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अधूरी प्रेम कहानी : रजिया किस बात का जिक्र करने पर असहज हो जाती थी

रजिया और आफताब का खातापीता और सुखी परिवार था. आज उन की शादी की 25वीं सालगिरह थी. आफताब और रजिया ने केक काटने के बाद सब से पहले अशोक बाबूजी को खिलाया. अशोक बाबूजी भी इसी परिवार का हिस्सा थे. रजिया और आफताब की 20 साल की बेटी आसमां आज भी अशोक बाबूजी से 5 साल की बच्ची की तरह लाड़ दिखाती है. आफताब के एक स्कूटर हादसे पर अशोक बाबूजी ने किसी फरिश्ते की तरह इस परिवार की मदद की थी. उस हादसे में अपनी टांग गंवाने के बाद आफताब की निर्भरता अशोक बाबूजी पर और ज्यादा बढ़ गई थी. इधर आसमां की शादी की बात चल रही थी. वह बहुत खूबसूरत और पढ़ीलिखी थी. उस के लिए एक से बढ़ कर एक परिवारों के रिश्ते आ रहे थे. आफताब की खाला की सख्त हिदायत थी कि उन के समाज में ज्यादा दूर के लोगों से रिश्ते नहीं किए जाते और उन्हें अपनी बेटी का निकाह अपने ही किसी एक परिचित परिवार में करना चाहिए.

खाला के सुझाव को दरकिनार कर रात को खाने की टेबल पर आफताब ने अपनी बेटी से कहा, ‘‘बेटा, हम तुम्हारे ऊपर अपनी पसंद नहीं थोपेंगे. तुम अपनी पसंद के लड़के से शादी कर सकती हो, भले ही वह किसी भी मजहब या जाति का हो, हमें फर्क नहीं पड़ता है.’’ इसी बातचीत के दौरान आफताब ने रजिया की अधूरी लवस्टोरी का जिक्र कर दिया. रजिया बातचीत का मसला बदलने को कह कर बगैर पूरा खाना खाए उठ गई. अपने अधूरे इश्क का जिक्र आते ही रजिया असहज हो जाती थी. वह अपने पुराने प्यार को पूरी तरह भूल चुकी थी और अब उस के लिए टोकना उसे बुरा लगता था. आफताब ने रजिया के कालेज के लड़के के साथ अफेयर की अनदेखी कर उस से शादी की थी. आफताब ने रजिया की प्रेम कहानी को पूरी होने से पहले ही खत्म कर दिया था. आफताब को इस बात का अफसोस था. आफताब रजिया की खूबसूरती और ऊंचे खानदान से होने के चलते इस कदर उतावला था कि उस ने रजिया की प्रेम कहानी को सांप्रदायिक रंग दे कर खत्म करा दिया और खुद उस का शौहर बन बैठा.

आफताब ने रजिया का शरीर और उस का शौहर होने का हक तो हासिल कर लिया था, लेकिन रजिया की रजामंदी हासिल करने में उसे जमाना लग गया. जबरदस्ती रजिया का प्यार हासिल कर लेने के बाद आफताब को अपनी गलती का एहसास हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. आसमां के जन्म के बाद रजिया ने मन से आफताब को अपना पति मान लिया था और अब जा कर उन के रिश्ते मधुर हुए थे. इस परिवार की हंसीखुशी इसी तरह जारी थी. आज उन के परिवार के दोस्त अशोक बाबूजी का जन्मदिन था. पूरा परिवार इस आयोजन को एकसाथ मनाता था. अशोक बाबू ने पता नहीं किस वजह से शादी नहीं की थी. इलाके में उन की एक छोटी सी कपड़ों की दुकान थी. अशोक बाबूजी से इस परिवार का नाता दिनोंदिन और गहरा हो गया था. आफताब को अशोक बाबूजी ने ही दिया था. आसमां को जन्म के बाद सब से पहले अपनी बांहों में उठाने वाले अशोक बाबूजी ही थे. कहते हैं कि इनसान के कर्म इसी जिंदगी में कभी न कभी उस के आने वाले कल को जरूर चोट पहुंचाते हैं. किसी छोटी सी बात पर नाराज हो कर एक दिन दंगाइयों ने आफताब के घर में आग लगा दी.

रजिया और आसमां तो किसी तरह से परदों और चादरों की रस्सी बना कर बाहर निकल आईं, लेकिन आफताब के साथ उन का खुशियों का आशियाना जल कर खाक हो चुका था. अशोक बाबूजी एक बार फिर इस परिवार के लिए फरिश्ता साबित हुए. भयानक अग्निकांड के बाद जब उन का किसी रिश्तेदार ने सहयोग नहीं दिया, तो अशोक बाबूजी ने ही उन्हें अपने घर में पनाह दी. रजिया के अपने ही सगेसंबंधी और समाज के लोग आफताब की जगह रजिया को सरकारी नौकरी नहीं मिलने दे रहे थे, बीमा की रकम मिलने में भी मुश्किलें डाल रहे थे. पूरा शहर मानो इस परिवार की जान का दुश्मन बना हुआ था. अशोक बाबूजी को इस परिवार के लिए कईकई दिनों तक दुकान बंद रखनी पड़ी, पूरे शहर से लड़ना पड़ा,

लेकिन अब 8 महीने बाद समस्याएं दुरुस्त होने लगी थीं. आसमां का एक कालेज में प्रोफैसर के लिए चयन हो गया था. आज उस का पहला दिन था. आसमां सुबहसुबह अशोक बाबूजी के कमरे में फूलों का गुलदस्ता ले कर गई. पर वहां उस के पैरों तले की जमीन खिसक गई. आसमां की मां रजिया अशोक बाबूजी के साथ उन के बिस्तर में थी. आप समझ सकते हैं कि आसमां के दिल पर क्या गुजरी होगी. आसमां ने फूलों को एक तरफ फेंक कर रोते हुए बेबसी में अशोक बाबूजी से कहा, ‘‘आह, तो यह है आप के एहसानों की वजह.’’ अभी उस के प्यारे अब्बूजान को गुजरे हुए पूरा एक साल भी नहीं हुआ था और उस की मां गिरगिट की तरह रंग बदल लेगी, आसमां ने यह सपने में भी नहीं सोचा था. आज रजिया को अपनी जिंदगी का वह गहरा राज आसमां से साझा करना पड़ गया जिसे वह गलती से भी जबान पर लाना नहीं चाहती थी. अशोक बाबूजी ही रजिया के बचपन का वह प्यार था, जो परवान नहीं चढ़ सका था. आफताब द्वारा रजिया को बेबस कर शादी के बाद, रजिया ने इसे ही जिंदगी मान लिया था.

रजिया ने पूरी वफादारी से आफताब के साथ अपने रिश्ते को निभाया था. अपनी पूरी शादीशुदा जिंदगी में उस ने अशोक बाबूजी की ओर मुड़ कर नहीं देखा था. अशोक बाबूजी का उन के घर आनाजाना था, लेकिन रजिया ने हर समय उन से परदा किया था. यहां तक कि चायपानी के लिए भी वह आसमां से कह कर या परदे की आड़ से पूछती थी. उधर अशोक ने अपने अधूरे प्यार के गम में जिंदगी में कभी शादी न करने का फैसला लिया था. आज जब हालत बदल चुके थे, तो रजिया इनकार नहीं कर सकी. आसमां को यह दलील, यह सफाई पसंद नहीं आई. उस ने अपनी मां के चेहरे पर थूक दिया. आसमां को रजिया और अशोक का रिश्ता किसी कीमत पर मंजूर नहीं था. वह नहीं चाहती थी कि उस के अब्बा, जिन को खाक में मिलना नसीब नहीं हुआ था, की बेवा किसी दूसरे धर्म के आदमी से जिस्मानी रिश्ता बनाए. अग्निकांड की उस भयानक रात ने आसमां की सोच को कट्टरपंथी बना दिया था. रजिया का जला हुआ मकान फिर से बन चुका था. आसमां को भी तनख्वाह मिलने लगी थी. तुरंत ही वे दोनों अपने नए मकान में शिफ्ट हो गए.

रजिया और अशोक बाबूजी के रिश्ते को जानने के बाद आसमां को अपना जन्म नाजायज लगने लगा था. आसमां ने रजिया को घर में बंदी बना दिया और अशोक बाबूजी से बोलचाल बंद कर दी. रजिया का कोई भी तर्क और कोई भी सुबूत आसमां को संतुष्ट न कर सका. आसमां की खातिर एक बार फिर रजिया और अशोक के मिलने का सपना अधूरा रह गया. आसमां की शादी करने के बाद रजिया ने अपनी सारी जायदाद बेटी और दामाद के नाम कर दी. अगले दिन रजिया बगैर किसी को बताए अशोक बाबूजी के साथ घर से भाग गई. जो काम अशोक और रजिया को आज से 30 साल पहले पूरा कर लेना चाहिए था, 50 साल की उम्र में वही काम कर उन्होंने अपनी अधूरी प्रेम कहानी को पूरा कर लिया था.

दिल का राज: क्या सरना ने पूरी की चौधराइन की इच्छा

जानवरों का चारादाना निबटाते हुए सरना को काफी देर हो गई थी. उस ने भल्लू चौधरी की गौशाला में ताला ठोंक कर झटका दिया और मुट्ठियां बगलों में दबा लीं. एक पल को उसे बड़ा अच्छा लगा. सोचने लगा कि अब रात अपनी है. पुआल के बिछावन में पुरानी रजाई ओढ़ कर लेटेगा, तो छमिया की याद थोड़ी गरमी दे जाएगी और वह मीठी नींद सो जाएगा.सरना को छमिया के गदराए बदन की याद आती थी, पर हर समय तो छमिया उस की बांहों में हो नहीं सकती. चौधराइन ने सरना को बाहर की कोठरी की चाबी देते वक्त लकड़ी निकालने को कहा था और कहा था कि अगले दिन बेचेंगे. अच्छा यह रहा कि घर पर चौधरी नहीं थे.

चौधराइन ने दोपहर को पेट भर बढि़या खाना करा दिया था. वह भी दोनों वक्त का एक ही बार में खा गया था. खाता न तो करता भी क्या? छमिया खाना तो ठीक बनाती थी, पर बढि़या कचौड़ी, रायता, 2-2 सब्जियां और खीर उसे कहां बनानी आती थी? चौधरी ने 2 दिन पहले रतजगा किया था. उस के लिए कई दिन खाने लायक खाना बचा था. चौधरी किसी स्वामी को छोड़ने उन के आश्रम 250 किलोमीटर दूर अपनी गाड़ी में गए हुए थे. चौधरी घर में होते तो चाहे कुछ भी बनता, सरना को सूखी रोटियां और बासी साग ही मिलता. वह मन ही मन सोच रहा था कि अच्छा होता, अगर चौधरी 5-7 दिन बाहर ही रहते. सरना ने दरवाजे की कुंडी खटकाई. चौधराइन ने दरवाजा खोला. सरना को लग रहा था कि चौधराइन कुंडी खोलते वक्त गुनगुना रही थीं. चौधराइन ने उस समय टाइट ब्लाउज पहन रखा था.

सरना कुछ सोचता सा खड़ा था कि सामने खड़ी चौधराइन ने कहा, ‘‘लाओ चाबी. और हां, कुछ लकडि़यां यहां भी डाल दो. बड़ी ठंड है. मैं भी जला लूंगी. हीटर से कहां काम चलता है.’’ हमेशा स्वैटर, शौल वगैरह से लदीफदी गुडि़या को उस समय इतने कम कपड़ों में देखने की बात सरना सपने में भी नहीं सोच सकता था.

‘इन्हें इतने कपड़े पहनने के बाद भी ठंड क्यों नहीं लग रही है?’ वह सोचने लगा, ‘पर बेचारी बूढ़े साहूकार के फंदे में फंस गई. यह किसी और गरमी की तलाश में है.’

जब तक सरना लकड़ी लाया, तो पानी की बूंदाबांदी बौछार में बदल गई थी. भीगने से बचने के लिए उसे तकरीबन दौड़ना पड़ा. शुक्र था कि चौधराइन किवाड़ खोले ही खड़ी थीं.

बरामदे में लकडि़यां रख कर उस ने चेहरे और नाक का पानी पोंछते हुए हाथ एक ओर झटका. चौधराइन ने उस की ओर देखा तो हंस पड़ीं, ‘‘अरे, तुम तो अच्छेखासे भीग गए.’’‘‘पानी में जो जाएगा, वह भीगेगा ही,’’ कहते हुए सरना कुढ़ सा गया. वह सोचने लगा, ‘पैसे वालों को गरीबी का मजाक उड़ाने में शायद कुछ खास मजा आता है.’ ‘‘वह तो ठीक है, लेकिन अब तुम रात कैसे काटोगे?’’ चौधराइन ने खूंटी पर टंगे पति के एक पुराने कुरते की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘यह तो तुम्हारे बहुत ढीला होगा पर पहन लो. और वह रही लुंगी.’’ सरना को यह बात कुछ जंची नहीं. पर ठिठुरने के बजाय यही ठीक रहेगा, यही सोच कर उस ने कुरता उतार लिया. अब चौधराइन अंदर की ओर चली गई थीं.

लुंगी और ढीलाढाला कुरता पहनते हुए सरना को लगा कि चौधराइन उसे देख रही हैं. सरना को अजीब लग रहा था. वह सोचने लगा कि इन कपड़ों में तो वह जोकर लग रहा होगा. खैर, कौन इतनी रात में देखेगा. सरना ने आवाज दी, ‘‘किवाड़ बंद कर लीजिए, मैं जा रहा हूं. मैं ने बरामदे में लकडि़यां जला दी हैं. आप यहां बैठ कर आग सेंक सकती हैं.’’

तभी खाने की थाली लिए आती चौधराइन ने कहा, ‘‘अजीब बात है. पानी बरस रहा है, फिर भीगना है क्या? खाना खा लो, शायद तब तक पानी रुक जाए. घर में छाता भी नहीं है. चौधरी साहब छाते को अपने साथ ले गए हैं.’’ यह तो मुंहमांगी मुराद थी सरना के लिए. वह खाता जाता था और चौधराइन की खूबसूरती की दिल ही दिल में तारीफ भी करता जा रहा था. तब तक बरामदे की लकडि़यां जलने लगी थीं. उसे भी गरमी महसूस हो रही थी.

सरना को लग रहा था कि यह वाकई बड़ी नेक औरत है. इसे बूढ़े चौधरी के पल्ले बांध कर कुदरत ने इस के साथ बहुत बड़ा मजाक किया है. अब तक औलाद का मुंह तक नहीं देखा बेचारी ने… जबकि ब्याह हुए 7-8 बरस गुजर गए हैं. चौधरी ने इसीलिए किसी पोंगापंथी स्वामी को बुला कर बच्चे देने की मन्नत मांगी थी और भंडारा किया था. सरना खाना खा कर हाथमुंह धो चुका था. पर पानी रुकने का नाम नहीं ले रहा था. उलटे बारिश तेज होती जा रही थी. आग के पास हाथपैर सेंक कर सरना ने कहा, ‘‘अब मैं चलूंगा मालकिन.?’’

इतनी रात को अकेली चौधराइन के पास सूने घर में रुकने का सरना का मन था, पर जानता था कि पकड़ा गया तो उस का घरबार सब जला दिया जाएगा, इसीलिए उसे वहां से जाने की उतावली हो रही थी. चौधराइन ने नीचे से ऊपर तक उसे गौर से देखते हुए कहा, ‘‘बहुत अच्छे… पानी में भीग कर बीमार पड़ने का इरादा है क्या? ठीक है, जाओ, जरूर जाओ, तुम्हारे घर में दवादारू के लिए भी बहुतेरे लोग बैठे हैं…’’ ‘‘न जाऊं तो करूं भी क्या? यहां बैठने से तो रात कटनी नहीं. कोई देखेगा तो क्या कहेगा,’’ अपने दिल की बात झिझक के साथ सरना ने कह दी.

‘‘यह घर छोटा है न… यहां ओढ़नेबिछाने को कुछ नहीं है न? अरे सरना, यह घर तो रहने वालों के लिए तरसता है. यहां कमी भी किस बात की है. दुनिया के कहनेसुनने की चिंता है? क्या मैं तुझे वैसी लगती हूं, सच कहना?’’

‘‘नहीं, आप तो बड़ी नेक और रहमदिल हैं. मैं औरतों के मामले में आप की मिसाल देता हूं. आप का अंगअंग संगमरमर का सा सफेद है, छूने पर मखमली होगा. सुंदरता की खान.

‘‘चौधरी के बुढ़ापे का जब आप से मेल करता हूं तो मन करता है कि आप के कदमों पर माथा झुका दूं. ‘‘मालकिन, छोटी सी उम्र में मैं ने भी काफी दुनिया देखी है. पहले मैं लुधियाना गया था. वहां मेरे बूढ़े लालाजी की जवान बीवी मेरे देखतेदेखते ही अपने यार के साथ चंपत हो गई थी…’’ लगता था जैसे सरना की बात बांध तोड़ कर नदी की तरह बह निकली थी. चौधराइन ने आग और तेज करते हुए सिसक कर सरना की ओर आते हुए कहा, ‘‘और क्या देखा?’’

सरना को लगा, जैसे उन के चेहरे पर कुछ और लाली आ गई है और आंखों में नशा सा छा गया है. वे बात करने में कुछकुछ अटकने सी लगी हैं. उस ने लाला और यार की कहानी 2-4 बातों में बता दी कि कैसे उस ने ही उन्हें कमरे में साथ सोते देखा था. बात करतेकरते चौधराइन इधरउधर चौकन्नी निगाहों से देखती भी जा रही थीं, मानो दीवारों के कान होने पर उन्हें यकीन होता जा रहा हो.

सरना को ऐसा लगा, जैसे उस के शरीर की उठी मछलियों पर चौधराइन की नजरें गड़ी हैं. वे बोलीं, ‘‘सरना, यही तो वहम है… दुनिया भी यही जानती है. पर, तुम सब अपने को मेरी जगह रख कर सोचो. क्या धनदौलत से जवानी के जोश को दबाया जा सकता है? सच तो यह है कि ये सब देह की भूख को और बढ़ाने वाले हैं.

‘‘कई बार सोचती हूं कि मैं एक गरीब घर में होती. शाम को मेरा आदमी काम कर के पसीने से लथपथ आता. मैं पंखे से उस को हवा करती और वह सिर्फ मेरा होता, इन बहीखातों का नहीं. घर में नन्हेमुन्ने किलकते, मैं निहाल हो जाती. ये सोनेचांदी के गहने मेरे पैरोें में बड़ी माया की जंजीरें हैं. इन से मेरा दुख बढ़ता है,’’ कह कर उन्होंने सरना पर एक निगाह डाली.

सरना चौधराइन की तेज निगाहों से सिटपिटा गया. उस ने कहा, ‘‘मालकिन, कुदरत ने ही आप को इतना दयावान बनाया है. सुख दिया है और सब से ऊपर ‘सत’ दिया है. आज के जमाने में ऐसे लोग मिलते कहां हैं?’’ ‘‘सरना, तू क्या कभी जान सकेगा मेरे मन की पीर? बचपन गरीबी में बीता. तब मैं पैसे को दुनिया का सब से बड़ा सुख समझती थी, लेकिन फिर भी उस गरीबी में कहीं न कहीं कोई मजा भी था. जो जीने की तमन्ना पैदा करता था, जिस की बदौलत होंठों पर मुसकान रहती थी. मेरी समझ में अब बीता समय ही अच्छा जान पड़ता है. ‘‘लेकिन तब तो मुझे क्या, मेरे मांबाप को भी यही वहम था कि दुनिया का सारा सुख पैसे से खरीदा जा सकता है. तभी तो मुझे चौधरी के पल्ले बांध दिया गया.

‘‘अब मैं सोचती हूं कि चौधरी ने तो पैसे से सुख जरूर खरीदा, पर मेरी खुशियां पैसे के बदले बिक गईं. क्या यह सारा पैसा गरीब से गरीब औरत को वह सुख मुझे दे सकता है, जो पति की बांह का सिरहाना लगा कर सोई जवान औरत को मिलता है? ‘‘प्यारमुहब्बत का झरना बराबर उम्र वालों में भी फूट सकता है. चौधरी तो बिस्तर पर आने से पहले ही निढाल हो जाते हैं.’’ फिर चौधराइन खुल कर बोलीं, ‘‘सरना, सच मान मेरा रोमरोम उस सुख के लिए जब पागल होता है, तो चौधरी के पैसे के हिसाब में डूब कर पता नहीं किस दुनिया में चले जाते हैं. क्या पैसे की इस प्यास का कहीं अंत भी है?

‘‘तू जो समझता है, मैं अपने ‘सत’ पर मजबूत हूं, यह तेरा भोलापन है. दरअसल, मैं अंदर से इतनी नंगी हूं कि तुझे क्या बताऊं.’’ सरना को चौधराइन की बात का कोई जवाब नहीं सूझ रहा था, तभी उसे खांसी आ गई, जिस से वह जवाबदेही से बच गया. चौधराइन इस समय उसे पैसे के जोर से खरीदी गई एक कमजोर औरत लगी, जिस के जिस्म में एक नाजुक दिल धड़क रहा है और वे पैसे के सुख के बदले अनजाने ही जिंदगी की खुशियां हार चुकी हैं. सरना को लगा कि उसे जरूर चौधराइन के काम आना चाहिए.

सरना को चुप देख कर चौधराइन बोलीं, ‘‘तुझे मैं दूध धोई लगती हूं. मेरे तन पर कोई शक नहीं कर सकता, पर दिल को तो मैं ही जानती हूं. कभीकभी दिल की प्यास आंखों में भर आती है. लेकिन इसे पढ़ने वाला कम से कम वहां तो कोई नहीं मिला.’’

सरना सन्न रह गया. जिसे वह इतना ‘साफ’ समझे बैठा है, उस के दिल में ऐसी बात होगी, उस ने ऐसा कब सोचा था? उसे बड़ा दुख हुआ. उसे लगा जैसे चौधराइन की आवाज का काम उन की आंखों ने अपने जिम्मे ले लिया है. वे आंखें एक भूचाल के आने की खबर दे रही थीं.

सरना चौधराइन के सुंदर मुखड़े को देखता रह गया, तभी बिजली जोर से चमकी और चौधराइन डर के मारे उस के बदन से चिपक गईं. सरना की आंखों में भी अनजाने ही एक चमक सी आ गई. उस ने महसूस किया, जैसे चौधराइन के जिस्म के जरीए एक आग उस के तनमन में समाती चली जा रही हो. वे दोनों घंटाभर एकदूसरे की बांहों में बरामदे में ही खोए रहे.

दरवाजे पर खटका सा हुआ. चौधराइन ने कपड़े पहन कर किवाड़ खोल दिए. चौधरी सामने खड़े थे. बदन का पानी पोंछते हुए वे बोले, ‘‘रास्ता बारिश की वजह से खराब हो गया था, इसलिए एक गाड़ी को स्वामीजी के साथ छोड़ कर आ गया हूं…

‘‘यहां तुम अकेली जो थी. मन ने कहा कि लौट चलो, सो लौट आया. तुम्हें हैरानी तो नहीं हुई इस तरह मेरे लौटने पर? यह अच्छा किया कि सरना को रोक लिया था. यह बड़ा अच्छा लड़का है. ऐसी सुनसान रात में अकेले रहना भी तो ठीक नहीं था…’’

चौधराइन अपने आदमी के इस यकीन पर हैरान रह गईं. अगर वह थोड़ी देर और कर देते तो जवानी का तूफान दोनों को पता नहीं कहां ले जाता. चौधराइन मुसकरा कर बोली, ‘‘हैरानी, वह भी आप के आने की? हैरानी तो तब होती, जब आप न आते. सरना भी रुक नहीं रहा था. कह रहा था कि चौधरी आते ही होंगे… थोड़ी देर की तो बात है. आप अकेले ही वक्त काट लीजिए. पर सच मानिए, आप के बिना सब सूनासूना लगता है.’’

घर जाते समय सरना सोच रहा था, चौधराइन के दिल का सारा बोझ जैसे उस के दिल पर आ गया है. अब उसे इस बात की चिंता थी कि अगर फिर किसी दिन चौधरी रात को घर नहीं लौटे, तो उस वक्त क्या होगा?उधर चौधराइन खुश थीं कि दिल के अंदर उठता जोशीला तूफान कम गया था. चौधरी भी खुश हुआ, जब 2 महीने बाद पता चला कि चौधराइन पेट से है. उस ने स्वामीजी को पूरे 2 लाख रुपए का चढ़ावा दिया.सरना को भी चौधराइन ने बहुतकुछ दिया, पर वह बताने की बात नहीं है. राज को राज ही रहने दें.

चोट: कैसे पूरी की उसने पत्नी की जिस्मानी जरूरत

आखिर कब तक सहन करती? कब तक बेइज्जती, जोरजुल्म सहती? इस आदमी ने, जब से मैं इस घर में शादी कर के आई हूं, डांटफटकार, उलाहनोंतानों के अलावा कुछ नहीं दिया.

शादी के शुरुआती कुछ दिन… कुछ महीने… ज्यादा हुआ, तो एक साल तक प्यार से बात की. घुमानेफिराने ले जाते. सिनेमा दिखाते, मेला, प्रदर्शनी ले जाते. मीठीमीठी प्यारभरी बातें करते. यहां तक कि अपनी मां से भी बहस कर लेते.

अगर मेरी सास मुझे छोटीछोटी बातों पर टोकतीं, तो पतिदेव अपनी मां से कह देते, ‘‘क्यों छोटीछोटी बातों पर घर की शांति भंग कर रही हो? आप की लड़की के साथ ससुराल में यही सब हो तो क्या बीतेगी आप पर? यह इस घर की बहू है, नौकरानी नहीं.

‘‘यह तो कुछ नहीं कहती, लेकिन मैं ही इसे घुमाने ले जाता हूं. पढ़ीलिखी औरत है. बदलते समय के साथ आप नहीं बदल सकतीं, तो छोटीछोटी बातों पर टोकाटाकी कर के घर में अशांति तो न फैलाएं.’’

सास को लगता होगा कि जोरू का गुलाम है बेटा. वे गुस्से में कुछ दिन तक बात न करतीं. बात करतीं तो भी इस तरह, जैसे धीरेधीरे बातों से अपना गुस्सा निकाल रही हों.

‘‘मुझे क्या करना है? तुम खूब घूमोफिरो, लेकिन हद में. आसपड़ोस के घर में भी बहुएं हैं. यह क्या बात हुई कि जब जी आया मुंह उठा कर चल दिए.

न किसी से कुछ पूछना, न बता कर जाना. आखिर घर में बड़ेबुजुर्ग भी हैं. उन के मानसम्मान का भी ध्यान रखो.’’

एक साल बाद ही पति के बरताव में बदलाव आने लगा. शायद शादी की  खुमारी अब तक उतर चुकी थी. पहले ये बहुत ही कम टोकाटाकी करते, बाद में बातबात पर टोकने लगे. मेरी कोई बात इन्हें अच्छी ही नहीं लगती. हर बात में अपनी मां की तरफदारी करते. चाहे वह बात गलत हो या सही, मैं सुनती रही.

इस बीच 2 बच्चे भी हो गए. कहने को घरगृहस्थी तो ठीकठाक चल रही थी, लेकिन जिन पति से मैं प्यार करती थी, उन के बातबात पर डांटनेटोकने से मन उदास रहने लगा.

मैं अपनी तरफ से पति का, सास का, बच्चों का, घर का पूरा खयाल रखती, फिर भी इन की बातबात पर टोकने, डांटने की आदत नहीं जाती.

एक बार मैं ने गुस्से में जरा जोर से कहा भी था, ‘‘आखिर बात क्या है? आप मुझे इस तरह से बेइज्जत क्यों करते रहते हैं?’’

इन्होंने भी झुंझला कर जवाब दिया, ‘‘मैं मर्द हूं. घर का मुखिया हूं. गलत बात पर टोकूंगा नहीं, तो क्या लाड़ करूंगा? तुम 2 बच्चों की मां बन गई हो. तुम्हें घर की जिम्मेदारी समझनी चाहिए. गलती पर डांटता हूं, तो गलती को सुधारना चाहिए. इस में बुरा मानने वाली क्या बात है?’’

‘‘मैं ऐसी कौन सी गलती करती हूं? क्या मन भर गया है मुझ से?’’

‘‘मुझे तो सब को साथ ले कर चलना है. तुम्हारा भी अब तक मन भर जाना चाहिए. प्यारमुहब्बत की उम्र बीत चुकी. अब अपने फर्ज पर ध्यान दो.’’

‘‘आखिर मैं ने फर्ज निभाने में कौन सी कमी रखी है?’’

‘‘तुम फिर बहस करने लगीं. मुझे तुम्हारी यही बात अच्छी नहीं लगती.’’

‘‘आप को मेरी कौन सी बात अच्छी लगती है आजकल?’’

‘‘औरत हो, औरत की तरह रहना सीखो. घर के कामकाज देखो. अम्मां की तबीयत ठीक नहीं रहती आजकल. उन की देखभाल करो.’’

‘‘करती तो हूं.’’

‘‘करती, तो अम्मां शिकायत नहीं करतीं.’’

‘‘अम्मां की तो आदत है मेरी शिकायत करने की. एक की चार लगा कर भड़काती हैं.’’

‘‘खबरदार, जो मेरी अम्मां के बारे में कुछ कहा,’’ इन्होंने इतनी जोर से डांटा कि मैं गुस्से में अपने कमरे में आ कर रोने लगी.

बैडरूम में तो ये बड़े प्यार से बात करते हैं. हालांकि अब यह होता है कि बैडरूम में मेरे आने तक ये सो जाते हैं. मुझे घर के काम निबटातेनिबटाते ही रात के 11-12 बज जाते हैं.

अब हमारे बीच संबंध बनने में भी काफी समय होने लगा था. मसरूफियत, जिम्मेदारी, बढ़ती उम्र के साथ ऐसा होता है. इस की कोई शिकायत नहीं. लेकिन आदमी दो बातें प्यार से कर ले, तो क्या बिगड़ जाएगा? लेकिन पता नहीं क्यों आजकल मुझे देख कर इन का पारा चढ़ जाता है, खासकर दूसरों के सामने.

ये दूसरों से तो अच्छी तरह बात करेंगे. अपनी अम्मां से, बच्चों से, पासपड़ोस के लोगों से, घर आए रिश्तेदारों से. दोस्तों से तो इस कदर प्यार से बातें करेंगे कि जैसे इन्हें गुस्सा आता ही न हो, मानो जबान पर चाशनी चिपक जाती हो.

लेकिन सुबह मैं थोड़ी देर से उठूं, तो चिल्लाते हैं, ‘‘तुम जल्दी नहीं उठ सकतीं. यह कोई समय है उठने का? अभी तक चाय नहीं बनी. चाय में चीनी कम है. कभी ज्यादा है. खाने में नमक नहीं है. यह सब्जी क्यों बनाई है? वही काम करती हो, जो मुझे पसंद नहीं आता. न घर में साफसफाई है, न बच्चों की तरफ ढंग से ध्यान देती हो.

‘‘अम्मां अब कितने दिनों की मेहमान हैं. कम से कम उन की देखभाल ही ठीक से कर लिया करो. तुम्हें कपड़े पहनने का सलीका नहीं आता है. तुम्हें मेहमानों से बात करने का ढंग नहीं है. तुम यह नहीं करती, तुम वह नहीं करती. तुम ऐसी हो, तुम वैसी हो. तुम्हें तो कुछ भी नहीं आता.’’

मैं ने तो अब बहस करना, इन की बातों पर ध्यान देना ही छोड़ दिया. जो कहना है, कहते रहो. मेरा काम सुनना है, सुनती रहती हूं. लेकिन आखिर कब तक? अकेले में कह दें तो सुन भी लूं. चार लोगों के बीच टोकना, डांटना घोर बेइज्जती है मेरी. मेरे औरत होने की. पत्नी हूं, नौकरानी नहीं.

एक दिन इन के 2-3 दोस्त खाने पर आए. इन के कहे मुताबिक ही खाना बनाया. मैं ने अच्छे से परोसा. लेकिन दोस्तों के सामने ही इन का चिल्लाना शुरू हो गया, ‘‘जरा अपने हाथपैर तेजी से चलाओ. यह जैट युग है, बैलगाड़ी की तरह काम मत करो…’’

फिर इन्होंने चीख कर कहा, ‘‘दही कहां है?’’

‘‘अभी लाई,’’ मैं ने अपनी रुलाई रोकते हुए कहा.

इन के एक दोस्त ने कहा, ‘‘क्या दबदबा बना कर रखा है यार? मैं अगर अपनी पत्नी से इतना कह दूं, तो घर में मुसीबत खड़ी हो जाए.’’

दूसरे दोस्त ने इन की हिम्मत बढ़ाते हुए कहा, ‘‘वाकई सही माने में तुम हो असली मर्द. औरतों को ज्यादा सिर पर नहीं चढ़ाना चाहिए.’’

मैं अंदर रसोई में से सब सुन रही थी. जी तो चाहता था कि सारा सामान उठा कर फेंक दूं. इन्हें और इन के दोस्तों को जम कर लताड़ लगाऊं, लेकिन चुप ही रही. पर मैं ने भी मन ही मन तय कर लिया था कि अपनी बेइज्जती का बदला तो ले कर रहूंगी. लेकिन बहस से, चीखचिल्ला कर घर का माहौल बिगाड़ कर नहीं. इन्हें बताऊंगी कि औरत कैसे शर्मिंदा कर सकती है. कैसे हरा सकती है. कैसे तुम्हारे मर्द होने का अहंकार तोड़ सकती है.

खाना खा रहे दोस्तों के बीच मैं दही रखने गई, तभी दोनों बच्चे वहां आ गए खेलते हुए.

‘‘बाहर निकालो इन्हें कमरे से. तुम बच्चों का ध्यान नहीं रख सकतीं…’’ वे जोर से चिल्लाए.

मैं दोनों बच्चों को जबरदस्ती घसीटते हुए कमरे से बाहर ले गई. इन के किसी दोस्त की आवाज कानों में आई, ‘‘खाना तो लजीज बना है.’’

इन्होंने मुंह बिचकाते हुए जवाब दिया, ‘‘खाना तो सुमन बनाती थी. पहले मेरी उसी से शादी होने वाली थी. सगाई तक हो गई थी उस से. कई बार मैं सुमन के घर भी गया. ऐसा स्वादिष्ठ खाना मुझे आज तक नसीब नहीं हुआ.’’

इन की सगाई टूटने की बात मुझे पता थी, लेकिन सुमन के खाने की तारीफ और मेरे खाने को सुमन के मुकाबले कमतर बताना मुझे अखर गया.

ये मर्द थे, तो मैं औरत थी. इन्हें अपने मर्द होने का घमंड था, तो मुझे क्यों न हो अपने औरत होने पर गर्व? अब इन्हें बताना जरूरी था कि औरत क्या होती है.

मर्द की सौ सुनार की और औरत की एक लुहार की कहावत को सच साबित करने का समय आ गया था. इन का यह जुमला कि मर्द बने रहने के लिए औरत को दुत्कारते रहना जरूरी है, तभी घर भी घर बना रहता है. तभी सब ठीक रहते हैं.

अम्मांजी ने इन से एक बार कहा भी था, ‘‘बेटा, मर्द को मर्द की तरह रहना चाहिए. औरत को हमेशा सिर पर चढ़ा कर नहीं रखना चाहिए. उसे डांटडपट, फटकार लगाना जरूरी है.’’

इन्होंने अम्मांजी की बातों को इस तरह स्वीकार किया कि मेरा पूरा वजूद ही बिखरने लगा.

दोनों बच्चे अकसर दादी के पास ही सोया करते थे. वे आज भी वहीं सो रहे थे. ये भी बिस्तर पर लेटेलेटे किताब पढ़ रहे थे.

आज मैं जरा जल्दी ही कमरे में पहुंच गई थी. मैं गाउन पहन कर सोती थी और कपड़े बाथरूम में ही बदलती थी. लेकिन आज मैं ने कमरे में जा कर साड़ी उतारी.

मैं ने तिरछी नजरों से इन की तरफ देखा. साड़ी बदलते ही इन का ध्यान मेरी तरफ गया. नहीं… नहीं, मेरे बदन की तरफ. पहले तो इन्होंने आदत के मुताबिक मुझे टोका, ‘‘यह जगह है क्या कपड़े बदलने की?’’

मैं ने भी कह दिया, ‘‘यहां पर आप के अलावा और कौन हैं? आप से कैसी परदादारी?’’

ये कुछ कहते, इस से पहले ही मैं ने अपने बाकी कपड़े भी उतार दिए. अब मैं छोटे कपड़ों में थी, टूपीस भी कह सकते हैं.

मैं ने पहनने के लिए गाउन उठाया. लेकिन इन के सब्र का पैमाना छलक चुका था. इन्होंने प्यार से मुझे अपनी ओर खींचते हुए कहा, ‘‘बहुत दिन हो गए तुम्हें प्यार किए हुए. आज इस रूप में देख कर सब्र नहीं होता.’’

इस के बाद कमरे में हम दोनों एक हो गए. अलग होते ही मैं मुंह बिचका कर एक तरफ मुंह फेर कर लेट गई. मैं ने कहा, ‘‘किसी वैद्यहकीम को दिखाओ. इतने सारे तो इश्तिहार आते हैं, कोई गोली ले लिया करो.’’

ये दुम दबाते पालतू कुत्ते की तरह आ र कूंकूं की आवाज में बोले, ‘‘क्यों, खुश नहीं हुईं क्या तुम? कुछ कमी रह गई क्या?’’

इन की हालत देख कर बड़ी मुश्किल से मैं ने अपनी हंसी रोकते हुए कहा, ‘‘नहीं, कोई ऐसी बात नहीं है. कभीकभी होता है ऐसा.’’

इन का उदास, हताश, हारा हुआ चेहरा देख कर मुझे अपनी जीत का एहसास हुआ. एक ही वार से इन के अंदर की मर्दानगी और बाहर का मर्द दोनों मुरदा पड़े हुए थे, जैसे दुनिया के सब से तुच्छ, कमजोर इनसान हों.

उस के बाद इन की टोकाटाकी, डांटफटकार तो बंद हुई ही, साथ ही साथ मेरी तरफ जब भी ये देखते, तो ऐसा लगता कि इन के देखने में डर और शर्मिंदा का भाव हो. अकसर चोरीछिपे जिस्मानी ताकत बढ़ाने के इश्तिहार पढ़ते भी नजर आते.

खूबसूरत : जब असलम को अच्छी लगने लगी मुमताज

असलम ने धड़कते दिल के साथ दुलहन का घूंघट उठाया. घूंघट के उठते ही उस के अरमानों पर पानी फिर गया था. असलम ने फौरन घूंघट गिरा दिया. अपनी दुलहन को देख कर असलम का दिमाग भन्ना गया था. वह उसे अपने ख्वाबों की शहजादी के बजाय किसी भुतहा फिल्म की हीरोइन लग रही थी. असलम ने अपने दांत पीस लिए और दरवाजा खोल कर बाहर निकल गया.

बड़ी भाभी बरामदे में टहलते हुए अपने रोते हुए मुन्ने को चुप कराने की कोशिश कर रही थीं. असलम उन के पास चला गया.

‘‘मेरे साथ आइए भाभी,’’ असलम भाभी का हाथ पकड़ कर बोला.

‘‘हुआ क्या है?’’ भाभी उस के तेवर देख कर हैरान थीं.

‘‘पहले अंदर चलिए,’’ असलम उन का हाथ पकड़ कर उन्हें अपने कमरे में ले गया.

‘‘यह दुलहन पसंद की है आप ने मेरे लिए,’’ असलम ने दुलहन का घूंघट झटके से उठा कर भाभी से पूछा.

‘‘मुझे क्या पता था कि तुम सूरत को अहमियत दोगे, मैं ने तो सीरत परखी थी,’’ भाभी बोलीं.

‘‘आप से किस ने कह दिया कि सूरत वालों के पास सीरत नहीं होती?’’ असलम ने जलभुन कर भाभी से पूछा.

‘‘अब जैसी भी है, इसी के साथ गुजारा कर लो. इसी में सारे खानदान की भलाई है,’’ बड़ी भाभी नसीहत दे कर चलती बनीं

‘‘उठो यहां से और दफा हो जाओ,’’ असलम ने गुस्से में मुमताज से कहा.

‘‘मैं कहां जाऊं?’’ मुमताज ने सहम कर पूछा. उस की आंखें भर आई थीं.

‘‘भाड़ में,’’ असलम ने झल्ला कर कहा.

मुमताज चुपचाप बैड से उतर कर सोफे पर जा कर बैठ गई. असलम ने बैड पर लेट कर चादर ओढ़ ली और सो गया. सुबह असलम की आंख देर से खुली. उस ने घड़ी पर नजर डाली. साढ़े 9 बज रहे थे. मुमताज सोफे पर गठरी बनी सो रही थी.

असलम बाथरूम में घुस गया और फ्रैश हो कर कमरे से बाहर आ गया.

‘‘सुबहसुबह छैला बन कर कहां चल दिए देवरजी?’’ कमरे से बाहर निकलते ही छोटी भाभी ने टोक दिया.

‘‘दफ्तर जा रहा हूं,’’ असलम ने होंठ सिकोड़ कर कहा.

‘‘मगर, तुम ने तो 15 दिन की छुट्टी ली थी.’’

‘‘अब मुझे छुट्टी की जरूरत महसूस नहीं हो रही.’’

दफ्तर में भी सभी असलम को देख कर हैरान थे. मगर उस के गुस्सैल मिजाज को देखते हुए किसी ने उस से कुछ नहीं पूछा. शाम को असलम थकाहारा दफ्तर से घर आया तो मुमताज सजीधजी हाथ में पानी का गिलास पकड़े उस के सामने खड़ी थी.

‘‘मुझे प्यास नहीं है और तुम मेरे सामने मत आया करो,’’ असलम ने बेहद नफरत से कहा.

‘‘जी,’’ कह कर मुमताज चुपचाप सामने से हट गई.

‘‘और सुनो, तुम ने जो चेहरे पर रंगरोगन किया है, इसे फौरन धो दो. मैं पहले ही तुम से बहुत डरा हुआ हूं. मुझे और डराने की जरूरत नहीं है. हो सके तो अपना नाम भी बदल डालो. यह तुम पर सूट नहीं करता,’’ असलम ने मुमताज की बदसूरती पर ताना कसा.

मुमताज चुपचाप आंसू पीते हुए कमरे से बाहर निकल गई. इस के बाद मुमताज ने खुद को पूरी तरह से घर के कामों में मसरूफ कर लिया. वह यही कोशिश करती कि असलम और उस का सामना कम से कम हो.

दोनों भाभियों के मजे हो गए थे. उन्हें मुफ्त की नौकरानी मिल गई थी. एक दिन मुमताज किचन में बैठी सब्जी काट रही थी तभी असलम ने किचन में दाखिल हो कर कहा, ‘‘ऐ सुनो.’’

‘‘जी,’’ मुमताज उसे किचन में देख कर हैरान थी.

‘‘मैं दूसरी शादी कर रहा हूं. यह तलाकनामा है, इस पर साइन कर दो,’’ असलम ने हाथ में पकड़ा हुआ कागज उस की तरफ बढ़ाते हुए कहा.

‘‘क्या…?’’ मुमताज ने हैरत से देखा और सब्जी काटने वाली छुरी से अपना हाथ काट लिया. उस के हाथ से खून बहने लगा.

‘‘जाहिल…,’’ असलम ने उसे घूर कर देखा, ‘‘शक्ल तो है ही नहीं, अक्ल भी नहीं है तुम में,’’ और उस ने मुमताज का हाथ पकड़ कर नल के नीचे कर दिया.

मुमताज आंसुओं को रोकने की नाकाम कोशिश कर रही थी. असलम ने एक पल को उस की तरफ देखा. आंखों में उतर आए आंसुओं को रोकने के लिए जल्दीजल्दी पलकें झपकाती हुई वह बड़ी मासूम नजर आ रही थी.

असलम उसे गौर से देखने लगा. पहली बार वह उसे अच्छी लगी थी. वह उस का हाथ छोड़ कर अपने कमरे में चला गया. बैड पर लेट कर वह देर तक उसी के बारे में सोचता रहा, ‘आखिर इस लड़की का कुसूर क्या है? सिर्फ इतना कि यह खूबसूरत नहीं है. लेकिन इस का दिल तो खूबसूरत है.’

पहली बार असलम को अपनी गलती का एहसास हुआ था. उस ने तलाकनामा फाड़ कर डस्टबिन में डाल दिया.

असलम वापस किचन में चला आया. मुमताज किचन की सफाई कर रही थी.

‘‘छोड़ो यह सब और आओ मेरे साथ,’’ असलम पहली बार मुमताज से बेहद प्यार से बोला.

‘‘जी, बस जरा सा काम है,’’ मुमताज उस के बदले मिजाज को देख कर हैरान थी.

‘‘कोई जरूरत नहीं है तुम्हें नौकरों की तरह सारा दिन काम करने की,’’ असलम किचन में दाखिल होती छोटी भाभी को देख कर बोला.

असलम मुमताज की बांह पकड़ कर अपने कमरे में ले आया, ‘‘बैठो यहां,’’  उसे बैड पर बैठा कर असलम बोला और खुद उस के कदमों में बैठ गया.

‘‘मुमताज, मैं तुम्हारा अपराधी हूं. मुझे तुम जो चाहे सजा दे सकती हो. मैं खूबसूरत चेहरे का तलबगार था. मगर अब मैं ने जान लिया है कि जिंदगी को खूबसूरत बनाने के लिए खूबसूरत चेहरे की नहीं, बल्कि खूबसूरत दिल की जरूरत होती है. प्लीज, मुझे माफ कर दो.’’

‘‘आप मेरे शौहर हैं. माफी मांग कर आप मुझे शर्मिंदा न करें. सुबह का भूला अगर शाम को वापस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते,’’ मुमताज बोली.

‘‘थैंक्स मुमताज, तुम बहुत अच्छी हो,’’ असलम प्यार से बोला.

‘‘अच्छे तो आप हैं, जो मुझ जैसी बदसूरत लड़की को भी अपना रहे हैं,’’ कह कर मुमताज ने हाथों में अपना चेहरा छिपा लिया और रोने लगी.

‘‘पगली, आज रोने का नहीं हंसने का दिन है. आंसुओं को अब हमेशा के लिए गुडबाय कह दो. अब मैं तुम्हें हमेशा हंसतेमुसकराते देखना चाहता हूं.

‘‘और खबरदार, जो अब कभी खुद को बदसूरत कहा. मेरी नजरों में तुम दुनिया की सब से हसीन लड़की हो,’’ ऐसा कह कर असलम ने मुमताज को अपने सीने से लगा लिया.

मुमताज सोचने लगी, ‘अंधेरी रात कितनी भी लंबी क्यों न हो, मगर उस के बाद सुबह जरूर होती है.’

घोंसला: सारा ने क्यों किया था शादी से इंकार

साराआज खुशी से झम रही थी. खुश हो भी क्यों न पुणे की एक बहुत बड़ी फर्म में उस की नौकरी जो लग गई थी. अपनी गोलगोल आंखें घुमाते हुए वह अपनी मम्मी से बोली, ‘‘मैं कहती थी न कि मेरी उड़ान कोई नहीं रोक सकता.’’

‘‘पापा ने पढ़ने के लिए मुझे मुजफ्फरनगर से बाहर नहीं जाने दिया पर अब इतनी अच्छी नौकरी मिली है कि वह मुझे रोक नहीं सकते हैं.’’

सारा थी 23 वर्ष की खूबसूरत नवयुवती, जिंदगी से भरपूर, गोरा रंग, गोलगोल आंखें, छोटी सी नाक और गुलाबी होंठ, होंठों के बीच काला तिल सारा को और अधिक आकर्षक बना देता था. उसे खुले आकाश में उड़ने का शौक था. वह अकेले रहना चाहती थी और जीवन को अपने तरीके से जीना चाहती थी.

जब भी सारा के पापा कहते, ‘‘हमें तुम से जिंदगी का अधिक अनुभव है इसलिए हमारा कहा मानो.’’

सारा फट से कहती, ‘‘पापा मैं अपने अनुभवों से कुछ सीखना चाहती हूं.’’

सारा के पापा उसे पुणे भेजना नहीं चाहते थे पर सारा की दलीलों के आगे उन की एक न चली.

फिर सारा की मम्मी ने भी समझया, ‘‘इतनी अच्छी नौकरी है, आजकल अच्छी नौकरी वाली लड़कियों की शादी आराम से हो जाती है.

फिर सारा के पापा ने हथियार डाल दिए थे. ढेर सारी नसीहतें दे कर सारा के पापा वापस मुजफ्फरनगर आ गए थे.

सारा को शुरुआत में थोड़ी दिक्कत हुई थी परंतु धीरधीरे वह पुणे की लाइफ की अभ्यस्त हो गई थी.

यहां पर मुजफ्फरनगर की तरह न टोकाटाकी थी न ही ताकाझंकी. सारा को आधुनिक कपड़े पहनने का बहुत शौक था जिसे सारा अब पूरा कर पाई थी. वह स्वच्छंद तितली की तरह जिंदगी बिता रही थी. दफ्तर में ही सारा की मुलाकात मोहित से हुई थी. मोहित का ट्रांसफर दिल्ली से पुणे हुआ था.

मोहित को सारा पहली नजर में ही भा गई थी. सारा और मोहित अकसर वीकैंड पर बाहर घूमने जाते थे. परंतु सारा को हरहाल में रात 9 बजे तक अपने होस्टल वापस जाना ही पड़ता था.

फिर एक दिन मोहित ने यों ही सारा से कहा, ‘‘सारा, तुम मेरे फ्लैट में शिफ्ट क्यों नहीं हो जाती हो. चिकचिक से छुटकारा भी मिल जाएगा और हमें यों ही हर वीकैंड पर बंजारों की तरह घूमना नहीं पड़ेगा. सब से बड़ी बात तुम्हारा होस्टल का खर्च भी बच जाएगा.’’

सारा छूटते ही बोली, ‘‘पागल हो क्या, ऐसे कैसे रह सकती हूं तुम्हारे साथ? मतलब मेरातुम्हारा रिश्ता ही क्या है?’’

मोहित बोला, ‘‘रहने दो बाबा, मैं तो भूल ही गया था कि तुम तो गांव की गंवार हो. छोटे शहर के लोगों की मानसिकता कहां बदल सकती हैं चाहे वह कितने ही आधुनिक कपड़े पहन लें.’’

सारा मोहित की बात सुन कर एकदम चुप हो गईं. अगले कुछ दिनों तक मोहित सारा से खिंचाखिंचा रहा.

एक दिन सारा ने मोहित से पूछा, ‘‘मोहित, आखिर मेरी गलती क्या हैं?’’

मोहित बोला, ‘‘तुम्हारा मुझ पर अविश्वास.’’

‘‘बात अविश्वास की नहीं है मोहित, मेरे परिवार को अगर पता चल जाएगा तो वे मेरी नौकरी भी छुड़वा देंगे.’’

‘‘तुम्हें अगर रहना है तो बताओ बाकी सब मैं हैंडल कर लूंगा.’’

घर पर पापा के मिलिटरी राज के कारण सारा का आज तक कोई बौयफ्रैंड नहीं बन पाया था, इसलिए वह यह सुनहरा मौका हाथ से नहीं छोड़ना चाहती थी. अत: 1 एक हफ्ते बाद मोहित के साथ शिफ्ट कर गई. घर पर सारा ने बोल दिया कि उस ने एक लड़की के साथ अलग से फ्लैट ले लिया है क्योंकि उसे होस्टल में बहुत असुविधा होती थी.

यह बात सुनते ही सारा के मम्मीपापा ने जाने के लिए सामान बांध लिया था. वे देखना चाहते थे कि उन की लाड़ली कैसे अकेले रहती होगी.

सारा घबरा कर मोहित से बोली, ‘‘अब क्या करेंगे?’’

मोहित हंसते हुए बोला, ‘‘अरे देखो मैं कैसा चक्कर चलाता हूं,’’

अगले रोज मोहित अपनी एक दोस्त शैली को ले कर आ गया और बोला, ‘‘तुम्हारे मम्मीपापा के सामने मैं शैली के बड़े भाई के रूप में उपस्थित रहूंगा.’’

सारा के मम्मीपापा आए और फिर मोहित के नाटक पर मोहित हो कर चले गए.

सारा के मम्मीपापा के सामने मोहित शैली के बड़े भाई के रूप में मिलने आता. सारा के मम्मीपापा को अब तसल्ली हो गई थी और वे निश्तिंत हो कर वापस अपने घर चले गए.

सारा और मोहित एकसाथ रहने लगे थे. सारा को मोहित का साथ भाता था परंतु अंदर ही अंदर उसे अपने मम्मीपापा से झठ बोलना भी कचोटता रहता था. एक दिन सारा ने मोहित से कहा, ‘‘मोहित, तुम मुझे पसंद करते हो क्या?’’

मोहित बोला, ‘‘अपनी जान से भी ज्यादा?’’

सारा बोली, ‘‘मोहित तुम और मैं क्या इस रिश्ते को नाम नहीं दे सकते हैं?’’

मोहित चिढ़ते हुए बोला,’’ यार मुझे माफ करो, मैं ने पहले ही कहा था कि हम एक दोस्त की तरह ही रहेंगे. मैं तुम पर कोई बंधन नहीं लगाना चाहता हूं और न ही तुम मुझ पर लगाया करो. और तुम यह बात क्यों भूल जाती हो कि मेरे घर पर रहने के कारण तुम्हारी कितनी बचत हो रही है और भी कई फायदे भी हैं,’’ कहते हुए मोहित ने अपनी आंख दबा दी.

सारा को मोहित का यह सस्ता मजाक बिलकुल पसंद नहीं आया. 2 दिन तक मोहित और सारा के बीच तनाव बना रहा परंतु फिर से मोहित ने हमेशा की तरह सारा को मना लिया. सारा भी अब इस नए लाइफस्टाइल की अभ्यस्त हो चुकी थी.

सारा जब मुजफ्फरनगर से पुणे आई थी तो उस के बड़ेबड़े सपने थे परंतु अब न जाने क्यों उस के सब सपने मोहित के इर्दगिर्द सिमट कर रह गए थे.

आज सारा बेहद परेशान थी. उस के पीरियड्स की डेट मिस हो गई थी. जब उस ने मोहित को यह बात बताई तो वह बोला, ‘‘सारा ऐसे कैसे हो सकता है हम ने तो सारे प्रीकौशंस लिए थे?’’

‘‘तुम मुझ पर शक कर रहे हो?’’

‘‘नहीं बाबा कल टैस्ट कर लेना.’’

सारा को जो डर था वही हुआ. प्रैगनैंसी किट की टैस्ट रिपोर्ट देख कर सारा के हाथपैर ठंडे पड़ गए.

मोहित उसे संभालते हुए बोला, ‘‘सारा टैंशन मत लो कल डाक्टर के पास चलेंगे.’’

अगले दिन डाक्टर के पास जा कर जब उन्होंने अपनी समस्या बताई तो डाक्टर बोली, ‘‘पहली बार अबौर्शन कराने की सलाह मैं नहीं दूंगी… आगे आप की मरजी.’’

घर आ कर सारा मोहित की खुशामद करने लगी, ‘‘मोहित, प्लीज शादी कर लेते हैं. यह हमारे प्यार की निशानी है.’’

मोहित चिढ़ते हुए बोला, ‘‘सारा, प्लीज फोर्स मत करो… यह शादी मेरे लिए शादी नहीं बल्कि एक फंदा बनेगी.’’

सारा फिर चुप हो गई थी. अगले दिन चुपचाप जब सारा तैयार हो कर जाने लगी तो मोहित भी साथ हो लिया.

रास्ते में मोहित बोला, ‘‘सारा, मुझे मालूम है तुम मुझ से गुस्सा हो पर ऐसा कुछ

जल्दबाजी में मत करो जिस से बाद में हम

दोनों को घुटन महसूस हो. देखो इस रिश्ते में

हम दोनों का फायदा ही फायदा है और शादी के लिए मैं मना कहां कर रहा हूं, पर अभी नहीं कर सकता हूं.’’

डाक्टर से सारा और मोहित ने बोल दिया था कि कुछ निजी कारणों से वे अभी बच्चा नहीं कर सकते हैं.

डाक्टर ने उन्हें अबौर्शन के लिए 2 दिन बाद आने के लिए कहा. मोहित ने जब पूरा खर्च पूछा तो डाक्टर ने कहा, ‘‘25 से 30 हजार रुपए.’’

घर आ कर मोहित ने पूरा हिसाब लगाया, ‘‘सारा तुम्हें तो 3-4 दिन बैड रैस्ट भी करना होगी जिस कारण तुम्हें लीव विदआउट पे लेनी पड़ेगी. तुम्हारा अधिक नुकसान होगी, इसलिए इस अबौर्शन का 50% खर्चा मैं उठा लूंगा.’’

सारा छत को टकटकी लगाए देख रही थी. बारबार उसे ग्लानि हो रही थी कि वह एक जीव हत्या करेगी. बारबार सारा के मन में खयाल आ रहा था कि अगर उस की और मोहित की शादी हो गई होती तो भी मोहित ऐसे ही 50% खर्चा देता. सारा ने रात में एक बार फिर मोहित से बात करने की कोशिश करी, मगर उस ने बात को वहीं समाप्त कर दिया.

मोहित बोला, ‘‘तुम्हें वैसे तो बराबरी चाहिए, मगर अब फीमेल कार्ड खेल रही हो. यह गलती दोनों की है तो 50% भुगतान कर तो रहा हूं और यह बात तुम क्यों भूल जाती हो कि तुम्हारा वैसे ही क्या खर्चा होता है. यह घर मेरा है जिस में तुम बिना किराए दिए रहती हो.’’

मोहित की बात सुन कर सारा का मन खट्टा हो गया.

जब से सारा अबौर्शन करा कर लौटी थी वह मोहित के साथ हंसतीबोलती जरूर थी, मगर उस के अंदर बहुत कुछ बदल गया था. पहले जो सारा मोहित को ले कर बहुत केयरिंग और पजैसिव थी अब उस ने मोहित से एक डिस्टैंस बना लिया था.

शुरूशुरू में तो मोहित को सारा का बदला व्यवहार अच्छा लग रहा था परंतु बाद में उसे सारा का वह अपनापन बेहद याद आने लगा.

पहले मोहित जब औफिस से घर आता था तो सारा उस के साथ ही चाय लेती थी परंतु आजकल अधिकतर वह गायब ही रहती थी.

एक दिन संडे को मोहित ने कहा, ‘‘सारा कल मैं ने अपने कुछ दोस्त लंच पर बुलाए हैं.’’

सारा लापरवाही से बोली, ‘‘तो मैं क्या

करूं, तुम्हारे दोस्त हैं तुम उन्हें लंच पर बुलाओ या डिनर पर.’’

‘‘अरे यार हम एकसाथ एक घर में रहते हैं… ऐसा क्यों बोल रही हो.’’

सारा मुसकराते हुए बोली, ‘‘बेबी, इस घोंसले की दीवारें आजाद हैं… जो जब चाहे उड़ सकता है. कोई तुम्हारी पत्नी थोड़े ही हूं जो तुम्हारे दोस्तों को ऐंटरटेन करूं.’’

मोहित मायूस होते हुए बोला, ‘‘एक दोस्त के नाते भी नहीं?’’

‘‘कल तुम्हारी इस दोस्त को अपने दोस्तों के साथ बाहर जाना है.’’

मोहित आगे कुछ नहीं बोल पाया.

सारा ने अब तक अपनी जिंदगी मोहित

के इर्दगिर्द ही सीमित कर रखी थी. जैसे ही उस

ने बाहर कदम बढ़ाए तो सारा को लगा कि वह कुएं के मेढक की तरह अब तक मोहित के

साथ बनी हुई थी. इस कुएं के बाहर तो बहुत

बड़ा समंदर है. सारा अब इस समंदर की सारी सीपियों और मोतियों को अनुभव करना

चाहती थी.

एक दिन डिनर करते हुए सारा मोहित से बोली, ‘‘मोहित, तुम्हें पता नहीं है तुम कितने अच्छे हो.’’

मोहित मन ही मन खुश हो उठा. उसे लगा कि अब सारा शायद फिर से प्यार का इकरार करेगी.

मगर सारा मोहित की आशा के विपरीत बोली, ‘‘अच्छा हुआ तुम ने शादी करने से मना कर दिया. मुझे उस समय बुरा अवश्य लगा परंतु अगर हम शादी कर लेते तो मैं इस कुएं में ही सड़ती रहती.’’

अगले माह मोहित को कंपनी के काम से बैंगलुरु जाना था. उसे न जाने क्यों अब सारा का यह स्वच्छंद व्यवहार अच्छा नहीं लगता था. उस ने मन ही मन तय कर लिया था कि अगले माह सारा के जन्मदिन पर वह उसे प्रोपोज कर देगा और फिर परिवार वालों की सहमति से अगले साल तक विवाह के बंधन में बंध जाएंगे.

बैंगलुरु पहुंचने के बाद भी मोहित ही सारा को मैसेज करता रहता था परंतु चैट पर बकबक करने वाली सारा अब बस हांहूं के मैसेज तक सीमित हो गई थी.

जब मोहित बैंगलुरु से वापस पुणे पहुंचा तो देखा सारा वहां नही थी. उस ने फोन लगाया तो सारा की चहकती आवाज आई, ‘‘अरे यार मैं गोवा में हूं, बहुत मजा आ रहा है.’’

इस से पहले कि मोहित कुछ बोलता सारा ने झट से फोन काट दिया.

3 दिन बाद जब सारा वापस आई तो मोहित बोला, ‘‘बिना बताए ही चली गईं, एक बार पूछा भी नही.’’

सारा बोली, ‘‘तुम मना कर देते क्या?’’

मोहित झेंपते हुए बोला, ‘‘मेरा मतलब यह नहीं था.’’

मोहित को उस के एक नजदीकी दोस्त ने बताया था कि सारा अर्पित नाम के लड़के के साथ गोवा गई थी. मोहित को यह सुन कर बुरा लगा था, मगर उसे समझ नहीं आ रहा था कि सारा से क्या बात करे? उस ने खुद ही अपने और सारा के बीच यह खाई बनाई थी.

मोहित सारा को दोबारा से अपने करीब लाने के लिए सारे ट्रिक्स अपना चुका था परंतु अब सारा पानी पर तेल की तरह फिसल गई थी.

अगले हफ्ते सारा का जन्मदिन था. मोहित ने मन ही मन उसे सरप्राइज देने की सोच रखी थी. तभी उस रात अचानक मोहित को तेज बुखार हो गया. सारा ने उस की खूब अच्छे से देखभाल करी. 5 दिन बाद जब मोहित पूरी तरह से ठीक हो गया तो उसे विश्वास हो गया कि सारा उसे छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी. मोहित ने सारा के लिए हीरे की अंगूठी खरीद ली. कल सारा का जन्मदिन था. मोहित शाम को जल्दी आ गया था. उस ने औनलाइन केक बुक कर रखा था.

न जाने क्यों आज उसे सारा का बेसब्री से इंतजार था.

जैसे ही सारा घर आई तो मोहित ने उस के लिए चाय बनाई. सारा ने मुसकराते हुए चाय का कप पकड़ा और कहा, ‘‘क्या इरादा है जनाब का?’’

मोहित बोला, ‘‘कल तुम्हारा जन्मदिन है, मैं तुम्हें स्पैशल फील कराना चाहता हूं.’’

‘‘वह तो तुम्हें मेरे घर आ कर करना पड़ेगा.’’

‘‘तुम क्या अपने घर जा रही हो जन्मदिन पर.’’

‘‘मैं ने अपने औफिस के पास एक छोटा सा फ्लैट ले लिया है. मैं अपना जन्मदिन वहीं मनाना चाहती हूं. अब मैं अपना खर्च खुद उठाना चाहती हूं… यह निर्णय मुझे बहुत पहले ही ले लेना चाहिए था.’’

मोहित बोला, ‘‘मुझे मालूम है तुम मुझ से अब तक अबौर्शन की बात से नाराज हो. यार मेरी गलती थी कि मैं ने तुम से तब शादी करने के लिए मना कर दिया था.’’

‘‘अरे नहीं तुम सही थे, मजबूरी में अगर तुम मुझ से शादी कर भी लेते तो हम दोनों हमेशा दुखी रहते.’’

‘‘सारा मैं तुम से प्यार करता हूं और तुम से शादी करना चाहता हूं.’’

‘‘मोहित पर मैं तुम से आकर्षित थी… अगर प्यार होता तो शायद आज मैं अलग रहने का फैसला नहीं लेती.’’

सारा सामान पैक कर रही थी. मोहित के अहम को ठेस लग गई थी, इसलिए उस ने अपना आखिरी दांव खेला, ‘‘तुम्हारे नए बौयफ्रैंड को पता है कि तुम ने अबौर्शन करवाया था. अगर तुम्हारे घर वालों को यह बात पता चल जाएगी तो सोचो उन्हें कैसा लगेगा? मैं तुम पर विश्वास करता हूं, इसलिए मैं तुम से शादी करने को अभी भी तैयार हूं.’’

‘‘पर मोहित मैं तैयार नहीं हूं. बहुत अच्छा हुआ कि इस बहाने ही सही मुझे तुम्हारे विचार पता चल गए. और रही बात मेरे परिवार की, तो वे कभी नहीं चाहेंगे कि मैं तुम जैसे लंपट इंसान से विवाह करूं. मोहित तुम्हारा यह घोंसला आजादी के तिनकों से नहीं वरन स्वार्थ के तिनकों से बुना हुआ है. अगर एक दोस्त के नाते कभी मेरे घर आना चाहो तो अवश्य आ सकते हो,’’ कहते हुए सारा ने अपने नए घोंसले का पता टेबल पर रखा और एक स्वच्छंद चिडि़या की तरह खुले आकाश में विचरण करने के लिए उड़ गई.

सारा ने अब निश्चय कर लिया था कि वह अपनी मेहनत और हिम्मत के तिनकों से अपना घोंसला स्वयं बनाएगी. तिनकातिनका जोड़ कर बनाएगी अब वह अपना घोंसला… आज की नारी में हिम्मत, मेहनत और खुद पर विश्वास का हौसला.

नाइट फ्लाइट :ऋचा से बात करने में क्यों कतरा रहा था यश

मुंबई का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा. अभी शाम के 5 भी  नहीं बजे थे. यश की फ्लाइट रात के 8 बजे की थी. वह लंबी यात्रा में किसी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहता था. सो, एयरपोर्ट जल्दी ही आ गया था. उस ने टैक्सी से अपना सामान उतार कर ट्रौली पर रखा. हवाईअड्डे पर काफी भीड़ थी. वह मन ही मन सोच रहा था, आजकल हवाई यात्रा करने वालों की कमी नहीं है. यश ने अपना पासपोर्ट और टिकट दिखा कर अंदर प्रवेश किया.

यश ने एयर इंडिया के काउंटर से चेकइन कर अपना बोर्डिंग पास लिया. उस ने अपने लिए किनारे वाली सीट पहले से बुक करा ली थी. उसे यात्रा के दौरान विंडो या बीच वाली सीट से निकल कर वौशरूम जाने में परेशानी होती है. उस के बाद वह सुरक्षा जांच के लिए गया. सुरक्षा जांच के बाद टर्मिनल 2 की ओर बढ़ा जहां से एयर इंडिया की उड़ान संख्या ए/314 से उसे हौंगकौंग जाना था. वहां पर वह एक किनारे कुरसी पर बैठ गया. अभी भी उस की फ्लाइट में डेढ घंटे बाकी थे. हौंगकौंग के लिए और भी उड़ानें थीं पर उस ने जानबूझ कर नाइट फ्लाइट ली ताकि रात जहाज में सो कर गुजर जाए और सारा दिन काम कर सके. उस की फ्लाइट हौंगकौंग के स्थानीय समय के अनुसार सुबह 6.45 बजे वहां लैंड करती.

थोड़ी देर बाद एक बुजुर्ग आ कर यश की बगल में एक सीट छोड़ कर बैठ गए. बीच की सीट पर उन्होंने अपना बैग रख दिया. देखने में वे किसान लग रहे थे. उन्होंने अपना बोर्डिंग पास यश को दिखाते हुए पंजाबी मिश्रित हिंदी में पूछा, ‘‘पुत्तर, मेरा जहाज यहीं से उड़ेगा न?’’

यश ने हां कहा और अपनी किताब पढ़ने लगा. बीचबीच में वह सामने टीवी स्क्रीन पर न्यूज देख लेता. लगभग आधे घंटे के बाद एक युवती आई. यश की बगल वाली सीट पर बुजुर्ग का बैग रखा था. लड़की ने यश से कहा, ‘‘प्लीज, आप अपना बैग हटा लेते, तो मैं यहां बैठ जाती.’’

यश ने मुसकराते हुए बुजुर्ग की ओर इशारा कर कहा, ‘‘यह बैग उन का है.’’

उस बुजुर्ग को हिंदी ठीक से नहीं आती थी. लड़की के समझाने पर उन्होंने अपना बैग नीचे रखा. तब लड़की ने यश की ओर देख कर कहा, ‘‘मैं थोड़ी देर में वौशरूम से आती हूं.’’

इस बार यश ने सिर उठा कर उसे देखा और मुसकराते हुए, ‘इट्स ओके’ कहा. फिर लड़की को जाते हुए देखा. लड़की खूबसूरत थी. उस की पतली कमर के ऊपर ब्लू स्कर्ट और स्कर्ट के बाहर झांकती पतली टांगें उसे अच्छी लगी थीं. ऊपर एक सफेद टौप था. उस ने हाईहील सैंडिल पहनी थी.

करीब 10 मिनट के बाद एक हाथ में स्नैक्स और दूसरे में कोक का कैन लिए वह लड़की आ रही थी. पहले स्नैक्स खाती, फिर कोक सिप करती. यश ने देखा कि उसे हाईहील पहन कर चलने में कुछ असुविधा हो रही थी. वह जैसे ही अपनी कुरसी पर बैठने जा रही थी कि थोड़ा लड़खड़ा पड़ी. उस ने अपने को तो संभाल लिया पर कोक का कैन हाथ से छूट कर यश की गोद में जा पड़ा. कुछ कोक छलक कर उस की जींस पर गिरी जिस से जींस कुछ गीली हो गई थी.

यश ने खड़े हो कर कैन उसे पकड़ाया. लड़की बुरी तरह शर्मिंदा थी, बोली, ‘‘आई एम ऐक्सट्रीमली सौरी.’’ और बैग में से कुछ टिश्यूपेपर निकाल कर उस की जींस पोंछने लगी.

यश को यह अच्छा नहीं लगा, वह बोला, ‘‘आप रहने दें, मैं खुद कर लेता हूं.’’ और उस के हाथ से टिश्यू ले कर खुद गीलापन कम करने की कोशिश करने लगा.

थोड़ी देर बाद बोर्डिंग की घोषणा हुई. यह भी इत्तफाक ही था कि वह लड़की और बुजुर्ग दोनों यश की बगल की सीटों पर थे. बुजुर्ग को विंडो सीट और लड़की को बीच वाली सीट मिली थी.

विमान के कैप्टन ने यात्रियों का स्वागत करते हुए कहा कि मुंबई से हौंगकौंग तक की उड़ान करीब 8 घंटे 35 मिनट की होगी. पर लगभग 2 घंटे के बाद विमान एक घंटे के लिए दिल्ली में रुकेगा. जिन यात्रियों को हौंगकौंग जाना है, कृपया अपनी सीट पर बैठे रहें. विमान परिचारिका ने सुरक्षा नियम समझाए. बुजुर्ग यात्री पहली बार हवाई जहाज से यात्रा कर रहे थे. उन्हें बैल्ट बांधने में लड़की ने मदद की. उन्होंने बताया कि वे कनाडा जा रहे हैं. वे कुछ दिन हौंगकौंग में अपनी भतीजी की शादी के सिलसिले में रुकेंगे.

फिर उन्हें हौंगकौंग से वैंकुवर जाना है. उन के बेटे ने उन का ग्रीनकार्ड स्पौंसर किया है.

निश्चित समय पर विमान ने टेकऔफ किया. बातचीत का सिलसिला यश ने शुरू किया. वह लड़की से बोला, ‘‘मैं यश मेहता, सौफ्टवेयर इंजीनियर हूं. मेरी कंपनी बैंकिंग सौफ्टवेयर बनाती है. अभी मैं एक प्रोडक्ट के सिलसिले में हौंगकौंग के बार्कले इन्वैस्टमैंट बैंक और एचएसबीसी बैंक जा रहा हूं.’’

‘‘ग्लैड टू मीट यू, मैं ऋचा शर्मा. हौंगकौंग में हमारा बिजनैस है.’’

‘‘तब तो आप अकसर वहां जाती होंगी.’’

‘‘जी नहीं, पहली बार जा रही हूं.’’

तब तक जलपान दिया गया. यश और ऋ चा ने देखा कि वे बुजुर्ग बारबार उठ कर बाथरूम जा रहे हैं जिस के चलते ऋचा को ज्यादा परेशानी हो रही थी. यश किनारे वाली सीट पर था तो वह अपने पैर बाहर की तरफ मोड़ लेता.

बुजुर्ग ने बताया कि उन्हें शुगर और किडनी दोनों बीमारियां हैं. उन की एक आदत यश और ऋ चा दोनों को बुरी लगी कि विमान परिचारिका जो भी कुछ सामान अगलबगल की सीट पर देती, वे अपने लिए भी मांग बैठते.

कुछ देर बाद विमान दिल्ली हवाई अड्डे पर उतर रहा था. करीब एक घंटे के बाद विमान ने हौंगकौंग के लिए उड़ान भरी. आधे घंटे के बाद डिनर सर्व हुआ. डिनर के बाद यश सोने की तैयारी में था. तभी ऋ चा ने अपने रिमोट से परिचारिका को बुलाने के लिए कौलबैल का बटन दबाया. थोड़ी देर में वह आई. ऋचा ने उस के कान में धीरे से कुछ कहा. परिचारिका ‘श्योर मैम, मैं देखती हूं,’ बोल कर चली गई.

कुछ ही देर बाद वह लौट कर आई. उस ने एक टिश्यू में लिपटा हुआ कुछ सामान ऋचा को दिया. बुजुर्ग ने कहा, ‘‘पुत्तर, एक मुझे भी दे दो.’’

परिचारिका बोली, ‘‘सर, यह आप के काम की चीज नहीं है.’’

‘‘तुम मुझे दो तो सही. मैं देख लूंगा, मेरे लिए है या नहीं.’’

ऋचा शरमा रही थी और अपनी हंसी भी नहीं छिपा पा रही थी. बारबार समझाने पर भी वे नहीं मान रहे थे. तब परिचारिका ने झुंझला कर कहा, ‘‘आप को भी मासिकधर्म है क्या?’’

बुजुर्ग बोले, ‘‘छि, क्या बोलती है?’’

तब जा कर उन की समझ में बात आई. यश ने कहा, ‘‘मैं देख रहा हूं आप हर चीज अपने लिए मांग रहे हैं?’’

‘‘आते समय मेरे बेटे ने समझाया था कि शर्म नहीं करना, सब चीजें जहाज में फ्री मिलती हैं.’’

यश हंस पड़ा. इसी बीच ऋचा सैनिटरी नैपकिन ले कर वौशरूम चली गई. 10 मिनट बाद वह लौट कर अपनी सीट पर आ रही थी. बगल की सीट पर बैठा यात्री सो रहा था और उस का हैडफोन नीचे गिरा था. ऋचा का पैर हैडफोन की तार में फंस गया, ऊपर से हाईहील, पैंसिल नोक वाली सैंडिल. ऋचा गिर पड़ी और उस की स्कर्ट भी कुछ इस तरह उठ गई थी कि उस का अधोवस्त्र भी झलकने लगा. वह उठने की कोशिश कर रही थी, पर दोबारा फिसल पड़ी थी. यश ने उसे सहारा दे कर अपनी सीट पर बैठाया और खुद बीच वाली सीट पर बैठ गया.

‘‘थैंक्स अ लौट,’’ ऋ चा बोली.

‘‘इट्स ओके. पर एक बात पूछूं, बुरा न मानिए.’’

ऋचा के पूछिए बोलने पर वह बोला, ‘‘आप हाईहील में सहज नहीं लगती हैं, फिर फ्लाइट में क्यों इसे पहन कर आई हैं?’’

‘‘हाईहील के बगैर मेरी हाइट 5 फुट से भी कम हो जाती है. वैसे, मैं रैगुलर इसे यूज नहीं करती.’’

थोड़ी देर बाद ऋ चा को नींद आ गई. उस ने नींद में यश के कंधे पर अपना सिर रख दिया. यश को उस का सामीप्य अच्छा लग रहा था. कंधे पर एक खुशनुमा बोझ तो था, पर उस के बदन और बालों की खुशबू यश को रोमांचित कर रही थी. वह यथावत स्थिति में बैठा रहा. उसे डर था कि कहीं हिलनेडुलने से ऋचा की नींद न टूट जाए और वह इस आनंद से वंचित रह जाए. बीच में कभी ऋचा की नींद खुलती तो वह सीधा हो कर बैठती, पर 5 मिनट के अंदर फिर यश के कंधों पर लुढ़क जाती.

इस बीच, यश ने दोनों सीटों के बीच वाले हिस्से को उठा कर खड़ा कर दिया. कभी तो ऋ चा का सिर उस के सीने पर भी आ जाता, तब उस की नींद खुलती और सौरी बोल कर सीधी हो जाती और बोलती, ‘‘मुझ से नींद बरदाश्त नहीं होती. मैं कहीं भी जाती हूं किसी तरह अपने सोनेभर की जगह बना ही लेती हूं.’’

यश ने कहा, ‘‘आप कहें तो मैं आप के लिए कुछ और जगह बना दूं. मेरे पैर पर तकिया रख कर सो लें.’’

‘‘ओह, नोनो.’’

पर 10 मिनट के अंदर उस का सिर यश के पैर पर रखे तकिए पर आ गया. यश को भी नींद आ रही थी, पर वह अपनी नींद कुरबान करने को तैयार था, बल्कि एकाध बार तो उस का दाहिना हाथ ऋ चा के बालों पर फिसलने लगता.

देखतेदेखते लैंडिंग की भी घोषणा हुई. तब यश ने धीरे से ऋचा का सिर हिला कर कहा ‘‘उठिए, बैल्ट बांधिए. हम हौंगकौंग पहुंच रहे हैं.’’

‘‘इतनी जल्दी आ गए. मुझे तो पता ही नहीं चला.’’ और फिर सीधा बैठ कर बैल्ट बांधती हुई बोली, ‘‘क्या मैं रातभर इसी तरह सोती आई? सौरी, आप को तकलीफ दी.’’

‘‘कोई बात नहीं, इट्स अ प्लेजर फौर मी. अगर सफर लंबा होता तो मुझे और खुशी होती.’’

ऋ चा मुसकरा कर रह गई. ऋ चा और यश दोनों का इमिग्रेशन और कस्टम एक ही डैस्क पर हुआ. वहीं लाइन में खड़े यश ने कहा, ‘‘आप के साथ का सफर बड़ा प्यारा रहा. क्या हम आगे भी मिल सकते हैं?’’

‘‘हां, मिलने में कोई बुराई नहीं है.’’

‘‘तो शाम को विंधम स्ट्रीट के इंडियन रैस्टोरैंट में मिलते हैं. जब हौंगकौंग आता हूं, वहां मैं अकसर डिनर करता हूं. लाजवाब स्वाद है वहां के खाने में.’’

ऋ चा हंस कर बोली, ‘‘तब तो वहां मैं जरूर मिलूंगी.’’

दोनों एयरपोर्ट से बाहर निकले. दोनों के लिए तख्तियां ले कर कार के ड्राइवर्स खड़े थे. दोनों अपनेअपने गंतव्य स्थान पर गए.

यश 2-3 घंटे होटल में आराम कर अपने काम पर चला गया. दिनभर वह शाम को ऋचा से होने वाली मुलाकात को सोच कर रोमांचित होता रहा.

यश ने शाम को उस इंडियन रैस्टोरैंट में अपने लिए टेबल बुक कर लिया था. होटल पहुंच कर वह अपने टेबल पर बैठा बारबार घड़ी देख रहा था. सोच रहा था कि ऋचा बोल कर भी क्यों नहीं आई. वह सोच ही रहा था कि तभी ऋचा एप्रन पहने सामने आ खड़ी हुई. उसे मेनू बुक देते हुए बोली, ‘‘गुड इवनिंग सर, आप खाने में क्या पसंद करेंगे?’’

यश उसे वेट्रैस की ड्रैस में देख कर घबरा गया और बोला, ‘‘तुम यहां वेट्रैस हो? यही तुम्हारा बिजनैस है?’’

‘‘रिलैक्स सर. अच्छा, आज मेरी पसंद का डिनर लें. आप को शिकायत का मौका नहीं दूंगी.’’

यश ने उस का हाथ पकड़ कर बैठाना चाहा तो वह बोली, ‘‘मैं डिनर ले कर आती हूं. दोनों साथ बैठ कर खाएंगे.’’

यश हैरानपरेशान सा बैठा था. थोड़ी देर में वह भरपूर खाना ले कर आई और एप्रन खोल कर रख दिया. दोनों खाते रहे. यश ने 2-3 बार पूछना चाहा कि क्या वह वेट्रैस है, पर हर बार वह टाल जाती.

खाना खत्म होते ही एक युवक उन के पास आया और उस ने ऋ चा से पूछा, ‘‘कुछ और चाहिए. खाना पसंद आया तुम्हारे वीआईपी गैस्ट को?’’

यश उस युवक की ओर देखने लगा. ऋ चा बोली, ‘‘मीट माई हस्बैंड, नीलेश.’’

यश भौचक्का सा कभी ऋचा, तो कभी नीलेश को देखता रहा. थोड़ी देर बाद नीलेश बोला, ‘‘हमारी शादी 2 महीने पहले इंडिया में हुई थी. इसे मायके में कुछ दिन रुकने का मन था. मैं यहां पहले चला आया. इस होटल में मेजर शेयर हमारा है. आप ने यात्रा में ऋचा की काफी सहायता की है. वह आप की बहुत तारीफ कर रही थी. दरअसल, इस टेबल की वेट्रैस आज छुट्टी पर है. ऋ चा बोली कि उस का एक खास गैस्ट आ रहा है, वह खुद मेहमाननवाजी करेगी. और आज का डिनर हमारी तरफ से कौंप्लीमैंट्री रहा.’’

यश अभी तक इस आश्चर्यजनक वाकए से उबर नहीं सका था, वह बोला, ‘‘ऋचा, आप ने पहले क्यों नहीं बताया?’’

‘‘मैं ने कहा था कि मेरा बिजनैस है. पर जब आप ने इंडियन रैस्टोरैंट का नाम लिया तो मैं ने सोचा, क्यों न सरप्राइज दिया जाए, और आप को कुछ देर और रोमांचित होने का मौका दिया मैं ने.’’

‘‘नौट फेयर ऋचा, मुझे आप ने अपने बारे में अंधेरे में रखा.’’

ऋचा ने यश की पीठ थपथपाई और कहा, ‘‘वी विल रिमेन गुड फ्रैंड्स. इस होटल में जब भी चाहो, आ जाना. बिल नहीं भी देंगे तो भी चलेगा. पर हर बार मैं सर्व नहीं कर सकूंगी. होप यू डौंट माइंड.’’

नीलेश और ऋचा दोनों होटल के बाहर तक यश को छोड़ने आए.

यश ने टैक्सी ली और वापस अपने होटल आ गया. रिलैक्स हो कर सोफे पर बैठ गया. उसे एहसास हो रहा था कि हम बिना दूसरे के बारे में जाने न जाने क्याक्या सोच बैठते हैं. ऋचा को देख उस ने न जाने क्याक्या सोच लिया था. गलती तो उसी की थी. मन तो बावरा होता है, लेकिन अपनी सोच पर तो हमारी खुद की पकड़ होती है. यश को अपनेआप पर हंसी आ गई. फिर लंबी सांस भर कर बोला, ‘‘नौट अगेन.’’

दूसरी शादी: कैसे एक हुई विनोद बाबू और मंजुला की राहें

साधारण कदकाठी के विनोद बाबू पहले जैसेतैसे रहते थे, लेकिन दूसरी शादी के बाद वे सलीके से कपड़े वगैरह पहनने लगे थे. वे चेहरे की बेतरतीब बढ़ी हुई दाढ़ीमूंछ को क्लीन शेव में बदल चुके थे. उन की आंखों पर खूबसूरत फ्रेम का चश्मा भी चढ़ गया था. इतना ही नहीं, सिर के खिचड़ी बालों को भी वे समयसमय पर डाई करवाना नहीं भूलते थे.

वैसे तो विनोद बाबू की उम्र 48 के करीब पहुंच गई थी, लेकिन जब से उन की मंजुला से दूसरी शादी हुई थी, तब से वे सजसंवर कर रहने लगे थे. इस का सुखद नतीजा यह हुआ है कि वे अब 38 साल के आसपास दिखने लगे थे.

इसी साल नवरात्र के बाद अक्तूबर के दूसरे हफ्ते में विनोद बाबू मंजुला से कोर्ट मैरिज कर चुके थे. तब से उन की जिंदगी में अलग ही बदलाव दिखने लगा था. पहले वे छुट्टी के बाद भी किसी बहाने देर तक अपने स्कूल में जमे रहने की कोशिश करते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं था.

अभी शाम के साढ़े 4 बज रहे थे. विनोद बाबू अपनी बाइक खड़ी कर के घर में कदम रख चुके थे. वे फ्रैश होने के बाद खुद को तरोताजा महसूस करने लगे थे. मंजुला घर की छोटीमोटी चीजों को सहेजने में लगी हुई थी. बेटाबेटी ट्यूशन पढ़ने गए हुए थे.

मंजुला को अकेली देख कर विनोद बाबू ने उन्हें पकड़ कर अपनी गोद में बैठाने की कोशिश की.

मंजुला बनावटी गुस्सा जाहिर करते हुए बोली, ‘‘मम्मीजी अपने कमरे में ही हैं. आप की आवाज सुन कर इधर आ जाएंगी.’’

‘‘मैं अपनी मां को बहुत अच्छी तरह से जानता हूं. हम दोनों के रहते वे इस कमरे में कभी नहीं आएंगी…’’ इतना कह कर वे मंजुला को अपनी बांहों में भर कर प्यार करने लगे.

तभी सासू मां ने बहू को आवाज लगाई. मंजुला खुद को छुड़ाते हुए अपनी सासू मां के कमरे की तरफ चली गई.

सासू मां ने मंजुला से कहा, ‘‘बहू, चाय बना दो.’’

मंजुला ने हां कह दी. वैसे उन्हें पता है कि सास को शाम के समय अपने पड़ोसियों के घर आनेजाने की पुरानी आदत है. जब तक वे 2-4 लोगों से जी भर कर बातें नहीं कर लेती हैं, उन का मन ही नहीं लगता है.

मंजुला नीले रंग की साड़ी में काफी खूबसूरत लग रही थी. उस ने अपने होंठों पर हलके गुलाबी रंग की लिपस्टिक लगा रखी थी. लंबे और खुले बाल उस की खूबसूरती को बढ़ा रहे थे.

सासू मां के कमरे से लौटने के बाद मंजुला ने विनोद बाबू से कहा, ‘‘आप स्कूल से थक कर आए हैं. थोड़ी देर आराम कर लीजिए. मैं आप के लिए भी चाय बना कर ला रही हूं.’’

मंजुला ने कुछ दिन में ही घर की रंगत ही बदल डाली थी. विनोद बाबू की पहली बीवी रजनी कैंसर के चलते गुजर गई थीं. तकरीबन 6 महीने तक कैंसर अस्पताल में भागदौड़ कर अपनी बीवी की वे समयसमय पर कीमोथैरेपी कराते रहे थे. वे इधरउधर से पैसे जुटा कर पानी की तरह बहा चुके थे, लेकिन आखिरी बार हुई कीमोथैरेपी के बाद दस्त और उलटी इतनी ज्यादा बढ़ गई थीं कि वे इन्हें अकेला छोड़ कर चली गईं.

रजनी के मौत के बाद विनोद बाबू का घर में रहना मुश्किल हो गया था. वे बेमन से अपने घर में आ पाते थे, वह भी सिर्फ अपने 10 साल के बेटे और बूढ़ी मां के लिए. पर सब्र बुरे से बुरे वक्त का सब से बड़ा मरहम होता है. कई साल गुजर गए थे. पत्नी की मौत के बाद ऐसा लगा था कि विनोद बाबू दोबारा शादी नहीं करेंगे.

जब पूरी दुनिया के साथ अपने देश में कोरोना वायरस की शुरुआत हुई, तो वह सब के लिए आफत ले कर आई थी. विनोद बाबू को कोरोना महामारी के दौरान अपने स्कूल में बने सैंटर में काम करना पड़ा था. वे दूसरे राज्यों से आए हुए लोगों की काफी मुस्तैदी से सेवा में जुटे हुए थे, लेकिन उन्हें वहां ड्यूटी करना महंगा पड़ गया था, क्योंकि वे खुद भी कोविड 19 की चपेट में आ चुके थे.

साथी टीचरों ने एंबुलैंस बुला कर विनोद बाबू को अस्पताल में भरती करवा दिया था. वे कई दिनों से अस्पताल के वार्ड में पड़े हुए थे. घर पर बेटा अर्नव था. उन का छोटा भाई अपने बीवीबच्चों के साथ अलग रह रहा था. विनोद बाबू अपनी मां और बेटे के साथ अलग रहते थे.

विनोद बाबू से 2 दिन पहले इस वार्ड में मंजुला आई थी. सांवले रंग की मंजुला देखने में काफी दुबलीपतली लग रही थी, पर खूबसूरत बहुत थी. रहरह कर उन की नजरें मंजुला की ओर चली ही जा रही थीं.

2 दिन बाद रात में विनोद बाबू की तबीयत अचानक ज्यादा बिगड़ने लगी थी. रात की शिफ्ट में काम करने वाले डाक्टर और नर्स ऊंघ रहे थे. उन्हें भी महामारी के चलते ज्यादा काम करना पड़ रहा था. ज्यादातर मरीज सोए हुए थे.

उस रात मंजुला की तबीयत ठीक थी, लेकिन से नींद नहीं आ रही थी. विनोद बाबू की हालत बिगड़ते देख उस से रहा नहीं गया और वह उन के पास आ गईं.

विनोद बाबू का औक्सीजन लैवल कम हो रहा था. छटपटाते देख वह उन के पास आ कर बोली, ‘‘आप पेट के बल लेट कर लंबीलंबी सांस भरने और छोड़ने की कोशिश कीजिए.’’

मंजुला विनोद बाबू की पीठ सहलाने लगी थी. इस से उन्हें राहत महसूस होने लगी थी. कुछ देर में ही उन का औक्सीजन लैवल सामान्य होने लगा था. उन्होंने मंजुला का शुक्रिया अदा किया था.

एक दिन मंजुला के बगल वाले बिस्तर की अधेड़ औरत मरीज मर गई. उस का बिस्तर अब खाली हो चुका था. वार्ड में दहशत का माहौल बन चुका था, इसीलिए मंजुला को उस रात नींद नहीं आ रही थी.

मंजुला को बेचैन देख कर विनोद बाबू से रहा नहीं गया था. आखिरकार उन्होंने मंजुला से पूछा, ‘‘अगर तुम्हें कोई परेशानी हो रही है, तो मेरे पास वाले खाली बिस्तर पर आ जाओ.’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है…’’ मंजुला ने यह कह तो दिया था, पर वह उस दिन काफी डर गई थी.

विनोद बाबू के बारबार कहने पर मंजुला उन के बगल वाले खाली बिस्तर पर आ गई थी.

‘‘तुम्हारे घर में कौनकौन लोग हैं?’’

‘‘मेरे घर में सास, ससुर, पति के अलावा 7 साल की एक बेटी है.’’

‘‘बेटी तो तुम्हें बहुत याद करती होगी?’’

‘‘पता नहीं याद करती होगी भी या नहीं,’’ यह कह कर मंजुला उदास हो गई थी.

‘‘परिवार वाले भी तुम्हें बहुत मिस कर रहे होंगे?’’ यह सुन कर मंजुला थोड़ी देर चुप रही, फिर बोली, ‘‘ऐसा कुछ नहीं है. मैं आज तक अपनी बेटी के बाद एक बेटे को जन्म नहीं दे पाई हूं, इसलिए घर के लोग नाखुश हैं. वैसे, मेरे शरीर के अंदर कुछ ऐसी परेशानी आ गई है कि डाक्टर ने साफ कह दिया है कि अब मैं दोबारा मां नहीं बन पाऊंगी.

‘‘मेरी बेटी अपनी दादी के पास रह रही है. वे सब तो चाहते हैं कि मैं मरूं तो मेरे पति को दूसरी शादी करने का मौका मिले, ताकि उन के घर में बेटे का जन्म हो सके.’’

विनोद बाबू हैरानी से मंजुला के चेहरे की ओर देख रहे थे, इसलिए वे कुछ देर तक चुप रही, फिर बोली, ‘‘वैसे, मैं भी अब उन को शादी करने की इजाजत दे देना चाहती हूं.’’

विनोद बाबू को यह सब सुन कर झटका सा लगा था, ‘‘बेटा या बेटी पैदा करना किसी के बस में नहीं होता है. फिर भी आज भी लोग किसी औरत से कैसे उम्मीद रखने लगते हैं कि उन के मन के मुताबिक बेटा या बेटी जनमे.

‘‘21वीं सदी में भी लोगों की सोच नहीं बदल रही है, जबकि आज लड़कियां आसमान की ऊंचाइयों पर उड़ रही हैं,’’ विनोद बाबू मंजुला को समझाने की कोशिश कर रहे थे.

एकदूसरे के सुखदुख बांटते हुए अस्पताल में दिन बीत रहे थे. जब मंजुला पूरी तरह से ठीक हो गई और डाक्टर ने डिस्चार्ज करने की इजाजत दे दी, तब भी उन के घर से कोई नहीं आया था.

मंजुला के पति अस्पताल में भरती कराने के बाद यह कह कर जा चुके थे, ‘तुम मर भी जाओगी, तो मैं तुम्हें यहां देखने नहीं आऊंगा.’

पति की यही नफरत भरी बातें मंजुला को घर जाने से रोक रही थीं. वैसे, वह भी अपनी सास और पति के रोजरोज के तानों से तंग आ चुकी थी. इधर विनोद बाबू उन्हें घर तक छोड़ने के लिए तैयार थे, लेकिन मंजुला ने उन से कहा, ‘‘आप जाइए. मैं बाद में घर चली जाऊंगी.’’

विनोद बाबू समझ गए तो उन से रहा नहीं गया और बोले, ‘‘चलो, मेरे घर चलो. तुम मेरे घर में पूरी तरह से सुरक्षित रहोगी. तुम्हारी भावनाओं का पूरा खयाल रखा जाएगा.’’

मंजुला जानती थी कि विनोद बाबू के साथ वह वाकई महफूज रहेगी और फिर कुछ सोचते हुए उस ने हां कह दी.

अब मंजुला विनोद बाबू के घर में रहने लगी और इस बात का पता उस के पति और परिवार वालों को चला तो उन के तेवर और सुर बदल गए थे. उन्होंने विनोद बाबू पर मंजुला को बरगलाने का आरोप लगाया था, लेकिन मंजुला अपने फैसले पर अडिग रही थी.

विनोद बाबू के परिवार की मदद से मंजुला अपने पति से तलाक लेने के लिए कोर्ट में अर्जी दाखिल कर चुकी थी. तकरीबन ढाई साल तक केस चलता रहा. जब भी वह अदालत में जाती थी, विनोद बाबू की माताजी उन के साथ रहती थीं.

तकरीबन ढाई साल की भागदौड़ और सामाजिक हिकारत सहने के बाद मंजुला अपने पति से तलाक ले पाई थी. तलाक के अगले दिन यानी दशहरा के बाद अक्तूबर के दूसरे हफ्ते में कोर्ट में ही मंजुला विनोद बाबू की दूसरी पत्नी बनना स्वीकार कर चुकी थी.

मंजूला को कोर्ट के आदेश के मुताबिक बेटी को भी अपने पास रखने की परमिशन मिल चुकी थी, क्योंकि बेटी भी अपनी मां के साथ ही रहना चाहती थी.

मंजुला अपने सासू मां को चाय पिला चुकी थी. सासू मां चाय पीने के बाद अपनी सहेली के घर जा चुकी थीं. अब मंजुला ट्रे में 2 कप चाय ले कर अपने कमरे में हाजिर थी.

मंजुला ने जैसे ही टेबल पर चाय की ट्रे रखी, विनोद बाबू ने उस के होंठ चूम लिए. वह भी उन के गले लग गई थी. आखिर में उस ने इशारा किया, ‘‘जनाब, चाय ठंडी हो जाएगी.’’

वे दोनों बातें करते हुए चाय पीने लगे थे. मंजुला चाय खत्म कर विनोद बाबू के बगल में आ कर लेट गई थी.

‘‘तुम्हारे साथ बातें करने में ही मेरी सारी थकान मिट जाती है,’’ विनोद बाबू मनुहार करते हुए बोले थे.

मंजुला ने अपना सिर उन के सीने पर रख दिया. सालों बाद उन्हें ऐसी खुशी मिल रही थी.

धीरज कुमार      

धोखेबाज: क्या मनोज को मिल पाया सच्चा प्यार

उस समय बाजार बंद था. सड़कें सुनसान थीं. आसमान नीला था. पेड़ हरे थे. ऐसा मौसम दिल्ली जैसे मैट्रो शहर में कभी किसी ने नहीं देखा था. खैर, ऐसे समय में मनोज को मोबाइल फोन और टैलीविजन से इश्क हो गया था. फेसबुक पर समय ज्यादा ही कट रहा था. और भला कटे भी क्यों न… कमबख्त इश्क जो हो गया था.

एक इश्क लड़की से और दूसरा इश्क मोबाइल फोन से. समझ नहीं आया कि इश्क मोबाइल फोन से हुआ था या मोबाइल वाली लड़की से. हां, शुरुआत बस औपचारिक बातचीत से हुई थी. धीरेधीरे वह भी खुलने लग गई और मनोज भी. उस की प्यारभरी बातें मनोज को अपनी तरफ खींचती चली जा रही थीं.

हां, फ्रैंड रिक्वैस्ट उस ने ही मनोज को भेजी थी. मनोज ने फ्रैंड रिक्वैस्ट स्वीकार करने से पहले उस का प्रोफाइल देखा था. फोटो उस का भारतीय लड़की के जैसा था. उस के बाल और आंखें विदेशी जैसी थीं. भूरे बाल और नीली आंखें.

उस ने अपने प्रोफाइल फोटो में नीली जींस और सफेद टीशर्ट पहन रखी थी. फोटो में देख कर अंदाजा लगाया जा सकता था कि वह तकरीबन 5 फुट, 7 इंच ऊंची होगी. उम्र 30-35 साल के आसपास की होगी.

मनोज द्वारा फ्रैंड रिक्वैस्ट स्वीकार करते ही उस ने मैसेज भेजा था, ‘हैलो, गुड मौर्निंग डियर…’

‘डियर’ शब्द से संबोधित करने पर मनोज बड़ा खुश हुआ.

‘हैलो, गुड मौर्निंग…’ मनोज ने भी जवाब दिया.

फिर उस का दूसरा मैसेज आया, ‘आप कैसे हो डियर?’

‘मैं ठीक हूं. आप कैसी हैं?’

‘मैं ठीक हूं. अपने काम में बिजी हूं…’ फिर तुरंत उस ने एक लंबा खतनुमा मैसेज इंगलिश में भेज दिया, ‘मेरा नाम जेसिका छोटू दुबे है. मैं आधी भारतीय हूं  और आधी अंगरेज हूं, क्योंकि मेरी मां दिल्ली से थीं और मेरे पिता इंगलैंड से. मैं ने फेसबुक पर आप का प्रोफाइल देखा और मैं ने आप को अपना दोस्त बनाने के लिए एक मैसेज भेजने का फैसला किया, क्योंकि मैं भारत में किसी को नहीं जानती.

‘मैं अभी अगले महीने भारत की यात्रा का प्लान कर रही हूं. मैं भारत पहली बार आ रही हूं… मुझे ऐसा लगता है कि अपनी मातृभूमि में आ कर मुझे बहुत खुशी होगी…’

मनोज को इतनी इंगलिश आती थी, इसलिए उस ने जवाब दिया, ‘मैं दिल्ली में रहता हूं. दिल्ली बहुत ही खूबसूरत जगह है. यहां कई सैलानी घूमने आते हैं. मैं एक आटोमोबाइल कंपनी में मशीन औपरेटर हूं…’

‘आप मुझे अपना ह्वाट्सएप नंबर भेजें, हम ह्वाट्सएप पर और बात करते हैं…’

मनोज ने अपना ह्वाट्सएप नंबर तुरंत भेज दिया. तुरंत ही जेसिका का जवाब भी आ गया.

नंबर विदेश का ही था. अब मनोज को पूरा यकीन हो चुका था कि वह किसी विदेशी लड़की से बात कर रहा है.

फिर रात हुई और फिर सुबह. इस बीच मनोज का कई बार जेसिका से बात करने का मन हुआ, पर वह उसे औनलाइन नहीं मिली.

मगर थोड़ी देर बाद जेसिका का मैसेज मिला, ‘मैं चाहती हूं कि आप मुझे बेहतर तरीके से जानें… मैं ने शादी नहीं की… मैं लंदन में रहती हूं… मैं फिलहाल ब्रिटिश पैट्रोलियम के एक समुद्र तटीय इलाके में नर्स के रूप में काम करती हूं. मेरे कहने का मतलब है कि मैं एक नर्स हूं, लेकिन मैं 32 साल की हूं. मैं ने अपनी मां को तब खो दिया था, जब मैं 10 साल की थी.

‘मैं ने 6 महीने की छुट्टी ले ली है. मैं अगले महीने भारत की यात्रा करने की योजना बना रही हूं. यह मेरी पहली यात्रा होगी और मैं बहुत सारी मस्ती करना चाहती हूं. मैं चाहती हूं कि आप अगले मैसेज में अपने बारे में बताएं, ताकि हम एकदूसरे को बेहतर तरीके से समझ सकें…’

मनोज ने भी तुरंत मैसेज किया, ‘आप ने मुझे अपने बारे में इतना कुछ बता कर यह साबित किया है कि आप दिल की साफ और नेकदिल इनसान हैं. अमूमन लोग इतनी जल्दी इतना प्यार किसी को नहीं करते. मैं आप का इंतजार करूंगा…’

इस के बाद जेसिका का कोई मैसेज नहीं आया. लेकिन अगले दिन सुबह मनोज ने जेसिका का मैसेज देखा.

‘डियर, शायद मेरी नौकरी के चलते कोई भी मर्द हमेशा घर से दूर रहने वाली लड़की के साथ नहीं रहना चाहेगा, शायद इसलिए कि जब मैं छोटी थी, तो मर्दों के साथ मेरा अनुभव अच्छा नहीं था.

‘मैं बहुत धार्मिक नहीं हूं, क्योंकि मैं नियमित रूप से प्रार्थना में शामिल नहीं होती हूं. मैं ग्रेटर लंदन में केसिंगटन स्क्वायर में रहती हूं. आप बेझिझक

मुझ से कुछ भी पूछें और मैं आप को जवाब दूंगी..’

‘‘मैं एक कंपनी में सीएनसी औपरेटर हूं. बहुत थकाऊ और बोरिंग काम है. पूरे 8 घंटे मशीन के सामने मशीन बन कर खड़ा रहता हूं. पर मेरी मजबूरी है कि मैं यह सब करता हूं. अच्छी नौकरी की तलाश में हूं. मैं यह भी जानता हूं कि ऐसे उबाऊ काम करने वाले से कोई दोस्ती नहीं करेगा.

‘हां, फिलहाल आराम फरमा रहा हूं और लौकडाउन के खुलने का इंतजार कर रहा हूं. आप के मैसेज बहुत लेट आते हैं. मुझे आप के जवाब का बेसब्री से इंतजार रहता है,’ मनोज ने जवाब दे दिया.

‘लगता है कि आप अच्छा समय बिता रहे हैं. मैं फेसबुक पर नई हूं, लेकिन मेरी उम्मीद बहुत ज्यादा है. तुम एक अच्छे और सभ्य आदमी की तरह लग रहे हो और मैं इसे थोड़ा और आगे ले जाना पसंद करूंगी. यह भारत की मेरी पहली यात्रा है और मैं इसे ले कर बहुत उत्साहित हूं. मैं अभी तक भारत में किसी को नहीं जानती हूं…’

‘आप भारत कब आ रही हैं? अब आप से मिलने का बहुत मन कर रहा है और आप के साथ बैठ कर बहुत सारी बात करने का भी. भारत बहुत बड़ा देश है. यहां घूमने की कई जगहें हैं.

‘मुझे लगता है कि आप किसी सच्चे जीवनसाथी का इंतजार कर रही हैं. मैं दुआ करता हूं कि आप को जल्द ही सच्चा जीवनसाथी मिले…’

इस मैसेज के बाद काफी लंबे समय तक जेसिका का कोई मैसेज नहीं आया. मतलब, चौथे दिन उस ने मैसेज किया, ‘जानेमन, आज तुम कैसे हो? मैं कुछ दिनों से बहुत बिजी हो गई हूं. जैसा कि मैं ने आप से पहले कहा था कि मैं अपनी बुकिंग करने में बिजी हूं और मैं 28 अक्तूबर को उड़ान भरूंगी. मैं उस समय को ले कर बहुत खुश हूं, जो हम एकसाथ बिताने जा रहे हैं.

‘मैं आज खरीदारी के लिए भी गई थी. मैं ने आप के लिए भी बहुत सी चीजें खरीदी हैं. मैं रवाना होने से पहले आप को कुरियर से वह सब सामान भेजूंगी, इसलिए मुझे अपना पूरा नाम, मोबाइल नंबर और पता भेजें, जहां आप पैकेट रिसीव करना चाहते हैं.’

‘ओह, मैं पहले इतना खुश कभी नहीं हुआ था. न जाने क्यों मैं घबरा भी रहा हूं. ठीक वैसे ही जैसे प्यार की पहली मुलाकात में लोग घबराते, शरमाते हैं. क्य तुम भी ऐसा महसूस कर रही हो? और मुझे किसी चीज की जरूरत नहीं है. बस तुम आ रही हो, इस से बड़ी खुशी की कोई बात नहीं.’

‘मना मत करो प्लीज. गिफ्ट तो तुम्हें लेना ही होगा जानेमन,’ इतना मैसेज लिख कर जेसिका ने मैसेज में एक चुम्मा भी भेज दिया.

मनोज खुश हुआ, पर साथ ही मैसेज किया, ‘मुझे बस एक बात का डर है. यहां कोरोना फैला हुआ है. इस वजह से यहां घूमनाफिरना बहुत ही मुश्किल है. विदेश से आने के बाद आप को भी

14 दिनों के लिए क्वारंटीन रहना होगा. दिल्ली में होटल मिलना भी मुश्किल होगा, लेकिन हम दोनों साथ रहने की कोशिश करेंगे. वैसे, मैं एक पता भेज रहा हूं…’ फिर मनोज ने अपना किराए के घर का पता जेसिका को भेज दिया.

‘मैं ने जो पैकेट भेजा है, उस में सफेद धारियों के बैग के अंदर 2,00,000 पाउंड, लैपटौप, सोने की कलाई घड़ी, डिजाइनर परफ्यूम, एप्पल आईफोन है. दूसरे बैग में मैं ने कुछ अपना सामान भी रख दिया है, ताकि जब मैं आऊं तो मेरा सामान कम हो.’

इतने सारे गिफ्ट और पैसे के बारे में जान कर मनोज को लग रहा था कि अब उस की गरीबी दूर हो जाएगी. हमेशा के लिए सड़ी सी नौकरी से उसे छुटकारा मिल जाएगा.

अपनी बात को पुख्ता करने के लिए मनोज ने जेसिका को लिखा, ‘लव, क्या तुम मुझे कुरियर की परची और पैकेट का फोटो भेज सकती हो, ताकि मुझे सामान लेने में आसानी रहे…’

‘आप मेरे लिए एक अद्भुत इनसान साबित हुए हैं. 2,00,000 पाउंड मेरे आने से पहले कार खरीदने और पंजीकरण करने में आप की मदद करने के लिए हैं.

‘मैं आने से पहले आप को कार के लिए कागजी कार्यवाही करने में सक्षम मानती हूं, तो मैं सफेद धारियों वाले बैग के अंदर अपने पासपोर्ट और इंटरनैशनल ड्राइविंग लाइसैंस की एक फोटोकौपी भी भेज रही हूं.

‘पैसे का कोई पता न लगा सके, इसलिए सामान के अंदर अच्छी तरह छिपा कर रखा है. मुझे इसे इस तरह से करना था, ताकि यह सुरक्षित रहे. जैसे ही आप कुरियर सेवा से पैकेट लेते हैं, कृपया मुझे बताएं. मैं अभी समुद्र तटीय इलाके में हूं.’

अगले दिन ही जेसिका ने मनोज को सामान का बैग और कुरियर परची का फोटो भेज दिया.

मनोज ने कुरियर की परची को ध्यान से पढ़ा था. उस में पूरा पता और लंदन का पता भी लिखा था. काला सा बड़ा बैग था. बैग के ऊपर भी कुरियर की परची चिपकी हुई थी.

अगले दिन फिर सुबह जेसिका का मैसेज मिला, ‘तुम्हें 3 दिन बाद ही बैग मिल जाएगा.’

सच में 3 दिन बाद ही एक फोन आया, ‘क्या आप मनोज बोल रहे हैं?’

‘‘जी, मैं मनोज बोल रहा हूं.’’

‘जी, आप का एक कुरियर लंदन से आया है. क्या यह कुरियर आप ही का है?’

‘‘जी, मेरा ही है.’’

‘क्या आप इस कुरियर को लेना चाहते हैं?’

‘‘जी हां, लेना चाहता हूं.’’

‘35,000 रुपए डिपौजिट करने पर यह कुरियर आप को पहुंचा दिया जाएगा.’

‘‘जी, वह क्यों?’’

‘सर, विदेश से आए कुरियर सरकारी टैक्स जमा करने के बाद ही मिलते हैं.’

यह सुनते ही मनोज को पसीना आना शुरू हो गया. इतनी बड़ी रकम उस के पास थी ही नहीं.

‘क्या आप अभी पैसे डिपौजिट कर रहे हैं? नहीं तो यह एक दिन बाद वापस चला जाएगा…’

‘‘मैं आप को बताता हूं,’’ इतना कह कर मनोज सोच में पड़ गया. सच कहें, तो उस के अकाउंट में 35,000 रुपए थे ही नहीं. अगर ये पैसे होते, तो शायद वह इन पैसों को अब तक दे देता. अमूमन जैसे लड़के प्यार के लिए कुछ भी कर देते हैं, मनोज ने ऐसा कुछ नहीं किया.

मनोज को पहली बार उसी शाम जेसिका का फोन आ गया. मनोज फोन उठाने के पहले सोच रहा था कि वह इंगलिश में बात करेगी. उस ने इंगलिश में कहा, ‘क्या तुम्हें गिफ्ट मिल गया है?’

मनोज उस की आवाज को पहली बार सुन रहा था. बहुत ही प्यारी, सुरीली, मीठी आवाज थी.

मनोज ने जवाब दिया, ‘‘मेरे पास 35,000 रुपए नहीं हैं.’’

‘कोई नहीं, तुम किसी से ले कर दे दो. बैग में बहुत पैसे हैं. इसे पाते ही तुम्हारी सारी तकलीफ दूर हो जाएगी.’

‘‘एक काम करो, तुम अभी मेरे अकाउंट में पैसे ट्रांसफर कर दो. मैं जा कर गिफ्ट ले लूंगा.’’

‘ओह डियर, अभी मैं समुद्र के किनारे हूं. जब मैं मैदानी इलाके में जाऊंगी, तो तुम्हें पैसे ट्रांसफर कर दूंगी. अभी तो तुम वहीं किसी से पैसे ले कर गिफ्ट ले लो. उस में बहुत सारे पैसे हैं.’

मनोज किसी भी तरह से जेसिका की बात को मान नहीं रहा था. वह हर तरह से उसे समझाने की कोशिश कर रही थी. धीरेधीरे वह गंभीर होने लगी. उस की प्यारी, मीठी, सुरीली आवाज कड़वी और भारी हो गई…

‘तुम मुझे धोखेबाज समझ रहे हो…’

‘‘नहीं… नहीं, तुम मुझे गलत समझ रही हो. मेरे मन में कोई ऐसी बात नहीं है.’’

‘तुम मुझे धोखेबाज समझ रहे हो. तुम मुझे धोखा दे रहे हो. तुम प्यार के लायक नहीं हो. मैं गिफ्ट वापस मंगा रही हूं,’ इतना कह कर जेसिका ने तुरंत फोन काट दिया.

उस दिन के बाद जेसिका का फोन कभी नहीं लगा. यहां तक कि वह फेसबुक, मैसेंजर से भी गायब हो गई थी. हां, हो सकता है कि वह नया प्यार ढूंढ़ रही हो, जिस से 35,000 रुपए मिल सकें. जो उसे धोखा न दे. अगर आप को ऐसा कोई मैसेज आए तो बताइएगा.

एस्कॉर्ट और साधु: मानस और विद्या का बिगड़ता रिश्ता

मानस डाइनिंग टेबल पर बैठा हुआ नाश्ते का इंतजार कर रहा था, पर विद्या की पूजा थी कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी. घर के मंदिर से घंटी की आवाजें लगातार मानस के कानों से टकरा रही थीं, पर इन सब से मानस को कोफ्त हो रही थी.

‘‘लगता है, आज भी औफिस की कैंटीन में ही नाश्ता करने पड़ेगा… और फिर मेरे लिए तो यह रोज का ही किस्सा है,’’ बुदबुदाते हुए उठा था मानस.

रोज बाहर नाश्ता करना मानस के रूटीन में आ गया था. इस सब की वजह उस की पत्नी विद्या ही थी. वह पूजापाठ में इतनी तल्लीन रहती कि सवेरे जल्दी उठने के बाद भी वह अपने पति को नाश्ता नहीं दे पाती थी.

विद्या का मानना था कि पूजापाठ इनसान को जीवन में जरूर करना चाहिए, क्योंकि इस से उस की अगली जिंदगी तय होती है और अगले जन्म में इनसान को पैसा, गाड़ी, मकान वगैरह का भरपूर सुख मिलता है.

ऐसा नहीं था कि विद्या कोई अनपढ़गंवार थी, बाकायदा उस ने यूनिवर्सिटी से बीए तक की पढ़ाई की थी, पर अपने घर के माहौल का उस पर ऐसा गहरा असर पड़ा था, जिस ने उसे धर्मभीरु बना दिया था.

अपने और मानस के कपड़ों के रंग के चुनाव विद्या दिन के मुताबिक करती थी, मसलन सोमवार को सफेद, मंगलवार को लाल से ले कर शनिवार को काले कपड़े पहनने तक के टाइम टेबल के मुताबिक ही चलती थी.

इतने तक तो कोई बात नहीं थी, मानस सहन कर लेता था, पर असली समस्या जब आती, जब मानस औफिस के काम से थका हुआ घर आता और रात को अपनी पत्नी से उस की देह की डिमांड कर के अपनी थकान मिटाना चाहता था, पर अकसर विद्या का कोई न कोई व्रत होता, कहीं एकादशी या कहीं किसी मन्नत पूरी करने के लिए व्रत या कहीं कोई साप्ताहिक व्रत.

अगर जानेअनजाने में मानस का हाथ भी उसे छू जाता, तो विद्या तुरंत ही जा कर गंगाजल पी लेती थी. कोई भी मर्द अपने पेट की आग को तो मार सकता है, पर अगर कई दिनों तक सैक्स का सुख नहीं मिले तो उसे अपने जिस्म की गरमी को सहन कर पाना उस के लिए नामुमकिन सा हो जाता है. ऐसा ही हाल मानस का था. विद्या के बहुत ज्यादा धार्मिक होने के चलते वह अनदेखा सा महसूस करता था.

प्यार में साथ नहीं मिलने पर कभीकभी बेचारा मानस अपने शरीर के उफान को दबा कर रह जाता और रातभर करवटें बदलता रहता. लिहाजा, अगले दिन औफिस में भी वह सुस्त रहता और कभीकभी काम लेट हो जाने के चलते उसे डांट भी पड़ जाती थी.

औफिस के बाकी साथियों का चेहरा जहां खिला हुआ रहता था, वहीं मानस का चेहरा बुझाबुझा सा रहता था.

‘‘क्या बात है मानस? आजकल तुम बुझेबुझे से रहते हो?’’ मानस के साथ काम करने वाली लिली ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं लिली… बस थोड़ी घरेलू समस्याएं हैं… इसीलिए थोड़ा परेशान रहता हूं.’’

‘‘कोई बात नहीं, धीरेधीरे सब सही हो जाएगा,’’ लिली ने कहा.

लिली का इस तरह से मानस के बारे में हालचाल पूछना, मानस को बहुत अच्छा लगा था.

अगले दिन औफिस से छुट्टी के समय मानस के मोबाइल पर लिली का फोन आया.

‘‘अरे मानस… अगर तुम मुझे लिफ्ट दे दो, तो मुझे घर जाने में आसानी रहेगी… दरअसल, मेरी स्कूटी पंक्चर हो गई है.’’

‘‘क्यों नहीं… बाहर आ जाओ… मैं तो पार्किंग स्टैंड पर ही खड़ा हूं.’’

मानस जब लिली को घर छोड़ने जा रहा था, तब लिली का साथ उसे बहुत अच्छा लग रहा था, ‘‘आओ… मानस अंदर आओ…

एकएक कप चाय हो जाए,’’ लिली ने मुसकरा कर जब चाय का औफर दिया, तो मानस उस के साथ अंदर ड्राइंगरूम में आ गया.

ड्राइंगरूम में लिली का पति पहले से बैठा हुआ था.

‘‘इन से मिलो… ये हैं मेरे पति राकेश. और राकेश, ये हैं मेरे औफिस के साथी मानस गोस्वामी,’’ लिली ने एकदूसरे का परिचय कराया.

‘‘आप लोग बैठो… मैं आप लोगों के लिए चाय बना कर लाती हूं,’’ कह कर लिली चाय बनाने चली गई और मानस और राकेश बैठ कर बातें करते रहे.

कुछ देर बाद मानस ने लिली के घर से विदा ली. वापसी में वह सोच रहा था कि लिली का पति कितना खुशकिस्मत है, जो इतनी मौडर्न और खूबसूरत बीवी मिली है और एक मैं हूं, औफिस से घर आओ तो भी मैडम पूजापाठ में या सत्संग में बिजी होती हैं, रात में भी उस के ध्यान करने का समय होता है… मेरी भी कोई जिंदगी है…’’

मानस ने औफिस में भी लोगों को अपनी पत्नी की तारीफ करते हुए सुना था कि कैसे उन की पत्नियां उन के खानेपीने का खयाल रखती हैं और खुद भी सजसंवर कर रूमानी मूड में रहती हैं.

जब मर्द को घर से प्यार नहीं मिलता, तब वह बाहर की दुनिया में प्यार तलाशता है. ऐसा ही हाल मानस का हो गया था और पिछले कुछ दिनों में लिली ने जो उस से निकटता बढ़ाई थी, उस से तो मानस को यह ही महसूस होने लगा था कि लिली उस से प्यार करती है.

‘पर भला वह क्यों मुझ से प्यार करने लगी… लिली के पास तो खुद ही एक  हैंडसम पति है,’ अपनेआप से बात करता हुआ मानस सोच रहा था.

‘तो क्या हुआ… आजकल तो नाजायज संबंध बनाना आम बात है और फिर लिली भी तो मुझ से निकटता दिखाती है. अगर मेरे हाथ उस के नाजुक अंगों से छू भी जाएं, तो भी वह बुरा नहीं मानती है… यह प्यार ही तो है… अब मैं इस वैलेंटाइन डे पर लिली से अपने प्यार का इजहार कर ही दूंगा,’ मन ही मन सोच रहा था मानस और जब वैलेंटाइन डे आया, तो एक प्यार भरा मैसेज टाइप कर के मानस ने लिली के मोबाइल पर भेज दिया और लिली के जवाब का इंतजार करने लगा.

जवाब तो नहीं आया, उलटा लिली जरूर आई और सब औफिस वालों के सामने मानस को खूब खरीखोटी सुनाई.

‘‘मैं तो आप को शरीफ आदमी समझ कर आप से बात करने लगी थी… मुझे क्या पता था कि आप किसी और ताक में हैं… आज के बाद मेरी तरफ नजर उठा कर भी मत देखिएगा, नहीं तो ठीक नहीं होगा,’’ गुस्से में लाल होती हुई लिली ने कहा.

जब मानस ने बहाना बनाया कि गलती से किसी दूसरे का मैसेज लिली पर फौरवर्ड हो गया था, तब जा कर बात शांत हुई थी.

उसी औफिस में मानस और लिली का एक कौमन दोस्त रहता था. विजय नाम का वह इनसान भी कभी लिली से प्यार किया करता था, पर लिली की शादी हो जाने के बाद से उस का लिली से अफेयर चलाने का कोई भी चांस खत्म हो गया था.

लिली को इस तरह से मानस द्वारा मैसेज किया जाना विजय को रास नहीं आया और उस ने मन ही मन मानस को सबक सिखाने की बात सोची.

औफिस के बाद विजय ने मानस का हमराज बनना चाहा कि क्यों मानस ने ऐसी हरकत की है, तो मानस गुस्से से फट गया, ‘‘अरे यार, किसी चीज की भी हद होती है…

अब भूखा आदमी अगर खाना ढूंढ़ने बाहर जाए, तो भला इस में क्या गलत है, मुझे घर में शारीरिक संतुष्टि नहीं मिलती, इसलिए मुझे लगा कि बाहर कहीं दांव आजमाना चाहिए… इसीलिए भावनाओं में बह गया मैं और उसे मैसेज कर बैठा.’’

‘‘यार, मेरी पत्नी भी कुछ इसी तरह की थी… आएदिन नखरे किया करती थी… मैं भी परेशान हुआ… फिर मैं ने इस समस्या का एक हल निकाल लिया,’’ तिरछी मुसकराहट के साथ विजय कह रहा था.

‘‘हल निकाला… क्या बीवी ही बदल दी तू ने क्या?’’ मानस ने पूछा.

‘‘बीवी नहीं बदली… पर खुद को बदल लिया…’’ विजय ने मोबाइल पर एक फोन नंबर दिखाते हुए कहा.

‘यह एक मसाज सैंटर चलाने वाले दलाल का नंबर है… जब मुझे मजा करना होता है, तब मैं इस नंबर पर फोन लगाता हूं और यह एक ऐस्कौर्ट को एक तय जगह या होटल या कभीकभी कार में ही भेज देता है…’’

‘‘ऐस्कौर्ट यानी… तू मुझे धंधे वाली के पास जाने को कह रहा है?’’

‘‘अरे नहीं… आजकल बड़े घर की लड़कियां अपने मजे और शौक के लिए ऐस्कौर्ट का काम करती हैं…’’ विजय ने अपना ज्ञान बघारा.

शाम को जब थका हुआ मानस घर आया, तो विद्या धार्मिक चैनल देख रही थी और जब मानस ने उस से चाय बना लाने के लिए कहा, तो वह बोली, ‘‘अरे, अभी थोड़ा रुक जाओ… देखते नहीं कि गुरुजी ‘समस्त कष्ट निवारण यज्ञ’ का तरीका बता रहे हैं… ऐसा करो, तुम खुद ही बना लो और एक कप मुझे भी दे देना.’’

झक मार कर मानस बैडरूम में चला गया.

रात हुई तो मानस ने बढि़या खुशबू वाला इत्र लगाया. दुकानदार ने दावा किया था कि इसे इस्तेमाल करेंगे, तो औरत आप से किसी बेल की तरह चिपकी रहेगी…

मानस ने विद्या के होंठों को चूमना चाहा, तो वह तुरंत ही पीछे हट गई और बोली, ‘‘नहीं, मुझे तंग मत करो… कल मेरा व्रत है… इसलिए यह सब आज नहीं. और सुनो… परसों मैं ने ‘समस्त कष्ट निवारण यज्ञ’ का आयोजन किया है, जिस के लिए मैं ने एक आचार्यजी से बात कर ली है. वे सुबह ही आ जाएंगे और 4-5 घंटे कार्यक्रम चलेगा… आप भी घर में ही रहना.’’

विद्या की बातें सुन कर मानस को गुस्सा आ गया, ‘‘नहीं, मैं तो घर में नहीं रुक पाऊंगा. तुम्हें जो करना है, करो. और अब जो मुझे करना है, वह मैं करूंगा,’’ और यह कह कर वह मुंह फेर कर सोने लगा.

अगली सुबह औफिस में जैसे ही विजय से मुलाकात हुई, वैसे ही मानस ने उस से कहा, ‘‘भाई मेरे शरीर में बहुत दर्द हो रहा है. लग रहा है, मुझे भी मसाज कराना पड़ेगा… जरा वह मसाज सैंटर वाला नंबर मुझे भी देना… मैं भी ऐंजौय करना चाहता हूं.’’

विजय ने शरारती ढंग से देखते हुए मानस को नंबर दिया और मानस ने उस नंबर पर बात की.

दलाल ने मानस को बताया कि कल उसे ठीक 12 बजे एक मैसेज आएगा, जिस पर पहुंचने का पता होगा और साथ ही एक अकाउंट नंबर भी लिखा होगा, जिस पर उसे एडवांस पेमेंट करनी होगी, तभी मसाज की सुविधा मिल पाएगी.

मानस ने सारी बात मान ली और अगले दिन बेसब्री से 12 बजने का इंतजार करने लगा.

उधर, विद्या ने भी ‘समस्त कष्ट निवारण यज्ञ’ रखवाया था. सुबह होते ही वह उसी की तैयारी करने में बिजी हो गई, जबकि मानस के अंदर बेचैनी बढ़ती जा रही थी.

ठीक 12 बजे मानस के मोबाइल पर एक मैसेज आया, जिस में एक एकाउंट नंबर था और एक होटल का नाम भी था, जहां पहुंचने पर उसे पहले से बुक एक कमरे में जाना था, जहां उसे मसाज की सुविधा दी जानी थी.

मानस को होटल के कमरे तक पहुंचने में कोई दिक्कत नहीं हुई और वह बेसब्री से ऐस्कौर्ट का इंतजार करने लगा.

वह समय भी आ गया, जब कमरे के अंदर एक लड़की आई. उसे देख कर मानस के पसीने छूट गए.

‘‘भला इतनी खूबसूरत लड़की भी ऐसा काम कर सकती है… पर, मुझे क्या, मैं ने भी तो पूरे 10,000 रुपए दिए हैं इस के लिए… अब तो मुझे वसूलना भर है,’’ ऐसा सोच कर मानस किसी भूखे भेडि़ए की तरह उस लड़की पर टूट पड़ा.

अभी मजा लेते हुए मानस को कुछ ही समय हुआ था कि होटल के कमरे का दरवाजा अचानक से खुल गया और 2 आदमी अंदर घुंस आए, जिन में से एक के हाथ में मोबाइल था और वे लगातार मानस और उस लड़की का वीडियो बनाने में लगा हुआ था.

मानस चौंक पड़ा था और वह लड़की अपने कपड़े पहनने लगी थी.

‘‘तुम ने ठीक पहचाना… इस मोबाइल में तुम्हारी पूरी फिल्म बन गई है… अब ये हम पर है कि इसे हम किसकिस को दिखाएं… इंटरनैट पर डालें या तुम्हारे घरपरिवार वालों को दे दें… या तुम्हारे औफिस में इसे सब के मोबाइलों पर भेज दें… फैसला तुम्हारे हाथ में है,’’ उन में से एक आदमी बोला.

अचानक से मानस का माथा ठनका, ‘‘आखिरकार ऐसा क्यों कर रहे हो तुम लोग…’’ मानस चीखा.

‘‘एक लाख रुपए के लिए… नहीं तो यह वीडियो अभी वायरल कर दिया जाएगा… पैसे दो और यह वीडियो हम तुम्हारे सामने ही डिलीट कर देंगे.’’

मानस ने देखा कि कमरे में सिर्फ वे 2 आदमी ही खड़े थे. वह लड़की वहां से जा चुकी थी. मानस को समझते देर नहीं लगी कि यह पूरा एक ही गैंग है और इन्हें बिना पैसे दिए इन से छुटकारा पाना मुमकिन नहीं होगा, इसलिए उस ने बिना देर किए पूरे 50,000 रुपए नैटबैंकिंग की मदद से उन दोनों द्वारा बताए गए अकाउंट नंबर पर ट्रांसफर कर दिए और बाकी के 50,000 रुपए का चैक काट दिया.

उन दोनों आदमियों ने भी शराफत दिखाते हुए वह वीडियो मानस के सामने ही डिलीट कर दिया.

अपना पैसा लुटा कर भारी मन से घर लौटने लगा था मानस. जब वह घर पहुंचा, तो वहां का दृश्य देख कर उस के हाथपैर फूल गए.

कमरे में चारों तरफ धुआं फैला हुआ था और विद्या एक कोने में सिर नीचे किए बैठी थी.

मानस ने विद्या से पूछा, तो पता चला कि जो साधु ‘समस्त कष्ट निवारण यज्ञ’ कराने के लिए घर में आया था, उस ने यज्ञ के बहाने घर में नशीला धुआं भर दिया, जिस से विद्या बेहोश होने लगी और तब वह साधु घर में रखी हुई कीमती चीजें, नकदी और गहने ले कर चंपत हो गया.

विद्या रो रही थी. मानस भी दुखी था और सोच रहा था कि अति हर चीज की बुरी होती है.

विद्या की पूजा की अति ने ही आज हम दोनों को इस मुकाम तक पहुंचा दिया है.

पर भला अपने लुटने की बात मानस विद्या से कैसे कहता, सो दोनों एकदूसरे के आंसू पोंछते रहे.

विद्या ने इतना जरूर कहा कि आज के बाद वह किसी साधु को घर में नहीं घुसाएगी. उस की आंखों पर तना हुआ अंधविश्वास का परदा हट रहा था.

प्यार का रिश्ता: कौनसा था वह अनाम रिश्ता

‘‘लक्ष्मी, एक अच्छी खबर है.’’ ‘‘क्या…?’’ लक्ष्मी ने पूछा. ‘‘मैं ने अपनी रीना का रिश्ता पक्का कर दिया है.’’ ‘‘अभी वह 14 साल की ही तो है.’’ ‘‘चुप रह. ज्यादा जबान न चलाया कर. 1-1 कर के 4-4 बेटियां पैदा कर दीं और अब मुझे कानून पढ़ा रही है. ‘‘बैजनाथ अपने भतीजे रमेश के लिए अपनी रीना का हाथ मांग रहे थे. मैं ने हां कर दी. शाम को 4-5 लोग रिश्ता पक्का करने के लिए आएंगे. रीना  को तैयार कर देना. यह पकड़ मिठाई  का डब्बा.’’ ‘‘कैसी बात कह रहे हैं रीना के बापू. कहां हमारी नाजुक सी बेटी और कहां तुम्हारी उमर का दुहाजू रमेश.’’ ‘‘बस, अब आगे जबान मत खोलना. आदमी की उम्र नहीं देखी जाती है, उस की कमाई देखी जाती है. मुंबई में तुम्हारी बेटी राज करेगी.

‘‘पूरीसब्जी बना लेना. खाना अच्छी तरह बनाना, कुछ गड़बड़ मत करना. रमेश वहां टैक्सी चलाता है. 1,000 रुपए तो रोज के आसानी से कहीं गए नहीं हैं. वह बता रहा था.’’ शाम को रमेश अपने काकाकाकी को ले कर आया. लाल चमकीली कढ़ी हुई साड़ी, पायलचूड़ी और सोने की अंगूठी पहना कर रीना की शादी पक्की कर दी. ढोलक पर गीत गाए गए, खानापीना और रात में शराब का पीनापिलाना भी हुआ. रीना के लिए शादी का मतलब केवल सजनासंवरना, बढि़या साड़ी, चूड़ी, पायल, महावर, सिंदूर, पाउडर और लिपिस्टिक था. उस की निगाहें तो उस सामान से हट कर रमेश की तरफ गई ही नहीं. अम्मां आंसुओं से रोई जा रही थीं.

बापू गाली दे कर बोल रहे थे, ‘‘असगुन मना रही है रोरो कर.’’ रीना तो अपनी शादी के बाद मुंबई जाने की खुशी में फूली नहीं समा रही थी. उस ने जल्दीजल्दी चूडि़यां पहन लीं, पाउडर और लिपिस्टिक लगा कर वह खुद को बारबार आईने में देख रही थी.  तभी रीना की सहेलियां सोनाली और गौरी आ गईं और उस की साड़ी, पायल और अंगूठी को लालची निगाहों से छूछू कर देखने लगीं. उन लोगों की निगाहों में उस के लिए जलन थी. ‘‘क्या री रीना, अब तू मुंबई में रहेगी?’’  ‘‘और नहीं तो क्या. मैं वहां फिल्म देखने जाऊंगी.’’ रीना दिनरात मुंबई नगरी के ख्वाबों में खोई रहती. कैसा होगा मुंबई शहर? वह तो कभी रेलगाड़ी में भी नहीं बैठी थी. कभी गांव से बाहर ही नहीं गई थी.

यहां तो उसे हर 2-4 दिन के बाद भूखे पेट सोना पड़ता था. बापू को मजदूरी न मिलती तो रोटी कैसे पकती या वह शराब पी कर आते तो अम्मां को मारते और गाली देते थे. रोतेरोते वह डर के मारे कोने में दुबक कर सो जाती. रीना रंगबिरंगे सपनों की दुनिया में खोई हुई थी, तभी उस के मन में खयाल यह आया कि कहीं रमेश भी नशा कर के उसे पीटेगा तो नहीं? लेकिन सुखद भविष्य के बारे में सोच कर उस का मन बोला, ‘नहींनहीं…’ एक दिन शाम को रीना अपनी सहेली गौरी के पास जा रही थी, तभी पीछे से किसी ने उसे बांहों में भर लिया. वह घबरा कर चिल्ला पड़ी, तो उस ने उस के मुंह पर अपनी हथेली रख दी. रमेश को पहचान कर रीना शरमा गई थी. गोराचिट्टा रमेश उसे अच्छा लगा था. टीशर्ट और पैंट पहना हुआ, हाथ में घड़ी बांधे हुए वह किसी फिल्मी हीरो से कम नहीं लग रहा था.

8-10 दिन के अंदर ही रीना ब्याह कर के रमेश के साथ मुंबई आ गई थी. वह आंखें फाड़फाड़ कर ऊंचीऊंची इमारतों पर सजी हुई रंगबिरंगी रोशनियों को देख कर हैरानी से भर उठी थी. अपनी आंखों में सुनहरे भविष्य के अनगिनत सपने संजोए हुए रीना अपने घर पहुंची थी. वहां सासू मां ने उस का आरती कर के स्वागत किया था. ‘‘रमेश की बहू तो सुंदर है, लेकिन उम्र में अभी छोटी है,’’ किसी ने कहा. आसपास की औरतें, बच्चे रीना को झांकझांक कर देखने की कोशिश कर रहे थे. सासू मां ने उसे खाने के लिए पूरीसब्जी और खीर दी थी.

रीना को तो शादी बड़ा फायदे का सौदा समझ में आ रहा था. बढि़या खाना, बढि़या कपड़े, सजनासंवरना, उस की खुशी का ठिकाना नहीं था. लेकिन रात में जब रमेश ने उस के तन को घायल किया तो उस का मन भी घायल हो  उठा था. वह तड़प कर चीख उठी थी और सासू मां के आंचल में आ कर दुबक गई थी.  अगली सुबह रीना देर तक सोती रही थी. जब उस की आंखें खुली थीं, तो दिन चढ़ आया था. सासू मां रमेश को धीरेधीरे कुछ समझा रही थीं. रमेश को देखते ही रीना डर के मारे कांप उठी थी. रात की बातों को याद कर के वह घबरा उठी थी. रमेश अपने काम पर चला गया था. सासू मां ने उस के लिए आलू का परांठा बनाया था, फिर उसे प्यार से समझाने लगीं कि शादी का मतलब ही यही होता है, इसलिए रमेश से डरो नहीं, अब वह तुम्हारा पति है.

रमेश शाम को घर लौट कर आया, तो रीना के लिए रसगुल्ले ले कर आया. उस ने आहिस्ता से रीना की हथेली को चूम लिया था. फिर उस ने उसे अपनी बांहों में भर लिया था.  धीरेधीरे रीना को रमेश अच्छा लगने लगा था. उस की प्यार भरी छेड़छाड़ से उस के मन में गुदगुदी हो उठती थी. वह रोज ही उस के लिए कुछ न कुछ खाने के लिए ले आता था. सासू मां भी काम पर चली जाती थीं. वे घर का काम करती थीं. झाड़ूबुहार, बरतन, कपड़ा, सब काम उन के लिए नया नहीं था.  एक दिन सुबह ही रमेश ने रीना को कह दिया कि शाम को तैयार रहना, आज तुझे घुमाने ले जाऊंगा. रीना सुबह से ही बहुत खुश थी. रमेश उसे अपनी आटोरिकशा में बिठा कर जुहूचौपाटी ले कर गया. वहां लोगों की भीड़ देख ऐसा लग रहा था कि जैसे मेला लगा हो. वहां रीना ‘बर्फ का गोला’ खा कर बहुत खुश हुई थी. सब तरफ लोग कुछकुछ खापी रहे थे. उस ने तो कभी नदी भी नहीं देखी थी, इतना  बड़ा समुद्र देख कर वह हैरानी से भर उठी थी.  रमेश ने उसे ठंडी बोतल पिलाई, गोलगप्पे खिलाए. वे दोनों घंटों समुद्र के किनारे बैठे रहे थे.

रमेश उस की हथेलियों को पकड़ कर बैठा हुआ मीठीमीठी बातें कर रहा था. रीना सजधज कर अपनेआप को महारानी से कम नहीं समझती थी. अब वह रमेश के लौटने का इंतजार करती, क्योंकि उस की प्यारभरी छेड़छाड़ उसे अच्छी लगती थी. यहां पर रीना के घर में गैस का चूल्हा था, टैलीविजन था और पानी ठंडा करने वाली मशीन भी थी. गांव में तो लकड़ी जला कर रोटी बनाती तो धुएं  के मारे रोतेरोते उस की आंखें लाल हो जाती थीं.

जब रीना को अपनी अम्मां की याद आती, तो रमेश अपने फोन से अपने बापू से बात करवा देता था. फिर रीना पेट से हो गई थी. सासू मां भी खुश थीं और रमेश भी बहुत खुश था. वह उस के इर्दगिर्द घूमता रहता. कभी काम पर जाता, कभी नहीं जाता. कभी उसे फिल्म दिखाने ले जाता, कभी बाजार ले जाता. वह बहुत खुश थी. सासू मां भी कोठी से उस के खाने के लिए कुछ न कुछ जरूर ले कर आतीं. रमेश की एक बात से रीना को गुस्सा आता था कि वह उसे किसी से बात करते हुए नहीं देख पाता था. वह कहीं भी किसी औरत से भी बात करे तो वह नाराज हो जाता था.

रीना ने परेशान हो कर एक दिन सासू मां से पूछा, तो उन्होंने बताया कि रमेश की पहली बीवी किसी दूसरे के चक्कर में पड़ कर उस के साथ भाग गई थी, इसीलिए वह हर समय उसे अपनी आंखों के सामने रखना चाहता था. समय आने पर रीना छोटी सी उम्र में जुड़वां बच्चों की मां बन गई. अस्पताल में आपरेशन और दवा में काफी खर्चा आया. 2 नन्हें बच्चों के दूध, दवा, डाक्टर, रोज के खर्चे बहुत बढ़ गए. वह बच्चों के साथ ज्यादा बिजी रहती. कमजोरी के चलते जल्दी थक जाती थी. अब वह रमेश की ओर ध्यान नहीं दे पाती थी. वह बातबात पर चिड़चिड़ाने लगा था.

रीना समझ गई थी कि रमेश शराब पी कर आने लगा है, क्योंकि वह उस के साथ भी जब जाता था तो कुछ चुपचाप से पी कर आता था. जब वह पूछती, तो कह देता कि यह उस की ताकत की दवा है. लेकिन रीना जानती थी कि रमेश शराब पीता है, क्योंकि नशा करने के बाद वह जानवर की तरह उस पर टूट पड़ता था और अब जबकि वह बच्चों के चलते उस के काबू में नहीं आती तो वह गालीगलौज और उस के कुछ बोलने पर पिटाई करने के लिए हाथ उठाने लगा था. रीना के सपने और खुशियां दफन होने लगी थीं. एक तरफ 2 नन्हें बच्चे तो दूसरी तरफ रमेश का रोजरोज नशा करना. वह कभी काम पर जाता, कभी नहीं जाता. पैसे की तंगी होने लगी. घर का माहौल बिगड़ने लगा. लड़ाईझगड़ा, कलह, गालीगलौज और मारपीट रोज की कहानी हो गई थी.

एक दिन रमेश नशा कर के घर आया, तो सासू मां ने उसे डांटा. उस ने बिगड़ कर खाने की थाली उठा कर फेंक दी और जब रीना रोने लगी तो उस ने उसे जोर से धक्का दे दिया था, ‘‘टेसुए बहाती है, मेरा पैसा?है, तुम कौन होती हो मुझे रोकने वाली?’’ उस दिन रीना को अपनी अम्मां की बहुत याद आई थी. वह तो कह भी नहीं सकती थी कि अम्मां के घर जाना है. वहां तो खाने का भी ठिकाना नहीं था. तकरीबन महीनाभर हो गया था, रमेश दिनभर घर पर पड़ा रहता और चार समय खाना मांगता.  ‘‘काम पर क्यों नहीं जाता है?’’ ‘‘बस… मेरी तबीयत ठीक नहीं है.’’ ‘‘नशा करने के समय तबीयत ठीक हो जाती है. एक पैसा दे नहीं रहे हो, चार समय रोटी खाने को चाहिए, कहां से आएगी रोटी?’’ ‘‘मेरी रोटी गिनती है,’’ फिर गाली देते हुए रमेश बोला, ‘‘तेरे चलते ही मैं बरबाद हो गया. बैंक वालों की किस्त नहीं दे पाया तो वे लोग मेरा आटोरिकशा उठा कर ले गए. तुझे खुश करने के लिए कभी सिनेमा ले जाता, तो कभी आइसक्रीम खिलाता. ‘आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपया’.

बस अब तो ठनठन गोपाला.’’ रमेश गुस्से में पैर पटकता हुआ घर से चला गया था. बच्चे 4 साल के हो गए थे, उन्हें स्कूल भेजना था. रीना ने मन ही मन काम करने का निश्चय कर लिया. अब वह रमेश की एक भी न सुनेगी. अगले दिन से ही सोसाइटी में उसे 3 घरों में काम मिल गया था. एक अंकल तो बुजुर्ग थे. वे घर में बिलकुल अकेले रहते थे. उन के यहां उसे खाना, झाड़ूबरतन, कपड़ा सब करना था. उन्होंने 10,000 रुपए महीना देने को बोला, तो उस की तो बांछें खिल गई थीं. इसी तरह से 2 घरों में और उसे काम मिल गया. मुंबई के छोटेछोटे घर, साफसुथरे, उन घरों में काम करने में उसे मजा आता. अब रीना जितनी देर घर से बाहर रहती, वहां के झंझट और कलहक्लेश से दूर रहती. वहां जा कर मैडम मान्या के 2 छोटेछोटे बच्चे थे. उन को देख कर, उसे अपने फटेहाल बच्चे आंखों के सामने घूम जाते.

लेकिन रीना चुपचाप अपना काम करती थी. जैसे ही उन्हें पता लगा कि उस के 2 बच्चे हैं, वह चौंक उठी थीं, ‘‘तुम तो लड़की सी लगती हो. तुम्हारे बच्चे हैं?’’ उन्हें बड़ी हैरानी हुई थी. मैडम मान्या ने अपने कई सूट निकाल कर दे दिए थे. जब बच्चे की बात सुनी तो बच्चे के भी कपड़े दे दिए. अंकल के यहां से खाना तय था वह उस के बच्चों के काम आता. महीनेभर में ही रीना की हालत सुधर गई. अब उस ने रमेश की फिक्र करना बिलकुल बंद कर दिया. उन दोनों के बीच बस अब एक ही रिश्ता बचा था. वह नशे में उस के शरीर पर टूट पड़ता और अपनी भूख मिटा कर बेहोशी की नींद सो जाता. अब वह रमेश को एक देह ही समझती, उस के मन के कोने में उस के लिए नफरत बढ़ती जा रही थी.

रमेश का शराब का चसका इतना बढ़ गया था कि बक्से, अलमारी में उस का छिपाया हुआ पैसा, सब चुरा कर ले गया. रीना ने तकिए के अंदर अपनी सोने की अंगूठी और पायल छिपा कर सिल दी थी. वह भी नशे के लिए रमेश चुरा कर ले गया था. शराब के नशे में रमेश कभी नाली में पड़ा मिलता, तो कभी ठेके पर. जब चाल वाले रीना को खबर करते, तो वह पकड़ कर ले आती. लेकिन अब जब वह गाली देता तो वह भी चार सुनाती.

अगर मारने को वह हाथ उठाता, तो वह भी जो हाथ में आता उठा कर मार देती. जिस दिन रीना को पता लगा कि वह उस की अंगूठी, रुपए, पायल चुरा ले गया?है, उस दिन उस ने उसे चुनचुन कर गाली दी और धक्के मार कर घर से निकाल दिया था.

सरिता मैडम बैंक में काम करती थीं, उन्होंने रीना का अकाउंट बैंक में खुलवा दिया. उस की एक रैकरिंग की स्कीम भी चालू करवा दी. अब वह अपने पैरों पर खड़ी थी. इस के अलावा कपड़ेत्योहार वगैरह अलग मिल जाते थे. अब वह रमेश से नहीं डरती थी और न ही उस की परवाह करती थी. सोसाइटी में दूसरी बाइयों के साथ खूब बातें होतीं, सब की एक सी परेशानी रहती, लेकिन आपस में हंसीमजाक कर  के सब अपना दिल हलका कर लेती थीं. वहीं पर रीना की मुलाकात सुनील से हुई थी.

वह वहां पर प्लंबर था. छोटी सी आपसी मुसकान दोस्ती में बदल गई थी.  ‘‘काहे री छम्मकछल्लो, आज बड़ी सुंदर लग रही हो,’’ सुनील बोला. रीना मुसकरा कर शरमा गई. अभी वह 23-24 साल की ही तो थी. उस के मन में भी तो अरमान थे. इधर रमेश की हालत बिगड़ती चली जा रही थी. उस का लिवर खराब हो रहा था. वह उस के लिए दवा ले आती, लेकिन उस से कोई फायदा नहीं होता.

रीना और सासू मां दोनों मिल कर रमेश को ‘नशा मुक्ति सैंटर’ ले गईं. सुनील ने बताया था कि पहले वह भी शराब पीने लगा था, लेकिन वहां से इलाज करा कर ठीक हो गया. रमेश भी वहां भरती रहा. उस का नशा छूट भी गया था, लेकिन वहां से लौट कर आते ही उस ने फिर से शराब पीना शुरू कर दिया था. अब उस की हालत पहले से ज्यादा बिगड़ गई थी. रीना रमेश की हरकतों से तंग हो चुकी थी, इसलिए वह अपने काम पर खूब सजधज कर जाती.

सुनील उस के लिए चूड़ी ले आया था. वह पहन कर अपने हाथों को निहारती हुई निकल  रही थी. तभी रमेश गाली देते हुए चिल्लाया, ‘‘काम पर जाती है कि अपने यार  से मिलने जाती है. ऐसे सजधज कर निकलती है, जैसे मेला देखने जा रही हो.’’ ‘‘काहे गाली दे रहे हो. मुझे भरभर हाथ चूड़ी अच्छी लगती है तो पहनती हो. काहे को गुस्सा हो रहे हो. तुम्हारे नाम की ही तो चूड़ी पहनती हूं,’’ इतना कह कर रीना जल्दीजल्दी अपने काम पर जाते के लिए निकल पड़ी थी.

चाल में आतेजाते अखिल मिल जाता था. वह भी देवर बन कर उस से हंसीमजाक करता. पहले तो रमेश के डर से रीना बाहर निकलती ही नहीं थी. अब वह आराम से उस से भी बात करती.  ‘‘भाभीजी, बड़ी लाइट मार रही हो,’’ अखिल बोला. तारीफ भला किसे नहीं पसंद. वह भी उस के समय से ही निकलती. वह रमेश के सामने भी कई बार उस के घर चाय पीने आ जाता. ‘‘रमेश भैया, बड़े किस्मत वाले हो, जो ऐसी पत्नी मिली, घर भी संभाल रही है और बाहर भी,’’ अखिल जब यह बोलता, तब रमेश कुढ़ कर रह जाता. रीना खूब सजधज कर अपने काम पर जाया करती, जो रमेश को बहुत नागवार गुजरता, लेकिन अब वह उस की परवाह नहीं करती थी. दूसरा, वह शारीरिक रूप से बहुत कमजोर हो चुका था.

रमेश अपनी अम्मां से चुपचाप पैसा ले लेता और शराब पी आता. अब तो डाक्टर ने भी मना कर दिया था. रीना कभी डाक्टर के हाथ जोड़ती, तो अस्पताल भागती. उसे काम से भी छुट्टी लेनी पड़ती, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल रहा था. मैडम से रोजरोज छुट्टी मांगती तो वे चार बातें सुनातीं. इधर बच्चों की अलग स्कूल से शिकायत आई थी. रीना तो पढ़ीलिखी नहीं थी. उस ने सुनील के सामने अपनी समस्या रखी तो वह पढ़ाने को राजी हो गया. उस ने पैसे की बात पूछी, तो उस ने मना कर दिया. सुनील रोज सुबहसुबह बच्चों को पढ़ाने के लिए आने लगा. कभी वह तो कभी सासू मां सुबह उस को चायनाश्ता करवा देतीं. यह आपसी तालमेल अच्छा बन गया था.

बच्चों के इम्तिहान में नंबर अच्छे आए, तो उस का मन खुश हो गया था. रमेश की हालत बिगड़ती जा रही थी. वह समझ रही थी कि अब रमेश ज्यादा दिन नहीं रहेगा. एक दिन रीना काम पर गई हुई थी, तभी उस के फोन पर खबर आई कि तेरा रमेश हिचकी ले रहा है. वह भाग कर घर आई थी. पीछेपीछे सुनील भी आ गया था. रमेश सच में इस दुनिया से विदा हो गया था. फिर शुरू हो गया चाल की औरतों का जुड़ना, रिश्तेदारों का आना और रोनाधोना, सासू मां पछाड़ें खा रही थीं. दोनों बच्चे भी ‘पापापापा’ कह कर रो रहे थे.

सब रीना से रोने को बोल रहे थे, लेकिन उसे रोना ही नहीं आ रहा था. कोई रोने को बोल रहा, कोई चूड़ी तोड़ रहा तो कोई मांग से सिंदूर पोंछ रहा था. रीना मन ही मन सोच रही थी, ‘मैं क्यों रोऊं? चला गया तो अच्छा हुआ. मेरी जान का क्लेश चला गया. कभी चैन नहीं लेने दिया, कभी कोठी के अंकल के साथ नाम जोड़ देता तो कभी सुनील तो कभी अखिल के साथ. जिस से भी मैं दो पल बात करती, उसी के साथ रिश्ता जोड़ देता. गाली तो हर समय जबान पर रहती…’ रमेश की अर्थी उठनी थी, इसलिए पैसे की जरूरत थी. उस ने मान्या मैडम को फोन कर के बताया था कि उस का आदमी नहीं रहा है, इसलिए पैसे की जरूरत है.

सुनील जा कर पैसे ले आया था. रीना मन ही मन सोच रही थी ‘वाह रे पैसा, जब बच्चा पैदा हुआ था, तो आपरेशन, दवा के लिए पैसा चाहिए, इनसान की मौत हो गई है तो दाहसंस्कार के लिए भी पैसा.’  रमेश की अर्थी सज चुकी थी. सुनील घर के सदस्य की तरह आगे बढ़ कर सारे काम जिम्मेदारी से कर रहा था. सासू मां और चाल की औरतें चिल्लाचिल्ला कर रो रही थीं. तीसरे दिन हवन और शांतिपाठ हो कर शुद्धि हो गई थी. अगली सुबह जब वह काम पर जाने के लिए निकलने लगी, वैसे ही सासू मां उस पर चिल्ला उठी थीं ‘‘कैसी लाजशर्म छोड़ दी है. शोक तो मना नहीं रही और देखो तो काम पर जा रही है. ऐसी बेशर्मबेहया औरत तो देखी नहीं.’’ बूआ ने नहले पर दहला मारा था, ‘‘कैसी सज के जा रही है, किसी के संग नैनमटक्का करती होगी. इसी बात से रमेश दुखी हो कर शराब पीने लगा होगा.’’

रीना अब किसी की परवाह नहीं करती. वह रंगबिरंगे कपड़े पहनती, हाथों में भरभर चूडि़यां पहनती, पाउडर, लिपिस्टिक और बालों में गजरा भी लगाती. देखने वाले उसे देख कर आह भरते. ‘किस पर बिजली गिराने चल दी.’  ‘अब तो रमेश भी नहीं रहा. किस के लिए यह साजसिंगार करती हो…’ ‘‘मैं अपनी खुशी के लिए सजती हूं.’’ ‘‘रीना कुछ तो डरो. विधवा हो, विधवा की तरह रहा करो,’’ पीछे से सासू मां की आवाज थी, पर वह अनसुनी कर के चली जाती. सुनील उस के लिए चांदी की झुमकी ले आया था. वह पहनने को बेचैन थी. उस ने सासू मां से कहा, ‘‘मैडम ने दीवाली के लिए दी है.’’ हाथ में पैसा रहता, रीना तरहतरह की सजनेसंवरने की चीजें खरीदती और मैडम लोगों के कपड़े भी मिल जाते.

उसे बचपन से शोख रंग के कपड़े पसंद थे. अब वह अपने सारे शौक पूरे कर रही थी. अब उसे न तो सासू मां के निर्देशों की परवाह थी और न ही चाल वालों के तानों की. सासू मां को रमेश का जाना और रीना की मनमानी बरदाश्त नहीं हो रही थी. वे कमजोर होती जा रही थीं. एक दिन वे रात में बाथरूम के लिए उठीं तो गिर पड़ीं.

मालूम हुआ कि उन्हें लकवे का अटैक आ गया है. रात में तो किसी तरह बच्चों की मदद से उन्हें चारपाई पर लिटा लिया, लेकिन सुबह जब डाक्टर बुला कर सुनील लाया तो पता चला कि उन का आधा शरीर बेकार हो गया है.  ऐसे मुश्किल समय में सुनील रीना की मदद को आगे आया था. वह भी परेशान था, सोसाइटी की नौकरी छूट गई थी, कहीं रहने का ठिकाना भी नहीं था. उस ने उसे अपने घर में रख लिया. वह रिया और सोम को पढ़ाता. घर के लिए सागसब्जी ले आता.

सब से ज्यादा तो सासू मां के काम में सहारा करता. रीना को उस के रहने से सहूलियत हो गई थी. दोनों के बीच एक अनाम रिश्ता हो गया था. वह पढ़ालिखा था, नौकरी छूटने के चलते वह आटोरिकशा चलाने लगा था. लोग तरहतरह की बातें बनाते. रीना एक कान से सुनती दूसरे से निकाल देती. एक दिन सासू मां सोई तो सोती रह गई थीं. खबर सुनते ही लोगों की भीड़ तरहतरह की कानाफूसी कर रही थी. सासू मां के जाने का गम रीना सहन नहीं कर पा रही थी, इसलिए वह रोरो कर बेहाल थी.  सुनील ने ही आगे बढ़ कर सारा काम किया था. रिश्तेदार ‘चूंचूं’ कर  रहे थे. ‘‘यह कौन है?

दूसरी बिरादरी का है.’’ ‘‘यह रीना का नया खसम है. इसी के चक्कर में तो रमेश को नशे की लत लग गई थी और सास भी इसी गम में चली गई,’’ कहते हुए रिश्ते की एक ननद रोने का नाटक कर रही थी. रीना के लिए चुप रहना मुश्किल हो गया था, ‘‘इतने दिन से सासू मां खटिया पर सब काम कर रही थीं, तो कोई नहीं आया पूछने को कि रीना अम्मां को कैसे संभाल रही हो. सुनील ने उन की सारी गंदगी साफ की. अम्मां तो उसे आशीर्वाद देते नहीं थकती थीं.

आज सब बातें बनाने को खड़े हो गए.’’ सब तरफ सन्नाटा छा गया था. अब रीना को किसी की परवाह नहीं थी कि कौन क्या कह रहा है. कई दिनों से सुनील अनमना सा रहता. वह देख रही थी कि वह बच्चों से भी बात नहीं करता. सुबह जल्दी चला जाता और देर रात लौटता. ‘‘क्यों सुनील, कोई परेशानी है तो बताओ?’’ ‘‘नहीं, मैं अपने लिए खोली ढूंढ़  रहा था. पास में मिल नहीं रही थी, इसलिए दूर पर ही लेना पड़ा. आज एडवांस दूंगा.’’ ‘‘क्यों? यहीं रहो, मुझे सहारा है  और बच्चों के भी कितने अच्छे नंबर आ रहे हैं.’’ ‘‘लोगों की उलटीसीधी गंदी बातें सुनसुन कर मेरे कान पक गए हैं.

अब बरदाश्त नहीं होता. अब अम्मां भी नहीं रहीं. मेरा यहां क्या काम?’’ ‘‘लोगों का तो काम है कहना. आज एडवांस मत देना. शाम को बात करेंगे,’’ कह कर रीना अपने काम पर चली गई थी. सुनील अभी लौटा नहीं था. बच्चे सो गए थे. उस ने सुहागिनों की तरह अपना सोलह सिंगार किया था. वही लाल साड़ी पहन ली, जो सुनील उस के लिए लाया था. सिंगार कर के जब आईने में अपने अक्स को देखा, तो अपनी सुंदरता पर वह खुद शरमा उठी थी.  तभी आहट हुई थी और सुनील उस को देखता ही रह गया था. रीना ने कांपते हाथों से सिंदूर का डब्बा सुनील की ओर बढ़ा दिया. उस रात वह सुनील की बांहों में खो गई थी. अनाम रिश्ते को एक नाम मिल गया था ‘प्यार का रिश्ता’.

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