एक और आकाश : भाग 3- कैसे पाया खोया हुआ मुकाम

परंतु उसी क्षण हृदय के किसी कोने में पुरुष के प्रति फूटा घृणा का अंकुर उसे फिर किसी पुरुष की ओर आकृष्ट होने से रोक देता. तब सचमुच उसे प्रत्येक युवक की सूरत में बस, वही सूरत नजर आती, जिस से उसे घृणा थी, जिसे वह भूल जाना चाहती थी. उस ने धीरेधीरे अपनी इच्छाओं, कामनाओं को केवल उसी सीमा तक बांधे रखा था, जहां तक उस की अपनी धरती थी, जहां तक उस का अपना आकाश था.

शारीरिक भूख से अधिक महत्त्व- पूर्ण उस के अपने बच्चे प्रकाश का भविष्य था, जिसे संवारने के लिए वह अभी तक कई बार मरमर कर जी थी. अपने को उस सीमा तक व्यस्त कर चुकी थी, जहां उस को कुछ सोचने का अवकाश ही नहीं मिलता था.

ज्योति की कल्पना में अभी स्मृतियों का क्रम टूट नहीं पाया था. वह शाम आंखों में तिर गई थी, जब उस ने मां को सबकुछ साफसाफ कह दिया था. अपने प्रेम को भूल का नाम दे कर रोई थी, क्षमा की भीख मांग कर मां से याचना की थी कि वह गर्भ नष्ट करने के लिए उसे जाने दे.

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मां ने उसे गर्भ नष्ट कराने का मौका न दे कर सबकुछ पिता को बता दिया था. फिर पहली बार पिता का वास्तविक रूप उस के सामने आया था. उन्होंने ज्योति को नफरत से देखते हुए दहाड़ कर कहा था, ‘‘खबरदार, जो तू ने मुझे आज के बाद पिता कहा. निकल जा, अभी…इसी वक्त इस घर से. तेरा काला मुंह मैं नहीं देखना चाहता. जाती है या नहीं?’’

अब उन्हीं पिता का पत्र उसे मिला था. क्षण भर के लिए मन तमाम कड़वाहटों से भर आया था. परंतु धीरेधीरे पिता के प्रति उदासीनता का भाव घटने लगा था. वह निर्णय ले चुकी थी कि अगर पिता ने उसे क्षमा नहीं किया तो कोई बात नहीं, वह अपने पिता को अवश्य क्षमा कर देगी.

उस दिन तो पिता की दहाड़ सुन कर कुछ क्षण ज्योति जड़वत खड़ी रही थी. फिर चल पड़ी थी बाहर की ओर. उसे विश्वास हो गया था कि उस का प्रेमी हो या पिता, पुरुष दोनों ही हैं और अपने- अपने स्तर पर दोनों ही समाज के उत्थान में बाधक हैं.

उस दिन ज्योति घर छोड़ कर चल पड़ी थी. किसी ने उस की राह नहीं रोकी थी. किसी की बांहें उस की ओर नहीं बढ़ी थीं. किसी आंचल ने उस के आंसू नहीं पोंछे थे. आंसू पोंछने वाला आंचल तो केवल मां का ही होता है. परंतु साथ ही उसे इस बात का पूरा एहसास था कि पिता के अंकुश तले दबी होंठों के भीतर अपनी सिसकियों को दबाए हुए उस की मां दरवाजे पर खड़ी जरूर थीं, पर उसे पांव आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं थी. वह चली जा रही थी और समझ रही थी मां की विवशता को. आखिर वह भी तो नारी थीं उसी समाज की.

बच्चे को जन्म देने के बाद ज्योति ने उसे प्रकाश नाम दे कर अपने भीतर अभूतपूर्व शक्ति का अनुभव किया था. उसे वह गुलाब के फूल की तरह अनेक कांटों के बीच पालती रही थी.

अब ज्योति की आंखों में केवल एक ही स्वप्न शेष था. किस प्रकार वह समाज में अपना वही स्थान प्राप्त कर ले, जिस पर वह घर से निकाले जाने से पहले प्रतिष्ठित थी.

शायद इन्हीं भावनाओं ने ज्योति को प्रेरित किया था मां के नाम पत्र लिखने के लिए. डब्बे में रोशनी कम थी. फिर भी उस ने अपने पर्स को टटोल कर उस में से कुछ निकाला. आसपास के सारे यात्री सो रहे थे या ऊंघ रहे थे. ज्योति एक बार फिर उस पत्र को पढ़ रही थी जिसे उस ने केवल मां को भेजा था, केवल यह जानने के लिए कि कहीं भावावेश में किसी शब्द के माध्यम से उस का आत्मविश्वास डिग तो नहीं गया था.

‘‘मां, अपनी बेटी का प्रणाम स्वीकार करते हुए तुम्हें यह विश्वास तो हो गया है न कि ज्योति जीवित है.

‘‘मैं जीवन के युद्ध में एक सैनिक की भांति लड़ी हूं और अब तक हमेशा विजयी रही हूं प्रत्येक मोर्चे पर. परंतु मेरी विजय अधूरी रहेगी जब तक अंतिम मोर्चे को भी न जीत लूं. वह मोर्चा है, तुम्हारे समाज के बीच आ कर अपनी प्रतिष्ठा पुन: प्राप्त कर लेने का. मैं ने उस घर को अपना घर कहने का अधिकार तुम से छीन लेने के बाद भी छोड़ा नहीं. मैं उसी घर में आना चाहती हूं. परंतु मैं तभी आऊंगी जब तुम मुझे बुलाओगी. सचसच कहना, मां, क्या तुम में इतना साहस है कि तुम और पिताजी दोनों अपने समाज के सामने यह बात निसंकोच स्वीकार कर सको कि मैं तुम्हारी बेटी हूं और प्रकाश मेरा पुत्र है.

‘‘मेरी परीक्षा की अवधि बीत चुकी है. अब तुम दोनों की परीक्षा का अवसर है. मैं नहीं चाहती कि आप में से कोई मेरे पास ममतावश आए. मैं चाहूंगी कि आप सब कभी मुझे इस दया का पात्र न बनाएं. मैं छुट्टियों के कुछ दिन आप के पास बिता कर पुन: यहां वापस आ जाऊंगी. मेरे पुत्र या मुझे ले कर आप की प्रतिष्ठा पर जरा भी आंच आए, यह मेरी इच्छा नहीं है. मैं ऐसे में अंतिम श्वास तक आप के लिए उसी तरह मरी बनी रहने में अपनी खुशी समझूंगी जिस तरह अब तक थी. यदि मैं ने आप लोगों को अपनी याद दिला कर कोई गलती की है तो भी क्षमा चाहूंगी. शायद यही सोच कर मैं ने इस पत्र में केवल अपनी याद दिलाई है, अपना पता नहीं दिया.

-ज्योति.’’

ज्योति को यह सोच कर शांति मिली थी कि उस ने ऐसा कुछ नहीं लिखा था जिस से उन के मन में कोई दुर्बलता झांके. उस ने पत्र को पर्स में रखने के साथ दूसरा पत्र निकाला, जो उस के पिता का था. वह पत्र देखते ही उस की आंखें डबडबा आईं और उन आंसुओं में उतने बड़े कागज पर पिता के हाथ के लिखे केवल दो वाक्य तैरते रहे, ‘‘चली आ, बेटी. हम सब पलकें बिछाए हुए हैं तेरे लिए.’’

सुबह का उजाला उसे आह्लादित करने लगा था. अपनी जन्मभूमि का आकर्षण उसे बरबस अपनी ओर खींच रहा था. कल्पना की आंखों से वह सभी परिवारजनों की सूरत देखने लगी थी.

गाड़ी ज्योंज्यों धीमी होती गई, ज्योति की हृदयगति त्योंत्यों तीव्र होती गई. प्रकाश की उंगली थामे हुए वह डब्बे के दरवाजे पर खड़ी हो गई. कल्पना साकार होने लगी. गाड़ी रुकते ही कई गीली आंखें उन दोनों पर टिक गईं. कई बांहों ने एकसाथ उन का स्वागत किया. कई आंचल आंसुओं से भीगे और कई होंठ मुसकराते हुए कह बैठे, ‘‘कैसी हो गई है ज्योति, योगिनी जैसी.’’

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ज्योति ने डबडबाई आंखों से भाई की ओर निहारा जो एक ओर चुपचाप खड़ा सहज आंखों से बहन को निहार रहा था. ज्योति ने अपने पर्स से पिछले 11 वर्षों की राखी के धागे निकाले और उस की कलाई पर बांधते हुए पूछा, ‘‘भाभी नहीं आईं, भैया?’’

‘‘नहीं, बेटी. तेरे बिना तेरे भैया ने शादी नहीं की. अब तू आ गई है तो इस की शादी भी होगी,’’ मां बोल उठी थीं.

घर की ओर जातेजाते ज्योति के मन में अपूर्व शांति थी. अपने भाई के प्रति मन स्नेह से भर गया था. उस का संघर्ष सार्थक हुआ था. उस के वियोग का मूल्य भाई ने भी चुकाया था. उस ने ऊपर की ओर ताका. मन के भीतर ही नहीं, ऊपर के आकाश को भी विस्तार मिल रहा था.

एक और आकाश : भाग 2- कैसे पाया खोया हुआ मुकाम

ज्योति एक-एक दिन उंगलियों पर गिनती रही थी. अब तक तो पत्रोत्तर आ जाना चाहिए था. क्यों नहीं आया था? उस के पत्र ने घर की शांति तो नहीं भंग कर दी थी? नहीं, नहीं, ऐसा नहीं हो सकता. निश्चय ही उस के हाथ की लिखावट देखते ही उस की मां ने पत्र को चूम लिया होगा. फिर खूब रोई होंगी. पिता को भलाबुरा सुनाया होगा. खुशामद की होगी कि जा कर बेटी को लिवा लाएं. पिता ने कहा होगा कि बेटी ने सौगंध दी है कि उसे केवल पत्रोत्तर चाहिए. उत्तर के स्थान पर कोई उसे लिवाने न आए. यहां आना या न आना, उस का अपना निर्णय होगा.

फिर भी पिता के मन में छटपटाहट जागी होगी कि चल कर देखें अपनी बेटी को. अनायास पिता का भूलाबिसरा वास्तविक रूप उस को याद आ गया था. नहीं, नहीं, पिता मुझ तक आएं यह उन की शान के विरुद्ध होगा. पत्र पढ़ कर जब मां रोई होंगी तब पिता की दबंग आवाज ने मां को डांट दिया होगा. परंतु वह खुद भी भावुक होने से न बच पाए होंगे.

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मां के सो जाने के बाद उन्होंने भी लुकछिप कर एक बार फिर उस के पत्र को ढूंढ़ कर पढ़ने की कोशिश की होगी. आंखें भर आई होंगी तो इधरउधर ताका होगा कि कहीं कोई उन्हें रोते हुए देख तो नहीं रहा. मां ने पिता की इस कमजोरी को पहचान कर पहले ही वह पत्र ऐसी जगह रखा होगा, जहां वह चोरीछिपे ढूंढ़ कर पढ़ सकें क्योंकि सब के सामने उस पत्र को बारबार पढ़ना उन की मानप्रतिष्ठा के विरुद्ध होता और इस बात का प्रमाण होता कि वह हार रहे हैं.

ज्योति अनमनी सी नित्य बच्चों को पढ़ाने स्कूल जाती थी. घर लौट कर देखती थी कि कहीं पत्र तो नहीं आया. धीरेधीरे 10 दिन बीत गए थे और आशा पर निराशा की छाया छाने लगी थी.

एक दिन रास्ते में वही हितैषी महेंद्र अचानक मिल गए थे. उन के हाथ में एक लिफाफा था. उस पर लिखी अपने पिता की लिखावट पहचानने में उसे एक पल भी न लगा था.

‘‘बेटी, डाक से यहां तक पहुंचने में देर लगती, इसलिए मैं खुद ही पत्र ले कर चला आया…खुश है न?’’ महेंद्र ने पत्र उसे थमाते हुए कहा.

स्वीकृति में सिर झुका दिया था ज्योति ने. होंठों से निकल गया था, ‘‘कोई मेरे बारे में पूछने घर से आया तो नहीं था?’’

‘‘नहीं, अभी तक तो नहीं आया. और आएगा भी तो तेरी बात मुझे याद है, घर के सब लोगों को भी बता दिया है. विश्वास रखना मुझ पर.’’

‘‘धन्यवाद, दादा.’’

महेंद्र ने ज्योति के सिर पर हाथ फेरा. बहुत सालों बाद उस स्पर्श में उसे अपने मातापिता के हाथों के स्पर्श जैसी आत्मीयता मिली. पत्र पाने की खुशी में यह भी भूल गई कि वह स्कूल की ओर जा रही थी. तुरंत घर की ओर लौट पड़ी.

लिफाफा ज्यों का त्यों बंद था. मां के हाथों की लिखावट होती तो अब तक पत्र खुल चुका होता. परंतु पिता के हाथ की लिखावट ने ज्योति के मन में कुछ और प्रश्न उठा दिए थे क्योंकि अब तक वह पिता के प्रति अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं ला सकी थी. उस की दृष्टि में उस के दुखों के लिए वह खुद तो जिम्मेदार थी ही, परंतु उस के पिता भी कम जिम्मेदार न थे.

तो क्या उन्हीं कठोर पिता का हृदय पिघल गया है? मन थरथरा उठा. कहीं पिता ने अपने कटु शब्दों को तो फिर से नहीं दोहरा दिया था?

कांपते हाथों से ज्योति ने लिफाफा फाड़ा. पत्र निकाला और पढ़ने लगी. एकएक शब्द के साथ मन की पीड़ा पिघलपिघल कर आंखों के रास्ते बहने लगी. वह भीगती रही उस ममता और प्यार की बरसात में, जिसे वह कभी की खो चुकी थी.

ज्योति अगले दिन की प्रतीक्षा नहीं कर सकी थी और उसी समय उठ कर स्कूल के लिए चल दी थी. छुट्टी का आवेदन देने के साथसाथ डाकघर में जा कर तार भी दे आई थी.

वह रात भी वैसी ही अंधियारी रात थी, जैसी रात में ज्योति ने 11 वर्ष पूर्व अकेले यात्रा की थी. मांबाप और समाज के शब्दों में, अपने गर्भ में वह किसी का पाप लिए हुए थी और अनजानी मंजिल की ओर चली जा रही थी एक तिरस्कृता के रूप में. और उसी पाप के प्रतिफल के रूप में जन्मे पुत्र के साथ वह वापस जा रही थी. उस रात जीवन एक अंधेरा बन कर उसे डस रहा था. इस रात वही जीवन सूरज बन कर उस के लिए नई सुबह लाने वाला था.

उस रात ज्योति अपने घर से ठुकरा दी गई थी. इस रात उस का अपने उसी घर में स्वागत होने वाला था. यह बात और थी कि उस स्वागत के लिए पहल स्वयं उस ने ही की थी क्योंकि उस ने अपना अतापता किसी को नहीं दिया था. अपने साहसी व्यक्तित्व के इस पहलू को वह केवल परिवारजनों के ही नहीं, पूरे समाज के सामने लाना चाहती थी, यानी इस तरह घर से ठुकराई गई बेटियां मरती नहीं, बल्कि जिंदा रहती हैं, पूरे आदरसम्मान और उज्ज्वल चरित्र के साथ.

ठुकराए जाने के बाद अपने पिता का घर छोड़ते समय के क्षण ज्योति को याद आए. मन में गहन पीड़ा और भय का समुद्र उफन रहा था. फिर भी उस ने निश्चय किया था कि वह मरेगी नहीं, वह जिएगी. वह अपने गर्भ में पल रहे भ्रूण को भी नष्ट नहीं करेगी. उसे जन्म देगी और पालपोस कर बड़ा करेगी. वह समाज के सामने खुद को लज्जित अनुभव कर के अपने बच्चे को हीन भावना का शिकार नहीं होने देगी. वह समाज के निकृष्ट पुरुष के चरित्रों के सामने इस बात का प्रमाण उपस्थित करेगी कि पुरुषों द्वारा छली गई युवतियों को भी उसी तरह का अधिकार है, जिस तरह कुंआरियों या विवाहिताओं को. वह यह भी न जानना चाहेगी कि उस का प्रेमी जीवित है या मर गया. वह स्वयं को विधवा मान चुकी थी, केवल विधवा. किस की विधवा इस से उसे कोई मतलब नहीं था.

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इस मानसिकता ने उस नींव का काम किया था, जिस पर उस के दृढ़ चरित्र का भवन और बच्चे का भविष्य खड़ा था. उस ने घरघर नौकरी की. पढ़ाई आगे बढ़ाई. बच्चे को पालतीपोसती रही. जिस ने उस के शरीर को छूने की कोशिश की, उस पर उस ने अपने शब्दों के ही ऐसे प्रहार किए कि वह भाग निकला. आत्मविश्वास बढ़ता गया और उस ने कुछ भलेबुजुर्ग लोगों को आपबीती सुना कर स्कूल में नौकरी पा ली. एक घर ढूंढ़ लिया और अब अपने महल्ले की इज्जतदार महिलाओं में वह जानी जाती थी.

ज्योति का अब तक का एकाकी जीवन उस के भविष्य की तैयारी था. उस भविष्य की जिस के सहारे वह समाज के बीच रह सके और यह जता सके कि जिस समाज में उसे छलने वाले जैसे प्रेमी अपना मुंह छिपा कर रहते हैं, ग्लानि का बोझ सहने के बाद भी दुनिया के सामने हंसते हुए देखे जाते हैं, वहां उन के द्वारा ठुकराई हुई असफल प्रेमिकाएं भी अपने प्रेम के अनपेक्षित परिणाम पर आंसू न बहा कर उसे ऐसे वरदान का रूप दे सकती हैं, जो उन्हें तो स्वावलंबी बना ही देता है, साथ ही पुरुष को भी अपने चरित्र के उस घिनौने पक्ष के प्रति सोचने का मौका देता है.

उस एकाकीपन में ऐसे क्षण भी कम नहीं आए थे, जब ज्योति के लिए किसी पुरुष का साथ अपरिहार्य महसूस होने लगा था. कई बार उस ने सोचा भी था कि इस समाज के कीचड़ में कुछ ऐसे कमल भी होंगे, जो उसे अपना लेंगे. कुछ ऐसे व्यक्तित्व भी उसे मिलेंगे, जिन में उस जैसी ठुकराई हुई लड़कियों के लिए चाहत होगी.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

एक और आकाश : भाग 1- कैसे पाया खोया हुआ मुकाम

उस गली में बहुत से मकान थे. उन तमाम मकानों में उस एक मकान का अस्तित्व सब से अलग था, जिस में वह रहती थी. उस के छोटे से घर का अपना इतिहास था. अपने जीवन के कितने उतारचढ़ाव उस ने उसी घर में देखे थे. सुख की तरह दुख की घडि़यों को भी हंस कर गले लगाने की प्रेरणा भी उसे उसी घर ने दी थी.

कम बोलना और तटस्थ रहते हुए जीवन जीना उस का स्वभाव था. फिर भी दिन हो या रात, दूसरों की मुसीबत में काम आने के लिए वह अवश्य पहुंच जाती थी. लोगों को आश्चर्य था कि अपने को विधवा बताने वाली उस शांति मूर्ति ने स्वयं के लिए कभी किसी से कोई सहायता नहीं चाही थी.

अपने एकमात्र पुत्र के साथ उस घर की छोटी सी दुनिया में खोए रह कर वह अपने संबंधों द्वारा अपने नाम को भी सार्थक करती रहती थी. उस का नाम ज्योति था और उस के बेटे का नाम प्रकाश था. ज्योति जो बुझने वाली ही थी कि उस में अंतर्निहित प्रकाश ने उसे नई जगमगाहट के साथ जलते रहने की प्रेरणा दे कर बुझने से बचा लिया था.

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तब से वह ज्योति अपने प्रकाश के साथ आलोकित थी. जीवन के एकाकी- पन की भयावहता को वह अपने साहस और अपनी व्यस्तता के क्षणों में डुबो चुकी थी. प्यार, कर्तव्य और ममता के आंचल तले अपने बेटे के जीवन की रिक्तताओं को पूर्णता में बदलते रहना ही उस का एकमात्र उद्देश्य था.

उस दिन ज्योति के बच्चे की 12वीं वर्षगांठ थी. पिछली सारी रात उस की बंद आंखों में गुजरे 11 वर्षों का पूरा जीवन चित्रपट की तरह आताजाता रहा था. उन आवाजों, तानों, व्यंग्यों, कटाक्षों और विषम झंझावातों के क्षण मन में कोलाहल भरते रहे थे, जिन के पुल वह पार कर चुकी थी. उस जैसी युवतियों को समाज जो कुछ युगों से देता आया था, वह उस ने भी पाया था. अंतर केवल इतना था कि उस ने समाज से पाया हुआ कोई उपहार स्वीकार नहीं किया था. वह चलती रही थी अपने ही बनाए हुए रास्ते पर. उस के मन में समाज की परंपरागत घिनौनी तसवीर न थी, उसे तलाश थी उस साफ- सुथरे समाज की, जिस का आधार प्रतिशोध नहीं, मानवीय हो, उदार हो, न्यायप्रिय और स्वार्थरहित हो.

अपनी जिंदगी याद करतेकरते अनायास ज्योति का मन कहीं पीछे क्यों लौट चला था, वह स्वयं नहीं जान पाई थी. मन जहां जा कर ठहरा, वहां सब से पहला चित्र उस की अपनी मां का उभरा था. उसे बच्चे की वर्षगांठ मनाने की परंपरा और संस्कार उसी मां ने दिए थे. वह स्वयं उस का और उस के भाई का जन्मदिन एक त्योहार की तरह मनाती थीं. याद करतेकरते मन में कुछ ऐसी भी कसक उठी जो आंखों के द्वारों से आंसू बन कर बहने के लिए आतुर हो उठी. उस ने आंखें पोंछ डालीं. यादों का सिलसिला चलता रहा…

काश, कहीं मां मिल जातीं. केवल उस दिन के लिए ही मिल जातीं. मां प्रकाश को भी उसी तरह आशीष देतीं जैसे उसे दिया करती थीं. उसे विश्वास था कि बड़ेबूढ़ों के आशीर्वाद में कोई अदृश्य शक्ति होती है. भले ही उस की मां के आशीर्वाद उस के अपने जीवन में फलदायक न हो सके हों, परंतु वह अब जो कुछ भी थी, उस में मां के आशीर्वाद के प्रभाव का अंश, बचपन में मां से मिले संस्कारों का असर अवश्य रहा होगा.

मन रुक न सका. सुबह होतेहोते ज्योति कागजकलम ले कर बैठ गई थी. भावनाओं के मोती शब्दों के रूप में कागज पर बिखरने लगे थे. 11 वर्ष की लंबी अवधि में मां के नाम ज्योति का यह पहला पत्र था. उसे भरोसा था कि वह उस पत्र को लिखने के बाद पोस्ट अवश्य करेगी. हमेशा की तरह वह पत्र टुकड़ों में बदल जाए, अब वह ऐसा नहीं होने देगी.

वह लिखे जा रही थी और आंखें पोंछती जा रही थी. कैसी विडंबना थी कि आज उसे उस घर की धुंधली पड़ गई छवि को नए रूप में याद करना पड़ रहा था जो कभी उस का अपना घर भी था. उस में वह 16 वर्ष की आयु तक पलीबढ़ी, पढ़ीलिखी थी. उस की बनाई हुई पेंटिंगों से उस घर की बैठक की दीवारों की शोभा बढ़ी थी. उस घर के आंगन में उस के नन्हेनन्हे हाथों ने एक नन्हा सा आम का पौधा लगाया था.

वह कल्पना में अपना अतीत स्पष्ट देख रही थी. पत्र को अधूरा छोड़ कर होंठों के बीच कलम दबाए हुए आंसू भरी आंखों के साथ सोच रही थी. मां बहुत बूढ़ी हो चली थीं, शायद अपनी उम्र से अधिक. पिता के चेहरे पर कुछ रेखाएं बढ़ जाने के बावजूद उन की आवाज में अब भी वही रोब था, शान थी और अपने ऊंचे खानदान में होने का अहंकार था. वह अपने समाज और खानदान में वयोवृद्ध सदस्य की तरह आदर पा रहे थे. भाई के सिर के बाल सफेद होने लगे थे. भाभी  आ गई थीं. घर के आंगन में नन्हेमुन्ने भतीजेभतीजी खेल रहे थे.

सोच रही थी ज्योति. बैठक की दीवार पर लगी पेंटिंगें हटाई नहीं गई थीं. शायद इसलिए कि घर वालों की दृष्टि में वह भले ही मर चुकी हो, लेकिन उन पेंटिंगों के बहाने उस की याद जिंदा रही. नित्य उन की धूलगर्द झाड़तेपोंछते समय उसे जरूर याद किया जाता होगा. कभी आंगन में लगाया गया आम का पौधा बढ़तेबढ़ते आज वृक्ष का रूप ले चुका था. उस में फल आने लगे थे और प्रत्येक फल की मिठास में एक विशेष मिठास थी, उस की याद की, उस घर की बेटी की यादों की.

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इस तरह वह पत्र पूरा हो चला था, जगहजगह आंखों से टपके आंसू की मुहरों के साथ. उस पत्र में ज्योति ने अपने अब तक के जीवन की पुस्तक का एकएक पृष्ठ खोल कर रख दिया था, कहीं कोई दाग न था. वह पत्र मात्र पत्र न था, कुछ सिद्धांतों का दस्तावेज था. उस के अपने आत्मविश्वास की प्रतिछवि था वह. उस में आह्वान था एक नए आकार का, जिस के तले नई सुबहें होती हों, नई रातें आती हों. उस के तले जीने वाला जीवन, जीवन कहे जाने योग्य हो. ऐसा जीवन, जो केवल अपने लिए न हो कर दूसरों के लिए भी हो.

ज्योति ने उस पत्र की प्रतिलिपि को अपने पास सहेज कर एक हितैषी द्वारा दूसरे शहर के डाकघर से भिजवा दिया था.

7 दिन बीत चुके थे. इस बीच ज्योति के मन के भीतर विचित्र अंतर्द्वंद्व चलता रहा था. कौन जाने उस के पत्र की प्रतिक्रिया घर वालों पर क्या हुई होगी. पत्र अब तक तो पहुंच चुका होगा. 33 किलोमीटर दूर स्थित दूसरे शहर के डाकघर से पत्र भेजने का अभिप्राय केवल इतना था कि वह पत्र का उत्तर आए बिना, अपना असली पता नहीं देना चाहती थी. जवाब के लिए भी उस ने दूसरे शहर में रहने वाले एक ऐसे सज्जन महेंद्र का पता दिया था जो उसे असली पते पर पत्र भेज देते.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

एक और आकाश : कैसे पाया खोया हुआ मुकाम

सम्मान वापसी : भाग 3- क्या उसे मिल पाया उसका सम्मान

डाक्टर ने शालू का चैकअप किया और बोला कि परेशानी की कोई बात नहीं है. कमजोरी की वजह से इन को चक्कर आ गया था. दवा पिला दीजिए और इन का ध्यान रखिए. ये मां बनने वाली हैं और ऐसी हालत में लापरवाही ठीक नहीं है.’’

डाक्टर के मुंह से मां बनने की बात सुन कर रामबरन हक्केबक्के रह गए. डाक्टर के जाते ही सब से सवालों की झड़ी लगा दी.

दीपा बूआ ने पूरी बात रामबरन को बताई और बोलीं, ‘‘भैया, गौने की तारीख जल्दी से पक्की कर के आइए. अभी कुछ नहीं बिगड़ा है. सब ठीक हो जाएगा.’’

उधर होश में आते ही शालू रोने लग गई. रोतेरोते वह बोली, ‘‘बाबूजी, मुझे माफ कर दीजिए. मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई.’’

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रामबरन शालू के सिर पर हाथ रख कर लंबी सांस ले कर बाहर चले गए.

अगले दिन वे फिर शालू की ससुराल गए. घर पर दीपा और शालू बेचैन घूम रही थीं कि न जाने क्या खबर आएगी.

रामबरन दिन ढले थकेहारे घर आए और आते ही सिर पर हाथ रख कर बैठ गए. उन को इस तरह बैठे देख सब का दिल बैठा जा रहा था. सब सांस रोक कर उन के बोलने का इंतजार कर रहे थे.

रामबरन रुंधे गले से बोले, ‘‘मेरी बेटी की जिंदगी बरबाद हो गई. उन लोगों ने गौना कराने से साफ मना कर दिया. रमेश बोल रहा था कि वह कभी मिलने नहीं आता था. दीपा, वे लोग मेरी बेटी पर कीचड़ उछाल रहे हैं. तू ही बता कि अब क्या करूं मैं?’’

दीपा बूआ और शालू दोनों रोने लगीं. किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. उस रात किसी ने कुछ नहीं खाया और सब ने अपनेअपने कमरे में करवटें बदलबदल कर रात बिताई.

सुबह हुई. शालू ने उठ कर मुंह धोया और बहुत देर तक खुद को आईने में देखती रही. मन ही मन एक फैसला लिया और बाहर आई.

रामबरन बरामदे में बैठे थे और शालू उन के पैरों के पास जमीन पर बैठ गई और बोली, ‘‘बाबूजी, मुझ से एक गलती हो गई है. लेकिन इस बच्चे को मारने का पाप मुझ से नहीं होगा. मुझ से यह पाप मत करवाइए.’’

रामबरन ने शालू का हाथ पकड़ लिया और बोले, ‘‘बेटी, क्या चाहती है बोल? मैं तेरे साथ हूं. मैं तेरे लिए सारी दुनिया से लड़ने के लिए तैयार हूं.’’

रामबरन की बात सुन कर शालू बोली, ‘‘बाबूजी, इस नन्ही सी जान को मैं सारी दुनिया से लड़ कर इस दुनिया में लाऊंगी और उस रमेश को नहीं छोडं़ूगी. अपने बच्चे को उस के बाप का नाम और हक दोनों दिलाऊंगी. रमेश बुजदिल हो सकता?है लेकिन मैं नहीं हूं. मैं आप की बेटी हूं, हार मानना नहीं सीखा है.’’

अपनी बेटी की बातें सुन कर रामबरन की आंखें भर आईं. वे आंसू पोंछ कर बोले, ‘‘हां बेटी, मैं हर पल हर कदम पर तेरी लड़ाई में साथ हूं.’’

अगले दिन शालू और रामबरन दोनों जा कर वकील से मिले और उन को सारी बातें समझाईं. वकील ने शालू को इतना बड़ा कदम उठाने के लिए सब से पहले शाबाशी दी और बोले, ‘‘बेटी, तुम परेशान न हो. हम यह लड़ाई लड़ेंगे और जरूर जीतेंगे.’’

धीरेधीरे समय बीतने लगा. रमेश पर केस दर्ज हो गया था. शालू हर पेशी पर अपने बाबूजी के साथ अदालत में अपने बच्चे के हक के लिए लड़ रही थी तो बाहर दुनिया से अपनी इज्जत के लिए. उस का बढ़ता पेट देख कर गांव वालों में कानाफूसी शुरू हो गई थी.

लोग कई बार उस के मुंह पर बोल देते थे, ‘देखो, कितनी बेशर्म है. पहले मुंह काला किया, अब बच्चा जनेगी और केस लड़ेगी.’

शालू सारी बातें सुन कर अनसुना कर देती थी. समय बीतता गया और शालू ने समय पूरा होने पर एक खूबसूरत से बेटे को जन्म दिया.

अदालत की तारीखें बढ़ रही थीं और रामबरन का बैंक बैलैंस खत्म हो रहा था. खेत बेचने तक की नौबत आ गई थी. लेकिन बापबेटी ने हिम्मत नहीं हारी, लड़ाई जारी रखी.

वे कई सालों तक लड़ाई लड़ते रहे. एक दिन रामबरन को एक रिश्तेदार ने एक रिश्ता बताया. वे लोग शालू की सारी सचाई जानते थे. लेकिन जब तक केस खत्म नहीं हो जाता, तब तक शालू अपनी जिंदगी के लिए कोई भी फैसला लेने को तैयार नहीं थी.

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इधर रमेश और उस के घर वाले अदालत के चक्कर लगालगा कर परेशान हो चुके थे. वे लोग चाहते थे कि समझौता हो जाए. शालू उन के घर आ जाए और वे बच्चे को भी अपना खून मानने के लिए तैयार थे, लेकिन शालू ने सख्ती से मना कर दिया और लड़ाई जारी रखी.

आखिरकार शालू की जीत हुई. अदालत ने रमेश को सजा सुनाई और उसे जेल भेज दिया गया. वहीं उसे और उस के बेटे को रमेश की जायदाद में हिस्सेदारी भी दी गई.

शालू ने हिम्मत दिखा कर अपना खोया हुआ मानसम्मान व अपने बेटे का हक सब वापस जीत लिया था. शालू इस जीत पर बेहद खुश थी. इधर शालू की शादी के लिए भी वे लोग जोर देने लग गए थे.

एक दिन रामबरन ने शालू और योगेश की शादी करा दी. योगेश शालू को ले कर मुंबई चला गया. डेढ़ साल बाद शालू और योगेश मुंबई से वापस आए तो शालू की गोद में 6 महीने की एक प्यारी सी बच्ची भी थी.

शाम को रामबरन जब घर आए तो देखा कि आंगन में शालू और योगेश अपने दोनों बच्चों के साथ खेलने में मगन थे. वे अपनी बेटी के उचित फैसले पर मुसकरा कर अंदर चले गए.

सम्मान वापसी : भाग 2- क्या उसे मिल पाया उसका सम्मान

शालू को रमेश के साथ बिताए ये चंद पल जिंदगी के सब से हसीन पल लग रहे थे. उसे इस नई छुअन का एहसास बारबार हो रहा था जो उस के साथ पहली बार था.

उस दिन की मुलाकात के बाद शालू और रमेश अकसर रोजाना मिलने लगे. कभी घंटों तो कभी मिनटों की मुलाकातों ने सारी हदें पार कर दीं. प्यार की आंधी इतनी जोर से चली कि सारे बंधन टूट गए और वे दोनों रीतिरिवाज के सारे बंधन तोड़ कर उन में बह गए.

छुट्टियां खत्म होते ही रमेश वापस होस्टल चला गया. इधर शालू उस के खयालों में दिनरात खोई रहती थी. शालू की रातें अब नींद से दूर थीं. उसे भी तकिए की जरूरत और रमेश की यादें सताने लगी थीं.

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कुछ दिनों से शालू को कमजोरी महसूस होने लगी थी. पूरे बदन में हलकाहलका दर्द रहता था.

एक दिन शालू सुबह सो कर उठी तो चक्कर आ गया और उबकाई आने लगी. उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था. वह आ कर अपने कमरे में चुपचाप लेट गई.

शालू को इतनी देर तक सोता देख दीपा बूआ उस के कमरे में चाय ले कर आईं और बोलीं, ‘‘तबीयत ज्यादा खराब हो तो डाक्टर के पास चलते हैं.’’

शालू ने मना कर दिया और बोली, ‘‘नहीं बूआ, बस जरा सी थकावट लग रही है. बाकी मैं ठीक हूं.’’

दीपा बूआ बोलीं, ‘‘ठीक है, फिर चाय पी लो. आराम कर लो, फिर बाजार चलते हैं. कुछ सामान ले कर आना?है.’’

शालू चाय पीने लगी तो उसे फिर से उबकाई आने लगी. वह भाग कर बाहर गई और उसे उलटियां आनी शुरू हो गईं. दीपा बूआ उसे उलटी करती करते देख परेशान हो गईं और शालू से पूछने लगीं, ‘‘शालू, सच बता, तुझे यह सब कब से हो रहा है? कहीं तू पेट से तो नहीं है?’’

शालू बोली, ‘‘अरे नहीं बूआ. पेट में गैस बनी होगी इसलिए उलटी हो रही है. ऐसा कुछ नहीं है.’’

दीपा बूआ का दिल नहीं माना. वे शालू को ले कर नजदीक के सरकारी अस्पताल में गईं तो पता चला कि शालू सच में पेट से थी. यह सुन कर दीपा बूआ सन्न रह गईं.

घर आ कर दीपा बूआ शालू को झकझोरते हुए पूछने लगीं, ‘‘यह क्या किया शालू तू ने? कहा था कि तेरा अभी गौना नहीं हुआ है. रमेश से मिलने मत जाया कर. कुछ ऊंचनीच हो गई तो क्या होगा. लेकिन तेरी अक्ल पर तो पत्थर पड़े थे. अब बता कि हम क्या करें?’’

शालू सिर्फ रोए जा रही थी क्योंकि गलती तो उस से हुई ही थी, लेकिन अभी भी सुधर सकती थी. उस ने दीपा बूआ से कहा, ‘‘बूआ, आप बाबूजी से बात करो कि वे मेरा गौना करा दें और मैं रमेश से बात करती हूं. मैं उसे बताती हूं. वह जरूर कुछ करेगा.’’

सुबह सब लोग चाय पी रहे थे तब दीपा बूआ ने रामबरन से शालू के गौने की बात छेड़ी तो रामबरन बोले, ‘‘हां, मुझे भी पता है कि अब गौना निबटा देना चाहिए. बेटी राजीखुशी अपनी ससुराल में रहे. मैं उन लोगों से कल ही बात करता हूं.’’

यह सुन कर दीपा और शालू दोनों ने चैन की सांस ली. शालू जब सिलाई सैंटर गई तो सब से पहले जा कर उस ने पीसीओ से रमेश को फोन किया और सारी बात बताई जिसे सुन कर रमेश शालू पर बुरी तरह बरस पड़ा, ‘‘यह क्या बेवकूफों वाली हरकत की तुम ने, अभी तो मैं पढ़ रहा हूं और इतनी जल्दी बच्चा नहीं चाहिए मुझे. जा कर डाक्टर से इस को गिराने की दवा ले आओ.

‘‘मैं अभी इस की जिम्मेदारी नहीं उठाऊंगा. और लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे. पूरे गांव में मेरी बदनामी होगी.

‘‘सब मेरा मजाक उड़ाएंगे कि गौने से पहले बाप बन गया. नहींनहीं शालू, यह बच्चा नहीं चाहिए मुझे,’’ यह बोल कर रमेश ने फोन रख दिया और शालू ‘हैलोहैलो’ कहती रह गई.

उस दिन शालू का मन सिलाई सैंटर में भी नहीं लगा. वह जल्दी घर वापस आ गई और अपने कमरे में जा कर अंदर से दरवाजा बंद कर औंधे मुंह बिस्तर पर गिर गई. उस के कानों में रमेश की बातें गूंज रही थीं, ‘दवा खा लो, बच्चा गिरा दो…’ उस ने दोनों हाथों से कान बंद कर लिए और जोर चीख पड़ी, ‘नहीं…’

शालू की चीख सुन कर दीपा बूआ दौड़ कर आईं और दरवाजा जोरजोर से पीटने लगीं.

दरवाजा खोलते ही शालू दीपा बूआ के गले लग कर जोरजोर से रो पड़ी. काफी देर तक रो लेने के बाद जब उस का जी हलका हुआ तब दीपा ने उस के आंसू पोंछते हुए प्यार से पूछा, ‘‘क्या हुआ, क्यों रो रही है? रमेश से बात हुई? क्या बोला उस ने?’’

दीपा ने पुचकार कर पूछा तो शालू फिर बिलख पड़ी और बोली, ‘‘बूआ, रमेश ने कहा है कि उसे यह बच्चा अभी नहीं चाहिए. वह बोल रहा है कि मैं दवा खा लूं और इस बच्चे को गिरा दूं.’’

‘‘तू ने क्या जवाब दिया? तू क्या करने वाली है?’’ दीपा बूआ ने उस का कंधा पकड़ कर पूछा.

शालू बोली, ‘‘बूआ, उस ने मेरी बात ही नहीं सुनी. उस ने फोन काट दिया.

‘‘बूआ, अब आप ही बताओ कि मैं क्या करूं?’’

दीपा बूआ ने शालू को अपनी छाती से लगा लिया और उस के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोलीं, ‘‘तू परेशान मत हो. आज तेरी ससुराल बात करने भैया गए हैं. एक बार तेरा गौना हो गया तो सब ठीक हो जाएगा. और देखना, रमेश भी इस बच्चे को अपना लेगा.’’

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दीपा बूआ की बातें सुन कर शालू को थोड़ी राहत मिली. उस का मन थोड़ा शांत हो गया.

शाम को रामबरन घर आए तो शालू का दिल जोरजोर से धड़कने लगा. वह सुनने के लिए परेशान थी कि उस की ससुराल वालों ने कब की तारीख पक्की की है.

दीपा बूआ पानी ले कर रामबरन के पास गईं और पानी दे कर उन से पूछने लगीं, ‘‘शालू की ससुराल वाले क्या बोल रहे हैं?’’

शालू भी दरवाजे के पीछे खड़ी हो कर दिल थाम कर सारी बातें सुन रही थी.

‘‘शालू की ससुराल वाले बोल रहे हैं कि रमेश की पढ़ाई का अभी एक साल और है इसलिए वे लोग नहीं ले जाएंगे. अभी हमारी शालू एक साल हमारे पास और रहेगी,’’ रामबरन मूंछों पर ताव देते हुए मुसकरा कर बोले.

रामबरन की बातें सुन कर दीपा बूआ के हाथ से गिलास छूट कर गिर गया.

रामबरन चौंक कर दीपा की तरफ देखने लगे. इस से पहले कोई कुछ बोलता, दरवाजे के पास खड़ी शालू बेहोश हो कर गिर पड़ी.

वे दोनों दौड़ कर शालू के पास गए और उसे उठा कर उस के कमरे में ले गए. डाक्टर को बुलाया गया.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

सम्मान वापसी : भाग 1- क्या उसे मिल पाया उसका सम्मान

शालू बड़ी सावधानी से घर में दाखिल हुई. इधरउधर देख कर वह दबे पैर अपने कमरे के तरफ बढ़ी, लेकिन दरवाजे पर पहुंचने से पहले ही दीपा बूआ ने उस का हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींच लिया.

दीपा बूआ तकरीबन धकेलते हुए दीपा को कमरे के अंदर ले गईं और अंदर जाते ही सवालों की झड़ी लगा दी, ‘‘कहां गई थी? इतनी देर कहां थी? तू आज फिर रमेश से मिलने गई थी?’’

‘‘हां, मैं रमेश से मिलने गई थी,’’ शालू खाऐखोए अंदाज में बोली.

दीपा बूआ शालू की हालत और उस के हावभाव देख कर परेशान हो कर समझाने लगीं, ‘‘देख शालू, तू रमेश के प्यार में पागल हो गई है, लेकिन तेरा इस तरह उस से मिलनाजुलना ठीक नहीं है. अगर कुछ ऊंचनीच हो गई तो गांव में भैया की क्या इज्जत रह जाएगी…’’

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दीपा बूआ काफी देर तक समझाने की नाकाम कोशिश करती रहीं लेकिन शालू तो जैसे रमेश के प्यार में बावली हो गई थी. उस को ऊंचनीच, सहीगलत कुछ नजर नहीं आ रहा था.

शालू के पिता रामबरन गांव के रसूखदार किसान माने जाते थे. 2 जोड़ी बैल, 4-5 भैंसें, ट्रैक्टरट्रौली, पचासों बीघा खेत, सभी सुखसुविधाओं से भरा बड़ा सा पक्का मकान. सबकुछ उन्होंने अपनी मेहनत से बनाया था.

रामबरन के घर में उन की पत्नी, एक बेटा और बेटी थी. पति से अनबन होने की वजह से उन की छोटी बहन भी उन के साथ ही रहती थी. बड़ा बेटा अजय अभी पढ़ रहा था जबकि बेटी शालू सिर्फ 8वीं जमात तक पढ़ने के बाद पढ़ाई छोड़ कर घर पर मां के साथ घर के कामों में हाथ बंटाती थी.

शालू जब 8वीं जमात में पढ़ रही थी तभी बगल के गांव में ही उस की शादी कर के रामबरन ने बेटी की जिम्मेदारी से छुटकारा पा लिया था.

शादी के समय शालू का होने वाला पति 10वीं जमात में पढ़ता था. दोनों शादी के समय छोटे थे इसलिए शादी के बाद गौने में विदाई तय थी.

शालू और रमेश का गांव अगलबगल में ही था इसलिए बाजार में या किसी दूसरे काम से आनेजाने पर कभीकभार दोनों का सामना हो ही जाता था.

समय बीतता गया. रमेश और शालू दोनों बड़े हो गए थे. रमेश 10वीं जमात पास करने के बाद आगे की पढ़ाई करने के लिए शहर में अपने चाचा के पास चला गया था और उस के बाद होस्टल में रहने लगा था. वह घर पर बहुत कम आता था और अब उस को शहर और होस्टल की हवा लग गई थी.

शालू घर के कामों में बेहद माहिर हो गई थी. यह देख कर रामबरन ने उसे सिलाई सीखने की इजाजत दे दी थी इसलिए अपनी कुछ सहेलियों के साथ वह सिलाई सीखने जाती थी.

शालू को ऊपर वाले ने बड़ी ही फुरसत से बनाया था. साफ चमकता हुआ बेदाग चेहरा, दूध और गुलाब की पंखुड़ी जैसे गुलाबी गालों का रंग, बड़ीबड़ी कजरारी झील जैसी गहरी आंखें, तोते सी नाक, गुलाबी होंठ, कमर तक लहराते काले घने रेशमी बाल, भरा हुआ बदन, आंखों पर काजल ऐसा लगता था जैसे किसी ने चांद पर कालिख की बिंदी लगा दी हो.

सुबह जब शालू तैयार हो कर सिलाई सीखने के लिए साइकिल ले कर सिलाई सैंटर जाती थी तो उस को देख कर गांव के न जाने कितने मनचलों की नीयत खराब हो जाती थी.

शालू को देखते ही तरहतरह की बातें करते हुए लड़के अपने होंठों पर जीभ फेरने लगते थे, जिस का अंदाजा शालू को भी होता था लेकिन वह किसी को भी घास नहीं डालती थी क्योंकि उसे अपने और रमेश के रिश्ते का मतलब पता था.

दीवाली आ रही थी. कालेज बंद हो रहे थे. रमेश के साथ होस्टल में रहने वाले सभी लड़के घर चले गए थे और रमेश की मां ने भी इस बार घर आने के लिए बहुत दबाव बनाया था इसलिए वह इस दीवाली पर अपने?घर आया था.

अगले दिन रमेश गांव के दोस्तों के साथ एक पान की दुकान पर खड़ा था तभी बगल से शालू साइकिल ले कर निकली. रमेश ने जब उसे देखा तो उसे देखता ही रह गया. एक पल को तो उसे लगा जैसे आसमान से कोई परी जमीन पर आ गई है लेकिन थोड़ी ही देर बाद उसे लगा कि यह चेहरा जानापहचाना सा है. वह उसे याद करने की कोशिश करने लगा कि इसे कहां देखा है, लेकिन काफी दिन बीत जाने व कोई मेलजोल न होने की वजह से याद नहीं आ रहा था.

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शालू की तरफ एकटक निहारते देख उस के दोस्त ने कुहनी मारी और बोला, ‘‘क्या रमेश भाई, भाभी को देख कर कहां खो गए?’’

रमेश अचकचा कर बोला, ‘‘अरे कहीं नहीं यार, कौन भाभी, किस की भाभी?’’

तब रमेश के दोस्त ने उसे बताया कि वह जिस हसीना को इतने गौर से देख रहा था वह उस की ही बीवी शालू है.

दोस्त के मुंह से यह सुन कर रमेश का मुंह खुला का खुला रह गया. वह शालू की खूबसूरती व गदराया बदन देख कर हैरान रह गया था. अब उस को एकएक पल काटना भारी पड़ने लगा था.

जैसेतैसे रात कटी तो सुबहसुबह रमेश ने किसी तरह जुगाड़ लगा कर शालू को मिलने के लिए संदेशा भिजवाया.

संदेशा सुनकर शालू सोच में पड़ गई थी क्योंकि इस संदेशे में रमेश ने मिलने को कहा था लेकिन वह सोच रही थी कि अगर रमेश से मिलते हुए किसी ने देख लिया तो बदनामी होगी और अगर न मिलने गई तो रमेश के नाराज होने का डर था.

शालू का मन भी रमेश से मिलने के लिए बेताब था. डरतेडरते शालू ने आने का वादा कर लिया. शाम को दिन ढलने के बाद वह सब से छिप कर दबे पैर गांव के बाहर आम के बगीचे में गई जहां पर रमेश पहले से आ कर उस का इंतजार कर रहा था.

गांव वाले बगीचे में गन्ने की सूखी पत्तियों व पुआल का ढेर लगा कर रखते थे. दोनों उसी की ओट में बैठ कर बांहों में बांहें डाले बातें करने लगे.

थोड़ी देर रमेश के साथ गुजार कर शालू घर आ गई. घर आ कर अपने कमरे में बिस्तर पर गिर गई. उस के हाथपैरों में कंपन हो रही थी. उसे अपने हाथों में रमेश के हाथों की गरमाहट अब तक महसूस हो रही थी.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

सम्मान वापसी : क्या उसे मिल पाया उसका सम्मान

रिश्तों की डोर : भाग 3- सुनंदा की आंखों पर पड़ी थी पट्टी

बेटे को मन ही मन शर्मिंदगी का एहसास हुआ. मां को उस ने अपने आने की बात इस डर से नहीं बताई थी कि शायद सुनंदा तैयार न हो और सुनंदा की मम्मी ने अपनी मजबूरी जता दी.

‘‘अच्छा मां, मैं सुनंदा से पूछता हूं.’’

विनय ने सुनंदा से बात की. सुनंदा को बुखार में पड़े हुए 5 दिन हो गए थे. बहुत अधिक कमजोरी आ गई थी. विनय चाहते हुए भी उस की वैसी देखभाल नहीं कर पा रहा था जैसी होनी चाहिए थी.

सुनंदा ने भी सोचा कि कौन सा वह हमेशा के लिए रहने जा रही है. जब ठीक हो जाएगी तब वापस आ जाएगी. यह सोच कर उस ने हामी भर दी. अपने फ्लैट में ताला लगा कर विनय, सुनंदा को ले कर मां के पास रहने चला गया.

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सुनंदा का बुखार अगले कुछ दिनों में और बिगड़ गया. ब्लड टैस्ट हुए. उसे टायफायड हो गया था. मांबेटी ने सुनंदा की देखभाल में रातदिन एक कर दिया. परीक्षा होते हुए भी वानिया, सुनंदा की देखभाल में मां का पूरा साथ देती. मां बहू के सिरहाने बैठ कर उस का सिर सहलाती रहतीं, ठंडे पानी की पट्टियां करतीं. सुनंदा इस समय इतनी दयनीय स्थिति में थी कि मांबेटी अपना सारा वैमनस्य भूल कर उस की देखभाल कर रही थीं.

सुनंदा अर्धबेहोशी में सबकुछ महसूस करती. मां उसे अपने हाथ से खिलातीं, वानिया सूप, जूस व दलिया बना कर लाती. भाई भी निश्ंिचत हो कर नौकरी पर जा पा रहे थे. धीरेधीरे सुनंदा की तबीयत ठीक होने लगी. अभी कमजोरी बहुत ज्यादा थी. वानिया भाभी को सहारा दे कर कुरसी पर बिठा देती, उस का बिस्तर ठीक कर देती, स्पंज कर कपड़े बदल देती. सुनंदा की कमजोरी भी ठीक होने लगी. उसे पता था कि उस की मम्मी ने अपनी मजबूरी जता दी थी और जिस सास के साथ उस ने कभी सीधे मुंह बात नहीं की, हर समय उस का व्यवहार उस के साथ तना हुआ ही रहा, उसी सास ने अपना सारा बैरभाव भूल कर, कितने प्यार व अपनेपन से उस की देखभाल की.

सुनंदा सोचने लगी कि अगर उस की भाभी की तबीयत खराब होती तो क्या मम्मी मजबूरी जता देतीं…शायद नहीं, भाभी उन की जिम्मेदारी हैं और भाभी भी तो कितनी अच्छी हैं. उस के मातापिता का कितना खयाल करती हैं. दूसरे शहर में रहते हुए भी उस के मम्मीपापा के प्रति पूरी जिम्मेदारी समझती हैं. सुनंदा के प्रति भी उन का व्यवहार कितना प्यार भरा है पर उस ने क्या जिम्मेदारी समझी अपनी सासननद के प्रति, जोकि एक तरह से उस के ऊपर ही निर्भर थे. क्या पढ़ने वाली कुंआरी ननद के प्रति उस का कोई फर्ज नहीं था? उस की देखभाल व उस का भविष्य निर्धारित करने का जिम्मा पिता के न होने पर क्या बड़े भाईभाभी का नहीं था. वृद्ध मां आखिर किस की जिम्मेदारी हैं. उन के रवैए से परेशान हो कर ही मां ने उन्हें जाने के लिए कहा था. बीमारी के बाद बिस्तर पर लेटी सुनंदा खुद से ही सवालजवाब करती रही. जब इनसान पर परेशानियां पड़ती हैं तभी अपनों का महत्त्व समझ में आता है और आदमी की विचारधारा भी बदलती है.

सुनंदा ठीक हो गई. एक दिन सुबह नहाधो कर मां के पास बैठ गई और बोली, ‘‘मांजी, मैं अब ठीक हूं…सोचती हूं परसों से आफिस जाना शुरू कर दूं.’’

‘‘ठीक है,’’ मां संक्षिप्त सा जवाब दे कर चुप हो गईं क्योंकि उन के दिल के घाव पर पपड़ी तो जम गई थी पर घाव सूख नहीं पाया था. बीमार सास के प्रति बहू ने भले ही अपना फर्ज नहीं निभाया था पर उन्होंने अपने फर्ज का पालन किया था. उन्होंने मन ही मन सोचा कि सुनंदा अब अपने घर जाने की सोच रही है इसीलिए वह भूमिका बांध रही है. तो जाए…उन्हें एतराज भी क्या हो सकता है.

सुनंदा कोमल स्वर में बोली, ‘‘सोचती हूं…मैं आफिस चली जाती हूं…मुझे भी इतना समय नहीं मिल पाता कि सुबहशाम खाना बना सकूं इसलिए खाना बनाने वाली का प्रबंध कर देते हैं और साफसफाई करने वाली कपड़े धोने का काम भी कर लिया करेगी, उस की तनख्वाह बढ़ा देंगे.’’

‘‘नहीं, इस की जरूरत नहीं है,’’ मां सपाट स्वर में बोलीं, ‘‘मुझे इस की आदत नहीं है और मेरे पास इतने पैसे भी नहीं हैं…फिर हम मांबेटी का काम ही कितना होता है. तुम ऐसा प्रबंध अपने घर पर कर लो,’’ मां अपनी बात स्पष्ट करती हुई बोलीं.

सुनंदा ठगी सी चुप हो गई. थोड़ी देर बाद बोली, ‘‘क्या यह मेरा घर नहीं है, मांजी?’’

‘‘यह घर तुम्हारा था…तुम ने इसे अपना घर नहीं समझा…इसलिए यह सिर्फ मेरा और वानिया का है.’’

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सुनंदा मां के शब्दों से आहत तो हुई पर उसे आत्मसात करती हुई बोली, ‘‘आप का गुस्सा जायज है, मांजी. मैं आप से माफी मांगती हूं.’’

‘‘मेरे मन में तुम्हारे लिए गुस्सा, माफी, प्यार कुछ भी नहीं है…तुम अपने घर में खुश रहो, मैं अपने घर में खुश हूं.’’

‘‘मां, आप झूठ बोल रही हैं…आप हमें बहुत प्यार करती हैं पर हमारी गलतियों पर आए गुस्से ने आप के प्यार को ढक दिया है.’’

इस बात का मां से कोई जवाब नहीं दिया गया. उन की आंखों में आंसू झिलमिला गए. सुनंदा ने हिम्मत कर के मां के दोनों हाथ पकड़ लिए.

‘‘मां, मुझे अपनी गलतियों का एहसास है…सिर्फ हमारे गलत विचार ही हमारी सोच को गलत तरफ मोड़ देते हैं. मुझे माफ कर दीजिए, मैं अपने घर वापस लौटने की इजाजत चाहती हूं लेकिन इस बार आप की बेटी बन कर.’’

सुनंदा के शब्दों की कोमलता, पश्चात्ताप व ग्लानि से मां के मन का गुबार बहने लगा. उन्होंने बहू को गले लगा लिया और बोलीं, ‘‘अपने बच्चों से किस को प्यार नहीं होता सुनंदा…दिलदिमाग जुडे़ हों, अपनों पर विश्वास हो तो हर रिश्ते की बुनियाद मजबूत होती है. आपस में सहज बातचीत है तो कुछ भी खराब नहीं लगता. गलतफहमियां नहीं पनपतीं…यह तुम्हारा घर है, आज ही जा कर सामान ले आओ.’’

सुनंदा मांजी के गले लगे हुए सोच रही थी, ‘आखिर ऐसा क्या था जो उन दोनों सासबहू के बीच में से बह गया और सबकुछ पारदर्शी हो गया. शायद उस की गलत सोच, गुमान, पराएपन का भाव, अपना न समझने का भाव, उस का अहम, यही सबकुछ बह गया था.

रिश्तों की डोर : भाग 2- सुनंदा की आंखों पर पड़ी थी पट्टी

वानिया मां को दवा देने के बाद जूठे बरतन उठा कर कमरे से बाहर चली गई. मां विचारमग्न हो चुपचाप लेट कर सोचने लगीं कि दोनों अच्छा कमाते हैं, जब अपने पास समय नहीं है तो जरा भी जिम्मेदारी महसूस करें तो खाना बनाने के लिए किसी कामवाली का प्रबंध कर सकते हैं, लेकिन पैसे भी नहीं खर्च करना चाहते, समय भी नहीं है, भावना भी नहीं है. दूसरा दिन भर खटता रहे तो उस के लिए तुम्हारे पास दो मीठे बोल भी नहीं हैं.

वानिया ठीक कहती है, जब अपनी भाषा सामने वाले की समझ में नहीं आए तो उस की भाषा में उसे समझाने की कोशिश तो करनी ही चाहिए. आखिर उसे अपनी गलती और दूसरे के महत्त्व का एहसास कैसे हो? मां कई तरह से सोचती रहीं. बेटे को रहने के लिए कंपनी की ओर से अच्छाभला किराया मिलता है. यह घर उन का है, उन के पति ने बनाया था. आधा घर किराए पर उठा कर भी वह और वानिया अपनी जीविका चला सकते हैं. पति का जो थोड़ाबहुत पैसा उन के नाम जमा है वह वानिया के विवाह व शिक्षा आदि के लिए काफी है.

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ऐसा सोच कर कुछ निश्चय कर मां निश्ंचिंत हो कर सो गईं. थोड़े दिन बाद मां ठीक हो गईं. बेटेबहू का रवैया जैसा चल रहा था चलता रहा. एक दिन मौका देख कर मां बहू को सुनाते हुए बेटे से बोलीं, ‘‘विनय, तुम्हें तो कंपनी से अच्छाखासा किराया मिलता है…कहीं अपने लिए किराए का अच्छा सा फ्लैट देख लो.’’

‘‘क्यों, मां?’’ विनय अवाक् सा मां का चेहरा देखता रह गया. सुनंदा की भी त्योरियां चढ़ गईं.

‘‘बात सीधी सी है, बेटा. वानिया अब बड़ी हो रही है…उस की शादी के लिए भी पैसा चाहिए. मैं चाहती हूं कि आधा घर किराए पर दे दूं और वह पैसा वानिया की शादी के लिए जोड़ दूं, वरना तो सारा भार तुम्हारे ऊपर ही पड़ जाएगा,’’ मां कोमल स्वर में बोलीं.

सुनंदा की समझ में चुपचाप बात आ गई. विनय भी थोड़ी देर चुप खड़ा रहा फिर अपने कमरे में चला गया, लेकिन सुनंदा के दिल में उथलपुथल मच गई. अलग रहने पर इन दोनों की जिम्मेदारी भी धीरेधीरे कम हो जाएगी, फिर खत्म भी हो सकती है. साथ रहने पर वानिया की शादी उन्हें अपने स्तर के हिसाब से करनी पड़ेगी, पैसा खर्च होगा. अलग रह कर दोनों जैसा चाहे गरीबी में रहें और जैसी चाहें शादी करें, अगर चाहेंगे तो वे दोनों भी बस, शामिल हो जाएंगे. ऐसा सोच कर वह विनय के पीछे पड़ गई. विनय पहले तो नहीं माना फिर कई तर्कवितर्क के बाद मान गया.

3-4 दिन की मेहनत के बाद आखिर विनय को 2 बेडरूम का खूबसूरत सा फ्लैट मिल गया और दोनों खुशीखुशी नए फ्लैट में चले गए. वानिया तो बहुत खुश हुई पर मां का दिल टीस गया. 1-2 दिन वह थोड़ा असमंजस की दशा में रहीं फिर धीरेधीरे उन्हें भी अच्छा लगने लगा.

मकान का नीचे का हिस्सा किराए पर दे कर मांबेटी ऊपरी हिस्से में चली गईं. किरायेदार आने से जहां उन को सुरक्षा का आभास हुआ वहीं पैसा आने से आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो गई. वानिया अपनी पढ़ाई पर अच्छी तरह ध्यान दे रही थी. मां की देखभाल तो वह वैसे भी खुद ही कर रही थी.

उधर सुनंदा की खुशी चार दिन भी नहीं रही. दिन भर घर बंद रहने की वजह से कामवाली काम करे तो कैसे. पैसा होते हुए भी अपने लिए सुविधा जुटाना उन के लिए मुश्किल हो रहा था. समय के अभाव में घर अस्तव्यस्त रहता था. खाने का कोई ठिकाना नहीं था. घरबाहर संभालते- संभालते सुनंदा को 24 घंटे भी कम लगने लगे. सुनंदा पर काम का दबाव बढ़ा तो विनय भी कहां अछूता रहता. घर के कुछ काम उस के भी हिस्से में आ गए. जिस की वजह से आफिस में भी कार्यक्षमता पर असर पड़ने लगा. जहां एक तरफ मांबेटी की जीवनशैली सुधर गई वहीं दूसरी तरफ विनय और सुनंदा की जीवन- शैली गड़बड़ा गई. आराम व निश्चिंतता खत्म हो गई थी.

अति व्यस्त दिनचर्या से सुनंदा की तबीयत गड़बड़ा गई. 1-2 दिन तो किसी तरह से विनय ने देखभाल की लेकिन ज्यादा छुट्टी लेना उस के लिए मुश्किल था. थकहार कर उस ने मां को फोन किया. मजबूरी के चलते सुनंदा चुप रह गई. उस ने मां से कहा कि वह थोड़े दिन उन के पास रहने को आ जाएं.

‘‘कैसे आ सकती हूं, बेटा,’’ मां बेटे की बात सुन कर बोलीं, ‘‘तू तो जानता है कि वानिया के पेपर चल रहे हैं…इस के अलावा बच्चे उस से ट्यूशन पढ़ने आते हैं इसलिए वह मेरे साथ आ नहीं सकती और उसे अकेला छोड़ कर आना मेरे लिए संभव नहीं है.’’

‘‘सुनंदा की तबीयत खराब है, मां.’’

मां थोड़ी देर चुप रहीं, अपनी बीमारी के दौरान बेटेबहू का रवैया याद आया. दिल ने चाहा कि कोई कड़वा सा जवाब दे दें लेकिन फिर अपने को संयत कर के बोलीं, ‘‘बेटा, मजबूरी है, नहीं तो मैं आ ही जाती. सुनंदा की मम्मी को बुला लो थोड़े दिन के लिए…उन के साथ ऐसी मजबूरी नहीं है.’’

मजबूर हो कर विनय ने सुनंदा की मम्मी को फोन किया. उन्होंने भी अपनी न आ पाने की मजबूरी जता दी, ‘‘सुनंदा के पापा को छोड़ कर कैसे आ सकती हूं बेटा, उन की तबीयत भी ठीक नहीं रहती है.’’

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विनय सोच में पड़ गया. मां के पास जाने को सुनंदा तैयार नहीं होगी लेकिन अपनी मम्मी के पास चली जाएगी. यही सोच कर बोला, ‘‘ठीक है मम्मी, फिर मैं सुनंदा को आप के पास छोड़ देता हूं क्योंकि यहां दिन भर फ्लैट में अकेले कैसे रहेगी. मैं भी अब छुट्टी नहीं ले सकता हूं.’’

सुनंदा की मम्मी चुप हो गईं. बीमार बेटी की देखभाल तो करनी ही पड़ेगी. साथ में दामाद भी तो यहीं आएगा. 2 लोगों का काम बढ़ जाएगा. नौकर छुट्टी पर गया था. उन के खुद के बस का था भी नहीं.

‘‘बेटा, नौकर तो इन दिनों छुट्टी पर है…मुझ से तो अपने ही दोनों का काम मुश्किल से हो पा रहा है, तुम अपनी मां को क्यों नहीं बुला लेते,’’ कह कर उन्होंने फोन रख दिया.

क्या करे अब…एक दिन की और छुट्टी लेनी पड़ेगी. उधर मां का मन शांत नहीं हो पा रहा था इसलिए शाम होतेहोते उन्होंने बेटे को फोन कर ही दिया, ‘‘कोई इंतजाम हुआ बेटा. नहीं तो अगर सुनंदा तैयार हो तो तुम लोग थोड़े दिनों के लिए यहां आ जाओ…जब सुनंदा ठीक हो जाए तब चले जाना.’’

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

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