूं एक पाड़ी ले आऊं. अशोक सारा दिन खेलता रहता है, तो वह पाड़ी को चराएगा. 2 साल में भैंस बन जाएगी तो दूध का सुभीता हो जाएगा और पैसा भी होगा.’’

तारा चुप रही. घर में सरजू की ही मरजी चलती थी. उस ने जो ठान लिया सो ठान लिया. कुछ कहने से पिटाई ही पल्ले पड़ती थी. वह समझ रही थी कि यह सब उस से रुपया मांगने की चाल है.

तारा सरकारी फार्म में मजदूरी करती थी. साढ़े 16 रुपए रोज के हिसाब से मजदूरी मिलती थी. इस बार 8 हफ्तों की मजदूरी मिली थी. ठंड पड़ने लगी थी. बच्चों के पास कपड़े नहीं थे. सोचा था, एकएक कपड़ा चारों के लिए बनवा देगी. लेकिन सूदखोर महाजन की तरह सरजू पैसा उगाहने आ गया था. वह पाईपाई का हिसाब रखता था. तारा ने कमर से सब रुपए खोल कर उस के आगे फेंक दिए.

सरजू ने बेहयाई से सब नोटों को उठा कर गिना. फिर बोला, ‘‘डेढ़ सौ रुपए कम हैं.’’

तारा खीज उठी. अपनी ही कमाई का हिसाब देना अखर गया. सरजू जानता था कि फार्म के पास वाली चाय की दुकान पर वह दोपहर की छुट्टी में चाय पीती है. बच्चों को भी कभीकभार बिसकुट दिला देती है.

पैसा मिलने पर उस की उधारी चुका कर एक वक्त के खाने के लिए कुछ अच्छी चीज ले आती है. बाकी पूरा महीना तो नमक और रोटी पर ही बीतता है.

‘‘हां, 70 रुपए चाय वाले को दिए, बाकी से मांस, तेल, मसाला और आटा आया है. मांस भी तो 55 रुपए किलो है,’’ तारा बोली.

‘‘क्या जरूरत थी, मांस लाने की… आलूगोभी नहीं ला सकती थी?’’ सरजू ने कहा.

तारा ने कुछ जवाब न दिया. झुक कर चूल्हे की लकड़ी ठीक करते हुए सोचने लगी, ‘अभी ऐसे कह रहा है, खाने बैठेगा तो यह नहीं सोचेगा कि दूसरे को भी खाना है.’

सरजू मन ही मन में हिसाब लगा रहा था, ‘पाड़ी खरीदने में 3-4 सौ तो लग ही जाएंगे. इधर 2-3 दिनों से उस की आमदनी भी कुछ कम हुई है. कहीं से कुछ रुपयों का जुगाड़ करना पड़ेगा.’

सरजू स्टेशन पर कुलीगीरी करता था. वह लाइसैंस वाला कुली नहीं था. लाइसैंस के लिए बहुत दौड़धूप करनी पड़ती थी और फीस भी लगती थी. साथ ही घूस भी देनी पड़ती थी.

उस के जैसे बिना लाइसैंस वाले कई कुली थे. स्टेशन के आउटर सिगनल के पास उन का जमाव रहता.

व्यापारी लोग सामान ले कर आते तो चुंगी से बचने के लिए ट्रेन की जंजीर खींच कर उतर पड़ते थे. उन का सामान जल्दी से उतरवा देने पर अच्छे पैसे बन जाते थे.

हां, पुलिस को जरूर मिला कर रखना पड़ता था. वैसे, हवलदार साहब उस से खुश ही रहते थे. गांजे के वे भी शौकीन थे. सरजू उन्हें भी पिला देता था.

दूसरे दिन शाम ढलने लगी थी. जब एक हाथ में रस्सी थामे आगेआगे सरजू और पीछेपीछे बड़ी बकरी से कुछ ऊंची पाड़ी गली में घुसी. अंधेरे में सरजू का काला रंग पाड़ी के रंग से बिलकुल मिल रहा था. छोटू भी साथ में था.

‘‘अरी, जल्दी से तेल, सिंदूर ले आ… घर में लक्ष्मी आई है,’’ सरजू की आवाज में खुशी झलक रही थी.

10 कोस की थकान भी उसे महसूस नहीं हो रही थी.

तारा ने एक निगाह पाड़ी पर डाली और उठ खड़ी हुई. पाड़ी के माथे पर तेल, सिंदूर लगाया और एक लोटा पानी सामने के दोनों पैरों के पास डाला.

उस का सख्त चेहरा देख कर सरजू को खीज आई. किंतु अभी उस की खुशी गुस्से पर हावी थी.

वह बोला, ‘‘अशोक, जल्दी से यहां एक खूंटा गाड़… इसे बांधना है. अभी देहरी नहीं पहचानती है न.

बच्चे भी खुश थे, पाड़ी की देखरेख में वे इतने मगन थे कि भूखप्यास भूल गए थे.

‘‘भौजी, अब कुछ चायपानी कराओ. देखो, तुम्हारे लिए आज सारा दिन दौड़े हैं,’’ छोटू ने कहा.

तारा को मौका मिल गया. घर में खाने को कुछ नहीं था, सारे पैसे सरजू ले गया था. उस ने सरजू से कहा, ‘‘रुपया दो, तो चायपानी ले आएं, आटा भी लाना है.’’

सरजू ने सुनीअनसुनी करते हुए कहा, ‘‘चल छोटू, हम दोनों स्टेशन पर ही चाय पी लेंगे.’’

उन दोनों को जाते हुए देख कर तारा ने दोबारा टोका, ‘‘आज घर में खर्च नहीं है. सरजू एक पल ठिठका, ‘‘जा कर उधारी आटा ले आओ. मेरा नाम ले देना, कल रुपए दे देंगे.’’

तारा चुपचाप उन दोनों को जाते हुए देखती रही. पाड़ी खरीदने से जो रुपया बचा होगा, उस से गांजा आएगा. चाय के साथ गांजे का दम लगा कर वह दूसरी दुनिया में खो जाएगा. जब घर लौटेगा, उस समय तक भूखे बच्चे पानी पी कर सो जाएंगे.

सरजू जानता है कि चक्की वाला आटा उधार कभी नहीं देता है. तारा को पछतावा हो रहा था कि कल क्यों गुस्से में सारे नोट फेंक दिए. कम से कम एक 20 का नोट बचा लिया होता.

रोज सवेरे बच्चे रात की बासी रोटी खा लेते थे. फिर उधरउधर भटकते हुए सरकारी क्वार्टरों में लगे फल चुरा कर खाते हुए उन का दिन कटता. पानी पीपी कर वे सांझ की बाट जोहते, जब मां चूल्हा जोड़ कर रोटी बनाती.

तारा के साथ की दूसरी मजदूरिनें भी थीं. पर उन की इतनी बुरी हालत नहीं थी. उन के मर्द कमा कर नोट उन के हाथ पर रखते. अपनी कमाई से वे अपने शौक पूरे करती थीं. सब के बदन पर ढंग के कपड़ेलत्ते होते थे. एक वही थी, जो ठंड में एक फटी धोती से तन को ढक कर खेतों में काम करती थी.

बच्चे अभी तक पाड़ी में लगे हुए थे. लक्ष्मण छोटी बालटी में पानी ले कर उस के मुंह से लगा रहा था. 3 साल की राधा भी अपने नन्हें हाथों में घास लिए उसे खिलाने की कोशिश कर रही थी.

अशोक और मालती महल्ले के बच्चों को डांट कर भगा रहे थे, ‘पाड़ी को तंग मत करो, इतनी दूर से आई है.’

तारा ने हांड़ी में से धान निकाला. वह फार्म से थोड़ाथोड़ा धान उठा लाती थी, सभी मजदूरिनें ले जाती थीं. बाबू लोग हर समय चौकसी थोड़े ही करते थे.

3 पाव के लगभग धान था. उसे कूट कर सूखी कड़ाही में भूना. बच्चों ने और उस ने एकएक मुट्ठी फांक कर पानी पिया और सो गए.

रात काफी हो गई थी, जब सरजू ने उसे झंझोड़ कर जगाया और कहा, ‘‘ला, खाने को दे.’’

‘‘कहां से दूं? सब तो ऐसे ही सो रहे हैं,’’ तारा बोली.

गांजे के नशे में लाललाल आंखें किए सरजू ने उसे पीटने को हाथ उठाया और बोला, ‘‘तेरी यही आदत अच्छी नहीं लगती है. कहा था न कि आटा उधार ले आना.’’

‘‘उधार नहीं देता है.’’

‘‘नहीं देता है… अभी बताता हूं कि कैसे देता है.’’

तब तक पाड़ी रंभाई. सरजू के उठे हाथ थम गए. वह बोला, ‘‘अच्छाअच्छा, भूख लगी है न, तुझे भी थोड़े ही कुछ मिला होगा, मैं जानता था. इसीलिए तेरे खाने के लिए लाया हूं.’’

गमछे को खोल कर भूसी चूनी निकाली और बालटी में घोल कर पाड़ी के सामने रखी. जब तक वह पीती रही, प्रेम से वह उस का माथा, पीठ सहलाता रहा. मुसीबत टली देख तारा ने चैन की सांस ली और बच्चों के बीच आ कर लेट गई.

कुछ दिनों तक पाड़ी को चराने, नहलाने और खिलाने के लिए बच्चे आपस में झगड़ते थे, पर धीरेधीरे यह काम भी तारा के जिम्मे आ गया. फार्म से दोपहर की छुट्टी में आती तो भूखप्यास से टूटी देह से कुएं से पानी खींचखींच कर उसे नहलाती. सामने गांजे का सुट्टा खींचते हुए सरजू लाट साहब की तरह बैठा रहता.

पहले कभीकभार ही ऐसा वक्त आ पड़ता था, जब घर में रोटी नहीं बनती थी. किंतु अब तो अकसर ही ऐसा हो जाता था, परिवार भले ही आधा पेट खा कर रहे, पर पाड़ी भूखी नहीं रहनी चाहिए, यह उस घर का कायदा बन गया था, क्योंकि पाड़ी सरजू को बच्चों से भी ज्यादा प्यारी थी.

3 सालों में पाड़ी बढ़ कर खूब हट्टीकट्टी भैंस बन गई थी. उस की कालीचिकनी चमड़ी दूर से ही चमकती थी. अब तक उसे गाभिन हो जाना चाहिए था, पर नहीं हुई थी.

आखिर सरजू एक दिन उसे जानवरों के डाक्टर के पास ले गया. डाक्टर ने बताया, ‘‘इसे खुराक जरूरत से ज्यादा दी गई है, इसी से पेट पर चरबी चढ़ गई है. दाना कम दिया करो.’’

जब तारा को यह बात मालूम हुई, तो उदासी में भी उसे हंसी आ गई और सोचने लगी, ‘भूखे बच्चे दुबले होते जा रहे हैं और भैंस पर चरबी चढ़ गई.’

शायद सरजू भी यही कुछ सोच रहा था. तारा की मुसकान से वह चिढ़ गया. वह उसे घुड़क कर बोला, ‘‘इस में हंसने की क्या बात है? औरतें मोटी नहीं हो जाती हैं?’’

भैंस जब गाभिन हुई तो सरजू की ममता भरी चिंता देखते ही बनती थी. तारा को याद नहीं पड़ता था कि कभी गर्भ ठहरने पर उस की इतनी संभाल हुई हो.

आखिरकार वह दिन आ ही गया. घर में खुशी का माहौल था. तारा भी खुश नजर आ रही थी. यह दिन भी उस की जिंदगी में आएगा, इस का उसे यकीन नहीं था.

वह सोचने लगी, ‘बच्चे अब जी भर कर दूध पिया करेंगे. अभी एकाध महीना वह दूध नहीं बेचेगी. सरजू की देह भी टूटती जा रही है, गांजा गरम होता है, दूध पीना उस के लिए भी जरूरी है.’

10 दिन इसी तरह की खुशियों, उम्मीदों में गुजर गए. वह भी एक उदास धुंधली सांझ थी, जब सरजू के साथ 4 लोग भैंस के पास आ खड़े हुए…

सरजू ने झटपट उन लोगों के सामने भैंस दुही. दूध देख कर मोलभाव शुरू हुआ और देखते ही देखते भैंस और पाड़ा सरजू ने उन लोगों के हवाले कर दिए.

तारा के रोटी पकाते हाथ थम चुके थे. बच्चों को भी खबर लग चुकी थी. सब उदास मुख से चुपचाप भैंस को जाते देख रहे थे. उस रात रोटी पकी रखी रह गई, किसी से खाई नहीं गई. तारा की आंखों के सामने भैंस के आने का दिन घूम गया. उस दिन कितनी खुशी थी कि सब भूख भूल गए थे और आज कितनी उदासी कि रोटी पकी रखी रह गई.

सरजू को तो भैंस प्राणों से भी प्यारी थी, पर फिर ऐसा क्यों हुआ?

रात गए गांजे के नशे में चूर बहकते हुए कदमों से सरजू घर लौटा. उस वक्त तक तारा दरवाजे पर ही बैठी थी, उस का भी दिल नहीं हो रहा था.

बड़ी हिम्मत बटोर कर तारा ने पूछा, ‘‘क्या बात हो गई जो भैंस को बेच दिया?’’

‘‘तुम्हें इस से मतलब? हमारी चीज थी, हम ने बेच दी, तू कौन होती है पूछने वाली?’’

गांजे के नशे में सरजू अपने को बादशाह से कम नहीं समझता था. वह बड़बड़ाता जा रहा था, ‘‘फिर एक पाड़ी लाएंगे. 300 की पाड़ी आ जाएगी…

4 हजार की भैंस बिकेगी. कितने फायदे का सौदा है. इसे कहते हैं, व्यापार… तू क्या समझेगी?’’

तारा की आंखों में आंसू आ गए.

300 को 4 हजार बनाने में उस का और बच्चों का कितना खून लगा, पिछले 3 सालों में कितनी रातें भूखे, पेट रह कर काटी थीं. बच्चे कितने दुबले हो गए थे और वह खुद? खेतों में काम करतेकरते आंखों के सामने अंधेरा छा जाता था और रुपया? क्या रुपया रहेगा? जब तक हाथ में रुपया रहेगा, सरजू कामधंधा छोड़ कर गांजे और जुए में मस्त रहेगा.

सरजू बोलता जा रहा था, ‘‘अरी, इस व्यापार से तुझे रानी बना दूंगा… रानी. हां, बस जरा हंस कर बोला कर, हर वक्त मनहूस सूरत बना कर घूमती है तो जी जलता है. हां, खुश रहा कर. देख, मेरे पास कितना रुपया है. अब तुझे क्या चाहिए बोल, मैं कल ही खरीद दूंगा.’’

सरजू अपनी आवाज को भरसक मुलायम बना रहा था. मुलायम स्वर किस मतलब के लिए है, इसे समझते हुए उस ने एक गहरी सांस ले कर उदासी के पुराने कवच से अपने को दोबारा ढक लिया. वह सोचने लगी, ‘अब कुछ भी हो, उस पर कुछ असर नहीं होगा.’ Hindi Family Story

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