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एक किन्नर की लव स्टोरी : रानो की कहानी

रानो बहुत खुश थी कि उसे भी कोई चाहने वाला मिल गया है. किन्नरों की जिंदगी में ऐसा कम ही होता है. किन्नरों के ऊपर पैसे फेंकने वाले तो बहुत होते हैं, मगर उन के ऊपर कोई अपना दिल फेंक दे, ऐसा कभी देखा नहीं. राजू एक आटोरिकशा ड्राइवर था. रानो रात के 10 बजे सहेलियों के साथ सड़क पर खड़ी थी. राजू की सांसें तेज चल रही थीं. उस से रानो का खुला हुआ कंधा देखा नहीं जा रहा था. वह गजब की खूबसूरत दिख रही थी. रानो अपनी सहेलियों से हंसहंस कर बातें कर रही थी. कुछ बातें राजू के कानों में भी पड़ रही थीं, मगर पता नहीं क्यों राजू उन बातों को सुनना नहीं चाह रहा था. उस की आंखों में इस वक्त रानो का गोरा कंधा घुसा हुआ था.

स्ट्रीट लाइट की रोशनी में रानो की ड्रैस रहरह कर चमक जाती थी. उस की ड्रैस पर ढेर सारे सितारे लगे हुए थे. रानो ने अपने बालों को खुला छोड़ रखा था. वह रहरह कर अपने बालों को कंधे के पीछे करती और कभीकभी अपनी छाती की ओर कर उंगलियों से अपनी लटों के साथ खेलती.

राजू को पता नहीं था कि उस के आटोरिकशे में कौन जाने वाला है, मगर वह पूरे मन से यही चाह रहा था कि रानो उस की सवारी बन जाए. वैसा ही हुआ. रानो हंसती हुई राजू के आटोरिकशे में बैठ गई.

राजू ने पहली ही नजर में उसे अपना दिल दे दिया था, एक लड़की समझ कर. लेकिन जब उसे पता चला कि रानो एक किन्नर है, तब भी वह उस की खूबसूरती के आगे सबकुछ भूल गया. ‘‘बहुत खूबसूरत लग रही हो,’’

राजू ने आटोरिकशे के साइड मिरर में देख कर रानो से कहा. यह सुन कर रानो हंस दी और बोली, ‘‘ऐसे मत देख पगले, प्यार हो जाएगा.’’

रानो ने राजू की हंसी उड़ाई, मगर उसे नहीं पता था कि राजू सच कह रहा है. वह तो पहले ही फंस चुका था उस के हुस्न के जाल में. रानो ने देखा कि राजू ने उस की बात का जवाब नहीं दिया, मगर बीचबीच में वह उसे देख जरूर रहा था.

रानो ने महसूस किया कि राजू एक सीधासादा लड़का है. उस की नजर में फूहड़पन नहीं था. वह उसे ऐसे देख रहा था, जैसे कोई एक खूबसूरत लड़की को देखता है. रानो ने अपने मन में कुछ सोचा कि तभी होटल आ गया. आटोरिकशे से उतर कर रानो ने ड्राइवर को पैसे दिए. राजू ने देखा भी नहीं कि उस ने कितने पैसे दिए. उस ने एक हाथ में पैसे पकड़े और रानो को देखता रहा. उसे रानो को कुछ पैसे वापस करने थे. रानो इंतजार कर रही थी, मगर उस ने देखा कि राजू उदास लग रहा है. रानो समझ गई.

‘‘कल 10 बजे वहीं आना, जहां से आज मुझे बैठाया है,’’ इतना कह कर रानो मुसकराते हुए होटल के अंदर चली गई.

यह सुन कर राजू खुश हुआ कि रानो ने उसे कल भी बुलाया है. अगले दिन ठीक 10 बजे राजू उसी नुक्कड़ पर पहुंच गया, जहां से रानो उस के आटोरिकशे में बैठी थी.

‘‘चलो,’’ यह सुन कर राजू चौंक गया. उस ने पीछे मुड़ कर देखा, तो रानो उस के आटोरिकशे में बैठ चुकी थी. ‘‘किधर से आईं तुम? मैं तो सामने देख रहा था,’’ राजू थोड़ा खुल सा

गया था आज. फिर उस ने आटोरिकशा स्टार्ट किया और साइड मिरर से उसे देखने लगा. आज रानो ने बैंगनी रंग की ड्रैस पहनी हुई थी. वैसी ही मादक ड्रैस, जिसे देखते ही नशा चढ़ जाए.

रानो मेकअप करती थी. वह छोटे से आईने में अपने मेकअप को देख रही थी. जल्दीजल्दी में आज वह ठीक से तैयार नहीं हो पाई थी, तभी उस की नजर राजू से टकरा गई. ‘‘सामने देख कर चलाओ…’’ रानो ने मुसकरा कर कहा. राजू समझ गया कि वह क्या कहना चाह रही थी.

‘‘तुम जैसी खूबसूरत लड़की साथ बैठी हो, तो नजर भटकेगी ही न,’’ राजू ने भी कह दिया. ‘‘क्यों मजाक उड़ा रहे हो. मैं लड़की नहीं हूं,’’ रानो के मन में जैसे कुछ चुभ सा गया था.

‘‘कम भी नहीं हो. कोई भी देखे, तो एकदम पगला जाएगा,’’ राजू ने अपनी बात कही. ‘‘मेरी तरफ से ध्यान हटाओ. मैं तुम्हारे किसी काम की नहीं,’’ रानो ने राजू को आगे बढ़ने से रोका.

‘‘तुम इतनी खूबसूरत हो कि मैं तुम्हारे लिए जिंदगीभर आटोरिकशा चला सकता हूं,’’ राजू बोला, तो रानो हंस दी. राजू ने उस के मन को छू लिया था. अब रानो राजू के आटोरिकशे को ही अपने आनेजाने के लिए इस्तेमाल करती थी. राजू को अब कुछ की जगह बहुत सारे पैसे मिलने लगे. बड़ीबड़ी पार्टियों में उस का आनाजाना होने लगा.

रानो के मना करने के बावजूद राजू नहीं माना और इस बात पर अड़ा रहा कि वह उस से प्यार करता है. उस दिन पता नहीं क्या हुआ. रानो होटल में गई, मगर कुछ ही देर में गुस्से से भरी हुई बाहर निकली. राजू का आटोरिकशा उसे वहीं खड़ा मिला.

‘‘तुम गए नहीं अब तक?’’ रानो ने आटोरिकशे में बैठते हुए गुस्से से कहा. ‘‘पता नहीं क्यों आज मन नहीं हुआ जाने का,’’ राजू बोला.

‘‘घर ले चलो,’’ आज रानो पहली बार इतनी जल्दी घर जा रही थी. आटोरिकशे से उतरने के बाद रानो अपनी बिल्डिंग में जाने लगी, तभी उस ने देखा कि राजू भी उस के पीछेपीछे आ रहा है.

‘‘तुम को घर नहीं जाना है क्या?’’ रानो ने पूछा. ‘‘नहीं, आज तुम्हारे पास रुकने का मन है.’’

‘‘अच्छा…’’ कह कर रानो आगे बढ़ गई. वह बड़े से घर में अकेले रहती थी. घर में घुसते ही रानो ने अपनी ड्रैस ऐसे उतारी, जैसे वह इस ड्रैस से खूब नाराज हो. उसे यह भी खयाल नहीं आया कि आज उस के साथ कोई और भी आया है.

राजू बड़ीबड़ी आंखों से रानो को कपड़े उतारते देख रहा था. उस ने पीले रंग की ड्रैस पहनी थी, जो उस ने अभीअभी उतारी थी. अब उस के भरे हुए सीने पर काले रंग की ब्रा दिख रही थी, जिस से उस का हुस्न जितना ढका हुआ था, उस से ज्यादा दिख रहा था. यह देख राजू के मुंह में पानी आ गया. उस से रहा नहीं गया और उस ने रानो के पूरे जिस्म पर अपनी नजर दौड़ा दी. पूरी औरत तो लगती थी रानो.

रानो सोफे पर ऐसे बैठ गई, मानो उसे राजू से कोई शर्म नहीं आ रही थी. ‘‘कुछ खाओगे?’’ पूछ कर रानो ने राजू का ध्यान भंग किया.

राजू ने भी कह दिया, ‘‘हां.’’ राजू इस वक्त रानो की खुली जांघों को घूर रहा था, जो एकदूसरे पर चढ़ी हुई थीं. रानो को उस ने पहली बार इतना खुल कर देखा था.

रानो की तरफ से कोई मनाही न देख उस का हौसला बढ़ गया और वह रानो के पास बैठ गया. रानो ने अपनी आंखें बंद कर लीं. राजू ने उस के होंठों को अपनी उंगली से छुआ. फिर उस ने रानो के पूरे जिस्म को अपनी उंगली से छुआ. राजू को अपने पास पा कर रानो बहुत खुश थी.

अब यह सिलसिला बहुत तेजी से आगे बढ़ने लगा. दोनों एकदूसरे की बांहों में घंटों पड़े रहते. अपने धंधे के बाद भी रानो अब खुश रहने लगी थी. उस का बड़ेबड़े अमीरों से वास्ता पड़ता था. बड़ेबड़े लोग भी अजीब शौक रखते हैं और ऐसे ही एक अजीब शौक को पूरा करने के लिए रानो जैसी किन्नरों की जरूरत पड़ती है.

रानो बस कहने को किन्नर थी, वरना उस के हुस्न के आगे अच्छीअच्छी लड़कियां पानी भरें. यही वजह थी कि उसे उस के काम के औरों से ज्यादा पैसे मिलते थे. इतनी कम उम्र में उस ने इतना पैसा कमा लिया था कि उसे पैसे से अब कोई मोह नहीं रह गया था. मगर जब रानो पूरी तरह राजू के प्यार में गिरफ्त हो गई, तब राजू के मन में लालच आ गया. अब वह किसी न किसी काम के बहाने उस से पैसे मांगने लगा था.

रानो ने पहले मना नहीं किया. राजू के ऊपर खूब पैसे लुटाए. मगर लालच का पेट इतना बड़ा होता है कि बड़े से बड़ा खजाना भी खाली हो जाए. फिर एक दिन रानो की दौलत भी कम पड़ गई. रानो ने बहुत समझाया, मगर राजू को बात समझ नहीं आई. आखिर में रानो ने साफसाफ कह दिया कि अब वह पैसे नहीं दे सकती. मगर तब तक राजू के मन में शैतान आ चुका था. रानो के पास बहुत पैसा था और राजू उस के सारे भेद जान चुका था.

राजू ने पूरी योजना बनाई और एक दिन रानो के पास पहुंचा और कहा कि उसे उस की बात समझ में आ गई है. रानो बहुत खुश हुई. दोनों में प्यार हुआ. इस के बाद उन्होंने खाना खाया. फिर प्यार हुआ.

जब रानो एकदम मस्त हो गई, तब राजू ने उस की हसरत भी पूरी की. राजू ने रानो की पीठ सहलाते हुए उस के बालों को आगे की तरफ सरका दिया, जिस से रानो को अब फर्श के सिवा कुछ नहीं दिख रहा था. रानो के बाल बहुत घने थे. जब भी वह घर में बिना कपड़ों के रहती, अपने बालों को संवारती रहती. उसे आईने में अपने उभारों को देखना अच्छा लगता था. फिर लंबे काले बालों से अपने गोरेगोरे उभारों को ढकती थी.

कभीकभी तो राजू के सामने भी वह ऐसा करती थी. क्या करती, प्यार में पड़ गई थी न. रानो के शरीर में बस एक ही कमी थी कि वह औरत हो कर भी औरत नहीं थी. वह राजू को एक औरत का सुख देना चाहती थी. राजू ने रानो को महसूस नहीं होने दिया था कि वह एक किन्नर है. वह उसे एक लड़की की ही नजर से देखता था.

रानो अब उस के सामने पूरी कोशिश करती कि एक लड़की ही दिखे. कपड़े भी उस ने शरीफ लड़कियों वाले खरीद लिए थे. जब वह राजू के साथ बाहर निकलती, तो सब देखते रह जाते. रानो ने राजू को अपना पति ही मान लिया था और उसे खुश रखने की भरपूर कोशिश करती थी. आज भी रानो बहुत खुश थी कि राजू ने उस की बात मान ली है. पैसे की उस के पास कमी नहीं थी. वह बस राजू के मन से लालच दूर कर देना चाहती थी.

इस वक्त भी रानो और राजू प्यार करने में मस्त थे. अपने घने बालों की वजह से रानो को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. तभी राजू ने जेब से चाकू निकाला और रानो की छाती में एक जोरदार वार किया. रानो चीखती हुई निढाल हो कर फर्श पर गिर पड़ी. थोड़ी देर में उस की मौत हो गई. घर में जितनी भी दौलत थी, राजू ले कर फरार हो गया.

मिस्टर बेचारा : कैसा था उस लड़की का खुमार?

दरवाजा खुला. जिस ने दरवाजा खोला, उसे देख कर चंद्रम हैरान रह गया. वह अपने आने की वजह भूल गया. वह उसे ही देखता रह गया.

वह नींद में उठ कर आई थी. आंखों में नींद की खुमारी थी. उस के ब्लाउज से उभार दिख रहे थे. साड़ी का पल्लू नीचे गिरा जा रहा था. उस का पल्लू हाथ में था. साड़ी फिसल गई. इस से उस की नाभि दिखने लगी. उस की पतली कमर मानो रस से भरी थी.

थोड़ी देर में चंद्रम संभल गया, मगर आंखों के सामने खुली पड़ी खूबसूरती को देखे बिना कैसे छोड़ेगा? उस की उम्र 25 साल से ऊपर थी. वह कुंआरा था. उस के दिल में गुदगुदी सी पैदा हुई.

वह साड़ी का पल्लू कंधे पर डालते हुए बोली, ‘‘आइए, आप अंदर आइए.’’

इतना कह कर वह पलट कर आगे बढ़ी. पीछे से भी वह वाकई खूबसूरत थी. पीठ पूरी नंगी थी.

उस की चाल में मादकता थी, जिस ने चंद्रम को और लुभा दिया था. उस औरत को देखने में खोया चंद्रम बहुत मुश्किल से आ कर सोफे पर बैठ गया. उस का गला सूखा जा रहा था.

उस ने बहुत कोशिश के बाद कहा, ‘‘मैडम, यह ब्रीफकेस सेठजी ने आप को देने को कहा है.’’

चंदम ने ब्रीफकेस आगे बढ़ाया.

‘‘आप इसे मेज पर रख दीजिए. हां, आप तेज धूप में आए हैं. थोड़ा ठंडा हो जाइएगा,’’ कहते हुए वह साथ वाले कमरे में गई और कुछ देर बाद पानी की बोतल, 2 कोल्ड ड्रिंक ले आई और चंद्रम के सामने वाले सोफे पर बैठ गई.

चंद्रम पानी की बोतल उठा कर सारा पानी गटागट पी गया. वह औरत कोल्ड ड्रिंक की बोतल खोलने के लिए मेज के नीचे रखे ओपनर को लेने के लिए झुकी, तो फिर उस का पल्लू गिर गया और उभार दिख गए. चंद्रम की नजर वहीं अटक गई.

उस औरत ने ओपनर से कोल्ड ड्रिंक खोलीं. उन में स्ट्रा डाल कर चंद्रम की ओर एक कोल्ड ड्रिंक बढ़ाई.

चंद्रम ने बोतल पकड़ी. उस की उंगलियां उस औरत की नाजुक उंगलियों से छू गईं. चंद्रम को जैसे करंट सा लगा.

उस औरत के जादू और मादकता ने चंद्रम को घायल कर दिया था. वह खुद को काबू में न रख सका और उस औरत यानी अपनी सेठानी से लिपट गया. इस के बाद चंद्रम का सेठ उसे रोजाना दोपहर को अपने घर ब्रीफकेस दे कर भेजता था. चंद्रम मालकिन को ब्रीफकेस सौंपता और उस के साथ खुशीखुशी हमबिस्तरी करता. बाद में कुछ खापी कर दुकान पर लौट आता. इस तरह 4 महीने बीत गए.

एक दोपहर को चंद्रम ब्रीफकेस ले कर सेठ के घर आया और कालबेल बजाई, पर घर का दरवाजा नहीं खुला. वह घंटी बजाता रहा. 10 मिनट के बाद दरवाजा खुला.

दरवाजे पर उस की सेठानी खड़ी थी, पर एक आम घरेलू औरत जैसी. आंचल ओढ़ कर, घूंघट डाल कर.

उस ने चंद्रम को बाहर ही खड़े रखा और कहा, ‘‘चंद्रम, मुझे माफ करो. हमारे संबंध बनाने की बात सेठजी तक पहुंच गई है. वे रंगे हाथ पकड़ेंगे, तो हम दोनों की जिंदगी बरबाद हो जाएगी.

‘‘हमारी भलाई अब इसी में है कि हम चुपचाप अलग हो जाएं. आज के बाद तुम कभी इस घर में मत आना,’’ इतना कह कर सेठानी ने दरवाजा बंद कर दिया.

चंद्रम मानो किसी खाई में गिर गया. वह तो यह सपना देख रहा था कि करोड़पति सेठ की तीसरी पत्नी बांहों में होगी. बूढ़े सेठ की मौत के बाद वह इस घर का मालिक बनेगा. मगर उस का सपना ताश के पत्तों के महल की तरह तेज हवा से उड़ गया. ऊपर से यह डर सता रहा था कि कहीं सेठ उसे नौकरी से तो नहीं निकाल देगा. वह दुकान की ओर चल दिया.

सेठानी ने मन ही मन कहा, ‘चंद्रम, तुम्हें नहीं मालूम कि सेठ मुझे डांस बार से लाया था. उस ने मुझ से शादी की और इस घर की मालकिन बनाया. पर हमारे कोई औलाद नहीं थी. मैं सेठ को उपहार के तौर पर बच्चा देना चाहती थी. सेठ ने भी मेरी बात मानी. हम ने तुम्हारे साथ नाटक किया. हो सके, तो मुझे माफ कर देना.’ इस के बाद सेठानी ने एक हाथ अपने बढ़ते पेट पर फेरा. दूसरे हाथ से वह अपने आंसू पोंछ रही थी.

बेवफाई: नैना को कैसे हुआ अपनी गलती का अहसास

नैना रसोईघर में रात का खाना पकाने की तैयारी कर रही थी. उस के मोबाइल फोन पर काल आ रहा था. रिंगटोन नहीं बजे, इसलिए उस ने मोबाइल फोन को साइलैंट मोड पर रखा था. वह नहीं चाहती थी कि उस के पति मुकेश को काल करने वाले के बारे में पता चले.

नैना ने मोबाइल फोन उठा कर देखा तो पाया कि उस का आशिक दीपक काल कर रहा था. हालांकि वह अभी उसे कुछ दिन तक काल करने से मना कर चुकी थी, फिर भी उस का बारबार काल आ रहा था. वह मुकेश के डर से कई दिनों से उस का काल नहीं रिसीव कर पा रही थी.

मुकेश कई सालों से गुजरात में प्राइवेट नौकरी कर रहा था. वह 3 महीने पहले घर वापस आ चुका था. कोरोना के वायरस से जितना लोगों को नुकसान नहीं हो रहा था, उस से ज्यादा नैना के लिए उस के पति की घर वापसी से आफत आई हुई थी. वह अपने आशिक दीपक से बात नहीं कर पा रही थी.

जब मुकेश कमाने के लिए गुजरात चला गया था, तो वह लंबे समय तक घर नहीं आ पाया था. वह पैसा मोबाइल से ही ट्रांसफर कर देता था. ऐसे में उसे अकेले ही घर में अकेले जिंदगी गुजारनी पड़ रही थी.

घर में नैना की एकमात्र सास थीं, जो काफी बूढ़ी हो चुकी थीं. वे अकसर बीमार रहती थीं. घर में 2 छोटेछोटे बच्चे होने के चलते उसे ही बाजार से सब्जी और घर के लिए जरूरी सामान लाना पड़ रहा था.

उस दिन दीपक शहर से पढ़ाई कर अपने बाइक से गांव की ओर लौट रहा था, तो नैना पैदल ही भारी थैले उठा कर पास के बाजार से वापस आ रही थी. तभी दीपक की नजर नैना पर पड़ी थी. वह पहले से नैना को जानता था, लेकिन उस से कभी भी बात करने का मौका नहीं मिला था.

नैना को देखते ही दीपक पहचान गया था, इसलिए वह बड़े प्यार से बोला था, ‘भाभीजी, आइए बैठ जाइए. अभी आटोरिकशा नहीं मिल पाएगा. वैसे, आप मुकेश भाई साहब की घरवाली हो न?’

‘हां…’ नैना सिर्फ इतना ही बोल पाई थी. वह दीपक के बारे में नहीं जानती थी, लेकिन उसे अंदाजा था कि इस रास्ते पर जाने वाला कोई न कोई उस के गांव का ही होगा, क्योंकि यह रास्ता सिर्फ उस के गांव की ओर जाता था.

‘बैठिए, आप को घर तक छोड़ देता हूं,’ दीपक उसे ऊपर से नीचे तक देख कर बोला था. दीपक की उस के ब्लाउज से झांकते उभारों पर नजर पड़ी, तो उस का जोश बढ़ने लगा था. वह उसे एकटक देखने लगा था.

दीपक ने थैले को पीछे बाइक पर बांध दिया था, इसलिए सीट पर थोड़ी सी जगह बच पाई थी. यही वजह थी कि नैना को दीपक से चिपक कर बैठना पड़ा था, इसलिए दीपक को उस के उभारों का दबाव महसूस हो रहा था.

वैसे, नैना को भी अच्छा लग रहा था कि इतनी दूर भारी थैले के साथ पैदल चलने से वह बच गई थी.

बाइक से उतारने के बाद दीपक ने नैना का मोबाइल नंबर मांग लिया था. वह न चाहते हुए भी अपना मोबाइल नंबर देने से इनकार नहीं कर सकी थी.

दीपक ने 1-2 बार हालचाल के बहाने नैना से बातचीत शुरू की और कुछ दिन में ही हंसीमजाक पर भी उतर आया था. धीरेधीरे मोबाइल फोन से बातचीत होने के चलते उन दोनों में खुल कर बातें होने लगी थीं.

थोड़े दिनों के बाद उन दोनों के बीच बातचीत इतनी हद तक बढ़ गई थी कि जब नैना की सास गहरी नींद में सो जाती थीं, तो वह दीपक को चुपके से बुला कर कई बार मजे ले चुकी थी. अब वह दीपक के बगैर नहीं रह पा रही थी.

लेकिन कोरोना काल के दौरान नैना का पति मुकेश काम छोड़ कर घर वापस आ गया था. तब से वह नौकरी पर लौटने का नाम ही नहीं ले रहा था, जबकि दीपक नैना से नहीं मिलने के चलते काफी बेताब था और कई बार फोन कर चुका था.

अभी नैना रसोईघर में खाना बनाने की तैयारी कर रही थी और मुकेश अपने कमरे में टैलीविजन पर पुराना क्रिकेट मैच शो देखने में बिजी था, इसलिए उसे दीपक का काल उठाने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई थी. वह मोबाइल कानों से लगा कर धीरे से बोली, ‘‘हैलो…’’

दूसरी तरफ से दीपक बोला, ‘नैना डार्लिंग, क्या हालचाल है?’

‘‘सब ठीकठाक है. तुम अपना हाल बताओ…’’

‘तुम मुझ से बात भी नहीं कर रही हो. जब से तुम्हारा पति आया है, तुम एक बार भी नहीं मिली हो. कब तक तुम्हारा पति घर पर कुंडली मार कर बैठा रहेगा?

‘मैं तुम से मिलने के लिए बेचैन हो रहा हूं. अब मेरा मन नहीं मान रहा है. मैं तुम्हारे सुंदर हुस्न का दीदार करना चाहता हूं. तुम मिलने का कोई इंतजाम करो, वरना मैं तुम्हारे घर पहुंच जाऊंगा.’

‘‘ऐसा बिलकुल भी मत करना, वरना हम दोनों कहीं के नहीं रहेंगे. मेरी बात ध्यान से सुनो. मैं 1-2 दिन के लिए अपने पति को कहीं भेजने का उपाय सोचती हूं, फिर तुम्हें बुला लूंगी. तब सारे अरमान पूरे कर लेना,’’ नैना ने इतना कह कर फोन काट दिया.

नैना का शातिर दिमाग काम नहीं कर पा रहा था कि आखिर वह अपने पति को कहां भेजे? उसे कोई तरकीब नजर नहीं आ रही थी.

आज जब नैना बिस्तर पर सोने गई, तो मुकेश से बोली, ‘‘आप कब तक घर में बैठे रहेंगे? कोरोना महामारी धीरेधीरे कम हो रही है. अब कमाने के लिए बाहर जाइए. आखिर घर का खर्चा कैसे चलेगा?

‘‘आप तकरीबन 3 महीने से घर बैठे हुए हैं. घर के सारे रुपए और सामान खत्म हो गया है. ऐसे बैठे रहेंगे, तो भोजन का इंतजाम कहां से होगा?’’

मुकेश तुनक कर बोला, ‘‘देखो, मैं ने बहुत दिनों तक बाहर नौकरी कर ली. अब मैं सोचता हूं कि क्यों न घर पर ही कोई धंधा कर लूं. इस से तुम्हारे और बच्चों के साथ रहने का भरपूर मौका भी मिलेगा. बाहर प्राइवेट नौकरी करने में कितनी परेशानी है, यह मैं ही जानता हूं.’’

‘‘वह सब तो ठीक है, लेकिन घर पर कौन सा धंधा करने वाले हो? धंधा करने के लिए मोटी रकम की जरूरत होती है. बिना पैसे के तो धंधा हो नहीं सकता है. क्या उस धंधे से हम लोगों का गुजारा हो जाएगा? यह सब विचार कर लेना भी जरूरी है.’’

‘‘हां, वह सब तो ठीक है, उसी पर तो मैं सोचविचार कर रहा हूं,’’ मुकेश ने चिंता जाहिर करते हुए जवाब दिया.

‘‘और दूसरी बात यह है कि आप बाहर रहते हो, तो मैं अपनी बिरादरी की औरतों में गर्व से कहती हूं कि मेरा आदमी बाहर नौकरी करता है. आप जब घर में रहने लगोगे, तो दूसरे पतियों की तरह घर की मुरगी दाल बराबर हो जाओगे.

‘‘आप की गांव में इज्जत कम हो जाएगी और यह मुझे अच्छा नहीं लगेगा,’’ कहते हुए नैना मुकेश के सीने से चिपक गई.

मुकेश नैना को अपनी बांहों में कसते हुए सोचने लगा कि यह सही कह रही है. वह अपना धंधा करने के लिए सोच तो जरूर रहा था, लेकिन अभी तय नहीं कर पा रहा था कि किस धंधे को किया जाए? कोई भी धंधा करने में काफी रुपए की जरूरत होती है और उस के पास जमापूंजी भी नहीं थी.

इसी बीच नैना नकली गुस्सा जाहिर करते हुए बोली, ‘‘आप को जो करना है, वही कीजिए,’’ फिर उस ने मुंह फेरा और चादर ओढ़ कर सो गई.

अगले दिन मुकेश बाहर से घूमघाम कर आया, तो उस ने नैना को बताया, ‘‘मैं दोबारा गुजरात जा रहा हूं. आज मैं ने अपने फैक्टरी मालिक से बात की थी. वह मुझे काम देने को तैयार हो गया है. वह कह रहा था कि काम शुरू हो गया है.

‘‘सभी कामगारों को फोन कर के बुलाया जा रहा है. इतना ही नहीं, मेरा मालिक मुझे कुछ पैसे बढ़ा कर भी देने के लिए राजी हो गया है.’’

‘‘यह तो अच्छी बात है… लेकिन जाना कब है?’’

‘‘मुझे आज ही निकलना पड़ेगा, वरना फिर ट्रेन 2 दिन बाद ही मिलेगी…’’

यह सब सुन कर नैना मन ही मन बहुत खुश हुई. अब वह अपने पति को गुजरात भेजने की तैयारी करने लगी. वह खुशीखुशी रसोईघर में जा कर रास्ते के लिए भोजन तैयार कर देना चाहती थी.

जब नैना रसोईघर की तरफ जाने के लिए मुड़ी, तो मुकेश ने प्यार से उस की कलाई पकड़ कर अपने सीने से लगा लिया और मनुहार करते हुए बोला, ‘‘छोड़ो खानापीना. वह तो रास्ते में मिल ही जाएगा, लेकिन तुम्हारा साथ तो नहीं मिलेगा न, इसलिए जाने से पहले मैं कुछ घंटे तुम्हारे साथ बिता लेना चाहता हूं…’’

यह कहते हुए मुकेश ने नैना को बिस्तर पर लिटा दिया. वह भी उस के आगोश में समा गई. आज उसे अपने पति पर काफी प्यार आ रहा था. वह अंदर से बहुत खुश थी. खुशी से उस की आंखों से आंसू छलक पड़े.

मुकेश उस के आंसुओं को पोंछते हुए बोला, ‘‘तुम तो अभी से ही दुखी होने लगी. कहो तो मैं नहीं जाता हूं…’’

नैना ने अपने हाथों को मुकेश के होंठों पर रख दिया और प्यार से बोली, ‘‘आप भले ही मुझ से दूर जा रहे हो, लेकिन आप का दिल मेरे पास रहेगा…’’ फिर वे दोनों एकदूसरे से कस कर लिपट गए.

नैना के दिमाग में अपने आशिक दीपक की मर्दानगी का खेल भी चल रहा था.

दर्द का एहसास : क्या हुआ मृणाल की बेवफाई का अंजाम

‘‘हैलो, एम आई टौकिंग टु मिस्टर मृणाल?’’ एक मीठी सी आवाज ने मृणाल के कानों में जैसे रस घोल दिया.

‘‘यस स्पीकिंग,’’ मृणाल ने भी उतनी ही विनम्रता से जवाब दिया.

‘‘सर, दिस इज निशा फ्रौम होटल सन स्टार… वी फाउंड वालेट हैविंग सम मनी, एटीएम कार्ड ऐंड अदर इंपौर्टैंट कार्ड्स विद योर आईडैंटिटी इन अवर कौन्फ्रैंस हौल. यू आर रिक्वैस्टेड टु कलैक्ट इट फ्रौम रिसैप्शन, थैंक यू.’’

सुनते ही मृणाल की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वह कल अपनी कंपनी की तरफ से एक सेमिनार अटैंड करने इस होटल में गया था. आज सुबह से ही अपने पर्स को ढूंढ़ढूंढ़ कर परेशान हो चुका था. निशा की इस कौल ने उस के चेहरे पर सुकून भरी मुसकान ला दी.

‘‘थैंक यू सो मच निशाजी…’’ मृणाल ने कहा, मगर शायद निशा ने सुना नहीं, क्योंकि फोन कट चुका था. लंच टाइम में मृणाल होटल सन स्टार के सामने था. रिसैप्शन पर बैठी खूबसूरत लड़की को देखते ही उस के चेहरे पर एक बार फिर मुसकान आ गई.

‘‘ऐक्सक्यूज मी, माइसैल्फ मृणाल… आप शायद निशाजी हैं…’’ मृणाल ने कहा तो निशा ने आंखें उठा कर देखा.

‘‘ओ या…’’ कहते हुए निशा ने काउंटर के नीचे से मृणाल का पर्स निकाल कर उस का फोटो देखा. तसल्ली करने के बाद मुसकराते हुए उसे सौंप दिया.

‘‘थैंक्स अगेन निशाजी… इफ यू डोंटमाइंड, कैन वी हैव ए कप औफ कौफी प्लीज…’’ मृणाल निशा का यह एहसान उतारना चाह रहा था.

‘‘सौरी, इट्स ड्यूटी टाइम… कैच यू लेटर,’’ कहते हुए निशा ने जैसे मृणाल को भविष्य की संभावना का हिंट दे दिया.

‘‘ऐज यू विश. बाय द वे, क्या मुझे आप का कौंटैक्ट नंबर मिलेगा? ताकि मैं आप को कौफी के लिए इन्वाइट कर सकूं?’’ मृणाल ने उस की आंखों में झांकते हुए कहा तो निशा ने अपना विजिटिंग कार्ड उस की तरफ बढ़ा दिया. मृणाल ने थैंक्स कहते हुए निशा से हाथ मिलाया और कार्ड को पर्स में डालते हुए होटल से बाहर आ गया.

‘‘कोई मिल गया… मेरा दिल गया… क्या बताऊं यारो… मैं तो हिल गया…’’ गुनगुनाते हुए मृणाल ने घर में प्रवेश किया तो उषा को बड़ा आश्चर्य हुआ. रहा नहीं गया तो आखिर पूछ ही लिया, ‘‘क्या बात है, बड़ा रोमांटिक गीत गुनगुना रहे हैं? ऐसा कौन मिल गया?’’

‘‘लो, अब गुनगुनाना भी गुनाह हो गया?’’ मृणाल ने खीजते हुए कहा.

‘‘गुनगुनाना नहीं, बल्कि आप से तो आजकल कुछ भी पूछना गुनाह हो गया,’’ उषा ने भी झल्ला कर कहा.

‘‘जब तक घर से बाहर रहते हैं, चेहरा 1000 वाट के बल्ब सा चमकता रहता है, घर में घुसते ही पता नहीं क्यों फ्यूज उड़ जाता है,’’ मन ही मन बड़बड़ाते हुए उषा चाय बनाने चल दी.

चाय पी कर मृणाल ने निशा का कार्ड जेब से निकाल कर उस का नंबर अपने मोबाइल में सेव कर लिया. फिर उसे व्हाट्सऐप पर एक मैसेज भेजा, ‘हाय दिस इज मृणाल…

हम सुबह मिले थे… आई होप कि आगे भी मिलते रहेंगे…’

रातभर इंतजार करने के बाद अगली सुबह रिप्लाई में गुड मौर्निंग के साथ निशा की एक स्माइली देख कर मृणाल खुश हो गया.

औफिस में फ्री होते ही मृणाल ने निशा को फोन लगाया. थोड़ी देर हलकीफुलकी औपचारिक बातें करने के बाद उस ने फोन रख दिया. मगर यह कहने से नहीं चूका कि फुरसत हो तो कौल कर लेना.

शाम होतेहोते निशा का फोन आ ही गया. मृणाल ने मुसकराते हुए कौल रिसीव की, ‘‘कहिए हुजूर कैसे मिजाज हैं जनाब के?’’ मृणाल की आवाज में रोमांस घुला था.

निशा ने भी बातों ही बातों में अपनी अदाओं के जलवे बिखेरे जिन में एक बार फिर मृणाल खो गया. लगभग 10 दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा. दोनों एकदूसरे से अब एक हद तक खुल चुके थे.

आज मृणाल ने हिम्मत कर के निशा के सामने एक बार फिर कौफी पीने का प्रस्ताव रखा जिसे निशा ने स्वीकार लिया. हालांकि मन ही मन वह खुद भी उस का सान्निध्य चाहने लगी थी. अब तो हर 3-4 दिन में कभी निशा मृणाल के औफिस में तो कभी मृणाल निशा के होटल में नजर आने लगा था.

2 महीने हो चले थे. निशा मृणाल की बोरिंग जिंदगी में एक ताजा हवा के झौंके की तरह आई और देखते ही देखते अपनी खुशबू से उस के सारे वजूद को अपनी गिरफ्त में ले लिया. मृणाल हर वक्त महकामहका सा घूमने लगा. पहले तो सप्ताह या 10 दिन में वह अपनी शारीरिक जरूरतों के लिए उषा के नखरे भी उठाया करता था, मगर जब से निशा उस की जिंदगी में आई है उसे उषा से वितृष्णा सी होने लगी थी. वह खयालों में ही निशा के साथ अपनी जरूरतें पूरी करने लगा था. बस उस दिन का इंतजार कर रहा था जब ये खयाल हकीकत में ढलेंगे.

दिनभर पसीने से लथपथ, मुड़ेतुड़े कपड़ों और बिखरे बालों में दिखाई देती उषा उसे अपने मखमल से सपनों में टाट के पैबंद सी लगने लगी. उषा भी उस के उपेक्षापूर्ण रवैए से तमतमाई सी रहने लगी. कुल मिला कर घर में हर वक्त शीतयुद्ध से हालात रहने लगे. उषा और मृणाल एक बिस्तर पर सोते हुए भी अपने बीच मीलों का फासला महसूस करने लगे थे. मृणाल का तो घर में जैसे दम ही घुटने लगा था.

अब मृणाल और निशा को डेटिंग करते हुए लगभग 3 महीने हो चले थे. आजकल मृणाल कभीकभी उस के मैसेज बौक्स में रोमांटिक शायरीचुटकुले आदि भी भेजने लगा था. जवाब में निशा भी कुछ इसी तरह के मैसेज भेज देती थी, जिन्हें पढ़ कर मृणाल अकेले में मुसकराता रहता. कहते हैं कि इश्क और मुश्क यानी प्यार और खुशबू छिपाए नहीं छिपते. उषा को भी मृणाल का यह बदला रूप देख कर उस पर कुछकुछ शक सा होने लगा था. एक दिन जब मृणाल बाथरूम में था, उषा ने उस का मोबाइल चैक किया तो निशा के मैसेज पढ़ कर दंग रह गई.

गुस्से में तमतमाई उषा ने फौरन उसे आड़े हाथों लेने की सोची, मगर फिर कुछ दिन और इंतजार करने और पुख्ता जानकारी जुटाने का खयाल कर के अपना इरादा बदल दिया और फोन वापस रख कर सामान्य बने रहने का दिखावा करने लगी जैसे कुछ हुआ ही नहीं.

एक दिन मृणाल के औफिस की सालाना गैटटुगैदर पार्टी में उस की सहकर्मी रजनी ने उषा से कहा, ‘‘क्या बात है उषा आजकल पति को ज्यादा ही छूट दे रखी है क्या? हर वक्त आसमान में उड़ेउड़े से रहते हैं.’’

‘‘क्या बात हुई? मुझे कुछ भी आइडिया नहीं है… तुम बताओ न आखिर क्या चल रहा है यहां?’’ उषा ने रजनी को कुरेदने की कोशिश की.

‘‘कुछ ज्यादा तो पता नहीं, मगर लंच टाइम में अकसर किसी का फोन आते ही मृणाल औफिस से बाहर चला जाता है. एक दिन मैं ने देखा था… वह एक खूबसूरत लड़की थी,’’ रजनी ने उषा के मन में जलते शोलों को हवा दी.

उषा का मन फिर पार्टी से उचट गया. घर पहुंचते ही उषा ने मृणाल से सीधा सवाल किया, ‘‘रजनी किसी लड़की के बारे में बता रही थी… कौन है वह?’’

‘‘है मेरी एक दोस्त… क्यों, तुम्हें कोई परेशानी है क्या?’’ मृणाल ने प्रश्न के बदले प्रश्न उछाला.

‘‘मुझे भला क्या परेशानी होगी? जिस का पति बाहर गुलछर्रे उड़ाए, उस पत्नी के लिए तो यह बड़े गर्व की बात होगी न…’’ उषा ने मृणाल पर ताना कसा.

‘‘कभी तुम ने अपनेआप को शीशे में देखा है? अरे अच्छेभले आदमी का मूड खराब करने के लिए तुम्हारा हुलिया काफी है. अब अगर मैं निशा के साथ थोड़ा हंसबोल लेता हूं तो तुम्हारे हिस्से का क्या जाता है?’’ मृणाल अब आपे से बाहर हो चुका था.

‘‘मेरे हिस्से में था ही क्या जो जाएगा… जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो किसी और को क्या दोष दिया जाए…’’ उषा ने बात आगे बढ़ाना उचित नहीं समझा और कमरे की लाइट बंद कर के सो गई.

इस शनिवार को निशा का जन्मदिन था. मृणाल ने उस से खास अपने लिए 2-3 घंटे का टाइम मांगा था जिसे निशा ने इठलाते हुए मान लिया था. सुबह 11 बजे होटल सन स्टार में ही उन का मिलना तय हुआ. उत्साह और उत्तेजना से भरा मृणाल निर्धारित समय से पहले ही होटल पहुंच गया था. निशा उसे एक वीआईपी रूम में ले कर गई. बुके के साथ मृणाल ने उसे ‘हैप्पी बर्थडे’ विश किया और एक हलका सा चुंबन उस के गालों पर जड़ दिया. मृणाल के लिए यह पहला अवसर था जब उस ने निशा को टच किया था. निशा ने कोई विरोध नहीं किया तो मृणाल की हिम्मत कुछ और बढ़ी. उस ने निशा को बांहों के घेरे में कस कर होंठों को चूम लिया. निशा भी शायद आज पूरी तरह समर्पण के मूड में थी. थोड़ी ही देर में दोनों पूरी तरह एकदूसरे में समा गए.

होटल के इंटरकौम पर रिंग आई तो दोनों सपनों की दुनिया से बाहर आए. यह रूम शाम को किसी के लिए बुक था, इसलिए अब उन्हें जाना होगा. हालांकि मृणाल निशा की जुल्फों की कैद से आजाद नहीं होना चाह रहा था, क्योंकि आज जो आनंद उस ने निशा के समागम से पाया था वह शायद उसे अपने 10 साल के शादीशुदा जीवन में कभी नहीं मिला था. जातेजाते उस ने निशा की उंगली में अपने प्यार की निशानीस्वरूप एक गोल्ड रिंग पहनाई. एक बार फिर उसे किस किया और पूरी तरह संतुष्ट हो दोनों रूम से बाहर निकल आए.

अब तो दिनरात कौल, मैसेज, व्हाट्ऐप, चैटिंग… यही सब चलने लगा. बेकरारी हद से ज्यादा बढ़ जाती थी तो दोनों बाहर भी मिल लेते थे. इतने पर भी चैन न मिले तो महीने में 1-2 बार होटल सन स्टार के किसी खाली कमरे का उपयोग भी कर लेते थे.

निशा के लिए मृणाल की दीवानगी बढ़ती ही जा रही थी. हर महीने उस की सैलरी का एक बड़ा हिस्सा निशा पर खर्च होने लगा था. नतीजतन घर में हर वक्त आर्थिक तंगी रहने लगी. उषा ने कई बार उसे समझाने की कोशिश की, समाज में रहने के कायदे भी बताए, मगर मृणाल तो जैसे निशा के लिए हर रस्मरिवाज तोड़ने पर आमादा था. ज्यादा विरोध करने पर कहीं बात तलाक तक न पहुंच जाए, यही सोच कर पति पर पूरी तरह से आश्रित उषा ने इसे अपनी नियति मान कर सबकुछ वक्त पर छोड़ दिया और मृणाल की हरकतों पर चुप्पी साध ली.

सालभर होने को आया. मृणाल अपनी दोस्ती की सालगिरह मनाने की प्लानिंग करने लगा. मगर इन दिनों न जाने क्यों मृणाल को महसूस होने लगा था कि निशा का ध्यान उस की तरफ से कुछ हटने सा लगा है. आजकल उस के व्यवहार में पहले जैसी गर्मजोशी नहीं रही थी. कई बार तो वह उस का फोन भी काट देती. अकसर उस का फोन बिजी भी रहने लगा है. उस ने निशा से इस बारे में बात करने की सोची, मगर निशा ने अभी जरा बिजी हूं, कह कर उस का मिलने का प्रस्ताव टाल दिया तो मृणाल को कुछ शक हुआ.

एक दिन वह उसे बिना बताए उस के होटल पहुंच गया. निशा रिसैप्शन पर नहीं थी. वेटर से पूछने पर पता चला कि मैडम अपने किसी मेहमान के साथ डाइनिंगहौल में हैं. मृणाल उधर चल दिया. उस ने जो देखा वह उस के पैरों के नीचे से जमीन खिसकाने के लिए काफी था. निशा वहां सोफे पर अपने किसी पुरुष मित्र के कंधे पर सिर टिकाए बैठी थी. उस की पीठ हौल के दरवाजे की तरफ होने के कारण वह मृणाल को देख नहीं पाई.

मृणाल चुपचाप आ कर रिसैप्शन पर बने विजिटर सोफे पर बैठ कर निशा का इंतजार करने लगा. लगभग आधे घंटे बाद निशा अपने दोस्त का हाथ थामे नीचे आई तो मृणाल को यों अचानक सामने देख कर सकपका गई. फिर अपने दोस्त को विदा कर के मृणाल के पास आई.

‘‘मैं ये सब क्या देख रहा हूं?’’ मृणाल ने अपने गुस्से को पीने की भरपूर कोशिश की.

‘‘क्या हुआ? ऐसा कौन सा तुम ने दुनिया का 8वां आश्चर्य देख लिया जो इतना उबल रहे हो?’’ निशा ने लापरवाही से अपने बाल झटकते हुए कहा.

‘‘देखो निशा, मुझे यह पसंद नहीं… बाय द वे, कौन था यह लड़का? उस ने तुम्हारा हाथ क्यों थाम रखा था?’’ मृणाल अब अपने गुस्से को काबू नहीं रख पा रहा था.

‘‘यह मेरा दोस्त है और हाथ थामने से क्या मतलब है तुम्हारा? मैं क्या तुम्हारी निजी प्रौपर्टी हूं जो मुझ पर अपना अधिकार जता रहे हो?’’ अब निशा का भी पारा चढ़ने लगा था.

‘‘मगर तुम तो मुझे प्यार करती हो न? तुम्हीं ने तो कहा था कि मैं तुम्हारा पहला प्यार हूं…’’ मृणाल का गुस्सा अब निराशा में बदलने लगा था.

‘‘हां कहा था… मगर यह किस किताब में लिखा है कि प्यार दूसरी या तीसरी बार नहीं किया जा सकता? देखो मृणाल, यह मेरा निजी मामला है, तुम इस में दखल न ही दो तो बेहतर है. तुम मेरे अच्छे दोस्त हो और वही बने रहो तो तुम्हारा स्वागत है मेरी दुनिया में अन्यथा तुम कहीं भी जाने के लिए आजाद हो,’’ निशा ने उसे टका सा जवाब दे कर उस की बोलती बंद कर दी.

‘‘लेकिन वह हमारा रिश्ता… वे ढेरों बातें… वह मिलनाजुलना… ये तुम्हारे हाथ में मेरी अंगूठी… ये सब क्या इतनी आसानी से एक ही झटके में खत्म कर दोगी तुम? तुम्हारा जमीर तुम्हें धिक्कारेगा नहीं?’’ मृणाल अब भी हकीकत को स्वीकार नहीं कर पा रहा था.

‘‘क्यों, जमीर क्या सिर्फ मुझे ही धिक्कारेगा? जब तुम उषा को छोड़ कर मेरे पास आए थे तब क्या तुम्हारे जमीर ने तुम्हें धिक्कारा था? वाह, तुम करो तो प्यार… मैं करूं तो बेवफाई… अजीब दोहरे मानदंड हैं तुम्हारे… क्या अपनी खुशी ढूंढ़ने का अधिकार सिर्फ तुम पुरुषों के ही पास है? हम महिलाओं को अपने हिस्से की खुशी पाने का कोई हक नहीं?’’ निशा ने मृणाल को जैसे उस की औकात दिखा दी.

आज उसे उषा के दिल के दर्द का एहसास हो रहा था. वह महसूस कर पा रहा था उस की पीड़ा को. क्योंकि आज वह खुद भी दर्द के उसी काफिले से गुजर रहा था. मृणाल भारी कदमों से उठ कर घर की तरफ चल दिया जहां उषा गुस्से में ही सही, शायद अब भी उस के लौटने का इंतजार कर रही थी.

पहला प्यार चौथी बार : पहले प्यार की महिमा

मेरा भारत महान. और भी बड़ेबड़े देश हैं जो हम से ज्यादा विकसित, धनी, सुखी और समृद्ध हैं मगर फिर भी महान नहीं हैं. महान तो सिर्फ और सिर्फ मेरा भारत है.

प्राचीनकाल में तो मेरा भारत और ज्यादा महान था. गौरवशाली साम्राज्य, ईमानदार इतिहास, सच्ची वीर परंपराएं, समृद्ध शासक, विशाल नागरिक, सोने की चिडि़या और घीदूध की नदियां… लगता है कुछ घालमेल हो गया लेकिन ऐसा ही कुछकुछ हुआ करता था. मगर आज के समय में, टूटीफूटी परंपराएं, सड़ा हुआ देश, भ्रष्ट जनता, गरीब नेता, गड़बड़ भूगोल और इतिहास का पता नहीं. कुल मिला कर जोजो अच्छा है वह पुराने जमाने में हो चुका, अभी तो जो भी नया है सब सत्यानाश.

मुझे तो सख्त अफसोस होता है कि मैं आज के समय में क्यों हूं, भूतकाल में क्यों न हुआ? बस, यही सोच कर संतोष होता है कि अभी जोजो बुरा है वह भी प्राचीन होने के बाद अच्छा हो जाएगा. ऐसे में जबकि जिंदगी जिल्लत ही जिल्लत है और हर चीज की किल्लत ही किल्लत है, एक चीज यहां ऐसी है जो पहले बड़ी दुर्लभ हुआ करती थी मगर आज उस की भरमार है और वह है प्रेम.

जी हां, आज हमारे पास प्रेम हमेशा हाजिर स्टाक में उपलब्ध रहता है. उस जमाने में कभी 100-50 साल में कोई एक मजनूं और एकाध लैला भूलेभटके ही होती थी, जो आपस में प्यार करते थे और बाकी लोग अजूबे की तरह उन्हें देखते थे कि ये लोग कर क्या रहे हैं और आखिर कब तक ऐसा करते रहेंगे? जिन की समझ में नहीं आता था वे उन्हें पत्थर उठा कर मारने लगते थे और जो अहिंसावादी थे वे बैठ कर उन के प्रेम की कहानियां लिखते थे. मगर आज गलीकूचों में प्रेम की ब्रह्मपुत्र बह रही है. यहां की हर छोरी लैला हर छोरा मजनूं. गांवगांव, शहरशहर, यहां, वहां, जहां, तहां, मत पूछो कहांकहां हीररांझा छितरे पड़े हैं. डालडाल रोमियो हैं तो पातपात जूलियट. बिजली के खंभों पर, टेलीफोन के तारों पर, जगहजगह लैला और मजनूं उलटे लटके पड़े हैं जितने जी चाहे गुलेल मार कर तोड़ लो.

किसी से भी यह सवाल पूछो कि आजकल क्या कर रहे हो? तो जवाब मिलता है, ‘‘प्यार कर रहा हूं.’’ कोई कालिज की कैंटीन में तो कोई हवाई झूले में, कोई गली के पिछवाड़े तो कोई कंप्यूटर पर ही. इंटरनेट पर तो प्यार करना बड़ा आसान है. एक मेल, फीमेल को ई मेल करता है, बदले में फीमेल भी मेल को ई मेल करती है और दोनों का मेल हो जाता है. शादियां भी इंटरनेट पर ही तय हो जाती हैं. कुछ दिनों बाद तो उन दोनों को मिलने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी, कंप्यूटर पर ही डब्लूडब्लूडब्लू डाट मुन्नामुन्नी डाट काम हो जाएगा.

पहले एक शीरीं हुआ करती थी जो एक फरहाद से प्यार किया करती थी और वह कमअक्ल मरते दम तक उसी से प्यार करती थी. मुगल साम्राज्य के पतन के बाद से ले कर जितेंद्र, श्रीदेवी की फिल्मों तक प्रेम के त्रिकोण बनने लगे थे, जिस में एक जूलियट के पीछे 2 रोमियो एकसाथ बरबाद हो जाते थे या फिर 2 महीवाल एक ही सोहणी को गलत रास्ते पर ले जाने की कोशिश किया करते थे, मगर अब तो त्रिकोण भी बीती बात हो गई, आजकल तो प्रेम के षट्कोण बनते हैं यानी 1 लैला, अकेली 5-5 मजनुओं को अपने घर के चक्कर कटवाती है और अंत में उन सब को ठेंगा दिखा कर किसी फरहाद से शादी कर लेती है.

उस जमाने में एक पहली नजर का प्यार होता था जो वाकई पहली नजर में हो जाया करता था लेकिन अब किसे उस की फिक्र है. अब तो हर नजर, प्यार की नजर है. इसी तरह एक होता था ‘पहला प्यार’, जो जीवन में किसी एक से एक ही बार होता था और भुलाए नहीं भूलता था, मगर आजकल तो पहला प्यार ही कई बार हो जाता है. राज की बात यह है कि मुझे भी यह कमबख्त ‘पहला प्यार’ 4 बार हो चुका है और पिछले सीजन में जब यह मुझे चौथी बार हुआ तभी मैं समझ गया था कि यह भी आखिरी बार नहीं है. मतलब अभी तो यह अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है.

जिधर नजर डालो प्यार ही प्यार, नफरत का तो कहीं नामोनिशान नहीं. मुंबई की पूरी फिल्म इंडस्ट्री पिछले 100 साल से इसी प्रेम के दम पर दारूमुर्गा उड़ा रही है. हर फिल्म में और कुछ चाहे हो न हो, मगर 1 लड़का और 1 लड़की जरूर होते हैं जो अंत में कभी मिल पाते हैं कभी बिछड़ जाते हैं पर प्यार जरूर करते हैं.

100 साल से यही विचार चलता चला आ रहा है कि जिसे हम प्यार समझ रहे हैं क्या यही प्यार है? या फिर प्यार वह है जिसे हम प्यार नहीं समझ रहे हैं? जवान लड़का चाय की पत्ती लेने घर से निकला और कुत्तों के क्लीनिक में घुस गया, यह इश्क नहीं तो और क्या है? जवान लड़की, लड़के से शिकायत करती है, ‘‘दिल में दर्द रहता है, मुझे भूख नहीं लगती, प्यास नहीं लगती, सारा दिन तड़पती हूं, सारी रात जगती हूं, जाने क्या हुआ मुझ को…?’’

किसी पत्नी ने पति से कहा होता तो डाक्टर और अस्पताल के खर्च के बारे में सोच कर बेचारे का दिल बैठ जाता लेकिन प्रेमी का दिल खड़ा हो कर उछलने लगता है कि चलो, अपना जुगाड़ बैठ गया. उधर दर्शक भी समझ जाते हैं कि इसे ‘फाल इन लव’ कहते हैं. लड़का और लड़की प्यार में गिर गए, अब ये दोनों गिरी हुई हरकतें करेंगे. लड़की 16 साल और 1 दिन की हुई नहीं कि उसे मोहब्बत हो जाती है, कोईकोई तो साढ़े 15 साल में ही उंगली में दुपट्टा लपेटना शुरू कर देती है.

खुदा न खास्ता अगर किसी लड़के या लड़की की 17 साल उम्र हो जाने पर भी कोई लफड़ा नहीं हुआ तो फिल्मी मांबाप चिंतित हो जाते हैं कि ‘बच्चा’ कहीं असामान्य तो नहीं है और किसी अच्छे डाक्टर से चेकअप करवाने की जरूरत महसूस करने लगते हैं. लड़का जब अपने बाप को यह खबर सुनाता है कि उस का किसी पर दिल आ गया है तो बाप यों खुशी से उछल पड़ता है मानो उसे विदेश में पढ़ाई के लिए स्कालरशिप मिली हो. फिर वह उसे लड़की को भगाने के लिए प्रेरित करता है और जब लड़का, लड़की को ले भागता है तो वह गर्व से अपना सीना फुला कर कहता है, ‘आखिर बेटा किस का है?’

प्रेम के मामले में हो रही तरक्की के मद्देनजर आने वाले समय में हमारे घरों के अंदर के दृश्य बड़े मजेदार होंगे. आइए, जरा एकदो काल्पनिक दृश्यों का वास्तविक आनंद लें.

दृश्य : एक

कमरा वास्तुशास्त्र के अनुसार बना हुआ है. दक्षिणमुखी कमरे के बीचोबीच, वाममुखी सोफे पर चंद्रमुखी लड़की की सूरजमुखी मां और ज्वालामुखी बाप बैठे हैं. बाप परेशान है, ‘‘बात क्या है? तुम दोनों मांबेटी आखिर मुझ से क्या छिपा रही हो?’’

‘‘मैं क्या बताऊं? आप ही के लाड़प्यार ने इसे बिगाड़ा है और अब पूछते हो कि हुआ क्या, जब इस ने हमें कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा.’’

‘‘पहेलियां मत बुझाओ, साफसाफ बताओ कि इस ने क्या किया है?’’

‘‘और क्या करेगी? आज जब पड़ोस वाली मिसेज भटनागर ने मुझे ताना मारा तब मुझे पता चला कि इस कलमुंही का एक भी ब्वायफ्रेंड नहीं है. नाक कटा दी इस ने हमारी. शहर के लोग क्या सोचते होंगे हमारे बारे में कि कितने बैकवर्ड हैं हम लोग.

‘‘ऊपर से मिसेज भटनागर मुझे जलाने के लिए अपनी दोनों बेटियों को ले कर आई थीं और वह इतराएं भी क्यों न, आखिर उन की दोनों बेटियां अब तक 2-2 ब्वायफ्रेंड बदल चुकी हैं और इस करमजली के कारण आज मैं 40 प्रतिशत जली हूं.’’

‘‘क्यों बेटी, जो मैं सुन रहा हूं क्या यह सच है?’’

‘‘नहीं, डैड…हां, डैड…पता नहीं, डैड.’’

‘‘देखो, मुझे हां या ना में सीधा जवाब चाहिए. क्या बात है बेटी, क्या तुम्हें कोई लाइन नहीं मारता?’’

‘‘म…म…मारता है मगर उस के पास सेलफोन और बाइक नहीं है.’’

‘‘बस, इतनी सी बात. तुम उसे लाइन देना शुरू कर दो. सेलफोन मैं उसे प्रजेंट कर दूंगा और तुम उसे प्यार से समझाना कि वह एक बाइक आसान किश्तों में खरीद ले.’’

‘‘ल…लेकिन डैड…’’

‘‘लेकिनवेकिन कुछ नहीं. मैं कोई बहाना सुनना नहीं चाहता. अगली बार जब तुम मेरे सामने आओ तो अपने ब्वायफ्रेंड के साथ ही आना, अगर ऐसा नहीं हुआ तो आइंदा तुम घर के बाहर ही रहोगी. तुम्हारा खाना, पीना और कमरे के अंदर घुसना बिलकुल बंद.’’

दृश्य : दो

कमरे की स्थिति तनावपूर्ण पर नियंत्रण में है. बाप बेटे पर गरम हो रहा है. मां दोनों में बीचबचाव कराती है, ‘‘अजी, मैं कहती हूं जब देखो आप मेरे लाडले के पीछे ही पड़े रहते हैं, अब इस ने ऐसा क्या कर दिया?’’

‘‘अरे, मुझ से क्या पूछती हो, पूछो अपने इस लाडले से, 2 साल से कालिज में है पर आज तक एक लड़की नहीं पटा सका, ऊपर से जबान लड़ाता है कि मुझे पढ़ाई से फुर्सत नहीं. सुना तुम ने? मैं ही जानता हूं कि कैसे मैं अपना पेट काट- काट कर इस के लिए फीस जुटाता हूं. इसी की उम्र के और लड़के रात में 2-2 बजे लौटते हैं अपनी ‘डेट’ के साथ और यह महाशय, इन्हें पढ़ाई से फुर्सत नहीं है.’’

‘‘हाय राम, बेटा, मैं यह क्या सुन रही हूं. देखो, तुम तो खुद समझदार हो, यह पढ़ाईवढ़ाई की जिद छोड़ दो, उस के लिए तो सारी उम्र पड़ी है. यही समय है जब तुम लड़कियों पर ध्यान दे कर अपना भविष्य संवार सकते हो.’’

‘‘इस तरह प्यार से समझाने पर यह नहीं समझने वाला. इस कमबख्त के सिर पर तो कैरियर बनाने का भूत सवार है. यह क्या समझेगा मांबाप के अरमानों को. पिछले हफ्ते जानती हो इस ने क्या किया? इसे किताबों के लिए मैं ने पैसे भेजे तो ये उन से सचमुच में किताबें खरीद लाया, किताबी कीड़ा कहीं का.’’

किताबी कीड़ा क्या करता? बेचारा चुपचाप सिर झुकाए सुनता रहा. प्रेम की ऐसी मारामारी, प्यार की ऐसी भरमार, इश्क, मोहब्बत का ऐसा जनून, न भूतो न भविष्यति. साल में एक पूरा दिन तो अब प्यार के नाम रिजर्व है ‘वेलेंटाइन डे’ के नाम से. अब वह रूखासूखा जमाना नहीं रहा जब प्रेम की उन्हीं घिसीपिटी 10-5 कहानियों को सारे लेखक अपनीअपनी शैली में घुमाफिरा कर लिखते थे…अब तो मैं :

‘‘सब धरती कागद करौं,

लेखनी सब बनराय,

सात समुंदर मसि करौं,

हरि गुन लिखा न जाय.’’

सारी धरती को कागज बना लूं, वन के सभी वृक्षों को कलम और सारे समुद्रों को स्याही में बदल दूं फिर भी जितनी प्रेम की कहानियां हैं पूरी नहीं लिख पाऊंगा. इस से तो बेहतर होगा कि इतना सारा कागज, कलम और स्याही बेच कर मैं करोड़पति हो जाऊं और मल्लिका शेरावत से पूछूं, ‘‘मेरे साथ डेट पर चलोगी?’’

Valentine’s Day 2024- तड़पते इश्क की गूंज: अवनी क्यों पागल हो गई थी

आगरा के पक्की सराय एरिया की कालोनी में 2 बैडरूम के छोटेछोटे घर. जिन लोगों के परिवार छोटे होते हैं, उन के लिए तो ऐसे घर सही हैं, लेकिन जिन के परिवार में 8-8 लोग हों, वे भला कैसे गुजारा करें… सब बड़ा घर भी तो नहीं ले सकते. इतनी महंगाई में घर का रोजमर्रा का खर्च चलाएं या बड़ा घर खरीदें?

यही हालत अविनाश की भी है. उस का एक भरापूरा परिवार है, जिस में दादादादी, मांपापा, भैयाभाभी, एक छोटी बहन और वह खुद यानी घर में रहने वाले पूरे 8 जने और बैडरूम हैं 2.

एक रूम पर भैयाभाभी का और दूसरे रूम पर मांपापा का कब्जा था. कौमन हाल में दादादादी और छोटी बहन सोते थे. अब रह गया अविनाश, पर उस के लिए तो जगह ही नहीं बचती थी. मांपापा कहते थे कि वह उन के रूम में आ जाए, पर भला जवान बेटा अपने मांपापा के कमरे कैसे आ सकता था?

खैर, एक दिन अविनाश वहां सोया तो रात को कुछ खुसुरफुसुर की आवाजें सुनाई दीं. उसे लगा कि मांपापा धीरेधीरे कुछ बात कर रहे हैं.

खैर, बात तो कोई भी हो सकती है, प्यार की या परिवार की, लेकिन उस के बाद अविनाश को अपने मांपापा के कमरे में सोना सही नहीं लगा और अगले ही दिन उस ने जीवन मंडी रोड पर बनी अपनी फैक्टरी के मालिक से बात कर ली कि वह भी रात को फैक्टरी में रुक जाया करेगा, ताकि उस का घर से आनेजाने का समय बच जाए और उस बचे हुए समय में वह और ज्यादा मेहनत कर के ज्यादा काम कर सके. मालिक ने हां कर दी.

लेकिन बात कुछ और भी थी. अविनाश फैक्टरी में मेनेजर की पोस्ट पर काम करने वाली अवनी से प्यार करता था, इसीलिए उसे अवनी के बराबर खुद को खड़ा करना था, तभी तो वह अवनी का रिश्ता मांगने की हिम्मत करता.

दरअसल, यह तब की बात है जब अवनी और अविनाश राधा वल्लभ कालेज में एक ही क्लास में पढ़ते थे. चलिए, अब आप को थोड़ा फ्लैशबैक में ले कर चलते हैं.

अवनी एक ठीकठाक अमीर परिवार से थी. थोड़ा हलका सा सांवला रंग, मोटेमोटे नैन, तीखी नाक, लंबी सुराहीदार गरदन, लंबेघने काले बाल, कद 5 फुट, 4 इंच, होंठ पतले जैसे गुलाब की पंखुड़ियां हों, बड़े उभार मर्दों को न्योता देते हुए, कमर ऐसे लचकती कि कहने ही क्या. कुलमिला कर अवनी किसी का भी दिल धड़काने के लिए काफी थी.

जैसे ही अवनी की कार कालेज के अंदर आती तो जवां दिलों की धड़कनें थम जातीं. कोई उस की कार का दरवाजा खोलने दौड़ता, तो कोई जहां होता वहीं बुत बना केवल उसे देखता रहता.

अवनी पर हजारों जवां दिल फिदा थे, मगर वह किसी की तरफ भी ध्यान नहीं देती थी. कार पार्क कर के सीधा अपनी क्लास में और क्लास के बाद कार में बैठ घर की तरफ चल देती थी.

अब जानिए हमारे हीरो अविनाश के बारे में. साफ रंग, कद 5 फुट, 8 इंच, घुंघराले बाल, माथे पर हमेशा एक बालों की लट झूलती रहती, चौड़ा सीना, मजबूत बांहें, चाल राजकुमारों सी, एकदम हीरो. मगर वह एक पुरानी सी स्कूटी पर कालेज आताजाता था. साधारण परिवार का जो था.

कालेज इश्क एक ऐसा अखाड़ा होता है जहां किसी न किसी का किसी न किसी से पेंच लड़ ही जाता है, मगर ये 2 महान हस्तियां ही ऐसी थीं, जिन्हें अभी तक किसी से प्यार नहीं हुआ था.

अवनी प्यारमुहब्बत के झमेले में पड़ना नहीं चाहती थी और अविनाश घर के हालात से मजबूर था. जब तक वह पढ़लिख कर कुछ बन न जाए, तब तक किसी लड़की के बारे में उसे सोचना भी नहीं.

लेकिन इश्क कहां छोड़ता है जनाब, यह तो वह आग है जो बिन तेल, बिन दीयाबाती जलती है. आखिर इन दोनों को भी इस आग ने पकड़ लिया.

दरअसल, जहां से अविनाश के घर का रास्ता था, वहीं कहीं रास्ते में ही अवनी का घर भी था और वे दोनों कालेज से अमूमन एक ही समय पर निकलते थे.

एक दिन अचानक रास्ते में अवनी की कार खराब हो गई. उस पर बारिश का मौसम भी बना हुआ था. लाख रोकने पर कोई बस या आटोरिकशा नहीं रुका. इतने में अविनाश, जो अपनी स्कूटी से आ रहा था, उसे देख रुक गया और पूछा, “अवनी, क्या हुआ? आप यहां बीच रास्ते में… गाड़ी में कुछ प्रौब्लम आ गई क्या?”

“हां, मेरी कार अचानक बंद हो गई है और कोई बस या आटोरिकशा भी नहीं  रुक रहा.”

“परेशान न हों. मैं आप को घर छोड़ देता हूं, क्योंकि मौसम भी खराब है. लगता है कि थोड़ी देर में बारिश भी होने वाली है और यहां आसपास कोई कार मेकैनिक भी नहीं है. अगर आप को एतराज न हो तो आप मेरी स्कूटी पर बैठ जाएं.”

अवनी को कोई और रास्ता भी नजर नहीं आ रहा था, इसलिए वह अविनाश के पीछे स्कूटी पर बैठ गई. मगर जैसे ही उस ने अविनाश को पकड़ा, मानो दोनों ने किसी बिजली के तार को छू लिया हो. सनसनी सी बन कर एक लहर दौड़ गई बदन में, उस पर बारिश भी शुरू हो गई थी.

एक तो बारिश से भीगने पर बदन में कंपकंपाहट, उस पर आग और घी का मिलन, ज्वाला तो भड़कनी ही थी. तब से दोनों के दिलों में इश्क ने बसेरा कर लिया था, मगर मूक इश्क ने. न अवनी जबां से कुछ कह सकी, न अविनाश इश्क कुबूल कर सका.

इत्तिफाक देखिए, पढ़ाई खत्म होने के बाद दोनों की नौकरी एक ही जूता फैक्टरी में लग गई. हुआ यों कि अवनी के पापा की जीवन मंडी रोड एक जूता फैक्टरी के मालिक लवेश से अच्छी जानपहचान थी और इस वजह से उन की बेटी अवनी को मैनेजर का पद मिल गया था.

इधर अविनाश को बहुत मेहनत के बाद किसी जानकार की सिफारिश से जीवन मंडी रोड की उसी फैक्टरी में काम मिल गया. उस ने आते ही अवनी को देखा तो हैरान रह गया. एकदूसरे को सामने देख कर दोनों का प्यार दोबारा हिलोरें लेने लगा.

एक दिन अविनाश जब फैक्टरी से छुट्टी के बाद घर जा रहा था, तो रास्ते में देखा कि अवनी कार रोके खड़ी थी.

“मैडम, क्या हुआ? कार खराब हो गई क्या? क्या मैं आप की कुछ मदद कर सकता हूं?”

इतना सुनते ही अवनी कार से निकली और अविनाश के गले लग कर खूब रोई.

“अरे अवनी, क्या हुआ? सब ठीक तो है न? जल्दी बताओ, मुझे चिंता हो रही है,” अविनाश ने पूछा.

“अविनाश, तुम्हें अगर मेरी जरा भी परवाह होती तो इतने पत्थरदिल न बनते, मेरे प्यार से अनजान न रहते. क्या तुम्हारा मेरा रिश्ता इस एक नौकरी की वजह से इतना बदल गया कि तुम मुझे औफिस के बाहर भी मैडम ही कहो. क्या मैं तुम्हारे लायक नहीं…”

“नहीं अवनी तुम नहीं, बल्कि मैं तुम्हारे लायक नहीं हूं, इसी वजह से मैं तुम से दूर रहता हूं. मैं जानता हूं कि हम दोनों एकदूसरे से प्यार करते हैं, मगर हमारा मिलन मुमकिन नहीं है. तुम एशोआराम में पली हो और मैं एक मामूली सा इनसान. तुम्हारे परिवार वाले इस रिश्ते के लिए नहीं मानेंगे.”

“लेकिन मैं तो तुम्हें अपना मान चुकी हूं,” यह कहते हुए अवनी ने अविनाश के होंठों पर अपने होंठ रख दिए. उस छुअन की आग से दोनों के तन जल उठे, मगर जल्दी ही वे संभल गए, क्योंकि दोनों को यह भी डर था कहीं कोई देख न ले. पर अगले दिन वे दोनों फैक्टरी से जल्दी छुट्टी ले कर ताजमहल देखने गए.

“हम इस प्यार की अनमिट निशानी के सामने एकदूसरे को अपनाते हैं और कसम खाते हैं कि जीएंगे तो साथसाथ, मरेंगे तो साथसाथ,” अविनाश ने ताजमहल को देखते हुए अवनी से कहा.

दोनों के जवां दिल धड़क रहे थे, मिलन को तड़प रहे थे. अब दूर रहना मुहाल हो रहा था. वे दोनों वहां से बाहर आए और किसी सुनसान जगह की ओर चल दिए. ज्वालामुखी जो अंदर दहक रहा था, वह न जाने उन्हें किस ओर ले जा रहा था, उन्हें खुद इस बात का अंदाजा नहीं था.

एक जगह पर अवनी ने जैसे ही गाड़ी रोकी, अविनाश पिघल पड़ा उस पर मोम के जैसे और लपेट लिया उसे अपने अंदर. अवनी भी अविनाश की बांहों की गिरफ्त में आने को छटपटा रही थी.

बस, एक जलजला काफी था दोनों को इश्क के दरिया में डुबाने के लिए और वे डूब भी गए. एक कुंआरी ने अपना कुंआरापन न्योछावर कर दिया अपने प्यार पर. मन से तो पहले ही उस के सामने बिछी हुई थी, आज तन से भी बिछ गई.

जब सब बह गया तब होश आया. दोनों सोचने लगे कि अब आगे न जाने क्या होगा, क्योंकि यह तो अवनी भी जानती थी कि उस के पिता इस रिश्ते के लिए नहीं मानेंगे.

अविनाश‌ ने अवनी को भरोसा दिलाया कि जब तक वह कुछ बन नहीं जाता है, तब तक वे नहीं मिलेंगे.

अवनी ने अगले ही दिन नौकरी छोड़ दी. अविनाश फैक्टरी में नए से नए डिजाइन के जूते बनाता था और वे काफी पसंद भी किए जाते थे. अब उस ने और ज्यादा लगन और मेहनत से काम करना शुरू कर दिया था.

एक दिन अविनाश रात को फैक्टरी में ही कोई नया डिजाइन सोच रहा था कि उसे हाजत ‌हुई, मगर जैसे ही वह बाहर निकला, तो देखा कि फैक्टरी में चारों ओर धुआं ही धुआं था. उस ने जल्दी से दूसरे कमरे में सोए हुए मजदूर और चौकीदार को आवाज लगाई, पर दरवाजा अंदर से बंद होने की वजह से इतनी जल्दी आग के फैल गई कि उन का बाहर निकलना मुश्किल हो गया.

शोर मचाने पर आसपास के लोग आए और दमकल की गाड़ियां भी बुलाई गईं, मगर अंदर जाना मुश्किल था, इसलिए फैक्टरी की दीवार तोड़ कर ही दमकल की गाड़ियां अंदर जा सकीं. मगर जब तक गाड़ियां अंदर गईं तब तक सबकुछ जल कर राख हो चुका था. उन तीनों की लाशें भी कंकाल के रूप में मिलीं.

अवनी ने यह सुना तो पागल सी हो गई. बहुत इलाज करवाया मगर वह अविनाश को भूल नहीं पाई. उस ने आगरा के पागलखाने में दीवारों पर ‘अविनाशअविनाश’ लिखा हुआ था. पागलखाने की दीवारों में इश्क की तड़प की गूंज सुनाई देती थी. अकसर रातों को अवनी के चीखने की आवाजें आती थीं, “कोई मेरे अविनाश को बचा लो या मुझे भी उसी आग में जला दो…”

 

Valentine’s Day 2024: कंवल और केवर की प्रेम कहानी

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Valentine’s Day 2024 – वादियों का प्यार: कैसे बन गई शक की दीवार

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Valentine’s Day 2024- बारिश की बूंद: उस रात आखिर क्या हुआ

मेरी शक्लसूरत कुछ ऐसी थी कि 2-4 लड़कियों के दिल में गुदगुदी जरूर पैदा कर देती थी. कालेज की कुछ लड़कियां मुझे देखते हुए आपस में फब्तियां कसतीं, ‘देख अर्चना, कितना भोला है. हमें देख कर अपनी नजरें नीची कर के एक ओर जाने लगता है, जैसे हमारी हवा भी न लगने पाए. डरता है कि कहीं हम लोग उसे पकड़ न लें.’

‘हाय, कितना हैंडसम है. जी चाहता है कि अकेले में उस से लिपट जाऊं.’

‘ऐसा मत करना, वरना दूसरे लड़के भी तुम को ही लिपटाने लगेंगे.’

धीरेधीरे समय बीतने लगा था. मैं ने ऐसा कोई सबक नहीं पढ़ा था, जिस में हवस की आग धधकती हो. मैं जिस्म का पुजारी न था, लेकिन खूबसूरती जरूर पसंद करने लगा था.

एक दिन उस ने खूब सजधज कर चारबत्ती के पास मेरी साइकिल के अगले पहिए से अपनी साइकिल का पिछला पहिया भिड़ा दिया था. शायद वह मुझ से आगे निकलना चाहती थी.

उस ने अपनी साइकिल एक ओर खड़ी की और मेरे पास आ कर बोली, ‘माफ कीजिए, मुझ से गलती हो गई.’

यह सुन कर मेरे दिल की धड़कनें इतनी तेज हो गईं, मानो ब्लडप्रैशर बढ़ गया हो. फिर उस ने जब अपनी गोरी हथेली से मेरी कलाई को पकड़ा, तो मैं उस में खोता चला गया.

दूसरे दिन वह दोबारा मुझे चौराहे पर मिली. उस ने अपना नाम अंबाली बताया. मेरा दिल अब उस की ओर खिंचता जा रहा था.

प्यार की आग जलती है, तो दोनों ओर बराबर लग जाती है. धीरेधीरे वक्त गुजरता गया. इस बीच हमारी मुहब्बत रंग लाई.

एक दिन हम दोनों एक ही साइकिल पर शहर से दूर मस्ती में झूमते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे. आकाश में बादलों की दौड़ शुरू हो चुकी थी. मौसम सुहावना था. हर जगह हरियाली बिछी थी.

अचानक आसमान में काले बादल उमड़ने लगे, जिसे देख कर मैं परेशान होने लगा.

मुझे अपनी उतनी फिक्र नहीं थी, जितना मैं अंबाली के लिए परेशान हो उठा था, क्योंकि कभी भी तेज बारिश शुरू हो सकती थी.

मैं ने अंबाली से कहा, ‘‘आओ, अब घर लौट चलें.’’

‘‘जल्दी क्या है? बारिश हो गई, तो भीगने में ज्यादा मजा आएगा.’’

‘‘अगर बारिश हो गई, तो इस कच्ची और सुनसान सड़क पर कहीं रुकने का ठिकाना नहीं मिलेगा.’’

‘‘पास में ही एक गांव दिखाई पड़ रहा है. चलो, वहीं चल कर रुकते हैं.’’

‘‘गांव देखने में नजदीक जरूर है, लेकिन उधर जाने के लिए कोई सड़क नहीं है. पतली पगडंडी पर पैदल चलना होगा.’’

‘‘अब तो जो परेशानियां सामने आएंगी, बरदाश्त करनी ही पड़ेंगी,’’ अंबाली ने हंसते हुए कहा.

हम ने अपनी चाल तेज तो कर दी, लेकिन गांव की पतली पगडंडी पर चलना उतना आसान न था. अभी हम लोग सोच ही रहे थे कि एकाएक मूसलाधार बारिश होने लगी.

कुछ दूरी पर घासफूस की एक झोंपड़ी दिखाई दी. हम लोग उस ओर दौड़ पड़े. वहां पहुंचने पर उस में एक टूटाफूटा तख्त दिखाई पड़ा, लेकिन वहां कोई नहीं था.

हम दोनों भीग चुके थे. झोंपड़ी में शरण ले कर सोचा कि कुछ आराम मिलेगा, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.

अंबाली ठंड से बुरी तरह कांपने लगी. जब उस के दांत किटकिटाने लगे, तो वह बोली, ‘‘मैं इस ठंड को बरदाश्त नहीं कर पाऊंगी.’’

‘‘कोई दूसरा उपाय भी तो नहीं है.’’

‘‘तुम मुझे अपने आगोश में ले लो. अपने सीने में छिपा लो, तुम्हारे जिस्म की गरमी से कुछ राहत मिलेगी,’’ अंबाली ने कहा.

‘‘अंबाली, हमारा प्यार अपनी जगह है, जिस पर मैं धब्बा नहीं लगने दूंगा, लेकिन तुम्हारी हिफाजत तो करनी होगी,’’ कह कर मैं ने अपनी कमीज उतार दी और उसे अपने सीने से चिपका लिया.

जब अंबाली मेरी मजबूत बांहों और चौड़े सीने में जकड़ गई, तो उस के होंठ जैसे मेरे होंठों से मिलने के लिए बेताब होने लगे थे.

मैं ने उस के पीछे अपनी दोनों हथेलियों को एकदूसरे पर रगड़ कर गरम किया और उस की पीठ सहलाने लगा, ताकि उस का पूरा बदन गरमी महसूस करे. तब मुझे ऐसा लगा, जैसे गुलाब की कोमल पंखुडि़यों पर ओस गिरी हो. मेरी उंगलियां फिसलने लगी थीं.

आधे घंटे के बाद बारिश कम होने लगी थी.

अंबाली मेरी बांहों में पूरी तरह नींद के आगोश में जा चुकी थी. मैं ने उसे जगाना ठीक नहीं समझा.

एक घंटे बाद मैं ने उसे जगाया, तब तक बारिश बंद हो चुकी थी.

अंबाली ने अलग हो कर अपने कुरते की चेन चढ़ाई और मुसकराते हुए पूछा, ‘‘तुम ने मेरे साथ कोई शैतानी तो नहीं की?’’

मैं हंसा और बोला, ‘‘हां, मैं ने तुम्हारे होंठों पर पड़ी बारिश की बूंदों को चूम कर सुखा दिया था.’’

‘‘धत्त…’’ थोड़ा रुक कर वह कहने लगी, ‘‘तुम्हारा सहारा पा कर मुझे नई जिंदगी मिली. ऐसा मन हो रहा था कि जिंदगीभर इसी तरह तुम्हारे सीने से लगी रहूं.’’

‘‘हमारा प्यार अभी बड़ी नाजुक हालत में है. अगर हमारे प्यार की जरा सी भी भनक किसी के कान में पड़ गई, तो हमारी मुहब्बत खतरे में तो पड़ ही जाएगी और हमारी जिंदगी भी दूभर हो जाएगी,’’ मैं ने कहा.

‘‘जानते हो, मैं तुम्हारे आगोश में सुधबुध भूल कर सपनों की दुनिया में पहुंच गई थी. मेरी शादी धूमधाम से तुम्हारे साथ हुई और विदाई के बाद मैं तुम्हारे घर पहुंची. वहां भी खूब सजावट थी.

‘‘रात हुई. मुझे फूलों से सजे हुए कमरे में पलंग पर बैठा दिया गया. तुम अंदर आए, दरवाजा बंद किया और मेरे पास बैठे.

‘‘हम दोनों ने वह पूरी रात बातें करते हुए और प्यार करने में गुजार दी,’’ इतना कह कर वह खामोश हो गई.

‘‘फिर क्या हुआ?’’ मैं ने पूछा.

‘‘हवा का एक बवंडर आया और मेरा सपना टूट गया. मैं ने महसूस किया कि मैं तुम्हारी बांहों में हूं. मेरा जिस्म तुम्हारे सीने में समाया था,’’ इतना कहतेकहते वह मुझ से चिपक गई.

‘‘अंबाली, बारिश बंद हो चुकी है. अंधेरा घिरने लगा है. अब हमें अपने घर पहुंचने में बहुत देर हो जाएगी. तुम्हारे घर वाले चिंता कर रहे होंगे. कहीं हमारा राज न खुल जाए.’’

‘‘तुम ठीक कहते हो. हमें चलना ही होगा.’’

कुछ दिन कई वजहों से हम दोनों नहीं मिल सके. लेकिन एक शाम अंबाली मेरे पास सहमी हुई आई. मैं ने उस के चेहरे को देखते हुए पूछा, ‘‘आज तुम बहुत उदास हो?’’

‘‘आज मेरा मन बहुत भारी है. मैं तुम्हारे बिना कैसे जी सकूंगी, कहीं मैं खुदकुशी न कर बैठूं, क्योंकि उस के सिवा कोई रास्ता नहीं सूझता,’’ कह कर अंबाली रो पड़ी.

‘‘ऐसा क्या हुआ?’’

‘‘मेरे घर वालों को हमारे प्यार के बारे में मालूम हो गया. अब मेरी शादी तय हो चुकी है. लड़का पढ़ालिखा रईस घराने का है. अगले महीने की तारीख भी तय कर ली गई. अब मुझे बाहर निकलने की इजाजत भी नहीं मिलेगी,’’ अंबाली रोते हुए बोली.

‘‘तुम्हारे घर वाले जो कर रहे हैं, वह तुम्हारे भविष्य के लिए ठीक होगा. मेरा तुम्हारा कोई मुकाबला नहीं. उन के अरमानों पर जुल्म मत करना. हमारा प्यार आज तक पवित्र है, जिस में कोई दाग नहीं लगा. समझ लो कि हम दोनों ने कोई सपना देखा था.’’

‘‘यह कैसे होगा?’’

‘‘अपनेआप को एडजस्ट करना ही पड़ेगा.’’

‘‘मेरे लिए कई रिश्ते आए, पर मैं ने किसी को पसंद नहीं किया. उस के बाद मैं तुम्हें अपना दिल दे बैठी, अब तुम मुझे भूल जाने के लिए कहते हो. मैं तुम्हें बेहद प्यार करती हूं, मेरा प्यार मत छीनो. मैं तुम्हें भुला नहीं पाऊंगी. क्या तुम मुझे तड़पते देखते रहोगे? मैं तुम्हें हर कीमत पर हासिल करना चाहूंगी.’’

कुछ दिन हम लोग अपना दुखी मन ले कर समय बिताते रहे. किसी काम को करने की इच्छा नहीं होती थी. अंबाली की मां से उस की हालत देखी नहीं गई. वह एकलौती लाडली थी. उन्होंने अपने पति को बहुत समझाया.

अंबाली के पिता ने एक दिन हमारे यहां संदेशा भेजा, ‘आप लोग किसी दूसरे किराए के मकान में दूर चले जाइए, ताकि दोनों लड़केलड़की का भविष्य खराब न हो.’

हमें दूसरे मकान में शिफ्ट होना पड़ा. 3 महीने तक हम एकदूसरे से नहीं मिले. चौथे महीने अंबाली के पिता मेरे पिता से मिलने आए और साथ में मिठाई भी लाए थे.

बाद में उन्होंने कहा, ‘‘रिश्ता वहीं होगा, जहां अंबाली चाहेगी, इसलिए 2 साल में उस की पढ़ाई पूरी हो जाने पर विचार होगा. आप लोग दूर चले आए. हम दोनों की इज्जत नीलाम होने से बच गई, वरना ये आजकल के लड़केलड़की मांबाप की नाक कटा देते हैं.’’

मेरे पिता ने उन की बातों को सुना और हंस कर टाल दिया.

एक साल बीत जाने पर मेरा चुनाव एक सरकारी पद पर हो गया और मेरी बहाली दूसरे शहर में हो गई. मेरी शादी के कई रिश्ते आने लगे और मैं बहाने बना कर टालता रहा.

आखिर में मेरे पिता ने झुंझला कर कहा, ‘‘अब हम लोग खुद लड़की देखेंगे, क्योंकि तुम्हें कोई लड़की पसंद नहीं आती. अगर तुम ने हमारी पसंद को ठुकरा दिया, तो हम लोग तुम्हें अकेला छोड़ कर चले जाएंगे.’’

मुझे उन के सामने झुकना पड़ा और कहा, ‘‘आप लोग जैसा ठीक समझें, वैसा करें. मुझे कोई एतराज नहीं होगा.’’

शादी की जोरशोर से तैयारियां होने लगीं, लेकिन मुझे कोई दिलचस्पी न थी.

बरात धूमधाम से एक बड़े होटल में घुसी, जहां बताया गया कि लड़की के पिता बीमार होने के चलते द्वारचार पर नहीं पहुंच सके. उन के भाई बरात का स्वागत करेंगे.

लड़की को लाल घाघराचोली में सजा कर स्टेज तक लाया गया, पर उस के चेहरे से आंचल नहीं हटाया गया था.

लड़की ने मेरे गले में जयमाल डाली और मैं ने उस के गले में. तब लोग शोर करने लगे, ‘अब तो लड़की का घूंघट खोल दिया जाए, ताकि लोग उस की खूबसूरती देख सकें.’

लड़की का घूंघट हटाया गया, जिसे देख कर मैं हैरान रह गया. उस की आंखों से आंसू बह रहे थे, मानो उसे जबरदस्ती बांधा गया था.

मैं ने एक उंगली से उस की ठुड्डी को ऊपर किया. उस की नजरें मुझ से टकराईं, तो वह बेहोश होतेहोते बची.

सुहागरात में अंबाली ने मेरे आगोश में समा कर अपनी खुशी का इजहार किया. उस का प्यार जिंदा रह गया. मैं ने उस के गुलाबी गाल पर अपने होंठ रख कर प्यार से कहा, ‘‘अंबाली, तुम्हारे गालों पर अभी तक बारिश की बूंदें मोतियों जैसी चमक रही हैं. थोड़ा मुझे अपने होंठों से चूम लेने दो.’’

यह सुन कर अंबाली खिलखिला कर हंस पड़ी, जैसे वह कली से फूल बन गई हो.

Valentine’s Day 2024 – वहां आकाश और है: आकाश और मानसी के बीच कौन-सा रिश्ता था

अचानक शुरू हुई रिमझिम ने मौसम खुशगवार कर दिया था. मानसी ने एक नजर खिड़की के बाहर डाली. पेड़पौधों पर झरझर गिरता पानी उन का रूप संवार रहा था. इस मदमाते मौसम में मानसी का मन हुआ कि इस रिमझिम में वह भी अपना तनमन भिगो ले.

मगर उस की दिनचर्या ने उसे रोकना चाहा. मानो कह रही हो हमें छोड़ कर कहां चली. पहले हम से तो रूबरू हो लो.

रोज वही ढाक के तीन पात. मैं ऊब गई हूं इन सब से. सुबहशाम बंधन ही बंधन. कभी तन के, कभी मन के. जाओ मैं अभी नहीं मिलूंगी तुम से. मन ही मन निश्चय कर मानसी ने कामकाज छोड़ कर बारिश में भीगने का मन बना लिया.

क्षितिज औफिस जा चुका था और मानसी घर में अकेली थी. जब तक क्षितिज घर पर रहता था वह कुछ न कुछ हलचल मचाए रखता था और अपने साथसाथ मानसी को भी उसी में उलझाए रखता था. हालांकि मानसी को इस बात से कोई आपत्ति नहीं थी और वह सहर्ष क्षितिज का साथ निभाती थी. फिर भी वह क्षितिज के औफिस जाते ही स्वयं को बंधनमुक्त महसूस करती थी और मनमानी करने को मचल उठती थी.

इस समय भी मानसी एक स्वच्छंद पंछी की तरह उड़ने को तैयार थी. उस ने बालों से कल्चर निकाल उन्हें खुला लहराने के लिए छोड़ दिया जो क्षितिज को बिलकुल पसंद नहीं था. अपने मोबाइल को स्पीकर से अटैच कर मनपसंद फिल्मी संगीत लगा दिया जो क्षितिज की नजरों में बिलकुल बेकार और फूहड़ था.

अत: जब तक वह घर में रहता था, नहीं बजाया जा सकता था. यानी अब मानसी अपनी आजादी के सुख को पूरी तरह भोग रही थी.

अब बारी थी मौसम का आनंद उठाने की. उस के लिए वह बारिश में भीगने के लिए आंगन में जाने ही वाली थी कि दरवाजा खटखटाने की आवाज आई.

इस भरी बरसात में कौन हो सकता है. पोस्टमैन के आने में तो अभी देरी है. धोबी नहीं हो सकता. दूध वाला भी नहीं. तो फिर कौन है? सोचतीसोचती मानसी दरवाजे तक जा पहुंची.

दरवाजे पर वह व्यक्ति था जिस की वह कल्पना भी नहीं कर सकती थी.

‘‘आइए,’’ उस ने दरवाजा खोलते हुए कुछ संकोच से कहा और फिर जैसे ही वह आगंतुक अंदर आने को हुआ बोली, ‘‘पर वे तो औफिस चले गए हैं.’’

‘‘हां, मुझे पता है. मैं ने उन की गाड़ी निकलते देख ली थी,’’ आगंतुक जोकि उन के महल्ले का ही था ने अंदर आ कर सोफे पर बैठते हुए कहा.

यह सुन कर मानसी मन ही मन बड़बड़ाई कि जब देख ही लिया था तो फिर क्यों चले आए हो… वह मन ही मन आकाश के बेवक्त यहां आने पर कु्रद्ध थी, क्योंकि उन के आने से उस का बारिश में भीगने का बनाबनाया प्रोग्राम चौपट हो रहा था. मगर मन मार कर वह भी वहीं सोफे पर बैठ गई.

शिष्टाचारवश मानसी ने बातचीत का सिलसिला शुरू किया, ‘‘कैसे हैं आप? काफी दिनों बाद नजर आए.’’

‘‘जैसा कि आप देख ही रहीं… बिलकुल ठीक हूं. काम पर जाने के लिए निकला ही था कि बरसात शुरू हो गई. सोचा यहीं रुक जाऊं. इस बहाने आप से मुलाकात भी हो जाएगी.’’

‘‘ठीक किया जो चले आए. अपना ही घर है. चायकौफी क्या लेंगे आप?’’

‘‘जो भी आप पिला दें. आप का साथ और आप के हाथ हर चीज मंजूर है,’’ आकाश ने मुसकरा कर कहा तो मानसी का बिगड़ा मूड कुछ हद तक सामान्य हो गया, क्योंकि उस मुस्कराहट में अपनापन था.

मानसी जल्दी 2 कप चाय बना लाई. चाय के दौरान भी कुछ औपचारिक बातें होती रहीं. इसी बीच बूंदाबांदी कम हो गई.

‘‘आप की इजाजत हो तो अब मैं चलूं?’’ फिर आकाश के चेहरे पर वही मुसकराहट थी.

‘‘जी,’’ मानसी ने कहा, ‘‘फिर कभी फुरसत से आइएगा भाभीजी के साथ.’’

‘‘अवश्य यदि वह आना चाहेगी तो उसे भी ले आऊंगा. आप तो जानती ही हैं कि उसे कहीं आनाजाना पसंद नहीं,’’ कहतेकहते आकाश के चेहरे पर उदासी छा गई.

मानसी को लगा कि उस ने आकाश की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो, क्योंकि वह जानती थी कि आकाश की पत्नी मानसिक रूप से अस्वस्थ है और इसी कारण लोगों से बात करने में हिचकिचाती है.

‘‘क्या मैं अंदर आ सकता हूं?’’ अगले दिन भी जब उसी मुसकराहट के साथ आकाश ने पूछा तो जवाब में मानसी भी मुसकरा दी और दरवाजा खोल दिया.

‘‘चाय या कौफी?’’

‘‘कुछ नहीं… औपचारिकता करने की आवश्यकता नहीं. आज भी तुम से दो घड़ी बात करने की इच्छा हुई तो फिर चला आया.’’

‘‘अच्छा किया. मैं भी बोर ही हो रही थी,’’ मानसी जानती थी कि उन्हें यह बताने की आवश्यकता नहीं थी कि क्षितिज कहां है, क्योंकि निश्चय ही वे जानते थे कि वे घर पर नहीं हैं.

इस तरह आकाश के आनेजाने का सिलसिला शुरू हो गया वरना इस महल्ले में किसी के घर आनेजाने का रिवाज कम ही था. यहां अधिकांश स्त्रियां नौकरीपेशा थीं या फिर छोटे बालबच्चों वाली. एक वही अपवाद थी जो न तो कोई जौब करती थी और न ही छोटे बच्चों वाली थी.

मानसी का एकमात्र बेटा 10वीं कक्षा में बोर्डिंग स्कूल में पढ़ता था. अपने अकेलेपन से जूझती मानसी को अकसर अपने लिए एक मित्र की आवश्यकता महसूस होती थी और अब वह आवश्यकता आकाश के आने से पूरी होने लगी थी, क्योंकि वे घरगृहस्थी की बातों से ले कर फिल्मों, राजनीति, साहित्य सभी तरह की चर्चा कर लेते थे.

आकाश लगभग रोज ही आफिस जाने से पूर्व मानसी से मिलते हुए जाते थे और अब स्थिति यह थी कि मानसी क्षितिज के जाते ही आकाश के आने का इंतजार करने लग जाती थी.

एक दिन जब आकाश नहीं आए तो अगले दिन उन के आते ही मानसी ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, कल क्यों नहीं आए? मैं ने कितना इंतजार किया.’’

आकाश ने हैरानी से मानसी की ओर देखा और फिर बोले, ‘‘क्या मतलब? मैं ने रोज आने का वादा ही कब किया है?’’

‘‘सभी वादे किए नहीं जाते… कुछ स्वयं ही हो जाते हैं. अब मुझे आप के रोज आने की आदत जो हो गई है.’’

‘‘आदत या मुहब्बत?’’ आकाश ने मुसकरा कर पूछा तो मानसी चौंकी, उस ने देखा कि आज उन की मुसकराहट अन्य दिनों से कुछ अलग है.

मानसी सकपका गई. पर फिर उसे लगा कि शायद वे मजाक कर रहे हैं. अपनी सकपकाहट से अनभिज्ञता का उपक्रम करते हुए वह सदा की भांति बोली, ‘‘बैठिए, आज क्षितिज का जन्मदिन है. मैं ने केक बनाया है. अभी ले कर आती हूं.’’

‘‘तुम ने मेरी बात का जवाब नहीं दिया.’’ आकाश फिर बोले तो उसे बात की गंभीरता का एहसास हुआ.

‘‘क्या जवाब देती.’’

‘‘कह दो कि तुम मेरा इंतजार इसलिए करती हो कि तुम मुझे पसंद करती हो.’’

‘‘हां दोनों ही बातें सही हैं.’’

‘‘यानी मुहब्बत है.’’

‘‘नहीं, मित्रता.’’

‘‘एक ही बात है. स्त्री और पुरुष की मित्रता को यही नाम दिया जाता है,’’ आकाश ने मानसी की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा.

‘‘हां दिया जाता है,’’ मानसी ने हाथ को हटाते हुए कहा, ‘‘क्योंकि साधारण स्त्रीपुरुष मित्रता का अर्थ इसी रूप में जानते हैं और मित्रता के नाम पर वही करते हैं जो मुहब्बत में होता है.’’

‘‘हम भी तो साधारण स्त्रीपुरुष ही हैं.’’

‘‘हां हैं, परंतु मेरी सोच कुछ अलग है.’’

‘‘सोच या डर?’’

‘‘डर किस बात का?’’

‘‘क्षितिज का. तुम डरती हो कि कहीं उसे पता चल गया तो?’’

‘‘नहीं, प्यार, वफा और समर्पण को डर नहीं कहते. सच तो यह है कि क्षितिज तो अपने काम में इतना व्यस्त है कि मैं उस के पीछे क्या करती हूं, वह नहीं जानता और यदि मैं न चाहूं तो वह कभी जान भी नहीं पाएगा.’’

‘‘फिर अड़चन क्या है?’’

‘‘अड़चन मानसिकता की है, विचारधारा की है.’’

‘‘मानसिकता बदली जा सकती है.’’

‘‘हां, यदि आवश्यकता हो तो… परंतु मैं इस की आवश्यकता नहीं समझती.’’

‘‘इस में बुराई ही क्या है?’’

‘‘बुराई है… आकाश, आप नहीं जानते हमारे समाज में स्त्रीपुरुष की दोस्ती को उपेक्षा की दृष्टि से देखने का यही मुख्य कारण है. जानते हो एक स्त्री और पुरुष बहुत अच्छे मित्र हो सकते हैं, क्योंकि उन के सोचने का दृष्टिकोण अलग होता है. इस से विचारों में विभिन्नता आती है. ऐसे में बातचीत का आनंद आता है, परंतु ऐसा नहीं होता.’’

‘‘अकसर एक स्त्री और पुरुष अच्छे मित्र बनने के बजाय प्रेमी बन कर रह जाते हैं और फिर कई बार हालात के वशीभूत हो कर एक ऐसी अंतहीन दिशा में बहने लगते हैं जिस की कोई मंजिल नहीं होती.’’

‘‘परंतु यह स्वाभाविक है, प्राकृतिक है, इसे क्यों और कैसे रोका जाए?’’

‘‘अपने हित के लिए ठीक उसी प्रकार जैसे हम ने अन्य प्राकृतिक चीजों, जिन से हमें नुकसान हो सकता है, पर नियंत्रण पा लिया है.’’

‘‘यानी तुम्हारा इनकार है,’’ ऐसा लगता था आकाश कुछ बुझ से गए थे.

‘‘इस में इनकार या इकरार का प्रश्न ही कहां है? मुझे आप की मित्रता पर अभी भी कोई आपति नहीं है बशर्ते आप मुझ से अन्य कोई अपेक्षा न रखें.’’

‘‘दोनों बातों का समानांतर चलना बहुत मुश्किल है.’’

‘‘जानती हूं फिर भी कोशिश कीजिएगा.’’

‘‘चलता हूं.’’

‘‘कल आओगे?’’

‘‘कुछ कह नहीं सकता.’’

सुबह के 10 बजे हैं. क्षितिज औफिस चला गया है पर आकाश अभी तक नहीं आए. मानसी को फिर से अकेलापन महसूस होने लगा है.

‘लगता है आकाश आज नहीं आएंगे. शायद मेरा व्यवहार उन के लिए अप्रत्याशित था, उन्हें मेरी बातें अवश्य बुरी लगी होंगी. काश वे मुझे समझ पाते,’ सोच मानसी ने म्यूजिक औन कर दिया और फिर सोफे पर बैठ कर एक पत्रिका के पन्ने पलटने लगीं.

सहसा किसी ने दरवाजा खटखटाया. मानसी दरवाजे की ओर लपकी. देखा दरवाजे पर सदा की तरह मुसकराते हुए आकाश ही थे. मानसी ने भी मुसकरा कर दरवाजा खोल दिया. उस ने आकाश की ओर देखा. आज उन की वही पुरानी चिरपरिचित मुसकान फिर लौट आई थी.

इसी के साथ आज मानसी को विश्वास हो गया कि अब समाज में स्त्रीपुरुष के रिश्ते की उड़ान को नई दिशाएं अवश्य मिल जाएंगी, क्योंकि उन्हें वहां एक आकाश और मिल गया है.

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