एक तीर से कई निशाने : भाग 3

मिताली को अपने पिता के मुंह से दिनेश के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल अच्छा नहीं लगा था, क्योंकि यह दिनेश ही तो था जिस ने मिताली की जान बचाई थी और वह यह भी जानती थी कि गोबर से बायोगैस बनाने का प्लांट उस के चालाक पिता इसलिए लगवाना चाहते हैं, ताकि अगले चुनाव में वे गांव वालों के सामने इसे एक उपलब्धि के तौर पर गिनाना और भुनाना चाहेंगे.

कुछ दिन तक दिनेश लगातार ठाकुर साहब से मिलने आता रहा और बात करता रहा. ठाकुर साहब आराम से बैठे रहते, जबकि दिनेश को कभी बैठने तक को नहीं कहते. वह हमेशा अदब के साथ ही खड़ा रहता. मिताली जानती थी कि उस के ठाकुर पिता दिनेश को कभी बैठने को नहीं कहेंगे, क्योंकि वे सिर्फ अपनी ऊंची जाति वालों के साथ ही उठनाबैठना पसंद करते हैं. ठाकुर साहब की हवेली के सामने वाले बाग के पास ही बायोगैस प्लांट लगने की तैयारी शुरू हो गई थी.

दिनेश देर शाम तक काम करता था. उस के साथ काम करने वालों की 6-7 लोगों की एक टीम भी थी. मिताली अकसर ही उन लोगों के पास आ जाती और उन्हें लगन के साथ काम करते देखती. कभीकभी कुछ तकनीकी बातों के बारे में दिनेश से सवालजवाब भी करती. दिनेश का ज्ञान और काम के प्रति लगन ये सब बातें मिताली को बहुत पसंद आईं और वह उस की तरफ कब खिंचती चली गई, यह मिताली को भी पता नहीं चला. मिताली ने अपना प्रेम दिनेश से छिपाया भी नहीं. दिनेश मिताली की बात सुन कर हक्काबक्का रह गया. हालांकि अंदर ही अंदर उस के मन में में भी मिताली के प्रति प्रेम पनप चुका था, पर वह जानता था कि एक दलित और ठकुराइन का प्रेम ऊंची जाति वालों को कभी रास नहीं आएगा,

इसलिए उस ने मिताली से यह सब ज्यादा गंभीरता से लेने को मना किया. ठाकुर साहब ने भी गाहेबगाहे मिताली को दिनेश से बात करते हुए देख लिया था और उन्हें यह मेलजोल पसंद नहीं आ रहा था. उन्होंने शाम को मिताली को इस तरह से दिनेश से बात करने से मना कर दिया, पर मिताली ने अपने पिता से कह ही दिया कि आखिर दिनेश में बुराई ही क्या है? वह आत्मनिर्भर है और पढ़ालिखा है. ‘‘यह सब तुझे शहर भेजने का नतीजा है… तू हमारी नाक कटवा कर रहेगी…

सुनती हो ठकुराइन, अब तुम्हारी लड़की एक नीच जाति के लड़के से इश्कबाजी करने लगी है और कहती है कि शादी भी रचाएगी… जी में आता है कि इस की गरदन ही काट दूं…’’ ठाकुर साहब का गुस्सा अपनी हद पर था. पर ठकुराइन ने बीचबचाव कर के ठाकुर साहब को शांत किया, पर अपनी आनबानशान और ऊंची जाति के मद में भरे ठाकुर साहब ने मिताली को एक कमरे में बंद कर दिया. ठाकुर साहब ने अपने गुरगों को दिनेश की हड्डीपसली तोड़ कर गांव के बाहर जाती हुई सड़क पर फेंक देने को कहा, पर इस से पहले कि वे सब दिनेश तक पहुंचते,

मिताली ने दिनेश को अपने मोबाइल से फोन कर के उस से यहां से भाग जाने को कह दिया था और यह भी बता दिया था कि अगर वह नहीं गया तो ठाकुर साहब के गुंडे उसे मार डालेंगे. यह खबर पाते ही दिनेश फौरन शहर की ओर भाग निकला. ठाकुर साहब के गुरगे दिनेश को पा न सके और हाथ मलते रह गए. हालांकि, दिनेश के इस तरह भाग जाने से ठाकुर साहब भी बहुत तिलमिलाए, पर मन ही मन उन्हें अपनी जीत का भान हो रहा था कि कम से कम उन की बेटी का एक दलित के साथ प्रेमप्रसंग तो खत्म हो गया और वे निश्चिंत भाव से मिताली के लिए एक अच्छे वर की तलाश में जुट गए. एक दिन मंदिर के पंडितजी ने ठाकुर साहब को बताया कि इस बार किसानों के खेत में आलू की फसल अच्छी नहीं हुई है और सरकार द्वारा भी

किसानों को कोई राहत नहीं दी जा रही है. कुछ किसान तो अपनी फसल सड़कों पर फेंक कर सरकार के खिलाफ गुस्सा जाहिर कर रहे हैं. पंडितजी की बात सुन कर ठाकुर साहब ने थोड़ा सोच कर कहा, ‘‘अरे तो पंडितजी, यही तो समय है जब तुम गांव वालों को ईश्वर का डर दिखा कर दान की उगाही कर सकते हो.’’ जब इस बात को पंडितजी समझ नहीं पाए तो ठाकुर साहब ने उन्हें बताया कि किसी भी कुदरती कहर को वे ईश्वर का क्रोध बताएं या मूर्तियों से नकली आंसू निकलवाएं, जिस से डर कर गांव वाले पूजापाठ और दान करेंगे, जिस से ज्यादा चढ़ावा आएगा. यह बात पंडितजी की समझ में आ गई थी. 2-3 दिन के बाद पंडितजी फिर ठाकुर साहब के पास आए. इस बार उन के साथ पैंटशर्ट पहने हुए एक आदमी भी था.

उस आदमी के हाथ में एक नक्शा था. उस ने ठाकुर साहब को बताया कि गांव के शुरुआती छोर पर बना हुआ मंदिर अब तोड़ना पड़ेगा, क्योंकि वहां से एक हाईवे निकाला जा रहा है, जिस के बदले में मंदिर के मालिक को अच्छाखासा मुआवजा भी दिया जाएगा. ‘‘पर, वह तो हमारे पुरखों का मंदिर है. उसे कोई कैसे तोड़ सकता है?’’ ठाकुर साहब थोड़ा तैश में आए, पर उन की तैश का कोई फायदा नहीं हुआ, क्योंकि उस आदमी ने मुसकराते हुए कहा कि यह तो सरकारी काम है… इस में बाधा भला कौन डाल सकता है. ठाकुर विक्रम सिंह का शातिर दिमाग समझ गया था कि सरकार ने भी आगामी चुनाव के तहत अपनी तैयारियां शुरू कर दी थीं और अब उन के पुरखों का मंदिर तोड़ा जाना तय ही था.

ठाकुर साहब ने शांत भाव से उस सरकारी आदमी को चायनाश्ता करा कर विदा कर दिया और तेजी से हुक्का गुड़गुड़ाने लगे. इस समय उन के दिमाग में एकसाथ कई चीजें चल रही थीं. शाम को ठाकुर साहब अपनी पत्नी के साथ मिताली के कमरे में गए, जहां पर वह गुमसुम बैठी हुई थी. ‘‘मिताली, तुम हमारी एकलौती बेटी हो. हम तुम्हें दुखी नहीं देख सकते, पर क्या करें… हम इस गांव के ठाकुर जो ठहरे, सब आगापीछा भी तो हमें ही देखना है न.’’ ठाकुर मिताली से प्यार जता रहे थे और उन्होंने मिताली से यह भी कहा कि उन्हें मिताली और दिनेश की शादी से एतराज नहीं है,

पर अगर उस ने इस शादी के लिए हां कर दी तो गांव वालों के सामने उस की और ठाकुर खानदान की किरकिरी हो जाएगी, इसलिए वह दिनेश को वापस बुला ले और पुरखों के मंदिर में रात के अंधेरे में चुपचाप शादी कर ले और शहर जा कर अपनी आगे की जिंदगी गुजारे. ठाकुर साहब ने अपने इस बदलाव की वजह यह बताई कि ठाकुर खानदान की सभी लड़कियों की शादी उसी मंदिर में होती आई हैं और अब उसे तोड़ने का फरमान आ गया है, इसलिए वे चाहते हैं कि मिताली भी जल्दी से जल्दी उसी मंदिर में शादी कर ले. अचानक अपने पिता के इस बरताव से मिताली हैरान तो थी, पर ठाकुर साहब की बातों में उसे सचाई भी नजर आ रही थी, इसलिए उस ने दिनेश को फोन कर के वापस आने को कहा और अपने पिता में आए इस बदलाव की वजह मिताली के प्रति ठाकुर के प्यार को बताया. दिनेश को एकदम से यकीन नहीं हुआ, पर जब उस ने इंटरनैट खंगाला तो गांव के सामने से हाईवे बनाए जाने की बात सच निकली. उसे लगा कि मिताली की बातें ठीक हैं और गांव लौटने में कोई बुराई नहीं है.

अगले दिन दिनेश ने मिताली को बताया कि वह सुबह ठीक 9 बजे कुलदेवी के मंदिर में उस का इंतजार करेगा. मिताली ने लाल जोड़ा पहना हुआ था, क्योंकि भले ही वह चोरीछिपे शादी कर रही थी, पर उसे अपने पिता की रजामंदी मिली हुई थी. ठाकुर साहब ने बड़े आराम से गाड़ी में मिताली और ठकुराइन को बिठाया और खुद भी बैठ गए. मंदिर के बाहर दिनेश मिताली का इंतजार कर रहा था. उस ने ठाकुर और ठकुराइन के पैर छूने चाहे, पर ठाकुर साहब ने यह कह कर रोक दिया कि वे लोग घर के दामाद से पैर नहीं छुआते. ठाकुर साहब ने दिनेश से कहा कि चूंकि मिताली मांगलिक है, इसलिए उस की शादी पहले एक नीम के पेड़ के साथ करनी होगी, ताकि मंगल के सब दोष खत्म हो जाएं.

इस सब में कुलमिला कर एक घंटा लगेगा और इस पूजा को दुलहन का परिवार ही देखता है, इसलिए दिनेश को मंदिर में ही रुकना होगा. दिनेश को इस बात पर यकीन नहीं हो रहा था. अभी तक तो उस ने ठाकुरों के जोरजुल्म के किस्से ही सुने थे, पर यह कैसा ठाकुर था जो अपनी बेटी का ब्याह एक दलित के साथ कर रहा था. ‘‘आओ भाई, अंदर आ जाओ,’’ पंडितजी ने दिनेश को मंदिर में बुलाया. दिनेश के पैर मंदिर में घुसते समय कांप रहे थे… ‘शायद ज्यादा खुशी के चलते ऐसा हो रहा होगा,’ दिनेश ने सोचा. पुजारी ने खुद एक स्टील की प्लेट में कुछ मिठाइयां और फल रख कर दिनेश की ओर बढ़ाए और कहा, ‘‘प्रसाद है… सारा खा लो… ऐसी रीति है.’’ दिनेश ने सिर झुका कर पंडितजी की आज्ञा का पालन किया और प्रसाद खाने लगा. बीचबीच में उस की नजरें मंदिर परिसर के बाहर दरवाजे की तरफ घूम जाती थीं.

उसे मिताली का इंतजार था. अचानक दिनेश को पेट में जलन और मरोड़ सी महसूस हुई. उस ने अपना गला पकड़ा और बाहर की ओर भागा. दिनेश को लगा कि उस का दम घुट रहा है और उस के शरीर का सारा खून बाहर की ओर आने पर आमादा है. दिनेश कुछ समझ नहीं पाया. एक अजीब सी अकड़न उस के जिस्म में फैल रही थी और उस का गला भी सूख रहा था. वह पानी तलाश रहा था. उस के गले से आवाज नहीं निकल पा रही थी. दिनेश मंदिर के बाहर लगे नल के पास पहुंच तो गया, पर उस का पानी नहीं पी सका और वहीं धड़ाम से गिर गया. उस के मुंह से झाग निकल रहा था. मिठाई में मिले जहर ने अपना काम पूरी ईमानदारी से कर दिया था. पंडितजी ने ठाकुर साहब को इस बात की जानकारी मोबाइल फोन पर दी. ठाकुर साहब मिताली के साथ लौट आए थे.

मिताली को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अभी तो दिनेश ठीक था, इतनी देर में उसे क्या हो गया. ‘‘कुलदेवी के मंदिर में कोई दलित घुस कर उन की मूर्ति को हाथ लगाए, यह कुलदेवी को मंजूर नहीं हुआ… आखिरकार उन्होंने इस पापी को खुद ही सजा दे दी,’’ पंडितजी जोरजोर से चीख रहे थे मानो वे यह बात सब को बताना चाह रहे हों. सुबह होने तक गांव में यह खबर फैल चुकी थी और डरेसहमे हुए लोग मंदिर से कुछ दूरी पर रह कर सारा घटनाक्रम देख रहे थे. पुलिस को खबर न लगे, इसलिए ठाकुर साहब ने फौरन ही दिनेश का क्रियाकर्म करवा दिया. ‘‘कुलदेवी की मूर्ति को दलित ने छू दिया है… मूर्ति और मंदिर अपवित्र हो गए हैं, इसलिए इस मूर्ति को गंगा में प्रवाहित करना होगा और एक नई मूर्ति हवेली के ठीक सामने एक नया मंदिर बनवा कर उस में रखनी होगी,’’

ठाकुर साहब ने सब गांव वालों के सामने कहा और यह भी बता दिया कि पुराने मंदिर की जगह को वे गांव वालों की भलाई के लिए सरकार को दान दे रहे हैं, ताकि वहां से शहर आसानी से आनेजाने के लिए हाईवे बनाया जा सके. गांव वाले ठाकुर साहब की दरियादिली और दानशीलता से बहुत खुश थे. दिनेश के मर जाने से मिताली कई महीनों तक सदमे में रही और जब वह दिनेश का गम नहीं सह पाई तो उसी नदी में डूब कर उस ने अपनी जान दे दी, जहां पर दिनेश ने उसे डूबने से बचाया था. ठाकुर को बेटी के मरने का गम तो हुआ,

पर मंदिर के पुजारी ने उन्हें ज्ञान दिया कि जो हुआ वह अच्छा है. अब कम से कम ठाकुर की बेटी एक दलित से तो नहीं ब्याही जाएगी. कुलदेवी ने एक दलित को खुद सजा दी है, इस डर से नए मंदिर में गांव वालों ने जम कर दान करना शुरू कर दिया था. पंडितजी की तनख्वाह ठाकुर साहब ने अब दोगुनी कर दी थी. इस तरह ठाकुर साहब ने एक तीर से कई निशाने साध लिए थे. द्य

सोने का घाव- भाग 3 : मलीहा और अलीना बाजी के बीच क्या थी गलतफहमी

दिन अपने अंदाज में गुजर रहे थे. एक शादी में शामिल होने चाचाचाची, उन के बच्चे आए. 5-6 दिन रहे. घर में खूब रौनक रही. खूब घूमेफिरे. चाची मेरी मम्मी को कम ही पसंद करती थीं क्योंकि मेरी मम्मी दादी की चहेती बहू थीं. दादी ने अपनी खास चीजें भी मम्मी को दी थीं. चाची की दोनों बेटियों से मेरी खूब बनती थी, हम ने खूब एंजौय किया.

नादिर की मम्मी 2-3 बार आईं. बहुत माफी मांगी, बहुत कोशिश की कि इस मसले का कोई हल निकल जाए, पर जब अहं और चरित्र पर चोट पड़ती है तो औरत बरदाश्त नहीं कर पाती. मैं ने किसी भी तरह के समझौते से साफ इनकार कर दिया.

अलीना बाजी के बेटे की सालगिरह फरवरी में थी. उन्होंने फोन कर के कहा कि वे अपने बेटे अशर की सालगिरह नानी के घर में मनाएंगी. मैं और मम्मी बहुत खुश हुए. बड़े उत्साह से पूरे घर को ब्राइट कलर से पेंट करवाया. कुछ नया फर्नीचर भी लिया. एक हफ्ते बाद अलीना बाजी अपने शौहर समर के साथ आ गईं. घर की डैकोरेशन देख कर बहुत खुश हुईं.

सालगिरह के दिन सुबह से ही सारे काम शुरू हो गए. दोस्तोंरिश्तेदारों सब को बुलाया था. मैं और मम्मी नाश्ते के बाद अरेंजमैंट के बारे में बातें करने लगे. खाना और केक बाहर से और्डर पर बनवाया था. उसी वक्त अलीना बाजी आईं, मम्मी से कहने लगीं, ‘मम्मी, लीजिए, आप यह झूमर संभाल कर रख लीजिए और मुझे कर्णफूल दे दीजिए. आज मैं अशर की सालगिरह में पहनूंगी.’ अम्मी ने मुझ से कहा, ‘जाओ मलीहा, वह डब्बी निकाल कर ले आओ.’ मैं ने डब्बी ला कर मम्मी के हाथ पर रख दी. बाजी ने बेसब्री से डब्बी उठा कर खोली. डब्बी खोलते ही वे चीख पड़ीं, ‘मम्मी, कर्णफूल तो इस में नहीं हैं.’

मम्मी ने झपट कर डब्बी उन के हाथ से ली. सच ही, डब्बी खाली पड़ी थी. मम्मी एकदम सन्न रह गईं. मेरे तो जैसे हाथपैरों की जान निकल गई. अलीना बाजी की आंखों में आंसू थे. उन्होंने ऐसी शकभरी नजरों से मुझे देखा कि मुझे लगा, काश, जमीन फट जाए और मैं उस में समा जाऊं. बाजी गुस्से में जा कर अपने कमरे में लेट गईं.

मैं ने और मम्मी ने अलमारी का कोनाकोना छान मारा, पर कहीं कर्णफूल न मिलें. अजब पहेली थी. मैं ने अपने हाथ से डब्बी अलमारी में रखी थी. उस के बाद कभी निकाली ही नहीं. फिर कर्णफूल गए कहां?

एक बार खयाल आया, ‘अभी चाचाचाची आए थे. और चाची दादी के जेवर की वजह से मम्मी से बहुत जलती थीं कि सब कीमती चीजें उन्होंने मम्मी को दी थीं. कहीं उन्होंने तो मौका देख कर, हक समझ कर निकाल लिए.’ मैं ने मम्मी से अपने मन की बात कही तो वे कहने लगीं, ‘मैं ऐसा नहीं सोचती कि वे ऐसा कर सकती हैं.’

फिर मेरा ध्यान घर पेंट करने वालों की तरफ गया. उन लोगों ने 3-4 दिनों काम किया था. भूल से कभी अलमारी खुली रह गई हो और उन्हें हाथ साफ करने का मौका मिल गया हो. मम्मी कहने लगीं, ‘नहीं बेटा, बिना देखे, बिना सुबूत के किसी पर इलजाम लगाना गलत है. जो चीज जानी थी वह चली गई. बेवजह किसी पर इलजाम क्यों लगाएं.’

सालगिरह का दिन बेरंग हो गया. किसी का दिलदिमाग ठिकाने न था. अलीना बाजी के हस्बैंड समर भाई ने परिस्थिति संभाली. सब काम ठीकठाक हो गए. दूसरे दिन अलीना बाजी ने जाने की तैयारी शुरू कर दी. मम्मी ने हर तरह से समझाया, कई तरह की दलीलें दीं. समरभाई ने भी समझाया, पर वे रुकने को तैयार न हुईं. मैं ने उन्हें कसम खा कर यकीन दिलाना चाहा, ‘मैं बेकुसूर हूं. कर्णफूल गायब होने में मेरा कोई हाथ नहीं है.’

उन्हें किसी बात पर यकीन न आया. उन के चेहरे पर छले जाने के भाव देखे जा सकते थे. शाम को वे चली गईं. पूरे घर में एक बेबस सी उदासी पसर गई. मेरे दिल पर अजब सा बोझ था. मैं अलीना बाजी से शर्मिंदा थी कि अपना वादा निभा न सकी.

पिछले 2 सालों में अलीना बाजी सिर्फ 2 बार मम्मी से मिलने आईं वह भी 2-3 दिनों के लिए. आने पर मुझ से तो बात ही न करतीं. मैं ने बहन के साथसाथ एक अच्छी दोस्त भी खो दी. बारबार सफाई देना फुजूल था. मैं ने चुप्पी साध ली. मेरी खामोशी ही शायद मेरी बेगुनाही की जबां बन जाए. वक्त बड़े से बड़ा जख्म भर देता है. शायद यह गम भी मंद पड़ जाए. हलकी सी आहट हुई और मैं अतीत से वर्तमान में आ गई. सिर उठा कर देखा, नर्स खड़ी थी, कहने लगी, ‘‘पेशेंट आप से मिलना चाहती हैं.’’

मुंह धो कर मैं मम्मी के पास आईसीयू में गई. मम्मी काफी बेहतर थीं. मुझे देख कर उन के चेहरे पर हलकी सी मुसकराहट आ गई. वे मुझे समझाने लगीं, ‘‘बेटी, तुम परेशान न हो. उतारचढ़ाव तो जिंदगी में आते रहते हैं. उन का हिम्मत से मुकाबला कर के ही हराया जा सकता है.’’

मैं ने उन्हें हलका सा नाश्ता कराया. डाक्टर ने कहा, ‘‘उन की हालत काफी ठीक है. आज रूम में शिफ्ट कर देंगे.

2-4 दिनों में छुट्टी कर देगें. पर दवा और परहेज का बहुत खयाल रखना पड़ेगा. ऐसी कोई बात न हो जिस से उन्हें स्ट्रैस पहुंचे.’’

शाम तक अलीना बाजी आ गईं. मुझ से सिर्फ सलामदुआ हुई. वे मम्मी के पास रुकीं, मैं घर आ गई. 3 दिनों बाद मम्मी भी घर आ गईं. अब उन की तबीयत अच्छी थी. हम उन्हें खुश रखने की ही कोशिश करते. एक हफ्ता तो मम्मी को देखने आने वालों में गुजर गया. मैं ने भी औफिस जौइन कर लिया. मम्मी के बहुत कहने पर बाजी ज्यादा रुकने को राजी हो गईं. जिंदगी सुकून से गुजरने लगी. अब मम्मी भी हलकेफुलके काम कर लेती थीं.

अलीना बाजी और उन के बेटे की वजह से घर में अच्छी रौनक रहती. उस दिन छुट्टी थी, मैं घर की सफाई में जुट गई. मम्मी कहने लगीं, ‘‘बेटा, गावतकिए फिर बहुत सख्त हो गए हैं, एक बार खोल कर रुई तोड़ कर भर दो.’’ अन्नामां तकिए उठा लाईं. उन्हें खोलने लगी. फिर मैं और अन्नामां रुई तोड़ने लगीं. कुछ सख्त सी चीज हाथ को लगी, मैं ने झुक कर नीचे देखा. मेरी सांस जैसे थम गई. दोनों कर्णफूल रुई के ढेर में पड़े थे. होश जरा ठिकाने आए तो मैं ने कहा, ‘देखिए मम्मी, ये रहे कर्णफूल.’’

बाजी ने कर्णफूल उठा लिए और मम्मी के हाथ पर रख दिए. मम्मी का चेहरा खुशी से चमक उठा. जब दिल को यकीन आ गया कि कर्णफूल मिल गए और खुशी थोड़ी कंट्रोल में आई तो बाजी बोलीं, ‘‘ये कर्णफूल यहां कैसे?’’

मम्मी सोच में पड़ गईं, फिर रुक कर कहने लगीं, ‘‘मुझे याद आता है अलीना, उस दिन भी तुम लोग तकिए की रुई तोड़ रही थीं. तभी मैं कर्णफूल निकाल कर लाई थी. हम उन्हें देख रहे थे जब ही घंटी बजी थी. मैं जल्दी से कर्णफूल डब्बी में रखने गई, पर हड़बड़ी में घबरा कर डब्बी के बजाय रुई में रख दिए और डब्बी तकिए के पीछे रख दी थी. कर्णफूल रुई में दब कर छिप गए. कश्मीरी शौल वाले के जाने के बाद डब्बी मैं ने अलमारी में रखवा दी, लेकिन कर्णफूल रुई में दब कर रुई के साथ तकिए के अंदर चले गए और मलीहा ने तकिए सिल कर कवर चढ़ा कर रख दिए. हम समझते रहे, कर्णफूल डब्बी में अलमारी में सेफ रखे हैं.

‘‘जब अशर की सालगिरह के दिन अलीना ने तुम से कर्णफूल मांगे तो पता चला कि उस में कर्णफूल नहीं हैं और अलीना तुम ने सारा इलजाम मलीहा पर लगा दिया.’’ मम्मी ने अपनी बात खत्म कर के एक दुखभरी सांस छोड़ी.

अलीना के चेहरे पर पछतावा था. दुख और शर्मिंदगी से उस की आंखें भर आईं. वे दोनों हाथ जोड़ कर मेरे सामने खड़ी हो गईं. रूंधे गले से कहने लगीं, ‘‘मेरी बहन, मुझे माफ कर दो. बिना सोचेसमझे तुम पर दोष लगा दिया. पूरे 2 साल तुम से नाराजगी में बिता दिए. मेरी गुडि़या मेरी गलती माफ कर दो.’’

मैं तो वैसे भी प्यारमोहब्बत को तरसी हुई थी. जिंदगी के मरूस्थल में खड़ी हुई थी. मेरे लिए चाहत की एक बूंद अमृत के समान थी. मैं बाजी से लिपट कर रो पड़ी. आंसुओं में दिल में फैली नफरत व जलन की गर्द धुल गई. अम्मी कहने लगीं, ‘‘अलीना, मैं ने तुम्हें पहले भी समझाया था कि मलीहा पर शक न करो. वह कभी भी तुम से छीन कर कर्णफूल नहीं लेगी. उस का दिल तुम्हारी चाहत से भरा है. वह कभी तुम से छल नहीं करेगी.’’

बाजी शर्मिंदगी से बोलीं, ‘‘मम्मी, आप की बात सही है, पर एक मिनट मेरी जगह खुद को रख कर सोचिए, मुझे एंटीक ज्वैलरी का दीवानगी की हद तक शौक है. ये कर्णफूल बेशकीमत एंटीक पीस हैं. मुझे मिलना चाहिए थे पर आप ने मलीहा को दे दिया. मुझे लगा, मेरी इल्तजा सुन कर वह मान गई, फिर उस की नीयत बदल गई. उस की चीज थी, उस ने गायब कर दी. यह माना कि  ऐसा सोचना मेरी खुदगर्जी थी, गलती थी. इस की सजा के तौर पर मैं इन कर्णफूल को मलीहा को ही देती हूं. इन पर मलीहा का ही हक है.’’

मैं जल्दी से बाजी से लिपट गईर् और बोली, ‘‘ये कर्णफूल आप के पहनने से जो खुशी मुझे होगी वह खुद के पहनने से नहीं होगी. ये आप के हैं, आप ही लेंगी.’’

मम्मी ने भी समझाया, ‘‘बेटा, जब मलीहा इतनी मिन्नत कर रही है तो मान जाओ. मोहब्बत के रिश्तों के बीच दीवार नहीं आनी चाहिए.’’

‘‘रिश्ते फूलों की तरह नाजुक होते हैं, नफरत व शक की धूप उन्हें झुलसा देती है. फिर ये टूट कर बिखर जाते हैं,’’ यह कहते हुए मैं ने बाजी के कानों में कर्णफूल पहना दिए.

सपना -भाग 1 : कौनसे सपने में खो गई थी नेहा

सरपट दौड़ती बस अपने गंतव्य की ओर बढ़ रही थी. बस में सवार नेहा का सिर अनायास ही खिड़की से सट गया. उस का अंतर्मन सोचविचार में डूबा था. खूबसूरत शाम धीरेधीरे अंधेरी रात में तबदील होती जा रही थी. विचारमंथन में डूबी नेहा सोच रही थी कि जिंदगी भी कितनी अजीब पहेली है. यह कितने रंग दिखाती है? कुछ समझ आते हैं तो कुछ को समझ ही नहीं पाते? वक्त के हाथों से एक लमहा भी छिटके तो कहानी बन जाती है. बस, कुछ ऐसी ही कहानी थी उस की भी… नेहा ने एक नजर सहयात्रियों पर डाली. सब अपनी दुनिया में खोए थे. उन्हें देख कर ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें अपने साथ के लोगों से कोई लेनादेना ही नहीं था. सच ही तो है, आजकल जिंदगी की कहानी में मतलब के सिवा और बचा ही क्या है.

वह फिर से विचारों में खो गई… मुहब्बत… कैसा विचित्र शब्द है न मुहब्बत, एक ही पल में न जाने कितने सपने, कितने नाम, कितने वादे, कितनी खुशियां, कितने गम, कितने मिलन, कितनी जुदाइयां आंखों के सामने साकार होने लगती हैं इस शब्द के मन में आते ही. कितना अधूरापन… कितनी ललक, कितनी तड़प, कितनी आहें, कितनी अंधेरी रातें सीने में तीर की तरह चुभने लगती हैं और न जाने कितनी अकेली रातों का सूनापन शूल सा बन कर नसनस में चुभने लगता है. पता नहीं क्यों… यह शाम की गहराई उस के दिल को डराने लगती है…

एसी बस के अंदर शाम का धुंधलका पसरने लगा था. बस में सवार सभी यात्री मौन व निस्तब्ध थे. उस ने लंबी सांस छोड़ते हुए सहयात्रियों पर दोबारा नजर डाली. अधिकांश यात्री या तो सो रहे थे या फिर सोने का बहाना कर रहे थे. वह शायद समझ नहीं पा रही थी. थोड़ी देर नेहा यों ही बेचैन सी बैठी रही. उस का मन अशांत था. न जाने क्यों इस शांतनीरव माहौल में वह अपनी जिंदगी की अंधेरी गलियों में गुम होती जा रही थी. कुछ ऐसी ही तो थी उस की जिंदगी, अथाह अंधकार लिए दिग्भ्रमित सी, जहां उस के बारे में सोचने वाला कोई नहीं था. आत्मसाक्षात्कार भी अकसर कितना भयावह होता है? इंसान जिन बातों को याद नहीं करना चाहता, वे रहरह कर उस के अंतर्मन में जबरदस्ती उपस्थिति दर्ज कराने से नहीं चूकतीं. जिंदगी की कमियां, अधूरापन अकसर बहुत तकलीफ देते हैं. नेहा इन से भागती आई थी लेकिन कुछ चीजें उस का पीछा नहीं छोड़ती थीं. वह अपना ध्यान बरबस उन से हटा कर कल्पनाओं की तरफ मोड़ने लगी.

उन यादों की सुखद कल्पनाएं थीं, उस की मुहब्बत थी और उसे चाहने वाला वह राजकुमार, जो उस पर जान छिड़कता था और उस से अटूट प्यार करता था.

नेहा पुन: हकीकत की दुनिया में लौटी. बस की तेज रफ्तार से पीछे छूटती रोशनी अब गुम होने लगी थी. अकेलेपन से उकता कर उस का मन हुआ कि किसी से बात करे, लेकिन यहां बस में उस की सीट के आसपास जानपहचान वाला कोई नहीं था. उस की सहेली पीछे वाली सीट पर सो रही थी. बस में भीड़ भी नहीं थी. यों तो उसे रात का सफर पसंद नहीं था, लेकिन कुछ मजबूरी थी. बस की रफ्तार से कदमताल करती वह अपनी जिंदगी का सफर पुन: तय करने लगी.

नेहा दोबारा सोचने लगी, ‘रात में इस तरह अकेले सफर करने पर उस की चिंता करने वाला कौन था? मां उसे मंझधार में छोड़ कर जा चुकी थीं. भाइयों के पास इतना समय ही कहां था कि पूछते उसे कहां जाना है और क्यों?’

रात गहरा चुकी थी. उस ने समय देखा तो रात के 12 बज रहे थे. उस ने सोने का प्रयास किया, लेकिन उस का मनमस्तिष्क तो जीवनमंथन की प्रक्रिया से मुक्त होने को तैयार ही नहीं था. सोचतेसोचते उसे कब नींद आई उसे कुछ याद नहीं. नींद के साथ सपने जुड़े होते हैं और नेहा भी सपनों से दूर कैसे रह सकती थी? एक खूबसूरत सपना जो अकसर उस की तनहाइयों का हमसफर था. उस का सिर नींद के झोंके में बस की खिड़की से टकरातेटकराते बचा. बस हिचकोले खाती हुई झटके के साथ रुकी.

 

कांटों भरी राह पर नंगे पैर : भाग 1

‘यह बताइए कि आप ने जिंदगी के 55वें साल में दूसरी शादी क्यों की? आप की पहली पत्नी भी एक सवर्ण राजपूत परिवार से थीं और दूसरी पत्नी, जो अभी महज 30 साल की हैं, भी सवर्ण हैं… क्या यह आप का सवर्णों से शादी करने का कोई खास एजेंडा है?’’ एक पत्रकार ने बातचीत के दौरान अजीत कुमार से सवाल पूछा. ‘‘देखिए, जहां तक मेरी पहली पत्नी की बात है, तो वह एक खास मकसद से मेरे पास आई और रही… दूसरी पत्नी ने भी मुझे खुद ही प्रपोज किया…

मैं खुद किसी के पास नहीं गया था,’’ अजीत कुमार ने मुसकराते हुए कहा. ‘‘पर, चाकू तरबूज पर गिरे या तरबूज चाकू पर, कटेगा तो तरबूज ही न,’’ एक महिला पत्रकार ने सवाल दागा, तो अजीत कुमार ने कहा, ‘‘हां वह तो है… किसी भी हालत में तरबूज को ही कटना होगा, चाकू तो कटने से रहा…’’ कुछ और सवालजवाब के बाद पत्रकार की बातचीत खत्म हो चुकी थी और अजीत कुमार अपनी कुरसी से उठ चुका था. अजीत कुमार एक समाजसेवी और लेखक था और लगातार दलितों के उत्थान के लिए काम कर रहा था. अजीत कुमार का लखनऊ के एक शानदार इलाके गोमती नगर में बंगला था. अपने घर के दालान में लगे हुए झूले में अजीत कुमार बैठा तो उस की पत्नी सुबोही चाय ले आई.

‘‘एक निचली जाति वाले से शादी कर के तुम्हें पछतावा तो जरूर हो रहा होगा सुबोही?’’ अजीत कुमार ने सुबोही का हाथ पकड़ते हुए पूछा. ‘‘निचली जाति नहीं, निचली समझी जाने वाली जाति कहिए,’’ सुबोही ने कहा. हाल में ही अजीत कुमार ने अपनी आत्मकथा प्रकाशित की थी और उस में बहुत सी ऐसी बातें थीं, जो बहुत से लोगों को अखर रही थीं और उन्होंने इस आत्मकथा को एक खास तबके के खिलाफ गुस्सा और जहर उगलने वाली बताया था. बहुत से लोगों ने इसे सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का तरीका बताया था, पर सच तो यह था कि अजीत कुमार ने इस में कड़वे सच को उजागर करने वाली बातें लिखी थीं, जो लोगों को बुरी लग रही थीं.

अजीत कुमार ने अपनी आत्मकथा की एक किताब उठाई और दलितों का यह सच्चा हमदर्द अपनी जिंदगी के पुराने पन्नों की परतें पलटने लगा. अजीत कुमार तब लखनऊ की एक मलिन बस्ती में रहता था और मोबाइल फोन की एक दुकान में काम करता था. वह नई तकनीक की भी अच्छी समझ रखता था. भले ही यह शहर लखनऊ था, पर इस बस्ती के अंदर शहरीकरण का कोई नामोनिशान नहीं था. यहां पर जिंदगी जरूर थी, पर जीने की बुनियादी सुविधाएं तक नहीं थीं. इस बस्ती के बाशिंदे छोटे काम और साफसफाई करने वाले थे.

 

कांटों भरी राह पर नंगे पैर : भाग 2

21 साल के अजीत कुमार के पिताजी सफाई मुलाजिमों के सुपरवाइजर थे. इस बस्ती में रहने वाले लोग उन्हें दिल से इज्जत देते थे. एक बार बस्ती में कलुआ की अम्मां बीमार पड़ गईं. उन्हें तेज बुखार था. आसपास के लोग फौरन एक ओझा के पास पहुंचे और उन्हें ठीक करने की गुहार लगाई. ओझा ने अम्मां की कलाई पकड़ी और उन की पलकों को देखा. अम्मां के आसपास कुछ धुआं सा फैलाने के बाद एक अनूठी भाषा में न जाने क्याक्या बोलने लगा.

इस सारे काम को अजीत कुमार बड़ी देर से देख रहा था. पहले तो वह जिज्ञासावश ओझा की हरकतों का रस लेता रहा, पर थोड़ी देर बाद उसे लगा कि यह तरीका किसी भी बीमारी को भगाने का तो हो नहीं सकता, इसलिए वह कलुआ के पास जा कर खड़ा हो गया और उस ने लोगों से मरीज को डाक्टर के पास ले जाने के लिए कहा. एक छोटे लड़के की बात सुन कर ओझा उसे घूरने लगा. ‘‘नहीं भैया, यह वाला बुखार तो हमारे ओझाजी ही सही करते हैं, कोई भी डाक्टर सही नहीं कर पाएगा,’’ किसी ने कहा. बस्ती वालों के दिमाग में जो सालों से कूड़ा भरा गया था, वे बेचारे उसी के हिसाब से बात कर रहे थे, पर अजीत कुमार लगातार कलुआ की अम्मां को डाक्टर के पास ले जाने की जिद कर रहा था, जबकि बस्ती के लोग झाड़फूंक पर ही जोर दे रहे थे. जब काफी देर तक ओझा से कोई फायदा होता नहीं दिखा,

तब अजीत कुमार से रहा नहीं गया और वह कलुआ की अम्मां को उन के सिर के पास से पकड़ कर उठाने लगा, जिस पर बहुत से लोगों ने विरोध प्रकट किया और उसे ऐसा करने से रोक भी दिया. ‘‘हमारा इलाज ऐसे ही होता आया है और आगे भी ऐसे ही होता रहेगा,’’ एक आदमी बोला और ओझा को उस का काम आगे बढ़ाने को कहने लगा. अजीत कुमार ने हार मान ली, क्योंकि वह समझ गया था कि इन लोगों का जाति के नाम पर इस तरह से ब्रेन वाश किया जा चुका है कि ये सभी अपनेआप को समाज की मुख्यधारा से अलग ही मानने लगे हैं. ओझा का तंत्रमंत्र काम न आया.

कुछ दिन बाद ही कलुआ की अम्मां की मौत हो गई. कुछ दिन बाद महल्ले के बाहर धार्मिक कार्यक्रम होना था, जिस के लिए चंदे की उगाही की जा रही थी. कुछ लोग अजीत कुमार के महल्ले में भी चंदा मांगने आए तो लोग अपनी पूरी श्रद्धा से चंदा देने लग गए. अजीत कुमार को जब यह पता चला, तब उस ने चंदा देने का विरोध करते हुए कहा कि जब हम किसी तरह के धार्मिक कार्यक्रम में शामिल नहीं होते तो चंदा भी क्यों दें? पर बस्ती के लोगों ने उस की इस बात का पुरजोर विरोध किया और बोले कि अगर वे धार्मिक कार्यक्रम में चंदा नहीं देंगे, तो उन का कुछ बुरा हो जाएगा.

महल्ले वालों ने खूब दान किया, जबकि अजीत कुमार और उस के परिवार ने एक भी पैसे का दान नहीं करते हुए महल्लेभर की नाराजगी भी मोल ली थी. अजीत कुमार समझ चुका था कि इस बस्ती के लोग इसलिए आगे नहीं बढ़ पाए हैं, क्योंकि बरसों से उन के मन में यह बात कूटकूट कर भर दी गई है कि वे समाज की आखिरी कड़ी हैं और इसी तरह से डर कर जीना ही उन की नियति है. अजीत कुमार नौजवान था. उस के मन में आगे बढ़ने और कुछ करगुजरने की ख्वाहिश थी. उसे लगा कि दलितों और पिछड़ों को एकजुट करने की दिशा में बहुत ज्यादा मेहनत करनी होगी और इस दिशा में एक मजबूत पहल की बहुत जरूरत भी है, इसलिए अजीत कुमार ने दलितों और पिछड़े लोगों को एकजुट करने का बीड़ा उठाया और सोशल मीडिया को अपना हथियार बनाया. इस सिलसिले में अजीत कुमार ने फेसबुक पर ‘दलित जाग’ नाम से एक पेज बनाया, जिस पर वह अपने कुछ संदेशों को टाइप करता और पेज पर पोस्ट कर देता. कुछ दिनों बाद वह खुद के वीडियो बना कर पेज पर पोस्ट करने लगा, जिन में वह दलित जागरण और उन के उत्थान की बातें करता.

एक गरीब को कैसे आगे बढ़ना चाहिए, यह बात भी अजीत कुमार बखूबी जानता था. लगा था कि ऐसा कर के वह दलितों और पिछड़ों के मन में कुछ ऊर्जा भर देगा या उन्हें अपने हकों के प्रति जागरूक बना देगा. पर, अजीत कुमार का यह सोचना गलत था, क्योंकि उस की बस्ती के कुछ लोग ही एंड्रौइड मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते थे और जो नौजवान मोबाइल रखते थे, वे तो अजीत कुमार के साथ में आ गए, पर जो लोग 40 साल के पार के थे, वे मोबाइल पर सिर्फ मूवी देखते और गाने ही सुनते थे. ऐसे लोग सोशल मीडिया जैसी किसी चीज का इस्तेमाल करना नहीं जानते थे,

लिहाजा अजीत कुमार की मुहिम उस के अपने महल्ले में कुछ रंग नहीं ला सकी. अलबत्ता, महल्ले से बाहर उस की गतिविधियों को अच्छी तरह से नोट किया गया. अजीत कुमार ने महल्ले के लोगों के दिमाग पर धूल की परतें हटाने के लिए दूसरा रास्ता अपनाना शुरू किया. जब रोज शाम को वह काम से वापस आता, तो अपने महल्ले में 2-4 दोस्तों के साथ खड़े हो कर जोरजोर से बोलता और जब कुछ लोगों की भीड़ इकट्ठी हो जाती, तब वह उन से अपनी बात कहता, पर उस की बात कम लोगों को ही समझ में आ रही थी… हम गुलाम कहां हैं… हम तो आजाद हैं… फिर यह सब क्या बता रहा है हम को… अजीत कुमार के मांबाप ने भी उसे अपने काम पर ध्यान देने को कहा. इधर अजीत कुमार को नुक्कड़ नाटक खेलने का ध्यान आया, क्योंकि इस तरीके से वह आसानी से अपनी बात बस्ती के लोगों तक पहुंचा सकता था.

उस की बात बस्ती के नौजवानों के साथसाथ अब और लोगों को भी समझ आने लगी थी. सोशल मीडिया पर अजीत कुमार के सादगी भरे वीडियो लोगों को पसंद आने लग गए और जल्दी ही 21 साल का वह नौजवान दलित पिछड़ों के नेता के रूप में पहचाना जाने लगा. सोशल मीडिया पर ही अजीत कुमार से कई लोग जुड़ने लगे थे. उन में से एक अंजलि भी थी. दोनों एकदूसरे से सोशल मीडिया पर अपनी भावनाओं का इजहार करते थे. अजीत कुमार दुकान पर काम कर रहा था, पर अंजलि एमए कर चुकी थी और अब वह राजनीति में अपने पैर जमाने की कोशिश कर रही थी.

जो बातें सोशल मीडिया से संदेशों के द्वारा शुरू हुई थीं, वे अब मुलाकातों तक जा पहुंची थीं और एक दिन अंजलि ने अजीत कुमार को शादी करने का प्रस्ताव दिया. ‘‘पर, तुम ठहरी पैसे और ऊंची जाति वाली राजपूतानी और मैं एक दलित… मलिन बस्ती में रहने वाला… तुम भला मुझ से क्यों शादी करना चाहोगी?’’ ‘‘तुम्हारी इसी सादगी पर ही तो मरमिटी हूं मैं.’’ ‘‘पर, तुम्हारे मातापिता… वे क्या कहेंगे?’’ अजीत कुमार के इस सवाल पर अंजलि बिना मुसकराए न रह सकी,

क्योंकि अंजलि ने पहले ही अजीत को बता रखा था कि वह माली तौर पूरी तरह आजाद है और इस बार विधायक के चुनाव में खड़ी होने वाली है और उस के घर वाले उस के फैसले में कोई भी दखल नहीं देते हैं. अजीत कुमार ने अंजलि की बात का भरोसा कर लिया और अपने मांबाप से अंजलि के बारे में बताया तो उस के घर वाले भी एक सवर्ण लड़की के बहू बन कर आने से खुश हो गए. अजीत कुमार की शादी होने से पहले ही अंजलि ने खुद ही अजीत के घर का रंगरोगन करवाया, अपने लिए अलग टौयलेट और एक कमरे को साफसुथरा करवा कर उस में एसीकूलर वगैरह की सुविधाएं जुटा लीं. अजीत कुमार की सवालिया नजरों को समझते हुए अंजलि ने उसे बताया कि वह शादी के बाद इसे अपना दफ्तर बनाएगी, इसीलिए ये सारी सुविधाएं जुटा रही है.

क्यों का प्रश्न नहीं

तांती – भाग 2 : क्या अपनी हवस पूरी कर पाया बाबा

मगर कुछ दिनों बाद जब दाग बिंदी से बाहर झांकने लगा तो सुखिया की पत्नी शांति का ध्यान उस पर गया. उस ने पूछा, ‘‘लक्ष्मी, यह तुम्हारे माथे पर दाग कैसा है?’’ ‘‘पता नहीं, यह कैसे हो गया. मैं ने तो कई देशी इलाज कर लिए मगर यह तो ठीक ही नहीं हो रहा, आगे से आगे बढ़ता ही जा रहा है,’’ कहते हुए लक्ष्मी रोंआसी सी हो गई.

‘‘अरे, बस इतनी सी बात. तुम नौलखा बाबा के नाम की तांती क्यों नहीं बांध लेती? इसे अपने दाएं हाथ पर बांध कर मन्नत मांग लो कि ठीक होते ही बाबा के दरबार में पैदल जा कर

धोक लगा कर आओगी… फिर देखो चमत्कार… सफेद दाग जड़ से न चला जाए तो कहना…’’ शांति ने दावे से कहा. ‘‘क्या ऐसा करने से यह दाग सचमुच ठीक हो जाएगा?’’ लक्ष्मी ने हैरानी से पूछा.

‘‘यही तो परेशानी है… रामदीन भैया की तरह तुम्हें भी बाबा पर भरोसा नहीं… अरे, बाबा तो अंधों को आंखें, लंगड़ों को पैर और बांझ को बेटा देने वाले हैं… देखती नहीं, हर साल लाखों भक्त कैसे उन के दर पर दौड़े चले आते हैं… अगर उन में कोई अनहोनी ताकत न होती तो कोई जाता क्या?’’ शांति ने उस की कमअक्ली पर तरस खाते हुए समझाया.

लक्ष्मी को अब भी सफेद दाग के इतनी आसानी से खत्म होने का भरोसा नहीं था. उस ने शक की निगाह से शांति की तरफ देखा. ‘‘मेरा अपना ही किस्सा सुन… मेरी शादी के बाद 4 साल तक भी मेरी गोद हरी नहीं हुई थी. हम सारे उपाय कर के निराश हो चुके थे. डाक्टर और हकीम भी हार मान गए थे. एक डाक्टर ने तो यहां तक कह दिया था कि मैं कभी मां नहीं बन सकती क्योंकि इन में ही कुछ कमी है. तब हमें किसी ने बाबा के दरबार में जाने की भली सलाह दी.

‘‘हारे का सहारा… नौलखा बाबा हमारा… और हम दोनों गिर पड़े बाबा के चरणों में… पुजारीजी से बाबा के नाम की तांती बंधवाई और सब दवादारू छोड़ कर हर महीने उन के दर्शनों को जाते रहे. और देखो बाबा का चमत्कार… अगले साल ही हरिया मेरी गोद में खेल रहा था,’’ शांति ने पूरे यकीन से कहा. शाम को अब रामदीन घर आया तो लक्ष्मी ने उसे अपने सफेद दाग के बारे में बताया और बाबा की तांती का भी जिक्र किया.

लक्ष्मी की सफेद दाग वाली बात सुन कर रामदीन के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. उस ने पत्नी को समझा कर शहर के चमड़ी के किसी अच्छे डाक्टर को दिखाने की बात की मगर लक्ष्मी पर तो जैसे शांति की बातों का जादू चला हुआ था. लक्ष्मी ने कहा, ‘‘ठीक है. डाक्टर और अस्पताल अपनी जगह हैं और आस्था अपनी जगह… एक बार शांति की बात मान कर तांती बांधने में हर्ज ही क्या है? अगर फायदा न हुआ तो डाक्टर कहां भागे जा रहे हैं… बाद में दिखा देंगे.’’ रामदीन को गुस्से के साथसाथ हंसी भी आ गई. उस ने अपने बचपन का एक किस्सा लक्ष्मी को सुनाया कि उस की बड़ी बहन रानी की गरदन पर छोटेछोटे मस्से हो गए थे. मां ने उस की बांह पर तांती बांध कर मन्नत मांगी कि मस्से ठीक होते ही वे बाबा के मंदिर में 2 झाड़ू चढ़ा कर आएंगी. उन्हें बाबा के चमत्कार पर पूरा भरोसा था और सचमुच कुछ ही दिनों में रानी की गरदन से सारे मस्से गायब हो गए.

मां ने बहन के साथ बाबा के मंदिर में जा कर धोक लगाई और श्रद्धा से 2 झाड़ू वहां देवरे पर चढ़ाईं. मेरा हंसतेहंसते बुरा हाल हो गया था जब रानी ने मुझे बताया कि उस ने चुपकेचुपके चमड़ी के माहिर डाक्टर की सलाह पर दवाएं खाई थीं.

रामदीन को हंसता देख लक्ष्मी आगबबूला हो गई. शांति से होते हुए बात सुखिया तक पहुंची तो वह भी आया रामदीन को समझाने के लिए. मगर रामदीन ने वहां जाने से साफ इनकार कर दिया. लक्ष्मी ने उसे पति धर्म का वास्ता दिया और एक आखिरी बार अपनी बात मानने की गुजारिश की तो आखिर में रामदीन को रिश्तों के आगे झुकना ही पड़ा और वह न चाहते हुए भी अपनों का मन रखने के लिए सुखिया के साथ लक्ष्मी को ले कर नौलखा बाबा के देवरे पर जा पहुंचा.

मंदिर के पीछे ही बड़े पुजारी का बड़ा सा कमरा बना हुआ था. चूंकि वह सुखिया को पहले से ही जानता था इसलिए तुरंत ही उसे भीतर बुला लिया. बाहर खड़ा रामदीन कमरे का मुआयना करने लगा. एक ही कमरे में पुजारीजी ने सारी मौडर्न सुखसुविधाएं जुटा रखी थीं. गजब की ठंडक थी अंदर… रामदीन का ध्यान दीवार पर लगे एयरकंडीशनर की तरफ चला गया. दीवार पर एक बड़ा सा टैलीविजन भी लगा था.

अभी रामदीन अचंभे से सबकुछ देख ही रहा था कि सुखिया ने उसे और लक्ष्मी को अंदर आने का इशारा किया. पुजारी ने लक्ष्मी पर एक भरपूर नजर डाल कर देखा, फिर उस ने कुछ मंत्रों का जाप करते हुए लक्ष्मी के दाएं हाथ पर काले धागे की तांती बांध दी. तांती बांधते समय जिस तरह से पुजारी लक्ष्मी का हाथ सहला रहा था, उसे देख कर रामदीन की त्योरियां चढ़ गईं. लक्ष्मी भी थोड़ी परेशान हो गई तो पुजारी ने माहौल की नजाकत को भांपते हुए बाबा के चरणों में से थोड़ी सी भस्म ले कर उसे चटा दी और आशीर्वाद के बदले में एक मोटी रकम दक्षिणा के रूप में वसूल ली.

लक्ष्मी ने पूछा, ‘‘पुजारीजी, यह दाग कितने दिन में ठीक हो जाएगा?’’ ‘‘यह तो बाबा की मेहर पर है… और साथ ही ही भक्त के भरोसे पर भी… कृपा तो वे ही करेंगे… मगर हां, जिन के मन में बाबा के प्रति जरा भी शक हो, उन पर बाबा की मेहर नहीं होती…’’ लक्ष्मी उस की गोलमोल बातों से कुछ समझी कुछ नहीं समझी और पुजारी को प्रणाम कर के कमरे से बाहर निकल आई.

रास्तेभर जहां सुखिया तो बाबा की ही महिमा का बखान करता रहा वहीं रामदीन की आंखों के सामने पुजारी का लक्ष्मी का हाथ सहलाना ही घूमता रहा. 2 महीने हो गए मगर दाग मिटने या कम होने के बजाय बढ़ ही रहा था. हालांकि लक्ष्मी को तांती पर पूरा भरोसा था, मगर रामदीन को चिंता होने लगी. उस ने सुखिया के सामने अपनी चिंता जाहिर की और लक्ष्मी को भी डाक्टर के पास चलने को कहा, तो सुखिया उखड़ गया. वह बोला, ‘‘तुम्हारा यह अविश्वास ही भाभी की बीमारी ठीक नहीं होने दे रहा… तुम कल ही चलो मेरे साथ पुजारीजी के पास… तुम्हारा सारा शक दूर हो जाएगा.’’

‘‘तुम रहने दो, बेकार क्यों अपनी छुट्टी खराब करते हो… मैं और लक्ष्मी ही हो आएंगे,’’ रामदीन ने हथियार डालते हुए कहा. वह अपने दोस्त को नाराज नहीं करना चाहता था. रामदीन को वहां जाने के लिए छुट्टी लेनी पड़ी. लक्ष्मी की तनख्वाह से भी एक दिन नागा होने से मालकिन ने पैसे काट लिए.

 

प्रेम की इबारत : भाग 1

रात के अंधियारे में पूरा मांडवगढ़ अब कितना खामोश रहता है, यहां की हर चीज में एक भयानकता झलकती है. धीरेधीरे खंडहरों में तबदील होते महल को देख कर इतना तो लगता है कि ये कभी अपार वैभव और सुविधाओं की अद्भुत चमक से रोशन रहते होंगे. कभी गूंजती होंगी यहां रहने वाले सैनिकों की तलवारों की खनक, घोड़ों के टापों की आवाजें, हाथियों की चिंघाड़, जिस की गवाह हैं ये पहाडि़यां, ये दीवारें उस शौर्यगाथा की, जो यहां के चप्पेचप्पे पर बिखरी पड़ी हैं.

यहां बने महल का हर कोना, जिस ने देखे होंगे वह नजारे, युद्ध, संगीत और गायन जिस की स्वर लहरियां बिखरी होेंगी यहां की फिजा में. काश, ये खामोश गवाह बोल सकते तो न जाने कितने भेद खोल देते और खोल देते हर वह राज, जो दफन हैं इन की दीवारों में, इन के दिलों में, इन के फर्श में, मेहराबों में, झरोखों में, सीढि़यों में और यहां के ऊंचेऊंचे गुंबदों में.’’

‘‘चुप क्यों हो गए दोस्त, मैं तो सुन रहा था. तुम ही खामोश हो गए दास्तां कहतेकहते,’’ रानी रूपमती के महल के एक झरोखे ने दूसरे झरोखे से कहा.

‘‘नहीं कह पाऊंगा दोस्त,’’ पहला वाला झरोखा बोलतेबोलते खामोश हो चुका था. किंतु महल की दीवारों ने भी तन्मयता से उन की बातें सुनी थीं. आखिरकार जब नहीं रहा गया तो एक दीवार बोल ही पड़ी :

‘‘दिन भर यहां सैलानियों की भीड़ लगी रहती है. देशीविदेशी इनसानों ने हमारी छाती पर अपने कदमों के जाने कितने निशान बनाए होंगे. अनगिनत लोगों ने यहां की गाथाएं सुनी हैं, विश्व में प्रसिद्ध है यह स्थान.

‘‘मांडवगढ़ के सुल्तानों का इतिहास, उन की वीरता, शौर्य और ऐश्वर्य के तमाम किस्सों ने, जो लेखक लिख गए हैं, यहां के इतिहास को अमर कर दिया है. समूचे मांडव में बिखरा पड़ा है प्रकृति का अद्भुत सौंदर्य. नीलकंठ का रमणीक स्थान हो या हिंडोला महल की शान, चाहे जामा मसजिद की आन हो, हर दीवार, गुंबद अपने में समेटे हुए है एक ऐसा रहस्य, जहां तक बडे़बडे़ इतिहासकार भी कहां पहुंच पाए हैं.’’

‘‘हां, तुम सच कहती हो, ये कहां पहुंचे?’’ दूसरी दीवार बोली, ‘‘यह तो हम जानते हैं, मांडव का हर वह किला, उस की हर मेहराब, हर सीढ़ी, हर दीवार जो आज चुप है…जानती हो बहन, वह बेबस है. काश, कुदरत ने हमें भी जबां दी होती तो हम बोल पड़ते और वह सब बदल जाता, जो यहां के बारे में दोहराया जाता रहा है, बताया जाता रहा है, कहा जाता रहा है.

‘‘हम ने बादशाह अकबर की यात्रा देखी है. कुल 4 बार अकबर ने मांडवगढ़ के सौंदर्य का आनंद उठाया था. हम ने अपनी आंखों से देखा है उस अकबर महान की छवि को, जो आज भी हमारी आंखों में बसी हुई है. हम ने सुल्तान जहांगीर की वह शानोशौकत भी देखी है जिस का आनंद उठाया था, यहां की हवाओं ने, पत्तों ने, इस चांदनी ने.’’

पहली दीवार की तरफ से कोई संकेत न आते देख दूसरी दीवार ने पूछा, ‘‘सुनो, बहन, क्या तुम सो गईं?’’

‘‘नहीं बहन, कहां नींद आती है,’’ पहली दीवार ने एक ठंडी आह भर कर कहा.

‘‘देखो तो, रात की खामोशी में हवाएं उन मेहराबों को, झरोखों को चूमने के लिए कितनी बेताब हो जाती हैं, जहां कभी रानी रूपमती ने अपने सुंदर और कोमल हाथों से स्पर्श किया था,’’ पहली दीवार बोली, ‘‘ताड़ के दरख्तों को सहलाती हुई आती ये हवाएं धीरेधीरे सीढि़यों पर कदम रख कर महल के ऊपरी हिस्से में चली जाती हैं, जहां से संगीत की पुजारिन और सौंदर्य की मलिका रानी रूपमती कभी सवेरेसवेरे नर्मदा के दर्शन के बाद ही अपनी दिनचर्या शुरू करती थीं.’’

सोने का घाव- भाग 1 : मलीहा और अलीना बाजी के बीच क्या थी गलतफहमी

जैसे ही मैं अपने कमरे से बाहर निकली, अन्नामां, जो मम्मी के कमरे में उन्हें नाश्ता करा रही थी, कहने लगी, ‘‘मलीहा बेटी, बीबी की तबीयत ठीक नहीं है. उन्होंने नाश्ता नहीं किया. बस, चाय पी है.’’

मैं जल्दी से मम्मी के कमरे में गई. कल से कमजोर लग रही थीं, पेट में दर्द बता रही थीं, आज तो ज्यादा ही निढाल लग रही थीं. मैं ने अन्नामां से कहा, ‘‘अम्मी के बाल संवारो, उन्हें जल्द तैयार करो. मैं गाड़ी गेट पर लगाती हूं.’’

मम्मी को ले कर हम दोनों अस्पताल पहुंचे. जांच होने पर पता लगा कि हार्ट अटैक है. उन का इलाज शुरू हो गया. इस खबर ने जैसे मेरी जान ही निकाल दी पर अगर मैं हिम्मत हार जाती तो यह सब कौन संभालता. मैं ने खुद को कंट्रोल किया, अपने आंसू पी लिए. इस वक्त पापा बेहद याद आए.

मेरे पापा बहुत मोहब्बत करने वाले, केयरिंग व्यक्ति थे. उन की मृत्यु एक ऐक्सिडैंट में हो गई थी. मुझ से बड़ी बहन अलीना बाजी, जिन की शादी हैदराबाद में हुई थी, का 3 साल का एक बेटा है. मैं ने उन्हें फोन कर के खबर देना जरूरी समझा.

मैं आईसीयू में गई. डाक्टर ने काफी तसल्ली दी, ‘‘इंजैक्शन लग चुके हैं, इलाज शुरू है, खतरे की कोई बात नहीं है. अभी दवाओं के असर में सो रही हैं, आराम उन के लिए जरूरी है, उन्हें डिस्टर्ब न करें.’’

मैं ने बाहर आ कर अन्नामां को घर भेज दिया और खुद वेटिंगरूम में जा कर एक कोने में बैठ गई. अच्छा था वेटिंगरूम, काफी खाली था. सोफे पर आराम से बैठ कर मैं ने अलीना बाजी को फोन लगाया. मेरी आवाज सुन कर बड़े ही रूखे अंदाज में सलाम का जवाब दिया. मैं ने अपने गम समेटते हुए आंसू पी कर उन्हें मम्मी के बारे में बताया. वे परेशान हो गईं, कहां, ‘‘मैं जल्द पहुंचने की कोशिश करती हूं.’’

बिना मुझे तसल्ली का एक शब्द कहे उन्होंने फोन बंद कर दिया. मेरे दिल को बड़ा सदमा लगा. मेरी यह वही बहन थी जो मुझे बेइंतहा प्यार करती थी. मेरी जरा सी उदासी पर दुनिया के जतन कर डालती थी. इतनी चाहत, इतनी मोहब्बत के बाद यह बेरुखी. मेरी आंखें आंसुओं से भर गईं. मैं अतीत में खो गई.

पापा की मौत को थोड़ा समय ही गुजरा था कि मुझ पर एक कयामत टूट पड़ी. पापा ने बहुत देखभाल कर एक अच्छे खानदान में मेरी शादी करवाई थी. शादी काफी शानदार हुई थी. मैं बड़े अरमान ले कर ससुराल गई. मैं ने एमबीए किया था और एक अच्छी कंपनी में जौब कर रही थी. शादी के पहले ही जौब करने के बारे में बात हो गईर् थी. उन लोगों को मेरे जौब करने पर एतराज न था. वे लोग भी मिडिल क्लास के थे. उन की 2 बेटियां थीं, जिन की शादी होनी थी. मुझ नौकरी करने वाली बहू का अच्छा स्वागत हुआ.

मेरी सास अच्छे मिजाज की थीं. मुझ से काफी अच्छा व्यवहार करती थीं. ससुर भी स्नेह रखते थे. मेरे पति देखने में सामान्य थे जबकि मैं खूबसूरत थी. कभीकभी उन की बातों में खुद को ले कर हीनभावना झलकती थी.

शादी के 2-3 महीने के बाद पति का असली रंग खुल कर सामने आ गया. मुझे ले कर नएनए शक उन के दिल में पनपने लगे. पूरे वक्त उन्हें लगता कि मैं उन से बेवफाई कर रही हूं. जराजरा सी बात पर नाराज हो जाते, झगड़ना शुरू कर देते. पर इसे मैं उन का कौंपलैक्स समझ कर टालती रही, निबाह करती रही.

एक तीर से कई निशाने : भाग 2

चूंकि मंदिर का दानपात्र मंदिर के बड़े दरवाजे पर रखा था, इसलिए ठाकुर साहब को पंडितजी की नीयत पर भी शक था. हालांकि दानपात्र की चाभी उन के ही पास थी, पर फिर भी वे अकसर सोचते कि कितना अच्छा होता अगर यह मंदिर उन की हवेली के ठीक पास ही बना होता, तब ये पंडितजी चाह कर भी घपला नहीं कर पाते. ठाकुर साहब की एक 24 साल की बेटी थी, जिस का नाम मिताली था. वह दिखने में बहुत खूबसूरत थी. ठाकुरठकुराइन भी यह बात अच्छी तरह से जानते थे कि मिताली की शादी की उम्र हो चली है और ठाकुर विक्रम सिंह मिताली के लिए जोरशोर से एक अच्छा वर भी ढूंढ़ रहे थे.

पर मिताली अभी शादी करने से इनकार कर रही थी, क्योंकि उस ने शहर के कालेज में राजनीति शास्त्र में एमए किया था और अब वह आगे पीएचडी करना चाहती थी, लेकिन ठाकुर साहब ने जिद कर के उसे वापस गांव में बुला लिया था, ताकि अब वे उस की शादी कर सकें. पिछले 3 महीने से मिताली अपने पिता की इसी हवेली में थी, पर उस का मन यहां नहीं लगता था. वह शहर जा कर अपने यारदोस्तों के साथ घूमनाफिरना चाहती थी. आज मिताली अपने पिता से पूछ कर गांव में घूमने निकल पड़ी थी. वह जी भर कर गांव का मजा ले रही थी. उस ने पहले पेड़ों से कच्चे आम तोड़े, फिर खेत से खीरे तोड़ कर गांव के नजदीक से निकलती हुई नदी किनारे बैठ कर खाने लगी. नदी का ठंडा पानी मिताली के गोरे पैरों को भिगोने लगा. वह अपने पैरों को पानी में मारती, तो पानी में ‘छपाक’ की आवाज आती.

यह सब करना मिताली को बहुत अच्छा लग रहा था और यह खेल करतेकरते नदी किनारे की गीली मिट्टी कब नहर के बहाव के साथ दरक गई, यह उसे पता ही नहीं चला और वह नदी के पानी के साथ ही बहने लगी. मिताली पानी में डूबनेउतराने लगी और उसे लगा कि आज उस की जिंदगी खत्म ही हो जाएगी. तभी किसी ने आ कर उसे थाम लिया. वह एक नौजवान था, जो मिताली को अपने कंधे का सहारा दे कर तेजी से किनारे की तरफ ले जाने लगा. किनारे जा कर उस नौजवान ने मिताली को जमीन पर लिटा दिया. मिताली धन्यवाद देने लगी, तो वह सांवला नौजवान मुसकरा उठा और बोला, ‘‘मैं ने आप को डूबने से तो बचा लिया, पर आप को अब गंगाजल से नहाना होगा, क्योंकि अब आप मैली हो गई हैं मितालीजी.’’

उस नौजवान के मुंह से अपना नाम सुन कर मिताली चौंक गई, ‘‘तुम मेरा नाम कैसे जानते हो? और भला मैं मैली कैसे हो गई?’’ मिताली ने एकसाथ 2 सवाल दाग दिए थे. मिताली के इन सवालों के बदले में उस नौजवान ने उसे बताया कि वह ठाकुर विक्रम सिंह की बेटी है और बड़े लोगों के परिवार के लोगों को इस छोटे से गांव में जानना कोई बड़ी बात नहीं होती. ‘‘और भला मैं मैली कैसे हो गई?’’ मिताली को अपनी जान बचाने वाले से बातें करना अच्छा लगने लगा था. मिताली के इस सवाल के जवाब में उस नौजवान ने उसे बताया कि वह एक दलित है और बड़ी जाति के किसी इनसान को छूना उस के लिए वर्जित है. आज उस ने एक ठाकुर की लड़की को छू कर उसे मैला कर दिया है. ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’ मिताली ने यों पूछा जैसे उसे उस नौजवान की जाति से कोई लेनादेना ही नहीं था.

उस नौजवान ने अपना नाम दिनेश बताया, तो मिताली ने उसे नाम से पुकारते हुए कहा, ‘‘दिनेश, किसी की जान बचाना तो नेक काम है… और कोई जाति नीच नहीं होती, बल्कि लोगों की नासमझी के चलते नीच समझी जाती है.’’ मिताली ने यह बात कुछ इस अंदाज में कही थी कि दिनेश भी मिताली के चेहरे को पढ़े बिना नहीं रह सका और जब दिनेश ने अपनी नजरें मिताली के चेहरे पर गड़ाईं, उसी समय हवा का एक झोंका आया और मिताली के गीले बालों की एक आवारा लट को उस के गालों पर उड़ाने लगा. दिनेश ने महसूस किया कि इस आवारा लट ने मिताली की खूबसूरती को और बढ़ा दिया था. कुछ देर और बैठने के बाद जब मिताली का भीगा शरीर सूख गया, तब वह अपने घर वापस जाने लगी.

उसे जाता देख कर दिनेश ने मिताली से हिम्मत कर के कहा, ‘‘अगली बार नदी के किनारे बैठिएगा तो जरा संभल कर… गहराई मत नापने लगिएगा,’’ उस की यह बात सुन कर मिताली बिना मुसकराए नहीं रह सकी. हवेली पहुंच कर मिताली को एहसास हुआ कि उसे वापस आने में देर हो गई है. उस की मां उसे कुछ टोकने ही वाली थी कि वह तेज कदमों से अपने कमरे की ओर बढ़ गई और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. अगले 3 दिन तक गांव में तेज बारिश हुई, इसलिए मिताली बाहर निकल नहीं सकी, पर उसे अब हवेली में रहना सुहा नहीं रहा था. बारिश रुकी तो मिताली हवेली की छत पर मौसम का हाल देखने पहुंच गई. आसमान से अब भी हलकी फुहार पड़ रही थी. वह छत के कोने में जा कर खड़ी हो गई. तभी उस की नजर हवेली के दालान में गई, जहां उस के पिता किसी नौजवान से बात कर रहे थे. मिताली ने ध्यान से देखा तो वह दिनेश था, जो ठाकुर साहब को एक चार्ट पेपर पर कुछ समझाता सा नजर आ रहा था.

इस बीच दिनेश की नजर भी छत पर खड़ी मिताली से टकराई, तो दोनों एकदूसरे को देख कर बिना मुसकराए न रह सके. जब दिनेश चला गया तो मिताली ने अपने पिता से बातोंबातों में उन की एक अजनबी से हुई बातचीत के बारे में पूछा, तो ठाकुर विक्रम सिंह ने उसे बताया कि दिनेश नाम का यह नौजवान गांव में एक बायोगैस प्लांट लगाना चाहता है. वह सारे मवेशियों का गोबर एक बड़े से लोहे के टैंक में डलवा कर उस से गैस बनाएगा, जो पाइपलाइन द्वारा गांव के घरघर में जाएगी और लोग उस से चूल्हा जला सकेंगे. ‘‘पर पिताजी, सरकार ने तो पहले से ही सुजला नामक योजना के तहत फ्री में गैस सिलैंडर बांटे हैं,’’ मिताली ने कहा. ‘‘अरे, बांट तो देती है सरकार, पर आएदिन रसोई गैस के दाम भी तो बढ़ा रही है.

किसी के लिए भी गैस सिलैंडर लेना भारी है. हमारे गांव में 20 गैस कनैक्शन होंगे, पर गांव के तकरीबन हर आदमी के यहां मिट्टी का चूल्हा ही जल रहा है…’’ ठाकुर साहब ने फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘और फिर ये जो दिनेशवा है न… यह भी छोटी जात का है. भले ही ये लोग कितना भी पढ़लिख जाएं, पर काम तो गोबर की साफसफाई का ही करेंगे न,’’ ठाकुर साहब के चेहरे पर हिकारत के भाव उभर आए थे.

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