Story In Hindi: 2 नाव की सवारी

Story In Hindi: इम्तियाज की शादी शकीला से बड़ी धूमधाम से हुई थी. शकीला भी कोई ऐसेवैसे घर की लड़की नहीं थी, बल्कि एक अच्छे परिवार की पढ़ीलिखी लड़की थी. भले ही उस का रंग सांवला था, पर उस के चेहरे पर एक अजीब सी कशिश थी.

लंबे डीलडौल की और ऊंची उठी हुई छातियों की मलिका होने के साथसाथ शकीला की आवाज भी बड़ी मधुर थी. उस के काले घनेलंबे बालों का तो कहना ही क्या था.

बायोलौजी में बीएससी कर शकीला ट्यूशन पढ़ा कर अपना खर्च खुद उठाने के काबिल थी.

इम्तियाज मुंबई के सांताक्रूज इलाके में शकीला के साथ अकेला रहता था. दोनों में बहुत गहरा प्यार था. शकीला इम्तियाज पर जान छिड़कती थी, क्योंकि इम्तियाज भी शकीला के घर के कामों में काफी मदद करता था और उस की हर खुशी का खूब खयाल रखता था.

इम्तियाज एक सौफ्टवेयर इंजीनियर था, लेकिन खूबसूरत लड़की देख कर अकसर उस का दिल मचलने लगता था.

शकीला जब पेट हुई तो उस की अम्मी ने शकीला की देखभाल के लिए अपनी छोटी बेटी सानिया को उस के घर भेज दिया.

डिलीवरी होने में अभी एक हफ्ता बाकी था. सानिया ने पहले ही आ कर शकीला के घर की जिम्मेदारी अच्छी तरह संभाल ली थी और अपनी बहन शकीला को आराम देने में पूरी मदद करने लगी थी.

इम्तियाज ने जब शकीला की बहन सानिया को देखा तो उस का दिल मचलने लगा और वह उसे पाने के सपने संजोने लगा.

सानिया बला की खूबसूरत थी. एकदम गोरीचिट्टी, बड़ीबड़ी आंखें, गुलाबी होंठ, सुर्ख गाल और मदमस्त उठी हुई छातियां देख कर इम्तियाज तो उस का ऐसा दीवाना हुआ कि बस उसे पाने के लिए जुगत भिड़ाने लगा.

कुछ दिनों बाद शकीला ने आपरेशन के जरीए एक प्यारे से बेटे को जन्म दिया. इस वजह से शकीला को एक हफ्ते तक अस्पताल में भरती रहने को कहा गया.

इम्तियाज ने औफिस से छुट्टी ले ली और शकीला और बच्चे की अच्छी तरह देखभाल करने लगा.

2 दिन तक इम्तियाज ढंग से सो नहीं पाया, तो शकीला बोली, ‘‘आप आज रात घर पर जा कर आराम कर लो. वैसे भी सानिया घर में अकेली है.’’

इम्तियाज बोला, ‘‘ठीक है, मैं थोड़ा आराम कर के सवेरे जल्दी आ जाऊंगा. तुम अपना खयाल रखना.’’

देर रात घर पहुंच कर इम्तियाज ने डोरबैल बजाई तो सानिया नींद से उठती हुई दरवाजा खोलने आई.

सानिया ने जैसे ही दरवाजा खोला, उस की उभरी हुई छातियां देख कर इम्तियाज के मन में हलचल मचने लगी.

इम्तियाज सानिया से बोला, ‘‘मैं काफी थका हुआ हूं. थोड़ा आराम कर के मुझे सुबह 4 बजे जल्दी अस्पताल जाना है. अगर मेरी आंख नहीं खुली, तो मुझे 4 बजे उठा देना.’’

सानिया ने कहा, ‘‘ठीक है जीजाजी, आप आराम करो. मैं आप को 4 बजे उठा दूंगी,’’ और फिर वह ड्राइंगरूम में ही अपने बिस्तर पर लेट गई.

इम्तियाज बाथरूम जा कर फ्रैश होने लगा. जब वह बाथरूम से निकला, तो ड्राइंगरूम में सानिया को लेटे देख कर उस का मन डोलने लगा.

इम्तियाज काफी देर तक सानिया को यों ही निहारता रहा, फिर धीरे से उस के करीब जा कर उस ने सानिया के उभारों पर अपना हाथ रख दिया और उन्हें सहलाने लगा.

सानिया चौंक कर उठ गई और अपने जीजा से अलग होते हुए बोली, ‘‘यह आप क्या कर रहे हो…’’

इम्तियाज ने कहा, ‘‘कुछ नहीं. मै देख रहा हूं कि तुम्हारे इस संगमरमरी बदन को कुदरत ने बड़ी फुरसत से बनाया है. मैं इसे चूमना चाहता हूं. तुम्हारे इस दूधिया बदन से प्यार करना चाहता हूं.’’

सानिया बोली, ‘‘आप को शर्म नहीं आती जीजाजी… आप मेरी सगी बहन के शौहर हैं और आप उन्हें कैसे धोखा दे सकते हैं…’’

इम्तियाज ने कहा, ‘‘मैं शकीला को धोखा नहीं दे रहा हूं. मैं तो बस तुम्हारे साथ कुछ समय गुजारना चाहता हूं.’’

‘‘यह गलत है. आप मुझ से दूर हो जाओ. मैं अपनी बहन को धोखा नहीं दे सकती,’’ सानिया ने कहा.

‘‘पर मैं तो तुम दोनों को ही अपने साथ जिंदगीभर रखना चाहता हूं,’’ कहते हुए इम्तियाज ने सानिया के रसभरे गुलाबी होंठों को चूमना शुरू कर दिया.

सानिया इम्तियाज से अलग होने के लिए छटपटाने लगी कि तभी इम्तियाज ने उस के उभारों पर अपना हाथ फेरना शुरू कर दिया.

थोड़ी सी नानुकर के बाद सानिया सिसकियां भरने लगी. वह इम्तियाज को अपने ऊपर खींचने लगी, तो इम्तियाज को यह समझते देर न लगी कि सानिया गरम हो चुकी है.

इम्तियाज ने सानिया को अपनी बांहों में जकड़ लिया और उसे प्यार करने लगा. सानिया भी अब पूरा मजा लेने लगी. कुछ देर तक वे दोनों यों ही एकदूसरे के जिस्म से खेलते रहे, फिर चरमसुख पर पहुंच कर अलग हो गए.

सानिया मुसकराते हुए बोली, ‘‘जीजाजी, आप ने तो मुझे वह खुशी दी है, जिस की मैं ने कभी कल्पना भी नहीं की थी. अब मैं आप के बिना नहीं रह सकती. यह खुशी मुझे आप से बारबार चाहिए.’’

इम्तियाज बोला, ‘‘तुम फिक्र मत करो. तुम्हारा जब भी दिल करेगा, मैं तुम्हारे लिए हाजिर रहूंगा.’’

सानिया ने कहा, ‘‘पर जब कुछ दिनों के बाद मैं यहां से चली जाऊंगी, तब आप मुझे यह खुशी कैसे दोगे?’’

इम्तियाज बोला, ‘‘हम दोनों शादी कर लेंगे, क्योंकि मुझे तुम बहुत अच्छी लगती हो. मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता.’’

सानिया ने सवाल किया, ‘‘यह कैसे हो सकता है? मैं अपनी ही बहन का घर नहीं उजाड़ सकती.’’

इम्तियाज बोला, ‘‘तुम फिक्र मत करो. जब तक हम दोनों को शादी करने का मौका नहीं मिलता, हम यों ही एकदूसरे के जिस्म की जरूरत पूरी करते रहेंगे.’’

तभी 4 बज गए. इम्तियाज जल्दी से उठा और फ्रैश हो कर अस्पताल की तरफ भागा.

अस्पताल पहुंच कर इम्तियाज ने देखा कि शकीला गहरी नींद में सो रही थी. उस ने उस के माथे को चूमा तो उस की आंख खुल गई.

शकीला ने इम्तियाज का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘आ गए आप. मेरी वजह से आप को कितनी तकलीफ हो रही है. आप को बिलकुल भी आराम नहीं मिल रहा है. मैं कितनी खुशनसीब हूं, जो आप जैसा शौहर मुझे मिला.’’

इम्तियाज बोला, ‘‘खुशनसीब तो मैं हूं जो तुम्हारे जैसी मुहब्बत करने वाली बीवी मुझे मिली है और जिस ने मुझे बाप बनने का नसीब अता किया है. साथ ही, तुम मुझे दिलोजान से प्यार करती हो.’’

शकीला ने कहा, ‘‘आप भी बस कुछ भी बोल देते हो. आप खुद मुझे इतना प्यार देते हो, उस के सामने मेरा प्यार तो कुछ भी नहीं.’’

इस तरह इम्तियाज दो नाव की सवारी करने लगा. उसे जब भी मौका मिलता, वह सानिया के जिस्म के मजे लूटता.

फिर एक दिन ऐसा भी आया जब इम्तियाज की असलियत सब के सामने आ गई.

हुआ यों कि शकीला के घर आने के बाद काफी दिनों तक इम्तियाज को सानिया से मिलने का मौका नहीं मिला, तो एक रात जब शकीला गहरी नींद में सो गई तो इम्तियाज चुपके से उठा और सानिया के कमरे में चला गया.

सानिया पहले तो इम्तियाज को अपने कमरे में देख कर घबरा गई, पर जब इम्तियाज ने उसे अपनी बांहों में पकड़ कर चूमना शुरू किया, तो उस के भी सब्र का बांध टूट गया और उस ने अपनेआप को इम्तियाज के हवाले कर दिया.

इसी बीच अचानक शकीला की आंख खुल गई. आवाज सुन कर जब वह सानिया के कमरे में पहुंची तो इम्तियाज और सानिया का जिस्मानी खेल देख कर उस के होश उड़ गए.

शकीला ने चीख कर इम्तियाज को कहा, ‘‘तुम्हें शर्म नहीं आती… अपनी बीवी के होते हुए किसी दूसरी लड़की के साथ यह हरकत करते हुए… मैं तुम्हें एक शरीफ इनसान सम?ाती थी, पर तुम तो एकदम घटिया निकले.

‘‘मैं ने तुम पर आंख मूंद कर भरोसा किया और तुम ने मेरी ही छोटी बहन को अपने जाल में फंसा लिया.’’
इम्तियाज बोला, ‘‘मेरी बात तो सुनो मेरी जान.’’

शकीला ने कहा, ‘‘अब क्या रह गया सुनने को. मैं तो तुम्हारा चेहरा भी नहीं देखना चाहती. मुझे नफरत है ऐसे मर्दों से जो अपनी बीवी को धोखा देते हैं.’’

इम्तियाज बोला, ‘‘मैं तुम से भी प्यार करता हूं और सानिया से भी. मैं वादा करता हूं कि तुम दोनों का बहुत खयाल रखूंगा. मैं सानिया से भी निकाह कर के उसे अपने साथ रखूंगा. तुम मुझे सानिया दे दो, मैं तुम्हारे पैर चूमूंगा.’’

शकीला ने इम्तियाज के गाल पर एक जोरदार थप्पड़ रसीद करते हुए कहा, ‘‘बेशर्म इनसान, तुझे शर्म नहीं आती अपनी बीवी के सामने ही उस की छोटी बहन से निकाह करने को कहने की. तू ने ऐसा सोच भी कैसे लिया…

‘‘मैं जा रही हूं अपने बेटे को ले कर तुम्हारी जिंदगी से दूर. मैं इस पर तुम जैसे घटिया बाप का साया भी नहीं पड़ने देना चाहती.’’

डरीसहमी सानिया ने भी अपना सामान पैक किया और शकीला के साथ चलने को तैयार हो गई.

इम्तियाज अपने किए पर पछता रहा था, ‘‘मुझे माफ कर दो. मैं आइंदा ऐसा कोई काम नहीं करूंगा जिस से तुम्हारा दिल दुखे.’’

शकीला ने कहा, ‘‘मैं अब तुम्हें ऐसा मौका कभी नहीं दूंगी. मेरा तो दिल टूट चुका है तुम्हारी इस हरकत से. तुम ने क्या सोचा था कि एकसाथ दो नाव में सवारी कर के जिंदगी का मजा ले लोगे… यही हरकत अगर मैं करती तो तुम मुझे बदचलन कहते और दुनियाभर के इलजाम लगाते.

‘‘मैं उन औरतों में से नहीं हूं जो अपने शौहर के जुल्म को बरदाश्त करती है. मैं अगर इज्जत देना जानती हूं, तो सामने वाले से भी इज्जत ही चाहती हूं.

‘‘तुम्हें यह घमंड था कि दोनों बहनों से निकाह कर के उन के जिस्म से खेलते रहोगे और तुम्हें कोई रोकेगा भी नहीं. मैं आज के बाद तुम्हारी सूरत भी नहीं देखूंगी. तुम्हें तलाक का नोटिस मिल जाएगा. अब मैं तुम्हारे साथ एकपल भी नहीं रह सकती.’’

इस तरह शकीला ने इम्तियाज से तलाक ले लिया और जो थप्पड़ उस ने इम्तियाज के मुंह पर मारा, उस का असर इम्तियाज के दिल और जिंदगी पर भी एक गहरी छाप छोड़ गया.

इम्तियाज के दो नाव में सवारी करने के चक्कर में उस के हाथ से सानिया तो गई ही, उसे अपनी बीवी शकीला और बेटे से भी हाथ धोना पड़ा.

शकीला ने अपने शौहर को छोड़ कर यह साबित कर दिया कि औरत किसी से कम नहीं होती. हमें गर्व है शकीला जैसी औरतों पर. Story In Hindi

Family Story In Hindi: फर्क

Family Story In Hindi: गरीब झांझन की छोटी सी दुकान थी. एक वक्त ऐसा था जब अमीर जगदंबा बाबू ने उस की बहन की इज्जत लूट ली थी. पर अब वे लकवे के शिकार हो थे. उन का परिवार दानेदाने को मुहताज था. इसी बात का फायदा उठा कर झांझन ने उन की बेटी से अपनी बहन का बदला लेना चाहा. क्या उस की नीयत में खोट आ गया था?

जब बारिश और सर्द हवाओं ने जनवरी की ठंड का रंग और जमा दिया, तो गांव में सांझ ढले ही सन्नाटा होने लगा. लेकिन झांझन की दुकान काफी देर तक खुली रहती, क्योंकि जरूरतमंद गरीब लोग दिन में मजदूरी कर के आटा, दाल, चावल वगैरह खरीदने वहां पहुंच जाते थे.

झांझन की चांदी हो चली थी. वह भी मनमाने दाम पर चीजें बेच कर वक्त की नजाकत का फायदा उठाता.
धंधे में वह कतई बेमुरब्बत था, इसीलिए लोग कहते कि जगदंबा बाबू के घर एड़ी रगड़ कर भी इसे गरीबी के दुख का एहसास नहीं है. चार दिन से चार पैसे हो गए, तो गरीबों को ही खा जाने की नीयत हो गई.

मगर झांझन पर इस का कोई असर नहीं होता. हालांकि उस ने बिना पैसे की दुनिया देखी थी. वह दिनभर जगदंबा बाबू की भैंसें चराता था और एक गिलास मट्ठे के साथ 2 रोटियां खा कर उसे संतोष करना पड़ता था. तब इस दुकान और घर की जगह झोंपड़ी थी, पर चेहरे पर मस्ती थी.

भैंस चराने जाते समय कंधे पर रखी लाठी को झांझन राइफल से कम नहीं समझता था. यह काम वह कभी नहीं छोड़ता, अगर जगदंबा बाबू ने मजदूरी के लिए गई हुई उस की जवान बहन पर हाथ न डाल दिया होता और सबकुछ लुटा कर उस ने पिछवाड़े के पोखर में कूद कर अपनी जान न दे दी होती.

उस दिन के बाद लाख धमकाने, फुसलाने के बाद भी झांझन जगदंबा बाबू के घर काम पर नहीं गया.

जगदंबा बाबू का सर्वनाश देखना उस की जिंदगी की सब से बड़ी तमन्ना हो गई. वह गांव छोड़ कर पंजाब चला गया. मेहनतमजदूरी कर के कुछ रुपए जोड़े और गांव में लौट आया.

गांव आ कर जगदंबा बाबू के बारे में मालूम हुआ कि वे लकवे के शिकार हो कर चारपाई पर पड़े रहते हैं. उन से उठना, बोलना बिलकुल नहीं हो पाता. इस बात ने उसे तसल्ली दी.

दरअसल, जगदंबा बाबू ने जमींदारी जाने के बाद भी अपनी आदतें नहीं छोड़ीं और शराब व ऐयाशी में उन की सफेदी झड़ कर रह गई थी. ऊपर से 4-4 जवान बेटियां. 3 के ब्याहों में खेतीबारी उतनी ही रह गई, जितने से साधारण किसान पेट पाल सकता था.

बेटियों के बाद बेटे मधुकर की शादी में वे खास धूमधड़ाका तो नहीं कर पाए, मगर कर्ज में तकरीबन सारा खेत रेहन हो गया. जेवर वगैरह तो पहले ही साफ हो चुके थे.

मधुकर गांव में ही मजदूरी कर नहीं सकता था, इसलिए वह अंबाला चला गया. वहां से आए मनीऔर्डर से ही पूरे घर की गुजर होती थी.

दुकान बंद करते समय झांझन जगदंबा बाबू के घर की ओर देखता कि गरीबों की जानमाल व इज्जतआबरू पी जाने वाले जगदंबा बाबू कब तक मटियामेट होते हैं. उन के घर की दीवारों के गिरने का उसे बेसब्री से इंतजार था. वैसे तो वह उन्हें साफ ही कर देता, मगर मधुकर और दूसरे पट्टीदारों की कुछ दहशत अभी बाकी थी.

झांझन मन को समझा लेता कि अब तो जगदंबा बाबू खुद अपाहिज हैं, ऐसे को मारना बेकार है.

झांझन को हैरानी होती कि दानेदाने की मुहताजी झेलते दूसरे परिवारों की तरह इस दुष्ट का कोई बरतन तक उस के यहां गिरवी नहीं हुआ. ऐसा हो जाता, तो वह उसे औरों को शान से दिखादिखा कर जगदंबा बाबू को नीचा दिखा सकता.

यही वजह थी कि दुकानदारी निबट जाने के घंटाभर बाद ही वह दुकान बंद करता था, ताकि झूठी शान में बरबाद होने वाले जगदंबा बाबू के परिवार वाले शायद अकेले में ही कुछ गिरवी रख कर आटा वगैरह ले जाएं या फिर उधार ही मांगने आएं.

आखिर एक दिन जगदंबा बाबू की पत्नी सब ग्राहकों के चले जाने के बाद दुकान पर आईं. उन्हें आते देख कर झांझन को अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ. उस ने आंखें मलीं और जब यकीन हो गया कि वही हैं, तो नोट गिनने लग गया.

जगदंबा बाबू की पत्नी हसरत से नोटों को देखती रहीं कि इतने सारे नोट यह करमजला लिए बैठा है. नोटों की गरमी में ही तो उन्हें देख नहीं रहा.

जब देर तक झांझन ने उन की ओर निगाह नहीं डाली, तो बेइज्जत होने के बावजूद उन्हें बोलना पड़ा, ‘‘झांझन भैया, कुछ मेरी भी सुन लेते.’’

‘‘ओह, आप हैं भाभीजी… बताइए, क्या सौदा दूं?’’ झांझन ने चौंकने का नाटक किया.

‘‘सौदा तो आटा, दाल, तेल, चीनी सबकुछ चाहिए, मगर जेब में पैसे भी तो होने चाहिए,’’ उन्होंने लाचारी बयान की.

‘‘तो कोई जेवर, बरतन वगैरह ही लिए आतीं. दुकानदारी में तो सब काम हिसाब से चलता है,’’ वह उन के अंगअंग को घूरता हुआ बोला.

जगदंबा बाबू की पत्नी ने रुकरुक कर जो बात कही, उस का मतलब यह था कि घर में बेचने लायक और गिरवी रखने लायक कुछ भी नहीं बचा. 2 दिन से घर में चूल्हा नहीं जला और बच्चे भूख से मुरदा जैसे पड़े हैं. पोतापोती दोनों ही बुखार से तप रहे हैं, वरना वे आती ही नहीं.

उन के मुंह से बेबसी में निकल गया, ‘‘अब तो इस देह के सिवा कुछ भी नहीं बचा है.’’

‘‘भाभीजी, अब आप की देह में इतना कसाव नहीं बचा है. बहू या

सरोज को भेज देतीं, वे ही सामान ले जातीं,’’ झांझन की आंखों में शरारत चमक रही थी.

जगदंबा बाबू की पत्नी सबकुछ सुन कर और समझ कर भी होंठ दाब कर रह गईं. उन से कुछ कहा नहीं गया और धरती पर हाथ लगा कर उठने लगीं.

झांझन ने उन्हें 2 किलो आटा दे दिया और कहा, ‘‘आगे से जरूरत हो, तो आप कतई न आना.’’

जगदंबा बाबू की पत्नी के जाने के बाद झांझन सरोज के छरहरे बदन और मादक अंगों की कल्पना करता, कभी बहू के उस अनदेखे रूप की, जिस के लिए मधुकर अंबाला कमाने गया था. उस की अपनी पत्नी थी, बच्चे थे, मगर जगदंबा बाबू से बदले की भावना उसे कल्पना की इन गलियों में भटका रही थी. वैसे इधरउधर मुंह मारना उस की आदत भी नहीं थी.

जगदंबा बाबू की पत्नी ने उस रात खानेपीने के बाद अकेले में बहू को समझाया, ‘‘कल सब ग्राहकों के चले जाने के बाद तू झांझन की दुकान पर चली जाना… कोई जानेगा भी नहीं.’’

‘‘नहीं अम्मां, मैं इज्जत बेच कर जिंदा नहीं रहना चाहूंगी. ऐसा होने से पहले अपनी जान दे दूंगी,’’ बहू ने बिफर कर कहा.

‘‘तब इज्जत बनी रहेगी, जब तू भूख के मारे हमें बदनाम करेगी. लोग कहेंगे कि पेट की खातिर बहू ने जान दे दी. आखिर यह समय तो हमेशा बना नहीं रहेगा.

‘‘इस समय जान बचाने का सवाल है. तू कहे तो मैं झांझन को यहीं बुला दूंगी… न चोर जानेगा, न साह बताएगा.’’

‘‘चोर जाने या न जाने, मैं यह नहीं कर पाऊंगी. मुझे माफ करो और मायके भेज दो,’’ बहू सुबकने लगी.

‘‘मायके भेजने के लिए 400 रुपए होते, तो यह दिन क्यों देखना पड़ता. तू बैठी रह अपने हठ पर… मर जाने दे गोद के बच्चों को,’’ बड़बड़ाती हुई सास ने बहू को छोड़ बेटी से धीमेधीमे बात करनी शुरू कर दी.

अगले दिन ग्राहक छंट जाने पर कुत्तों से बचने को डंडा लिए हुए जगदंबा बाबू की पत्नी झांझन की दुकान पर आईं.

उन्हें देख कर झांझन के मुंह का जायका बिगड़ गया. दुकान में ताला लगाने की तैयारी कर के वह बोला, ‘‘आप फिर आ गईं?’’

‘‘मैं सौदा लेने नहीं आई हूं,’’ वे बोलीं.

‘‘फिर क्या करने आई हैं?’’ झांझन रुखाई से बोला.

‘‘तुम्हें बुलाने मेरी बेटी यहां आई और किसी ने देख लिया, तो कितनी जगहंसाई होगी.’’

‘‘अच्छा, ठीक है, यही सही. थोड़ा सामान तुम ले जाओ, बाकी मैं ले आऊंगा,’’ झांझन बागबाग था.

‘‘खाली सामान नहीं, 1,000 रुपए की भी जरूरत है. अगर तैयार हो तो बोलो?’’ कह कर वे जैसे चलने को तैयार थीं.

‘‘हां, तैयार हूं. मगर वहां मुझे आना कब है?’’ झांझन ने दिल कड़ा कर के पूछा.

‘‘तुम एक घंटे बाद आना. सरोज की कोठरी दरवाजे के बाएं ही है… दरवाजे खाली भिड़े होंगे,’’ कह कर आटा, दाल उठा कर वे इस तरह चलीं, जैसे रत्नों का ढेर लिए जा रही हों.

झांझन को खुशी के साथसाथ हैरानी भी हो रही थी कि इसी औरत को कभी आटा, दाल तो दूर, घी, दूध को देखने की भी फुरसत नहीं थी. नौकरचाकर जो चाहते, करते. अब यह भूख के लिए सबकुछ करने को तैयार है. अब उस का कलेजा ठंडा होगा, बहन का बदला ले कर.

झांझन ने 1,000 रुपए जेब में रखे और जगदंबा बाबू के घर की ओर कदम बढ़ा दिए.

झांझन जगदंबा बाबू के घर के सामने खड़ा था. सरोज के कमरे से उसे सिसकियों की आवाजें सुनाई दीं. जिस सरोज की अल्हड़ हंसी को ही वह पहचानता था, उस की सिसकियों ने उसे हिला कर रख दिया. उस की बहन की इज्जत से तो जगदंबा बाबू खेले थे, सरोज का क्या कुसूर था? सिर्फ यही न कि सरोज उन की बेटी है.

हो सकता है कि ऐसी ही किसी बेबसी का शिकार उस की बहन भी बनी हो. जब झांझन भी वही करेगा, जो जगदंबा बाबू ने किया, तो दोनों में फर्क ही क्या रह जाएगा.

इसी तरह ब्याह से पहले उस की बहन के अरमान कुचले गए थे. सरोज की भी अभी शादी नहीं हुई है. अगर उस ने भी मजबूरी में अपना सबकुछ सौंप कर परिवार को बचा कर बाद में उस की बहिन जैसा ही किया, तो झांझन की हालत भी क्या जगदंबा बाबू जैसी नहीं हो जाएगी?

झांझन सिहर उठा. उस ने धीरे से सरोज के कमरे का दरवाजा खोला.

सरोज ने सिसकते हुए कहा, ‘‘चले आओ.’’

‘‘नहीं, अपनी अम्मां को बुलाओ,’’ झांझन ने कहा.

‘‘अम्मां क्यों… तुम्हारा मतलब तो मुझ से है न,’’ सरोज ने आंसू पोंछते हुए कहा.

‘‘मैं ने कहा न, अम्मां को बुलाओ.’’

जगदंबा बाबू की पत्नी, जो दरवाजे के पास ही खड़ी थीं, पास आ कर बोलीं, ‘‘अब भी कुछ बाकी है झांझन ? अब तो तुम्हारे मन की हो रही है.’’

‘‘बहुतकुछ बाकी है अभी… मैं तो तुम्हें तौल रहा था. यह लो 1,000 रुपए… बुरे दिन तो आदमी पर आते ही रहते हैं, इन्हें हौसले से झेलना चाहिए और धनदौलत पा कर इनसानियत से नहीं खेलना चाहिए,’’ रुपयों की गड्डी जगदंबा बाबू की पत्नी को दे कर वह सीधे अपनी राह चल दिया.

दोनों मांबेटी हैरान हो कर उसे जाते देख रही थीं. Family Story In Hindi

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